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Computer Proficiency Certification Test
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Question Paper Name : REMINGTON GAIL 22nd October 2021 Shift 1
Subject Name : Remington GAIL
Creation Date : 2021-10-22 16:15:24
Duration : 25
Calculator : None
Magnifying Glass Required? : No
Ruler Required? : No
Eraser Required? : No
Scratch Pad Required? : No
Rough Sketch/Notepad Required? : No
Protractor Required? : No
Show Watermark on Console? : No
Highlighter : No
Auto Save on Console? ( SA type of questions will be always auto saved ) : Yes
Mock
Group Number : 1
Group Id : 2549892946
Group Maximum Duration : 10
Group Minimum Duration : 10
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Break time : 1
Mandatory Break time : Yes
Group Marks : 0
Is this Group for Examiner? : No
Hindi Mock
Section Id : 2549894586
Section Number : 1
Section type : Typing Test
Mandatory or Optional : Mandatory
Number of Questions : 1
Number of Questions to be attempted : 1
Section Marks : 0
Enable Mark as Answered Mark for Review and Clear Response : Yes
Sub-Section Number : 1
Sub-Section Id : 2549894627
Question Shuffling Allowed : No
Question Number : 1 Question Id : 25498941842 Question Type : TYPING TEST
एक बार की बात है, अकबर और बीरबल शिकार पर जा रहे थे। अभी कु छ समय हुआ था कि उन्हें एक हिरण दिखा। जल्दबाजी में तीर निकलते हुए
अकबर अपने हाथ पर घाव लगा बैठा। अब हालात कु छ ऐसे थे कि अकबर बहुत दर्द में था और गुस्से में भी।
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Actual
Group Number : 2
Group Id : 2549892947
Group Maximum Duration : 15
Group Minimum Duration : 15
Break time : 0
Group Marks : 0
Is this Group for Examiner? : No
Hindi Typing Test
Section Id : 2549894587
Section Number : 1
Section type : Typing Test
Mandatory or Optional : Mandatory
Number of Questions : 1
Number of Questions to be attempted : 1
Section Marks : 0
Enable Mark as Answered Mark for Review and Clear Response : Yes
Sub-Section Number : 1
Sub-Section Id : 2549894628
Question Shuffling Allowed : No
Question Number : 2 Question Id : 25498941843 Question Type : TYPING TEST
कर्मफल की सुव्यवस्था में किसी बाहरी नियन्त्रण की आवश्यकता नहीं होती, यह सब कु छ स्वसंचालित प्रक्रिया के आधार पर अनायास ही सम्पन्न
होता रहता है। अनाचार का आरम्भ विकृ त विचारों से होता है। मनोविकारों का चेतना क्षेत्र से विग्रह उत्पन्न करना दुविधा उभारना सर्वविदित है। इससे
दुरावजन्य ग्रन्थियां बनती हैं। भय, लज्जा, संकोच भावना शरीर और मन के मध्य चल रहे व्यवस्था तन्त्र को अस्तव्यस्त कर देती है। फलत: चित्र विचित्र
प्रकार के शरीर एवं मन के रोग असन्तुलन उत्पन्न करते हैं। इन आधिव्याधियों के फलस्वरूप व्यक्तित्व विकृ त हो जाता है। न चिन्तन सही रह पाता है
न व्यवहार की शालीनता स्थिर रहती है। फलत: अविश्वास और असन्तोष का वातावरण भीतर भी दीखता है और बाहर भी। यह दशा में मनुष्य के
ऊपर दु:ख दारिद्रय ही लदेंगे। मनोविकारों की इस परिणति का मन:शास्त्र पूरी तरह समर्थन करता है और अनेकानेक प्रमाणों से साबित करता है कि
सौ है है
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सरल, सात्विक, सौम्य, सदाचारी चिन्तन चरित्र के सहारे ही व्यक्तित्व सुसंयत बना रह सकता है। उसे अपनाने में ही भलाई है। जो अनीति की राह पर
चलेंगे वे अपनी दुर्दशा स्वयं करें गे। कर्मफल के दण्ड पुरस्कार का शासन तन्त्र में पूरा विधान है। समाज में भी निन्दा, प्रशंसा, सहयोग, असहयोग का
दौर इसी आधार पर चलता है। प्रामाणिकों को समर्थन मिलता है और वे उन्नति करते हैं जबकि अनाचारी अप्रामाणिक व्यक्ति तिरस्कार के भाजन
बनते और असहयोग, प्रतिरोध के कारण गई गुजरी स्थिति में दिन गुजारते हैं। जिसका अहित किया है उसकी ओर से प्रतिशोध लिये जाने की
सम्भावना भी बनी रहती है। इस समूची व्यवस्था पर दृष्टिपात करने से साबित होता है कि कर्मफल की सुव्यवस्था प्रकृ ति की कार्यप्रणाली का एक
सुनिश्चित अंग है। व्यक्तियों की तरह भलेबुरे वातावरण का भी प्रभाव होता है। जिस प्रकार गंदगी के ढेर से किसी क्षेत्र का वायुमण्डल दुर्गन्धित विषाक्त
हो जाता है और वहां हैजा जैसी छू त की बीमारियों का दौर चल निकलता है, उसी प्रकार व्यापक वातावरण की भी वैसी ही स्थिति होती है। जिन दिनों
सज्जनता, सहकारी शालीनता का प्रचलन होता है उन दिनों व्यापक वातावरण भी सर्वसाधारण के लिए सुखशान्ति से भरा रहता है। प्रकृ ति अनुकू ल
रहती है और धन धान्य, वर्षा, ऋतु प्रभाव आदि में किसी प्रकार का व्यतिक्रम नहीं होने देती। सतयुग में सज्जनता का बाहुल्य था तब वृक्ष फलों से, खेत
फसलों से, बादल विद्युत जल से भरे रहते थे और किसी को किसी प्रकार का अभाव या कष्ट अनुभव नहीं होने देते थे। न अकाल मृत्युएं होती थी और
न ही रोग, शोक, विग्रह जैसी विपत्तियां ही दृष्टिगोचर होती थीं। पारस्परिक स्नेह सहयोग इस सृष्टि का स्वाभाविक क्रम है इसी आधार पर सारी विश्व
व्यवस्था सुनियोजित ढंग से चल रही है। इसमें जहां भी व्यतिक्रम होता है वहीं सन्तुलन डगमगाता और व्यवस्था बिगड़ने पर विग्रह उत्पन्न होते हैं। इस
दृष्टि से शरीर चक्र, जलचक्र, वनस्पति चक्र, दृष्टव्य हैं। हाथ कमाता है। उस कमाई को भोजन रूप में मुंह को देता है। मुंह चबाने का श्रम जोड़कर उसे
पेट के सुपुर्द करता है। पेट उसमें अपने पाचक रस मिलाकर आंतों की और धके लता है, वहां से वह उपार्जन, हृदय में रक्त बनकर पहुंचाता है। इस
प्रकार यह प्रकृ ति की संतुलनकारी व्यवस्था बनी रहती है।