aglasem.com
Home Schools Admission Career Mock Test PDF Docs Playground
ClassChoose class
StateSelect state

NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

AglaSem पर कक्षा 9 हिंदी पाठ 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद (गंगा) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Hindi Chapter 9 (Ganga).
NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद - Page 1 of 92

About NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद is available here for free download. Published by NCERT for Class 9, this solution can be viewed online or downloaded as a PDF (92 pages). Candidates preparing for Class 9 can use NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद to understand the exam pattern, the type of questions asked, and the overall difficulty level.

Frequently Asked Questions

How can I download NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद?

Open this page and click the Download button to save NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद as a PDF. It is completely free on AglaSem Docs.

Is NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद free to download?

Yes. NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद can be viewed online and downloaded as a PDF free of cost on AglaSem Docs.

How many pages does NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद have?

NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद contains 92 pages, which you can read online or download together as a single PDF.

Where can I find more Class 9 study material?

You can find more Class 9 question papers, sample papers, syllabus, and answer keys on AglaSem Docs.

NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद – Text

Read the full text of this solution below — useful to quickly search, copy and reference the content online without downloading the PDF.

📄 View text version (60 pages)

Page 1

F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा9

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 9: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — गंगा

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

153 – 165 19 60 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 91 pages

Page 2

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · हद · गं गा

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 9: राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
NCERT कक्षा 9 हद क पाठ्यपुस्तक गंगा के काव्य खंड के दूसरे पाठ — पाठ 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद — के सभी प्रश्न के पूरे हल।
रचनाकार ह गोस्वामी तुलसीदास (16व –17व शताब्द , सन् 1532–1623), और यह अंश उनके महाकाव्य रामच रतमानस के बालकांड से लया
गया है। वधा है चौपाई-दोहा म र चत संवाद-प्रधान प्रबंध-काव्य का अंश, भाषा है अवधी। पाठ म 24 चौपाइयाँ और 3 दोहे ह। पृष्ठ 153 से 165
तक अभ्यास के सभी छपे शीषक — रचना से संवाद (मेरे उत्तर मेरे तक, मेरी समझ मेरे वचार, मेरी कल्पना मेरे अनुमान), वधा से संवाद (क वता
का स दय, भाव-पहचान एवं व ेषण, व ेषण कैसे कर, काव्य-पं क्त और भाव), वषय से संवाद, सृजन, भाषा से संवाद (व्याकरण क बात,
बहुभा षकता, लोक म भाषा, गद्य-रूप, ग त व धयाँ, मेरी पहेली, भाषा संगम), खोजबीन और शब्द-संपदा — शीषक-दर-शीषक, प्रश्न-दर-प्रश्न हल
कए गए ह। साथ म हर चौपाई और हर दोहे क पं क्त-दर-पं क्त व्याख्या (पद े द, क ठन शब्दाथ, सरल अथ, भाव और शल्प) द गई है और
पुस्तक क सभी अधूरी ता लकाएँ — संवाद क वशेषता, भाव-पहचान, अलंकार, बहुभा षकता, लोको क्त और ‘कौन-सा कथन कसका’ — पूरी
भरकर द गई ह।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

गंगा (कक्षा 9) 153 – 165

खं ड प्रश्न

19 60

माध्यम

हन्द

चौपाई 1–8 और दोहा 1 — पं क्त-दर-पं क्त व्याख्या — पृष्ठ 154
काव्य खंड › पाठ 9 › परशुराम का आगमन — पद े द, सरल अथ, भाव और शल्प

व्याख्या शल्प

प्र.1 “दे खत भृगुप त बेषु कराला। उठे सकल भय बकल भुआला॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — परशुराम का भयानक वेष दे खते ही सभा म बैठे सभी राजा भय से व्याकुल होकर उठ खड़े हुए।

Page 1 of 91

Page 3

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

पद अथ

दे खत दे खते ही

भगृ पु ित भृगुकुल के स्वामी — परशुराम

बेष ु वेष, रूप-स ा

कराला भयानक, डरावना

सकल सब, सारे

िबकल व्याकुल, बेचैन

भुआ ला राजा, महीप, भूपाल

भाव: यह पाठ क पहली ही पं क्त है और तुलसी इसम पूरा वातावरण एक साथ खड़ा कर दे ते ह। ध्यान द जए,
परशुराम ने अभी कुछ कहा नह है — केवल दखाई दए ह। फर भी सभा म बैठे राजा उठ खड़े होते ह। यानी भय
शब्द से नह , उप त से पैदा हुआ है। ‘ बकल’ शब्द बहुत सट क है — वे केवल डरे नह , बेचैन हो गए; बैठे रहना
भी उन्ह असंभव लगा। और ‘सकल’ कहकर क व बताता है क एक भी राजा अपवाद नह था। इस एक पं क्त म
उस पूरे राज-समाज क दुबलता उघड़ जाती है, जो थोड़ी दे र पहले धनुष उठाने का दावा कर रहा था।

शल्प पं क्त म कैसे काम कर रहा है
का पक्ष

अलंकार अनुप्रास — “भृगुप त … भय बकल भुआला” म ‘भ’ और ‘ब’ वण क बार-बार आवृ त्त है। पुस्तक क अपनी प रभाषा —
“एक ही वण क बार-बार आवृ त्त” (पृष्ठ 161)। इस भारी-भरकम ध्व न से ही भय का प्रभाव बनता है।

छं द चौपाई — प्रत्येक चरण म 16 मात्राएँ। गनकर दे खए —
दे (2)+ख(1)+त(1)+भृ(1)+गु(1)+प(1)+ त(1)+बे(2)+षु(1)+क(1)+रा(2)+ला(2) = 16। दूसरे चरण म भी
उ(1)+ठे (2)+स(1)+क(1)+ल(1)+भ(1)+य(1)+ ब(1)+क(1)+ल(1)+भु(1)+आ(2)+ला(2) = 16।

रस भयानक रस का आरंभ। आलंबन — परशुराम का कराल वेष; आश्रय — सभा के राजा; अनुभाव — उठ खड़ा होना, व्याकुल
होना।

बब दृश्य बब — फरसा उठाए, जटा-जूट वाले तपस्वी क भयानक आकृ त और उसके सामने एक साथ खड़ी हो जाती हुई राजाओं
क पं क्त।

तुक और चरणांत तुक — कराला – भुआला। ‘आ’ क लंबी ध्व न पर दोन चरण खत्म होते ह, जससे पं क्त गाने म गूँजती है।
लय

अवधी क ‘बेषु’ (वेष), ‘कराला’ (कराल), ‘भुआला’ (भूपाल) — अवधी म शब्दांत पर ‘उ’ और ‘आ’ जुड़ जाते ह। यही रूप पं क्त को
वशेषता लय भी दे ते ह।

Page 2 of 91

Page 4

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 “ पतु समेत क ह क ह नज नामा। लगे करन सब दं ड प्रनामा॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — सब राजा अपने पता के नाम स हत अपना-अपना नाम कह-कहकर परशुराम को दं डवत् प्रणाम करने लगे।

पद अथ

िपतु समेत पता के नाम स हत

किह किह कह-कहकर, बार-बार कहकर

िनज नामा अपना नाम

दंड पनामा दं डवत् प्रणाम, ज़मीन पर लेटकर कया जाने वाला साष्टांग प्रणाम

भाव: यह पं क्त सभा के लोग क मनः त बताती है और अभ्यास का पहला बहु वकल्पी प्रश्न ठ क इसी पर है।
ऊपर से दे खने पर यह आदर-सत्कार लगता है — नाम बताना, दं डवत् करना। पर पछली पं क्त साथ रखकर प ढ़ए
— “उठे सकल भय बकल भुआला”। यानी यह शष्टाचार भय से उपजा शष्टाचार है, श्रद्धा से नह । ‘ पतु समेत’
भी अकारण नह है — कुल-प रचय दे कर वे यह जताना चाहते ह क हम कुलीन ह, हमसे कोई अपराध नह हुआ।
और ‘क ह क ह’ क पुनरु क्त बताती है क यह काम जल्द -जल्द , घबराहट म हो रहा था। तुलसी ने एक भी बार
‘डर’ शब्द दोहराए बना पूरी सभा का डर दखा दया।

शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है

अलंकार 1 पुनरु क्त प्रकाश — ‘क ह क ह’ म एक ही शब्द क आवृ त्त से क्रया क बारंबारता और घबराहट दोन व्यक्त हुई ह।

अलंकार 2 अनुप्रास — “ नज नामा” म ‘न’ क और “ पतु … प्रनामा” म ‘प’ क आवृ त्त।

छं द और तुक चौपाई; तुक — नामा – प्रनामा। दोन तुक-शब्द ‘नाम’ धातु से बने ह, इस लए ध्व न और अथ दोन जुड़ जाते ह।

भाव भय और शष्टाचार — यही इस पं क्त का उत्तर है। बाहर से आदर, भीतर से भय।

अवधी क वशेषता ‘ पतु’ ( पता), ‘ नज’ (अपना), ‘करन’ (करने), ‘प्रनामा’ (प्रणाम) — तत्सम शब्द का अवधी म ढला हुआ रूप।

प्र.3 “जे ह सुभायँ चतव ह हतु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव
और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — परशुराम जस कसी को अपने सहज स्वभाव से, उसे अपना हतैषी जानकर भी दे ख लेते, वह समझता क मानो अब
उसक आयु ही समाप्त हो आई है।

Page 3 of 91

Page 5

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

co m
m.
पद अथ

m as e
जेिह
.co
जसे, जसक ओर
a g l
se m
g l a स्वभाव से, सहज भाव से
a
सुभायँ

िचतविहं दे खते ह, नरखते ह

com
िहतु जानी
e m .
हतैषी जानकर, अपना समझकर ag
g l as
जनु मानो
a

co m
आइ खुटानी आ पहुँची समा प्त, आयु पूरी हो गई

e m.
m l as
.co
भाव: यह पूरे पाठ क सबसे चतुर पं क्तय म से एक है। तुलसी यहाँ यह नह कहते क परशुराम ने कसी को घूरकर
a g
दे खeा।mवे इसका ठ क उलटा कहते ह — वे तो हतैषी जानकर, स्नेह से दे ख रहे थे। और फर भी दे खा गया व्य क्त
a s
a gl काँप जाता था। सो चए, जसक प्रेम-भरी दृ ष्ट मृत्यु जैसी लगे, उसका क्रोध कैसा होगा! क व ने क्रोध का वणन
s
कए बना क्रोध का अनुमान करा दया — यही काव्य क सूक्ष्मता है। साथ ही यह पं क्त यह भी बताती है क सभा
m a
.co agl
के लोग का डर परशुराम के व्यवहार से नह , उनक ख्या त से पैदा हुआ था; वे पहले से जानते थे क यह मु न

se m
a
क्या कर सकते ह।

a g l
शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है

co m
m .
as e
अलंकार 1 उत्प्रेक्षा — ‘जनु’ (मानो) उत्प्रेक्षा का पहचाना हुआ वाचक शब्द है। यहाँ संभावना क कल्पना क गई है — मानो आयु

m l
.co g
ही समाप्त हो आई हो।

eअलंmकार 2 a
a s
gl
अ तशयो क्त — बात बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है (केवल दे ख लेने से मृत्यु का आभास)। पुस्तक क प रभाषा —

a “बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना”।

se m
अलंकार 3
com
अनुप्रास — “जे ह … जानी … जानइ जनु” म ‘ज’ चार बार आया है।
g l a
m . a
ase
agl
वरोधाभास का ‘ हतु जानी’ (स्नेह) और ‘खुटानी’ (मृत्यु) — दो बलकुल वपरीत भाव एक ही पं क्त म। इसी टकराहट से पं क्त का
प्रभाव असर बनता है।

om
तुक जानी – खुटानी।

. c
s e m — क्रया-रूप म ‘ ह’ और ‘इ’
m a
अवधी क वशेषता ‘जे ह’ ( जसे), ‘ चतव ह’ (दे खते ह), ‘जानइ’ (जानता है), ‘खुटानी’ (समाप्त होना)

. co agl
क अवधी प्रत्यय-योजना।

e m
g l as
a c
m .
m a s e
e m . co agl
g l as
a

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 4 of 91

Page 6

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

प्र.4 “जनक बहो र आइ सरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — इसके बाद राजा जनक ने आकर सर नवाया (प्रणाम कया) और सीता को बुलाकर उनसे भी परशुराम को प्रणाम
करवाया।

पद अथ

बहोिर फर, इसके बाद, तदनंतर

आइ आकर

िसरु नावा सर नवाया, प्रणाम कया

सीय सीता

बोलाइ बुलाकर

करावा करवाया

भाव: यहाँ जनक का च रत्र खुलता है और अभ्यास का दूसरा बहु वकल्पी प्रश्न इसी पर है। ध्यान द जए, जनक इस
सभा के मेज़बान और राजा ह — चाहते तो अपने सहासन पर बैठे रहते। पर वे स्वयं उठकर आते ह, सर नवाते ह,
और फर पुत्री को बुलाकर उससे भी प्रणाम करवाते ह। यह शष्टता है — अ त थ और गुरुजन के प्र त उ चत मयादा
का नवाह, वह भी बना कसी हचक के। इसम भय भी हो सकता है, पर पं क्त म डर का कोई शब्द नह है; है तो
केवल औपचा रक सम्मान का पूरा-पूरा नवाह। और पुत्री से प्रणाम करवाना उस परंपरा का हस्सा है जसम घर
के बड़े अ त थ को आशीवाद दे ने का अवसर दे ते ह — जसका फल अगली ही चौपाई म मलता है।

शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है

अलंकार अनुप्रास — “सीय … प्रनामु … करावा” म क्रम से ‘स’, ‘न’ और ‘र’ क आवृ त्त; “बहो र … बोलाइ” म ‘ब’ क
आवृ त्त।

क्रया- ंखला चार क्रयाएँ एक साथ — आइ, नावा, बोलाइ, करावा। इससे दृश्य म ग त आती है; पाठक को लगता है क सब कुछ
आँख के सामने तेज़ी से घट रहा है।

च रत्र- चत्रण एक ही पं क्त म जनक क शष्टता स्था पत हो जाती है — बना कसी वशेषण के, केवल उनके कम से।

तुक नावा – करावा। दोन ‘आवा’ म समाप्त होकर लय बाँधते ह।

अवधी क ‘ सरु’ ( सर), ‘सीय’ (सीता), ‘प्रनामु’ (प्रणाम) — संज्ञाओं के अंत म ‘उ’ अवधी का प्र सद्ध लक्षण है।
वशेषता

Page 5 of 91

Page 7

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

प्र.5 “आ सष द न्ह सख हरषान । नज समाज लै गईं सयान ॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — परशुराम ने सीता को आशीवाद दया, जससे स खयाँ हष से भर उठ ; और समझदार स खयाँ सीता को अपनी
मंडली म वापस ले गईं।

पद अथ

आिसष आशीवाद

दीिन्ह दया

सखी ं स खयाँ, सहे लयाँ

हरषानी ं ह षत हुईं, प्रसन्न हुईं

िनज समाज अपनी मंडली, अपने समूह म

सयानी ं समझदार, चतुर

भाव: यह क वता का सबसे राहत भरा क्षण है — और सबसे छोटा भी। परशुराम का आशीवाद पाते ही स खयाँ
खल उठती ह, क्य क उन्ह लगता है क जो मु न सबको डरा रहे थे, वे सीता पर प्रसन्न ह। पर तुलसी इस राहत को
टकने नह दे ते। एक ही शब्द — ‘सयान ’ — पूरे दृश्य का रुख बदल दे ता है। स खयाँ केवल ह षत नह ह,
समझदार भी ह; वे जानती ह क यह वातावरण कसी भी क्षण बगड़ सकता है, इस लए सीता को वहाँ से हटा ले
जाती ह। यानी हष के भीतर भी सतकता बनी हुई है। स्त्री-पात्र क यह सूझ-बूझ आगे सुनयना क चता और सीता
क व्यग्रता तक चलती जाती है।

शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है

अलंकार अनुप्रास — “सख … समाज … सयान ” म ‘स’ क तीन आवृ त्तयाँ, जो पं क्त को मुलायम और गीत जैसा बना दे ती ह।

शब्द-चयन ‘सयान ’ पूरे चरण का प्राण है। इसे हटा द जए तो केवल घटना बचती है; इसके रहते घटना के साथ च रत्र भी बनता है।

तुक और लय हरषान – सयान । दोन म अनुना सक ‘ईं’ क ध्व न है, जससे स्त्री-स्वर क कोमलता सुनाई दे ती है।

दृश्य-संयोजन यह चौपाई एक दृश्य-प रवतन का काम करती है — स्त्री-पात्र मंच से हट जाती ह और अब सभा म केवल पुरुष-पात्र
बचते ह, जनके बीच टकराव होना है।

अवधी क ‘द न्ह’ ( दया), ‘लै गईं’ (ले गईं), ‘हरषान ’ (ह षत हुईं) — अवधी क क्रयाओं म अनुना सक बहुवचन रूप।
वशेषता

Page 6 of 91

Page 8

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

प्र.6 “ बस्वा मत्रु मले पु न आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और शल्प
स्पष्ट क जए।

सरल अथ — इसके बाद वश्वा मत्र आकर परशुराम से मले और उन्ह ने दोन भाइय (राम और लक्ष्मण) को परशुराम के चरण-
कमल म डाल दया, अथात् उनसे प्रणाम करवाया।

पद अथ

िबस्वािमत्र ु वश्वा मत्र (राम-लक्ष्मण के साथ आए ऋ ष)

पुिन फर

पद सरोज चरण-कमल

मेले डाल दए, लगा दए

दोउ भाई दोन भाई — राम और लक्ष्मण

भाव: यह पं क्त एक अ भभावक क सूझ दखाती है। वश्वा मत्र जानते ह क धनुष राम ने तोड़ा है और परशुराम
का क्रोध कसी भी क्षण उधर मुड़ सकता है। इस लए वे राम-लक्ष्मण को पीछे नह छपाते, सबसे पहले सामने लाकर
चरण म डाल दे ते ह। यह वही रणनी त है जो कोई अनुभवी बड़ा अपनाता है — ववाद से पहले संबंध बना दो। ‘मेले’
शब्द भी ध्यान दे ने योग्य है; इसम एक स्नेह-भरा बल है, मानो उन्ह ने दोन को हाथ पकड़कर चरण म झुका दया
हो। यह छोट -सी क्रया आगे राम क वनम्रता क भू मका भी तैयार करती है।

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार रूपक अलंकार — “पद सरोज”। यही पुस्तक का अपना उदाहरण है (पृष्ठ 161), जहाँ रूपक क प रभाषा द गई है —
“रूप का आरोपण करना”। यहाँ उपमेय (चरण) म उपमान (सरोज यानी कमल) का सीधा आरोप है; बीच म ‘जैसा’ या ‘सम’
जैसा कोई वाचक शब्द नह , इस लए यह उपमा नह , रूपक है।

रूपक क्य कमल कोमल है, प वत्र है और क चड़ म रहकर भी न लप्त रहता है। ये तीन गुण मु न के चरण पर आरो पत कर दए गए ह
बना — इसी लए उपमान ‘सरोज’ चुना गया।

अनुप्रास “ मले … मेले” म ‘म’ क आवृ त्त; “पु न … पद” म ‘प’ क ।

तुक आई – भाई।

अवधी क ‘ बस्वा मत्रु’ ( वश्वा मत्र), ‘दोउ’ (दोन ) — अवधी म ‘व’ प्रायः ‘ब’ हो जाता है और संज्ञा के अंत म ‘उ’ जुड़ता है।
वशेषता

Page 7 of 91

Page 9

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

प्र.7 “रामु लखनु दसरथ के ढोटा। द न्ह असीस दे ख भल जोटा॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — ( वश्वा मत्र ने प रचय दया क) ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथ के पुत्र ह। दोन क अ जोड़ी दे खकर परशुराम ने
उन्ह आशीवाद दया।

पद अथ

रामु लखनु राम और लक्ष्मण

ढोटा पुत्र, बेटा, बालक

दीिन्ह असीस आशीवाद दया

भल जोटा अ जोड़ी, सुंदर जोड़ा

भाव: यह पं क्त कथा क सबसे बड़ी वडंबना रचती है। जस व्य क्त ने धनुष तोड़ा है, परशुराम उसी को आशीवाद
दे रहे ह — और उन्ह पता ही नह । पाठक यह जानता है, सभा यह जानती है, केवल परशुराम नह जानते। इसी को
नाटक य वडंबना कहते ह, और यही आगे के व ोट को और तीखा बना दे ती है। दूसरी बात — परशुराम का
आशीवाद क्रोधी होने पर भी उनके भीतर क सहजता दखाता है। वे कसी को बना कारण नापसंद नह करते; ‘भल
जोटा’ कहकर वे सच्चे मन से प्रसन्न होते ह। ‘ढोटा’ और ‘जोटा’ जैसे ठे ठ लोकभाषा के शब्द इस क्षण को दरबारी
नह , घरेलू बना दे ते ह।

शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है

अलंकार अनुप्रास — “दसरथ … ढोटा … द न्ह … दे ख” म ‘द/ढ’ वग क आवृ त्त।

वडंबना (व्यंग्य- क्रोध का लक्ष्य बनने वाले को ही आशीवाद मलना — यह नाटक यता का श्रेष्ठ उदाहरण है, जसक चचा पुस्तक
स्थ त) ‘क वता का स दय’ म करती है।

लोकभाषा ‘ढोटा’ (पुत्र) और ‘जोटा’ (जोड़ा) — दोन अवधी के ठे ठ लोक-शब्द ह। शास्त्रीय ‘पुत्र’ और ‘युगल’ क जगह इन्ह
रखकर तुलसी दृश्य को आत्मीय बना दे ते ह।

तुक ढोटा – जोटा। यह तुक इतनी सहज है क पूरी चौपाई एक कहावत क तरह याद रह जाती है।

अवधी क वशेषता ‘रामु’, ‘लखनु’ — नाम के अंत म ‘उ’; ‘भल’ (भला), ‘असीस’ (आशीष) — तद्भव रूप।

Page 8 of 91

Page 10

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

co m
m.
“राम ह चतइ रहे थ क लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
e
प्र.8

m l as
.co
शल्प स्पष्ट क जए।

a g
se m
g l a
a

सरल अथ — राम को दे खकर परशुराम के नेत्र वह ठहर गए (वे अपलक दे खते रह गए), क्य क राम का अपार स दय कामदे व के

co m
गव को भी चूर करने वाला है।

em . ag
पद अथ
g l as
रामिह िचतइ
a
राम को दे खकर

co m
m.
थिक रहे लोचन आँख थककर रह गईं — टकटक बँध गई

m as e
.co a g l
m
रूप अपार असीम स दय

l a se
a g मार कामदे व

a s
com
मद गव, अ भमान

छु ड़ाने वाला, दूर .करने
e m agl
as
मोचन वाला

a g l
भाव: ‘थ क रहे लोचन’ — इस एक प्रयोग पर रु कए। आँख थकती तब ह जब वे दे खते-दे खते हट न सक। यानी

. c om
परशुराम क दृ ष्ट राम पर जाकर अटक गई। ज़रा सो चए, यह वही व्य क्त है जसक दृ ष्ट पड़ते ही लोग अपनी मृत्यु

s e mदे ते ह क राम का
coभीmएक श क्त है — ऐसी श क्त जो क्रोध को कुछ क्षण के लए रोक aदे तgीlहैa। और कामदे व को उपमान
का अनुमान लगा लेते थे (चौपाई 3)। वही दृ ष्ट यहाँ स्वयं बँध जाती है। तुलसी इस तरह बता

.
m बहुत साथक है: कामदे व स दय का अ भमानी दे वता माना जाता है; जब उसी का गव चूर हो जाए, तो स दय
स दय
eबनाना
as क सीमा कहाँ बचेगी!
a g l
se m
com g l a
m . a
ase
agl

co m
m .
m as e
.co a g l
se m
g l a
a c
m .
m a s e
e m . co agl
g l as
a

com
m .
m ase
.co


a g l Page 9 of 91

Page 11

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार 1 अनुप्रास — “मार मद मोचन” म ‘म’ क तीन आवृ त्तयाँ। यह पाठ के सबसे सुंदर अनुप्रास म से एक है।

अलंकार 2 अ तशयो क्त — कामदे व तक का मद चूर कर दे ना; बात बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है।

अलंकार 3 व्य तरेक क छाया — उपमान (कामदे व) से उपमेय (राम का रूप) को श्रेष्ठ बताया गया है।

बब दृश्य बब — क्रोध से भरा फरसाधारी मु न और उसक ठहरी हुई, अपलक आँख। पूरा दृश्य एक क्षण के लए स्थर हो जाता
है।

संरचना म यह चौपाई कथा म ठहराव पैदा करती है — ठ क उससे पहले, जब दोहे म परशुराम पूछगे ‘कहहु काह अ त भीर’ और
स्थान तूफ़ान शुरू होगा। शां त के बाद तूफ़ान — यह जानी-मानी नाटक य यु क्त है।

तुक लोचन – मोचन।

प्र.9 “बहु र बलो क बदे ह सन कहहु काह अ त भीर। पूछत जा न अजान ज म ब्यापेउ कोपु सरीर॥” — इस दोहे का
पद े द, सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — फर परशुराम ने वदे ह (राजा जनक) क ओर दे खकर कहा — “कहो, यह इतनी भीड़ कस कारण है?” वे सब कुछ
जानते हुए भी अनजान क तरह पूछ रहे थे, क्य क क्रोध उनके सारे शरीर म व्याप्त हो चुका था।

पद अथ

बहिु र फर, तदनंतर

िबलोिक दे खकर

िबदे ह सन वदे ह (जनक) से

काह अित भीर यह इतनी भीड़ कस लए है

जािन अजान िजिम जानते हुए भी अनजान क तरह

ब्यापेउ व्याप्त हो गया, फैल गया

कोपु सरीर क्रोध शरीर म

Page 10 of 91

Page 12

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

भाव: यह दोहा कथा का पहला संवाद है और परशुराम का पहला वाक्य। ध्यान द जए, वे प्रश्न पूछ रहे ह — पर
प्रश्न असली नह है। माग म उन्ह समाचार मल ही चुका था क शव-धनुष टू ट गया। फर भी वे पूछते ह। तुलसी स्वयं
इसका कारण बता दे ते ह — “ब्यापेउ कोपु सरीर”। क्रोध केवल मन म नह है, सारे शरीर म फैल चुका है; ऐसे म
मनुष्य वही करता है जो परशुराम कर रहे ह — जानते हुए भी पूछता है, ता क सामने वाला अपने मुँह से कहे और
उसे बरसने का बहाना मले। इसी लए इस दोहे को पढ़ते ही सभा का तनाव पाठक तक पहुँच जाता है। ‘ बदे ह’
संबोधन भी अथपूण है — जनक का यही प्र सद्ध नाम है, पर अगली ही चौपाई म यही मु न उन्ह ‘जड़’ कह दगे।

शल्प का दोहे म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

छं द दोहा — दो पं क्तय का अधसम मा त्रक छं द, जसम पहले और तीसरे चरण म 13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण म 11
मात्राएँ होती ह और चरणांत गुरु-लघु होता है। ग नए — ब(1)हु(1) र(1) + ब(1)लो(2) क(1) + ब(1)दे (2)ह(1) +
स(1)न(1) = 13; क(1)ह(1)हु(1) + का(2)ह(1) + अ(1) त(1) + भी(2)र(1) = 11।

अलंकार 1 अनुप्रास — “बहु र बलो क बदे ह” म ‘ब’ क तीन आवृ त्तयाँ, और “जा न अजान ज म” म ‘ज’ क तीन।

अलंकार 2 उपमा — ‘ ज म’ (जैसे) उपमा का वाचक शब्द है। उपमेय — परशुराम का पूछना; उपमान — अनजान व्य क्त का पूछना;
साधारण धम — अन भज्ञता का भाव।

अलंकार 3 वरोधाभास — ‘जा न’ और ‘अजान’ एक साथ। ऊपर से वरोध दखता है, पर अथ खुलते ही वरोध मट जाता है।

वक्रो क्त प्रश्न सीधा है, पर आशय दूसरा है — यही वक्र कथन है। पूरी क वता म व्यंग्य क यही परंपरा आगे लक्ष्मण उठा लेते ह।

तुक और भीर – सरीर। दोहे क लय म पहला चरण लंबा और दूसरा छोटा होता है, जससे बात कहकर तुरंत रुक जाने का प्रभाव बनता है
लय — व्यंग्य और चेतावनी के लए यह सबसे उपयुक्त छं द है।

ध्यान द जए: पुस्तक पाठ को इसी क्रम म छापती है — आठ चौपाइय के बाद एक दोहा। ‘व्याकरण क बात’ म
पुस्तक ने स्वयं इसे क वता क एक वशेषता बताया है — “दोहा-चौपाई का क्रम से होना”। चौपाई कथा को आगे
बढ़ाती है और दोहा उस खंड पर मुहर लगाकर उसे समेट दे ता है।

चौपाई 9–16 और दोहा 2 — पं क्त-दर-पं क्त व्याख्या — पृष्ठ 155
काव्य खंड › पाठ 9 › परशुराम का क्रोध और सभा का भय — पद े द, सरल अथ, भाव और शल्प

व्याख्या रौद्र रस

प्र.1 “समाचार क ह जनक सुनाए। जे ह कारन महीप सब आए॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — राजा जनक ने परशुराम को वह सारा समाचार कह सुनाया, जस कारण से ये सब राजा यहाँ आए हुए थे — अथात्
सीता-स्वयंवर और शव-धनुष क प्र तज्ञा क बात।

Page 11 of 91

Page 13

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

पद अथ

समाचार किह सुनाए सारा वृत्तांत कह सुनाया

जेिह कारन जस कारण से

महीप राजा, भूप त

भाव: जनक क यह प्र त क्रया उनक शष्टता क दूसरी कड़ी है। परशुराम ने ताना-सा प्रश्न पूछा था (‘कहहु काह
अ त भीर’), पर जनक ताने का उत्तर ताने से नह दे ते; वे सीधा, पूरा और सच्चा उत्तर दे ते ह। यहाँ यह भी ध्यान रखने
योग्य है क जनक ने कुछ छपाया नह — इसी लए आगे परशुराम के क्रोध का कारण ‘जनक द्वारा समाचार
छपाना’ नह हो सकता। तुलसी ने बहुत कम शब्द म यह जता दया क गलती जनक क ओर से नह हुई; जो होना
है वह केवल इस लए होगा क सामने वाला क्रोध म है।

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

कथन-शैली अप्रत्यक्ष कथन — जनक ने क्या कहा, यह ज्य -का-त्य नह दया गया, केवल सार दया गया है। जो बात पाठक पहले से
जानता है, उसे दोहराने से क व बचता है — यह कथा-कौशल है।

अलंकार अनुप्रास — “समाचार … सुनाए … सब” म ‘स’ क आवृ त्त; “क ह … कारन” म ‘क’ क ।

तुक सुनाए – आए।

अवधी क ‘जे ह’ ( जस), ‘महीप’ (राजा) — अवधी म सवनाम ‘जे ह/ते ह/के ह’ के रूप म चलते ह। आगे ‘के ह हेतू’ म भी यही रूप
वशेषता मलेगा।

संरचना यह चौपाई सूचना-सेतु है — इसके बाद ही परशुराम क दृ ष्ट टू टे धनुष पर पड़ेगी और क वता का सबसे तीव्र भाग शुरू
होगा।

प्र.2 “सुनत बचन फ र अनत नहारे। दे खे चापखंड म ह डारे॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — जनक क बात सुनते ही परशुराम ने मुड़कर दूसरी ओर दे खा और धरती पर पड़े हुए धनुष के टु कड़े दे खे।

Page 12 of 91

Page 14

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

पद अथ

सुनत बचन वचन सुनते ही

िफिर मुड़कर

अनत अन्यत्र, दूसरी ओर

िनहारे दे खा

चापखंड धनुष के टु कड़े

मिह डारे धरती पर पड़े हुए

भाव: यह पूरे पाठ क सबसे बड़ी घड़ी-भर क चुप्पी है। परशुराम कुछ बोलते नह — बस मुड़ते ह और दे खते ह।
और जो दे खते ह, वह उनके आराध्य शव का धनुष है, टु कड़े-टु कड़े होकर धरती पर पड़ा हुआ। क व ने ‘म ह डारे’
शब्द जान-बूझकर रखे ह — टु कड़े केवल टू टे नह ह, ज़मीन पर बखरे पड़े ह; यानी उन्ह उठाकर सम्मान से रखा
भी नह गया। एक भक्त के लए यह दृश्य असहनीय है। यही वह क्षण है जसके बाद क वता का ताप एकदम चढ़
जाता है। यह भी ध्यान द जए क सारी बात सुनने के बाद भी क्रोध शब्द से नह , दृश्य से फूटा — दे खना बोलने से
अ धक भारी पड़ा।

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

बब दृश्य बब — धरती पर बखरे धनुष के टु कड़े। पूरे पाठ म यही एक ठोस वस्तु है जस पर सारा झगड़ा टका है, और तुलसी
उसे एक ही बार, ठ क सही जगह पर दखाते ह।

अलंकार अनुप्रास — “दे खे … डारे” म ‘द/ड’ क और “ नहारे … न” क आवृ त्त।

क्रया-ग त तीन क्रयाएँ लगातार — सुनत, फ र, नहारे, दे खे। इससे दृश्य कैमरे क तरह घूमता है: पहले जनक पर, फर मु न पर,
फर धरती पर।

नाटक यता यह मोड़- बदु (turning point) है। ‘क वता का स दय’ म जस नाटक यता क बात है, उसका सबसे साफ़ उदाहरण
यही चौपाई है।

तुक नहारे – डारे।

प्र.3 “अ त रस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — अत्यंत क्रोध म भरकर परशुराम कठोर वचन बोले — “अरे मूख जनक! बता, यह धनुष कसने तोड़ा?”

Page 13 of 91

Page 15

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

co m
m.
पद अथ

m as e
अित िरस
.co
अत्यंत क्रोध म
a g l
se m
g l a कठोर वचन
a
बचन कठोरा

कहु कहो, बताओ

. cमूoखm ag
e m
जड़ , जड़बु द्ध

g l as
कै तोरा
a कसने तोड़ा

co m
m.
भाव: यह पाठ क सबसे तीखी पं क्त है और अभ्यास का तीसरा बहु वकल्पी प्रश्न इसी पर है। दो बात ध्यान दे ने

o m l a se
योग्य ह। पहली — क्रोध का मूल कारण ठ क पछली चौपाई म मल जाता है: “दे खे चापखंड म ह डारे”। यानी क्रोध
g राम एक राजा को, वह भी
.cअपमान या आदर-सत्कार नह , शव-धनुष का खं डत होना है। दूसरी —aपरशु
m
seसभा म, ‘जड़’ कहकर संबो धत करते ह। यह केवल क्रोध नह , मयादा का उल्लंघन भी है, और तुलसी इसे
का कारण
aभरी
agl छपाते नह । इसी से यह भी समझ आता है क आगे लक्ष्मण का पलटकर बोलना अकारण उ ं डता नह है —
वातावरण पहले ही अपमान से भर चुका है।
m a s
m .co agl
l a se
a g
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

co m
.
रस रौद्र रस — स्थायी भाव ‘क्रोध’। आलंबन — धनुष तोड़ने वाला; उ पन — धरती पर बखरे चापखंड; अनुभाव — कठोर
वचन, अपमानसूचक संबोधन।
se m
com l a
अलंक.ार
m ag बचन” म ‘ब’ क ।
ase
अनुप्रास — “कहु जड़ जनक” म ‘ज’ क दो और ‘क’ क दो आवृ त्तयाँ; “बोले

agl शब्द-श क्त ‘जड़’ केवल गाली नह है — इसका शब्दाथ है ‘चेतनाहीन’। परशुराम कह रहे ह क जो अपने राज्य म शव-धनुष टू टने दे ,
वह चेतनाहीन ही है। इस लए यह तकयुक्त अपमान है।
se m
coहैm g l a
m . a
se है।
वाक्य-रचना दूसरा चरण पूरी तरह आदे श और प्रश्न । कोई वशेषण नह , कोई अलंकरण नह — केवल पाँच शब्द। क्रोध क भाषा

l a
ऐसी ही छोट और नुक ली होती

तुक कठोरा – तोरा।
ag

co m
भाषा संगम से
m .
यही पं क्त पुस्तक के भाषा संगम बॉक्स (पृष्ठ 163) म ली गई है, जहाँ ‘धनुष’ शब्द के अनेक भारतीय भाषाओं के रूप

as e
com l
जोड़ दए गए ह।

. a g
m
ase
agl c
m .
m a s e
e m . co agl
g l as
a

com
m .
m ase
.co


a g l Page 14 of 91

Page 16

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

प्र.4 “बे ग दे खाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ म ह जहँ ल ह तव राजू॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — “मूख! शीघ्र दखा ( क कसने तोड़ा), नह तो आज जहाँ तक तेरा राज्य फैला है, उस सारी पृथ्वी को म उलट-पुलट
कर दूँ गा।”

पद अथ

बेिग शीघ्र, जल्द

दे खाउ दखाओ

मूढ़ मूख

नत नह तो

आजू आज

उलटउँ उलट दूँ गा

मिह पृथ्वी

जहँ लिह जहाँ तक

तव राजू तुम्हारा राज्य

भाव: क्रोध यहाँ धमक म बदल जाता है, और धमक भी नाप-तौल कर द गई है — “जहाँ तक तेरा राज्य है, उतनी
पृथ्वी उलट दूँ गा।” यानी दं ड केवल अपराधी को नह , पूरे राज्य को मलेगा। यह सामू हक दं ड क धमक है, और
इसी से सभा म बैठे हर व्य क्त क जान सूख जाती है — अगली दो चौपाइय म उसी का चत्र है। ध्यान द जए,
परशुराम अभी भी यह नह जानते क धनुष कसने तोड़ा; वे केवल जानना चाहते ह। ले कन क्रोधी व्य क्त जानने से
पहले ही दं ड घो षत कर दे ता है — यह मनुष्य-स्वभाव का सच्चा चत्र है। ‘बे ग’ (शीघ्र) शब्द भी बताता है क उनके
पास प्रतीक्षा का धैय बलकुल नह बचा।

Page 15 of 91

Page 17

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार 1 अ तशयो क्त — पृथ्वी को उलट दे ने क बात स्पष्ट रूप से बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है। पुस्तक क प रभाषा से यह
अ तशयो क्त अलंकार का सुंदर उदाहरण है (पुस्तक ने ‘अरध नमेष कलप सम बीता’ दया है; यह उसका दूसरा उदाहरण
है)।

अलंकार 2 अनुप्रास — “मूढ़ … म ह” म ‘म’ क , “जहँ ल ह” म ‘ह’ क आवृ त्त।

रस रौद्र रस क पराकाष्ठा। इसके आगे क्रोध केवल शब्द म और बढ़ सकता है, कम म नह ।

संबोधन ‘जड़’ के बाद अब ‘मूढ़’ — अपमान क मात्रा बढ़ती जा रही है। दो चौपाइय म दो बार राजा का अपमान।

तुक और लय आजू – राजू। ‘ऊ’ क लंबी, भारी ध्व न धमक को और गूँजदार बना दे ती है।

अवधी क ‘उलटउँ ’ (उलट दूँ गा) — अवधी का उत्तम पुरुष भ वष्यत् रूप; ‘तव’ (तुम्हारा), ‘राजू’ (राज्य), ‘आजू’ (आज)।
वशेषता

प्र.5 “अ त डरु उतरु दे त नृपु नाह । कु टल भूप हरषे मन माह ॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — अत्य धक भय के कारण राजा जनक कोई उत्तर नह दे पा रहे थे; और यह दे खकर सभा म बैठे कु टल राजा मन-ही-
मन प्रसन्न हो रहे थे।

पद अथ

अित डरु अत्य धक भय के कारण

उतरु उत्तर

नपृ ु राजा (जनक)

कु िटल भूप दुष्ट/छल-भरे राजा

हरषे मन माही ं मन ही मन प्रसन्न हुए

भाव: तुलसी यहाँ एक ही पं क्त म दो बलकुल उलट मनः तयाँ रख दे ते ह — एक ओर मौन म जमा हुआ
भय, दूसरी ओर उसी भय पर छपी हुई प्रसन्नता। दूसरा चरण मनुष्य-स्वभाव क एक कड़वी सच्चाई खोलता है:
बहुत-से लोग दूसरे क मुसीबत म भीतर-भीतर खुश होते ह। ये वही राजा ह जो स्वयं धनुष नह उठा पाए थे और
स्वयंवर म अपमा नत होकर बैठे थे; इस लए जनक का संकट उन्ह अपने अपमान का बदला-सा लगता है। यह ईष्या
है, और ईष्या का सबसे साफ़ लक्षण यही है क वह मुँह से नह , मन से बोलती है — इसी लए क व ने ‘मन माह ’
लखा। इस एक चरण से पूरे राज-समाज का नै तक चेहरा उजागर हो जाता है।

Page 16 of 91

Page 18

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

वरोधी युग्म भय ↔ हष — दो वपरीत भाव आमने-सामने रखकर वषम स्थ त (कं ास्ट) पैदा क गई है। यही इस चौपाई क सबसे
बड़ी श क्त है।

अलंकार अनुप्रास — “मन माह ” म ‘म’ क और “कु टल … भूप … हरषे” म क्रमशः वण-आवृ त्त।

च रत्र- चत्रण ‘कु टल’ वशेषण क व का अपना नणय है। तुलसी तटस्थ नह रहते — वे बता दे ते ह क यह हष नदनीय है।

अभ्यास से यही पं क्त ‘मेरी कल्पना मेरे अनुमान’ के प्रश्न 2 का आधार है और ‘भाव-पहचान’ ता लका म ईष्या/कु टलता का
जोड़ उदाहरण भी यही है। ‘गद्य-रूप’ म भी यही चौपाई द गई है।

तुक नाह – माह ।

अवधी क ‘डरु’, ‘उतरु’, ‘नृपु’ — तीन म अंत्य ‘उ’; ‘माह ’ (म) — अवधी का संबंध-सूचक रूप।
वशेषता

प्र.6 “सुर मु न नाग नगर नर नारी। सोच ह सकल त्रास उर भारी॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — दे वता, मु न, नाग तथा नगर के सभी स्त्री-पुरुष — सब हृदय म भारी भय लए च तत हो रहे थे।

पद अथ

सुर दे वता

नाग नागलोक के प्राणी

नर नारी स्त्री-पुरुष

सोचिहं चता कर रहे थे

सकल सब

त्रास उर भारी हृदय म भारी भय

भाव: पछली चौपाई म भय सभा तक सी मत था; यहाँ वह तीन लोक तक फैल जाता है। दे वता, मु न, नाग, और
नगर के साधारण स्त्री-पुरुष — कोई बचा नह । क व यह दखाना चाहता है क परशुराम का क्रोध कसी एक व्य क्त
का नजी मामला नह रह गया, वह एक सावभौ मक संकट बन गया है। ‘उर भारी’ शब्द-योजना बहुत सट क है —
भय क सबसे पहचानी हुई अनुभू त यही है क छाती पर बोझ-सा लगे। और ‘सोच ह’ म केवल डर नह , चता भी है
— यानी लोग यह भी सोच रहे ह क अब आगे क्या होगा, कह इन सुंदर राजकुमार पर आप त्त न आ जाए।

Page 17 of 91

Page 19

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार अनुप्रास अलंकार का श्रेष्ठ उदाहरण — “सुर मु न नाग नगर नर नारी” म ‘न’ वण चार बार आया है। पुस्तक क प रभाषा
— “एक ही वण क बार-बार आवृ त्त”। पूरे पाठ म इससे स्पष्ट अनुप्रास दूसरा नह है।

रस भयानक रस — स्थायी भाव ‘भय’; आश्रय — दे वता से लेकर साधारण नाग रक तक; अनुभाव — चता, हृदय का
भारीपन।

समास और पहला चरण पूरा का पूरा नाम क सूची है, बना कसी क्रया के। सूची जतनी लंबी होती जाती है, संकट का दायरा उतना
गणना बड़ा दखता जाता है।

लोक-दृ ष्ट तुलसी ‘नगर नर नारी’ को दे वताओं और मु नय के साथ एक ही पं क्त म रखते ह। यह उनक लोकधम दृ ष्ट है — संकट म
सब बराबर ह।

तुक नारी – भारी।

गद्य-रूप से पुस्तक ने ‘गद्य-रूप’ के अभ्यास म यही चौपाई पछली चौपाई के साथ द है (पृष्ठ 162)।
जोड़

प्र.7 “मन प छता त सीय महतारी। ब ध अब सँवरी बात बगारी॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — सीता क माता (सुनयना) मन-ही-मन पछता रही थ क वधाता ने अब बनी-बनाई बात बगाड़ द ।

पद अथ

पिछताित पछता रही थ

सीय महतारी सीता क माता — सुनयना

िबिध वधाता, ईश्वर

सँवरी बात बनी-बनाई बात

िबगारी बगाड़ द

Page 18 of 91

Page 20

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

. com
भाव: यह पं क्त एक माँ क चता क पं क्त है, और पुस्तक ने ‘भाव-पहचान’ ता लका म इसे स्वयं ‘ चता’ का

m a s emष टूटा, वर मल
o तय हो गया। और अब वही ‘सँवरी बात’ बगड़ती दख रही है। ध्यानagद lजए, वे कसी व्य क्त
उदाहरण बनाया है। सुनयना के लए यह क्षण दोहरा है — कुछ दे र पहले तक सब कुछ ठ क था: धनु
गया, पुत्री का.cववाह

a s eनहm दे त — न परशुराम को, न राम को, न प त को। वे वधाता को दोष दे ती ह, क्य क साधारण मनुष्य क
glच से बाहर क वप त्त के लए हमारे लोक-मन म यही भाषा है। यह वात्सल्य- म श्रत असहायता का बहुत सच्चा
को दोष
aपहुँ
m
चत्र है।

. co ag
em
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
g l as
पक्ष a

co m
m.
अलंकार अनुप्रास — “ ब ध … बात बगारी” म ‘ब’ क तीन आवृ त्तयाँ; ‘सँवरी … सीय’ म ‘स’ क ।

o m l a seने ‘व्याकरण क बात’ म
g है।
.c क वता क एक वशेषता ‘मुहावर का उपयोग करना’ बताई है — यह उसका सीधाaउदाहरण
लोको क्त का ‘बनी-बनाई बात बगड़ जाना’ आज भी घर-घर म बोला जाने वाला लोक-प्रयोग है। पुस्तक

em
प्रयोग

a s
aglध्व न और भाव ‘सँवरी’ और ‘ बगारी’ — दो वपरीत अथ वाले शब्द एक ही चरण म। बनने और बगड़ने क दूरी इसी एक चरण म तय हो
जाती है।

m a s
कथन-शैली
em
.co
दूसरा चरण बना वक्ता का नाम बताए सीधे सुनयना का कथन है — पुस्तक ने इसे भी क वता क एक वशेषता माना है।
agl
a s
aglहै।)
तुक महतारी – बगारी। ( पछली चौपाई क ‘नारी – भारी’ के साथ मलकर ‘आरी’ क ध्व न लगातार चार बार आती है, जससे
शोक का स्वर गहरा हो जाता

co m
m .
o m l a se
g का पद े द, सरल अथ, भाव
.c“भृगुप त कर सुभाउ सु न सीता। अरध नमेष कलप सम बीता॥” — इसaचौपाई
e m
las और शल्प स्पष्ट क जए।
प्र.8

ag
se m
com g l a
m . a
ase
सरल अथ — परशुराम के (क्रोधी) स्वभाव के बारे म सुनकर सीता को आधा क्षण भी एक कल्प के समान लंबा बीत रहा था।

पद अथ agl

co m
भगृ पु ित कर सुभाउ
.
परशुराम का स्वभाव

e m
m l as
.co a g
सुिन सुनकर

a s em अरध िनमेष
agl
आधा क्षण, आधा पलक झपकने जतना समय

.c
कलप कल्प — ब्रह्मा का एक दन, एक हज़ार महायुग (लगभग 4 अरब 32 करोड़ मानव-वष)
s e m
m a
सम बीता के समान बीता
e m . co agl
g l as
a

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 19 of 91

Page 21

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

भाव: यह पूरे पाठ क सबसे सुंदर मनोवैज्ञा नक पं क्त है। सीता कुछ बोलती नह , कुछ करती नह — वे केवल
सुनती ह और प्रतीक्षा करती ह। और उसी प्रतीक्षा म समय का माप ही बदल जाता है। तुलसी ने डर का वणन नह
कया; उन्ह ने डर का प्रभाव दखा दया। ध्यान द जए क सीता क चता अपने लए नह है — धनुष राम ने तोड़ा
है, और परशुराम तोड़ने वाले को शत्रु घो षत करने वाले ह। सीता मन-ही-मन राम का वरण कर चुक ह; इस लए
उनका भय प्रेम से उपजा भय है। यही कारण है क पुस्तक ‘मेरी समझ मेरे वचार’ म इसी पं क्त पर प्रश्न पूछती है।

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार 1 अ तशयो क्त अलंकार — यह पुस्तक का अपना उदाहरण है (पृष्ठ 161): “बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना”। आधा पल
और एक कल्प — दो छोर को एक साथ रखकर बात को अत्यंत बढ़ा दया गया है।

अलंकार 2 उपमा — ‘सम’ उपमावाचक शब्द है। उपमेय — अरध नमेष; उपमान — कलप; साधारण धम — लंबा लगना।

बब समय का बब — इसम कुछ दखाई नह दे ता, केवल महसूस होता है। हद क वता म ऐसे ‘आंत रक बब’ कम मलते ह,
इसी लए यह पं क्त वशेष है।

संख्या का पुस्तक क शब्द-संपदा म ‘कलप’ का माप तक दया गया है — 4 अरब 32 करोड़ मानव-वष। इस संख्या को आधे पल के
प्रयोग सामने र खए, तो अ तशयो क्त का पूरा असर समझ आ जाता है।

अनुप्रास “सुभाउ सु न सीता” म ‘स’ क तीन आवृ त्तयाँ; “कलप … बीता” के साथ ‘क’ क ।

तुक सीता – बीता।

प्र.9 “सभय बलोके लोग सब जा न जानक भीरु। हृदयँ न हरषु बषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥” — इस दोहे का
पद े द, सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — श्रीराम ने सब लोग को भयभीत दे खा और जानक (सीता) को भी डरी हुई जान लया। तब वे बोले — कतु उनके
हृदय म न हष था, न वषाद।

Page 20 of 91

Page 22

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

पद अथ

सभय िबलोके भयभीत दे खा

जािन जानकर

जानकी सीता (जनक क पुत्री)

भीरु भयभीत, डरी हुई

हृदयँ हृदय म

हरषु हष, प्रसन्नता

िबषादु वषाद, दुख

श्रीरघुबीरु रघुकुल के वीर — श्रीराम

भाव: यह दोहा राम के च रत्र क कुंजी है, और अभ्यास का एक पूरा प्रश्न इसी पर है। दो बात साथ-साथ चल रही
ह। पहली — राम दे ख रहे ह: सभा का भय भी और सीता का भय भी। यानी वे स्थ त से कटे हुए नह , पूरी तरह
सचेत ह। दूसरी — फर भी उनके हृदय म न हष है, न वषाद। यह उदासीनता नह , समभाव है। हष होता तो वे
अपने पराक्रम का श्रेय लेते; वषाद होता तो घबरा जाते। दोन म से कुछ न होने के कारण ही वे अगली चौपाई म
इतना संतु लत उत्तर दे पाते ह। तुलसी यह भी बता दे ते ह क वे बोलने से पहले इस स्थ त म पहुँच चुके थे — यही
धीरोदात्त नायक का लक्षण है।

शल्प का दोहे म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

छं द दोहा — 13 + 11 मात्राएँ। ग नए — स(1)भ(1)य(1) + ब(1)लो(2)के(2) + लो(2)ग(1) + स(1)ब(1) = 13;
जा(2) न(1) + जा(2)न(1)क (2) + भी(2)रु(1) = 11।

अलंकार 1 अनुप्रास — “जा न जानक ” म ‘जान’ ध्व न क सीधी आवृ त्त, और “हृदयँ न हरषु” म ‘ह’ क ।

ध्व न-साम्य ‘जा न’ (जानना) और ‘जानक ’ (सीता) — ध्व न एक-सी, अथ अलग। इससे पं क्त म चमत्कार पैदा होता है और सीता का
नाम कान म अटक जाता है।

वरोधी युग्म ‘हरषु’ और ‘ बषादु’ — दोन का एक साथ नषेध। दो छोर काटकर बीच का बदु दखाया गया है, और वही बदु राम ह।

रस यहाँ कोई उग्र रस नह है — शांत स्वर है, जो रौद्र और भयानक के ठ क बीच म रखा गया है। यही तुलसी क संयोजन-
कुशलता है।

तुक भीरु – श्रीरघुबीरु। क व ‘भीरु’ (डरा हुआ) के ठ क सामने ‘रघुबीरु’ (वीर) रख दे ते ह — तुक ही अथ का वरोध बन जाती
है।

Page 21 of 91

Page 23

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

जोड़ ली जए: इस दोहे म राम ‘बोले’ तो सही, पर उन्ह ने क्या कहा — यह अगली चौपाई म आता है। दोहे को इस
तरह अधूरा छोड़कर अगली चौपाई से जोड़ना तुलसी क जानी-पहचानी यु क्त है; इससे पाठक बना रुके आगे बढ़ता
है।

चौपाई 17–24 और दोहा 3 — पं क्त-दर-पं क्त व्याख्या — पृष्ठ 155
काव्य खंड › पाठ 9 › राम क वनय और लक्ष्मण का व्यंग्य — पद े द, सरल अथ, भाव और शल्प

व्याख्या व्यं ग् य

प्र.1 “नाथ संभुधनु भंज नहारा। होइ ह केउ एक दास तुम्हारा॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — (राम ने कहा —) हे नाथ! शव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा।

पद अथ

नाथ स्वामी — आदरसूचक संबोधन

संभध
ु नु शंभु ( शव) का धनुष

भंजिनहारा भंग करने वाला, तोड़ने वाला

होइिह होगा

के उ एक कोई एक

दास तुम्हारा आपका सेवक

भाव: यह पूरे पाठ क सबसे संयत पं क्त है, और अभ्यास का चौथा बहु वकल्पी प्रश्न इसी पर है। इस एक वाक्य म
तीन काम एक साथ हो रहे ह। पहला — राम सच बोल रहे ह (हाँ, धनुष टू टा है)। दूसरा — वे अपना नाम नह लेते;
कहते ह ‘कोई एक’। तीसरा — जो कहते ह, उसम भी स्वयं को ऊपर नह , परशुराम का ‘दास’ बताते ह। यानी वे
झूठ भी नह बोलते और टकराव भी नह बढ़ाते। ध्यान द जए, यही बात य द लक्ष्मण के ढं ग से कही जाती — ‘धनुष
मने तोड़ा, क्या कर लोगे?’ — तो सभा म युद्ध छड़ जाता। यही अंतर वनम्रता और मयादा का है। और वनम्रता
यहाँ कमज़ोरी नह है: सच कहने का साहस पूरा है, केवल कहने का ढं ग शालीन है।

Page 22 of 91

Page 24

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

कथन-शैली बना वक्ता का नाम बताए कथन — पछले दोहे म ‘बोले श्रीरघुबीरु’ कहकर क व चुप हो गया था; यहाँ सीधे राम क
वाणी आ जाती है। पुस्तक ने इसे क वता क एक वशेषता माना है।

अलंकार अनुप्रास — “संभुधनु भंज नहारा” म ‘अनुस्वार + भ’ क आवृ त्त; “होइ ह … तुम्हारा” म ‘ह’ क ।

शब्द-चयन ‘नाथ’ और ‘दास’ — पहला शब्द सामने वाले को ऊपर उठाता है, दूसरा स्वयं को नीचे रखता है। एक ही चौपाई म दोन
काम।

अ नश्चय का ‘केउ एक’ (कोई एक) और ‘होइ ह’ (होगा) — दोन म अ नश्चय है। राम जान-बूझकर वाक्य को खुला छोड़ दे ते ह, ता क
प्रयोग आरोप कसी एक पर न टके।

तुक भंज नहारा – तुम्हारा।

गद्य-रूप से पुस्तक ने ‘गद्य-रूप’ के उदाहरण म इसी चौपाई का गद्य-रूपांतर स्वयं दया है (पृष्ठ 162)।
जोड़

प्र.2 “आयसु काह क हअ कन मोही। सु न रसाइ बोले मु न कोही॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव
और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — (राम ने आगे कहा —) आपक क्या आज्ञा है, मुझसे क्य नह कहते? यह सुनकर क्रोधी मु न परशुराम क्रोध म
भरकर बोले।

पद अथ

आयसु आज्ञा, आदे श

काह क्या

किहअ िकन क्य नह कहते

मोही मुझसे

िरसाइ क्रोध करके

कोही क्रोधी

Page 23 of 91

Page 25

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

. com
भाव: यहाँ राम एक कदम और आगे जाते ह। पहले उन्ह ने आरोप को टाला, अब वे स्वयं को प्रस्तुत कर दे ते ह —
m रहे ह। यह
‘आज्ञा मुझसे क्य नह कहते’। यानी वे झगड़े से भाग नह रहे; वे केवल झगड़े को आज्ञा-पालन मeबदल
s
m a
co क ठन रूप है — जो सामने वाले के क्रोध को अपने ऊपर ले लेता है,aपरglउसे भड़कने का कोई
वनम्रता का .सबसे
कारणsनह
a emदे ता। दूसरे चरण म तुलसी एक ही शब्द म परशुराम का चत्र ख च दे ते ह — ‘मु न कोही’। मु न और
gl — दोन बात एक ही व्य क्त म। परशुराम का सारा द्वं द्व इसी दो-शब्द क जोड़ी म है।
aक्रोधी

co m
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
e m . ag
पक्ष
g l as
अलंकार
a
अनुप्रास — “काह क हअ कन” म ‘क’ क तीन आवृ त्तयाँ; “मोही … मु न” म ‘म’ क ।

co m
m.
se काह अ त भीर’) चुनौती
वरोधाभास ‘मु न कोही’ — मु न का स्वभाव शां त है, फर भी वे क्रोधी ह। यह वरोधाभास पूरे पाठ के तनाव का स्रोत है।

o m l a
m
प्रश्न-शैली
.c ‘क हअ कन मोही’ — प्रश्न है , पर उत्तर क माँ ग नह ; यह नवे दन है । परशु राम
ag
का प्रश्न (‘कहहु

l a se था, राम का प्रश्न प्राथना है। दोन क तुलना क जए — च रत्र-भेद स्पष्ट हो जाएगा।

g
a वक्ता-प रवतन एक ही चौपाई म वक्ता बदल जाता है — पहला चरण राम का, दूसरा क व का। क व बीच म आकर बता दे ता है क अब

m a s
agl
कौन बोलेगा।

m .co
a se
तुक मोही – कोही।

अवधी क a g l
‘मोही’ (मुझसे), ‘क हअ’ (क हए/कहते ह), ‘काह’ (क्या), ‘ कन’ (क्य नह ) — शुद्ध अवधी रूप, जनका खड़ी बोली म

m
वशेषता कोई सीधा जोड़ नह मलता।

. co
em
m l as
.co a g
a s em “सेवकु सो जो करै सेवकाई। अ र करनी क र क रअ लराई॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
agl
प्र.3
शल्प स्पष्ट क जए।

se m
com g l a
m . a
ase
agl
सरल अथ — (परशुराम ने कहा —) सेवक वही होता है जो सेवा का काम करे। शत्रु जैसी करतूत करके तो लड़ाई ही क जाती है
— अथात् जसने यह कया है वह मेरा दास नह , शत्रु है, और उससे युद्ध ही होगा।

com
m .
m as e
.co a g l
se m
g l a
a c
m .
m a s e
e m . co agl
g l as
a

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 24 of 91

Page 26

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

पद अथ

से वकु सेवक, दास

से वकाई सेवा का काम

अिर शत्रु

करनी करतूत, कम

किरअ क जाती है

लराई लड़ाई

भाव: परशुराम राम के ही शब्द (‘दास तुम्हारा’) को पकड़कर उलट दे ते ह। राम ने कहा था — तोड़ने वाला आपका
दास होगा। परशुराम कहते ह — दास वह होता है जो सेवा करे; जो शत्रु जैसा काम करे, वह दास नह । यह तक है,
केवल क्रोध नह — और यही इस चौपाई को महत्वपूण बनाता है। परशुराम मूख नह ह; वे बात को काटना जानते
ह। यह से संवाद तक-प्र ततक का रूप ले लेता है, जो आगे लक्ष्मण के आने पर व्यंग्य म बदल जाएगा। पहला चरण
एक सू क्त जैसा है, जसे संदभ से अलग करके भी उद्धत कया जा सकता है।

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार अनुप्रास अलंकार — “अ र करनी क र क रअ लराई” म ‘कर’ ध्व न तीन बार आई है। यह पुस्तक का अपना उदाहरण है
(पृष्ठ 161)। साथ ही पहले चरण म ‘सेवकु … सेवकाई’ क आवृ त्त भी अनुप्रास ही है।

सू क्त-शैली “सेवकु सो जो करै सेवकाई” — यह प रभाषा के ढं ग का वाक्य है, इसी लए कहावत क तरह याद रह जाता है।

तक-संरचना पहला चरण वधान (सेवक क्या है), दूसरा चरण नषेध का प रणाम (जो सेवक नह , उसके साथ क्या होगा)। दो चरण म
पूरा तक पूरा हो जाता है।

रस रौद्र — पर यहाँ क्रोध शांत, नुक ले तक का रूप ले चुका है। यह ‘ठं डा क्रोध’ पहले वाले गरम क्रोध से अ धक ख़तरनाक
लगता है।

तुक सेवकाई – लराई।

ग त व ध से ‘ग त व धयाँ’ क ता लका म “सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे।” कथन इसी चौपाई से लया गया है और वह
जोड़ परशुराम का है।

Page 25 of 91

Page 27

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

प्र.4 “सुनहु राम जे ह सवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रपु मोरा॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — हे राम! सुनो — जसने शव का धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।

पद अथ

सुनहु सुनो

जेिहं जसने

िसवधनु शव का धनुष

तोरा तोड़ा

सहसबाहु सहस्रबाहु — पौरा णक कथा का वह राजा जसका वध परशुराम ने कया था

सम के समान

िरपु मोरा मेरा शत्रु

भाव: यह चौपाई क वता म पौरा णक संदभ का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। परशुराम केवल यह नह कह रहे क ‘वह
मेरा शत्रु है’; वे उसे सहस्रबाहु के बराबर रख रहे ह — और यह तुलना धमक को कई गुना बड़ा कर दे ती है, क्य क
सुनने वाले जानते ह क सहस्रबाहु का क्या हुआ था। यानी वाक्य म सज़ा का नाम लए बना सज़ा सुना द गई है।
यह भी ध्यान द जए क परशुराम अब सीधे राम को संबो धत कर रहे ह — जनक को नह । संवाद का कद्र बदल
चुका है, और इसी बदलाव से आगे लक्ष्मण के बीच म कूदने क भू मका बनती है।

Page 26 of 91

Page 28

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार 1 उपमा अलंकार — ‘सम’ उपमावाचक शब्द है। उपमेय — धनुष तोड़ने वाला; उपमान — सहस्रबाहु; साधारण धम —
परशुराम का शत्रु होना।

अलंकार 2 अनुप्रास — “ सवधनु … सहसबाहु सम सो” म ‘स’ क चार आवृ त्तयाँ।

पौरा णक सहस्रबाहु (कातवीय अजुन) क कथा परशुराम-प्रसंग क सबसे प्र सद्ध कथा है। इस एक नाम से पूरी कथा पाठक के मन म
संदभ खुल जाती है — इसे संदभ-संकेत कहते ह। पुस्तक ने ‘क वता का स दय’ म ‘पौरा णक संदभ’ को संवाद क एक
वशेषता बताया है; यह उसका सबसे अ ा उदाहरण है।

शब्द-संपदा पुस्तक क शब्द-संपदा म ‘सहसबाहु’ के कोश-अथ दए गए ह — “सहस्रबाहु, बाणासुर, शव, स्कंद का एक अनुचर”। यहाँ
क टप्पणी प्रसंग के अनुसार अथ सहस्रबाहु ही लेना उ चत है।

तुक तोरा – मोरा।

अवधी क ‘मोरा’ (मेरा), ‘जे ह’ ( जसने), ‘सुनहु’ (सुनो) — अवधी के व शष्ट रूप।
वशेषता

प्र.5 “सो बलगाउ बहाइ समाजा। न त मारे जैह ह सब राजा॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — वह (धनुष तोड़ने वाला) इस सभा को छोड़कर अलग हो जाए, नह तो यहाँ उप स्थत सब राजा मारे जाएँगे।

पद अथ

सो वह

िबलगाउ अलग हो जाए

िबहाइ छोड़कर

समाजा सभा, समूह

नत नह तो

मारे जैहिहं मारे जाएँगे

Page 27 of 91

Page 29

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

भाव: यह पाठ क सबसे भारी चेतावनी है और अभ्यास इसी पर पूरा प्रश्न पूछता है। ध्यान द जए, धमक क
बनावट कतनी चतुर है — दं ड अपराधी को नह , पूरे समाज को दया जा रहा है। इससे दो काम एक साथ होते ह।
पहला — अपराधी पर सामा जक दबाव पड़ता है; अब सब उसे खोजगे, क्य क सबक जान खतरे म है। दूसरा —
सभा म बैठा हर व्य क्त एक साथ भयभीत हो जाता है, इस लए कोई वरोध म नह बोलेगा। परशुराम केवल क्रोधी
नह , रणनी त जानने वाले भी ह। पर इसका एक नै तक पक्ष भी है — नद ष को दोषी के साथ दं ड दे ना अन्याय है,
और शायद यही बात लक्ष्मण को चुप नह रहने दे ती। अगली ही चौपाई म वे बोल पड़ते ह।

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार अनुप्रास — “ बलगाउ बहाइ” म ‘ ब’ क सीधी आवृ त्त; “समाजा … सब” म ‘स’ क ।

वाक्य-रचना शतवाची वाक्य — ‘न त’ (नह तो) से जुड़ा हुआ। ऐसे वाक्य म सारा भार दूसरे चरण पर पड़ता है, और यहाँ दूसरा चरण
मृत्यु क घोषणा है।

रस रौद्र प्रधान, भयानक गौण — क्रोध बोलने वाले का, भय सुनने वाल का।

नाटक य यह चौपाई मंच पर सबसे ऊँचे स्वर क चौपाई है। इसके ठ क बाद लक्ष्मण क ‘मुसकान’ आती है — सबसे धीमा भाव।
प्रभाव तुलसी ऊँचे स्वर के तुरंत बाद सबसे मुलायम भाव रखकर व ोट क तैयारी करते ह।

तुक समाजा – राजा।

अवधी क ‘जैह ह’ (जाएँगे) — अवधी का बहुवचन भ वष्यत् रूप; ‘ बलगाउ’, ‘ बहाइ’ — ‘व’ के स्थान पर ‘ब’।
वशेषता

प्र.6 “सु न मु न बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधर ह अपमाने॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — मु न परशुराम के ये वचन सुनकर लक्ष्मण मुसकराए और परशुराम का अपमान करते हुए (व्यंग्य-भरे वचन) बोले।

पद अथ

सुिन मुिन बचन मु न के वचन सुनकर

लखन लक्ष्मण

मुस ुक ाने मुसकराए

परसुध रिह परशुराम को (फरसा धारण करने वाले को)

अपमाने अपमा नत करते हुए

Page 28 of 91

Page 30

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

. com
भाव: यह पूरे पाठ का नणायक मोड़ है और अभ्यास का पाँचवाँ बहु वकल्पी प्रश्न इसी पर है। सारा भार एक शब्द
पर है — ‘मुसुकाने’। सभा म सब काँप रहे ह, राजा चुप ह, जनक नरुत्तर ह — और लक्ष्मण मुसe
s m रहे ह।
m a
gl मानता ही नह । यही
करा
o नह है; यह अस्वीकार है। इसका अथ है — म तुम्हारी धमक कोaधमक
मुसकान यहाँ.cप्रसन्नता
m
कारणsहैe क तुलसी अगले ही चरण म साफ़ लख दे ते ह — ‘अपमाने’। यानी क व यह छपाता नह क लक्ष्मण
a
gl कर रहे ह। यहाँ से क वता म व्यंग्य (वक्रो क्त) प्रवेश करता है, जो रौद्र के सामने खड़ा होकर नाटक यता
aअपमान
m
को चरम पर पहुँचा दे ता है।

. co ag
e m
शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है
g l as
a
अलंकार अनुप्रास — “सु न मु न … मुसुकाने” म ‘ न’ और ‘मु’ क आवृ त्त। ‘सु न–मु न’ क तुक-सी जोड़ी पं क्त को ग त दे ती

co m
m.
है।

m as e
.co नाटक य तनाव बनता है। g l
रस-प रवतन यहाँ रौद्र के भीतर हास्य-व्यंग्य प्रवेश करता है। दो वरोधी रस आमने-सामने आ जाते ह — इसी टकराव से क वता का

em a
a s
a glच रत्र- चत्रण एक ही क्रया — मुसकराना — से लक्ष्मण का पूरा च रत्र खुल जाता है: नभ क, आत्म व ासी, उग्र और वाक्-पटु ।

m a s
.co agl
नामकरण क क व ने यहाँ परशुराम को ‘परसुधर’ कहा है — यानी ‘फरसा धारण करने वाला’। ठ क उस क्षण, जब उन्ह मु न नह ,

m
व्यंग्य-श क्त शस्त्रधारी के रूप म दे खा जा रहा है। पुस्तक ने ‘व्याकरण क बात’ म इसी नाम-वै वध्य क ओर ध्यान ख चा है।

l a se
तुक मुसुकाने – अपमाने।
ag

co m
m .
m as e
प्र.7
.coशल्प स्पष्ट क जए।
“बहु धनुह तोर ल रकाईं। कबहुँ न अ स रस क न्ह गोसाईं॥” — इस चौपाई का पद
a g l े द, सरल अथ, भाव और

se m
g l a
a
se m

com g l a
. a
सरल अथ — (लक्ष्मण ने कहा —) हमने बचपन म बहुत-सी धनु हयाँ तोड़ी ह, पर हे गोसाईं! आपने कभी ऐसा क्रोध नह कया।
m
ase
agl
पद अथ

m
बहु धनुही ं बहुत-सी छोट धनु हयाँ ( खलौना धनुष)

. co
em
as
तोरी ं तोड़

com
.लिरकाईं a g l
m
ase
लड़कपन म, बचपन म

agl c
.
कबहु ँ न कभी नह

s e m
m a
co agl
अिस िरस ऐसा क्रोध

m .
as e
l
कया
g
कीिन्ह

गोसाईं
a
स्वामी, महाराज (यहाँ व्यंग्य म आदर-संबोधन)

co m
m .
m ase
.co


a g l Page 29 of 91

Page 31

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

भाव: यह पाठ का सबसे प्र सद्ध व्यंग्य है। लक्ष्मण एक चाल चलते ह — वे शव-धनुष का नाम ही नह लेते; उसे
‘धनुही’ यानी बच्च के खलौना-धनुष क श्रेणी म रख दे ते ह। इससे दो चोट एक साथ लगती ह। पहली — शव-
धनुष क म हमा घट जाती है, इस लए उसे तोड़ना कोई अपराध नह रह जाता। दूसरी — परशुराम का क्रोध बेतुका
सा बत हो जाता है, क्य क खलौना टू टने पर कोई इतना क्रोध नह करता। और सबसे नुक ली बात है ‘गोसाईं’ —
शब्द पूरा आदर का है, पर स्वर पूरा उपहास का। जस बात को सीधे कहा जाए तो झगड़ा हो, उसे आदर क चादर म
लपेटकर कहना — यही व्यंग्य क सबसे बड़ी कला है।

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार 1 वक्रो क्त (व्यंग्य) — कथन का ऊपरी अथ कुछ और है, आशय कुछ और। ‘गोसाईं’ का आदर-सूचक प्रयोग इसका सबसे
साफ़ प्रमाण है।

अलंकार 2 अनुप्रास — “कबहुँ न … क न्ह” म ‘क’ क , और “बहु … धनुह … तोर ” म वण-संग त।

अलंकार 3 ेष जैसी त — ‘धनुही’ शब्द म दोन अथ एक साथ चलते ह: बच्च का धनुष, और (व्यंग्य म) शव का धनुष।

रस हास्य और वीर का मेल। लक्ष्मण हँसते भी ह और चुनौती भी दे ते ह।

शब्द-रचना ‘धनुष’ से ‘धनुही’ — यह अल्पाथक (छोटा बताने वाला) रूप है, जैसे ‘टोकरी’ से ‘टोकनी’। एक ही प्रत्यय से कसी
वस्तु का महत्व घटा दे ना भाषा का बड़ा कौशल है।

तुक ल रकाईं – गोसाईं।

ग त व ध से ‘ग त व धयाँ’ क ता लका का कथन “बचपन म हमने ऐसी बहुत-सी धनु हयाँ तोड़ डाली ह।” इसी चौपाई से है और वह
जोड़ लक्ष्मण का है।

प्र.8 “ए ह धनु पर ममता के ह हेतू। सु न रसाइ कह भृगुकुलकेतू॥” — इस चौपाई का पद े द, सरल अथ, भाव और
शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — (लक्ष्मण ने आगे कहा —) इस धनुष पर इतनी ममता कस कारण है? यह सुनकर भृगुकुल के ध्वज (परशुराम)
क्रो धत होकर बोले।

Page 30 of 91

Page 32

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

पद अथ

एिह धनु पर इस धनुष पर

ममता मोह, लगाव

के िह हेत ू कस कारण

िरसाइ क्रोध करके

भगृ क
ु ु लके तू भृगुकुल का ध्वज/द पक — परशुराम

भाव: लक्ष्मण दूसरी चोट करते ह, और यह पहली से भी गहरी है। पहले उन्ह ने धनुष को छोटा बताया था; अब वे
परशुराम क भावना पर ही प्रश्न उठा दे ते ह — ‘ममता कस कारण?’ ‘ममता’ शब्द जान-बूझकर चुना गया है,
क्य क यह शब्द प्रायः माँ-बच्चे के लगाव के लए आता है। एक नज व धनुष के प्र त ऐसे लगाव क ओर संकेत
करके लक्ष्मण मु न के क्रोध को बचकाना ठहरा दे ते ह। साथ ही एक और बात है — मु न होकर कसी वस्तु से मोह
रखना, यह तो वैराग्य के वरुद्ध है। इस लए यह व्यंग्य केवल चढ़ाने वाला नह , तक-भरा भी है। दूसरे चरण म क व
‘भृगुकुलकेतू’ जैसा भव्य नाम रखकर वरोध और बढ़ा दे ता है — इतने बड़े व्य क्तत्व का इतनी छोट बात पर क्रोध।

शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार 1 रूपक — ‘भृगुकुलकेतू’ म परशुराम पर ‘केतु’ (ध्वज/द पक) का आरोप है। पुस्तक क प रभाषा — “रूप का आरोपण
करना”। यह पुस्तक के अपने उदाहरण ‘पद सरोज’ के अ त रक्त रूपक का दूसरा अ ा उदाहरण है।

अलंकार 2 वक्रो क्त (व्यंग्य) — प्रश्न पूछने के ढं ग म उपहास छपा है; उत्तर क अपेक्षा नह है।

अलंकार 3 अनुप्रास — “के ह हेतू … केतू” म ‘के/हे’ ध्व नय क आवृ त्त।

शब्द-चयन ‘ममता’ — एक कोमल, घरेलू शब्द को कठोर संदभ म रखकर व्यंग्य पैदा कया गया है।

तुक हेतू – केतू। यह तुक इतनी चुस्त है क व्यंग्य और प्रत्युत्तर एक ही साँस म बँध जाते ह।

ग त व ध से ‘ग त व धयाँ’ क ता लका का कथन “इसी धनुष पर इतनी ममता क्य !” इसी चौपाई का है और वह लक्ष्मण का है।
जोड़

प्र.9 “रे नृप बालक काल बस बोलत तो ह न सँभार। धनुही सम तपुरा र धनु ब दत सकल संसार॥” — इस दोहे का
पद े द, सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — अरे राजा के बालक! तू काल के वश म होकर बोल रहा है, तुझे अपनी सुध ही नह है। क्या त्रपुरा र ( शव) का धनुष
धनुही के समान है? उसक म हमा तो सारा संसार जानता है।

Page 31 of 91

Page 33

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

पद अथ

रे अरे — तरस्कारपूण संबोधन

नपृ बालक राजा का बालक, राजकुमार

काल बस काल (मृत्यु) के वश म होकर

तोिह न सँभार तुझे अपनी सुध-बुध नह है

धनुही सम धनुही के समान

ितपुर ािर धनु त्रपुरा र ( शव) का धनुष

िबिदत सकल संस ार सारा संसार जानता है

भाव: परशुराम अब सीधे लक्ष्मण पर उतर आते ह। ‘रे’ और ‘तो ह’ — दोन अपमानसूचक संबोधन ह; एक
राजकुमार के लए भरी सभा म इनका प्रयोग सबसे कड़ी बात है। ‘काल बस बोलत’ म तो सीधी मृत्यु-सूचना है —
जो व्य क्त मरने वाला होता है, वही ऐसी बात कहता है। और दूसरी पं क्त लक्ष्मण क ही बात लौटाकर मारती है:
तुमने शव-धनुष को ‘धनुही’ कहा? उसका महत्व तो सारा संसार जानता है। यानी परशुराम व्यंग्य का उत्तर व्यंग्य से
दे ते ह। पाठ यह समाप्त हो जाता है, पर तनाव समाप्त नह होता — पुस्तक ने पाठ के नीचे स्वयं लख दया है क
आगे यह व्यंग्यो क्तपूण संवाद और बढ़ता है, और अंततः राम क वनय तथा वश्वा मत्र के समझाने पर परशुराम का
आक्रोश शांत होता है।

शल्प का दोहे म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

छं द दोहा — 13 + 11 मात्राओं का अधसम मा त्रक छं द, चरणांत गुरु-लघु। पहला चरण ग नए —
रे(2)+नृ(1)+प(1)+बा(2)+ल(1)+क(1)+का(2)+ल(1)+ब(1)+स(1) = 13।

अलंकार 1 उपमा — ‘सम’ वाचक शब्द के साथ ‘धनुही’ उपमान और ‘ तपुरा र धनु’ उपमेय। पर यह उपमा व्यंग्य म प्रयुक्त है —
परशुराम इसे स्वीकार नह कर रहे, वे लक्ष्मण क कही उपमा को दोहराकर उसका उपहास कर रहे ह।

अलंकार 2 अनुप्रास — “बालक … बस बोलत” म ‘ब’ क तीन आवृ त्तयाँ; “सम … सकल संसार” म ‘स’ क तीन।

अलंकार 3 अ तशयो क्त — ‘ ब दत सकल संसार’ म ‘सारा संसार’ कहकर बात बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है।

रस रौद्र रस — और साथ म वीर रस क छाया, क्य क दोन पक्ष अब आमने-सामने ह।

संबोधन क पूरे पाठ म अपमान क सीढ़ दे खए — ‘जड़’ (जनक के लए) → ‘मूढ़’ (जनक के लए) → ‘रे नृप बालक’ (लक्ष्मण के
श क्त लए)। क्रोध हर बार एक पायदान ऊपर चढ़ता है।

तुक सँभार – संसार।

Page 32 of 91

Page 34

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

अथ का एक और पाठ: कुछ ट काकार दूसरी पं क्त को व्यंग्य-प्रश्न न मानकर सीधा कथन मानते ह — “क्या तुझे
शव का धनुष धनुही जैसा लगता है, जब क उसक म हमा सारा संसार जानता है?” दोन पाठ म आशय एक ही
रहता है — लक्ष्मण क तुलना का खंडन। परीक्षा म आप इनम से कोई भी अथ लख सकते ह, बस आशय स्पष्ट
कर द जए।

मेरे उत्तर मेरे तक — पृष्ठ 156 और 157
अभ्यास › रचना से संवाद › मेरे उत्तर मेरे तक

रचना से सं वाद मे रे उत्तर मे रे तक

प्र.1 नम्न ल खत प्रश्न के सट क उत्तर चु नए और यह भी बताइए क आपको ये उत्तर उपयुक्त क्य लगते ह? 1.
“ पतु समेत क ह क ह नज नामा। लगे करन सब दं ड प्रनामा॥” यह पं क्त सभा म उप त लोग क कस
मनः त को दशाती है? (क) आदर और सम्मान (ख) भ क्त और श्रद्धा (ग) भय और शष्टाचार (घ) प्रेम और
स हष्णुता

सट क उत्तर — (ग) भय और शष्टाचार।

यह उत्तर क्य उपयुक्त है: इस पं क्त को उससे ठ क पहले वाली पं क्त के साथ प ढ़ए — “दे खत भृगुप त बेषु
कराला। उठे सकल भय बकल भुआला॥” यानी राजा उठे ही भय से व्याकुल होकर थे। उसी अवस्था म वे पता के
नाम स हत अपना-अपना नाम कह-कहकर दं डवत् प्रणाम करने लगते ह। बाहर से यह क्रया पूरी तरह शष्टाचार क
है — नाम बताना, कुल बताना, साष्टांग प्रणाम करना। पर इसके पीछे का भाव भय है, श्रद्धा नह । ‘ पतु समेत’
जोड़ने का कारण भी यही है — वे यह जताना चाहते ह क हम कुलीन ह, हमसे कोई अपराध नह हुआ। और ‘क ह
क ह’ क पुनरु क्त बताती है क यह सब घबराहट म, जल्द -जल्द हो रहा था। तीसरी चौपाई इस पर मुहर लगा दे ती
है — जसे परशुराम हतैषी जानकर भी दे ख लेते, वह समझता क मानो उसक आयु ही पूरी हो आई। इस लए
इस पं क्त क मनः स्थ त ‘भय और शष्टाचार’ ही है — भीतर डर, बाहर आदर।

Page 33 of 91

Page 35

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

co m
m.
वकल्प सही / कारण

om a se
ग़लत

(क) आदर और .c ग़लत
l
agपैदा नह करता; वह शांत होता
सम्मानas
em केवल आदर होता तो ‘भय बकल’ शब्द न आते। सच्चा आदर व्याकुलता

agl
है। यहाँ राजा बैठे नह रह सके, यही बताता है क यह आदर स्वतः ू त नह था।

(ख) भ क्त और ग़लत भ क्त और श्रद्धा म मन प्रसन्न होता है, जब क यहाँ पूरी सभा म त्रास फैला है — “सोच ह सकल त्रास उर

co m
. ag
श्रद्धा भारी”। परशुराम इन राजाओं के आराध्य नह , भय का कारण ह।

se m
(ग) भय और सही ✓
म सीधे मौजूदg l a
‘भय बकल भुआला’ (भय) + ‘दं ड प्रनामा’ और ‘ पतु समेत नज नामा’ ( शष्टाचार) — दोन तत्त्व पाठ
शष्टाचार
a ह। यही एकमात्र वकल्प है जो पं क्त के दोन पक्ष को समेटता है।
(घ) प्रेम और ग़लत
co m
पूरे प्रसंग म प्रेम का कोई संकेत नह है, और स हष्णुता का तो प्रश्न ही नह उठता — राजा कुछ सह नह

e m.
स हष्णुता रहे, वे केवल स्वयं को बचा रहे ह। स हष्णुता तो आगे राम के व्यवहार म दखती है, इन राजाओं म नह ।

m l as
m .co a g
l a se
g
a प्र.2 2. “जनक बहो र आइ सरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पं क्त से राजा जनक के व्यवहार क कौन-सी

m a s
.co agl
वशेषता उ ा टत होती है? (क) संवेदनशीलता (ख) शष्टता (ग) सहनशीलता (घ) उदासीनता

se m
g l a
a

सट क उत्तर — (ख) शष्टता।

co m
m .
se
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: इस पं क्त म जनक तीन काम करते ह और तीन शष्टाचार के ह — स्वयं आना, सर

o m l a
.c तो अपने सहासन पर बैठे-बैठे स्वागत कर सकते थे। पर वे उठकर आते aह।gयही मयादा का पूरा-पूरा नवाह है
नवाना और पुत्री को बुलाकर उससे भी प्रणाम करवाना। ध्यान र खए क जनक इस सभा के राजा और मेज़बान ह;

m
aseऔर इसी को ‘ शष्टता’ कहते ह। पुत्री से प्रणाम करवाना भी उसी परंपरा का हस्सा है, जसम घर के बड़े अ त थ को
चाहते

agl
m
आशीवाद दे ने का अवसर दे ते ह — और उसका फल तुरंत मलता भी है: “आ सष द न्ह सख हरषान ।” यानी

a se
com l
जनक का व्यवहार केवल औपचा रक नह , फलदायी भी सद्ध होता है।
. a g
m
ase
agl

co m
m .
m as e
.co a g l
se m
g l a
a c
m .
m a s e
e m . co agl
g l as
a

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 34 of 91

Page 36

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

वकल्प सही / कारण
ग़लत

(क) ग़लत संवेदनशीलता का अथ है दूसर के दुख-सुख को गहराई से अनुभव करना। इस पं क्त म जनक कसी क
संवेदनशीलता भावना नह पढ़ रहे; वे अ त थ-सत्कार का नयम नभा रहे ह। संवेदनशीलता का पक्ष क वता म सुनयना
और सीता के प्रसंग म दखता है, यहाँ नह ।

(ख) शष्टता सही ✓ ‘आइ’, ‘ सरु नावा’, ‘प्रनामु करावा’ — तीन क्रयाएँ मयादा और सभ्य आचरण क ह। एक राजा का स्वयं
उठकर प्रणाम करना शष्टता क सबसे स्पष्ट पहचान है।

(ग) ग़लत सहनशीलता तब दखती जब जनक कुछ कठोर सुनकर चुप रहते। इस पं क्त तक परशुराम ने कुछ कहा ही
सहनशीलता नह है। जनक क सहनशीलता आगे दखती है — “अ त डरु उतरु दे त नृपु नाह ” — पर वह इस पं क्त
का वषय नह है।

(घ) उदासीनता ग़लत यह वकल्प तो पं क्त के ठ क उलटा है। उदासीन व्य क्त न स्वयं आता, न प्रणाम करता, न पुत्री को
बुलाता। जनक तीन काम करते ह, इस लए उदासीनता का प्रश्न ही नह उठता।

प्र.3 3. “अ त रस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्र त परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था— (क)
उ चत आदर-सत्कार न मलना (ख) जनक ारा समाचार छपाना (ग) शव-धनुष का खं डत होना (घ) अन्य
राजाओं क सभा म उप त

सट क उत्तर — (ग) शव-धनुष का खं डत होना।

यह उत्तर क्य उपयुक्त है: इसका प्रमाण ठ क पछली चौपाई म है — “सुनत बचन फ र अनत नहारे। दे खे
चापखंड म ह डारे॥” यानी क्रोध का व ोट उसी क्षण होता है जब परशुराम क दृ ष्ट धरती पर बखरे धनुष के
टु कड़ पर पड़ती है। जब तक उन्ह ने टू टा धनुष नह दे खा था, तब तक वे आशीवाद तक दे रहे थे — “द न्ह असीस
दे ख भल जोटा॥” पूरे पाठ म उनका क्रोध लगातार धनुष से ही जुड़ा रहता है — “कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा”,
“जे ह सवधनु तोरा, सहसबाहु सम सो रपु मोरा”, “धनुही सम तपुरा र धनु ब दत सकल संसार”। ‘मूल कारण’
का अथ है — जड़ म क्या है; और जड़ म शव-धनुष का खं डत होना ही है, क्य क शव उनके आराध्य ह और वह
धनुष उनके लए पूज्य है।

Page 35 of 91

Page 37

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

वकल्प सही / कारण
ग़लत

(क) उ चत आदर- ग़लत पाठ इसका ठ क उलटा कहता है। सभी राजाओं ने नाम ले-लेकर दं डवत् कया, जनक स्वयं आकर
सत्कार न मलना सर नवाकर गए, सीता ने प्रणाम कया और वश्वा मत्र ने राम-लक्ष्मण को चरण म डाल दया। आदर
म कह कोई कमी नह रही।

(ख) जनक द्वारा ग़लत जनक ने कुछ छपाया ही नह — “समाचार क ह जनक सुनाए। जे ह कारन महीप सब आए॥”
समाचार छपाना उन्ह ने पूछे जाने पर पूरी बात सच-सच बता द । क्रोध इसी सच को सुनने और टू टा धनुष दे खने के बाद
आया।

(ग) शव-धनुष का सही ✓ “दे खे चापखंड म ह डारे॥” के तुरंत बाद “अ त रस बोले बचन कठोरा” आता है — कारण और
खं डत होना प रणाम एक-दूसरे से सटे हुए ह। शव परशुराम के आराध्य ह; उनके धनुष का टू टना उनके लए
व्य क्तगत और धा मक — दोन तरह क चोट है।

(घ) अन्य राजाओं ग़लत राजाओं क उप स्थ त से परशुराम को कोई आप त्त नह है; उन्ह ने तो केवल यह पूछा था क इतनी
क सभा म भीड़ कस लए है। और जब जनक ने बता दया क स्वयंवर के कारण सब आए ह, तो उस पर उन्ह ने
उप स्थ त कोई प्र त क्रया नह द — प्र त क्रया टू टे धनुष पर द ।

प्र.4 4. राम का कथन “होइ ह केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्य क्तत्व क कस वशेषता को दशाता है? (क) कूटनी त
और चतुराई (ख) वनम्रता और मयादा (ग) त्याग और समपण (घ) दृढ़ता और आत्म व ास

सट क उत्तर — (ख) वनम्रता और मयादा।

यह उत्तर क्य उपयुक्त है: इस एक वाक्य म राम तीन काम एक साथ करते ह। पहला — वे सच स्वीकार करते ह
क धनुष टू टा है; झूठ नह बोलते। दूसरा — वे अपना नाम नह लेते, कहते ह ‘केउ एक’ — कोई एक। तीसरा —
जसे भी तोड़ने वाला बताते ह, उसे ‘दास तुम्हारा’ बताते ह, यानी स्वयं को परशुराम से नीचे रखते ह। साथ ही वे उन्ह
‘नाथ’ कहकर संबो धत करते ह — सामने वाले को ऊपर उठाना और स्वयं को नीचे रखना, यही वनम्रता है। और
अगली ही पं क्त म वे कहते ह — “आयसु काह क हअ कन मोही” यानी ‘आपक आज्ञा क्या है, मुझसे क्य नह
कहते?’ बड़ से आज्ञा माँगना मयादा है। पुस्तक क ‘ वषय से संवाद’ वाली टप्पणी भी यही कहती है क परशुराम
के प्र त राम के व्यवहार से उनक वनम्रता, मयादा, धीर और उदात्त च रत्र का पता चलता है।

Page 36 of 91

Page 38

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

वकल्प सही / कारण
ग़लत

(क) कूटनी त और ग़लत कूटनी त म सत्य छपाया जाता है और अपना लाभ साधा जाता है। राम सत्य छपाते नह — वे स्वीकार
चतुराई कर लेते ह क धनुष टू ट चुका है और तुरंत स्वयं को प्रस्तुत भी कर दे ते ह (‘मुझसे क्य नह कहते’)। यह
चतुराई नह , शालीनता है।

(ख) वनम्रता सही ✓ ‘नाथ’ (आदर), ‘दास तुम्हारा’ (स्वयं को नीचे रखना), अपना नाम न लेना, और आज्ञा माँगना — चार
और मयादा प्रमाण एक साथ इसी वकल्प क ओर जाते ह।

(ग) त्याग और ग़लत त्याग का अथ है अपना कुछ छोड़ना और समपण का अथ है स्वयं को स प दे ना। यहाँ राम कुछ त्याग
समपण नह रहे, न ही आत्म-समपण कर रहे ह। वे केवल बात कहने का शालीन ढं ग चुन रहे ह।

(घ) दृढ़ता और ग़लत राम म ये गुण अवश्य ह — “हृदयँ न हरषु बषादु कछु ” उसी का प्रमाण है — पर इस वशेष कथन म
आत्म वश्वास वे प्रकट नह होते। दृढ़ता का स्वर तो लक्ष्मण के उत्तर म सुनाई दे ता है। प्रश्न इसी कथन के बारे म है,
इस लए उत्तर वही होगा जो कथन के शब्द से सद्ध हो।

प्र.5 5. “सु न मु न बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधर ह अपमाने॥” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचन
का क्या कारण था? (क) वे सभा म अपनी श्रेष्ठता सद्ध करना चाहते थे। (ख) उन्ह राम के प्र त अपना प्रेम
प्रद शत करना था। (ग) वे परशुराम क श क्त से अन भज्ञ थे। (घ) वे परशुराम को चुनौती दे ना चाहते थे।

सट क उत्तर — (घ) वे परशुराम को चुनौती दे ना चाहते थे।

यह उत्तर क्य उपयुक्त है: लक्ष्मण ठ क उस समय बोलते ह जब परशुराम धमक दे चुके होते ह — “सो बलगाउ
बहाइ समाजा। न त मारे जैह ह सब राजा॥” यानी तोड़ने वाला सामने आ जाए, नह तो सब राजा मारे जाएँगे। इस
धमक को लक्ष्मण स्वीकार नह करते, और अस्वीकार का पहला संकेत उनक मुसकान है। सारी सभा काँप रही है,
जनक नरुत्तर ह — और लक्ष्मण मुसकरा रहे ह। मुसकान का यहाँ एक ही अथ है: ‘म तुम्हारी धमक को धमक
मानता ही नह ।’ फर वे शव-धनुष को ‘धनुही’ बताकर उसका महत्व घटा दे ते ह और पूछते ह ‘ए ह धनु पर ममता
के ह हेतू’ — यानी क्रोध का आधार ही खोखला बता दे ते ह। क व स्वयं लख दे ता है — ‘अपमाने’। पुस्तक क
‘क वता का स दय’ वाली भू मका भी यही कहती है क “परशुराम के रोष भरे वाक्य का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचन
से दे ते ह” — और उत्तर दे ना ही यहाँ चुनौती दे ना है। इसक पु ष्ट परशुराम क प्र त क्रया से भी होती है: वे इसे चुनौती
ही समझते ह और तुरंत मृत्यु क चेतावनी दे ते ह — “रे नृप बालक काल बस बोलत तो ह न सँभार।”

Page 37 of 91

Page 39

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

वकल्प सही / कारण
ग़लत

(क) वे सभा म ग़लत लक्ष्मण अपने बारे म एक शब्द नह कहते। उनका पूरा कथन दूसरे पक्ष पर क द्रत है — धनुष का महत्व
अपनी श्रेष्ठता सद्ध और परशुराम क ‘ममता’। ‘बहु धनुह तोर ’ म भी वे ‘मने’ नह , ‘हमने’ कहते ह, यानी दोन भाइय क
करना चाहते थे। बात करते ह। आत्म-प्रदशन का कोई संकेत नह है।

(ख) उन्ह राम के ग़लत भ्रातृ-प्रेम उनके भीतर अवश्य है और वही उन्ह साहस दे ता है — पर प्रदशन उनका उ े श्य नह है। प्रेम
प्र त अपना प्रेम दखाना होता तो वे राम क प्रशंसा करते या उनका बचाव करते। वे इसके बजाय सीधे परशुराम के तक
प्रद शत करना था। पर चोट करते ह। प्रेम कारण क पृष्ठभू म है, पर तात्का लक कारण चुनौती ही है।

(ग) वे परशुराम क ग़लत यह वकल्प सबसे भ्रामक है, पर पाठ इसे काट दे ता है। लक्ष्मण उन्ह ‘गोसाईं’ कहकर संबो धत करते ह
श क्त से अन भज्ञ — यानी वे जानते ह क सामने कोई साधारण व्य क्त नह है। य द वे अनजान होते तो ‘कबहुँ न अ स
थे। रस क न्ह’ जैसी बात न कह पाते, जसम परशुराम के प्र सद्ध क्रोधी स्वभाव क ओर संकेत है। वे सब
जानते ह और जानते हुए बोलते ह — यही उनक नभ कता है।

(घ) वे परशुराम सही ✓ धमक के तुरंत बाद मुसकान, फर धनुष को ‘धनुही’ कहकर उसका महत्व गराना, फर ‘ममता’ पर
को चुनौती दे ना प्रश्न — यह क्रम स्पष्ट चुनौती का है। क व का अपना शब्द ‘अपमाने’ और परशुराम क प्र त क्रया ‘रे
चाहते थे। नृप बालक’ दोन इसे प्रमा णत करते ह।

ध्यान द जए: ‘मुसकराना’ इस पाठ का सबसे अथपूण शब्द है। सो चए — य द लक्ष्मण क्रोध म चल्लाकर बोलते,
तो वह केवल एक और क्रोधी आवाज़ होती। मुसकराकर बोलने से उनका उत्तर अ धक तीखा हो जाता है, क्य क
उसम भय का पूण अभाव दखाई दे ता है।

मेरी समझ मेरे वचार — पृष्ठ 157
अभ्यास › रचना से संवाद › मेरी समझ मेरे वचार

रचना से सं वाद चचा

प्र.1 1. “अरध नमेष कलप सम बीता” पं क्त का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए क क वता म यह कसके संदभ म कहा
गया है और क्य ?

यह पं क्त सीता के संदभ म कही गई है। पूरी चौपाई है — “भृगुप त कर सुभाउ सु न सीता। अरध नमेष कलप सम बीता॥” अथात्
परशुराम के क्रोधी स्वभाव के बारे म सुनकर सीता को आधा क्षण भी एक कल्प के समान लंबा बीत रहा था।
भाव —

समय का माप बदल जाना। ‘अरध नमेष’ का अथ है आधा पल — पलक झपकने का आधा समय। और ‘कलप’ का अथ है
ब्रह्मा का एक दन, जो पुस्तक क शब्द-संपदा के अनुसार एक हज़ार महायुग यानी लगभग 4 अरब 32 करोड़ मानव-वष
होता है। क व इन दो छोर को आमने-सामने रखकर बताता है क चता म डू बे मन के लए समय अपनी असली लंबाई खो दे ता
है।
भय का वणन नह , भय का प्रभाव। तुलसी यह नह लखते क सीता डर गईं। वे केवल इतना बताते ह क उन्ह समय कैसा
लग रहा था — और इसी से डर क गहराई अपने आप स्पष्ट हो जाती है। यही अ े क व का ढं ग है।

Page 38 of 91

Page 40

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

प्रतीक्षा क पीड़ा। सीता कुछ कर नह सकत । वे न बोल सकती ह, न सभा म हस्तक्षेप कर सकती ह। उनके पास केवल
co m
प्रतीक्षा बची है, और प्रतीक्षा ही समय को सबसे लंबा बनाती है।
e m.
m l as
m .co
यह सीता के संदभ म क्य कहा गया — तीन कारण
a g
l a se
g
1. धनुष राम ने तोड़ा है और परशुराम तोड़ने वाले को शत्रु घो षत कर चुके ह। “सुनहु राम जे ह सवधनु तोरा। सहसबाहु सम
a सो रपु मोरा॥” — सीता जानती ह क यह क्रोध कस दशा म मुड़ने वाला है।

com
2. सीता मन-ही-मन राम का वरण कर चुक ह। इसी लए उनका भय अपने लए नह है; वह प्रेम से उपजा भय है। जसके लए

. ag
हम च तत होते ह, उसी क प्रतीक्षा सबसे लंबी लगती है।
‘सुm
3. परशुराम क ख्या त पहले से डरावनी है। पं क्त म e
a s
aglवह देखे हुए भय से कह बड़ा हो जाता है।
भाउ सु न’ शब्द ह — यानी सीता ने उनका क्रोध दे खा नह , उसके बारे
म सुना है। जस भय क कल्पना कर ली जाए,

. c om
शल्प: यहाँ अ तशयो क्त अलंकार है — यही पुस्तक का अपना उदाहरण भी है (पृष्ठ 161), जहाँ अ तशयो क्त

s e mयहाँ उपमा भी है
a — “सुभाउ सु न सीता”
का अथ दया गया है “बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना”। साथ ही ‘सम’ वाचक शब्द होने के कारण
— उपमेय o m नमेष’, उपमान ‘कलप’, साधारण धम ‘लंबा लगना’। अनुप्रास भी gदे lखए
c ‘अरध
. a
a s emक तीन आवृ त्तयाँ।
l
म ‘स’

ag
m a s
.co agl
अपने अनुभव से जो ड़ए: परीक्षा-प रणाम क प्रतीक्षा म या अस्पताल के बाहर बैठे हुए एक-एक मनट कतना

se m
लंबा लगता है — तुलसी ठ क इसी अनुभव को पाँच सौ साल पहले शब्द दे गए ह। इसी लए यह पं क्त आज भी
उतनी ही सच्ची लगती है।
g l a
a

co m
m .
प्र.2
ase
2. “सो बलगाउ बहाइ समाजा। न त मारे जैह ह सब राजा॥” पं क्त के आधार पर बताइए क परशुराम ारा द
m
.co
गई इस चेतावनी का सभा म उप
a g l
त राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तक स हत उत्तर द जए।

a s em
a gl उत्तर
संदभ — परशुराम शव-धनुष के टु कड़े दे ख चुके ह, जनक को ‘जड़’ और ‘मूढ़’ कह चुके ह और अब वे घोषणा करते ह — तोड़ने
se m
com g l a
. a
वाला इस सभा को छोड़कर अलग हो जाए, नह तो यहाँ बैठे सब राजा मारे जाएँगे। ध्यान द जए, दं ड अपराधी को नह , पूरे समाज
m
ase
को दया जा रहा है। इसी बनावट से इस चेतावनी का सारा प्रभाव नकलता है।
प्रभाव — तक स हत
agl
1. भय का चरम पर पहुँच जाना। इसका प्रमाण क वता म ही है — “सुर मु न नाग नगर नर नारी। सोच ह सकल त्रास उर

. c om
भारी॥” जब दे वता और मु न तक भयभीत ह, तो साधारण राजाओं क दशा का अनुमान सहज है। जो लोग पहले ही परशुराम

s e mगुना पड़ा होगा।
2.cपूoणm la ही चुप ह — “अ त डरु उतरु देत नृपु
को दे खकर ‘भय बकल’ होकर उठ खड़े हुए थे, उन पर मृत्यु क सीधी घोषणा का असर कई
मौन और न ष्क्रयता। चेतावनी के बाद सभा म से कोई नह बोलता। जनकgपहले
. a
a s em नाह ।” कोई राजा न सत्य बताता है, न राम के पक्ष म खड़ा होता है। सामू हक दं ड क धमक का यही सबसे बड़ा असर
agl होता है — वह लोग क आवाज़ छ न लेती है।
c
m .
s e
3. अपराधी पर सामा जक दबाव। यह धमक बहुत चतुराई से बनाई गई है। अब हर राजा चाहेगा क तोड़ने वाला जल्द सामने
m a
. co agl
आ जाए, ता क उसक अपनी जान बचे। इस तरह परशुराम ने एक ही वाक्य से पूरी सभा को अपने पक्ष म दबाव बनाने वाला

e m
as
यंत्र बना लया।

a g l

co m
m .
m ase
.co


a g l Page 39 of 91

Page 41

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

4. भीतर छपी ईष्या का और बढ़ जाना। क वता पहले ही बता चुक है — “कु टल भूप हरषे मन माह ॥” ये वही राजा ह जो
स्वयं धनुष नह उठा पाए थे। उनके लए यह चेतावनी दोहरी थी — डर भी और भीतर-भीतर संतोष भी क जसने धनुष तोड़कर
उन्ह पीछे छोड़ा था, अब वही संकट म है।
5. राम पर संदेह क दृ ष्ट जाना। सभा जानती है क धनुष राम ने तोड़ा है। इस लए चेतावनी के बाद सबक दृ ष्ट अनायास राम क
ओर मुड़ गई होगी। यही कारण है क अगले ही दोहे म राम ‘सभय बलोके लोग सब’ — सबको भयभीत दे खते ह और स्वयं
उत्तर दे ने के लए आगे आते ह।
6. सभा का नै तक साहस टू ट जाना। यह सबसे महत्वपूण प्रभाव है। एक भी राजा यह नह कहता क ‘ नद ष को दं ड क्य ?’
पूरा राज-समाज केवल अपनी जान बचाने क सोचता है। तुलसी बना एक भी टप्पणी कए दखा दे ते ह क भय के सामने
समूह कतनी जल्द झुक जाता है — और उसी पृष्ठभू म म अकेले लक्ष्मण का बोल पड़ना और भी बड़ा लगने लगता है।

नष्कष: इस चेतावनी ने सभा को तीन हस्स म बाँट दया — डरकर चुप हो जाने वाले (जनक और अ धकांश
राजा), भीतर-भीतर प्रसन्न होने वाले (कु टल भूप) और सामने आकर उत्तर दे ने वाले (राम, और फर लक्ष्मण)। इससे
स्पष्ट होता है क संकट कसी समाज का असली च रत्र उघाड़ दे ता है — जो साधारण दन म सब एक जैसे दखते
ह, वे क ठन क्षण म अलग-अलग खड़े हो जाते ह।

तक लखने का ढं ग: ऐसे प्रश्न म केवल ‘सब डर गए ह गे’ लख दे ना अधूरा उत्तर है। हर प्रभाव के साथ क वता क
एक पं क्त प्रमाण के रूप म द जए — जैसे भय के लए ‘त्रास उर भारी’, मौन के लए ‘उतरु दे त नृपु नाह ’, ईष्या
के लए ‘कु टल भूप हरषे मन माह ’। प्रमाण के बना दया गया तक केवल अनुमान रह जाता है।

प्र.3 3. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही प र त के प्र त दो अलग-अलग प्र त क्रयाएँ दखाई ह।
आपक दृ ष्ट म परशुराम के क्रोध को शांत करने के लए राम का ‘ वनय’ का माग उ चत है या लक्ष्मण के ‘तक’
का? अपने उत्तर का उ चत कारण और तक भी प्रस्तुत क जए।

मेरा मत — परशुराम जैसे अत्यंत क्रो धत व्य क्त का क्रोध शांत करने के लए राम का ‘ वनय’ का माग ही अ धक उ चत है।
लक्ष्मण का ‘तक’ साहसपूण और सच्चा है, पर उस क्षण वह क्रोध को शांत नह करता — बढ़ा दे ता है। नीचे दोन पक्ष रखकर यह
नष्कष सद्ध कया गया है।
क — दोन माग आमने-सामने

Page 40 of 91

Page 42

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

तुलना का राम का ‘ वनय’ लक्ष्मण का ‘तक’
आधार

पाठ क पं क्त “नाथ संभुधनु भंज नहारा। होइ ह केउ एक दास तुम्हारा॥ “बहु धनुही ं तोरी ं लिरकाईं। कबहु ँ न अिस िरस कीिन्ह
आयसु काह क हअ कन मोही।” गोसाईं॥ एिह धनु पर ममता के िह हेत।ू ”

स्वर शांत, शालीन, आदरपूण — ‘नाथ’, ‘दास’, ‘आयसु’। मुस कराहट के साथ उपहास — किव स्वयं कहता है
‘अपमाने’।

सामने वाले पर क्रोध का लक्ष्य बखर जाता है; परशुराम को सीधा उत्तर दे ना क्रोध तुरंत भड़ क उठता है — “रे नपृ बालक काल बस
असर पड़ता है, अपमान का बहाना नह मलता। बोलत तोिह न सँभार।”

तात्का लक संवाद चलता रहता है, कोई अनथ नह होता। बात मृत्यु की धमकी तक पहचु ँ जाती है और तनाव और
प रणाम बढ़ जाता है।

गुण धैय, मयादा, आत्मसंयम, दूरद शता। िनभ कता, स्वािभमान, वाक् -पटुता, अन्याय के िवरुद्ध
खड़ े होने का साहस।

ख — वनय का माग क्य अ धक उ चत है

1. क्रोध को ईंधन नह मलता। क्रोध तभी बढ़ता है जब सामने से प्र तरोध मले। राम प्र तरोध दे ते ही नह ; वे ‘नाथ’ कहकर,
स्वयं को ‘दास’ बताकर परशुराम के क्रोध को टकने के लए जगह ही नह दे ते। यह वही सद्धांत है जो लोक म कहा जाता है —
नरमी से गाँठ खुल जाती है, ख चने से और कस जाती है।
2. पाठ का प्रमाण। क वता के नीचे पुस्तक ने स्वयं लख दया है — “अंततः राम के वनय और व ा मत्र के समझाने पर तथा
राम क श क्त क परीक्षा लेकर परशुराम का आक्रोश शांत होता है।” यानी कथा स्वयं बता दे ती है क अंत म काम कस माग ने
कया। लक्ष्मण के तक से आक्रोश शांत नह हुआ था।
3. वनय म सत्य का त्याग नह है। यह ध्यान रखना ज़रूरी है क राम झूठ नह बोलते। वे स्वीकार करते ह क धनुष टू ट चुका है
और फर स्वयं को प्रस्तुत भी कर दे ते ह — “मुझसे क्य नह कहते?” यानी वनय यहाँ कायरता नह , संयम है। सत्य वही है,
केवल कहने का ढं ग शालीन है।
4. प रणाम क ज़म्मेदारी। उस सभा म सीता, सुनयना, जनक, ऋ ष वश्वा मत्र और सैकड़ नाग रक बैठे थे, और परशुराम
धमक दे चुके थे क सब राजा मारे जाएँगे। ऐसी स्थ त म टकराव का जो खम केवल अपना नह होता। राम यह जानते ह,
इसी लए वे उत्तेजना नह फैलाते।
5. बड़ के प्र त मयादा। परशुराम आयु म, तप म और सामा जक स्थान म बड़े ह। भारतीय जीवन-दृ ष्ट म बड़ से असहम त भी
मयादा के भीतर रहकर प्रकट क जाती है। राम इसी परंपरा का पालन करते ह।

ग — पर लक्ष्मण का पक्ष भी नरथक नह

लक्ष्मण जो कह रहे ह, वह सच है — नद ष राजाओं को मारने क धमक अन्याय ही है, और कसी वस्तु के टू ट जाने पर इतना
क्रोध उ चत नह । पुस्तक ने ‘ग त व धयाँ’ म जो वषय दया है — “क ठन प र तय म भी सत्य कहने का साहस करना
आवश्यक है” — वह ठ क लक्ष्मण के पक्ष म जाता है।
य द हर बार केवल झुककर बात क जाए, तो अन्याय करने वाले का साहस बढ़ता जाता है। इस लए तक और असहम त का
ान जीवन म हमेशा रहना चा हए।
लक्ष्मण क उप स्थ त से क वता म नाटक यता और च रत्र क व वधता आती है। य द सब राम जैसे होते, तो न संवाद बनता, न
संघष।

Page 41 of 91

Page 43

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

अं तम नष्कष: प्रश्न यह नह है क वनय अ ा है या तक; प्रश्न यह है क कस क्षण क्या काम करेगा। जब
सामने वाला क्रोध के चरम पर हो, तब तक सुनाई ही नह दे ता — वह केवल चुनौती लगता है। इस लए पहले वनय
से क्रोध क आग बुझाइए, तक बाद म र खए। यही राम करते ह। और यही व्यवहार पुस्तक के अनुसार “ कसी भी
कुशल शासक के लए आवश्यक” है। तक का समय तब आता है जब सुनने वाला सुनने क स्थ त म हो — इसी लए
मेरी दृ ष्ट म वनय का माग उ चत है, बशत वह सत्य को छोड़कर न कया जाए।

दूसरा पक्ष भी लखा जा सकता है: य द कोई वद्याथ लक्ष्मण के पक्ष म लखना चाहे, तो उसे यह सद्ध करना
होगा क — (1) अन्याय के आगे चुप रहना उसे बढ़ावा दे ता है, (2) लक्ष्मण ने कोई झूठ नह कहा, और (3) उनके
कारण ही सभा का भय टू टा। ऐसा उत्तर भी स्वीकाय है, बशत हर बदु के साथ क वता क पं क्त प्रमाण के रूप म द
जाए। ऐसे प्रश्न म ‘सही उत्तर’ नह , ‘ सद्ध कया गया उत्तर’ माँगा जाता है।

प्र.4 4. ‘हृदयँ न हरषु बषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥’ श्री राम के हृदय म न हष था, न वषाद। यह उनके व्य क्तत्व के
कन गुण को दशाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ म उन्ह अन्य पात्र से अलग कैसे ा पत करता
है?

इस अधाली म राम क रबु द्ध का चत्र है। पूरा दोहा है — “सभय बलोके लोग सब जा न जानक भीरु। हृदयँ न हरषु बषादु
कछु बोले श्रीरघुबीरु॥” ध्यान द जए, राम अनजान नह ह — वे सब लोग को भयभीत दे ख रहे ह और सीता को डरी हुई जान भी
रहे ह। फर भी उनके हृदय म न हष है, न वषाद। यह उदासीनता नह , समभाव है।
क — कौन-कौन से गुण प्रकट होते ह

Page 42 of 91

Page 44

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

गुण पाठ म कहाँ दखता है व्याख्या

समभाव / रबु द्ध “हृदयँ न हरषु बषादु कछु ” सुख और दुख — दोनों में एक -सा बने रहना। हष होता तो वे धनुष तोड़ ने का श्रेय
ले ते; िवषाद होता तो घबरा जाते। दोनों न होने से ही वे स्पष्ट सोच पाते है।ं

आत्मसंयम “नाथ संभुधनु भंज नहारा…” इतने अपमानजनक वातावरण में भी स्वर ऊँ चा नही ं होता। जो अपने भीतर संयत
है, वही बाहर संयत बोल सकता है।

वनम्रता “होइ ह केउ एक दास अपना नाम तक न ले ना और स्वयं को ‘दास ’ कहना। यह िवनमता संतलु न से ही
तुम्हारा” जन्मती है — घबराया हुआ या घमंडी व्यिक्त इतना संयत नही ं रह सकता।

मयादा “आयसु काह क हअ कन बड़ ों से आज्ञा माँगना और असहमित में भी संबोधन ‘नाथ’ ही रखना।
मोही।”

संवेदनशीलता “सभय बलोके लोग सब संतलु न का अथ भावनाहीन होना नही ं है। राम सबका भय दे खते है ं और सीता का
जा न जानक भीरु” भय तो िबना कहे ही जान ले ते है।ं वे संवेद नशील भी है ं और संयत भी।

धैय और दूरद शता पूरे प्रसंग म उत्तर दे ने का ढं ग वे जानते है ं िक उ त्ते जना से बात िबगड़ ेगी। इसिलए वे समय को अपने पक्ष में काम
करने दे ते है ं — और अंततः यही माग परशुराम का आक्रोश शांत करता है।

उदात्तता (धीरोदात्त पूरा पाठ जो नायक िवपित्त में भी अपना धै य और शील न छोड़ े, उसे काव्यशास्त्र में
नायकत्व) धीरोदात्त नायक कहा जाता है। राम इसी कोिट के नायक है।ं

ख — यह संतुलन उन्ह दूसर से अलग कैसे कर दे ता है
इस पाठ क सबसे बड़ी खूबी यह है क यहाँ हर पात्र कसी एक भाव का प्र त न ध बन गया है, और राम अकेले ह जनके पास कोई
‘उछलता हुआ’ भाव नह है। नीचे क ता लका इसी अंतर को दखाती है —

पात्र उस क्षण क मनः त प्रमाण-पं क्त

परशुराम क्रोध, आवेश, अहंकार “अ त रस बोले बचन कठोरा।”

राजा जनक भय और असहायता “अ त डरु उतरु दे त नृपु नाह ।”

सभा के अन्य राजा भय, और भीतर ईष्या-भरी प्रसन्नता “कु टल भूप हरषे मन माह ॥”

सुनयना चता और पश्चात्ताप “ ब ध अब सँवरी बात बगारी॥”

सीता व्यग्रता, प्रतीक्षा क पीड़ा “अरध नमेष कलप सम बीता॥”

लक्ष्मण उग्रता, उपहास, स्वा भमान “बोले परसुधर ह अपमाने॥”

राम न हष, न िवषाद — पूण संतलु न “हृ दयँ न हरषु िबषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥ ”

Page 43 of 91

Page 45

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

.
नष्कष: ता लका दे खए — सारे पात्र कसी न कसी भाव म बह रहे ह, केवल राम स्थर ह। इसी स्थरता के कारण
com
वे पूरे प्रसंग के कद्र बन जाते ह। जस सभा म राजा उठ खड़े हुए, जनक नरुत्तर हो गए और लक्ष्मeणmभड़क उठे , वहाँ
केवल राम ही.cऐसा omउत्तर दे पाते ह जो न झूठा है, न उत्तेजक। तुलसीदास के लए राम ‘मानवीय
g l asमयादाओं और
m a
आदशseके प्रतीक’ ह, और यह दोहा उसी आदश का सबसे छोटा और सबसे पूरा प्रमाण है। यही कारण है क पुस्तक
la से संवाद’ म कहती है क राम के इस व्यवहार से जो गुण दखते ह, वे कसी भी कुशल शासक के लए
a‘gवषय
m
आवश्यक ह — क्य क शासक का नणय तभी सही होता है जब वह भावनाओं के बहाव म न बहे।

. co ag
e m
g l as
मेरी कल्पना मेरे अनुमान — पृष्ठ 157 a
अभ्यास › रचना से संवाद › मेरी कल्पना मेरे अनुमान
co m
e m.
m l as
.co
रचना से सं वाद कल्पना

a g
a s em1. कल्पना क जए क आप जनक क सभा म उप
a gl प्र.1
गमन तक क कथा अपने शब्द म ल खए।
त एक राजा ह। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके

m a s
m .co agl
se

g l a
a
यह कल्पना पर आधा रत आत्मकथात्मक लेखन है। इसम ‘म’ बोलेगा, इस लए वाक्य उत्तम पुरुष म ह गे और वही बात आएँगी
जो सभा म बैठे एक राजा को दखाई-सुनाई दे सकती थ ।

o m
अ े उत्तर म क्या-क्या होना चा हए —
. c
घटना-क्रम वही रहे जो क वता म है — परशुराम का आगमन, राजाओं का भय, जनक-सीता का
s e mप्रणाम, वश्वा मत्र का
. c
प रचय, omटूटा धनुष देखना, क्रोध, धमक , राम का उत्तर, लक्ष्मण का व्यंग्य। a g la
a em
s यही इस प्रश्न क असली माँग है।
पूरी कथा एक साधारण राजा क आँख से दखे — यानी उसे भी डर लगे, वह भी चुप रहे, उसे भी अपनी जान क चता हो।

agl
se m
बीच-बीच म क वता क पं क्तयाँ उद्धत क जाएँ, ता क लेखन पाठ से जुड़ा रहे।

com g l a
.
अंत म परशुराम का जाना भी आए। पाठ का अंश यहाँ समाप्त नह होता, इस लए पाठ के नीचे द गई पुस्तक क टप्पणी का

m a
ase
सहारा लेना होगा — “अंततः राम के वनय और वश्वा मत्र के समझाने पर तथा राम क श क्त क परीक्षा लेकर परशुराम का

agl
आक्रोश शांत होता है।”
अंत म एक-दो वाक्य का अपना नष्कष हो — उस राजा ने उस दन क्या सीखा।

नमूना उत्तर:
co m
m .
m
उस दन जनक क सभा म — एक राजा क ज़बानी
as e
.co a g l
emको वश्वास था क शव-धनुष उसी के हाथ उठे गा। पर धनुष हला तक नह । हम सब अपनी-अपनी जगह लौट आए थे — कुछ
वह दन म जीवन-भर नह भूल सकता। म थला क सभा सजी हुई थी। हम अनेक दे श के राजा वहाँ आए थे और हम म से हर एक

a s
agl ल त, कुछ चढ़े हुए। तभी दशरथ-कुमार राम ने वह धनुष उठाया और उसे भंग कर दया। सभा म हष क लहर दौड़ी, पर सच
.c
क ँ तो मेरे मन म उस समय भी एक काँटा चुभ रहा था।
s e m
. c om a g la
कुछ ही दे र बाद द्वार पर हलचल हुई। सामने जो आकृ त खड़ी थी, उसे दे खकर मेरा रक्त जम-सा गया — जटाजूट, तनी हुई भ ह,
कंधे पर फरसा। भृगुकुल के स्वामी परशुराम!m
s e
laबकल भुआला॥” मने भी अपने पता का नाम लेकर अपना प रचय दया और दंडवत्
उनका वेष इतना भयानक था क हम सब अपने-आप उठ खड़े हुए — “दे खत

a
भृगुप त बेषु कराला। उठे सकल भय
g
कया। उन्ह ने मेरी ओर एक बार दे खा — बस एक बार — और मुझे लगा जैसे मेरी आयु वह समाप्त हो गई हो।

com
m .
m ase
.co


a g l Page 44 of 91

Page 46

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

महाराज जनक स्वयं आगे आए, सर नवाया और सीता को बुलाकर प्रणाम करवाया। मु न ने आशीवाद दया। फर वश्वा मत्र जी
आए और उन्ह ने राम-लक्ष्मण को उनके चरण म झुका दया। परशुराम जी ने दोन भाइय क जोड़ी दे खी और प्रसन्न होकर
आशीवाद दे दया। मने दे खा, राम को दे खते हुए उनक आँख वह ठहर गईं। उस समय मुझे लगा क सब कुछ शां त से बीत जाएगा।
पर वह शां त क्षण-भर क थी। उन्ह ने महाराज जनक से पूछा क यह इतनी भीड़ कस लए है। महाराज ने सारा समाचार सुना दया।
बात सुनते ही मु न मुड़े, और उनक दृ ष्ट धरती पर बखरे धनुष के टु कड़ पर पड़ी। मने अपने जीवन म कसी के चेहरे का रंग इतनी
तेज़ी से बदलते नह दे खा। वे गरजे — “कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” और फर — “बे ग दे खाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ
म ह जहँ ल ह तव राजू॥”
महाराज जनक जैसे वद्वान और शांत राजा भी उस क्षण एक शब्द नह बोल सके। और मुझे स्वीकार करने म संकोच नह क हम
राजाओं म से कुछ के मन म उस समय एक कु टल-सा संतोष भी उठा — जो हमसे न हुआ, वह करने वाले पर अब आफ़त आई है।
पर वह संतोष टका नह । मु न ने घोषणा कर द क तोड़ने वाला अलग हो जाए, नह तो सब राजा मारे जाएँगे। मेरे हाथ-पैर ठं डे
पड़ गए। पूरी सभा म, नगर म, मानो दे वताओं और मु नय तक म एक ही भय दौड़ गया।
उस भरी सभा म एक ही व्य क्त था जसके चेहरे पर कोई प रवतन नह आया — राम। उन्ह ने सबको दे खा, सीता को भी दे खा, और
फर अत्यंत शांत स्वर म कहा — “नाथ संभुधनु भंज नहारा। होइ ह केउ एक दास तुम्हारा॥ आयसु काह क हअ कन मोही।”
म सोचता रह गया क जो धनुष उन्ह ने स्वयं तोड़ा था, उसके लए वे स्वयं को ‘दास’ कह रहे थे।
तभी लक्ष्मण मुसकराए। भरी सभा म, जहाँ सब काँप रहे थे, वह मुसकान बजली क तरह गरी। उन्ह ने कहा — “बहु धनुह तोर
ल रकाईं। कबहुँ न अ स रस क न्ह गोसाईं॥ ए ह धनु पर ममता के ह हेतू।” उस क्षण मुझे उन पर क्रोध भी आया और भीतर-
ही-भीतर उनका साहस भी अ ा लगा — जो बात हम म से कोई नह कह सका, वह उस कशोर ने कह द । परशुराम जी भड़क उठे
— “रे नृप बालक काल बस बोलत तो ह न सँभार।”
इसके बाद दे र तक दोन के बीच वचन क वषा होती रही। लक्ष्मण हर बार व्यंग्य करते और मु न हर बार फरसा उठाते। पर बीच-बीच
म राम बोलते और उनका एक-एक शब्द ठं डे जल क तरह पड़ता। अंततः राम के वनय और वश्वा मत्र जी के समझाने से बात
सँभली, और जब मु न ने राम क श क्त क परीक्षा ली तो उनका सारा आक्रोश शांत हो गया। वे राम को आशीवाद दे कर तपोवन क
ओर चल दए। जाते समय उनका चेहरा वैसा ही तेजस्वी था, पर उसम अब कोई कठोरता नह थी।
सभा म साँस लौट । पर म उस रात सो नह सका। मने सोचा — उस दन तीन तरह के लोग वहाँ थे। एक वे जो डर से चुप रह गए
(उनम म भी था), दूसरे वे जो सच बोलने का साहस कर बैठे, और तीसरे वे जन्ह ने बना ऊँचा बोले सब सँभाल लया। और मने उसी
दन जाना क सबसे बड़ा बल तलवार म नह , संयत वाणी म होता है।

लखते समय ध्यान र खए: ‘म’ को कहानी का नायक मत बनाइए। आप एक दशक ह — आपक भू मका दे खना,
डरना और अंत म कुछ सीखना है। यही इस प्रश्न को रोचक बनाता है।

प्र.2 2. “अ त डरु उतरु दे त नृपु नाह । कु टल भूप हरषे मन माह ॥” जनक ारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन म
प्रसन्न क्य हुए ह गे? (संकेत– सो चए, यह मनुष्य के व्यवहार क कस स ाई को उजागर करता है?)

तुलसीदास ने इन राजाओं के लए एक ही वशेषण दया है — ‘कु टल’, यानी टे ढ़े मन वाले। उनक यह प्रसन्नता कसी अ बात
पर नह थी; वह दूसरे के संकट पर थी। इसके पीछे कई कारण हो सकते ह —
क — प्रसन्न होने के संभा वत कारण

1. स्वयंवर म हुए अपमान का बदला-सा लगना। ये वही राजा ह जो शव-धनुष हला तक नह सके थे और भरी सभा म ल त
हुए थे। अब जस राजा ने वह शत रखी थी, वही राजा नरुत्तर खड़ा है। उन्ह लगा क हमारे अपमान का हसाब अपने आप
बराबर हो रहा है।

Page 45 of 91

Page 47

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

2. राम से ईष्या। जो काम वे नह कर सके, वह राम ने कर दखाया और सीता का वरण भी उन्ह को मलने जा रहा था। अब
परशुराम उसी धनुष-भंग को अपराध बता रहे ह। इससे उन्ह आशा बँधी क शायद ववाह टल जाए और अवसर फर खुले।
3. दं ड का भागी कोई और है, वे नह । उस क्षण परशुराम का क्रोध जनक पर था। हर व्य क्त को यह राहत होती है क आप त्त
कसी और पर पड़ी। यह क्ष णक और स्वाथ राहत है, पर बहुत सामान्य है।
4. बड़े व्य क्त को छोटा पड़ते दे खने का सुख। जनक ‘ वदे ह’ कहलाते थे — वद्वान, संयमी, प्र त ष्ठत। ऐसे व्य क्त का
सावज नक रूप से ‘जड़’ और ‘मूढ़’ कहा जाना उन राजाओं के अहंकार को सहलाता था, जो स्वयं को उनसे कम समझते आए
थे।
5. अपनी चुप्पी को उ चत ठहराने का बहाना। जब जनक जैसा राजा भी चुप है, तो हमारी चुप्पी पर कौन उँ गली उठाएगा? दूसरे
क कमज़ोरी अपनी कायरता का सबसे सु वधाजनक पदा बन जाती है।

ख — मनुष्य के व्यवहार क कौन-सी स ाई यह उजागर करता है

1. ईष्या दूसरे क हा न म अपना सुख ढूँ ढ़ लेती है। ईष्यालु व्य क्त अपनी उन्न त से उतना प्रसन्न नह होता,
जतना दूसरे क अवन त से। यहाँ राजाओं को कुछ मला नह — फर भी वे प्रसन्न ह। यह वह सुख है जसम अपना
कोई लाभ नह होता, केवल दूसरे का नुकसान होता है।
2. भीड़ का साहस भीड़ जतना बड़ा नह होता। सभा म अनेक राजा थे, पर एक भी नह बोला। भय के सामने
समूह प्रायः सबसे पहले टू टता है, क्य क हर व्य क्त सोचता है क कोई और बोले।
3. मनुष्य का भीतर और बाहर अलग होता है। बाहर से वे सब भयभीत और गंभीर दख रहे थे; भीतर से प्रसन्न
थे। तुलसी ने इसी लए ‘मन माह ’ लखा — यह हष चेहरे पर नह आया, आ भी नह सकता था। ईष्या हमेशा मन
के भीतर ही रहती है, इसी लए वह पहचानी नह जाती।
4. पराजय आदमी को कड़वा बना दे ती है। ये राजा जन्म से दुष्ट नह थे। पर स्वयंवर क असफलता ने उनके मन
म एक गाँठ डाल द , और वही गाँठ यहाँ कु टल प्रसन्नता बनकर बाहर आई।

ग — आज के जीवन से जो ड़ए

कक्षा म जब कसी हो शयार वद्याथ के कम अंक आ जाएँ और कुछ लोग भीतर-भीतर प्रसन्न ह — यह वही ‘कु टल भूप’
वाला भाव है।
खेल म जब अपनी ट म जीत न पाए, तो जीतने वाली ट म क छोट -सी गलती पर ताली बजाना भी इसी का रूप है।
यही कारण है क तुलसीदास ने इन राजाओं को ‘कु टल’ कहकर क व का नणय भी दे दया — वे तटस्थ नह रहते, वे बता
दे ते ह क यह भाव नदनीय है।

नष्कष एक वाक्य म: यह पं क्त बताती है क दूसरे क वप त्त म प्रसन्न होना मनुष्य क सबसे छपी हुई और
सबसे कुरूप प्रवृ त्त है — और सच्चा बड़प्पन इसी प्रवृ त्त पर वजय पाने म है, जैसा राम ने करके दखाया, जनके
हृदय म उस क्षण न हष था, न वषाद।

क वता का स दय — पृष्ठ 158

Page 46 of 91

Page 48

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास › वधा से संवाद › क वता का स दय

वधा से सं वाद ता लका

प्र.1 नीचे क वता के संवाद क कुछ वशेषताएँ द गई ह। उन वशेषताओं को दशाने वाली पं क्तय के उदाहरण
क वता से ढूँ ढ़कर ल खए। — संवाद क वशेषता: राम क वनम्रता / परशुराम का रौद्र रूप / लक्ष्मण का
प्रत्युत्तर / पौरा णक संदभ / नाटक यता

पूरी भरी हुई ता लका इस प्रकार है —

संवाद क वशेषता क वता क पं क्त (उदाहरण)

राम क वनम्रता “नाथ संभध
ु नु भंजिनहारा। होइिह के उ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह किहअ िकन मोही।”

परशुराम का रौद्र रूप “अित िरस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
बेिग दे खाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ मिह जहँ लिह तव राजू॥”

लक्ष्मण का प्रत्युत्तर “बहु धनुही ं तोरी ं लिरकाईं। कबहु ँ न अिस िरस कीिन्ह गोसाईं॥
एिह धनु पर ममता के िह हेत।ू ”

पौरा णक संदभ “सुनहु राम जेिहं िसवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो िरपु मोरा॥ ”

नाटक यता “सुिन मुिन बचन लखन मुस ुक ाने। बोले परसुध रिह अपमाने॥ ”

हर पं क्त क्य चुनी गई —

1. राम क वनम्रता — “नाथ संभुधनु भंज नहारा। होइ ह केउ एक दास तुम्हारा॥” इस एक चौपाई म वनम्रता के चार
प्रमाण एक साथ ह — (क) संबोधन ‘नाथ’, यानी सामने वाले को स्वामी मानना; (ख) अपना नाम न लेकर ‘केउ एक’ (कोई
एक) कहना; (ग) तोड़ने वाले को ‘दास तुम्हारा’ बताना, यानी स्वयं को नीचे रखना; और (घ) अगली पं क्त म आज्ञा माँगना
— “आयसु काह क हअ कन मोही।” ध्यान द जए, वनम्रता का अथ यहाँ झूठ बोलना नह है — राम स्वीकार कर लेते ह क
धनुष टू टा है; वे केवल कहने का ढं ग शालीन रखते ह।
वैक ल्पक उदाहरण: “हृदयँ न हरषु बषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥” — वनम्रता का मूल यही संतुलन है।
2. परशुराम का रौद्र रूप — “अ त रस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” ‘अ त रस’ म क्रोध क मात्रा
है, ‘बचन कठोरा’ म उसका रूप, और ‘जड़’ म उसका प रणाम — एक राजा को भरी सभा म मूख कह दे ना। अगली चौपाई म
यह रौद्र रूप अपने चरम पर पहुँचता है — “उलटउँ म ह जहँ ल ह तव राजू॥” यानी पूरी पृथ्वी उलट दे ने क धमक । यह
अ तशयो क्त रौद्र रस को और तीव्र बना दे ती है।
वैक ल्पक उदाहरण: “दे खत भृगुप त बेषु कराला। उठे सकल भय बकल भुआला॥” — यहाँ रौद्र रूप स्वयं परशुराम के शब्द
से नह , दे खने वाल क प्र त क्रया से सद्ध होता है, जो और भी प्रभावी तरीका है।
3. लक्ष्मण का प्रत्युत्तर — “बहु धनुह तोर ल रकाईं। कबहुँ न अ स रस क न्ह गोसाईं॥” यह पूरी क वता का सबसे
नुक ला वाक्य है। लक्ष्मण शव-धनुष का नाम ही नह लेते — वे उसे ‘धनुही’ यानी बच्च का खलौना-धनुष बताकर उसक
म हमा गरा दे ते ह। और ‘गोसाईं’ जैसा आदर-सूचक शब्द व्यंग्य का औज़ार बन जाता है — शब्द आदर का, स्वर उपहास का।
अगली पं क्त म वे परशुराम क भावना पर ही प्रश्न उठा दे ते ह — ‘ए ह धनु पर ममता के ह हेतू।’
वैक ल्पक उदाहरण: “सु न मु न बचन लखन मुसुकाने।” — केवल ‘मुसुकाने’ शब्द ही उनका पूरा प्रत्युत्तर है।

Page 47 of 91

Page 49

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

4. पौरा णक संदभ — “सुनहु राम जे ह सवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रपु मोरा॥” ‘सहसबाहु’ (सहस्रबाहु) परशुराम-
कथा का सबसे प्र सद्ध पौरा णक संदभ है — वह राजा जसका वध परशुराम ने कया था। इस एक नाम से पूरी कथा सुनने
वाल के मन म खुल जाती है, और धमक बना दं ड का नाम लए दं ड सुना दे ती है। यही संदभ-संकेत क श क्त है।
वैक ल्पक उदाहरण: “धनुही सम तपुरा र धनु ब दत सकल संसार॥” — ‘ त्रपुरा र’ ( शव) का नाम भी पौरा णक संदभ है,
और ‘अरध नमेष कलप सम बीता’ म ‘कल्प’ भी पुराण-क थत काल-माप है।
5. नाटक यता — “सु न मु न बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधर ह अपमाने॥” नाटक यता का अथ है ऐसा मोड़ जो दशक
क साँस रोक दे । सारी सभा काँप रही है, जनक नरुत्तर ह, मृत्यु क घोषणा हो चुक है — और ठ क उसी क्षण एक कशोर
मुसकरा दे ता है। सबसे ऊँचे स्वर के तुरंत बाद सबसे मुलायम भाव — यही नाटक यता है।
वैक ल्पक उदाहरण: “सुनत बचन फ र अनत नहारे। दे खे चापखंड म ह डारे॥” — यह पूरी क वता का मोड़- बदु है; एक दृ ष्ट
पड़ते ही सारा वातावरण बदल जाता है। और “रामु लखनु दसरथ के ढोटा। द न्ह असीस दे ख भल जोटा॥” म तो नाटक य
वडंबना है — परशुराम उसी को आशीवाद दे रहे ह जस पर आगे क्रोध करगे।

यह अभ्यास सखाता क्या है: पुस्तक क भू मका कहती है — “संवाद के माध्यम से ही पूरी क वता का
कथात्मक वकास होता है, संवाद ही च रत्र का नमाण करते ह और संवाद से ही भाव म व वधता भी
आती है।” ऊपर क ता लका इसी बात का प्रमाण है — पाँच वशेषताएँ कसी वणन से नह , पात्र के अपने वचन
से सद्ध होती ह। इसी लए यह क वता “काव्यात्मक वधा म संवाद-प्रस्तु त का एक उत्कृष्ट उदाहरण” कही गई है।

ता लका भरते समय ध्यान रख: हर वशेषता के लए अलग पं क्त चु नए और पं क्त पूरी ल खए — आधी पं क्त
से वशेषता सद्ध नह होती। और य द हो सके तो एक वाक्य म यह भी लख द जए क यह पं क्त उस वशेषता को
कैसे दशाती है; इससे उत्तर पूरा माना जाता है।

भाव-पहचान एवं व ष
े ण — पृष्ठ 158 और 159
अभ्यास › वधा से संवाद › भाव-पहचान एवं व ेषण (साथ म ‘ व ेषण कैसे कर’)

वधा से सं वाद व ेषण

प्र.1 आपने पढ़ा क राजा जनक क सभा म उप त व भन्न पात्र क मनः त अलग-अलग है। नीचे दए गए
भाव /मनः त को दशाने वाली पं क्तय को क वता से च ह्नत क जए और बताइए क यह भाव कस पात्र से
संबं धत है और उसक इस मनः त का कारण क्या है? — चता, क्रोध, व्यग्रता, भय, संयम/ वनम्रता, ईष्या/
कु टलता

पूरी भरी हुई ता लका इस प्रकार है (पहली पं क्त पुस्तक ने स्वयं उदाहरण के रूप म द है) —

Page 48 of 91

Page 50

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

co m
m.
भाव / संबं धत पं क्त संबं धत पात्र मनः त का कारण

m a se
मनः त

.co“ ब ध अब सँवरी बात बगारी” l
ag( ववाह) के प्र त आशं कत और
m
ase
चता सीता क माता पुत्री सीता के भ वष्य

agl
सुनयना च तत

क्रोध “अित िरस बोले बचन कठोरा। कहु परशुराम अपने आराध्य िशव का धनुष खंिडत होकर धरती पर

com
ag
जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” पड़ ा दे खना — “दे खे चापखंड मिह डारे ॥” उनके िलए
m .
se
यह धािमक और व्यिक्तगत, दोनों तरह की चोट है।
l a
व्यग्रता
ag सीता
“भगृ पु ित कर सुभाउ सुिन सीता। परशुराम का क्रोधी स्वभाव सुनकर राम के िलए भय;
अरध िनमेष कलप सम बीता॥” धनुष राम ने तोड़ ा है और मुिन तोड़ ने वाले को शत्र ु कह
m
.co
चुके है।ं पतीक्षा के कारण आधा पल भी क ल्प जैस ा लंबा

em
लग रहा है।
a s
. com“अित ड उत दे त नपृ ु नाही ं।” a glवचन, अपमानजनक संबोधन और
m
भय राजा जनक (तथा परशुराम के कठोर
e
रु रु

s
gla
(तथा “उठे सकल भय िबकल सभा के सभी राजा, पूरे रा य को उलट दे ने की धमकी। भय इतना है िक
ज्

a भुआला॥” और “सोचिहं सकल
त्र ास उर भारी॥ ”)
नगरवासी, दे व-मुिन) राजा उ त्तर तक नही ं दे पाते।

m a s
.cीरामo agl
“हृ दयँ न हरषु िबषादु कछु बोले वभावगत धै य और मय दा; वे जानते है ं िक उ त्ते जना से
ीरघुबीरु॥” तथा “नाथ संभधु नु em
संयम / श्र स्

as
वनम्रता िस्थित िबगड़ ेगी और सभा में सीता, सुनयना, जनक तथा
l
श्र

तुम्हारा॥” a g
भंजिनहारा। होइिह के उ एक दास नगरवासी सब उपिस्थत है।ं इसिलए स त्य स्वीकार
करते हुए भी वे शालीन बने रहते है।ं

oेm
ईष्या / “कु िटल भूप हरषे मन माही ं॥ ” सभा में उपिस्थत
. c
वे स्वयं िशव-धनुष नही ं उठा सक थे और स्वयंवर में
कु टलता अन्य (कु िटल ) राजा
s
अपमािनत हुए थे। जनक
e mको संकट में दे खकर उन्हे ं
co m अपने अपमानlका
g a -सा लगा, इसिलए वे मन-ही-मन
.
बदला
m पस न्न हुएa।
as e
a g l
हर पं क्त क्य चुनी गई — सं क्षप्त तक

se m
com
क्रोध: ‘अ त रस’ और ‘बचन कठोरा’ — दोन शब्द सीधे क्रोध के ह, और ‘जड़’ संबोधन क्रोध क मात्रा बता दे ता है। यह
g l a
m . a
e
asकुछ बोलती नह , कुछ कर नह सकत — इस लए उनक बेचैनी समय के माप म
पं क्त टू टे धनुष को दे खने के ठ क बाद आती है, इस लए कारण और भाव दोन एक साथ सद्ध हो जाते ह।

g l
a सूक्ष्म चत्रण है।
व्यग्रता: व्यग्रता का अथ है बेचैनी। सीता
प्रकट होती है, जो व्यग्रता का सबसे

m
भय: ‘अ त डरु’ म भय का नाम स्वयं मौजूद है। और भय केवल जनक तक सी मत नह है — “सुर मु न नाग नगर नर नारी”

. co
m
वाली चौपाई बताती है क वह पूरे लोक म फैला हुआ है।

m a e हरषु बषादु’) और एक जो बाहर
त बताएs(‘न
o l
संयम/ वनम्रता: इसके लए दो पं क्तयाँ ज़रूरी ह — एक जो भीतर क
agहै।
.cका व्यवहार दखाए (‘दास तुम्हारा’)। संयम भीतर होता है, वनम्रता बाहर दखती
m ईष्या/कु टलता: ‘मन माह ’ शब्द सबसे महत्वपूण है — यह हष चेहरे पर नह आया। ईष्या हमेशा भीतर ही रहती है,
l a se
ag
.c
इसी लए वह पहचानी नह जाती और इसी लए तुलसी को ‘कु टल’ वशेषण जोड़ना पड़ा।

s e m
m a
e m . co agl
g l as
a

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 49 of 91

Page 51

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

इस ता लका से क्या समझ आता है: एक ही घटना — शव-धनुष का टू टना — और सभा म बैठे हर व्य क्त क
प्र त क्रया अलग। प र स्थ त एक है, पर मन अनेक ह। यही कारण है क इस अंश म इतने कम पं क्तय म इतने सारे
च रत्र बन जाते ह। और सबसे बड़ी बात — इन छह भाव म से पाँच कसी न कसी उत्तेजना के ह; केवल राम का
‘संयम’ ऐसा है जो उत्तेजना के बीच स्थर खड़ा है।

प्र.2 “अ त डरु उतरु दे त नृपु नाह ।” — परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयज नत है या ववेकपूण नणय?
संवाद क त के आधार पर व ेषण क जए। (सहायता के लए पुस्तक ने ‘ व ेषण कैसे कर’ के पाँच सूत्र
दए ह।)

पुस्तक ने पृष्ठ 159 पर ‘ व ेषण कैसे कर’ के पाँच सूत्र दए ह। नीचे उत्तर ठ क उसी क्रम म लखा गया है, ता क व ेषण
लखने का ढाँचा भी स्पष्ट हो जाए।
1. संदभ स्पष्ट क जए — यह पं क्त कस त म आई है
परशुराम सभा म आ चुके ह। सब राजा भय से उठ खड़े हुए, नाम ले-लेकर दं डवत् कया। जनक ने स्वयं आकर प्रणाम कया, सीता
से भी करवाया। वश्वा मत्र ने राम-लक्ष्मण का प रचय कराया और परशुराम ने आशीवाद तक दे दया। फर उन्ह ने पूछा — ‘कहहु
काह अ त भीर’ — और जनक ने पूरा समाचार सच-सच सुना दया। बात सुनते ही परशुराम मुड़े, धरती पर बखरे धनुष के टु कड़े
दे खे और गरज उठे — “कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥ बे ग दे खाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ म ह जहँ ल ह तव राजू॥” ठ क इसी के
बाद यह पं क्त आती है — “अ त डरु उतरु दे त नृपु नाह ।”
2. कारण — जनक चुप क्य रह गए

कारण पाठ से प्रमाण

भय — यह सबसे स्पष्ट कारण पंिक्त स्वयं कहती है — “अित डरु”, यानी अत्यिधक भय। किव ने कोई और कारण नही ं िदया।
है

अपमान से आया आघात भरी सभा में एक राजा को ‘जड़ ’ और ‘मूढ़’ कहा गया। ऐसे आघात में शब्द अपने-आप रुक जाते है।ं

पूरे राज्य पर संकट “उलटउँ मिह जहँ लिह तव राजू॥ ” — धमकी जनक की नही,ं उनकी पजा की है। राजा के िलए यह सबसे
भारी दबाव है।

राम क रक्षा क चता जनक जानते है ं िक धनुष राम ने तोड़ ा है और सीता उ न्ही ं का वरण कर चुक ी है।ं नाम बता दे ना राम को सीधे
संक ट में डाल दे ता।

उत्तर दे ने से स्थ त बगड़ने का परशुराम उस क्षण िकसी तक की िस्थित में नही ं थे — “ब्यापेउ कोपु सरीर॥” यानी क्रोध उनके सारे शरीर
खतरा में फै ला हआ
ु था।

3. भाव — उस मौन के भीतर क्या था
जनक के मौन म एक साथ तीन चीज़ थ — भय (अपने और राज्य के लए), असहायता (वे राजा होकर भी कुछ नह कर पा रहे)
और ववशता-भरी सावधानी (कह मेरी बात से कसी नद ष पर आप त्त न आ जाए)। यही कारण है क उनका मौन केवल
कायरता नह लगता, दुखद लगता है।
4. प रणाम — उस मौन का क्या प्रभाव पड़ा

Page 50 of 91

Page 52

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

कु टल राजा प्रसन्न हुए — “कु टल भूप हरषे मन माह ॥” यानी मौन ने वरो धय को अवसर दे दया।
भय और फैल गया — “सुर मु न नाग नगर नर नारी। सोच ह सकल त्रास उर भारी॥” जब राजा ही चुप हो, तो प्रजा का साहस
टू ट जाता है।
टकराव टला भी — यह मौन का सकारात्मक पक्ष है। य द जनक उसी क्षण उत्तर दे ते, तो परशुराम का क्रोध तुरंत राम पर मुड़
जाता।
राम को आगे आने का अवसर मला — जनक क चुप्पी से बनी खाली जगह म ही राम बोले, और उन्ह ने वह उत्तर दया जो
न झूठा था, न उत्तेजक — “होइ ह केउ एक दास तुम्हारा॥” इस अथ म जनक का मौन कथा के लए उपयोगी सद्ध हुआ।

5. नष्कष — मेरा अपना मत

पाठ के शब्द के आधार पर जनक का मौन मूलतः भयज नत है, ववेकपूण नणय नह । इसका सबसे सीधा
प्रमाण क व का अपना वाक्य है — “अ त डरु उतरु दे त नृपु नाह ।” य द यह सोचा-समझा नणय होता, तो तुलसी
‘डर’ शब्द न लखते; वे कोई ऐसा शब्द चुनते जो ववेक या धैय का सूचक हो, जैसा उन्ह ने राम के लए कया —
‘हृदयँ न हरषु बषादु कछु ’।
फर भी यह मानना उ चत होगा क उस मौन का प रणाम ववेकपूण नकला। जनक ने न झूठ बोला, न कसी का
नाम लया, न प्रत्युत्तर दे कर आग भड़काई। इससे टकराव टल गया और बात को सँभालने का अवसर राम तक पहुँच
गया। यानी कारण भय था, पर प्रभाव ववेक जैसा हुआ।
यह पं क्त संकेत दे ती है क मौन हमेशा एक ही चीज़ नह होता। कभी वह डर से आता है, कभी समझदारी से —
और कभी डर से आया मौन भी अनजाने म समझदारी का काम कर जाता है। जनक के मौन क सच्ची पहचान यही
है।

व ेषण लखते समय याद र खए (पुस्तक के सूत्र): (1) पहले संदभ बताइए; (2) घटना का वणन कम, कारण
और प्रभाव अ धक ल खए — केवल ‘क्या हुआ’ नह , ‘क्य हुआ’ ल खए; (3) कारण → भाव → प रणाम का
क्रम बनाइए; (4) अंत म 1–2 पं क्तय म ‘अपना’ स्पष्ट नष्कष द जए — जैसे ‘इससे स्पष्ट होता है क…’ या ‘यह
पं क्त संकेत दे ती है क…’; (5) संक्षेप म क्या, क्य , कैसे के आधार पर व ेषण क जए।

काव्य-पं क्त और भाव — पृष्ठ 159
अभ्यास › वधा से संवाद › काव्य-पं क्त और भाव

वधा से सं वाद मं च न

प्र.1 “रे नृप बालक काल बस बोलत तो ह न सँभार। धनुही सम तपुरा र धनु ब दत सकल संसार॥” (क) य द आप
इन पं क्तय को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?

चेहरे पर मुख्य भाव होता — तीव्र क्रोध (रौद्र भाव), जसके साथ तरस्कार और व्यंग्य भी मला हुआ होता।
कारण यह है क ये पं क्तयाँ परशुराम के मुख से नकली ह और उनम तीन चीज़ एक साथ ह —

क्रोध — ‘रे’ और ‘तो ह’ जैसे तरस्कारपूण संबोधन।

Page 51 of 91

Page 53

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

चेतावनी — ‘काल बस बोलत’ यानी ‘तू मरने वाला है, तभी ऐसा बोल रहा है’।
व्यंग्य — ‘धनुही सम तपुरा र धनु’ म वे लक्ष्मण क ही तुलना दोहराकर उसका उपहास करते ह।

मंच पर इसे कैसे नभाया जाए — पूरी योजना

अंश चेहरे का भाव स्वर शरीर क भाषा

“रे नृप बालक” तीखा ितरस्कार — भौंहे ं तनी हुई, एकदम ऊँ चा और झटके दार; ‘रे ’ तजनी उठाकर सीधे ल क्ष्मण की ओर
आँखें िसकु ड़ ी हुई, होंठ कसे हुए पर सबसे अिधक बल संके त; एक कदम आगे

“काल बस गंभीर चेतावनी — भाव कठोर, पर वर थोड़ ा धीमा, पर भारी और
स् फरसे वाला हाथ हल्का-सा ऊपर उठे
बोलत” आँखें िस्थर ठहरा हुआ

“तो ह न सँभार” ितरस्कार और खीझ ‘न’ पर िवशेष बल , िफर एक िसर हल्का-सा दािहनी ओर झटका
छोटा-सा ठहराव

“धनुही सम यं य — एक ितरछी, कड़ वी मुस कान
व् ग् ‘धनुही’ शब्द को खी ंचकर , िचढ़ ाने हथेल ी उलटकर, मानो ल क्ष्मण की
तपुरा र धनु” जो तुरंत िमट जाए वाले लहजे में बात लौटा रहे हों

“ ब दत सकल दृ ढ़ घोषणा, गव-िमिश्रत वर िफर ऊँ चा और फै ला हुआ;
स् दोनों हाथ चारों ओर फै लाकर —
संसार” अंत पर पूरा ठहराव ‘सारा संस ार ’

ध्यान रखने क बात: यह केवल ‘गुस्से का दृश्य’ नह है। य द पूरी दो पं क्तयाँ एक ही स्वर म चीखकर बोल द
जाएँ, तो व्यंग्य मर जाएगा। असली कौशल बीच म स्वर बदलने म है — पहली पं क्त म क्रोध, दूसरी पं क्त म व्यंग्य।
और ‘धनुही’ शब्द पर आते ही चेहरे पर एक क्षण क कड़वी मुसकान लाइए; उसी एक क्षण से दशक समझ जाएगा
क परशुराम लक्ष्मण क बात लौटाकर मार रहे ह।

नमूना उत्तर (य द एक-दो वाक्य म लखना हो): “य द म ये पं क्तयाँ मंच पर बोलता, तो मेरे चेहरे पर तीव्र क्रोध
और तरस्कार का भाव होता — भ ह तनी हुईं, आँख लाल और ह ठ कसे हुए। ‘रे नृप बालक’ पर मेरा स्वर सबसे
ऊँचा होता और उँ गली सीधे लक्ष्मण क ओर उठ होती। पर ‘धनुही सम तपुरा र धनु’ कहते समय चेहरे पर एक
कड़वी, व्यंग्य-भरी मुसकान आ जाती, क्य क यहाँ परशुराम क्रोध के साथ-साथ लक्ष्मण क तुलना का उपहास भी
कर रहे ह।”

प्र.2 (ख) आपने अनुभव कया होगा क इस क वता म प र तवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्र त न ध बन
जाता है। नम्न ल खत पात्र को आप कौन-कौन से भाव ारा प्रद शत करगे— परशुराम, राजा जनक, लक्ष्मण,
राम, सभा म उप त अन्य राजा

नीचे पाँच पात्र के भाव, उनका प्रमाण और मंच पर उन्ह दखाने का ढं ग — तीन एक साथ दए गए ह।

Page 52 of 91

Page 54

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

पात्र मुख्य भाव प्रमाण-पं क्त मंच पर कैसे दखाएँ

परशुराम क्रोध (रौद ), आवेश, अहंकार, “अ त रस बोले बचन ऊँ चा, गरजता स्वर; तनी भौंह;े ं फरसा बार-बार िहलता
ितरस्कार — और बीच में एक कठोरा।” हआु ; तेज़ चाल। पर राम को दे खते समय स्वर और
क्ष ण का वात्स ल्य भी “उलटउँ म ह जहँ ल ह तव दृ िष्ट — दोनों एक क्षण के िलए कोमल हो जाएँ।
राजू॥”
वात्सल्य के लए —
“द न्ह असीस दे ख भल
जोटा॥”

राजा जनक भय, असहायता, िववशता, और “अ त डरु उतरु दे त नृपु झुके कं धे , नीची दृ िष्ट, हाथ जुड़े हुए ; कोई संवाद नही,ं
शुरू में िशष्टता नाह ।” के वल मौन और एक -दो बार सूखे होंठों पर ज़ बु ान
शष्टता के लए — फे रना। मौन ही उनका सबसे बड़ ा अिभनय है।
“जनक बहो र आइ सरु
नावा।”

लक्ष्मण िनभ कता, व्यंग्य/उपहास , “सु न मु न बचन लखन सीधी कमर, िस्थर मुस कान, िबना पलक झपकाए आँखों
स्वािभमान, उग ता, भात-ृ पेम मुसुकाने। बोले परसुधर ह में आँखें डालकर दे खना; स्वर ऊँ चा नही,ं पर चुभता
अपमाने॥” हआ
ु । ‘गोसाईं’ पर हल्का-सा िसर झुक ाकर व्यंग्यपूण
“बहु धनुह तोर आदर िदखाइए।
ल रकाईं…”

राम संयम, िवनमता, मय दा, धै य, “हृदयँ न हरषु बषादु कछु शांत मुद ा, हाथ जुड़े हुए , दृ िष्ट नीची पर िस्थर; स्वर
समभाव, संवेद नशीलता बोले श्रीरघुबीरु॥” धीमा, सम और स्पष्ट। पूरे दृ श्य में चेहरे का भाव
“नाथ संभुधनु लगभग अपिरवितत रहे — यही उनका सबसे किठन
भंज नहारा…” अिभनय है।

सभा म भय, ईष्य , कु िटलता, “उठे सकल भय बकल परशुराम के आते ही एक साथ खड़ े होना; िफर एक -
उप त अवसरवािदता, चुप्पी भुआला॥” दू स रे की ओर ितरछी दृ िष्ट और आपस में फु सफु साहट;
अन्य राजा “कु टल भूप हरषे मन जनक के चुप होने पर होंठों के कोने पर हल्की, िछपी हुई
माह ॥” मुस कान।

दो अ त रक्त पात्र, य द आप मंचन म उन्ह भी ल —

पात्र भाव प्रमाण-पं क्त

सीता यगता, पतीक्षा, पेमजिनत भय
व् “अरध नमेष कलप सम बीता॥”

सुनयना (सीता क माता) िचंता, पश्चात्ताप, वात्स ल्य “ ब ध अब सँवरी बात बगारी॥”

यह अभ्यास क्य दया गया है: पुस्तक कहती है क इस क वता म “प र स्थ तवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का
प्र त न ध बन जाता है।” यानी प र स्थ त एक है, पर हर पात्र उसे अलग ढं ग से भोगता है। इसी व वधता से
नाटक यता बनती है। य द सब पात्र एक जैसा व्यवहार करते, तो न संवाद बनता, न संघष — और क वता क वता न
रह जाती, केवल समाचार बन जाती।

Page 53 of 91

Page 55

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

. com
अ भनय का सुझाव: मंचन म सबसे क ठन भू मका राम क है। क्रोध और व्यंग्य दखाना आसान है, पर ‘न हष, न

m a s em म सबसे
gl
वषाद’ दखाना क ठन — क्य क इसम कुछ करना नह , ब ल्क कुछ न करना पड़ता है। जस वद्याथ
. coहो, उसे राम क भू मका द जए। a
em
अ धक ठहराव

a s
agl

co m
ag
वषय से संवाद — पृष्ठ 159 और 160
m .
अभ्यास › वषय से संवाद
as e
वषय से सं वाद अं त र- वषयी a g l

co m
m.
eतय म इन वशेषताओं
1. सभा म परशुराम के प्र त राम के व्यवहार से उनक वनम्रता, मयादा, धीर और उदात्त च रत्र के संबंध म पता

as
प्र.1

का.c
m
पoरचय दे ना पड़ता है? चचा क जए और ल खए।
चलता है जो कसी भी कुशल शासक के लए आवश्यक है। आपको कन- कन प र
g l
a
la sem
agउत्तर
m a s
.co agl
पहले यह दे ख ली जए क राम म ये चार गुण कस- कस पं क्त से सद्ध होते ह — उसके बाद अपने जीवन से जोड़ना आसान हो

se m
जाएगा।

g l a
गुण राम म कहाँ दखा a अथ

co
बड़ ा होकर भी स्वयं को छोटा रखना m
.
वनम्रता “नाथ… होइ ह केउ एक दास तुम्हारा॥”

m
e , बड़ ों से आज्ञा माँगना
सीमा और िशष्टाचार काsपालन
.co
m gla
मयादा “आयसु काह क हअ कन मोही।”

m
eधीरता a
a s
gl
“हृदयँ न हरषु बषादु कछु ” िवपि में भी धै य न खोना
त्त

a
m
मन की ऊँ चाई; छोटी बातों पर न उतरना
se
उदात्तता पूरा प्रसंग — अपमान सुनकर भी उत्ते जत न होना

o m g l a
m .c दे ना पड़ता है a
sडाँeट दे । शक्षक या माता- पता कभी-कभी अधूरी जानकारी पर नाराज़ हो जाते ह।
ऐसी प र तयाँ जनम हम भी इन गुण का प रचय

l a
ag बात बगाड़ता है। पहले पूरी बात सुनना, फर शांत स्वर म अपना पक्ष रखना — यही
1. जब कोई बड़ा हम बना पूरी बात जाने
उस समय बीच म काटकर बहस करना
राम वाला रास्ता है। सच कहना ज़रूरी है, पर सही समय पर और सही ढं ग से कहना उतना ही ज़रूरी है।
co m
m .
e
2. जब कसी सहपाठ से झगड़ा या ग़लतफ़हमी हो जाए। सामने वाला ऊँची आवाज़ म बोल रहा हो, तो उतनी ही ऊँची

omउत्ते जत होने के बजाय शांत उत्तर दया। g l as
.cतरह
आवाज़ म उत्तर दे ने से झगड़ा बढ़ता है। शांत रहकर बात करना कमज़ोरी नह , संयम है — ठ क वैसे ही जैसे राम ने लक्ष्मण क
a
em3. जब हम कसी ट म या समूह के नेता ह । कक्षा का मॉनीटर, खेल ट म का कप्तान या कसी प रयोजना का समूह-नायक —
a s
agl इन सबको ऐसी स्थ तयाँ मलती ह जहाँ कोई साथी गलती करे या कोई साथी वद्रोह करे। नेता य द स्वयं भड़क जाए तो पूरा
.c
s e m
m a
समूह बखर जाता है। इसी लए पुस्तक कहती है क ये गुण ‘ कसी भी कुशल शासक के लए आवश्यक ह’।

. co a gl
m
4. जब हम अपनी गलती स्वीकार करनी हो। यह सबसे क ठन क्षण है। राम ने धनुष तोड़ने क बात छपाई नह , पर उसे घमंड से
भी नह कहा — “होइ ह केउ एक दासeतुम्हारा।” गलती स्वीकार करने का यही ढं ग सबसे अ ा है: सच पूरा, स्वर वनम्र।
g l as
a

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 54 of 91

Page 56

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

5. जब हम कसी प्र तयो गता म जीत या हार। जीत पर उछल पड़ना और हार पर टू ट जाना — दोन असंतुलन ह। ‘न हष, न
वषाद’ का पाठ ठ क यह काम आता है। जीतने पर हारने वाले का सम्मान करना और हारने पर जीतने वाले को बधाई दे ना ही
खेल-भावना है।
6. जब कसी बड़े से असहमत होना पड़े। असहम त रखना गलत नह है, पर उसे प्रकट करने का ढं ग मया दत होना चा हए —
“मुझे लगता है क…”, “क्या इस पर एक बार और सोचा जा सकता है?” यह वाक्य-रचना बात को खुला रखती है, जब क
‘आप गलत ह’ बात बंद कर दे ता है।
7. जब कोई हमारा उपहास करे या हम उकसाए। वद्यालय म, खेल के मैदान म या ऑनलाइन — कोई जान-बूझकर चढ़ाता है
ता क हम भड़क जाएँ। उस समय प्र त क्रया न दे ना ही सबसे मज़बूत उत्तर है। भड़क जाना उकसाने वाले क जीत है।
8. जब घर या मुहल्ले म बड़ के बीच ववाद हो। बच्च को अक्सर बीच म पड़ना होता है। ऐसे म दोन पक्ष को आदर दे कर,
बना कसी का पक्ष लए बात करना बहुत काम आता है — जैसे वश्वा मत्र ने राम-लक्ष्मण को पहले ही चरण म झुका दया था।

नमूना उत्तर (कक्षा-चचा के बाद लखने योग्य अनु े द):

“मुझे इन गुण क सबसे अ धक आवश्यकता तब पड़ती है जब म जानता ँ क म सही ँ, पर सामने वाला क्रोध म
है। पछले महीने अंतर-कक्षा प्र तयो गता म हमारे समूह का चाट फट गया था। हमारे शक्षक को लगा क यह हमारी
लापरवाही थी और उन्ह ने भरी कक्षा म मुझे डाँटा। मेरा पहला मन हुआ क तुरंत क ँ — ‘मेरी गलती नह है!’ पर
मने चुप रहकर पूरी बात सुनी। कक्षा के बाद जाकर मने शांत स्वर म कहा क चाट खड़क से आई बा रश म भीगा
था और म उसे दुबारा बना दूँ गा। शक्षक ने न केवल बात मानी, ब ल्क मुझे धन्यवाद भी दया। उस दन मुझे समझ
आया क अपनी बात रखने के लए ऊँची आवाज़ क नह , सही समय क ज़रूरत होती है — और यही राम
का रास्ता है।”

चचा के लए प्रश्न: (1) क्या वनम्रता कभी कमज़ोरी बन सकती है? कहाँ रेखा ख चनी चा हए? (2) य द सामने
वाला बार-बार अन्याय करे, तो कब तक चुप रहना चा हए? (3) लक्ष्मण का साहस और राम का संयम — क्या ये
दोन एक ही व्य क्त म हो सकते ह?

प्र.2 2. क वता म व णत प्रसंग सीता-स्वयंवर क सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज म वर-चयन के लए स्वयंवर क
प्रथा प्रच लत थी। इसके अनेक उदाहरण मलते ह। ऐसी कसी एक पौरा णक-ऐ तहा सक आ द घटना/प्रसंग का
वणन क जए जससे स्वयंवर व ध ारा ववाह क जानकारी मलती है।

स्वयंवर क्या था — ‘स्वयंवर’ शब्द दो हस्स से बना है — स्वयं + वर, यानी ‘स्वयं वर चुनना’। प्राचीन भारतीय समाज म यह वर-
चयन क एक प्रच लत प्रथा थी, जसम कन्या के पता अनेक राजकुमार को आमं त्रत करते और कन्या अपनी इ ा से वर चुनती।
इसके दो रूप मलते ह —

Page 55 of 91

Page 57

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

प्रकार वध उदाहरण

वरण-स्वयंवर क न्या स्वयं वर-माला ले क र सभा में घूमती और िजसे चाहे, दमयंती का स्वयंवर
उसके गले में माला डाल दे ती।

शौय/शत-स्वयंवर िपता कोई किठन शत रखते; जो उसे पूरा करता, उसी से िववाह सीता का स्वयंवर (िशव-धनुष), द ौपदी का
(वीय-शुल्क) होता। स्वयंवर (म त्स्यभेद )

वस्तार से एक प्रसंग — द्रौपद का स्वयंवर (महाभारत)
पांचाल दे श के राजा द्रुपद ने अपनी पुत्री द्रौपद (कृष्णा) के ववाह के लए स्वयंवर क घोषणा क । उन्ह ने बहुत क ठन शत रखी —
सभा के बीच एक ऊँचे खंभे पर घूमता हुआ मछली का यंत्र लगाया गया और नीचे तेल से भरा कड़ाह रखा गया। शत यह थी क
प्र तयोगी को कड़ाह म दखते प्र त बब को दे खकर, ऊपर घूमती मछली क आँख को बाण से बेधना है — और वह भी एक भारी,
क ठन धनुष चढ़ाकर।
दे श-दे श के राजा और राजकुमार आए। बहुत से तो धनुष उठ भी नह सका, कुछ चढ़ा न सके, और जो चढ़ा सके वे नशाना चूक
गए। उस समय पांडव लाक्षागृह से बचकर ब्राह्मण के वेश म वनवास काट रहे थे और वे भी उस सभा म उप स्थत थे। अंत म अजुन
उठे , धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई, कड़ाह म प्र त बब दे खा और एक ही बाण से मछली क आँख बेध द । द्रौपद ने उनके गले म वरमाला
डाल द ।
इसके बाद वहाँ उप स्थत कुछ राजाओं ने आप त्त क क एक ब्राह्मण क्ष त्रय-कन्या को कैसे प्राप्त कर सकता है, और सभा म संघष
क स्थ त बन गई, जसे भीम और अजुन ने सँभाला।
इस प्रसंग से स्वयंवर- व ध के बारे म क्या-क्या पता चलता है —

कन्या के पता अनेक दे श के राजाओं को नमंत्रण भेजते थे और सभा म उनके लए आसन लगते थे।
वर-चयन के लए प्रायः शौय और कौशल क शत रखी जाती थी, जससे यह सद्ध हो क वर योग्य है।
शत पूरी होने पर कन्या वरमाला डालती थी — यही ववाह क स्वीकृ त का प्रतीक था।
असफल राजा प्रायः अपमा नत अनुभव करते थे और कभी-कभी वरोध या संघष भी हो जाता था।

सीता-स्वयंवर से तुलना — और इसी से हमारा पाठ समझ म आता है: दोन प्रसंग क बनावट लगभग एक-सी
है। दोन म क ठन शत थी ( शव-धनुष / मत्स्यभेद), दोन म बहुत-से राजा असफल हुए, और दोन म असफल
राजाओं का अपमान ही आगे ववाद का कारण बना। हमारे पाठ म इसी असफलता क कड़वाहट ‘कु टल भूप हरषे
मन माह ’ बनकर सामने आती है। यानी यह प्रश्न केवल जानकारी के लए नह है — स्वयंवर क प्रथा को समझे
बना उन राजाओं क ईष्या समझ म नह आती।

अन्य प्र सद्ध उदाहरण (संक्षेप म)

Page 56 of 91

Page 58

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

प्रसंग ग्रंथ / स्रोत वशेषता

सीता का स्वयंवर रामच रतमानस / रामायण — शत थी िशव-धनुष पर पत्यंचा चढ़ ाना। श्रीराम ने धनुष उठाते ही वह भंग हो गया।
बालकांड यही हमारे पाठ का पसंग है।

दमयंती का महाभारत — नल-दमयंती कोई शत नही ं थी; दमयंती ने स्वयं राजा नल को चुना। इस कथा में दे वताओं ने भी
स्वयंवर उपाख्यान नल का रूप धर िलया था, पर दमयंती ने पहचानकर असली नल को माला
पहनाई। यह शुद्ध वरण-स्वयंवर का उदाहरण है।

संयो गता और पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई) — क न्नौज के राजा जयचंद ने संयोिगता के स्वयंवर में पथ्ृ वीराज को न बुल ाकर उनकी
पृथ्वीराज चौहान ऐ तहा सक-सा ह त्यक प्रसंग मूित द्वारपाल के रूप में रखवाई; संयोिगता ने उसी मूित को वरमाला पहना दी। यह
ऐितहािसक -सािहित्यक उदाहरण है।

इ तहास क दृ ष्ट से एक ज़रूरी बात: स्वयंवर क प्रथा मुख्यतः राजप रवार तक सी मत थी, साधारण जनता म
नह । और इन कथाओं म कन्या क इ ा को महत्व अवश्य दया जाता था, पर शत प्रायः पता ही तय करते थे। इस
पर अपने सामा जक वज्ञान के शक्षक से चचा क जए — यह जानना रोचक होगा क उस समय क सामा जक
व्यवस्था म स्त्री के चुनाव का दायरा कतना बड़ा था और कतना सी मत।

सृजन — पृष्ठ 160
अभ्यास › सृजन

सृ ज न ले ख न

प्र.1 1. परशुराम के क्रोध को दे खकर सीता और उनक माता सुनयना दोन च तत ह और सीता के लए एक-एक पल
युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनक मनः त का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोन के बीच
चल रहा मौन संवाद ल खए।

‘मौन संवाद’ क्या होता है — वह बातचीत जो मुँह से नह , केवल आँख , चेहरे और मन से होती है। दोन पात्र एक-दूसरे क बात
बना कहे समझ जाते ह। लखते समय हर कथन के साथ यह भी दखाइए क वह ‘कहा’ कैसे गया — दृ ष्ट से, सर हलाकर, हाथ
थामकर।
अ े उत्तर म क्या-क्या होना चा हए —

दोन पात्र क मनः स्थ त पाठ से नकले — सुनयना क चता “ ब ध अब सँवरी बात बगारी” से, सीता क व्यग्रता “अरध
नमेष कलप सम बीता” से।
दोन क भाषा और भाव अलग सुनाई द — माँ क चता व्यावहा रक और सुरक्षा-भरी हो, पुत्री क चता कोमल, संकोच-भरी
और प्रेमज नत हो।
एक भी शब्द बोला हुआ न हो — सारा संवाद कोष्ठक म दए संकेत और मन के वाक्य से चले।
अंत म एक सांत्वना या संकल्प का क्षण हो, ता क संवाद अधूरा न लगे।

नमूना उत्तर:
मौन संवाद — सीता और सुनयना

Page 57 of 91

Page 59

कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद AglaSem · NCERT Solutions

(दृश्य: म थला क सभा का एक कोना। दूर परशुराम क गरजती आवाज़ सुनाई दे रही है। सीता स खय के बीच खड़ी ह, पर उनक
दृ ष्ट बार-बार सभा क ओर जा रही है। सुनयना पास आकर उनके कंधे पर हाथ रखती ह।)

कौन मन म जो कहा गया वह कैसे ‘कहा’ गया

सुनयना ‘बेट , घबरा मत। जो होना है वह होकर रहेगा — पर तू यह मेरे पास खड़ी सीता के कं धे पर हाथ रखकर, उ न्हे ं अपनी ओर
रह।’ हल्का-सा खी ंचते हएु

सीता ‘माँ, वे इतना क्रोध क्य कर रहे ह? धनुष ही तो टू टा है… और वह भी एक बार माँ की ओर दे खकर, िफर तुरंत दृ िष्ट
अपने आप।’ झुक ाकर

सुनयना ‘तू नह जानती बेट । वह धनुष उनके आराध्य का था। और जो कोप उनके धीरे से िसर िहलाकर, आँखों में गहरी िचंता िलए
शरीर म समा चुका है, वह शब्द से नह उतरता।’

सीता ‘पर उन्ह ने तो कुछ भी अनु चत नह कया। मने उन्ह दे खा है, माँ — सभा की िदशा में एक क्षण दे खकर, िफर काँपते
उनके चेहरे पर अभी भी वैसी ही शां त है।’ होंठों को दबाकर

सुनयना (मन ही मन) ‘हे वधाता! तूने बनी-बनाई बात क्य बगाड़ द ? कल तक आकाश की ओर एक क्षण दे खकर, िफर आँचल
तो सब कुछ सँवरा हुआ था…’ का कोना मु ी में भी ंचकर

सीता (मन ही मन) ‘यह आधा पल भी क्य नह बीत रहा? लगता है जैसे एक पलकें झपकाना भूल कर, एक ही िदशा में िस्थर
पूरा युग बीत गया हो और अभी भी वह खड़ी ँ…’ दृ िष्ट

सुनयना ‘मत दे ख उधर। तेरा दे खना ही तुझे और तोड़ेगा।’ सीता का चेहरा दोनों हथेिलयों में ले क र अपनी ओर
मोड़ ते हुए

सीता ‘माँ, आपका हाथ काँप रहा है। आप भी तो डर रही ह।’ माँ का हाथ अपने हाथ में ले क र, आँखों में दे खते हुए

सुनयना (एक क्षण रुककर) ‘हाँ… पर माँ का डर बेट को दखाना नह चा हए।’ एक थकी-सी, आधी मुस कान — जो पूरी नही ं हो
पाती

सीता ‘मने उन्ह मन से वर लया है, माँ। अब जो होगा, उसे भी मन से ही सह आँखें बंद कर, गहरी साँस ले क र, हाथ जोड़ कर
लूँगी।’

सुनयना ‘तो चल, हम दोन यह खड़ी होकर प्रतीक्षा कर। कम-से-कम साथ तो ह।’ सीता का हाथ अपने हाथ में कसकर पकड़ ते हएु ;
दोनों की दृ िष्ट िफर सभा की ओर

(दूर से आवाज़ आती है — “सो बलगाउ बहाइ समाजा। न त मारे जैह ह सब राजा॥” दोन क पकड़ और कस जाती है। पदा
गरता है।)

यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पूरा संवाद पाठ क दो पं क्तय पर टका है — माँ क ‘ ब ध अब सँवरी बात बगारी’
और पुत्री क ‘अरध नमेष कलप सम बीता’ — और दोन पं क्तयाँ संवाद के भीतर सहज रूप से आ गई ह। साथ ही
दोन के भाव अलग रखे गए ह: माँ का भय व्यावहा रक है (क्या होगा, कैसे बचेगा), बेट का भय भावनात्मक है
(उनके साथ कुछ न हो जाए)। यही अंतर उत्तर को जीवंत बनाता है।

Page 58 of 91

Page 60

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
a g l AglaSem · NCERT Solutions

. com
em
प्र.2 2. सभा म हो रहे संवाद को दूर बैठ सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और

m a s
l हँसी, भय, शंका
coसे पूरी घटना का व ेषण क जए। (संकेत– लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चता,
अनुमान के आधार पर ल खए क उस समय सीता के मन म कस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे ह गे? सीता के

. a gगव,
emद)
दृ ष्टकोण

a s
gl
इत्या
a
m

. co ag
m
यह प्रश्न एक साथ दो चीज़ माँगता है — भाव क सूची और सीता के दृ ष्टकोण से पूरी घटना का व ेषण। दोन नीचे अलग-

as e
l
अलग दए गए ह।

a g
क — घटना के हर मोड़ पर सीता के मन के भाव

co m
m.
घटना का मोड़ सीता के मन का भाव कारण

m as e
.co
परशुराम का आगमन और उनका कराल आशंक ा, संक ोच
a g l
सारी सभा भय से खड़ी हो गई — “उठे सकल भय

se
वेष
m बकल भुआला॥”

g l a
a परशुराम का उन्ह आशीवाद देना क्ष िणक राहत, कृ तज्ञता “आ सष द न्ह सख हरषान ।” — लगा क मु न प्रसन्न

s
ह

cताom a
टू टा धनुष दे खकर परशुराम का क्रोध
em
.
तीव भय और यग “अरध नमेष कलप सम बीता॥” — आधा पल भी युग agl
s
व्

a
agl
जैसा लगने लगा

पता जनक का ‘जड़’, ‘मूढ़’ कहा जाना पीड़ ा, ल ज्जा और असहायता पता का सावज नक अपमान पुत्री के लए सबसे क ठन

com
क्षण होता है

.
m इतने लोग पर संकट न आ
‘कह मेरे स्वयंवर केeकारण
m a s
agl
आतंक , अपराध-बोध
.co
“न त मारे जैह ह सब राजा॥” क धमक

em
जाए’

a s
a gl राम का शांत उत्तर — “होइ ह केउ एक गव, आश्विस्त, श्रद्धा जस सभा म सब काँप रहे थे, वहाँ उनका स्वर स्थर था

m
दास तुम्हारा”

एक साथ —oहँसm l a se
लक्ष्मण का मुसकराना और व्यंग्य करना
और शंm . c ी, गव, िचंता, भय बात सच्ची और साहसी थी, पर उससे आग भड़क
a g
ase
का सकती थी

“रे नृप बालक काल बस बोलत…” agl घबराहट और पाथना अब स्थ त सीधे मृत्यु क चेतावनी तक पहुँच गई

com
ख — सीता के दृ ष्टकोण से पूरी घटना का व ेषण (नमूना उत्तर, प्रथम पुरुष म)
m .
o m
“उस दन म सबसे दूर खड़ी थी, और सबसे पास भी”
l a se
c मुझे सभा से हटाकर अपने समाज म ले आई थ । वे समझदार थ — उन्ह लग
स .खयाँ a gरहा था क वातावरण बगड़ने वाला है। पर
m
se दूर आ जाने से मन थोड़े ही दूर जाता है। मेरे कान वह लगे थे, जहाँ मेरी आँख नह पहुँच सकती थ ।
a
agl c
जब मु न ने आकर मुझे आशीवाद दया था, तब मुझे लगा था क अब सब शुभ है। मेरी स खयाँ प्रसन्न थ और म भी। पर वह
m .
m a s e
co agl
प्रसन्नता कतनी छोट नकली! कुछ ही क्षण म उधर से गजना सुनाई दे ने लगी। और जब मने सुना क वे मेरे पता को ‘जड़’ कह रहे

m .
se
ह, तो मेरा मन जैसे बैठ गया। मेरे पता — जन्ह सारा जगत ‘ वदे ह’ कहता है, जनके दरबार म वद्वान बहस करने आते ह — वे

l a
ag से शकायत कर रही थ ।
भरी सभा म एक शब्द नह बोल पा रहे थे। मने अपनी माता क ओर दे खा; वे आँचल का कोना मु म भ चे खड़ी थ और ह ठ म
कुछ बुदबुदा रही थ — शायद वधाता

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 59 of 91

Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages92
Languagehindi
Updated19 Sep 2026