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NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 11 झाँसी की रानी

AglaSem पर कक्षा 9 हिंदी पाठ 11 झाँसी की रानी (गंगा) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Hindi Chapter 11 (Ganga).
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NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 11 झाँसी की रानी – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा9

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 11: झाँसी क रानी

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — गंगा

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

176 – 193 14 49 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 64 pages

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · हद · गं गा

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 11: झाँसी क रानी
NCERT कक्षा 9 हद क पाठ्यपुस्तक गंगा के काव्य खंड के पाठ 11 — झाँसी क रानी — के सभी प्रश्न के पूरे हल। रचनाकार ह सुभद्रा कुमारी
चौहान (सन् 1904–1948), जो स्वयं स्वतंत्रता सेनानी थ और दो बार जेल गईं। वधा है वीर-रस क कथात्मक क वता (वीरगाथा-गीत), जो सन्
1857 के प्रथम स्वतंत्रता सं ाम क पृष्ठभू म पर रची गई है और रानी लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर वीरग त तक क पूरी कथा 18 छं द म कहती है।
हर छं द के अंत म वही टे क लौटती है — “बुंदेले हरबोल के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥” पृष्ठ 176 से
193 तक अभ्यास के सभी शीषक — मेरे उत्तर मेरे तक, मेरी समझ मेरे वचार (रचना से संवाद), क वता म कहानी ( वधा से संवाद), साझा
साथ/साझा संघष ( वषय से संवाद), व्याकरण क बात › शब्द एक अथ अनेक और मुहावरे (भाषा से संवाद), सृजन, ग त व धयाँ, भाषा
संगम, झरोखे से (झलकारी बाई) तथा खोजबीन — शीषक-दर-शीषक, प्रश्न-दर-प्रश्न हल कए गए ह। साथ म पूरी क वता क छं द-दर-छं द व्याख्या
(सरल अथ, भाव, शल्प और ऐ तहा सक संदभ) द गई है और पुस्तक क दोन अधूरी ता लकाएँ पूरी भरकर द गई ह।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

गंगा (कक्षा 9) 176 – 193

खं ड प्रश्न

14 49

माध्यम

हन्द

क वता क व्याख्या — छं द 1 से 6 — पृष्ठ 177, 178 और 179
काव्य खंड › पाठ 11 › झाँसी क रानी — सरल अथ, भाव, शल्प और ऐ तहा सक संदभ

व्याख्या शल्प

प्र.1 “ सहासन हल उठे , राजवंश ने भृकुट तानी थी, / बूढ़े भारत म भी आई फर से नई जवानी थी, / गुमी हुई
आजाद क क मत सबने पहचानी थी, / दूर फ़रंगी को करने क सबने मन म ठानी थी, / चमक उठ सन्
सत्तावन म वह तलवार पुरानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — सन् 1857 म सारे दे श म ऐसी हलचल मची क राजाओं के सहासन तक हल उठे और राजवंश ने क्रोध से भ ह तान
ल । बूढ़े यानी स दय से थके-हारे भारत म फर से नई जवानी — नया जोश — आ गया। जो आज़ाद खो चुक थी, उसक क मत
अब सबक समझ म आ गई और सबने मन म ठान लया क अंग्रेज़ को यहाँ से दूर करना है। सन् सत्तावन म वही पुरानी तलवार
फर चमक उठ ।

भाव: यह पूरी क वता का प्रवेश-द्वार है। कव यत्री सीधे रानी से शुरू नह करत — पहले वे पूरे दे श का चत्र
ख चती ह, ता क पाठक समझे क लक्ष्मीबाई अकेली नह लड़ ; वे एक बड़े जागरण क सबसे तेज़ लौ थ । ध्यान
द जए क चार पं क्तय म कता ‘सबने’ है — सबने पहचाना, सबने ठाना। यही ‘सब’ आगे चलकर महल और
झ प ड़य म बँटकर भी एक ही रहता है।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार मानवीकरण — नज व ‘ सहासन’ का ‘ हल उठना’ और भारत का ‘बूढ़ा’ होकर ‘जवानी’ पाना। रूपक — ‘बूढ़ा भारत’
(भारत म वृद्धावस्था का आरोप), ‘नई जवानी’ (नया जोश)। अनुप्रास — “ सहासन हल उठे ” म ‘स’-‘ह’ क आवृ त्त और
“क◌ीमत ... पहचानी” म ‘क’ क आवृ त्त।

प्रतीक ‘पुरानी तलवार’ — यह कसी एक क तलवार नह ; यह भारत का वह पुराना शौय है जो लंबे समय से म्यान म पड़ा जंग खा
रहा था। ‘चमक उठ ’ कहकर कव यत्री बताती ह क वह मरा नह था, केवल सोया हुआ था।

बब दृश्य बब — तनी हुई भ ह और म्यान से नकलती चमकती तलवार; कान से अ धक आँख को छू ने वाला चत्र।

तुक और चार चरण के अंत म एक ही तुक — तानी – जवानी – पहचानी – ठानी – पुरानी — और यही ‘-आनी’ क तुक टे क के
लय ‘कहानी’ और ‘रानी’ से जा मलती है। इसी कारण छं द बना रुके टे क म बह जाता है।

रस वीर रस, जसका स्थायी भाव है उत्साह। पहली ही पं क्त से स्वर ऊँचा है।

भाषा ओजपूण खड़ी बोली; ‘ फ़रंगी’ (अंग्रेज़) और ‘आजाद ’ जैसे उदू-फ़ारसी मूल के शब्द — जो शब्द उस समय आम आदमी क
ज़बान पर थे।

ऐ तहा सक संदभ: ‘सन् सत्तावन’ यानी सन् 1857 — जसे प्रथम स्वतंत्रता सं ाम कहा जाता है। इसका आरंभ
10 मई 1857 को मेरठ क छावनी से हुआ और यह दल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी, बहार तथा मध्य भारत तक
फैल गया।

प्र.2 “कानपूर के नाना क मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी, / लक्ष्मीबाई नाम, पता क वह संतान अकेली थी, / नाना के
सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी, / बरछ , ढाल, कृपाण, कटारी उसक यही सहेली थी, / वीर शवाजी
क गाथाएँ उसको याद ज़बानी थ ।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — वह कानपुर के नाना साहब क मुँहबोली बहन थी और बचपन म उसे ‘छबीली’ कहा जाता था। उसका नाम लक्ष्मीबाई
था और वह अपने पता क अकेली संतान थी। वह नाना के साथ ही पढ़ती थी और नाना के साथ ही खेलती थी। बरछ , ढाल, कृपाण
और कटारी — ये ह थयार ही उसक सहे लयाँ थे। वीर शवाजी क शौय-गाथाएँ उसे ज़बानी याद थ ।

भाव: कव यत्री यहाँ बताती ह क वीरता अचानक नह आती — वह बचपन म बोई जाती है। जस उम्र म लड़ कय
को गु ड़य से खेलते दखाया जाता था, उस उम्र म लक्ष्मीबाई क सहे लयाँ ह थयार थे और उसका पाठ शवाजी क
गाथाएँ थ । “बरछ , ढाल, कृपाण, कटारी उसक यही सहेली थी” — इस एक पं क्त म पूरा बचपन आ जाता है,
और यही पं क्त आगे के हर युद्ध का कारण भी बन जाती है।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार रूपक — ह थयार म ‘सहेली’ का आरोप (‘जैसे’ जैसा कोई वाचक शब्द नह है, इस लए उपमा नह , रूपक है)। अनुप्रास
— “क◌ृपाण, कटारी”। पुनरु क्त — “नाना के सँग ... नाना के सँग”, जो साथ-साथ बीते बचपन पर बल दे ती है।

शब्द-चयन ‘छबीली’ — शब्द-संपदा के अनुसार इसका अथ है तेजस्वी, सुंदर, छ बवाली, सजीली। यह नाम बताता है क वह बच्ची
केवल बहादुर नह , चमकदार व्य क्तत्व वाली भी थी।

वतनी ‘कानपूर’ — मानक वतनी ‘कानपुर’ है, पर कव यत्री ने लय के लए द घ ‘ऊ’ रखा। इसी क वता म आगे ‘कानपुर’ भी आता
है (“मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी”)। पुस्तक ने इसी जोड़ी पर पृष्ठ 188 का प्रश्न पूछा है।

तुक छबीली – अकेली – खेली – सहेली — और अंत म ज़बानी, जो टे क क ‘कहानी–रानी’ से मल जाती है।

भाषा बोलचाल क खड़ी बोली; ‘मुँहबोली’, ‘सँग’, ‘ज़बानी’ — घर-आँगन के शब्द।

ऐ तहा सक संदभ: ‘नाना’ यहाँ नाना धुंधूपंत (नाना साहब) ह — अं तम पेशवा बाजीराव द्वतीय के दत्तक पुत्र,
जो बठू र (कानपुर के पास) म रहते थे। लक्ष्मीबाई के पता मोरोपंत ताँबे बठू र म ही रहते थे, इस लए मनु
(लक्ष्मीबाई का बचपन का नाम) और नाना साथ पले-बढ़े । शवाजी मराठा श क्त के संस्थापक थे — उनक गाथाएँ
याद होना ही आगे क तैयारी थी।

प्र.3 “लक्ष्मी थी या दुगा थी वह स्वयं वीरता क अवतार, / दे ख मराठे पुल कत होते उसक तलवार के वार, / नकली
युद्ध, व्यूह क रचना और खेलना खूब शकार, / सैन्य घेरना, दुग तोड़ना, ये थे उसके प्रय खलवार, / महाराष्ट्र-
कुल-दे वी उसक भी आराध्य भवानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — वह लक्ष्मी थी या दुगा — कहना क ठन है; वह तो स्वयं वीरता का अवतार थी। उसक तलवार के वार दे खकर मराठे
पुल कत हो उठते थे। नकली युद्ध करना, सेना का व्यूह रचना और खूब शकार खेलना — ये उसके खेल थे। सेना को घेर लेना और
कला तोड़ना उसके प्रय खलवाड़ थे। महाराष्ट्र क कुलदे वी भवानी ही उसक भी आराध्य दे वी थ ।

भाव: पछले छं द म ह थयार ‘सहेली’ थे; इस छं द म युद्ध-कौशल ‘खेल’ बन जाता है। ‘ खलवार’ शब्द ही सबसे बड़ी
बात कह दे ता है — जो दूसर के लए क ठन युद्ध- वद्या थी, वह उसके लए खेल थी। ‘लक्ष्मी थी या दुगा थी’ म
कव यत्री एक साथ दो रूप रखती ह — लक्ष्मी (शोभा, वैभव, नाम भी वही) और दुगा (श क्त) — और फर दोन
को छोड़कर कहती ह क वह तो ‘वीरता क अवतार’ थी, यानी कसी दे वी क नकल नह , स्वयं एक नया रूप।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी
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शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है

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.cसंदेह — “लक्ष्मी थी या दुगा थी” म उपमेय के वषय म संशय बना रहता है, यही संदेह अलंaकgार है। रूपक — ‘वीरता क
अलंकार
se m अवतार’। अनुप्रास — “द◌ुगा ... अवतार”, “सैन्य घेरना, द◌ुग तोड़ना”।
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वाक्य-रचना तीसरी और चौथी पं क्त म क्रयाहीन सूची है — नकली युद्ध, व्यूह क रचना, शकार, सैन्य घेरना, दुग तोड़ना। क्रया हटा दे ने

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से ग त बढ़ जाती है और लगता है जैसे एक के बाद एक चत्र सामने से गुज़र रहे ह ।

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ग तशील दृश्य बब — तलवार के वार, घरती सेना, टू टता कला।

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अवतार – वार – शकार – खलवार; फर ‘भवानी’ टे क से जुड़ जाता है।

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छं द क ‘भवानी’ मलकर लक्ष्मीबाई को मराठा वीर-परंपरा क उत्तरा धका रणी सद्ध करती ह।em
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भवानी (तुलजा भवानी) मराठ क कुलदे वी ह और शवाजी क आराध्या भी। पछले छं द क ‘ शवाजी क गाथाएँ’ और इस

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a gl द जए: ‘व्यूह’ का अथ है सेना क वशेष रचना (जैसे महाभारत का चक्रव्यूह)। कव यत्री यह बताना चाहती ह
ध्यान
क रानी केवल तलवार चलाना नह जानती थ , रणनी त भी जानती थ — और आगे कालपी तथा ग्वा लयर के

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अ भयान इसी का प्रमाण ह।

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“हुई वीरता क वैभव के साथ सगाई झाँसी म, / ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी म, / राजमहल म
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बजी बधाई खु शयाँ छाईं झाँसी म, / सुभट बुँदेल क वरुदाव ल-सी वह आई झाँसी म, / चत्रा ने अजुन को

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पाया, शव से मली भवानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क
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ag सरल अथ — झाँसी म वीरता क सगाई वैभव के साथ हुई — अथात वीर लक्ष्मीबाई का ववाह झाँसी के वैभवशाली राजघराने म
हुआ। ववाह हुआ और लक्ष्मीबाई रानी बनकर झाँसी आईं। राजमहल म बधाइयाँ बज , चार ओर खु शयाँ छा गईं। वह झाँसी म ऐसे
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आईं जैसे वीर बुंदेल क क त-गाथा ही चली आई हो। यह मलन ऐसा था जैसे चत्रा ने अजुन को पाया हो और भवानी शव से
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मली ह ।

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भाव: कव यत्री ववाह को साधारण घटना क तरह नह कहत । वे कहती ह क यह दो व्य क्तय का नह , दो गुण
का मलन था — ‘वीरता’ का ‘वैभव’ से। और आगे दो पौरा णक-ऐ तहा सक जोड़े रखकर वे इस मलन को बराबरी
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का मलन बताती ह: दोन जोड़ म स्त्री स्वयं वीर या श क्तस्वरूपा है। यानी लक्ष्मीबाई झाँसी म केवल ‘बहू’ बनकर
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नह आईं, श क्त बनकर आईं।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार उपमा — “सुभट बुँदेल क वरुदाव ल-सी वह आई” म ‘-सी’ वाचक शब्द स्पष्ट है (उपमेय — रानी; उपमान —
वरुदाव ल)। रूपक — ‘वीरता क वैभव के साथ सगाई’। पुनरु क्त/यमक-सा प्रभाव — चार पं क्तय का अंत ‘झाँसी म’
पर होना।

संदभ चत्रा और अजुन — महाभारत म म णपुर क राजकुमारी चत्रांगदा स्वयं वीरांगना थ और उन्ह ने अजुन से ववाह कया।
शव और भवानी — श क्त का शव से मलन। दोन संदभ वीर + श क्त के मेल के ह।

ध्व न “बजी बधाई ... छाईं” म अनुप्रास और उत्सव क ध्व न; पूरा छं द मंगल-गीत क तरह बजता है।

रचना- चार बार ‘झाँसी म’ लौटने से झाँसी नगर स्वयं एक पात्र बन जाता है — और यही झाँसी आगे ‘बुझा द प’ और ‘ बरानी’ होगी।
कौशल इसी लए यह उल्लास इतना ज़ोरदार रखा गया है; उसके टू टने पर चोट भी उतनी ही गहरी लगेगी।

तुक झाँसी म – झाँसी म – झाँसी म – झाँसी म (पदांत/अंत्यानुप्रास), और अध-पं क्त म ‘भवानी’ टे क से मल जाती है।

ऐ तहा सक संदभ: लक्ष्मीबाई का ववाह झाँसी के राजा गंगाधर राव नेवालकर से हुआ था। ववाह के बाद ही
उनका नाम ‘मनु/छबीली’ से बदलकर लक्ष्मीबाई रखा गया। ‘बुँदेले’ बुंदेलखंड के लोग ह, और झाँसी बुंदेलखंड म ही
है।

प्र.5 “उ दत हुआ सौभाग्य, मु दत महल म उजयाली छाई, / कतु कालग त चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई, / तीर
चलाने वाले कर म उसे चू ड़याँ कब भाईं, / रानी वधवा हुई हाय! व ध को भी नह दया आई, / नःसंतान मरे
राजाजी रानी शोक-समानी थी,” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — सौभाग्य का सूरज उगा और प्रसन्न महल म उजाला छा गया। कतु समय क चाल चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई।
तीर चलाने वाले हाथ म चू ड़याँ उसे कब अ लगत ! रानी वधवा हो गई — हाय, वधाता को भी दया नह आई। राजा नःसंतान
ही चल बसे और रानी शोक म डू ब गई।

भाव: यह क वता का पहला मोड़ है — उजाले से अँधेरे क ओर। ध्यान द जए, कव यत्री वधवा होने का शोक भी
वीरता क भाषा म कहती ह: “तीर चलाने वाले कर म उसे चू ड़याँ कब भाईं”। यहाँ ‘चू ड़याँ’ केवल आभूषण नह ,
उस समय स्त्री पर लगाई गई सीमा का प्रतीक ह — सजो, घर म रहो, लड़ो मत। रानी को वह सीमा कभी नह भाई।
और अं तम पं क्त का ‘ नःसंतान’ शब्द सूचना भर नह है; वही शब्द अगले छं द म डलहौजी को बहाना दे गा।

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शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार रूपक — ‘सौभाग्य का उ दत होना’ (सूय का आरोप), ‘काली घटा’ ( वप त्त का आरोप)। मानवीकरण — ‘कालग त’
का चुपके-चुपके घटा घेर लाना, ‘ व ध’ का दया न करना। पुनरु क्त प्रकाश — ‘चुपके-चुपके’। अनुप्रास — “मु दत
महल म”, “कालग त ... काली”।

प्रतीक चू ड़याँ = स्त्री के लए तय कया गया सी मत संसार। काली घटा = आने वाली वप त्त। उजयाली = सुख का समय।

वरोधाभासी पहली पं क्त म उजाला, दूसरी म अँधेरा — दोन को अगल-बगल रखकर कव यत्री ने घटना का धक्का और तेज़ कर दया
संयोजन है।

करुण रस ‘हाय!’ का वस्मया दबोधक और ‘शोक-समानी’ शब्द वीर रस के बीच करुण रस क एक धारा ले आते ह।

अनेकाथ शब्द इस छं द म दो अनेकाथ शब्द ह, जन पर पुस्तक ने पृष्ठ 188 पर प्रश्न पूछा है — ‘तीर’ (यहाँ अथ ‘बाण’, न क ‘नद का
कनारा’) और ‘ व ध’ (यहाँ अथ ‘ वधाता’)।

ऐ तहा सक संदभ: राजा गंगाधर राव क मृत्यु सन् 1853 म हुई। मृत्यु से पहले उन्ह ने दामोदर राव को गोद लया
था, पर अंग्रेज़ ने उस दत्तक पुत्र को उत्तरा धकारी मानने से इनकार कर दया — यही आगे क पूरी कथा का बीज
है।

प्र.6 “बुझा द प झाँसी का तब डलहौजी मन म हरषाया, / राज्य हड़प करने का उसने यह अ ा अवसर पाया, / फौरन
फौज भेज दुग पर अपना झंडा फहराया, / लावा रस का वा रस बनकर ब्र टश राज्य झाँसी आया, / अश्रुपूण रानी
ने दे खा झाँसी हुई बरानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — झाँसी का द पक बुझ गया — यानी राजा नह रहे — तब डलहौजी मन-ही-मन प्रसन्न हुआ। उसे राज्य हड़पने का
अ ा अवसर मल गया। उसने तुरंत सेनाएँ भेजकर झाँसी के कले पर अपना झंडा फहरा दया। लावा रस राज्य का वा रस बनकर
ब्र टश राज झाँसी म आ बैठा। आँसुओं से भरी आँख वाली रानी ने दे खा क उसक अपनी झाँसी अब पराई हो चुक है।

भाव: यह छं द अंग्रेज़ी नी त का असली चेहरा दखाता है। ‘हरषाया’ शब्द पर ध्यान द जए — कसी के घर म मौत
हुई है और दूसरा मन-ही-मन खुश हो रहा है; इस एक शब्द से कव यत्री ने डलहौजी का पूरा च रत्र खोल दया।
‘लावा रस का वा रस’ कहकर वे व्यंग्य करती ह — झाँसी लावा रस थी नह , वा रस तो था (दत्तक पुत्र दामोदर राव);
उसे लावा रस घो षत कया गया, ता क हड़पा जा सके।

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शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार रूपक — ‘बुझा द प झाँसी का’ (राजा/राज्य क आशा म द पक का आरोप)। वरोधाभास/व्यंग्य — ‘लावा रस का
वा रस’। अनुप्रास — “फ◌ौरन फ◌ौज फहराया”, “वा रस ... वा रस”।

प्रतीक द प = राजवंश और झाँसी क आशा। झंडा = अ धकार और अधीनता का चह्न। द प का बुझना और झंडे का फहराना —
एक ही छं द म दो उलटे चत्र।

क्रया क ‘फौरन’, ‘भेज’, ‘फहराया’ — तीन तेज़ क्रयाएँ एक ही पं क्त म। इससे लगता है क अंग्रेज़ ने पल भर क दे र नह क ।
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करुण अंत पूरा छं द तेज़ चलता है और अंत म एकदम ठहर जाता है — “अश्रुपूण रानी ने दे खा झाँसी हुई बरानी थी।” ‘ बरानी’ यानी
पराई। अपने ही घर का पराया हो जाना — यही इस छं द क सबसे गहरी चोट है।

तुक हरषाया – पाया – फहराया – आया; फर ‘ बरानी’ टे क क ‘कहानी–रानी’ से मलती है।

ऐ तहा सक संदभ: लॉड डलहौजी सन् 1848 से 1856 तक भारत का गवनर-जनरल था। उसक व्यपगत नी त
(हड़प नी त / Doctrine of Lapse) कहती थी — य द कसी राजा क मृत्यु बना अपनी संतान के हो जाए तो
उसका दत्तक पुत्र उत्तरा धकारी नह माना जाएगा और राज्य कंपनी म मला लया जाएगा। इसी नी त से सतारा,
नागपुर, झाँसी आ द राज्य छ ने गए। इसी अवसर पर रानी का प्र सद्ध वाक्य आता है — “म अपनी झाँसी नह
दूँ गी।”

क वता क व्याख्या — छं द 7 से 12 — पृष्ठ 179, 180 और 181
काव्य खंड › पाठ 11 › झाँसी क रानी — सरल अथ, भाव, शल्प और ऐ तहा सक संदभ

व्याख्या शल्प

प्र.1 “अनुनय- वनय नह सुनता है, वकट फ़रंगी क माया, / व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया, /
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया, / राजाओं नव्वाब को भी उसने पैर ठु कराया, / रानी दासी बनी,
बनी यह दासी अब महरानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — अंग्रेज़ कसी क वनती नह सुनता; उसक माया बड़ी भयंकर है। जब वह भारत आया था तब व्यापारी बनकर दया
क भीख माँगता था। अब डलहौजी ने पैर पसार लए ह और उसका रूप ही पलट गया है। उसने राजाओं और नवाब तक को पैर से
ठु करा दया। रानी दासी बन गई और यह दासी ( ब्र टश सत्ता) अब महारानी बन बैठ ।

भाव: यह पूरा छं द ऐ तहा सक व्यंग्य है। कव यत्री एक ही छं द म अंग्रेज़ क पूरी यात्रा दखा दे ती ह — भीख माँगते
व्यापारी से लेकर राजाओं को ठु कराने वाले शासक तक। सबसे तीखी है अं तम पं क्त: “रानी दासी बनी, बनी यह
दासी अब महरानी थी।” जो असली रानी थी वह दासी बना द गई, और जो पहले याचक (दासी) थी वह महारानी बन
बैठ । यह उलटफेर ही पराधीनता का सबसे सट क चत्र है।

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शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार वरोधाभास — रानी का दासी और दासी का महारानी बनना। यमक-सा प्रभाव — ‘बनी ... बनी’ क आवृ त्त। मुहावरे का
प्रयोग — ‘पैर पसारना’ (धीरे-धीरे अ धकार बढ़ाना), ‘पैर ठु कराना’ (अपमानपूवक अस्वीकार करना)। अनुप्रास — “प◌ैर
पसारे ... पलट”।

‘माया’ शब्द ‘ वकट फ़रंगी क माया’ — माया यानी छल-कपट और भ्रमजाल। कव यत्री यह कहती ह क अंग्रेज़ क ताक़त केवल तोप
क नह , चालाक क भी थी — पहले व्यापार, फर सं ध, फर नी त, फर राज्य।

कालक्रम दूसरी पं क्त ‘जब यह भारत आया’ भूतकाल क ओर लौटती है और तीसरी पं क्त ‘अब’ वतमान म लौट आती है — इस तब–
अब क तुलना से ही व्यंग्य पैदा होता है।

तुक माया – आया – काया – ठु कराया; अध-पं क्त म ‘महरानी’ टे क से जुड़ जाती है।

भाषा ‘नव्वाब’ और ‘महरानी’ — बोलचाल के रूप, जो लय के लए अपनाए गए ह (मानक रूप ‘नवाब’, ‘महारानी’)।

ऐ तहा सक संदभ: ईस्ट इं डया कंपनी सन् 1600 म व्यापार के लए बनी और सन् 1608 म सूरत म व्यापार क
अनुम त माँगने आई थी। प्लासी (1757) और बक्सर (1764) के बाद वह शासक बन गई। पुस्तक के मेरे उत्तर मेरे
तक के प्रश्न 5 म इसी पं क्त के ‘यह’ के बारे म पूछा गया है।

प्र.2 “ छनी राजधानी दे हली क , लया लखनऊ बात -बात, / कैद पेशवा था बठू र म, हुआ नागपुर का भी घात, /
उदै पूर, तंजोर, सतारा, करनाटक क कौन बसात, / जब क सध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र- नपात, /
बंगाले, मद्रास आ द क भी तो यही कहानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — दल्ली क राजधानी छ न ली गई, लखनऊ बात -ही-बात म ले लया गया। पेशवा बठू र म कैद-जैसी हालत म थे
और नागपुर का भी अंत कर दया गया। उदयपुर, तंजोर, सतारा और कनाटक क तो कोई है सयत ही नह बची। सध, पंजाब और
ब्रह्मदे श (बमा) पर तो पहले ही वज्र गर चुका था। बंगाल, मद्रास आ द क कहानी भी यही थी।

भाव: यह छं द क वता क सबसे बड़ी सूची है और इसका उ े श्य साफ़ है — यह दखाना क झाँसी अकेली नह
लूट गई; पूरा भारत एक-एक करके नगला जा रहा था। एक ही छं द म उत्तर, द क्षण, पूव, प श्चम — चार दशाओं
के नाम आ जाते ह। इसी लए आगे का वद्रोह कसी एक राज्य का बदला नह , पूरे दे श का उत्तर बन जाता है।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी
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शल्प का पक्ष छं द म कैसे काम कर रहा है

o m l a se लंबी सूची एक साँस
.c म। प्रश्न-शैली — “क कौन बसात” वस्तुतः प्रश्न नह , उत्तर है — ‘कोई बसात नह a’। g
अलंकार रूपक — ‘वज्र- नपात’ (आक्रमण पर वज्र गरने का आरोप)। अ तशयो क्त-सा प्रभाव — इतनी

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aसूgचीlका शल्प नाम को बना जोड़-शब्द के एक-दूसरे से सटाकर रखा गया है। इससे तेज़ी और बेबसी दोन पैदा होती ह — जैसे गनती
करते-करते साँस टू ट रही हो।

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अनेकाथ /
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बसात = है सयत, सामथ्य (शब्द-संपदा)। नपात = गरना, पतन, वनाश। ब्रह्म = ब्रह्मदे श यानी आज का म्याँमार। ag
व शष्ट शब्द
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वतनी
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दे हली ( दल्ली), उदै पूर (उदयपुर), करनाटक (कनाटक) — लय के लए बदले हुए रूप। यही बात पुस्तक के वतनी वाले
प्रश्न (पृष्ठ 188) का अ त रक्त उत्तर बनती है।
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तुक बात – घात – बसात – नपात; और ‘कहानी’ टे क से मल जाती है।

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agl लखनऊ (1856) ‘कुशासन’ का बहाना बनाकर लया गया — कव यत्री इसी लए कहती ह ‘बात -बात’; सध
ऐ तहा सक संदभ: सतारा (1848), नागपुर (1854) और झाँसी (1854) व्यपगत नी त से हड़पे गए; अवध/

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comबंद कर दे ना ही उनके वद्रोह का एक बड़ा कारण बना। agl
1843 म और पंजाब 1849 म मलाया गया। पेशवा से आशय बाजीराव द्वतीय और उनके प रवार से है, जन्ह
बठू र म पशन पर रखा गया था — नाना साहब क .पशन
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प्र.3 “रानी रोईं र नवास म बेगम ग़म से थ बेजार / उनके गहने-कपड़े बकते थे कलकत्ते के बाजार, / सरे-आम

s e m हार’, / य परदे क
नीलाम छापते थे अं ेज के अखबार, / ‘नागपूर के जेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख

. om परदे शी के हाथ बकानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव औरagशल्प
cइज़्ज़त la स्पष्ट क जए।
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aउत्तर
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सरल अथ — रा नयाँ अपने महल के भीतर रो रही थ और बेगम दुख से ऊब चुक थ । उनके गहने और कपड़े कलकत्ते के बाज़ार
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म बक रहे थे। अंग्रेज़ के अख़बार खुले आम नीलामी के वज्ञापन छाप रहे थे — ‘नागपुर के जेवर ले लो’, ‘लखनऊ का नौलखा हार
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ले लो’। इस तरह परदे म रहने वाली स्त्रय क इज़्ज़त परदे शय के हाथ बक रही थी।

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भाव: यह छं द बताता है क अंग्रेज़ी राज ने केवल राज्य नह छ ने, आत्मसम्मान भी नीलाम कर दया। जो गहने

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कसी घर क स्त्री क नजी वस्तु थे, वे अख़बार म वज्ञापन बनकर छप रहे थे। अं तम पं क्त म कव यत्री दो शब्द को
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जान-बूझकर पास रखती ह — ‘परदे ’ और ‘परदे शी’ — और इसी टकराव से पूरी बात कह दे ती ह। यह लूट का
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नह , अपमान का चत्र है, और यही अपमान आगे वद्रोह म बदलेगा।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार ेष-जैसा शब्द-कौशल — ‘परदे ’ और ‘परदे शी’ क ध्व न-समानता से अथ का व ोट; अनुप्रास — “र◌ानी रोईं
र नवास म”। उद्धरण-शैली — नीलामी के वाक्य ज्य -के-त्य उद्धत करना, जससे चत्र आँख के सामने आ जाता है।

बब श्रव्य बब — नीलामी क पुकार, जो बाज़ार म गूँजती सुनाई दे ती है। क वता म यह अकेली जगह है जहाँ शत्रु क आवाज़
सीधे सुनाई पड़ती है।

करुण रस ‘रोईं’, ‘ग़म’, ‘बेजार’ — तीन शब्द लगातार; यह छं द वीर रस के बीच करुण का सबसे गहरा ग ा है।

वतनी ‘नागपूर’ — इसी क वता के छं द 8 म ‘नागपुर’ आया है। यह वही लय-ज नत वतनी-भेद है जस पर पुस्तक ने पृष्ठ 188 पर
प्रश्न पूछा है।

तुक बेजार – बाजार – अखबार – हार; और ‘ बकानी’ टे क से मलती है।

ध्यान द जए: पुस्तक के मेरी समझ मेरे वचार के प्रश्न 4 म इसी छं द क तीसरी पं क्त पर प्रश्न पूछा गया है —
‘नीलाम छापते’ कसक ओर संकेत करता है।

प्र.4 “कु टय म थी वषम वेदना, महल म आहत अपमान, / वीर सै नक के मन म था, अपने पुरख का अ भमान, /
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान, / ब हन छबीली ने रण-चंडी का कर दया प्रकट आ ान, / हुआ
यज्ञ प्रारंभ उन्ह तो सोई ज्यो त जगानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — झ प ड़य म असह्य पीड़ा थी और महल म घायल स्वा भमान। वीर सै नक के मन म अपने पूवज का गव जाग रहा
था। नाना धुंधूपंत पेशवा युद्ध क सारी तैयारी जुटा रहे थे। ब हन छबीली (लक्ष्मीबाई) ने रण-चंडी का खुला आ ान कर दया। यज्ञ
आरंभ हो गया — उन्ह सोई हुई ज्यो त को जगाना था।

भाव: यहाँ वद्रोह क तैयारी दखाई गई है, और सबसे महत्वपूण बात यह है क उसम तीन वग एक साथ ह —
कु टया, महल और सेना। कु टया के पास भूख का कारण है, महल के पास अपमान का, और सै नक के पास पुरख
के गौरव का। तीन क चोट अलग है, पर दुश्मन एक है। इसी लए कव यत्री इसे युद्ध नह , ‘यज्ञ’ कहती ह — यज्ञ म
सब मलकर आहु त दे ते ह, अकेला कोई नह ।

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शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार रूपक — ‘स्वतंत्रता-संग्राम’ म ‘यज्ञ’ का आरोप; ‘रण-चंडी’ म रानी का आरोप; ‘सोई ज्यो त’ म सुप्त राष्ट्रीय चेतना का
आरोप। अनुप्रास — “न◌ाना धुंधूपंत ... सब सामान”, “ज्यो त जगानी”।

प्रतीक कु टया = साधारण जनता, महल = राजवग, यज्ञ = सामू हक ब लदान, सोई ज्यो त = भूली हुई स्वाधीनता-चेतना।

मुहावरा ‘सोई ज्यो त जगाना’ — बुझी/भूली हुई चेतना को फर जगाना। यही पं क्त पुस्तक क मुहावरे वाली ता लका (पृष्ठ 189)
म द गई है।

संबोधन रानी को यहाँ ‘ब हन छबीली’ कहा गया है — बचपन का घरेलू नाम, ठ क उसी क्षण जब वह युद्ध क घोषणा कर रही है। इस
मेल से पात्र बड़ी और अपनी — दोन एक साथ लगती है।

तुक अपमान – अ भमान – सामान – आ ान; और ‘जगानी’ टे क से मल जाती है।

ऐ तहा सक संदभ: नाना धुंधूपंत यानी नाना साहब, बठू र के पेशवा-पुत्र, जन्ह ने कानपुर म वद्रोह का नेतृत्व
कया। रण-चंडी युद्ध क दे वी चंडी का रूप है; ‘आ ान’ का अथ है दे वी को बुलाना — यानी युद्ध क खुली घोषणा।

प्र.5 “महल ने द आग, झ पड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, / यह स्वतंत्रता क चनगारी अंतरतम से आई थी, / झाँसी
चेती, दल्ली चेती, लखनऊ लपट छाईं थ , / मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी, / जबलपुर, कोल्हापुर म
भी कुछ हलचल उकसानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — महल ने आग द और झ पड़ी ने उस आग को ज्वाला बनाकर सुलगाया। स्वतंत्रता क यह चनगारी कसी बाहरी
कारण से नह , लोग के हृदय क गहराई से आई थी। झाँसी सचेत हुई, दल्ली सचेत हुई, लखनऊ म लपट छा गईं। मेरठ, कानपुर
और पटना ने भारी हलचल मचा द । जबलपुर और कोल्हापुर म भी कुछ हलचल उकसाई गई।

भाव: यह छं द बताता है क 1857 का संग्राम ऊपर से नीचे नह , भीतर से बाहर फैला। पहली पं क्त म श्रम-
वभाजन दे खए — आग महल ने द , पर उसे ज्वाला झ पड़ी ने बनाया। यानी नेतृत्व राजाओं का था, पर श क्त
साधारण जनता क । दूसरी पं क्त इसी बात को दोहराती है — चनगारी ‘अंतरतम’ से आई, कसी वदे शी वचार या
बाहरी कारण से नह । तीसरी-चौथी पं क्त म शहर के नाम आग क तरह एक-एक कर पकड़ते जाते ह।

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शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार रूपक — वद्रोह म ‘आग/ज्वाला/ चनगारी/लपट’ का आरोप, जो पूरे छं द म एक ही चत्र क तरह चलता है (सांगरूपक)।
मानवीकरण — ‘झाँसी चेती, दल्ली चेती’, ‘मेरठ, कानपुर, पटना ने धूम मचाई’ — नगर स्वयं जागते और लड़ते ह। अनुप्रास
— “लखनऊ लपट”, “झ पड़ी ... ज्वाला”।

बब दृश्य बब — चनगारी से ज्वाला और ज्वाला से लपट तक बढ़ता हुआ आग का चत्र। ध्यान द जए, आग का आकार पं क्त-
दर-पं क्त बढ़ता है — यही वद्रोह के फैलने का चत्र है।

मुहावरा ‘धूम मचाना’ — खलबली या हलचल मचा दे ना। यह पं क्त भी पुस्तक क मुहावरे वाली ता लका म है।

वतनी यहाँ ‘कानपुर’ मानक रूप म है, जब क छं द 2 और 9 म ‘कानपूर’/‘नागपूर’ है — यही जोड़ी पुस्तक के प्रश्न का आधार है।

तुक सुलगाई – आई – छाईं – मचाई; और ‘उकसानी’ टे क से मलती है।

ऐ तहा सक संदभ: क्रां त क शुरुआत 10 मई 1857 को मेरठ से हुई; वहाँ से सै नक दल्ली पहुँचे और बहादुर शाह
ज़फ़र को नेता घो षत कया। कानपुर म नाना साहब, लखनऊ म बेगम हज़रत महल, बहार म कुँवर सह (पटना
क्षेत्र) और झाँसी म लक्ष्मीबाई ने मोचा सँभाला। जबलपुर और कोल्हापुर म वद्रोह क हलचल तो हुई, पर वह उतनी
बड़ी नह हो पाई — कव यत्री ने इसी लए वहाँ ‘कुछ हलचल’ लखा है, ‘धूम’ नह । यह उनक ऐ तहा सक
सावधानी है।

प्र.6 “इस स्वतंत्रता-महायज्ञ म कई वीरवर आए काम / नाना धुंधूपंत, ताँ तया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, / अहमद
शाह मौलवी, ठाकुर कुँवर सह सै नक अ भराम, / भारत के इ तहास-गगन म अमर रहगे जनके नाम, / ले कन
आज जुम कहलाती उनक जो कुरबानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए। इसम
आए वीर का प रचय भी द जए।

सरल अथ — इस स्वतंत्रता के महायज्ञ म कई श्रेष्ठ वीर काम आए (ब लदान हुए) — नाना धुंधूपंत, ताँ तया, प्र सद्ध और चतुर
अज़ीमुल्ला, अहमद शाह मौलवी और सुंदर सै नक ठाकुर कुँवर सह। भारत के इ तहास रूपी आकाश म इनके नाम अमर रहगे।
ले कन आज उनका जो ब लदान था, वह ‘अपराध’ कहलाता है।

भाव: यह क वता का सबसे तीखा राजनी तक छं द है। चार पं क्तयाँ वीर को अमर बताती ह और पाँचव पं क्त
एक झटके म यह कह दे ती है क उसी ब लदान को अंग्रेज़ी शासन ‘जुम’ कहता है। “ले कन आज जुम कहलाती
उनक जो कुरबानी थी।” — यह पं क्त याद दलाती है क इ तहास वजेता लखता है, और सुभद्रा कुमारी चौहान
(जो स्वयं दो बार जेल गई थ ) यह क वता उसी लखे हुए इ तहास के वरुद्ध लख रही ह। यही कारण है क वे बार-
बार कहती ह — कहानी हमने ‘हरबोल ’ से सुनी, यानी सरकारी दस्तावेज़ से नह , लोक क स्मृ त से।

छं द म आए 1857 के वीर — कौन थे और क्या कया —

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नाम प रचय 1857 म योगदान

नाना धुंधूपंत (नाना अं तम पेशवा बाजीराव द्वतीय के दत्तक पुत्र; अंग्रेज़ ने उनक पशन बंद कर द थी। उन्ह ने कानपुर म
साहब) बठू र (कानपुर के पास) के नवासी; लक्ष्मीबाई के वद्रोह का नेतृत्व कया और स्वयं को पेशवा घो षत कया।
बचपन के साथी। क वता उन्ह ‘सब सामान जुटाने वाला’ कहती है — यानी
क्रां त के संगठनकता।

ताँ तया (तात्या टोपे) नाना साहब के वश्वस्त साथी और सेनाप त; 1857 के सबसे कुशल सेनानायक। कानपुर, कालपी और
असली नाम रामचंद्र पांडुरंग टोपे। ग्वा लयर के अ भयान म रानी लक्ष्मीबाई के साथ रहे। रानी
क वीरग त के बाद भी लंबे समय तक छापामार युद्ध लड़ते
रहे।

अज़ीमुल्ला खाँ नाना साहब के द वान और सलाहकार; अंग्रेज़ी नाना साहब क पशन का मुक़दमा लड़ने इंग्लड तक गए।
और ांसीसी जानने वाले पढ़े - लखे व्य क्त। लौटकर क्रां त के प्रचार और कूटनी त का काम सँभाला —
कव यत्री ने इसी लए उन्ह ‘चतुर’ और ‘सरनाम’ गाँव-गाँव संदेश पहुँचाने क व्यवस्था इन्ह से जोड़ी जाती है।
(प्र सद्ध) कहा है।

अहमद शाह मौलवी फ़ैज़ाबाद (अवध) के मौलवी और उपदे शक। अवध म वद्रोह के प्रमुख नेता। लखनऊ और शाहजहाँपुर म
(मौलवी अहमदुल्ला अंग्रेज़ से लड़े। सन् 1858 म मारे गए। अंग्रेज़ अफ़सर ने भी
शाह) उन्ह एक कुशल सेनानायक माना।

ठाकुर कुँवर सह बहार के जगद शपुर (आरा, शाहाबाद) के बहार म वद्रोह का नेतृत्व कया। बूढ़े होते हुए भी आरा,
ज़म दार; वद्रोह के समय लगभग 80 वष के थे। आज़मगढ़ और जगद शपुर म अंग्रेज़ को हराया। सन् 1858
‘सै नक अ भराम’ यानी शोभायमान योद्धा। म वजय के कुछ ही दन बाद घाव से उनका दे हांत हो गया।

शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार रूपक — ‘स्वतंत्रता-महायज्ञ’ और ‘इ तहास-गगन’ (इ तहास म आकाश का आरोप — जसम नाम तार क तरह चमकते
रहगे)। अनुप्रास — “कई वीरवर आए काम”।

वरोध क चार पं क्तय का उत्कष और पाँचव का पतन — यह जान-बूझकर रचा गया वपयय है। ‘अमर’ और ‘जुम’ दो शब्द
योजना आमने-सामने खड़े ह।

तुक काम – सरनाम – अ भराम – नाम; और ‘कुरबानी’ टे क से मलती है।

पुस्तक म एक मुद्रण-त्रु ट: पृष्ठ 181 पर इस छं द क टे क म “बुंदेले हरबाल के मुँह” छपा है, जब क पूरी क वता
म हर जगह “बुंदेले हरबोल के मुँह” है। सही शब्द हरबोल ही है — ‘हरबोला’ बुंदेलखंड के लोकगायक का
समुदाय है (दे खए पृष्ठ 190)। उत्तर लखते समय ‘हरबोल ’ ही ल खए।

क वता क व्याख्या — छं द 13 से 18 — पृष्ठ 181, 182 और 183

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी
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काव्य खंड › पाठ 11 › झाँसी क रानी — सरल अथ, भाव, शल्प और ऐ तहा सक संदभ
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व्याख्या शल्प

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a s em गाथा छोड़ चल हम झाँसी के मैदान म, / जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मद बनी मदान म, / ले टनट वॉकर
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प्र.1
आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवान म, / रानी ने तलवार ख च ली, हुआ द्वं द्व असमान म, / जख्मी होकर वॉकर भागा,

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उसे अजब हैरानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

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हमgझाँसी के मैदान म चल, जहाँ लक्ष्मीबाई पुरुष के बीच पुरुष बनकर खड़ी है।

सरल अथ — इन वीर क गाथा छोड़कर अब a
ले टनट वॉकर अपने जवान को लेकर आगे बढ़ा। रानी ने तलवार ख च ली और असमान लोग के बीच द्वं द्व हुआ। घायल होकर

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वॉकर भाग खड़ा हुआ — उसे बड़ी अनोखी हैरानी थी।

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g युद्ध-भू म पर आ जाता है।
.c क वता का कैमरा बदलता है — अब तक दे श का चौड़ा दृश्य था, अब सीधे
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भाव: यहाँ

l a se गाथा छोड़ चल हम’ — यह कहकर कव यत्री पाठक का हाथ पकड़कर उसे मैदान म ले जाती ह; यह
‘इनक
a g कथात्मक क वता क खास शैली है। सबसे मा मक शब्द है ‘असमान ’ — यह द्वं द्व बराबरी का था ही नह : एक ओर

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पूरी अंग्रेज़ी सेना का अफ़सर, दूसरी ओर अकेली रानी। और फर भी हारा वॉकर। ‘अजब हैरानी’ म हल्का व्यंग्य भी
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है — उसे वश्वास ही नह हो रहा था क एक स्त्री उसे घायल कर सकती है।

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छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

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अलंकार अनुप्रास — “मद बनी मदान म” (साथ ही यह यमक-सा प्रयोग भी है — एक ही शब्द-मूल दो रूप म)। वीर रस का पूरा

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उभार।

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“जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई” — पूरी क वता भूतकाल म है, पर यह एक क्रया वतमान म है। इससे दृश्य आँख के सामने

a घ टत होता-सा लगता है। यह कव यत्री का सचेत शल्प है।

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अनेकाथ
क लड़ाई), न क ‘संशय’ या ‘युग्म’।.co
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‘द्वं द्व’ — पुस्तक के पृष्ठ 188 क ता लका म इसी शब्द पर प्रश्न है। यहाँ इसका अथ है युद्ध (दो योद्धाओं क आमने-सामने
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शब्द
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तुक
a l म – असमान म; और ‘हैरानी’ टेक से मल जाती है।
मैदान म – मदान म –gजवान

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ऐ तहा सक संदभ: माच–अप्रैल 1858 म सर ह्य रोज़ क सेना ने झाँसी घेर ली थी। कला टू टने पर रानी रात के
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omे लौटने पर मजबूर कर दया। l
अँधेरे म घोड़े पर नकल और कालपी क ओर बढ़ । रास्ते म ले टनट वॉकर ने पीछा कया — रानी ने उसे घायल
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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 “रानी बढ़ कालपी आई, कर सौ मील नरंतर पार / घोड़ा थक कर गरा भू म पर, गया स्वग तत्काल सधार, /
यमुना-तट पर अं ेज ने फर खाई रानी से हार, / वजयी रानी आगे चल द , कया ग्वा लयर पर अ धकार, /
अं ेज के मत्र स धया ने छोड़ी रजधानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — रानी लगातार सौ मील क दूरी तय करके कालपी पहुँची। घोड़ा थककर ज़मीन पर गर पड़ा और तत्काल स्वग सधार
गया। यमुना के कनारे अंग्रेज़ ने फर रानी से हार खाई। वजयी रानी आगे बढ़ और ग्वा लयर पर अ धकार कर लया। अंग्रेज़ के
मत्र स धया अपनी राजधानी छोड़कर भाग गए।

भाव: यह छं द क वता का सबसे तेज़ छं द है — इसम एक साथ चार घटनाएँ ह और कह ठहराव नह । ‘ नरंतर’
शब्द ही पूरी दौड़ का भार उठाता है: सौ मील बना रुके। घोड़े क मृत्यु पर कव यत्री केवल दो शब्द दे ती ह — ‘स्वग
तत्काल सधार’ — पर वही दो शब्द बता दे ते ह क यह यात्रा कतनी कठोर थी। जो घोड़ा मर गया, वह भी इस
स्वतंत्रता-यज्ञ क आहु त है; कव यत्री उसे भी ‘स्वग’ दे ती ह।

शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार मानवीकरण — घोड़े का ‘स्वग सधारना’ (मनुष्य के लए प्रयुक्त शब्द पशु के लए, आदर के साथ)। मुहावरा — ‘हार
खाना’। अनुप्रास — “क◌ालपी ... कर ... पार”।

गत पाँच पं क्तय म पाँच स्थान — कालपी, भू म, यमुना-तट, ग्वा लयर, स धया क रजधानी। एक भी वणन-वाक्य नह , केवल
क्रयाएँ। यही कथात्मक क वता क चाल है।

वतनी ‘रजधानी’ — मानक रूप ‘राजधानी’; लय के लए ह्रस्व कया गया, और इससे ‘कहानी–रानी’ क तुक भी सध गई।

तुक पार – सधार – हार – अ धकार; और ‘रजधानी’ टे क से मलती है।

ऐ तहा सक संदभ: झाँसी से नकलकर रानी एक ही रात म लगभग सौ मील चलकर कालपी पहुँच — यही क वता
क ‘कर सौ मील नरंतर पार’ है। कालपी यमुना के कनारे है। बाद म रानी और तात्या टोपे ने 1 जून 1858 को
ग्वा लयर पर अ धकार कया। ग्वा लयर के महाराजा जयाजीराव स धया अंग्रेज़ के पक्ष म थे, इस लए वे राजधानी
छोड़कर आगरा चले गए — कव यत्री ने इसी लए उन्ह ‘अंग्रेज के मत्र’ कहा है।

प्र.3 “ वजय मली, पर अं ेज क फर सेना घर आई थी, / अबके जनरल स्मथ सन्मुख था, उसने मुँह क खाई थी,
/ काना और मंदरा स खयाँ रानी के सँग आई थ , / युद्ध क्षेत्र म उन दोन ने भारी मार मचाई थी, / पर, पीछे
रोज आ गया, हाय! घरी अब रानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — वजय तो मल गई, पर अंग्रेज़ क सेना फर से घेरा डालकर आ गई। इस बार सामने जनरल स्मथ था और उसे मुँह
क खानी पड़ी। काना और मंदरा नाम क स खयाँ रानी के साथ आई थ और उन दोन ने युद्ध-भू म म भारी मार मचाई। पर पीछे से
ह्य रोज़ आ गया — हाय! अब रानी घर गई।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

भाव: यह छं द युद्ध के उतार-चढ़ाव को क्षण-दर-क्षण दखाता है — वजय, फर घेरा, फर स्मथ क हार, फर पीछे
से ह्य रोज़। पूरी क वता म यही एक जगह है जहाँ रानी के साथ दो और स्त्रयाँ लड़ती दखाई दे ती ह — काना और
मंदरा। कव यत्री उन्ह ‘स खयाँ’ कहती ह, पर उनका काम सखी का नह , योद्धा का है — ‘भारी मार मचाई’। यह
छोट -सी पं क्त क वता का एक बड़ा वक्तव्य है: रानी अकेली अपवाद नह थ , साधारण स्त्रयाँ भी लड़ रही थ ।
अं तम पं क्त का ‘हाय!’ पूरे युद्ध का रुख पलट दे ता है।

शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

मुहावरा ‘मुँह क खाना’ = बुरी तरह परा जत होना। यही पं क्त पुस्तक क मुहावरे वाली ता लका (पृष्ठ 189) म हल कए हुए
उदाहरण के रूप म द गई है। साथ ही ‘मार मचाना’ भी एक प्रयोग है।

अलंकार अनुप्रास — “म◌ार मचाई”, “स खयाँ ... सँग”। वस्मया दबोधक ‘हाय!’ से करुण क छाया।

वाक्य-रचना “पर, पीछे ह्य रोज आ गया” — ‘पर’ के बाद अल्प वराम पढ़ते समय एक क्षण रुकना पड़ता है। यह ठहराव ही आगे आने
वाली वप त्त क सूचना दे दे ता है।

तुक आई थी – खाई थी – आई थ – मचाई थी; और ‘रानी’ टे क से जुड़ जाती है।

ऐ तहा सक संदभ: ब्रगे डयर माइकल स्मथ ग्वा लयर के पास कोटा-क -सराय म रानी क सेना से भड़ा था। सर
रोज़ मध्य भारत म अंग्रेज़ी सेना का प्रमुख सेनाप त था, जसने झाँसी, कालपी और ग्वा लयर — तीन अ भयान
का नेतृत्व कया। काना और मंदरा रानी क स खयाँ और अंगर क्षकाएँ थ , जो अंत तक उनके साथ रह । रानी क
एक और साथी झलकारी बाई थ , जनके बारे म पुस्तक ने ‘झरोखे से’ म अलग लेख दया है।

प्र.4 “तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार, / कतु सामने नाला आया, था यह संकट वषम अपार, /
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने म आ गए सवार, / रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार, / घायल होकर
गरी सहनी उसे वीर-ग त पानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — फर भी रानी शत्रुओं को मारती-काटती हुई सेना के पार नकल गई। कतु सामने एक नाला आ गया — यह बहुत
बड़ा और वकट संकट था। घोड़ा अड़ गया, क्य क वह नया घोड़ा था; इतने म शत्रु के घुड़सवार आ पहुँचे। रानी अकेली थी और शत्रु
बहुत — उस पर वार पर वार होने लगे। घायल होकर सहनी गर पड़ी; उसे वीरग त पानी थी।

भाव: क वता का सबसे मा मक क्षण, और उसका कारण एक बहुत छोट -सी बात है — घोड़ा नया था। जो पुराना
घोड़ा कालपी क दौड़ म मर चुका था, वह इस नाले को कूद जाता; नया घोड़ा नाले पर अड़ गया। कव यत्री ने यह
कारण जान-बूझकर बताया है — रानी वीरता म नह हारी, प र स्थ त म हारी। ‘रानी एक, शत्रु बहुतेरे’ म केवल तीन
शब्द से पूरी असमानता ख च द गई है। और अं तम पं क्त दे खए — ‘ गरी सहनी’, ‘रानी’ नह । मरते समय भी वह
मनुष्य नह , सहनी है। साथ ही ‘उसे वीर-ग त पानी थी’ — यह हार नह , अ जत उपल है।

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शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार रूपक — ‘ सहनी’ म रानी का अभेद आरोप (‘जैसी’ नह कहा गया, इस लए उपमा नह )। पुनरु क्त — ‘वार पर वार’,
जससे लगातार होते प्रहार सुनाई दे ते ह। अनुप्रास — “घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा”।

बब दृश्य + श्रव्य बब — नाले पर अड़ा घोड़ा, चार ओर से आते घुड़सवार, और गरते हुए वार क आवाज़।

शब्द-चयन ‘वीर-ग त’ — मृत्यु के लए यह शब्द चुनना ही पूरे छं द का स्वर तय कर दे ता है। कव यत्री कह ‘मर गई’ नह लखत ।

तुक पार – अपार – सवार – वार; और ‘पानी’ टे क से मलती है।

ऐ तहा सक संदभ: रानी लक्ष्मीबाई ने 17–18 जून 1858 को ग्वा लयर के पास कोटा-क -सराय म वीरग त पाई।
कहा जाता है क उन्ह ने अपने सै नक से कहा था क उनका शरीर अंग्रेज़ के हाथ न लगे — इसी कारण अगले छं द
म ‘ चता’ का उल्लेख आता है।

प्र.5 “रानी गई सधार, चता अब उसक दव्य सवारी थी, / मला तेज से तेज, तेज क वह स ी अ धकारी थी, /
अभी उम्र कुल तेइस क थी, मनुज नह अवतारी थी, / हमको जी वत करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी, / दखा
गई पथ, सखा गई हमको जो सीख सखानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — रानी चल बसी और अब चता ही उसक दव्य सवारी बनी। उसका तेज (अ ग्न के) तेज म मल गया — वह उस तेज
क सच्ची अ धका रणी थी। अभी उसक उम्र कुल तेईस वष क थी; वह साधारण मनुष्य नह , अवतार थी। वह हम जी वत करने के
लए स्वतंत्रता का स्त्री-रूप बनकर आई थी। वह हम रास्ता दखा गई और जो सीख सखानी थी, सखा गई।

भाव: यहाँ क वता शोक से ऊपर उठकर श्रद्धांज ल बन जाती है। सबसे सुंदर पं क्त है “ मला तेज से तेज, तेज क
वह सच्ची अ धकारी थी” — चता क आग भी ‘तेज’ है और रानी का पराक्रम भी ‘तेज’; दोन एक हो गए। ‘ चता’
जैसे दुखद शब्द के साथ ‘ दव्य सवारी’ लगाकर कव यत्री मृत्यु को पराजय नह , प्र ान बना दे ती ह। और अं तम
पं क्त ‘ दखा गई पथ, सखा गई’ क वता का उ े श्य खोल दे ती है — यह गाथा केवल याद करने के लए नह , चलने
के लए है।

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शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है
पक्ष

अलंकार यमक — ‘तेज’ शब्द एक ही पं क्त म तीन बार, हर बार थोड़े अलग अथ-रंग म (अ ग्न क लपट / पराक्रम / प्रभा)। रूपक
— ‘स्वतंत्रता नारी’ (स्वतंत्रता म नारी का आरोप), ‘अवतारी’। अनुप्रास — “ दखा गई पथ, सखा गई ... सीख सखानी”।

प्रतीक तेज = ज्यो त, पराक्रम और सम्मान — तीन एक साथ। अवतारी = जसम साधारण मनुष्य से अ धक गुण ह (दे खए शब्द-
संपदा का ‘अवतार’)।

अनेकाथ ‘तेज’ — पुस्तक के पृष्ठ 188 क ता लका म यही शब्द दया गया है; क वता के संदभ म इसका अथ आभा/प्रभा है, न क
शब्द ‘ग त’ या ‘तेज़ धार’।

तुक सवारी – अ धकारी – अवतारी – नारी; और ‘ सखानी’ टे क से मल जाती है।

एक ईमानदार टप्पणी: क वता कहती है क रानी क उम्र ‘कुल तेइस’ थी। इ तहासकार म उनके जन्म-वष को
लेकर मतभेद है — कुछ 1828 मानते ह और कुछ 1835। सन् 1835 मानने पर मृत्यु के समय आयु लगभग 23 वष
बैठती है, जो क वता से मेल खाती है। परीक्षा म क वता के अनुसार तेईस वष ही ल खए, और चाह तो यह भी जोड़
द जए क जन्म-वष पर मतभेद है।

प्र.6 “जाओ रानी याद रखगे हम कृतज्ञ भारत वासी, / यह तेरा ब लदान जगावेगा स्वतंत्रता अ वनाशी, / होवे चुप
इ तहास, लगे स ाई को चाहे फाँसी, / हो मदमाती वजय, मटा दे गोल से चाहे झाँसी, / तेरा स्मारक तू ही
होगी, तू खुद अ मट नशानी थी।” — इस छं द का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।

सरल अथ — जाओ रानी, हम कृतज्ञ भारतवासी तुम्ह याद रखगे। तुम्हारा यह ब लदान कभी न नष्ट होने वाली स्वतंत्रता क भावना
को जगाता रहेगा। चाहे इ तहास चुप रह जाए, चाहे सच्चाई को फाँसी लगा द जाए, चाहे मदमस्त वजेता गोल से झाँसी को मटा दे
— फर भी तुम्हारा स्मारक तुम स्वयं ही होगी; तुम स्वयं ही न मटने वाली नशानी थ ।

भाव: यह क वता का नष्कष है और सबसे बड़ा वक्तव्य भी। कव यत्री तीन आशंकाएँ गनाती ह — इ तहास चुप
रह सकता है, सच को फाँसी लग सकती है, झाँसी नगर मटाया जा सकता है — और तीन के बाद भी कहती ह क
कुछ नह मटे गा। क्य ? क्य क “तेरा स्मारक तू ही होगी।” पत्थर का स्मारक तोड़ा जा सकता है; पर जो व्य क्त स्वयं
स्मारक बन जाए, उसे कौन तोड़े? यही कारण है क हर छं द के अंत म लौटती टे क इतनी महत्वपूण है — जब तक
हरबोले गाते रहगे, यह स्मारक खड़ा रहेगा। और यह क वता स्वयं वही गान है।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी
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शल्प का छं द म कैसे काम कर रहा है

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.c मानवीकरण — इ तहास का ‘चुप होना’ और सच्चाई को ‘फाँसी लगना’। रूपक — ‘तूagही तेरा स्मारक’। अनुप्रास —
अलंकार
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“मदमाती ... मटा दे ”, “स◌्मारक ... खुद ... नशानी”।

संबोधन-शैली यह अकेला छं द है जो रानी को सीधे संबो धत करता है — ‘जाओ रानी’, ‘तेरा’, ‘तू’। पूरी क वता तीसरे पुरुष म है

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(‘वह’), और अंत म अचानक दूसरा पुरुष आ जाता है। इससे वदाई का स्वर बहुत नकट और आत्मीय हो जाता है।

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शत-वाक्य क
कहा जा सकता है — बात चढ़तेg l a
तीन ‘चाहे’ वाली पं क्तयाँ आशंका गनाती ह और अं तम पं क्त उन तीन का एक साथ उत्तर दे ती है। इसे उत्कष क रचना
योजना
a -चढ़ते सबसे ऊपर जाकर रुकती है।

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अनेकाथ शब्द ‘गोल ’ — पुस्तक क ता लका म यही शब्द है; क वता के संदभ म इसका अथ तोप से दागे जाने वाले गोले है।

वासी – अ वनाशी – फाँसी – झाँसी; और ‘ नशानी’ टे क से मलकर क वता समाप्त होती है। em
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s दे खए: छं द 12 म कव यत्री ने शकायत क थी — “ले कन आज जुम कहलाती उनक जो कुरबानी थी।”
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a यहाँ उसी शकायत का उत्तर है — इ तहास चाहे चुप रहे, स्मृ त चुप नह होगी। दोन छं द को साथ प ढ़ए, तो क वता

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का पूरा तक खुल जाता है।

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मेरे उत्तर मेरे तक — पृष्ठ 184 और 185
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अभ्यास › रचना से संवाद › मेरे उत्तर मेरे तक
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रचना से सं वाद
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agl प्र.1 नम्न ल खत प्रश्न के सट क उत्तर चु नए और यह भी बताइए क आपको ये उत्तर उपयुक्त क्य लगते ह? 1.
‘झाँसी क रानी’ क वता क पं क्त “बूढ़े भारत म भी आई फर से नई जवानी थी” म ‘नई जवानी’ शब्द कस
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भाव को व्यक्त करता है? (क) दे श का स्वा भमान (ख) वद्रोह क चगारी (ग) स्वाधीनता का भय (घ) भारत क

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सट क उत्तर — (ख) वद्रोह क चगारी।
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यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पं क्त को अकेले नह , पूरे छं द के साथ प ढ़ए। ‘नई जवानी’ के ठ क बाद कव यत्री

s e m लखती ह — “गुमी हुई आजाद क क मत सबने पहचानी थी, / दूर फ़रंगी को करने क सबने मन म ठानी थी, /
agla चमक उठ सन् सत्तावन म वह तलवार पुरानी थी।” यानी यह ‘जवानी’ केवल जोश या उम्र नह है — वह जोश है जो
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तलवार तक जाता है। ‘बूढ़ा भारत’ का अथ है वह भारत जो लंबे समय से हारा और थका बैठा था; उसी म जब
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फर से लड़ने क श क्त जागी, तो वही सन् 1857 का वद्रोह बना। इसी लए ‘नई जवानी’ का भाव वद्रोह क

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चगारी ही है — और ‘ चगारी’ शब्द कव यत्री क अपनी शब्दावली है, आगे वे स्वयं लखती ह — “यह स्वतंत्रता क
चनगारी अंतरतम से आई थी।”
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वकल्प सही / कारण
ग़लत

(क) दे श का ग़लत स्वा भमान इस छं द म है ज़रूर, पर वह ‘नई जवानी’ का अथ नह है। स्वा भमान एक भाव है, जब क
स्वा भमान ‘जवानी’ यहाँ क्रया म बदली हुई श क्त है — मन म ठानना और तलवार का चमकना। ‘स्वा भमान’
कहने से पं क्त का आधा ही अथ आता है।

(ख) वद्रोह सही ✓ ‘बूढ़े भारत’ म लौट हुई श क्त ने ही 1857 का रूप लया — “चमक उठ सन् सत्तावन म वह तलवार
क चगारी पुरानी थी।”

(ग) स्वाधीनता ग़लत यह पं क्त के ठ क उलटा है। छं द म भय कह नह है; उलटे भय टू ट रहा है — “ सहासन हल उठे ,
का भय राजवंश ने भृकुट तानी थी।” भय अंग्रेज़ म पैदा हो रहा है, भारतवा सय म नह ।

(घ) भारत क ग़लत यह शब्द का शा ब्दक अथ है, ‘भाव’ नह । दे श क सचमुच कोई उम्र नह होती; ‘बूढ़ा’ और ‘जवान’ यहाँ
युवावस्था रूपक ह। प्रश्न ‘भाव’ पूछ रहा है, इस लए शा ब्दक वकल्प उपयुक्त नह ।

याद र खए: जब प्रश्न ‘भाव’ पूछे, तो शब्द का सीधा अथ दे ने वाला वकल्प प्रायः ग़लत होता है — उत्तर वह होता है
जो पं क्त के आगे-पीछे क पं क्तय से सद्ध हो।

प्र.2 2. लक्ष्मीबाई को ‘छबीली’ कहना उनके व्य क्तत्व क कस वशेषता को दशाता है? (क) वनम्रता (ख)
शोभायुक्त (ग) स हष्णुता (घ) कठोरता

सट क उत्तर — (ख) शोभायुक्त।

यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पुस्तक ने स्वयं पृष्ठ 193 क शब्द-संपदा म ‘छबीली/छबीला’ का अथ दया है —
तेजस्वी, सुंदर, छ बवाली, सजीली। ‘छ ब’ का अथ ही है शोभा, कां त, आभा। इस लए ‘छबीली’ कहने का सीधा
आशय है — शोभा से युक्त, जसे दे खते ही आँख ठहर जाए। पं क्त है — “कानपूर के नाना क मुँहबोली बहन
‘छबीली’ थी”। यह बचपन का घरेलू नाम है, जो बताता है क वह बच्ची अपने तेज और चमक के कारण सबका
ध्यान ख चती थी। ध्यान द जए, यह चमक केवल रूप क नह थी — अगली ही पं क्तय म उसक सहे लयाँ ‘बरछ ,
ढाल, कृपाण, कटारी’ ह। यानी ‘छबीली’ म सुंदरता और तेज स्वता दोन एक साथ ह।

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वकल्प सही / कारण
ग़लत

(क) वनम्रता ग़लत ‘छबीली’ शब्द का वनम्रता से कोई संबंध नह । क वता म भी उसका स्वर वनम्र नह , नभ क है — वह
‘रण-चंडी का आ ान’ करती है।

(ख) सही ✓ शब्द-संपदा का अथ ही ‘छ बवाली, सजीली, तेजस्वी’ है — यानी शोभा से भरी हुई।
शोभायुक्त

(ग) स हष्णुता ग़लत स हष्णुता का अथ है सह लेना। रानी का पूरा च रत्र इसके वपरीत है — उन्ह ने अन्याय सहा नह , उसका
उत्तर दया।

(घ) कठोरता ग़लत ‘छबीली’ स्नेह से दया गया नाम है, कठोरता का सूचक नह । कठोरता का भाव क वता म आता ज़रूर है,
पर वह ‘ सहनी’ और ‘रण-चंडी’ जैसे शब्द से आता है, ‘छबीली’ से नह ।

जोड़कर दे खए: कव यत्री ने यही नाम एक बार और प्रयोग कया है — “ब हन छबीली ने रण-चंडी का कर दया
प्रकट आ ान”। युद्ध क घोषणा के क्षण म बचपन का नाम लाना बताता है क यह वही ‘छबीली’ है — बदली नह ,
बस बड़ी हो गई है।

प्र.3 3. “बुझा द प झाँसी का” पं क्त का भावाथ है— (क) अं ेज का झाँसी पर अ धकार हो जाना (ख) झाँसी राज्य
क उम्मीद का नष्ट हो जाना (ग) राजा क आक स्मक मृत्यु होना (घ) रानी के जीवन म उदासी होना

सट क उत्तर — (ख) झाँसी राज्य क उम्मीद का नष्ट हो जाना।

यह उत्तर क्य उपयुक्त है: प्रश्न ‘भावाथ’ पूछ रहा है, यानी रूपक के पीछे का अथ। ‘द प’ घर का उजाला होता है
— जब तक वह जलता है, दशा दखती है और आशा बनी रहती है। झाँसी का ‘द प’ था उसका राजवंश। राजा
गंगाधर राव क मृत्यु के बाद जो बुझा, वह केवल एक व्य क्त का जीवन नह था — झाँसी का भ वष्य, उसका
उत्तरा धकार और उसक स्वतंत्र रहने क आशा बुझी। इसी लए अगली ही पं क्त म डलहौजी ‘मन म हरषाया’ — वह
इसी आशा के बुझने क प्रतीक्षा म था। य द द प का अथ केवल राजा क मृत्यु होता, तो कव यत्री पछले छं द म यह
बात कह ही चुक थ — “ नःसंतान मरे राजाजी, रानी शोक-समानी थी”। उसे दोहराने के लए वे नया रूपक क्य
लात ? नया रूपक इस लए आया क्य क अब बात राजा क नह , पूरे राज्य के भ वष्य क है।

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वकल्प सही / कारण
ग़लत

(क) अंग्रेज का झाँसी पर ग़लत यह इस पं क्त के बाद क घटना है, इस पं क्त का अथ नह । अ धकार तो दो पं क्त आगे होता
अ धकार हो जाना है — “फौरन फौज भेज दुग पर अपना झंडा फहराया”। द प बुझना कारण है, अ धकार
प रणाम।

(ख) झाँसी राज्य क सही ✓ द प = आशा और उजाला; उसका बुझना = झाँसी के भ वष्य का अंधकार म डू ब जाना। यही
उम्मीद का नष्ट हो जाना रूपक का भावाथ है।

(ग) राजा क आक स्मक ग़लत यह पं क्त का शा ब्दक संकेत है, भावाथ नह — और प्रश्न भावाथ पूछ रहा है। राजा क मृत्यु
मृत्यु होना क बात कव यत्री पछले छं द म सीधे शब्द म कह चुक ह।

(घ) रानी के जीवन म ग़लत यह अथ बहुत छोटा है। ‘झाँसी का द प’ कहा गया है, ‘रानी का द प’ नह — बात एक व्य क्त
उदासी होना के मन क नह , पूरे राज्य क है।

उत्तर लखने का तरीका: ऐसे प्रश्न म पहले बताइए क रूपक कसका है (द प = आशा/राजवंश), फर बताइए क
पं क्त के आगे-पीछे क्या हो रहा है। दोन बात लख दे ने पर उत्तर पूरा हो जाता है।

प्र.4 4. “इस स्वतंत्रता-महायज्ञ म कई वीरवर आए काम” पं क्त म स्वतंत्रता आंदोलन क कस ऐ तहा सक घटना क
ओर संकेत कया गया है? (क) असहयोग आंदोलन (ख) भारत छोड़ो आंदोलन (ग) 1857 क क्रां त (घ) स वनय
अवज्ञा आंदोलन

सट क उत्तर — (ग) 1857 क क्रां त।

यह उत्तर क्य उपयुक्त है: इसके तीन पक्के प्रमाण क वता के भीतर ही ह। पहला — पहले ही छं द म त थ साफ़
है — “चमक उठ सन् सत्तावन म वह तलवार पुरानी थी।” ‘सन् सत्तावन’ यानी 1857। दूसरा — इसी छं द म जन
वीर के नाम गनाए गए ह — नाना धुंधूपंत, ताँ तया (तात्या टोपे), अज़ीमुल्ला, अहमद शाह मौलवी और ठाकुर
कुँवर सह — वे सब 1857 के ही सेनानी ह। तीसरा — पुस्तक ने पाठ के आरंभ म स्वयं लखा है क “यह क वता
1857 के स्वतंत्रता संग्राम क पृष्ठभू म पर लखी गई है”। ‘महायज्ञ’ शब्द इस लए चुना गया क यज्ञ म सब मलकर
आहु त दे ते ह — यहाँ आहु त दे ने वाले ये वीर ह, और ‘आए काम’ का अथ है — ब लदान हो गए।

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वकल्प सही / कारण
ग़लत

(क) असहयोग ग़लत यह सन् 1920–22 का, गांधीजी के नेतृत्व म चला अ हसक आंदोलन था। उसम तलवार, दुग और
आंदोलन सेना का कोई प्रसंग नह है, जब क यह छं द युद्ध का है।

(ख) भारत छोड़ो ग़लत यह सन् 1942 का आंदोलन है — क वता म ना मत सभी वीर उससे लगभग 85 वष पहले के ह।
आंदोलन

(ग) 1857 क सही ✓ ‘सन् सत्तावन’ का सीधा उल्लेख, और नाना साहब, तात्या टोपे, अज़ीमुल्ला, अहमद शाह मौलवी
क्रां त तथा कुँवर सह — सभी 1857 के नायक।

(घ) स वनय अवज्ञा ग़लत यह सन् 1930 का आंदोलन है, जसका आरंभ दांडी यात्रा से हुआ। वह भी अ हसक था और
आंदोलन उसका इस छं द से कोई संबंध नह ।

जाँच का सरल तरीका: जब वकल्प म कई आंदोलन दए ह , तो क वता म आए नाम और त थय को दे खए।
नाम ही सबसे पक्का प्रमाण होते ह — यहाँ पाँच नाम ह और पाँच 1857 के ह।

प्र.5 5. “व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया” पं क्त म ‘यह’ शब्द कसके लए कहा गया है? (क)
नवाब के लए (ख) जनरल डलहौजी के लए (ग) ले टनट वॉकर के लए (घ) ब्र टश राज के लए

सट क उत्तर — (घ) ब्र टश राज के लए।

यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पूरा छं द दे खए — “अनुनय- वनय नह सुनता है, वकट फ़रंगी क माया, / व्यापारी
बन दया चाहता था जब यह भारत आया,”। ‘यह’ ठ क पछली पं क्त के ‘ फ़रंगी’ क ओर लौटता है, और शब्द-
संपदा के अनुसार ‘ फ़रंगी’ का अथ है अंग्रेज़/ वलायती — यानी अंग्रेज़ी सत्ता। ऐ तहा सक तथ्य भी यही है: अंग्रेज़
भारत म ईस्ट इं डया कंपनी के रूप म केवल व्यापार करने आए थे और शुरू म उन्ह ने मुग़ल दरबार से व्यापार क
अनुम त माँगी थी। बाद म वही व्यापारी शासक बन बैठा — “डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया”। ‘काया
पलटना’ इसी प रवतन का मुहावरा है — व्यापारी से शासक तक का।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी
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वकल्प सही / कारण

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(क) नवाब के .c ग़लत नवाब भारत के ही शासक थे, वे ‘भारत आए’ नह । उलटे इसी छं द मa
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em उन्ह भुगतते हुए दखाया गया है

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— “राजाओं नव्वाब को भी उसने पैर ठु कराया”।

(ख) जनरल ग़लत डलहौजी भारत गवनर-जनरल बनकर आया था, व्यापारी बनकर नह । और उसका नाम इसी छं द क

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डलहौजी के लए अगली पं क्त म अलग से आता है — य द ‘यह’ का अथ डलहौजी होता, तो कव यत्री अगली पं क्त म

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उसका नाम फर न दोहरात ।
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वॉकर एक सै g l a
(ग) ले टनट
वॉकर के लए
ग़लत
a नक अफ़सर था, जो क वता म बहुत आगे (छं द 13 म) आता है और रानी से घायल होकर
भागता है। इस छं द से उसका कोई संबंध नह ।

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सही ✓
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(घ) ब्र टश राज ‘यह’ पछली पं क्त के ‘ फ़रंगी’ क ओर संकेत करता है — अंग्रेज़ी सत्ता, जो व्यापारी बनकर आई और

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के लए शासक बन गई।

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a gl व्याकरण क दृ ष्ट से: ‘यह’ यहाँ नश्चयवाचक सवनाम है और इसका ‘संकेत’ पछली पं क्त म मौजूद है। ऐसे प्रश्न
हल करते समय हमेशा दे खए क सवनाम से पहले कौन-सी संज्ञा आई है — उत्तर वह मलेगा।

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मेरी समझ मेरे वचार — पृष्ठ 185a g
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अभ्यास › रचना से संवाद › मेरी समझ मेरे वचार

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रचना से सं वाद चचा

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a s em नीचे दए गए प्रश्न पर कक्षा म चचा क जए और उनके उत्तर ल खए— 1. ‘झाँसी क रानी’ क वता के आधार
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प्र.1

a पर बताइए क लक्ष्मीबाई के प्रय खेल कौन-कौन से थे? उनका बचपन दूसर से कस प्रकार भन्न था?

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लक्ष्मीबाई के प्रय खेल — क वता के तीसरे छं द म कव यत्री स्वयं उनक सूची दे ती ह — “नकली युद्ध, व्यूह क रचना और खेलना
खूब शकार, / सैन्य घेरना, दुग तोड़ना, ये थे उसके प्रय खलवार”।

खेल उसका अथ उससे कौन-सा गुण बनता है
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नकली युद्ध अभ्यास के लए झूठमूठ क लड़ाई लड़ना शस्त्र-संचालन और मैदान म डटे रहने का साहस

m व्यूह क रचना a
l a se सेना को वशेष आकार म खड़ा करना (जैसे चक्रव्यूह) रणनी त और आगे क चाल सोचने क क्षमता

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शकार खेलना घोड़े पर जंगल म शकार करना घुड़सवारी, नशाना और तुरंत नणय लेने क आदत

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सैन्य घेरना शत्रु-सेना को चार ओर से घेर लेना नेतृत्व और सामू हक चाल का अभ्यास

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दुग तोड़ना
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कले पर आक्रमण करके उसे जीतना दुग- वद्या क समझ, जो आगे झाँसी क रक्षा म काम आई

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

उनका बचपन दूसर से कैसे भन्न था —

सहे लयाँ ह थयार थे — “बरछ , ढाल, कृपाण, कटारी उसक यही सहेली थी।” उस समय लड़ कय के लए गु ड़य और घरेलू
खेल क कल्पना क जाती थी; उनक सं गनी ह थयार थे। यह अंतर सबसे बड़ा है।
पढ़ाई और खेल — दोन लड़क के साथ — “नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी।” उन्ह अलग नह रखा
गया; वे नाना धुंधूपंत के बराबर बैठकर पढ़ और उन्ह के साथ खेल ।
कहा नयाँ भी वीरता क — “वीर शवाजी क गाथाएँ उसको याद ज़बानी थ ।” बच्च को जो कहा नयाँ सुनाई जाती ह, उन्ह
से उनका मन बनता है। उनका मन शवाजी क गाथाओं से बना।
खेल म भी युद्ध — दूसरे बच्च का खेल मनोरंजन के लए होता है; उनका खेल स्वयं एक प्र शक्षण था। ‘ खलवार’ कहकर
कव यत्री यही कहती ह क जो दूसर के लए क ठन वद्या थी, वह उनके लए खेल थी।
घर का वातावरण — वे पता क अकेली संतान थ और बठू र के पेशवा-प रवार के नकट पल , जहाँ शस्त्र, घोड़े और सैन्य-
चचा रोज़ का हस्सा थे।

नष्कष: क वता यह बात केवल जानकारी के लए नह दे ती। वह दखाना चाहती है क वीरता जन्म से नह ,
अभ्यास से आती है। जो लड़क बचपन म दुग तोड़ने का खेल खेलती रही, वही आगे चलकर सचमुच के दुग क
रक्षा करती है और सचमुच क सेना को चीरकर नकलती है। बचपन का हर खेल आगे चलकर एक युद्ध बन जाता है
— यही इन दो छं द का सबसे बड़ा संदेश है।

प्र.2 2. “ कतु कालग त चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई” पं क्त के माध्यम से कस घटना क ओर संकेत कया गया
है?

इस पं क्त के माध्यम से झाँसी के राजा गंगाधर राव क मृत्यु और उसके बाद रानी लक्ष्मीबाई के वधवा हो जाने क घटना क
ओर संकेत कया गया है।

पं क्त कैसे यह अथ दे ती है: छं द क पहली पं क्त सुख क है — “उ दत हुआ सौभाग्य, मु दत महल म उजयाली
छाई”। ठ क उसके बाद यह पं क्त आती है और उजाले को अँधेरे म बदल दे ती है। ‘कालग त’ का अथ है समय क
चाल, यानी काल यानी मृत्यु का आना। ‘काली घटा’ वप त्त का रूपक है — जैसे आकाश म काले बादल घर आएँ
और सारा उजाला ढँ क जाए। और ‘चुपके-चुपके’ सबसे मा मक शब्द है — दुख ढोल बजाकर नह आता, वह बना
आहट के आता है। छं द क अगली पं क्तयाँ इस संकेत को खोल भी दे ती ह — “रानी वधवा हुई हाय! व ध को भी
नह दया आई, / नःसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी।”

शब्द संकेत

कालग त समय/मृत्यु का अटल आना — कसी के रोके नह रुकता

चुपके-चुपके वप त्त का बना चेतावनी के आना; सुख के बीच भी दुख भीतर-भीतर बढ़ता रहता है

काली घटा वैधव्य का शोक और उसके साथ आने वाला संकट (राज्य पर मँडराता खतरा)

घेर लाई दुख का चार ओर से घेर लेना — कोई नकलने का रास्ता नह

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

आगे क्या हुआ: यही घटना पूरी क वता का मोड़ है। राजा क मृत्यु के बाद अंग्रेज़ ने उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव
को उत्तरा धकारी मानने से इनकार कर दया, और डलहौजी ने ‘हड़प नी त’ के अंतगत झाँसी को अंग्रेज़ी राज्य म
मला लया — “लावा रस का वा रस बनकर ब्र टश राज्य झाँसी आया”। इस लए यह ‘काली घटा’ केवल एक
प रवार का दुख नह , पूरे राज्य पर आई वप त्त है।

प्र.3 3. “महल ने द आग, झ पड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी” पं क्त समाज के व भन्न वग क एकता को दशाती है, इस
एकता का स्वतंत्रता सं ाम के संदभ म क्या महत्व है?

इस पं क्त म ‘महल’ राजा-रजवाड़ और उच्च वग का प्रतीक है तथा ‘झ पड़ी’ कसान, मज़दूर और साधारण जनता का। कव यत्री
कहती ह क आग महल ने द — यानी वद्रोह क पहल और नेतृत्व राजाओं क ओर से आया — पर उस आग को ज्वाला
झ पड़ी ने बनाया — यानी उसे सचमुच जलती हुई श क्त साधारण जनता ने द ।
इस एकता का स्वतंत्रता सं ाम म महत्व —

1. आंदोलन जन-आंदोलन बना — य द केवल राजा लड़ते तो वह कुछ रयासत का झगड़ा रह जाता। जनता के जुड़ते ही वह
पूरे समाज का संघष बन गया। इसी लए अगली पं क्त म शहर के नाम आग क तरह पकड़ते जाते ह — “झाँसी चेती, दल्ली
चेती, लखनऊ लपट छाईं थ ।”
2. संख्या और श क्त — राजाओं के पास सेना और साधन थे; जनता के पास संख्या, स्थानीय जानकारी, भोजन-आश्रय और
लगातार लड़ते रहने क क्षमता। दोन मलकर ही अंग्रेज़ क संग ठत सेना का सामना कर सके।
3. कारण भी साझा था — छं द 10 इसे साफ़ कहता है — “कु टय म थी वषम वेदना, महल म आहत अपमान।” कु टया के
पास भूख और शोषण का कारण था, महल के पास छने राज्य और अपमान का। चोट अलग-अलग थी, पर चोट पहुँचाने वाला
एक ही था — इसी लए दोन एक हुए।
4. अंतरतम से उठा आंदोलन — कव यत्री जोड़ती ह — “यह स्वतंत्रता क चनगारी अंतरतम से आई थी।” यानी यह कसी
बाहरी उकसावे से नह , समाज के भीतर से उठा। जो आंदोलन भीतर से उठता है, वही टकता है।
5. आगे के लए रास्ता — 1857 सैन्य दृ ष्ट से सफल नह हुआ, पर उसने यह सद्ध कर दया क वग, जा त, प्रांत और धम से
ऊपर उठकर लोग एक साथ खड़े हो सकते ह। छं द 12 क नामावली इसका प्रमाण है — नाना धुंधूपंत, ताँ तया, अज़ीमुल्ला,
अहमद शाह मौलवी और कुँवर सह — भन्न प्रांत, भन्न धम, एक ही लक्ष्य। यही सीख आगे के पूरे स्वतंत्रता संग्राम क न व
बनी।

शल्प क बात: ध्यान द जए क कव यत्री ने महल को ‘आग’ और झ पड़ी को ‘ज्वाला’ दया है। आग चगारी है,
ज्वाला उसका बड़ा रूप। यानी शुरुआत ऊपर से हुई, पर वस्तार नीचे से। एक ही पं क्त म उन्ह ने पूरे 1857 का
समाजशास्त्र कह दया है।

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प्र.4 4. “सरे-आम नीलाम छापते थे अं ेज के अखबार” पं क्त म ‘नीलाम छापते’ शब्द कसक ओर संकेत करता है?
यह भी बताइए क कसक नीलामी क जाती थी और क्य ?

‘नीलाम छापते’ कसक ओर संकेत करता है — यह अंग्रेज़ के उन अख़बार क ओर संकेत करता है जनम भारतीय
राजप रवार से छ ने गए गहन और वस्तुओं क नीलामी क सूचनाएँ/ वज्ञापन खुले आम छापे जाते थे। ‘सरे-आम’ का अथ ही है
— सबके सामने, बना कसी ल ा या छपाव के।
कसक नीलामी क जाती थी — उन रा नय और बेगम के गहने, कपड़े और बहुमूल्य वस्तुए,ँ जनके राज्य अंग्रेज़ ने छ न
लए थे। क वता स्वयं दो उदाहरण उद्धत करती है — “‘नागपूर के जेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख हार’” — यानी नागपुर क
रानी के जेवर और लखनऊ (अवध) का नौ लाख का हार। ये चीज़ कलकत्ते के बाज़ार म बकती थ , जो उस समय अंग्रेज़ी शासन
का कद्र था — “उनके गहने-कपड़े बकते थे कलकत्ते के बाजार”।
नीलामी क्य क जाती थी — तीन कारण —

कारण स्पष्टीकरण

1. धन कमाने के राज्य हड़पने के बाद राजकोष और राजप रवार क संप त्त अंग्रेज़ के हाथ आ जाती थी। उसे बेचकर वे सीधा धन
लए जुटाते थे।

2. अपमा नत करने यह केवल बेचना नह था। जन वस्तुओं को राजप रवार क ग रमा का चह्न माना जाता था, उन्ह बाज़ार म सबके
के लए सामने बकवाना राजवंश को नीचा दखाने का तरीका था।

3. डर बैठाने के लए अख़बार म छपी नीलामी बाक रयासत के लए चेतावनी थी — दे ख लो, वरोध कया तो तुम्हारा भी यही हाल
होगा।

पं क्त का असली मम: छं द क अं तम पं क्त सारी बात कह दे ती है — “य परदे क इज़्ज़त परदे शी के हाथ
बकानी थी।” उस समय राजप रवार क स्त्रयाँ परदे म रहती थ और उनक वस्तुओं का सावज नक होना ही
अपमान माना जाता था। कव यत्री ने ‘परदे ’ और ‘परदे शी’ शब्द को जान-बूझकर अगल-बगल रखा है — इस एक
ध्व न-खेल से वे कहती ह क लूट धन क नह , सम्मान क हो रही थी। यही अपमान आगे चलकर “महल म आहत
अपमान” बनकर वद्रोह का कारण बनता है।

प्र.5 5. “अभी उम्र कुल तेइस क थी, मनुज नह अवतारी थी” पं क्त म ‘अवतारी’ शब्द व्य क्त के वशेष गुण क
ओर इं गत कर रहा है। क वता के आधार पर बताइए क लक्ष्मीबाई के कन गुण के कारण उनको ‘अवतारी’ कहा
गया है?

‘अवतार’ का अथ शब्द-संपदा म दया है — उतरना, नीचे आना; कसी दे वता या ईश्वर का मनुष्य आ द के रूप म जन्म लेना।
‘अवतारी’ कहकर कव यत्री यह कहती ह क लक्ष्मीबाई साधारण मनुष्य नह थ — इतनी कम उम्र म जो कर दखाया, वह मनुष्य
क सामान्य सीमा से ऊपर था। क वता म उनके ये गुण मलते ह —

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गुण क वता का प्रमाण वह ‘अवतारी’ क्य बनाता है

1. जन्मजात वीरता “लक्ष्मी थी या दुगा थी वह स्वयं वीरता क अवतार” कव यत्री उन्ह कसी क तुलना म नह , स्वयं वीरता का
रूप बताती ह।

2. बचपन से शस्त्र- “बरछ , ढाल, कृपाण, कटारी उसक यही सहेली थी” जस उम्र म बच्चे खेलते ह, उस उम्र म युद्ध- वद्या
कौशल साधना असाधारण है।

3. रणनी त क “व्यूह क रचना ... सैन्य घेरना, दुग तोड़ना” केवल साहस नह , बु द्ध भी — दोन का मेल दुलभ
समझ होता है।

4. अकेले लड़ने का “रानी ने तलवार ख च ली, हुआ द्वं द्व असमान म”; असमान युद्ध म भी पीछे न हटना — यही मनुष्य क
साहस “रानी एक, शत्रु बहुतेरे” सामान्य सीमा से ऊपर क बात है।

5. अ त “रानी बढ़ कालपी आई, कर सौ मील नरंतर पार” एक ही यात्रा म सौ मील — घोड़ा तक थककर मर गया,
सहनश क्त पर वे नह रुक ।

6. नेतृत्व-श क्त “ब हन छबीली ने रण-चंडी का कर दया प्रकट वे स्वयं लड़ ही नह , और को भी लड़ने के लए खड़ा
आ ान”; काना और मंदरा का साथ लड़ना कया।

7. आत्म-ब लदान “घायल होकर गरी सहनी उसे वीर-ग त पानी थी” जीवन दे कर भी हार न मानना — ब लदान ही अवतार
क अं तम पहचान है।

8. दे श को जगाने “हमको जी वत करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी” यही ‘अवतार’ क प रभाषा है — कोई अपने लए नह ,
का उ े श्य दूसर के उद्धार के लए आता है।

‘अभी उम्र कुल तेइस क थी’ का महत्व: यह पं क्त ‘अवतारी’ शब्द का सबसे बड़ा आधार है। ‘कुल’ शब्द पर
ध्यान द जए — यानी ‘इतनी-सी ही’। तेईस वष क आयु म इतने युद्ध लड़ना, एक राज्य सँभालना, सेना का नेतृत्व
करना और अंत म वीरग त पाना — यह सब जोड़कर दे खने पर कव यत्री को शब्द ही नह मलता, इस लए वे कहती
ह — “मनुज नह अवतारी थी।”

एक वचार: ‘अवतारी’ कहने का यह अथ नह क उन्ह ने कुछ चमत्कार से कया। क वता स्वयं दखा चुक है क
उनका कौशल बचपन के अभ्यास से आया था। ‘अवतारी’ यहाँ श्रद्धा का शब्द है — उस वस्मय का, जो
असाधारण मनुष्य को दे खकर होता है।

क वता म कहानी — पृष्ठ 186

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी
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अभ्यास › वधा से संवाद › क वता म कहानी
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वधा से सं वाद समय-रे खा

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यह क वता लक्ष्मीबाई के जीवन क घटनाओं पर आधा रत है और अपनी संरचना म एक कथात्मक क वता है।
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कथात्मक क वता ऐसी क वता को कहते ह जसम क वता और कहानी के तत्व परस्पर जुड़े होते ह तथा घटनाओं

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का एक क्रम होता है। इस क वता म भी लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर वीरग त प्राप्त होने तक क कथा क्रम से

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दे खने को मलती है। पाठ क संरचना को समझते हुए इसम व णत प्रमुख घटनाओं को समय-रेखा (टाइमलाइन)

a s em अन्य घटनाएँ आ द।)
पर दशाएँ। (संकेत– लक्ष्मीबाई का बचपन, ववाह,

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पहले यह दे ख ली जए क यह क वता कथात्मक क्य है — इसम कहानी के पाँच तत्व मौजूद ह: पात्र (लक्ष्मीबाई, नाना, डलहौजी,

s e m त तक), संघष (रानी
omऔर चरम बदु (नाले पर अं तम युद्ध)। अंतर बस इतना है क यह कहानीaगद्यglaम नह , गाए जाने योग्य छं द म
वॉकर, स्मथ, ह्य रोज़, काना-मंदरा), ान ( बठू र, झाँसी, कालपी, ग्वा लयर), घटना-क्रम (बचपन से वीरग

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बनाम अंग्रेज़ी सत्ता)

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l खा (टाइमलाइन) —
कही गई है।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

छं द 2–3 बचपन — िबठू र मे ं नाना के साथ शस्त्र-खेल

छं द 4 िववाह — रानी बनकर झाँसी आना

छं द 5 राजा की मत्ृ य ;ु रानी िवधवा हु ई ं

छं द 6–7 डलहौजी ने झाँसी हड़ पी; िकले पर झंड ा

छं द 8–9 देश भर के राज्य िछने; गहनों की नीलामी

छं द 10–12 1857 — िवदोह की तै य ारी और आग का फैलना

छं द 13 झाँसी के मैदान मे ं वॉकर घायल होकर भागा

छं द 14 सौ मील की दौड़ — कालपी, िफर ग्वािलयर िवजय

छं द 15–16 िस्मथ की हार; ू रोज़ का घेरा; अंितम य द्ध
ु

छं द 17–18 वीरगित; िचता — और अिमट स्मिृ त बन जाना

किवता के 18 छं द इसी क्रम मे ं चलते है ं — यही इसे ‘कथात्मक किवता’ बनाता है ।

क वता क घटनाओं क समय-रेखा — बचपन से वीरग त तक, छं द-क्रम के साथ।

वही समय-रेखा ता लका के रूप म (उत्तर-पु स्तका म इसी तरह ल खए) —

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क्रम घटना क वता क पं क्त (प्रमाण) छं द

1 बचपन — बठू र म नाना धुंधूपंत के साथ पढ़ना-खेलना; ‘छबीली’ नाम “नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग 2
खेली थी”

2 शस्त्र- शक्षा — नकली युद्ध, व्यूह-रचना, शकार, दुग तोड़ना “ये थे उसके प्रय खलवार” 3

3 ववाह — झाँसी के राजघराने म; रानी लक्ष्मीबाई बनकर झाँसी आना “ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी 4
म”

4 राजा क मृत्यु — रानी का वधवा होना, राजा का नःसंतान जाना “ नःसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी 5
थी”

5 झाँसी का हड़पा जाना — डलहौजी क नी त; कले पर ब्र टश झंडा “लावा रस का वा रस बनकर ब्र टश राज्य 6–7
झाँसी आया”

6 दे शव्यापी लूट — दल्ली, लखनऊ, नागपुर, सतारा आ द का छनना; “सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेज के 8–9
रा नय के गहन क नीलामी अखबार”

7 वद्रोह क तैयारी — नाना का सामान जुटाना; रानी का रण-चंडी का “हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्ह तो सोई ज्यो त 10
आ ान जगानी थी”

8 क्रां त का फैलना — झाँसी, दल्ली, लखनऊ, मेरठ, कानपुर, पटना “यह स्वतंत्रता क चनगारी अंतरतम से 11–
आई थी” 12

9 वॉकर से द्वं द्व — ले टनट वॉकर घायल होकर भागा “जख्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब 13
हैरानी थी”

10 कालपी क दौड़ — सौ मील नरंतर; घोड़े क मृत्यु; यमुना-तट पर “रानी बढ़ कालपी आई, कर सौ मील 14
वजय नरंतर पार”

11 ग्वा लयर वजय — स धया का राजधानी छोड़ना “ वजयी रानी आगे चल द , कया ग्वा लयर 14
पर अ धकार”

12 स्मथ क पराजय — काना और मंदरा का साथ लड़ना “अबके जनरल स्मथ सन्मुख था, उसने 15
मुँह क खाई थी”

13 रोज़ का घेरा — रानी चार ओर से घर गईं “पर, पीछे ह्य रोज आ गया, हाय! घरी अब 15
रानी थी”

14 अं तम युद्ध — नाले पर नया घोड़ा अड़ा; अकेली रानी पर वार पर वार “रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर 16
वार”

15 वीरगित — तेईस वष की आयु में बिलदान; िचता ही िद य सवारी
व् “घायल होकर गरी सहनी उसे वीर-ग त 16–
पानी थी” 17

16 अमर स्मृ त — कव यत्री क श्रद्धांज ल — रानी स्वयं अपना स्मारक “तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अ मट 18
नशानी थी”

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

ध्यान दे ने योग्य बात: समय-रेखा बनाते समय दो बात का ध्यान र खए — (1) घटनाएँ उसी क्रम म र खए जस
क्रम म क वता उन्ह लाती है, क्य क कथात्मक क वता क पहचान ही उसका क्रम है; और (2) हर घटना के साथ
क वता क एक पं क्त प्रमाण के रूप म ल खए — इससे उत्तर केवल सूची नह रह जाता, वह पाठ से जुड़ा उत्तर
बन जाता है।

इ तहास से मलान (य द शक्षक पूछ): राजा गंगाधर राव क मृत्यु सन् 1853 म हुई और झाँसी सन् 1854 म
अंग्रेज़ी राज्य म मला ली गई। क्रां त 10 मई 1857 को मेरठ से आरंभ हुई। झाँसी पर घेरा और उसका पतन अप्रैल
1858 म हुआ, ग्वा लयर पर अ धकार 1 जून 1858 को, और रानी ने 17–18 जून 1858 को ग्वा लयर के पास
कोटा-क -सराय म वीरग त पाई। क वता म त थयाँ नह द गईं — वह घटनाओं का क्रम दे ती है, त थयाँ नह ;
इस लए समय-रेखा म त थयाँ जोड़ना अ त रक्त जानकारी होगी, आवश्यक नह ।

साझा साथ/साझा संघष — पृष्ठ 186 और 187
अभ्यास › वषय से संवाद › साझा साथ/साझा संघष

वषय से सं वाद अं त र- वषयी

प्र.1 1. “लावा रस का वा रस बनकर ब्र टश राज्य झाँसी आया”, ब्र टश राज कस नी त के कारण ‘लावा रस का
वा रस’ बन जाता था? अपने इ तहास के शक्षक से पता लगाकर उस नी त के वषय म ल खए।

वह नी त थी — व्यपगत का सद्धांत, जसे हड़प नी त और अंग्रेज़ी म Doctrine of Lapse कहा जाता है। इसे लॉड डलहौजी ने
लागू कया, जो सन् 1848 से 1856 तक भारत का गवनर-जनरल था।
नी त क्या कहती थी —

य द कसी दे शी राज्य के शासक क मृत्यु अपनी संतान के बना हो जाए, तो उसका दत्तक (गोद लया) पुत्र उत्तरा धकारी
नह माना जाएगा।
ऐसी स्थ त म वह राज्य ‘लावा रस’ मान लया जाएगा और ईस्ट इं डया कंपनी म मला लया जाएगा।
भारतीय परंपरा म गोद लेना पूरी तरह मान्य था — पुत्र न होने पर राजा गोद ले लेते थे और वही उत्तरा धकारी होता था। अंग्रेज़
ने इसी परंपरा को अस्वीकार करके राज्य हड़पने का रास्ता बना लया।

इसी नी त से छ ने गए कुछ राज्य —

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

राज्य वष क वता म उल्लेख

सतारा 1848 “उदै पूर, तंजोर, सतारा, करनाटक क कौन बसात”

नागपुर 1854 “हुआ नागपुर का भी घात”

झाँसी 1854 “लावा रस का वा रस बनकर ब्र टश राज्य झाँसी आया”

संबलपुर, जैतपुर, उदयपुर, 1849– “उदै पूर ... क कौन बसात”
बघाट आ द 1854

अवध (लखनऊ) 1856 “ लया लखनऊ बात -बात” — यह ‘कुशासन’ के बहाने लया गया, हड़प नी त से नह ;
इसी लए कव यत्री ने ‘बात -बात’ कहा।

झाँसी के साथ ठ क क्या हुआ: राजा गंगाधर राव क मृत्यु सन् 1853 म हुई। मृत्यु से पहले उन्ह ने दामोदर राव
को गोद लया था। अंग्रेज़ ने उस दत्तक पुत्र को उत्तरा धकारी मानने से इनकार कर दया और सन् 1854 म झाँसी
को अंग्रेज़ी राज्य म मला लया। रानी लक्ष्मीबाई ने इसका डटकर वरोध कया — उन्ह का प्र सद्ध वाक्य है “म
अपनी झाँसी नह दूँ गी।” कव यत्री का व्यंग्य यह है: झाँसी लावा रस थी ही नह — वा रस मौजूद था। उसे घो षत
लावा रस कया गया, ता क हड़पा जा सके।

प रणाम: इस नी त ने दे शी राजाओं म गहरा असंतोष भर दया और यही 1857 क क्रां त के प्रमुख राजनी तक
कारण म गनी जाती है। क वता का छं द 8 इसी असंतोष क पूरी सूची है। सन् 1858 म जब शासन कंपनी से
ब्र टश ताज के हाथ आया, तो महारानी वक्टो रया क घोषणा म गोद लेने का अ धकार भारतीय राजाओं को लौटा
दया गया — यानी अंग्रेज़ को स्वयं यह नी त वापस लेनी पड़ी।

प्र.2 2. इस क वता म लक्ष्मीबाई क जीवन-गाथा के साथ-साथ अनेक वीर के त्याग और ब लदान का भी उल्लेख है।
उनक सूची बनाइए तथा शक्षक क सहायता से 1857 क क्रां त म उनके योगदान के वषय म ल खए।

क वता म जन वीर का नाम आया है, उनक सूची और 1857 म उनका योगदान —

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी
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वीर कौन थे 1857 क क्रां त म योगदान
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क वता क

emपं क्त
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रानी लक्ष्मीबाई .c झाँसी क रानी; राजा गंगाधर राव क a वॉकर
a s em पत्नी; बचपन का नाम मनु, घर का झाँसी को अंग्रेज़ से बचाने के लए युद्ध कया; “खूब लड़ी मदानी

agl
को घायल कया; सौ मील चलकर कालपी पहुँच ; वह तो झाँसी
नाम ‘छबीली’ तात्या टोपे के साथ ग्वा लयर जीता; 17–18 जून वाली रानी थी”
1858 को ग्वा लयर के पास वीरग त पाई।

co m
m .
e कानपुर म वद्रोह का नेतृत्व कया, स्वयं को पेशवा ag
as
नाना धुंधूपंत अं तम पेशवा बाजीराव द्वतीय के अंग्रेज़ ने उनक पशन बंद कर द थी। उन्ह ने “नाना धुंधूपंत

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(नाना साहब) दत्तक पुत्र; बठू र (कानपुर) के पेशवा जुटा रहा

साथी
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नवासी; लक्ष्मीबाई के बचपन के घो षत कया और क्रां त के लए सैन्य-सामग्री जुटाई। था सब सामान”

m धुंधूपंत,
co“नाना
m .
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ताँ तया (तात्या नाना साहब के वश्वस्त साथी और 1857 के सबसे कुशल सेनानायक। कानपुर,

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.co पांडुरंग टोपे g
टोपे) सेनाप त; असली नाम रामचंद्र कालपी और ग्वा लयर के अ भयान म रानी के साथ ताँ तया, चतुर

m a
रहे। रानी क वीरग त के बाद भी लंबे समय तक अज़ीमुल्ला

l a se छापामार युद्ध लड़ते रहे; सन् 1859 म पकड़े जाकर सरनाम”

a g ब लदान हुए।

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coगए।mलौटकर क्रां त के प्रचार और कूटनी त का पक्ष agl
अज़ीमुल्ला खाँ नाना साहब के द वान और नाना साहब क पशन का मुक़दमा लड़ने इंग्लड तक “चतुर अज़ीमुल्ला
सलाहकार; अंग्रेज़ी तथा ांसीसी
m . सँभाला — छाव नय और गाँव तक संदेश पहुँचाने सरनाम”
जानने वाले पढ़े - लखे व्य क्त
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agl
क व्यवस्था इन्ह से जोड़ी जाती है। कव यत्री ने
इसी लए उन्ह ‘चतुर’ और ‘सरनाम’ (प्र सद्ध) कहा।

co m “अहमद शाह
सन्.
अहमद शाह फ़ैज़ाबाद (अवध) के मौलवी और अवध म वद्रोह के प्रमुख नेता। लखनऊ क घेराबंद
और शाहजहाँपुर के युद्ध म अंग्रेज़ से लड़े। m
मौलवी (मौलवी
m
उपदे शक
1858 म मारे गए। अंग्रेज़ अफ़सर ने a
e
भीsउन्ह बहुत
मौलवी, ठाकुर

.co
अहमदुल्ला शाह)
ag l कुँवर सह सै नक

m
ase
योग्य सेनानायक माना। अ भराम”

agl ठाकुर कुँवर सह बहार के जगद शपुर (आरा, बहार म वद्रोह का नेतृत्व कया। आरा, आज़मगढ़ “ठाकुर कुँवर सह
शाहाबाद) के ज़म दार; वद्रोह के और जगद शपुर म अंग्रेज़ को परा जत कया। सन् सै नक अ भराम”
se m
comहुआ। ‘सै नक अ भराम’ का अथ है — शोभायमान, g l a
.
समय लगभग 80 वष के 1858 म वजय के कुछ ही दन बाद घाव से दे हांत

m a
gl ase आदश योद्धा।

काना और मंदरा
a
रानी लक्ष्मीबाई क स खयाँ और ग्वा लयर के युद्ध म रानी के साथ रह और स्वयं युद्ध- “काना और मंदरा
अंगर क्षकाएँ
अंo
मचाई थी”। ये साधारण स्त्रयाँ थ , फर भी c
m
भू म म लड़ — “युद्ध क्षेत्र म उन दोन ने भारी मार स खयाँ रानी के

.
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त तक सँग आई थ ”

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com gl
साथ नह छोड़ा।

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m झलकारी बाई a
l a se झाँसी के पास भोजला गाँव म जन्म झाँसी के कले क घेराबंद के समय स्वयं रानी का पृष्ठ 191–192,

ag (22 नवंबर 1830); रानी क ‘दुगा वेश धारण करके सेना क कमान सँभाली और ‘झरोखे से’

.c
m
दल’ नामक म हला सेना क अंग्रेज़ को भ्र मत कए रखा, जससे रानी अपने पुत्र

m a s e
agl
सेनाना यका। (क वता म नह , के साथ कले से नकल सक ।
पुस्तक के ‘झरोखे से’ म)
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सूची से क्या दखता है: ध्यान द जए, इस सूची म महाराष्ट्र, अवध, बहार और बुंदेलखंड — चार क्षेत्र ह; हदू और
मुसलमान दोन ह; राजा, सेनाप त, वद्वान, ज़म दार, धम पदे शक और साधारण स्त्रयाँ — सब ह। यही कव यत्री क
सबसे बड़ी बात है: 1857 कसी एक वग या एक क्षेत्र का वद्रोह नह था, वह साझा संघष था। इसी लए इस शीषक
का नाम ही ‘साझा साथ/साझा संघष’ है।

चोट क पं क्त: इन नाम को गनाने के बाद कव यत्री जोड़ती ह — “ले कन आज जुम कहलाती उनक जो
कुरबानी थी।” अंग्रेज़ी शासन के अ भलेख म इन वीर को ‘ वद्रोही’ और ‘अपराधी’ लखा गया था। यह पं क्त याद
दलाती है क इ तहास कसक दृ ष्ट से लखा गया है, यह दे खना कतना ज़रूरी है।

प्र.3 3. यह क वता जस समय और प रवेश म लखी गई है, उसम युद्ध और अन्य साह सक काय करना सामान्यत:
पुरुष का क्षेत्र माना जाता था। वतमान म लगभग हर क्षेत्र म म हलाएँ काय कर रही ह। नीचे कुछ ऐसे ही कायक्षेत्र
दए गए ह। इन क्षेत्र म काम करने वाली स्त्रय के नाम और उनके वषय म ल खए। आप चाह तो इसम अपनी
समझ के अनुसार कुछ और कायक्षेत्र भी जोड़ सकते ह। (कायक्षेत्र — 1. दमकल कद्र (फायर ब्रगेड) 2. रेलगाड़ी
चालक 3. खेल के व भन्न क्षेत्र 4. व्यापार और प्रबंधन 5. वज्ञान और तकनीक)

पुस्तक ने केवल कायक्षेत्र क सूची द है — नाम आपको भरने ह। पूरी भरी हुई ता लका इस प्रकार है —

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क्रम कायक्षेत्र स्त्रय के नाम सं क्षप्त प रचय

1 दमकल कद्र हिषणी का हेक र;
न् ह षणी कान्हेकर भारत क पहली म हला फ़ायर फ़ाइटर मानी जाती ह — उन्ह ने
(फायर ता या सा याल
न् न् नागपुर के राष्ट्रीय अ ग्न सेवा महा वद्यालय से प्र शक्षण लया। तान्या सान्याल
ब्रगेड) भारतीय वमानपत्तन प्रा धकरण क पहली म हला अ ग्नशमन अ धकारी बन । आज
अनेक राज्य क दमकल सेवाओं म म हला दस्ते ह।

2 रेलगाड़ी सुरेखा यादव; मुमताज़ सुरेखा यादव भारत क पहली म हला रेल इंजन चालक (लोको पायलट) ह; आगे
चालक काज़ ी चलकर वे वंदे भारत एक्सप्रेस चलाने वाली पहली म हला भी बन । मुमताज़ काज़ी
डीज़ल इंजन चलाने वाली पहली म हला चालक म गनी जाती ह। मुंबई क
उपनगरीय रेल-सेवा म आज कई म हला चालक ह।

3 खेल के पी.टी. ऊषा; मैरी कॉम; पी.ट . ऊषा — दौड़ (एथले टक्स) क महान खलाड़ी, ‘उड़नपरी’। मैरी कॉम —
व भन्न क्षेत्र पी.वी. िसंध;ु मीराबाई मुक्केबाज़ी म अनेक बार वश्व च पयन। पी.वी. सधु — बैड मटन म ओलं पक
चानू; िमताली राज; पदक वजेता। मीराबाई चानू — भारोत्तोलन (वेट ल टं ग) म ओलं पक पदक।
िहमा दास मताली राज — भारतीय म हला क्रकेट ट म क कप्तान रह । हमा दास — वश्व
स्तर पर दौड़ म स्वण जीतने वाली पहली भारतीय।

4 व्यापार और िकरण मजूमदार-शॉ; करण मजूमदार-शॉ — जैव-प्रौद्यो गक कंपनी ‘बायोकॉन’ क संस्थापक। इं दरा
प्रबंधन इंिदरा नूयी; अ ं धित रु नूयी — एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी क मुख्य कायकारी अ धकारी रह । अरुं ध त
भ ाचाय; फा गुनी ल् भ ाचाय — भारतीय स्टे ट बक क पहली म हला अध्यक्ष। फाल्गुनी नायर — एक
नायर बड़े ऑनलाइन व्यापार-मंच क संस्थापक।

5 वज्ञान और क पना चावला; टेस ी
ल् कल्पना चावला — अंत रक्ष म जाने वाली भारतीय मूल क पहली म हला। टे सी
तकनीक थॉमस ; िरतु किरधाल ; थॉमस — मसाइल कायक्रम क वैज्ञा नक, ‘ मसाइल वुमन’ कही जाती ह। रतु
मुथ या विनता; जानकी
य् क रधाल और मुथय्या व नता — इसरो के चंद्र-अ भयान क प्रमुख वैज्ञा नक।
अ माल
म् जानक अम्माल — प्र सद्ध वनस्प त वैज्ञा नक।

6 वायुसे ना / र ा
क्ष अवनी चतुवदी, भावना ये तीन भारतीय वायुसेना क पहली म हला लड़ाकू वमान चालक ह। आज तीन
(जोड़ ा गया) कं ठ, मोहना िसंह सेनाओं म म हलाएँ स्थायी कमीशन पर अ धकारी ह।

7 पुिलस और िकरण बेद ी; अन्ना करण बेद भारत क पहली म हला आई.पी.एस. अ धकारी थ । अन्ना राजम
पशासन (जोड़ ा राजम म ो ा त्र मल्होत्रा पहली म हला आई.ए.एस. अ धकारी थ ।
गया)

8 पवतारोहण बछे ंद ी पाल ; अ िणमा रु बछद्र पाल एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय म हला ह। अरु णमा सन्हा ने
(जोड़ ा गया) िस हा
न् एक पैर खोने के बाद भी एवरेस्ट पर चढ़कर दखाया।

क वता से जोड़कर दे खए: कव यत्री ने रानी के लए ‘मदानी’ शब्द इस लए प्रयोग कया क्य क उस समय
बहादुरी को पुरुष का गुण मान लया गया था — इस लए बहादुर स्त्री क प्रशंसा भी ‘पुरुष जैसी’ कहकर क जाती
थी। यह भाषा उस युग क सीमा दखाती है, स्त्री क नह । आज जब स्त्रयाँ इंजन चलाती ह, आग बुझाती ह, लड़ाकू
वमान उड़ाती ह और अंत रक्ष तक जाती ह, तो साहस के लए ‘मदानी’ जैसा शब्द ढूँ ढ़ने क ज़रूरत ही नह रह
जाती। क वता क ना यका ने डेढ़ सौ साल पहले जो रास्ता खोला था, ये सब स्त्रयाँ उसी पर आगे बढ़ रही ह।

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करके दे खए: अपने आस-पास से भी दो नाम जो ड़ए — अपने वद्यालय क कोई श क्षका, गाँव या मुहल्ले क
डॉक्टर, आशा कायकता, बस चालक, दुकानदार या पंचायत क प्रधान। उनसे मलकर पू छए क उन्ह शुरू म क्या
क ठनाई हुई और उन्ह ने उसे कैसे पार कया — यह उत्तर कक्षा म सबसे अ ा माना जाएगा, क्य क वह कताब से
नह , जीवन से आया होगा।

प्र.4 4. क वता म 1857 के प्रथम स्वतंत्रता सं ाम से संबं धत अनेक ान के नाम आए ह। अपने शक्षक क
सहायता से दए गए मान चत्र म उन ान /नगर को च ह्नत करके नाम ल खए।

यह मान चत्र-काय है — चह्न आपको अपनी पुस्तक के पृष्ठ 187 पर दए गए भारत के मान चत्र म लगाने ह। नीचे क वता म आए
सभी ान, उनका आज का नाम और आज वे कस राज्य/दे श म ह — यह सूची द गई है। इसी के अनुसार मान चत्र पर बदु
लगाइए और नाम ल खए।

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क वता म आज का नाम आज कहाँ क वता म कस प्रसंग म
नाम

झाँसी झाँसी उत्तर प्रदे श (बुंदेलखंड) रानी का राज्य; क वता का कद्र

कानपूर / कानपुर उत्तर प्रदे श नाना साहब का क्षेत्र ( बठू र कानपुर के
कानपुर पास है); “मेरठ, कानपुर, पटना ने
भारी धूम मचाई थी”

बठू र बठू र उत्तर प्रदे श (कानपुर के पास) “कैद पेशवा था बठू र म”

दे हली दल्ली दल्ली “ छनी राजधानी दे हली क ”; “झाँसी
चेती, दल्ली चेती”

लखनऊ लखनऊ उत्तर प्रदे श “ लया लखनऊ बात -बात”;
“लखनऊ के लो नौलख हार”

मेरठ मेरठ उत्तर प्रदे श क्रां त का आरंभ-स्थल — “मेरठ,
कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी”

पटना पटना बहार बहार म वद्रोह (कुँवर सह का क्षेत्र
इसी ओर)

नागपूर / नागपुर महाराष्ट्र “हुआ नागपुर का भी घात”; “नागपूर
नागपुर के जेवर ले लो”

सतारा सतारा महाराष्ट्र हड़प नी त से छ ना गया राज्य

कोल्हापुर कोल्हापुर महाराष्ट्र “जबलपुर, कोल्हापुर म भी कुछ
हलचल उकसानी थी”

जबलपुर जबलपुर मध्य प्रदे श वही पं क्त

तंजोर तंजावुर त मलनाडु “उदै पूर, तंजोर, सतारा, करनाटक क
कौन बसात”

करनाटक कनाटक (यहाँ ‘कनाटक क द क्षण भारत वही पं क्त
नवाबी’, जो आज के
त मलनाडु क्षेत्र म थी)

उदै पूर उदयपुर राजस्थान (कुछ इ तहासकार डलहौजी वही पं क्त
द्वारा हड़पी गई छोट ‘उदयपुर’ रयासत
क ओर संकेत मानते ह)

सध सध आज पा कस्तान म “जब क सध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी
हुआ था वज्र- नपात”

पंजाब पंजाब भारत और पा कस्तान — दोन म वही पं क्त

ब्रह्म ब्रह्मदे श (बमा) आज म्याँमार वही पं क्त

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क वता म आज का नाम आज कहाँ क वता म कस प्रसंग म

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नाम

.cबंoगाल “बंa
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बंगाले प श्चम बंगाल गाले, मद्रास आ द क भी तो यही

agl
कहानी थी”

मद्रास चेन्नई त मलनाडु वही पं क्त

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कलकत्ता कोलकाता प श्चम बंगाल “उनके गहने-कपड़े बकते थे कलकत्ते

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के बाजार”

कालपी कालपी
a उत्तर प्रदे श (जालौन ज़ला, यमुना के “रानी बढ़ कालपी आई, कर सौ मील

com
कनारे) नरंतर पार”

.
a s emपर अंग्रेज ने फर खाई
com(कालपी के पास) gरानीl से हार”
यमुना-तट यमुना नद का कनारा उत्तर प्रदे श “यमुना-तट

m . a
ase
agl
ग्वा लयर ग्वा लयर मध्य प्रदे श “ कया ग्वा लयर पर अ धकार” —
और इसी के पास रानी ने वीरग त पाई

m a s
.co agl
मान चत्र भरते समय ध्यान र खए —

se m
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पहले झाँसी को च ह्नत क जए, क्य क पूरी कहानी वह से चलती है; फर उसके पास ही कालपी और ग्वा लयर — ये तीन
मलकर रानी क अं तम यात्रा बनाते ह।
क्रां त के मुख्य कद्र — मेरठ, दल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी, पटना — इन्ह एक ही रंग से च ह्नत क जए। ये उत्तर भारत
म लगभग एक प
.
बनाते ह, और इसी से समझ आता है क क्रां त कहाँ सबसे तीव्र थी।
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mजए।
हड़प नी त से छ ने गए राज्य — सतारा, नागपुर, झाँसी, उदयपुर — इन्ह दूसरे रंग से च ह्नतeक
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सधco m
और ब्रह्मदे श (म्याँमार) आज भारत क सीमा के बाहर ह — मान चत्र म इनक gदशा a
l तीर से दखाइए और नीचे टप्पणी
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a semलख द जए।
agl नाम हमेशा बदु के दाईं ओर और सीधी लखावट म ल खए; मान चत्र म तीर और नाम आपस म न उलझ।

se m
com g l a
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एक रोचक बात: इन नाम को मान चत्र पर एक साथ दे खए — उत्तर म मेरठ और दल्ली, पूव म पटना और
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ase
कलकत्ता, द क्षण म तंजावुर और मद्रास, प श्चम म सध और सतारा। कव यत्री ने जान-बूझकर पूरे दे श को समेटा है,

agl
ता क पाठक को लगे क यह कसी एक रयासत क लड़ाई नह थी।

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व्याकरणmक बात — शब्द एक अथ अनेक — पृष्ठ 188 as e
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अभ्यास › भाषा से संवाद › व्याकरण क बात › शब्द एक अथ अनेक

भाषा से सं वाद अने काथ शब्द

प्र.1 1. “कानपूर के नाना क मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी” — उपयुक्त पं क्त म रेखां कत शब्द पर ध्यान द जए।
क वता म ‘नाना’ शब्द ‘नाना धुंधूपंत’ के लए प्रयुक्त हुआ है। ले कन इस शब्द का प्रयोग संदभ के अनुसार अन्य
अथ म भी होता है। जैसे– माता के पता के लए तथा अनेक के अथ म। इस प्रकार अनेकाथ शब्द वह शब्द है
जसके एक से अ धक अथ होते ह। नीचे ता लका म द गई क वता क पं क्तय म रेखां कत शब्द अनेकाथ शब्द
ह। क वता के संदभ म उनके सही अथ पर घेरा लगाइए।

पूरी भरी हुई ता लका इस प्रकार है। मोटे अक्षर वाला अथ ही वह है जस पर घेरा लगाना है —

काव्य-पं क्त (रेखां कत शब्द) दए गए अथ क वता के संदभ म
सही अथ

तीर चलाने वाले कर म उसे चू ड़याँ कब नद का कनारा, बाण, सीसा बाण
भाईं
(रेखां कत शब्द — तीर)

रानी वधवा हुई हाय! व ध को भी नह शास्त्र म लखी व्यवस्था, प्रणाली, वधाता, तरीका िवधाता
दया आई

रानी ने तलवार ख च ली, हुआ द्वं द्व युद्ध, संशय, युग्म यु
द्ध

असमान म

हो मदमाती वजय, मटा दे गोल से कसी पदाथ का गोल पड, रस्सी/सूत/बफ का गोला, तोप से तोप से दागने वाले गोले
चाहे झाँसी दागने वाले गोले, ना रयल

मला तेज से तेज, तेज क वह सच्ची आभा, ग त, तेज चाकू (धार) आभा
अ धकारी थी

हर अथ क्य चुना गया —

1. तीर = बाण। पूरी पं क्त है — “तीर चलाने वाले कर म उसे चू ड़याँ कब भाईं”। ‘चलाना’ क्रया के साथ ‘तीर’ का अथ केवल
बाण बन सकता है — नद का कनारा या सीसा (धातु) कोई ‘चलाता’ नह । यहाँ बात रानी के उस हाथ क है जो धनुष-बाण
चलाता था।
2. व ध = वधाता। पं क्त है — “रानी वधवा हुई हाय! व ध को भी नह दया आई”। ‘दया आना’ कसी चेतन पर लागू होता है,
कसी नयम या तरीके पर नह । इस लए यहाँ ‘ व ध’ का अथ है — सृ ष्ट क रचना करने वाला, यानी वधाता/भाग्य- वधाता।
कव यत्री का भाव यह है क जब भाग्य ही नदयी हो गया, तो और कससे आशा क जाए।
3. द्वं द्व = युद्ध। पं क्त है — “रानी ने तलवार ख च ली, हुआ द्वं द्व असमान म”। तलवार खचने के बाद जो होता है, वह लड़ाई है
— ‘संशय’ (मन का द्वं द्व) या ‘युग्म’ (जोड़ा) यहाँ बैठता ही नह । ‘असमान म’ जोड़कर कव यत्री यह भी बता दे ती ह क यह
द्वं द्व बराबरी का नह था।
4. गोले = तोप से दागने वाले गोले। पं क्त है — “हो मदमाती वजय, मटा दे गोल से चाहे झाँसी”। ‘ मटा दे ना’ और ‘ वजय’
— दोन युद्ध के शब्द ह। कसी नगर को गोल पड, ऊन के गोले या ना रयल से नह मटाया जाता; उसे तोप के गोल से
मटाया जाता है।

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5. तेज = आभा। पं क्त है — “ मला तेज से तेज, तेज क वह सच्ची अ धकारी थी”। यहाँ रानी क आभा/प्रभा (यश और
पराक्रम क चमक) चता क अ ग्न के तेज म जा मलती है। ‘ग त’ या ‘चाकू क धार’ वाला अथ लेने पर पं क्त नरथक हो
जाएगी। ध्यान द जए, यह शब्द एक ही पं क्त म तीन बार आया है और तीन बार आभा के ही रंग म — यही इस पं क्त का
स दय है।

‘नाना’ शब्द से क्या सीखा: पुस्तक ने ‘नाना’ का उदाहरण दे कर एक बड़ी बात सखाई है — शब्द का अथ
शब्दकोश से नह , संदभ से तय होता है। ‘नाना’ के तीन अथ ह — (1) माता के पता, (2) अनेक/ व वध, (3) यहाँ
एक व्य क्त का नाम — नाना धुंधूपंत। क वता म तीसरा अथ इस लए सही है क्य क आगे उसी छं द म लखा है
“नाना के सँग पढ़ती थी वह”, और छं द 10 म उनका पूरा नाम भी आता है — “नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब
सामान”।

अभ्यास के लए और अनेकाथ शब्द (इसी क वता से): कर — हाथ / कर (टै क्स) / करण; अंबर — आकाश
/ वस्त्र; काल — समय / मृत्यु / अकाल; घन — बादल / हथौड़ा / घना; दल — पत्ता / समूह / सेना; हार —
पराजय / माला। हर शब्द के दो-दो वाक्य बनाकर दे खए क अथ कैसे बदल जाता है।

प्र.2 2. “कानपूर के नाना क मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी” / “मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी” —
उपयुक्त पं क्तय म रेखां कत शब्द क वतनी पर ध्यान द जए। दोन शब्द क वतनी म थोड़ी भन्नता है। कई
बार रचनाकार क वता क लय, अथ क लय इत्या द को ध्यान म रखते हुए भाषा के स्तर पर इस प्रकार का प्रयोग
करते रहे ह। इस क वता म अन्य शब्द के भी ऐसे प्रयोग मलते ह, उन्ह ढूँ ढ़कर ल खए और कक्षा म चचा
क जए। इसी पाठ्यपुस्तक क अन्य क वताओं म भी आपने ऐसा प्रयोग दे खा होगा। जहाँ कसी शब्द क मानक
वतनी से भन्न वतनी का प्रयोग कया गया है। अपने शक्षक के साथ इस वषय पर चचा क जए। चचा से उभरे
बदुओं को लखकर उन पर अपने शक्षक के साथ पुन: चचा क जए क ऐसे प्रयोग क्य कए गए ह?

पहले जोड़ी को सम झए — ‘कानपूर’ म ऊ (द घ) है और ‘कानपुर’ म उ (ह्रस्व)। मानक वतनी कानपुर है। कव यत्री ने ‘कानपूर’
इस लए लखा क उस पं क्त म शब्द क ध्व न लंबी चा हए थी — “कान-पू-र के नाना क मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी”। ठ क यही
शब्द जब सूची म आया, जहाँ तेज़ी चा हए थी, तो ह्रस्व हो गया — “मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी”।
इसी क वता म ऐसे और प्रयोग —

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क वता का मानक रूप क वता क पं क्त क्य बदला गया
रूप

नागपूर / नागपुर “‘नागपूर के जेवर ले लो’” / ठ क ‘कानपूर–कानपुर’ जैसी ही जोड़ी — नीलामी क पुकार म
नागपुर “हुआ नागपुर का भी घात” शब्द खचकर बोला जाता है, इस लए ‘नागपूर’।

दे हली दल्ली “ छनी राजधानी दे हली क ” ‘ दल्ली’ म दो लघु मात्राएँ ह; ‘दे हली’ से चरण क मात्रा पूरी
बैठती है। साथ ही यह उस समय का प्रच लत रूप भी था।

रजधानी राजधानी “ने छोड़ी रजधानी थी” ‘राजधानी’ लंबा पड़ता; ह्रस्व करने से ‘कहानी–रानी’ क तुक
ठ क बैठ गई।

महरानी महारानी “दासी अब महरानी थी” वही कारण — तुक और मात्रा; और बोलचाल का रूप होने से
व्यंग्य भी तीखा हो गया।

नव्वाब नवाब “राजाओं नव्वाब को भी उसने ‘व्व’ के द्वत्व से शब्द भारी हो जाता है — पं क्त का ओज
पैर ठु कराया” बढ़ता है।

उदै पूर उदयपुर “उदै पूर, तंजोर, सतारा, ‘उदय’ को ‘उदै ’ करने से एक मात्रा बचती है और सूची तेज़
करनाटक क कौन बसात” चलती है।

करनाटक कनाटक वही पं क्त ‘र्’ क संयुक्त ध्व न खोलकर बोलने से पढ़ने म सरलता —
लोकगीत क तरह गाया जा सके।

ब हन बहन “ब हन छबीली ने रण-चंडी का पुराना और अ धक आत्मीय रूप; बोलचाल म आज भी
कर दया प्रकट आ ान” प्रच लत।

चनगारी चगारी “यह स्वतंत्रता क चनगारी अनुस्वार खोलकर लखने से उच्चारण खुलता है और लय
अंतरतम से आई थी” ठहरती है।

सन्मुख सम्मुख “अबके जनरल स्मथ सन्मुख उच्चारण के अनुसार लखा गया रूप।
था”

तेइस तेईस “अभी उम्र कुल तेइस क थी” एक मात्रा घटाकर चरण को संतु लत करना।

होवे, हो, जगाएगा “होवे चुप इ तहास”; “यह तेरा लोकभाषा के क्रया-रूप; इनसे क वता गीत जैसी लगती है।
जगावेगा ब लदान जगावेगा”

उजयाली उ जयाली / “मु दत महल म उजयाली छाई” ‘छाई’ के साथ तुक बैठाने के लए।
उजाला

खलवार खलवाड़ “ये थे उसके प्रय खलवार” ‘वार, शकार, अवतार’ क तुक- ंखला पूरी करने के लए।

गुमी हुई गुम हुई / खोई “गुमी हुई आजाद क क मत बोलचाल का रूप, जो पं क्त को सहज बनाता है।
हुई सबने पहचानी थी”

पाठ्यपुस्तक क अन्य क वताओं म ऐसे प्रयोग —

पाठ 8, रैदास के पद — छू टै , बरै, जाक , तोरौ, जोरौ, भरोसां, दासा। यहाँ कारण अलग है — यह ब्रजभाषा का अपना रूप
है, केवल लय के लए कया गया प रवतन नह ।

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

पाठ 9, तुलसीदास — पूरी रचना अवधी म है, इस लए वहाँ के रूप खड़ी बोली से भन्न ह।
पाठ 10, नराला — ‘भार त’ जैसा रूप, जो ‘भारती’ के स्थान पर संबोधन क लय के लए आया है।

चचा से उभरने वाले बदु — ऐसे प्रयोग क्य कए जाते ह:

1. लय और मात्रा — क वता के हर चरण म मात्राओं का एक संतुलन होता है। एक मात्रा घटाने-बढ़ाने के लए
क व वतनी बदल लेता है।
2. तुक — ‘रजधानी’ और ‘महरानी’ के बना ‘कहानी–रानी’ क तुक नह बैठती। तुक ही इस क वता को गाने
योग्य बनाती है।
3. गेयता — यह क वता लोकगायक क तरह गाई जानी थी। गाते समय ‘कानपूर’ जैसा द घ रूप स्वाभा वक
लगता है।
4. लोक क भाषा — कव यत्री चाहती थ क यह क वता गाँव-गाँव पहुँचे। इस लए उन्ह ने वही रूप चुने जो लोग
बोलते थे — ‘ब हन’, ‘गुमी’, ‘होवे’।
5. उस समय क भाषा — सन् 1930 के आसपास हद क वतनी आज जतनी नयमबद्ध नह थी; ‘दे हली’ जैसे
रूप तब सामान्य थे।
6. क व क छू ट — इसे सा हत्य म ‘काव्य-स्वतंत्रता’ कहते ह। यह छू ट क वता म मान्य है — पर नबंध, पत्र या
उत्तर-पु स्तका म नह । वहाँ मानक वतनी ही ल खए।

कक्षा म करने योग्य: दो समूह बनाइए। एक समूह इस क वता से दस ऐसे शब्द छाँटे, दूसरा समूह पाठ 8 और 9 से।
फर दोन सू चयाँ मलाकर दे खए — आप पाएँगे क इस क वता के प रवतन लय के कारण ह, जब क पाठ 8–9 के
रूप बोली (ब्रज/अवधी) के कारण। यह अंतर पहचान लेना ही इस प्रश्न क असली उपल है।

मुहावरे — पृष्ठ 189
अभ्यास › भाषा से संवाद › व्याकरण क बात › मुहावरे

भाषा से सं वाद मु हावरे

प्र.1 पाठ म से चुनकर कुछ पं क्तयाँ नीचे द गई ह। उन पं क्तय म आए मुहावरे ढूँ ढ़कर ल खए और उन मुहावर का
प्रयोग करते हुए नए वाक्य भी बनाइए। आपक सु वधा के लए एक उदाहरण दया गया है। — 1. “अबके जनरल
स्मथ सन्मुख था, उसने मुँह क खाई थी” (पुस्तक का हल कया हुआ उदाहरण)

पहले पूरी भरी हुई ता लका दे ख ली जए (पहली पं क्त पुस्तक ने स्वयं द है) —

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी
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क्रम काव्य पं क्त प्रयुक्त मुहावरा नया वाक्य

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उसने .मुc
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अबके जनरल स्मथ सन्मुख था, मुँह क खाना
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मोहन ने सोचा था क वह आसानी से जीत जाएगा, ले कन अंत म उसे

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ँह क खाई थी मुँह क खानी पड़ी। (पुस्तक का उदाहरण)

a2gl डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पैर पसारना; िकरायेद ार ने ऐसे पैर पसारे िक पूरा मकान ही अपना समझ बैठा। —
पलट गई काया काया पलटना नई नौकरी िमलते ही उसके पिरवार की काया पलट गई।
m
coिजस िम ने किठन समय में साथ िदया था, सफल होते ही उसने उसे
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ा) em पैरों ठुक रा िदया।
3 राजाओं नव्वाब को भी उसने पैरों ठुक राना
(ठुक रा दे नs
त्र

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पैर ठु कराया

4 हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्ह तो / सोई
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सोई योित जगाना
ज् एक अ छे िश क का काम पढ़ ाना ही नही,ं िव ािथयों के भीतर सोई
च् क्ष

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ज्यो त जगानी थी योित जगाना भी है।
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ज्

s m पूरे इलाके में धूम
eजीतकर
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धूम मचाना गाँव की टीम ने िज़ ला तर की पितयोिगता
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5 मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम स्

. मचा दी।
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मचाई थी

laपहली पं क्त का मुहावरा — ‘मुँह क खाना’ —
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अथ — बुरी तरह परा जत होना; अपमानजनक हार खाना।
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शा ब्दक अथ से भन्नता — शब्द को अलग-अलग प ढ़ए तो अथ बनता ही नह — ‘मुँह’ को कोई ‘खाता’ कैसे है? पर पूरा
agl
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“ऐसे वाक्यांश जो अपने शा ब्दक अथ सेglभन्न एक वशेष और लाक्ष णक अथ व्यक्त करते ह”।
वाक्यांश मलकर एक तीसरा अथ दे दे ता है। यही मुहावरे क पहचान है — पुस्तक ने इसे इन्ह शब्द म प रभा षत कया है:

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क वता म इसका बल — कव यत्री यह नह कहत क ‘ स्मथ हार गया’। वे कहती ह ‘मुँह क खाई’ — इससे हार के साथ

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.
अपमान भी जुड़ जाता है। एक स्त्री से हारकर लौटना — जनरल स्मथ के लए यही सबसे बड़ी बात थी।
मेरा नया वाक्य — बड़ी-बड़ी बात करने वाली ट म पहले ही मैच म मुँह क खाकर लौट आई। m

o m l a se
.c र खए: मुहावरा वाक्य म हमेशा क्रया के रूप म ढलकर आता है — ‘खाना’a g
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a ‘खाकर’, ‘खाई थी’ हो जाता है। नया वाक्य बनाते समय मुहावरे को ज्य -का-त्य चपकाइए नह , वाक्य के अनुसार
agl
ध्यान बदलकर ‘खानी पड़ी’,

उसका रूप बद लए।
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प्र.2 agl
2. “डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया” — इस पं क्त म आया मुहावरा ढूँ ढ़कर ल खए और उसका
प्रयोग करते हुए नया वाक्य बनाइए।

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इस.cएक पं क्त म दो मुहावरे ह। g l

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मुहावरा अथ पं क्त म भाव नया वाक्य

पैर धीरे-धीरे अपना अ धकार या वस्तार अंग्रेज़ पहले थोड़ी-सी जगह म व्यापार करने जंगल काटकर ब ती ने ऐसे पैर
स्

पसारना बढ़ाना; जतनी जगह मली उससे आए थे; फर एक-एक करके पूरे दे श पर पसारे िक नदी का िकनारा तक
अ धक घेर लेना अ धकार जमाते चले गए। ढँक गया।

काया रूप या दशा का पूरी तरह बदल जो कल तक याचक था, वह आज शासक बन नई सड़ क और पुल बन जाने से
पलटना जाना बैठा — व्यापारी का रूप पलटकर राजा का हमारे गाँव की काया पलट गई।
हो गया।

दोन मुहावरे एक साथ क्य : ध्यान द जए, ये दोन मुहावरे मलकर एक क्रम बनाते ह — पहले ‘पैर पसारना’
(धीरे-धीरे फैलना), फर ‘काया पलटना’ (एकदम बदल जाना)। यही अंग्रेज़ी सत्ता क पूरी कहानी है: वस्तार धीरे-
धीरे हुआ, पर एक दन रूप बलकुल बदल गया। पछली पं क्त इसी क भू मका है — “व्यापारी बन दया चाहता था
जब यह भारत आया”। दो मुहावर से कव यत्री ने वह बात कह द जसके लए इ तहास क पुस्तक म कई पृष्ठ
लगते।

मलते-जुलते मुहावरे: ‘पैर जमाना’ (मज़बूती से टक जाना), ‘पाँव फैलाना’, ‘ सर पर चढ़ना’ — इनके अथ
अलग-अलग ह, इस लए इन्ह आपस म बदलकर मत ल खए।

प्र.3 3. “राजाओं नव्वाब को भी उसने पैर ठु कराया” — इस पं क्त म आया मुहावरा ढूँ ढ़कर ल खए और उसका
प्रयोग करते हुए नया वाक्य बनाइए।

मुहावरा अथ नया वाक्य

पैर ठु कराना (ठु करा दे ना / अत्यंत तरस्कार के साथ अस्वीकार कर दे ना; िजस प ताव को उसने कल पैरों ठुक रा िदया था, आज
स्

ठोकर मारना) कसी को बलकुल महत्व न दे ना उसी के िलए वह अनुरोध कर रहा है।

पं क्त म इसका बल: ‘मना कर दया’ कहने से केवल इनकार का पता चलता। ‘पैर ठु कराया’ कहने से अपमान का
चत्र भी बन जाता है — जैसे कोई पैर से कसी चीज़ को परे सरका दे । कव यत्री यह दखाना चाहती ह क अंग्रेज़ ने
राजाओं और नवाब को केवल हराया नह , उनक मान-मयादा को भी कुचला। यही ‘आहत अपमान’ आगे छं द 10
म वद्रोह का कारण बनकर लौटता है — “कु टय म थी वषम वेदना, महल म आहत अपमान”।

एक और अभ्यास: ‘ठु कराना’ से बने अन्य प्रयोग — ‘ठोकर खाना’ (हा न उठाकर सीखना), ‘ठोकर लगना’। इन
तीन के अथ अलग ह; अपने-अपने वाक्य बनाकर अंतर स्पष्ट क जए।

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प्र.4 4. “हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्ह तो/सोई ज्यो त जगानी थी” — इस पं क्त म आया मुहावरा ढूँ ढ़कर ल खए और उसका
प्रयोग करते हुए नया वाक्य बनाइए।

मुहावरा अथ नया वाक्य

सोई ज्यो त जगाना बुझी या भूली हुई चेतना, उत्साह अथवा आत्म-सम्मान को महा मा गांधी ने गाँव-गाँव घूमकर जनता की सोई
त्

फर से जाग्रत करना योित जगा दी।
ज्

यज्ञ प्रारंभ होना (साथ कसी बड़े और प वत्र सामू हक काय का आरंभ होना, िव ालय में व छता का य पारंभ हआ
स् च् ु तो हर
ज्ञ

आया प्रयोग) जसम सबको कुछ न कुछ त्यागना पड़ता है िव ाथ ने अपना िह सा उठाया।
स्

पं क्त म इसका बल: कव यत्री ने युद्ध के लए दो कोमल और प वत्र शब्द चुने — यज्ञ और ज्यो त। इससे दो बात
एक साथ सद्ध हो जाती ह। पहली, यह लड़ाई लूट या बदले के लए नह थी, ब ल्क एक प वत्र उ े श्य के लए थी
— यज्ञ म आहु त द जाती है, कुछ पाया नह जाता। दूसरी, दे श का स्वा भमान मरा नह था, केवल ‘सोया’ हुआ था
— उसे जगाना ही काम था। यही बात क वता के पहले छं द म भी है — “चमक उठ सन् सत्तावन म वह तलवार
पुरानी थी।” तलवार नई नह थी, पुरानी थी; ज्यो त नई नह थी, सोई हुई थी।

भाव-समान मुहावरे: ‘आँख खुलना’, ‘होश म आना’, ‘अलख जगाना’ — ‘अलख जगाना’ सबसे नकट है, पर
उसम ‘पुकारकर जगाने’ का भाव अ धक है।

प्र.5 5. “मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी” — इस पं क्त म आया मुहावरा ढूँ ढ़कर ल खए और उसका
प्रयोग करते हुए नया वाक्य बनाइए।

मुहावरा अथ नया वाक्य

धूम ज़ोरदार हलचल या खलबली मचा दे ना; चार ओर हमारी क ा की नाटक -मंडली ने वािषको सव में ऐसी धूम मचाई िक सब
क्ष त्

मचाना चचा फैला दे ना उसी की बात करते रहे।

पं क्त म इसका बल: यहाँ ‘धूम मचाना’ का अथ उत्सव वाला नह , वद्रोह क खलबली वाला है — इन तीन
नगर म अंग्रेज़ी शासन के वरुद्ध ज़बरदस्त हलचल मची। ध्यान द जए, इसी छं द क अगली पं क्त म कव यत्री शब्द
बदल दे ती ह — “जबलपुर, कोल्हापुर म भी कुछ हलचल उकसानी थी।” जहाँ वद्रोह प्रबल था वहाँ ‘भारी धूम’,
और जहाँ सी मत रहा वहाँ ‘कुछ हलचल’। मुहावरे का चुनाव भी ऐ तहा सक सच्चाई के अनुसार कया गया है —
यही कव यत्री क सावधानी है।

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मुहावरा और कहावत का अंतर: मुहावरा वाक्य का अंश होता है और वाक्य म ढलकर आता है (धूम मचाना →
धूम मचाई थी)। कहावत अपने आप म पूरा वाक्य होती है और उसका रूप नह बदलता, जैसे — ‘अकेला चना
भाड़ नह फोड़ता’। परीक्षा म यह अंतर अक्सर पूछा जाता है।

सृजन — पृष्ठ 189
अभ्यास › सृजन (पुस्तक म इस शीषक के ान पर केवल चह्न छपा है)

सृ ज न ले ख न

प्र.1 1. लक्ष्मीबाई क स खय काना तथा मंदरा क ओर से लक्ष्मीबाई को एक पत्र ल खए जसम काना तथा मंदरा
द्वारा ब्र टश हुकूमत के वरुद्ध युद्ध क रणनी त पर चचा क गई हो।

यह कल्पना-आधा रत पत्र-लेखन है। पहले दे ख ली जए क इसम क्या-क्या होना चा हए —

पत्र का ढाँचा — स्थान और त थ, संबोधन, वषय-वस्तु के दो-तीन अनु े द, समापन और भेजने वाल के नाम।
भाषा — स्वा मभ क्त और आत्मीयता दोन — काना और मंदरा रानी क स खयाँ भी ह और सै नक भी। इस लए ‘आप’ और
आदरसूचक क्रयाएँ, पर स्वर मत्रता का।
रणनी त ठोस हो — केवल ‘हम लड़गे’ लखना पयाप्त नह । दुग क रक्षा, रसद, गुप्तचर, म हला टु कड़ी, घोड़े — इन पर स्पष्ट
बात होनी चा हए।
क वता से जुड़ाव — क वता क बात पत्र म झलक — काना और मंदरा का साथ आना, ‘दुगा दल’, वॉकर से भड़ंत, कालपी-
ग्वा लयर क योजना।

नमूना उत्तर:

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झाँसी दुग, श वर संख्या 3
चैत्र मास, संवत् 1915 (सन् 1858)
पूज्य रानी सा हबा,
सादर प्रणाम। कल संध्या को जब आपने दुग क प्राचीर से पूरी सेना को दे खा था, तब आपके चेहरे पर जो शां त थी, वही हम दोन का बल है।
हम आपक स खयाँ ह, इस लए मन क बात बना डरे लख रही ह।
पहली बात — दुग क रक्षा क । अंग्रेज़ क तोप द क्षण क ओर से आ रही ह, क्य क उधर क द वार सबसे नीची है। हमारा सुझाव है क वहाँ
रात- दन पहरा बढ़ा दया जाए और द वार के भीतर म क एक और द वार खड़ी कर द जाए, ता क गोला लगने पर भी दरार पूरी न पड़े। पूव
द्वार पर हमारी म हला टु कड़ी रहेगी — बारूद, पानी और प याँ पहुँचाने का काम हम सँभालगी।
दूसरी बात — रसद और पानी क । घेराबंद लंबी चल सकती है। अनाज को एक ही स्थान पर मत रखवाइए; उसे तीन अलग-अलग तहख़ान
म बँटवा द जए। कुओं पर पहरा रहे, क्य क शत्रु सबसे पहले पानी पर ही आघात करता है।
तीसरी बात — सूचना क । हमने गाँव क चार स्त्रय को इस काम पर लगाया है। वे दूध और साग बेचने के बहाने शत्रु- श वर के पास तक
जाती ह और लौटकर बताती ह क तोप कहाँ ह और कतने घुड़सवार आए ह। स्त्रय पर कोई संदेह नह करता — यही हमारा सबसे बड़ा शस्त्र
है।
चौथी बात — नकलने के माग क । य द दुग टू टने लगे तो आप रु कएगा नह । उत्तर का छोटा द्वार खुला र खए और अपने साथ नया नह ,
परखा हुआ घोड़ा र खए। कालपी क ओर का रास्ता हमने दो बार दे ख लया है — नद -नाले कहाँ ह, यह हम कंठस्थ है। वहाँ पेशवा और
ताँ तया जी क सेना से मलकर हम फर संग ठत हो सकगी।
रानी सा हबा, हम यह जानती ह क शत्रु क सेना हमसे बड़ी है। पर हम यह भी जानती ह क जस भू म के लए हम लड़ रही ह, वह हमारी है
और उन्ह उसका रास्ता तक नह मालूम। हम अंत तक आपके साथ रहगी — रणभू म म भी और उसके बाद भी।
आपक सेवा म सदै व तत्पर,
काना और मंदरा

अपना पत्र लखते समय: इसे ज्य -का-त्य उतारने के बजाय अपनी एक-दो रणनी तयाँ जो ड़ए — जैसे घायल के
उपचार क व्यवस्था, बच्च और बूढ़ को सुर क्षत स्थान पर भेजना, या रात म मशाल क झूठ पं क्त जलाकर सेना
बड़ी दखाना। मौ लक वचार ही उत्तर को सबसे अ ा बनाता है।

प्र.2 2. युद्धपूव रा त्र म झाँसी क रानी के मन म अगले दन क संभावनाओं को लेकर कई तरह के भाव और वचार
उठ रहे ह गे। आपके जीवन म भी कई ऐसे क्षण आए ह गे जब आपने मान सक ऊहापोह का अनुभव कया होगा।
ऐसी कसी घटना के वषय म अपनी डायरी म ल खए, जैसे– परीक्षा के एक दन पूव क त या न वी कक्षा म
पहला दन आ द।

यह डायरी-लेखन है और यह आपका अपना अनुभव माँगता है। पहले जान ली जए क अ डायरी म क्या होता है —

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी
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तत्व क्या करना है

mऊपर बाईं ओर ल खए — डायरी क पहली पहचान यही है। as e
त थ, दन और
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समय
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aप्रथम ‘म’ म ल खए। डायरी अपने आप से क गई बात है, कसी को सुनाई गई कहानी नह ।

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ऊहापोह दखे ‘ऊहापोह’ का अथ है — मन का दो ओर डोलना। इस लए डायरी म दोन पक्ष आने चा हए — डर भी और भरोसा भी।

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केवल एक पक्ष लखने से वह ऊहापोह नह रहेगा।

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छोटे -छोटे ब्योरे
ag अधूरी पड़ी कताब — यही ब्योरे डायरी को सच्ची बनाते ह।
घड़ी क टक- टक, माँ क आवाज़,

अंत म एक
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डायरी प्रायः कसी छोटे -से नश्चय पर समाप्त होती है — जैसे ‘अब सो जाती हूँ’, ‘कल जो होगा दे खा जाएगा’।

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नणय

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नमूना उत्तर:.co a g l
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aglमंगलवार, 18 जून
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रात 11 बजकर 20 मनट

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कल मेरी नौव कक्षा का पहला दन है और न द है क आ ही नह रही।

सच पू छए तो बस्ता तैयार है — तैयार तो म नहgहूँl। a s
अभी-अभी बस्ता तीसरी बार जमाया है। नई कताब रख द , ज्या म त का डब्बा रख दया, फर लगा क पानी क बोतल ही रखनी भूल गई।

a
मन एक जगह टकता ही नह । कभी लगता है — अ ा ही तो है, नई कक्षा, नए वषय, वज्ञान क प्रयोगशाला। और अगले ही पल लगता है —

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नए शक्षक कैसे ह गे? कक्षा म मेरे साथ बैठने वाला कोई प र चत होगा भी या नह ? आठव म जो दो सहे लयाँ थ , वे दूसरे अनुभाग म चली गई

m .
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ह। अंग्रेज़ी क नई पुस्तक पलटकर दे खी तो लगा क आधे शब्द तो म जानती ही नह ।

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c न जाने क्य मन कुछ हल्का हो गया।
कही,.पर g l a
माँ अभी कमरे म आई थ । बत्ती बुझाते हुए बोल — “ जसे पढ़ना आता है, उसे कोई भी कक्षा क ठन नह लगती।” उन्ह ने बात बहुत सीधी

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aseअभी-अभी अपने आप से एक बात कही है, और वही यहाँ लख रही हूँ — डर इस लए लग रहा है क्य क कल का दन नया है, इस लए नह क
agl वह क ठन है। नया तो नौव कक्षा का पहला दन सबके लए होगा — मेरे लए भी, और उस लड़के के लए भी जो कल मेरे बगल म बैठेगा।

se m
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अब पानी क बोतल बस्ते म रखकर सो जाती हूँ। कल सबसे पहले जाकर तीसरी पं क्त क खड़क वाली सीट लूँगी — वहाँ से बोड भी दखता
है और बाहर का पीपल भी।
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क वता से जोड़कर सो चए: कव यत्री ने रानी के मन का ऊहापोह कह नह लखा — क वता म वे हमेशा नश्चय के

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साथ खड़ी दखती ह। पर सो चए, अगले दन क्या होगा यह तो उन्ह भी नह पता था। युद्ध के एक दन पहले उनके
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मन म भी दो धाराएँ रही ह गी — झाँसी बचेगी या नह , साथी टकगे या नह , बच्चे का क्या होगा। साहस का अथ डर

o m l a se
.cक वता से जोड़ती है — इसे अपनी डायरी क अं तम पं क्त म एक वाक्य कaे gरूप म जोड़ सकते ह।
का न होना नह है; साहस का अथ है डर के बावजूद वही करना जो करना चा हए। यही बात आपक डायरी को

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अपनी डायरी म: वही घटना चु नए जो सचमुच आपके साथ घट हो — परीक्षा से पहले क रात, पहली बार मंच पर
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. co agl
बोलने से पहले के मनट, या कसी मैच से पहले क सुबह। सच्ची घटना पर लखी दो पं क्तयाँ, गढ़े हुए दो पृष्ठ से

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बेहतर होती ह।

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ग त व धयाँ — पृष्ठ 190
अभ्यास › भाषा से संवाद › ग त व धयाँ (पुस्तक म इस शीषक के ान पर केवल चह्न छपा है)

ग त व धयाँ प्रस्तु त

प्र.1 शौय के समाचार — यह क वता रानी लक्ष्मीबाई के जीवन क घटनाओं, उनक वीरता और पराक्रम से हमारा
साक्षात्कार कराती है। क वता म व णत घटनाओं को एक समाचार-वाचक क तरह समाचार के रूप म प्रस्तुत
क जए। (संकेत– “आज झाँसी क रणभू म पर रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी अ त वीरता और शौय का प रचय
दया...।”)

यह प्रस्तु त क ग त व ध है। पहले जान ली जए क समाचार, क वता से कन बात म अलग होता है —

बदु क वता म समाचार म

भाषा अलंकार, रूपक, भावुक स्वर — ‘ सहनी’, ‘रण-चंडी’ सीधी, तथ्यपरक, बना अ तशयो क्त क भाषा

क्रम आरंभ से अंत तक कथा-क्रम सबसे नई और बड़ी बात सबसे पहले, फर ववरण

वाक्य लंबे, तुकांत, गेय छोटे , स्पष्ट, वतमान या भूतकाल म

ब्योरा भाव प्रमुख स्थान, समय, कौन, क्या, कैसे — पाँच प्रश्न के उत्तर

नमूना उत्तर — समाचार-वाचन क पूरी पटकथा (लगभग 3 मनट):

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी AglaSem · NCERT Solutions

[संकेत-धुन के बाद, वाचक सीधे बैठकर]
वाचक: नमस्कार। मुख्य समाचार के साथ म आपके सामने हूँ। आज के प्रमुख समाचार —
[शीषक — रुक-रुककर]
• झाँसी क रणभू म पर रानी लक्ष्मीबाई ने अ त वीरता का प रचय दया।
• ले टनट वॉकर घायल होकर पीछे हटा।
• रानी क सेना ने ग्वा लयर पर अ धकार कर लया; महाराजा स धया ने राजधानी छोड़ी।
• बुंदेलखंड के लोकगायक ने रानी क गाथा गाँव-गाँव पहुँचानी शुरू क ।
अब वस्तार से —
झाँसी से — आज झाँसी क रणभू म पर रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी अ त वीरता और शौय का प रचय दया। प्राप्त सूचना के अनुसार अंग्रेज़ी
सेना का नेतृत्व कर रहे ले टनट वॉकर जब अपने जवान के साथ आगे बढ़े , तो रानी ने स्वयं तलवार ख चकर उनका सामना कया। यह
मुक़ाबला बराबरी का नह था — एक ओर पूरी सेना, दूसरी ओर अकेली रानी। इसके बावजूद वॉकर घायल होकर पीछे हटने पर ववश हुए।
कालपी से — सूत्र के अनुसार रानी ने एक ही यात्रा म लगभग सौ मील क दूरी बना रुके तय क । इस यात्रा म उनका घोड़ा थककर गर पड़ा
और उसक मृत्यु हो गई। यमुना के तट पर हुई भड़ंत म अंग्रेज़ी सेना को फर पराजय का सामना करना पड़ा।
ग्वा लयर से — वजय के बाद रानी क सेना ने ग्वा लयर पर अ धकार कर लया है। अंग्रेज़ के मत्र माने जाने वाले महाराजा स धया राजधानी
छोड़कर चले गए ह। बताया जा रहा है क जनरल स्मथ क टु कड़ी को भी पीछे हटना पड़ा। रानी के साथ उनक स खयाँ काना और मंदरा भी
युद्धभू म म डट रह ।
पृष्ठभू म — उल्लेखनीय है क राजा गंगाधर राव के नधन के बाद अंग्रेज़ी शासन ने ‘व्यपगत नी त’ के अंतगत झाँसी को अपने राज्य म मला
लया था। रानी ने इस नणय को कभी स्वीकार नह कया।
संस्कृ त डेस्क से — बुंदेलखंड के लोकगायक ‘हरबोले’ इन घटनाओं को गीत म ढालकर गाँव-गाँव पहुँचा रहे ह। जानकार का कहना है क
आने वाले समय म यही गीत इस गाथा को जी वत रखगे।
वाचक: यही थे आज के प्रमुख समाचार। नमस्कार।

प्रस्तु त के सुझाव: (1) आवाज़ सम र खए — समाचार म उत्तेजना नह , स्पष्टता चा हए। (2) हर समाचार के बाद
एक सेकंड रु कए। (3) दो वद्याथ मलकर कर तो अ ा रहेगा — एक स्टू डयो म, दूसरा ‘रणभू म से’ रपोट दे ता
हुआ। (4) पीछे झाँसी के कले का चत्र या पोस्टर लगाया जा सकता है। (5) क वता क पं क्तयाँ सीधे मत बो लए
— उन्ह अपने शब्द म समाचार बनाकर क हए; यही इस ग त व ध का उ े श्य है।

प्र.2 ‘हरबोल ’ और हमारी कहानी — “बुंदेले हरबोल के मुँह हमने सुनी कहानी थी।” ‘हरबोला’ बुंदेलखंड क्षेत्र म रहने
वाले लोकगायक का एक समुदाय है जन्ह ने रानी लक्ष्मीबाई क वीरतापूण गाथा को अपने गीत के माध्यम से
जन-जन तक पहुँचाने का काम कया। भारत के व भन्न क्षेत्र म लोकगायक क एक लंबी और समृद्ध परंपरा रही
है। इनके द्वारा गाए जाने वाले गीत सामा जक, सांस्कृ तक और ऐ तहा सक मूल्य को संर क्षत करने का एक
जीवंत माध्यम ह। आपके क्षेत्र म अथवा आपक भाषा म भी ऐसे लोकगायक और उनके द्वारा गाए जाने वाले
दे शभ क्तपूण गीत अवश्य प्रच लत ह गे। ऐसे गीत का एक संकलन तैयार क जए और कक्षा म साझा क जए।

पहले टे क का महत्व सम झए — कव यत्री ने क वता म एक बार भी यह नह कहा क ‘मने पढ़ा’ या ‘इ तहास म लखा है’। वे हर
छं द के बाद दोहराती ह — “बुंदेले हरबोल के मुँह हमने सुनी कहानी थी।” यानी यह गाथा उन तक कताब से नह , लोकगायक के
मुँह से पहुँची। इसका बहुत बड़ा अथ है: अंग्रेज़ी शासन के दस्तावेज़ म इन वीर को ‘ वद्रोही’ लखा गया था — “ले कन आज जुम
कहलाती उनक जो कुरबानी थी”। सरकारी इ तहास चुप रह सकता था, पर लोकगीत चुप नह हुआ। इसी लए क वता कहती है
— “तेरा स्मारक तू ही होगी।” असली स्मारक पत्थर का नह , स्मृ त का होता है, और उस स्मृ त को हरबोल ने बचाया।

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संकलन कैसे तैयार कर — चरणबद्ध व ध —

1. ोत खो जए — घर के बुजग, गाँव के लोकगायक, मं दर या मेले म गाने वाले, ववाह-गीत गाने वाली म हलाएँ, वद्यालय क
संगीत- श क्षका, और जला पुस्तकालय क लोक-सा हत्य वाली अलमारी।
2. शष्टाचार से पू छए — गाने वाले से पहले अनुम त ली जए, फर ल खए या (अनुम त मले तो) रकॉड क जए। गाने वाले का
नाम, गाँव और उम्र अवश्य ल खए — यही संकलन को प्रामा णक बनाता है।
3. प्रत्येक गीत के साथ ल खए — गीत का मुखड़ा (पहली पं क्तयाँ), उसका वषय, कब और कस अवसर पर गाया जाता है,
कौन-सा वाद्य बजता है, और उसका अथ अपने शब्द म।
4. वग करण क जए — वीरगाथा-गीत, स्वतंत्रता संग्राम के गीत, ऋतु-गीत, संस्कार-गीत — इस तरह अलग-अलग खंड बनाइए।
5. प्रस्तु त — कक्षा म एक गीत गाकर या पढ़कर सुनाइए और बताइए क उसम कौन-सी ऐ तहा सक या सामा जक बात सुर क्षत
है।

नमूना संकलन-पृष्ठ (इसी प्रारूप म अपने गीत भ रए) —

क्रम गीत/गाथा क्षेत्र और गायक-परंपरा वषय

1 आल्हा (आल्हा- बुंदेलखंड — ‘आल्हैत’ गायक; वषा दो वीर भाइय क युद्ध-गाथा; इसी परंपरा से हरबोल का
ऊदल क गाथा) ऋतु म ढोलक के साथ गायन भी जुड़ा है

2 पंडवानी छत्तीसगढ़ — एकल गायन, तंबूरा के महाभारत क कथा, वशेषकर पांडव का पराक्रम
साथ

3 पाबूजी क फड़ राजस्थान — भोपा-भोपी; चत्र-पट लोकदे वता पाबूजी क वीरता और ब लदान
(फड़) के आगे रावणहत्था बजाकर

4 पोवाड़ा महाराष्ट्र — शाहीर परंपरा शवाजी और अन्य वीर क गाथाएँ — क वता का “वीर
शवाजी क गाथाएँ” इसी परंपरा क ओर संकेत करता है

5 बरहा पूव उत्तर प्रदे श और बहार वीरता, वरह और समाज क बात

6 आपके गाँव/क्षेत्र का गायक का नाम, गाँव, आयु िवषय और अवसर
गीत

यह ग त व ध क्य महत्वपूण है: लोकगीत बना कागज़ का इ तहास ह। वे पीढ़ -दर-पीढ़ कंठ से कंठ तक जाते
ह और उनम वह भी बच जाता है जो सरकारी अ भलेख म कभी दज नह हुआ — जैसे झलकारी बाई क कहानी,
जो पुस्तक के अनुसार आज भी “बुंदेलखंड क लोक स्मृ त का एक हस्सा है”। पर यह परंपरा तेज़ी से लुप्त हो रही
है, क्य क गाने वाले बूढ़े हो रहे ह और सुनने वाले कम। आपका संकलन उसी को बचाने क एक छोट -सी को शश
है।

सावधानी: गीत को अपनी भाषा म ‘सुधा रए’ नह । जैसा गाया गया, वैसा ही ल खए — बोली के शब्द ज्य -के-त्य
र खए और क ठन शब्द का अथ नीचे कोष्ठक म दे द जए। लोकगीत क असली श क्त उसक अपनी बोली म ही है।

भाषा संगम — पृष्ठ 190

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अभ्यास › भाषा से संवाद › भाषा संगम

भाषा सं ग म भारतीय भाषाएँ

प्र.1 “कानपूर के नाना क मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी।” — नीचे ‘बहन’ शब्द के लए सं वधान क आठव अनुसूची
म स म्म लत कुछ भारतीय भाषाओं म प्रयुक्त शब्द क सूची द गई है। इनके अ त रक्त य द आप ‘बहन’ शब्द
को कसी और भाषा म भी जानते ह तो उस भाषा म भी ल खए।

पुस्तक ने पृष्ठ 190 पर जो सूची द है, वह इस प्रकार है —

भाषा ‘बहन’ के लए शब्द भाषा ‘बहन’ के लए शब्द

हद बहन अस मया भनी, बाइ, बाइदे उ

संस्कृत भ गनी, स्वसृ: म णपुरी मचन, मनाओ

पंजाबी भण ओ ड़आ भउणी

उदू बहन, हमशीरा तेलुगू अक्कॅ, चेल्लेलु

कश्मीरी बैनी त मल तंगै, अक्का

सधी भेण मलयालम सहोद र, पेङ्ङळ्

मराठ बहीण कन्नड़ सोद र, अक्क, तं ग

गुजराती बहेन क कणी भयण

नेपाली बैनी, द द बांग्ला बोन, भ गनी

इनके अ त रक्त कुछ और भाषाओं/बो लय के शब्द (आप अपनी जानकारी के अनुसार और जोड़ सकते ह) —

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co m
m.
भाषा / बोली ‘बहन’ के लए शब्द

m as e
मै थली
.co
बिहन, दीदी
a g l
se m
g l a
भोजपुरी बिहन, दीदी
a
अवधी / ब्रज बिहनी, बिहन

. cबैoनm ag
em , बिहनी
बुंदेली

g l as
छत्तीसगढ़
a बिहनी, दीदी

बैन, बाई
co m
राजस्थानी (मारवाड़ी)

em.
com as
बहण, बेब
l
ह रयाणवी

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m
ase
अंग्रेज़ी sister

agl
s
सूची से एक सुंदर बात: ध्यान से दे खए तो अ धकांश शब्द क जड़ एक ही है — संस्कृत का ‘भ गनी’। उसी से
m a
.co agl
बना — बांग्ला ‘भ गनी’, ओ ड़आ ‘भउणी’, क कणी ‘भयण’, सधी ‘भेण’, पंजाबी ‘भण’, मराठ ‘बहीण’, गुजराती

a s em
agl बात यह क कई भाषाओं म दो शब्द ह — बड़ी बहन के लए अलग
‘बहेन’, हद ‘बहन’। दूसरी ओर द क्षण क द्र वड़ भाषाओं म एक अलग प रवार दखता है — त मल ‘अक्का’,
तेलुगू ‘अक्कॅ’, कन्नड़ ‘अक्क’। और तीसरी
और छोट के लए अलग (तेलुगू म अक्कॅ = बड़ी, चेल्लेलु = छोट ; कन्नड़ म अक्क = बड़ी, तं ग = छोट ; नेपाली म

co m
.
द द = बड़ी, बैनी = छोट )। हद म यह अंतर शब्द से नह , ‘बड़ी/छोट ’ जोड़कर बताया जाता है।

se m
o m l a
gक सगी बहन नह थ , मुँहबोली
m .c से जो ड़ए: इस पं क्त म ‘बहन’ शब्द वशेष है — लक्ष्मीबाई नाना साहब
a
aseबहन थ । यानी यह रश्ता जन्म का नह , स्नेह का था। भारत क लगभग हर भाषा म ऐसे मुँहबोले रश्त के लए भी
क वता

agl वही शब्द चलते ह — यही हमारी भाषाओं क साझी संस्कृ त है।

se m
com g l a
m . a
ase
प्र.2
थी।”)
agl
उपयुक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा म भी ल खए। (वाक्य — “कानपूर के नाना क मुँहबोली बहन ‘छबीली’

co m
m .
m as e
.co a g l
mरूप म दया गया है — इसे देखकर आप अपनी भाषा म ल खए।
यह प्रश्न आपक अपनी मातृभाषा माँगता है, इस लए उत्तर हर वद्याथ का अलग होगा। नीचे कुछ भाषाओं म यही वाक्य नमूने के

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ag
.c
s e m
m a
e m . co agl
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a

com
m .
m ase
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भाषा वाक्य

हद (मूल) कानपूर के नाना क मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी।

भोजपुरी कानपुर के नाना के मुँहबोली बिहन ‘छबीली’ रहली।

अवधी कानपुर के नाना कै मुँहबोली बिहनी ‘छबीली’ रही।

बुंदेली कानपुर के नाना की मुँहबोली बैन ‘छबीली’ हती।

मै थली कानपुरक नानाक मुँहबोली बिहन ‘छबीली’ छलीह।

मराठ कानपूर या नानांची मानले ल ी बहीण ‘छबीली’ होती.
च्

गुजराती कानपुरना नानानी मानेल ी बहेन ‘छबीली’ हती.

पंजाबी कानपुर दे नाना दी मूँहबोली भैण ‘छबीली’ सी।

बांग्ला कानपुरेर नानार पातानो बोन िछले न ‘छबीली’।

उदू कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी ं।

अं ेज़ी ‘Chhabili’ was the adopted sister of Nana of Kanpur.

आपकी मातभृ ाषा यहाँ अपनी भाषा में िलिखए

अनुवाद करते समय क्या ध्यान रख:

‘मुँहबोली’ का सही भाव लाइए। इसका अथ है — जन्म से नह , मान लेने से बना रश्ता। मराठ म
‘मानलेली’, गुजराती म ‘मानेली’, बांग्ला म ‘पातानो’ — हर भाषा का अपना शब्द है। शब्द-दर-शब्द अनुवाद
करने पर यह भाव मर जाता है।
क्रया का रूप बदलता है। हद का ‘थी’ भोजपुरी म ‘रहली’, अवधी म ‘रही’, मै थली म ‘छलीह’, मराठ म
‘होती’ हो जाता है।
नाम मत बद लए। ‘छबीली’ और ‘कानपूर’ नाम ह, इस लए हर भाषा म वैसे ही रहगे।

कक्षा म करने योग्य: कक्षा के हर वद्याथ से यही वाक्य उसक मातृभाषा म लखवाकर एक द वार-प त्रका
बनाइए। इससे पता चलेगा क एक ही कक्षा म कतनी भाषाएँ बैठ ह — और यही ‘भाषा संगम’ का उ े श्य है।

झरोखे से — झलकारी बाई — पृष्ठ 191 और 192

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अभ्यास › झरोखे से — ‘झलकारी बाई’ (पुस्तक म इस शीषक के ान पर केवल चह्न छपा है)

झरोखे से अ त रक्त पाठ

प्र.1 क वता म लक्ष्मीबाई क दो स खय ‘काना’ और ‘मंदरा’ का उल्लेख मलता है जो युद्धक्षेत्र म अंत तक लक्ष्मीबाई
के साथ रह । लक्ष्मीबाई क सहे लय म ऐसी ही एक और वीरांगना का नाम आता है, जनका नाम था ‘झलकारी
बाई’। … नीचे दए गए लेख को पढ़कर आप 1857 के स्वतंत्रता सं ाम म उनके योगदान के वषय म जान सकते
ह। — लेख के आधार पर बताइए क झलकारी बाई कौन थ और 1857 के स्वतंत्रता सं ाम म उनका क्या
योगदान रहा?

झलकारी बाई कौन थ — पुस्तक के लेख के अनुसार उनका जन्म 22 नवंबर 1830 को झाँसी के नकट भोजला गाँव म हुआ
था। वे एक सामान्य प रवार से थ और लेख के शब्द म “केवल अपनी दृढ़ता और साहस से प्रे रत थ ”, जो आगे चलकर एक
आदरणीय योद्धा बन । उन्ह ने बहुत कम उम्र म ही घुड़सवारी, अस्त्र-शस्त्र क कला और योद्धा क तरह लड़ना सीख लया था।
तीरंदाजी, कुश्ती और नशानेबाजी उन्ह ने अपने प त पूरन कोरी से सीखी, जो रानी लक्ष्मीबाई के प त राजा गंगाधर राव क सेना म
सै नक थे।
रानी से संबंध — वे प्रायः अपने प त के साथ शाही महल जाया करती थ । जब रानी लक्ष्मीबाई को उनक बहादुरी के बारे म पता
चला, तो दोन अ सहे लयाँ बन गईं। लेख एक वशेष बात बताता है — झलकारी बाई का शारी रक गठन और चेहरा रानी
लक्ष्मीबाई से मलता-जुलता था। यही समानता आगे चलकर इ तहास का रुख मोड़ दे ती है। उन्ह रानी क ‘दुगा दल’ नामक म हला
सेना म पद मला और वे प्रायः रानी क ओर से महत्वपूण नणय भी लया करती थ ।
1857 म उनका योगदान —

क्रम योगदान लेख का आधार

1 म हला टु कड़ी का नेतृत्व — सन् 1857 म जब सपा हय का वद्रोह उत्तरी और “झलकारी बाई को सेना क म हला टु कड़ी
मध्य भारत म फैला और सपाही रानी के समथन म एकत्र हुए, तब झलकारी बाई का नेतृत्व करने क जम्मेदारी स पी गई।”
को सेना क म हला टु कड़ी का नेतृत्व स पा गया।

2 कले क रक्षा — सन् 1858 म जब जनरल सर ह्य रोज क कमान म अंग्रेज़ी सेना “दोन ने उसका कड़ा प्र तरोध कया।”
ने झाँसी के कले पर हमला करके उसे घेर लया, तो झलकारी बाई और पूरन कोरी
दोन ने कड़ा प्र तरोध कया।

3 रानी का वेश धारण करना — उ होंने रानी को अपने ब चे के साथ महल छोड़ ने का
न् च् “उनक सरूपता ने अंग्रेज को भ्र मत कए
सुझाव िदया और वयं रानी ल मीबाई का वेश धारण करके से ना की कमान सँभाली
स् क्ष् रखा और उनक यह चाल लंबे समय तक
तथा अंगेज़ों से लड़ ी ं। काम करती रही।”

4 रानी को सुरि त िनकालना — अंगेज़ उनकी असली पहचान को ले क र अिनि चत
क्ष श् “उनक वजह से ही रानी लक्ष्मीबाई अपने
बने रहे और इसी कारण रानी ल मीबाई अपने बेटे के साथ महल से िनकल सकी ं।
क्ष् बेटे के साथ अपने महल से भाग सक ।”

5 प त के ब लदान के बाद भी लड़ती रह — उसी लड़ाई म पूरन कोरी अंग्रेज़ से लेख का चौथा अनु ेद
लड़ते हुए मारे गए। यह सुनकर झलकारी बाई क्रो धत हो गईं, उन्ह ने कई अंग्रेज़
सै नक को मार डाला और जमकर लड़ाई लड़ी।

स्मृ त — लेख के अनुसार उनक कहानी बुंदेलखंड क लोक स्मृ त का हस्सा है; उनके बहादुर करतब वहाँ क लोककथाओं म
बार-बार उभरकर सामने आते ह और उनके सम्मान म हर साल झलकारी बाई जयंती मनाई जाती है। ‘अमर शहीद’ झलकारी बाई
सन् 1890 तक जी वत रह और अपने समय क शौय क प्र तमू त बन गई थ ।

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ध्यान द जए: लेख का पहला ही वाक्य कहता है — “इ तहास के पन्न म लुप्त, यह एक महान योद्धा क कहानी
है।” यही इस ‘झरोखे’ का उ े श्य है — उन नाम क ओर ध्यान दलाना जो लखे हुए इ तहास से छू ट गए।

प्र.2 क वता ‘झाँसी क रानी’ और ‘झरोखे से’ म दए गए झलकारी बाई पर आधा रत लेख — दोन को साथ रखकर
बताइए क इनसे 1857 के स्वतंत्रता सं ाम म स्त्रय क भू मका के बारे म क्या समझ बनती है? दोन रचनाओं
क वधा और प्रस्तु त म क्या अंतर है?

1. स्त्रय क भू मका के बारे म क्या समझ बनती है —

स्त्रयाँ अपवाद नह थ । क वता म केवल रानी नह , काना और मंदरा भी लड़ती ह — “युद्ध क्षेत्र म उन दोन ने भारी मार
मचाई थी”। लेख म झलकारी बाई और पूरी ‘दुगा दल’ नामक म हला सेना का उल्लेख है। यानी एक स्त्री-योद्धा के पीछे स्त्रय
क एक पूरी टु कड़ी खड़ी थी।
वग क सीमा टू टती है। लक्ष्मीबाई रानी थ ; झलकारी बाई एक सामान्य प रवार से थ और उनके प त साधारण सै नक थे।
फर भी दोन क भू मका एक ही थी — दे श के लए लड़ना। यह भी ‘साझा संघष’ का ही उदाहरण है, जैसे क वता कहती है —
“महल ने द आग, झ पड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी।”
भू मका केवल लड़ने क नह थी। झलकारी बाई ने केवल तलवार नह चलाई — उन्ह ने रणनी त बनाई (रानी को नकल
जाने का सुझाव), वेश बदलकर शत्रु को भ्र मत कया और सेना क कमान सँभाली। यह बु द्ध, नेतृत्व और आत्म-ब लदान —
तीन का काम है।
प्र शक्षण से बनी वीरता। दोन रचनाओं म एक बात समान है — दोन स्त्रय ने बचपन म ही शस्त्र- वद्या सीखी थी। क वता
कहती है — “बरछ , ढाल, कृपाण, कटारी उसक यही सहेली थी”; लेख कहता है — “उन्ह ने बहुत कम उम्र म ही घुड़सवारी,
अस्त्र-शस्त्र क कला और एक योद्धा क तरह लड़ना सीख लया था।” यानी अवसर और अभ्यास मले, तो कोई भी स्त्री योद्धा
बन सकती है।
इ तहास ने सबको समान जगह नह द । रानी का नाम हर जगह है, पर झलकारी बाई “इ तहास के पन्न म लुप्त” रह और
उन्ह बचाया लोक स्मृ त ने। यही बात क वता क टे क भी कहती है — कहानी हम हरबोल से मली, दस्तावेज़ से नह ।

2. दोन रचनाओं क वधा और प्रस्तु त का अंतर —

बदु ‘झाँसी क रानी’ (क वता) ‘झलकारी बाई’ (लेख)

वधा कथात्मक क वता — वीर रस का गेय छं द, टे क के साथ सूचनात्मक गद्य — जीवनी-परक लेख

भाषा अलंकारमयी और ओजपूण — ‘ सहनी’, ‘रण-चंडी’, ‘वीर- सीधी और तथ्यपरक — जन्म- त थ, गाँव का नाम, घटनाओं
ग त’ का क्रम

त थयाँ प्रायः नह ; केवल ‘सन् सत्तावन’ और ‘तेइस क उम्र’ स्पष्ट — 22 नवंबर 1830, 1857, 1858, 1890

उ े श्य पढ़ने-सुनने वाले म जोश और गव जगाना एक भूली हुई योद्धा के वषय म जानकारी दे ना

प्रभाव गाया जा सकता है, इस लए याद रह जाता है और लोक तक प्रमाण दे ता है, इस लए तथ्य क दृ ष्ट से भरोसेमंद है
पहुँचता है

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नष्कष: दोन रचनाएँ एक-दूसरे को पूरा करती ह। क वता भाव दे ती है और लेख तथ्य। क वता से हम यह जोश
मलता है क लड़ना क्य ज़रूरी था; लेख से यह जानकारी मलती है क लड़ने वाले और भी थे, जनके नाम हम भूल
चुके ह। इसी लए पुस्तक ने क वता के बाद यह ‘झरोखा’ खोला है — ता क पाठक यह न मान ले क 1857 म केवल
एक स्त्री लड़ी थी।

करके दे खए: 1857 और उसके बाद क तीन और वीरांगनाओं के नाम खो जए — जैसे अवध क बेगम हज़रत
महल, ऊदा दे वी और रानी अवंतीबाई लोधी। हर एक पर पाँच वाक्य लखकर कक्षा म एक ‘वीरांगना भ त्त-पत्र’
तैयार क जए।

खोजबीन — पृष्ठ 192
अभ्यास › खोजबीन (पुस्तक म इस शीषक के ान पर केवल चह्न छपा है)

खोजबीन प रयोजना

प्र.1 नीचे द गई इंटरनेट क ड़य तथा पुस्तक के माध्यम से आप लक्ष्मीबाई तथा भारतीय स्वतंत्रता सं ाम क अन्य
वीरांगनाओं और राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मा नत बा लका कां त के अदम्य साहस के बारे म जानकारी प्राप्त
कर सकते ह— (पुस्तक म द गई क ड़याँ तथा ‘भारत क महान ना रयाँ’ ंखला क पुस्तक, प्रकाशन वभाग, नई
दल्ली द्वारा प्रका शत)

यह खोज-काय है। नीचे बताया गया है क कहाँ खोज, क्या खोज और खोज को कस रूप म लख।
1. कहाँ खोज

पुस्तक क अपनी क ड़याँ — पृष्ठ 192 पर नीले रंग म दो क ड़याँ छपी ह — एक ‘award-4677447’ से समाप्त होने वाला
पता (यह राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार से सम्मा नत बा लका कां त से संबं धत है) और दूसरा NCERT OFFICIAL का यू ूब
चैनल। इन्ह शक्षक या अ भभावक क उप स्थ त म खो लए।
पुस्तक — ‘भारत क महान ना रयाँ’ ंखला क पुस्तक, प्रकाशन वभाग, नई दल्ली — पुस्तक ने स्वयं यही ोत सुझाया
है। ये पुस्तक अ धकतर वद्यालय और ज़ला पुस्तकालय म मल जाती ह।
पाठ का QR कोड — पाठ के पहले पृष्ठ (पृष्ठ 176) पर बाईं ओर एक QR कोड छपा है जस पर 0901CH11 लखा है। उसे
स्कैन करके इस पाठ क अ त रक्त सामग्री तक पहुँचा जा सकता है।
वश्वसनीय ऑनलाइन ोत — NCERT के अपने मंच (ePathshala / DIKSHA), राष्ट्रीय अ भलेखागार और प्रकाशन
वभाग क ड जटल पुस्तक। कोई भी जानकारी लेने से पहले दे खए क प्रकाशक और लेखक का नाम दया गया है या नह ।

2. क्या-क्या खोज — एक जाँच-सूची

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कक्षा 9 हद अध्याय 11 झाँसी क रानी
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वषय क्या पता करना है

m a e पुत्र दामोदर राव,
sदत्तक
रानी
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.c झाँसी का हड़पा जाना, झाँसी क घेराबंद , कालपी और ग्वा लयर के अ भयान, 1858 मaवीरग
बचपन
l
g त। ध्यान द जए — उनके
का नाम (मनु/म णक णका), पता मोरोपंत ताँबे, बठू र म बचपन, गंगाधर राव से ववाह,

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लक्ष्मीबाई
m जन्म-वष पर इ तहासकार म मतभेद है (1828 या 1835); दे खए आपका ोत क्या कहता है और कस आधार पर।
g l a
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झलकारी बाई भोजला गाँव, ‘दुगा दल’, रानी का वेश धारण करना; बुंदेलखंड क लोककथाओं म उनक स्मृ त; उनके नाम पर बने

co m
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संग्रहालय और जयंती।

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ag लक्ष्मी सहगल। हर एक के लए — कब, कहाँ, कसके वरुद्ध, और कस बात के लए
अन्य बेगम हज़रत महल (अवध), ऊदा दे वी (लखनऊ), रानी अवंतीबाई लोधी (रामगढ़), रानी चेन्नम्मा ( कत्तूर), मातं गनी
वीरांगनाएँ हाज़रा और बाद के दौर क कैप्टन
याद क जाती ह।

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बा लका राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार कसे और कस आधार पर दया जाता है; कां त ने ऐसा क्या कया क उन्ह यह सम्मान मला;

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कां त पुरस्कार कस वष मला।

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राष्ट्रीय वीरता यह पुरस्कार बच्च को असाधारण साहस के लए दया जाता है। पता क जए क यह कब आरंभ हुआ, कौन दे ता है, और
पुरस्कार इस वष कन बच्च को मला।

सुभद्रा कुमारी
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वे स्वयं स्वतंत्रता सेनानी थ और दो बार जेल गईं। उनक अन्य क वताएँ — ‘वीर का कैसा हो वसंत’, ‘ज लयाँवाला बाग म
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चौहान वसंत’ — प ढ़ए और दे खए क उनम भी वही ओज है या नह । उनके सम्मान म जारी डाक टकट का चत्र खो जए।

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3. खोज को कस रूप म लख
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1. एक पृष्ठ, एक वीरांगना — ऊपर नाम और जीवन-काल, फर पाँच-छह वाक्य म प रचय, फर एक वाक्य म यह क उन्ह क्य
याद कया जाना चा हए।
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m a s emदेखने क त थ। यह आदत
2. ोत अवश्य ल खए — पुस्तक का नाम, लेखक/प्रकाशक और पृष्ठ; या वेबसाइट का नाम और

. co पढ़ाई म बहुत काम आएगी। a gl
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आगे क

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दो ोत से मलान क जए — य द दो ोत अलग-अलग त थ द, तो दोन लख द जए और नीचे टप्पणी कर द जए क
मतभेद है। यही सही ऐ तहा सक पद्ध त है।
4. कक्षा म प्रस्तु त — सब मलकर एक ‘1857 क वीरांगनाएँ’ नामक भ त्त-प त्रका बनाइए, जसम हर वद्याथ का एक पृष्ठ
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लगे और साथ म भारत का मान चत्र हो जस पर हर वीरांगना का क्षेत्र च ह्नत हो।
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इंटरनेट पर खोजते समय: (1) पहले सरकारी या शै क्षक ोत दे खए। (2) कसी एक जगह मली बात को तब
तक अं तम मत मा नए जब तक दूसरी जगह से उसक पु ष्ट न हो जाए। (3) चत्र और वी डयो लेते समय दे खए क
वे कस काल के ह — 1857 के समय के छाया चत्र बहुत कम ह; बाद म बने चत्र को उस समय का चत्र मान लेना
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भूल होगी।
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अध्याय — एक नज़र म
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seका जन्म सन् 1904 म उत्तर प्रदेश के प्रयागराज म हुआ और आरं भक शक्षा भी वह
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रचनाकार — सुभद्रा कुमारी चौहान
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agरचनाकार होने के साथ-साथ स्वतंत्रता सेनानी भी थ और इसी कारण उन्ह दो बार जेल जाना
हुई। वे अपने समय क प्र सद्ध
पड़ा। उन्ह ने अपनी क वताओं के माध्यम से जनमानस म राष्ट्रीय चेतना जगाई। प्रमुख रचनाएँ — मुकुल, त्रधारा (क वता

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages65
Languagehindi
Updated19 Sep 2026