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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 12: घर क याद
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — गंगा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
194 – 206 15 78 हन्द
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · हद · गं गा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 12: घर क याद
NCERT कक्षा 9 हद क पाठ्यपुस्तक गंगा के काव्य खंड के अं तम पाठ — पाठ 12 घर क याद — के सभी प्रश्न के पूरे हल। रचनाकार ह
भवानीप्रसाद मश्र (सन् 1913–1985), ‘गीत-फ़रोश’ के क व, जन्ह ने सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन म भाग लेने पर तीन वष का कारावास
भोगा और जेल म रहते हुए ही यह क वता लखी। वधा है गीतात्मक लंबी क वता — सहज बोलचाल क खड़ी बोली म लखा हुआ एक लंबा,
तुकांत, गाया जा सकने वाला पत्र, जो क व अपने पता और प रवार को सावन के बादल के हाथ भेज रहा है। पृष्ठ 194 से 206 तक अभ्यास के
सभी शीषक — रचना से संवाद (मेरे उत्तर मेरे तक, मेरी समझ मेरे वचार), वधा से संवाद (क वता का स दय, क वता क संरचना), वषय से
संवाद, सृजन, भाषा से संवाद (व्याकरण क बात, ग त व धयाँ, भाषा संगम), खोजबीन, शब्द-संपदा और अंत म साथ-साथ पढ़ (रामनरेश त्रपाठ
क क वता ‘तब याद तुम्हारी आती है’) — शीषक-दर-शीषक, प्रश्न-दर-प्रश्न हल कए गए ह। साथ म पूरी क वता क छं द-दर-छं द व्याख्या (सरल अथ,
भाव और शल्प) और पुस्तक क अधूरी ता लकाएँ — ‘ वशेषताएँ’ क सूची तथा ‘शब्द क व्याकर णक पहचान’ का पूरा अभ्यास — भरकर द गई
ह।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
गंगा (कक्षा 9) 194 – 206
खं ड प्रश्न
15 78
माध्यम
हन्द
क वता क व्याख्या (1) — पृष्ठ 195
काव्य खंड › पाठ 12 › ‘घर क याद’ — सरल अथ, भाव और शल्प
व्याख्या शल्प
प्र.1 “आज पानी गर रहा है, बहुत पानी गर रहा है, / रात-भर गरता रहा है, प्राण मन घरता रहा है,” — इन पं क्तय
का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — आज पानी बरस रहा है, और खूब बरस रहा है। रात-भर बरसता रहा है। और उसी के साथ-साथ मेरे प्राण और मन
भी रात-भर घरते रहे ह — याद और उदासी से।
भाव: क वता क पहली ही चार पं क्तय म क व ने बाहर और भीतर को एक साथ खोल दया है। बाहर पानी गर
रहा है, भीतर मन घर रहा है। दोन क्रयाएँ रात-भर चलती रही ह, दोन रुकने का नाम नह ले रह । जेल क कोठरी
म बंद आदमी के पास खड़क के बाहर दे खने के सवा कुछ नह है — इस लए बा रश ही उसक घड़ी है, बा रश ही
उसका साथी है, और अंत म बा रश ही उसका दुख बन जाती है। ‘प्राण मन’ दोन शब्द एक साथ रखकर क व बताता
है क यह घरना केवल सोचने का नह , पूरी दे ह-प्राण का घरना है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
शब्द-चमत्कार गरता / घरता — केवल एक ध्व न (ग/घ) का अंतर है, पर अथ बाहर से भीतर पलट जाता है। यही इस क वता क पूरी
यु क्त का बीज है।
पुनरु क्त ‘पानी गर रहा है’ तीन बार लौटता है — इससे बरसात क लगातार चलती रहने वाली ध्व न पं क्त म ही सुनाई दे ने लगती
है।
तुक गर रहा है – घर रहा है (चरणांत तुक)। पूरी क वता इसी तरह जोड़े-जोड़े म तुक मलाती चलती है।
भाषा एकदम सहज खड़ी बोली — एक भी क ठन शब्द नह । यही भवानीप्रसाद मश्र क ‘बातचीत जैसी क वता’ वाली शैली है।
ध्यान द जए: क वता म कह ‘जेल’ शब्द नह आया, फर भी पहली पं क्त से ही बंद होने का एहसास शुरू हो
जाता है — क्य क आदमी वह बैठा है और आकाश ही उसक एकमात्र खड़क है।
प्र.2 “अब सबेरा हो गया है, कब सबेरा हो गया है, / ठ क से मने न जाना, बहुत सोकर सफ माना— / क्य क बादल
क अँधेरी, है अभी तक भी घनेरी, / अभी तक चुपचाप है सब, रातवाली छाप है सब,” — इनका सरल अथ, भाव
और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — अब सबेरा हो चुका है — पर सबेरा कब हुआ, यह म ठ क से जान ही नह पाया। बहुत दे र सो लेने के कारण बस मान
लया क सुबह हो गई होगी। कारण यह है क बादल का अँधेरा अब तक उतना ही घना है; अब तक चार ओर चुप्पी है; हर चीज़ पर
अब तक रात क ही छाप लगी हुई है।
भाव: यह पूरे प्रसंग क सबसे मा मक बात है — बंद को सुबह होने का पता भी नह चलता। सुबह का सबसे बड़ा
प्रमाण होता है सूरज; बादल ने वह छ न लया है। सुबह का दूसरा प्रमाण होता है चहल-पहल; जेल म वह है ही नह ।
इस लए क व के पास सुबह जानने का एक ही सहारा बचता है — ‘बहुत सो लया, इस लए शायद सुबह हो गई’।
समय क यह अ न श्चतता ही आगे चलकर “आज का दन दन नह है” बनकर फूटती है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
वाक्य-रचना ‘अब सबेरा हो गया है’ और ‘कब सबेरा हो गया है’ — एक ही पं क्त को दोहराकर केवल पहला शब्द बदल दे ना। कथन
तुरंत प्रश्न म बदल जाता है और अ नश्चय पैदा हो जाता है।
बब दृश्य बब — बादल क घनी अँधेरी; और साथ ही श्रव्य बब का अभाव (‘चुपचाप है सब’), जो चुप्पी को स्वयं सुनाई दे ने
लायक बना दे ता है।
अलंकार ‘रातवाली छाप है सब’ — रात कोई ठप्पा नह होती, पर क व उसे ठप्पे क तरह लगी हुई बताता है; यह रूपक जैसा प्रयोग
है।
तुक और लय अँधेरी – घनेरी, चुपचाप है सब – छाप है सब। ‘अभी तक’ का दोहराव समय के ठहर जाने क लय पैदा करता है।
भाषा ‘घनेरी’, ‘रातवाली’ — बोलचाल के, लोक के शब्द। शब्द-संपदा म ‘घनेरा/घना’ का अथ दया गया है — गाढ़ा, गुंजान।
प्र.3 “ गर रहा पानी झरा-झर, हल रहे पत्ते हरा-हर, / बह रही है हवा सर-सर, काँपते ह प्राण थर-थर,” — इनका
सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — पानी झर-झर करता हुआ गर रहा है, पत्ते हर-हर करते हुए हल रहे ह, हवा सर-सर बह रही है — और (इस सबके
बीच) मेरे प्राण थर-थर काँप रहे ह।
भाव: इन चार पं क्तय म तीन पं क्तयाँ बाहर क प्रकृ त क ह और चौथी अचानक भीतर मुड़ जाती है। पानी, पत्ते
और हवा — तीन हल रहे ह; और उसी लय म क व के प्राण भी काँप रहे ह। यानी बाहर क हलचल क व के भीतर
उतर आई है। पाठ्यपुस्तक ने स्वयं इन्ह पं क्तय को उठाकर बताया है क यहाँ शब्द के चयन और संयोजन से
क वता म ध्वन्यात्मकता और नाद स दय क सृ ष्ट हुई है।
शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है
ध्वन्यात्मकता / नाद झरा-झर, हरा-हर, सर-सर, थर-थर — चार ध्व न-मूलक (अनुकरणात्मक) शब्द ह। पढ़ते ही बा रश, पत्त और हवा
स दय क आवाज़ कान म बजने लगती है। यह पुस्तक का अपना दया हुआ उदाहरण है।
अलंकार पुनरु क्त प्रकाश (एक ही शब्द का तुरंत दोहराव) और अनुप्रास — ‘ हल रहे … हरा-हर’, ‘बह रही है हवा’ म ‘ह’
क आवृ त्त।
संरचना तीन पं क्तयाँ प्रकृ त क , चौथी मन क — 3 + 1 का यह ढाँचा ही मा मकता पैदा करता है। य द चौथी पं क्त न होती
तो यह केवल वषा-वणन रह जाता।
बब श्रव्य बब (झरा-झर, सर-सर), दृश्य बब ( हलते पत्ते), और स्पश बब (काँपते प्राण) — तीन एक साथ।
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद
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परीक्षा के लए: ‘नाद स दय’ या ‘ध्वन्यात्मकता’ का उदाहरण पूछा जाए तो इसी छं द को उद्धत क जए — पुस्तक
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ने इसे ही चुना है।
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प्र.4 “बहुत पानी गर रहा है, घर नजर म तर रहा है, / घर क मुझसे दूर है जो, घर खुशी का पूर है जो, / घर क घर म
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चार भाई, मायके म ब हन आई, / ब हन आई बाप के घर, हाय रे प रताप के घर!” — इनका सरल अथ, भाव
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और शल्प स्पष्ट क जए।
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सरल अथ — खूब पानी बरस रहा है और उसी पानी म मेरा घर मेरी आँख के सामने तैरता-सा दखाई दे रहा है। वह घर जो मुझसे
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दूर है, वह घर जो खु शय से भरा हुआ है। वह घर जसम चार भाई ह, और जहाँ बहन मायके आई हुई है — बहन अपने पता के घर
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आई है, पर हाय! आज वह घर तो दुख से भरा हुआ घर है।
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em‘ तर रहा है’ शब्द पर रु कए। शब्द-संपदा म इसका अथ है — तैरना, उतराना। घर आँख म तैर रहा है, यानी
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वह ठहरा हुआ चत्र नह , बहता हुआ चत्र है — जैसे पानी पर कोई परछाईं डोलती हो। यही स्मृ त का स्वभाव है।
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coकmपाँचवाँ भाई जेल म है। ‘प रताप’ का अथ शब्द-संपदा म agl
और फर अं तम दो पं क्तय म एक ही घर के दो नाम आ जाते ह — ‘बाप के घर’ और ‘प रताप के घर’। बहन खुशी
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से मायके आई थी, पर घर म खुशी बची ही नह , क्य
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दया है — अत्य धक दुख, शोक।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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पक्ष
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अलंक.ार
agजो ‘खुशी का पूर’ है, वही ‘प रताप के
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अनुप्रास — ‘घर … घर … घर’ क लगातार आवृ त्त। साथ ही वरोधाभास —
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घर’ बन जाता है।
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तुक गर रहा है – तर रहा है; दूर है जो – पूर है जो; बाप के घर – प रताप के घर। तुक ही अथ को पलटने का औज़ार बन गई
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है।
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बब स्मृ त- बब — बरसते पानी के पद पर घर का तैरता चत्र। यह पूरी क वता का कद्र य बब है।
भाषा ‘पूर’ (भरपूरता, बाढ़), ‘ तर’ (तैरना) — दे शज-लोक शब्द, जनसे घर का अपनापन बना रहता है।
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m .c “आज का दन दन नह है, क्य क इसका छन नह है, / एक छन aसौgबरस है रे, हाय कैसा तरस है रे, / घर क
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प्र.5
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घर म सब जुड़े ह, सब क इतने कब जुड़े ह, / चार भाई चार ब हन, भुजा भाई प्यार ब हन,” — इनका सरल अथ,
भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
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सरल अथ — आज का दन दन जैसा लगता ही नह , क्य क इसका कोई क्षण बीतता ही नह । यहाँ एक क्षण सौ वष के बराबर हो
गया है — हाय, कैसी तरस खाने लायक हालत है! उधर घर म तो सब लोग जुड़े हुए ह — इतने लोग एक साथ पहले कब जुड़े थे!
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चार भाई और चार बहन — भाई घर क भुजाएँ (बल) ह और बहन घर का प्यार ह।
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भाव: जेल म समय रुक गया है और घर म समय भर गया है — यही वडंबना इन पं क्तय क जान है। ‘आज का
दन दन नह है’ कहकर क व तक को ही उलट दे ता है: दन तब दन होता है जब वह बीतता हो; यहाँ वह बीतता ही
नह । और ठ क उसी समय घर म सब इक े ह — पर वह जुड़ना खुशी का नह , चता का जुड़ना है। ‘भुजा भाई प्यार
ब हन’ एक ही साँस म प रवार क प रभाषा दे दे ता है — भाई ताकत ह, बहन स्नेह ह।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार वरोधाभास — ‘ दन दन नह है’। अ तशयो क्त — ‘एक छन सौ बरस है रे’। रूपक — ‘भुजा भाई’ (भाइय म भुजा
का आरोप)।
शब्द-प्रयोग छन = क्षण, क व क स्थानीय बोली का रूप। पुस्तक ने ‘व्याकरण क बात’ म इसी शब्द को उठाया है।
संबोधन-शैली ‘है रे’ का प्रयोग — जैसे क व कसी के सामने बैठकर बोल रहा हो। यही क वता क संबोधनात्मकता है।
तुक दन नह है – छन नह है; बरस है रे – तरस है रे; जुड़े ह – जुड़े ह (अनुप्रासयुक्त पुनरु क्त)।
प्र.6 “और माँ बन-पढ़ मेरी, दुख म वह गढ़ मेरी, / माँ क जसक गोद म सर, रख लया तो दुख नह फर, / माँ क
जसक स्नेह-धारा का यहाँ तक भी पसारा, / उसे लखना नह आता, जो क उसका पत्र पाता।” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — और मेरी माँ — जो पढ़ - लखी नह है, जो दुख म ही ढलकर बनी है। वह माँ, जसक गोद म एक बार सर रख दो
तो फर कोई दुख नह रहता। वह माँ, जसके स्नेह क धारा यहाँ (जेल) तक भी फैली हुई है। पर उसे लखना नह आता — वरना
उसका पत्र मुझे मलता।
भाव: पूरी क वता म यह सबसे चुपचाप टू टने वाला हस्सा है। क व माँ क तीन बात कहता है और तीन बना कसी
अलंकार-सजावट के — वह अनपढ़ है, वह दुख म गढ़ हुई है, और उसक गोद दुख मटा दे ती है। फर आ ख़री
पं क्त आती है और सब कुछ पलट दे ती है: माँ का प्यार जेल तक पहुँच जाता है, पर माँ क च नह पहुँच सकती,
क्य क उसे अक्षर ही नह आते। प्यार पहुँच सकता है, शब्द नह — इस एक वचार म उस समय के भारत क स्त्री-
शक्षा क स्थ त भी छपी है और बेटे क तड़प भी।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार रूपक — ‘स्नेह-धारा’ (स्नेह म धारा का आरोप) और उसका ‘पसारा’ होना। अनुप्रास — ‘माँ क जसक ’ क आवृ त्त।
शब्द-गठन ‘ बन-पढ़ ’ और ‘दुख म गढ़ ’ — तुक तो मलती ही है, अथ भी जुड़ जाता है: जसे कताब ने नह गढ़ा, उसे दुख ने गढ़ा है।
व्यंजना अं तम पं क्त सीधे यह नह कहती क ‘मुझे माँ का पत्र नह मलता’; वह घुमाकर कहती है — ‘उसे लखना नह आता, जो
क उसका पत्र पाता’। यही कहन क वता को साधारण कथन से ऊपर उठा दे ती है।
भाषा पूरी तरह घर क भाषा — ‘गोद’, ‘ सर रख लया’, ‘पत्र पाता’। कोई संस्कृत नष्ठ शब्द नह ।
प्र.7 “और पानी गर रहा है, घर चतु दक् घर रहा है, / पताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर, / पताजी
जनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नह व्यापा, / जो अभी भी दौड़ जाएँ, जो अभी भी खल खलाएँ,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — और पानी बरस रहा है, और घर मुझे चार ओर से घेरता जा रहा है। (उसी घर म) मेरे पताजी ह — भोले भी और
बहादुर भी; भुजाएँ जनक वज्र-सी कठोर ह और हृदय ताज़ा मक्खन-सा कोमल। वे पताजी, जन्ह बुढ़ापा एक क्षण के लए भी
नह छू सका; जो आज भी दौड़ पड़ते ह और आज भी खल खलाकर हँस दे ते ह।
भाव: यहाँ से क वता का सबसे लंबा और सबसे भरा हुआ चत्र शुरू होता है — पता का चत्र। और क व उसे
पहली ही पं क्त म एक वरोध पर खड़ा कर दे ता है: बाहर से वज्र, भीतर से नवनीत। शब्द-संपदा के अनुसार वज्र वह
है ‘ जस पर कसी का प्रभाव न पड़े’, और नवनीत का अथ है ‘ताजा मक्खन’। यानी पता क दे ह और उनका साहस
पत्थर-सा अटल है, पर हृदय इतना कोमल क ज़रा-सी बात पर पघल जाए। यही ‘भोले बहादुर’ का अथ है। आगे
क पं क्तयाँ बताती ह क उम्र ने उनके उत्साह म सध नह लगाई — वे आज भी दौड़ सकते ह, आज भी ब क
तरह खल खला सकते ह।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार रूपक — ‘वज्र-भुज’ (भुजाओं म वज्र का सीधा आरोप, कोई ‘जैसे’ नह )। उपमा — ‘नवनीत-सा उर’ (वाचक शब्द ‘सा’
मौजूद है)। दोन एक ही पं क्त म साथ-साथ।
वरोधाभास कठोरतम वस्तु (वज्र) और कोमलतम वस्तु (मक्खन) को एक ही व्य क्त म जोड़ दे ना। इसी से पता का बहुआयामी रूप
बनता है।
शब्द-चयन ‘व्यापा’ = फैला, असर कया। ‘बुढ़ापा … नह व्यापा’ — बुढ़ापे को कसी फैलने वाली चीज़ क तरह दखाना
मानवीकरण जैसा प्रभाव दे ता है।
तुक और लय बहादुर – उर; बुढ़ापा – व्यापा; दौड़ जाएँ – खल खलाएँ। ‘जो अभी भी’ का दोहराव पता क चुस्ती को दो बार रेखां कत
करता है।
शब्द-संपदा चतु दक् = चार ओर, चौखूँट। घर का ‘चतु दक् घरना’ बताता है क अब स्मृ त से बचकर नकलने का कोई रास्ता नह
बचा।
क वता क व्याख्या (2) — पृष्ठ 196
काव्य खंड › पाठ 12 › ‘घर क याद’ — सरल अथ, भाव और शल्प
व्याख्या शल्प
प्र.1 “मौत के आगे न हचक, शेर के आगे न बचक, / बोल म बादल गरजता, काम म झंझा लरजता,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — (मेरे पताजी ऐसे ह क) मौत के सामने भी हचकते नह , शेर के सामने भी सहमते नह । उनक बोली म बादल क -
सी गरज है और उनके काम म आँधी क -सी तेज़ी और थरथराहट है।
भाव: पछले छं द ने पता का हृदय दखाया था — मक्खन-सा; यह छं द उनका बाहरी व्य क्तत्व दखाता है —
नभय और वेगवान। ‘मौत’ और ‘शेर’ — डर के दो सबसे बड़े प्रतीक चुनकर क व कहता है क इनसे भी पता नह
डरते। फर उनक आवाज़ और उनके काम, दोन को प्रकृ त के दो प्रचंड रूप से जोड़ दया जाता है — बादल क
गरज और झंझा (आँधी) क लरज। ध्यान द जए क इन्ह दो चीज़ — बादल और हवा — से यह पूरी क वता बनी
है; क व ने पता को भी उन्ह के रूपक म गढ़ दया है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार अनुप्रास — ‘ब◌ोल म ब◌ादल’। रूपक/लक्षणा — बोल म बादल का गरजना, काम म झंझा का लरजना।
शब्द-संपदा झंझा = तेज हवा, आँधी-पानी। लरजता/लरजना = काँपना, हलना-डु लना, दहल जाना।
शब्द-युग्म ‘ हचक – बचक’ जैसे मलते-जुलते दे शज क्रया-रूप क जोड़ी। ‘ बचकना’ का अथ है डरकर सहम जाना या मुँह बना
लेना — बलकुल बोलचाल का शब्द।
संरचना दो पं क्तयाँ ‘नह ’ से (न हचक, न बचक) और दो पं क्तयाँ ‘है’ से — पहले डर का नषेध, फर श क्त का वधान। यही
संतुलन पता के व्य क्तत्व को गढ़ता है।
प्र.2 “आज गीता-पाठ करके, दं ड दो सौ साठ करके, / खूब मुगदर हला लेकर, मूठ उनक मला लेकर, / जब क नीचे
आए ह गे, नैन जल से छाए ह गे, / हाय, पानी गर रहा है, घर नजर म तर रहा है,” — इनका सरल अथ, भाव
और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — आज भी (रोज़ क तरह) पताजी ने गीता का पाठ कया होगा, दो सौ साठ दं ड लगाए ह गे, खूब मुगदर हलाए ह गे
और उनक मूठ आपस म मलाई ह गी। और फर जब वे (व्यायाम के बाद) नीचे उतरे ह गे, तब उनक आँख आँसुओं से भर आई
ह गी। हाय! (यहाँ) पानी बरस रहा है और घर मेरी आँख म तैर रहा है।
भाव: यह छं द पता क दनचया का चत्र है — और वह दनचया दो हस्स म बँट है: गीता-पाठ यानी आत्मा का
अभ्यास, और दं ड-मुगदर यानी दे ह का अभ्यास। इतना अनुशा सत, इतना कठोर व्य क्त — और फर अं तम मोड़
आता है: सब कुछ कर चुकने के बाद, जब कोई दे ख नह रहा, उनक आँख भर आती ह। क व यह नह कहता क
‘ पताजी रोए’; वह कहता है ‘नैन जल से छाए ह गे’ — यानी यह उसका अनुमान है, जेल म बैठे-बैठे लगाया गया
अनुमान। ‘ह गे’ शब्द ही इस पूरे हस्से क कुंजी है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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.c‘करके … लेकर … आए ह गे … छाए ह गे’ — पूरा छं द संभावनाथ (अनुमान) म है। कaवgघर देख नह सकता, इस लए
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m वह घर क कल्पना करता है। यही क वता क मूल यु क्त है।
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ब्योरे क ‘दं ड दो सौ साठ’ — गोल-मोल संख्या नह , ठ क संख्या। ऐसा ब्योरा ही स्मृ त को असली बना दे ता है।
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अलंकार
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अनुप्रास — ‘मुगदर … मूठ … मला’ म ‘म’ क आवृ त्त। तुक — करके–करके, लेकर–लेकर, ह गे–ह गे।
शब्द-संपदा
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मूठ = मु , दस्ता, कब्ज़ा। यहाँ मुगदर क मूठ। मुगदर = व्यायाम का भारी लकड़ी का उपकरण।
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टे क-सी पं क्त ‘पानी गर रहा है, घर नजर म तर रहा है’ पूरी क वता म बार-बार लौटती है — यह गीत क टे क क तरह काम करती है और
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हर बार पाठक को वतमान (जेल) म वापस ख च लाती है।
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“चार भाई चार ब हन, भुजा भाई प्यार ब हन, / खेलते या खड़े ह गे, नजर उनको पड़े ह गे।” — इनका सरल
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अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
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सरल अथ — चार भाई और चार बहन — भाई घर का बल ह और बहन घर का प्यार — वे खेल रहे ह गे या य ही खड़े ह गे, और
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पताजी क नज़र उन पर पड़ी होगी।
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.c यह छं द बहुत छोटा है, पर पूरे प्रसंग का पुल है। पता क आँख अभी भरaआई
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aseपर पड़ती ह — और तभी उन्ह याद आता है क एक और भी था, जो यहाँ नह है। क व यह बात कहता नह , अगले
भाव:
agl छं द के लए छोड़ दे ता है। ध्यान द जए क ‘चार भाई चार ब हन, भुजा भाई प्यार ब हन’ पं क्त दूसरी बार आ रही है
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का य अथ बदल जाना क वता का बड़ा कौशलcहैo।m a
— पहली बार यह घर क खुशी बताने आई थी, इस बार यह पता के दुख का कारण बनकर आई है। एक ही पं क्त
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शल्प का पक्ष a काम कर रहा है
पं क्त म कैसे
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पं क्तय का यही पं क्त-जोड़ी पृष्ठ 195 पर भी आ चुक है। ऐसा दोहराव गीत म टे क का काम करता है और भाव को गहरा करता
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दोहराव है।
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रूपक — ‘भुजा भाई’, ‘प्यार ब हन’। दोन म उपमेय पर उपमान a
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अनुमान-शैली ‘ह गे … ह गे’ — फर वही संभावना का रूप, जससे यह चत्र क व क कल्पना का होते हुए भी आँख दे खा लगता है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
प्र.4 “ पताजी जनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नह व्यापा, / रो पड़े ह गे बराबर, पाँचव का नाम लेकर,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — वही पताजी, जन्ह बुढ़ापा एक क्षण के लए भी नह छू पाया, आज लगातार रो पड़े ह गे — और रोते हुए अपने
पाँचव बेटे का नाम लेते रहे ह गे।
भाव: क व जान-बूझकर वही पं क्त दोहराता है जो उसने पता क ताकत बताने के लए लखी थी — ‘ पताजी
जनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नह व्यापा’। पहली बार यह गव क पं क्त थी; अब यह करुणा क पं क्त बन जाती है।
जस आदमी को उम्र नह झुका सक , उसे बेटे क याद ने झुका दया — यही इस क वता का सबसे बड़ा वार है।
‘बराबर’ शब्द का अथ है — लगातार, रुक-रुककर नह । और ‘पाँचव का नाम लेकर’ — नाम लेकर रोना, यानी दुख
का सबसे नजी रूप।
शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पं क्तय का ‘ पताजी जनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नह व्यापा’ का दूसरी बार आना — वही शब्द, उलटा भाव। यह क वता क
दोहराव सबसे प्रभावशाली संरचनात्मक यु क्त है।
व्यंजना क व कह ‘भवानी’ नह कहता, ‘पाँचव’ कहता है — जैसे बेटा अब घर म एक खाली जगह भर बनकर रह गया हो, नाम
भी दूर से लया जा रहा हो।
तुक बुढ़ापा – व्यापा; बराबर – लेकर।
प्र.5 “पाँचवाँ म ँ अभागा, जसे सोने पर सुहागा, / पताजी कहते रहे ह, प्यार म बहते रहे ह, / आज उनके स्वण बेटे,
लगे ह गे उन्ह हेटे, / क्य क म उन पर सुहागा बँधा बैठा ँ अभागा,” — इनका सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट
क जए।
सरल अथ — वह पाँचवाँ अभागा म ही हूँ, जसे पताजी हमेशा ‘सोने पर सुहागा’ कहते रहे ह और जसके लए वे प्यार म बहते रहे
ह। आज उन्ह अपने बाक सोने-जैसे बेटे भी कम (हेटे) लग रहे ह गे — क्य क उस सोने पर जो सुहागा था, वह अभागा तो यहाँ
(जेल म) बँधा बैठा है।
भाव: यहाँ क व ने एक मुहावरे को पूरे छं द क धुरी बना दया है — ‘सोने पर सुहागा’, यानी जो पहले से अच्छा है
उसे और नखार दे ने वाली चीज़। पता के लए बाक बेटे ‘सोना’ थे और यह पाँचवाँ बेटा उस सोने पर ‘सुहागा’। पर
आज वही सुहागा जेल म बँधा है, इस लए बाक सोना भी फ का पड़ गया है। ध्यान द जए क क व अपने लए बार-
बार ‘अभागा’ शब्द चुनता है — अपने पर गव नह करता, ब ल्क यह कहता है क मने घर को दुख दया। और यही
वनम्रता क वता को नारे से बचा लेती है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
मुहावरा सोने पर सुहागा — पहले सीधे अथ म ( पता का दुलार), फर उलटकर (‘म उन पर सुहागा बँधा बैठा हूँ अभागा’)। एक ही
मुहावरे से गव और पीड़ा दोन नकाल लेना बड़ी बात है।
अलंकार रूपक — ‘स्वण बेटे’। वरोधाभास — ‘सुहागा’ और ‘अभागा’ क तुक ही दो उलटे भाव को टकरा दे ती है।
शब्द-संपदा अभागा = भाग्यहीन। हेटे = तुच्छ, कमतर।
तुक अभागा – सुहागा – अभागा; रहे ह – रहे ह; बेटे – हेटे। तुक का यह जाल पूरे छं द को एक ही साँस म बाँध दे ता है।
प्र.6 “और माँ ने कहा होगा, दुख कतना बहा होगा / आँख म कस लए पानी, वहाँ अ ा है भवानी,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — और ( पताजी को रोते दे खकर) माँ ने कहा होगा — कतना दुख बह चुका, अब आँख म पानी कस लए? भवानी
वहाँ अच्छा है (उसे कोई तकलीफ़ नह है)।
भाव: क वता म यह वह क्षण है जहाँ माँ बोलती है — और पहली ही बात म वह पता को सँभाल लेती है। ध्यान
द जए क माँ के पास कोई प्रमाण नह है क बेटा ‘वहाँ अच्छा है’; वह यह बात इस लए कहती है क्य क घर को
टू टने से बचाना है। यह से माँ क भावनात्मक मजबूती का वह चत्र शुरू होता है जसे पुस्तक ‘मेरी समझ मेरे वचार’
म अलग से पूछती है। यह भी दे खए क माँ बेटे को उसके नाम — भवानी — से पुकारती है, जब क क व स्वयं को
‘पाँचवाँ’ कहता आया था। नाम माँ के मुँह म ही लौटता है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
ना ात्मकता यहाँ से क वता संवाद म बदल जाती है — माँ बोलती है, फर पता बोलते ह। लंबी क वता म यह बदलाव एकरसता तोड़ता
है।
आत्म- नदश क व अपना ही नाम ‘भवानी’ क वता के भीतर रख दे ता है — यह भ क्त-काव्य क छाप/भ णता जैसी परंपरा क याद
दलाता है, पर यहाँ यह माँ क पुकार बनकर आया है।
अलंकार लक्षणा — ‘दुख बहना’; दुख कोई बहने वाली वस्तु नह , पर आँसुओं के साथ जोड़कर उसे बहा दया गया है।
तुक कहा होगा – बहा होगा; पानी – भवानी।
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प्र.7 “वह तुम्हारा मन समझकर, और अपनापन समझकर, / गया है सो ठ क ही है, यह तुम्हारी लीक ही है,” — इनका
सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — (माँ पता से कहती है —) वह तो तुम्हारा ही मन समझकर, तुम्हारा ही अपनापन समझकर गया है। उसका जाना
ठ क ही है, क्य क यह तो तुम्हारी ही बनाई हुई लीक (राह) है।
भाव: यह क वता का सबसे बड़ा वैचा रक मोड़ है। माँ पता को ढाढ़स ही नह बँधा रही — वह उन्ह याद दला रही
है क बेटा जस रास्ते पर गया है, वह रास्ता पता का ही दखाया हुआ है। ‘लीक’ का अथ है — प हये से बनी
लक र, बनी-बनाई राह, परंपरा। यानी दे श के लए जेल जाना इस घर क परंपरा है। इस एक पं क्त से बेटे का
कारावास अपराध नह , वरासत बन जाता है — और पता का रोना अपने ही आदश पर रोना ठहर जाता है।
स्वाधीनता आंदोलन के दन के हज़ार घर क यही स ाई थी।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
प्रतीक लीक — बैलगाड़ी के प हये से बनी लक र। खे तहर जीवन से लया गया प्रतीक, जो ‘परंपरा’ जैसे बड़े वचार को घर क
भाषा म उतार दे ता है।
तक-शैली माँ भावुक होकर नह , तक दे कर पता को चुप कराती है — ‘गया है सो ठ क ही है’। अनपढ़ माँ क यह ता ककता क वता
का सबसे सुंदर वरोधाभास है।
अलंकार अनुप्रास — ‘समझकर … समझकर’ क पुनरु क्त। तुक — ठ क ही है – लीक ही है।
प्र.8 “पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता, / इस तरह होओ न क े, रो पड़गे और ब े,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — (माँ कहती है —) अगर वह पाँव पीछे हटा लेता, तो मेरी कोख को ल त करता। इस तरह कमज़ोर मत प ड़ए —
नह तो बाक ब े भी रो पड़गे।
भाव: यह पूरी क वता म माँ का सबसे मज़बूत वाक्य है, और इसे एक अनपढ़ स्त्री बोल रही है। पहली पं क्त म वह
अपने ही बेटे के लए कहती है क अगर वह डरकर पीछे हट जाता तो मेरी कोख कलं कत होती — यानी वह बेटे के
जेल जाने को अपनी माँ होने क साथकता मानती है। दूसरी पं क्त म वह और आगे जाती है: वह अपने दुख क बात
ही नह करती, वह बाक ब क चता करती है — ‘आप टू टगे तो ये भी टू ट जाएँगे’। यही स ी भावनात्मक
मजबूती है — अपना दुख पी जाना और दूसर को सँभालना।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
शब्द-चयन ‘कोख’ — स्त्री-जीवन का सबसे नजी शब्द, और उसे दे श-भ क्त क कसौट बना दे ना। ‘क े’ — बलकुल घरेलू शब्द,
जसका अथ है कमज़ोर, अधपका।
अलंकार लक्षणा — ‘पाँव पीछे हटाना’ (मुहावरा) और ‘कोख लजाना’। तुक — हटाता – लजाता; क े – ब े।
संवाद-शैली पूरा छं द माँ के मुँह से बोला गया है, इस लए इसम आदे श (‘होओ न क े’) और चेतावनी (‘रो पड़गे और ब े’) दोन ह —
बलकुल जैसे घर म माँ बोलती है।
भाव-संयम माँ एक बार भी ‘मुझे दुख है’ नह कहती। क वता क ताकत इसी अनकहे म है।
क वता क व्याख्या (3) — पृष्ठ 197
काव्य खंड › पाठ 12 › ‘घर क याद’ — सरल अथ, भाव और शल्प
व्याख्या शल्प
प्र.1 “ पताजी ने कहा होगा, हाय, कतना सहा होगा, / कहाँ, म रोता कहाँ ँ, धीर म खोता, कहाँ ँ,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — (माँ क बात सुनकर) पताजी ने कहा होगा — हाय, उस बेचारे ने कतना सहा होगा! और फर तुरंत सँभलकर कहा
होगा — कहाँ, म कहाँ रो रहा हूँ? म अपना धीरज कहाँ खो रहा हूँ?
भाव: यह चार पं क्तय का एक पूरा नाटक है। पहली दो पं क्तय म पता का हृदय फूट पड़ता है — ‘ कतना सहा
होगा’। अगली दो पं क्तय म वही पता अपने आँसुओं से मुकर जाते ह — ‘कहाँ, म रोता कहाँ हूँ’। दो बार आया
हुआ ‘कहाँ’ ही सब कुछ कह दे ता है: जो आदमी सचमुच नह रो रहा होता, वह इतनी सफ़ाई नह दे ता। यही दुख को
छपाने क को शश आगे चलकर बेटे म भी दखाई दे गी — ‘और कहना मस्त हूँ म’। पता और पुत्र, दोन एक ही
तरह से रोते ह और एक ही तरह से इनकार करते ह।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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g … कहाँ हूँ … कहाँ हूँ’।
.c वक्रो क्त-सा प्रभाव — कथन का अथ उसके शब्द से उलटा है। साथ ही पुनरु क्त —a‘कहाँ
अलंकार
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aशब्द-संपदा धीर = जसका चत्त वच लत न हो, दृढ़, गंभीर। ‘धीर खोना’ यानी धैय छोड़ दे ना।
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संवाद-शैली छं द पूरा का पूरा पता क बोली म है, और उसम दो अलग स्वर ह — पहले टू टना, फर सँभलना। यही क वता क
ना ात्मकता है।
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कहा होगा – सहा होगा; कहाँ हूँg l a
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a – कहाँ हूँ (आवृ त्तमूलक तुक)।
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“ गर रहा है आज पानी, याद आता है भवानी, / उसे थी बरसात प्यारी, रात दन क झड़ी झारी,” — इनका सरल
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सरल अथ — ( पताजी कहते ह —) आज पानी बरस रहा है और भवानी क याद आ रही है। उसे तो बरसात बहुत प्यारी थी —
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रात- दन लगी रहने वाली झड़ी और झारी-सी बरसती धार उसे भाती थी।
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भाव: यहाँ क वता का दृ ष्टकोण पलट जाता है। अब तक बेटा घर को याद कर रहा था; अब पता बेटे को याद कर
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रहे ह — और याद का सूत्र वही है, बरसता पानी। जो बा रश जेल म बेटे को रुला रही है, वही बा रश घर म पता को
बेटे क याद दला रही है। एक ही वषा दो जगह, दो लोग को, एक ही स्मृ त से बाँध दे ती eहैm
omका संयोजन’ है, जसे पुस्तक क वता क वशेषता बताती है। agla
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agl शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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संरचना
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वषा यहाँ सेतु का काम कर रही है — वह जेल और घर को जोड़ने वाली एकमात्र साझा चीज़ है। इसी कारण आगे चलकर
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बादल ही संदेशवाहक बनता है।
अलंकार अनुप्रास — ‘झड़ी झ◌ारी’। शब्द-संपदा म झारी का अथ है — पानी परसने या हाथ-मुँह धुलाने का टोट दार बतन; यानी
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झारी से गरती लगातार पतली धार-सी बरसात।
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भाषा ‘झड़ी’ और ‘झारी’ — दोन लोक-जीवन के शब्द; ब्योरा इतना घरेलू है क चत्र आँख के सामने खड़ा हो जाता है।
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प्र.3 “खुले सर नंगे बदन वह, घूमता फरता मगन वह, / बड़े बाड़े म क जाता, बीज लौक का लगाता,” — इनका
सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — ( पताजी बेटे को याद करते ह —) खुले सर और नंगे बदन वह मस्ती म घूमता- फरता रहता था; बड़े बाड़े (घर से लगे
खेत/बगीचे) म चला जाता और वहाँ लौक के बीज बो आता था।
भाव: यह पूरी क वता का सबसे उजला और खुला हुआ चत्र है — और यह ठ क उस आदमी क याद है जो इस
समय एक बंद कोठरी म बैठा है। ‘खुले सर’, ‘नंगे बदन’, ‘घूमता फरता’ — तीन शब्द खुलेपन के ह; और क वता
का वतमान बंद का है। पाठक को यह वरोध कोई नह बताता, पर वह चुभे बना नह रहता। ‘लौक का बीज
लगाना’ जैसी छोट -सी बात याद रह जाना ही बताता है क पता ने बेटे को कतने ध्यान से दे खा था।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
बब दृश्य बब — बा रश म भीगता, बाड़े म घूमता युवक। यह ‘स्मृ त और दृश्य बब’ का सबसे अच्छा उदाहरण है।
व्यंजना खुलेपन के शब्द चुनकर, बना कहे, बंद होने क पीड़ा तीखी कर द गई है — यह व्यंजना है, कहा कुछ और गया, समझ
कुछ और आया।
व्याकरण पुस्तक ने ‘व्याकरण क बात’ म इसी पं क्त को लया है — ‘खुले’ ( वशेषण), ‘वह’ (सवनाम), ‘बदन’ (संज्ञा), ‘ फरता’
( क्रया)।
तुक बदन वह – मगन वह; जाता – लगाता।
प्र.4 “तुझे बतलाता क बेला ने फलानी फूल झेला, / तू क उसके साथ जाती, आज इससे याद आती,” — इनका
सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — ( पताजी माँ से कहते ह —) वह तुझे बताता था क फलाँ बेला के पौधे ने फूल दया है; और तू उसके साथ (दे खने)
चली जाती थी। इसी कारण आज उसक याद और भी आ रही है।
भाव: यह सबसे छोट -सी, सबसे मामूली स्मृ त है — और इसी लए सबसे स ी। बेटा माँ को बुलाकर एक खला
हुआ फूल दखाता था; माँ उसके साथ जाती थी। बड़ी बात नह , यही छोट -छोट बात ही घर होती ह। क व जानता है
क याद बड़े अवसर से नह , ऐसे ही टु कड़ से बनती है। ध्यान द जए क यहाँ पता माँ को ‘तू’ कहकर संबो धत कर
रहे ह — बलकुल घर क बोली।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
शब्द-संपदा बेला = एक सुगं धत फूल, मोगरा। फलानी/फलाना/फलाँ = कोई अमुक (व्य क्त या वस्तु)। दोन शब्द ‘व्याकरण क
बात’ म भी पूछे गए ह।
बब ाण बब — बेला क गंध; और दृश्य बब — फूल दखाने ले जाता बेटा।
भाषा क ‘फलानी’ जैसा बलकुल बोलचाल का शब्द क वता म य बैठ गया है क खटकता ही नह — यही लोकभाषा क
सहजता सहजता है।
प्र.5 “म न रोऊँगा — कहा होगा, और फर पानी बहा होगा, / दृश्य उसके बाद का रे, पाँचव क याद का रे,” — इनका
सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — ‘म नह रोऊँगा’ — पताजी ने ऐसा कहा होगा, और फर उनक आँख से पानी बह नकला होगा। उसके बाद का
दृश्य — पाँचव बेटे क याद का दृश्य — (कैसा रहा होगा!)
भाव: दो पं क्तय म एक पूरा मनुष्य खुल जाता है। संकल्प — ‘म न रोऊँगा’; और तुरंत उसका टू टना — ‘ फर पानी
बहा होगा’। बीच म ‘और’ के सवा कुछ नह है; क व कोई टप्पणी नह करता। यही उसका संयम है। तीसरी-चौथी
पं क्त म क व दृश्य को बीच म ही छोड़ दे ता है — ‘दृश्य उसके बाद का रे’ — जैसे आगे कहने क हम्मत न हो। यह
अधूरापन ही सबसे ज़्यादा बोलता है, और इसी से अगला छं द (भाई पागल, ब हन पागल…) शुरू होता है।
शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है
कहन ( शल्प) वाक्य को अधूरा छोड़ दे ना — यह अपूण क्त जैसा प्रभाव पैदा करता है। पाठक को स्वयं दृश्य पूरा करना पड़ता है।
संबोधनात्मकता ‘का रे … का रे’ — ‘रे’ का प्रयोग क वता को बोली हुई बात बना दे ता है, जैसे कोई पास बैठे मत्र से कह रहा हो।
अलंकार अनुप्रास और तुक — कहा होगा – बहा होगा; बाद का रे – याद का रे।
प्र.6 “भाई पागल, ब हन पागल, और अम्मा ठ क बादल, / और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला, / शम से
रो भी न पाएँ, खूब भीतर छटपटाएँ, / आज ऐसा कुछ हुआ होगा, आज सबका मन चुआ होगा।” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — भाई पागल-से हो रहे ह गे, बहन पागल-सी; और अम्मा तो बलकुल बादल ही बन गई ह गी (बरसती हुईं)। और भौजी
तथा सरला — वे तो सहज बहते पानी जैसी, सहज तरल ह। ये सब शम के मारे रो भी नह पाते ह गे, भीतर-ही-भीतर खूब छटपटाते
ह गे। आज कुछ ऐसा ही हुआ होगा — आज सबका मन टपक पड़ा होगा।
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भाव: यह पूरे घर का सामू हक चत्र है, और क व ने हर सदस्य को पानी के कसी न कसी रूप से जोड़ दया है —
अम्मा ‘ठ क बादल’, भौजी और सरला ‘सहज पानी सहज तरला’, और अंत म ‘सबका मन चुआ होगा’। यानी बाहर
जो बरसात हो रही है, वही घर के भीतर भी हो रही है। सबसे मा मक पं क्त है — ‘शम से रो भी न पाएँ, खूब भीतर
छटपटाएँ’। बड़े घर म दुख खुलकर रोया नह जाता; वह भीतर घुटता है। क व यही घुटन पकड़ता है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार रूपक — ‘अम्मा ठ क बादल’ (अम्मा म बादल का सीधा आरोप)। पुनरु क्त — ‘पागल … पागल’, ‘सहज … सहज’,
‘आज … आज’।
प्रतीक-संग त पूरे छं द म जल ही प्रतीक है — बादल, पानी, तरल, चुआ। वषा और आँसू एक हो जाते ह।
भाषा भौजी (भाभी) और चुआ (टपका) — क व क क्षेत्रीय बोली के शब्द; पुस्तक ने ‘चुआ’ को उदाहरण बनाकर ही ‘व्याकरण
क बात’ शुरू क है।
अनुमान-शैली ‘हुआ होगा … चुआ होगा’ — फर वही संभावना। क व दावा नह करता, केवल अनुमान लगाता है, और इसी वनम्रता से
चत्र और वश्वसनीय हो जाता है।
प्र.7 “अभी पानी थम गया है, मन नहायत नम गया है, / एक-से बादल जमे ह, गगन-भर फैले रमे ह,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — अभी पानी थम गया है, पर मन बहुत ज़्यादा भीग चुका है। एक जैसे बादल आकाश म जम गए ह और पूरे आकाश म
फैलकर टक गए ह।
भाव: यहाँ क वता म पहली बार ठहराव आता है — बा रश रुक गई है। पर क व तुरंत जोड़ दे ता है क बाहर पानी
थमा है, भीतर नह — ‘मन नहायत नम गया है’। यही इस क वता का स्थायी ढाँचा है: बाहर क हर घटना भीतर क
घटना बन जाती है। ‘एक-से बादल’ यानी एक जैसे, बना कसी दरार के — यह समरूपता आगे के छं द म ‘लीपे हुए
आँगन’ क उपमा तक ले जाती है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
शब्द-चमत्कार थम – नम क तुक ही अथ खोल दे ती है: बाहर थमना, भीतर नम होना। यह वही यु क्त है जो पहली पं क्त म ‘ गर – घर’
से शुरू हुई थी।
शब्द-संपदा नहायत = बहुत ज़्यादा, अत्य धक — उदू का बलकुल रोज़मरा शब्द, जो क वता क मली-जुली भाषा का उदाहरण है।
बब दृश्य बब — पूरे आकाश पर बछे एक-से बादल। यह चत्र अगले तीन छं द तक चलता है।
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प्र.8 “ढे र है उनका, न फाँक, जो क करन झुक-झाँक, / लग रहे ह वे मुझे य , माँ क आँगन लीप दे ज्य ;” — इनका
सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — बादल का इतना ढे र लगा है क कह कोई झरी या दरार नह बची, जससे झुककर सूरज क करण झाँक सक। वे
बादल मुझे ऐसे लग रहे ह जैसे माँ ने आँगन लीप दया हो।
भाव: यह पूरी क वता क सबसे सुंदर उपमा है। आकाश जैसी वराट चीज़ के लए क व ने कोई शास्त्रीय उपमान
नह चुना — उसने घर का आँगन चुना, और वह भी माँ के हाथ से लीपा हुआ आँगन। गोबर- म से लीपे आँगन क
सतह एक-सी, चकनी और बना दरार क होती है; बादल क चादर भी ठ क वैसी ही है। ध्यान द जए क आदमी
जेल म है, आकाश दे ख रहा है — और आकाश म भी उसे माँ ही दखाई दे ती है। पूरी क वता क कद्र य संवेदना —
घर क याद — इस एक उपमा म समट आई है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार उपमा — वाचक शब्द ‘ज्य ’ स्पष्ट रूप से मौजूद है (उपमेय = बादल, उपमान = लीपा हुआ आँगन, साधारण धम =
एकसार और चकना होना)।
अनुप्रास ‘ करन झुक-झाँक’ — ‘झ’ क आवृ त्त; साथ ही मानवीकरण, क्य क करन झुकती और झाँकती ह।
लोकध मता उपमान गाँव-घर से लया गया है — लीपा हुआ आँगन। यही भवानीप्रसाद मश्र क क वता को ‘घर क क वता’ बनाता है।
तुक न फाँक – झुक-झाँक; मुझे य – दे ज्य ।
प्र.9 “गगन-आँगन क लुनाई दशा के मन म समाई / दश- दशा चुपचाप है रे, स्वस्थ क लय छाप है रे” — इनका
सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — आकाश रूपी इस आँगन क सुंदरता दशाओं के मन म समा गई है। दस दशाएँ चुपचाप ह और चार ओर एक
स्वस्थ, संतु लत लय क छाप है।
भाव: पछले छं द म बादल ‘लीपा हुआ आँगन’ बने थे; इस छं द म क व उसी बब को आगे बढ़ाकर आकाश को सीधे
‘गगन-आँगन’ कह दे ता है। ‘लुनाई’ का अथ शब्द-संपदा म दया है — सुंदरता, सलोनापन। दशाएँ चुप ह,
वातावरण म ठहराव है — और यही ठहराव क व के भीतर भी उतर आया है। यह क वता का वह क्षण है जहाँ तूफ़ान
के बाद क शां त है; ठ क अगले छं द म यह शां त टू टेगी, जब एक पंछ बोलेगा।
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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ag होना और उनका ‘चुपचाप’
.c रूपक — ‘गगन-आँगन’ (गगन म आँगन का आरोप)। मानवीकरण — दशाओं का ‘मन’
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होना।
शब्द-संपदा लुनाई = सुंदरता, सलोनापन, फसल काटने क क्रया। यहाँ पहला अथ लागू है।
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लय ‘है रे … है रे’ क आवृ त्त गीत जैसा ठहराव दे ती है; ‘लय’ शब्द स्वयं पं क्त म आकर उसे और पुष्ट कर दे ता है।
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“झाड़ आँख बंद करके साँस सु स्थर मंद करके, / हले बन चुपके खड़े ह, क्ष तज पर जैसे जड़े ह” — इनका
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सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
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a सरल अथ — पेड़ अपनी आँख बंद करके, साँस को स्थर और धीमा करके, बना हले-डु ले चुपचाप खड़े ह — मानो क्ष तज पर
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जड़ दए गए ह ।
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भाव: यह क वता का सबसे सुंदर मानवीकरण है। पेड़ को आँख द गई ह, साँस द गई है — और वे ध्यान लगाए
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कसी साधक क तरह खड़े ह। बा रश थमने के बाद हवा भी रुक जाती है, इस लए पत्ते तक नह हलते; क व इसी
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दृश्य को साधना का रूप दे दे ता है। ध्यान द जए क आरंभ म यही पेड़ ‘ हल रहे पत्ते हरा-हर’ कहकर चंचल दखाए
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गए थे — अब वही स्थर ह। प्रकृ त के बदलते चत्र के साथ-साथ क व के मन क अवस्था भी बदलती चल रही है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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अलंकार मानवीकरण — पेड़ का आँख बंद करना और साँस मंद करना। उपमा — ‘ क्ष तज पर जैसे जड़े ह’ (वाचक शब्द ‘जैसे’
मौजूद)।
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s और आकाश मलते दखाई देते ह।
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शब्द-संपदा क्ष तज = वह स्थान जहाँ
बब दृश्य बब — नश्चल पेड़ क कतार; और भीतर से यह ध्यान/समा ध का बब भी है।
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“एक पंछ बोलता है, घाव उर के खोलता है, / आदमी के उर बचारे, कस लए इतनी तृषा रे,” — इनका सरल
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अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
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सरल अथ — (इस चुप्पी म) एक पंछ बोल se पड़ता है और वह आवाज़ हृदय के घाव को खोल देती है। अरे बेचारे आदमी के हृदय!
तुझम इतनी तृष्णा (चाह) आ खरag
कस लए है?
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
भाव: पूरे वातावरण क स्थरता को एक पंछ क आवाज़ तोड़ दे ती है — और उसी के साथ क व का सँभला हुआ
मन भी टू ट जाता है। जब चार ओर सन्नाटा हो, तब एक छोट -सी आवाज़ भी भीतर तक चली जाती है; क व इसे
‘घाव उर के खोलता है’ कहकर पकड़ता है। अं तम दो पं क्तय म क वता एकाएक व्य क्तगत से सावभौ मक हो
जाती है — अब बात केवल भवानी क नह , हर आदमी के हृदय क है: आदमी इतना चाहता ही क्य है, क हर चाह
उसे दुख दे जाए? यही प्रश्न आगे के छं द म और खुलता है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार रूपक — ‘उर के घाव’ (मन क पीड़ा म घाव का आरोप)। संबोधन — ‘आदमी के उर बचारे’, जहाँ क व सीधे हृदय को
पुकारता है।
शब्द-संपदा उर = हृदय, मन। तृषा = तीव्र इच्छा, अ भलाषा, लोभ, प्यास।
भाव- वस्तार छं द ‘म’ से चलकर ‘आदमी’ तक पहुँचता है — यही कसी नजी क वता को सावभौ मक बनाता है।
तुक बोलता है – खोलता है; बचारे – तृषा रे।
क वता क व्याख्या (4) — पृष्ठ 198 और 199
काव्य खंड › पाठ 12 › ‘घर क याद’ — सरल अथ, भाव और शल्प
व्याख्या शल्प
प्र.1 “तू जरा-सा दुख कतना, सह सकेगा क्या क इतना, / और इस पर बस नह है, बस बना कुछ रस नह है,” —
इनका सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — (अरे मन!) तू तो ज़रा-सा है — इतना बड़ा दुख भला कतना सह सकेगा? और इस दुख पर कसी का वश भी नह
चलता; और जस चीज़ पर वश न हो, उसम कोई रस भी नह रह जाता।
भाव: पछले छं द का प्रश्न — ‘आदमी के उर बचारे, कस लए इतनी तृषा रे’ — यहाँ आगे बढ़ता है। क व अपने ही
मन को ‘तू’ कहकर डाँटता और समझाता है। पूरी बात दो हस्स म है: पहला, मन छोटा है और दुख बड़ा; दूसरा, इस
दुख पर बस (वश) नह चलता। और क व एक गहरी बात जोड़ता है — जस पर वश न हो, उसम रस नह रहता;
यानी जीवन का स्वाद तभी है जब उस पर हमारा कुछ अ धकार हो। जेल म बंद आदमी के लए इससे स ी बात
और कोई नह हो सकती, क्य क उसके पास ‘वश’ ही सबसे कम है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
शब्द- बस (वश/अ धकार) और रस क तुक। यह ‘बस’ आगे चलकर ‘घर नह हूँ बस यही है / यह बस बड़ा बस है’ म फर लौटे गा
चमत्कार और अथ बदल लेगा — यह यमक जैसा प्रयोग है।
आत्म- क व अपने ही मन को ‘तू’ कहकर पुकारता है — इससे क वता म संबोधनात्मकता और आत्म-संवाद, दोन आ जाते ह।
संबोधन
प्रश्न-शैली ‘सह सकेगा क्या क इतना’ — प्रश्न पूछकर कहना, ता क उत्तर पाठक स्वयं दे । इससे पीड़ा और तीखी हो जाती है।
प्र.2 “हवा आई उड़ चला तू, लहर आई मुड़ चला तू, / लगा झटका टू ट बैठा, गरा नीचे फूट बैठा,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — हवा आई तो तू उड़ चला, लहर आई तो तू मुड़ चला; ज़रा-सा झटका लगा तो टू ट बैठा और नीचे गरकर फूट गया।
भाव: क व यहाँ अपने मन को पानी क एक बूँद या बुलबुले क तरह दे ख रहा है — जो हवा के साथ उड़ जाए, लहर
के साथ मुड़ जाए और एक ज़रा-से झटके से फूट जाए। यह मन क चंचलता और नाजकपन, दोन का चत्र है। बाहर
बरसात का पानी बह रहा है, और भीतर मन भी उसी पानी क तरह इधर-उधर डोल रहा है — प्रकृ त और भाव का
यही संयोजन इस क वता क खास पहचान है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार रूपक — मन म जल- बदु का आरोप, बना ‘जैसे’ कहे। अनुप्रास — ‘लहर … मुड़’, ‘लगा … झटका’ म समान ध्व नय
क आवृ त्त।
वाक्य-रचना चार पं क्तयाँ एक ही ढाँचे म — ‘(कारण) आया, तू (प रणाम) हो गया’। इस समानांतरता से मन क ववशता जल्द -
जल्द सामने आती है।
क्रया-युग्म उड़ चला – मुड़ चला, टू ट बैठा – फूट बैठा : संयुक्त क्रयाओं के ये जोड़े क वता को ग त दे ते ह।
प्र.3 “तू क प्रय से दूर होकर बह चला रे पूर होकर, / दुख भर क्या पास तेरे, अश्रु स चत हास तेरे!” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — तू अपने प्रय (घर/प रजन ) से दूर होकर बाढ़ क तरह भर-भरकर बह चला। क्या तेरे पास दुख के सवा कुछ भी
नह ? तेरी हँसी भी तो आँसुओं से स ची हुई है!
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भाव: ‘पूर’ का अथ है — भरपूर, बाढ़। दूर होते ही मन बाढ़ क तरह बहने लगा — यानी दूरी ने ही भावनाओं को
उमड़ा दया। और फर वह पं क्त आती है जो पूरी क वता का सार है — ‘अश्रु स चत हास तेरे!’ यानी तेरी हँसी भी
आँसुओं से स चकर उगाई गई है। आगे क व सचमुच हँसकर ही च भजवाएगा — ‘और कहना मस्त हूँ म’ —
और पाठक जानता होगा क वह हँसी कस चीज़ से स ची गई है। इस लए यह पं क्त आगे आने वाले पूरे संदेश क
पूव-सूचना है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार रूपक — ‘अश्रु स चत हास’ (हँसी को पौधे क तरह दखाकर आँसुओं से स चना)। वरोधाभास — आँसू और हँसी का
एक साथ आना।
शब्द-संपदा अश्रु = आँसू। हास = हँसने क क्रया, प्रसन्नता। दोन शब्द पुस्तक क शब्द-संपदा म दए गए ह।
संबोधन ‘तू … तेरे … तेरे’ — आत्म-संबोधन जारी है; क व अपने ही मन से बात कर रहा है।
प्र.4 “ पताजी का वेश मुझको, दे रहा है क्लेश मुझको, / दे ह एक पहाड़ जैसे, मन क बड़ का झाड़ जैसे,” — इनका
सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — पताजी का रूप (जो मेरी आँख के सामने आ रहा है) मुझे पीड़ा दे रहा है — वह दे ह जो पहाड़ जैसी है, और वह मन
जो बरगद के पेड़ जैसा है।
भाव: क व पता के दो चत्र दे ता है, दोन प्रकृ त से — पहाड़ और बरगद। पहाड़ यानी अटल, वशाल, अ डग;
बरगद यानी फैला हुआ, छाया दे ने वाला, गहरी जड़ वाला। दोन ही उपमान पता के बड़प्पन के ह। पर ध्यान द जए,
यह बड़प्पन ही क व को ‘क्लेश’ दे रहा है — क्य क ऐसे वशाल आदमी का रोना और भी असह्य लगता है। और
आगे के दो छं द इसी बरगद क उपमा को खोलकर पता क भावुकता तक ले जाएँगे।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार उपमा — दोन पं क्तय म वाचक शब्द ‘जैसे’ मौजूद है (दे ह : पहाड़ :: मन : बड़ का झाड़)।
शब्द-संपदा बड़ = बरगद, वट। क्लेश = दुख, पीड़ा। ‘बड़’ क व क स्थानीय बोली का शब्द है और ‘व्याकरण क बात’ म भी पूछा
गया है।
उपमान क अगले दो छं द इसी बरगद-उपमा को आगे बढ़ाते ह (पत्ता, धारा, टहनी, डाल, जड़) — इसे वस्तृत रूपक या ‘सांगरूपक-
योजना सी योजना’ कहा जा सकता है।
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प्र.5 “एक पत्ता टू ट जाए, बस क धारा फूट जाए, / एक हल्क चोट लग ले, दूध क न उमग ले,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — (बरगद ऐसा पेड़ है क) बस एक पत्ता टू ट जाए और उसम से दूध क धार फूट पड़े; ज़रा-सी हल्क चोट लगे और दूध
क पूरी नद उमड़ आए।
भाव: यह उपमा प्रत्यक्ष रूप से बरगद क है, पर वास्तव म पता क भावुकता क है। बरगद का पत्ता तो ड़ए तो
दूध-सा सफ़ेद रस नकल आता है — यह गाँव का हर ब ा जानता है। क व कहता है, पता भी ऐसे ही ह: दे ह पहाड़
जैसी, पर ज़रा-सी चोट लगते ही भीतर से स्नेह क धार फूट पड़ती है। यही पं क्त पुस्तक ने ‘मेरे उत्तर मेरे तक’ के
प्रश्न 5 म उठाई है और उसका सट क उत्तर है — पता क भावुकता। ‘हल्क चोट’ और ‘न ’ का अनुपात ही बताता
है क पता के भीतर कतना स्नेह भरा है।
शल्प का पक्ष पं क्त म कैसे काम कर रहा है
अलंकार अ तशयो क्त — एक हल्क चोट से ‘दूध क न ’ का उमड़ना। साथ ही यह पूरा छं द बरगद-रूपक का वस्तार है।
प्रतीक दूध = वात्सल्य, ममता। बरगद का सफ़ेद रस और पता का स्नेह — दोन एक हो जाते ह।
भाषा न — ‘नद ’ का लोक-रूप। क व जान-बूझकर शुद्ध रूप नह लेता, क्य क यहाँ बात घर के आदमी क हो रही है।
व्याकरण पुस्तक ने इसी पं क्त से ‘एक’ ( वशेषण), ‘फूट जाए’ ( क्रया) और ‘पत्ता’ (संज्ञा) क पहचान पूछ है।
प्र.6 “एक टहनी कम न हो ले, कम कहाँ क ख़म न हो ले, / ध्यान कतना फक्र कतनी, डाल जतनी जड़ उतनी!” —
इनका सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — (बरगद क ) एक टहनी भी कम न हो जाए — और कम होना तो दूर, उसम कह कोई टे ढ़ापन तक न आ जाए! उसे
कतना ध्यान रहता है, कतनी फ़क्र रहती है — जतनी उसक डाल ह, उतनी ही उसक जड़ भी ह।
भाव: बरगद क खा सयत यह है क उसक डाल से जटाएँ लटककर ज़मीन म उतरती ह और नई जड़ बन जाती ह
— इस लए जतनी डाल, उतनी जड़। क व इसी प्राकृ तक तथ्य से पता क बात कह दे ता है: पता क जतनी संतान
ह, उतनी ही उनक चताएँ ह; हर ब ा एक डाल भी है और एक जड़ भी। और वे चाहते ह क कसी डाल म कमी तो
दूर, ज़रा-सा टे ढ़ापन (ख़म) भी न आए। एक बेटे के जेल चले जाने पर पता क तड़प का कारण अब पूरी तरह समझ
म आ जाता है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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.c अन्यो क्त/ वस्तृत रूपक — कहा बरगद के बारे म गया है, समझाया पता के बारे म aगयाgहै। अनुप्रास — ‘कम … कम
अलंकार
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… कहाँ … ख़म’।
शब्द-संपदा ख़म = झुका हुआ, टे ढ़ा, वक्र, घुमाव।
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सूत्र-वाक्य ‘डाल जतनी जड़ उतनी!’ — कहावत जैसी छोट , कसी हुई पं क्त, जो पूरे छं द का नचोड़ है। ऐसा वाक्य क वता म दे र
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तक याद रह जाता है।
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m भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
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“इस तरह का हाल उनका, इस तरह का ख्याल उनका, / हवा, उनको धीर दे ना, यह नह जी चीर दे ना,” — इनका
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सरल अथ — पताजी क हालत ऐसी है, उनका सोचने का ढं ग ऐसा है। इस लए हे हवा! तुम उन्ह धीरज दे ना — उनका कलेजा
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चीर मत दे ना।
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भाव: यहाँ क वता म पहली बार प्रकृ त को संदेशवाहक बनाया जाता है। क व हवा को पुकारकर एक ही वनती
करता है — ‘धीर दे ना’, ‘जी चीर मत दे ना’। यानी मेरी खबर पहुँचाना, पर ऐसी नह जो उन्ह तोड़ दे । यह वनती आगे
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और गहरी होगी, जब क व सावन के बादल से यही बात कहेगा। ध्यान र खए क पुस्तक क भू मका भी यही कहती
है — क व सावन के बादल ारा प रवार को संदेश भेज रहा है और उससे आग्रह करता हैem
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co म न बताए और सांत्वना दे । gl
क वह उन्ह जेल के कष्ट
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संबोधनात्मकता ‘हवा, उनको धीर दे ना’ — नज व प्रकृ त को संबो धत करना। यही क वता क एक बड़ी वशेषता है, जसे पुस्तक ने
‘ वशेषताएँ’ क सूची म गनाया है।
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अलंकार मानवीकरण — हवा को धीरज दे ने और कलेजा चीरने वाला बना दे ना। दूत-योजना के कारण इसे संदेश-काव्य (दूत-
काव्य) क परंपरा से जोड़ा जा सकता है।
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मुहावरा ‘जी चीर दे ना’ — बोलचाल का मुहावरा, अथात् हृदय को असह्य पीड़ा दे ना।
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प्र.8 “हे सजीले हरे सावन, हे क मेरे पुण्य पावन, / तुम बरस लो वे न बरस, पाँचव को वे न तरस,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — हे सजे-धजे, हरे-भरे सावन! हे मेरे पुण्य और प वत्र सावन! तुम चाहे जतना बरस लो, पर वे (मेरे घरवाले) न बरस (न
रोएँ); वे अपने पाँचव बेटे के लए न तरस।
भाव: यह क वता क टे क है — यही चार पं क्तयाँ अंत म फर लौटती ह और क वता को समाप्त करती ह। यहाँ
क व सावन को दो बार संबो धत करता है और उसे ‘पुण्य पावन’ यानी प वत्र कहता है — क्य क वही उसका
इकलौता दूत है। पूरी वनती एक शब्द ‘बरसना’ के दो अथ पर टक है: बादल का बरसना और आँख का बरसना।
क व कहता है — बरसने का काम तुम कर लो, मेरे घरवाल को मत बरसने दो। इससे बड़ी और साद प्राथना कोई
नह हो सकती।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार यमक-सा प्रयोग — ‘बरस लो’ (वषा) और ‘वे न बरस’ (रोना), एक ही शब्द दो अथ म। अनुप्रास — ‘सजीले …
स◌ावन’, ‘प◌ुण्य पावन’। मानवीकरण — सावन को संबो धत करना।
संबोधनात्मकता दो बार ‘हे’ — यही क वता क संबोधनात्मकता का सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
टे क यह छं द क वता म दो बार आता है (पृष्ठ 198 और अंत म पृष्ठ 199) — गीत क टे क क तरह, जो पूरी क वता को एक
धुरी दे दे ता है।
भाषा ‘सजीले’, ‘हरे’ — सावन के लए ऐसे वशेषण, जो उसे कसी सजे-धजे जी वत व्य क्त जैसा बना दे ते ह।
प्र.9 “म मजे म ँ सही है, घर नह ँ बस यही है, / कतु यह बस बड़ा बस है, इसी बस से सब वरस है,” — इनका
सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — यह सही है क म मज़े म हूँ; बस इतना ही है क म घर पर नह हूँ। पर यह ‘बस’ बहुत बड़ा ‘बस’ है — इसी एक
‘बस’ के कारण तो सब कुछ बेस्वाद हो गया है।
भाव: पूरी क वता का सबसे चतुर और सबसे मा मक छं द यही है। क व पहले हल्के-से कहता है — ‘घर नह हूँ बस
यही है’, जैसे कोई मामूली-सी बात हो। और फर तुरंत उसी छोटे -से शब्द को उठाकर उसका वज़न बता दे ता है —
‘ कतु यह बस बड़ा बस है’। घर न होना कोई ‘बस इतनी-सी’ बात नह ; वही तो सब कुछ है। यहाँ क व दुख को बढ़ा-
चढ़ाकर नह कहता, ब ल्क उसे छोटा कहकर उसक असली ऊँचाई दखा दे ता है — इसी को कहन का संयम कहते
ह, और यही भवानीप्रसाद मश्र क पहचान है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार यमक — ‘बस’ शब्द एक ही छं द म तीन बार, हर बार अथ क छाया बदलकर (केवल इतना / यह सीमा / यह ववशता)।
अनुप्रास — बस–बस–बस– वरस।
शब्द-संपदा वरस = नीरस, अ प्रय, जी उबाने वाला, कष्टकर।
कहन अल्पो क्त (कम कहकर ज़्यादा कहना) — दुख को ‘बस इतना’ बताकर उसे और बड़ा कर दे ना।
प्र.10 “ कतु उनसे यह न कहना, उन्ह दे ते धीर रहना, / उन्ह कहना लख रहा ँ, उन्ह कहना पढ़ रहा ँ,” — इनका
सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — (हे सावन!) पर उनसे यह बात मत कहना; उन्ह बस धीरज दे ते रहना। उनसे कहना क म लख रहा हूँ, उनसे कहना
क म पढ़ रहा हूँ।
भाव: यहाँ से क वता का अं तम और सबसे लंबा हस्सा शुरू होता है — बादल को दया गया संदेश। और संदेश
का पहला ही वाक्य है — ‘यह न कहना’। यानी सबसे ज़रूरी बात वही है, जो कहनी नह है। क व जो कहलवाना
चाहता है, वे सब सामान्य, आश्वस्त करने वाली बात ह — लख रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ। जेल म पढ़ना- लखना उन दन
सचमुच स्वाधीनता सेना नय क दनचया थी, इस लए यह झूठ भी नह है — बस अधूरा सच है। और अधूरा सच
बोलने क यह को शश ही क वता को इतना मा मक बनाती है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
पुनरु क्त ‘कहना’ शब्द यहाँ से लगातार लौटता रहेगा — दस से अ धक बार। यह दोहराव संदेश क आतुरता पैदा करता है, जैसे कोई
जल्द -जल्द सब याद दला रहा हो।
नषेध-शैली ‘न कहना’ और ‘कहना’ का आमना-सामना — यही इस पूरे हस्से का ढाँचा है, और यही दुख छपाने क चेष्टा को उघाड़
दे ता है।
तुक न कहना – धीर रहना; लख रहा हूँ – पढ़ रहा हूँ।
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प्र.11 “काम करता ँ क कहना, नाम करता ँ क कहना, / चाहते ह लोग, कहना, मत करो कुछ शोक, कहना,” —
इनका सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — कहना क म काम करता हूँ, कहना क नाम कमा रहा हूँ; कहना क लोग मुझे चाहते ह; और कहना क आप लोग
कोई शोक मत क जए।
भाव: क व वही सब कहलवा रहा है जो एक बेटा माँ-बाप को सुनाना चाहता है — क वह व्यस्त है, प्र त ष्ठत है, लोग
उसे चाहते ह। ये बात झूठ नह ह, पर पूरी बात भी नह ह। पं क्त के अंत म हर बार ‘कहना’ लौटता है, जैसे कोई
बार-बार याद दला रहा हो — भूल मत जाना, यह भी कहना, वह भी कहना। और अं तम पं क्त म असली बात
नकल आती है: ‘मत करो कुछ शोक’। इतनी सारी बात असल म इसी एक वनती को ढाँपने के लए कही जा रही
ह।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
अलंकार पुनरु क्त प्रकाश — चार पं क्तय के अंत म ‘कहना’। यह क वता म टे क जैसा प्रभाव पैदा करता है।
लय हर पं क्त म ठहराव ठ क ‘कहना’ से पहले पड़ता है, इस लए पढ़ते समय बात अटक-अटककर, साँस लेकर कही जाती
लगती है — जैसे बोलने वाले का गला भरा हो।
तुक काम – नाम; लोग – शोक। छोट -छोट तुक बात को कहावत जैसी ग त दे ती ह।
प्र.12 “और कहना मस्त ँ म, कातने म व्यस्त ँ म, / वजन सत्तर सेर मेरा, और भोजन ढे र मेरा,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — और यह भी कहना क म मस्त हूँ, चरखा कातने म व्यस्त हूँ; मेरा वज़न सत्तर सेर है और मेरा भोजन भी भरपूर है।
भाव: अब क व ब्योरे दे ने लगता है — क्य क माँ-बाप को ब्योर से ही तसल्ली होती है। ‘वज़न सत्तर सेर’ (लगभग
65 कलो) और ‘भोजन ढे र’ — ये ठ क वही बात ह जो कोई माँ अपने बेटे से पूछती है। और ‘कातने म व्यस्त हूँ’
केवल भरोसा दलाने वाली बात नह , ऐ तहा सक सच भी है: गांधीजी के प्रभाव म स्वाधीनता सेनानी जेल म चरखा
कातते थे। इस एक शब्द से पाठक को याद आ जाता है क यह आदमी कसी अपराध म नह , दे श के लए बंद है।
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शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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ऐ तहा सक कातना = चरखे या तकली पर रुई से धागा नकालना (शब्द-संपदा)। यह गांधीवाद जेल- दनचया का संकेत है और
संदभ क वता को 1942 के आंदोलन से जोड़ दे ता है।
ब्योरे ‘सत्तर सेर’ — सेर तब का प्रच लत तौल (लगभग 933 ग्राम)। ठ क-ठ क संख्या दे ना ही घर वाल को भरोसा दलाने का
सबसे कारगर तरीका है।
अलंकार अनुप्रास — ‘मस्त … म’; तुक — मस्त हूँ म – व्यस्त हूँ म; सेर मेरा – ढे र मेरा।
व्यंजना जतनी ज़ोर दे कर वह अपनी भलाई बताता है, पाठक को उतना ही साफ़ दखता है क वह दुख छपा रहा है।
प्र.13 “कूदता ँ, खेलता ँ, दुख डटकर ठे लता ँ, / और कहना मस्त ँ म, य न कहना अस्त ँ म,” — इनका सरल
अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — (कहना क) म कूदता हूँ, खेलता हूँ और दुख को डटकर धकेल दे ता हूँ। और यही कहना क म मस्त हूँ — यह मत
कह दे ना क म डू बा हुआ (टू टा हुआ) हूँ।
भाव: इस छं द क जान है — ‘दुख डटकर ठे लता हूँ’। क व यह नह कहता क दुख नह है; वह कहता है क दुख को
डटकर धकेलता हूँ। यानी वह दुख को स्वीकार करता है और फर भी उससे लड़ता है। यही मनुष्य का संघषशील
स्वभाव है, और इसी पं क्त को पुस्तक ने ‘मेरी समझ मेरे वचार’ के प्रश्न 2 का आधार बनाया है। अं तम पं क्त म एक
बार फर वही नषेध है — ‘य न कहना अस्त हूँ म’। ‘अस्त’ का अथ है डू बा हुआ, समाप्त। बेटा कहलवा रहा है —
मुझे डू बा हुआ मत बताना।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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अलंकार यमक-सा तुक-प्रयोग — ‘मस्त’ और ‘अस्त’; एक ही ध्व न-ढाँचे म दो बलकुल उलट अवस्थाएँ।
शब्द-संपदा अस्त = डू बा हुआ, समाप्त, (सूय-चंद्र का) डू बना, पतन, अंत।
क्रया-चयन ‘ठे लता हूँ’ — ठे लना यानी ज़ोर लगाकर धकेलना। दुख को हटाना नह , धकेलना — इससे लगातार चलते रहने वाले संघष
का बोध होता है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद
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“हाय रे, ऐसा न कहना, है क जो वैसा न कहना, / कह न दे ना जागता ँ, आदमी से भागता ँ,” — इनका सरल
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प्र.14
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अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
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सरल अथ — हाय! ऐसा मत कह दे ना; जो हालत सचमुच है, वैसा मत कह दे ना। यह मत कह दे ना क म (रात को) जागता रहता हूँ
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और आद मय से दूर भागता हूँ।
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ag है। सचाई यह है क वह रात-भर जागता है और लोग से कटा-कटा
भाव: अब तक क व यह बताता आया था क क्या-क्या कहना है; यहाँ वह वह बात कह दे ता है जो कहनी नह है
— और इसी म उसका सारा सच खुल जाता
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रहता है। ध्यान द जए क क वता क पहली ही पं क्त थी — ‘रात-भर गरता रहा है, प्राण मन घरता रहा है’; तब
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यह बात दृश्य के रूप म आई थी, अब वह स्वीकार बनकर आई है। मना करते-करते सब कह दे ना — यह इस क वता
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क सबसे बारीक यु क्त है।
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शल्प पं क्त म कैसे काम कर रहा है
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कहन नषेध के रूप म स्वीकार — ‘यह मत कहना’ कहकर वही बात कह दे ना। इससे पाठक तक सच पहुँच जाता है और
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घरवाल तक नह ।
संबोधन a g l
‘हाय रे’ — पीड़ा का सहज उ ार, जो पूरी क वता म जगह-जगह लौटता है (‘हाय रे प रताप के घर!’, ‘हाय कैसा तरस है
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रे’)।
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तुक न कहना – न कहना; जागता हूँ – भागता हूँ।
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प्र.15 “कह न दे ना मौन ँ म, खुद न समझूँ कौन ँ म, / दे खना कुछ बक न दे ना, उन्ह कोई शक न दे ना,” — इनका
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सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
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सरल अथ — यह भी मत कह दे ना क म चुप्पी साधे रहता हूँ, क म खुद ही नह समझ पाता क म कौन हूँ। दे खना, कह कुछ बक
मत दे ना — उन्ह ज़रा-सा भी शक मत होने दे ना।
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भाव: यह बेटे क स्वीकारो क्त क अं तम सीढ़ है और सबसे गहरी भी। पहले उसने माना क वह जागता है और
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agla कौन हूँ म’। कारावास क सबसे बड़ी चोट यही होती है: आदमी अपने आप से भी कट जाता है। और इतना कह
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चुकने के बाद भी उसक आ ख़री चता वही है — ‘उन्ह कोई शक न दे ना’। अपने टू टने से ज़्यादा उसे घरवाल के
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दुखी होने क फ़क्र है। यही इस क वता का त्याग है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
भाषा ‘बक न दे ना’ और ‘शक’ — बलकुल रोज़मरा के, बोलचाल के शब्द। कसी बड़े दुख को इतने साधारण शब्द म कहना ही
इस क वता क ताकत है।
अलंकार अनुप्रास — ‘मौन हूँ म – कौन हूँ म’; ‘बक न दे ना – शक न दे ना’। तुक इतनी सट क है क पं क्त अपने आप याद रह जाती
है।
आत्म-प्रश्न ‘खुद न समझूँ कौन हूँ म’ — पहचान का संकट। क वता यहाँ घर क याद से आगे बढ़कर अ स्तत्व का प्रश्न छू लेती है।
प्र.16 “हे सजीले हरे सावन, हे क मेरे पुण्य पावन, / तुम बरस लो वे न बरस, पाँचव को वे न तरस।” — क वता के
अंत म आई इन पं क्तय का सरल अथ, भाव और शल्प स्पष्ट क जए।
सरल अथ — हे सजे-धजे, हरे-भरे सावन! हे मेरे पुण्य और प वत्र सावन! तुम चाहे जतना बरस लो, पर मेरे घरवाले न बरस (न
रोएँ), वे अपने पाँचव बेटे के लए न तरस।
भाव: क वता ठ क वह आकर बंद होती है जहाँ से उसका संदेश-भाग शुरू हुआ था — वही चार पं क्तयाँ,
अक्षरशः। पर अब उनका असर बदल चुका है, क्य क बीच म हम बहुत कुछ जान चुके ह: क व जागता है, आद मय
से भागता है, चुप हो गया है, खुद को पहचान नह पाता। इतना सब जानने के बाद जब वह फर वही प्राथना दोहराता
है, तो वह प्राथना दुगुनी भारी हो जाती है। यही टे क के लौटने का जादू है। और क वता का अं तम शब्द ‘तरस’ है —
पूरी क वता एक तरसने वाले घर क क वता है, इस लए यही शब्द अंत म गूँजता रह जाता है।
शल्प का पं क्त म कैसे काम कर रहा है
पक्ष
संरचना चक्र य संरचना — क वता जस टे क से मुड़ी थी, उसी टे क पर लौटकर बंद होती है। गीत-परंपरा क यही री त है।
अलंकार यमक-सा प्रयोग — ‘बरस लो’ / ‘न बरस’। अनुप्रास — ‘पुण्य पावन’। मानवीकरण और संबोधन — सावन को
व्य क्त क तरह पुकारना।
भाव-संयम क वता कसी शकायत, नारे या क्रोध के साथ नह , एक प्राथना के साथ खत्म होती है — और वह प्राथना भी अपने लए
नह , घरवाल के लए है।
मेरे उत्तर मेरे तक — पृष्ठ 199 और 200
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
अभ्यास › रचना से संवाद › मेरे उत्तर मेरे तक
रचना से सं वाद मे रे उत्तर मे रे तक
प्र.1 नम्न ल खत प्रश्न के सट क उत्तर चु नए और यह भी बताइए क आपको ये उत्तर उपयुक्त क्य लगते ह? 1.
भवानीप्रसाद मश्र ने यह क वता कहाँ और क्य लखी? (क) वदे श से मत्र के लए (ख) युद्धभू म से जनता के
लए (ग) जेल से प रवार के लए (घ) यात्रा से कसी संबंधी के लए
सट क उत्तर — (ग) जेल से प रवार के लए।
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पाठ के आरंभ म पुस्तक ने स्वयं यह जानकारी द है — भवानीप्रसाद मश्र ने सन् 1942
के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ म स क्रय भाग लया, जसके चलते ब्र टश सरकार ने उन्ह तीन वष के कारावास का दं ड
दया, और जेल म रहते हुए ही उन्ह ने ‘घर क याद’ क वता लखी। क वता का भीतरी प्रमाण भी यही कहता है —
क व बाहर नह नकल सकता, इस लए उसे यह भी पता नह चलता क सबेरा कब हुआ (“ठ क से मने न जाना,
बहुत सोकर सफ माना”); वह अपने ही मन से कहता है “घर नह हूँ बस यही है”; और वह हवा तथा सावन को दूत
बनाकर संदेश भजवाता है, क्य क वह स्वयं जा नह सकता। और यह संदेश कसे भेजा जा रहा है? पताजी, माँ,
चार भाइय , चार बहन , भौजी और सरला को — यानी प रवार को। इस लए ‘जेल से, प रवार के लए’ ही पूरी तरह
सही है।
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) वदे श से मत्र के ग़लत क वता म कह वदे श का संकेत नह है — सावन, बरगद, लौक का बीज, लीपा हुआ आँगन, ये सब
लए भारतीय गाँव के चत्र ह। और संबोधन मत्र को नह , माता- पता और भाई-बहन को है।
(ख) युद्धभू म से ग़लत क वता म कोई युद्ध, शस्त्र या सै नक नह है, और न ही यह ‘जनता’ को संबो धत है। इसम एक ही
जनता के लए आदमी अपने घर को याद कर रहा है।
(ग) जेल से प रवार सही ✓ पुस्तक स्वयं बताती है क यह क वता 1942 के आंदोलन म मले तीन वष के कारावास के दौरान
के लए जेल म लखी गई और इसक कद्र य संवेदना ‘प रवार क स्मृ त’ है।
(घ) यात्रा से कसी ग़लत यात्रा म आदमी आ-जा सकता है; यहाँ क व क ववशता ही मूल भाव है — “और इस पर बस नह
संबंधी के लए है”। यह ववशता यात्रा क नह , बंद होने क है।
प्र.2 2. लगातार बरसता पानी क व के मन क कस भावना का प रचायक है? (क) उत्साह और आवेग (ख) भय और
क्रोध (ग) साहस और उमंग (घ) चता और बेचैनी
सट क उत्तर — (घ) चता और बेचैनी।
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यह उत्तर क्य उपयुक्त है: क वता क पहली ही चार पं क्तयाँ बाहर के पानी को भीतर के मन से जोड़ दे ती ह —
“रात-भर गरता रहा है, प्राण मन घरता रहा है”। ‘ गरना’ बाहर क क्रया है और ‘ घरना’ भीतर क ; जतनी दे र
पानी गरता रहा, उतनी दे र मन घरता रहा। इसके तुरंत बाद आता है — “काँपते ह प्राण थर-थर”, जो बेचैनी का
सीधा चत्र है। फर “आज का दन दन नह है… एक छन सौ बरस है रे” — समय का न कटना बेचैनी का सबसे
पक्का लक्षण है। और जब बा रश थमती भी है तो क व कहता है “मन नहायत नम गया है” — यानी भीतर क
बरसात नह थमी। पूरी क वता म वषा कभी उत्सव नह बनती; वह हर बार याद, चता और छटपटाहट ही जगाती
है।
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) उत्साह और ग़लत हद क वता म वषा प्रायः उल्लास का प्रतीक होती है, पर यहाँ नह । यहाँ क व बंद कोठरी म है और
आवेग वषा उसे घर क याद दलाकर और अकेला कर दे ती है।
(ख) भय और ग़लत क वता म कह डर या गुस्सा नह है — न ब्र टश सरकार पर, न भाग्य पर। स्वर शकायत का नह ,
क्रोध वनती का है — “उन्ह दे ते धीर रहना”।
(ग) साहस और ग़लत साहस क वता म है ज़रूर (“दुख डटकर ठे लता हूँ”), पर वह वषा से नह जुड़ा। वषा तो हर बार घर का
उमंग चत्र सामने ले आती है — “घर नजर म तर रहा है”।
(घ) चता और सही ✓ ‘प्राण मन घरता रहा है’, ‘काँपते ह प्राण थर-थर’, ‘एक छन सौ बरस है रे’, ‘मन नहायत नम गया है’
बेचैनी — चार प्रमाण एक ही दशा म जाते ह।
प्र.3 3. क वता म माँ क कैसी छ व उभरती है? (क) कमजोर और न ष्क्रय (ख) स्नेहमयी और दृढ़ (ग) श क्षत और
अनुशासन प्रय (घ) सरल और उदासीन
सट क उत्तर — (ख) स्नेहमयी और दृढ़।
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: माँ के दोन पक्ष क वता म साथ-साथ चलते ह। स्नेह का प्रमाण — “माँ क जसक
गोद म सर, रख लया तो दुख नह फर” और “माँ क जसक स्नेह-धारा का यहाँ तक भी पसारा”; उसका प्यार
जेल तक पसरा हुआ है। दृढ़ता का प्रमाण — जब पताजी रो पड़ते ह तो सँभालने वाली माँ ही होती है: “आँख म
कस लए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी”; और फर वह वाक्य, जो पूरी क वता का सबसे मज़बूत वाक्य है — “पाँव
जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता”। यानी वह बेटे के जेल जाने को अपनी कोख का गौरव मानती है। साथ ही
वह पता को टू टने से रोकती है — “इस तरह होओ न क े, रो पड़गे और ब े”। इस तरह वह ममता भी है और घर
का सहारा भी।
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वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) कमजोर और ग़लत यह उलटा है। पूरे घर म जो एक व्य क्त टू टता नह और दूसर को सँभालता है, वह माँ ही है।
न ष्क्रय
(ख) स्नेहमयी और सही ✓ ‘गोद म सर रख लया तो दुख नह फर’ (स्नेह) और ‘कोख को मेरी लजाता’ (दृढ़ता) — दोन
दृढ़ प्रमाण क वता म मौजूद ह।
(ग) श क्षत और ग़लत क वता तो साफ़ कहती है — “और माँ बन-पढ़ मेरी… उसे लखना नह आता”। वह श क्षत नह
अनुशासन प्रय है; उसक ताकत पढ़ाई से नह , अनुभव और दुख से आई है — “दुख म वह गढ़ मेरी”।
(घ) सरल और ग़लत सरल तो वह है, पर उदासीन बलकुल नह । उदासीन माँ यह नह कहती क ‘रो पड़गे और ब े’
उदासीन — यह तो पूरे घर क चता है।
प्र.4 4. “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” पं क्त के माध्यम से पता के व्य क्तत्व क कैसी छ व प्रस्तुत क गई है? (क) कमठ
और सृजनशील (ख) साहसी और पराक्रमी (ग) दृढ़ और संवेदनशील (घ) प्रसन्न चत्त और स क्रय
सट क उत्तर — (ग) दृढ़ और संवेदनशील।
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पं क्त के दो हस्से जान-बूझकर एक-दूसरे के उलट रखे गए ह। ‘वज्र-भुज’ — शब्द-
संपदा के अनुसार वज्र वह है जो ‘बहुत कठोर हो, जस पर कसी का प्रभाव न पड़े’; यानी पता क भुजाएँ और
उनका संकल्प अटल ह। और ‘नवनीत-सा उर’ — नवनीत यानी ताज़ा मक्खन; यानी हृदय इतना कोमल क ज़रा-सी
गरमी म पघल जाए। एक ही पं क्त म सबसे कठोर और सबसे कोमल वस्तु को जोड़कर क व पता का बहुआयामी
रूप गढ़ दे ता है। क वता आगे इसे प्रमा णत भी करती है — जो पता ‘मौत के आगे न हचक, शेर के आगे न
बचक’, वही ‘रो पड़े ह गे बराबर, पाँचव का नाम लेकर’। बरगद वाली उपमा भी यही कहती है — “एक पत्ता टू ट
जाए, बस क धारा फूट जाए”।
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वकल्प सही / कारण
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(क) कमठ और .c
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agइस पं क्त से नह नकलती।
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सृजनशील और ‘सृजनशील’ का कोई संकेत पूरी क वता म नह है।
(ख) साहसी और ग़लत यह वकल्प पं क्त के केवल आधे हस्से (वज्र-भुज) को पकड़ता है और ‘नवनीत-सा उर’ को छोड़
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पराक्रमी दे ता है। अधूरा उत्तर सट क उत्तर नह होता।
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(ग) दृढ़ और सही ✓
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हस्स कोgसमेटता है।
‘वज्र’ = दृढ़ता, ‘नवनीत’ = कोमलता/संवेदनशीलता। यही एकमात्र वकल्प है जो पं क्त के दोन
संवेदनशील
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(घ) प्रसन्न चत्त और ग़लत
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‘जो अभी भी दौड़ जाएँ, जो अभी भी खल खलाएँ’ से यह भाव ज़रूर नकलता है, पर वह अगली
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स क्रय पं क्तय से नकलता है — प्रश्न म द गई इसी पं क्त से नह ।
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a प्र.5 5. “एक पत्ता टू ट जाए, बस क धारा फूट जाए” पं क्त कस ओर संकेत करती है? (क) पता क कठोरता (ख)
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पता क भावुकता (ग) वषा क तीव्रता (घ) पता क नबलता
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सट क उत्तर — (ख) पता क भावुकता।
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यह उत्तर क्य उपयुक्त है: इस पं क्त से ठ क पहले क व पता के मन को बरगद कह चुका है — “मन क बड़ का
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g है: दे ह भले पहाड़ जैसी हो, पर
.े दc रस तुरंत नकल आता है। क व इसी प्राकृ तक बात को पता पर लागू करता
झाड़ जैसे” (‘बड़’ का अथ शब्द-संपदा म दया है — बरगद, वट)। बरगद का एक पत्ता तो ड़ए तो उसम से दूध जैसा
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aseज़रा-सी चोट लगते ही भीतर से स्नेह क धार बह नकलती है। अगली पं क्त इसे और खोल दे ती है — “एक हल्क
सफ़
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चोट लग ले, दूध क न उमग ले”। यानी कारण छोटा और प्र त क्रया बड़ी — यही भावुकता क पहचान है।
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इसका प्रमाण क वता म घ टत भी होता है: इतना कठोर आदमी पाँचव का नाम लेकर लगातार रो पड़ता है।
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वकल्प सही / कारण
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(क) पता क ग़लत
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कठोरता दूसरी पं क्तय म है — ‘वज्र-भुज’, ‘दे ह एक पहाड़ जैसे’। यह पं क्त तो ठ क उसके उलट,
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कठोरता भीतर क कोमलता दखा रही है।
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ase भावुकता
सही ✓ बरगद-रूपक क सीधी व्याख्या — छोट -सी चोट पर दूध क धार का फूट पड़ना, यानी ज़रा-सी बात
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पर स्नेह का उमड़ आना।
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(ग) वषा क तीव्रता ग़लत यहाँ ‘धारा’ वषा क नह , बरगद के दूध क है। संदभ पता के मन का है, आकाश का नह ।
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sउन्हe नबल कहना क वता के साथ अन्याय होगा।
(घ) पता क ग़लत भावुक होना और नबल होना एक बात नह । जो ‘मौत के आगे न हचक, शेर के आगे न बचक’,
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नबलता
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प्र.6 6. “ब हन आई बाप के घर, हाय रे प रताप के घर” पं क्त म ‘प रताप’ शब्द से क्या संकेत मलता है? (क) घर का
समृद्ध होना (ख) घर क सजावट (ग) घर म दुख का वातावरण (घ) घर क शां त
सट क उत्तर — (ग) घर म दुख का वातावरण।
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: पुस्तक क शब्द-संपदा म ‘प रताप’ का अथ दया है — अत्य धक दुख, शोक, भय,
बहुत गम , अत्य धक ताप। यहाँ पहला ही अथ लागू होता है। पं क्त क बनावट पर ध्यान द जए: पहले क व कहता
है ‘बाप के घर’ — यानी वह घर जहाँ बहन को खुशी-खुशी आना चा हए था; और तुरंत उसी घर को नाम दे दे ता है
‘प रताप के घर’। बीच म लगा ‘हाय रे’ बताता है क यह पीड़ा का उ ार है। कारण भी स्पष्ट है — घर का पाँचवाँ
बेटा जेल म है, इस लए मायके आई बहन को भी वहाँ खुशी नह मलती। आगे क पं क्तयाँ इसक पु ष्ट करती ह —
“शम से रो भी न पाएँ, खूब भीतर छटपटाएँ… आज सबका मन चुआ होगा।”
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) घर का समृद्ध ग़लत ‘प रताप’ का समृ द्ध से कोई संबंध नह । क वता म घर क संप त्त क चचा है ही नह , केवल
होना संबंध क है।
(ख) घर क सजावट ग़लत यह शब्द के अथ से बलकुल दूर है। ‘ताप’ क ध्व न सुनकर धोखा हो सकता है, पर शब्द-संपदा
का अथ ‘अत्य धक दुख, शोक’ है।
(ग) घर म दुख का सही ✓ शब्द-संपदा का दया अथ और ‘हाय रे’ का उ ार, दोन इसी ओर ले जाते ह — घर खुशी का घर
वातावरण नह , शोक का घर बन गया है।
(घ) घर क शां त ग़लत शां त होती तो ‘हाय रे’ न कहा जाता। और उसी घर के लए क व पहले ‘खुशी का पूर’ कह चुका है
— यह वरोध ही बताता है क अब वहाँ शां त नह , संताप है।
प्र.7 7. “और कहना मस्त ँ म” पं क्त म क व का ऐसा कहना कस बात क ओर संकेत करता है? (क) क व अपने
जीवन म बहुत खुश है। (ख) अपने दुख को प रजन से छपाना चाहता है। (ग) घर के लोग के प्र त उदासीन है।
(घ) क व प्राकृ तक स दय से अ भभूत है।
सट क उत्तर — (ख) अपने दुख को प रजन से छपाना चाहता है।
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यह उत्तर क्य उपयुक्त है: ध्यान द जए क क व यह नह कहता क ‘म मस्त हूँ’; वह सावन से कहता है — ‘और
कहना मस्त हूँ म’। यानी यह उसक हालत नह , वह संदेश है जो घर तक पहुँचाना है। और इसी संदेश के आसपास
क पं क्तयाँ स ाई खोल दे ती ह — “ कतु उनसे यह न कहना”, “हाय रे, ऐसा न कहना, है क जो वैसा न कहना”,
“कह न दे ना जागता हूँ, आदमी से भागता हूँ”, “कह न दे ना मौन हूँ म”, “उन्ह कोई शक न दे ना”। यानी असली
हालत यह है क वह रात-भर जागता है, लोग से कटा रहता है और चुप हो गया है — और वह चाहता है क इनम से
कुछ भी घर तक न पहुँचे। पुस्तक क भू मका भी यही कहती है क क व बादल से आग्रह करता है क वह उन्ह जेल
के कष्ट के वषय म न बताए और सांत्वना दे ।
वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) क व अपने जीवन म बहुत ग़लत ठ क इसी पं क्त के पास लखा है — “य न कहना अस्त हूँ म”। ‘अस्त’ यानी डू बा हुआ।
खुश है। जो सचमुच खुश हो, उसे यह मना करने क ज़रूरत ही नह पड़ती।
(ख) अपने दुख को प रजन सही ✓ पूरा अं तम भाग ‘कहना’ और ‘न कहना’ के जोड़े पर टका है। क व स ाई जानता है,
से छपाना चाहता है। पर उसे घर तक नह पहुँचने दे ना चाहता।
(ग) घर के लोग के प्र त ग़लत उदासीन आदमी घर का इतना बारीक चत्र नह ख चता — पताजी का व्यायाम, माँ क
उदासीन है। गोद, बहन का मायके आना, बेला का फूल। यह तो अत्य धक लगाव है।
(घ) क व प्राकृ तक स दय से ग़लत प्रकृ त के सुंदर चत्र क वता म ह (‘माँ क आँगन लीप दे ज्य ’), पर यह पं क्त प्रकृ त क
अ भभूत है। नह , घर भेजे जाने वाले संदेश क है।
प्र.8 8. इस क वता म कस बात को प्रमुखता से व णत कया गया है? (क) घर क शां त और सुरक्षा (ख) घर के
सदस्य के बीच का संबंध (ग) घर के नमाण क प्र क्रया (घ) घर क याद और अकेलेपन क पीड़ा
सट क उत्तर — (घ) घर क याद और अकेलेपन क पीड़ा।
यह उत्तर क्य उपयुक्त है: क वता का शीषक ही ‘घर क याद’ है, और पुस्तक ने भू मका म स्पष्ट लखा है —
“प रवार क स्मृ त ही इस क वता क कद्र य संवेदना है।” पूरी क वता का ढाँचा भी यही है: बाहर पानी गरता है →
‘घर नजर म तर रहा है’ → प रजन एक-एक करके याद आते ह → और अंत म क व सावन से वनती करता है क
वे मेरे लए न तरस। साथ ही अकेलेपन क पीड़ा भी जगह-जगह फूटती है — “एक छन सौ बरस है रे”, “घर नह हूँ
बस यही है”, “कह न दे ना जागता हूँ, आदमी से भागता हूँ”, “खुद न समझूँ कौन हूँ म”। यानी क वता म याद और
अकेलापन — दोन साथ-साथ चलते ह, और यही वकल्प (घ) कहता है।
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वकल्प सही / कारण
ग़लत
(क) घर क शां त और ग़लत क वता का घर इस समय शांत नह है — वह ‘प रताप के घर’ है, जहाँ सब रो रहे ह। और
सुरक्षा सुरक्षा क बात कह नह आती।
(ख) घर के सदस्य के बीच ग़लत यह आधा सच है — संबंध का चत्र ज़रूर है, पर वह अपने आप म वषय नह । वे संबंध याद
का संबंध आते ह, क्य क क व उनसे दूर है। कारण छोड़कर केवल प रणाम बताना अधूरा उत्तर है।
(ग) घर के नमाण क ग़लत क वता म मकान बनाने क कोई बात नह । यहाँ ‘घर’ ईंट-गारे का नह , संबंध और भावनाओं
प्र क्रया का घर है।
(घ) घर क याद और सही ✓ शीषक, पुस्तक क भू मका (‘प रवार क स्मृ त ही कद्र य संवेदना है’) और क वता क टे क —
अकेलेपन क पीड़ा तीन इसी उत्तर क पु ष्ट करते ह।
मेरी समझ मेरे वचार — पृष्ठ 200 और 201
अभ्यास › रचना से संवाद › मेरी समझ मेरे वचार
रचना से सं वाद चचा
प्र.1 नीचे दए गए प्रश्न पर कक्षा म चचा क जए और उनके उत्तर ल खए— 1. क वता म व णत पता के व्य क्तत्व
क उन वशेषताओं का वणन क जए जनसे उनका बहुआयामी रूप सामने आता है।
‘घर क याद’ म पता का चत्र इतने पक्ष से बनाया गया है क वे कसी एक वशेषण म नह समाते — वे एक साथ वज्र भी ह और
नवनीत भी। उनक प्रमुख वशेषताएँ ये ह —
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
वशेषता क वता का प्रमाण इससे क्या पता चलता है
1. दे ह से ब लष्ठ, “िपताजी भोले बहादुर , वज्र-भुज नवनीत-सा उर ”; “दे ह ‘वज्र’ यानी जस पर कसी का प्रभाव न पड़े।
संकल्प से अटल एक पहाड़ जैसे ” भुजाएँ और इरादे , दोन कठोर ह।
2. हृदय से अत्यंत “नवनीत-सा उर ”; “एक पत्त ा टू ट जाए , बस िक धारा फू ट नवनीत = ताज़ा मक्खन। बरगद क तरह ज़रा-सी
कोमल जाए ” चोट पर भीतर से स्नेह क धार बह नकलती है।
3. नभय “मौत के आगे न िहचकें , शेर के आगे न िबचकें ” डर के दो सबसे बड़े प्रतीक के सामने भी वे नह
डगते।
4. वाणी और कम म “बोल में बादल गरजता, काम में झंझा लरजता” बोली म बादल-सी गूँज और काम म आँधी-सी ग त
तेजस्वी — व्य क्तत्व म प्रभाव और वेग दोन ।
5. आस्थावान और “आज गीता-पाठ करके , दंड दो सौ साठ करके , खूब रोज़ का नयम — पहले गीता-पाठ (आत्मा का
अनुशा सत मुगदर िहला ले क र” अभ्यास), फर दं ड और मुगदर (दे ह का अभ्यास)।
6. वृद्ध होकर भी “िपताजी िजनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नही ं व्यापा, जो अभी उम्र ने उनके उत्साह को नह छु आ; वे आज भी दौड़
युवा भी दौड़ जाएँ, जो अभी भी िखलिखलाएँ” और खल खला सकते ह।
7. वात्सल्य से भरे “पाँचवाँ मैं हू ँ अभागा, िजसे सोने पर सुहागा, िपताजी कहते बेटे को ‘सोने पर सुहागा’ कहना — पता का दुलार
रहे है,ं प्यार में बहते रहे है”ं मुहावरे म ढलकर आया है।
8. भावुक, पर आँसू “रो पड़ े होंग े बराबर , पाँचवें का नाम ले क र ”; “कहाँ, मैं वे रोते ह और फर उसी साँस म मुकर जाते ह —
छपाने वाले रोता कहाँ हू,ँ धीर मैं खोता, कहाँ हू”ँ यही उनका सबसे मानवीय पक्ष है।
9. हर संतान क “एक टहनी कम न हो ले , कम कहाँ िक ख़म न हो ले , ध् यान बरगद क तरह — जतनी डाल (संतान), उतनी ही
चता करने वाले िकतना िफ क्र िकतनी, डाल िजतनी जड़ ें उतनी!” जड़ ( चताएँ)।
बहुआयामी रूप कैसे बनता है: क व ने पता को कह एक जगह प रभा षत नह कया; उसने उन्ह टु कड़ म
दखाया — कभी अखाड़े म, कभी गीता के सामने, कभी ब को दे खते हुए, कभी अकेले म रोते हुए। और सबसे
बड़ी बात यह क हर बार एक ही पं क्त म दो उलटे गुण रख दए — वज्र और नवनीत, पहाड़ और बरगद का दूध,
‘मौत के आगे न हचक’ और ‘रो पड़े ह गे बराबर’। इन्ह वरोध से पता एक जीता-जागता, पूरा मनुष्य बन जाते ह
— कोई आदश मू त नह ।
लखते समय ध्यान रख: उत्तर म हर वशेषता के साथ क वता क पं क्त ज़रूर द जए। ‘ पताजी बहादुर थे’ लख
दे ना अधूरा उत्तर है; ‘मौत के आगे न हचक, शेर के आगे न बचक’ लखकर बताना पूरा उत्तर है।
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2. “दुख डटकर ठे लता ँ” यह कथन मनुष्य के संघषशील स्वभाव को उजागर करता है। क वता के आधार पर
बताइए क क ठन प र स्थ तय म क व कस प्रकार धैय, साहस और त्याग का प रचय दे ता e
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कaव जेल म है, घर से कटा हुआ है और समय उसके लए ठहर गया है — फर भी वह न टू टता है, न शकायत करता है। उसका
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धैय, साहस और त्याग क वता म तीन अलग-अलग रूप म सामने आता है।
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1. धैय — क व अपनी हालत जानता है और उसे स्वीकार करता है, पर उससे भागता नह । वह मानता है — “और इस पर बस नह
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agजेल क सबसे बड़ी यातना समय का न कटना है — “आज का दन दन नह
है”, यानी इस स्थ त पर मेरा वश नह । और जस पर वश न हो, उसे झेल जाना ही धैय है। वह अपने ही मन को समझाता है — “तू
जरा-सा दुख कतना, सह सकेगा क्या क इतना”।
है… एक छन सौ बरस है रे” — और वह इसे भी काट लेता है।
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ध्यान द जए, क व यह नह कहता क ‘मुझे दुख नह है’ या ‘दुख अपने आप चला गया’; वह कहता है eकm
2. साहस — साहस का सबसे साफ़ प्रमाण वही पं क्त है जो प्रश्न म द गई है — “कूदता हूँ, खेलता हूँ, दुख डटकर ठे लता हूँ”।
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co पूरी ताकत लगाकर धकेलना — यह एक बार क जीत नह , रोज़-रोज़ क लड़ाई glहै। साथ ही वह काम म लगा
दुख को डटकर ठे लता
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m“कातने म व्यस्त हूँ म”, “उन्ह कहना लख रहा हूँ, उन्ह कहना पढ़ रहा हूँ”। खाली बैठकर दुख पालने के बजाय काम म
ँ। ‘ठे लना’ यानी
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agजुlट जाना ही साहस का व्यावहा रक रूप है।
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3. त्याग — क व का त्याग दो स्तर पर है। पहला, दे श के लए — उसने स्वेच्छा से आंदोलन म भाग लया और कारावास स्वीकार
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कया; माँ के शब्द म, “पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता”। दूसरा और अ धक मा मक त्याग है अपने दुख का — वह
अपनी पीड़ा घरवाल को बताने से इनकार कर दे ता हैe: m
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glaम कसी क आँख न भरे। दुख सहना क ठन है, पर दुख को छपाकर हँसते रहना
“ कतु उनसे यह न कहना, उन्ह दे ते धीर रहना… उन्ह कोई शक न दे ना”।
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यानी वह अपना दुख अकेले पी जाता है ता क घर
उससे भी क ठन है — और क व यही करता है।
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नष्कष: ‘दुख डटकर ठे लता हूँ’ इस पूरी क वता का सूत्र-वाक्य है। इसम दुख को नकारा नह गया, हराया गया है —
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और वह भी शोर मचाकर नह , चुपचाप। यही मनुष्य का संघषशील स्वभाव है: प र स्थ त बदल न सके तो अपने
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3. क वता म बार-बार वषा का वणन क वcकoे m g l a
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प्र.3 भाव को कस प्रकार व्यक्त करता है?
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इस क वता म वषा केवल मौसम नह है — वह क व के मन का दपण है। जैसे-जैसे वषा क अवस्था बदलती है, वैसे-वैसे क व का
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भाव भी बदलता है। इसे इस ता लका से सम झए —
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वषा क अवस्था क वता क पं क्त क व का भाव
रात-भर लगातार बरसना “रात-भर िगरता रहा है, पाण मन िघरता रहा है” बेचैनी — बाहर पानी िगरता है, भीतर मन िघरता है।
बादल का घना अँधेरा “क्योंिक बादल की अँधे र ी, है अभी तक भी घनेर ी” समय का ठहर जाना; सबेरा होने का भी पता न चलना।
झरा-झर, सर-सर क “िगर रहा पानी झरा-झर… काँपते है ं पाण थर- पकृ ित की हलचल का सीधे पाणों तक उतर आना।
आवाज़ थर”
पानी का पदा “बहुत पानी िगर रहा है, घर नजर में ितर रहा है” स्मृित का जागना — बरसते पानी पर घर का िचत्र तैरने
लगता है।
वषा घर म भी हो रही है “और अम्मा ठीक बादल… आज सबका मन चुआ बाहर की वष और भीतर के आँस ुओं का एक हो जाना।
होगा”
पानी का थमना “अभी पानी थम गया है, मन िनहायत नम गया है” बाहर शांित, भीतर नही ं — दुख वष के साथ नही ं थमता।
बादल क चादर “लग रहे है ं वे मुझे यों, माँ िक आँग न लीप दे ज्यों” आकाश में भी माँ का िदखाई दे ना — याद की चरम
अवस्था।
सावन से वनती “तुम बरस लो वे न बरसे ं, पाँचवें को वे न तरसे ं” वष का दू त बन जाना — क रुणा से पाथना तक की
यात्रा।
वषा तीन काम करती है:
(1) वह स्मृ त खोलती है — बरसात क व को प्रय थी (“उसे थी बरसात प्यारी”), इस लए वही बरसात अब घर क
याद बनकर लौटती है।
(2) वह क व और घर को जोड़ती है — एक ही समय म वह जेल पर भी बरस रही है और घर पर भी; यही एकमात्र
चीज़ है जो दोन जगह साझा है। इसी लए आगे चलकर वही सावन संदेशवाहक बन जाता है।
(3) वह आँसुओं का प्रतीक बन जाती है — ‘अम्मा ठ क बादल’, ‘मन चुआ होगा’, ‘वे न बरस’ म वषा और रुदन
एक-दूसरे म घुल जाते ह।
ध्यान द जए: हद क वता म सावन प्रायः उल्लास और मलन का मौसम है। भवानीप्रसाद मश्र ने उसी सावन को
वरह और चता का मौसम बना दया — यही इस क वता क मौ लकता है।
प्र.4 4. क वता से उन पं क्तय को चुनकर ल खए और भाव स्पष्ट क जए जनसे माँ क भावनात्मक मजबूती का
प रचय मलता है।
क वता म माँ अ धक नह बोलती, पर जतना बोलती है वह पूरे घर को सँभाल लेता है। उसक भावनात्मक मजबूती दखाने वाली
पं क्तयाँ ये ह —
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पं क्त भाव
“ और माँ िबन-पढ़ ी मेरी, दुख में वह गढ़ ी मेरी” माँ को अक्षर-ज्ञान नही ं है, पर उसे दुख ने गढ़ ा है — यानी उसकी मजबूती िकताबों से
नही,ं जीवन के अनुभव से आई है। ‘गढ़ ी’ शब्द बताता है िक दुख ने उसे तोड़ ा नही,ं आकार
िदया है।
“ आँख में िकसिलए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी” िपताजी रो पड़ े है ं और सँभालने वाली माँ है। उसके पास कोई पमाण नही ं िक बेटा ठीक है,
िफर भी वह भरोसा िदलाती है — क्योंिक घर को िबखरने से बचाना उसकी िज़ म्मेद ारी है।
“वह तुम्हारा मन समझकर, और अपनापन माँ बेटे के जेल जाने को गलती नही,ं परंपरा का िनव ह बताती है — ‘यह तो तुम्हारी ही
समझकर, / गया है सो ठीक ही है, यह तुम्हारी लीक बनाई हुई राह है’। वह िपता को भावुक ता से नही,ं तक से चुप कराती है।
ही है”
“ पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता” किवता का सबसे मज़ बूत वाक्य। माँ कहती है िक बेटा अगर डरकर पीछे हट जाता तो मेरी
कोख लिज्जत होती। यानी वह बेटे के कारावास को अपने मातत्ृ व का गौरव मानती है,
अिभशाप नही ं।
“ इस तरह होओ न कच्चे, रो पड़ ेंगे और बच्चे” माँ अपने दुख की बात ही नही ं करती; उसे िचंता है िक िपता टू टेंगे तो बाकी बच्चे भी टू ट
जाएँगे। अपना दुख पीकर दू स रों को सँभालना — यही स च्ची भावनात्मक मजबूती है।
“ माँ िक िजसकी स्नेह-धारा का यहाँ तक भी पसारा, यहाँ मजबूती चुपचाप है। उसका प्यार जेल तक पहचु ँ जाता है, यद्यिप उसका एक अक्षर
/ उसे िलखना नहीं आता, जो िक उसका पत्र भी नही ं पहचु ँ सकता। िबना शब्द ों के इतनी दू र तक पहचु ँ ना ही उसके स्नेह की शिक्त है।
पाता।”
कुल मलाकर: क वता म सब रो रहे ह — पता रो पड़ते ह, भाई-बहन पागल हो रहे ह, ‘सबका मन चुआ’ है। एक
माँ ही है जो नह टू टती। और यह वशेष रूप से ध्यान दे ने योग्य है क वह अनपढ़ है। क व ने जान-बूझकर यह
वरोध रखा है — जसे लखना नह आता, वही घर क सबसे बड़ी ताकत है। यही इस क वता क सबसे बड़ी
मानवीय खोज है।
प्र.5 5. क वता का कौन-सा अंश आपको सबसे अ धक भावनात्मक और प्रभावी लगता है और क्य ?
यह प्रश्न आपक अपनी पसंद पूछता है, इस लए उत्तर म अंश + कारण + क वता का प्रमाण — तीन होने चा हए। नीचे एक पूरा
नमूना उत्तर दया गया है, जसे आप अपनी पसंद के अनुसार बदल सकते ह।
अ े उत्तर म क्या-क्या होना चा हए:
जस अंश को आपने चुना है, उसे उद्धत क जए (कम से कम दो पं क्तयाँ)।
उसका अथ संक्षेप म बताइए।
वह आपको क्य प्रभावी लगा — भाव क दृ ष्ट से और शल्प (शब्द-चयन, अलंकार, कहन) क दृ ष्ट से, दोन
कारण द जए।
य द हो सके तो अपने जीवन या अनुभव से उसे जो ड़ए।
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नमूना उत्तर:
मुझे क वता का यह अंश सबसे अ धक भावनात्मक और प्रभावी लगता है —
“माँ िक िजसकी स्ने ह-धारा का यहाँ तक भी पसारा,
उसे िलखना नही ं आता, जो िक उसका पत्र पाता।”
इसका अथ है — माँ के स्नेह क धारा जेल तक भी पसरी हुई है, पर उसे लखना नह आता, वरना मुझे उसका पत्र मलता।
यह अंश मुझे क्य प्रभावी लगता है —
1. भाव क दृ ष्ट से: इसम एक बहुत बड़ी बात बहुत छोटे -से वाक्य म कह द गई है — प्यार जेल क द वार पार कर सकता है,
पर च नह । बेटा जेल म बैठा है और उसे यह भी सुख नह मल सकता क माँ के हाथ क चार पं क्तयाँ पढ़ ले। यह अभाव
कसी सज़ा से बड़ा है।
2. शल्प क दृ ष्ट से: क व ने कह ‘दुख’ शब्द इस्तेमाल नह कया, न कोई वलाप कया। उसने केवल एक तथ्य रख दया —
‘उसे लखना नह आता’। यह अल्पो क्त ही सबसे ज़्यादा चोट करती है। साथ ही ‘स्नेह-धारा का पसारा’ म स्नेह को बहती हुई
नद बना दे ना (रूपक) उसे नापने-योग्य, दखाई दे ने वाली चीज़ बना दे ता है।
3. सामा जक दृ ष्ट से: यह पं क्त उस समय के भारत क भी तस्वीर है, जब घर क स्त्रय को पढ़ाया नह जाता था। क वता
शकायत नह करती, पर पाठक को यह कमी अपने आप खटक जाती है।
4. अपने अनुभव से: मेरी दाद भी पढ़ - लखी नह ह। जब हम शहर आ गए तो उनका कोई पत्र कभी नह आया — पर हर बार
जब भी घर लौटा, उनका हाथ सर पर पहले पड़ा। यह पं क्त पढ़ते ही वह याद ताज़ा हो जाती है।
दूसरे वकल्प, जन्ह आप चुन सकते ह: “पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता” (माँ का अ त साहस);
“कहाँ, म रोता कहाँ हूँ, धीर म खोता, कहाँ हूँ” ( पता का आँसू छपाना); “म मजे म हूँ सही है, घर नह हूँ बस यही
है” (सबसे कम शब्द म सबसे बड़ा दुख); या “लग रहे ह वे मुझे य , माँ क आँगन लीप दे ज्य ” (सबसे सुंदर
उपमा)। कसी को भी चु नए — बस कारण मज़बूत होना चा हए।
क वता का स दय — पृष्ठ 201
अभ्यास › वधा से संवाद › क वता का स दय
वधा से सं वाद ता लका
प्र.1 “ गर रहा पानी झरा-झर, हल रहे पत्ते हरा-हर, / बह रही है हवा सर-सर, काँपते ह प्राण थर-थर” — उपयुक्त
पं क्तय म रेखां कत शब्द को ध्यानपूवक प ढ़ए। यहाँ शब्द का चयन और संयोजन इस प्रकार कया गया है क
क वता म ध्वन्यात्मकता और नाद स दय क सृ ष्ट हुई है। … क वता म ऐसी अनेक वशेषताएँ ह जो इसे जीवंत
और प्रभावपूण बनाती ह। ऐसी कुछ वशेषताओं क सूची नीचे द गई है। क वता से ऐसी वशेषताओं वाली
पं क्तय को ढूँ ढ़कर ल खए। — वशेषताएँ: स्मृ त और दृश्य बब / लोकभाषा क सहजता / पं क्तय का
दोहराव / आलंका रक प्रयोग / प्राकृ तक दृश्य और भाव का संयोजन / संबोधनात्मकता
पहले पुस्तक क सूची को पूरी भरी हुई ता लका के रूप म दे खए —
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वशेषताएँ क वता क पं क्तयाँ
स्मृ त और दृश्य बब “खुले िसर नंग े बदन वह, घूम ता िफरता मगन वह, / बड़ े बाड़ े में िक जाता, बीज लौकी का लगाता,”
लोकभाषा क सहजता “और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला,” / “आज सबका मन चुआ होगा। ”
पं क्तय का दोहराव “चार भाई चार बिहने,ं भुजा भाई प्यार बिहने,ं ” (किवता में दो बार ) तथा “िपताजी िजनको बुढ़ापा, एक क्षण
भी नही ं व्यापा,” (दो बार)
आलंका रक प्रयोग “िपताजी भोले बहादुर , वज्र-भुज नवनीत-सा उर ,” / “लग रहे है ं वे मुझे यों, माँ िक आँग न लीप दे ज्यों;”
प्राकृ तक दृश्य और भाव का “आज पानी िगर रहा है, बहत
ु पानी िगर रहा है, / रात-भर िगरता रहा है, पाण मन िघरता रहा है,”
संयोजन
संबोधनात्मकता “हे सजीले हरे सावन, हे िक मेरे पुण् य पावन, / तुम बरस लो वे न बरसे ं, पाँचवें को वे न तरसे ं,”
हर पं क्त क्य चुनी गई —
1. स्मृ त और दृश्य बब — “खुले सर नंगे बदन वह, घूमता फरता मगन वह, बड़े बाड़े म क जाता, बीज लौक का
लगाता,”
यह पूरा चत्र याद से बना है — पता अपने बेटे के बचपन को याद कर रहे ह। और वह याद इतनी साफ़ है क आँख के सामने
खड़ी हो जाती है: खुला सर, नंगा बदन, बा रश म घूमता लड़का, बाड़े म लौक का बीज बोता हुआ। यही दृश्य बब है। ‘लौक
का बीज’ जैसा छोटा ब्योरा ही इस चत्र को असली बनाता है।
वैक ल्पक उदाहरण: “तुझे बतलाता क बेला / ने फलानी फूल झेला,” — इसम दृश्य के साथ गंध का बब भी है।
2. लोकभाषा क सहजता — “और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला,” और “आज सबका मन चुआ होगा।”
‘भौजी’ (भाभी) और ‘चुआ’ (टपका) क व क क्षेत्रीय बोली के शब्द ह — पुस्तक ने ‘व्याकरण क बात’ म इन्ह को उदाहरण
बनाया है। ये शब्द क वता म बना कसी झझक के आ जाते ह और कह खटकते नह ; उलटे उनसे घर जैसा अपनापन आ
जाता है। यही ‘लोकभाषा क सहजता’ है।
वैक ल्पक उदाहरण: “एक छन सौ बरस है रे” ( छन = क्षण); “मन क बड़ का झाड़ जैसे” (बड़ = बरगद); “दूध क न उमग
ले” (न = नद )।
3. पं क्तय का दोहराव — “चार भाई चार ब हन, भुजा भाई प्यार ब हन,” तथा “ पताजी जनको बुढ़ापा, एक क्षण भी
नह व्यापा,”
ये दोन पं क्त-जो ड़याँ क वता म दो-दो बार आती ह, और हर बार अथ बदल जाता है। ‘चार भाई चार ब हन’ पहले घर क
खुशी बताने आती है, दूसरी बार पता के दुख का कारण बनकर। ‘ पताजी जनको बुढ़ापा’ पहले उनक ताकत बताती है, दूसरी
बार उनके रोने से पहले आकर करुणा पैदा करती है। इसके अलावा ‘हाय, पानी गर रहा है, घर नजर म तर रहा है’ और अं तम
टे क ‘हे सजीले हरे सावन…’ भी लौटती ह। यह दोहराव गीत म टे क जैसा काम करता है।
4. आलंका रक प्रयोग — “ पताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर,” और “लग रहे ह वे मुझे य , माँ क आँगन
लीप दे ज्य ;”
पहली पं क्त म एक साथ दो अलंकार ह — ‘वज्र-भुज’ म रूपक (कोई वाचक शब्द नह , सीधा आरोप) और ‘नवनीत-सा
उर’ म उपमा (वाचक शब्द ‘सा’ मौजूद)। दूसरी पं क्त म ‘ज्य ’ वाचक शब्द के साथ उपमा है — बादल ऐसे लगते ह जैसे माँ ने
आँगन लीप दया हो।
और उदाहरण: अनुप्रास — “बोल म बादल गरजता”; मानवीकरण — “झाड़ आँख बंद करके साँस सु स्थर मंद करके”;
अ तशयो क्त — “एक छन सौ बरस है रे”; वरोधाभास — “आज का दन दन नह है”।
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5. प्राकृ तक दृश्य और भाव का संयोजन — “आज पानी गर रहा है… प्राण मन घरता रहा है,”
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यह क वता क पहली ही चौपाई है और इसम प्रकृ त तथा भाव एक-दूसरे म गुँथे हुए ह। तीन पं क्तयाँ बाहर के पानी क ह और
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चौथी भीतर के मन क ; और दोन को जोड़ने वाला शब्द है — गरता / घरता। यही ढाँचा पूरी क वता म लौटता है।
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वैक ल्पक उदाहरण:
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agसंबोधनात्मकता — “हे सजीले हरे सावन, हे क मेरे पुण्य पावन, / तुम बरस लो वे न बरस, पाँचव को वे न तरस,”
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यहाँ क व सावन को सीधे पुकार रहा है — और वह भी दो बार ‘हे’ लगाकर। यही क वता क संबोधनात्मकता का सबसे स्पष्ट
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उदाहरण है। इसी कारण सावन एक जड़ मौसम न रहकर एक जी वत दूत बन जाता है।
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वैक ल्पक उदाहरण: “हवा, उनको धीर दे ना, यह नह जी चीर दे ना,” (हवा को संबोधन); “आदमी के उर बचारे, कस लए
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इतनी तृषा रे,” (अपने ही हृदय को संबोधन); “तू क प्रय से दूर होकर, बह चला रे पूर होकर,” (अपने मन को ‘तू’ कहकर)।
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ता लका भरते समय ध्यान रख: हर वशेषता के लए अलग-अलग पं क्त चु नए और पं क्त पूरी ल खए। साथ ही
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एक वाक्य म यह भी ल खए क वह पं क्त उस वशेषता को कैसे सद्ध करती है — केवल पंeक्त
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क वता क संरचना — पृष्ठ 201
अभ्यास › वधा से संवाद › क वता क संरचना
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वधा से सं वाद सं र चना
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‘घर क याद’ क व के भीतर उठते भाव क यात्रा है। क वता म प्रकृ त के माध्यम से व्यक्त इस यात्रा के प्रमुख
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चरण का वणन कर। (संकेत– पानी का गरना, सबेरा होना)
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‘घर क याद’ को य द एक ही वाक्य म कहना हो तो यह कहा जा सकता है — बाहर क वषा जैसे-जैसे बदलती है, भीतर का
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भाव भी वैसे-वैसे बदलता है। क वता कुल आठ चरण से होकर गुज़रती है —
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
चरण प्रकृ त क क वता क पं क्त भाव क अवस्था
अवस्था
1. आरंभ रात-भर पानी का “आज पानी िगर रहा है… पाण मन िघरता रहा बेचैनी का जागना — बाहर िगरना, भीतर
गरना है,” िघरना।
2. सबेरा बादल क अँधेरी, “अब सबेर ा हो गया है, कब सबेर ा हो गया है… समय का ठहर जाना, िदशाहीनता — सबेरा
होना चुप्पी रातवाली छाप है सब,” हुआ भी तो पता न चला।
3. ध्व नय झरा-झर, हरा-हर, “िगर रहा पानी झरा-झर… काँपते है ं पाण थर- बाहर की हलचल का पाणों तक उतरना —
का जागना सर-सर थर,” काँपना।
4. स्मृ त का पानी का पदा “बहत ु पानी िगर रहा है, घर नजर में ितर रहा घर का तैरता िचत्र — पिरजन एक -एक करके
खुलना है,” याद आने लगते है।ं
5. कल्पना वषा घर पर भी हो “और अम्मा ठीक बादल… आज सबका मन किव घर के भीतर पहचु ँ जाता है — िपता का
का वस्तार रही है चुआ होगा।” रोना, माँ का सँभालना, भाई-बहनों की
छटपटाहट।
6. वषा का पानी थमा, बादल “अभी पानी थम गया है, मन िनहायत नम गया बाहर ठहराव, भीतर भीगापन। एक क्षण के िलए
थमना जमे, पेड़ नश्चल है,”; “झाड़ आँखें बंद करके … िक्षितज पर जैसे मन शांत होता-सा लगता है।
जड़े है”ं
7. पंछ क चुप्पी का टू टना “एक पंछी बोलता है, घाव उर के खोलता है,” शांित टू टती है, घाव िफर खुल जाते है ं — और
आवाज़ बात ‘मैं’ से बढ़ कर ‘आदमी’ तक पहचु ँ जाती
है।
8. संदेश और सावन दूत बन “हे सजीले हरे सावन… पाँचवें को वे न दुख से िनकलकर दू स रों की िचंता तक — ‘मैं
प्राथना जाता है तरसे ं। ” ठीक हू,ँ बस उ न्हे ं दुख न हो’।
इस यात्रा म तीन बात ध्यान दे ने योग्य ह:
प्रकृ त ही कड़ी है। क व कह यह नह कहता क ‘अब मुझे यह लग रहा है’। वह हर बार पहले मौसम बताता है,
और भाव अपने आप उसम से नकल आता है।
यात्रा भीतर से बाहर क ओर जाती है। क वता अपने दुख (‘प्राण मन घरता रहा है’) से शुरू होकर दूसर के
दुख क चता (‘वे न बरस, पाँचव को वे न तरस’) पर खत्म होती है। यही इसका नै तक वकास है।
अंत चक्र य है। जस टे क से संदेश-भाग शुरू हुआ था, क वता उसी टे क पर लौटकर समाप्त होती है — गीत क
परंपरा के अनुसार।
वषय से संवाद — पृष्ठ 201 और 202
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
अभ्यास › वषय से संवाद
वषय से सं वाद अं त र- वषयी
प्र.1 1. क वता म च त्रत ‘घर’ एक भौ तक स्थान से बढ़कर भावनाओं और संबंध के कद्र के रूप म च त्रत हुआ है।
वतमान म एकल प रवार के बढ़ते चलन के संदभ म संयुक्त प रवार और एकल प रवार क तुलना क जए और
कारण स हत ल खए क दोन क कौन-कौन-सी बात आपको पसंद ह और कौन-कौन-सी नापसंद?
पहले क वता का ‘घर’ — इस क वता म घर कोई मकान नह है। क व एक बार भी द वार, छत या कमरे क बात नह करता। वह
जसे ‘घर’ कहता है, वह है — चार भाई, चार बहन, माँ क गोद, पताजी का मुगदर, भौजी, सरला, और बाड़े म लगा लौक का
बीज। इसी लए वह लख पाता है — “घर क घर म सब जुड़े ह, सब क इतने कब जुड़े ह”। यह एक भरा-पूरा संयुक्त प रवार है,
और क वता क सारी पीड़ा इसी से जुड़े होने के कारण है।
तुलना का संयुक्त प रवार एकल प रवार
आधार
सदस्य दादा-दाद , चाचा-चाची, ताऊ-ताई, भाई-बहन, भौजी — तीन माता- पता और उनक संतान — प्रायः तीन-चार
पी ढ़याँ एक साथ। लोग।
संकट के समय दुख बँट जाता है। किवता में भी िपता को माँ सँभाल ले ती है और सहारा कम पड़ ता है; बाहर से मदद ढू ँढ़नी पड़ ती है।
घर टू टने से बच जाता है।
ब का पालन दादी-नानी की कहािनयाँ, कई भाई-बहन, साझा करना अपने आप माता-िपता का पूरा ध्यान िमलता है, पर बच्चा पायः
सीख जाते है।ं अके ला बड़ ा होता है।
नणय बड़ ों की सलाह िमलती है, पर व्यिक्त की अपनी पसंद दब भी िनणय जल्दी होते है ं और अपनी इच्छा से होते है।ं
सकती है।
खच रसोई, मकान और सामान साझा — खच कम। हर चीज़ अलग — खच अिधक।
नजता कम; हर बात सबकी बात बन जाती है। अिधक ; अपनी जगह और अपना समय िमलता है।
(प्राइवेसी)
बुजग क स्थ त घर में ही दे खभाल और स म्मान िमलता है। पायः अके ले रह जाते है ं — आज का सबसे बड़ ा
सामािजक पश्न।
नमूना उत्तर (मेरी पसंद-नापसंद, कारण स हत):
संयुक्त प रवार म मुझे जो पसंद है — सबसे पहले यह क वहाँ कोई अकेला नह पड़ता। बीमारी, परीक्षा, ववाह या मृत्यु —
कसी भी अवसर पर आठ-दस हाथ अपने आप उठ जाते ह। दूसरा, ब को बाँटना और सहना कताब से नह , रोज़ के जीवन से
आता है। तीसरा, दादा-दाद के पास बैठकर जो भाषा, कहावत और कहा नयाँ मलती ह, वे कसी कक्षा म नह मलत — इसी
क वता क भाषा (‘ छन’, ‘भौजी’, ‘बड़’) भी ऐसे ही घर क दे न है।
संयुक्त प रवार म मुझे जो नापसंद है — कभी-कभी व्य क्त क अपनी इच्छा दब जाती है; पढ़ाई या क रयर का नणय ‘घर के
हसाब से’ लेना पड़ता है। पढ़ने या एकांत म सोचने क जगह कम मलती है। और य द आपस म मतभेद हो जाए तो पूरा घर उसम
उलझ जाता है।
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एकल प रवार म मुझे जो पसंद है — नणय क स्वतंत्रता, अपनी जगह और अपना समय। माता- पता का पूरा ध्यान मलता है,
और जीवन आसानी से एक शहर से दूसरे शहर ले जाया जा सकता है — आज क नौक रय के लए यह ज़रूरी भी है।
एकल प रवार म मुझे जो नापसंद है — संकट के समय अकेलापन; बुजग का पीछे छू ट जाना; और ब म साझा करने क
आदत का कम पड़ना।
मेरा नष्कष: प रवार बड़ा हो या छोटा, इससे उतना फ़क नह पड़ता — फ़क इससे पड़ता है क उसम जुड़ाव
कतना है। ‘घर क याद’ का घर इस लए बड़ा नह क उसम आठ भाई-बहन ह, ब ल्क इस लए क वहाँ एक बेटे क
अनुप स्थ त सबको एक साथ रुला दे ती है। एकल प रवार म भी यह जुड़ाव बनाया जा सकता है — बस साथ बैठकर
खाना, त्योहार पर मलना और बुजग से नय मत बात करना छोड़ना नह चा हए।
प्र.2 2. क वता म बार-बार पानी गरने का वणन है। लगातार बा रश होती रहे तो ग्रामीण और शहरी क्षेत्र म कस प्रकार
क समस्याएँ उत्पन्न हो सकती ह?
वषा जीवन दे ती है, पर लगातार और अ धक वषा जीवन क ठन भी कर दे ती है। गाँव और शहर — दोन क समस्याएँ अलग-अलग
होती ह, क्य क दोन क बनावट अलग है।
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क्षेत्र प्रमुख समस्याएँ क्य होती ह
ग्रामीण खड़ ी फ़ सल का सड़ ना और बह खेत खुले होते ह; अ धक पानी भर जाने से धान को छोड़कर अ धकांश फ़सल क
क्षेत्र जाना जड़ गल जाती ह।
क च्चे मकानों का ढहना म और खपरैल के घर लगातार भीगकर बैठ जाते ह। क वता म भी घर, आँगन और
बाड़े का ज़क्र है — यह ग्रामीण घर ही है।
क च्ची सड़ कों और पुिलयों का टू टना गाँव कट जाते ह; बीमार को अस्पताल तक ले जाना क ठन हो जाता है।
पशुओं के िलए चारे और सूखी जगह चारा भीगकर सड़ जाता है और गोशालाएँ पानी म डू ब जाती ह।
का संक ट
नदी-नालों का उफनना, बाढ़ नद कनारे बसे गाँव सबसे पहले डू बते ह; लोग को ऊँची जगह पर शरण लेनी पड़ती
है।
साँप-िबच्छू का घरों में घुस ना, बल भर जाने से जीव बाहर आते ह; ठहरे पानी म मच्छर पनपते ह।
मले िरया-डेंगू
शहरी सड़ कों पर जलभराव और यातायात पक्क सतह पानी सोखती नह ; सारा पानी ना लय पर आ पड़ता है।
क्षेत्र ठप होना
नािलयों का जाम होकर उलटना प्ला स्टक और कचरे से ना लयाँ पहले से भरी रहती ह; गंदा पानी घर तक आ जाता
है।
िबजली का जाना, शॉट-सिक ट का खंभ और ांसफ़ॉमर म पानी भरने पर आपू त रोकनी पड़ती है।
खतरा
िनचली बिस्तयों में पानी घुस ना शहर क झुग्गी-ब स्तयाँ प्रायः नाले या नचली ज़मीन के पास होती ह।
स्कू ल -द ़ तर बंद , िदहाड़ ी मज़ दू रों जो रोज़ कमाकर रोज़ खाते ह, उन्ह सबसे पहले और सबसे अ धक चोट लगती है।
की कमाई रुकना
जल -जिनत रोग — हैजा, टाइफ़ ॉइड, पीने के पानी क पाइप-लाइन म गंदा पानी मल जाता है।
पीिलया
दोन म साझा समस्याएँ: लगातार बादल छाए रहने से धूप न मलना और उससे होने वाला उदासी-भरा वातावरण
(क वता म भी — “है अभी तक भी घनेरी… रातवाली छाप है सब”), कपड़ और अनाज म फफूँद लग जाना, और
आवागमन ठप हो जाने से आवश्यक वस्तुओं का महँगा हो जाना।
क्या कया जा सकता है: गाँव म — खेत म जल- नकासी क ना लयाँ, ऊँचे चबूतरे पर अनाज-भंडारण, और बाढ़
क पूव-चेतावनी। शहर म — ना लय क समय पर सफ़ाई, प्ला स्टक कम करना, वषा-जल संचयन (rainwater
harvesting) और खुली म वाली जगह छोड़ना, ता क पानी ज़मीन म उतर सके।
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mजए और
3. क वता म सावन के बादल का प्रयोग एक संचार माध्यम के रूप म कया गया है जसके ारा क व अपने
प रवार तक संदेश भेज रहा है। कक्षा म संचार के नए-पुराने माध्यम म अंतर बताते हुए चचाeक
प्र.3
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ल खए।
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क वता म क व जेल से बाहर नह जा सकता और उसक माँ को लखना नह आता — इस लए वह सावन के बादल को दूत बनाता
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है: “हे सजीले हरे सावन… तुम बरस लो वे न बरस”। यह कल्पना है, पर इसी बहाने संचार का प्रश्न हमारे सामने आ जाता है।
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आधार पुराने माध्यम
a नए माध्यम
उदाहरण दूत/हरकारा, कबूतर, च और डा कया, तार (टे लीग्राम),
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मोबाइल कॉल, एस.एम.एस., ई-मेल, व्हाट् सऐप,
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ढोल-नगाड़ा, मुनाद , अखबार, रे डयो, लडलाइन फ़ोन वी डयो कॉल, सोशल मी डया, ऑनलाइन समाचार
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.co बहतु धीमी — िच ी को गाँव तक पहचु ँ ने में कई िदन लगते तत्काल — संदे शgसेlकaं डों में दू स रे महा ीप तक।
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थे।
aglपहुँच सीिमत; और पढ़ ना-िलखना आना ज़ रूरी था। किवता की माँ बहतु व्यापक ; वीिडयो और ऑिडयो के कारण िनरक्षर
इसी कारण िच ी नही ं िलख पाती।
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व्यिक्त भी बात कर सकता है।
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तार बहुत महँगा; िच ी स स्ती पर धीमी। इंटरनेट के बाद लगभग िन:शुल्क , पर उपकरण और डेटा
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खच
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चािहए।
अिधक — हाथ की िलखावट, इंतज़ ार, बार-बार पढ़ ी जाने कम — संदे श जल्दी आते है ं और जल्दी भुल ा िदए जाते
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भावनात्मक
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गहराई वाली िच ी। िच ी सँभालकर रखी जाती थी। है।ं
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तेज़ पर जोिखम aभरीse— फ़ ज़ खबरे ं और अफ़ वाहे ं िमनटों
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वश्वसनीयता धीमी पर पायः पामािणक ; अफ़ वाह फै लने में समय लगता था।
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में फै ल जाती
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agl नजता िच ी बंद िलफ़ ाफ़े में; पर डािकया या घर का कोई पढ़ ले ता व्यिक्तगत उपकरण, पर आँक ड़ ों की सुरक्षा का नया
था। खतरा।
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प्रतीक्षा भी मटा द है। पहले च आने मaपंsद्रह दन लगते थे, और उन पंद्रह दन क प्रतीक्षा म ही स्नेह गाढ़ा होता था। आज
नमूना उत्तर (चचा का नष्कष): हमारी कक्षा म चचा के बाद यह बात नकलकर आई क नए माध्यम ने दूरी मटा द है, पर
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संदेश एक सेकंड म पहुँच जाता है, पर बहुत बार बना पढ़े ही आगे बढ़ जाते ह। दूसरी बात यह क आज संचार का सबसे बड़ा खतरा
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यह है क खबर सच है या झूठ, यह जाँचे बना आगे बढ़ा द जाती है।
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तीसरी और सबसे सुंदर बात यह नकली क य द उस समय मोबाइल होता, तो शायद यह क वता लखी ही न जाती — क्य क यह
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क वता उसी ववशता से जन्मी है क क व अपनी बात सीधे नह कह सकता।
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se m चचा को आगे बढ़ाने के प्रश्न: (1) अपने घर के कसी बुजग से पू छए क उन्ह आई कोई एक च आज भी याद
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क्य है? (2) क्या हम आज भी कोई ऐसा संदेश भेजते ह जसे सँभालकर रखा जाए? (3) संचार के इन नए माध्यम
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म हम कौन-कौन-सी सावधा नयाँ बरतनी चा हए?
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प्र.4 4. भवानीप्रसाद मश्र ने यह क वता स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कारावास म लखी थी। अपने शक्षक और
पुस्तकालय क सहायता से ‘भारत का स्वतंत्रता संग्राम’ वषय पर लेख ल खए।
यह एक लेखन-प रयोजना है। पहले काम का तरीका सम झए, फर नीचे दया गया नमूना लेख दे खए।
कैसे कर:
1. पुस्तकालय से कक्षा 8 और 10 क इ तहास क पाठ्यपुस्तक तथा गांधीजी क सत्य के प्रयोग जैसी एक पुस्तक
ली जए।
2. घटनाओं को त थ-क्रम म एक कागज़ पर उतार ली जए — तभी लेख म बखराव नह आएगा।
3. अपने ज़ले या राज्य के एक स्वतंत्रता सेनानी का नाम अवश्य जो ड़ए — इससे लेख अपना-सा लगेगा।
4. अंत म एक अनुच्छेद इस पर ल खए क सा हत्य ने इस संग्राम म क्या भू मका नभाई — इसी क वता का
उदाहरण दे कर।
5. लेख का ढाँचा र खए — शीषक → भू मका → प्रमुख चरण → योगदान → सा हत्य क भू मका →
नष्कष।
नमूना उत्तर:
भारत का स्वतंत्रता संग्राम
भू मका — भारत क स्वतंत्रता कसी एक दन क घटना नह , लगभग नब्बे वष के संघष का प रणाम है। यह संग्राम केवल तलवार
और बंदूक से नह लड़ा गया — यह अदालत, कक्षा, चरखा, अख़बार और क वता से भी लड़ा गया। इसी कारण इसम कसान,
मज़दूर, वद्याथ , स्त्रयाँ, वक ल और क व — सब शा मल थे।
प्रमुख चरण —
सन् 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम — मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, कुँवर सह और बेगम हज़रत महल के
नेतृत्व म लड़ा गया पहला बड़ा संग ठत वद्रोह। यह दबा दया गया, पर इसने आगे क पी ढ़य को रास्ता दखा दया।
सन् 1885 — भारतीय रा ीय कांग्रेस क स्थापना, जससे संघष को एक संग ठत मंच मला।
सन् 1905 — बंग-भंग और स्वदे शी आंदोलन; वदे शी वस्तुओं का ब हष्कार और स्वदे शी का प्रचार।
सन् 1919 — ज लयाँवाला बाग हत्याकांड, जसने पूरे दे श को झकझोर दया और रव द्रनाथ ठाकुर ने ‘नाइट’ क उपा ध
लौटा द ।
सन् 1920–22 — असहयोग आंदोलन और सन् 1930 — नमक सत्याग्रह (दांडी यात्रा), जनम गांधीजी ने सत्य और
अ हसा को संघष का ह थयार बनाया।
सन् 1942 — भारत छोड़ो आंदोलन, जसका नारा था ‘करो या मरो’। इसी आंदोलन म भाग लेने के कारण भवानीप्रसाद
मश्र को तीन वष के कारावास का दं ड मला, और जेल म ही उन्ह ने ‘घर क याद’ लखी।
क्रां तकारी धारा — भगत सह, चंद्रशेखर आज़ाद, राजगुरु, सुखदे व, अशफ़ाक़ल्ला खाँ; और सुभाषचंद्र बोस क आज़ाद हद
फ़ौज, जसका नारा था ‘तुम मुझे खून दो, म तुम्ह आज़ाद दूँ गा’।
15 अगस्त 1947 — भारत स्वतंत्र हुआ; और 26 जनवरी 1950 को सं वधान लागू होने के साथ यह स्वतंत्रता एक गणराज्य के
रूप म स्थर हुई।
सा हत्य क भू मका — स्वाधीनता संग्राम का एक मोचा कलम पर भी था। भारतदु ह रश्चंद्र, मै थलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुवद ,
सुभद्रा कुमारी चौहान, सूयकांत त्रपाठ ‘ नराला’, रामधारी सह ‘ दनकर’ और भवानीप्रसाद मश्र जैसे रचनाकार ने लोग के मन म
आत्मसम्मान जगाया। ‘घर क याद’ इसी परंपरा क क वता है — पर उसका ढं ग नराला है। उसम कोई नारा नह , कोई ललकार
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नह ; वहाँ केवल एक बंद बेटे क याद है। और उस याद के बीच माँ का यह वाक्य पूरे स्वाधीनता आंदोलन का सार बन जाता है —
“पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता।”
नष्कष — स्वतंत्रता हम उपहार म नह मली; वह लाख लोग के त्याग से मली है — और उस त्याग क क मत केवल सेना नय ने
नह , उनके घर ने भी चुकाई है। ‘घर क याद’ हम यही याद दलाती है क हर जेल जाने वाले के पीछे एक घर था, जहाँ कसी पता
क आँख भर आती थ और कोई माँ चुपचाप सबको सँभाल रही थी।
सृजन — पृष्ठ 202
अभ्यास › सृजन
सृ ज न ले ख न
प्र.1 1. कल्पना क जए क क व क माँ को पत्र लखना आता है। क वता म व णत उनक छ व और अनुमान के
आधार पर ल खए क वे क व के लए पत्र म क्या-क्या लखत ?
यह प्रश्न क वता क सबसे मा मक पं क्त से नकला है — “उसे लखना नह आता, जो क उसका पत्र पाता।” अब कल्पना क जए
क उसे लखना आता तो वह पत्र कैसा होता।
अ े उत्तर म क्या-क्या होना चा हए:
पत्र का रूप — स्थान, त थ, संबोधन (‘मेरे प्यारे भवानी’), वषय-वस्तु, समापन और हस्ताक्षर।
माँ क भाषा — सरल, बोलचाल क , जसम ‘ छन’, ‘भौजी’ जैसे घर के शब्द आएँ। बहुत सा ह त्यक हद न
ल खए, वरना वह माँ क नह रहेगी।
माँ का स्वभाव — क वता के अनुसार वह स्नेहमयी भी है और दृढ़ भी। इस लए पत्र म ममता भी हो और
हौसला भी। वह रोएगी नह , बेटे को कमज़ोर नह पड़ने दे गी।
क वता के ब्योरे — पताजी का गीता-पाठ और दं ड, बहन का मायके आना, बेला का फूल, बाड़े क लौक ,
भौजी और सरला — इनम से कुछ का उल्लेख अवश्य क जए। इसी से पत्र इसी क वता का पत्र बनेगा।
नमूना उत्तर:
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गाम — िटगिरया, होशंगाबाद
सावन की तीज, सन् 1942
मेरे प्यारे भवानी,
यहाँ सब कु शल है। त मु अपनी कु शल िलखना, और सच िलखना — बनाकर मत िलखना, मै ं त म्ु हारी माँ हूँ,
त म्ु हारे अक्षरों से ही पढ़ लूगँ ी।
आज सवेरे से पानी बरस रहा है। त म्ु हे ं बरसात िकतनी प्यारी थी, यह सोचकर सारा िदन त म्ु हारी याद आती
रही। बाड़ े में जो लौकी त मु ने बोई थी, उसकी बेल अब मुँडेर तक चढ़ गई है। बेला में भी फूल आए है।
ं त म्ु हारे
िपताजी रोज़ की तरह आज भी गीता पढ़ कर, दंड लगाकर, मुगदर िहलाकर नीचे आए — पर आते ही चुप हो
गए। मैन
ं े पूछा तो कहने लगे, ‘कहाँ, मै ं रोता कहाँ हूँ।’ बेट ा, वे रोए थे । त म्ु हे ं बताने को मना िकया था, िफर भी
िलख रही हूँ, क्योंिक मुझ से िछपाया नही ं जाता।
घर में सब जुड़े है।
ं त म्ु हारी बहन मायके आई है। भौजी और सरला िदन-भर काम में लगी रहती है,ं पर बात-बात
पर आँख भर लेत ी है।
ं छोटे भाई अब भी वही खेल खेलते है,ं बस उनमें एक िखलाड़ ी कम है।
अब एक बात कान खोलकर सुन लो। त मु जहाँ हो, ठीक जगह हो। जो रास्ता त मु ने पकड़ ा है, वह त म्ु हारे
िपताजी का ही रास्ता है। अगर त मु डरकर पाँव पीछे हटा लेते तो मेरी कोख लजाती। इसिलए वहाँ मन छोटा
मत करना, तबीयत का ध्यान रखना, समय पर खाना खाना और रात को जागते मत रहना।
मुझे िलखना नही ं आता था, यह त मु जानते हो। पड़ ोस की िबिटया से पूछ-पूछकर यह पत्र िलखवाया है। िजतना
त मु पढ़ ोगे, उससे ज़्यादा िजतना मैन
ं े नही ं िलखा, वह समझ लेन ा।
त म्ु हारी राह दे खती,
तुम्हारी माँ
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यह पत्र क वता से कैसे जुड़ा है: इसम माँ क तीन वशेषताएँ आ गई ह — ममता (‘म तुम्हारी माँ हूँ, तुम्हारे अक्षर
से ही पढ़ लूँगी’), दृढ़ता (‘पाँव पीछे हटाते तो मेरी कोख लजाती’) और अनपढ़ होने का दुख (‘पड़ोस क ब टया
से पूछ-पूछकर लखवाया है’)। साथ ही क वता के अपने ब्योरे — बाड़े क लौक , बेला का फूल, पताजी का गीता-
पाठ, भौजी और सरला — भी पत्र म लौट आए ह।
प्र.2 2. क वता म माँ और पताजी के बीच क व के वषय म क जाने वाली बातचीत का वणन है। उनक इस बातचीत
को संवाद-लेखन के रूप म प्रस्तुत क जए।
क वता म यह बातचीत पृष्ठ 196–197 पर आती है — पहले माँ बोलती है (“आँख म कस लए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी”), फर
पताजी (“कहाँ, म रोता कहाँ हूँ”)। नीचे उसी को संवाद-लेखन के रूप म खोला गया है।
संवाद-लेखन म ध्यान रखने क बात:
हर पं क्त के आरंभ म बोलने वाले का नाम और उसके बाद वराम- चह्न (:)।
कोष्ठक म भाव या क्रया लख सकते ह — (आँचल से आँख प छते हुए)।
भाषा बोलचाल क हो, जैसी घर म बोली जाती है।
संवाद का एक आरंभ, एक मोड़ और एक अंत हो — यहाँ मोड़ है माँ का ‘लीक’ वाला वाक्य।
नमूना उत्तर:
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(शाम का समय। बाहर झड़ ी लगी है। िपताजी व्यायाम के बाद बरामदे में आकर चुपचाप बैठ गए है।
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aमाँgl: (िपताजी का चे हरा दे खकर िठठकते हुए) आज तो पूरा िनयम कर िलया आपने — गीता भी, दंड भी, मुगदर
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भी। िफर यह मुँह क्यों लटका है?
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िपताजी : कु छ नही ं। बस… यों ही।
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माँ : आँख में िकसिलए पानी है, यह भी ‘यों ही’ है?
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िपताजी : (मुँह फेरकर) कहाँ, मै ं रोता कहाँ हूँ। धीरज खोता कहाँ हूँ मै।
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माँ : मुझ से िछपाइएगा? पचीस बरस हुए इस घर में आए। आपकी आवाज़ का काँपना मै ं पहचानती
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s e m : (कुछ दे र चुप रहकर) आज सवेरे बच्चे आँगन में खेल रहे थे । िगनने लगा तो… एक कम था। और
िपताजी
a glaिफर पानी बरसने लगा। उसे तो बरसात िकतनी प्यारी थी। खुले िसर, नंगे बदन घूमता रहता था। बाड़ े में लौकी
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का बीज लगाकर आता और दौड़ कर त म्ु हे ं बुला लाता — ‘दे खो, बेला में फूल आया!’
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माँ : (धीरे से) आया है इस बार भी बेला में फूल।
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िपताजी : हाय, िकतना सहा होगा उसनेagl। जाने कैसा खाना िमलता होगा, कैसी जगह सोता होगा।
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माँ : वहाँ अच्छा है भवानी। और सुिनए — वह आपका ही मन समझकर, आपका ही अपनापन समझकर गया
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है। गया है सो ठीक ही है। यह तो आपकी ही बनाई हुई लीक है।
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.co : (िसर उठाकर) मेरी लीक? a g
eमाँm: और िकसकी? बचपन से उसने आपके िसवा िकसे दे खा है? आप डरे कभी? मौत के आगे नही ं िहचके, शेर
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के आगे नही ं िबचके । वही तो सीखकर गया है।
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om पर माँ होकर तम्ु हे ं दुख नही ं होता?
िपताजी : (हल्के से मुसकराते हुए, िफर गंभ ीर cहोकर) g l a
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a s emमेरी कोख लजाती। मुझे उस िदन ज़्यादा दुख होता।
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माँ : होता है। पर पाँव जो पीछे हटाता, तो
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िपताजी : (लंबी साँस लेक र) ठीक कहती हो।
माँ : तो अब इस तरह कच्चे मत पिड़ ए। आपको इस हाल में दे खकर बाकी बच्चे भी रो पड़om
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े ं े। इस घर में एक ही
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आदमी को मज़बूत रहना है — और वह आप है।
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a s em िपताजी : (आँख पोंछकर, खड़ े होते हुए) चलो, दीया रख दो दे हरी पर। बािरश ते ज़ हो रही है।
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माँ : (दीया रखते हुए, मन-ही-मन) भगवान करे, जहाँ हो, सुखी हो मेरा लाल।
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(बाहर पानी की झड़ ी लगी रहती है। पद िगरता है।)
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कक्षा 9 हद अध्याय 12 घर क याद AglaSem · NCERT Solutions
यह संवाद क्य सही है: इसम क वता क अपनी पं क्तय को — ‘आँख म कस लए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी’,
‘कहाँ, म रोता कहाँ हूँ’, ‘यह तुम्हारी लीक ही है’, ‘कोख को मेरी लजाता’, ‘रो पड़गे और ब े’ — बोलचाल के रूप
म खोलकर रखा गया है। और दोन पात्र का स्वभाव भी क वता जैसा ही रखा गया है: पता भावुक होकर मुकर जाते
ह, माँ शांत रहकर सँभालती है।
प्र.3 3. इस क वता म क व ने सावन के बादल को संदेशवाहक बनाया है। अगर आपको कसी प्राकृ तक उपादान के
माध्यम से अपने घर, मत्र या कसी संबंधी व्य क्त को कोई संदेश भेजना हो तो आप कसे चुनगे और क्य ?
यह कल्पना-प्रधान प्रश्न है, इस लए उत्तर म चुनाव + कारण + उस उपादान के गुण + आपका संदेश — चार होने चा हए।
अ े उत्तर म क्या-क्या होना चा हए:
आपने जो उपादान चुना है, उसका कोई गुण आपके संदेश से मेल खाना चा हए (बादल चुना गया क्य क वह
चलता है, बरसता है और दूर तक जाता है)।
संदेश कसे भेजा जा रहा है और क्य — यह स्पष्ट हो।
दो-चार पं क्तयाँ संबोधन-शैली म ल खए, जैसे क व ने ‘हे सजीले हरे सावन’ कहा है।
अंत म एक वाक्य म यह भी बताइए क दूसरे वकल्प क्य नह चुने।
नमूना उत्तर 1 — म ‘हवा’ को चुनूँगा/चुनूँगी
म अपना संदेश हवा के हाथ भेजूँगा। कारण यह है क हवा हर जगह पहुँचती है — बंद खड़क क झरी से भी, और ऊँची द वार के
ऊपर से भी। उसे कसी रास्ते, कसी टकट और कसी अनुम त क ज़रूरत नह । मुझे अपने दादाजी को संदेश भेजना है, जो गाँव म
अकेले रहते ह और जनके पास फ़ोन नह है। मेरा संदेश यह होगा —
हे धीमे-धीमे चलती हवा!
तू जब उनके आँगन के नीम से गुज़रे, तो ज़रा ठहर जाना।
उनसे कहना — पोता ठीक है, पढ़ रहा है, और छु ि यों में आ रहा है।
उनके िसर पर हाथ फेरकर आना, पर उन्हे ं ज़क
ु ाम मत दे दे न ा।
नमूना उत्तर 2 — म ‘नद ’ को चुनूँगा/चुनूँगी
म नद को चुनूँगा, क्य क वह एक ही दशा म, बना रुके, बना थके बहती है — और मेरा शहर उसी नद के कनारे है जहाँ मेरा
मत्र रहता है। नद म द या बहाकर संदेश भेजने क परंपरा भी हमारे यहाँ है। मेरा संदेश होगा — ‘सखी नद , बहते-बहते जब उसके
घाट पर पहुँचो, तो अपनी लहर से उसका पाँव छू लेना और कह दे ना क दोस्ती अब भी वैसी ही है, बस दूरी बढ़ गई है।’
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प्राकृ तक उपादान कौन-सा गुण उसे दूत बनाता है कस तरह के संदेश के लए उपयुक्त
बादल (क वता का चलता है, दू र तक जाता है, बरसता है — यानी वरह और चता का संदेश। का लदास के मेघदूत से यह
चुनाव) भावना उँ डेल सकता है। परंपरा चली आ रही है।
हवा हर जगह पहचु ँ ती है, कोई दीवार उसे नही ं रोकती, चुपचाप कही जाने वाली, कोमल बात। क वता म भी —
छू कर जाती है। “हवा, उनको धीर दे ना”।
नद लगातार बहती है, एक जगह से दू स री जगह तक नरंतरता और स्मृ त का संदेश।
जुड़ी रहती है।
चाँद एक ही चाँद दोनों जगह से िदखाई दे ता है। ‘हम दूर होकर भी एक ही चीज़ दे ख रहे ह’ — इस भाव का
संदेश।
पंछ उड़ ता है, लौट आता है, बोलता है। कुशल-क्षेम क खबर और उत्तर क प्रतीक्षा वाला संदेश।
ध्यान र खए: उपादान का चुनाव मनमाना नह होना चा हए। क व ने सावन इस लए चुना क वह जेल पर भी बरस
रहा है और घर पर भी — यानी वही एक चीज़ है जो दोन जगह साझा है। आप भी वही चु नए जसका कोई गुण
आपके संदेश से मलता हो; तभी उत्तर साथक लगेगा।
व्याकरण क बात — पृष्ठ 202 और 203
अभ्यास › भाषा से संवाद › व्याकरण क बात
भाषा से सं वाद व्याकरण
प्र.1 1. “आज सबका मन चुआ होगा।” — उपयुक्त पं क्त म रेखां कत शब्द क व क क्षेत्रीय/स्थानीय भाषा का शब्द
है। क वता म स्थानीय भाषा के शब्द का सहज प्रयोग हुआ है। क वता से कुछ पं क्तयाँ नीचे द गई ह। उनम
रेखां कत शब्द का अथ स्पष्ट करते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए। • एक छन सौ बरस है रे • तुझे बतलाता क
बेला / ने फलानी फूल झेला • और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला • मन क बड़ का झाड़ जैसे
पहले उदाहरण वाला शब्द दे खए — चुआ (‘आज सबका मन चुआ होगा।’)। ‘चुआ’ का अथ है टपका, बूँद-बूँद गरा; यहाँ भाव है
‘सबका मन भर आया, सबक आँख भीग गईं’। मानक हद म हम ‘टपका’ कहगे, पर क व क बोली का ‘चुआ’ यहाँ कह अ धक
सहज लगता है। अब चार रेखां कत शब्द —
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पं क्त रेखां कत अथ (मानक हद रूप) नया वाक्य
शब्द
“एक िछन सौ बरस है छन क्षण, पल , बहुत थोड़ ा-सा समय। ‘क्षण’ का दे शज/ दाद को दे खते ही थकान एक
रे ” बोलचाल रूप। छन म उतर गई।
“तुझे बतलाता िक फलानी अमुक , कोई िवशेष (व्यिक्त या वस्तु), फलाँ। शब्द -संपदा वह हर बार यही कहता है क
बेल ा / ने फलानी फू ल में — ‘कोई आिद ष्ट (व्यिक्त या वस्तु), अमुक ’। यहाँ अथ फलाना काम कल कर दूँ गा, और
झेल ा” है — बेल ा के फलाँ पौधे ने फू ल िदया। कल कभी आता नह ।
“और भौजी और भौजी भाभी, भाई की पत्नी। ‘भाभी’ का घरे ल ू, स्नेह भरा बोली- भौजी ने आते ही रसोई सँभाल ली
सरला, सहज पानी रूप। और सबके लए चाय बना द ।
सहज तरला”
“मन िक बड़ का झाड़ बड़ बरगद , वट (शब्द -संपदा — ‘बरगद , वट’)। ‘वट’ से बना गाँव के बड़ के नीचे हर शाम बुजग
जैसे ” बोली-रूप। बैठकर बात करते ह।
ऐसे शब्द क वता म क्य ह: भवानीप्रसाद मश्र मध्य प्रदे श के होशंगाबाद (अब नमदापुरम) के ह, और यह क वता
उनके अपने घर क क वता है। घर क बात घर क भाषा म ही स ी लगती है। य द क व ‘ छन’ क जगह ‘क्षण’,
‘भौजी’ क जगह ‘ ातृजाया’ और ‘बड़’ क जगह ‘वटवृक्ष’ लख दे ता, तो अथ वही रहता पर अपनापन चला
जाता। इसी को पुस्तक ‘लोकभाषा क सहजता’ कहती है।
और भी दे खए: क वता म ऐसे कई शब्द ह — न (नद ), हेटे (तुच्छ, कमतर), बचक (सहम), पूर (भरपूर,
बाढ़), झारी (ट ट दार बतन), मुगदर (व्यायाम का उपकरण), तरला (तरल, चंचल)। इनके साथ-साथ उदू के
रोज़मरा शब्द भी ह — नहायत, फक्र, ख्याल, शक, मस्त, वजन। इसी मली-जुली भाषा से क वता बातचीत
जैसी बन जाती है।
प्र.2 (क) 2. नीचे द गई क वता क पं क्तय म आए शब्द क व्याकर णक पहचान ल खए। आपक सहायता के लए
एक उदाहरण नीचे दया गया है। — (क) “बहुत पानी गर रहा है” • ‘पानी’ शब्द है — संज्ञा • ‘बहुत’ शब्द है
— वशेषण • ‘ गर रहा है’ है — क्रया
यह पुस्तक का अपना दया हुआ उदाहरण है। इसे ठ क से समझ लेने पर आगे के सारे उत्तर आसान हो जाएँगे।
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शब्द शब्द- उपभेद कारण
भेद
पानी संज्ञा द्रव्यवाचक संज्ञा यह कसी वस्तु का नाम है — और ऐसी वस्तु का, जसे गना नह , नापा-तौला
जाता है। इसी लए इसे द्रव्यवाचक संज्ञा कहते ह। (कुछ पुस्तक इसे जा तवाचक के
अंतगत भी रखती ह।)
बहुत िवशेषण प रमाणवाचक वशेषण यह ‘पानी’ क मात्रा बता रहा है — कतना पानी? बहुत। संज्ञा क वशेषता बताने
(अ न श्चत प रमाणवाचक) वाला शब्द वशेषण होता है; यहाँ वशेष्य ‘पानी’ है। मात्रा अ न श्चत है, इस लए
अ न श्चत प रमाणवाचक।
गर िक्रया अकमक क्रया, अपूण यह काम होने का बोध कराती है। ‘ गर’ मुख्य क्रया है और ‘रहा है’ सहायक क्रया,
रहा है वतमान काल जो बताती है क काम अभी चल रहा है। इसका कोई कम नह है (‘क्या गर रहा
है?’ का उत्तर कता ‘पानी’ ही है), इस लए अकमक।
पहचानने का सरल तरीका:
संज्ञा — कसी व्य क्त, वस्तु, स्थान, भाव या जा त का नाम। (पानी, बदन, पत्ता, सावन)
सवनाम — संज्ञा के बदले आने वाला शब्द। (वह, जनको, मेरे)
वशेषण — संज्ञा या सवनाम क वशेषता बताने वाला शब्द। (बहुत, खुले, एक, सजीले)
क्रया — कसी काम के होने या करने का बोध कराने वाला शब्द। ( गर रहा है, व्यापा, फरता, फूट जाए)
सबसे आसान जाँच यह है — शब्द से पहले या बाद म प्रश्न लगाकर दे खए: ‘कौन/क्या?’ का उत्तर मले तो संज्ञा या
सवनाम; ‘कैसा/ कतना/कौन-सा?’ का उत्तर मले तो वशेषण; ‘क्या हुआ/क्या कया?’ का उत्तर मले तो क्रया।
प्र.2 (ख) (ख) “ पताजी जनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नह व्यापा” • ‘बुढ़ापा’ शब्द है — • ‘व्यापा’ शब्द है — •
‘ जनको’ शब्द है —
पूरी पहचान इस प्रकार है —
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शब्द शब्द- उपभेद कारण
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भेद
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ag या दशा का नाम है, जसे
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बुढ़ापा संज्ञा भाववाचक संज्ञा यह कसी वस्तु या व्य क्त का नाम नह , एक अवस्था
a g l छु आ या दे खा नह जा सकता — केवल अनुभव कया जा सकता है। यह वशेषण
‘बूढ़ा’ म ‘पा’ प्रत्यय जोड़कर बना है (बूढ़ा + पा = बुढ़ापा), और वशेषण से बनी
संज्ञा प्राय: भाववाचक ही होती है। इसी तरह — मीठा → मठास, ब ा →
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बचपन।
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e का अथ है — फैलना, समा जाना, असर करना। यह काम होने का बोध
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िक्रया
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aे g कराता है, इस लए क्रया है। इसका कता ‘बुढ़ापा’ है और इसका अपना कोई कम
व्यापा अकमक क्रया, सामान्य
भूतकाल (यहाँ नषेध क
साथ — ‘नह व्यापा’) नह है, इस लए अकमक। ‘नह ’ के कारण यह नषेधवाचक वाक्य बन गया है —
अथात् बुढ़ापे का असर उन पर एक क्षण भी नह हुआ।
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सवनाम
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जनको संबंधवाचक सवनाम यह ‘ पताजी’ के स्थान पर आया है और आगे के वाक्यांश को पहले से जोड़ता है —
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(‘जो’ का बहुवचन रूप +
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‘ पताजी, जनको बुढ़ापा नह व्यापा’। जो सवनाम दो उपवाक्य म संबंध जोड़ता
l a se ‘को’ वभ क्त) है, वह संबंधवाचक सवनाम कहलाता है (जो–सो, जसे, जनको, जनका)। यहाँ
a g आदर के कारण बहुवचन रूप ‘ जनको’ प्रयुक्त हुआ है।
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पं क्त का अथ भी दे ख ली जए: “ पताजी जनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नह व्यापा” — अथात् वे पताजी, जन
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agl े रोने से ठ क पहले।
पर बुढ़ापे का एक क्षण के लए भी असर नह हुआ। यही पं क्त क वता म दो बार आती है — पहली बार उनक
ताकत बताने के लए और दूसरी बार उनक
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ध्यान द जए: ‘एक’ (संख्यावाचक वशेषण), ‘क्षण’ (संज्ञा), ‘भी’ ( नपात) और ‘नह ’ ( नषेधवाचक क्रया-
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वशेषण) — इसी पं क्त के ये शब्द भी पहचानने का अच्छा अभ्यास ह।
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(ग) “खुले सर नंगे बदन वह, घूमता फरता मगन वह” • ‘खुले’ शब्द है — • ‘वह’ शब्द है — • ‘बदन’ शब्द है
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प्र.2 (ग)
— • ‘ फरता’ शब्द है —
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पूरी पहचान इस प्रकार है —
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