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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 8: पद
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — गंगा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
145 – 152 12 36 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 43 pages
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · हद · गं गा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 8: पद
NCERT कक्षा 9 हद क पाठ्यपुस्तक गंगा के काव्य खंड के पहले पाठ — पाठ 8 पद — के सभी प्रश्न के पूरे हल। रचनाकार ह रैदास (संत
र वदास, सन् 1388–1518), जो नगुण संत काव्य परंपरा के क व ह; वधा है पद — गाया जाने वाला भ क्त-गीत। यहाँ रैदास बानी से लए गए दो
पद पढ़ाए गए ह। पृष्ठ 145 से 152 तक अभ्यास के सभी शीषक — रचना से संवाद (मेरे उत्तर मेरे तक, अथ और भाव, मेरी समझ मेरे वचार), वधा
से संवाद (क वता का स दय, क वता क कुछ अन्य वशेषताएँ), वषय से संवाद, भाषा से संवाद (व्याकरण क बात › शब्द क बात), सृजन,
झरोखे से (संत नामदे व के दो पद) और खोजबीन — शीषक-दर-शीषक, प्रश्न-दर-प्रश्न हल कए गए ह। साथ म दोन पद क पं क्त-दर-पं क्त
व्याख्या (सरल अथ, भाव और शल्प) द गई है और पुस्तक क अधूरी ता लका (‘क वता क कुछ अन्य वशेषताएँ’) पूरी भरकर द गई है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
गंगा (कक्षा 9) 145 – 152
खं ड प्रश्न
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माध्यम
हन्द
पद (1) — पं क्त-दर-पं क्त व्याख्या — पृष्ठ 146
काव्य खंड › पाठ 8 › पद (1) — सरल अथ, भाव और शल्प
व्याख्या शल्प
प्र.1 “अब कैसे छू टै राम रट लागी।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — अब मुझे राम-नाम रटने क जो लगन लग गई है, वह भला कैसे छू ट सकती है!
भाव: यह पद क टे क ( ुवपद) है — वह पं क्त जो गाते समय हर अंतरे के बाद लौटकर आती है। भक्त कह रहा है
क भ क्त अब उसका कम नह , स्वभाव बन चुक है। ‘लागी’ शब्द ध्यान दे ने योग्य है — लगन कसी ने लगाई नह ,
वह अपने आप लग गई। और जो अपने आप लगे, उसे छोड़ना अपने आप को छोड़ने जैसा होगा। इसी लए वाक्य
प्रश्न के रूप म है, पर उत्तर क प्रतीक्षा नह करता — यह प्रश्न वस्तुतः सबसे दृढ़ उत्तर है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार अनुप्रास — “राम रट” म ‘र’ व्यंजन एक से अ धक बार आया है। पुस्तक क प रभाषा — “ जस रचना म व्यंजन वण क
आवृ त्त एक से अ धक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।”
लय और टे क होने के कारण यह पं क्त बार-बार लौटती है। छोट , साँस-भर क पं क्त है, इस लए समूह म गाने पर सबसे पहले यही
गेयता याद रह जाती है।
शैली प्रश्नशैली (काकु) — ‘कैसे छू टै ’ पूछकर क व नषेध को और मज़बूत कर दे ता है।
भाषा ‘रट’, ‘छू टै ’, ‘लागी’ — तीन लोकभाषा के शब्द। पूरी पं क्त म एक भी शास्त्रीय शब्द नह । यही रैदास क सधुक्कड़ी, ब्रज-
म श्रत भाषा है।
प्रतीक ‘राम’ यहाँ दशरथ-पुत्र राम नह , नगुण, नराकार ब्रह्म का नाम है — संत काव्य म ‘राम’ प्रायः इसी अथ म आता है।
प्र.2 “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाक अंग-अंग बास समानी।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
क जए।
सरल अथ — हे प्रभु! आप चंदन ह और म पानी हूँ, जसके अंग-अंग (कण-कण) म आपक सुगंध समा गई है।
भाव: चंदन को पानी म घसा जाता है। घसने के बाद पानी वही पानी नह रह जाता — वह सुगं धत हो जाता है।
सुगंध आई चंदन से, पर अब वह पानी क भी है। भ क्त का ठ क यही रूप है: भक्त अपनी अलग पहचान खोकर
आराध्य के गुण से भर जाता है। ध्यान द जए, यह मलन ऊपर-ऊपर का नह है — “अंग-अंग” कहकर क व
बताता है क यह रोम-रोम तक का, भीतर तक उतरा हुआ मलन है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार रूपक — ‘तुम चंदन’, ‘हम पानी’ म ‘जैसे’ या ‘सा’ जैसा कोई वाचक शब्द नह है; उपमेय (प्रभु) म उपमान (चंदन) का
सीधा आरोप कर अभेद स्था पत कया गया है। साथ ही पुनरु क्त प्रकाश — ‘अंग-अंग’।
बब ाण बब (गंध का बब) — पूरी पं क्त म सुनाई या दखाई कुछ नह दे ता, केवल सूँघा जाता है। हद क वता म गंध- बब
कम मलते ह, इस लए यह प्रयोग वशेष है।
तुक पानी – समानी (चरणांत तुक)। यही तुक पं क्त को गेय बनाती है।
प्रतीक चंदन = आराध्य क सुगंधमयी सत्ता; पानी = भक्त, जो अपने आप म रंग-गंधहीन है पर आराध्य से मलकर सुगं धत हो जाता
है।
भाषा ‘जाक ’ ( जसक ), ‘बास’ (गंध), ‘समानी’ (समा गई) — ब्रज- म श्रत रूप। ‘बास’ शब्द का प्रयोग शब्द-संपदा म भी दया
गया है।
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ध्यान द जए: इस पं क्त म भक्त ने अपने लए वही वस्तु चुनी है जो अपने आप म सबसे साधारण है — पानी। यह
वनम्रता संत काव्य का स्थायी स्वर है।
प्र.3 “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चतवत चंद चकोरा।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
क जए।
सरल अथ — हे प्रभु! आप वन पर छाए हुए बादल ह और म मोर हूँ, जो बादल दे खते ही नाच उठता है; और यह संबंध वैसा ही है
जैसे चकोर पक्षी टकटक लगाकर चंद्रमा को नहारता रहता है।
भाव: यहाँ दो चत्र एक साथ आते ह और दोन प्रतीक्षा के चत्र ह। मोर वष-भर बादल क बाट जोहता है; बादल
आते ही उसका सारा शरीर नाच बन जाता है। चकोर रात-भर चाँद को नहारता है — बना पलक झपकाए। दोन म
एक बात समान है: दे खना ही उनका सुख है, पाना ज़रूरी नह । भक्त भी यही कह रहा है — दशन ही मेरी तृ प्त है।
पुस्तक क भू मका इसी को ‘बादल-मोर का अटू ट संबंध’ कहती है।
शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है
अलंकार 1 अनुप्रास — “ चतवत चंद चकोरा” म ‘च’ व्यंजन तीन बार आया है। यही पुस्तक का अपना उदाहरण है (पृष्ठ 148)।
अलंकार 2 उपमा — ‘जैसे’ वाचक शब्द के साथ चकोर-चंद्र क प्र सद्ध जोड़ी से भक्त-आराध्य के संबंध क तुलना।
अलंकार 3 रूपक — ‘तुम घन’, ‘हम मोरा’ म बना वाचक के सीधा आरोप।
बब दृश्य बब — घरे बादल, नाचता मोर, चाँद क ओर टँ गी चकोर क आँख। पूरी पं क्त एक चत्र क तरह खुलती है।
तुक और लय मोरा – चकोरा। दोन चरण लगभग बराबर मात्रा के ह, इस लए गाते समय संतुलन बना रहता है।
भाषा ‘घन’ (बादल), ‘ चतवत’ ( नहारना) — शब्द-संपदा म दए गए ब्रज शब्द।
‘घन बन’ कैसे पढ़? ‘घन’ का अथ है बादल और ‘बन’ का अथ है वन। इस लए ‘तुम घन बन’ का अथ हुआ —
‘आप वन पर छाए बादल ह’। पुस्तक क अपनी भू मका म इस जोड़ी को ‘बादल-मोर’ कहा गया है, इस लए यही
पाठ लेना उ चत है।
प्र.4 “प्रभु जी तुम द पक, हम बाती, जाक जो त बरै दन राती।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
क जए।
सरल अथ — हे प्रभु! आप द पक ह और म उसक बाती हूँ, जसक ज्यो त दन-रात जलती रहती है।
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भाव: यह चत्र परस्पर- नभरता का है। द पक अकेला नह जल सकता, उसे बाती चा हए; और बाती अकेली पड़ी
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glराती’ कहकर क व
रहे तो केवल धागा है। दोन मलते ह, तभी ज्यो त बनती है। साथ म एक और गहरी बात है — बाती
मटती जाती.हैc।oयानी भक्त का समपण केवल जुड़ाव नह , अपने को खपा दे ना भी है। ‘ दन
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बताताsहैe क यह जलना कसी पूजा-मुहूत तक सी मत नह — यह चौबीस घंटे चलने वाली भ क्त है।
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शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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mवाचक आरोप)। अनुप्रास — “जाक जो त” म ‘ज’ क आवृ त्त।
रूपक — ‘तुम द पक’, ‘हम बाती’ (eबना
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अलंकार
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दृश्य/तेजस बब — अँधेरे म जलती हुई एक स्थर लौ। पूरा पद इसी एक लौ से रोशन हो जाता है।
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प्रतीक ज्यो त = ान और भ क्त का प्रकाश; अंधकार = अ ान। संत काव्य म यह प्रतीक-जोड़ी बार-बार आती है।
o m l a sगयाe है।
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वरोधी युग्म ‘ दन’ और ‘राती’ — दो वपरीत समय एक साथ रखकर नरंतरता का भाव पैदा कया
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तुक बाती – राती।
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“प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मलत सुहागा।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
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सरल अथ — हे प्रभु! आप मोती ह और म धागा हूँ; हम दोन का मेल वैसा ही है जैसा सोने म सुहागा मलने पर होता है।
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agl यहाँ दो अलग-अलग बात कही गई ह और दोन ज़रूरी ह। पहली — मोती और धागे का रश्ता: बना धागे के
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मोती बखरे दाने भर ह, माला नह बनते; और बना मोती के धागा साधारण सूत। यानी भक्त और आराध्य एक-दूसरे
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coमैmल हटाकर उसे नखार दे ती है। इसी लए आज भी कहावत है — l
को ‘पूरा’ करते ह। दूसरी — सोने और सुहागे का रश्ता: सुहागा सोने क अशु द्धयाँ जला दे ता है और सोना और
दमक उठता है। इसी तरह भ क्त भक्त के मन .का a g
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‘सोने पर सुहागा’।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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पक्ष
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अलंकार 1 उपमा — “जैसे सोने मलत सुहागा”। यही पुस्तक का अपना उदाहरण है (पृष्ठ 149)। उपमेय = भक्त और आराध्य का मेल,
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उपमान = सोने-सुहागे का मेल, वाचक = ‘जैसे’, साधारण धम = मलकर नखर जाना।
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अलंकार 2 रूपक — ‘तुम मोती’, ‘हम धागा’।
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उदाहरण उठाते ह। यह उनकm
उपमान का दोन उपमान लोकजीवन से ह — माला गूँथने वाले का और सुनार का काम। रैदास शास्त्र से नह , कारीगर के औज़ार-घर से
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ोत क वता क सबसे बड़ी पहचान है।
तुक धागा – सुहागा।a
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जोड़ ली जए: ‘सोने पर सुहागा’ वाला यही मुहावरा आपक पाठ्यपुस्तक क अं तम क वता म भी आता है —
भवानीप्रसाद मश्र क घर क याद म — “पाँचवाँ म हूँ अभागा, जसे सोने पर सुहागा, पताजी कहते रहे ह”।
प्र.6 “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भग त करै रैदासा।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
क जए।
सरल अथ — हे प्रभु! आप स्वामी ह और म आपका दास हूँ। रैदास ऐसी ही भ क्त करता है।
भाव: यह पद का समापन है और यहाँ भ क्त का रूप बदल जाता है। पहले चार चत्र म दोन पक्ष बराबर थे —
चंदन-पानी, घन-मोर, द पक-बाती, मोती-धागा। अंत म क व जान-बूझकर एक ऊँच-नीच वाला रश्ता रखता है —
स्वामी और दास। यह दास्य भाव क भ क्त है, जसम भक्त अपना अहंकार पूरी तरह छोड़ दे ता है। ध्यान र खए,
रैदास के लए ‘दास’ होना अपमान नह — जस समाज ने उन्ह नीचा कहा, उसी के सामने वे स्वयं को केवल प्रभु का
दास कहकर सबसे ऊँचा बना दे ते ह। और ‘ऐसी भग त’ कहकर वे पूरे पद को समेट लेते ह — यानी ऊपर के पाँच
चत्र जैसी भ क्त।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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अलंकार रूपक — ‘तुम स्वामी’, ‘हम दासा’।
भ णता / अं तम चरण म क व अपना नाम रखता है — ‘कहै/करै रैदासा’। पद-परंपरा म इसे छाप कहते ह; इससे रचना क पहचान
छाप बनी रहती है।
संरचना पाँच चत्र का क्रम सोचा-समझा है — चंदन → घन → द पक → मोती → स्वामी। पहले प्रकृ त, फर घर, फर बाज़ार,
और अंत म समाज का रश्ता। क वता प्रकृ त से चलकर मनुष्य-समाज तक पहुँचती है।
तुक दासा – रैदासा। यह तुक क व के नाम को ही लय का हस्सा बना दे ती है।
पद (2) — पं क्त-दर-पं क्त व्याख्या — पृष्ठ 146
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काव्य खंड › पाठ 8 › पद (2) — सरल अथ, भाव और शल्प
व्याख्या शल्प
प्र.1 “जो तुम तोरौ राम म न ह तोरौ, तुम सौ तो र कवन स जोरौ।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प
स्पष्ट क जए।
सरल अथ — हे राम! य द आप मुझसे नाता तोड़ भी द, तो भी म नह तो ग
ँ ा; आपसे नाता तोड़कर म भला और कससे जो ?
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भाव: यह पूरे पाठ क सबसे साहसी पं क्त है। साधारण भ क्त म शत छपी रहती है — ‘आप मुझे मान तो म
आपको मानूँ’। रैदास वह शत हटा दे ते ह। उनक भ क्त एकतरफ़ा और बना शत है — इसी लए वह टू ट ही नह
सकती। दूसरे चरण म वे तक भी दे ते ह: संसार म कोई ऐसा है ही नह जससे नाता जोड़ा जा सके। यानी यह केवल
भावुकता नह , एक सोचा-समझा नणय है। इसी कारण पुस्तक ने अपनी ता लका म इसे ‘अनन्य भ क्त भाव’ का
उदाहरण बनाया है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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अलंकार अनुप्रास — “तुम सौ तो र” म ‘त’ क और “सौ … स ” म ‘स’ क आवृ त्त। प्रश्नालंकार — ‘कवन स जोरौ’ ऐसा प्रश्न है
जसका उत्तर पूछा नह जा रहा।
शब्द-योजना तोरौ और जोरौ — वलोम क्रयाओं क जोड़ी। ‘तोरौ’ एक ही पं क्त म तीन बार आया है, जससे इनकार का स्वर हथौड़े
क तरह पड़ता है।
लय दोन चरण एक ही ढाँचे पर बने ह, इस लए गाते समय पहला चरण दूसरे को अपने आप ख च लेता है।
भाषा ‘कवन’ (कौन), ‘स ’ (से) — ब्रज-राजस्थानी रूप। ‘राम’ फर नगुण ब्रह्म का नाम है।
तुक तोरौ – जोरौ।
प्र.2 “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
क जए।
सरल अथ — मुझे तीथ-यात्रा और व्रत न कर पाने का कोई अंदेशा ( चता, दु वधा) नह है, क्य क मुझे तो केवल आपके चरण-
कमल का एक ही भरोसा है।
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भाव: यही नगुण संत काव्य क कद्र य स्थापना है — भ क्त का रास्ता बाहर नह , भीतर से जाता है। ध्यान र खए,
रैदास तीथ और व्रत को गाली नह दे ते; वे केवल कहते ह क इनका न होना उनके लए चता क बात नह । ‘अंदेसा’
शब्द इसी लए महत्वपूण है — शब्द-संपदा म इसका अथ है ‘सोच, चता, शक, आशंका, दु वधा’। और ‘एक
भरोसां’ म जो ‘एक’ है, वही पूरे पद का प्राण है — भरोसा अनेक जगह बाँटा नह जा सकता। यह बात उस समय के
लए बहुत बड़ी थी, जब तीथ और कमकांड तक सबक पहुँच ही नह थी।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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अलंकार रूपक — “चरन कमल”। यही पुस्तक का अपना उदाहरण है (पृष्ठ 149): रूप और गुण क अत्य धक समानता के कारण
उपमेय (चरण) म उपमान (कमल) का आरोप कर अभेद स्था पत कर दया गया है — चरण ‘कमल जैसे’ नह , चरण ‘कमल
ही’ ह। साथ ही अनुप्रास — ‘बरत … भरोसां’।
बब कोमलता, शीतलता और प वत्रता का दृश्य बब — कमल क चड़ म रहकर भी न लप्त रहता है, यही भाव चरण पर आरो पत
है।
वचार- पहला चरण नषेध (क्या नह चा हए), दूसरा चरण वधान (क्या चा हए)। पहले जगह खाली क जाती है, फर उसम एक ही
संरचना चीज़ रखी जाती है।
तुक अंदेसा – भरोसां।
प्र.3 “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा दे व ओर न ह दूजा।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
क जए।
सरल अथ — म जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वह आपक ही पूजा होती दखाई दे ती है; आपके समान दूसरा कोई दे व है ही नह ।
भाव: यह पं क्त दो बड़ी बात एक साथ कहती है। पहली — ईश्वर सवव्यापक है। वह कसी एक मं दर, तीथ या
दशा म बंद नह ; इसी लए कसी को उस तक पहुँचने के लए यात्रा करने क ज़रूरत नह । यह वचार सीधे पछली
पं क्त से जुड़ता है — जब प्रभु हर जगह ह, तो तीथ जाने का ‘अंदेसा’ क्य ? दूसरी — ईश्वर अ तीय है, उसका
कोई दूसरा नह । सवव्यापकता और अनन्यता — दोन एक ही साँस म। इसी कारण पुस्तक ने इस पं क्त को
‘सवव्यापक ईश्वर क अवधारणा’ वाले प्रश्न का सही वकल्प बनाया है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
पुनरु क्त ‘जहँ जहँ’ — शब्द दोहराकर स्थान का असीम वस्तार बना दया गया (पुनरु क्त प्रकाश)। एक बार ‘जहँ’ कहने से इतना
वस्तार नह बनता।
अनुप्रास “जहँ जहँ जाओ” म ‘ज’ क तीन आवृ त्तयाँ।
तुलना ‘तुम सा दे व’ म ‘सा’ उपमावाचक है, पर यहाँ उपमान को अस्वीकार कर दया गया है — ‘तुम्हारे जैसा कोई है ही नह ’। यह
अनन्वय जैसी स्थ त है, जसम उपमेय क तुलना केवल स्वयं से हो सकती है।
तुक पूजा – दूजा।
प्र.4 “म अपनो मन ह र से जोरौ, ह र सो जो र सबन सो तोर ।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
क जए।
सरल अथ — मने अपना मन ह र से जोड़ लया है; और ह र से जोड़कर मने बाक सबसे (सांसा रक मोह-माया से) नाता तोड़ लया
है।
भाव: यहाँ भ क्त क शत बताई गई है — एकाग्रता। मन एक ही समय म अनेक जगह नह लग सकता। इसी लए
‘जोड़ना’ और ‘तोड़ना’ यहाँ दो अलग काम नह , एक ही काम के दो पक्ष ह। ध्यान द जए, क्रम भी सोचा हुआ है —
पहले जोड़ा, फर तोड़ा। रैदास यह नह कहते क पहले संसार छोड़ो, तब भ क्त करो; वे कहते ह क पहले प्रभु से
जुड़ो — बाक नाते अपने आप ढ ले पड़ जाएँगे। यह गृहस्थ के लए भी संभव रास्ता है, संन्यास लेने क ज़रूरत
नह ।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
शब्द-योजना जोरौ – जो र – तोर क ंखला। पहला चरण जस शब्द पर खत्म होता है, दूसरा चरण उसी से शुरू होता है — इससे
वाक्य म कड़ी-दर-कड़ी जुड़ने का प्रभाव बनता है।
अनुप्रास “ह र सो जो र सबन सो” — ‘स’ क आवृ त्त।
पुनरु क्त ‘ह र’ शब्द दो बार — कद्र म वही एक नाम बना रहता है।
तुक जोरौ – तोर । ध्यान द जए, पद (2) क पहली पं क्त क तुक भी यही जोड़ी थी — इससे पूरा पद एक ही स्वर म बँधा रहता
है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद
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“सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
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सरल अथ — हर पहर, यानी आठ पहर मुझे आपक ही आस लगी रहती है — रैदास यह बात मन, कम और वचन तीन से कहता
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ag बात पहले पद म ‘ दन राती’ कहकर आई थी)। दूसरी स ाई क —
भाव: पद यहाँ दो कसौ टयाँ रखकर समाप्त होता है। पहली समय क — ‘सबही पहर’, यानी भ क्त का कोई नयत
समय नह , वह चौबीस घंटे क चीज़ है (यही
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‘मन क्रम वचन’। जो मन म सोचा जाए, वही मुँह से कहा जाए और वही हाथ से कया जाए, तभी भ क्त स ी है।
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यही वह कसौट है जससे रैदास दखावट धम को अलग कर दे ते ह — क्य क आडंबर म वचन कुछ और होता है,
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शल्प पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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भ णता / ‘कहै रैदासा’ — दोन पद का अंत क व-नाम पर होता है, जो पद- वधा क पहचान है।
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त्रपद सूत्र a g l
‘मन – क्रम – वचन’ तीन शब्द का सूत्र। तीन का यह ढाँचा भारतीय परंपरा म स ाई क माप के लए बार-बार आता है।
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अनुप्रास “मन क्रम” म ‘म’ क आवृ त्त; ‘कहै’ के ‘क’ के साथ ‘क्रम’ का ‘क्र’ भी मलता है।
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तुक और लय आसा – रैदासा। ध्यान द जए, पहला पद भी ‘दासा – रैदासा’ पर समाप्त हुआ था — दोन पद क अं तम ध्व न एक-सी है,
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जससे वे एक ही माला के दो मनके लगते ह।
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agl दोन पद का अंतर एक वाक्य म: पहला पद चत्र से भ क्त समझाता है (चंदन-पानी, द पक-बाती), दूसरा पद
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घोषणाओं से (नह तो ग
ँ ा, अंदेसा नह , दूजा नह )। पहला दखाता है, दूसरा कहता है।
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मेरे उत्तर मेरे तक — पृष्ठ 147 और 148
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अभ्यास › रचना से संवाद › मेरे उत्तर मेरे तक
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रचना से सं वाद मे रे उत्तर मे रे तक
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प्र.1 नम्न ल खत प्रश्न के सट क उत्तर चु नए और यह भी बताइए क आपको ये उत्तर उपयुक्त क्य लगते ह? 1.
“अब कैसे छू टै राम रट लागी” पं क्त का भाव है? (क) नाम उ ारण क क ठनाई (ख) नाम रटकर याद करना
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(ग) आराध्य का नाम जपना (घ) मत्र का नाम रटना
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सट क उत्तर — (ग) आराध्य का नाम जपना।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: इस पं क्त म ‘राम’ कोई साधारण नाम नह , भक्त के आराध्य का नाम है — और ‘रट’
का अथ है वह लगन जो अपने आप लग जाए। भक्त कह रहा है क यह लगन अब छू ट ही नह सकती। यही बात पूरे
पद म आगे भी चलती है — “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भग त करै रैदासा।” और दूसरे पद म तो वे साफ़
कह दे ते ह — “सबही पहर तुम्हारी आसा”। यानी पं क्त का भाव है — आठ पहर आराध्य का नाम जपना, उसे
स्मरण म बनाए रखना। पुस्तक क भू मका भी इसी पद के बारे म कहती है क इसम ‘अनन्य भ क्त और आराध्य के
प्र त समपण का भाव प्रकट होता है’।
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) नाम उ ारण ग़लत पं क्त म क ठनाई का कोई संकेत नह है। ‘कैसे छू टै ’ का अथ ‘बोलना क ठन है’ नह , ब ल्क
क क ठनाई ‘छोड़ना असंभव है’ है। भाव क ठनाई का नह , सहजता का है।
(ख) नाम रटकर याद ग़लत यह ‘रट’ शब्द को पाठशाला वाले अथ म ले लेता है। यहाँ रटना = याद करने क मेहनत नह , लगन
करना है। रटकर याद क गई चीज़ भूल भी जाती है; रैदास क रट तो छू टती ही नह ।
(ग) आराध्य का सही ✓ ‘राम’ = आराध्य ( नगुण ब्रह्म), ‘रट लागी’ = नरंतर स्मरण। आगे क पं क्तयाँ — ‘सबही पहर
नाम जपना तुम्हारी आसा’ — इसी को पुष्ट करती ह।
(घ) मत्र का नाम ग़लत पद म कह मत्र का प्रसंग नह है। संबोधन सवत्र ‘प्रभु जी’ और ‘राम’ है, और रश्ता स्वामी-दास का
रटना बताया गया है।
प्र.2 2. “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” पं क्त म आराध्य और भक्त का संबंध कस रूप म व्यक्त हुआ है? (क)
एकाकार और समरूप (ख) तरल और तीव्र सुगंध (ग) आश्रय और आ श्रत (घ) द्रव और ठोस
सट क उत्तर — (क) एकाकार और समरूप।
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पं क्त का दूसरा चरण ही उत्तर दे दे ता है — “जाक अंग-अंग बास समानी।” चंदन
घसकर पानी म मलता है, तो सुगंध पानी के अंग-अंग म समा जाती है। इसके बाद न चंदन अलग दखता है, न
पानी अलग — दोन एक हो जाते ह और दोन क गंध एक जैसी हो जाती है। यही ‘एकाकार’ (एक हो जाना) और
‘समरूप’ (एक-सा रूप हो जाना) है। पुस्तक क भू मका भी यही कहती है क ‘भक्त से उसके आराध्य अलग नह
हो सकते’। ‘अंग-अंग’ क पुनरु क्त बताती है क यह मेल ऊपर-ऊपर का नह , भीतर तक का है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) एकाकार सही ✓ ‘बास समानी’ का अथ ही है — गंध समा गई, घुल गई। घुलने के बाद अलगाव संभव नह रहता।
और समरूप
(ख) तरल और ग़लत यह वकल्प केवल दोन वस्तुओं के गुण गना रहा है, उनका संबंध नह बता रहा। प्रश्न पूछ रहा है क
तीव्र सुगंध संबंध कस रूप म व्यक्त हुआ — गुण-वणन उत्तर नह है।
(ग) आश्रय और ग़लत आश्रय-आ श्रत का रश्ता ‘द पक-बाती’ या ‘स्वामी-दास’ वाली पं क्तय म दखता है, यहाँ नह । चंदन
आ श्रत और पानी म कोई कसी को आश्रय नह दे ता — वे मलकर एक तीसरी चीज़ बन जाते ह।
(घ) द्रव और ठोस ग़लत यह उत्तर व ान क कक्षा का है, क वता का नह । क व चंदन और पानी क अव ा नह , उनके
मलन क बात कर रहा है।
प्र.3 3. “तुम द पक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है? (क) द पक और बाती का कोई मेल नह होता है। (ख)
द पक बना बाती भी जल सकता है। (ग) भक्त आराध्य से अ धक महत्वपूण है। (घ) भक्त का आराध्य से मेल
जीवन को आलो कत करता है।
सट क उत्तर — (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलो कत करता है।
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पूरी पं क्त है — “प्रभु जी तुम द पक, हम बाती, जाक जो त बरै दन राती।” ध्यान
द जए, ‘जो त’ (ज्यो त) द पक अकेले से नह बनती और बाती अकेली से भी नह — वह दोन के मेल से बनती
है। और वह ज्यो त ‘ दन राती’ जलती है, यानी लगातार, बना रुके। इसी लए भाव यह हुआ क भक्त और आराध्य
का मलन ही जीवन म प्रकाश ( ान, दशा, आनंद) भरता है। ‘आलो कत करना’ का अथ ही है — प्रकाश से भर
दे ना, और पं क्त म वही ज्यो त कद्र म है।
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) द पक और बाती का कोई मेल ग़लत यह पं क्त के ठ क उलटा है। पूरा पद ही अटू ट मेल के उदाहरण गना रहा है —
नह होता है। चंदन-पानी, घन-मोर, द पक-बाती, मोती-धागा।
(ख) द पक बना बाती भी जल ग़लत तथ्य क दृ ष्ट से भी यह ग़लत है और भाव क दृ ष्ट से भी। य द द पक अकेले जल
सकता है। सकता, तो भक्त क कोई भू मका ही न बचती — और तब पूरी पं क्त व्यथ हो
जाती।
(ग) भक्त आराध्य से अ धक ग़लत रैदास क भ क्त दास्य भाव क है — “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा”। वे स्वयं को
महत्वपूण है। कह भी बड़ा नह बताते; हर जोड़ी म प्रभु पहले और भक्त बाद म आता है।
(घ) भक्त का आराध्य से मेल सही ✓ ‘जाक जो त बरै दन राती’ — ज्यो त ही मेल का प रणाम है, और वह नरंतर
जीवन को आलो कत करता है। जलती है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
और गहरे म: बाती जलती है तो घटती भी जाती है। यानी इस मेल म भक्त का समपण भी छपा है — प्रकाश मुफ़्त
नह मलता, बाती उसक क़ मत चुकाती है।
प्र.4 4. “जो तुम तोरौ राम म न ह तोरौ” पं क्त म रैदास का क्या आशय है? (क) परोपकारी भ क्त भाव (ख) आराध्य
से अटू ट संबंध (ग) सांसा रक मोह (घ) कमकांड पर बल
सट क उत्तर — (ख) आराध्य से अटू ट संबंध।
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पूरी पं क्त है — “जो तुम तोरौ राम म न ह तोरौ, तुम सौ तो र कवन स जोरौ।” इसम दो
बात ह। पहली — भक्त क ओर से यह नाता कसी भी हाल म नह टू टेगा, चाहे दूसरा पक्ष तोड़ ही क्य न दे । दूसरी
— तोड़कर जाएँ भी तो कहाँ? संसार म ऐसा कोई दूसरा है ही नह जससे नाता जोड़ा जाए। इन दोन को मलाकर
जो बनता है, वही अटू ट संबंध है। इसी लए पुस्तक ने अपनी ता लका म इसी पं क्त को ‘अनन्य भ क्त भाव’ का
उदाहरण बनाया है, और अगला ही प्रश्न (मेरी समझ मेरे वचार, प्र.1) इसे ‘अटू ट नष्ठा’ कहता है।
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) परोपकारी भ क्त ग़लत परोपकार का अथ है दूसर का भला करना। यह पं क्त दूसर क नह , केवल अपने और प्रभु के
भाव रश्ते क बात कर रही है।
(ख) आराध्य से सही ✓ ‘म न ह तोरौ’ = म नह तो ग
ँ ा; ‘कवन स जोरौ’ = और जो ँ भी कससे। दोन मलकर संबंध को
अटू ट संबंध अटू ट बना दे ते ह।
(ग) सांसा रक मोह ग़लत यह तो उलटा है। अगली पं क्तय म रैदास सांसा रक नाते तोड़ने क बात करते ह — “ह र सो
जो र सबन सो तोर ।”
(घ) कमकांड पर बल ग़लत इसी पद म रैदास कमकांड से हटते ह — “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”। वे बाह्य आडंबर का
खंडन करने वाले संत क व ह, उन पर बल दे ने वाले नह ।
प्र.5 5. “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” पं क्त से आप क्या समझते ह? (क) तीथ और व्रत आवश्यक नह ह। (ख) तीथ
और व्रत सब आवश्यक ह। (ग) तीथ जाने से मु क्त न त है। (घ) आराध्य के चरण म स ा आश्रय है।
सट क उत्तर — (घ) आराध्य के चरण म स ा आश्रय है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पं क्त अधूरी पढ़ने पर भ्रम होता है; पूरी पं क्त दे खए — “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा,
तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” पहला चरण बताता है क भक्त को क्या चता नह है, दूसरा चरण बताता है क
उसके पास क्या है — और असली बात दूसरे चरण म है। ‘अंदेसा’ का अथ शब्द-संपदा म दया है — ‘सोच, चता,
शक, आशंका, दु वधा’। यानी रैदास यह नह कह रहे क तीथ-व्रत बेकार ह; वे कह रहे ह क उन्ह उनक चता
नह , क्य क उनके पास ‘एक भरोसां’ है — प्रभु के चरण का। ‘एक’ शब्द ही सद्ध कर दे ता है क आश्रय एक ही है
और वह चरण म है। यह बात अगली पं क्त से भी जुड़ती है — “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा” — जब प्रभु हर जगह
ह, तो तीथ तक जाने क चता क्य ?
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) तीथ और व्रत नकट, यह केवल पहले चरण का अथ है और वह भी कड़ा करके। रैदास ‘आवश्यक नह ह’ जैसी घोषणा
आवश्यक नह ह। पर अधूरा नह करते — वे ‘अंदेसा’ यानी चता न होने क बात करते ह। साथ ही यह वकल्प पं क्त का
सकारात्मक पक्ष — ‘एक भरोसां’ — छोड़ दे ता है, जो पं क्त का असली भाव है।
(ख) तीथ और व्रत ग़लत यह पं क्त के ठ क उलटा है। ‘न करूँ अंदेसा’ म ‘न’ को अनदे खा करने पर ही ऐसा अथ नकलेगा।
सब आवश्यक ह।
(ग) तीथ जाने से ग़लत नगुण संत काव्य क मूल स्थापना ही इसके वरुद्ध है। रैदास ने ‘बाह्य आडंबर का खंडन कर मन क
मु क्त न त है। शुद्धता और आंत रक भ क्त को ही स ा धम माना है’ (पाठ क भू मका)।
(घ) आराध्य के सही ✓ ‘तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां’ — यही पं क्त का कद्र है। ‘भरोसां’ का अथ ही आसरा/आश्रय है।
चरण म स ा
आश्रय है।
प्र.6 6. सवव्यापक ईश्वर क अवधारणा कस पं क्त म व्यक्त होती है? (क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा” (ख)
“जाक जो त बरै दन राती” (ग) “तुम द पक, हम बाती” (घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”
सट क उत्तर — (क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”।
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: ‘सवव्यापक’ का अथ है — जो सब जगह व्याप्त हो। इस पं क्त म ‘जहँ जहँ’ क
पुनरु क्त ठ क यही काम करती है: कोई एक स्थान नह , हर स्थान। भक्त जहाँ भी जाता है, वह उसे अपने प्रभु क
पूजा होती दखाई दे ती है — यानी ईश्वर कसी मं दर, तीथ या दशा म बंद नह है। और दूसरा चरण इस वचार को
पूरा कर दे ता है — “तुम सा दे व ओर न ह दूजा”, यानी वह सब जगह है और वही एक है। इसी कारण पछली पं क्त
म तीथ का ‘अंदेसा’ भी नह रह जाता — जब प्रभु हर जगह ह, तो उन तक पहुँचने के लए यात्रा कस लए?
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद
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वकल्प सही / कारण
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ग़लत
(क) “जहँ जहँ .जाओ
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तुम्हरीaपूsजा”
‘जहँ जहँ’ = हर जगह। यही सवव्यापकता क सीधी अ भव्य क्त
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(ख) “जाक जो त बरै ग़लत यह समय क नरंतरता बताती है ( दन-रात), ान क व्यापकता नह । दोन बात अलग ह —
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दन राती” यह वकल्प सही उत्तर के बहुत पास है, पर सवाल ‘कहाँ-कहाँ’ का है, ‘कब-कब’ का नह ।
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(ग) “तुम द पक, हम ग़लत
नह । gl
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यह भक्त और आराध्य क परस्पर- नभरता का रूपक है। इसम ईश्वर के फैलाव क कोई बात
बाती”
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(घ) “तीरथ बरत न ग़लत
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यह कमकांड के प्र त न तता बताती है। सवव्यापकता इसका कारण है, पर वह इस पं क्त म
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करूँ अंदेसा” कही नह गई — वह अगली पं क्त म आती है।
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a और भाव — पृष्ठ 148
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अभ्यास › रचना से संवाद › अथ और भाव
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रचना से सं वाद व्याख्या
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प्र.1 नीचे द गई पं क्तय का अथ समझाते हुए भाव स्पष्ट क जए। (क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चतवत
चंद चकोरा।”
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उत्तर .c o m g l a
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l a se — हे प्रभु! आप वन पर घरे हुए बादल ह और म मोर हूँ; और हम दोन का नाता वैसा ही है जैसे चकोर पक्षी टकटक लगाकर
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चंद्रमा को नहारता रहता है।
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भाव — इस एक पं क्त म क व ने प्रकृ त से उठाए दो चत्र रखे ह, और दोन प्रतीक्षा और दशन-सुख के चत्र ह।
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as भी ऐसा ही है — प्रभु का स्मरण होते ही उसका मन नाच उठता है।
घन और मोर — मोर पूरे वष बादल क बाट जोहता है। बादल घरते ही वह पंख फैलाकर नाच उठता है। उसका आनंद बादल
को पाने म नह , उसके आ जाने म है।lभक्त
चंद और चकोर — शब्द-संपदा a
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के अनुसार चकोर ‘तीतर क जा त का एक पक्षी है जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है’।
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वह रात-भर बना पलक झपकाए चाँद को दे खता रहता है। चाँद उसे कभी मलता नह , फर भी उसका प्रेम घटता नह । यही
अनन्य, नष्काम भ क्त है — जसम पाने क शत नह होती।
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m .cदोन चत्र मलकर क्या कहते ह: भक्त का प्रेम एकतरफ़ा दखता है, परagअधूरा नह है। मोर और चकोर दोन
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ag नीचे ह, बादल और चाँद दोन ऊपर; दोन जो ड़य म दूरी है, फर भी संबंध अटू ट है। पुस्तक क भू मका इसी को
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‘बादल-मोर का संबंध अटू ट होता है’ कहकर बताती है। यही रैदास क भ क्त का स्वर है — प्रभु दूर ह तब भी भक्त
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का मुख उन्ह क ओर रहेगा।
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शल्प क बात: इस पं क्त म तीन अलंकार एक साथ काम कर रहे ह — रूपक (‘तुम घन’, ‘हम मोरा’ — बना
वाचक आरोप), उपमा (‘जैसे … चंद चकोरा’) और अनुप्रास (‘ चतवत चंद चकोरा’ म ‘च’ क तीन आवृ त्तयाँ —
यही पुस्तक का अपना उदाहरण है)। ‘मोरा – चकोरा’ क तुक पं क्त को गेय बना दे ती है।
प्र.2 (ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”
अथ — मुझे तीथ-यात्रा और व्रत न कर पाने का कोई अंदेशा — कोई चता, शंका या दु वधा — नह है, क्य क मुझे तो केवल
आपके चरण-कमल का एक ही भरोसा है।
भाव — यह पं क्त रैदास क भ क्त का घोषणापत्र है। इसम तीन बात एक साथ कही गई ह —
1. भ क्त का रास्ता भीतर से जाता है, बाहर से नह । तीथ और व्रत बाहरी क्रयाएँ ह। रैदास ने ‘बाह्य आडंबर का खंडन कर मन
क शुद्धता और आंत रक भ क्त को ही स ा धम माना है’ (पाठ क भू मका)। इस लए वे इन क्रयाओं के न होने से वच लत
नह होते।
2. भरोसा एक ही जगह हो सकता है। ‘एक भरोसां’ म ‘एक’ शब्द सबसे भारी है। जसने अनेक जगह आसरा ढूँ ढ़ा, उसका कह
भी पूरा आसरा नह । इसी बात को वे आगे दोहराते ह — “म अपनो मन ह र से जोरौ, ह र सो जो र सबन सो तोर ।”
3. भ क्त सबके लए खुली है। तीथ के लए साधन चा हए, समय चा हए, और उस युग म जा त क अनुम त भी चा हए थी।
भरोसे के लए कुछ नह चा हए। इस तरह यह पं क्त उस पूरी व्यवस्था को चुनौती दे दे ती है जो भ क्त को कुछ ही लोग क चीज़
बना दे ती थी।
ध्यान रखने योग्य बारीक : रैदास तीथ और व्रत को बुरा नह कहते। वे कहते ह क उनका ‘अंदेसा’ नह है।
‘अंदेसा’ का अथ शब्द-संपदा म है — ‘सोच, चता, शक, आशंका, दु वधा’। यानी उनका झगड़ा कमकांड से नह ,
कमकांड को भ क्त क शत बना दे ने से है। यह अंतर समझ लेना पूरे भ क्तकाल को समझ लेना है।
शल्प क बात: ‘चरन कमल’ म रूपक अलंकार है — पुस्तक क प रभाषा के अनुसार ‘रूप और गुण क
अत्य धक समानता के कारण उपमेय म उपमान का आरोप कर अभेद स्था पत’ कया गया है। चरण ‘कमल जैसे’
नह कहे गए, ‘कमल ही’ कह दए गए — इसी लए यह उपमा नह , रूपक है। साथ म अनुप्रास (‘बरत … भरोसां’)
और तुक ‘अंदेसा – भरोसां’ भी है।
मेरी समझ मेरे वचार — पृष्ठ 148
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
अभ्यास › रचना से संवाद › मेरी समझ मेरे वचार
रचना से सं वाद चचा
प्र.1 नीचे दए गए प्रश्न पर कक्षा म चचा क जए और उनके उत्तर ल खए— 1. “जो तुम तोरौ राम म न ह तोरौ”
पं क्त म रैदास क अपने आराध्य म अटू ट नष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते ह? वस्तार से ल खए।
इस पं क्त से यह समझ म आता है क रैदास क भ क्त शत पर टक हुई भ क्त नह है — वह एकतरफ़ा, बना शत और इस लए
अटू ट है।
1. भ क्त म सौदा नह है। साधारण रश्ते ‘लेन-दे न’ पर चलते ह — जो मुझे माने, म उसे मानूँ। रैदास इस नयम को तोड़ दे ते ह। वे
कहते ह, ‘जो तुम तोरौ’ — यानी य द आप ही नाता तोड़ द — ‘राम म न ह तोरौ’ — तो भी म नह तो ग
ँ ा। इसका अथ है क उनक
भ क्त प्रभु के व्यवहार पर नभर ही नह है। जो चीज़ कसी दूसरे के व्यवहार पर नभर नह , उसे कोई तोड़ भी नह सकता।
2. यह भावुकता नह , तक है। दूसरा चरण दे खए — “तुम सौ तो र कवन स जोरौ।” यहाँ रैदास कारण भी दे दे ते ह: आपसे
तोड़कर जो ँ भी तो कससे? संसार म कोई ऐसा दूसरा है ही नह । यह प्रश्न उत्तर माँगने के लए नह पूछा गया, ब ल्क यह
प्रश्नालंकार है — उत्तर पहले से तय है। इसी बात को वे आगे स्पष्ट भी कर दे ते ह — “तुम सा दे व ओर न ह दूजा।”
3. नष्ठा का अथ है — वकल्प न रखना। रैदास एक और पं क्त म यही बात दूसरे ढं ग से कहते ह — “म अपनो मन ह र से जोरौ,
ह र सो जो र सबन सो तोर ।” यानी एक से जुड़ने का अथ है बाक सबसे छू ट जाना। जसके पास कोई दूसरा रास्ता बचा ही न हो,
उसक नष्ठा डोल नह सकती।
4. यह नष्ठा उनके जीवन से जुड़ी हुई है। रैदास चमकार प रवार से थे और उस समय के समाज ने उन्ह मं दर, शास्त्र और तीथ से
दूर रखा। जस भक्त को समाज बार-बार ‘तोड़ता’ रहा, वह भक्त कह रहा है क म फर भी नह तो ग
ँ ा। इस दृ ष्ट से यह पं क्त
केवल भ क्त का नह , आत्मसम्मान और अ डगता का भी वक्तव्य है।
इससे हम क्या सीखते ह: कोई भी स ा रश्ता — भ क्त हो, मत्रता हो या कतव्य — तभी टकता है जब वह
‘बदले म क्या मलेगा’ पर न टका हो। इसी लए पुस्तक ने अपनी ता लका म इसी पं क्त को ‘अनन्य भ क्त भाव’
का उदाहरण बनाया है, और इसी पं क्त पर सृजन म ‘अटू ट मत्रता’ क लघुकथा लखने को कहा है।
प्र.2 2. रैदास ने तीथ और व्रत के ान पर कस साधन को भ क्त का प्रमुख आधार माना है? आपके वचार से भ क्त
के क्या आधार हो सकते ह?
पहला भाग — रैदास का उत्तर। रैदास ने तीथ और व्रत के स्थान पर प्रभु-चरण म अनन्य भरोसे को भ क्त का प्रमुख आधार
माना है — “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” इस भरोसे के तीन रूप पूरे पद म दखाई दे ते ह —
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आधार पद क पं क्त उसका अथ
अनन्य भरोसा “तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” आसरा अनेक जगह नह , केवल एक जगह।
(शरणाग त)
मन क एकाग्रता “म अपनो मन ह र से जोरौ, ह र सो जो र मन को एक ओर जोड़ना और शेष मोह से छु ड़ाना।
सबन सो तोर ।”
मन, कम और वचन क “सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै जो सोचा, वही कहा; जो कहा, वही कया — यही
एकता रैदासा।” स ाई क कसौट है।
ध्यान द जए, ये तीन आधार भीतर के ह। इनम से कसी के लए धन, यात्रा, पुरो हत या जा त क अनुम त नह चा हए। इसी लए
रैदास क भ क्त सबके लए खुली भ क्त है।
दूसरा भाग — मेरे वचार से भ क्त के आधार। (यह भाग आपके अपने वचार का है; नीचे एक पूरा उत्तर नमूने के रूप म दया
गया है, जसे आप अपने अनुभव से बदल सकते ह।)
नमूना उत्तर: मेरे वचार से भ क्त का आधार कोई क्रया नह , भाव है। मुझे लगता है क भ क्त के मुख्य आधार ये हो सकते ह —
श्रद्धा और वश्वास — जसे हम मानते ह, उस पर पूरा भरोसा। बना भरोसे क पूजा केवल दखावा है।
प्रेम — डर से क गई पूजा भ क्त नह होती। मीरा, कबीर और रैदास — तीन क भ क्त प्रेम क भ क्त है।
नष्कपटता — ‘मन क्रम वचन’ का एक होना। भीतर कुछ और, बाहर कुछ और — यह भ क्त नह है।
वनम्रता — ‘हम दासा’ कहने क क्षमता, यानी अहंकार का छू ट जाना।
सेवा और सद्व्यवहार — मेरे वचार से सबसे बड़ा आधार यही है। जो व्य क्त दूसर का दुख समझता है, उसक पूजा म अथ
है। रैदास स्वयं जूते बनाने का काम करते हुए भक्त रहे — इसका अथ है क ईमानदारी से कया गया अपना काम भी भ क्त है।
समता का भाव — य द पूजा करके भी हम कसी को छोटा समझते रह, तो भ क्त अधूरी है। रैदास क रचनाएँ आज भी
‘समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश दे ती ह’ (पाठ क भू मका)।
चचा के लए: कक्षा म यह प्रश्न उठाइए — क्या तीथ जाना या व्रत रखना ग़लत है? उत्तर यह नकलेगा क ग़लत
नह है, पर वह भ क्त क शत नह है। रैदास का वरोध कमकांड से नह , कमकांड के एका धकार से है।
प्र.3 3. दोन पद म भक्त और आराध्य के संबंध को कन- कन प्रतीक /उपमाओं से व्यक्त कया गया है? ल खए।
दोन पद म कुल सात प्रतीक-जो ड़याँ और तुलनाएँ आई ह। पहले पद म पाँच चत्र ह, दूसरे पद म दो। नीचे हर जोड़ी के साथ यह
भी दया गया है क वह संबंध का कौन-सा पक्ष दखाती है —
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# प्रतीक / पद क पं क्त आराध्य भक्त संबंध का पक्ष
उपमा
1 चंदन – “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, चंदन पानी एकाकार होना — घुलकर एक हो जाना, भक्त
पानी जाक अंग-अंग बास समानी।” का आराध्य के गुण से भर जाना।
2 घन (बादल) “प्रभु जी तुम घन बन, हम बादल मोर प्रतीक्षा और उल्लास — दशन होते ही भक्त
– मोर मोरा” का मन नाच उठना।
3 चंद – चकोर “जैसे चतवत चंद चकोरा।” चंद्रमा चकोर अपलक नहारना — नष्काम, अनन्य प्रेम;
पाने क शत नह ।
4 द पक – “प्रभु जी तुम द पक, हम बाती, द पक बाती परस्पर- नभरता और समपण — दोन के मेल
बाती जाक जो त बरै दन राती।” से ही ज्यो त बनती है; बाती जलकर मटती भी
है।
5 मोती – “प्रभु जी तुम मोती, हम धागा” मोती धागा एक-दूसरे को पूरा करना — धागे बना मोती
धागा माला नह बनते।
6 सोना – “जैसे सोने मलत सुहागा।” सोना सुहागा नखार — मेल से अशु द्ध दूर होती है और
सुहागा चमक बढ़ती है।
7 स्वामी – “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा” स्वामी दास दास्य भाव — अहंकार का पूण वसजन, पूरा
दास समपण।
8 चरण – “तुम्हरे चरन कमल एक आराध्य के चरण ही आश्रय — कोमल, प वत्र और न लप्त शरण-
कमल भरोसां।” कमल ह स्थल।
इन प्रतीक क खास बात: दे खए क ये सब कहाँ से आए ह — प्रकृ त (चंदन, बादल, मोर, चाँद, चकोर, कमल),
घर (द पक, बाती, पानी) और कारीगर के काम (मोती, धागा, सोना, सुहागा)। इनम एक भी शास्त्रीय या दुलभ
उपमान नह है। रैदास वह बात, जो सबसे क ठन है, उन चीज़ से समझाते ह जो सबसे सुलभ ह — यही उनक
‘सरल और लोकधम भाषा’ है।
प्रतीक और उपमा का अंतर यहाँ कैसे पहचान: जहाँ ‘जैसे’ या ‘सा’ जैसा वाचक शब्द आया है — “जैसे चतवत
चंद चकोरा”, “जैसे सोने मलत सुहागा” — वहाँ उपमा है। जहाँ बना वाचक के सीधा कह दया गया — “तुम
चंदन हम पानी”, “तुम द पक, हम बाती”, “चरन कमल” — वहाँ रूपक है, और वे वस्तुएँ प्रतीक बनकर आई ह।
क वता का स दय — पृष्ठ 148 और 149
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद
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अभ्यास › वधा से संवाद › क वता का स दय
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वधा से सं वाद अलं कार
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a s emजी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चतवत चंद चकोरा।” — उपयुक्त पं क्त के रेखां कत अंश पर ध्यान
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“प्रभु
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प्र.1
द जए। इसम अनुप्रास अलंकार का प्रयोग कया गया है। जस रचना म व्यंजन वण क आवृ त्त एक से अ धक
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बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। — इस अलंकार को समझाइए और पद म से अनुप्रास के और
उदाहरण छाँ टए।
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अनुप्रास कहाँ है — रेखां कत अंश है ‘ चतवत चंद चकोरा’। इसम ‘च’ व्यंजन लगातार तीन बार आया है — चतवत, चंद,
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चकोरा। पुस्तक क प रभाषा के अनुसार ‘ जस रचना म व्यंजन वण क आवृ त्त एक से अ धक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार
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होता है’ — यहाँ एक से अ धक बार आवृ त्त है, इस लए यह अनुप्रास है।
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s m कार कर क्या रहा है: अनुप्रास केवल सजावट नह है। एक ही व्यंजन बार-बार लौटने से पं क्त म लय
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gl बनती है और वह गाने म सहज हो जाती है — याद र खए, पद गाया जाने वाला रूप है। दूसरी बात, ‘च’ क तीन
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ध्व नयाँ चकोर के टकटक लगाकर दे खते रहने क एकरसता को भी सुनाई दे ने लायक बना दे ती ह। ध्व न और अथ
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एक साथ चलते ह — यही अ े अलंकार क पहचान है।
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इन्ह दोन पद से अनुप्रास के और उदाहरण —
पं क्त / अंश आवत व्यंजन कहाँ-कहाँ
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“अब कैसे छू टै राम रट लागी।” रा-म, र-ट
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l a se“जाक जो त बरै दन राती।” ज जा-क , जो- त
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“तुम सौ तो र कवन स जोरौ।” तु-म, तो- र
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“तुम सौ तो र कवन स जोरौ।” स सौ, स
l a seभरोसां।”
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“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक ब/भ बरत, भरोसां (सजातीय ओष्ठ्य ध्व नयाँ)
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“जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा।” जहँ, जहँ, जाओ
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“ह र सो जो र सबन सो तोर ।” स
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सो, सबन, सो
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m .“मन ag मन-क्रम; क्रम-कहै
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क्रम वचन कहै रैदासा।” म/क
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याद र खए: अनुप्रास म व्यंजन क आवृ त्त दे खी जाती है, स्वर क नह । और आवृत्त व्यंजन प्रायः पास-पास के
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शब्द के आरंभ म आते ह, तभी कान उन्ह पकड़ पाता है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 “प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मलत सुहागा।” — उपयुक्त रेखां कत अंश म उपमा अलंकार है। कसी
प्र सद्ध वस्तु क समानता के आधार पर जब कसी वस्तु या व्य क्त के रूप, गुण, धम का वणन कया जाता है तो
वहाँ उपमा अलंकार होता है। — इस अलंकार को समझाइए और पद म से उपमा के और उदाहरण छाँ टए।
उपमा कहाँ है — रेखां कत अंश है ‘सोने मलत सुहागा’। क व भक्त और आराध्य के मलन का वणन सोने और सुहागे के मलन
क प्र सद्ध समानता के आधार पर कर रहा है — और यही पुस्तक क प रभाषा है।
उपमा के चार अंग इस पं क्त म इस तरह ह —
उपमा का अंग इस पं क्त म अथ
उपमेय ( जसक तुलना मोती और धागे का — यानी आराध्य और जस बात को समझाना है।
क जाए) भक्त का — मेल
उपमान ( जससे तुलना सोने में सुहागे का िमलना वह प्र सद्ध वस्तु, जसे सब जानते ह।
क जाए)
वाचक शब्द जैसे तुलना बताने वाला शब्द — जैसे, सम, सा, ज्य , स रस।
साधारण धम (समान िमलकर िनखर उठना सुहागा सोने क अशु द्ध हटाकर उसे दमका दे ता है; भ क्त भक्त
गुण) के मन का मैल हटा दे ती है।
यह उपमान क्य चुना गया: सुहागा कोई दुलभ चीज़ नह थी — हर सुनार क दुकान पर मलती थी। रैदास स्वयं
श्रम करने वाले समाज से आते ह, इस लए उनके उपमान भी कारीगर के काम से आते ह। इसका फल यह है क
उनक बात हर आदमी को तुरंत समझ आ जाती है — यही ‘लोकधम ’ काव्य क ताक़त है। इसी से बनी कहावत
आज भी चलती है — ‘सोने पर सुहागा’।
इन्ह दोन पद से उपमा के और उदाहरण —
“जैसे चतवत चंद चकोरा।” — वाचक ‘जैसे’; उपमान चकोर-चंद्र क प्र सद्ध जोड़ी; साधारण धम — अपलक नहारना।
“तुम सा दे व ओर न ह दूजा।” — वाचक ‘सा’। यहाँ रोचक बात यह है क उपमान खोजा जाता है और मलता नह ; क व
कहता है आपके जैसा कोई है ही नह । ऐसी स्थ त को अनन्वय कहते ह, जहाँ उपमेय क तुलना केवल उसी से हो सकती है।
प्र.3 “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” — उपयुक्त रेखां कत अंश म रूपक अलंकार है।
रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ रूप और गुण क अत्य धक समानता के कारण उपमेय म उपमान का आरोप
कर अभेद ा पत कया जाए। — इस अलंकार को समझाइए और पद म से रूपक के और उदाहरण छाँ टए।
रूपक कहाँ है — रेखां कत अंश है ‘चरन कमल’। यहाँ उपमेय है ‘चरण’ और उपमान है ‘कमल’। क व यह नह कहता क चरण
कमल जैसे ह — वह चरण को कमल कह ही दे ता है। यही ‘उपमेय म उपमान का आरोप कर अभेद स्था पत करना’ है, और यही
रूपक है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
रूपक और उपमा म अंतर एक वाक्य म: उपमा म दो चीज़ अलग रहती ह और उनके बीच ‘जैसे/सा/सम’ खड़ा
रहता है; रूपक म वह बीच का शब्द हट जाता है और दोन एक हो जाती ह। इसी लए ‘जैसे सोने मलत सुहागा’
उपमा है, पर ‘चरन कमल’ रूपक।
यहाँ आरोप उ चत भी है — कमल कोमल है, सुंदर है, प वत्र है और क चड़ म रहकर भी न लप्त रहता है; ये सब गुण
आराध्य के चरण पर सहज बैठते ह। ‘रूप और गुण क अत्य धक समानता’ का यही अथ है।
इन्ह दोन पद से रूपक के और उदाहरण — पहला पद तो लगभग पूरा ही रूपक से बना है, क्य क उसक हर पं क्त म बना
वाचक के सीधा आरोप है —
पं क्त उपमेय आरो पत उपमान अभेद कस गुण के कारण
“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” प्रभु / भक्त चंद न / पानी घुलकर एक हो जाना, गंध का समा जाना।
“प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा” प्रभु / भक्त बादल / मोर आना और नाच उठना — प्रतीक्षा तथा उल्लास।
“प्रभु जी तुम द पक, हम बाती” प्रभु / भक्त दीपक / बाती दोन के मेल से ही ज्यो त बनती है।
“प्रभु जी तुम मोती, हम धागा” प्रभु / भक्त मोती / धागा एक-दूसरे के बना अधूरे; मलकर माला।
“प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा” प्रभु / भक्त वामी / दास
स् पूण समपण, दास्य भाव।
“तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां” चरण कमल कोमलता, प वत्रता, न लप्तता।
पहचानने का आसान तरीक़ा: पं क्त म ‘जैसे’, ‘सा’, ‘सम’, ‘ज्य ’, ‘स रस’ जैसा कोई वाचक शब्द ढूँ ढ़ए। मल
जाए तो उपमा; न मले और फर भी एक चीज़ को दूसरी कह दया गया हो तो रूपक।
प्र.4 अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक म स म्म लत क वताओं म अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य
पं क्तय को ढूँ ढ़कर ल खए।
नीचे गंगा के काव्य खंड क चार आगे आने वाली क वताओं से उदाहरण दए गए ह। हर पं क्त के साथ यह भी बताया गया है क
अलंकार काम कैसे कर रहा है — केवल नाम लख दे ना पयाप्त नह होता।
1. अनुप्रास अलंकार (व्यंजन वण क एक से अ धक बार आवृ त्त)
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क वता पं क्त आवत व्यंजन और उसका प्रभाव
राम-लक्ष्मण-परशुराम “सुर मु न न◌ाग नगर नर न◌ारी।” ‘न’ चार बार — िगनती-सी लय बनती है, िजससे लगता है िक
संवाद (तुलसीदास) सचमुच सारा संस ार एक साथ काँप उठा।
राम-लक्ष्मण-परशुराम “ पतु समेत क ह क ह नज न◌ामा।” ‘किह किह’ की पुनरुिक्त और ‘िनज नामा’ में ‘न’ — राजाओं के
संवाद एक -एक कर नाम बताने का दृ श्य सुनाई दे ने लगता है।
भार त, जय, वजयकरे! “धवल ध◌ार हार गले।” ‘ध ’ की आवृित्त गंग ा की धारा के बहाव जैस ी गित दे ती है।
( नराला)
भार त, जय, वजयकरे! “शतमुख-शतरव-मुखरे!” ‘श’ की आवृित्त और ‘शत’ की पुनरुिक्त िमलकर अनेक िदशाओं से
उठती ध्विन का पभाव बनाती है।
झाँसी क रानी (सुभद्रा “बुंदेले हरबोल के मुँह हमने सुनी ‘ह’ की आवृित्त ; यह टेक बार -बार लौटती है, इसिलए अनुपास पूरे
कुमारी चौहान) कहानी थी,” गीत की धड़ कन बन जाता है।
झाँसी क रानी “ क◌ंतु कालग त चुपके-चुपके काली ‘क ’ की आवृित्त के साथ ‘चुपके -चुपके ’ की पुनरुिक्त — िवपित्त के
घटा घेर लाई,” चुपचाप बढ़ ने का पभाव।
घर क याद (भवानीप्रसाद “ गर रहा पानी झरा-झर, हल रहे पत्ते ‘ह’ और ‘र ’ की आवृित्त ; साथ में झरा-झर , हरा-हर , सर -सर , थर -
मश्र) हरा-हर, बह रही है हवा सर-सर,” थर जैस ी ध्वन्यात्मक पुनरुिक्तयाँ — बािरश सचमुच सुनाई दे ने लगती
है।
2. उपमा अलंकार (वाचक शब्द — जैसे, सम, सा, ज म, ज्य — के साथ तुलना)
क वता पं क्त उपमेय – उपमान – वाचक
राम-लक्ष्मण- “सुनहु राम जे ह सवधनु तोरा। सहसबाहु धनुष तोड़ ने वाला (उपमेय) – सहस्रबाहु (उपमान) – ‘सम’ (वाचक )
परशुराम संवाद सम सो रपु मोरा।”
राम-लक्ष्मण- “धनुही सम तपुरा र धनु ब दत सकल िशव-धनुष (उपमेय) – साधारण धनुही (उपमान) – ‘सम’ (वाचक );
परशुराम संवाद संसारा।” यहाँ उपमा व्यंग्य का काम कर रही है।
राम-लक्ष्मण- “पूछत जा न अजान ज म ब्यापेउ कोपु परशुराम का पूछना (उपमेय) – अनजान बनकर पूछने वाला (उपमान)
परशुराम संवाद सरीरा।” – ‘िजिम ’ (वाचक )
झाँसी क रानी “सुभट बुंदेल क वरुदाव ल-सी वह आई ल क्ष्मीबाई का आना (उपमेय) – बुंदे ल ों की िवरुदावली (उपमान) –
झाँसी म,” ‘सी’ (वाचक )
घर क याद “ पताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत- िपता का हृदय (उपमेय) – नवनीत यानी मक्खन (उपमान) – ‘सा’
सा उर,” (वाचक ); साधारण धम — कोमलता
3. रूपक अलंकार ( बना वाचक के, उपमेय म उपमान का आरोप)
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क वता पं क्त उपमेय म कस उपमान का आरोप
राम-लक्ष्मण-परशुराम “पद सरोज मेले दोउ भाई।” चरणों में कमल (सरोज) का आरोप — ठीक ‘चरन कमल ’ जैस ा ही
संवाद पयोग।
भार त, जय, “मुकुट शुभ्र हम-तुषार,” िहमालय की श्वेत बफ़ पर मुकु ट का आरोप — भारत माता का मुकु ट।
वजयकरे!
भार त, जय, “गंगा ज्यो तजल-कण/ धवल धार गंगा की उजली धारा पर गले के हार का आरोप।
वजयकरे! हार गले।”
भार त, जय, “तरु-तृण-वन-लता वसन,” वन-वनस्पित पर वस्त्र (वसन) का आरोप।
वजयकरे!
झाँसी क रानी “बरछ , ढाल, कृपाण, कटारी उसक हिथयारों पर सहेल ी का आरोप — बचपन की संिगनी ही तलवार है।
यही सहेली थी,”
घर क याद “माँ क जसक स्नेह-धारा का यहाँ नेह पर धारा (नदी) का आरोप — पेम बहता हुआ जल है।
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तक भी पसारा,”
घर क याद “वज्र-भुज नवनीत-सा उर,” भुजाओं पर वज्र का आरोप। ध्यान दीिजए — इसी पंिक्त के पहले आधे में
रूपक है और दू स रे आधे में उपमा।
अभ्यास का सुझाव: कोई भी पं क्त उठाकर पहले यह दे खए क वाचक शब्द है या नह — इसी से उपमा और
रूपक अलग हो जाते ह। अनुप्रास के लए पं क्त को ऊँची आवाज़ म प ढ़ए; जो व्यंजन कान पर बार-बार पड़े, वही
आवत व्यंजन है।
क वता क कुछ अन्य वशेषताएँ — पृष्ठ 149
अभ्यास › वधा से संवाद › क वता क कुछ अन्य वशेषताएँ
वधा से सं वाद ता लका
प्र.1 नीचे द गई सूची को ध्यान से दे खए। इस सूची म रैदास के दोन पद से कुछ वशेषताएँ चुनकर द गई ह। पद म
से चुनकर इन वशेषताओं को दशाती पं क्तयाँ ल खए। उदाहरण के लए पहली वशेषता के सामने पं क्त द गई
है। — वशेषताएँ: अनन्य भ क्त भाव / सरल और लोकधम भाषा / उपमा और तुलना / लयात्मकता और
गेयता/ध्वन्यात्मकता / दृढ़ नष्ठा और आ ा
पूरी भरी हुई ता लका इस प्रकार है (पहली पं क्त पुस्तक ने स्वयं द है) —
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद
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वशेषताएँ उदाहरण
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अनन्य भ क्त भाव
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“जो तुम तोरौ राम म न ह तोरौ, तुम सौ तो र कवन स जोरौ।”
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सरल और लोकधम भाषा “पभु जी तुम दीपक , हम बाती, जाकी जोित बरै िदन राती। ”
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उपमा और तुलना “पभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने िमलत सुहागा। ”
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लयात्मकता और गेयता/ध्वन्यात्मकता “पभु जी तुम चंद न हम पानी, जाकी अंग -अंग बास समानी। ”
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दृढ़ नष्ठा और आ ा
ag “तीरथ बरत न क ँ अंदेसा, तु हरे चरन कमल एक भरोसां।”
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हर पं क्त क्य चुनी गई —
1. अनन्य भ क्त भाव — “जो तुम तोरौ राम म न ह तोरौ, तुम सौ तो र कवन स जोरौ।” (यह पुeस्m
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काoअथ है — जसके लए दूसरा कोई है ही नह । इस पं क्त म दोन बात ह: भक्तgकl ओर से नाता कभी नह टू टेगा,
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तक का दया उदाहरण है।)
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और तोड़कर जोड़ने के लए कोई दूसरा है भी नह । भ क्त यहाँ शत-र हत हो जाती है , इसी
a 2. सरल और लोकधम भाषा — “प्रभु जी तुम द पक, हम बाती, जाक जो त बरै दन राती।” पूरी पं क्त म एक भी क ठन
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या शास्त्रीय शब्द नह है। ‘द पक’ और ‘बाती’ हर घर क चीज़ ह — शाम को द या हर आँगन म जलता था। शब्द-रूप भी
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बोलचाल के ह — जाक ( जसक ), जो त (ज्यो त), बरै (जलती है), राती (रात)। यही ‘लोकधम ’ होना है: लोक क चीज़ से,
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लोक क ही भाषा म सबसे बड़ी बात कह दे ना।
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वैक ल्पक उदाहरण: “म अपनो मन ह र से जोरौ” — ‘अपनो’, ‘जोरौ’ पूरी तरह बोलचाल के रूप ह।
3. उपमा और तुलना — “प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मलत सुहागा।” इसम वाचक शब्द ‘जैसे’ स्पष्ट रूप से
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मौजूद है, इस लए यहाँ शुद्ध उपमा अलंकार है — और पुस्तक ने स्वयं इसी अंश को उपमा का उदाहरण बताया है (पृष्ठ 149)।
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तुलना यह है: जैसे सोने म सुहागा मलने पर सोना और नखर उठता है, वैसे ही भक्त और आराध्य मलकर एक-दूसरे क शोभा
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वैक.cल्पक उदाहरण: “जैसे चतवत चंद चकोरा।”
बढ़ाते ह।
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a 4. लयात्मकता और गेयता/ध्वन्यात्मकता — “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाक अंग-अंग बास समानी।” इस पं क्त म
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तीन चीज़ एक साथ मलती ह —
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• लय — दोन चरण लगभग बराबर मात्रा के ह, इस लए गाते समय ठहराव ठ क बीच म पड़ता है।
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• गेयता — चरणांत म तुक है, पानी – समानी। पू.रcे पद म यही ढाँचा चलता है (मोरा–चकोरा, बाती–राती, धागा–सुहागा, दासा– ag
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रैदासा), और ‘प्रभु जी तुम … हम …’ हर sपंeक्त म लौटता है — इसी दोहराव से पद गाया जा सकने लायक बनता है।
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• ध्वन्यात्मकता — ‘अंग-अंग’ क agपुlनरु क्त और ‘न’ ध्व न (पानी, समानी, चंदन) का बार-बार लौटना पं क्त म गूँज पैदा करता
है।
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वैक ल्पक उदाहरण: टे क क पं क्त “अब कैसे छू टै राम रट लागी।”, जो गायन म हर अंतरे के बाद लौटती है।
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cवहo कसी दबाव म न डोले। यहाँ भक्त समाज क सबसे मान्य कसौ टय — तीथagऔरl व्रत — को छोड़ देता है, पर अपने भरोसे
5. दृढ़ नष्ठा और आ ा — “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां ।” नष्ठा तब दृढ़ कहलाती है जब
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a sem को नह छोड़ता। ‘एक भरोसां’ का ‘एक’ ही दृढ़ता का प्रमाण है: आस्था बँट हुई नह है।
agl वैक ल्पक उदाहरण: “सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।” — आठ पहर क आस और मन-कम-वचन क
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एकता, दोन दृढ़ आस्था के ही लक्षण ह।
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ता लका भरते समय ध्यान रख: हर m
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वशेषता के लए अलग-अलग पं क्त चु नए, वरना उत्तर दोहराव जैसा
a — आधी पं क्त से वशेषता सद्ध नह होती।
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लगेगा। और पं क्त को पूरा ल खए
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
वषय से संवाद — पृष्ठ 149 और 150
अभ्यास › वषय से संवाद
वषय से सं वाद अं त र- वषयी
प्र.1 1. तीथ और व्रत के ान पर रैदास ने आराध्य क भ क्त को प्रधान माना है। भ क्तकाल के क व रैदास क तरह
कबीर भी नराकार आराध्य क भ क्त पर बल दे ते ह। तत्कालीन सामा जक, सांस्कृ तक प र तय के आधार
पर बताइए क इसके क्या कारण हो सकते ह? (संकेत– आप अपने सामा जक व ान के शक्षक क सहायता भी
ले सकते ह।)
रैदास और कबीर — दोन 15व शताब्द के आस-पास के, दोन काशी से जुड़े, दोन श्रम करने वाले समाज से। दोन ने एक ही बात
कही: भगवान तक पहुँचने के लए न मं दर चा हए, न तीथ, न पुरो हत — केवल स ा मन चा हए। यह बात हवा म नह आई; उस
समय क प र स्थ तय ने इसे जन्म दया। मुख्य कारण ये हो सकते ह —
1. जा त-व्यव ा और मं दर-प्रवेश पर रोक। यह सबसे बड़ा कारण है। उस समय समाज जा त के खाँच म बँटा था और
तथाक थत ‘नीची’ जा तय के लोग को मं दर, तीथ, शास्त्र-पाठ और कमकांड से दूर रखा जाता था। रैदास स्वयं चमकार प रवार से
थे। जस भक्त को मं दर के भीतर जाने ही न दया जाए, उसके लए भ क्त का एक ही रास्ता बचता है — भीतर का रास्ता।
इसी लए वे कहते ह — “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” नराकार ईश्वर क सबसे बड़ी बात यही है क
उसका कोई ारपाल नह होता।
2. कमकांड का बढ़ जाना और भ क्त का खच ला हो जाना। तीथ-यात्रा म समय, धन और साधन लगते थे; व्रत-पूजा म सामग्री
और पुरो हत लगते थे। जो कसान, बुनकर, चमकार या मज़दूर दन-भर श्रम करता था, उसके पास ये सब नह थे। संत क वय ने
भ क्त को मुफ़्त और सुलभ बना दया — नाम-स्मरण के लए न धन चा हए, न जगह, न अनुम त। “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”
— यह पं क्त उस पूरी व्यवस्था का उत्तर है।
3. धम म दखावा बढ़ जाना। बाहरी क्रयाएँ इतनी बढ़ गई थ क धम का असली अथ पीछे छू ट गया था। इसी लए रैदास ने ‘बाह्य
आडंबर का खंडन कर मन क शुद्धता और आंत रक भ क्त को ही स ा धम माना’ (पाठ क भू मका), और कबीर ने भी बाहरी
पूजा-पद्ध त के दखावे पर तीखी चोट क । ‘मन क्रम वचन’ क कसौट इसी दखावे के वरुद्ध खड़ी क गई है।
4. समाज म समता क माँग। नराकार ईश्वर क कल्पना अपने आप म एक सामा जक वचार है। य द ईश्वर का कोई रूप नह ,
तो उसका कोई एक मं दर नह ; और य द उसका कोई एक मं दर नह , तो वहाँ ऊँच-नीच का कोई नयम भी नह । इसी लए रैदास क
रचनाएँ ‘आज भी समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश दे ती ह’। भ क्त यहाँ केवल पूजा नह , बराबरी का दावा बन जाती है।
5. दो धाराओं का मेल — भ क्त और सूफ़ । उस दौर म द क्षण भारत से चली भ क्त क लहर उत्तर भारत तक पहुँच चुक थी,
और साथ ही सूफ़ संत क प्रेम-साधना भी लोक प्रय हो रही थी। दोन म एक बात समान थी — ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता प्रेम है,
कमकांड नह । इस मेल ने नगुण संत काव्य को मज़बूत आधार दया। यही कारण है क रैदास क रचनाएँ आगे चलकर आ द श्री गुरु
ग्रंथ सा हब जी म भी शा मल हुईं।
6. लोकभाषा का उभार। संस्कृत कुछ ही लोग क भाषा थी। संत क वय ने ब्रज, अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उदू-फ़ारसी
के शब्द से बनी सधुक्कड़ी भाषा अपनाई, जसे रास्ते चलता आदमी समझ सकता था। जब भाषा सबक हो गई, तो भ क्त भी
सबक हो गई।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
नष्कष: नराकार भ क्त पर बल दे ना उस समय केवल धा मक चुनाव नह था, वह एक सामा जक उत्तर था। जस
समाज ने मं दर के दरवाज़े बंद कए, संत क वय ने उससे कहा क ईश्वर दरवाज़े के भीतर रहता ही नह — “तुम सा
दे व ओर न ह दूजा”, और वह हर जगह है। इस तरह भ क्त आंदोलन धम-सुधार के साथ-साथ समता का आंदोलन
भी बन गया।
कक्षा-काय का सुझाव: सामा जक व ान के शक्षक से पूछकर एक समय-रेखा बनाइए — भ क्त आंदोलन क
द क्षण से उत्तर क यात्रा, रामानंद, कबीर, रैदास, नानक, मीरा और सूफ़ संत। इससे यह स्पष्ट हो जाएगा क रैदास
अकेले नह थे, वे एक पूरी लहर का हस्सा थे।
प्र.2 2. “सोने मलत सुहागा” — ‘सुहागा’ एक प्राकृ तक ख नज है जसके प्रयोग से सोने क अशु द्धयाँ दूर हो जाती
ह और उसक चमक बढ़ जाती है। ‘सुहागा’ का रासाय नक नाम और उसक वशेषताएँ अपने व ान के शक्षक
से चचा करके ल खए।
सुहागा का रासाय नक नाम — सुहागे को अंग्रेज़ी म बोरैक्स (Borax) कहते ह। इसका रासाय नक नाम है सो डयम टे ाबोरेट
डेकाहाइ ेट और सूत्र है —
Na2B4O7 · 10H2O
(सोिडयम टे ट ाबोरेट डेक ाहाइडेट — यानी अणु के साथ पानी के 10 अणु जुड़े हुए)
मुख्य वशेषताएँ —
वशेषता ववरण
रूप सफ़ेद, चमक ला, रवेदार ( क्रस्टलीय) ठोस; स्वाद म हल्का क्षारीय।
प्रा प्त प्राकृ तक ख नज के रूप म सूखी झील क तलछट से; भारत म यह परंपरागत रूप से ल ाख और तब्बत क
ओर से आता रहा है।
जल म घुलनशीलता गरम पानी म आसानी से घुल जाता है; इसका जलीय वलयन क्षारीय होता है।
गरम करने पर पहले जल के अणु नकलते ह और यह फूलकर एक स्पंज-सा पदाथ बनाता है; और गरम करने पर पघलकर
पारदश काँच जैसा बोरैक्स-मनका (borax bead) बन जाता है।
धातु-ऑक्साइड घोलने यही इसका सबसे उपयोगी गुण है — पघला हुआ बोरैक्स धातुओं के ऑक्साइड को घोल लेता है और रंगीन
क क्षमता मनका बनाता है (प्रयोगशाला क बोरैक्स-बीड परीक्षा इसी पर आधा रत है)।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
‘सोने पर सुहागा’ का व ान: सोने को गलाते समय उसक सतह पर और उसम मली दूसरी धातुओं क
ऑक्साइड क परत बन जाती है, जससे सोना मैला और भुरभुरा दखता है। सुनार गलाते समय थोड़ा-सा सुहागा
डालता है। पघला हुआ सुहागा इन ऑक्साइड को घोलकर मैल (स्लैग) के रूप म ऊपर ले आता है और साथ ही
पघले सोने पर एक परत बना दे ता है जो उसे फर से हवा से ऑक्सीकृत नह होने दे ती। इस काम को रसायन क
भाषा म गालक या फ्लक्स (flux) कहते ह। नतीजा — सोना शुद्ध और अ धक चमक ला नकलता है। इसी लए
कसी अ चीज़ के और बेहतर हो जाने को ‘सोने पर सुहागा’ कहा जाता है, और रैदास ने इसी लोक-अनुभव से
उपमा बनाई।
अन्य उपयोग —
सोना-चाँद क सोल्ड रग और वे ल्डग म गालक के रूप म।
काँच और बोरो स लकेट काँच (जो गरमी से नह चटकता — प्रयोगशाला के बीकर) बनाने म।
इनैमल और चीनी म के बतन पर चमकदार परत (ग्लेज़) चढ़ाने म।
कपड़े धोने के पाउडर म — इसका क्षारीय वलयन मैल छु ड़ाने म मदद करता है।
प्रयोगशाला म बोरैक्स-बीड परीक्षा ारा धातुओं क पहचान म।
आयुवद और घरेलू उपयोग म इसे ‘टं कण’ कहा जाता है।
सावधानी: सुहागा खाने क चीज़ नह है। इसे खाद्य पदाथ म मलाना भारत म प्र तबं धत है, क्य क यह स्वास्थ्य के
लए हा नकारक है। प्रयोगशाला म इसे शक्षक क दे ख-रेख म ही प्रयोग कर।
व्याकरण क बात — शब्द क बात — पृष्ठ 150
अभ्यास › भाषा से संवाद › व्याकरण क बात › शब्द क बात
भाषा से सं वाद शब्द क बात
प्र.1 1. प ठत पद म से सं ा और सवनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँ ढ़कर ल खए।
सं ा के तीन उदाहरण — राम, चंदन, द पक।
सवनाम के तीन उदाहरण — तुम, हम, म।
नीचे इन्ह पद क पं क्त के साथ और भेद बताकर दया गया है, ता क पहचान का आधार भी स्पष्ट हो जाए —
सं ा ( कसी व्य क्त, वस्तु, स्थान या भाव का नाम) —
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
सं ा पद क पं क्त भेद
राम “अब कैसे छू टै राम रट लागी।” यिक्तवाचक सं ा
व्
चंद न “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” जाितवाचक सं ा
दीपक “प्रभु जी तुम द पक, हम बाती” जाितवाचक सं ा
मोती “प्रभु जी तुम मोती, हम धागा” जाितवाचक सं ा
रै द ास “ऐसी भग त करै रैदासा।” यिक्तवाचक सं ा
व्
भगित (भिक्त) “ऐसी भग त करै रैदासा।” भाववाचक सं ा
तीरथ / बरत “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” जाितवाचक सं ा
सवनाम (सं ा के स्थान पर आने वाला शब्द) —
सवनाम पद क पं क्त भेद
तुम “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” पुरुषवाचक — मध्यम पुरुष
हम “प्रभु जी तुम द पक, हम बाती” पुरुषवाचक — उ त्तम पुरुष
मैं “म अपनो मन ह र से जोरौ” पुरुषवाचक — उ त्तम पुरुष
जो “जो तुम तोरौ राम म न ह तोरौ” संबंधवाचक सवनाम
कवन (कौन) “तुम सौ तो र कवन स जोरौ।” पश्नवाचक सवनाम
अपनो (अपना) “म अपनो मन ह र से जोरौ” िनजवाचक सवनाम
जाकी (िजसकी) “जाक अंग-अंग बास समानी।” संबंधवाचक सवनाम
पहचानने का तरीक़ा: जस शब्द के आगे ‘का/क /के’ लगाकर या ‘कौन-सा?’ पूछकर कोई नाम मल जाए, वह
सं ा है। और जो शब्द कसी नाम क जगह खड़ा हो — जैसे ‘रैदास’ क जगह ‘म’, ‘प्रभु’ क जगह ‘तुम’ — वह
सवनाम है। इन पद म यह बात बहुत साफ़ दखती है: पहली पं क्त म नाम ‘राम’ आता है, फर पूरे पद म उसी के
लए ‘तुम’ चलता रहता है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद
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प्र.2 2. रैदास के इन दोन पद म बहुत से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए ह जनके ान पर अन्य शब्द का प्रयोग होता है। नीचे
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co ह? ल खए। — मोरा, चकोरा, बाती, राती, सोने, तीरथ, बरत gl
सूची म दए गए शब्द को दे खए। आप या आपके आस-पास के लोग इन शब्द के लए कन अन्य शब्द का
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प्रयोग करते
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ये सात शब्द रैदास क ब्रज- म श्रत सधुक्कड़ी भाषा के रूप ह। आज मानक हद म और हमारी बोलचाल म इनके स्थान पर दूसरे
शब्द चलते ह। नीचे ता लका म तीन रूप दए गए ह —
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पद का पद म अथ
ag मानक बोलचाल / आस-पास के प्रयोग
शब्द हद म
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मोरा मोर पक्षी मोर मयूर, मोरा, मोरवा (अवधी-भोजपुरी म), पंख वाला नाचने वाला
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पक्षी
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चकोरा तीतर क जा त का पक्षी, जो चंद्रमा चकोर चकोर पंछ ; कह -कह इसे ‘चकवा’ से भ्र मत कर लया जाता है,
a g का परम प्रेमी माना जाता है पर वह अलग पक्षी है
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बत्ती
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बाती द ये क बत्ती बाती, रूई क बत्ती, द ये क बत्ती, द पक क लौ वाली बत्ती;
m . आज ‘बत्ती’ बजली के बल्ब के लए भी बोला जाता है
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as रात
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राती रात रा त्र, रैन, र तया, रात-भर, ‘ दन-रात’ (जैसे पद म ‘ दन राती’)
सोना
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सोने स्वण धातु स्वण, कंचन, कनक, गोल्ड; गाँव म गहन के लए ‘पीली धातु’
भी कहा जाता है
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c o m पुण्य स्थान, जहाँ पूजा-स्नान के लए g l as
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तीथ
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तीरथ तीथस्थान, तीथयात्रा, धाम, चारधाम, ‘दरसन करने जाना’
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जाया जाता है
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a उपवास, संकल्प वत उपवास, फलाहार, ‘बरत रखना’, ‘ नजला’, ‘रोज़ा’ (उदू से)
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इससे क्या समझ म आता है: ध्यान द जए .कc ये सब शब्द आज भी पूरी तरह अजनबी नह लगते — ‘बाती’, g l a
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‘राती’, ‘तीरथ’, ‘बरत’ आज भी गाँवa
l seम सुनाई दे ते ह। इसका अथ है क रैदास ने जान-बूझकर ऐसी भाषा चुनी
कgभाषा थी — और इसी लए वह पाँच सौ साल बाद भी जी वत है। यही ‘सरल और
-घर
जो कोश क नह , बोलने वाल a
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लोकधम भाषा’ है।
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ध्यान द जए: ‘राती’ जैसा रूप केवल पुराना नह है — वह तुक के काम भी आता है (‘बाती – राती’)। य द क व
s e m ‘रात’ लखते तो तुक टूट जाती। इस लए पद म शब्द-रूप का चुनाव अथ के साथ-साथ लय से भी तय होता है।
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सृजन — पृष्ठ 150
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
अभ्यास › सृजन
सृ ज न ले ख न
प्र.1 1. कक्षा म समूह बनाकर इन दोन पद को गाकर/पाठ करके प्रस्तुत क जए।
यह करके दखाने वाली ग त व ध है। नीचे प्रस्तु त क पूरी योजना द गई है, जसे आप ज्य -का-त्य अपना सकते ह।
अ प्रस्तु त म क्या-क्या होना चा हए —
टे क क पहचान — ‘अब कैसे छू टै राम रट लागी’ पहले पद क टे क है। हर अंतरे के बाद इसे पूरा समूह मलकर दोहराएगा।
यही पद-गायन क सबसे पहली शत है।
ठहराव सही जगह — हर पं क्त दो चरण म बँट है; ठहराव ठ क बीच म ली जए — “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी | जाक
अंग-अंग बास समानी।”
तुक पर ज़ोर — पानी–समानी, मोरा–चकोरा, बाती–राती, धागा–सुहागा, दासा–रैदासा। चरणांत का शब्द ज़रा ख चकर गाइए,
इससे लय अपने आप बैठ जाएगी।
भाव के अनुसार स्वर — पहला पद प्रेम और समपण का है — कोमल, धीमी लय म। दूसरा पद घोषणा का है — दृढ़, थोड़ी
ऊँची और स्पष्ट आवाज़ म।
वाद्य — हारमो नयम, ढोलक या मंजीरा; कुछ न हो तो केवल ताली से भी ताल द जा सकती है — संत काव्य इसी तरह गाया
जाता रहा है।
उ ारण — ‘छू टै ’, ‘बरै’, ‘तोरौ’, ‘भरोसां’ — इनका उ ारण ठ क क जए, क्य क ब्रज के इन रूप म ही पद क मठास है।
नमूना प्रस्तु त-योजना (10 वद्या थय का समूह, लगभग 5 मनट):
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क्रम कौन क्या कैसे
1 सूत्रधार (1 दो वाक्य क भू मका “हम काशी के संत रैदास के दो पद प्रस्तुत कर रहे ह। पहले पद
वद्याथ ) म भक्त और आराध्य के अटू ट नाते के पाँच चत्र ह।”
2 पूरा समूह टे क — “अब कैसे छू टै राम रट लागी।” धीमे से शुरू करके दोहराएँ; ताली क एक सम-ताल।
3 समूह ‘क’ (3 चंदन-पानी और घन-मोर वाली पं क्तयाँ कोमल स्वर; ‘अंग-अंग’ पर हल्का ज़ोर।
वद्याथ )
4 पूरा समूह टे क दोहराएँ —
5 समूह ‘ख’ (3 द पक-बाती और मोती-धागा वाली ‘ दन राती’ को ख चकर गाएँ।
वद्याथ ) पं क्तयाँ
6 पूरा समूह अं तम पं क्त — “प्रभु जी तुम स्वामी, सब एक साथ, स्वर धीरे-धीरे धीमा करते हुए।
हम दासा, ऐसी भग त करै रैदासा।”
7 समूह ‘ग’ (3 दूसरा पद — सस्वर पाठ (गायन नह ) दृढ़, स्पष्ट आवाज़; ‘म न ह तोरौ’ पर सबसे अ धक बल।
वद्याथ )
8 सूत्रधार समापन “मन क्रम वचन कहै रैदासा — यानी मन, कम और वचन तीन
से यही बात। धन्यवाद।”
तैयारी का सुझाव: प्रस्तु त से पहले पूरे समूह के साथ पद को तीन बार बना गाए प ढ़ए — केवल लय पकड़ने के
लए। जब सबक साँस एक जगह रुकने लगे, तभी गाना शुरू क जए।
प्र.2 2. कल्पना क जए क पद म आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस म बात कर रहे ह। इस दृश्य
को आधार बनाकर संवाद-लेखन क जए।
अ े संवाद-लेखन म क्या होना चा हए —
पद क अपनी उपमाएँ ही आधार बन — चंदन-पानी, घन-मोर, चंद-चकोर, द पक-बाती, मोती-धागा, सोना-सुहागा, स्वामी-
दास।
दोन पात्र क भाषा अलग सुनाई दे — भक्त क भाषा म वनम्रता और आग्रह, आराध्य क भाषा म स्नेह और शांत आश्वासन।
संवाद कह भाषण न बन जाए — छोटे -छोटे वाक्य, आमने-सामने क बात।
अंत म पद का मूल भाव नकलकर आए — यह नाता तोड़ा नह जा सकता।
नमूना उत्तर:
(संध्या का समय। एक छोटा-सा आँगन। कोने म द या जल रहा है। भक्त हाथ जोड़े बैठा है; भीतर से एक शांत स्वर उत्तर दे ता है।)
भक्त — प्रभु जी! आज मन बहुत भारी है। लोग कहते ह, तीथ कए बना भ क्त पूरी नह होती।
आराध्य — और तुम्हारा मन क्या कहता है?
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
भक्त — मेरा मन तो बस एक ही बात जानता है — जहाँ-जहाँ म जाता हूँ, वह आप मल जाते ह। फर म आपको ढूँ ढ़ने कहाँ
जाऊँ?
आराध्य — तो फर अंदेसा कस बात का, रैदास?
भक्त — अंदेसा नह है, प्रभु। बस एक डर है — कह आप मुझसे नाता न तोड़ ल।
आराध्य — (हँसकर) और य द तोड़ लूँ?
भक्त — तो भी म नह तो ग
ँ ा। आपसे तोड़कर जो ग
ँ ा भी कससे? आप चंदन ह, म पानी। चंदन घस चुका, सुगंध मेरे अंग-अंग म
समा चुक । अब पानी को चंदन से अलग कैसे करगे?
आराध्य — तुम्हारी बात म सचमुच सुगंध है।
भक्त — आप घन ह, म मोर। बादल घरते ह तो पंख अपने आप खुल जाते ह — मने कब नाचना सीखा था? और चकोर से पू छए,
वह चाँद को क्य दे खता है। वह उत्तर नह दे गा, बस दे खता रहेगा।
आराध्य — पर मोर को बादल हर दन नह मलते, और चकोर को चाँद कभी नह मलता।
भक्त — इसी लए तो प्रेम बचा हुआ है, प्रभु। मलने म तृ प्त है, न मलने म प्रतीक्षा — और प्रतीक्षा भी तो आपक ही है।
आराध्य — तुम अपने को इतना छोटा क्य कहते हो — पानी, बाती, धागा?
भक्त — छोटा कहाँ कहा, प्रभु! आप द पक ह, म बाती — पर ज्यो त तो हम दोन के मलने से बनी है। आप मोती ह, म धागा —
मोती बखरे न रह, इस लए धागा चा हए। मने अपने को छोटा नह , ज़रूरी कहा है।
आराध्य — (स्नेह से) और यह सुहागे वाली बात?
भक्त — वह सुनार से सीखी है, प्रभु। सोने म सुहागा पड़ता है तो मैल जल जाता है और सोना दमक उठता है। आपका नाम मेरे मन
म पड़ा, तो मेरा मैल भी वैसे ही जल गया।
आराध्य — तो अब क्या चा हए?
भक्त — कुछ नह । बस इतना क यह रट लगी रहे। आप स्वामी ह, म दास — और दास क सबसे बड़ी कमाई यही है क उसका
स्वामी कभी बदले नह ।
आराध्य — (धीमे से) रैदास, जो मुझे मन, कम और वचन — तीन से पुकारता है, उसे मुझे ढूँ ढ़ना नह पड़ता। म पहले से वह होता
हूँ।
(द ये क लौ एक बार काँपकर स्थर हो जाती है। भक्त सर झुकाए बैठा रहता है।)
अपना संवाद लखते समय: हर उपमा को एक-एक संवाद द जए, सब एक साथ मत ठूँ सए। और आराध्य से कोई
चमत्कार मत करवाइए — इन पद क सुंदरता चमत्कार म नह , सहजता म है।
प्र.3 3. “जो तुम तोरौ राम म न ह तोरौ” पं क्त को आधार बनाकर अटू ट मत्रता पर एक लघुकथा तैयार क जए।
अ लघुकथा म क्या होना चा हए —
एक ही घटना और दो-तीन से अ धक पात्र नह । लघुकथा उपन्यास नह , एक झलक है।
पं क्त का भाव घटना से नकले, उपदे श से नह — यानी कोई पात्र यह कहे नह क ‘ मत्रता महान होती है’, ब ल्क करके दखा
दे ।
अंत म मोड़ हो, जो पाठक को ठहरा दे ।
शीषक ऐसा हो जो कथा खोले नह , बस इशारा करे।
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नमूना उत्तर:
शीषक — एक तरफ़ा
दसव क परीक्षा से ठ क तीन महीने पहले ह रया के पता का दे हांत हो गया।
वह लड़का, जो कक्षा म सबसे आगे बैठता था, अब सबसे पीछे बैठने लगा। पहले वह उत्तर दे ने के लए हाथ उठाता था; अब वह
खड़क से बाहर दे खता रहता। एक दन वह स्कूल आया ही नह । दूसरे दन भी नह । तीसरे दन मास्टर जी ने हा ज़री म उसका नाम
पुकारना बंद कर दया।
सोमू उसके पीछे -पीछे उसके घर तक गया।
“अब म नह प ँ गा,” ह रया ने बना दे खे कहा। “दुकान पर बैठना है। और तू भी अब मेरे घर मत आया कर। मेरे साथ रहने से तेरा
भी नुकसान होगा।”
“मुझे नुकसान क चता होती, तो पहले दन ही न आता,” सोमू बोला।
“म कह रहा हूँ न — अब हमारी दोस्ती ख़त्म।”
सोमू कुछ दे र चुप रहा। फर उसने अपना बस्ता ज़मीन पर रखा और बोला, “तूने तोड़ ली होगी। मने नह तोड़ी।”
“ऐसे कैसे नह तोड़ी?”
“तोड़कर जो ग
ँ ा कससे?” सोमू ने कंधे उचकाए। “तेरे जैसा दूसरा कौन है?”
उस दन के बाद सोमू रोज़ शाम को दुकान पर आने लगा। वह ग्राहक के जाते ही तख़्त पर कॉपी खोल दे ता और दन-भर क पढ़ाई
ऊँची आवाज़ म दोहराता। ह रया सुनता, कभी-कभी बीच म टोक दे ता — “यह ग़लत है, दुबारा पढ़।” फर एक दन उसने ख़ुद कॉपी
माँग ली।
परीक्षा म दोन बैठे। प रणाम आया तो ह रया के अंक सोमू से चार अ धक थे।
“दे ख, म जीत गया,” ह रया हँसा।
“म तो पहले ही जीत चुका था,” सोमू ने कहा, “ जस दन तूने दोस्ती तोड़ी थी और मने नह तोड़ी।”
यह लघुकथा पं क्त से कैसे जुड़ती है: रैदास कहते ह — “जो तुम तोरौ राम म न ह तोरौ, तुम सौ तो र कवन स
जोरौ।” कहानी म सोमू ठ क यही करता है। ह रया नाता तोड़ता है, पर सोमू नह तोड़ता; और उसका तक भी वही है
जो रैदास का है — तोड़कर जो ग
ँ ा कससे? इस तरह भ क्त का भाव मत्रता के धरातल पर उतर आता है: स ा
रश्ता वही है जो दूसरे के व्यवहार पर नभर न हो।
अपनी कथा लखते समय: कोई ऐसा क्षण चु नए जहाँ एक मत्र दूसरे को छोड़ने का कारण दे रहा हो — बीमारी,
ग़रीबी, बदनामी, स्थान-प रवतन। असली परीक्षा वह होती है। और अं तम वाक्य ऐसा र खए जो कहानी को समझाए
नह , बस बंद कर दे ।
झरोखे से — संत नामदे व के दो पद — पृष्ठ 150 और 151
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद
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अभ्यास › झरोखे से
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झरोखे से तु ल नात्मक अध्ययन
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a s emरैदास के पद पढ़े । अब आप रैदास क तरह ही महाराष्ट्र के संत क व नामदे व के दए गए दो पद प ढ़ए। …
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अब अपनी कक्षा म चचा क जए और बताइए क रैदास तथा नामदे व के पद म क्या-क्या अंतर है और क्या-क्या
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समानताएँ ह?
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g म हुआ। वे भी नगुण संत काव्य परंपरा के क व ह और उन्ह ने भी ‘बाह्य
संत नामदे व का जन्म 13व –14व शताब्द म a
महाराष्ट्र
आडंबर , सामा जक रू ढ़य का वरोध कर सामा जक समरसता, प्रेम एवं नराकार भ क्त से संबं धत पद क रचना क है’ (पुस्तक
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क भू मका)। रैदास उनसे लगभग सौ-डेढ़ सौ वष बाद के ह और काशी के ह। दोन क रचनाएँ आ द श्री गुरु ग्रंथ सा हब जी म
संक लत ह। इस लए तुलना करते समय दोन बात दखगी — एक ही परंपरा क साझी ज़मीन और दो m
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oे mपद का सरल अथ, ता क तुलना का आधार साफ़ रहे — gla
अलग क व-व्य क्तत्व।
पहले नामदे वcक
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
नामदे व के पद क पं क्त सरल अथ
पद (1)
“माइ न होती बापु न होता करम न य द माता न होती, पता न होते, कम न होते, तो यह शरीर भी न होता।
होती काया।”
“हम न ह होते, तुम न ह होते, कवन न हम होते, न तुम होते — तो फर यह सब कहाँ से आया?
कहां ते आया॥”
“राम कोइ न कसही केरा। जैसे तरवर राम कसी एक का नह है (और न कोई कसी का सदा के लए है); यह संसार का साथ वैसा ही है
पं ख-बसेरा॥” जैसे पेड़ पर प क्षय का रात-भर का बसेरा — सुबह सब उड़ जाते ह।
“चंद न होता, सूर न होता, पानी पवनु न चंद्रमा होता, न सूय, न जल और पवन का यह मेल होता।
मलाया।”
“सास्त्र न होता बेद न होता, करमु कहां शास्त्र न होते, वेद न होते — तो कमकांड कहाँ से आ जाता?
ते आया॥”
“खेच र भूच र तुलसी माला गुरपरसाद खेचरी-भूचरी जैसी योग-साधनाएँ ह या तुलसी क माला — ये सब गुरु क कृपा से ही साथक
पाया।” होती ह।
“नामा प्रणवै परम तत्त कूं सतगुर मो ह नामदे व वनती करता है क उस परम तत्त्व (ब्रह्म) को स रु ने ही मुझे दखाया।
लखाया॥”
पद (2)
“मो ह लाग त तालाबेली। बछरा बनु मुझे ऐसी बेचैनी लगी है जैसी बछड़े के बना अकेली गाय को होती है।
गाइ अकेली॥”
“पानी बनु ज्यूं मीन तलफ। ऐसे जैसे पानी बना मछली तड़पती है, वैसे ही राम-नाम बना नामदे व तड़पता है।
रामनाम बनु नामा कलपै॥”
“जैसे गाइ का बाछा छू टला। थन जैसे गाय का बछड़ा बंधन से छू टते ही थन से लपटकर दूध का घूँट भरता है (वैसा ही मेरा मन प्रभु
चोखता माखन घूटला॥” से लपट जाना चाहता है)।
“नामदे उ नारायन पाया। गुर भेटत ही नामदे व ने नारायण को पा लया — गुरु से भट होते ही उस अलख (अदृश्य, नराकार) के दशन हो
अलख लखाया॥” गए।
“जैसे वषै हेत परनारी। ऐसे नामे प्री त जैसे वषयी व्य क्त का मन पराई स्त्री म लगा रहता है, वैसी ही अटू ट लगन नामदे व क मुरारी म है।
मुरारी॥”
“जैसे ताप ते नरमल घामा। तैसे जैसे तेज़ ताप से धूप और तीखी हो उठती है, वैसे ही राम-नाम के बना बेचारा नामदे व तप्त और
रामनाम बनु बापुरो नामा॥” व्याकुल रहता है।
एक क ठन पं क्त: “जैसे ताप ते नरमल घामा” का अथ अलग-अलग संपादक ने कुछ भन्न लगाया है, क्य क यह
मराठ - म श्रत रूप है। ऊपर सबसे प्रच लत अथ दया गया है। अपने शक्षक से इस पं क्त पर अवश्य चचा क जए।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
क — समानताएँ
1. दोन नगुण भ क्त के क व ह। दोन के यहाँ ‘राम’ कसी अवतार का नाम नह , नराकार ब्रह्म का नाम है। रैदास — “अब
कैसे छू टै राम रट लागी”; नामदे व — “ऐसे रामनाम बनु नामा कलपै”। नामदे व तो उसे स्पष्ट ही ‘अलख’ कहते ह, यानी जो
दे खा न जा सके।
2. दोन बाह्य आडंबर और कमकांड पर प्रश्न उठाते ह। रैदास — “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”; नामदे व — “सास्त्र न होता बेद
न होता, करमु कहां ते आया॥” और “खेच र भूच र तुलसी माला गुरपरसाद पाया।” दोन कहते ह क क्रया अपने आप म कुछ
नह , भीतर का भाव ही सब कुछ है।
3. दोन क भ क्त अनन्य और एक नष्ठ है। रैदास — “तुम सा दे व ओर न ह दूजा”; नामदे व — “ऐसे नामे प्री त मुरारी॥” दोन
के यहाँ प्रेम बँटता नह ।
4. दोन के उपमान लोकजीवन से आते ह। रैदास के यहाँ चंदन-पानी, द पक-बाती, मोती-धागा, सोना-सुहागा; नामदे व के यहाँ
गाय-बछड़ा, पानी-मछली, पेड़-पक्षी, दूध-थन। दोन म एक भी उपमान शास्त्र से नह आया, सब घर-गाँव से आए ह।
5. दोन क तुलना-शैली एक-सी है। दोन ‘जैसे … ऐसे/तैसे’ का ढाँचा बार-बार प्रयोग करते ह — रैदास: “जैसे चतवत चंद
चकोरा”, “जैसे सोने मलत सुहागा”; नामदे व: “पानी बनु ज्यूं मीन तलफ। ऐसे रामनाम बनु नामा कलपै॥” यानी दोन म
उपमा अलंकार प्रधान है।
6. दोन क वधा एक है — पद। दोन गेय ह, दोन म टे क है (रैदास: “अब कैसे छू टै …”; नामदे व: “मो ह लाग त तालाबेली।”),
दोन म चरणांत तुक है और दोन म अंत म भ णता/छाप है — ‘रैदासा’ और ‘नामा/नामदे उ/नामे’।
7. दोन क भाषा म श्रत (सधुक्कड़ी) है। कसी एक बोली क शुद्ध भाषा नह — रैदास म ब्रज के साथ अवधी, राजस्थानी,
खड़ी बोली और उदू-फ़ारसी; नामदे व म मराठ के साथ ब्रज और खड़ी बोली।
8. दोन का सामा जक संदेश एक है — समानता, प्रेम और भाईचारा। नामदे व क पं क्त “राम कोइ न कसही केरा” तो सीधे
कहती है क ईश्वर पर कसी क बपौती नह — यही बात रैदास अपने पूरे जीवन से कहते ह।
9. दोन क रचनाएँ आ द श्री गुरु ग्रंथ सा हब जी म संक लत ह — यह इस बात का प्रमाण है क दोन क वाणी क्षेत्र और
भाषा क सीमा पार कर गई।
ख — अंतर
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
तुलना का रैदास के पद नामदे व के पद
आधार
गुरु क भू मका इन दोन पद म गुरु का उल्लेख नह । भक्त गुरु कें द में है — “गुरपरसादी पाया”, “सतगुर मोिह लखाया”, “गुर
सीधे प्रभु से बात करता है — बीच म कोई भेटत ही अलख लखाया”। ईश्वर तक पहचु ँ गुरु के माध्यम से होती
नह । है।
मूल स्वर मलन और एकाकारता का — चंदन पानी म िवरह और व्याकु लता का — ‘तालाबेल ी’, ‘तलफै ं ’, ‘कलपै’,
समा गया, ज्यो त जल रही है। भाव तृ त का ‘बापुर ो’। भाव छटपटाहट का है।
है।
कहने का ढं ग चत्र बनाकर कहना। पाँच जो ड़याँ रखकर पश्न उठाकर कहना — “कवन कहां ते आया”, “करमु कहां ते
बात अपने आप स्पष्ट कर द जाती है। आया”। पाठक को सोचने पर िववश िकया जाता है।
वषय का भक्त और आराध्य का नजी संबंध। संसार स ृि ट, माता-िपता, कम, वेद -शास्त्र, संस ार की क्षणभंगरु ता —
दायरा क चचा बहुत कम। दाशिनक दायरा बड़ ा है। “जैसे तरवर पंिख-बसे रा” जीवन की
नश्वरता का िचत्र है।
संबोधन / पुरुष सीधा संबोधन — ‘प्रभु जी तुम’, ‘म न ह पायः अन्य पुरुष में आत्म-कथन — ‘नामा कलपै’, ‘नामदे उ नारायन
तोरौ’। पूरा पद आमने-सामने का संवाद है। पाया’, ‘बापुरो नामा’। किव अपने बारे में तीसरे व्यिक्त की तरह कहता
है।
उपमान क स दय और सुगंध के उपमान — चंदन, मोती, दे ह और पशु-जगत के उपमान — गाय-बछड़ ा, थन, मछली, धूप-ताप।
प्रकृ त द पक, चाँद, कमल। स्पश कोमल है। स्पश अिधक ठोस और तीखा है।
भाषा का रंग ब्रज-प्रधान — ‘जाक ’, ‘बरै’, ‘राती’, ‘तोरौ’, मराठी की छाया साफ़ है — ‘छू टला’, ‘घूटला’, ‘तालाबेल ी’, ‘तलफै ं ’,
‘जोरौ’, ‘अपनो’। ‘पणवै’, ‘कूं ’, ‘के रा’।
पं क्त-संरचना लंबी पं क्तयाँ, हर पं क्त दो चरण म; लय शांत दू स रा पद बहुत छोटी दो-चरणी इकाइयों में — “मोिह लागित
और लय और ठहरी हुई। तालाबेल ी। बछरा िबनु गाइ अके ली॥” लय तेज़ और साँस -भर की
है।
वरोध का तीथ और व्रत — यानी वे क्रयाएँ जो आम शास्त्र, वेद और योग-साधनाएँ — यानी वे माग जो िव ानों और योिगयों
नशाना आदमी क पहुँच से बाहर थ । के थे।
छाप (भ णता) दोन पद क अं तम पं क्त म — ‘करै बीच की पंिक्तयों में भी बार-बार — ‘नामा कलपै’, ‘नामदे उ नारायन
क जगह रैदासा’, ‘कहै रैदासा’। पाया’, ‘ऐसे नामे पीित मुरारी’।
ग — नष्कष
दोन संत एक ही राह के यात्री ह, पर उनक चाल अलग है। रैदास उस भक्त क तरह बोलते ह जसे मं ज़ल मल
चुक है — इस लए उनके पद म शां त है, चत्र ह और ‘एक भरोसां’ है। नामदे व उस भक्त क तरह बोलते ह जो
अभी तड़प रहा है — इस लए उनके पद म प्रश्न ह, बेचैनी है और गुरु क पुकार है। रैदास कहते ह ‘म न ह तोरौ’ —
यह वश्वास का स्वर है; नामदे व कहते ह ‘रामनाम बनु नामा कलपै’ — यह वरह का स्वर है। पर दोन का गंतव्य
एक ही है: वह नराकार, सवव्यापी सत्ता, जस तक पहुँचने के लए न जा त चा हए, न तीथ, न शास्त्र — केवल
स ा मन चा हए।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
चचा के लए प्रश्न: (1) क्या भ क्त म गुरु का होना आवश्यक है? रैदास और नामदे व इस पर अलग-अलग खड़े
दखते ह — कक्षा म दोन पक्ष र खए। (2) ‘राम कोइ न कसही केरा’ — इस एक पं क्त म नामदे व क्या सामा जक
बात कह रहे ह? (3) रैदास के ‘चंदन-पानी’ और नामदे व के ‘गाय-बछड़ा’ — इनम से कौन-सा उपमान आपको
अ धक नकट लगता है और क्य ?
खोजबीन — पृष्ठ 152
अभ्यास › खोजबीन
खोजबीन प रयोजना
प्र.1 रैदास के जीवन और पद के वषय म पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर प ढ़ए। कुछ लक नीचे दए गए ह।
यह खोज-काय है। नीचे बताया गया है क कहाँ खोज, क्या खोज और खोज को कस रूप म लख।
1. कहाँ खोज
पुस्तकालय — रैदास बानी (संपादक — डॉ. शुकदे व सह); यही ग्रंथ इस पाठ का ोत भी है, जैसा पाठ के नीचे दए गए
संदभ म लखा है। साथ ही हद सा हत्य कोश ( ानमंडल ल मटे ड, वाराणसी), जससे पुस्तक ने रैदास का जीवन-काल लया
है।
पाठ्यपुस्तक का QR कोड — पाठ के पहले पृष्ठ (पृष्ठ 145) पर बाईं ओर एक QR कोड छपा है, जस पर 0901CH08
लखा है। उसे स्कैन करके इस पाठ क अ त रक्त सामग्री तक पहुँचा जा सकता है।
वश्वसनीय ऑनलाइन ोत — NCERT का अपना ड जटल मंच (ePathshala / DIKSHA), सा हत्य अकादमी और
सरकारी ड जटल पुस्तकालय के संग्रह। कसी भी सामग्री को लेने से पहले दे खए क प्रकाशक और संपादक का नाम दया
गया है या नह ।
पुस्तक म एक बात छू ट गई है: पृष्ठ 152 पर ‘खोजबीन’ के नीचे लखा है — “कुछ लक नीचे दए गए ह।” — पर
उस पृष्ठ पर वास्तव म कोई लक छपा हुआ नह है, वहाँ खाली जगह है। इस लए इस काम के लए पाठ के पहले
पृष्ठ पर छपे QR कोड और ऊपर बताए गए ोत का उपयोग क जए, और अपने शक्षक से भी पू छए।
2. क्या-क्या खोज — एक जाँच-सूची
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद
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बदु क्या पता करना है
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.c त थय पर व ान म मतभेद रहता है — दे खए आपके ोत क्या कहते ह और वे कसagआधार पर कहते ह।
जीवन-काल जन्म काशी (वाराणसी) म; पुस्तक के अनुसार 15व शताब्द , सन् 1388–1518। ध्यान र खए
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और स्थान
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aजीgवका वे जूते बनाने का काम करते थे और उसी काम को करते हुए भक्त बने रहे। यह बात उनक क वता के उपमान से भी मेल
श्रम खाती है।
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रचनाएँ
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रैदास बानी म संक लत पद; अनेक रचनाएँ आ द श्री गुरु ग्रंथ सा हब जी म शा मल ह। पता क जए क वहाँ उनके कतने ag
पद संगृहीत ह।
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प्र सद्ध पद
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‘बेगमपुरा’ वाला पद, जसम वे ऐसे नगर क कल्पना करते ह जहाँ न दुख है, न भय, न ऊँच-नीच। इसे प ढ़ए — यह
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उनक सामा जक दृ ष्ट का सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
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mउनके पद ‘तीरथ बरत न
‘मन चंगा तो कठौती म गंगा’ — यह उ क्त रैदास से जोड़ी जाती है। पता क जए क इसका eभाव
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co करूँ अंदेसा’ से कैसे मलता है। gl
लोक म प्रच लत
कहावत
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a परंपरा
प्रभाव मीराबाई उन्ह अपना गुरु मानती थ — इस बात के प्रमाण खो जए। साथ ही कबीर से उनक समानताएँ और भन्नताएँ।
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स्मृ त संत र वदास जयंती (माघ पू णमा) और वाराणसी के सीर गोवधनपुर स्थत स्मारक-स्थल के बारे म प ढ़ए।
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भाषा उनक भाषा म ब्रज के साथ अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उदू-फ़ारसी के शब्द कैसे मलते ह — दो-तीन उदाहरण
जुटाइए।
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3. खोज को कस रूप म लख
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नमूना ढाँचा (लगभग दो पृष्ठ क प रयोजना):
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s e शीषक — ‘संत रैदास: जीवन, वाणी और संदेश’।
agla 2. प रचय (5–6 वाक्य) — जन्म-स्थान, समय, जी वका, परंपरा।
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3. वाणी — दो पद उद्धत क जए (एक पाठ्यपुस्तक से, एक अपनी खोज से) और हर पद पर तीन-चार वाक्य ल खए।
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4. संदेश — समानता, प्रेम और भाईचारा — हर एक के लए एक पं क्त प्रमाण के रूप म द जए।
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5. आज के लए अथ (अपने शब्द म, 5–6 वाक्य) — रैदास क बात आज के वद्यालय, मुहल्ले और समाज म कहाँ काम
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आती है।
6. संदभ-सूची — जन पुस्तक और वेबसाइट से सामग्री ली, उनके नाम ल खए। यह सबसे ज़रूरी हस्सा है — बना संदभ के
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द गई जानकारी अधूरी मानी जाती है।
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.cह ही नह । इस लए कोई भी पं क्त तभी ल खए जब वह कसी संपा दत पुaस्gतक या वश्वसनीय संग्रह म मल जाए।
खोजबीन करते समय ध्यान र खए: संत क वय के नाम से इंटरनेट पर बहुत-सी ऐसी पं क्तयाँ चलती ह जो उनक
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एक ही तथ्य दो अलग ोत म मला ली जए — यही शोध क सबसे सरल और सबसे पक्क आदत है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
अध्याय — एक नज़र म
रचनाकार — रैदास नाम से वख्यात संत र वदास का जन्म काशी (वाराणसी) म हुआ। पुस्तक के अनुसार उनका जीवन-
काल 15व शताब्द (सन् 1388–1518) माना जाता है। वे संत क वय म गने जाते ह। उन्ह ने बाह्य आडंबर का खंडन
कर मन क शुद्धता और आंत रक भ क्त को ही स ा धम माना है। उनक रचनाएँ रैदास बानी म संक लत ह और उनक अनेक
भ क्त-रचनाएँ आ द श्री गुरु ग्रंथ सा हब जी म भी शा मल ह।
भाषा — रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं म सरल, व्यावहा रक ब्रजभाषा का प्रयोग कया है, जसम अवधी, राज ानी,
खड़ी बोली और उदू-फ़ारसी के शब्द का भी मश्रण है। संत क वय क ऐसी मली-जुली भाषा को सधुक्कड़ी कहा जाता
है। यही कारण है क पद म ‘जाक ’, ‘बरै’, ‘राती’, ‘तोरौ’, ‘जोरौ’, ‘कवन’, ‘अंदेसा’, ‘भरोसां’ जैसे रूप एक साथ मलते ह।
उनक रचनाएँ आज भी समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश दे ती ह।
पहला पद — कथ्य — पद क टे क है “अब कैसे छू टै राम रट लागी।” इसके बाद पाँच पं क्तय म भक्त और आराध्य के रश्ते
के पाँच चत्र आते ह — चंदन–पानी, घन (बादल)–मोर, द पक–बाती, मोती–धागा और स्वामी–दास। पुस्तक क भू मका
इसे इस तरह कहती है क जैसे इन जोड़ का संबंध अटू ट होता है, वैसे ही भक्त से उसके आराध्य अलग नह हो सकते। इस
पद म अनन्य भ क्त और आराध्य के प्र त समपण का भाव प्रकट होता है।
दूसरा पद — कथ्य — इसम भी आराध्य से भक्त का अटू ट नाता व्यक्त हुआ है, पर स्वर बदल जाता है — यहाँ भक्त
घोषणा करता है। “जो तुम तोरौ राम म न ह तोरौ” कहकर वह भ क्त को एकतरफ़ा और बना शत बना दे ता है। वह तीथ और
व्रत छोड़ सकता है, पर प्रभु-चरण क भ क्त नह । ‘जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा’ म सवव्यापक ईश्वर क अवधारणा है और
‘मन क्रम वचन’ म मन, कम और वचन क एकता। यह पद नष्ठा, वश्वास और अ डग भ क्त को व्यं जत करता है।
काव्य-नायक — दोन पद का ‘म’ कोई व ान या पुरो हत नह , एक साधारण भक्त है जो अपने आराध्य से दास्य भाव से
बात करता है — “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा”। वह मं दर, तीथ या शास्त्र के सहारे नह , केवल भरोसे के सहारे खड़ा है —
“तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां”। यही रैदास क भ क्त का लोकतां त्रक स्वर है, जो जा त और कमकांड क द वार गरा दे ता
है।
शल्प — दोन रचनाएँ पद ह — यानी गाई जाने वाली रचनाएँ। पहली पं क्त टे क ( ुवपद) है, जो गायन म बार-बार लौटती
है। हर पं क्त दो चरण म बँट है और चरणांत म तुक मलती है — पानी–समानी, मोरा–चकोरा, बाती–राती, धागा–
सुहागा, दासा–रैदासा। पद के अंत म क व अपना नाम रखता है, जसे छाप या भ णता कहते ह — ‘कहै रैदासा’।
अलंकार — यही पाठ पाठ्यपुस्तक म अनुप्रास, उपमा और रूपक क प रभाषा दे ता है। पुस्तक के अपने उदाहरण ह —
अनुप्रास: “ चतवत चंद चकोरा”, उपमा: “सोने मलत सुहागा”, रूपक: “चरन कमल”। ‘तुम चंदन हम पानी’, ‘तुम द पक,
हम बाती’, ‘तुम मोती, हम धागा’ जैसे प्रयोग भी रूपक ह, क्य क इनम ‘जैसे/सा’ जैसा कोई वाचक शब्द नह , सीधा आरोप
है।
मूल संवेदना — भ क्त कोई बाहरी क्रया नह , संबंध है — और वह संबंध ऐसा है जसे तोड़ा नह जा सकता। रैदास इस बात
को दशन क भाषा म नह , घर-आँगन क चीज़ क भाषा म कहते ह — चंदन, पानी, द या, बाती, मोती, धागा, सोना,
सुहागा। इसी लए ये पद पाँच सौ साल बाद भी उतने ही सहज लगते ह। साथ ही ये पद उस समाज से भी सवाल करते ह जो
तीथ और व्रत को भ क्त क शत बना दे ता था।
अभ्यास क्या माँगता है — यह पाठ केवल अथ नह पूछता। मेरे उत्तर मेरे तक म वकल्प चुनकर तक भी दे ना है; अथ और
भाव म पं क्तय क व्याख्या करनी है; क वता का स दय म अलंकार पहचानने ह और पाठ्यपुस्तक क अन्य क वताओं से भी
उदाहरण खोजने ह; क वता क कुछ अन्य वशेषताएँ क अधूरी ता लका भरनी है; वषय से संवाद म भ क्तकाल क
सामा जक-सांस्कृ तक प र स्थ तय तक जाना है और ‘सुहागा’ पर व ान के शक्षक से चचा करनी है; सृजन म गायन, संवाद-
लेखन और लघुकथा है; और झरोखे से म संत नामदे व के दो पद से तुलना करनी है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ पाठ क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
रट लगन, ध नु , बार-बार दोहराना “अब कैसे छू टै राम रट उसे तो बस एक ही रट लगी है
लागी।” — डॉक्टर बनना है।
चंदन एक पिसद्ध वृक्ष िजसकी लकड़ी एक पधान गंध द व्य है, संद ल; चंद न “प्रभु जी तुम चंदन हम माथे पर चंदन लगाकर वह मं दर
को िघसकर बनवाया हुआ ले प पानी” से लौटा।
बास गंध , िनवास, वासस्थान, वस्त्र “जाक अंग-अंग बास रात-रानी क बास पूरे आँगन म
समानी।” फैल गई।
समानी समा गई, बस गई “जाक अंग-अंग बास माँ क सीख उसके मन म
समानी।” समानी हुई है।
घन बादल, मेघ , अंध कार, समूह, िवस्तार “प्रभु जी तुम घन बन, आषाढ़ के घन दे खकर कसान
हम मोरा” का मन हरा हो गया।
मोरा मोर, मयूर “प्रभु जी तुम घन बन, बादल घरते ही बाग़ म मोर
हम मोरा” नाचने लगा।
चतवत िकसी की ओर दे खने का ढं ग , दृ ि ट, दे खना, िनरखना “जैसे चतवत चंद वह ार क ओर चतवत ही रह
चकोरा।” गई।
चकोरा / तीतर की जाित का एक पक्षी जो चंद मा का परम पेम ी माना जाता है “जैसे चतवत चंद चकोर क तरह वह गुरु का मुख
चकोर चकोरा।” नहारता रहता है।
जो त / पकाश, रोशनी, लौ, सूय, नक्षत्र “जाक जो त बरै दन द ये क जो त हवा म भी काँपी
ज्यो त राती।” नह ।
बरै जलती है, पज्विलत होती है “जाक जो त बरै दन चूल्हे क आग रात-भर बरती
राती।” रही।
राती राित्र, रात “जाक जो त बरै दन दन-राती वह अपने काम म
राती।” लगा रहता है।
सुहागा एक पाकृ ितक खिनज, िजसके पयोग से सोने की अशुिद्धयाँ दू र हो “जैसे सोने मलत अ संगत तो सोने पर सुहागा
जाती है ं और चमक बढ़ जाती है (बोरै क्स) सुहागा।” है।
दासा दास, से वक “प्रभु जी तुम स्वामी, वह स्वयं को गुरु का दासा
हम दासा” कहता है।
भग त / आराध्य के पित अनन्य पेम और समपण “ऐसी भग त करै मीरा क भग त म दखावा नह
भ क्त रैदासा।” था।
तोरौ तोड़ूँ / तोड़ो (संबंध तोड़ना) “जो तुम तोरौ राम म मत्रता का नाता कभी मत तोरौ।
न ह तोरौ”
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
शब्द अथ पाठ क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
जोरौ जोड़ूँ, जोड़ना “तुम सौ तो र कवन स मन को अ े काम से जोरौ।
जोरौ।”
कवन कौन “तुम सौ तो र कवन स कवन जाने कल क्या होगा।
जोरौ।”
तीरथ / तीथ पुण् य क्षेत्र ; वह पुण् य स्थान जहाँ िवशेष धम के अनुयायी पूजा, स्नान “तीरथ बरत न करूँ दाद हर साल कसी तीथ पर
आिद के िलए जाते हों — जैसे काशी, पयाग, मथुर ा अंदेसा” जाती ह।
बरत / व्रत उपवास, संक ल्प “तीरथ बरत न करूँ माँ ने आज व्रत रखा है।
अंदेसा”
अंदेसा सोच, िचंता, शक, आशंक ा, खतरा, हािन, दुिवधा “तीरथ बरत न करूँ परीक्षा का कोई अंदेसा उसके
अंदेसा” चेहरे पर नह था।
चरन कमल कमल के समान कोमल और सुंद र चरण (रूपक) “तुम्हरे चरन कमल एक संत के चरन कमल म सर
भरोसां।” झुकाकर वह बैठ गया।
भरोसां भरोसा, आसरा, िवश्वास “तुम्हरे चरन कमल एक मुझे तो बस अपनी मेहनत का
भरोसां।” भरोसा है।
जहँ जहँ जहाँ-जहाँ, िजस-िजस जगह “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी जहँ जहँ वह गया, लोग ने उसे
पूजा” सराहा।
दूजा दू स रा “तुम सा दे व ओर न ह इस काम म उसका दूजा कोई
दूजा।” नह ।
अपनो अपना “म अपनो मन ह र से अपनो कतव्य पहचानो।
जोरौ”
सबही पहर आठों पहर, हर समय “सबही पहर तुम्हारी सबही पहर उसे घर क चता
आसा” लगी रहती है।
आसा आशा, आस, पतीक्षा “सबही पहर तुम्हारी आसा ही जीवन को आगे
आसा” ख चती है।
मन क्रम मन, कम और वाणी — तीनों से “मन क्रम वचन कहै मन क्रम वचन से मने यह वचन
वचन रैदासा।” नभाया।
तालाबेली बेचैनी, छटपटाहट (नामदे व के पद में) “मो ह लाग त माँ के बना ब े को तालाबेली
तालाबेली।” लगी रहती है।
तलफ तड़पती है, छटपटाती है “पानी बनु ज्यूं मीन धूप म पौधा पानी के लए
तलफ।” तलफता रहा।
अलख जो दे खा न जा सके , िनराकार बह्म “गुर भेटत ही अलख संत ने अलख का भेद सरल
लखाया।” शब्द म बता दया।
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कक्षा 9 हद अध्याय 8 पद AglaSem · NCERT Solutions
शब्द अथ पाठ क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
बापुरो बेचारा, दीन “तैसे रामनाम बनु सहारा टू टते ही वह बापुरो-सा
बापुरो नामा।” खड़ा रह गया।
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