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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 10: भार त, जय, वजयकरे!
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — गंगा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
166 – 175 16 44 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 63 pages
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे! AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · हद · गं गा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 10: भार त, जय, वजयकरे!
NCERT कक्षा 9 हद क पाठ्यपुस्तक गंगा के काव्य खंड के तीसरे पाठ — पाठ 10 भार त, जय, वजयकरे! — के सभी प्रश्न के पूरे हल।
रचनाकार ह सूयकांत त्रपाठ ‘ नराला’ (सन् 1899–1961), जो छायावाद के चार प्रमुख स्तंभ म गने जाते ह; वधा है राष्ट्र-वंदना — संस्कृत नष्ठ,
समासयुक्त खड़ी बोली म लखा एक गेय संबोधन-गीत, जसम भारतभू म को दे वी के रूप म दे खकर उसक स्तु त क गई है। पृष्ठ 166 से 175 तक
अभ्यास के सभी शीषक — रचना से संवाद (मेरे उत्तर मेरे तक, अथ और भाव, मेरी समझ मेरे वचार), वधा से संवाद (क वता का स दय), वषय
से संवाद ( व वध रंग भारत के स हत), सृजन, भाषा से संवाद (व्याकरण क बात › बहुभाषी दे श हमारा, मातृभाषा और भाव, समास— समस्त पद
एवं वग्रह, अलंकार— समझ और प्रयोग), ग त व धयाँ ( मलकर ल शपथ), भाषा संगम, झरोखे से (मै थलीशरण गुप्त क ‘जय जय भारतमाता’)
और खोजबीन — शीषक-दर-शीषक, प्रश्न-दर-प्रश्न हल कए गए ह। साथ म पूरी क वता क पं क्त-दर-पं क्त व्याख्या (सरल अथ, भाव और शल्प)
द गई है, पुस्तक क अधूरी ता लका (‘क वता क कुछ अन्य वशेषताएँ’) पूरी भरकर द गई है और चार सामा सक पद के समास- वग्रह भेद स हत
समझाए गए ह।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
गंगा (कक्षा 9) 166 – 175
खं ड प्रश्न
16 44
माध्यम
हन्द
क वता — पं क्त-दर-पं क्त व्याख्या — पृष्ठ 167
काव्य खंड › पाठ 10 › भार त, जय, वजयकरे! — सरल अथ, भाव और शल्प
व्याख्या शल्प
प्र.1 “भार त, जय, वजयकरे! कनक-शस्य-कमलधरे!” — इन पं क्तय का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
क जए।
सरल अथ — हे भार त! तुम्हारी जय हो, हे वजय दलाने वाली! हे सोने जैसी लहलहाती फ़सल रूपी कमल को धारण करने
वाली!
भाव: ये दो पं क्तयाँ पूरी क वता क टे क ह और इनम क व का सारा मंतव्य समा गया है। पहली पं क्त म श क्त क
कामना है — ‘जय’ और ‘ वजयकरे’ — और दूसरी पं क्त म समृ द्ध का चत्र — ‘कनक-शस्य’। ध्यान द जए, क व
भारत को धन या सेना से नह , फ़सल से पहचानता है। खेत म पक हुई गेहूँ क बा लयाँ धूप म सोने-सी चमकती ह,
और वही चमक क व को दे वी के हाथ म खले कमल जैसी लगती है। यानी भारत क असली संपदा उसका अन्न और
उसे उपजाने वाला श्रम है। ‘भार त’ शब्द भी दो अथ एक साथ खोलता है — शब्द-संपदा के अनुसार यह
सरस्वती/वाणी क अ धष्ठात्री भी है और भारतमाता भी। इस लए यह वंदना एक साथ ज्ञान क दे वी और
मातृभू म — दोन क है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
शैली संबोधन-शैली — ‘ वजयकरे!’ और ‘कमलधरे!’ दोन संबोधन-पद ह (‘हे वजय करने वाली!’, ‘हे कमल धारण करने
वाली!’)। पूरी क वता इसी शैली म चलती है, इस लए वह वंदना बन जाती है, ववरण नह ।
अलंकार अनुप्रास — “कनक-शस्य-कमलधरे” म ‘क’ क तीन आवृ त्तयाँ; “जय, वजयकरे” म ‘ज’ क आवृ त्त। साथ ही उपमा-
ग भत समास — ‘कनक-शस्य’ का अथ ही है ‘कनक के समान शस्य’, यानी तुलना समास के भीतर छपी है।
सामा सक ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ एक ही साँस म तीन शब्द जोड़ दे ता है। पुस्तक स्वयं बताती है क ‘कनक-शस्य’ और ‘कमलधरा’
पद समस्त पद ह और ‘कमलधरे’ संबोधन शब्द है।
बब दृश्य बब — सुनहरे खेत और खला हुआ कमल। रंग एक ही है — स्वण, और वही रंग पूरी पं क्त को दमका दे ता है।
तुक और लय वजयकरे – कमलधरे। यही ‘-रे’ क तुक आगे हर छं द के अं तम चरण म लौटती है (भरे, गले, मुखरे), इस लए ये दो पं क्तयाँ
पूरी क वता क धुरी बन जाती ह।
गुण ओज गुण — छोटे -छोटे चरण, संयुक्त वण और जयघोष का स्वर मलकर उत्साह जगाते ह। ऐसी पं क्तयाँ पढ़ नह जात ,
उच्चा रत क जाती ह।
ध्यान द जए: पूरी क वता म क्रया लगभग है ही नह — यहाँ भी कोई क्रया नह , केवल संबोधन। क व वाक्य नह
बनाता, नाम रखता जाता है। इसी से क वता म मंत्र जैसी गूँज पैदा होती है।
प्र.2 “लंका पदतल शतदल,” — इस पं क्त का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — (हे भार त!) लंका तुम्हारे चरण के नीचे खले हुए कमल के समान शोभा पा रही है।
भाव: क व भारत को एक खड़ी हुई दे वी के रूप म दे ख रहा है और अब वह उसका शरीर सर से पैर तक नह ,
ब ल्क पैर से सर तक गनाता है — पहले लंका (सबसे द क्षण), फर समुद्र, फर वन-वनस्प त, फर गंगा और अंत
म हमालय (सबसे उत्तर)। यह क्रम जान-बूझकर चुना गया है, क्य क वंदना सदा चरण से आरंभ होती है। शब्द-
संपदा के अनुसार ‘शतदल’ का अथ है कमल और ‘पदतल’ का अथ है तलवा या पैर के नीचे। हद महासागर म
बसा लंका द्व प ऊपर से दे खने पर सचमुच जल पर तैरते कमल-सा जान पड़ता है। ध्यान र खए, यह क वता
स्वतंत्रता-पूव क है, जब पूरा द क्षण ए शया एक ही सांस्कृ तक भूगोल के रूप म दे खा जाता था।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार रूपक — लंका पर ‘चरणतल के कमल’ का सीधा आरोप है; ‘जैसे’ या ‘सा’ जैसा कोई वाचक शब्द नह । अनुप्रास —
“लंका पदतल शतदल” म ‘ल’ ध्व न तीन बार लौटती है, और ‘त’ भी दो बार (पदतल, शतदल)।
सामा सक पदतल (पद का तल — तत्पुरुष), शतदल ( जसके सौ दल ह — बहु ी ह, अथात कमल)।
पद
बब दृश्य बब — नीले जल पर तैरता एक कमल। पूरी पं क्त म एक भी क्रया नह , फर भी चत्र पूरा बन जाता है।
प्रतीक कमल = प वत्रता, स दय और शुभता का भारतीय प्रतीक। चरण के नीचे कमल रखने क कल्पना दे वी-प्र तमाओं क परंपरा
से आई है।
तुक शतदल – सागर-जल – युगल (इस छं द के पहले तीन चरण क साझी तुक)।
प्र.3 “ग जतो म सागर-जल / धोता शु च चरण युगल” — इन पं क्तय का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — गरजती हुई लहर वाला समुद्र का जल तुम्हारे दोन प वत्र चरण को धो रहा है।
भाव: भारत तीन ओर से समुद्र से घरा है — यह भूगोल क बात है। क व इसी भूगोल को भ क्त म बदल दे ता है:
समुद्र केवल टकरा नह रहा, वह चरण धो रहा है। भारतीय परंपरा म अ त थ या पूज्य के चरण धोना सबसे बड़ा
आदर है, इस लए यहाँ वशाल और भयंकर समुद्र भी भारतमाता के सामने एक सेवक बन जाता है। यही प्रकृ त का
मानवीकरण है। ‘ग जतो म’ शब्द म श क्त है और ‘शु च’ म प वत्रता — दोन को एक साथ रखकर क व कहता है
क भारत क म हमा के आगे प्रचंड श क्त भी वनम्र हो जाती है। ‘युगल’ यानी जोड़ा — दोन चरण; यह शब्द चत्र
को और ठोस बना दे ता है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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पक्ष
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.c समुद्र मनुष्य क तरह चरण धोता है — नज व प्रकृ त पर मानवीय क्रया का आरोप। पूaरीgक वता म यही एकमात्र स्पष्ट
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मानवीकरण
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क्रया (‘धोता’) है, इस लए यह और अ धक ध्यान ख चती है।
अलंकार अनुप्रास — “शु च चरण” म ‘च’ क आवृ त्त; “ग जतो म सागर” म ‘ग’ क । रूपक — भारतभू म पर दे वी का आरोप,
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जसके ‘चरण’ ह।
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श्रव्य बब
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‘ग जत’ शब्द लहर क आवाज़ सुना दे ता है। क वता म यह पहली ध्व न है — और अंत म ‘शतरव’ के रूप म ध्व न ही पूरी
क वता को समेटती है।
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सामा सक पद
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ग जतो म = ग जत + ऊ म (गरजती हुई लहर) — कमधारय; सं ध से ‘त + ऊ’ मलकर ‘तो’ हो गया। सागर-जल =
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m.se बात पुस्तक क ता लका
सागर का जल — तत्पुरुष। चरण-युगल = चरण का जोड़ा — तत्पुरुष।
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भाषा
m .c पू री तरह तत्सम — ग जत, ऊ म, शु च, चरण, यु गल। यही ‘सं स्कृ त नष्ठ भाषा
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प्रयोग’ है , जसक
l a se म क गई है।
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mसरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए। agl
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“स्तव कर बहु-अथ-भरे!” — इस पं क्त का
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सरल अथ — हे अनेक अथ से भरी हुई (भार त)! (समुद्र तुम्हारे चरण धोता हुआ) तुम्हारी स्तु त कर रहा है।
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m .c यह छं द का समापन-चरण है और यहाँ क व अपनी ही क वता के बारे म aएकg बात कह दे ता है। ‘बहु-अथ-भरे’
aseका अथ है — जसम अनेक अथ भरे ह । पुस्तक भी इसी पं क्त के बारे म कहती है क ‘इस पं क्त म भारत क
भाव:
agl प्रशंसा व वध अथ म क गई है’। भारत का अथ एक नह — वह अन्न भी है, जल भी, वन भी, ज्ञान भी और ध्व न
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om का शोर क व को कोई कोलाहल नह , स्तोत्र-पाठ सुनाई दे ता a
भी। इसी लए उसक स्तु त भी एक अथ म पूरी नह होती। ‘स्तव’ शब्द ध्यान दे ने योग्य है — शब्द-संपदा के अनुसार
इसका अथ है प्रशंसा, स्तु त और स्तोत्र। यानीcलहर
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है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
शैली संबोधन — ‘बहु-अथ-भरे!’ फर एक संबोधन-पद है, जो ‘ वजयकरे!’, ‘कमलधरे!’ क ंखला को आगे बढ़ाता है।
अलंकार अनुप्रास — “बहु … भरे” म ‘ब’ और ‘भ’ सजातीय ओष्ठ्य ध्व नयाँ एक साथ आई ह। साथ ही मानवीकरण जारी है —
समुद्र स्तु त कर रहा है।
सामा सक बहु-अथ-भरे = बहुत अथ से भरी हुई — तत्पुरुष (करण/अपादान संबंध)।
पद
तुक भरे — यह चरण छं द के पहले तीन चरण (शतदल, सागर-जल, युगल) से तुक नह मलाता, ब ल्क आरं भक टे क
‘ वजयकरे – कमलधरे’ से मलाता है। इसी यु क्त से हर छं द के अंत म क वता अपनी टे क पर लौट आती है।
अथ-गांभीय ‘बहु-अथ’ शब्द अपने आप म क वता क कुंजी है — यही बताता है क ‘भार त’ को केवल भूगोल न समझा जाए; वह
वाणी, ज्ञान और संस्कृ त भी है।
प्र.5 “तरु-तृण-वन-लता वसन, / अंचल म ख चत सुमन;” — इन पं क्तय का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
क जए।
सरल अथ — वृक्ष, तनके, वन और लताएँ ही तुम्हारे वस्त्र ह, और तुम्हारे आँचल म फूल जड़े हुए ह।
भाव: यहाँ क वता का सबसे सुंदर और सबसे अथपूण चत्र है। वन-वनस्प त भारत के ऊपर उगी हुई कोई चीज़ नह
— वह भारत का पहना हुआ वस्त्र है। इस एक कल्पना से बात बहुत आगे चली जाती है: वस्त्र उतार लया जाए तो
शरीर नंगा हो जाता है, इस लए वन काटना दे श को उघाड़ दे ना है। पुस्तक इसी पं क्त को आगे ‘ मलकर ल शपथ’
म उठाकर वन-संरक्षण के नयम पर वचार करने को कहती है — यानी पुस्तक भी इसे पयावरण-चेतना क पं क्त
मानती है। दूसरी पं क्त म फूल ‘ख चत’ ह, यानी जड़े हुए — जैसे कसी बहुमूल्य वस्त्र पर रत्न टाँके जाते ह। क व
फूल को उगा हुआ नह , सजाया हुआ कहता है, इससे भारत क छ व सुस त और ग रमामय बन जाती है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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अलंकार रूपक — वन-वनस्प त पर ‘वसन’ (वस्त्र) का और फूल पर ‘आँचल म जड़े रत्न ’ का आरोप। अनुप्रास — “तरु-तृण” म
‘त’, “वन … वसन” म ‘व’, और “अंचल … ख चत” म ‘च’ क आवृ त्त।
सामा सक तरु-तृण-वन-लता — चार शब्द का द्वं द्व समास (तरु, तृण, वन और लता)। वग्रह म ‘और’ लगता है, इस लए द्वं द्व। यह
पद क वता का सबसे लंबा समस्त पद है।
बब दृश्य और स्पश बब — हरे वस्त्र और उन पर टँ के रंगीन फूल। ‘ख चत’ शब्द से कपड़े पर उभरी कढ़ाई का-सा स्पश
महसूस होता है।
शब्द-चयन ‘अंचल’ का दोहरा अथ काम कर रहा है — शब्द-संपदा के अनुसार यह आँचल भी है और दे श का प्रांत-भाग भी। इस लए
‘अंचल म ख चत सुमन’ का अथ यह भी बनता है क दे श के हर अंचल म फूल खले ह।
तुक वसन – सुमन (और आगे ‘कण’) — इस छं द के पहले तीन चरण क ‘-न/-ण’ वाली साझी तुक।
जोड़ ली जए: यही पं क्त पाठ के अंत म ‘ मलकर ल शपथ’ के नीचे दोबारा छपी है। जब कोई पं क्त अभ्यास म
लौटकर आए, तो सम झए क पुस्तक उसे क वता का कद्र य संदेश मान रही है।
प्र.6 “गंगा ज्यो तजल-कण / धवल धार हार गले।” — इन पं क्तय का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — गंगा के प्रकाशमय जल-कण से बनी उजली धारा तुम्हारे गले का हार है।
भाव: क व क दृ ष्ट अब चरण और वस्त्र से ऊपर उठकर गले तक आ गई है। भारत के मान चत्र पर गंगा एक
चौड़ी, चमकती हुई रेखा क तरह प श्चम से पूव क ओर जाती है — और क व को वही रेखा गले म पड़ा मो तय का
हार दखाई दे ती है। ‘ज्यो तजल-कण’ म जल क बूँद मोती बन जाती ह, क्य क धूप म हर बूँद चमकती है। ‘धवल’
का अथ है सफ़ेद, स्वच्छ, नमल — इस लए यह हार केवल सुंदर नह , प वत्र भी है। गंगा भारत क सबसे बड़ी
सांस्कृ तक पहचान है, इसी लए वह आभूषण के रूप म गले म है — शरीर के सबसे दृश्यमान स्थान पर। जो चीज़
हार है, उसे मैला करना अपनी ही शोभा मटाना है — यही वचार आगे ‘ वषय से संवाद’ के प्रश्न म उठाया गया है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार रूपक — गंगा क धारा पर ‘हार’ का सीधा आरोप, और जल-कण पर मो तय का। अनुप्रास — “धवल धार हार” म ‘ध’
क आवृ त्त और ‘धार–हार’ क ध्व न-समानता, जससे धारा का बहाव सुनाई दे ने लगता है।
सामा सक ज्यो तजल = ज्यो त (प्रकाश) रूपी जल — कमधारय; ‘ज्यो तः + जल’ म वसग बदलकर ‘र्’ हो गया। ज्यो तजल-कण =
पद ज्यो तजल के कण — तत्पुरुष।
बब दृश्य/तेजस बब — धूप म चमकती नद । पूरा चत्र सफ़ेद और उजाले का है, और अगली ही पं क्त म यही सफ़ेद हमालय
क बफ़ बनकर लौटती है।
पद-चयन ‘धार’ के साथ ‘हार’ क तुक भीतर ही भीतर (आंत रक तुक) बन गई है — इससे पं क्त गाने म और मीठ हो जाती है।
तुक गले — यह चरण फर टे क क ‘-रे/-ले’ ध्व न पर लौट आता है, जैसे ‘भरे’ लौटा था।
प्र.7 “मुकुट शुभ्र हम-तुषार, / प्राण प्रणव ओंकार,” — इन पं क्तय का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — उज्ज्वल बफ़ से ढका हमालय तुम्हारा मुकुट है, और ‘ॐ’ क प वत्र ध्व न तुम्हारे प्राण ह।
भाव: शरीर का वणन अब सर तक पहुँच गया है और यह वह पूरा होता है। हमालय भारत के सबसे ऊपरी छोर पर
है, सफ़ेद है और सबसे ऊँचा है — मुकुट के तीन लक्षण उसम ह। इस लए यह कल्पना केवल सुंदर नह , सही भी है।
दूसरी पं क्त म क व एक बड़ी छलाँग लगाता है: अब तक वह जो कुछ गना रहा था — लंका, सागर, वन, गंगा,
हमालय — वह सब भारत का शरीर था; अब वह भारत के प्राण बताता है, और वे प्राण कोई वस्तु नह , एक ध्व न
ह — ‘प्रणव’ यानी ओंकार। इसका अथ यह हुआ क भारत क असली पहचान उसक भू म नह , उसक ज्ञान-
परंपरा और आध्या त्मक चेतना है। पुस्तक क भू मका भी यही कहती है क ‘क व भारत को एक चेतन सत्ता के
रूप म दे खता है, जसक दशाओं म ओंकार क गूँज हो रही है’।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार 1 रूपक — “मुकुट शुभ्र हम-तुषार”। यही पुस्तक का अपना उदाहरण है (पृष्ठ 172): ‘ हमालय मुकुट नह है, ले कन क व
ने कल्पना के बल पर उसे मुकुट का रूप दे दया … गुण क अत्यंत समानता के कारण उपमेय म उपमान का अभेद स्था पत
कया गया है, इसी लए यहाँ रूपक अलंकार है।’
अलंकार 2 रूपक — ‘प्राण प्रणव ओंकार’ म प्राण पर ओंकार का आरोप। अनुप्रास — “प्राण प्रणव” म ‘प्र’ क आवृ त्त, जो उच्चारण
म मंत्र-सी लय पैदा करती है।
सामा सक हम-तुषार = हम रूपी तुषार / हम का तुषार — कमधारय। ध्यान द जए, ‘ हम’ का एक अथ शब्द-संपदा म हमालय
पद पवत भी दया गया है।
बब पहली पं क्त म दृश्य बब (चमकती बफ़), दूसरी म श्रव्य बब (ओंकार क ध्व न)। क व आँख से कान क ओर बढ़ रहा है —
और अगली दो पं क्तय म पूरी क वता ध्व न म बदल जाती है।
तुक तुषार – ओंकार – उदार (इस छं द के पहले तीन चरण क साझी तुक)।
क्रम पर ध्यान द जए: लंका (चरण) → सागर (चरण-प्रक्षालन) → वन (वस्त्र) → गंगा (हार) → हमालय (मुकुट)
→ ओंकार (प्राण)। क व नीचे से ऊपर चला है और अंत म शरीर से नकलकर आत्मा तक पहुँच गया है। यही इस
छोट -सी क वता क सबसे बड़ी योजना है।
प्र.8 “ध्व नत दशाएँ उदार, / शतमुख-शतरव-मुखरे!” — इन पं क्तय का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — तुम्हारी उदार दशाएँ ध्व न से गूँज रही ह; हे सौ मुख से उठे सौ स्वर द्वारा मुख रत होने वाली (भार त)!
भाव: क वता का समापन ध्व न पर होता है, और यही उसका सबसे गहरा अथ है। ‘ दशाएँ’ को ‘उदार’ कहा गया
— शब्द-संपदा के अनुसार उदार यानी दानशील, दयालु। यानी भारत क दशाएँ बंद नह , खुली हुई ह; वे लेती नह ,
दे ती ह। और ‘शतमुख-शतरव’ का अथ है — सौ मुख, सौ ध्व नयाँ। भारत एक स्वर वाला दे श नह है; यहाँ सैकड़
भाषाएँ, बो लयाँ, पव, संगीत और वचार एक साथ बोलते ह — और यही शोर नह , मुखरता है। ‘शत’ यहाँ गनती
नह , अन गनत का प्रतीक है। इसी लए पुस्तक इसी पं क्त के आधार पर आगे पूछती है क भारत के व वध पव
और री त- रवाज ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ क संकल्पना को कैसे साकार करते ह। एकता का अथ यहाँ एकरूपता
नह , अनेक स्वर का एक साथ बजना है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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पक्ष
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.c अनुप्रास — “शतमुख-शतरव-मुखरे!” म ‘श’ वण क पुनरावृ त्त। यही पुस्तक का अपनाagउदाहरण है (पृष्ठ 172)। साथ
अलंकार
se m ही ‘शत’ क और ‘मुख’ क पुनरु क्त (शतमुख–शतरव, शतमुख–मुखरे) पूरी पं क्त को गूँजता हुआ बना देती है। ‘ दशाएँ
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a उदार’ म ‘द’ क आवृ त्त भी है।
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मानवीकरण दशाएँ ‘उदार’ ह और ‘ध्व नत’ हो रही ह — नज व दशाओं पर मनुष्य के गुण और वाणी का आरोप।
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सामा सक पद
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शतमुख (सौ मुख वाली — बहु ी ह), शतरव (सौ रव/ध्व नयाँ — द्वगु), शतमुख-शतरव-मुखरे (सौ मुख के सौ रव से
मुखर — तत्पुरुष)।
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श्रव्य बब
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पूरी पं क्त सुनाई दे ती है। ‘श’, ‘ख’, ‘र’ जैसी ध्व नयाँ बार-बार टकराकर भीड़-भरे मेले-सा शोर पैदा करती ह — और यही
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sखeरे। इस लौटने से रचना
अथ भी है।
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तुक और
m .c मु खरे — क वता फर वह लौट आती है जहाँ से चली थी: वजयकरे , कमलधरे ,
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भरे , गले , मु
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समापन वृत्ताकार हो जाती है, जैसे कोई मंत्र पूरा होकर फर आरंभ हो सके।
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a गुण ओज गुण — समास, संयुक्त वण और घोष ध्व नयाँ मलकर उत्साह और गव का भाव जगाती ह। यही कारण है क यह
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क वता सामू हक स्वर म गाने योग्य है।
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पूरी क वता एक वाक्य म: नराला भारत का भूगोल गनाते- गनाते उसक आत्मा तक पहुँच जाते ह — पैर पर
लंका, चरण पर सागर, दे ह पर वन, गले म गंगा, सर पर हमालय, प्राण म ओंकार और वाणी म सौ स्वर।
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मेरे उत्तर.cमेoरm a g l
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े तक — पृष्ठ 168 और 169
l a se › रचना से संवाद › मेरे उत्तर मेरे तक
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अभ्यास
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रचना से सं वाद मे रे उत्तर मे रे तक
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नम्न ल खत प्रश्न के सट क उत्तर चु नए और यह भी बताइए क आपको ये उत्तर उपयुक्त क्य लगते ह? 1.
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“भार त, जय, वजयकरे” क वता म वशेष रूप से— (क) भारत क भौगो लक संरचना क प्रश स्त क गई है।
(ख) भारत क सांस्कृ तक व वधता बताई गई है। (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृ त और संपन्नता क प्रशंसा क गई है।
(घ) भारत के ख नज पदाथ के बारे म बताया गया है।
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s e mसट क उत्तर — (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृ त और संपन्नता क प्रशंसा क गई है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे! AglaSem · NCERT Solutions
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: इस वकल्प म तीन बात ह और तीन के लए क वता म अलग-अलग पं क्त मौजूद है —
यही इसे सबसे सट क बनाता है।
ज्ञान — “प्राण प्रणव ओंकार, / ध्व नत दशाएँ उदार” — ओंकार भारत क आध्या त्मक और ज्ञान-परंपरा का
प्रतीक है। और संबोधन ही ‘भार त’ है, जसका अथ शब्द-संपदा म सरस्वती, वाणी क अ धष्ठात्री दया गया है
— यानी ज्ञान क दे वी।
प्रकृ त — “तरु-तृण-वन-लता वसन, / अंचल म ख चत सुमन;”, “गंगा ज्यो तजल-कण”, “मुकुट शुभ्र हम-
तुषार” — वन, फूल, नद और हमालय, सब कुछ।
संपन्नता — “कनक-शस्य-कमलधरे!” — सोने जैसी फ़सल, यानी धन-धान्य से भरी भू म।
पुस्तक स्वयं आगे ‘ वषय से संवाद’ म लखती है — ‘इस क वता म भारत को ज्ञान, कृ ष और संस्कृ त के
प्रतीक/प रचायक के रूप म प्रस्तुत कया गया है’ (पृष्ठ 170)। यह वाक्य इसी वकल्प क पु ष्ट करता है।
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) भारत क भौगो लक अधूरा यह बात ग़लत नह है — लंका, सागर, गंगा और हमालय सचमुच भूगोल ह। पर यह वकल्प
संरचना क प्रश स्त क गई केवल एक हस्सा पकड़ता है और ‘प्राण प्रणव ओंकार’ जैसी ज्ञान-पं क्त तथा ‘कनक-शस्य’
है। जैसी समृ द्ध-पं क्त को छोड़ दे ता है। प्रश्न ‘ वशेष रूप से’ पूछ रहा है, इस लए उत्तर वही होगा जो
पूरी क वता को समेटे।
(ख) भारत क सांस्कृ तक अधूरा व वधता क झलक केवल अं तम पं क्त ‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ म है। एक पं क्त के आधार पर
व वधता बताई गई है। पूरी क वता का वषय तय नह कया जा सकता।
(ग) भारत के ज्ञान, सही ✓ तीन पक्ष के लए क वता म स्पष्ट पं क्तयाँ ह, और पुस्तक क अपनी भू मका भी यही कहती है।
प्रकृ त और संपन्नता क
प्रशंसा क गई है।
(घ) भारत के ख नज ग़लत क वता म कसी ख नज क चचा नह है। ‘कनक’ (सोना) शब्द अवश्य आया है, पर वह ख नज
पदाथ के बारे म बताया के रूप म नह , फ़सल के रंग के उपमान के रूप म आया है — ‘कनक के समान शस्य’, यानी
गया है। सोने जैसी पक फ़सल।
प्र.2 2. “कनक-शस्य-कमल धरे” पं क्त का भावाथ है— (क) भारत क धन-धान्य संपन्नता (ख) भारत क न दय का
स दय (ग) भारत के लोक-जीवन क सुंदरता (घ) भारत क सैन्य श क्त और औद्यो गक वकास
सट क उत्तर — (क) भारत क धन-धान्य संपन्नता।
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यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पं क्त के तीन शब्द इसी अथ क ओर जाते ह। शब्द-संपदा के अनुसार कनक = सोना
और शस्य = फसल, खेती, अन्न, धान्य। पुस्तक स्वयं ‘भाषा से संवाद’ म इसका अथ खोलकर बता दे ती है —
‘कनक-शस्य’ का अथ है कनक के समान शस्य (सोने जैसी फसल) और ‘कमलधरे’ का अथ है हे कमल को
धारण करने वाली! (पृष्ठ 171)। यानी भारतभू म वह दे वी है जसके खेत म सोने-सी फ़सल लहलहाती है और
जसके हाथ म समृ द्ध का प्रतीक कमल है। कमल भारतीय परंपरा म लक्ष्मी और वैभव का चह्न है — इस लए ‘धन’
और ‘धान्य’ दोन इसी एक पं क्त म आ जाते ह। पाठ क भू मका भी कहती है क यह संबोधन ‘भारत क कृ ष-
परंपरा और श्रम के स दय को दशाता है’।
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) भारत क धन- सही ✓ ‘शस्य’ = अन्न/धान्य, ‘कनक’ = सोना, ‘कमल’ = वैभव का प्रतीक। तीन मलकर धन-धान्य क
धान्य संपन्नता समृ द्ध बनाते ह।
(ख) भारत क न दय का ग़लत नद क बात इस पं क्त म है ही नह । वह आगे आती है — “गंगा ज्यो तजल-कण/ धवल धार
स दय हार गले।” वकल्प चुनते समय पं क्त और उसका वषय मलाकर दे खना चा हए।
(ग) भारत के लोक-जीवन ग़लत लोक-जीवन का अथ है लोग का रहन-सहन, पव, वेशभूषा, लोकगीत। पं क्त म मनुष्य का कोई
क सुंदरता चत्र नह है — केवल फ़सल और कमल ह। हाँ, फ़सल के पीछे कसान का श्रम अवश्य छपा है,
पर पं क्त का भावाथ समृ द्ध ही है।
(घ) भारत क सैन्य श क्त ग़लत पूरी क वता म न कोई अस्त्र-शस्त्र है, न कारख़ाना। क वता स्वतंत्रता-पूव क है और उसका बल
और औद्यो गक वकास कृ ष, प्रकृ त तथा ज्ञान पर है, उद्योग पर नह ।
छोट -सी बात, बड़ी पहचान: ‘कनक-शस्य’ म तुलना समास के भीतर छपी है — ‘कनक के समान शस्य’। ऐसे
समास को उपमानवाचक कमधारय कहते ह। यानी यहाँ उपमा अलंकार समास के भीतर बैठा हुआ है।
प्र.3 3. समस्त वश्व म भारत के महत्व का उ ोष करने वाली पं क्तयाँ ह— (क) गंगा ज्यो तजल-कण/ धवल धार हार
गले (ख) ग जतो म सागर-जल/ धोता शु च चरण युगल (ग) भार त, जय, वजयकरे/ कनक-शस्य-कमलधरे! (घ)
ध्व नत दशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!
सट क उत्तर — (घ) ध्व नत दशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!
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यह उत्तर क्य उपयुक्त है: प्रश्न म दो शब्द कुंजी ह — ‘समस्त वश्व’ और ‘उ ोष’। उत्तर वही पं क्त होगी जसम
(1) फैलाव सब ओर हो और (2) कुछ बोला या गूँजा जा रहा हो।
‘ध्व नत दशाएँ’ — दशाएँ यानी चार ओर, हर ओर। ध्व न कसी एक स्थान म बँधी नह रहती, वह फैलती है।
इस लए यहाँ भारत क क त एक दे श क सीमा म नह , सारी दशाओं म गूँज रही है।
‘शतमुख-शतरव-मुखरे’ — सौ मुख, सौ स्वर, और ‘मुखर’ यानी बोलता हुआ। यही ‘उ ोष’ है — घोषणा, जो
सुनाई दे ।
‘उदार’ शब्द भी साथ आया है, जसका अथ शब्द-संपदा म दानशील, दयालु है। यानी भारत क दशाएँ केवल
गूँज नह रह , वे दे ती भी ह — और जो दे ता है, वही वश्व म महत्व पाता है।
इस तरह यह पं क्त भारत को वश्व-मंच पर रखकर उसक महत्ता क घोषणा करती है।
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) गंगा ज्यो तजल-कण/ ग़लत यह स दय क पं क्त है — गंगा को भारत के गले का उजला हार बताया गया है। इसम
धवल धार हार गले अलंकरण है, उ ोष नह ; और वस्तार भारत क भीतरी भू म तक ही है।
(ख) ग जतो म सागर- ग़लत यह भारत क भौगो लक त और सागर क वनम्र सेवा का चत्र है। ‘ग जत’ म ध्व न
जल/ धोता शु च चरण अवश्य है, पर वह लहर क है — भारत क महत्ता क घोषणा नह । यहाँ वस्तार भी केवल
युगल चरण तक है।
(ग) भार त, जय, ग़लत यह कामना और वंदना क पं क्त है — ‘तुम्हारी जय हो’। पाठ क भू मका भी इसे यही कहती
वजयकरे/ कनक-शस्य- है क क व ‘भारत को वजयश्री प्राप्त करने क कामना करता है’। कामना करना और वश्व म
कमलधरे! महत्व क घोषणा करना — दो अलग बात ह।
(घ) ध्व नत दशाएँ सही ✓ ‘ दशाएँ’ = सब ओर; ‘ध्व नत’ और ‘मुखरे’ = गूँजता हुआ उ ोष; ‘शत’ = अन गनत। यही
उदार/ शतमुख-शतरव- पं क्त भारत क महत्ता को सारे संसार तक फैला दे ती है।
मुखरे!
प्र.4 4. क वता क भाषा और शैली कस वशेषता से संपन्न है? (क) सरल, बोल-चाल क भाषा (ख) संस्कृत नष्ठ और
समासयुक्त (ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूण (घ) संवादात्मक और व ेषणात्मक
सट क उत्तर — (ख) संस्कृत नष्ठ और समासयुक्त।
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यह उत्तर क्य उपयुक्त है: क वता क हर पं क्त इसका प्रमाण है।
संस्कृत नष्ठ (तत्सम) शब्दावली — शु च, युगल, स्तव, तरु, तृण, वसन, ख चत, सुमन, ज्यो तजल, धवल,
शुभ्र, तुषार, प्रणव, ओंकार, शतरव, मुखर। इनम एक भी शब्द रोज़मरा क बोलचाल का नह है; सब सीधे
संस्कृत से आए ह। क व ने स्वयं स्वाध्याय से संस्कृत सीखी थी, और उसका असर यहाँ साफ़ है।
समासयुक्त पद — ‘कनक-शस्य-कमलधरे’, ‘ग जतो म’, ‘सागर-जल’, ‘चरण युगल’, ‘बहु-अथ-भरे’, ‘तरु-
तृण-वन-लता’, ‘ज्यो तजल-कण’, ‘ हम-तुषार’, ‘शतमुख-शतरव-मुखरे’। लगभग हर पं क्त म कम-से-कम एक
समस्त पद है — इसी लए पुस्तक ने ‘समस्त पद/सामा सक पद का प्रयोग’ को क वता क एक अलग वशेषता
के रूप म गनाया है (पृष्ठ 170) और उसी पर समास का पूरा अभ्यास दया है।
इसी संस्कृत नष्ठता से क वता म ओज गुण आता है — भाषा गंभीर, भव्य और उ ोष करने योग्य बन जाती है,
जो एक राष्ट्र-वंदना के लए उपयुक्त है।
यही कारण है क ‘खोजबीन’ म भी पुस्तक लखती है — ‘इस क वता क तरह ही संस्कृत नष्ठ शब्दावली से युक्त
नराला क एक अन्य क वता … प ढ़ए।’
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) सरल, बोल-चाल ग़लत यह इसके ठ क उलटा है। ‘ग जतो म’, ‘ज्यो तजल’, ‘प्रणव’, ‘शतरव’ जैसे शब्द बोलचाल म नह
क भाषा आते — इसी लए पुस्तक को दो पूरे पृष्ठ क शब्द-संपदा दे नी पड़ी।
(ख) संस्कृत नष्ठ और सही ✓ तत्सम शब्दावली और लगातार आते सामा सक पद — दोन प्रमाण क वता म मौजूद ह।
समासयुक्त
(ग) सरस और हास्य- ग़लत क वता का स्वर गंभीर, भ क्तपूण और उ ोषात्मक है। हास्य या व्यंग्य का एक भी संकेत नह ।
व्यंग्यपूण ( नराला क ‘कुकुरमुत्ता’ म व्यंग्य अवश्य है, पर यह वह क वता नह ।)
(घ) संवादात्मक और ग़लत संवाद म दो पक्ष बोलते ह; यहाँ केवल क व बोल रहा है और भार त को संबो धत कर रहा है —
व ेषणात्मक उत्तर कोई नह दे ता। व ेषण भी नह है, क्य क क व कारण नह गना रहा, चत्र रख रहा है।
प्र.5 5. भारत के वस्त्र म ‘तरु-तृण-वन-लता’ और गले म ‘गंगा-धारा’ को च त्रत कर क व कस प्रकार क चेतना का
संदेश दे ते ह? (क) पयावरणीय और सांस्कृ तक (ख) राष्ट्रीयता और दे शप्रेम (ग) ऐ तहा सक और भौगो लक (घ)
सामा जक और राजनी तक
सट क उत्तर — (क) पयावरणीय और सांस्कृ तक।
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यह उत्तर क्य उपयुक्त है: प्रश्न पूरी क वता के बारे म नह , दो वशेष चत्र के बारे म है — वन-वनस्प त को वस्त्र
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बताना और गंगा को गले का हार बताना। इन दोन चत्र क अपनी अलग चेतना है —
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.c — “तरु-तृण-वन-लता वसन” कहकर क व वन को दे श के ऊपर उगीaवस्तु g नह , दे श का पहना
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se वस्त्र बना दे ता है। वस्त्र उतर जाए तो शरीर उघड़ जाता है — इस लए वन काटना दे श को नंगा कर दे ना है।
पयावरणीय
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हुआ
यही पयावरण-चेतना है।
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सांस्कृ तक — “गंगा … धवल धार हार गले।” गंगा केवल नद नह , भारत क सबसे बड़ी सांस्कृ तक पहचान
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है — इसी लए वह आभूषण बनकर गले म, सबसे दृश्यमान जगह पर है। और ‘धवल’ यानी नमल — नद का
उजलापन ही उसका सांस्कृ तक मूल्य है।
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पुस्तक स्वयं इसी दशा म पढ़ती है — ठ क इन्ह पं क्तय पर आगे ‘ मलकर ल शपथ’ म लखा है: ‘वन, लता,
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पुष्प आ द भारत के अमूल्य प्राकृ तक संसाधन ह। इनके संरक्षण के लए … अ ध नयम के बारे म सूचना एक त्रत
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क जए’ (पृष्ठ 172)। और ‘ वषय से संवाद’ का चौथा प्रश्न इन्ह दो बब — गंगा-हार और हमालय-मु
. comऔर जलवायु प रवतन पर सोचने को कहता है। इससे स्पष्ट है क पुaस्gतकlaइन चत्र म पयावरणीय
लेकर प्रदूषण
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सांस्कृ तक चेतना ही दे खती है।
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वकल्प सही / कारण
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ग़लत
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सही ✓
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(क) पयावरणीय वन = वस्त्र (पयावरण), गंगा = हार (संस्कृ त)। पुस्तक के अपने आगे के प्रश्न भी इन्ह पं क्तय को
और सांस्कृ तक वन-संरक्षण और नद -प्रदूषण से जोड़ते ह।
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(ख) राष्ट्रीयता और सही तो है, यह पूरी क वता का सामान्य भाव है — हर पं क्त पर लागू होता है, इस लए यह इन दो वशेष
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दे शप्रेम पर उत्तर चत्र क पहचान नह बता पाता। प्रश्न पूछ रहा है क इन बब से क व कस प्रकार क चेतना
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नह जगाता है; ऐसे प्रश्न म वही वकल्प सही होता है जो सबसे व शष्ट हो, सबसे सामान्य नह ।
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gl और भौगो लक
ग़लत इन दोन पं क्तय म कोई ऐ तहा सक घटना, त थ या राजा नह है। भूगोल गंगा म अवश्य है, पर
a क व गंगा का माग नह बता रहा, उसे आभूषण बना रहा है — यानी दृ ष्ट भौगो लक नह ,
सांस्कृ तक है।
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cरीoतmया राजनी त क कोई चचा इन पं क्तय म नह है। पूरी क वता म एक भी g l a
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emतक नह आता।
(घ) सामा जक और ग़लत समाज के वग,
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राजनी तक मनुष्य-पात्र
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अथ और भाव — पृष्ठ 169
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अभ्यास › रचना से संवाद › अथ और भाव
रचना से सं वाद व्याख्या
प्र.1 नीचे द गई पं क्तय का अथ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट क जए— (क) “लंका पदतल शतदल, ग जतो म
सागर-जल धोता शु च चरण युगल!”
अथ — (हे भार त!) लंका तुम्हारे चरण के नीचे खले हुए कमल के समान है, और गरजती लहर वाला समुद्र का जल तुम्हारे दोन
प वत्र चरण को धो रहा है।
भाव — इन तीन पं क्तय म क व ने भारत के भूगोल को वंदना म बदल दया है। भाव के तीन स्तर ह —
1. भारत एक चेतन दे वी है, न ा नह । क व भारत को खड़ी हुई एक दे वी के रूप म दे खता है और उसका वणन चरण से
आरंभ करता है — क्य क पूजा सदा चरण से शुरू होती है। भारत का सबसे द क्षणी छोर सागर म है और उससे आगे लंका
द्व प — इस लए लंका ‘पदतल’ पर पड़ा वह कमल बन जाती है जो दे वी-प्र तमाओं के चरण के नीचे दखाया जाता है।
2. प्रचंड श क्त भी यहाँ वनम्र है। ‘ग जतो म’ यानी गरजती लहर — समुद्र यहाँ अपने सबसे भयंकर रूप म है। पर वह टकरा
नह रहा, चरण धो रहा है। भारतीय परंपरा म कसी के चरण धोना सबसे बड़ा आदर है। यानी क व कहना चाहता है क भारत
क म हमा के आगे संसार क सबसे बड़ी श क्त भी सेवक बन जाती है।
3. प वत्रता का भाव। ‘शु च’ का अथ है प वत्र, नमल, नष्कपट। भारत के चरण पहले से ही प वत्र ह; समुद्र उन्ह धोकर उन्ह
प वत्र नह बना रहा, ब ल्क अपने को धन्य कर रहा है। यह भाव भ क्त-काव्य क परंपरा से आया है।
पूरा चत्र एक साथ दे खए: नीला समुद्र, उस पर तैरता कमल-सा लंका द्व प, और ऊपर खड़ी एक वशाल आकृ त
जसके चरण लहर छू रही ह। क व ने न कह ‘भारत महान है’ लखा, न कोई नारा दया — फर भी पूरी म हमा
खड़ी हो गई। यही चत्रात्मक भाषा क श क्त है, जसक चचा पुस्तक ‘क वता का स दय’ म करती है।
शल्प क बात: रूपक — लंका पर चरणतल के कमल का आरोप; भारतभू म पर दे वी का आरोप। मानवीकरण
— समुद्र मनुष्य क तरह चरण धोता है (पूरी क वता क यही एकमात्र स्पष्ट क्रया है — ‘धोता’)। अनुप्रास —
‘लंका पदतल शतदल’ म ‘ल’ क तीन आवृ त्तयाँ, ‘श◌ु च चरण’ म ‘च’ क । सामा सक पद — पदतल, शतदल,
ग जतो म, सागर-जल, चरण-युगल। तुक — शतदल – सागर-जल – युगल।
प्र.2 (ख) “प्राण प्रणव ओंकार, ध्व नत दशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!”
अथ — ‘ॐ’ क प वत्र ध्व न ही तुम्हारे प्राण ह; तुम्हारी उदार दशाएँ उसी ध्व न से गूँज रही ह; हे सौ मुख से उठे सौ स्वर द्वारा
मुख रत होने वाली (भार त)!
भाव — यह क वता का समापन है और यह उसका सबसे बड़ा अथ खुलता है। अब तक क व भारत का शरीर गना रहा था —
चरण, वस्त्र, हार, मुकुट। अंत म वह भारत के प्राण बताता है, और वे प्राण कोई वस्तु नह , एक ध्व न ह। भाव के तीन स्तर ह —
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1. भारत क पहचान उसक भू म नह , उसक ज्ञान-चेतना है। ‘प्रणव’ यानी ओंकार — भारतीय चतन म यह सृ ष्ट का मूल
नाद और ज्ञान का प्रतीक माना गया है। इसे ‘प्राण’ कहकर क व यह घो षत करता है क भारत जी वत इस लए है क उसके
भीतर वचार और साधना क परंपरा साँस ले रही है। पाठ क भू मका भी कहती है — ‘क व भारत को एक चेतन सत्ता के
रूप म दे खता है, जसक दशाओं म ओंकार क गूँज हो रही है’।
2. भारत क दशाएँ ‘उदार’ ह। शब्द-संपदा के अनुसार उदार = दानशील, दयालु। यानी भारत क सीमाएँ द वार नह , खुले
दरवाज़े ह; यह दे श लेता नह , दे ता है। इसी उदारता के कारण उसक ध्व न चार दशाओं म फैल पाती है — और यही ‘समस्त
वश्व म भारत के महत्व का उ ोष’ बनता है।
3. भारत अनेक स्वर का दे श है। ‘शतमुख-शतरव’ यानी सौ मुख और सौ ध्व नयाँ; यहाँ ‘शत’ गनती नह , अन गनत का प्रतीक
है। सैकड़ भाषाएँ, बो लयाँ, पव, संगीत, पंथ और वचार — सब एक साथ बोलते ह। पर क व इसे शोर नह कहता, ‘मुखर’
कहता है। यानी व वधता भारत क कमज़ोरी नह , उसक वाणी है। एकता का अथ यहाँ एकरूपता नह , अनेक स्वर का एक
साथ बजना है — यही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ क भावना है, जस पर पुस्तक आगे प्रश्न भी पूछती है।
ध्यान दे ने योग्य बात: क वता दृश्य से आरंभ हुई थी (कमल, समुद्र, वन, गंगा, बफ़) और ध्व न पर समाप्त होती है।
यह क्रम आक स्मक नह है — दखाई दे ने वाली चीज़ मट सकती ह, पर ध्व न दशाओं म फैलकर बनी रहती है।
इसी लए क व ने भारत के प्राण कसी पवत या नद म नह , एक ध्व न म रखे।
शल्प क बात: अनुप्रास — ‘प्राण प्रणव’ म ‘प्र’ क आवृ त्त; ‘शतमुख-शतरव-मुखरे’ म ‘श’ क — यही पुस्तक
का अपना अनुप्रास-उदाहरण है (पृष्ठ 172); ‘दि◌शाएँ उदार’ म ‘द’ क । रूपक — प्राण पर ओंकार का आरोप।
मानवीकरण — दशाएँ ‘उदार’ ह और ‘ध्व नत’ हो रही ह। पुनरु क्त — ‘शत’ दो बार, ‘मुख’ दो बार। श्रव्य बब
— पूरी पं क्त सुनाई दे ती है। तुक — ओंकार – उदार, और अंत म ‘मुखरे’ जो टे क ‘ वजयकरे – कमलधरे’ पर लौट
आता है।
मेरी समझ मेरे वचार — पृष्ठ 169
अभ्यास › रचना से संवाद › मेरी समझ मेरे वचार
रचना से सं वाद चचा
प्र.1 नीचे दए गए प्रश्न पर कक्षा म चचा क जए और उनके उत्तर ल खए— 1. क वता म क व क कस भावना क
अ भव्य क्त मलती है?
क वता म क व क दे शप्रेम और राष्ट्र-गौरव क भावना क अ भव्य क्त मलती है — और यह दे शप्रेम नारे का नह , वंदना का है।
पूरी क वता भारतभू म क स्तु त है, जसम क व मातृभू म को दे वी मानकर उसे प्रणाम करता है। पाठ क भू मका भी यही कहती है
क यह ‘ नराला क दे शप्रेम से ओत-प्रोत एक प्रेरणादायक रचना है’।
इस मूल भावना के भीतर चार अलग-अलग भाव-रंग दखाई दे ते ह —
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# भावना क वता क पं क्त वह पं क्त यह भाव कैसे दखाती है
1 वजय क “भार त, जय, वजयकरे!” किवता का पहला ही श द जयघोष है। किव भारत के िलए िवजय ी
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कामना माँगता है — और यह किवता वतं ता-पूव की है, इसिलए यह कामना
स् त्र
परतं ता के िव एक आशा भी है।
त्र रुद्ध
2 समृ द्ध पर गव “कनक-शस्य-कमलधरे!” भारत की पहचान किव के िलए सोने-सी लहलहाती फ़ सल है — यानी
उसका गव अन्न, कृ िष और म पर है, धन-संगह पर नही ं।
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3 प्रकृ त के प्र त “तरु-तृण-वन-लता वसन”, “गंगा … वन, नदी और पवत यहाँ संस ाधन नही,ं माँ के व और आभूषण है।ं
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श्रद्धा धवल धार हार गले”, “मुकुट शुभ्र इसिलए इनके पित भाव उपयोग का नही,ं आदर का है।
हम-तुषार”
4 ज्ञान और “प्राण प्रणव ओंकार, / ध्व नत दशाएँ किव भारत के पाण िकसी भूखंड में नही,ं ओंक ार यानी ान-परंपरा में
संस्कृ त पर उदार, / शतमुख-शतरव-मुखरे!” दे खता है; और उसकी अनेक भाषाओं- वरों को गव से िगनाता है।
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यह दे शप्रेम कस तरह का है — यह समझना ज़रूरी है: इस क वता म कह कसी शत्रु का नाम नह है, कोई युद्ध
नह है, कोई घृणा नह है। क व केवल यह गनाता है क उसका दे श कतना सुंदर, कतना संपन्न और कतना उदार
है। इस लए यह रचनात्मक दे शप्रेम है — जो कसी के वरुद्ध नह , अपने दे श के पक्ष म खड़ा होता है। ‘उदार’ शब्द
इसका प्रमाण है: भारत क दशाएँ दे ने वाली ह, रोकने वाली नह ।
चचा के लए: कक्षा म पू छए — य द यही क वता आज लखी जाती, तो क व भारत के कौन-से नए ‘आभूषण’
गनाता? (उत्तर म वज्ञान, अंत रक्ष-यात्रा, लोकतंत्र, खेल, फ़ल्म-संगीत जैसे बदु आ सकते ह।)
प्र.2 2. क वता म भारत के प्राकृ तक स दय का वणन कस प्रकार कया गया है? क्या आप मानते ह क प्रकृ त का
संरक्षण करना भी दे शप्रेम का काम है? क्य ?
पहला भाग — प्राकृ तक स दय का वणन कस प्रकार हुआ है।
क व ने भारत क प्रकृ त का वणन अलग-अलग दृश्य के रूप म नह कया। उसने भारत को एक दे वी मानकर प्रकृ त क हर
चीज़ को उसके शरीर का अंग या वस्त्राभूषण बना दया। पाठ क भू मका भी यही कहती है — ‘नद , वन, पुष्प, हमालय, गंगा आ द
प्राकृ तक शोभा को भारत के वस्त्राभूषण क तरह प्रस्तुत कया गया है।’ पूरी योजना इस प्रकार है —
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प्रकृ त का अंग क वता म उसे क्या बनाया गया पं क्त
लंका द्व प चरणों के नीचे िखला कमल “लंका पदतल शतदल,”
समुद्र चरण धोने वाला से वक “ग जतो म सागर-जल / धोता शु च चरण युगल”
वृक्ष, तनके, वन, लताएँ पहने हुए व
स्त्र “तरु-तृण-वन-लता वसन,”
फूल आँचल पर जड़ े र नत् “अंचल म ख चत सुमन;”
गंगा गले का उजला हार “गंगा ज्यो तजल-कण / धवल धार हार गले।”
हमालय क बफ़ िसर का मुकु ट “मुकुट शुभ्र हम-तुषार,”
वणन क तीन वशेषताएँ ध्यान दे ने योग्य ह —
क्रम — चरण से सर तक, यानी द क्षण से उत्तर तक। इससे पूरे भारत का भूगोल एक ही आकृ त म समा जाता है।
मानवीकरण — समुद्र चरण धोता है, दशाएँ बोलती ह। प्रकृ त यहाँ जड़ नह , जी वत है।
रंग-योजना — सोना (कनक-शस्य), हरा (तरु-तृण-वन-लता), सफ़ेद (धवल गंगा, शुभ्र हम)। पूरी क वता एक चत्र क तरह
खुलती है — इसी लए पुस्तक इसे चत्रात्मक भाषा कहती है।
दूसरा भाग — क्या प्रकृ त का संरक्षण भी दे शप्रेम है? क्य ?
हाँ, प्रकृ त का संरक्षण न त रूप से दे शप्रेम का काम है। इसके कारण ये ह —
1. क्य क क वता के अनुसार प्रकृ त दे श का शरीर ही है। य द वन ‘वसन’ ह, गंगा ‘हार’ है और हमालय ‘मुकुट’ है, तो जंगल
काटना दे श के वस्त्र फाड़ना है, नद को गंदा करना उसका हार मैला करना है और ग्ले शयर पघलाना उसका मुकुट गला दे ना है।
जो अपने दे श से प्रेम करता है, वह उसके शरीर को क्ष त नह पहुँचने दे गा।
2. क्य क दे श केवल सीमा-रेखा नह , जीवन-आधार है। दे शप्रेम का अथ केवल झंडा फहराना नह । जस मट्ट से अन्न मलता
है, जस नद से पानी और जन वन से हवा — उनक रक्षा करना दे श के करोड़ लोग के जीवन क रक्षा करना है।
3. क्य क यह सं वधान म लखा हमारा कतव्य है। भारतीय सं वधान के अनुच्छेद 51क(छ) म हर नाग रक का मूल कतव्य
बताया गया है — ‘वन , झील , न दय और वन्य जीव स हत प्राकृ तक पयावरण क रक्षा करे और उसका संवधन करे’। कतव्य
नभाना दे शभ क्त का सबसे ठोस रूप है।
4. क्य क प्रकृ त हमारी सांस्कृ तक पहचान भी है। गंगा, हमालय, तुलसी, पीपल, कमल — ये केवल वस्तुएँ नह , हमारे पव,
गीत और कहावत म बसे हुए प्रतीक ह। इन्ह खो दे ना अपनी संस्कृ त का एक हस्सा खो दे ना है।
5. क्य क यह आने वाली पी ढ़य के प्र त ईमानदारी है। दे श केवल आज के लोग का नह होता। जो हम मला, वैसा ही आगे
स पना — यही सच्चा प्रेम है।
नष्कष: दे शप्रेम केवल वशेष अवसर क भावना नह , रोज़ का व्यवहार है। पेड़ लगाना, पानी बचाना, नद और
तालाब म कचरा न डालना, प्ला स्टक कम करना, कागज़ दोन ओर लखना — ये सब उतने ही दे शभ क्त के काम ह
जतना कोई नारा लगाना। नराला क क वता यही सखाती है, इसी लए पुस्तक इन्ह पं क्तय के आधार पर आगे
‘ मलकर ल शपथ’ म वन-संरक्षण के नयम पर वचार करने को कहती है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे!
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3. “कनक-शस्य-कमलधरे!” पं क्त भारतभू म क कन- कन वशेषताओं क ओर संकेत कर रही है?
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a एकl ही पं क्त भारतभू म क पाँच वशेषताओं क ओर संकेत करती है। पहले पं क्त का अथ खोल ली जए — पुस्तक स्वयं
बताती है (पृष्ठ 171) क ‘कनक-शस्य’ का अथ है कनक के समान शस्य (सोने जैसी फसल) और ‘कमलधरे’ का अथ है हे कमल
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को धारण करने वाली!
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# वशेषता पं क्त का कौन-सा
शब्द इसे बताता है
शय
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1 कृ ष-प्रधानता स् शब्द-संपदा के अनुसार शस्य = फसल, खेती, अन्न, धान्य। भारत क पहचान क व
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के लए उसके खेत ह — यही उसक सबसे पहली वशेषता है।
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‘सोने जैसी फ़सल’ का अथ है — फ़सल हीgयहाँ का सोना है। भारत को प्राचीन
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emसंपन्नता
2 धन-धान्य कनक + श य
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काल से ‘सोने क च ड़या’ कहा जाता रहा है; क व उसी समृ द्ध क ओर संकेत
करता है।
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3 श्रम का स दय शय स् फ़सल अपने आप नह उगती — उसके पीछे कसान का प रश्रम है। पाठ क
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भू मका इसी को ‘भारत क कृ ष-परंपरा और श्रम के स दय’ कहती है।
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4 वैभव और
शुभता
कमल
agl कमल भारतीय परंपरा म लक्ष्मी, प वत्रता और शुभता का प्रतीक है। ‘कमलधरे’
कहकर क व भारतभू म को समृ द्ध क दे वी के रूप म दे खता है।
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कमलधरे (संबोधन)
भारतभू म भू म नह रह जाती, माँ बन जाती है। m
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5 मातृ-रूप और ‘-धरे’ स्त्री लग संबोधन है, जैसे दे वी को पुकारा जाता है। इसी एक प्रत्यय से
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पूज्यता
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seएक बारीक बात: ‘कनक’ का अथ शब्द-संपदा म सोना, पलाश, चंपा — तीन दया गया है। पलाश और चंपा
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ag दोन फूल का रंग भी सुनहरा-नारंगी होता है। इस लए यह शब्द एक साथ धातु क चमक और फूल क कोमलता —
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दोन ले आता है। ऐसी बहु-अथता ही नराला क भाषा क वशेषता है, और क व स्वयं आगे इसे स्वीकार भी करता
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है — ‘स्तव कर बहु-अथ-भरे!’
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शल्प: ‘कनक-शस्य’ म तुलना समास के भीतर छपी है (कनक के समान शस्य) — इसे उपमानवाचक कमधारय
कहते ह। साथ ही ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ म ‘क’ क आवृ त्त से अनुप्रास बनता है।
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4. “मुकुट शुभ्र हम-तुषार” पं क्त म हमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्य ?
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क व ने हमालय को भारत का मुकुट इस लए कहा है क्य क मुकुट के जतने भी लक्षण होते ह, वे सब हमालय म मलते ह —
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स्थान, रंग, ऊँचाई, रक्षा और गौरव। कारण एक-एक करके दे खए —
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# कारण व्याख्या
1 ान — सबसे मुकुट सर पर पहना जाता है। क वता म भारत एक खड़ी हुई दे वी है और हमालय उसके भूगोल का सबसे
ऊपर उत्तरी और सबसे ऊँचा छोर है। जो सबसे ऊपर है, वही मुकुट होगा — कल्पना यहाँ भूगोल से पूरी तरह मेल
खाती है।
2 रंग — श्वेत और ‘शुभ्र’ का अथ है उज्ज्वल, चमक ला, सफ़ेद, चाँद जैसा। बफ़ से ढक चो टयाँ धूप म चाँद -सी दमकती ह,
उज्ज्वल ठ क जड़ाऊ मुकुट क तरह। ‘ हम-तुषार’ म हम और तुषार दोन शब्द रखकर क व ने यह चमक और गाढ़
कर द है।
3 ऊँचाई — गौरव मुकुट सम्मान और ग रमा का चह्न है। संसार क सबसे ऊँची चो टयाँ हमालय म ह, इस लए वह भारत के गौरव
का प्रतीक और मस्तक क ऊँचाई का प्रतीक बन जाता है। ‘ सर ऊँचा होना’ मुहावरा भी इसी भाव से जुड़ा है।
4 रक्षक — प्रहरी मुकुट सर को ढँ कता है। हमालय भी स दय से भारत के उत्तर म प्रहरी क तरह खड़ा है — वह उत्तर से आने
क तरह वाली बफ़ ली हवाओं को रोकता है और मानसून के बादल को टकराकर वषा म बदल दे ता है। यानी वह केवल
सजावट नह , रक्षक भी है।
5 जीवनदाता गंगा, यमुना, सधु, ब्रह्मपुत्र — सब हमालय से नकलती ह। जो मुकुट क वता क अगली पं क्त के ‘हार’ (गंगा)
को भी जन्म दे ता है, वह भारत के लए केवल आभूषण नह , जीवन का ोत है।
यहाँ कौन-सा अलंकार है — पुस्तक के शब्द म: ‘उपयुक्त पं क्त म हमालय को भारत का मुकुट कहा गया है।
वास्तव म हमालय मुकुट नह है, ले कन क व ने कल्पना के बल पर उसे मुकुट का रूप दे दया। इससे भारत क
छ व भव्य और दव्य बन जाती है। यहाँ गुण क अत्यंत समानता के कारण उपमेय म उपमान का अभेद स्था पत
कया गया है, इसी लए यहाँ रूपक अलंकार है’ (पृष्ठ 172)। ध्यान र खए — क व ने ‘ हमालय मुकुट जैसा है’ नह
कहा; उसने ‘मुकुट’ कह ही दया। यही उपमा और रूपक का अंतर है।
जोड़ ली जए: ‘झरोखे से’ म द गई मै थलीशरण गुप्त क क वता भी हमालय को ही उठाती है — पर वहाँ वह
मुकुट नह , हृदय है: “ऊँचा हया हमालय तेरा / उसम कतना दरद भरा”। दोन कल्पनाओं क तुलना क जए —
नराला के लए हमालय गौरव है, गुप्त जी के लए वेदना।
क वता का स दय — पृष्ठ 169 और 170
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अभ्यास › वधा से संवाद › क वता का स दय
वधा से सं वाद ता लका
प्र.1 नीचे द गई पं क्तय को प ढ़ए — “भार त, जय, वजयकरे! कनक-शस्य-कमलधरे!” — इन पं क्तय म क व ने
चत्रात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए भारतभू म का मनोरम चत्र प्रस्तुत कया है। इस क वता क कुछ अन्य
वशेषताओं क सूची नीचे द गई है। क वता म से उन वशेषताओं वाली पं क्तय को ढूँ ढ़कर ल खए— प्रकृ त का
मानवीकरण / आलंका रक प्रयोग / समस्त पद/सामा सक पद का प्रयोग / संस्कृत नष्ठ भाषा प्रयोग
पहले ‘ चत्रात्मक भाषा’ को समझ ली जए — चत्रात्मक भाषा वह है जसे पढ़ते ही आँख के सामने चत्र बन जाए। द गई
पं क्तय म क व ने कोई व्याख्या नह क , केवल दो नाम रखे — सोने जैसी फ़सल और कमल — और भारतभू म का पूरा दृश्य
खड़ा हो गया: लहलहाते सुनहरे खेत, और उन्ह धारण कए एक दे वी। क व बताता नह , दखाता है — यही चत्रात्मकता है।
अब पुस्तक क ता लका, पूरी भरी हुई —
वशेषताएँ क वता क पं क्तयाँ
प्रकृ त का मानवीकरण “गिजतोिम सागर -जल / धोता शुिच चरण युग ल ”
“ध् विनत िदशाएँ उदार ,”
आलंका रक प्रयोग “मुकु ट शुभ िहम -तुषार ,” (रूपक)
“शतमुख-शतरव-मुखरे !” (अनुपास)
“गंग ा ज्योितजल -कण / धवल धार हार गले । ” (रूपक + अनुपास)
समस्त पद/सामा सक पद का प्रयोग “कनक -शस्य-कमलधरे !”
ृ -वन-लता वसन,”
“तरु-तण
“शतमुख-शतरव-मुखरे !”
संस्कृत नष्ठ भाषा प्रयोग “धोता शुिच चरण युग ल / स्तव कर बहु-अथ-भरे !”
“पाण पणव ओंक ार ,”
“अंचल में खिचत सुम न;”
हर पं क्त क्य चुनी गई —
1. प्रकृ त का मानवीकरण — “ग जतो म सागर-जल / धोता शु च चरण युगल”। मानवीकरण वहाँ होता है जहाँ जड़ या
नज व वस्तु मनुष्य क तरह व्यवहार करने लगे। यहाँ समुद्र केवल टकरा नह रहा — वह चरण धो रहा है, जो मनुष्य का, और
वह भी आदर-भाव से भरा हुआ, काम है। ध्यान द जए, पूरी क वता म यही एकमात्र स्पष्ट क्रया है — ‘धोता’ — और वह
प्रकृ त को ही द गई है।
दूसरा उदाहरण: “ध्व नत दशाएँ उदार,” — दशाएँ बोलती भी ह और ‘उदार’ यानी दानशील भी ह। ये दोन मनुष्य के गुण ह।
2. आलंका रक प्रयोग — “मुकुट शुभ्र हम-तुषार,” और “शतमुख-शतरव-मुखरे!”। ये दोन पुस्तक के अपने उदाहरण ह
(पृष्ठ 172) — पहली म रूपक ( हमालय पर मुकुट का अभेद आरोप) और दूसरी म अनुप्रास (‘श’ वण क पुनरावृ त्त)। तीसरा
उदाहरण “गंगा ज्यो तजल-कण / धवल धार हार गले।” है, जसम एक साथ दोन अलंकार ह — गंगा-धारा पर हार का आरोप
(रूपक) और ‘धवल धार हार’ म ‘ध’ क आवृ त्त (अनुप्रास)।
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3. समस्त पद/सामा सक पद का प्रयोग — “कनक-शस्य-कमलधरे!”, “तरु-तृण-वन-लता वसन,”, “शतमुख-शतरव-
मुखरे!”। ये तीन पं क्तयाँ इस लए चुनी गईं क इनम दो-दो, तीन-तीन शब्द जुड़कर एक पद बन गए ह — ‘कनक-शस्य’
(कनक के समान शस्य), ‘कमलधरे’ (कमल को धारण करने वाली), ‘तरु-तृण-वन-लता’ (द्वं द्व समास — तरु, तृण, वन और
लता), ‘शतमुख’ (सौ मुख वाली), ‘शतरव’ (सौ ध्व नयाँ)। पुस्तक स्वयं कहती है क ‘कनक-शस्य’ और ‘कमलधरा’ समस्त
पद/सामा सक पद ह (पृष्ठ 171)।
और उदाहरण: ‘ग जतो म’, ‘सागर-जल’, ‘बहु-अथ-भरे’, ‘ज्यो तजल-कण’, ‘ हम-तुषार’।
4. संस्कृत नष्ठ भाषा प्रयोग — “धोता शु च चरण युगल / स्तव कर बहु-अथ-भरे!”। इन दो चरण म ‘धोता’ को छोड़कर हर
शब्द तत्सम है — शु च, चरण, युगल, स्तव, अथ। ‘प्राण प्रणव ओंकार,’ म तीन शब्द संस्कृत के ह और तीन दशन क
शब्दावली से आए ह। ‘अंचल म ख चत सुमन;’ म ‘ख चत’ और ‘सुमन’ ऐसे शब्द ह जो आज बोलचाल म लगभग नह आते —
इसी लए पुस्तक को दो पृष्ठ क शब्द-संपदा दे नी पड़ी।
इन चार वशेषताओं का आपस म संबंध: ये चार अलग-अलग बात नह ह, एक ही शैली के चार पक्ष ह।
संस्कृत नष्ठ शब्द ग रमा दे ते ह, समास उन्ह कस दे ता है (चार शब्द क बात एक पद म आ जाती है), अलंकार उसम
ध्व न और चत्र भरते ह, और मानवीकरण भारत को जी वत कर दे ता है। इन चार के मेल से जो बनता है, उसे
काव्यशास्त्र म ओज गुण कहते ह — वही गुण जो कसी वंदना या जयघोष के लए चा हए।
ता लका भरते समय ध्यान रख: हर वशेषता के लए पूरी पं क्त ल खए, केवल शब्द नह — क्य क वशेषता
पं क्त म सद्ध होती है। और यथासंभव अलग-अलग पं क्तयाँ चु नए; एक ही पं क्त चार जगह लख दे ने से उत्तर
कमज़ोर लगेगा (यद्य प इस क वता क कई पं क्तय म एक साथ तीन-तीन वशेषताएँ मौजूद ह)।
वषय से संवाद — पृष्ठ 170
अभ्यास › वषय से संवाद
वषय से सं वाद ले ख न
प्र.1 1. स्वतंत्रता-पूव लखी इस क वता म भारत को ज्ञान, कृ ष और संस्कृ त के प्रतीक/प रचायक के रूप म प्रस्तुत
कया गया है। वतमान संदभ म य द आपको भारत को एक नए रूप म प्रस्तुत करने का अवसर मले तो आप
भारत क कन वशेषताओं और व वधताओं को स म्म लत करगे?
पहले यह दे ख ली जए क नराला ने क्या-क्या रखा था — ज्ञान (‘प्राण प्रणव ओंकार’), कृ ष (‘कनक-शस्य’), प्रकृ त (‘तरु-
तृण-वन-लता’, ‘गंगा’, ‘ हम-तुषार’) और अनेक स्वर (‘शतमुख-शतरव-मुखरे’)। ये आज भी सच ह, इस लए इन्ह हटाना नह है —
इनम जोड़ना है। आज का भारत वह भी है जो 1947 के बाद बना।
अच्छे उत्तर म क्या होना चा हए —
कम-से-कम पाँच-छह क्षेत्र चुने जाएँ, और हर एक के साथ एक ठोस उदाहरण हो — केवल ‘भारत महान है’ जैसा वाक्य नह ।
वशेषताएँ और व वधताएँ — दोन आएँ, क्य क प्रश्न दोन माँग रहा है।
उपल य के साथ-साथ मूल्य भी आएँ — लोकतंत्र, समानता, सहअ स्तत्व।
अंत म यह भी कहा जाए क कन चुनौ तय को नह छपाना चा हए — ईमानदार प्रस्तु त ही अच्छ प्रस्तु त है।
नमूना उत्तर:
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य द मुझे आज भारत को नए रूप म प्रस्तुत करने का अवसर मले, तो म उसे ‘पुरानी जड़ वाला नया वृक्ष’ कहकर प्रस्तुत करूँगा
— जड़ वही, शाखाएँ नई। म इन वशेषताओं और व वधताओं को स म्म लत करूँगा —
क्षेत्र क्या स म्म लत करूँगा क्य
लोकतंत्र संिवधान, हर पाँच वष में होने वाला िवशाल चुनाव, भारत वश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। करोड़ लोग का
वय क मतािधकार
स् शां तपूवक अपनी सरकार चुनना अपने आप म एक उपल है।
वज्ञान और चंद यान और मंगलयान जैसे अिभयान, ISRO, ‘प्राण प्रणव ओंकार’ वाली ज्ञान-परंपरा का आज का रूप यही है
अंत रक्ष टीका-िनम ण की मता क्ष — जज्ञासा वही है, उपकरण नए ह।
ड जटल भारत यूपीआई से होने वाला िडिजटल भुगतान, आधार, छोटे -से गाँव क दुकान पर भी क्यूआर कोड दखना बताता है क
ऑनलाइन िश ा क्ष तकनीक कुछ लोग तक सी मत नह रही।
भाषाई संिवधान की आठवी ं अनुस ूची की 22 भाषाएँ, यही ‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ का आज का प्रमाण है। म एक ही
व वधता सै क ड़ ों बोिलयाँ, अनेक िलिपयाँ वाक्य को कई भाषाओं म लखकर दखाऊँगा — जैसे पुस्तक
‘भाषा संगम’ म ‘शस्य’ के लए करती है।
पव और कला होली, ईद , ि समस , बैस ाखी, ओणम, िबहू, व वधता को गनाना नह , एक साथ दखाना चा हए — तभी
पोंगल , छठ; भरतनाट म से ले क र िबहू न ृ य तक ;
त् ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ क भावना सामने आती है।
मधुबनी, वारली, प िच ट्ट त्र
कृ ष और हिरत ांित, वेत ांित, मोटे अनाज ( ी अन्न/
श् श्र नराला का ‘कनक-शस्य’ आज भी जी वत है — अंतर यह है क
खाद्य-सुरक्षा िमले ट्स ) की वापसी अब भारत अपने लए अन्न स्वयं उगाता है।
प्रकृ त और जैव िहमालय से सुंद रवन तक , बाघ और गंगा आज प्रकृ त केवल शोभा नह , ज़म्मेदारी भी है — इस लए म
व वधता डॉि फ़ न का संर ण, नवीकरणीय ऊज
ल् क्ष संरक्षण के प्रयास भी दखाऊँगा।
म हलाएँ और खेल , िव ान, से ना और पंचायत में मिहलाओं की नराला क क वता म भारत स्त्री-रूप म है, पर उसम स्त्रयाँ नह
युवा भागीदारी; िव व की सबसे युवा आबािदयों में से
श् ह। आज क प्रस्तु त म वे अवश्य होनी चा हए।
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‘वसुधैव आपदा में दू स रे दे शों को सहायता, योग का िव व- श् क वता का शब्द ‘उदार’ (दानशील) आज भी भारत क सबसे
कुटुं बकम्’ का पसार, शांित-से नाओं में योगदान अच्छ पहचान है।
भाव
और म यह भी स म्म लत करूँगा — म भारत को केवल सुंदर बनाकर नह दखाऊँगा। म उसक चुनौ तयाँ भी रखूँगा — प्रदू षत
होती न दयाँ, कटते जंगल, असमानता और बेरोज़गारी — क्य क जो दे श अपनी क मयाँ स्वीकार कर सकता है, वही उन्ह सुधार भी
सकता है। सच्चा दे शप्रेम आँख मूँदकर प्रशंसा करना नह , आँख खोलकर सुधार करना है।
प्रस्तु त का सुझाव: इसे एक ‘तब और अब’ चाट के रूप म बनाइए — बाईं ओर नराला क पं क्त, दाईं ओर
उसका आज का रूप। जैसे — ‘कनक-शस्य’ → खाद्यान्न म आत्म नभरता; ‘प्राण प्रणव ओंकार’ → चंद्रयान;
‘शतमुख-शतरव’ → 22 अनुसू चत भाषाएँ। ऐसा चाट पूरी कक्षा के सामने बात को एक झटके म स्पष्ट कर दे ता है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे!
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2. “शतमुख-शतरव-मुखरे!” पं क्त म भारत के व वध पव, उत्सव और री त- रवाज कस प्रकार ‘एक भारत,
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श्रेष्ठ भारत’ क संकल्पना को साकार करते ह?
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पहले पं क्त का अथ — ‘शतमुख’ यानी सौ मुख और ‘शतरव’ यानी सौ ध्व नयाँ; ‘मुखरे’ यानी बोलती हुई। क व भारत को उस
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सत्ता के रूप म दे खता है जो सौ मुख से बोलती है। यहाँ ‘शत’ गनती नह , अन गनत का प्रतीक है। और सबसे ज़रूरी बात —
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क व इन सौ स्वर को शोर नह कहता, ‘मुखर’ कहता है। शोर म स्वर टकराते ह; मुखरता म वे मलकर बोलते ह।
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ag लोग एक साथ रह पाते ह। पव, उत्सव और री त- रवाज इस बात को इन
यही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का मूल वचार है — एकता का अथ एकरूपता नह । भारत इस लए एक नह है क यहाँ सब
एक जैसे ह, ब ल्क इस लए एक है क यहाँ अलग-अलग
तरीक़ से साकार करते ह —
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1. एक ही पव, अनेक नाम और रूप। फ़सल के आने क खुशी पूरे दे श म मनाई जाती है, पर हर अंचल का अपना नाम है —
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.cभाव एक है — अन्न के प्र त कृतज्ञता, यानी वही ‘कनक-शस्य’ वाली भावना। सौagमुख अलग ह, ध्व न क जड़ एक है।
पंजाब म बैसाखी, त मलनाडु म प गल, असम म बहू, केरल म ओणम, गुजरात म उत्तरायण, ओ डशा-बंगाल म मकर
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seपव सबका बन जाता है। होली क टोली, ईद क सवइयाँ, गुरुपव का लंगर, क्रसमस का केक, बुद्ध पू णमा क शां त —
संक्रां त।
2.aहर
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a g इनम भाग लेने के लए कसी को अपना धम नह बदलना पड़ता। पव यहाँ बाँटते नह , बुलाते ह। यही ‘उदार दशाएँ’ ह।
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3. तीथ और मेले पूरे दे श को आपस म बुनते ह। कुंभ, गंगासागर, पुष्कर, सोनपुर, रथयात्रा, पंढरपुर क वारी — इनम दूर-दूर के
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लोग एक जगह आते ह। एक बहार का यात्री त मलनाडु के मं दर म और एक त मल यात्री ह रद्वार म मलता है। यात्रा ने भारत
को भूगोल से पहले भावना म जोड़ा है।
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4. अनेक भाषाएँ, एक भाव। सं वधान क आठव अनुसूची म 22 भाषाएँ ह और बो लयाँ सैकड़ । पुस्तक का भाषा संगम बॉक्स
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इसी का प्रमाण है — एक ही शब्द ‘शस्य’ अठारह भाषाओं म अलग-अलग ध्व न लेकर आता है, पर अथ एक ही रहता है:
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उपज। यही शतमुख-शतरव का जी वत उदाहरण है।
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5. राष्ट्रीय पव सबके साझे ह। 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्तूबर हर गाँव, हर भाषा और हर पंथ म एक ही दन, एक ही
g साफ़ सुनाई देता है।
.cमनाए जाते ह। जहाँ सौ स्वर एक साथ एक ही गीत गाते ह, वह ‘एक भारत’ सबसे
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s6.e ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ कायक्रम इसी वचार को व्यवहार म लाता है — इसम एक राज्य को दूसरे राज्य से जोड़ा जाता है
तरह
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agl और वद्याथ एक-दूसरे क भाषा, भोजन, पव और लोकगीत सीखते ह। यह ठ क वही काम है जो क वता क यह पं क्त भाव के
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स्तर पर करती है।
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नष्कष: संगीत का उदाहरण ली जए। वाद्यवृंद म तबला, बाँसुरी, वीणा और मृदंग — सबक ध्व न अलग होती है।
य द सब एक ही ध्व न नकाल तो संगीत नह बनेगा; और य द हर एक अपनी ताल पर बजे तो केवल शोर होगा।
संगीत तभी बनता है जब अलग-अलग स्वर एक ही ताल म बज। भारत यही वाद्यवृंद है — ‘शतमुख’ अलगाव नह ,
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समृ द्ध है, और ‘मुखर’ होना ही उसक एकता का प्रमाण है।
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m .cकरके दे खए: कक्षा म एक ‘पव-मान चत्र’ बनाइए — भारत के नक़्शे परaहरgराज्य का एक प्रमुख पव चपकाइए
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और उसके नीचे उसका मूल भाव ल खए (फ़सल, नववष, वजय, भाई-बहन का स्नेह)। आप दे खगे क नाम बीस ह,
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पर भाव पाँच-छह ही नकलगे।
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे! AglaSem · NCERT Solutions
प्र.3 3. भारत को सुदृढ़ करने म इसक प्रकृ त, संस्कृ त और ज्ञान-परंपरा के महत्व को बताते हुए सं क्षप्त लेख
ल खए।
लेख लखने क व ध — एक अच्छे सं क्षप्त लेख म चार हस्से होते ह: शीषक, भू मका ( वषय क्य ज़रूरी है), मुख्य भाग
(एक-एक बदु, हर बदु के साथ उदाहरण) और उपसंहार ( नष्कष तथा हमारा कतव्य)। हर अनुच्छेद एक ही बात कहे, और य द
पाठ से जुड़ी कोई पं क्त उद्धत क जा सके तो लेख और मज़बूत बनता है।
नमूना उत्तर:
शीषक — भारत क तीन न व: प्रकृ त, संस्कृ त और ज्ञान
भू मका — कोई दे श केवल सीमा-रेखाओं से मज़बूत नह होता। उसक असली श क्त उन चीज़ म होती है जो उसे भीतर से बाँधे
रखती ह। सूयकांत त्रपाठ ‘ नराला’ ने अपनी क वता ‘भार त, जय, वजयकरे!’ म भारत का जो चत्र ख चा है, वह इसी सत्य को
दखाता है — उसम फ़सल भी है, गंगा और हमालय भी, और ‘प्राण प्रणव ओंकार’ भी। यानी भारत क न व तीन ह — प्रकृ त,
संस्कृ त और ज्ञान-परंपरा।
1. प्रकृ त — दे श का शरीर। हमालय उत्तर म प्रहरी क तरह खड़ा होकर ठं डी हवाओं को रोकता है और मानसून को वषा म बदल
दे ता है। उसी से गंगा, यमुना, सधु और ब्रह्मपुत्र नकलती ह, जनके मैदान म दे श का अन्न उगता है। वन हम हवा, लकड़ी, औष ध
और वषा दे ते ह, और समुद्र व्यापार तथा मत्स्य-संपदा। नराला ने इसी बात को सबसे सुंदर ढं ग से कहा — वन भारत के ‘वसन’ ह,
गंगा उसका ‘हार’ और हमालय उसका ‘मुकुट’। जब प्रकृ त दे श का शरीर ही है, तो उसक रक्षा दे श क रक्षा है। आज जल-संकट,
प्रदूषण और जलवायु प रवतन हम यही याद दला रहे ह।
2. संस्कृ त — दे श का मन। भारत क संस्कृ त क सबसे बड़ी वशेषता उसक व वधता है। यहाँ 22 अनुसू चत भाषाएँ, सैकड़
बो लयाँ, अनेक पंथ, नृत्य-शै लयाँ, चत्रकलाएँ और पव एक साथ चलते ह। नराला ने इसी को ‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ कहा है।
यह व वधता कमज़ोरी नह , जोड़ने वाली श क्त है — क्य क जो समाज अलग-अलग लोग को साथ रहना सखा दे ता है, वह कसी
भी संकट म टू टता नह । ‘वसुधैव कुटुं बकम्’ और ‘अ त थ दे वो भव’ जैसे भाव भारत क उसी उदारता से आते ह, जसे क व ने
‘ध्व नत दशाएँ उदार’ कहा।
3. ज्ञान-परंपरा — दे श के प्राण। भारत म ज्ञान क धारा कभी रुक नह । वेद-उप नषद से लेकर आयभट, चरक, सुश्रुत और
पा ण न तक; तक्ष शला और नालंदा जैसे वश्व वद्यालय से लेकर आज के ISRO, IIT और अनुसंधान संस्थान तक — प्रश्न पूछने
क आदत यहाँ क सबसे पुरानी परंपरा है। शून्य और दशमलव-पद्ध त भारत क दु नया को द गई दे न है। क व ने इसी परंपरा को
भारत का ‘प्राण’ कहा — ‘प्राण प्रणव ओंकार’। शरीर और मन तभी काम करते ह जब प्राण ह ; इसी तरह प्रकृ त और संस्कृ त तभी
साथक ह जब समाज सोचना और सीखना जारी रखे।
तीन का आपसी संबंध — ये तीन अलग खाने नह ह, एक-दूसरे से बँधे ह। नद बची रहेगी तो खेती बचेगी; खेती बचेगी तो पव
और लोकगीत बचगे; और ज्ञान बचेगा तभी हम नद को बचाने के उपाय खोज पाएँगे। एक कड़ी टू टती है तो तीन कमज़ोर हो जाती
ह।
उपसंहार — भारत को सुदृढ़ करने का अथ केवल सेना या अथव्यवस्था को मज़बूत करना नह है। इसका अथ है — अपनी न दय
को साफ़ रखना, अपने जंगल बचाना, अपनी भाषाएँ और कलाएँ जी वत रखना और अपने बच्च को प्रश्न पूछना सखाना। ये तीन
काम कोई सरकार अकेले नह कर सकती; ये नाग रक के रोज़ के व्यवहार से होते ह। नराला क क वता हम यही याद दलाती है क
भारत केवल भू म का टु कड़ा नह — वह एक जी वत सत्ता है, जसका शरीर प्रकृ त है, मन संस्कृ त और प्राण ज्ञान।
लेख लखते समय: हर अनुच्छेद म कम-से-कम एक ठोस उदाहरण या पाठ क एक पं क्त अवश्य द जए। बना
उदाहरण के लखा गया लेख भाषण जैसा लगता है, प्रमाण जैसा नह । लंबाई लगभग 250–300 शब्द र खए —
‘सं क्षप्त लेख’ का यही अथ है।
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प्र.4 4. क वता म गंगा को भारत के स्वच्छ और श्वेत हार एवं हमालय को मुकुट के रूप म अ भव्यक्त कया गया है।
वतमान संदभ म बताइए क बढ़ते प्रदूषण और जलवायु प रवतन ने हमारी न दय और हमालय को कस प्रकार
प्रभा वत कया है?
क वता म गंगा ‘धवल धार हार’ है और हमालय ‘मुकुट शुभ्र हम-तुषार’। आज इन दोन बब क तुलना वास्त वकता से कर तो
चता होती है — हार का उजलापन घट रहा है और मुकुट क बफ़ पघल रही है।
क — न दय पर प्रभाव
कारण क्या हो रहा है
घरेलू मल-जल नदी-िकनारे बसे नगरों का िबना शोिधत पानी सीधे नदी में िगरता है। यही आज नदी-पदू षण का सबसे बड़ ा कारण माना
(सीवेज) जाता है। इससे पानी में घुल ी ऑ सीजन घट जाती है और जलीय जीव मरने लगते है।ं
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औद्यो गक अप शष्ट चमड़ ा, काग़ ज़, चीनी, रसायन और रंगाई के कारख़ानों का रासायिनक जल नदी में िमलता है। इससे पानी में भारी
धातुए ँ पहचु ँ ती है,ं जो मछिलयों के रा ते हमारे भोजन तक आ जाती है।ं
स्
खेती के रसायन खेतों से बहकर आने वाले रासायिनक उवरक और कीटनाशक नदी में जमा होते है ं और जल -वन पित को अिनयंि त
स् त्र
प से बढ़ ा दे ते है।ं
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ठोस कचरा और पूजा-सामगी, पॉिलथीन और मूित-िवसजन का मलबा घाटों पर जमा हो जाता है। लाि टक गलता नही,ं इसिलए वह
प् स्
प्ला स्टक वष ं नदी में बना रहता है।
जल-दोहन और िसंचाई, नहरों, बाँधों और भूजल के अ यिधक दोहन से निदयों में पवाह घट गया है। बहाव कम हो तो नदी अपने आप
त्
अवरोध को साफ़ नही ं कर पाती — बहती नदी ही िनमल रहती है।
अवैध रेत-खनन और नदी-तल से रे त िनकालने और बाढ़ - े में िनम ण करने से नदी का पाकृ ितक रा ता बदल जाता है और बाढ़ का ख़तरा
क्ष त्र स्
अ तक्रमण बढ़ ता है।
जीव-जगत पर असर गंगा डॉि फ़ न — जो भारत की रा ीय जलीय जीव है — घिड़ याल , कछु ए और अनेक मछिलयाँ संक ट में है।ं डॉि फ़ न
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लगभग अंधी होती है और विन से रा ता खोजती है, इसिलए पदू षण और नाव-यातायात का शोर उसके िलए दोहरी
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मार है।
ख — हमालय पर प्रभाव
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कारण क्या हो रहा है
तापमान-वृ द्ध वै ािनक अ ययनों के अनुस ार िहमालय के अिधकांश िहमनद ( ले िशयर) लगातार पीछे हट रहे है ं — गंगो ी िहमनद , जहाँ
ध् ग् त्र
से भागीरथी िनकलती है, इसका सबसे चिचत उदाहरण है। िहमनद िपघलने पर पहले निदयों में पानी बढ़ ता है, पर आगे
चलकर गिमयों का थायी जल - ोत ही घट जाता है।
स्
हमनद-झील बाढ़ िपघलते िहमनदों के सामने बनी झीले ं अचानक फू ट पड़ ती है ं और नीचे की घािटयों में भीषण बाढ़ आती है। हाल के वष ं में
(GLOF) उ राखंड और िसि कम में ऐसी आपदाएँ दे खी गई है।ं
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वषा-चक्र म बफ़ की जगह अब अिधक वष हो रही है, और वह भी कम समय में बहुत अिधक (बादल फटना)। इससे भू खलन और स्
बदलाव अचानक बाढ़ की घटनाएँ बढ़ ी है।ं
काली का लख वाहनों, ईंधन और पराली के धुए ँ से िनकले काले कण बफ़ पर जमकर उसे मैल ा कर दे ते है।ं मैल ी बफ़ अिधक धूप
(ब्लैक काबन) सोखती है, इसिलए वह और तेज़ी से िपघलती है — यानी ‘शुभ’ रहना के वल सौंद य की नही,ं िटकाऊपन की भी शत है।
अ नयं त्रत पहाड़ ों को काटकर बनी सड़ कें , सुरंगें, बड़ ी पिरयोजनाएँ और भारी वाहन-यातायात ढलानों को कमज़ ोर करते है।ं
नमाण और जोशीमठ में दे खा गया भू-धंस ाव इसी दबाव की चेतावनी है। तीथ-माग ं और टैिकं ग-माग ं पर जमा होता लाि टक कचरा
प् स्
पयटन अलग सम या है।
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वन-कटाव ढलानों के जंगल कटने से िम ी को पकड़ ने वाला कु छ नही ं बचता, इसिलए भू खलन और िम ी का कटाव बढ़ जाता है —
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और वही िम ी बहकर निदयों में गाद के प में जमा होती है।
ट्ट रू
ग — दोन समस्याएँ आपस म जुड़ी ह
हमालय और गंगा दो अलग समस्याएँ नह ह — मुकुट पघलेगा तो हार सूख जाएगा। हमालय क बफ़ ही ग मय म
न दय को पानी दे ती है। य द हमनद घटे , तो नद म प्रवाह घटे गा; प्रवाह घटे गा तो प्रदूषण और गाढ़ा होगा; प्रदूषण
बढ़े गा तो जल-जीवन समाप्त होगा और करोड़ लोग का पेयजल तथा सचाई संकट म पड़ेगी। नराला ने अनजाने ही
यह संबंध क वता म रख दया है — उनक क वता म भी हमालय (मुकुट) और गंगा (हार) एक ही शरीर के दो
आभूषण ह।
घ — क्या कया जा रहा है और हम क्या कर सकते ह
सरकारी प्रयास — गंगा को सन् 2008 म राष्ट्रीय नद घो षत कया गया; सन् 2014 म नमा म गंगे कायक्रम आरंभ हुआ,
जसके अंतगत मल-जल शोधन संयंत्र, घाट-सुधार और वृक्षारोपण के काम होते ह। जल (प्रदूषण नवारण एवं नयंत्रण)
अ ध नयम, 1974 और पयावरण (संरक्षण) अ ध नयम, 1986 इसके क़ानूनी आधार ह।
हम क्या कर सकते ह — नद और घाट पर कचरा न डाल; पूजा-सामग्री नधा रत स्थान पर ही वस जत कर; प्ला स्टक का
उपयोग घटाएँ; पानी बचाएँ (कम पानी बहाना भी नद बचाना है); पहाड़ पर यात्रा करते समय अपना कचरा वापस लेकर लौट;
पेड़ लगाएँ और स्थानीय तालाब-कुएँ क सफ़ाई म भाग ल।
सो चए: क वता कहती है क गंगा भारत के गले का हार है। कोई भी अपने हार को मैला नह रखता। तो जस दन
हम नद को ‘नाला’ क तरह नह , ‘आभूषण’ क तरह दे खने लगगे — उसी दन आधा काम हो जाएगा।
व वध रंग भारत के — पृष्ठ 170
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अभ्यास › वषय से संवाद › व वध रंग भारत के
वषय से सं वाद गतवध
प्र.1 आप अपने कक्षा-समूह म मलकर भारत क सांस्कृ तक व वधता पर आधा रत एक पावरपॉइंट प्रस्तु त/पोस्टर/
चाट/कोलाज तैयार क जए और इसे अपनी कक्षा म दखाइए। आप भारत के व भन्न राज्य पर क द्रत
पावरपॉइंट प्रस्तु त/पोस्टर/चाट/कोलाज भी बना सकते ह।
यह समूह म करने वाली ग त व ध है। नीचे पूरी काय-योजना द गई है, जसे आप ज्य -का-त्य अपना सकते ह।
1. काम कैसे बाँट (6 वद्या थय का समूह) —
सदस्य ज़म्मेदारी
संयोजक वषय-सूची बनाना, समय-सीमा तय करना, अंत म सब सामग्री जोड़ना।
सामग्री-संग्रह (2) पुस्तकालय, पाठ्यपुस्तक और वश्वसनीय वेबसाइट से जानकारी और चत्र जुटाना; हर जानकारी का ोत लख लेना।
डज़ाइन (1) रंग, शीषक, चत्र क व्यवस्था — एक स्लाइड/एक भाग म एक ही मुख्य बात।
भाषा (1) वाक्य छोटे और शुद्ध रखना; हर स्लाइड पर पाँच-छह से अ धक पं क्तयाँ न ह ।
प्रस्तुतकता (1) कक्षा के सामने बोलना; पहले दो बार अभ्यास करना।
2. नमूना रूपरेखा — ‘ व वध रंग भारत के’ (10 स्लाइड / 10 खाने वाला चाट)
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क्रम शीषक उसम क्या होगा
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1 आवरण
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शीषक ‘ व वध रंग भारत के’, नीचे नराला क पं क्त — “शतमुख-शतरव-मुखरे!”, और भारत का रंगीन
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मान चत्र।
a2gl व वधता क्या है एक वाक्य म वचार: भारत एक नह , अनेक स्वर का दे श है — और यही उसक श क्त है।
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3 भाषाएँ आठव अनुसूची क 22 भाषाएँ; ‘नमस्ते’ या ‘उपज’ शब्द कई भाषाओं म (पाठ का ‘भाषा संगम’ बॉक्स यह
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काम आएगा)।
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4 पव और उत्सव
ag ओणम, छठ, ईद, क्रसमस, गुरुपव — चत्र के साथ; नीचे ल खए क इनका साझा
बैसाखी, प गल, बहू,
भाव क्या है।
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5 वेशभूषा राज्यवार पारंप रक पहनावा — फुलकारी, पैठणी, मेखला-चादर, मुंडु, पगड़ी, घाघरा-चोली।
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6 नृत्य और संगीत भरतनाट्यम, कथकली, कथक, ओ डसी, म णपुरी, कु चपुड़ी, सत्रीया, मो हनीअट्टम; लोकनृत्य — भांगड़ा,
l a se गरबा, बहू, लावणी।
a 7g चत्रकला और मधुबनी ( बहार), वारली (महाराष्ट्र), पट्ट चत्र (ओ डशा), फड़ (राजस्थान), ग ड (मध्य प्रदे श), कलमकारी
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शल्प (आंध्र)।
एक ही अनाज के अनेक m . c o
eरूप — चावल से इडली, पखाल, खचड़ी, पुलाव, चीला। इससे ‘ व वधता म एकता’ agl
सेsसमझ आती है।
सबसे स्वा दष्ट ढं ग a
8 भोजन
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9 प्रकृ त क हमालय, थार, सुंदरवन, प श्चमी घाट, समुद्र-तट — क वता क पं क्तय के साथ।
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व वधता
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10 नष्कष ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ — एक पं क्त म समापन और ोत-सूची।
m त अच्छ बनाने के सूत्र —
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3.
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एक स्लाइड, एक वचार। अ धक लखा हुआ कोई नह पढ़ता।
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चत्र बड़े और स्पष्ट ह ; हर चत्र के नीचे एक पं क्त का कैप्शन।
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aतs पाठ से जुड़ जाएगी।
क वता क पं क्तयाँ जो ड़ए — ‘कनक-शस्य’ के साथ खेत का चत्र, ‘धवल धार हार गले’ के साथ गंगा का, ‘मुकुट शुभ्र हम-
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कोई राज्य छू टे नह — व वधताa दखाते समय कसी क्षेत्र को छोड़ दे ना सबसे बड़ी चूक होती है। पूव त्तर और द्व प-समूह
तुषार’ के साथ हमालय का। इससे प्रस्तु
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अवश्य र खए।
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ोत-सूची अंत म द जए — यह ईमानदारी का चह्न है।
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m ag का मान चत्र और चार ओर
.cय द कंप्यूटर उपलब्ध न हो: चाट पेपर पर कोलाज बनाइए — बीच म भारत
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ag प त्रकाओं-अख़बार से काटे चत्र, धागे से मान चत्र के उस राज्य से जोड़े हुए। यह प्रस्तु त पावरपॉइंट से भी अ धक
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सुंदर लगती है और पूरी कक्षा एक साथ काम कर सकती है।
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सृजन — पृष्ठ 170 और 171
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अभ्यास › सृजन
सृ ज न ले ख न
प्र.1 1. मान ली जए आपको भारत को एक मनुष्य के रूप म क ल्पत करते हुए सुस त करने का अवसर मले तो
आप अपने राज्य के कन सांस्कृ तक, पारंप रक वेशभूषा, आभूषण, च , पुष्प आ द का प्रयोग कर उसक
साज-स ा करगे?
पहले दे खए क नराला ने यह काम कैसे कया — उन्ह ने भारत को दे वी मानकर प्रकृ त से सजाया: लंका चरण का कमल,
वन-वनस्प त वस्त्र, फूल आँचल के रत्न, गंगा गले का हार, हमालय मुकुट। अब यही काम हम अपने राज्य क संस्कृ त से करना है
— यानी हर वस्तु के साथ यह भी बताना है क वह क्य चुनी गई।
अच्छे उत्तर म क्या होना चा हए —
शरीर के अंग का क्रम हो — सर से पाँव तक या पाँव से सर तक; क वता क तरह।
हर वस्तु के साथ एक पं क्त का कारण हो। बना कारण क सजावट केवल सूची बन जाती है।
चुनी हुई चीज़ सचमुच आपके राज्य क ह — काल्प नक नह ।
अंत म एक वाक्य म यह भी क हए क यह सजावट क्या भाव बताती है।
नमूना उत्तर (उदाहरण के लए — राज ान):
य द मुझे भारत को एक मनुष्य के रूप म सजाने का अवसर मले, तो म उसे अपने राज्य राजस्थान के रंग से सजाऊँगा —
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अंग कससे सजाऊँगा क्य
सर रंगीन पगड़ ी (साफ़ ा) राजस्थान म पगड़ी केवल पहनावा नह , सम्मान और वचन का प्रतीक है। नराला ने सर
पर हमालय का मुकुट रखा था; म वहाँ पगड़ी रखूँगा — क्य क दोन का अथ एक ही है:
ऊँचा माथा।
माथा रखड़ ी (माथे का आभूषण) और स्वागत और शुभता का चह्न — ‘अ त थ दे वो भव’ क परंपरा।
चंद न का ितलक
कान और ितमिणया और आड़ जैसे ये आभूषण पी ढ़य से चले आते ह, इस लए ये परंपरा क नरंतरता के प्रतीक ह।
गला पारंपिरक आभूषण
वस्त्र बांधनी और लहिरया की ओढ़ नी, बांधनी का हर बदु हाथ से बाँधा जाता है — यह राजस्थान के श्रम और धैय का चत्र है।
घाघरा-चोली नराला के ‘वसन’ क जगह यहाँ यही आएगा।
आँचल रोिहड़ ा (रा य-पु प) और
ज् ष् नराला ने ‘अंचल म ख चत सुमन’ कहा था। रो हड़ा को ‘मरुस्थल का सागवान’ कहते ह
के सिरया गेंदे के फू ल — यह क ठनाई म भी खलने का प्रतीक है।
हाथ एक हाथ में बाजरे की बाली, बाजरा यहाँ क मुख्य फ़सल है — यही ‘कनक-शस्य’ का राजस्थानी रूप है। कलश
दू स रे में जल का कलश रे गस्तान म जल के मोल क याद दलाता है।
पाँव पायल और मोजड़ ी (जूती) घूमर नृत्य क थाप और चलते रहने का भाव — संस्कृ त रुक हुई नह , चलती हुई चीज़
है।
साथ म ऊँ ट, गोडावण (रा य-प ी), ज् क्ष ऊँट मरुभू म का साथी है; खेजड़ी वह वृक्ष है जसके लए खेजड़ली गाँव के लोग ने प्राण
खेजड़ ी का वृ क्ष दे दए थे — यह पयावरण-रक्षा क सबसे बड़ी मसाल है।
पृष्ठभू म अरावली की पहािड़ याँ और दू र राजस्थान क पहचान उसका भूगोल ही है — जैसे भारत क पहचान हमालय और गंगा।
तक फै ले धोरे (रे त के टीले )
यह सजावट क्या कहती है — इस पूरे रूप म एक ही भाव है: कम साधन म भी सुंदरता और उल्लास बनाए रखना। जहाँ पानी
कम है, वहाँ के लोग सबसे चटख रंग पहनते ह — यही राजस्थान का उत्तर है जीवन को।
अपने राज्य के लए कैसे बनाएँ: पाँच बात पता कर ली जए — (1) राज्य-पुष्प और राज्य-वृक्ष, (2) राज्य-पशु
और राज्य-पक्षी, (3) पारंप रक वेशभूषा, (4) प्रमुख आभूषण और हस्त शल्प, (5) मुख्य फ़सल और नद । बस,
आपक सजावट तैयार है। जैसे — केरल के लए कसावु साड़ी, ना रयल, कथकली-मुकुट और पे रयार नद ; असम
के लए मेखला-चादर, गमछा, एक-स ग वाला गडा और ब्रह्मपुत्र।
प्र.2 2. भारत पर आधा रत एक डाक टकट, पोस्टर या पुस्तक के लए आवरण पृष्ठ बनाइए और बताइए क आप
उसम कन- कन प्रतीक को स म्म लत करगे और क्य ?
यह बनाकर दखाने वाला काम है। नीचे बनाने क व ध, प्रतीक क सूची कारण स हत और एक पूरा नमूना डज़ाइन दया
गया है।
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1. अच्छे आवरण/डाक टकट म क्या होना चा हए —
एक ही मुख्य चत्र, जो दूर से भी पहचाना जाए। डाक टकट बहुत छोटा होता है, इस लए उसम बारीक़ चीज़ काम नह करत ।
तीन-चार से अ धक प्रतीक नह । जतने अ धक प्रतीक, उतना कम प्रभाव।
रंग-योजना सोची हुई — जैसे क वता क ही तीन रंग वाली योजना: सुनहरा (फ़सल), हरा (वन), श्वेत (गंगा और हम)।
एक छोट पं क्त — जैसे ‘भार त, जय, वजयकरे!’ — जो चत्र का अथ खोल दे ।
डाक टकट पर ‘भारत / INDIA’ और मूल्य लखना अ नवाय होता है — यह भू लए मत।
2. प्रतीक और उनके कारण —
प्रतीक क्य स म्म लत करूँगा
गेहूँ/बाजरे क सुनहरी बा लयाँ ‘कनक -शस्य’ का सीधा िचत्र — भारत की कृ िष-परंपरा और िकसान के श्रम का पतीक।
हमालय क श्वेत चो टयाँ ‘मुकु ट शुभ िहम -तुषार ’ — ऊँ चाई, गौरव और र क्षा का पतीक ; साथ ही सभी उ त्त री निदयों का
ोत।
गंगा क लहरदार धारा ‘धवल धार हार गले ’ — िनम लता, जीवन और सांस्कृ ितक िनरंतरता का पतीक।
कमल रा ीय पु प; कीचड़ में रहकर भी िनिल त रहने का भाव — ‘लंक ा पदतल शतदल ’ में किव ने भी इसे
ष् प्
चुना है।
अशोक-स्तंभ का सह-शीष और रा ीय पतीक — यह भारत के रा य- प और स य पर आधािरत शासन-आदश को िदखाता है।
ज् रू त्
‘सत्यमेव जयते’
चरखा या हाथ का करघा वतं ता-संगाम, आ मिनभरता और म की गिरमा का पतीक। किवता वतं ता-पूव की है, इसिलए
स् त्र त् श्र स् त्र
यह पतीक उससे जुड़ता भी है।
अनेक ल पय म लखा एक ही शब्द ‘शतमुख-शतरव-मुखरे !’ का दृ श्य रूप — भाषाई िविवधता। जैसे ‘भारत’ शब्द दे वनागरी, तिमल ,
बां ला, गु मुखी और गुजराती िलिप में।
ग् रु
राष्ट्रीय पशु/पक्षी — बाघ और मोर भारत की जैव िविवधता और व य-संपदा; साथ ही संर ण का संदे श।
न् क्ष
तरंगा और उपग्रह आज का भारत — परंपरा के साथ िव ान। ितरंगे के तीन रंग वैसे भी याग, शािं त और समृि के
त् द्ध
पतीक है।ं
3. नमूना डज़ाइन — डाक टकट ‘भार त, जय, वजयकरे!’
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भाग क्या होगा
ऊपरी पट्ट बाईं ओर भारत / INDIA, दाईं ओर मूल्य ₹5।
पृष्ठभू म ऊपर श्वेत हमालय, बीच म मुड़ती हुई नीली-उजली गंगा, नीचे सुनहरे खेत — यानी क वता का पूरा शरीर एक ही चत्र म।
बीच म गंगा क धारा से बना हुआ हल्का-सा हार, जो चत्र को क वता से जोड़ दे ता है।
नचला कोना एक खला हुआ कमल और उसके पास एक छोटा-सा अशोक- चह्न।
नीचे क दे वनागरी म — “भार त, जय, वजयकरे!” और उसके नीचे छोटे अक्षर म — सूयकांत त्रपाठ ‘ नराला’ (1899–
पं क्त 1961)।
रंग-योजना केवल तीन रंग — सुनहरा, हरा और श्वेत, हल्क नीली रेखाओं के साथ। कम रंग = अ धक प्रभाव।
प्रतीक चुनते समय सो चए: अच्छा प्रतीक वह है जो बना शब्द के बात कह दे और जसे दे श का हर व्य क्त
पहचान ले। इस लए ऐसे प्रतीक चु नए जो कसी एक क्षेत्र, भाषा या समुदाय तक सी मत न ह — प्रकृ त, फ़सल,
नद और राष्ट्रीय चह्न सबके साझे ह।
प्र.3 3. नद क यात्रा — गंगा नद क अपने उद्गम से लेकर बंगाल क खाड़ी म वलीन होने तक क पूरी यात्रा के बीच
म आने वाली प्राकृ तक, सांस्कृ तक, भा षक आ द वशेषताओं का वणन करते हुए एक रोचक यात्रा-वृत्तांत
ल खए। (संकेत– पवतीय स दय से लेकर गंगासागर तक क संस्कृ त इत्या द)
यात्रा-वृत्तांत लखने क व ध — यात्रा-वृत्तांत नबंध नह होता। इसम (1) क्रम होता है — कहाँ से कहाँ; (2) ‘म’ होता है —
लेखक स्वयं दे खता-सुनता चलता है; (3) इं द्रयाँ होती ह — क्या दखा, क्या सुना, क्या महकता था; (4) लोग होते ह — केवल
स्थान नह ; और (5) भाषा म ग त होती है। यहाँ एक अच्छ यु क्त यह है क लेखक स्वयं गंगा बनकर बोले — इससे वृत्तांत रोचक
भी बनेगा और नद का दृ ष्टकोण भी सामने आएगा।
नमूना उत्तर:
शीषक — गोमुख से गंगासागर तक: एक बूँद क डायरी
पहला पड़ाव — गोमुख (उत्तराखंड)। मेरा जन्म गंगोत्री हमनद के उस मुहाने पर हुआ जसे लोग गोमुख कहते ह — बफ़ क एक
वशाल द वार, जसके नीचे से मटमैला पानी उबलता हुआ नकलता है। यहाँ मेरा नाम गंगा नह , भागीरथी है। चार ओर भोजपत्र के
पेड़ ह, हवा इतनी ठं डी क साँस जम जाए, और चट्टान पर कह -कह भूरा भालू के पैर के नशान। यहाँ लोग बहुत कम मलते ह —
बस कुछ साधु, कुछ पवतारोही और एक-दो चरवाहे, जो गढ़वाली म बात करते ह।
दे वप्रयाग — जहाँ मुझे मेरा नाम मला। पहाड़ से उतरते हुए मने गीत गाए, झरन क तरह गरी, और फर दे वप्रयाग पहुँची। यहाँ
मुझसे मलने अलकनंदा आई — गहरे हरे रंग क , और म मटमैली-सफ़ेद। दोन धाराएँ मल और उसी क्षण मेरा नाम गंगा हो गया।
नाम मलना यात्रा का सबसे बड़ा पड़ाव होता है।
ऋ षकेश और ह रद्वार — पहाड़ का अंत, मैदान का आरंभ। ऋ षकेश म मने पहली बार झूलते पुल दे खे और शाम क आरती
सुनी — सैकड़ द ये मुझ पर तैरते हुए बहते गए। ह रद्वार म ‘हर क पौड़ी’ पर भीड़ ऐसी क लगा पूरा दे श एक जगह इक ा हो गया
हो। यह से मेरा पहाड़ छू टा और मैदान शुरू हुआ। भाषा भी बदल गई — अब चार ओर खड़ी बोली हद सुनाई दे ने लगी।
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे!
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मैदान — खेत, कुम्हार और घाट। कन्नौज के पास इत्र क महक हवा म तैर रही थी। दोन कनार पर गेहूँ और गन्ने के खेत — वही
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‘कनक-शस्य’ जसक बात नराला ने क है। कसान मुझसे पानी लेते और बदले म मुझे अपनी थकान सुना जाते। सुबह घाट पर
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धोबी कपड़े पटकते, बच्चे छलाँग लगाते और बगुले एक पैर पर खड़े होकर मुझे घूरते रहते।
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प्रयागराज — तीन का मलन। यहाँ यमुना मुझसे आ मली — साँवली, गहरी, शांत। लोग कहते ह क यहाँ अदृश्य सरस्वती भी
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मलती है, इस लए इसे त्रवेणी संगम कहते ह। हर बारह वष पर यहाँ कुंभ लगता है और तंबुओं का एक पूरा नगर बस जाता है। मने
अपने जीवन म इससे बड़ा मेला और कह नह दे खा।
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काशी — जहाँ म उत्तर क ओर मुड़ गई। वाराणसी म मने अपना रास्ता ही बदल लया — यहाँ म उत्तर क ओर बहती हूँ। कनारे
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पर अस्सी से लेकर राजघाट तक अधचंद्राकार घाट, ऊपर ऊँचे मकान, नाव क क़तार, संस्कृत के ोक, शहनाई क आवाज़ और
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शाम को द प क पं क्तयाँ। यहाँ क भोजपुरी ऐसी है क गाली भी गीत जैसी लगती है।
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बहार — न दय का मलन और छठ का सूय। बक्सर के आगे मुझम सोन, गंडक और कोसी आकर मल और म और चौड़ी हो
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गई — इतनी क दूसरा कनारा धुँधला दखने लगा। पटना के घाट पर मने छठ दे खा: लाख लोग कमर तक पानी म खड़े होकर
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डू बते और उगते सूरज को अ य दे ते ह। यही एक पव है जसम डू बते सूरज को भी नमस्कार कया जाता है — मुझे यह बात सबसे
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सुंदर लगी। यहाँ भाषा फर बदली — मगही, मै थली, अं गका। भागलपुर के पास मेरी सबसे प्यारी साथी मली — गंगा डॉ ल्फ़न,
c और ध्व न से रास्ता खोजती है। वह भारत क राष्ट्रीय जलीय जीव है, पर आज
जो दे ख नह .सकती
a g संकट म है।
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se — जहाँ म दो हो गई। प श्चम बंगाल म फरक्का के पास म बँट गई। एक धारा हुगली बनकर कोलकाता क ओर चली और
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agदूसरी प ा बनकर बांग्लादेश क ओर। यहाँ से भाषा बांग्ला हो गई और मट्ट और गीली।
फरक्का
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सुंदरवन और गंगासागर — यात्रा का अंत। अंत म म सुंदरवन पहुँची — दु नया का सबसे बड़ा मग्रोव वन, जहाँ पेड़ क जड़
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साँस लेने के लए मट्ट से बाहर नकल आती ह और जहाँ बाघ तैरना जानता है। और फर गंगासागर — जहाँ मेरा पानी खारे समुद्र
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म घुल गया। मकर संक्रां त पर यहाँ लाख लोग स्नान करने आते ह; कहावत है — ‘सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार’।
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अं तम पन्ना। लगभग ढाई हज़ार कलोमीटर क इस यात्रा म मने पाँच राज्य, दस से अ धक भाषाएँ, सैकड़ पव और करोड़ लोग
दे खे। सबने मुझे माँ कहा। पर मने यह भी दे खा क जन घाट पर मेरी आरती होती है, उन्ह के पास नाले मुझम गरते ह। पूजा और
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सफ़ाई — दोन साथ चल, तभी म ‘धवल धार’ बनी रह सकूँगी। नराला ने मुझे भारत के गले का हार कहा था। हार को मैला रखने
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वाला कोई नह होता — यही एक बात म अपने बच्च से कहना चाहती हूँ।
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s m वृत्तांत लखते समय: नक़्शा सामने रखकर पहले पड़ाव क सूची बना ली जए — उद्गम, संगम, बड़े नगर,
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gl मुहाना। फर हर पड़ाव के लए तीन बात ल खए: एक दृश्य, एक ध्व न और एक व्य क्त। इन तीन चीज़ से यात्रा-
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वृत्तांत अपने आप जी वत हो उठता है।
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व्याकरण क बात — बहुभाषीaदे श हमारा — पृष्ठ 171
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे! AglaSem · NCERT Solutions
अभ्यास › भाषा से संवाद › व्याकरण क बात › बहुभाषी दे श हमारा
भाषा से सं वाद बहुभा षकता
प्र.1 भारत क एक वशेषता उसक बहुभा षकता है। य द आपको एक सचेत नाग रक के रूप म भारत से अपनी
मातृभाषा म संवाद का अवसर मले तो आप कन वषय पर और क्या-क्या संवाद करना चाहगे? इन संवाद को
अपनी मातृभाषा और हद म ल खए। (संकेत– समाज, पयावरण, संस्कृ त आ द।)
यह प्रश्न कल्पना पर आधा रत है — मा नए क ‘भारत’ स्वयं सामने खड़ा है, ठ क वैसे ही जैसे नराला क क वता म वह एक चेतन
सत्ता बनकर सामने खड़ा है, और आप उससे अपनी मातृभाषा म बात कर सकते ह। ‘सचेत नाग रक’ का अथ है — जो केवल
शकायत न करे, अपनी ज़म्मेदारी भी पहचाने।
1. कन वषय पर संवाद करना चाहूँगा —
वषय क्या पूछूँगा / क्या कहूँगा
पयावरण आपका ‘हार’ (गंगा) मैल ा यों हो रहा है और ‘मुकु ट’ (िहमालय) की बफ़ यों घट रही है? मैं वचन दे ता हू ँ िक नदी में
क् क्
कचरा नही ं डालूँगा और हर वष एक पेड़ लगाऊँ गा।
शक्षा या हर ब चे को अपनी मातभृ ाषा में पढ़ ने का अवसर िमल पा रहा है? मैं चाहूगँ ा िक गाँव के िव ालय में पु तकालय हो।
क् च् स्
भाषा और हमारी छोटी बोिलयाँ धीरे -धीरे चुप यों हो रही है?ं मैं अपनी बोली के दस लोकगीत िलखकर सुरि त रखूँगा।
क् क्ष
संस्कृ त
समाज और जाित, धम और िलंग के भेद कब िमटेंगे? मैं अपनी क ा में िकसी के साथ भेद भाव नही ं होने दू ँगा।
क्ष
समानता
कसान और श्रम आपका ‘कनक -श य’ उगाने वाला िकसान वयं िचंितत यों रहता है? मैं अन्न बब द नही ं क ँ गा।
स् स् क् रू
स्वच्छता और सावजिनक थान गंदे यों रहते है?ं मैं कू ड़ ा कू ड़ ेद ान में ही डालूँगा और दू स रों से भी कहूगँ ा।
स् क्
स्वास्थ्य
वैज्ञा नक दृ ष्ट आपने संस ार को शू य और आयुवद िदया — आज भी हमें अंधिव वास के बजाय प न पूछना िसखाइए।
न् श् श्
2. नमूना संवाद — हद म
(संध्या का समय। नद का कनारा। एक वद्याथ घाट पर बैठा है। सामने एक वशाल, स्नेहमय स्वर उभरता है।)
वद्याथ — प्रणाम भारत! मने आपको क वता म पढ़ा है — ‘कनक-शस्य-कमलधरे!’ पर आज आपसे बात करने का मन है।
भारत — कहो बेटा। मुझसे लोग माँगते बहुत ह, बात कम करते ह।
वद्याथ — यही तो म कहना चाहता हूँ। क व ने गंगा को आपके गले का हार कहा था। पर आज उसम झाग तैरता है। यह हार मैला
क्य हो गया?
भारत — हार मने नह पहना था बेटा, तुम्ह ने पहनाया था। और मैल भी बाहर से नह आया।
वद्याथ — बात तो सही है। तो म क्या करूँ?
भारत — बड़ा काम मत खोजो। छोटा काम रोज़ करो। एक पेड़ लगाओ और उसे जी वत रखो; अपनी बोली के गीत भूलो मत; अन्न
का एक दाना बबाद मत करो; और अपने साथी को उसक जा त या भाषा से मत तौलो।
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वद्याथ — पर म तो अकेला हूँ। मेरे करने से क्या होगा?
भारत — म सौ मुख से बोलता हूँ — शतमुख-शतरव-मुखरे। हर मुख अकेला ही होता है, बेटा। सौ मुख मलकर ही आवाज़ बनते
ह।
वद्याथ — तो म वचन दे ता हूँ — म आपका एक मुख बनूँगा, चुप नह रहूँगा।
भारत — यही मुझे चा हए था। जय हो!
3. नमूना संवाद — मातृभाषा म (उदाहरण के लए भोजपुरी)
भोजपुरी म हद भावाथ
वद्याथ — प्रणाम भारत! रउरा गंगा त हमनी के गला के हार बाड़ी, िव ाथ — पणाम भारत! आपकी गंगा तो हम सबके गले का हार है,
बा कर उहो अब मइल हो गइल बाड़ी। पर वह भी अब मैल ी हो गई है।
भारत — हार त तूह लोग प हरवले रहलऽ, आ मइल भी तूह लोग भारत — हार भी तु ही ं लोगों ने पहनाया था, और मैल भी तु ही ं ने
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लगवलऽ। लगाया।
वद्याथ — त हम का कर ? िव ाथ — तो मैं या क ँ ?
क् रू
भारत — रोज़ छोट-छोट काम करऽ — एगो गाछ लगावऽ, कूड़ा नद म भारत — रोज़ छोटे-छोटे काम करो — एक पेड़ लगाओ, कू ड़ ा नदी
जन फकऽ, आ आपन बोली जन बसरऽ। में मत फे ं को, और अपनी बोली मत भूल ो।
यह अभ्यास क्य दया गया है: पुस्तक चाहती है क आप यह अनुभव कर क जो बात मातृभाषा म कही जाती है,
वह अ धक सच्ची लगती है। इसी लए क वता म भी भारत ‘शतमुख’ है — सौ मुख वाला। य द सब एक ही भाषा म
बोलते, तो वे सौ मुख कस काम के? बहुभा षकता का अथ यही है — अपनी भाषा म सोचना और दूसरे क
भाषा का आदर करना।
अपना संवाद लखते समय: पहले हद म लख ली जए, फर अपनी मातृभाषा म — पर अनुवाद मत क जए।
मातृभाषा म वही बात अपने मुहावरे म क हए, तभी वह सजीव लगेगी। दो-दो पं क्तय क आठ-दस बारी पयाप्त ह।
मातृभाषा और भाव — पृष्ठ 171
अभ्यास › भाषा से संवाद › व्याकरण क बात › मातृभाषा और भाव
भाषा से सं वाद रचना
प्र.1 “स्तव कर बहु-अथ-भरे” — उपयुक्त पं क्त म भारत क प्रशंसा व वध अथ म क गई है। आप भी अपनी
मातृभाषा म भारत क स्तु त के लए एक क वता क रचना क जए और उसका भावाथ हद म भी ल खए।
पहले पं क्त को समझ ली जए — ‘स्तव’ का अथ है स्तु त, प्रशंसा, स्तोत्र और ‘बहु-अथ-भरे’ का अथ है हे अनेक अथ से भरी
हुई! यानी भारत क स्तु त एक ही अथ म पूरी नह होती — वह अन्न भी है, जल भी, वन भी, ज्ञान भी और ध्व न भी।
अच्छ स्तु त-क वता म क्या होना चा हए —
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संबोधन हो — ‘हे भारत!’, ‘मेरी माट !’ — क्य क स्तु त सामने खड़े कसी को क जाती है। नराला क पूरी क वता संबोधन
ही है।
प्रशंसा अनेक अथ म हो — केवल सुंदरता नह ; प्रकृ त, अन्न, श्रम, ज्ञान, भाषा और उदारता — सब आएँ।
ठोस चत्र ह , बड़े-बड़े शब्द नह । ‘भारत महान है’ कहने से कुछ नह बनता; ‘तेरे खेत म सोना उगता है’ कहने से चत्र बन
जाता है।
तुक और लय हो, ता क क वता गाई जा सके — जैसे क वता म करे–धरे–भरे–मुखरे।
छोट र खए — आठ से बारह पं क्तयाँ पयाप्त ह।
नमूना उत्तर 1 — हद ( जनक मातृभाषा हद है, उनके लए)
वंदना
हे मेरी माट , तुझको प्रणाम!
तेरे खेत म सोना उगता,
तेरे न दय म चाँद बहती,
तेरे शखर पर उजला मुकुट,
तेरे आँचल म ह रयाली रहती।
तू सौ भाषा म गाती है,
हर बोली तेरी थाती है।
जो आया, तूने अपनाया —
यही तेरा सबसे बड़ा नाम!
हे मेरी माट , तुझको प्रणाम!
भावाथ — इसम भारत क प्रशंसा पाँच अथ म क गई है — कृ ष (खेत म सोना), जल-संपदा (न दय म चाँद ), पवत (उजला
मुकुट), वन (आँचल म ह रयाली) और भाषाई व वधता तथा उदारता (सौ भाषाएँ, और जो आया उसे अपनाना)। अं तम पं क्तयाँ
यह कहती ह क भारत क सबसे बड़ी वशेषता उसक संपदा नह , उसका समा लेने का स्वभाव है।
नमूना उत्तर 2 — मातृभाषा म (उदाहरण के लए ब्रजभाषा)
ब्रजभाषा म हद भावाथ
जय जय भारत, जय जय माई। हे भारत! हे माँ! तु हारी जय हो।
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तेरे खेतन म सोनो झलके, गंग तहारे गरे सुहाई॥ तु हारे खेतों में (पकी फ़ सल का) सोना चमकता है और गंगा तु हारे गले में हार-सी
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सुशोिभत है।
हम कौ मुकुट धरे तू ऊँची, बन क चूनर ओ ढ़ बफ़ का मुकु ट धारण िकए तुम ऊँ ची खड़ ी हो, और वन की चुनरी ओढ़ कर मन मोह ले ती
लुभाई॥ हो।
सौ बोली म बोलै तू ही, सबकूँ अपनौ कहै लुगाई॥ तु ही ं सौ बोिलयों में बोलती हो और सबको अपना कहती हो।
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तेरी माट चंदन जैसी, को ट प्रनाम करूँ सर नाई॥ तु हारी िम ी चंद न के समान (पिव ) है; िसर झुक ाकर मैं करोड़ ों पणाम करता हू।ँ
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ध्यान द जए क यहाँ ‘बहु-अथ’ कैसे आया: दोन नमून म भारत क प्रशंसा एक बात के लए नह , अनेक
बात के लए क गई है — फ़सल, नद , पवत, वन, भाषा और उदारता। यही ‘बहु-अथ-भरे’ का अभ्यास है। और
ध्यान द जए क हर प्रशंसा के साथ एक चत्र है — सोना, चाँद , मुकुट, चुनरी, चंदन। क वता तक से नह , चत्र से
बात कहती है।
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अपनी क वता लखते समय: अपनी मातृभाषा के अपने शब्द उठाइए — जो चीज़ आपके घर, खेत या गली म
रोज़ दखती है। य द आपक मातृभाषा त मल, मराठ , ओ ड़आ, अस मया, क कणी या कोई और है, तो उसी म
ल खए और नीचे हद म भावाथ दे द जए, जैसे ऊपर ता लका म कया गया है। क वता का अच्छा होना भाषा से
नह , सच्चाई से तय होता है।
समास — समस्त पद एवं वग्रह — पृष्ठ 171 और 172
अभ्यास › भाषा से संवाद › व्याकरण क बात › समास— समस्त पद एवं वग्रह
भाषा से सं वाद व्याकरण
प्र.1 क वता म से चुनकर कुछ सामा सक पद (शब्द) नीचे दए गए ह। उनके समास- वग्रह अपनी लेखन-पु स्तका म
ल खए। — शतदल
समस्त पद — शतदल | वग्रह — शत (सौ) ह दल जसके — वह (कमल) | समास — बहु ी ह
यह वग्रह क्य : ‘शत’ का अथ है सौ और ‘दल’ का अथ है पंखुड़ी। शब्द-संपदा म ‘शतदल’ का अथ सीधे कमल
दया गया है — और यही इस समास क कुंजी है। ध्यान द जए, वग्रह करने पर जो अथ नकला (‘सौ पंखु ड़य
वाला’), वह न पूवपद ‘शत’ है और न उत्तरपद ‘दल’ — वह एक तीसरी वस्तु है: कमल। जस समास म दोन पद
अपना अथ छोड़कर कसी तीसरे अथ क ओर संकेत कर, उसे बहु ी ह समास कहते ह।
बदु ववरण
पूवपद शत (संख्यावाचक वशेषण — सौ)
उत्तरपद दल (पंखुड़ी)
वग्रह शत ह दल जसके, वह — कमल
समास का भेद बहुवीिह ( योंिक अथ िकसी तीसरी व तु — कमल — का है)
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क वता क पं क्त “लंका पदतल शतदल,”
पं क्त म अथ लंका (भारतमाता के) चरण के नीचे खले कमल के समान है।
एक और संभव वग्रह: य द इसका अथ केवल ‘सौ पंखु ड़य का समूह’ लया जाए, तो यह द्वगु समास होगा,
क्य क पूवपद संख्यावाचक है और समाहार (समूह) का बोध होता है। पर यहाँ क वता म इसका अथ कमल है,
इस लए इसे बहु ी ह मानना ही उ चत है। समास का भेद शब्द से नह , वाक्य म उसके अथ से तय होता है — यह
बात याद र खए।
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे!
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अपने वाक्य म प्रयोग: सरोवर म खला शतदल भोर क धूप म और सुंदर लग रहा था।
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l a se— ज्यो तजल
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समस्त पद — ज्यो तजल | वग्रह — ज्यो त (प्रकाश) रूपी जल | समास — कमधारय
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ag नह गना रहा — वह कह रहा है क गंगा का जल स्वयं प्रकाश ही
यह वग्रह क्य : क व दो चीज़ को अलग-अलग
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है। जब समास म एक पद दूसरे का रूप बन जाए (यानी उपमेय म उपमान का आरोप हो), तो वहाँ कमधारय
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m.
समास होता है — जैसे ‘चरण-कमल’ = चरण रूपी कमल, ‘मुख-चंद्र’ = मुख रूपी चंद्र। इसी लए यहाँ रूपक
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अलंकार और कमधारय समास एक साथ बैठे ह।
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बदु ववरण
पूवपद ज्यो तस् / ज्यो त (प्रकाश, रोशनी, लौ)
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उत्तरपद जल (पानी)
वग्रह a g l
ज्यो त रूपी जल (वैक ल्पक: ज्यो त से युक्त जल — मध्यमपदलोपी कमधारय)
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समास का भेद कमधारय
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सं ध क बात ‘ज्यो तः + जल’ म वसग बदलकर ‘र्’ हो गया — इस लए रूप बना ज्यो तजल। यही कारण है क शब्द-संपदा म मूल
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रूप ‘ज्यो तस्’ भी दया गया है।
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agl “गंगा ज्यो तजल-कण / धवल धार हार गले।”
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पं क्त
m धारा भारत के गले का हार है।
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पं क्त म अथ गंगा के प्रकाशमय जल-कण, जनसे बनी
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पूरा पद दे खए: क वता म शब्दa‘ज्यो तजल-कण’ है — यह दो चरण वाला समास है: पहले ‘ज्यो तजल’
(कमधारय) बना, फर उसम ‘कण’ जुड़कर ‘ज्यो तजल के कण’ (तत्पुरुष) बना। ऐसे बड़े समास को द घ समास
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कहते ह और यही नराला क भाषा क पहचान है।
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m . वाक्य म प्रयोग: भोर क पहली करण पड़ते ही नद का ज्यो तजल दमक उठा।
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प्र.3 — शतमुख
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समस्त पद — शतमुख | वग्रह — शत (सौ) ह मुख जसके — वह (भार त) | समास — बहु ी ह
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे! AglaSem · NCERT Solutions
यह वग्रह क्य : क वता म यह शब्द अकेला नह खड़ा — वह ‘शतमुख-शतरव-मुखरे’ म आया है, यानी वह भार त
का वशेषण है: ‘वह, जसके सौ मुख ह’। जब समस्त पद अपने दोन पद से हटकर कसी अन्य (यहाँ भार त) क
ओर संकेत करे, तो वहाँ बहु ी ह समास होता है — जैसे ‘चतुभुज’ = चार भुजाओं वाला ( वष्णु), ‘दशानन’ = दस
मुख वाला (रावण)। ‘शतमुख’ ठ क इसी प रवार का शब्द है।
बदु ववरण
पूवपद शत (सौ)
उत्तरपद मुख
वग्रह शत ह मुख जसके, वह — (यहाँ भारतमाता)
समास का भेद बहुवीिह
क वता क “शतमुख-शतरव-मुखरे!”
पं क्त
पं क्त म अथ हे सौ मुख से उठे सौ स्वर द्वारा मुख रत होने वाली! — यानी भारत क अन गनत भाषाएँ, बो लयाँ, पव और वचार एक
साथ बोल रहे ह।
‘शत’ का भाव यहाँ ‘शत’ गनती नह , अन गनत का प्रतीक है — जैसे ‘हज़ार बार कहा’ म हज़ार गनती नह होती।
दूसरा संभव वग्रह: शब्द-संपदा म ‘शतमुख’ का अथ सीधे ‘सौ मुख’ दया गया है। इस अथ म वग्रह होगा ‘सौ
मुख का समूह’ और समास होगा द्वगु, क्य क पूवपद संख्यावाचक है और समाहार का बोध होता है। परीक्षा म
दोन म से जो भी लख, वग्रह और भेद आपस म मेल खाने चा हए — यही सबसे ज़रूरी बात है।
अपने वाक्य म प्रयोग: हमारा दे श शतमुख है — यहाँ एक ही भाव सैकड़ बो लय म गाया जाता है।
प्र.4 — सागरजल
समस्त पद — सागरजल | वग्रह — सागर का जल | समास — तत्पुरुष (संबंध/षष्ठी तत्पुरुष)
यह वग्रह क्य : यहाँ दोन पद अपना अपना अथ बनाए रखते ह और उनके बीच ‘का/के/क ’ का संबंध लगता है
— सागर का जल। जस समास म वग्रह करते समय कोई कारक- चह्न (का, को, से, के लए, म) लगाना पड़े और
उत्तरपद प्रधान हो, उसे तत्पुरुष समास कहते ह। यहाँ मुख्य वस्तु ‘जल’ है, ‘सागर’ केवल यह बताता है क जल
कौन-सा है — इस लए उत्तरपद ही प्रधान है।
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बदु ववरण
पूवपद सागर (समुद्र)
उत्तरपद जल (पानी) — यही प्रधान है
वग्रह सागर का जल
समास का भेद त पु ष — संबंध (ष ठी) त पु ष
त् रु ष् त् रु
क वता क पं क्त “ग जतो म सागर-जल / धोता शु च चरण युगल”
पं क्त म अथ गरजती लहर वाला समुद्र का जल भारतमाता के दोन प वत्र चरण को धो रहा है।
अंतर पहचा नए: ‘सागरजल’ = सागर का जल (तत्पुरुष), पर ‘ज्यो तजल’ = ज्यो त रूपी जल (कमधारय)। दोन
का उत्तरपद एक ही है — ‘जल’ — फर भी समास अलग ह। कारण यह है क पहले म संबंध है और दूसरे म
आरोप। जहाँ ‘का/के/क ’ लगे वहाँ तत्पुरुष, जहाँ ‘रूपी’ लगे वहाँ कमधारय।
अपने वाक्य म प्रयोग: सागरजल खारा होता है, इस लए उसे पीने योग्य बनाने के लए वशेष संयंत्र लगाने पड़ते ह।
प्र.5 क वता म आए अन्य सामा सक पद को भी छाँटकर उनका समास- वग्रह और भेद ल खए।
यह क वता समास से बनी हुई क वता है — इसी लए पुस्तक ने ‘समस्त पद/सामा सक पद का प्रयोग’ को इसक अलग वशेषता
माना है (पृष्ठ 170)। पुस्तक ने चार शब्द दए ह; क वता म इनके अ त रक्त भी अनेक समस्त पद ह। पूरी सूची इस प्रकार है —
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे! AglaSem · NCERT Solutions
समस्त पद वग्रह समास का भेद क वता क पं क्त
कनक-शस्य कनक के समान शस्य (सोने जैसी कमधारय (उपमानवाचक ) “कनक-शस्य-
फ़सल) कमलधरे!”
कमलधरा / कमल को धारण करने वाली त पु ष (उपपद त पु ष; ‘कमलधरे ’ इसका
त् रु त् रु “कनक-शस्य-
कमलधरे संबोधन प है)
रू कमलधरे!”
पदतल पद (पैर) का तल त पु ष (संबंध)
त् रु “लंका पदतल
शतदल,”
शतदल शत ह दल जसके, वह — कमल बहुवीिह “लंका पदतल
शतदल,”
ग जतो म ग जत (गरजती हुई) ऊ म (लहर) कमधारय (संिध: गिजत + ऊिम = गिजतोिम — “ग जतो म सागर-
गण
ु संिध ) जल”
सागर-जल सागर का जल त पु ष (संबंध)
त् रु “ग जतो म सागर-
जल”
चरण-युगल चरण का युगल (जोड़ा) त पु ष (संबंध)
त् रु “धोता शु च चरण
युगल”
बहु-अथ-भरे बहुत अथ से भरी हुई त पु ष (करण/अपादान)
त् रु “स्तव कर बहु-अथ-
भरे!”
तरु-तृण-वन-लता तरु, तृण, वन और लता ं (चार पदों वाला)
द्वद्व “तरु-तृण-वन-लता
वसन,”
ज्यो तजल ज्यो त रूपी जल कमधारय “गंगा ज्यो तजल-कण”
ज्यो तजल-कण ज्यो तजल के कण त पु ष (संबंध)
त् रु “गंगा ज्यो तजल-कण”
हम-तुषार हम रूपी तुषार / हम का तुषार कमधारय (अथवा त पु ष) त् रु “मुकुट शुभ्र हम-
तुषार,”
शतमुख शत ह मुख जसके, वह बहवु ीिह (अथवा ि गु — सौ मुखों का समूह)
द्व “शतमुख-शतरव-
मुखरे!”
शतरव सौ रव (ध्व नय ) का समूह ि गु
द्व “शतमुख-शतरव-
मुखरे!”
शतमुख-शतरव- सौ मुख के सौ रव से मुखर होने त पु ष (करण) — दीघ समास
त् रु “शतमुख-शतरव-
मुखरे वाली मुखरे!”
समास को पहचानने का सरल तरीक़ा —
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य द वग्रह म … तो समास क वता से उदाहरण
‘का/के/क , को, से, के लए, म’ लगे और उत्तरपद प्रधान हो त पु षत् रु सागर-जल, पदतल, चरण-युगल
‘रूपी’ या ‘के समान’ लगे ( वशेषण- वशेष्य का संबंध) कमधारय कनक-शस्य, ज्यो तजल, ग जतो म
पहला पद संख्यावाचक हो और समूह का बोध कराए ि गु
द्व शतरव
‘और’ लगे और दोन /सभी पद प्रधान ह ं
द्वद्व तरु-तृण-वन-लता
अथ कसी तीसरी वस्तु का नकले, ‘ जसके … वह’ लगे बहुवीिह शतदल (= कमल), शतमुख
क व ने इतने समास क्य लगाए: तीन कारण ह। पहला — समास से भाषा कस जाती है: ‘सोने जैसी फ़सल और
कमल को धारण करने वाली’ जैसा लंबा वाक्य केवल एक पद म आ जाता है — ‘कनक-शस्य-कमलधरे’। दूसरा —
छोटे चरण म अ धक अथ भरने से पं क्त म वेग आता है, और वेग से ओज गुण बनता है, जो वंदना के लए
आवश्यक है। तीसरा — समास क वता को मंत्र जैसा बना दे ता है — संस्कृत के स्तोत्र इसी तरह गुँथे होते ह, और
यह क वता है भी एक स्तव।
याद र खए: पुस्तक स्वयं बताती है — ‘समास का अथ है संक्षेप। … पहले पद को पूवपद और दूसरे पद को
उत्तरपद कहते ह। समास रचना से बने शब्द को समस्त पद कहते ह। य द समस्त पद के अंग अलग-अलग करने ह ,
तो उस प्र क्रया को समास वग्रह कहते ह’ (पृष्ठ 171–172)। समास और सामा सक पद के बारे म आप ‘क्या
लखूँ?’ (पाठ 2) के अभ्यास म वस्तार से पढ़ चुके ह।
अलंकार — समझ और प्रयोग — पृष्ठ 172
अभ्यास › भाषा से संवाद › व्याकरण क बात › अलंकार— समझ और प्रयोग
भाषा से सं वाद अलं कार
प्र.1 (क) क वता म जहाँ-जहाँ अनुप्रास अलंकार आया है, उन पं क्तय को खोजकर ल खए।
पहले प रभाषा — पुस्तक के अनुसार ‘शतमुख’ और ‘शतरव’ म ‘श’ वण क पुनरावृ त्त हो रही है, इसी लए वहाँ अनुप्रास
अलंकार है (पृष्ठ 172)। ‘रैदास के पद’ (पाठ 8) म यही बात इस तरह कही गई थी — जस रचना म व्यंजन वण क आवृ त्त एक
से अ धक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। ध्यान र खए — आवृ त्त व्यंजन क दे खी जाती है, स्वर क नह ।
इस क वता म अनुप्रास लगभग हर पं क्त म है। पूरी सूची —
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे!
a g l AglaSem · NCERT Solutions
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# पं क्त आवत कहाँ-कहाँ और उसका प्रभाव
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व्यंजन
“भार त,.cजय,
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ag दोबारा बज उठता है, इस लए
1
a s em ज जय, वजय — दो बार। ‘जय’ शब्द ही ‘ वजय’ के भीतर
agl
वजयकरे!” जयघोष दुगुना सुनाई दे ता है।
2 “कनक-शस्य- क कनक (दो बार ‘क’), कमल — कुल तीन आवृ त्तयाँ। ‘क’ क कड़ी ध्व न पं क्त को
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कमलधरे!” दृढ़ता दे ती है।
लंकs ा, e
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ल
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ag पं क्त लहर क तरह लुढ़कती हुई चलती है।
3 “लंका पदतल पदतल, शतदल — तीन आवृ त्तयाँ। साथ म ‘त’ भी दो बार (पदतल, शतदल)।
शतदल,”
4 “ग जतो म सागर- ग
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ग जतो म, सागर — ‘ग’ क गहरी ध्व न लहर क गड़गड़ाहट का आभास दे ती है
em.
जल” (ध्वन्यात्मकता)।
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5
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mयुगल”
“धोता शु च चरण च
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शु च, चरण — ‘च’ क आवृ त्त; कोमल ध्व न, जो चरण-प्रक्षालन के भाव के अनुकूल
l a se है।
a 6 g “स्तव कर बहु- ब/भ बहु, भरे — दोन सजातीय ओष्ठ्य ध्व नयाँ ह, इस लए कान इन्ह एक ही प रवार का
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agl
अथ-भरे!” मानता है।
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त और व
s e mतृण म ‘त’; वन, वसन म ‘व’। एक ही पं क्त म दो-दो आवृ त्त- ंखलाएँ चल रही ह।
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7 “तरु-तृण-वन- तरु,
ag
लता वसन,”
च
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8 “अंचल म ख चत अंचल, ख चत — ‘च’ क आवृ त्त, जो कढ़ाई जैसी बारीक़ ध्व न पैदा करती है।
. co
सुमन;”
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c o m ध
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g सुंदर अनुप्रास है।
. गले।”
9 “धवल ध◌ार हार धवल, धार — और साथ ही ‘धार–हार’ क भीतरी तुक। पूरी पं क्त बहती हुई धारा क
तरह सुनाई दे ती है। यह इस क वता का a
s em
सबसे
a
gl 10 “मुकुट शुभ्र हम-
a म / ट-त मुकुट का ‘म’ और हम का ‘म’; मुकुट का ‘ट’ और तुषार का ‘त’ — सजातीय ध्व नयाँ
तुषार,” मलकर हल्क गूँज बनाती ह।
se m
m — दो बार पूरा संयुक्त वण ‘प्र’ लौटता है, इस लए यह पं क्त मंत्र-जैसी
coप्रणव g l a
. a
semलगती है। बहुत स्पष्ट अनुप्रास।
11 “प्राण प्रणव प प्राण,
gl a
ओंकार,”
12 “ध्व नत दशाएँ द
a दशाएँ, उदार — ‘द’ क आवृ त्त; खुली, गूँजती ध्व न।
om
उदार,”
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भी दो बार (शतमुख, मुखरे) — तीन स्तरla
sem‘शत’ पूरा शब्द दो बार, और ‘मुख’
comमुखरे!”
13 “शतमुख-शतरव- श (और ‘मुख’ यही पुस्तक का अपना उदाहरण है। ‘श’ दो बार,
m. ag है।
की पुन ि त) क आवृ त्त एक ही पं क्त म। इसी से अनेक
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रु क्
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दशाओं से उठती ध्व न का प्रभाव बनता
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अनुप्रास यहाँ कर क्या रहा है: यह केवल सजावट नह है। तीन काम कर रहा है — (1) लय बनाता है, जससे यह
वंदना सामू हक स्वर म गाई जा सकती है; (2) अथ को सुनाई दे ने लायक बनाता है — ‘ग’ से लहर क
गड़गड़ाहट, ‘ध’ से धारा का बहाव, ‘श’ से सौ स्वर का गूँजना; और (3) पूरी क वता म ओज गुण भरता है, जो एक
राष्ट्र-वंदना के लए आवश्यक है। जहाँ ध्व न और अथ एक साथ चल, वह अलंकार सफल माना जाता है — इस
क वता म यह बार-बार होता है।
पहचानने का तरीक़ा: पं क्त को ऊँची आवाज़ म प ढ़ए। जो व्यंजन कान पर बार-बार पड़े, वही आवत व्यंजन है।
और दे खए क आवृत्त व्यंजन प्रायः पास-पास के शब्द के आरंभ म आते ह — तभी वे सुनाई दे ते ह।
प्र.2 (ख) क वता क उन पं क्तय को खो जए जहाँ रूपक अलंकार है। साथ ही यह भी बताइए क क व ने कस
प्राकृ तक दृश्य या वस्तु को भारत का रूप मानकर च त्रत कया है?
पहले प रभाषा — पुस्तक के अनुसार ‘मुकुट शुभ्र हम-तुषार’ म ‘ हमालय को भारत का मुकुट कहा गया है। वास्तव म हमालय
मुकुट नह है, ले कन क व ने कल्पना के बल पर उसे मुकुट का रूप दे दया … यहाँ गुण क अत्यंत समानता के कारण उपमेय म
उपमान का अभेद स्था पत कया गया है, इसी लए यहाँ रूपक अलंकार है’ (पृष्ठ 172)। सीधा नयम यह है — जहाँ ‘जैसे’, ‘सा’,
‘सम’, ‘ज्य ’ जैसा कोई वाचक शब्द न हो और फर भी एक वस्तु को दूसरी कह दया गया हो, वहाँ रूपक है।
क — क वता म रूपक अलंकार वाली पं क्तयाँ
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# पं क्त उपमेय ( जस उपमान ( जसका अभेद कस गुण के कारण
पर आरोप) आरोप)
1 “मुकुट शुभ्र हम-तुषार,” हमालय क श्वेत मुकु ट दोन सर पर, दोन उज्ज्वल, दोन गौरव के
बफ़ चह्न। (पुस्तक का अपना उदाहरण)
2 “गंगा ज्यो तजल-कण / गंगा क उजली गले का हार दोन लंबे, चमक ले और गले के पास से
धवल धार हार गले।” धारा गुज़रने वाले; दोन शोभा बढ़ाते ह।
3 “तरु-तृण-वन-लता वसन,” वृक्ष, तनके, वन व स्त्र दोन शरीर को ढँ कते ह; ह रयाली धरती को
और लताएँ ओढ़ हुई चादर-सी लगती है।
4 “अंचल म ख चत सुमन;” दे श के अंचल म आँचल पर जड़ े र न त् दोन वस्त्र क शोभा बढ़ाते ह; ‘ख चत’ यानी
खले फूल जड़ा हुआ — जैसे कढ़ाई या नगीने।
5 “लंका पदतल शतदल,” लंका द्व प चरणों के नीचे िखला दोन जल पर टके हुए, दोन सुंदर; दे वी-
कमल प्र तमा के चरण म कमल रखने क परंपरा
से जुड़ा हुआ।
6 “प्राण प्रणव ओंकार,” भारत के प्राण ओंक ार (ॐ की नाद - दोन अदृश्य, दोन जीवन के आधार; जैसे
शि त) क् साँस के बना शरीर नह , वैसे ज्ञान-चेतना के
बना राष्ट्र नह ।
7 “ज्यो तजल-कण” गंगा का जल ज् योित (पकाश) जल स्वयं प्रकाश बन गया — धूप म
चमकती बूँद। (कमधारय समास और रूपक
एक साथ।)
8 “भार त, जय, वजयकरे! … भारतभू म दे वी (िजसके चरण, व , स्त्र यह पूरी क वता का मूल रूपक है, जससे
चरण युगल” आँचल , गला और िसर है)ं बाक़ सारे रूपक नकलते ह।
ख — क व ने कस प्राकृ तक दृश्य या वस्तु को भारत का रूप मानकर च त्रत कया है
क व ने भारत को एक दे वी के रूप म दे खा है और प्रकृ त क हर वस्तु को उस दे वी के शरीर का कोई अंग या आभूषण बना दया
है। पूरी योजना नीचे है —
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प्राकृ तक दृश्य/वस्तु भारत का कौन-सा रूप बनी पं क्त
लंका द्व प चरणों के नीचे िखला कमल “लंका पदतल शतदल,”
गरजता समुद्र चरण धोने वाला से वक / तुित करने वाला भ त
स् क् “ग जतो म सागर-जल / धोता शु च चरण युगल”
वृक्ष, तनके, वन, लताएँ पहने हुए व स्त्र “तरु-तृण-वन-लता वसन,”
फूल आँचल पर जड़ े र न त् “अंचल म ख चत सुमन;”
गंगा गले का वेत हार
श् “गंगा ज्यो तजल-कण / धवल धार हार गले।”
हमालय क बफ़ िसर का मुकु ट “मुकुट शुभ्र हम-तुषार,”
ओंकार क ध्व न भारत के पाण “प्राण प्रणव ओंकार,”
दशाएँ और अनेक स्वर भारत की वाणी “ध्व नत दशाएँ उदार, / शतमुख-शतरव-मुखरे!”
इस पूरी रूपक-योजना का अथ: जब भारत का शरीर ही प्रकृ त है, तो प्रकृ त क हा न दे श क हा न हो जाती है
— वन काटना उसके वस्त्र फाड़ना है, गंगा को गंदा करना उसका हार मैला करना है और ग्ले शयर पघलाना उसका
मुकुट गला दे ना है। इसी लए यह क वता दे शप्रेम और पयावरण-चेतना — दोन एक साथ सखाती है, और यही बात
पुस्तक ‘ मलकर ल शपथ’ तथा ‘ वषय से संवाद’ के प्रश्न म आगे बढ़ाती है।
उपमा और रूपक का अंतर, इसी क वता से: ‘कनक-शस्य’ का अथ है ‘कनक के समान शस्य’ — यहाँ तुलना
है, इस लए यह उपमा क स्थ त है (समास के भीतर छपी हुई)। पर ‘मुकुट शुभ्र हम-तुषार’ म क व यह नह कहता
क हमालय मुकुट जैसा है — वह उसे ‘मुकुट’ कह ही दे ता है। इसी लए वहाँ रूपक है। वाचक शब्द है तो उपमा,
नह है तो रूपक — यही सबसे सरल कसौट है।
ग त व धयाँ — मलकर ल शपथ — पृष्ठ 172
अभ्यास › ग त व धयाँ › मलकर ल शपथ
ग त व धयाँ पयावरण
प्र.1 “तरु-तृण-वन-लता वसन/ अंचल म ख चत सुमन” — वन, लता, पुष्प आ द भारत के अमूल्य प्राकृ तक संसाधन
ह। इनके संरक्षण के लए सरकार द्वारा बनाए गए अ ध नयम के बारे म सूचना एक त्रत क जए और वन संरक्षण
के लए बनाए नयम पर वचार क जए।
पं क्त से जुड़ाव — क व ने वन-वनस्प त को भारत का ‘वसन’ यानी वस्त्र कहा है। जस दन यह वस्त्र फट जाएगा, दे श उघड़
जाएगा। इसी लए वन-संरक्षण केवल पयावरण का नह , दे श के सम्मान का प्रश्न है।
1. वन और वन्य-जीवन से जुड़े प्रमुख अ ध नयम और प्रावधान
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे! AglaSem · NCERT Solutions
अ ध नयम / प्रावधान वष मुख्य बात
भारतीय वन अ ध नयम 1927 वन को आर क्षत, संर क्षत और ग्राम-वन जैसी श्रे णय म बाँटने और वन-उपज पर
नयम बनाने का सबसे पुराना क़ानून।
वन्यजीव (संरक्षण) अ ध नयम 1972 वन्य प्रा णय और पौध क सूचीबद्ध प्रजा तय के शकार तथा व्यापार पर रोक;
राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य बनाने का आधार।
जल (प्रदूषण नवारण एवं नयंत्रण) 1974 न दय -जलाशय म प्रदूषण रोकने के लए; इसी से प्रदूषण नयंत्रण बोड बने।
अ ध नयम
वन (संरक्षण) अ ध नयम 1980 सबसे महत्वपूण — वन-भू म को ग़ैर-वन काम (खनन, उद्योग, नमाण) म
बदलने के लए कद्र सरकार क पूव अनुम त अ नवाय। सन् 2023 म इसम
संशोधन हुआ और नाम बदलकर ‘वन (संरक्षण एवं संवधन) अ ध नयम’ कया
गया।
पयावरण (संरक्षण) अ ध नयम 1986 पयावरण क रक्षा के लए छाता-क़ानून; इसी के अंतगत पयावरण-प्रभाव आकलन
(EIA) जैसी व्यवस्थाएँ आती ह।
जैव व वधता अ ध नयम 2002 दे श क जैव-संपदा और परंपरागत ज्ञान क रक्षा; जैव व वधता प्रबंधन स म तयाँ
गाँव-स्तर तक।
वन अ धकार अ ध नयम (अनुसू चत 2006 वन म पी ढ़य से रहने वाले समुदाय के अ धकार को मान्यता — क्य क वन
जनजा त एवं अन्य परंपरागत वन नवासी बचाने म सबसे बड़ी भू मका उन्ह क है।
— वन अ धकार क मान्यता)
सं वधान — अनुच्छेद 48क — राज्य का कतव्य: पयावरण क रक्षा और सुधार तथा वन एवं वन्य जीव क रक्षा
करना।
सं वधान — अनुच्छेद 51क(छ) — नाग रक का मूल कतव्य: वन , झील , न दय और वन्य जीव स हत प्राकृ तक
पयावरण क रक्षा करे और उसका संवधन करे। यही वह पं क्त है जसे हर वद्याथ
को याद रखना चा हए।
2. कुछ प्रमुख कायक्रम और आंदोलन
राष्ट्रीय वन नी त, 1988 — लक्ष्य रखा गया क दे श के लगभग एक- तहाई भूभाग पर वन या वृक्ष-आवरण हो (पहाड़ी क्षेत्र म
दो- तहाई)।
संयुक्त वन प्रबंधन — वन वभाग और गाँव क स म तयाँ मलकर वन क दे खभाल कर और उपज म हस्सा पाएँ।
प्र तपूरक वनरोपण (CAMPA) — जहाँ वन-भू म कसी प रयोजना को द जाए, वहाँ उतनी ही भू म पर नया वन लगाना
अ नवाय।
ह रत भारत मशन और वन महोत्सव — वृक्षारोपण के राष्ट्रव्यापी अ भयान।
चपको आंदोलन (उत्तराखंड, 1970 का दशक) — गाँव के लोग, वशेषकर म हलाएँ, पेड़ से चपककर खड़े हो गए ता क
उन्ह काटा न जा सके। इससे भी पहले राजस्थान के खेजड़ली गाँव म अमृता दे वी और उनके सा थय ने खेजड़ी के पेड़ बचाने के
लए प्राण दे दए थे — यह वश्व के सबसे पुराने पयावरण-ब लदान म गना जाता है।
3. इन नयम पर वचार — ये अच्छे क्य ह और क ठनाई कहाँ है
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे!
a g l AglaSem · NCERT Solutions
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पक्ष वचार
o m l a seसे पहले रोक लगाना ही
.c एकमात्र रास्ता है। यही 1980 के अ ध नयम का मूल वचार है। ag
क्य ज़रूरी ह वन एक बार कटने पर तुरंत नह लौटते — एक बड़ा पेड़ बनने म दशक लगते ह। इस लए काटने
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gl क ठन
aसबसे वकास और संरक्षण का संतुलन। सड़क, बाँध और खदान भी चा हए, और वन भी। इसका उत्तर यही है क हर
प्रश्न प रयोजना का पयावरणीय मूल्य पहले तौला जाए और कटे वन क भरपाई अवश्य हो।
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वनवा सय का
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वन केवल लकड़ी नह , लाख लोग का घर और जी वका है। इसी लए 2006 का वन अ धकार अ ध नयम ज़रूरी था ag
पक्ष
g l as
— जो समुदाय वन पर नभर है, वही उसक सबसे अच्छ रक्षा भी करता है।
क़ानून काफ़
a
क़ानून तभी काम करता है जब समाज उसका साथ दे । चपको आंदोलन कोई क़ानून नह था, फर भी उसने वन बचाए।
नह इस लए जागरूकता क़ानून से भी बड़ी श क्त है।
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em.
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4. नमूना शपथ — ‘ मलकर ल शपथ’
g l as
(कक्षा म m . a
s e सब मलकर खड़े होकर बोल)
la भारत के वद्याथ शपथ लेते ह क —
ag“हम
हम प्र तवष कम-से-कम एक पेड़ लगाएँगे और जब तक वह बड़ा न हो जाए, उसक दे खभाल करगे;
m a s
.co agl
हम कसी हरे पेड़ को न काटगे, न कटने दगे;
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हम वद्यालय, मुहल्ले और नद -तट पर कचरा नह फैलाएँगे और प्ला स्टक का उपयोग घटाएँगे;
g l a
हम प क्षय के लए जल और दाना रखगे तथा कसी जीव को हा न नह पहुँचाएँगे;
हम पानी और बजली बबाद नह करगे; a
और हम दूसर को भी यही करने के लए प्रे रत करगे —
co m
.
क्य क वन, लता और पुष्प हमारे दे श के वस्त्र और आभूषण ह।”
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.co a
m क ‘भारत वन स्थ त रपोट’ (यह हर दो वष पर आती है और बताती है क दे श म वन-आवरण कतना है),
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जानकारी कहाँ से जुटाएँ: पयावरण, वन एवं जलवायु प रवतन मंत्रालय क आ धका रक वेबसाइट, भारतीय वन
a s eसवक्षण
agl राज्य के वन वभाग का कायालय, तथा वद्यालय के पुस्तकालय क पयावरण संबंधी पुस्तक। जो भी आँकड़ा लख,
उसके साथ वष और ोत अवश्य ल खए।
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com g l a
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भाषा संगम — पृष्ठ 173 agl
अभ्यास › भाषा संगम
co m
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भाषा सं ग म बहुभा षकता
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a s emप्र.1
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“कनक-शस्य-कमलधरे” — क वता म आए ‘शस्य’ शब्द का अथ ‘उपज’ भी होता है। नीचे ‘उपज’ शब्द के लए
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.
सं वधान क आठव अनुसूची म स म्म लत कुछ भारतीय भाषाओं म प्रयुक्त शब्द क सूची द गई है। — इनके
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अ त रक्त य द आप ‘शस्य’ शब्द को कसी और भाषा म भी जानते ह तो उस भाषा म भी ल खए।
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agता लका के रूप म (पृष्ठ 173)
पहले पुस्तक क द हुई सूची —
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे! AglaSem · NCERT Solutions
भाषा ‘उपज’ के लए शब्द
हद जो उपजा हो, पैद ावार, फसल
संस्कृत श यम्
स्
पंजाबी उपज, पैद ावार
उदू पैद ावार
कश्मीरी पॉदावार
सधी उपज, पैद ावार
मराठ पीक
गुजराती ऊपज, पेद ाश
क कणी पीक
नेपाली उ जाबाली, उपज
ब्
बांग्ला फसल
अस मया श य, खेित, फचल , कृ िष जात व तु
स् स्
म णपुरी महै मरोङ् थाबा पो थोक
त्
ओ ड़आ फसल , खेित
तेलुगु पंट
त मल िवळै चल्
च्
मलयालम िव वुं
ळ्
कन्नड़ बेळे फसलु
अब ‘इनके अ त रक्त’ — कुछ और भाषाओं तथा बो लय के शब्द
(यह भाग आपको स्वयं अपने घर, गाँव और आस-पड़ोस से पूछकर भरना है। नीचे नमूने के रूप म कुछ शब्द दए गए ह — आप
अपनी जानकारी से इनम जोड़ सकते ह।)
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे! AglaSem · NCERT Solutions
भाषा / बोली ‘उपज’ के लए शब्द
अंग्रेज़ी crop, harvest, produce, yield
भोजपुरी फसल , उपज, पैद ावार
अवधी फसल , उपज, खेती
मगही फसल , उपज
मै थली फिसल , उपज
ब्रजभाषा फसल , उपज, खेती-बाड़ ी
ह रयाणवी फसल , पैद ावार
छत्तीसगढ़ फसल , उपज
राजस्थानी (मारवाड़ी) फसल , पैद ावार, ऊपज
बुंदेली फसल , उपज
इस सूची से क्या दखता है — यही इस बॉक्स का असली पाठ: ध्यान से दे खए, अठारह भाषाओं म शब्द
अलग-अलग ह, पर वे दो-तीन प रवार म बँट जाते ह —
‘उपज/ऊपज/उब्जाबाली’ — हद , पंजाबी, सधी, गुजराती, नेपाली — सबका मूल एक ही क्रया है:
‘उपजना’।
‘फसल/फचल/फसलु/फ सल’ — बांग्ला, अस मया, ओ ड़आ, कन्नड़, हद — यह शब्द अरबी-फ़ारसी से
आकर लगभग पूरे भारत म बस गया।
‘पीक/पंट/ वळै च्चल्/ वळ्वुं’ — मराठ , क कणी, तेलुगु, त मल, मलयालम — यहाँ मूल अलग है, पर त मल
‘ वळै च्चल्’ और मलयालम ‘ वळ्वुं’ आपस म बहन-भाषाएँ लगती ह।
‘शस्य/शस्यम्’ — संस्कृत और अस मया दोन म मलता है — यानी क वता का शब्द आज भी जी वत है।
यही ‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ का जीता-जागता प्रमाण है — सौ मुख अलग-अलग बोलते ह, पर बात एक ही होती
है: अन्न।
कैसे पता कर: अपने वद्यालय म ही यह काम हो सकता है। कक्षा म जतनी भाषाएँ बोलने वाले वद्याथ ह, सबसे
एक-एक शब्द पू छए और श्यामपट पर ल खए। अपने दादा-दाद और नाना-नानी से पू छए — पुरानी पीढ़ के पास
प्रायः वे शब्द होते ह जो अब लुप्त हो रहे ह।
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प्र.2 — उपयुक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा म भी ल खए।
पहले वह वाक्य दे ख ली जए जो अनुवाद करना है (पृष्ठ 173) —
“क वता म आए ‘शस्य’ शब्द का अथ ‘उपज’ भी होता है।”
यह भाग आपको अपनी मातृभाषा म लखना है। नीचे कुछ भाषाओं म नमूने दए गए ह, ता क आप ढं ग समझ सक —
भाषा वाक्य
हद (मूल) क वता म आए ‘शस्य’ शब्द का अथ ‘उपज’ भी होता है।
भोजपुरी किवता में आइल ‘श य’ श द के मतलब ‘उपज’ भी होला।
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अवधी किवता माँ आइ ‘श य’ सबद कै अरथ ‘उपज’ भी होत है।
स्
ब्रजभाषा किवता मैं आयौ ‘श य’ सबद कौ अरथ ‘उपज’ हू ँ होय है।
स्
मै थली किवतामे आयल ‘श य’ श दक अथ ‘उपज’ से हो होइत अिछ।
स् ब्
राज ानी किवता में आयोड़ ो ‘श य’ सबद रो अरथ ‘उपज’ ई है।
स् व्
छत्तीसगढ़ किवता म आय ‘श य’ स द के अरथ ‘उपज’ घलो होथे।
स् ब्
संस्कृत किवतायाम् आगत य ‘श य’ इित श द य अथः ‘उपज’ (स यम्) इ यिप भवित।
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यह अभ्यास क्य : जब हम एक ही वाक्य को दो भाषाओं म लखते ह, तो दो बात अपने आप समझ आ जाती ह —
पहली, क हर भाषा के अपने नयम ह (कह ‘होता है’, कह ‘होला’, कह ‘होइत अ छ’, कह ‘भव त’); और
दूसरी, क इन नयम के नीचे अथ एक ही रहता है। यही भारत क बहुभा षकता क सुंदरता है — और यही
क वता क पं क्त ‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ का व्यावहा रक अनुभव है।
ध्यान द जए: य द आपक मातृभाषा हद ही है, तो अपनी बोली म ल खए — भोजपुरी, अवधी, बुंदेली,
ह रयाणवी, मगही, ब्रज, कुमाऊँनी, गढ़वाली, जो भी आपके घर म बोली जाती हो। बोली भी भाषा ही होती है, और
वही आपके सबसे नकट है।
झरोखे से — ‘जय जय भारतमाता’ (मै थलीशरण गुप्त) — पृष्ठ 173
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अभ्यास › झरोखे से
झरोखे से तु ल नात्मक अध्ययन
प्र.1 सूयकांत त्रपाठ ‘ नराला’ क भाँ त मै थलीशरण गुप्त ने भी भारत का मनोरम और ओजस्वी गुणगान कया है।
नीचे उनक च चत क वता ‘जय जय भारतमाता’ का एक अंश दया गया है — इसका अथ और भाव स्पष्ट
क जए तथा बताइए क यह ‘भार त, जय, वजयकरे!’ से कन बात म मलती है और कन बात म अलग है।
क — अंश का सरल अथ
पं क्त सरल अथ
“जय जय भारतमाता!” हे भारतमाता! तु हारी जय हो, जय हो।
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“तेरा बाहर भी घर जैसा रहा प्यार ही तु हारा बाहर का भाग — यानी दू स रे दे शों से लगा तु हारा छोर — भी घर जैस ा ही रहा; उसने सदा
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पाता।” यार ही पाया है। (भारत ने बाहर से आने वाले को भी अपना ही माना।)
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“ऊँचा हया हमालय तेरा / उसम िहमालय तु हारा ऊँ चा दय (िहया) है, और उस दय में िकतनी पीड़ ा भरी हुई है।
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कतना दरद भरा”
“ फर भी आग दबाकर अपनी / िफर भी वह अपने भीतर की आग (पीड़ ा) को दबाकर हमें हरा-भरा बनाए रखता है।
रखता है वह हम हरा”
“सौ सोत से फूट-फूटकर पानी टू टा उसी िहमालय से सौ ोतों (सोतों) से फू ट-फू टकर पानी बहकर आता है।
आता”
ख — भाव
गुप्त जी ने यहाँ हमालय को भारत का हृदय कहा है, और इसी एक कल्पना से पूरा भाव खुल जाता है। हृदय वह अंग है जो भीतर
रहता है, दखता नह , पर सबको जीवन दे ता है। हमालय भी ऐसा ही है — वह चुपचाप खड़ा रहता है, बफ़ क चोट सहता है, ठं डी
हवाएँ रोकता है और बदले म न दयाँ दे कर पूरे दे श को ‘हरा’ रखता है। ‘आग दबाकर अपनी’ म गहरी बात है — दुख सहकर भी
दूसर को हरा-भरा रखना ही सच्चा मातृत्व है, और यही भारत का स्वभाव है। ‘सौ सोत से फूट-फूटकर पानी टू टा आता’ म वह पीड़ा
आँसुओं क तरह बहती हुई भी दखती है और न दय के रूप म जीवन भी दे ती है — एक ही चत्र म दुख और वरदान दोन ।
पहली पं क्तय म क व भारत क उदारता गनाता है: यहाँ ‘बाहर’ भी ‘घर’ जैसा है, यानी जो भी आया, उसे प्यार ही मला।
ग — दोन क वताओं क तुलना
समानताएँ —
1. दोन राष्ट्र-वंदना ह और दोन जयघोष से आरंभ होती ह — ‘भार त, जय, वजयकरे!’ और ‘जय जय भारतमाता!’
2. दोन म भारत माँ है, भू म नह — नराला ‘भार त’ कहते ह, गुप्त जी ‘भारतमाता’। इसी लए दोन म भारत का शरीर है —
कसी म मुकुट और गला, कसी म हृदय।
3. दोन म हमालय कद्र म है और दोन म उससे नकलती जलधारा का उल्लेख है — नराला म ‘गंगा ज्यो तजल-कण’, गुप्त जी
म ‘सौ सोत से फूट-फूटकर पानी’।
4. दोन म ‘सौ’ क कल्पना है — नराला म ‘शतमुख-शतरव’, गुप्त जी म ‘सौ सोत ’। दोन जगह ‘सौ’ गनती नह , अन गनत
का प्रतीक है।
5. दोन म उदारता का भाव है — नराला क ‘ध्व नत दशाएँ उदार’ और गुप्त जी का ‘बाहर भी घर जैसा … प्यार ही पाता’।
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कक्षा 9 हद अध्याय 10 भार त, जय, वजयकरे!
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6. दोन गेय ह — दोन म टे क है और तुक है, इस लए दोन गाई जा सकती ह।
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7. दोन स्वतंत्रता-पूव के क वय क रचनाएँ ह, इस लए दोन म दे श को जगाने और गौरव जगाने का स्वर है।
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अंतर —
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aतुआधार भार त, जय, वजयकरे! ( नराला) जय जय भारतमाता (मै थलीशरण गुप्त)
. comसरल, बोलचाल के िनकट खड़ ी बोली — िहया, दरद, हरा, सोतों, ag
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भाषा अत्यंत संस्कृत नष्ठ और समासयुक्त — शु च,
l as फू ट-फू टकर। पढ़ ते ही अथ खुल जाता है।
स्तव, प्रणव, शतरव, ज्यो तजल।
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हमालय का मुकुट — सर पर, यानी गौरव का प्रतीक। िहया ( दय) — भीतर, यानी वेद ना और वा स य का पतीक।
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रूपक
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a s emभी संतान को हरा रखती
com और वैभवशाली है।
वा स य और क णा — माँ दुख सहकर
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मूल भाव गौरव और वजय-कामना — भारत भव्य, दव्य त् ल् रु
. है।
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शै ली संबोधन-शैली, क्रया लगभग नह ; केवल नाम- कथन-शैल ी — ‘रखता है’, ‘आता’ जैस ी ि याएँ; बात कही जा रही
पद और चत्र। है, िदखाई नही ं जा रही।
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दृ ष्ट बाहर से — क व भारत का रूप गनाता है भीतर से — किव भारत की भावना बताता है (दद , याग, यार)।
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(चरण, वस्त्र, हार, मुकुट)।
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gजैl सा स्वर।
ओज गुण प्रधान — उ aोष
गुण माधुय और क णा पधान — लोरी जैस ा वर।
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ि वेद ी युग / रा ीय का यधारा — प ट क यm
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काव्य-धारा छायावाद — लाक्ष णकता, प्रतीक, बब-बहुलता। द्व व् , सीधा संदे श।
स् ष् थ्
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. gl नराला दूर खड़े होकर दे खते
co दोन क व एक ही माँ क वंदना करते ह, पर दो अलग जगह पर खड़ेaहोकर।
seहmऔर उसका रूप गनाते ह — इस लए उनक क वता म मुकुट, हार और वस्त्र ह। गुप्त जी पास बैठकर दे खते ह
नष्कष:
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agl और उसका मन पढ़ते ह — इस लए उनक क वता म दद, त्याग और प्यार है। पहली क वता पढ़कर सर ऊँचा होता
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है, दूसरी पढ़कर आँख भर आती है। दोन मलकर दे शप्रेम का पूरा अथ बनाती ह — गव और कृतज्ञता।
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प्र.2
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(इस क वता को पुस्तकालय से ढूँ ढ़कर पूरा प ढ़ए।)
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em1. कहाँ ढूँढ़
यह पढ़ने का काम है। नीचे बताया गया है क कहाँ ढूँ ढ़, पढ़ते समय क्या दे ख और पढ़ने के बाद क्या लख।
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पुस्तकालय — मै थलीशरण गुप्त क काव्य-रचनाओं के संग्रह दे खए। उनक प्र सद्ध कृ तयाँ ह — भारत-भारती, साकेत,
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यशोधरा, पंचवट , जयद्रथ वध। ‘जय जय भारतमाता’ उनके गीत के संग्रह म मलेगी।
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हद सा हत्य के संकलन — दे शभ क्त-गीत के संकलन म यह क वता प्रायः रहती है।
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वश्वसनीय ड जटल ोत — NCERT का ePathshala/DIKSHA मंच, सा हत्य अकादमी तथा सरकारी ड जटल
पुस्तकालय के संग्रह। इंटरनेa से कोई भी पं क्त लेने से पहले दे खए क वहाँ प्रकाशक या संपादक का नाम दया है या नह
— क्य क नेट पर बहुत-सी पं क्तयाँ ग़लत क व के नाम से चलती रहती ह।
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अपने हद शक्षक से पू छए — वद्यालय के पुस्तकालय म प्रायः ‘राष्ट्रक व’ के नाम से एक अलग खंड होता है।
2. क व के बारे म इतना जान ली जए
मै थलीशरण गुप्त हद के उन क वय म ह जन्ह ‘राष्ट्रक व’ कहा जाता है। वे खड़ी बोली को काव्य क भाषा बनाने वाले प्रमुख
क वय म गने जाते ह। उनक क वता क सबसे बड़ी वशेषता है — सरल भाषा म गहरी बात, और उपे क्षत पात्र को स्वर दे ना
(जैसे साकेत म उ मला और यशोधरा म यशोधरा)। इसी कारण उनक राष्ट्र-वंदना म भी श क्त से अ धक करुणा दखाई दे ती है।
3. पढ़ते समय ये बात नोट क जए
क्या दे ख क्य
टे क कौन-सी है और कतनी बार ‘जय जय भारतमाता!’ — यही पं क्त गीत को गेय बनाती है। ग नए क वह कतनी बार आती है।
लौटती है
भारत के कौन-कौन से अंग गनाए अंश म ‘ हया’ ( हमालय) आया है। पूरी क वता म और कौन-से अंग ह — यह नराला क क वता से
गए ह तुलना के काम आएगा।
कौन-से शब्द बोलचाल के ह हया, दरद, सोत , हरा — इन्ह अलग ल खए और नराला के शु च, स्तव, प्रणव से तुलना क जए।
कौन-सा भाव प्रधान है गव, करुणा, आ ान या कृतज्ञता — पूरी क वता पढ़ने पर यह और स्पष्ट हो जाएगा।
अलंकार ‘फूट-फूटकर’ (पुनरु क्त), ‘ हया हमालय’ (रूपक और अनुप्रास दोन ) — ऐसे और उदाहरण
खो जए।
4. पढ़ने के बाद क्या लख — नमूना ढाँचा (एक पृष्ठ)
1. क वता का नाम, क व और ोत ( कस पुस्तक से पढ़ , प्रकाशक और वष स हत)।
2. क वता का सार — पाँच-छह वाक्य म।
3. तीन पं क्तयाँ जो सबसे अच्छ लग — और हर पं क्त पर दो वाक्य क वह क्य अच्छ लगी।
4. तुलना — ‘भार त, जय, वजयकरे!’ से एक समानता और एक अंतर।
5. मेरी प्र त क्रया — क वता पढ़कर मन म क्या भाव आया।
कक्षा म क जए: दोन क वताएँ एक के बाद एक ऊँची आवाज़ म प ढ़ए — पहले नराला क , फर गुप्त जी क ।
आप स्वयं अनुभव करगे क पहली म स्वर ऊँचा और तेज़ हो जाता है और दूसरी म धीमा और कोमल। यही ओज
गुण और माधुय गुण का अंतर है, जसे कताब से नह , कान से सीखा जाता है।
खोजबीन — पृष्ठ 174
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अभ्यास › खोजबीन
खोजबीन प रयोजना
प्र.1 दे शप्रेम से संबं धत अन्य क वताएँ पुस्तकालय, इंटरनेट से खोजकर प ढ़ए और कसी एक क वता का कक्षा म
वाचन भी क जए।
यह खोज और वाचन का काम है। नीचे क वताओं क सूची, खोजने के भरोसेमंद ोत और वाचन क पूरी व ध द गई है।
1. दे शप्रेम से जुड़ी कुछ प्र सद्ध हद क वताएँ
क वता कव क्य पढ़
वर दे , वीणावा द न वर दे ! सूयकांत त्रपाठ इसी पाठ की अगली खोज — सं कृ तिन ठ श दावली और संबोधन-शैल ी
स् ष् ब्
‘ नराला’ िबलकु ल इसी किवता जैस ी।
जय जय भारतमाता मै थलीशरण गुप्त ‘झरोखे से ’ में इसी का अंश िदया गया है — सरल भाषा में गहरी क रुणा।
भारत माता ग्रामवा सनी सु मत्रानंदन पंत यहाँ भारतमाता महल में नही,ं गाँव में रहने वाली दुबल ी है — िनराला की स्त्र
भ य छिव से िबलकु ल उलटा और बहुत सोचने लायक िच ।
व् त्र
पुष्प क अ भलाषा माखनलाल चतुवद छोटी, सरल और अ यंत पभावशाली — फू ल कहता है िक वह दे वता पर नही,ं
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दे श पर िमटने वालों के माग पर पड़ ना चाहता है।
झाँसी क रानी सुभद्रा कुमारी आपकी अपनी पाठ पु तक गंगा की अगली किवता (पाठ 11) — वीर रस और
स्
चौहान लय का सव म उदाहरण। त्त
हमा द्र तुंग ंग से (‘अरुण यह जयशंकर प्रसाद छायावाद की एक और ओज वी रा -वंद ना; िनराला से तुल ना के िलए बहुत
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मधुमय दे श हमारा’ भी) उपयु त। क्
हमालय का संदेश / र श्मरथी के रामधारी सह ओज गुण का सबसे पिस उदाहरण; ऊँ ची आवाज़ में पढ़ ने के िलए बना हुआ
द्ध
अंश ‘ दनकर’ का य। व्
कदम मलाकर चलना होगा अटल बहारी आज की भाषा में िलखी गई पेरक किवता, जो क ा-वाचन के िलए बहुत अ छी क्ष च्
वाजपेयी रहती है।
वंदे मातरम् बं कमचंद्र हमारा रा ीय गीत — मूल प से सं कृ त-िन ठ बां ला में; इसमें भी मातभृ िू म
रू स् ष् ग्
चट्टोपाध्याय को माँ के प में दे खा गया है, ठीक इसी किवता की तरह।
रू
सारे जहाँ से अच्छा मुहम्मद इक़बाल ‘मज़ हब नही ं िसखाता आपस में बैर रखना’ — भारत की उदारता का वही भाव
जो िनराला के ‘उदार’ श द में है। ब्
2. कहाँ खोज
वद्यालय और सावज नक पुस्तकालय — क वय क काव्य-संग्रह पुस्तक और दे शभ क्त-गीत के संकलन।
NCERT ePathshala / DIKSHA और सा हत्य अकादमी के ड जटल संग्रह।
पाठ के पहले पृष्ठ (पृष्ठ 166) पर छपा QR कोड — उस पर 0901CH10 लखा है; उसे स्कैन करके इस पाठ से जुड़ी
अ त रक्त सामग्री तक पहुँचा जा सकता है।
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कोई भी पं क्त तभी ल खए जब वह कसी संपा दत पुस्तक या वश्वसनीय संग्रह म मल जाए — इंटरनेट पर बहुत-सी क वताएँ
ग़लत क व के नाम से घूमती रहती ह।
3. कक्षा म वाचन कैसे कर
चरण क्या कर
1. चुनाव ऐसी क वता चु नए जो 12–20 पं क्तय क हो और जसक लय आपको स्वयं अच्छ लगे। जो क वता आपको अच्छ नह
लगती, वह सुनने वाले को भी नह लगेगी।
2. समझ वाचन से पहले हर क ठन शब्द का अथ दे ख ली जए। जो पं क्त समझ म न आए, उसे पढ़ते समय आवाज़ अपने आप
लड़खड़ा जाती है।
3. भू मका दो वाक्य म क व और क वता का प रचय द जए — “म माखनलाल चतुवद क ‘पुष्प क अ भलाषा’ सुनाऊँगा। इसम एक
फूल अपनी अं तम इच्छा बताता है।”
4. ठहराव हर चरण के अंत म ज़रा-सा रु कए। तुक वाले शब्द (जैसे करे–धरे–भरे) थोड़ा ख चकर बो लए — इससे लय अपने आप बैठ
जाती है।
5. भाव वीर रस क क वता म स्वर ऊँचा और कसा हुआ; करुण भाव म धीमा और कोमल। एक ही सुर म पूरी क वता पढ़ दे ना
सबसे बड़ी चूक है।
6. दृ ष्ट और काग़ज़ म सर मत गा ड़ए; बीच-बीच म सुनने वाल क ओर दे खए। सीधे खड़े होइए और हाथ का प्रयोग संयम से क जए।
मुद्रा
7. अभ्यास घर पर कम-से-कम तीन बार ऊँची आवाज़ म प ढ़ए — एक बार केवल अथ के लए, एक बार केवल लय के लए, और
तीसरी बार दोन के साथ।
सुझाव: जस क वता का वाचन कर, उसक एक पं क्त चुनकर श्यामपट पर लख द जए। सुनने वाले उस पं क्त
को दे खते हुए सुनगे तो क वता उन्ह अ धक दे र याद रहेगी।
प्र.2 इस क वता क तरह ही संस्कृत नष्ठ शब्दावली से युक्त नराला क एक अन्य क वता, ‘वर दे , वीणावा द न वर दे !’
पुस्तकालय, इंटरनेट से ढूँ ढ़कर प ढ़ए।
क वता का प रचय — ‘वर दे , वीणावा द न वर दे !’ सूयकांत त्रपाठ ‘ नराला’ क सबसे प्र सद्ध रचनाओं म से एक है। यह
सरस्वती-वंदना है, जो आज भी अनेक वद्यालय म प्राथना के रूप म गाई जाती है। ‘वीणावा द न’ का अथ है वीणा बजाने वाली,
यानी सरस्वती; और ‘वर दे ’ का अथ है वरदान द जए।
आरंभ क पं क्तयाँ —
वर दे , वीणावा द न वर दे !
प्रय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत म भर दे !
सरल अथ — हे वीणा बजाने वाली (सरस्वती)! वरदान द जए। भारत म स्वतंत्रता का प्रय स्वर और अमृत जैसा नया मंत्र भर
द जए।
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यह क वता इस पाठ से क्य जोड़ी गई है — दोन क वताओं म आश्चयजनक समानताएँ ह। नीचे उन्ह आमने-सामने रखा गया है
—
समानता का भार त, जय, वजयकरे! वर दे , वीणावा द न वर दे !
बदु
संबोधन कसे ‘भार त’ — जसका अथ शब्द-संपदा म सरस्वती ‘वीणावािदिन’ — स्पष्ट रूप से सर स्वती। दोनों किवताएँ एक ही
और भारतमाता दोन है। दे वी तक पहचु ँ ती है।ं
भाषा अत्यंत संस्कृत नष्ठ और समासयुक्त — शु च, वही शैल ी — ‘ वतं -रव’, ‘अमृत-मं ’, ‘ योितमय’, ‘जगमग’
स् त्र त्र ज्
स्तव, प्रणव, शतरव। जैसे त सम और सामािसक पद।
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शैली संबोधन-शैली; टे क बार-बार लौटती है — करे, वही — ‘वर दे ’ पूरी किवता में लौटता रहता है, इसिलए दोनों गेय
धरे, भरे, मुखरे। है।ं
भाव भारत का गौरव-गान और वजय क कामना। भारत के िलए वतं ता, नवीनता और ान की पाथना। दोनों में
स् त्र
कें द में ‘भारत’ ही है।
ओज गुण छोटे चरण, कसे हुए समास, उ ोष का स्वर। वही वेग और वही उद् घ ोष — दोनों सामूिहक वर में गाने के िलए
स्
बनी है।ं
दोन को साथ पढ़ने से क्या लाभ: पाठ क भू मका बताती है क नराला ने छायावाद क वय म सबसे पहले
मुक्त छं द का प्रयोग कया। इससे यह भ्रम हो सकता है क उनक सारी क वताएँ छं द-मुक्त ह। ये दोन क वताएँ
इस भ्रम को तोड़ दे ती ह — दोन पूरी तरह तुकांत, लयबद्ध और गेय ह। इससे यह समझ बनती है क नराला ने छं द
तोड़ा नह था, उसे बंधन नह रहने दया था — जहाँ लय से बात बनती थी, वहाँ उन्ह ने लय का पूरा उपयोग कया।
पढ़ते समय ये बात नोट क जए —
क व सरस्वती से क्या-क्या माँगता है — ध्यान द जए, वह अपने लए कुछ नह माँगता, भारत के लए माँगता है।
कौन-कौन से समा सक पद ह — जैसे ‘स्वतंत्र-रव’, ‘अमृत-मंत्र’। उनका वग्रह क जए, ठ क वैसे ही जैसे इस पाठ म ‘शतदल’
और ‘ज्यो तजल’ का कया।
तुक-योजना क्या है और टे क कतनी बार लौटती है।
कौन-सा अलंकार बार-बार आता है (यहाँ भी अनुप्रास ही सबसे अ धक मलेगा)।
कहाँ मलेगी: नराला के काव्य-संग्रह अना मका तथा उनक प्र त न ध क वताओं के संकलन म; नराला रचनावली
के आठ खंड म उनका संपूण सा हत्य प्रका शत है। ड जटल रूप म NCERT ePathshala/DIKSHA और
सा हत्य अकादमी जैसे वश्वसनीय मंच पर दे खए। ध्यान र खए — इंटरनेट पर इस क वता के कुछ पाठ-भेद भी
मलते ह, इस लए कसी संपा दत पुस्तक का पाठ ही अं तम मा नए।
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अध्याय — एक नज़र म
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g वे मूलतः गढ़ाकोला
m .cसूयकांत त्रपाठ ‘ नराला’ का जन्म सन् 1899 म बंगाल के म हषादल म हुआ।
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se उत्तर प्रदे श के नवासी थे। उनक औपचा रक शक्षा नौव तक म हषादल म ही हुई और आगे का सारा ज्ञान उन्ह ने
रचनाकार —
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स्वाध्याय से अ जत कया — संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी तीन भाषाएँ उन्ह ने स्वयं पढ़कर सीख । यही स्वाध्याय इस क वता
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क संस्कृत नष्ठ शब्दावली म साफ़ दखाई दे ता है। उनका नधन सन् 1961 म हुआ।
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रचना-संसार — नराला क प्रमुख काव्य रचनाएँ ह — अना मका, प रमल, गी तका, कुकुरमुत्ता और नए पत्ते। उपन्यास,
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कहानी, आलोचना और नबंध लेखन म भी उनक ख्या त अ वस्मरणीय है। नराला रचनावली के आठ खंड म उनका संपूण
agनकता, वद्रोह, क्रां त, प्रेम क तरलता और प्रकृ त का वराट तथा उदात्त
सा हत्य प्रका शत है। उनक रचनाओं म दाश
चत्र उप स्थत है। छायावाद रचनाकार म सबसे पहले मुक्त छं द का प्रयोग उन्ह ने ही कया, और उपे क्षत तथा पी ड़त के
प्र त उनक क वताओं म गहरी सहानुभू त मलती है।
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s e mवता के आरंभ म ही
जय, वजयकरे!’ कहकर भारत को वजयश्री प्राप्त करने क कामना करता lहैa
कथ्य — ‘भार त, जय, वजयकरे!’ नराला क दे शप्रेम से ओत-प्रोत एक प्रेरणादायक रचना है। क
क व ‘भारoत,m
. c a g । वह भारतभू म को ‘कनक-
a s em !’ कहकर संबो धत करता है, जो भारत क कृ ष-परंपरा और श्रम के स दय को दशाता है। पूरी क वता एक
शस्य-कमलधरे
a gl ही लंबा संबोधन है — क व भारत से कुछ माँगता नह , केवल उसका रूप गनाता चला जाता है।
चत्र-योजना — क वता म भारत क भौगो लक सुंदरता का ऐसा चत्र ख चा गया है मानो भारत कोई दे वी हो, जसके
m है, वन-वनस्प त वस्त्र ह, फूल आँचल म जड़े ह, गंगा गले का a s
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चरण को समुद्र अपने जल से धोता है। नद , वन, पुष्प, हमालय, गंगा आ द प्राकृ तक शोभा को भारत के वस्त्राभूषण क
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उजला हार है और हमालय क बफ़ सर काaमुsकeु ट। क व भारत को एक चेतन सत्ता के रूप म दे खता है, जसक दशाओं म
तरह प्रस्तुत कया गया है — लंका चरण के नीचे खला
agकlतरह के स्वर और वचार से समृद्ध है।
‘ओंकार’ क गूँज हो रही है और जो अने
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काव्य-ना यका — क वता क कद्र य उप स्थ त ‘भार त’ है। शब्द-संपदा के अनुसार ‘भार त/भारती’ का अथ है —
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सरस्वती, वाणी, वाणी क अ धष्ठात्री, भारतमाता। यही दोहरा अथ क वता का प्राण है: संबोधन एक साथ ज्ञान क दे वी
m a s emहै और वाणी भी। क व स्वयं
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और मातृभू म — दोन तक जाता है। इसी लए क वता म अन्न भी है और ओंकार भी, फ़सल भी
. coहै — ‘स्तव कर बहु-अथ-भरे!’ यानी यह स्तु त ही बहु-अथ है। a
semभाषा-शैली — भाषा खड़ी बोली है, पर तत्सम-बहुल और अत्यंत संस्कृत नष्ठ — शु च, युगल, स्तव, तरु, तृण, वसन,
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agl ख चत, सुमन, धवल, शुभ्र, प्रणव, ओंकार, मुखर। शैली क तीन पहचान ह — (1) संबोधन-शैली: ‘ वजयकरे!’,
‘कमलधरे!’, ‘बहु-अथ-भरे!’, ‘मुखरे!’ — चार संबोधन-पद ह; (2) समास-बहुलता: ‘कनक-शस्य-कमलधरे’, ‘तरु-तृण-
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वन-लता वसन’, ‘शतमुख-शतरव-मुखरे’; (3) क्रया क न्यूनता: पूरी क वता म ‘धोता’ के अ त रक्त लगभग कोई क्रया नह
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as है क नराला ने छायावा दय म सबसे पहले मुक्त छं द अपनाया, पर यह क वता
— क व वाक्य नह बनाता, चत्र रखता चला जाता है। इसी से भाषा म ओज गुण उत्पन्न होता है।
शल्प और छं द — पाठ क भू मका lबताती
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उनका दूसरा पक्ष दखाती है — यह पूरी तरह तुकांत और गेय है। तुक-योजना दे खने लायक है: हर छं द के पहले तीन चरण
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आपस म तुक मलाते ह (शतदल–सागर-जल–युगल; वसन–सुमन–कण; तुषार–ओंकार–उदार) और चौथा चरण हर बार
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आरं भक ‘-रे’ क तुक पर लौट आता है ( वजयकरे–कमलधरे–भरे–गले–मुखरे)। इससे क वता म आगे बढ़ने और लौट आने
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— दोन क ग त एक साथ बनी रहती है, ठ क जयघोष क तरह।
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ag शतदल’, ‘श◌ु च चरण’, ‘धवल ध◌ार’,
.cअलंकार — क वता अनुप्रास से भरी हुई है — ‘कनक … कमल’, ‘ल◌ंका पदतल
m ‘प्राण प्रणव’, ‘शतमुख-शतरव’। रूपक भी बार-बार आता है — हमालय पर मुकुट का, गंगा-धारा पर हार का, वन-वनस्प त
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पर वस्त्र का और लंका पर चरण-तल के कमल का आरोप। पुस्तक स्वयं ‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ को अनुप्रास का और ‘मुकुट
शुभ्र हम-तुषार’ को रूपक का उदाहरण बताती है। साथ ही पूरी क वता म प्रकृ त का मानवीकरण है — समुद्र चरण धोता
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है, दशाएँ बोलती ह।
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a s emव लखी गई है, इस लए इसका देशप्रेम नारा नह , वंदना है। क व भारत को श क्त,
मूल संवेदना — यह क वता स्वतंत्रता-पू
a l इन सबका एक जीवंत शरीर मानकर देखता है। इसका सीधा अथ यह नकलता है क नद ,
अन्न, जल, वन, ज्ञान और ध्व नg—
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