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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा9
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 1: सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम्
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
1–8 14 49 हन्द
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 1: सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम्
सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् शारदा (कक्षा ९) का प्रथमः पाठः है। यह गीत वधा क रचना है — संस्कृतभाषा क म हमा गाने वाले छह ोक, जनके
रच यता वाराणसी के ‘सावभौमसंस्कृतप्रचारकायालय’ के संस्थापक प ण्डत वासुदेव-शास्त्री द्ववेद ह। पाठ के साथ पुस्तक स्वयं भावाथः ( ोक
का संस्कृत सारांश), सव शब्दे न भासते (शब्दाथ-ता लका), अत्र इदम् अवधेयम् (क वकाव्यप रचय), स्वाध्यायान्मा प्रमदः (पञ्चशील तथा तीन
ोक) तथा यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् (भाषणप्र तयो गता एवं अङ् कयोजना) दे ती है। अभ्यास अभ्यासाद् जायते स द्धः शीषक के नीचे
आठ प्रश्न म है — गीतगायनम्, एकपदे न उत्तरम्, पूणवाक्येन उत्तरा ण, रक्तस्थानपू तः, मञ्जूषापदै ः वाक्यरचना, समस्तपद वग्रहः, पयायपदचयनम्
तथा मेलनम्।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
शारदा (कक्षा 9) 1–8
खं ड प्रश्न
14 49
माध्यम
हन्द
पाठ-प रचयः — पृष्ठ 1
गीतस्य प्रस्तावना — गद्यांशः
पाठ-प रचयः
प्र.1 गीतस्य आरम्भे यः गद्यांशः दत्तः, तस्य आशयं लखत — “संस्कृतं भारतदे शस्य सम्पद स्त। अ स्मन् भारतीयानां
ानवैभवं स ञ्चतम स्त। संस्कृताध्ययनेन मानवः सुसंस्कृतः भव त। भारतीयभाषाणां सुचारुरूपेण अध्ययनाथ
संस्कृतं नतराम् अपे क्षतम् अ स्त। संस्कृताध्ययनेन क क सा धतं भव त इ त वषयम् अ धकृत्य क वना सुन्दरं
गीतं प्रस्तुतम्।”
अस्य गद्यांशस्य आशयः — संस्कृतं भारतदे शस्य सम्पत् अ स्त, अस्यां भाषायाम् एव भारतीयानां ानवैभवं स ञ्चतम्
अ स्त। संस्कृताध्ययनेन मानवः सुसंस्कृतः भव त। अन्यासां भारतीयभाषाणां सम्यक् अध्ययनाथम प संस्कृतम् अत्यन्तम्
आवश्यकम्। एतमेव वषयम् आधृत्य क वना इदं गीतं र चतम्।
( हन्द — संस्कृत भारत दे श क सम्प त्त है। इसी भाषा म भारतीय का ानवैभव सं चत है। संस्कृत के अध्ययन से मनुष्य सुसंस्कृत
बनता है। भारतीय भाषाओं को भली-भाँ त पढ़ने के लए भी संस्कृत अत्यन्त अपे क्षत है। ‘संस्कृत पढ़ने से क्या-क्या सद्ध होता है’
— इसी वषय को लेकर क व ने यह सुन्दर गीत प्रस्तुत कया है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
वाक्यम् क्या कहता है
संस्कृ तं भारतदे शस्य सम्पदिस्त संस्कृ त भारत की धरोहर है — के वल एक िवषय नही,ं रा की िनिध।
अिस्मन् भारतीयानां ानवैभवं वेद , उपिनषद् , आयुवद , गिणत, ज्योितष, काव्य — सारा ान इसी भाषा में जमा है।
सिञ्चतमिस्त
संस्कृ ताध्ययनेन मानवः सुस ंस्कृ तः भाषा के वल शब्द नही ं दे ती, संस्कार दे ती है — यही आगे श्लोक २ का िवषय है।
भवित
भारतीयभाषाणां … संस्कृ तं िनतराम् िहन्दी, मराठी, बाङ् ग्ला, तेल ुग,ु क न्नड आिद का मूल शब्दभण्डार संस्कृ त है, इसिलए संस्कृ त जाने िबना वे
अपेिक्षतम् भाषाएँ भी अधूरी समझ में आती है।ं
यह गद्यांश गीत से कैसे जुड़ता है: अ न्तम वाक्य ही गीत क भू मका है — ‘संस्कृताध्ययनेन क क सा धतं
भव त’। पूरा गीत इसी प्रश्न का उत्तर है : पहला ोक कहता है एकता सधती है, दूसरा कहता है संस्कार सधता है,
तीसरा वश्वबन्धुत्व, चौथा त्याग-सेवा का व्रत, पाँचवाँ चार पुरुषाथ और छठा सौन्दय तथा पूवज का यश। इस प्रकार
गद्यांश प्रश्न रखता है और छह ोक उत्तर दे ते ह।
ध्यान द: ‘सम्पद स्त’ = सम्पत् + अ स्त (व्यञ्जनस न्ध — त् + अ → द्); ‘स ञ्चतम स्त’ = स ञ्चतम् + अ स्त;
‘अ धकृत्य’ ( द्वतीया के साथ) का अथ है ‘को लेकर, के वषय म’ — यही रूप अभ्यास के अ न्तम भाग म भी आया
है (‘इ त वषयम धकृत्य’)।
गीतम् — ोकानां भावाथः — पृष्ठ 1–2
षट् ोकाः — पद े दः, अन्वयः, शब्दाथः, हन्द अथः, भावः
भावाथः
प्र.1 प्रथमस्य ोकस्य पद े दम् अन्वयं शब्दाथ भावाथ च लखत — “भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम् /
भारतीयत्वसम्पादकं संस्कृतम् / ानपुञ्जप्रभादशकं संस्कृतम् / सवदानन्दसन्दोहदं संस्कृतम्॥ १॥”
भारतीयैक तासाधकं संस्कृ तम्
भारतीयत्वसम्पादकं संस्कृ तम्
ानपुञ् जपभादशकं संस्कृ तम्
सवदानन्दसन्दोहदं संस्कृ तम्॥ १॥
पद े दः — भारतीय-ऐकता-साधकम् + संस्कृतम् + भारतीयत्व-सम्पादकम् + संस्कृतम् + ान-पुञ्ज-प्रभा-दशकम् + संस्कृतम् +
सवदा + आनन्द-सन्दोह-दम् + संस्कृतम्।
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अन्वयः — संस्कृतं भारतीयैकतासाधकम् (अ स्त)। संस्कृतं भारतीयत्वसम्पादकम् (अ स्त)। संस्कृतं ानपुञ्जप्रभादशकम् (अ स्त)।
संस्कृतं सवदा आनन्दसन्दोहदम् (अ स्त)।
पदम् शब्दाथः
भारतीयैक तासाधकम् भारतीयानाम् ऐ क्यस्य साधकम् — भारतीयों की एकता को िस द्ध करने वाली
भारतीयत्वसम्पादकम् भारतीयत्वं स म्पादयित इित — भारतीयता को अिजत कराने वाली
पुञ्जः रािशः — समूह, ढे र
पभा दीिप्तः — पकाश, आभा
ानपुञ्जपभादशकम् ानपुञ्जस्य पभां दशयित इित — ान-रािश की आभा िदखाने वाली
सवदा सदै व — हमेशा
सन्दोहः समूहः — समूह
सन्दोहदम् स न्दोहं ददाित इित — समूह को दे ने वाली
हन्द अथ — संस्कृत भारतीय क एकता को सद्ध करने वाली है; वही भारतीयता (भारतीय होने के भाव) को अ जत कराने वाली
है; वही ान क वशाल रा श क आभा दखाने वाली है; और वही सदा आनन्द का समूह — अथात् आनन्द क अटू ट परम्परा —
दे ने वाली है।
भावः (पुस्तक का अपना भावाथ १): “संस्कृतभाषा भारतीयानाम् ऐक्यं साधय त, भारतीयत्वं सम्पादय त,
ानसमूहस्य प्रभां दशय त, सवदा आनन्दस्य परम्परामेव जनय त च।” — भारत म भाषाएँ अनेक ह, पर उनका
शब्दभण्डार, वचार और सा ह त्यक परम्परा एक ही ोत से आती है। इसी लए संस्कृत उत्तर से द क्षण तक क
भाषाओं को जोड़ने वाली कड़ी है — वह ‘एकता को बनाती’ नह , ‘एकता को सद्ध (साधय त) करती’ है, क्य क
एकता पहले से भीतर है, संस्कृत उसे प्रकट कर दे ती है।
स -सङ् केत: भारतीयैकता = भारतीय + ऐकता → अ + ऐ = ऐ (वृ द्ध स )। सवदानन्द = सवदा + आनन्द
→ आ + आ = आ (द घ स )। दोन ही स न्धयाँ इसी गीत म बार-बार आती ह, इस लए इन्ह यह पकड़ ली जए।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम्
a g l AglaSem · NCERT Solutions
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प्र.2
सववाणीप रष्कारकं संस्कृतम् / सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम् / स णग्रामस ायकं संस्कृतम्e॥m
द्वतीयस्य ोकस्य पद
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े दम् अन्वयं शब्दाथ भावाथ च लखत — “सवम स्तष्कसंस्कारकं संस्कृतम् /
o m l as
२॥”
. c a g
उत्तर as
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agl
सवमिस्तष्कसंस्कारकं संस्कृ तम्
co m
e m . ag
as
सववाणीपिरष्कारकं संस्कृ तम्
सत्पथपेरणादायकं संस्कृ तम् a g l
ु गामसन्धायकं संस्कृ तम्॥ २॥
सद् गण
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em.
m l as
.co a g
पद े दः — सव-म स्तष्क-संस्कारकम् + संस्कृतम् + सव-वाणी-प रष्कारकम् + संस्कृतम् + सत्पथ-प्रेरणा-दायकम् + संस्कृतम् +
a s em
स ण-ग्राम-सन्धायकम् + संस्कृतम्।
l — संस्कृतं सवम स्तष्कसंस्कारकम् (अ स्त)। संस्कृतं सववाणीप रष्कारकम् (अ स्त)। संस्कृतं सत्पथप्रेरणादायकम् (अ स्त)।
gअन्वयः
a संस्कृतं स णग्रामसन्धायकम् (अ स्त)।
m a s
em
.co agl
s
पदम् शब्दाथः
मिस्तष्कम् द्धःg
मानसम्, बुिa l a
— मन, मिस्तष्क
संस्कारकम् संस्कारं करोित इित — संस्कार दे ने वाली, शुद्ध करने वाली
co m
m .
m ase
l
वचनम्, भाषा — वाणी
.co g
वाणी
m a
l a se पिरष्कारकम् संस्कारकम् — शुद्ध करने वाली, माँजने वाली
a g स न्मागः — स त्य का, अच्छाई का माग
m
सत्पथः
पेरणां ददाित इित — पेरणाoदे m l a se
. c ने वाली
a g
m
पेर णादायकम्
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ग ामः
ag laह (यहाँ ‘गाँव’ नही)ं
समूहः — समू
स न्धानं करोित इित — जोड़ ने वाली, एक त्र करने वाली
om
सन्धायकम्
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s e m प रष्कृत — शुद्ध और सुन्दर —
la वाली है।
m है; सन्माग क ओर प्रेरणा देने वाली है; और स ण के समूह को एक साथ gजोड़ने
हन्द अथ — संस्कृत सब लोग के म स्तष्क (मन) को संस्का रत करने वाली है; सबक वाणी को
करने o
. c वाली a
a sem
agl भावः (पुस्तक का भावाथ २): “संस्कृतं सवषां जनानां मानसं शोधय त, वचना न प रष्करो त, सन्माग दशय त,
c
m .
s e
स णानां समूहमेव उत्पादय त।” — ध्यान द जए, ोक का क्रम भीतर से बाहर क ओर है : पहले मन सुधरता है,
. c om
फर वाणी सुधरती है, फर आचरण (सत्पथ) बनता है, और अन्त म वह आचरण जमकर स ण का समूह बन
a g la
जाता है। यही कसी भी शक्षा क स m
a s e ी कसौट है — जो पढ़ाई मन और वाणी को न बदले, वह केवल सूचना है,
संस्कार नह ।
agl
co m
m .
m as e
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ध्यान द: ‘ग्राम’ शब्द यहाँ गाँव नह , समूह है — जैसे संगीत म ‘स्वरग्राम’ का अथ स्वर का समूह होता है। यही अथ
‘स णग्राम’ म ली जए। ‘स ण’ = सत् + गुण (व्यञ्जनस न्ध — त् + ग → द्)।
प्र.3 तृतीयस्य ोकस्य पद े दम् अन्वयं शब्दाथ भावाथ च लखत — “ वश्वब ुत्व वस्तारकं संस्कृतम् /
सवभूतैकताकारकं संस्कृतम् / सवतः शा न्तसं ापकं संस्कृतम् / पञ्चशीलप्र तष्ठापकं संस्कृतम्॥ ३॥”
िवश्वबन्धुत्विवस्तारकं संस्कृ तम्
सवभूतै क ताकारकं संस्कृ तम्
सवतः शािन्तसंस्थापकं संस्कृ तम्
पञ्चशीलपितष्ठापकं संस्कृ तम्॥ ३॥
पद े दः — वश्व-बन्धुत्व- वस्तारकम् + संस्कृतम् + सव-भूत-ऐकता-कारकम् + संस्कृतम् + सवतः + शा न्त-संस्थापकम् +
संस्कृतम् + पञ्च-शील-प्र तष्ठापकम् + संस्कृतम्।
अन्वयः — संस्कृतं वश्वबन्धुत्व वस्तारकम् (अ स्त)। संस्कृतं सवभूतैकताकारकम् (अ स्त)। संस्कृतं सवतः शा न्तसंस्थापकम्
(अ स्त)। संस्कृतं पञ्चशीलप्र तष्ठापकम् (अ स्त)।
पदम् शब्दाथः
िवश्वबन्ध त्ु वम् िवश्वस्य बन्धुत्वम् — सारे संस ार से भाईचारा
िवस्तारकम् िवस्तारं करोित / िवतनोित यत् — फै लाने वाली
सवभूतैक ता सवषां भूतानाम् (पािणनाम्) ऐ क्यम् — सब पािणयों की एकता
कारकम् करोित इित — करने वाली
सवतः सवत्र, सवपकारे ण — सब ओर, हर तरफ़
संस्थापकम् संस्थापयित इित — भली-भाँित स्थािपत करने वाली
पञ्चशीलम् पिस द्धािन पञ्च शीलािन — अस्तेय, अिहंस ा, बह्मचय, स त्य, मादकद व्य-पिरहार
पितष्ठापकम् पितष्ठां नयित इित — पितिष्ठत करने वाली
हन्द अथ — संस्कृत वश्वबन्धुत्व का वस्तार करने वाली है; समस्त प्रा णय म एकता का भाव उत्पन्न करने वाली है; सब ओर
शा न्त क स्थापना करने वाली है; और पञ्चशील (पाँच सदाचार ) को प्र त ष्ठत करने वाली है।
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भावः (पुस्तक का भावाथ ३): “संस्कृतं वश्वबन्धुत्वं वधय त, सवषां प्रा णनाम प ऐक्यं बोधय त, सवत्रा प शा न्त
प्र तष्ठापय त, प्र सद्धानां पञ्चानां शीलानां री त गमय त।” — पहला ोक भारत क एकता क बात करता था; यह
तीसरा ोक उसी वृत्त को बढ़ाकर वश्व तक ले जाता है, और फर मनुष्य से भी आगे सवभूत — हर प्राणी —
तक। ‘वसुधैव कुटु म्बकम्’ तथा ‘सव भवन्तु सु खनः’ जैसे वाक्य इसी भाषा से नकले ह, इसी लए क व संस्कृत को
वश्वशा न्त का साधन कहता है।
स तथा सन्दभ: सवभूतैकता = सवभूत + एकता → अ + ए = ऐ (वृ द्ध स न्ध)। ‘पञ्चशील’ क्या है — यह
पुस्तक स्वयं पृष्ठ ७ के ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ खण्ड म बताती है; उसे इसी ोक के साथ प ढ़ए।
प्र.4 चतुथस्य ोकस्य पद े दम् अन्वयं शब्दाथ भावाथ च लखत — “त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम् /
वश्वकल्याण नष्ठायुतं संस्कृतम् / ान व ानसम्मेलनं संस्कृतम् / भु क्तमु क्तद्वयोद्वे लनं संस्कृतम्॥ ४॥”
त्यागसन्तोषसेवावतं संस्कृ तम्
िवश्वकल्याणिनष्ठायुतं संस्कृ तम्
ानिव ानसम्मेलनं संस्कृ तम्
भुिक्तमुिक्तद्वयोद्वेलनं संस्कृ तम्॥ ४॥
पद े दः — त्याग-सन्तोष-सेवा-व्रतम् + संस्कृतम् + वश्व-कल्याण- नष्ठा-युतम् + संस्कृतम् + ान- व ान-सम्मेलनम् + संस्कृतम् +
भु क्त-मु क्त-द्वय-उद्वे लनम् + संस्कृतम्।
अन्वयः — संस्कृतं त्यागसन्तोषसेवाव्रतम् (अ स्त)। संस्कृतं वश्वकल्याण नष्ठायुतम् (अ स्त)। संस्कृतं ान व ानसम्मेलनम् (अ स्त)।
संस्कृतं भु क्तमु क्तद्वयोद्वे लनम् (अ स्त)।
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पदम् शब्दाथः
त्यागः दानम्, पिरत्यागः — छोड़ ना, दे ना
सन्तोषः हषः, तिृ प्तः — स न्तोष, तिृ प्त
वतम् िनयमः, सङ् क ल्पः — वत, संक ल्प
िनष्ठायुतम् िनष्ठया युतम् — िनष्ठा से युक्त
सम्मेल नम् सङ् गमः, िमलनम् — मेल , संगम
भुिक्तः भोगः — सांस ािरक भोग
मुिक्तः मोक्षः — मुिक्त, मोक्ष
उद्वेल नम् उदयकृ त् (उद् + √वेल + ल्युट्) — उठाने वाला, उभारने वाला
हन्द अथ — संस्कृत त्याग, सन्तोष तथा सेवा का व्रत है; वश्व के कल्याण क नष्ठा से युक्त है; ान और व ान — दोन का
संगम है; तथा भु क्त (भोग) और मु क्त (मोक्ष) — इन दोन को ही ऊपर उठाने वाली है।
भावः (पुस्तक का भावाथ ४): “त्यागस्य, हषस्य, सेवाबुद्धेश्च व्रतं, प्रपञ्चस्य मङ्गलमेव कतव्यम् इ त ानं,
व ानञ्च सङ्गमनीयम् इ त वचारः, भोगस्य मोक्षस्य च मागः च संस्कृतेन लभ्यः।” — यहाँ ोक का सबसे बड़ा
सन्दे श तीसरी और चौथी पं क्त म है। संस्कृत ान (तत्त्व ान) और व ान (व्यावहा रक शास्त्र — आयुवद, ग णत,
ज्यो तष) को अलग-अलग खान म नह रखती, दोन को एक ही परम्परा म मलाकर चलती है। इसी तरह वह भोग
और मोक्ष को एक-दूसरे का शत्रु नह मानती — गृहस्थ जीवन भी उतना ही धम है जतना संन्यास।
स -सङ् केत: द्वयोद्वे लनम् = द्वय + उद्वे लनम् → अ + उ = ओ (गुण स )। तथा ‘उद्वे लनम्’ क व्युत्प त्त
पुस्तक स्वयं दे ती है — उद् + √वेल + ल्युट्; ‘ल्युट्’ प्रत्यय से बने शब्द नपुंसक लङ्ग म ‘-अनम्’ पर समाप्त होते ह
(जैसे गम् + ल्युट् = गमनम्)।
प्र.5 पञ्चमस्य ोकस्य पद े दम् अन्वयं शब्दाथ भावाथ च लखत — “धमकामाथमोक्षप्रदं संस्कृतम् /
ऐ हकामु ष्मकोत्कषदं संस्कृतम् / कमदं ानदं भ क्तदं संस्कृतम् / सत्य नष्ठं शवं सुन्दरं संस्कृतम्॥ ५॥”
धमकामाथमोक्षपदं संस्कृ तम्
ऐिहकामुिष्मकोत्कषदं संस्कृ तम्
कमदं ानदं भिक्तदं संस्कृ तम्
सत्यिनष्ठं िशवं सुन्दरं संस्कृ तम्॥ ५॥
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पद े दः — धम-काम-अथ-मोक्ष-प्रदम् + संस्कृतम् + ऐ हक-आमु ष्मक-उत्कष-दम् + संस्कृतम् + कमदम् + ानदम् + भ क्तदम् +
संस्कृतम् + सत्य नष्ठम् + शवम् + सुन्दरम् + संस्कृतम्।
अन्वयः — संस्कृतं धमकामाथमोक्षप्रदम् (अ स्त)। संस्कृतम् ऐ हकामु ष्मकोत्कषदम् (अ स्त)। संस्कृतं कमदं ानदं भ क्तदं च
(अ स्त)। संस्कृतं सत्य नष्ठं शवं सुन्दरं च (अ स्त)।
पदम् शब्दाथः
धम-काम-अथ-मोक्ष चत्वारः पुरुषाथ ः — चार पुरुषाथ
पदम् पयच्छित इित — दे ने वाली
ऐिहकम् इह लोके भवम्, संस ारस्य — इस लोक का
आमुिष्मकम् परलोक स्य — परलोक का
उत्कषदम् उ त्कष ं ददाित इित — उ न्नित दे ने वाली
कमदम् कम ददाित इित — पुरुषाथ/स त्कम दे ने वाली
भिक्तदम् भिक्तं ददाित इित — भिक्त दे ने वाली
सत्यिनष्ठम् स त्ये िनष्ठा यस्य तत् — स त्य में िनष्ठा रखने वाली
हन्द अथ — संस्कृत धम, अथ, काम तथा मोक्ष — चार पुरुषाथ को दे ने वाली है; इस लोक और परलोक — दोन म उत्कष दे ने
वाली है; कम दे ने वाली, ान दे ने वाली तथा भ क्त दे ने वाली है; और वह स्वयं सत्य म नष्ठ, कल्याणकारी ( शव) तथा सुन्दर है।
भावः (पुस्तक का भावाथ ५): “इहलोके परलोके च संस्कृतेन उत्कषः लभ्यते। धमस्य, कामानाम्, अथस्य,
मोक्षस्या प साधना न संस्कृतेन लभ्यन्ते। भ क्तम् आच रतुं ानं प्राप्तुं कम कतु च संस्कृतं साधनम्। अतः संस्कृतं सत्यं
शवं सुन्दरं च अ स्त।” — यही ोक पूरे पाठ का शीषक- ोक है : ‘सत्यं शवं सुन्दरम्’ पाठ का नाम इसी
अ न्तम पं क्त से बना है। तीसरी पं क्त भारतीय परम्परा के तीन माग — कममाग, ानमाग तथा भ क्तमाग — को
एक साथ रखती है और कहती है क तीन के ग्रन्थ संस्कृत म ही मलते ह।
स -सङ् केत: ऐ हकामु ष्मकोत्कषदम् म दो स न्धयाँ एक साथ ह — ऐ हक + आमु ष्मक → अ + आ = आ
(द घ स न्ध), फर आमु ष्मक + उत्कषदम् → अ + उ = ओ (गुण स न्ध)। इसी प्रकार धमकामाथ = काम + अथ
→ अ + अ = आ (द घ स न्ध)।
Did you know? ‘सत्यं शवं सुन्दरम्’ भारतीय सौन्दयशास्त्र का प्र सद्ध सूत्र है — जो सत्य है वही
कल्याणकारी है, और जो कल्याणकारी है वही सचमुच सुन्दर है। क व यही तीन कसौ टयाँ संस्कृत पर लगाता है
और तीन पर वह खरी उतरती है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम्
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षष्ठस्य ोकस्य पद
m .co
े दम् अन्वयं शब्दाथ भावाथ च लखत — “शब्दला लत्यलीलावनं संस्कृतम् /
se
प्र.6
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चारुमाधुयधारागृहं संस्कृतम् / वश्वचेतश्चमत्कारकं संस्कृतम् / पूवजानां यशः स्मारकं संस्कृतम् ॥ ६॥”
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उत्तर as
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ag l
शब्दलािलत्यलीलावनं संस्कृ तम्
co m
em . ag
as
चारुमाधुयधारागृहं संस्कृ तम्
िवश्वचे त श्चमत्कारकं संस्कृ तम् a g l
पूवजानां यशः स्मारकं संस्कृ तम्॥ ६॥
co m
em.
m l as
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पद े दः — शब्द-ला लत्य-लीलावनम् + संस्कृतम् + चारु-माधुय-धारा-गृहम् + संस्कृतम् + वश्व-चेतः + चमत्कारकम् + संस्कृतम् +
a s em
पूवजानाम् + यशः + स्मारकम् + संस्कृतम्।
l — संस्कृतं शब्दला लत्यलीलावनम् (अ स्त)। संस्कृतं चारुमाधुयधारागृहम् (अ स्त)। संस्कृतं वश्वचेतश्चमत्कारकम् (अ स्त)।
gअन्वयः
a संस्कृतं पूवजानां यशःस्मारकम् (अ स्त)।
m a s
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.co agl
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पदम् शब्दाथः
लािलत्यम् माधुयम्a, g
a
l मायम् — कोमलता, लािलत्य
सौकु
लीलावनम् लीलायाः वनम् — ीडा का उ द्यान
com
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m as e
l
सुन्दरम् — मनोहर
.co g
चारु
m a
l a se माध यु धारा माधुयस्य धारा — मधुर रस की धारा
a g आवासः, शीतलगृहम् — घर, आश्रय
m
ग ृहम्
िवश्वस्य चेतः (िचत्तम्)o—m l a se
. c संस ार का मन
a g
m
िवश्वचेतः
s e
चमत्कारकम्
ag laकरोित इित — चिकत करने वाली
चमत्कारं
स्मारयित इित, द्य ोतकम् — स्मरण कराने वाली
om
स्मारकम्
हन्द अथ — संस्कृत शब्द के ला लत्य का क्र डा-उद्यान है; मनोहर माधुय क धारा का घर है; m
. c
s e
c नेm glaहै।
समस्त संसार के चत्त को चमत्कृत
कर देo
. वाली है; और पूवज के यश क स्मारक — उनक क त को याद दलाने वाली —
a
a sem
agl भावः (पुस्तक का भावाथ ६): “ल लतपद्या न संस्कृतवने वृक्षाः इव स न्त। अन्वेषकस्य संस्कृतं माधुयस्य सौन्दयस्य
c
m .
s e
शीतलगृह मव आ ादकम् अ स्त। संस्कृतस्य श्रवणेन अ खलस्या प प्रपञ्चस्य जनाः चमत्कारं लभन्ते। अत एव
ोक संस्कृत la
. c om g
उसके सौन्दय क बात करता है। क व दो सुन्दर रूपक दे ता है — संस्कृत a
एतादृशं संस्कृतम् अस्माकं भारतीयानां पूवजैः सम्पा दतस्य क तराशेः द्योतकम् अ स्त।” — पहले पाँच
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एक लीलावन (क्र डा-उद्यान)gहैlaजसम ल लत पद्य वृक्ष क तरह खड़े ह, और वह माधुय क धारा का शीतल गृह है,
के उपयोग गनाते थे; यह अ न्तम ोक
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जहाँ खोजी मन को वश्राम मलता है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
स तथा अलङ् कार: वश्वचेतश्चमत्कारकम् = वश्वचेतः + चमत्कारकम् — वसग के बाद ‘च्’ आने पर वसग
‘श्’ हो जाता है ( वसगस — श्चत्व)। ‘लीलावनम्’ तथा ‘माधुयधारागृहम्’ म रूपक अलङ् कार है — संस्कृत
पर वन और गृह का आरोप कया गया है। छह ोक क हर पं क्त ‘संस्कृतम्’ पर समाप्त होती है — यह पदावृ त्त
गीत को उसक लय दे ती है।
सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 3–4
शब्दाथ-ता लका तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त स्तम्भस्य पू तः
कायकलापः
प्र.1 ‘सव शब्दे न भासते’ इ त ता लकायाः अ न्तमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अथ लखत’ — रक्तः अ स्त। पाठे
प्रयुक्तानां शब्दानाम् अथान् ात्वा तं स्तम्भं पूरयत।
पुस्तक म यह अ न्तम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — वद्याथ को हर शब्द का अथ अपनी मातृभाषा म लखना है।
नीचे क ता लका म वह स्तम्भ हन्द (हमारी माध्यम-भाषा) म भर दया गया है; जनक मातृभाषा मराठ , बाङ् ग्ला, गुजराती,
त मऴ, तेलुगु, ओ ड़आ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अथ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रख।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH मातृभाषया अथम् (भरा
हुआ — हन्द )
आमुिष्मकम् (नपुं.प.ए.व.) परलोकस्य परलोक का Of the other world परलोक -स म्बन्धी, मरने के बाद
के लोक का
उत्कषदम् (नपुं.प.ए.व.) उत्कष ददा त इ त उन्न त को दे ने Bestower of उ न्नित दे ने वाला, ऊपर उठाने
वाली excellence वाला
उद्वेल नम् (उद् + √वेल + उदयकृत् उत्थान करने Awakener उभारने वाला, जगाने वाला
ल्युट्, नपुं.प.ए.व.) वाला
ऐिहकम् (नपुं.प.ए.व.) इह लोके भवम्, संसार का Of this world इस लोक का, इसी जीवन से
संसारस्य जुड़ा
कमदम् (नपुं.प.ए.व.) कम ददा त इ त पुरुषाथ को Bestower of स त्कम की पेरणा दे ने वाला
दे ने वाली righteous action
चारु (नपु.ं प.ए.व.) सुन्दरम् मनोहर Beautiful सुन्दर, मन को हरने वाला
पिरष्कारकम् (नपुं.प.ए.व.) संस्कारकम् शुद्ध करने Refiner माँजकर िनखारने वाला, शुद्ध
वाली करने वाला
पुञ्जः (पु.ं प.ए.व.) रा शः समूह Clump ढे र, रािश
पभा (स्त्री.प.ए.व.) द प्तः प्रकाश Light आभा, चमक
भिक्तदम् (नपुं.प.ए.व.) भ क्तं ददा त इ त भ क्त को दे ने Bestower of Bhakti भिक्त-भाव जगाने वाला
वाली
माध यु धारा (स्त्री.प.ए.व.) माधुयस्य धारा इ त मधुर रस क Flow of Sweetness िमठास की बहती धारा
धारा
िवस्तारकम् (नपुं.प.ए.व.) वस्तारं करो त / वस्तार करने Expander फै लाने वाला, बढ़ ाने वाला
वतनो त यत् वाली
लीलावनम् (नपुं.प.ए.व.) लीलायाः वनम् क्र डा का Garden for play खेल ने का बगीचा
उद्यान
सत्पथः (पुं.प.ए.व.) सन्मागः सत्य माग Noble Path अच्छाई का रास्ता, स न्माग
सन्दोहः (पुं.प.ए.व.) समूहः समूह Group समुच्चय, ढे र
नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं म) — मराठ : प्रभा = ‘तेज / प्रकाश’, पुञ्जः = ‘राशी’, चारु = ‘सुंदर’, सत्पथः
= ‘सन्माग’। बाङ् ग्ला: प्रभा = ‘आलो’, सन्दोहः = ‘समूह’, लीलावनम् = ‘खेलार बागान’। गुजराती: माधुयधारा =
‘मीठाश नी धारा’, वस्तारकम् = ‘फेलावनार’। त मऴ: प्रभा = ‘ओ ळ’, सत्पथः = ‘नल्ल व ऴ’। अपनी भाषा म
लखते समय ध्यान र खए क अथ वही रहे जो संस्कृत स्तम्भ म दया है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
यह स्तम्भ क्य रखा गया: संस्कृत का शब्द जब अपनी मातृभाषा के शब्द से जुड़ जाता है, तब वह याद रहता है —
क्य क तब वह ‘नया शब्द’ नह , ‘पहचाना हुआ शब्द’ बन जाता है। ‘प्रभा’, ‘पुञ्ज’, ‘सन्तोष’, ‘सत्पथ’ जैसे अनेक
शब्द तो अ धकांश भारतीय भाषाओं म ज्य के त्य चलते ह — यही पाठ के गद्यांश क बात सद्ध करता है क
भारतीय भाषाओं के अध्ययन के लए संस्कृत ‘ नतराम् अपे क्षतम्’ है।
पुस्तक म छपी दो छोट अशु द्धयाँ: ‘उद्वे लनम्’ के सामने अंग्रेज़ी म Awakene छपा है — शुद्ध रूप
Awakener होना चा हए; तथा ‘भ क्तदम्’ के सामने Bestover छपा है — शुद्ध रूप Bestower है (जैसा
‘उत्कषदम्’ के सामने ठ क छपा है)।
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 4
क वकाव्यप रचयः — प ण्डतः वासुदेव-शास्त्री- द्ववेद
क वकाव्यप रचयः
प्र.1 अस्य गीतस्य रच यतुः प रचयं लखत। तस्य काः कृतयः सुप्र सद्धाः स न्त ?
अस्य गीतस्य रच यता वाराणस्यां वद्यमानस्य ‘सावभौमसंस्कृतप्रचारकायालयस्य’ सं ापकः प ण्डतः वासुदेव-शा स्त्र-
द्ववे दमहाभागः अ स्त। महाशयेन सरलसंस्कृतेन बहवः ग्र ाः वर चताः, संस्कृतप्रचाराथ वपुलं सा हत्यं च प्रका शतम्।
‘परमाथसुधा’ इ त संस्कृतप त्रका अ प एतेन सम्पाद्यते स्म।
( हन्द — इस गीत के रच यता वाराणसी म स्थत ‘सावभौम संस्कृत प्रचार कायालय’ के संस्थापक प ण्डत वासुदेव-शास्त्री द्ववेद
जी ह। उन्ह ने सरल संस्कृत म अनेक ग्रन्थ लखे और संस्कृत के प्रचार के लए वपुल सा हत्य प्रका शत कया। ‘परमाथसुधा’ नामक
संस्कृत-प त्रका का सम्पादन भी वे करते थे।)
क्रमः कृ तः / कायम् स्वरूपम्
१ सुर भारतीसन्दे शः संस्कृ तभाषायाः स न्दे शपरः गन्थः
२ स्वग यसंस्कृ तकिवसम्मेल नम् संस्कृ तकवीनां स म्मेल न-रूपकम्
३ भोजराज्ये संस्कृ तसामाज्यम् राजा भोजस्य संस्कृ त-पेमिवषयकः गन्थः
४ कौत्सस्य ग रु
ु दिक्षणा कौत्स -वरतन्तु-रघु-कथायाम् आधािरतम् आख्यानम्
५ परमाथसुध ा संस्कृ तपित्रका — एतेन स म्पाद्यते स्म
६ सावभौमसंस्कृ तपचारकाय लयः (वाराणसी) संस्थापनम् — संस्कृ तपचारस्य संस्था
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
क व का प रचय गीत को कैसे समझाता है: जस व्य क्त ने जीवन भर संस्कृत के प्रचार के लए संस्था बनाई,
प त्रका नकाली और जान-बूझकर सरल संस्कृत म लखा — वही यह गीत लख सकता था। यही कारण है क पूरे
गीत म क ठन क्रयारूप नह ह; बस एक-एक लम्बा समास और उसके बाद ‘संस्कृतम्’। ऐसा गीत गाया जा सकता
है, याद रखा जा सकता है — और प्रचार के लए यही चा हए था।
ध्यान द: ‘सम्पाद्यते स्म’ कमवाच्य का लङ् -अथ वाला प्रयोग है — वतमान क्रयारूप के साथ ‘स्म’ लगने पर अथ
भूतकाल का हो जाता है (‘सम्पा दत क जाती थी’)। यही नयम ‘पठ त स्म’ = ‘पढ़ता था’ म भी लगता है।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 4
प्रश्न १ — गीतगायनम् (य त-ग त-लयपूवकम्)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.1 छात्राः म लत्वा पृथक् पृथक् पञ्चानां छात्राणां लघुसमूहान् नमाय य त-ग त-लयपूवकं गीतगानस्य अभ्यासं
क रष्य न्त।
यह क्रयात्मक काय है — पाँच-पाँच वद्या थय के छोटे समूह बनाकर पूरे गीत का सस्वर गान करना है। इसका उत्तर कॉपी म नह ,
कक्षा म गाकर दया जाता है। नीचे वह व ध द है जससे गान शुद्ध और सुन्दर बने।
गान क व ध —
1. समूह बनाइए: पाँच-पाँच के समूह; एक वद्याथ ‘सूत्रधार’ बने जो हर ोक क पहली पं क्त आरम्भ करे, शेष चार साथ
दोहराएँ।
2. य तः ( वराम): प्रत्येक पं क्त म समास के बाद और ‘संस्कृतम्’ से पहले एक छोटा वराम ली जए — जैसे ‘भारतीयैकतासाधकं
/ संस्कृतम्’। यही य त है; इसी से लम्बा समास साँस म समा जाता है।
3. ग तः (चाल): चार पं क्तय क चाल एक-सी र खए। हर पं क्त म मात्राएँ लगभग बराबर ह, इस लए एक पं क्त म जतना
समय लगे, अगली म भी उतना ही लगे।
4. लयः (ताल): हर पं क्त ‘संस्कृतम्’ पर समाप्त होती है — इसी आवतन को ताल बना ली जए। ताली इसी शब्द पर पड़े, तो पूरा
समूह एक साथ रहेगा।
5. उच्चारण: संयुक्ताक्षर को न नग लए — ानपुञ्ज, स णग्राम, पञ्चशील, वश्वचेतश्चमत्कारकम्,
भु क्तमु क्तद्वयोद्वे लनम्। ‘म्’ (हलन्त) को पूरा बो लए, ‘म’ नह ।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम्
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ोकः य त ( वराम) कहाँ भावानुसार स्वर
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s का उद् घोष
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१ — भारतीयैक तासाधकं … m समास के बाद, ‘संस्कृतम्’ से पूव
ag laएकता
गौरवपूण, ऊँ चा स्वर —
२ —a s em स्कारकं…
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सवमिस्तष्कसं ‘सव’ के बाद हल्का, फर समासान्त पर शान्त, समझाने वाला स्वर — संस्कार की बात
३ — िवश्वबन्ध त्ु विवस्तारकं … ‘सवतः’ के बाद स्पष्ट वराम िवस्ततृ , खुल ा स्वर — िवश्व तक फै लता भाव
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४ — त्यागसन्तोषसे वावतं…
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‘त्याग-सन्तोष-सेवा’ के तीन खण्ड के बीच दृ ढ़ स्वर — वत का संक ल्प ag
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५ — धमकामाथमोक्षपदं…
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चार पुरुषाथ के बीच हल्का ठहराव तीसरी पंिक्त में तीनों ‘-दं’ पर बल
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कोमल , मधुर स्वर; अिन्तम पंिक्त धीमी और ल म्बी
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६ — शब्दलािलत्यलीलावनं… ‘पूवजानां / यशः / स्मारकम्’ — तीन खण्ड
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अभ्यास क यु क्त: पहले पूरा गीत बना लय के शुद्ध प ढ़ए, फर लय लगाइए। जो पहले शुद्ध नह पढ़ पाता, वह
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लय म और अशुद्ध हो जाता है। समूह म एक वद्याथ को ‘शुद्धता- नरीक्षक’ बनाइए जो केवल उ ारण सुने।
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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 5
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प्रश्न २ — एकपदे न उत्तरं लखत (यथा — ानपुञ्जप्रभादशकं कम् ? — संस्कृतम्)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
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संस्कृतं कस्याः साधकम् ?
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प्र.2 (क)
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aउत्तर
agl उत्तरम् — भारतीयैकतायाः। ( हन्द — भारतीय क एकता का।)
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पाठ की पंिक्त — भारतीयैक तासाधकं संस्कृ तम्
िवगह — भारतीयैक तायाः + साधकम् agl
पश्न ‘कस्याः’ = स्त्रीिलङ् ग · षष्ठी · एकवचन
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अतः उत्तर भी उसी रूप में — भारतीयैक तायाः
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a नयम: ‘साधकम्’ जसका साधक है, उसम सम्बन्धे षष्ठी होती है। ‘एकता’ स्त्री लङ्ग आकारान्त शब्द है, इस लए
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उसक षष्ठी एकवचन ‘एकतायाः’ बनती है (जैसे लता → लतायाः)। ‘कस्याः’ स्वयं स्त्री लङ्ग षष्ठी है — प्रश्न का रूप
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ही उत्तर का रूप तय कर दे ता है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
सावधान: उत्तर ‘भारतीयैकता’ (प्रथमा) लखना अशुद्ध होगा। एकपदे न उत्तर दे ते समय भी वभ क्त प्रश्न के
अनुसार ही रखनी है।
प्र.2 (ख) सवदा संस्कृतं कस्य सन्दोहदम् ?
उत्तरम् — आनन्दस्य। ( हन्द — आनन्द का।)
पाठ की पंिक्त — सवदान न्दसन्दोहदं संस्कृ तम्
सिन्धिवच्छे द ः — सवदा + आनन्द + सन्दोहदम्
िवगह — सवदा आनन्दस्य सन्दोहदम्
‘कस्य’ = पुंिलङ् ग/नपुंसकिलङ् ग · षष्ठी · एकवचन → आन न्द स्य
क्य यही उत्तर: ‘सन्दोहः’ का अथ है समूह, और ‘सन्दोहदम्’ अथात् ‘समूह को दे ने वाली’। कसका समूह ? —
आनन्द का। पुस्तक का भावाथ भी यही कहता है — ‘सवदा आनन्दस्य परम्परामेव जनय त’। ‘सवदा’ अव्यय है,
इस लए वह प्रश्न म भी वैसा ही रहता है और उत्तर म नह आता।
प्र.2 (ग) संस्कृतं कस्य प्रेरणादायकम् ?
उत्तरम् — सत्पथस्य। ( हन्द — सन्माग का / सत्य के माग का।)
पाठ की पंिक्त — सत्पथपेरणादायकं संस्कृ तम्
िवगह — सत्पथस्य पेरणादायकम्
‘सत्पथः’ — पुंिलङ् ग · अकारान्त → षष्ठी एकवचन सत्पथ स्य
शब्द का अथ: पुस्तक क शब्दाथ-ता लका ‘सत्पथः = सन्मागः’ दे ती है, अथात् अच्छाई का रास्ता। संस्कृत उस
रास्ते पर चलने क प्रेरणा दे ती है — पुस्तक का भावाथ २ इसे ‘सन्माग दशय त’ कहकर दोहराता है।
जोड़कर दे खए: यही पद अभ्यास के प्रश्न ८ (मेलनम्) म भी आया है — ‘सत्पथे → प्रेरणादायकम्’। वहाँ सप्तमी
(‘सत्पथे’ = सन्माग पर) है, यहाँ षष्ठी। दोन शुद्ध ह, केवल दृ ष्ट बदलती है।
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प्र.2 (घ) संस्कृतं कासां प रष्कारकम् ?
उत्तरम् — (सव)वाणीनाम्। ( हन्द — सब वा णय का / सबक वाणी का।)
पाठ की पंिक्त — सववाणीपिरष्कारकं संस्कृ तम्
िवगह — सववाणीनां पिरष्कारकम्
‘कासाम्’ = स्त्रीिलङ् ग · षष्ठी · बहुवचन
‘वाणी’ ईकारान्त स्त्रीिलङ् ग → षष्ठी बहवु चन वाणीनाम् (नदी → नदीनाम् इव)
यहाँ बहुवचन क्य : प्रश्न म ‘कासाम्’ है, ‘कस्याः’ नह — अथात् उत्तर बहुवचन म चा हए। पद म ‘सव’ जुड़ा है,
इस लए बात एक वाणी क नह , सब लोग क वाणी क है। पुस्तक का भावाथ भी बहुवचन म है — ‘वचना न
प रष्करो त’।
ध्यान द: ‘प रष्कारकम्’ म ‘प र’ उपसग + √कृ है; ‘प र’ के बाद ‘स्’ का ‘ष्’ हो जाता है — षत्व वधान (प र +
स्कारक → प रष्कारक)। इसी नयम से ‘प रष्कार’, ‘प रष्कृत’ बनते ह।
प्र.2 (ङ) कस्य वस्तारकं संस्कृतम् ?
उत्तरम् — वश्वब ुत्वस्य। ( हन्द — वश्वबन्धुत्व का / सारे संसार के भाईचारे का।)
पाठ की पंिक्त — िवश्वबन्धुत्विवस्तारकं संस्कृ तम्
िवगह — िवश्वबन्धुत्वस्य िवस्तारकम्
‘बन्धुत्वम्’ नपुंसकिलङ् ग → षष्ठी एकवचन बन्धुत्वस्य
शब्द कैसे बना: बन्धु + त्व प्रत्यय = बन्धुत्वम् (भाव-वाचक, नपुंसक लङ्ग) — ‘भाई होने का भाव’। इसी तरह
भारतीय + त्व = भारतीयत्वम् ( ोक १)। ‘-त्व’ लगते ही शब्द नपुंसक लङ्ग हो जाता है, चाहे मूल शब्द कसी भी
लङ्ग का हो।
जोड़कर दे खए: प्रश्न ६ (ग) म इसी पद का वग्रह पूछा गया है और प्रश्न ८ (ङ) म इसी का मेलन — तीन जगह
उत्तर एक ही सूत्र से नकलता है : वश्वब ुत्वस्य वस्तारकम्।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 5
प्रश्न ३ — अधो ल खतप्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.3 (क) सवतः कस्याः सं ापकं संस्कृतम् ?
उत्तरम् — संस्कृतं सवतः शान्तेः सं ापकम् अ स्त। ( हन्द — संस्कृत सब ओर शा न्त क स्थापना करने वाली है।)
पाठ की पंिक्त — सवतः शािन्तसंस्थापकं संस्कृ तम् (श्लोक ३)
िवगह — शान्ते ः संस्थापकम्
‘कस्याः’ = स्त्रीिलङ् ग · षष्ठी · एकवचन
‘शािन्तः’ इकारान्त स्त्रीिलङ् ग → षष्ठी एकवचन शान्ते ः (मित → मते ः इव)
पूण वाक्य कैसे बनाएँ: प्रश्न म जो शब्द ह उन्ह को उत्तर म लौटाइए और प्रश्नवाचक ‘कस्याः’ के स्थान पर उत्तर-पद
र खए, अन्त म क्रया ‘अ स्त’ जोड़ द जए। यही ‘पूणवाक्येन उत्तरम्’ क सीधी व ध है — नया वाक्य गढ़ने क
आवश्यकता नह ।
पुस्तक का समथन: भावाथ ३ कहता है — ‘संस्कृतं … सवत्रा प शा न्त प्र तष्ठापय त।’ अथात् ‘सवतः’ = सवत्र, हर
ओर।
प्र.3 (ख) क दृशं व्रतं संस्कृतम् ?
उत्तरम् — संस्कृतं त्यागसन्तोषसेवाव्रतम् अ स्त। अथात् — संस्कृतं त्यागस्य, सन्तोषस्य, सेवायाः च व्रतम् अ स्त। ( हन्द —
संस्कृत त्याग, सन्तोष तथा सेवा का व्रत है।)
पाठ की पंिक्त — त्यागसन्तोषसेवावतं संस्कृ तम् (श्लोक ४)
‘कीदृ शम्’ = िकस पकार का ? → उत्तर िवशेषण में चािहए
िवशेष्य ‘संस्कृ तम्’ नपुंसकिलङ् ग · एकवचन → िवशेषण भी नपुंसक एकवचन : त्यागसन्तोषसेवावतम्
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
‘क दृशम्’ का उत्तर वशेषण होता है: जब प्रश्न ‘क दृशम्/क दृशी/क दृशः’ हो, तब उत्तर म गुण बताने वाला पद
आता है और वह वशेष्य के लङ्ग-वचन- वभ क्त का अनुसरण करता है। यहाँ वशेष्य ‘संस्कृतम्’ है, इस लए उत्तर-
पद भी ‘-व्रतम्’ (नपुं. प्रथमा एकवचन) रहेगा।
समास: ‘त्यागसन्तोषसेवाव्रतम्’ म भीतर ‘त्याग-सन्तोष-सेवा’ इतरेतर-द्वन्द्व है (त्यागः च सन्तोषः च सेवा च), और
उसके बाद ‘व्रतम्’ के साथ षष्ठी-तत्पुरुष। पुस्तक का भावाथ ४ भी यही खोलता है — ‘त्यागस्य, हषस्य, सेवाबुद्धेश्च
व्रतम्’।
प्र.3 (ग) कयोः सम्मेलनं संस्कृतम् ?
उत्तरम् — संस्कृतं ान व ानयोः सम्मेलनम् अ स्त। ( हन्द — संस्कृत ान और व ान — दोन का संगम है।)
पाठ की पंिक्त — ानिव ानसम्मेलनं संस्कृ तम् (श्लोक ४)
‘कयोः’ = षष्ठी/सप्तमी · िद्ववचन
ानम् + िव ानम् = दो वस्त एु ँ → षष्ठी िद्ववचन ानिव ानयोः
द्ववचन का सङ् केत प्रश्न म ही है: संस्कृत म एक के लए ‘कस्य’, दो के लए ‘कयोः’ और बहुत के लए ‘केषाम्’
आता है। प्रश्न म ‘कयोः’ है, इस लए उत्तर ठ क दो वस्तुओं का और द्ववचन म होना चा हए — ‘ ानस्य’ अकेले
लखना अशुद्ध है।
अथभेद: ानम् = तत्त्व ान, आत्म ान (दशन, उप नषद्); व ानम् = प्रयोग- सद्ध व्यावहा रक ान (आयुवद,
ग णत, ज्यो तष, रसायन)। क व का कहना है क संस्कृत इन दोन को अलग नह करती — भावाथ ४ म ‘ व ानञ्च
सङ्गमनीयम् इ त वचारः’ यही कहता है।
प्र.3 (घ) संस्कृतं कस्य चमत्कारकम् ?
उत्तरम् — संस्कृतं वश्वचेतसः चमत्कारकम् अ स्त। ( हन्द — संस्कृत समस्त संसार के चत्त को चमत्कृत करने वाली है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम्
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पाठ की पंिक्त — िवश्वचे त श्चमत्कारकं संस्कृ तम् (श्लोक ६)
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सिन्धिवच्छे द ः — िवश्वचे त ः + चमत्कारकम्
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(िवसग के बाद ‘च्’ आने से िवसग → ‘श्’ — िवसगसिन्ध, श्चुत्व)
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a‘चे तस्’ सकारान्त नपुंसकिलङ् ग → षष्ठी एकवचन चे तसः
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ag तेजस् → तेजसः। यही रूप आगे प्रश्न ३ (ङ) म ‘यशः’ के साथ भी
शब्दरूप क सावधानी: ‘चेतस्’ सकारान्त शब्द है, इस लए उसक षष्ठी ‘चेतस्य’ नह , चेतसः बनती है — ठ क
वैसे ही जैसे मनस् → मनसः, यशस् → यशसः,
काम आएगा।
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पुस्तक का समथन: भावाथ ६ — ‘संस्कृतस्य श्रवणेन अ खलस्या प प्रपञ्चस्य जनाः चमत्कारं लभन्ते।’ अथात्
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संस्कृत सुनकर सारे संसार के लोग च कत रह जाते ह।
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केषां यशः स्मारकं संस्कृतम् ?
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प्र.3 (ङ)
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उत्तरम् — संस्कृतं पूवजानां यशःस्मारकम् अ स्त। ( हन्द — संस्कृत हमारे पूवज के यश क स्मारक है।)
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पाठ की पंिक्त — पूवजानां यशः स्मारकं संस्कृ तम् (श्लोक ६)
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a ‘पूवजः’ अकारान्त पुंिलङ् ग → षष्ठी बहुवचन पूवजानाम्
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‘स्मारकम्’ का भाव: स्मारक वह है जो कसी क स्मृ त जी वत रखे। क व कहता है क संस्कृत सा हत्य ही हमारे
पूवज का स ा स्मारक है — पत्थर का नह , शब्द का स्मारक। पुस्तक का भावाथ ६ इसे और स्पष्ट करता है —
‘भारतीयानां पूवजैः सम्पा दतस्य क तराशेः द्योतकम् अ स्त’।
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g है, अथ एक ही है।
.c‘यशःस्मारकम्’ बनता है; पुस्तक ने छपाई म ‘यशः स्मारकम्’ अलग करकेaछापा
ध्यान द: ‘यशः’ स्वयं सकारान्त नपुंसक लङ्ग शब्द (यशस्) का प्रथमा/ द्वतीया एकवचन रूप है। समास म यह
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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 5
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प्रश्न ४ — रक्त ाना न पूरयन्तु (यथा — सवभूतैकता-कारकं संस्कृतम्।)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.4 (क) …………………… सम्पादकं संस्कृतम्।
उत्तरम् — भारतीयत्वसम्पादकं संस्कृतम्। ( हन्द — संस्कृत भारतीयता को अ जत कराने वाली है।)
कैसे पहचान: ‘सम्पादकम्’ शब्द पूरे गीत म केवल एक बार आया है — ोक १ क दूसरी पं क्त म। वहाँ उससे
पहले भारतीयत्व है। रक्तस्थान भरते समय सबसे सुर क्षत तरीका यही है : वाक्य म जो पद दया है, उसे गीत म
ढूँ ढ़ए और उसका जोड़ीदार पद उठा ली जए।
शब्द- नमाण: भारतीय + त्व = भारतीयत्वम् — ‘भारतीय होने का भाव’। इसी प्रत्यय से बन्धु + त्व = बन्धुत्वम्
( ोक ३) भी बना है।
प्र.4 (ख) …………………… दशकं संस्कृतम्।
उत्तरम् — ानपुञ्जप्रभादशकं संस्कृतम्। ( हन्द — संस्कृत ान-रा श क आभा दखाने वाली है।)
कैसे पहचान: ‘दशकम्’ ोक १ क तीसरी पं क्त म आया है — ‘ ानपुञ्जप्रभादशकं संस्कृतम्’। ध्यान रहे क इस
प्रश्न का उत्तर यथा (नमूना) से मेल नह खाता — नमूने म ‘ ानपुञ्जप्रभादशकं कम्?’ पूछा गया था, उसका उत्तर
‘संस्कृतम्’ था। यहाँ उलटा है : ‘दशकम्’ दया है, पूवपद भरना है।
तीन शब्द जुड़े ह: ान ( वद्या) + पुञ्ज (रा श) + प्रभा (आभा) — अथात् ‘ ान के ढे र क चमक’। तीन के अथ
पुस्तक क शब्दाथ-ता लका म दए ह।
प्र.4 (ग) …………………… संस्कारकं संस्कृतम्।
उत्तरम् — सवम स्तष्कसंस्कारकं संस्कृतम्। ( हन्द — संस्कृत सबके म स्तष्क को संस्का रत करने वाली है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
कैसे पहचान: ‘संस्कारकम्’ ोक २ क पहली पं क्त म है। सावधान र हए — उसी ोक क दूसरी पं क्त म
मलता-जुलता शब्द ‘प रष्कारकम्’ है (‘सववाणीप रष्कारकं’)। दोन को मलाइए मत : संस्कारकम् → म स्तष्क
का, प रष्कारकम् → वाणी का।
अथ-भेद: पुस्तक क ता लका ‘प रष्कारकम् = संस्कारकम्’ दे ती है, अथात् दोन का भाव ‘शुद्ध करना’ ही है; पर
गीत म एक मन के लए और दूसरा वाणी के लए प्रयुक्त हुआ है — यही क्रम भावाथ २ म भी है : ‘मानसं शोधय त,
वचना न प रष्करो त’।
प्र.4 (घ) कमदं …………………… भ क्तदं संस्कृतम्।
उत्तरम् — कमदं ानदं भ क्तदं संस्कृतम्। ( हन्द — संस्कृत कम दे ने वाली, ान दे ने वाली तथा भ क्त दे ने वाली है।)
क्रम ही उत्तर है: यह ोक ५ क तीसरी पं क्त है और इसम भारतीय परम्परा के तीन माग उसी प्र सद्ध क्रम म रखे
गए ह — कम → ान → भ क्त। पहला और तीसरा दया है, इस लए बीच का ‘ ानदम्’ ही आएगा। पुस्तक का
भावाथ ५ भी तीन को साथ गनाता है — ‘भ क्तम् आच रतुं, ानं प्राप्तुं, कम कतु च संस्कृतं साधनम्’।
शब्द-रचना: ‘-दम्’ का अथ है ‘दे ने वाला’ (√दा + क प्रत्यय) — कमदम् = कम ददा त इ त; ानदम् = ानं ददा त
इ त; भ क्तदम् = भ क्तं ददा त इ त। तीन नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन म ह क्य क वशेष्य ‘संस्कृतम्’ नपुंसक लङ्ग
है।
प्र.4 (ङ) सत्य नष्ठं …………………… संस्कृतम्।
उत्तरम् — सत्य नष्ठं शवं सुन्दरं संस्कृतम्। ( हन्द — संस्कृत सत्य म नष्ठ, कल्याणकारी तथा सुन्दर है।)
यही पाठ का शीषक है: ोक ५ क यह अ न्तम पं क्त ही पाठ को उसका नाम दे ती है — ‘सत्यं शवं सुन्दरं
संस्कृतम्’। इस लए यह रक्तस्थान भरते समय अनुमान क आवश्यकता नह ; पाठ का शीषक ही उत्तर है। ‘ शवम्’
का अथ यहाँ दे वता नह , कल्याणकारी है।
भाव: तीन वशेषण एक ंखला बनाते ह — जो सत्य है वही कल्याणकारी है, और जो कल्याणकारी है वही
सचमुच सुन्दर है। भावाथ ५ इसे इन्ह शब्द म दोहराता है — ‘अतः संस्कृतं सत्यं शवं सुन्दरं च अ स्त।’
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
प्र.4 (च) शब्दला लत्य …………………… संस्कृतम्।
उत्तरम् — शब्दला लत्यलीलावनं संस्कृतम्। ( हन्द — संस्कृत शब्द के ला लत्य का क्र डा-उद्यान है।)
कैसे पहचान: यह ोक ६ क पहली पं क्त है। पुस्तक क शब्दाथ-ता लका ‘लीलावनम् = लीलायाः वनम् = क्र डा
का उद्यान’ दे ती है। भावाथ ६ इसी बम्ब को खोलता है — ‘ल लतपद्या न संस्कृतवने वृक्षाः इव स न्त’ अथात् सुन्दर
पद्य इस वन के वृक्ष ह।
अलङ् कार: यहाँ रूपक है — संस्कृत पर ‘वन’ का आरोप कया गया है। अगली ही पं क्त म दूसरा रूपक है —
‘माधुयधारागृहम्’ (माधुय क धारा का घर)। दोन बम्ब मलकर संस्कृत को एक ऐसा स्थान बना दे ते ह जहाँ मन
खेलता भी है और वश्राम भी पाता है।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 6
प्रश्न ५ — मञ्जूषायाः पदा न उपयुज्य षड् वाक्या न रचयत (यथा — वाणीप रष्का रका संस्कृत-भाषा भव त।)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.5 (क) मञ्जूषायाः पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत। — मञ्जूषा : वाणीप रष्का रका, एकता, सवतः, सेवा, सुन्दरम्,
पूवजानाम्, सत्पथे प्रेर यतुम्, वश्वकल्याणाय, त्यागस्य, सन्तोषस्य, वश्वब ुत्व वस्तारकम्
वाक्यम् — संस्कृतेन भारतीयानाम् एकता भव त। ( हन्द — संस्कृत से भारतीय क एकता होती है।)
पयुक्तं मञ्जूषापदम् — एकता (स्त्रीिलङ् ग · पथमा · एकवचन)
ि या — भवित (लट् , पथमपुरु ष, एकवचन) — कत ‘एकता’ एकवचन है, अतः ि या भी एकवचन
‘संस्कृ ते न ’ — करणे त ृत ीया (िजस साधन से)
वाक्य कैसे बनाया गया: मञ्जूषा का शब्द ‘एकता’ प्रथमा म दया है, इस लए उसे कता बनाना सबसे सरल है।
कता प्रथमा म, साधन तृतीया म और क्रया कता के वचन के अनुसार — यही तीन नयम वाक्यरचना के हर प्रश्न म
काम आते ह। आधार पाठ का ोक १ है — ‘भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्’।
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प्र.5 (ख) मञ्जूषायाः पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
वाक्यम् — संस्कृतं सवतः शा न्त सं ापय त। ( हन्द — संस्कृत सब ओर शा न्त क स्थापना करती है।)
पयुक्तं मञ्जूषापदम् — सवतः (अव्ययम् — सव + तिसल् पत्ययः)
‘शािन्तम्’ — कमिण िद्वतीया
‘संस्थापयित’ — िणजन्त लट् , पथमपुरु ष एकवचन
अव्यय का लाभ: ‘सवतः’ अव्यय है — इसका रूप कभी नह बदलता, न लङ्ग से न वचन से। इस लए इसे कसी
भी वाक्य म ज्य का त्य रखा जा सकता है। ‘-तः’ (त सल्) प्रत्यय से बने अन्य अव्यय — अत्र → अतः, सव →
सवतः, मुख → मुखतः।
पाठ का आधार: ोक ३ — ‘सवतः शा न्तसंस्थापकं संस्कृतम्’। वहाँ यह कृदन्त- वशेषण था, यहाँ हमने उसे
क्रयापद वाले वाक्य म बदल दया।
प्र.5 (ग) मञ्जूषायाः पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
वाक्यम् — त्यागस्य सन्तोषस्य सेवायाः च व्रतं संस्कृतम् अ स्त। ( हन्द — संस्कृत त्याग, सन्तोष और सेवा का व्रत है।)
पयुक्तािन मञ्जूषापदािन — त्यागस्य, सन्तोषस्य, सेवा
‘सेवा’ को वाक्य में सम्बन्ध िदखाने के िलए षष्ठी में रखा — सेवायाः (आकारान्त स्त्रीिलङ् ग : लता → लतायाः)
‘च’ तीनों को जोड़ ता है — अिन्तम पद के बाद ही आता है
तीन शब्द एक साथ क्य : मञ्जूषा म ‘त्यागस्य’ और ‘सन्तोषस्य’ पहले से षष्ठी म दए ह — यह स्वयं सङ् केत है
क इन्ह कसी एक सं ा (यहाँ ‘व्रतम्’) से जोड़ना है। ‘सेवा’ प्रथमा म द है, इस लए उसे भी उसी सूची म लाने के
लए षष्ठी ‘सेवायाः’ करनी पड़ी — समान वाक्यांश म सभी पद समान वभ क्त म रहते ह।
पाठ का आधार: ोक ४ — ‘त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम्’, और भावाथ ४ — ‘त्यागस्य, हषस्य, सेवाबुद्धेश्च
व्रतम्’।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम्
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मञ्जूषायाः पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
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प्र.5 (घ)
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पयुक्तं मञ्जूषापदम् — सत्पथे पेरियतुम्
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‘सत्पथे ’ — अिधकरणे सप्तमी (माग पर)
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‘पेरियत मु ्’ — त मु न
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ु ् पत्ययान्त (√पेर ् + िणच् + त मु न
ु ्) = ‘पेिरत करने के िलए’
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‘शक्नोित’ — त मु न
ु ् के साथ सदा पयुक्त होने वाली ि या
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a gl इच्छ त, आरभते, गच्छ त जैसी कोई मुख्य क्रया चा हए। इसी लए ‘प्रेर यतुम्’ के बाद ‘शक्नो त’ जोड़ा गया।
‘जनान्’ कम है, अतः द्वतीया बहुवचन म।
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पाठ का आधार:
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ोक २ — ‘सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम्’; भावाथ २ — ‘सन्माग दशय त’।
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मञ्जूषायाः पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
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प्र.5 (ङ)
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ag वाक्यम् — वश्वकल्याणाय संस्कृतस्य अध्ययनम् आवश्यकम् अ स्त। ( हन्द — वश्व के कल्याण के लए संस्कृत का अध्ययन
आवश्यक है।)
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पयुक्तं मञ्जूषापदम् — िवश्वक ल्याणाय (चत थ
ु · एकवचन)
िनयम — ‘ताद य चतुथ ’ — िजस पयोजन के िलए काय हो, उसमें चत थ
ु
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‘संस्कृ तस्य’ — सम्बन्धे षष्ठी; ‘आवश्यकम्’ — िवशेषण, ‘अध्ययनम्’ (नपुं.) के अनुसार
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a s em चतुथ क्य : मञ्जूषा ने शब्द पहले से ‘-आय’ रूप म दया है, यह स्वयं बता दे ता है क वाक्य म उसे प्रयोजन के
agl अथ म लाना है — ‘ कसके लए ?’ का उत्तर बनकर। य द उसे कता या कम बनाने क चेष्टा करगे, तो वभ क्त
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बदलनी पड़ेगी और मञ्जूषा का पद ‘ज्य का त्य ’ प्रयुक्त नह होगा।
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a s em नष्ठायुतं संस्कृतम्’; भावाथ ४ — ‘प्रपञ्चस्य मङ्गलमेव कतव्यम् इ त
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पाठ का आधार: ोक ४ — ‘ वश्वकल्याण
ानम्’।
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प्र.5 (च) मञ्जूषायाः पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
वाक्यम् — वश्वब ुत्व वस्तारकं संस्कृतं पूवजानां सुन्दरं यशःस्मारकम् अ स्त। ( हन्द — वश्वबन्धुत्व को फैलाने वाली संस्कृत
हमारे पूवज का सुन्दर यश-स्मारक है।)
पयुक्तािन मञ्जूषापदािन — िवश्वबन्धुत्विवस्तारकम्, पूवजानाम्, सुन्दरम्
तीनों िवशेषण/सम्बन्धपद ‘संस्कृ तम्’ तथा ‘स्मारकम्’ (नपुं. पथमा एकवचन) के साथ मेल में है ं
‘पूवजानाम्’ — सम्बन्धे षष्ठी बहुवचन
एक वाक्य म तीन पद क्य : मञ्जूषा म ग्यारह पद ह और वाक्य केवल छह बनाने ह — इस लए कुछ वाक्य म एक
से अ धक पद रखने ही ह गे। यह ‘चालाक ’ नह , प्रश्न क माँग है। ध्यान यह र खए क जोड़े गए सभी पद एक ही
वशेष्य से ठ क-ठ क मेल खाएँ — यहाँ तीन नपुंसक लङ्ग एकवचन के साथ जुड़े ह।
सभी ग्यारह पद कहाँ प्रयुक्त हुए: वाणीप रष्का रका (यथा) · एकता (क) · सवतः (ख) · त्यागस्य, सन्तोषस्य, सेवा
(ग) · सत्पथे प्रेर यतुम् (घ) · वश्वकल्याणाय (ङ) · वश्वबन्धुत्व वस्तारकम्, पूवजानाम्, सुन्दरम् (च)। एक भी पद
बचा नह — उत्तर लखते समय अन्त म यही जाँच कर ली जए।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 6
प्रश्न ६ — समस्तपदानां वग्रहं कुरुत (यथा — भारतीयैकतासाधकम् = भारतीयैकतायाः साधकम्)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.6 (क) ानपुञ्जप्रभादशकम्
वग्रहः — ानपुञ्जप्रभायाः दशकम्। ( वस्तार से — ानस्य पुञ्जः = ानपुञ्जः; ानपुञ्जस्य प्रभा = ानपुञ्जप्रभा;
ानपुञ्जप्रभायाः दशकम् = ानपुञ्जप्रभादशकम्।)
( हन्द — ान क रा श क आभा को दखाने वाला।)
समासः — षष्ठी-त त्पुरु षः
कारण — िवगह में पूवपद षष्ठी िवभिक्त में आता है (पभायाः), और अथ की पधानता उत्तरपद (दशकम्) में है
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
यह षष्ठी-तत्पुरुष ही क्य : य द यह कमधारय होता तो दोन पद एक ही वभ क्त म और एक ही वस्तु के होते (जैसे
‘नीलकमलम्’ = नीलं कमलम्)। यहाँ ‘प्रभा’ और ‘दशक’ दो अलग वस्तुएँ ह और उनम का/क का सम्बन्ध है —
इसी लए षष्ठी-तत्पुरुष। नमूने ‘भारतीयैकतासाधकम् = भारतीयैकतायाः साधकम्’ का साँचा भी यही है।
तीन स्तर का समास: यह पद तीन शब्द से बना है, इस लए वग्रह भी तीन चरण म खोला जा सकता है (ऊपर
कोष्ठक म दखाया गया)। परीक्षा म अ न्तम चरण — ‘ ानपुञ्जप्रभायाः दशकम्’ — लखना पयाप्त है; प्रश्न ८ (घ)
म पुस्तक ने स्वयं यही जोड़ी द है।
प्र.6 (ख) सववाणीप रष्कारकम्
वग्रहः — सववाणीनां प रष्कारकम्। ( वस्तार से — सवाः च ताः वाण्यः = सववाण्यः; सववाणीनां प रष्कारकम्।)
( हन्द — सब वा णय को शुद्ध करने वाला।)
समासः — षष्ठी-त त्पुरु षः (भीतर ‘सववाणी’ में कमधारयः)
‘वाणी’ ईकारान्त स्त्रीिलङ् ग → षष्ठी बहुवचन वाणीनाम्
बहुवचन क्य : ‘सव’ का अथ ही ‘सब’ है, इस लए वग्रह एकवचन म नह हो सकता — ‘सववाण्याः’ अशुद्ध है।
भावाथ २ भी बहुवचन दे ता है — ‘वचना न प रष्करो त’। यही उत्तर प्रश्न २ (घ) म एकपद के रूप म आया था।
ध्यान द: ‘सववाणी’ म ‘सव’ वशेषण है और ‘वाणी’ वशेष्य — दोन एक ही वभ क्त म ह, इस लए यह भीतरी
समास कमधारय है। बाहरी समास ‘प रष्कारकम्’ के साथ षष्ठी-तत्पुरुष रहता है।
प्र.6 (ग) वश्वब ुत्व वस्तारकम्
वग्रहः — वश्वब ुत्वस्य वस्तारकम्। ( वस्तार से — वश्वस्य बन्धुत्वम् = वश्वबन्धुत्वम्; वश्वबन्धुत्वस्य वस्तारकम्।)
( हन्द — वश्वबन्धुत्व का वस्तार करने वाला।)
समासः — षष्ठी-त त्पुरु षः (भीतरी ‘िवश्वबन्धुत्वम्’ भी षष्ठी-तत्पुरु ष)
‘बन्धुत्वम्’ नपुंसकिलङ् ग → षष्ठी एकवचन बन्धुत्वस्य
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दोन स्तर एक ही समास के: यहाँ बाहरी और भीतरी — दोन समास षष्ठी-तत्पुरुष ह। ऐसे ‘समास के भीतर
समास’ को पहचानने का तरीका यह है क पद को अन्त से खो लए — पहले ‘ वस्तारकम्’ अलग क जए, फर बचे
‘ वश्वबन्धुत्व’ को खो लए।
जोड़कर दे खए: यही जोड़ी प्रश्न ८ (ङ) के मेलन म भी है — ‘ वश्वबन्धुत्वस्य → वस्तारकम्’, और प्रश्न २ (ङ) म
एकपद-उत्तर के रूप म। एक ही पद तीन प्रश्न म तीन ढं ग से पूछा गया है।
प्र.6 (घ) सवभूतैकताकारकम्
वग्रहः — सवभूतैकतायाः कारकम्। ( वस्तार से — सवा ण च ता न भूता न = सवभूता न; सवभूतानाम् एकता = सवभूतैकता;
सवभूतैकतायाः कारकम्।)
( हन्द — समस्त प्रा णय क एकता को करने वाला।)
समासः — षष्ठी-त त्पुरु षः
सिन्धः — सवभूत + एकता → अ + ए = ऐ (वृिद्ध सिन्ध)
‘एकता’ आकारान्त स्त्रीिलङ् ग → षष्ठी एकवचन एकतायाः
‘भूत’ का अथ: यहाँ ‘भूत’ का अथ प्रेत नह , प्राणी है — जो हो चुका है, जो अ स्तत्व म है। इसी लए भावाथ ३ इसे
‘सवषां प्रा णनाम् अ प ऐक्यं बोधय त’ कहकर खोलता है। ‘सवभूतेषु’, ‘भूतदया’ जैसे प्रयोग इसी अथ म ह।
स क जाँच: वग्रह लखते समय स न्ध खोलना न भू लए — ‘सवभूतैकतायाः’ म ‘ऐ’ है क्य क ‘सवभूत’ का
अ न्तम ‘अ’ और ‘एकता’ का आ द ‘ए’ मलकर वृ द्ध ‘ऐ’ बने ह। यही स न्ध नमूने ‘भारतीयैकता’ म भी है।
प्र.6 (ङ) शा न्तसं ापकम्
वग्रहः — शान्तेः सं ापकम्। ( हन्द — शा न्त क स्थापना करने वाला।)
समासः — षष्ठी-त त्पुरु षः
‘शािन्तः’ इकारान्त स्त्रीिलङ् ग → षष्ठी एकवचन शान्ते ः
(मित → मते ः, बुिद्ध → बुद्ध ेः के समान)
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रूप क सावधानी: ‘शा न्तस्य’ लखना अशुद्ध है। इकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द क षष्ठी एकवचन म ‘-एः’ आता है, ‘-
स्य’ नह (‘-स्य’ अकारान्त पुं लङ्ग/नपुंसक लङ्ग का रूप है)। यही उत्तर प्रश्न ३ (क) म पूण वाक्य के रूप म आ चुका
है।
पाठ क पं क्त: ‘सवतः शा न्तसंस्थापकं संस्कृतम्’ ( ोक ३)। ‘सवतः’ अव्यय है, इस लए वह समास के भीतर नह
आता — वग्रह म भी उसे बाहर ही रखा जाता है।
प्र.6 (च) ान व ानसम्मेलनम्
वग्रहः — ान व ानयोः सम्मेलनम्। (अथवा — ानस्य व ानस्य च सम्मेलनम्।)
( हन्द — ान और व ान — दोन का मेल।)
समासः — षष्ठी-त त्पुरु षः, िजसका पूवपद ‘ ानिव ान’ स्वयं इतरेत र-द्वन्द्वः है
द्वन्द्व का िवगह — ानं च िव ानं च = ानिव ाने
दो वस्त एु ँ है,ं अतः षष्ठी िद्ववचन — ानिव ानयोः
दो समास एक पद म: पहले ‘ ान’ और ‘ व ान’ बराबरी से जुड़े — यह द्वन्द्व है (दोन पद प्रधान)। फर वह जुड़ा
जोड़ा ‘सम्मेलन’ के साथ ‘का’ के सम्बन्ध से जुड़ा — यह षष्ठी-तत्पुरुष है (उत्तरपद प्रधान)। कसी लम्बे समास को
खोलते समय हमेशा यही दे खए क कौन-सा पद प्रधान है — वही समास का नाम तय करता है।
जोड़कर दे खए: प्रश्न ३ (ग) — ‘कयोः सम्मेलनं संस्कृतम् ?’ का उत्तर ‘ ान व ानयोः’ इसी वग्रह से नकलता है।
‘कयोः’ द्ववचन है और ‘ ान व ानयोः’ भी — दोन का मेल बैठ जाता है।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 6–7
प्रश्न ७ — प्रदत्तमञ्जूषातः पयायपदा न चत्वा रक्त ाने लखत (मञ्जूषा : उल्लासः, करणः, जगत्, अनुपमा, तेजोराशयः, मानम्)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.7 (क) वद्वांसः …………………… भव न्त।
उत्तरम् — वद्वांसः तेजोराशयः भव न्त। ( हन्द — वद्वान् तेज के पुञ्ज होते ह।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम्
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ं ः (पुंिलङ् ग · पथमा · बहवु चन )
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कत — िवद्वास
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ि या — भविन्त (लट् , पथमपुरु ष, बहुवचन )
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अतः िवधेय-िवशेषण भी बहुवचन में चािहए → ते जोराशयः
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aसिन्धः — ते जस् + राशयः → िवसग → ओ (िवसगसि ध) न्
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g है और क्रया ‘भव न्त’ भी, इस लए वचन का मेल केवल यही पद
यही पद क्य : मञ्जूषा के छह पद म केवल ‘तेजोराशयः’ ही बहुवचन म है — ‘उल्लासः, करणः, अनुपमा, मानम्,
जगत्’ सब एकवचन ह। कता ‘ वद्वांसः’ a
बहुवचन
बैठाता है। यह पयायपद कसका है ? — पाठ के ‘ ानपुञ्जप्रभा’ का; ‘पुञ्ज’ = रा श और ‘प्रभा’ = तेज, दोन
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मलकर ‘तेजोरा शः’ बनते ह।
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a glप्र.7 (ख) सूयस्य …………………… सवषां प्रा णनां कृते हतकरः भव त।
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उत्तरम् — सूयस्य करणः सवषां प्रा णनां कृते हतकरः भव त। ( हन्द — सूय क करण सब प्रा णय के लए हतकारी होती
है।)
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िवधेय-िवशेषण — िहतकरः (पुंिलङ् ग · पथमा · एकवचन)
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अतः कत भी पुंिलङ् ग एकवचन → िकरणः
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s m ं पािणनां कृते ’ — ‘कृते ’ के योग में षष्ठी (‘के िलए’)
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यही पद क्य : ‘सूयस्य’ के साथ अथ क दृ ष्ट से ‘ करणः’ ही जुड़ता है। व्याकरण भी यही कहता है — वशेषण
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‘प्रभा’ (= द प्तः) का पयायवाची हैl। as
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‘ हतकरः’ पुं लङ्ग है, इस लए कता ‘अनुपमा’ (स्त्री.) या ‘मानम्’ (नपुं.) नह हो सकता। पयाय: ‘ करणः’ पाठ के
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प्र.7 (ग) ईश्वरं स्मृत्वा …………………… उपजायते।
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उत्तरम् — ईश्वरं स्मृत्वा उल्लासः उपजायते। ( हन्द — ईश्वर का स्मरण करके आनन्द उत्पन्न होता है।)
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‘स्मृत्वा’ — क्त्वा-पत्ययान्त पूवकािलक ि या (‘स्मरण करके ’)
कत — उल्लासः (पुंिलङ् ग · पथमा · एकवचन)
ि या — उपजायते (आत्मने पद, लट् , पथमपुरु ष एकवचन)
यही पद क्य : ‘उपजायते’ का अथ है ‘उत्पन्न होता है’ — जो उत्पन्न होता है वह कोई भाव होना चा हए, वस्तु नह ।
मञ्जूषा म भाववाचक पद ‘उल्लासः’ और ‘मानम्’ ह; ईश्वर-स्मरण से ‘मान’ (सम्मान) नह , आनन्द उपजता है —
इस लए ‘उल्लासः’। पयाय: यह पाठ के ‘आनन्द’ (सवदानन्दसन्दोहदं ) का पयायवाची है।
प्र.7 (घ) वद्यायाः …………………… अजरं भव त।
उत्तरम् — वद्यायाः मानम् अजरं भव त। ( हन्द — वद्या का सम्मान कभी बूढ़ा नह होता / सदा बना रहता है।)
िवधेय-िवशेषण — अजरम् (नपुंसकिलङ् ग · पथमा · एकवचन)
अतः कत भी नपुंसकिलङ् ग एकवचन चािहए → मानम्
‘िवद्यायाः’ — सम्बन्धे षष्ठी (आकारान्त स्त्री. : िवद्या → िवद्यायाः)
यही पद क्य : मञ्जूषा म नपुंसक लङ्ग के दो पद ह — ‘मानम्’ और ‘जगत्’। पर ‘ वद्यायाः जगत्’ का कोई अथ
नह बनता, जब क ‘ वद्यायाः मानम्’ = वद्या का सम्मान — साथक है। इस लए लङ्ग और अथ दोन ‘मानम्’ को
चुनते ह। पयाय: यह पाठ के ‘यशः’ (पूवजानां यशः स्मारकम्) का पयायवाची है।
‘अजरम्’ का अथ: अ + जर = जसे जरा (बुढ़ापा) न आए। नी त-वचन है — ‘ वद्या ही ऐसा धन है जो न चोरी
होता है, न घटता है, न पुराना पड़ता है।’
प्र.7 (ङ) प्रकृतेः शोभा …………………… वद्यते।
उत्तरम् — प्रकृतेः शोभा अनुपमा वद्यते। ( हन्द — प्रकृ त क शोभा अनुपम — जसक कोई उपमा न हो, ऐसी — है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
कत — शोभा (स्त्रीिलङ् ग · पथमा · एकवचन)
अतः िवशेषण भी स्त्रीिलङ् ग एकवचन → अनुपमा
‘पकृ ते ः’ — इकारान्त स्त्रीिलङ् ग, षष्ठी एकवचन
यही पद क्य : मञ्जूषा म केवल ‘अनुपमा’ ही स्त्री लङ्ग है, और यहाँ वशेष्य ‘शोभा’ स्त्री लङ्ग है — वशेषण-
वशेष्य-भाव का नयम कहता है क दोन का लङ्ग-वचन- वभ क्त समान हो। इस लए उत्तर न श्चत है। पयाय:
‘अनुपमा’ पाठ के ‘चारु’ / ‘सुन्दर’ का पयायवाची है।
शब्द- नमाण: न + उपमा = अनुपमा (नञ्-तत्पुरुष) — ‘ जसक उपमा न द जा सके’। इसी ढं ग से अ + जरम् =
अजरम् (ऊपर घ म), अ + हसा = अ हसा।
प्र.7 (च) यत्र …………………… एकनीडं भव त।
उत्तरम् — यत्र जगत् एकनीडं भव त। ( हन्द — जहाँ सारा संसार एक घ सला बन जाता है।)
िवधेय — एकनीडम् (नपुंसकिलङ् ग · पथमा · एकवचन)
अतः कत भी नपुंसकिलङ् ग एकवचन → जगत् (तकारान्त नपुंसकिलङ् ग)
‘यत्र’ — अव्यय (जहाँ)
यही पद क्य : ‘मानम्’ इस वाक्य म शेष नह बचता (वह घ म लग चुका), और लङ्ग क दृ ष्ट से भी ‘एकनीडम्’
नपुंसक लङ्ग है, इस लए कता ‘जगत्’ ही बनेगा। पयाय: ‘जगत्’ पाठ के ‘ वश्व’ ( वश्वबन्धुत्व, वश्वकल्याण,
वश्वचेतः) का पयायवाची है।
बम्ब पहचा नए: ‘नीडम्’ = घ सला। ‘सारा संसार एक घ सला बन जाए’ — यही रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्र सद्ध
वाक्य ‘यत्र वश्वं भवत्येकनीडम्’ ( वश्वभारती का ध्येयवाक्य) का भाव है, और यही तीसरे ोक के
‘ वश्वबन्धुत्व वस्तारकम्’ का भी।
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वाक्यम् चय नतं पदम् चयन का कारण पाठ का कौन-सा शब्द
(क) िवद्वांस ः … भविन्त तेजोराशयः एकमात्र बहुवचन पद ानपुञ्जप्रभा
(ख) सूयस्य … िहतकरः िकरणः पुं लङ्ग वशेषण ‘ हतकरः’ प्रभा
(ग) ईश्वरं स्म ृत्वा … उपजायते उ ल्लासः ‘उपजायते’ के साथ भाववाचक पद आनन्दः
(घ) िवद्यायाः … अजरं भवित मानम् नपुंसक वशेषण ‘अजरम्’ + अथसङ्ग त यशः
(ङ) पकृ तेः शोभा … िवद्यते अनुपमा एकमात्र स्त्री लङ्ग पद चारु / सुन्दरम्
(च) यत्र … एकनीडं भवित जगत् नपुंसक ‘एकनीडम्’ + शेष पद वश्वम्
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 7
प्रश्न ८ — अधो ल खतानां मेलनं कुरुत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.8 अधो ल खतानां मेलनं कुरुत — (क) भारतीयैकतायाः (ख) सत्पथे (ग) त्यागसन्तोषसेवारूपम् (घ)
ानपुञ्जप्रभायाः (ङ) वश्वब ुत्वस्य ॥ १. वस्तारकम् २. साधकम् ३. दशकम् ४. प्रेरणादायकम् ५. व्रतम्
शुद्धं मेलनम् — (क)–२, (ख)–४, (ग)–५, (घ)–३, (ङ)–१।
क्रमः ‘क’ स्तम्भः ‘ख’ स्तम्भः पूण पदम् / पाठ क पं क्त मेल का कारण
(क) भारतीयैक तायाः २. साधकम् भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम् ( ोक एकता ‘ सद्ध’ क जाती है — साधने का
१) कम
(ख) सत्पथे ४. सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम् ( ोक माग ‘पर’ प्रेरणा द जाती है —
पेरणादायकम् २) अ धकरणे सप्तमी
(ग) त्यागसन्तोषसे वारूपम् ५. वतम् त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम् ( ोक ‘-रूपम्’ वशेषण है, उसे सं ा ‘व्रतम्’
४) चा हए
(घ) ानपुञ्जपभायाः ३. दशकम् ानपुञ्जप्रभादशकं संस्कृतम् प्रभा ‘ दखाई’ जाती है — दशन का कम
( ोक १)
(ङ) िवश्वबन्ध त्ु वस्य १. िवस्तारकम् वश्वबन्धुत्व वस्तारकं संस्कृतम् बन्धुत्व ‘फैलाया’ जाता है — वस्तार का
( ोक ३) कम
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मेलन कैसे जाँच: दो कसौ टयाँ एक साथ लगाइए। पहली — व्याकरण: ‘क’ स्तम्भ के चार पद षष्ठी म ह
(एकतायाः, प्रभायाः, बन्धुत्वस्य) और एक सप्तमी म (सत्पथे); जो पद सप्तमी म है उसे वही जोड़ीदार चा हए जो
‘पर/म’ का भाव सम्भाले — ‘सत्पथे प्रेरणादायकम्’। दूसरी — पाठ: जोड़ी बनाकर पद जोड़ द जए और दे खए
क वह गीत क कसी पं क्त म सचमुच है या नह । दोन कसौ टय पर उतरने वाली जोड़ी ही शुद्ध है।
ध्यान द (ग) क बारीक : पुस्तक ने यहाँ पाठ का ‘त्यागसन्तोषसेवा-’ नह , ‘त्यागसन्तोषसेवारूपम्’ दया है —
अथात् ‘त्याग-सन्तोष-सेवा के रूप वाला’। ‘-रूपम्’ लगते ही पद वशेषण बन जाता है, और वशेषण को कोई सं ा
चा हए; ‘ वस्तारकम्, साधकम्, दशकम्, प्रेरणादायकम्’ — ये चार स्वयं कृदन्त- वशेषण ह, केवल ‘व्रतम्’ सं ा है।
इस लए (ग) का जोड़ीदार ५ ही बनेगा।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 7
पञ्चशीलं कम् ? तथा त्रयः ोकाः
स्वाध्यायान्मा प्रमदः
प्र.1 पञ्चशीलं कम् ? बौद्धधम का न पञ्च शीला न स न्त ? तेषाम् आचरणेन कः लाभः ?
उत्तरम् — बौद्धधम सदाचरणस्य प रपालनाय पञ्च शीला न स न्त, येषाम् आचरणं मनुष्याणाम् अत्यन्तं लाभाय अ स्त।
ता न स न्त — अस्तेयम्, अ हसा, ब्रह्मचयम्, सत्यम्, मादकद्रव्याणां प रहारः च।
( हन्द — बौद्ध धम म सदाचरण के पालन के लए पाँच शील ह, जनका आचरण मनुष्य के लए अत्यन्त लाभकारी है। वे ह —
चोरी न करना, अ हसा, ब्रह्मचय, सत्य तथा नशीले पदाथ का त्याग।)
क्रमः शीलम् अथः आचरणस्य लाभः
१ अस्तेयम् न स्तेयम् — चोरी न करना, दू स रे का धन न समाज म वश्वास बना रहता है; मन नभय रहता है
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२ अिहंस ा मनसा वाचा कमणा िकसी को पीड़ ा न दे ना वैर समाप्त होता है; ‘सवभूतैकता’ का भाव जागता है
३ बह्मचयम् इिन्द य-संयम तथा िवद्या में िनष्ठा शरीर स्वस्थ, बु द्ध तीव्र तथा अध्ययन सफल होता है
४ सत्यम् यथाथ ही बोलना, वचन का पालन वाणी म बल आता है; लोग वश्वास करते ह
५ मादकद व्याणां नशीले पदाथ ं का पूण त्याग ववेक जागा रहता है; प रवार तथा स्वास्थ्य सुर क्षत
पिरहारः रहते ह
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम्
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यह खण्ड यहाँ क्य दया गया: गीत के तीसरे
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ोक क अ न्तम पं क्त है — ‘पञ्चशीलप्र तष्ठापकं संस्कृतम्’, और
mयह ोक
पुस्तक का भावाथ ३ कहता है ‘प्र सद्धानां पञ्चानां शीलानां री त गमय त’। पर ‘पञ्चशील’ है क्याe—
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co लए ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ म उसक व्याख्या द गई है। दोन को साथ aप gढ़ए,l तभी ोक पूरा
नह बताता। .इसी
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खुलताsहै
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ध्यान द: यह ‘पञ्चशील’ बौद्ध धम का सदाचार- नयम है। आधु नक इ तहास म ‘पञ्चशील’ नाम से भारत-चीन के
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बीच १९५४ का पाँच-सूत्री समझौता भी प्र सद्ध है — पर पाठ म जसक बात है, वह बौद्ध शील ही है। दोन को
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मलाइए मत। साथ ही ध्यान द जए क ये पाँच नयम पातञ्जल योगसूत्र के पञ्च यम (अ हसा, सत्य, अस्तेय,
ब्रह्मचय, अप रग्रह) से बहुत मलते-जुलते ह — भारतीय परम्परा क यही साझी नै तक भू म संस्कृत ने सुर क्षत रखी
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है।
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a s em‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ खण्डे प्रदत्तानां त्रयाणां ोकानाम् अन्वयम् अथ भावं च लखत — “एत े शप्रसूतस्य
gl सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं च रत्रं शक्षेरन् पृ थव्यां सवमानवाः॥ संस्कृतं संस्कृतेमूलं ान व ानवा र धः।
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वेदतत्त्वाथसंजु ं लोकाऽऽलोककरं शवम्॥ सत्या हसागुणैः ेष्ठा वश्वब ुत्व श क्षका। वश्वशा न्तसुखाधात्री
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भारतीया ह संस्कृ तः॥”
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ोकः १
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एत ेशपसूत स्य सकाशादगजन्मनः।
m स्वं चिरत्रं िशक्षेरन् पृिथव्या सवमानवाः॥ a g
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पद
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े दः — एतद्-दे श-प्रसूतस्य + सकाशात् + अग्रजन्मनः + स्वम् + स्वम् + च रत्रम् + शक्षेरन् + पृ थव्याम् + सवमानवाः।
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षsके समीप से पृथ्वी के सभी मनुष्य अपना-अपना च रत्र सीख।
अन्वयः — पृ थव्यां सवमानवाः एत े शप्रसूतस्य अग्रजन्मनः सकाशात् स्वं स्वं च रत्रं शक्षेरन्।
अथः — इस दे श (भारत) म उत्पन्न श्रेष्ठ पुlरुa
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भावः: यह मनुस्मृ त (२.२०) का प्र सद्ध
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ोक है और उसे यहाँ रखने का प्रयोजन स्पष्ट है — भारत को क व ‘च रत्र
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क पाठशाला’ मानता है। ध्यान द जए, ोक ‘सब मेरा अनुकरण कर’ नह कहता; वह कहता है ‘स्वं स्वं च रत्रम्’
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— अपना-अपना च रत्र सीख। अथात् सीख यहाँ से ली जए, पर उसे अपने ढं ग से जएँ। यही उदार दृ ष्ट तीसरे ोक
a s em के ‘ वश्वबन्धुत्व’ का आधार है।
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व्याकरण: ‘ शक्षेरन्’ — √ शक्ष् (आत्मनेपद), व ध लङ् लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन (‘सीखना चा हए / सीख’)।
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‘सकाशात्’ अव्ययवत् प्रयुक्त पञ्चमी है (‘के पास से’) और उसके योग म ‘अग्रजन्मनः’ षष्ठी म है। ‘अग्रजन्मन्’ =
a s emअथात् श्रेष्ठ/ वद्वान्।
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अग्रे जन्म यस्य सः — जो पहले जन्मा,
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संस्कृ तं संस्कृ ते मूलं ानिव ानवािरिधः।
वेद तत्त्वाथसंजष्ु टं लोकाऽऽलोककरं िशवम्॥
पद े दः — संस्कृतम् + संस्कृतेः + मूलम् + ान- व ान-वा र धः + वेद-तत्त्व-अथ-संजुष्टम् + लोक-आलोक-करम् + शवम्।
अन्वयः — संस्कृतं संस्कृतेः मूलम् (अ स्त), ान व ानवा र धः (अ स्त), वेदतत्त्वाथसंजुष्टं लोकालोककरं शवं च (अ स्त)।
अथः — संस्कृत संस्कृ त क जड़ है, ान और व ान का समुद्र है, वेद के तत्त्व तथा अथ से भरी हुई है, संसार को आलो कत करने
वाली और कल्याणकारी है।
पदम् अथः
संस्कृ तेः मूल म् संस्कृ ित की जड़ — संस्कृ ित संस्कृ त से िनकली है
वािरिधः वािर (जल ) धीयते यिस्मन् सः — समुद
संजष्ु टम् सम् + जुष्ट — भली-भाँित युक्त, से िवत
लोकालोककरम् लोकानाम् आलोकं करोित इित — संस ार को पकािशत करने वाला
िशवम् क ल्याणकरम् — मङ् गलकारी
भावः: यह ोक गीत के पाँचव ोक का ही सार दोहराता है। ‘संस्कृतं संस्कृतेमूलम्’ म एक सुन्दर शब्द-क्र डा है
— ‘संस्कृत’ और ‘संस्कृ त’ दोन एक ही धातु (सम् + √कृ) से बने ह, इस लए भाषा और संस्कृ त का सम्बन्ध केवल
भाव का नह , शब्द का भी है। ‘वा र धः’ रूपक कहता है क इस भाषा म ान बूँद-बूँद नह , समुद्र-भर है — जतना
उत रए उतना गहरा।
स तथा छपाई: ‘संस्कृतेमूलम्’ = संस्कृतेः + मूलम् ( वसगस न्ध — वसग का ‘र्’)। पुस्तक म
‘लोकाऽऽलोककरम्’ अवग्रह- चह्न के साथ छपा है, जो ‘लोक + आलोक’ क स न्ध को दखाने के लए है; सामान्य
लेखन म इसे लोकालोककरम् लखा जाता है। कुछ वद्वान् इसे ‘लोक-अलोक-करम्’ (इस लोक तथा परलोक —
दोन को प्रका शत करने वाला) भी पढ़ते ह, जो गीत के ‘ऐ हकामु ष्मकोत्कषदम्’ से मेल खाता है।
ोकः ३
सत्यािहंसागुणैः श्रेष्ठा िवश्वबन्धुत्विशिक्षका।
िवश्वशािन्तसुखाधात्री भारतीया िह संस्कृ ितः॥
पद े दः — सत्य-अ हसा-गुणैः + श्रेष्ठा + वश्व-बन्धुत्व- श क्षका + वश्व-शा न्त-सुख-आधात्री + भारतीया + ह + संस्कृ तः।
अन्वयः — भारतीया संस्कृ तः ह सत्या हसागुणैः श्रेष्ठा, वश्वबन्धुत्व श क्षका, वश्वशा न्तसुखाधात्री च (अ स्त)।
अथः — भारतीय संस्कृ त सत्य तथा अ हसा के गुण के कारण श्रेष्ठ है; वही वश्वबन्धुत्व क श क्षका है; और वही वश्व क शा न्त
तथा सुख को धारण करने वाली — पोषण करने वाली — है।
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भावः: तीन ोक एक सीढ़ बनाते ह — पहला कहता है च रत्र यहाँ से सीखो, दूसरा बताता है उस च रत्र का ोत
संस्कृत है, और तीसरा उस ोत से बनी संस्कृ त का फल गनाता है : सत्य, अ हसा, वश्वबन्धुत्व और वश्वशा न्त।
यही चार बात गीत के तीसरे ोक म भी थ — इस लए यह ोक पाठ का समापन-वाक्य जैसा है।
व्याकरण: ‘गुणैः’ म तृतीया है — हेतु के अथ म (‘इन गुण के कारण श्रेष्ठ’)। ‘ श क्षका’ तथा ‘आधात्री’ दोन
स्त्री लङ्ग ह, क्य क वशेष्य ‘संस्कृ तः’ स्त्री लङ्ग है। ‘आधात्री’ = आ + √धा + तृच् + ङ प् — धारण/पोषण करने
वाली। ‘ ह’ अव्यय यहाँ नश्चय के अथ म है — ‘ नश्चय ही’।
यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् — पृष्ठ 8
१. ‘संस्कृताधा रता भारतीयैकता’ इ त वषये भाषणप्र तयो गता (अङ् कयोजनास हता) · २. वश्वब ुत्व वकासस्य मागाणाम् आलोचना
यस्तु क्रयावान् मनु जः स वद्वान्
प्र.1 “संस्कृताधा रता भारतीयैकता” इ त एतं वषयम् आधृत्य एका भाषणप्र तयो गता आयोजनीया। शक्षकः
भाषणप्र तयो गतायां नम्नाङ् कतानां बन्दूनां समावेशं क रष्य त। (अङ् कयोजना — प्रवाहः, शुद्धता, शब्दकोषः)
यह प्र तयो गता-काय है। वषय है — ‘संस्कृत पर आधा रत भारतीय एकता’। शक्षक तीन बन्दुओं पर अंक दगे : प्रवाहः
(धाराप्रवाह बोलना), शुद्धता (व्याकरण क शु द्ध) तथा शब्दकोषः (शब्द-भण्डार क व वधता)। प्रत्येक बन्दु पर ५ से १ तक अंक
ह।
पुस्तक क अङ् कयोजना (मूल्यांकन-ता लका) —
अङ् कयोजना ५ ४ ३ २ १
पवाहः पवाहपूवकं संवादं केषु चत् बन्दुषु केषु चत् बन्दुषु कदा चत् प्रायः वरामं संचार एव न
करोित। वरामं करो त परन्तु वरामं करो त यः करो त येन संचारः क ठनः जायते।
सः संचारं न बाधते। संचारं बाधते। भव त।
शुद्धता योग्यवाक्य- अत्यल्पाः व्याकरण- नै म त्तक- त्रु टपूण-वाक्य-संरचनाः वाक्य-संरचना
संरचना दोषाः व्याकरण-दोषाः एव न
जायमाना
अ स्त।
शब्दकोषः पासंिगक - शब्दावल्यां प्रास ङ्गक–सी मत- सी मतशब्दकोशस्य द्वत्राः एव
शब्दकोशस्य व वधतायाः शब्दकोशस्य उपयोगः शब्दाः
िविवधतायाः उपयोगः उपयोगः प्रयुक्ताः।
उपयोगः
उच्चतम ेणी (५ + ५ + ५) पाने के लए भाषण म क्या चा हए —
प्रवाहः (५): बना रुके, बना ‘अ… अ…’ के बो लए। वाक्य छोटे र खए; एक साँस म एक ही वचार। कण्ठस्थ क जए, प ढ़ए
मत।
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शुद्धता (५): कता- क्रया का वचन मलाइए (संस्कृतम् अ स्त / भाषाः स न्त), वभ क्त ठ क र खए, संख्यावाची शब्द म
सावधानी बर तए। जस वाक्य पर सन्दे ह हो, उसे सरल कर द जए — अशुद्ध लम्बे वाक्य से शुद्ध छोटा वाक्य अच्छा है।
शब्दकोषः (५): एक ही शब्द बार-बार मत दोहराइए। पाठ के पयाय का उपयोग क जए — भाषा/वाणी/भारती/सुरभारती,
एकता/ऐक्यम्/सङ् घटनम्, ानम्/ वद्या/शास्त्रम्, सवत्र/सवतः।
वषय-वस्तु: तीन खण्ड बनाइए — (१) संस्कृत क्य जोड़ती है, (२) उदाहरण, (३) आज हम क्या कर। आरम्भ म सुभा षत
और अन्त म आ ान र खए।
आदश उत्तरम् (नमूना भाषण — उच्चतम ेणी) —
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॥ संस्कृ ताधािरता भारतीयैक ता ॥
माननीयाः अध्यापकाः, िपयाः सहपािठनः, सवभ्यः नमस्कारः।
अद्य अहं ‘संस्कृ ताधािरता भारतीयैक ता’ इित िवषये िकिञ्चत् वक्त मु ् इच्छािम।
संस्कृ तं भारतदे शस्य सम्पत् अिस्त। अस्यां भाषायाम् एव अस्माकं ानवैभ वं सिञ्चतम् अिस्त।
अस्माकं दे शे भाषाः बह्व्यः सिन्त — िहन्दी, मराठी, बाङ् ग्ला, ते लगु ,ु कन्नडम्, तिमऴम्, गुजरी, ओिड़ आ
इत्यादयः।
िकन्त ु आसां सव सां भाषाणां शब्दभण्डारः पायः संस्कृ तात् एव आगतः।
यदा कश्चन बङ् गदे शीयः ‘िवद्यालयः’ इित वदित, यदा च कश्चन कन्नडभाषी ‘िमत्रम्’ इित वदित, तदा उभौ अिप
संस्कृ तम् एव वदतः।
अतः एव किवः गायित — ‘भारतीयैक तासाधकं संस्कृ तम्’।
न के वलं शब्दाः, अिप त ु िवचाराः अिप सामान्याः सिन्त।
‘वसुधैव कु टु म्बकम्’, ‘सव भवन्त ु सुिखनः’, ‘सत्यमेव जयते ’ — एतािन वाक्यािन संस्कृ तात् एव िनःसत
ृ ािन,
एतािन च कश्मीरतः कन्याकु मारीपयन्तं सवः भारतीयैः समानरूपेण मन्यन्ते ।
रामायणं महाभारतं च दे शस्य पत्येक िस्मन् पदे शे स्वभाषया गीयेते — कथा एका, भाषाः अने क ाः।
इयम् एव अस्माकं वास्तिवकी एकता।
संस्कृ तं जनानां मानसं संस्करोित, वाणी ं पिरष्करोित, सत्पथे पेरयित च।
तत् के वलं भारतीयानाम् एकतां न साधयित, अिप त ु िवश्वबन्धुत्वम् अिप िवस्तारयित।
यतः संस्कृ तस्य सन्दे शः अिस्त — ‘सव सन्त ु िनरामयाः’।
अतः वयं सव पित ां कु मः — वयं संस्कृ तं पिठष्यामः, संस्कृ ते न विदष्यामः, संस्कृ तस्य सुभ ािषतािन च
स्मिरष्यामः।
यतः संस्कृ तं सत्यं िशवं सुन्दरं च अिस्त।
एतावत् एव। धन्यवादः।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम्
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( हन्द अनुवाद —) आदरणीय अध्यापकगण, प्रय सहपा ठयो, सबको नमस्कार। आज म ‘संस्कृत पर आधा रत भारतीय एकता’
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वषय पर कुछ कहना चाहता/चाहती ँ। संस्कृत भारत दे श क सम्प त्त है; इसी भाषा म हमारा ानवैभव सं चत है। हमारे दे श म
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.cहै। जब कोई बंगाली ‘ वद्यालय’ कहता है और कोई कन्नडभाषी ‘ मत्र’ कहता हैa, gतब दोन संस्कृत ही बोल रहे
भाषाएँ बहुत ह — हन्द , मराठ , बाङ् ग्ला, तेलुगु, कन्नड, त मऴ, गुजराती, ओ ड़आ आ द। कन्तु इन सबका शब्दभण्डार प्रायः
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seलए क व गाता है — ‘भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्’। केवल शब्द ही नह , वचार भी साझे ह — ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’,
संस्कृत से ही आया
होते ह। a
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agभवन्तु सु खनः’, ‘सत्यमेव जयते’ — ये वाक्य संस्कृत से ही नकले ह और कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय इन्ह एक-
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सा मानते ह। रामायण और महाभारत दे श के हर प्रदे श म अपनी-अपनी भाषा म गाए जाते ह — कथा एक, भाषाएँ अनेक। यही
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हमारी वास्त वक एकता है। संस्कृत मन को संस्का रत करती है, वाणी को शुद्ध करती है और सन्माग पर प्रे रत करती है। वह केवल
a s e,mक्य क उसका सन्देश है — ‘सव सन्तु नरामयाः’। इस लए हम सब
agl और संस्कृत के सुभा षत याद रखगे; क्य क संस्कृत सत्य है, शव है और
भारतीय क एकता नह साधती, वश्वबन्धुत्व भी फैलाती है
प्र त ा करते ह — हम संस्कृत पढ़गे, संस्कृत म बोलगे
सुन्दर है। बस इतना ही। धन्यवाद।
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यह भाषण उच्चतम ेणी म क्य आएगा: प्रवाहः (५) — वाक्य छोटे ह, कोई वाक्य दो पं क्तय
. c omसमय कह अटकना नह पड़ेगा और ‘संचारः’ (स ेषण) कह नह टूaटgेगlा।aशुद्धता (५) — हर वाक्य
इस लए बोलते
a s emऔर क्रया का वचन मला हुआ है (भाषाः … स न्त; कथा एका; उभौ … वदतः), समास पाठ से ही लए गए
म कता
ag l ह, इस लए व्याकरण-दोष क सम्भावना न्यूनतम है। शब्दकोषः (५) — सम्पत्, ानवैभवम्, शब्दभण्डारः,
नःसृता न, संस्करो त, प रष्करो त, वस्तारय त, प्र त ाम् — शब्द बार-बार नह दोहराए गए और सब प्रसंग के
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अनुकूल ह।
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l और अन्त का ‘धन्यवादः’ कभी न भू लए — इनसे प्रवाह का प्रथम
agसम्बोधन
प्रस्तु त क यु क्तयाँ: (१) आरम्भ का
और अ न्तम प्रभाव बनता है। (२) उद्धरण (‘भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम्’) बोलते समय स्वर थोड़ा ऊँचा क जए।
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(३) २–३ मनट पयाप्त ह; लम्बा भाषण प्रायः प्रवाह खो दे ता है। (४) एक बार दपण के सामने और एक बार मत्र के
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सामने अभ्यास क जए — मत्र से केवल यह पू छए क ‘कहाँ अटका ?’
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प्र.2 वश्वब ुत्वभावनायाः वकासाय के मागाः अवलम्बनीयाः इ त वषयम धकृत्य सहपा ठ भः सह आलोचनां कुरुत।
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यह समूह-चचा (आलोचना) का काय है — सहपा ठय के साथ बैठकर यह सोचना है क वश्वबन्धुत्व क भावना बढ़ाने के लए
कौन-से माग अपनाए जाएँ। इसका उत्तर एक ‘सही’ सूची नह है; पर अच्छ चचा क एक व ध अवश्य है।
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चचा कैसे क जए ( व ध) —
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1. पाँच-छह के समूह बनाइए। एक वद्याथ ‘लेखक’ बने जो सुझाव लखता जाए।
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g तैकताकारकं संस्कृतम्’। चचा इसी
2..cपहले पाठ का तीसरा ोक फर से प ढ़ए — ‘ वश्वबन्धुत्व वस्तारकं संस्कृतम् /aसवभू
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se आधार से आरम्भ हो।
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3. हर सदस्य एक ऐसा उपाय बताए जो वह स्वयं इसी सप्ताह कर सकता है — बड़ी-बड़ी बात नह , छोटा और करने योग्य काम।
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4. अन्त म समूह तीन उपाय चुने और यह भी लखे क उन्ह कैसे जाँचा जाएगा क वे सचमुच हुए या नह ।
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अ े उत्तर म ये बात अवश्य आएँ — हर माग कसी ोक या भावाथ से जुड़ा हो; माग व्यावहा रक हो; और उसम ‘सवभूत’ का
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भाव हो — अथात् केवल मनुष्य नह , प्रा णमात्र तक करुणा जाए।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
क्रमः मागः (संस्कृतम्) हन्द म क्या करना है पाठ से आधार
१ भाषाणां परस्परम् आदरः — िवद्यालये महीने में एक िदन हर िवद्याथ िकसी दू स री भारतीयैकतासाधकं संस्कृतम् ( ोक
‘भाषा-िदवसः’ आयोजनीयः। भारतीय भाषा का एक गीत या सुभािषत १)
सुनाए।
२ सुभािषतानां पठनम् — ‘वसुधै व पाथना-सभा में पितिदन एक सुभािषत वश्वबन्धुत्व वस्तारकं संस्कृतम् ( ोक
कु टुम्बकम्’ इत्यादीिन कण्ठस्थािन उसके अथ के साथ पढ़ ा जाए। ३)
कतव्यािन।
३ पािणदया — पिक्षभ्यः जलपात्रं, वृक्षारोपणं क क्षा हर छत पर पिक्षयों के िलए पानी रखे; सवभूतैकताकारकं संस्कृतम् ( ोक
च। वष में पाँच पौधे लगाए। ३)
४ पत्रमैत्र ी — अन्यराज्यस्य िवद्यालयेन सह िकसी दू स रे राज्य के िवद्यालय से पत्र- वश्वबन्धुत्वं वधय त (भावाथ ३)
पत्राचारः। िमत्रता जोड़ ी जाए ; वष में चार पत्र िलखे
जाएँ।
५ से वाकायम् — त्यागः, सन्तोषः, से वा च महीने में एक िदन ‘से वा-िदवस ’ — त्यागसन्तोषसेवाव्रतं संस्कृतम् ( ोक
वतरूपेण स्वीकाय ः। िवद्यालय की सफाई, छोटी क क्षा के बच्चों ४)
को पढ़ ाना।
६ शीलपालनम् — सत्यम्, अिहंस ा, क क्षा में ‘आज िकसी ने िकसी की सहायता पञ्चशीलप्र तष्ठापकं संस्कृतम् ( ोक
अस्तेयम् इत्यादीनां पञ्चशीलानाम् की’ — इसका एक साप्तािहक िभित्त-पत्र ३) तथा ‘पञ्चशीलं कम् ?’
आचरणम्। बने।
आदश उत्तरम् (नमूना — चचा का नष्कष) —
िवश्वबन्धुत्वभावनायाः िवकासाय अस्मािभः त्रयः माग ः अवलम्बनीयाः इित वयं िनिश्चतवन्तः —
पथमम् — अन्येषां भाषाणां संस्कृ तीनां च आदरः करणीयः, यतः िनन्दया न कदािप बन्धुत्वं जायते ।
िद्वतीयम् — ‘वसुधैव कु टु म्बकम्’ इित भावः के वलं कण्ठस्थः न भवेत ्, अिप त ु आचरणे दृ श्येत — अतः पितमासम्
एकः सेवािदवसः आयोजनीयः।
त ृत ीयम् — सवषु भूते ष ु दया करणीया; पिक्षभ्यः जलं, वृक्षेभ्यः रक्षणं च दे यम्।
यतः यत्र सव पािणनः सुिखनः भविन्त, तत्र एव जगत् एकनीडं भवित।
( हन्द — वश्वबन्धुत्व क भावना के वकास के लए हमने तीन माग तय कए — पहला, दूसरी भाषाओं और संस्कृ तय का आदर
करना, क्य क नन्दा से कभी भाईचारा नह बनता। दूसरा, ‘वसुधैव कुटु म्बकम्’ केवल याद न रहे, आचरण म दखे — इसके लए
हर महीने एक सेवा- दवस मनाया जाए। तीसरा, सब प्रा णय पर दया क जाए — प क्षय को पानी और वृक्ष को रक्षा द जाए।
क्य क जहाँ सब प्राणी सुखी होते ह, वह संसार एक घ सला बनता है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
यह उत्तर अ ा क्य है: इसम तीन माग पाठ से नकले ह (आदर → ोक १, सेवा → ोक ४, प्रा णदया →
ोक ३), तीन करने योग्य ह, और अ न्तम पं क्त अभ्यास के प्रश्न ७ (च) के वाक्य ‘यत्र जगत् एकनीडं भव त’ को
उठाकर पूरे उत्तर को पाठ से बाँध दे ती है। चचा का उत्तर तभी पूरा माना जाता है जब वह वचार से आरम्भ होकर
काय पर समाप्त हो।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ-प रचय — पाठ का आरम्भ एक छोटे गद्यांश से होता है : ‘संस्कृतं भारतदे शस्य सम्पद स्त। अ स्मन् भारतीयानां ानवैभवं
स ञ्चतम स्त।’ अथात् संस्कृत भारत क सम्प त्त है, इसी म भारतीय का ानवैभव सं चत है, संस्कृत पढ़ने से मनुष्य सुसंस्कृत
बनता है, और भारतीय भाषाओं को भली-भाँ त पढ़ने के लए संस्कृत अत्यन्त अपे क्षत है। इसी वषय को लेकर क व ने यह
सुन्दर गीत रचा है।
वधा तथा रच यता — यह गीत है, कोई कथा या संवाद नह । छह ोक क चार पं क्तयाँ ‘…संस्कृतम्’ पर समाप्त होती ह
— यही आवृ त्त गीत को लय और बल दे ती है। रच यता प ण्डत वासुदेव-शास्त्री द्ववेद ने सरल संस्कृत म अनेक ग्रन्थ लखे
और ‘परमाथसुधा’ नामक संस्कृत-प त्रका का सम्पादन भी कया।
वषयवस्तु — छह ोक संस्कृत के छह पक्ष को गनाते ह — (१) रा ीय एकता तथा भारतीयता, (२) मन-वाणी का संस्कार
तथा स ण, (३) वश्वबन्धुत्व, प्रा णमात्र क एकता, शा न्त एवं पञ्चशील, (४) त्याग-सन्तोष-सेवा का व्रत तथा ान- व ान का
मेल, (५) चार पुरुषाथ एवं इहलोक-परलोक दोन का उत्कष, (६) शब्द-सौन्दय, माधुय तथा पूवज के यश क स्मृ त।
मूल सन्दे श — संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नह , वह संस्कृ त क जड़ है। वह जोड़ती है (ऐक्य), शुद्ध करती है
(संस्कार), फैलाती है ( वश्वबन्धुत्व) और ऊपर उठाती है (उत्कष) — इसी लए क व उसे ‘सत्यं शवं सुन्दरम्’ कहता है : सत्य म
नष्ठ, कल्याणकारी और मनोहर।
भा षक वशेषताएँ — पूरे गीत क भाषा समासबहुला है। प्रत्येक पं क्त म एक लम्बा षष्ठी-तत्पुरुष समास है और उसके बाद
‘संस्कृतम्’ — इसी लए अभ्यास का प्रश्न ६ समस्तपद के वग्रह पर है। ‘संस्कृतम्’ क आवृ त्त से अनुप्रास तथा गीतात्मक
ताल बनती है।
व्याकर णक बदु — गीत स न्ध का उत्तम अभ्यास कराता है — वृ द्ध स न्ध (भारतीय + ऐकता → भारतीयैकता, सवभूत +
एकता → सवभूतैकता), द घ स न्ध (सवदा + आनन्द → सवदानन्द, ऐ हक + आमु ष्मक → ऐ हकामु ष्मक), गुण स न्ध
(आमु ष्मक + उत्कषद → आमु ष्मकोत्कषद, द्वय + उद्वे लन → द्वयोद्वे लन) तथा वसगस न्ध/श्चत्व ( वश्वचेतः + चमत्कारकम्
→ वश्वचेतश्चमत्कारकम्)।
कारक का अभ्यास — प्रश्न २ तथा ३ सीधे सम्ब े षष्ठी पर टके ह — ‘कस्याः साधकम्?’ का उत्तर स्त्री लङ्ग षष्ठी म
(भारतीयैकतायाः), ‘कासां प रष्कारकम्?’ का बहुवचन षष्ठी म (सववाणीनाम्), ‘कयोः सम्मेलनम्?’ का द्ववचन षष्ठी म
( ान व ानयोः)। प्रश्न का वभ क्त-रूप ही उत्तर का वभ क्त-रूप तय करता है।
अ त रक्त सामग्री — ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ म बौद्धधम के पञ्चशील (अस्तेयम्, अ हसा, ब्रह्मचयम्, सत्यम्, मादकद्रव्याणां
प रहारः) का प रचय है — यही तीसरे ोक के ‘पञ्चशीलप्र तष्ठापकम्’ पद को स्पष्ट करता है; साथ म तीन ोक भी दए ह,
जनम पहला मनुस्मृ त का प्र सद्ध ोक है।
अभ्यास क्या माँगता है — एक शब्द म उत्तर, पूण वाक्य म उत्तर, रक्तस्थानपू त, मञ्जूषा से छह वाक्य क रचना, छह
समस्तपद का वग्रह, पयायपद चुनकर वाक्यपू त तथा मेलन। इसके ऊपर ‘यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान्’ म
‘संस्कृताधा रता भारतीयैकता’ वषय पर भाषणप्र तयो गता है, जसका मूल्यांकन प्रवाहः, शुद्धता तथा शब्दकोषः — इन तीन
बन्दुओं क ५-अङ् क य अङ् कयोजना से होगा।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शवं सुन्दरं संस्कृतम् AglaSem · NCERT Solutions
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ पाठ का वाक्य / पं क्त
आमु ष्मकम् (नपुं.) परलोकस्य परलोक का ऐ हकामु ष्मकोत्कषदं संस्कृतम् ( ोक ५)
उत्कषदम् (नपुं.) उत्कष ं ददाित इित उन्न त को दे ने वाली ऐ हकामु ष्मकोत्कषदं संस्कृतम् ( ोक ५)
उद्वे लनम् (नपुं.) उदयकृ त् (उद् + √वेल + ल्युट्) उत्थान करने वाला भु क्तमु क्तद्वयोद्वे लनं संस्कृतम् ( ोक ४)
ऐ हकम् (नपुं.) इह लोके भवम्, संस ारस्य संसार का, इस लोक का ऐ हकामु ष्मकोत्कषदं संस्कृतम् ( ोक ५)
कमदम् (नपुं.) कम ददाित इित पुरुषाथ को दे ने वाली कमदं ानदं भ क्तदं संस्कृतम् ( ोक ५)
चारु (नपुं.) सुन्दरम् मनोहर चारुमाधुयधारागृहं संस्कृतम् ( ोक ६)
प रष्कारकम् (नपुं.) संस्कारकम् शुद्ध करने वाली सववाणीप रष्कारकं संस्कृतम् ( ोक २)
पुञ्जः (पुं.) रािशः समूह, ढे र ानपुञ्जप्रभादशकं संस्कृतम् ( ोक १)
प्रभा (स्त्री.) दीिप्तः प्रकाश, आभा ानपुञ्जप्रभादशकं संस्कृतम् ( ोक १)
भ क्तदम् (नपुं.) भिक्तं ददाित इित भ क्त को दे ने वाली कमदं ानदं भ क्तदं संस्कृतम् ( ोक ५)
माधुयधारा (स्त्री.) माध यु स्य धारा इित मधुर रस क धारा चारुमाधुयधारागृहं संस्कृतम् ( ोक ६)
वस्तारकम् (नपुं.) िवस्तारं करोित / िवतनोित यत् वस्तार करने वाली वश्वबन्धुत्व वस्तारकं संस्कृतम् ( ोक ३)
लीलावनम् (नपुं.) लीलायाः वनम् क्र डा का उद्यान शब्दला लत्यलीलावनं संस्कृतम् ( ोक ६)
सत्पथः (पुं.) सन्मागः सत्य माग, सन्माग सत्पथप्रेरणादायकं संस्कृतम् ( ोक २)
सन्दोहः (पुं.) समूहः समूह सवदानन्दसन्दोहदं संस्कृतम् ( ोक १)
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