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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 2: सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम्
अथः
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
9 – 21 12 47 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 39 pages
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 2: सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम्
अथः
सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः शारदा (कक्षा ९) का द्वतीयः पाठः है। यह गद्यपाठ है — नी तशास्त्र तथा अथसाक्षरता (financial
literacy) को जोड़नेवाला एक मौ लक नबन्ध, जसका मूल सूत्र कौ टल्य के अथशास्त्र से लया गया है — “सुखस्य मूलं धमः, धमस्य मूलम्
अथः।” पाठ म गरुडपुराण, मनुस्मृ त, ईशोप नषद् तथा चाणक्यनी त क सू क्तयाँ उद्धत ह, बीच म अत्र इदम् अवधेयम् के अन्तगत चक्रवृ ंश
(compound interest) क सा रणी द गई है, और अभ्यासाद् जायते स द्धः के अन्तगत छह प्रकार के प्रश्न ह — एकपदे न उत्तर, पूणवाक्येन
उत्तर, वाक्येन सह ग्रन्थस्य सम्मेलनम्, रेखाङ् कतपद-आधृत्य प्रश्न नमाणम्, उ चतैः पदै ः रक्तस्थानपू तः (आत्मनेपद धातुरूप) तथा बहु वकल्पात्मक
प्रश्न।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
शारदा (कक्षा 9) 9 – 21
खं ड प्रश्न
12 47
माध्यम
हन्द
पाठ-बोधः (पाठ्य प्रश्न) — पृष्ठ 9–12
गद्यांशस्य अवबोधः — धम-अथ-सुखयोः सम्ब ः, त्र वधः आ थकव्यवहारः, छात्रजीवने आ थकसाक्षरता
पाठ्य प्रश्न
प्र.1 भारतीयधमशास्त्रेषु क दृश्यः सूक्तयः वद्यन्ते ? तासु एका प्र सद्धा सू क्तः क स्मन् ग्रन्थे प्राप्यते ?
भारतीयधमशास्त्रेषु अनेकाः सूक्तयः वद्यन्ते, याः मानवजीवनस्य यथाथतत्त्वं प्र तपादय न्त। तासु एकं प्र सद्धं सूत्ररूपं
वाक्यं कौ टल्यस्य अथशास्त्रे प्राप्यते — “सुखस्य मूलं धमः, धमस्य मूलम् अथः।” ( हन्द — भारतीय धमशास्त्र म अनेक
सू क्तयाँ ह, जो मानव-जीवन के यथाथ तत्त्व का प्र तपादन करती ह। उनम एक प्र सद्ध सूत्ररूप वाक्य कौ टल्य के अथशास्त्र म
मलता है — “सुख क जड़ धम है, धम क जड़ धन है।”)
क्य यह ‘सूत्ररूप’ कहलाता है: संस्कृत म सूत्र उस वाक्य को कहते ह जो अत्यन्त सं क्षप्त हो, कन्तु जसम पूरा
सद्धान्त समा जाए। यहाँ केवल छह पद म जीवन के तीन पुरुषाथ का क्रम बता दया गया है — इसी लए ता लका
म इसका अथ ‘संक्षेपरूपम्’ (Aphoristic form) दया है।
ग्रन्थ-प रचय: अथशास्त्रम् आचाय कौ टल्य (चाणक्य / वष्णुगुप्त) क रचना है — राजनी त, प्रशासन तथा
अथव्यवस्था का प्राचीनतम भारतीय शास्त्र। अभ्यास के प्रश्न ३ (घ) म यही मेलन पूछा गया है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 “अथः” इत्युक्ते कम् ? जीवने धमः, अथः, सुखम् — एतेषां त्रयाणां परस्परसम्ब ं स्पष्टयत।
अथः इत्युक्ते धनं, यत् सव वधस्य आजी वकाव्यवहारस्य प्रमुखं साधनम्। जीवने धमः, अथः, सुखम् इत्येतेषां त्रयाणां
परस्परसम्ब ः अ व च्छन्नः अ स्त। यः जनः न्यायपूवकम् अथ पाजनं करो त, सः धमपालनं कतु समथः भव त, धमपालनेन
च द घका लकं सुखं लभते। ( हन्द — ‘अथ’ का तात्पय है धन, जो सब प्रकार के आजी वका-व्यवहार का प्रमुख साधन है। जीवन
म धम, अथ और सुख — इन तीन का पारस्प रक सम्बन्ध अटू ट है। जो व्य क्त न्यायपूवक धन कमाता है, वही धम का पालन कर
सकता है, और धमपालन से उसे द घका लक सुख मलता है।)
पाठ की शृंखला —
यायपूवकम् अथ पाजनम् → धमपालनम् → दीघकािलकं सुखम्
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क्य धन सबसे नीचे क सीढ़ है: सूत्र म क्रम उलटा दखता है — पहले सुख, फर धम, फर अथ। कन्तु ‘मूल’
का अथ है जड़। वृक्ष म जड़ नीचे होती है और फल ऊपर। अतः पढ़ना नीचे से चा हए — अथ जड़ है, धम तना है,
सुख फल है। धन के बना धम का पालन (दान, सेवा, शक्षा, अ त थ-सत्कार) व्यवहार म असम्भव हो जाता है।
ध्यान द: पाठ ‘अथ’ को साध्य नह , साधन कहता है — “आजी वकाव्यवहारस्य प्रमुखं साधनम्”। धन जीवन का
लक्ष्य नह , लक्ष्य तक पहुँचने का उपकरण है।
प्र.3 सामान्यजीवने धनं कमथम् आवश्यकम् ? पयाप्तधनस्य अभावे क भव त ?
सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, शक्षा, स्वास्थ्यसेवा चेत्याद नां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूतये धनम् आवश्यकम्।
पयाप्तधनस्य अभावात् स्वकतव्यपालनं क ठनं भव त; स्वास्थ्यं, शक्षा, सेवा, दानम् चेत्याद न काया ण बा धता न
भव न्त, दै न न्दनजीवनं च असन्तु लतं भव त। ( हन्द — साधारण जीवन म अन्न, वस्त्र, आवास, शक्षा, स्वास्थ्य-सेवा आ द
मूलभूत आवश्यकताओं क पू त के लए धन आवश्यक है। पयाप्त धन न होने पर अपने कतव्य का पालन क ठन हो जाता है;
स्वास्थ्य, शक्षा, सेवा और दान जैसे काय बा धत हो जाते ह तथा दै न न्दन जीवन असन्तु लत हो जाता है।)
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मूलभूता आवश्यकता हन्द धनाभावे प रणामः
अन्नम् भोजन पोषणाभावः, स्वास्थ् यहािनः
वस्त्रम् वस्त्र ऋतुर क्षायाः अभावः
आवासः घर सुर क्षायाः स्थैयस्य च अभावः
िशक्षा शक्षा िवद्य ाजनं बािधतम्
स्वास्थ्यसे वा च कत्सा रोगे िचिक त्सा दुष्करा
नष्कष क्य : इसी कारण धमशास्त्र चतुवग — धम-अथ-काम-मोक्ष — म अथ को अन्यतमः स्त ः मानता है।
स्तम्भ भवन का सौन्दय नह , आधार होता है; धन भी वैसा ही है।
प्र.4 स्वस्थः आ थकव्यवहारः क त वधः भव त ? प्रत्येकं सोदाहरणं वणयत।
स्वस्थः आ थकव्यवहारः त्र वधः भव त — (१) न्यायपूणम् अथ पाजनम्, (२) औ चत्यपूणः व्ययः, (३) भ वष्यदृ ा
सञ्चयः। ( हन्द — स्वस्थ आ थक व्यवहार तीन प्रकार का होता है — न्यायपूण धनोपाजन, उ चत व्यय तथा भ वष्य को ध्यान म
रखकर कया गया संचय।)
क्रमः प्रकारः पाठस्य आशयः प्रमाणवचनम् / उदाहरणम्
१. न्यायपूणम् स न्माग ण एव धनाजनं करणीयम्; अनैितकः आिथक व्यवहारः कदािप न मनुः — “सवषामेव
अथ पाजनम् करणीयः। शौचानामथशौचं परं स्मृतम्।”
उप नषद् — “मा गृधः
कस्य स्वद्धनम्।”
२. औिचत्यपूणः येन व्ययेन स्वास्थ् यलाभः, िवद्य ाजनम्, आ त्मसुर क्षा वा भवेत ् — सः व्ययः प्रत्येकं व्ययस्य लेखः स्थापनीयः,
व्ययः अवश्यं करणीयः। आडम् बरपूणः पदशनकारी व्ययः िवलास व्यसनाय व्ययः अन्ते च तेषां प रशीलनं करणीयम्।
च अपव्ययः, सः वजनीयः।
३. भिवष्यदृ ष्ट ा उपािजतधनस्य क श्चन भागः भिवष्यसुर क्षायै स ञ्चयनीयः। स ञ्चयस्य संकटकालेऽ प स्वा भमा नजनः
सञ्चयः अभ्यासे न जनः स्वावल म् बी भवित; स्वावल म् बनं स्वािभमानस्य मूल ं वतते। अन्यजनस्य आ थकसहायतां
नापेक्षते।
तीन क्य साथ चा हए: केवल कमाना पयाप्त नह — बना संय मत व्यय के कमाई बह जाती है; और बना संचय
के एक संकट पूरी कमाई नगल जाता है। तीन मलकर ही व्यवहार को स्वस्थ बनाते ह, जैसे शरीर के लए आहार,
वहार और व ाम तीन ।
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छात्रजीवने आ थकसाक्षरता कमथम् आवश्यका ? छात्राः कैः कारणैः अपव्ययं कुव न्त ?
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अनेgकlदा छात्राः माता पतृभ्यां कष्टा जतधनस्य तुच्छकारणैः अपव्ययं कुव न्त। ज ालालसापूत्यथ त्व रताहारः, शीतपेयं,
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पुट कृतभोजनं, तथैव व्यसनपदाथानां सेवनं, प्रदशनका रप रधानं, वला सतापूणम् आचरणं चेत्या द यत्र प्रभूतः अपव्ययः
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भव त। एतैः न केवलं धनहा नः, स्वास्थ्यहा नर प जायते; स्वास्थ्यहा नकारणात् पुनः धनव्ययः वधते। अतः छात्रजीवने
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आ थकसाक्षरता आवश्यका। ( हन्द — प्रायः छात्र माता- पता के कष्ट से कमाए धन का तुच्छ कारण से अपव्यय करते ह —
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वला सतापूण आचरण। इनसे केवल धन क हाaनgनह , स्वास्थ्य क भी हा न होती है, और स्वास्थ्य बगड़ने पर फर से धन-व्यय बढ़
जीभ क लालसा पूरी करने के लए फ़ास्ट फ़ूड, शीतपेय, डब्बाबन्द भोजन, व्यसन-पदाथ का सेवन, दखावट वेशभूषा और
जाता है।)
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अपव्यय का दुष्च
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त च्ु छकारणैः व्ययः → धनहािनः → अस्वास्थ्यकर-आहारसेवनम् → स्वास्थ्यहािनः → िचिकत्सायै पुन ः अिधकः
a g धन व्ययः
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la यह जानना क धन कहाँ से आता है, कस पर व्यय करना उ चत है,
यही ‘आ थकसाक्षरता’ है: ता लका म आ थकसाक्षरता
(Financial literacy)’ दया है — g
का अथ ‘आ थक साक्षरता / वत्तीय साक्षरता
a अथात्
और शेष का क्या करना है। पाठ इसे नै तक प्रश्न भी बनाता है, क्य क जो धन व्यय हो रहा है वह छात्र का नह ,
माता- पता का कष्टा जत धन है।
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g , आत्मसुरक्षा हो, वह ‘अवश्यं
.c द: पाठ व्यय का वरोध नह करता। जस व्यय से स्वास्थ्यलाभः, वद्याजनम्
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aseकरणीयः’ है। वजनीय केवल आडम्बर, प्रदशन तथा वलासव्यसन पर कया व्यय है।
ध्यान
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प्र.6 भारतदे शे धनसञ्चयस्य सुर क्षत नवेशस्य च कृते के मागाः स न्त ? सूचनां ल ुं कुत्र गन्तव्यम् ?
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भारतदे शे धनसञ्चयस्य सुर क्षत नवेशस्य च कृते बहु वधाः मागाः स न्त। सूचनाः ल
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ुं लाभम् अवाप्तुं च
mभारत म धन-संचय तथा सुर क्षत
समीपस्थ वत्तागाराः पत्रालयाः वा गन्तव्याः, तत्सम्बद्धाः अ धका रणः च प्रष्टव्याः। ( हन्दe—
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नवेशoके अनेक माग ह। सूचना पाने और लाभ उठाने के लए पास के बक अथवा डाकघर
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gl जाना चा हए तथा सम्ब न्धत अ धका रय
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as emसे पूछना चा हए।)
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संस्कृतनाम हन्द नाम संक्षेपः
पधानमन्त्री-जनधनयोजना प्रधानमन्त्री जन धन योजना PMJDY
सुक न्या-सम ृिद्ध-योजना सुकन्या समृ द्ध योजना SSY
सावजिनक-भिवष्य-िनिधः सावज नक भ वष्य न ध PPF
विरष्ठ-नागिरक-संचय-योजना व रष्ठ नाग रक बचत योजना SCSS
िकसान-िवकास-पत्रम् कसान वकास पत्र KVP
राि य-संचय-पमाणपत्रम् रा ीय बचत प्रमाणपत्र NSC
राि य-पेंशन-योजना रा ीय पशन प्रणाली NPS
िनयतिनक्षेपः न श्चत अव ध के लए जमा FD
आवृित्तिनक्षेपः आवत जमा RD
इन योजनाओं का लाभ दो प्रकार का है: पाठ के शब्द म — “एतासु योजनासु न केवलं कष्टा जतधनस्य सुरक्षा
भव त अ प तु चक्रवृ ंशेन सह तद्धनं सततं वधमानं भव त।” अथात् (क) धन सुर क्षत रहता है, (ख) चक्रवृ द्ध
ब्याज से बढ़ता भी रहता है।
शब्द-सङ् केत: वत्तागारम् = बक ( वत्तस्य आगारम् — षष्ठी-तत्पुरुष), पत्रालयः = डाकघर। ये दोन पद प्रश्न बनाने
म बहुत काम आते ह।
प्र.7 बु द्धमतां छात्राणां ध्येयं क स्यात् ? क दृशः वद्याथ भ वष्ये उत्तरदायी नाग रकः भव त ?
बु द्धमतां छात्राणां ध्येयं स्यात् — धनस्य उ चतोपाजनम्, व्ययस्य मयादा, आपत्कालीन न धसञ्चयः, द घकालीन नवेशश्च।
यः एतेषाम् अनुशासनेन पालनं करो त, स एव यथाथतः धनस्य धमस्य च सन्तोलनं स्थाप यतुं शक्नो त। यः वद्याथ अद्य
अथ वषये जागरूकः अ स्त, सः भ वष्ये उत्तरदायी नाग रकः भव त। ( हन्द — बु द्धमान् छात्र का ध्येय होना चा हए — धन
का उ चत उपाजन, व्यय क मयादा, आपत्कालीन न ध का संचय तथा द घकालीन नवेश। जो इनका अनुशासनपूवक पालन करता
है, वही सचमुच धन और धम का सन्तुलन स्था पत कर सकता है। जो वद्याथ आज अथ के वषय म जागरूक है, वही भ वष्य म
उत्तरदायी नाग रक बनता है।)
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ध्येयम् हन्द व्यावहा रक अथ
धनस्य उिचतोपाजनम् धन का उ चत उपाजन स न्माग से ही कमाना
व्ययस्य मय दा व्यय क सीमा आवश्यकता तक ही ख़च, ले खा रखना
आपत्कालीनिनिधसञ्चयः आपात- न ध का संचय संक ट के िलए अलग बचत
दीघकालीनिनवेशः द घकालीन नवेश क्र
च वृिद्ध का लाभ पाने के िलए ल म् बी अविध का िनवेश
पाठ का अ न्तम सूत्र: “धमः, अथः, सुखम् चेत्येतेषां सन्तोलनम् एव यथाथजीवनस्य लक्षणम्।” — जीवन क
कसौट कसी एक क अ त नह , तीन का सन्तुलन है। इसी को सद्ध करने के लए अन्त म यह ोक दया है —
“क्षणशः कणशश्चैव वद्यामथ च साधयेत्।”
भाषा-सङ् केत: पाठ म मु द्रत सन्तोलनम् शब्द ‘सन्तुलनम्’ का ही रूप है (अथः — समन्वयः, Balance)।
ता लका म भी यही रूप दया गया है, अतः उत्तर म यही ल खए।
सूक्तीनां ोकानां च अथः — पृष्ठ 9–12
पाठे उद्धताः पञ्च सूक्तयः — पदच्छे दः, अन्वयः, शब्दाथः, हन्द अथ, भावः
ोकाथः
प्र.1 “सुखस्य मूलं धमः, धमस्य मूलम् अथः।” — अस्य सूत्रस्य पदच्छे दम् अन्वयं अथ भावं च लखत। इदं वाक्यं
क स्मन् ग्रन्थे अ स्त ?
इदं सूत्ररूपं वाक्यं कौ टल्यस्य अथशास्त्रे अ स्त। ( हन्द — यह सूत्ररूप वाक्य कौ टल्य के अथशास्त्र म है।)
पद च् छे द ः — सुखस्य + मूलम् + धमः, धमस्य + मूलम् + अथः।
अन्वयः — सुखस्य मूलं धमः (अिस्त), धमस्य मूलम् अथः (अिस्त)।
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पदम् शब्दाथः (संस्कृतम्) हन्द अथ व्याकरणम्
सुखस्य आनन्दस्य सुख का सुख (नपुं.) — षष्ठी ए .व.; «स म् बन्धे षष्ठी»
मूल म् आधारः, प्रथमं कारणम् जड़, आधार मूल (नपुं.) — पथमा ए .व.
धमः कतव्यम्, सदाचारः धम धम (पुं.) — पथमा ए .व.; «कतिर पथमा»
अथः धनम् धन अथ (पुं.) — पथमा ए .व.
हन्द अथ — सुख क जड़ धम है, और धम क जड़ अथ (धन) है।
भावः: मानवः यथाथ सुखं तदा एव लभते यदा सः धम पालय त; धमपालनं च तदा एव सम्भव त यदा तस्य समीपे
न्यायोपा जतः अथः अ स्त। अतः अथः धमस्य साधनम्, धमः च सुखस्य साधनम्। (भाव — मनुष्य को सच्चा सुख
तभी मलता है जब वह धम का पालन करे; और धम का पालन तभी सम्भव है जब उसके पास न्याय से कमाया धन
हो। इस लए धन धम का साधन है और धम सुख का साधन।)
व्याकरण- टप्पणी: दोन वाक्य म क्रयापद अ स्त अध्याहृत (लुप्त) है — संस्कृत म ‘X is Y’ प्रकार के वाक्य म
‘अ स्त’ प्रायः छोड़ दया जाता है। ‘सुखस्य’ तथा ‘धमस्य’ म षष्ठी वभ क्त है, क्य क सम्बन्ध बताया जा रहा है —
कसका मूल?
प्र.2 “ ा े मुहूत चो ाय धममथ च चन्तयेत्।” — अस्य पदच्छे दं स वच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत। इदं
वचनं कुत्र उक्तम् ?
इदं वचनं गरुडपुराणे उक्तम्। ( हन्द — यह वचन गरुडपुराण म कहा गया है।)
पद च् छे द ः — बाह्मे + मुहूत + च + उत्थाय + धमम् + अथम् + च + िचन्तयेत ्।
सिन्धः — च + उत्थाय = चोत् थाय (अ + उ = ओ, गुणसिन्धः) · धमम् + अथम् = धममथ म् (म्-अन्तस्य पदस्य
परे स्वरे सित अनुस्वारः न भवित, म् एव ितष्ठित)
अन्वयः — बाह्मे मुहूत उत्थाय च धमम् अथ ं च िचन्तयेत ्।
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पदम् शब्दाथः हन्द अथ व्याकरणम्
बाह्मे मुहूत प्रातःकालस्य सूय दयात् पूवः ाह्म मुहूत म (सूय दय से लगभग डेढ़ स प्तमी ए .व. — «अिधकरणे स प्तमी»
कालः घण्टा पूव) (कालािधकरणम्)
उत्थाय उ ानं कृत्वा उठकर उद् + √स्था + ल्यप् — पूवकािलक अव्यय
धमम् अथं धम धनं च धम और धन का िद्वतीया ए .व. — «कम िण िद्वतीया»
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िचन्तयेत ् चन्तनं कुयात् चन्तन करना चा हए √िचन्त् (िणजन्त), िविधिलङ् लकारः, पथमपुरुषः,
एकवचनम्
हन्द अथ — ाह्म मुहूत म उठकर धम और अथ — दोन का चन्तन करना चा हए। पाठ स्वयं इसका आशय दे ता है — “अथात्
दनस्य आरम्भे धमाथयोः चन्तनम् आवश्यकम्।”
भावः: दनस्य आरम्भः एव सव त्तमः कालः, यतः तदा मनः शान्तं नमलं च भव त। यः प्रातःकाले एव अद्य क धम्य
करणीयम्, कयान् व्ययः करणीयः, क च सञ्चेतव्यम् — इ त चन्तय त, तस्य सम्पूणः दवसः सुव्यव स्थतः भव त।
(भाव — दन का आरम्भ ही सव त्तम समय है, क्य क तब मन शान्त और नमल रहता है। जो प्रातः ही सोच लेता है
क आज कौन-सा धम्य काय करना है, कतना ख़च करना है और कतना बचाना है, उसका पूरा दन सुव्यव स्थत
रहता है।)
व ध लङ् क्य : ‘ चन्तयेत्’ म व ध लङ् लकार है, जो चा हए / करना उ चत है (उपदे श, व ध) का अथ दे ता है
— ‘ चन्तय त’ (करता है) नह । शास्त्र-वचन म यही लकार सामान्य है; आगे ‘साधयेत्’ म भी यही मलेगा।
प्र.3 “सवषामेव शौचानामथशौचं परं स्मृतम्। योऽथ शु च ह सः शु चन मृद्वा रशु चः शु चः॥” — अस्य ोकस्य
पदच्छे दं स वच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत। अयं ोकः केन उक्तः ?
अयं ोकः भगवता मनुना उक्तः; अयं मनुस्मृतेः वचनम् अ स्त। ( हन्द — यह ोक भगवान् मनु ने कहा है; यह मनुस्मृ त का
वचन है।)
पद च् छे द ः — सवषाम् + एव + शौचानाम् + अथशौचम् + परम् + स्मृत म्। यः + अथ + शुिचः + िह + सः + शुिचः
+ न + मृद्वािरशुिचः + शुिचः॥
सिन्धः — शौचानाम् + अथशौचम् = शौचानामथशौचम् · यः + अथ = योऽथ (िवसगसिन्धः — पूवरूपम्) · शुिचः
+ िह = शुिचिह · शुिचः + न = शुिचन (िवसगस्य रेफादे शः)
अन्वयः — सवषाम् एव शौचानाम् (मध्ये) अथशौचं परं स्मृत म्। यः अथ शुिचः (भवित) सः िह शुिचः; मृद्वािरशुिचः
(एव) शुिचः न (भवित)।
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पदम् शब्दाथः हन्द अथ व्याकरणम् / समासः
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सव सब प्रकार क शु द्धय म
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षष्ठी ब.व. — «िनध रणे षष्ठी»
शौचानाम्
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aअथशौचम् अथस्य (धनस्य) शौचम् धन क प वत्रता षष्ठी-तत्पुरुषः; नपुं. पथमा ए .व.
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परं स्म ृतम् ेष्ठं क थतम् ेष्ठ माना गया है स्म ृतम् — √स्म ृ + क्त, कम िण, नपुं. पथमा ए .व.
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शुद्ध, s m
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शुिचः प वत्रः वत्र पुं. पथमा ए .व. (तािलकायाम् अिप एतत् पदं द त्त म्)
म ृद्वािरशुिचः मृदा वा रणा च शु चः म और जल से (बाहर से) म ृत ् च वािर च = म ृद्वािरणी (द्वन्द्वः), ताभ्यां शुिचः
शुद्ध हुआ (ततृ ीया-तत्पुरुषः)
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c से कमाया हुआ है), वही सचमुच प वत्र है; जो केवल म और जल से शरीरagधोकर स्वच्छ हुआ है, वह वास्तव म
हन्द अथ — सब प्रकार क प वत्रताओं म धन क प वत्रता सव ेष्ठ मानी गई है। जो व्य क्त धन के वषय म प वत्र है (अथात्
जसका धन .न्याय
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sनहe है।
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प वत्र
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भावः: बाह्यशु द्धः शरीरस्य, आन्त रकशु द्धः तु आचरणस्य। यस्य धनम् अनै तकोपायेन आगतम्, सः सहस्रवारम्
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अ प स्नात्वा शु चः न भव त। पाठस्य आशयः — “अनै तकः आ थकव्यवहारः कदा प न करणीयः।” (भाव — बाहरी
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agहैl क अनै तक आ थक व्यवहार कभी नह करना चा हए।)
शु द्ध शरीर क है, भीतरी शु द्ध आचरण क । जसका धन अनै तक उपाय से आया है, वह हज़ार बार नहा ले तो भी
प वत्र नह होता। पाठ का आशय यही
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साथ प ढ़ए: उप नषद् का वचन — “मा गृधः कस्य स्वद्धनम्” ( कसी के धन का लालच मत करो; ईशोप नषद्)।
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g ‘अ’ (अडागम) नह लगता।
नषे.धाथक अव्यय है और गृधः लुङ्-लकार का माङ् -योग रूप है — इसी लए इसम
पाठ कहता है क इसे सदा मन म रखकर स्वकौशलेन वद्यया च धन उपा जत करना चा हए। ‘मा गृधः’ म मा
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प्र.4
ु त्रm
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“जल बन्दु नपातेन क्रमशः पूयते घटः। स क्रमः
अथ भावं च लखत। अयं ोकः कe
सव वद्यानां धमस्य च धनस्य च॥” — अस्य पदच्छे दम् अन्वयम्
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उक्तः ?
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अयं ोकः चाणक्यनीतौ उक्तः; एनं चाणक्यः अवदत्। ( हन्द — यह
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ोक चाणक्यनी त म कहा गया है; इसे चाणक्य ने कहा
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था।)
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ag पद च् छे द ः — जलिबन्दुिनपाते न + क्रमशः + पूयते + घटः। सः + क्रमः + सविवद्यानाम् + धमस्य + च + धनस्य
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+ च॥
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अन्वयः — जलिबन्दुिनपाते न घटः क्रमशः पूयते । सः (एव) क्रमः सविवद्यानां धमस्य च धनस्य च (भवित)।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
पदम् शब्दाथः हन्द अथ व्याकरणम् / समासः
जलिबन्दुिनपातेन जलस्य बन्दूनां पानी क बूँद जल स्य िबन्दवः = जलिबन्दवः (ष.तत्पुरुषः), तेषां िनपातः = जलिबन्दुिनपातः
पतनेन गरने से (ष.तत्पुरुषः); ततृ ीया ए .व. — «करणे ततृ ीया»
क्रमशः क्रमेण, शनैः शनैः क्रम से, धीरे- क्र
अव्ययम् ( म + शस् पत्ययः)
धीरे
पूयते पूणः भव त भर जाता है √पूर ् — कम वाच्ये लट् , पथमपुरुषः ए .व.
घटः कलशः घड़ा पथमा ए .व. — कम वाच्ये कम िण पथमा
सविवद्यानाम् समस्तानां सब वद्याओं कम धारयः; षष्ठी ब.व.
वद्यानाम् का
हन्द अथ — पानी क बूँद-बूँद गरने से घड़ा धीरे-धीरे भर जाता है। वही क्रम समस्त वद्याओं का, धम का और धन का भी है।
भावः: महत्काय क्षणेन न सध्य त — तत् लघु भः लघु भः प्रयत्नैः एव सध्य त। यथा एकैका बन्दुः घटं पूरय त, तथा
एकैकः ोकः वद्यां वधय त, एकैकं सत्कम धम वधय त, एकैका बचतः च धनं वधय त। पाठः स्वयं वद त — “लघु-
लघुः सञ्चयोऽ प कालान्तरे महत्सम्प त्तरूपेण वधते।” (भाव — बड़ा काम एक क्षण म नह होता, वह छोटे -छोटे
प्रयत्न से ही सद्ध होता है। जैसे एक-एक बूँद घड़ा भरती है, वैसे ही एक-एक ोक वद्या बढ़ाता है, एक-एक
सत्कम धम बढ़ाता है और एक-एक बचत धन बढ़ाती है।)
जोड़कर दे खए: यही ोक पाठ के चक्रवृ ंश वाले भाग क भू मका है — ₹1000 पर 10% चक्रवृ द्ध से दस
वष म ₹2,593.74 हो जाना ‘जल बन्दु नपात’ का ही ग णतीय रूप है। अभ्यास के प्रश्न १ (च), ३ (क) तथा ६ (ङ)
— तीन इसी ोक से बने ह।
प्र.5 “क्षणशः कणशश्चैव वद्यामथ च साधयेत्। क्षणे नष्टे कुतो वद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥” — अस्य पदच्छे दं
स वच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।
अयं ोकः पाठस्य अन्ते ‘अत एवोक्तम्’ इ त न दश्य उद्धतः; अयं धम-अथयोः सन्तोलनस्य उपसंहारवाक्यम्। ( हन्द —
यह ोक पाठ के अन्त म ‘अत एवोक्तम्’ कहकर उद्धत कया गया है; यह धम और अथ के सन्तुलन का उपसंहार-वाक्य है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
पद च् छे द ः — क्षणशः + कणशः + च + एव + िवद्याम् + अथम् + च + साधयेत ्। क्षणे + नष्टे + कु तः + िवद्या, कणे
+ नष्टे + कु तः + धनम्॥
सिन्धः — कणशः + च = कणशश्च (िवसगस्य श्-आदे शः, श्चुत् वसिन्धः) · च + एव = चै व (अ + ए = ऐ,
वृिद्ध सिन्धः) · िवद्याम् + अथम् = िवद्यामथम् · कु तः + िवद्या = कु तो िवद्य ा (िवसगस्य उकारादे शः → गुणसिन्धः
‘ओ’)
अन्वयः — क्षणशः कणशः च एव िवद्याम् अथ ं च साधयेत ्। क्षणे नष्टे कु तः िवद्या ? कणे नष्टे कु तः धनम् ?
पदम् शब्दाथः हन्द अथ व्याकरणम्
क्षणशः क्षणे क्षणे क्षण-क्षण करके अव्ययम् (क्षण + शस्)
कणशः कणे कणे कण-कण करके अव्ययम् (कण + शस्)
साधयेत ् सद्धं कुयात्, अजयेत् सद्ध करना चा हए √साध् (िणजन्त), िविधिलङ् , प.पु. ए .व.
क्षणे नष्टे यदा क्षणः नष्टः भव त क्षण नष्ट हो जाने पर सित स प्तमी (भावे स प्तमी) — ‘जब … हो जाए तब’
कु तः कस्मात्, कथम् कहाँ से, कैसे पश्नवाचकम् अव्ययम्
हन्द अथ — क्षण-क्षण करके वद्या और कण-कण करके धन सद्ध करना चा हए। क्षण नष्ट हो जाने पर वद्या कहाँ से मलेगी,
और कण नष्ट हो जाने पर धन कहाँ से मलेगा?
भावः: वद्यायाः मूल्यं कालः, धनस्य मूल्यं कणः। यः क्षणम् अ प व्यथ नय त सः वद्यां न लभते; यः कणम् अ प
अपव्यय त सः धनं न स ञ्चनो त। अतः कालस्य सञ्चयः तथा धनस्य सञ्चयः — उभौ समानौ अभ्यासौ। (भाव —
वद्या का मूल्य समय है और धन का मूल्य कण। जो एक क्षण भी व्यथ गँवाता है वह वद्या नह पाता; जो एक कण
भी बरबाद करता है वह धन नह जोड़ पाता। इस लए समय क बचत और धन क बचत — दोन एक ही अभ्यास
ह।)
‘स त सप्तमी’ क्या है: जब ‘जब यह हो जाए तब वह होता है’ जैसा भाव कहना हो, तब क्रया के कता तथा उसके
क्त-प्रत्ययान्त वशेषण — दोन सप्तमी म आ जाते ह। यहाँ ‘क्षणे नष्टे’ = क्षण के नष्ट हो जाने पर। यह कक्षा ९ का
महत्त्वपूण प्रयोग है।
सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 13–16
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
शब्दाथ-ता लका — शब्दः / अथः / हन्द / English तथा रक्तः स्त ः ‘मातृभाषया अथ लखत’
शब्दाथः
प्र.1 पाठे प्रयुक्तानां शब्दानाम् अथान् ज्ञात्वा ता लकायाः अ न्तमे स्त े ‘मातृभाषया अथ लखत’।
पुस्तके अ न्तमः स्त ः रक्तः अ स्त; तत्र छात्रैः स्वमातृभाषया अथः लेखनीयः। अत्र सः स्त ः हन्द भाषया पू रतः। ( हन्द
— पुस्तक म अ न्तम स्तम्भ खाली छोड़ा गया है; वहाँ वद्याथ को अपनी मातृभाषा म अथ लखना है। यहाँ वह स्तम्भ हन्द म
भरकर दया गया है। जनक मातृभाषा बांग्ला, त मल, मराठ , गुजराती आ द है, वे इसी क्रम से अपनी भाषा म लख।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
शब्दः अथः हन्द ENGLISH मातृभाषया अथ लखत
( हन्द )
अपव्ययः (पुं.प.ए.व.) व्यथव्ययः अनु चत व्यय Unnecessary िफ़ ज़ूल ख़च , बेक ार में िकया
expense गया ख़च
अवाप्तुम ् (अव + √आप् + प्राप्तुम् प्राप्त करने के To get पाने के िलए , हािसल करने के
तुम ुन,् अव्ययम्) लए िलए
अिविच्छन्नः (नञ् तत्पुरुषः, न व च्छन्नः अटू ट Inseparable जो टू टे नही,ं लगातार जुड़ा
पुं.प.ए.व.) हुआ
अिजतस्य (√अज् + क्त, उपा जतस्य कमाए हुए का Of the earned कमाई हईु वस्तु या धन का
पुं.ष.ए.व.)
अथ पाजनम् (ष.तत्पुरुषः, अथस्य उपाजनम् धन कमाना Earning धन कमाने की ि याक्र
नपुं.प.ए.व.)
आजीिवका (स्त्री.प.ए.व.) वृ त्तः व्यवसाय Livelihood रोज़ी-रोटी, जीिवका चलाने
का साधन
आडम्बरपूणः (पुं.प.ए.व.) पाखण्डयुक्तः दखावे से भरा Ostentatious के वल िदखावे के िलए िकया
गया, तड़क -भड़क वाला
आिथकव्यवहारः (पुं.प.ए.व.) धन वषयकः व्यवहारः आ थक लेन- Financial behavior पैसे का ले न-दे न तथा उससे
दे न जुड़ा आचरण
आिथकसाक्षरता आ थक साक्षरता वत्तीय Financial literacy धन के ले न-दे न, बचत तथा
(कमधारयः, स्त्री.प.ए.व.) साक्षरता िनवेश की समझ
आवृित्तिनक्षेपः (पुं.प.ए.व.) आवृ त्त नक्षेपः आवत जमा Recurring Deposit हर महीने एक िनिश्चत रकम
(RD) जमा करने की योजना
उिचतिनवेशम् (पुं.िद्व.ए.व.) साधु नवेशम् योग्य नवेश Proper investment सोच-समझकर सही जगह
लगाया गया धन
उद्धृत्य (उद् + √ध ृ + ल्यप्) उद्धारं कृत्वा ऊपर उठाकर By lifting up बाहर िनकालकर , ऊपर
उठाकर
औिचत्यपूणः (पुं.प.ए.व.) समु चतः उपयुक्त Justified जो उिचत हो, मौक़े के
अनुरूप
कष्टािजतधनस्य कष्टेन अ जतं धनं, कष्ट से कमाए Of the wealth मेहनत से कमाए हुए पैसे का
(कमधारयः, नपुं.ष.ए.व.) तस्य हुए धन का earned with
difficulty
कालान्तरे ण (नपुं.त.ृ ए.व.) अन्यः कालः, तेन समय बीतने By the course of कु छ समय बाद , धीरे -धीरे
पर time समय के साथ
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः
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िकसान-िवकास-पत्रम् कृषकस्य वकासः कसान Kisan Vikas Patra डाकघर की एक बचत
(नपुं.प.ए.व.)
m
कसान वकासः, तदथ वकास पत्र (KVP)
िनिs
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योजना, िजसमें जमा धन
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. co a gl
पत्रम् श्चत अविध में दुग न
ु ा होता
m
ase
है
glृद्ध ंशेन (त.ृ तत्पुरुषः,
aचक्रव चक्रवृ ा अंशेन चक्रवृ द्ध ब्याज By Compound ऐसे ब्याज से , जो मूल धन के
पुं.त.ृ ए.व.) से Interest साथ ब्याज पर भी लगता है
co m For trivial reasons
तुच्छकारणैः (कमधारयः, तुच्छं कारणम्, तैः
e
नरथक
m . छोटी-छोटी, बेम तलब की
ag
नपुं.त.ृ ब.व.)
g l asकारण से वजहों से
त्विरताहारः (कमधारयः, त्व रतः चासौ आहारः
a शीघ्र आहार Fast Food झटपट तैयार िमलनेवाला
com
पुं.प.ए.व.) खाना
.
m a s eतयmसमय के िलए बैकं में जमा
agl की गई रकम
Fixed Deposit (FD)
कमधारयः, पुं.पo
िनयतिनक्षेपः (मध्यपद-लोपी नयतका लकः नक्षेपः न श्चत अव ध
. c .ए.व.)
eणmम् (ततृ ीया-
के लए जमा
a s
agl
न्यायपू न्यायेन पूणम् न्यायसङ्गत Justified जो न्याय के अनुस ार हो,
तत्पुरुषः, नपुं.प.ए.व.) ईमानदारी का
m a s
. c o agl
पुटीकृ तभोजनम् पुट कृतं भोजनम् डब्बाबन्द Packaged food पैके ट या िडब्बे में बन्द करके
sem
खाना
a
(कमधारयः, नपुं.प.ए.व.) बेचा जानेवाला भोजन
पूतये (स्त्री.च.ए.व.) सम्पू त न मत्तम् agl उपलब्ध कराने To fulfill पूर ा करने के िलए
के लए
कc
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Fashionable attire
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as
पदशनकािरपिरधानम् प्रदशनका र प रधानम् प्रदशनकारी े वल िदखावे के िलए पहना
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(कमधारयः, नपुं.प.ए.व.) वेशभूषा जानेवाला पहनावा
eपm a
l a s Abundant
g
भूतः (पु.ं प.ए.व.) प्रचुरम् पयाप्त बहुत अिधक , भरपूर
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पधानमन्त्री-जन धन प्रधानमन्त्री-जन धन प्रधानमन्त्री Pradhan Mantri हर नागिरक का बैक
ं -खाता
योजना (स्त्री.प.ए.व.) योजना
m
coयोजना
जन धन Jana Dhana Yojna खुल वाने की सरकारी योजना
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m . a
ase
agl
बािधतािन (नपुं.प.ब.व.) अवरो धता न बा धत होते ह Interrupted रुक जाते है,ं अटक जाते है ं
com
मा (अ) ग ृध ः (पुं.प.ए.व.) लोभं न कुरु लालच न करो Don’t covet लालच मत करो, दू स रे के
m . धन पर नज़र मत रखो
m ase
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मूल भूतानाम् (नपुं.ष.ब.व.) मूले भूतम्, तेषाम् मौ लक Basic बुिनयादी (आवश्यकताओं) का
m
e यथाथतत्त्वम् (नपुं.प.ए.व.)
g l as True essence
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यथाथ तत्त्वम् वास्त वक तत्त्व असली स च्चाई, वास्तिवक
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सार
s e m
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.co प्रणाली agl
राि य-पेंशन-योजना रा य-पशन-योजना रा ीय पशन National Pension से वािनवृित्त के बाद िनयिमत
(स्त्री.प.ए.व.)
se m System (NPS) पेंशन दे नेवाली योजना
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राि य-संचय-पमाणपत्रम् रा य-संचय- रा ीय बचत National Savings डाकघर का बचत पमाणपत्र ,
(नपुं.प.ए.व.) प्रमाणपत्रम् प्रमाणपत्र Certificate (NSC) िजस पर िनिश्चत ब्याज
िमलता है
विरष्ठ-नागिरक-संचय- व रष्ठ-नाग रक-संचय- व रष्ठ नाग रक Senior Citizens’ बुज़गु नागिरकों के िलए बनी
योजना (स्त्री.प.ए.व.) योजना बचत योजना Savings Scheme बचत योजना
(SCSS)
िवलासव्यसनाय वलासश्च व्यसनञ्च, सुख भोग के For luxury and ऐशो-आराम और बुर ी लत के
(नपुं.च.ए.व.) तस्मै लए enjoyment िलए
िवपन्ना (स्त्री.प.ए.व.) सम्पन्नतार हता संकटग्रस्त Destitute िबगड़ी हईु , तंग ी में पड़ी हईु
शीतपेयम् (कमधारयः, शीतं पेयम् मृदु पेय Soft Drinks ठं डा पेय, कोल्ड िडंक
नपुं.प.ए.व.)
शुिचः (पु.ं प.ए.व.) प वत्रः शुद्ध Clean पिवत्र , साफ़ (मन तथा
आचरण से भी)
सचेतनता (स्त्री.प.ए.व.) ववेकः जागरूकता Consciousness सजगता, होश रखकर काम
करने का भाव
सञ्चयः (पुं.प.ए.व.) सङ् ग्रहः संचय Accumulation बचत, जोड़कर रखना
सन्तोलनम् (नपुं.प.ए.व.) समन्वयः सन्तु लत Balance स न्तुल न बनाए रखना
करना
सुक न्या-सम ृिद्ध-योजना सुकन्या-समृ द्ध- सुकन्या समृ द्ध Sukanya Samriddhi बािलका के भिवष्य के िलए
(स्त्री.प.ए.व.) योजना योजना Yojna बनाई गई बचत योजना
सूत्र रूपम् (नपुं.प.ए.व.) संक्षेपरूपम् सं क्षप्त रूप Aphoristic form थोड़े शब्दों में पूर ा िस द्धान्त
कहनेवाला रूप
स्वावलम्बी (पुं.प.ए.व.) आत्म नभरः स्वावलम्बी Self-reliant अपने पैर ों पर खड़ा,
आ त्मिनभर
कैसे भर: ‘मातृभाषया’ का अथ है अपनी मातृभाषा म। ता लका का ‘ हन्द ’ स्तम्भ केवल एक-दो शब्द दे ता है;
अ न्तम स्तम्भ म उससे थोड़ा खुला, अपनी भाषा का सहज अथ ल खए — जैसे ऊपर कया गया है। य द आपक
मातृभाषा हन्द नह है, तो इसी क्रम से अपनी भाषा म ल खए।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 ता लकायां दत्तानां समास नदशानाम् (नञ् तत्पुरुषः, षष्ठी-तत्पुरुषः, तृतीया-तत्पुरुषः, कमधारयः, मध्यपद-लोपी
कमधारयः) उदाहरणा न वग्रहेण सह लखत, समासस्य नाम च समथयत।
ता लकायाः पदे षु पञ्च वधाः समासाः दृश्यन्ते। प्रत्येकस्य वग्रहः तथा नामकरणस्य कारणम् अधः दत्तम्। ( हन्द — ता लका
के पद म पाँच प्रकार के समास मलते ह। नीचे प्रत्येक का वग्रह तथा उस नाम का कारण दया गया है।)
समस्तपदम् वग्रहः समासस्य नाम एतत् नाम एव कुतः ?
अिविच्छन्नः न व च्छन्नः नञ् तत्पुरुषः पूवपदे नषेधाथकः नञ् (न → अ) अ स्त, उत्तरपदस्य
अथः प्रधानः — अतः नञ् तत्पुरुषः।
अथ पाजनम् अथस्य उपाजनम् षष्ठी-तत्पुरुषः वग्रहे पूवपदं षष्ठी वभक्तौ (अथस्य) अ स्त; उत्तरपदम्
(उपाजनम्) प्रधानम्।
न्यायपूणम् न्यायेन पूणम् ृ ीया-तत्पुरुषः
तत वग्रहे पूवपदं तृतीया वभक्तौ (न्यायेन) अ स्त —
करणाथ।
चक्रवृद्ध ंशेन चक्रवृ ा अंशेन ृ ीया-तत्पुरुषः
तत पूवपदं तृतीयायाम् (चक्रवृ ा); ता लकायाम् अ प एतत्
एव न दष्टम्।
त्विरताहारः त्व रतः चासौ आहारः कम धारयः उभे पदे समाना धकरणे (एक वभ क्तके) स्तः, पूवपदं
वशेषणम्, उत्तरपदं वशेष्यम्।
शीतपेयम् शीतं पेयम् कम धारयः शीतम् ( वशेषणम्) + पेयम् ( वशेष्यम्) — वशेषण-
पूवपद कमधारयः।
कष्टािजतधनस्य कष्टेन अ जतं कष्टा जतम्, कम धारयः (िद्वपद - प्रथमं तृतीया-तत्पुरुषेण ‘कष्टा जतम्’, ततः तेन सह ‘धनम्’
कष्टा जतं धनं, तस्य समासः) इ त कमधारयः।
िनयतिनक्षेपः नयतका लकः नक्षेपः म ध् यपद -लोपी वग्रहस्य मध्यपदम् (का लकः) समासे लुप्तम् — अतः
कम धारयः ‘मध्यपद-लोपी’।
िवलासव्यसनाय वलासश्च व्यसनञ्च, तस्मै द्वन्द्वः (समाहारः) उभयोः पदयोः अथः प्रधानः, ‘च’ इ त योजनम् — अतः
द्वन्द्वः।
म ृद्वािरशुिचः मृत् च वा र च मृद्वा रणी, ताभ्यां ृ ीया-
द्वन्द्वगिभतः तत अन्तः द्वन्द्वः (मृद्वा रणी), ततः तृतीया-तत्पुरुषः (ताभ्यां
शु चः तत्पुरुषः शु चः)।
पहचान का नयम एक पं क्त म: य द वग्रह म पूवपद कसी वभ क्त म आए (अथस्य, न्यायेन) तो तत्पुरुष, और
उसी वभ क्त का नाम समास के आगे लग जाता है। य द दोन पद एक ही वभ क्त म आएँ और पहला दूसरे का
वशेषण हो, तो कमधारय। य द दोन ‘च’ से जुड़, तो द्वन्द्व।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
ध्यान द: ता लका म आ थकसाक्षरता को कमधारय कहा गया है — क्य क वग्रह ‘आ थक साक्षरता’ म
‘आ थक ’ वशेषण है और ‘साक्षरता’ वशेष्य, दोन स्त्री लङ्ग प्रथमा म।
प्र.3 ता लकायां दत्तानां कृदन्तपदानाम् — अवाप्तुम्, उद्धत्य, अ जतस्य, स्मृतम्, बा धता न — प्रकृ त प्रत्ययं च पृथक्
कृत्वा लखत।
पञ्चा प पदा न कृदन्ता न स न्त — त्रयः प्रत्ययाः अत्र प्रयुक्ताः — तुमुन्, ल्यप्, क्तः। ( हन्द — ये पाँच पद कृदन्त ह; इनम
तीन प्रत्यय प्रयुक्त हुए ह — तुमुन्, ल्यप् तथा क्त।)
पदम् प्रकृ त + प्रत्ययः प्रत्ययस्य अथः हन्द अथ
अवाप्तुम ् अव + √आप् + तुम ुन ् ‘…ने के लए’ — तुमुन्-प्रत्ययान्तम् अव्ययम्; प्रयोजनाथ प्राप्त करने के लए
उद्धृत्य उद् + √ध ृ + ल्यप् पूवका लकः अव्ययः; उपसगयुक्ते धातौ ‘क्त्वा’ स्थाने ‘ल्यप्’ ऊपर उठाकर
भव त
अिजतस्य √अज् + क्त (+ षष्ठी भूतका लकं कम ण वशेषणम् कमाए हुए का
ए .व.)
स्म ृतम् √स्म ृ + क्त भूतका लकं कम ण वशेषणम् — ‘माना गया’ माना गया है
बािधतािन √बाध् + क्त (नपुं.प.ब.व.) कम ण क्तान्तम्, बहुवचने बा धत होते ह / रुके
हुए
ल्यप् और क्त्वा का भेद क्य : जब धातु के आगे उपसग हो, तब ‘क्त्वा’ का स्थान ‘ल्यप्’ ले लेता है — इसी लए
‘धृत्वा’ नह , ‘उद्धृत्य’ बनता है; इसी नयम से ‘स्था’ से ‘ स्थत्वा’ कन्तु उद् + स्था से ‘उ ाय’ (यह रूप ोक २
म आया है)। दोन ही पूवका लक क्रया बताते ह और अव्यय ह।
अभ्यास हेतु: पाठ के अन्य कृदन्त — उपा जतधनस्य (उप + √अज् + क्त), सञ्चयनीयः / वजनीयः / करणीयः
(√ + अनीयर् — वध्यथक), प्रष्टव्याः / गन्तव्याः (√ + तव्यत्)। इन दोन प्रत्यय का अथ है ‘करने योग्य / करना
चा हए’।
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 17–18
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
चक्रवृ ंशः — प रभाषा, दशवष या सा रणी, नगमनम् तथा गणनाकायम्
अवधे य म्
प्र.1 चक्रवृ ंशः कः ? उदाहरणेन सा रण्या च स्पष्टयत।
चक्रवृ ंशः तादृशः वृ ंशः वतते य स्मन् मूलधनेन सह वृ ंशस्य उप र अ प वृ ंशः अ यते, येन कालान्तरेण धनस्य
वृ द्धः अ तशी ं भव त। ( हन्द — चक्रवृ द्ध ब्याज वह ब्याज है जसम मूलधन के साथ-साथ ब्याज पर भी ब्याज कमाया जाता है,
जससे समय बीतने पर धन क वृ द्ध बहुत तेज़ी से होती है।)
पाठस्य उदाहरणम् —
यिद भवान् ₹1000 िनवेशं करोित, तत्र 10% वािषकं वृद्ध श
ं म् अजयित —
पथमवषस्य अन्ते → आहत्य ₹1100
िद्वतीयवष ₹1000 इत्यस्य स्थाने ₹1100 राशेः उपिर वृद्ध श
ं ं पाप्स्यित → आहत्य ₹1210
वषा ण आर कधनम् वा षकः वृ ंशः (10%) चक्रवृ ंश-स हतं धनम् साधारणवृ ंशेन सह धनम्
1. 1,000.00 100.00 1,100.00 1100
2. 1,100.00 110.00 1,210.00 1200
3. 1,210.00 121.00 1,331.00 1300
4. 1,331.00 133.10 1,464.10 1400
5. 1,464.10 146.41 1,610.51 1500
6. 1,610.51 161.05 1,771.56 1600
7. 1,771.56 177.16 1,948.72 1700
8. 1,948.72 194.87 2,143.59 1800
9. 2,143.59 214.36 2,357.95 1900
10. 2,357.95 235.80 2,593.74 2000
सारः — नवे शतं मूलधनम् — 1,000 · वा षकः चक्रवृ ंशः — 10% · दशवषानन्तरं धनस्य मूल्यम् — 2,593.74
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः
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अन्तर कहाँ से आया: साधारण वृ
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ंश म हर वष ब्याज केवल मूलधन ₹1000 पर लगता है, इस लए हर वष ठ क
m लए ब्याज
₹100 जुड़ते ह — दस वष म ₹2000। चक्रवृ द्ध म ब्याज पछले वष क कुल रा श पर लगता है,eइस
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coजाता है — पहले वष ₹100, दसव वष ₹235.80। दस वष का अन्तर =a2,593.74
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स्वयं भी बढ़ता − 2,000 =
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₹593.74।
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सूत्र-रूप म: चक्रवृ द्ध से प्राप्त रा श A = P (1 + r/100)n. यहाँ P = 1000, r = 10, n = 10 ⇒ A = 1000 ×
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(1.1)10 = 1000 × 2.59374 ≈ ₹2,593.74 — ठ क वही जो पुस्तक क सा रणी दे ती है।
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अस्याः सा रण्याः क नगमनम् ? चक्रवृ ंशः कस्मै प्रयोजनाय सुशक्तं साधनम् अ स्त ?
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l न इदं सद्धं यत् चक्रवृ
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a अ जतवृ ा नवे शतं धनं शी ं वधते, यतो ह नवेशकता न केवलं स्वस्य मूलधनस्य अ पतु
ंशस्य अ प उप र वृ ंशम् अजय त। द घकालीनसञ्चयस्य नवेशस्य च कृते एतत् कञ्चन सुशक्तं साधनम्
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c।oदmघकालीन बचत तथा नवेश के लए यह एक बहुत सशक्त साधन agl
अ स्त। ( हन्द — इससे यह सद्ध होता है क चक्रवृ द्ध से लगाया गया धन शीघ्र बढ़ता है, क्य क नवेश करनेवाला केवल अपने
मूलधन पर ही नह , कमाए हुए ब्याज पर भी ब्याज कमाता.है
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है।)
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‘द घकालीन’ शब्द यहाँ कुंजी है: पहले वष म दोन प्रकार का ब्याज बराबर (₹100) है — अन्तर शून्य। अन्तर
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समय के साथ चक्रवृ द्ध से बढ़ता है। इसी लए पाठ छात्र का ध्येय ‘द घकालीन नवेशः’ बताता है — जतनी जल्द
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आरम्भ, उतना बड़ा लाभ।
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a gl ोक से जो ड़ए: “जल बन्दु नपातेन क्रमशः पूयते घटः” — बूँद-बूँद से घड़ा भरना ही चक्रवृ द्ध का काव्यात्मक
रूप है; और “लघु-लघुः सञ्चयोऽ प कालान्तरे महत्सम्प त्तरूपेण वधते” इस सा रणी का गद्य-रूप।
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प्र.3 agl
गणनाकायम् (छात्राः कुवन्तु) — उपयुक्तगणनायाः आधारेण ₹1000 नवे शतस्य मूलधनस्य पञ्चदशवषषु
वश तवषषु वा चक्रवृ ा सकलधनराशेः प रमाणं लखत।
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.c a g (10% वा षकचक्रवृ ंशेन)। ( हन्द
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se — 10% वा षक चक्रवृ द्ध ब्याज से पन्द्रह वष बाद कुल रा श लगभग ₹4,177.25 तथा बीस वष बाद लगभग ₹6,727.50 हो
पञ्चदशवषानन्तरं सकलधनरा शः ≈ ₹4,177.25; वश तवषानन्तरं ≈ ₹6,727.50
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जाती है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
सूत्रेण गणना — A = P (1 + r/100)n
15 वष िण: A = 1000 × (1.1)15 = 1000 × 4.17725 = ₹4,177.25
20 वष िण: A = 1000 × (1.1)20 = 1000 × 6.72750 = ₹6,727.50
वषा ण आर कधनम् वा षकः वृ ंशः वषान्ते चक्रवृ ंश-स हतं साधारणवृ ंशेन
(₹) 10% (₹) धनम् (₹) (₹)
11. 2,593.74 259.37 2,853.11 2100
12. 2,853.11 285.31 3,138.42 2200
13. 3,138.42 313.84 3,452.26 2300
14. 3,452.26 345.23 3,797.49 2400
15. 3,797.49 379.75 4,177.24 2500
16. 4,177.24 417.72 4,594.96 2600
17. 4,594.96 459.50 5,054.46 2700
18. 5,054.46 505.45 5,559.91 2800
19. 5,559.91 555.99 6,115.90 2900
20. 6,115.90 611.59 6,727.49 3000
नष्कषः: दश वषषु धनं द्वगुणात् क ञ्चत् अ धकं (2.59 गुणम्), पञ्चदशवषषु प्रायः चतुगुणम् (4.18),
वश तवषषु प्रायः षड् गुणा धकम् (6.73) भव त — यद्य प साधारणवृ ंशेन तत् क्रमशः ₹2500 तथा ₹3000 एव
भवेत्। ( नष्कष — दस वष म धन 2.59 गुना, पन्द्रह वष म लगभग चार गुना और बीस वष म लगभग पौने सात गुना
हो जाता है, जब क साधारण ब्याज से वह क्रमशः केवल ₹2500 और ₹3000 ही होता।)
गणना-सङ् केत: वष-दर-वष प्रत्येक पं क्त को दो दशमलव तक पूणा कत (round) करने पर 15व वष
₹4,177.24 तथा 20व वष ₹6,727.49 आता है; सूत्र से सीधे गणना करने पर ₹4,177.25 तथा ₹6,727.50।
यह एक पैसे का अन्तर केवल पूणाकन का है — दोन उत्तर शुद्ध माने जाएँगे। पुस्तक क अपनी सा रणी भी इसी
प्रकार पूणा कत है (10व वष का ब्याज 235.80, यथाथतः 235.795)।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 18
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प्रश्न १ — एकपदे न उत्तरं लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.1 (क) वास्त वकसुखस्य आधारः कः ?
धमः। ( हन्द — धम।)
आधारवाक्यम्: पाठे स्पष्टम् — “अस्य आशयः अ स्त यत् वास्त वकसुखस्य आधारः धमः, धमपालनस्य च आधारः
अथः।”
रूप-सङ् केत: प्रश्न म ‘कः’ (पुं. प्रथमा ए.व.) है, अतः उत्तर भी प्रथमा एकवचन पुं ल्लङ्ग म — ‘धमः’, न क
‘धमम्’ या ‘धमस्य’। «कत र प्रथमा»।
प्र.1 (ख) कस्य अभावात् स्वकतव्यपालनं क ठनं भव त ?
पयाप्तधनस्य। ( हन्द — पयाप्त धन के अभाव से।)
आधारवाक्यम्: “पयाप्तधनस्य अभावात् स्वकतव्यपालनं क ठनं भव त।”
रूप-सङ् केत: प्रश्न ‘कस्य’ — षष्ठी एकवचन; अतः उत्तर भी षष्ठी एकवचन म ‘पयाप्तधनस्य’। ‘अभावात्’ पञ्चमी
म है क्य क वह हेतु बता रहा है — «हेतौ पञ्चमी»।
प्र.1 (ग) स्वस्थः आ थकव्यवहारः क त वधः भव त ?
त्र वधः। ( हन्द — तीन प्रकार का।)
आधारवाक्यम्: “स्वस्थः आ थकव्यवहारः त्र वधः भव त —” अथात् (१) न्यायपूणम् अथ पाजनम्, (२)
औ चत्यपूणः व्ययः, (३) भ वष्यदृ ा सञ्चयः।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
रूप-सङ् केत: ‘क त वधः’ का उत्तर ‘त्रयः’ नह , त्र वधः — क्य क प्रश्न ‘ कतने प्रकार का’ पूछ रहा है, ‘ कतने’
नह । वशेषण होने से यह ‘आ थकव्यवहारः’ के अनुसार पुं. प्रथमा ए.व. म है।
प्र.1 (घ) क दृशः आ थकव्यवहारः कदा प न करणीयः ?
अनै तकः। ( हन्द — अनै तक (आ थक व्यवहार)।)
आधारवाक्यम्: मनुवचनस्य आशयं व्याख्यायन् पाठः वद त — “अस्य आशयः यत् अनै तकः आ थकव्यवहारः
कदा प न करणीयः।”
रूप-सङ् केत: ‘क दृशः’ वशेषण पूछता है, अतः उत्तर भी वशेषण ही होगा और वशेष्य (आ थकव्यवहारः) के
समान पुं. प्रथमा ए.व. — ‘अनै तकः’। यही पद अभ्यास ४ (घ) म रेखाङ् कत भी है।
प्र.1 (ङ) स्वावलम्बनं कस्य मूलं वतते ?
स्वा भमानस्य। ( हन्द — स्वा भमान का।)
आधारवाक्यम्: “सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः स्वावलम्बी भव त। स्वावलम्बनं स्वा भमानस्य मूलं वतते।”
भाव: जो दूसर पर आ त नह , वही सर उठाकर जी सकता है — इसी लए पाठ आगे कहता है क संकटकाल म
भी स्वा भमानी व्य क्त दूसरे से आ थक सहायता क अपेक्षा नह करता।
प्र.1 (च) जल बन्दु नपातेन क्रमशः क पूयते ?
घटः। ( हन्द — घड़ा।)
आधारवाक्यम्: चाणक्यनीतेः ोकः — “जल बन्दु नपातेन क्रमशः पूयते घटः।”
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
रूप-सङ् केत: ‘पूयते’ कमवाच्य क्रया है, अतः जो हन्द म कम लगता है (घड़े को) वह संस्कृत म प्रथमा म आता
है — ‘घटः’, ‘घटम्’ नह । यही कारण है क प्रश्न म भी ‘ कम्’ (प्रथमा/ द्वतीया नपुं.) रखा गया है।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 18–19
प्रश्न २ — पूणवाक्येन उत्तरं लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.2 (क) “सुखस्य मूलं धमः, धमस्य मूलम् अथः” इतीदं प्र सद्धं वाक्यं क स्मन् ग्रन्थे प्राप्यते ?
“सुखस्य मूलं धमः, धमस्य मूलम् अथः” इतीदं प्र सद्धं सूत्ररूपं वाक्यं कौ टल्यस्य अथशास्त्रे प्राप्यते। ( हन्द — “सुख क
जड़ धम है, धम क जड़ धन है” — यह प्र सद्ध सूत्ररूप वाक्य कौ टल्य के अथशास्त्र म मलता है।)
पूणवाक्य कैसे बनाएँ: ‘पूणवाक्येन उत्तरं लखत’ का अथ है — प्रश्न के शब्द को ही उत्तर म लौटाकर एक पूरा
वाक्य बनाना। यहाँ प्रश्न का ‘क स्मन् ग्रन्थे’ उत्तर म कौ टल्यस्य अथशास्त्रे (सप्तमी — «अ धकरणे सप्तमी») बन
जाता है। केवल ‘अथशास्त्रे’ लखना भी शुद्ध है, कन्तु पूरा वाक्य अपे क्षत है।
Did you know? कौ टल्य (चाणक्य / वष्णुगुप्त) का अथशास्त्र राजनी त तथा अथव्यवस्था का प्राचीनतम
उपलब्ध भारतीय ग्रन्थ है। यही मेलन अभ्यास ३ (घ) म भी पूछा गया है।
प्र.2 (ख) सामान्यजीवने कासाम् आवश्यकतानां पूत्यथ धनम् आवश्यकम् ?
सामान्यजीवने अन्नं, वस्त्रम्, आवासः, शक्षा, स्वास्थ्यसेवा चेत्याद नां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूत्यथ धनम्
आवश्यकम्। ( हन्द — साधारण जीवन म अन्न, वस्त्र, आवास, शक्षा, स्वास्थ्य-सेवा आ द मूलभूत आवश्यकताओं क पू त के लए
धन आवश्यक है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः
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संस्कृतम् हन्द
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अन्नम्
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भोजन
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वस्त्रम् कपड़ा
आवासः घर
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िशक्षा
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स्वास्थ्यसे वा
a िचिक त्सा-से वा
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रूप-सङ् केत: प्रश्न म ‘कासाम् आवश्यकतानाम्’ — स्त्री लङ्ग षष्ठी बहुवचन; अतः उत्तर म भी ‘मूलभूतानाम्
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आवश्यकतानाम्’ षष्ठी बहुवचन म ही र खए। पुस्तक के मूल गद्य म यही वाक्य ‘पूतये’ के साथ है, प्रश्न म ‘पूत्यथम्’
प्रयुक्त है.c— a g
se m दोन समानाथक ह।
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प्र.2 (ग) ा े मुहूत कयोः चन्तनम् आवश्यकम् ?
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ा े मुहूत धमाथयोः चन्तनम् आवश्यकम्। ( हन्द — ाह्म मुहूत म धम और अथ — दोन का चन्तन आवश्यक है।)
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m a s emस्वयं तस्य अथ वद त —
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आधारवाक्यम्: गरुडपुराणस्य वचनं — “ ाह्मे मुहूत चो ाय धममथ च चन्तयेत्।” पाठः
. co दनस्य आरम्भे धमाथयोः चन्तनम् आवश्यकम्।” a
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“अथात्
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रूप-सङ् केत: प्रश्न का ‘कयोः’ द्ववचन षष्ठी है — इसी लए उत्तर भी द्ववचन म धमाथयोः (धमः + अथः =
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धमाथ , द्वन्द्व समास; षष्ठी द्ववचन = धमाथयोः)। ‘धमस्य अथस्य च’ लखना भी अशुद्ध नह , पर द्ववचन-रूप ही
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अपे क्षत उत्तर है।
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जनः केन स्वावलम्बी भव त ?
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प्र.2 (घ)
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जनः सञ्चयस्य अभ्यासेन स्वावलम्बी भव त। ( हन्द — मनुष्य संचय (बचत) के अभ्यास से स्वावलम्बी बनता है।)
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आधारवाक्यम्: “सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः स्वावलम्बी भव त। स्वावलम्बनं स्वा भमानस्य मूलं वतते।”
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
रूप-सङ् केत: ‘केन’ — तृतीया एकवचन, अतः उत्तर भी तृतीया म — ‘अभ्यासेन’। «करणे तृतीया» — जस
साधन से काय हो, वह तृतीया म आता है।
प्र.2 (ङ) लघुलघुसञ्चयः अ प कालान्तरे केन रूपेण वधते ?
लघु-लघुः सञ्चयः अ प कालान्तरे महत्सम्प त्तरूपेण वधते। ( हन्द — छोटा-छोटा संचय भी समय बीतने पर महती सम्प त्त के
रूप म बढ़ जाता है।)
आधारवाक्यम्: चाणक्यनीतेः ोकानन्तरं पाठः वद त — “लघु-लघुः सञ्चयोऽ प कालान्तरे महत्सम्प त्तरूपेण
वधते।” इदम् एव पृष्ठ १७ इत्यत्र चक्रवृ ंशस्य सा रण्या सद्धं भव त।
रूप-सङ् केत: ‘केन रूपेण’ — तृतीया; उत्तर म ‘महत्सम्प त्तरूपेण’ भी तृतीया एकवचन। ‘सञ्चयोऽ प’ = सञ्चयः
+ अ प ( वसगस न्ध — ओऽ)।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 19
प्रश्न ३ — वाक्येन सह ग्रन्थस्य सम्मेलनं कुरुत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.3 वाक्येन सह ग्रन्थस्य सम्मेलनं कुरुत — (क) जल बन्दु नपातेन क्रमशः पूयते घटः। (ख) ा े मुहूत चो ाय
धममथ च चन्तयेत्। (ग) सवषामेव शौचानामथशौचं परं स्मृतम्। (घ) सुखस्य मूलं धमः, धमस्य मूलम् अथः। |
[ग्रन्थाः — १. गरुडपुराणम् २. मनुस्मृ तः ३. अथशास्त्रम् ४. चाणक्यनी तः]
शुद्धं सम्मेलनम् — (क) → ४, (ख) → १, (ग) → २, (घ) → ३। ( हन्द — सही मेलन — (क) चाणक्यनी त, (ख) गरुडपुराण,
(ग) मनुस्मृ त, (घ) अथशास्त्र।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
वाक्यम् ग्रन्थः पाठे प्रमाणम् (कैसे जाना)
(क) जलिबन्दुिनपातेन क्रमशः पूयते ४. पाठे ल खतम् — “अ जतस्य सञ्चयः स ञ्चतस्य च नवेशः — चाणक्यनीतौ
घटः। चाणक्यनीितः उक्तम् —” ततः अयं ोकः।
(ख) बाह्मे मुहूत चोत्थाय धममथं च १. “अन्यतमः स्तम्भः इ त गण्यते। उक्तं गरुडपुराणे —” इ त न दश्य दत्तम्।
िचन्तयेत।
् ग रुडपुर ाणम्
(ग) सवषामेव शौचानामथशौचं परं २. मनुस्म ृितः “उक्तं भगवता मनुना —” इ त न दश्य दत्तम्; मनोः वचनं मनुस्मृतौ अ स्त।
स्म ृतम्।
(घ) सुखस्य मूल ं धमः, धमस्य मूल म् ३. अथशास्त्र म् “तेष्वेकं प्र सद्धं सूत्ररूपं वाक्यं कौ टल्यस्य अथशास्त्रे अ स्त —”
अथः।
स्मरणसूत्रम्: पुस्तक म चार उद्धरण एक ही ढं ग से आते ह — पहले ग्रन्थ का नाम (‘उक्तं गरुडपुराणे’, ‘उक्तं
भगवता मनुना’, ‘चाणक्यनीतौ उक्तम्’), फर लाल रंग म ोक। अतः मेलन याद करने क नह , पाठ क पं क्त
दे खने क बात है।
ध्यान द: पुस्तक म (क) से ४ तक एक लाल तीर पहले से ख चा गया है — वह उदाहरण है, उत्तर का संकेत। शेष
तीन आपको मलाने ह।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 19
प्रश्न ४ — रेखाङ् कतपदमाधृत्य प्रश्न नमाणं कुरुत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.4 (क) सुखस्य मूलं धमः।
कस्य मूलं धमः ? ( हन्द — कसक जड़ धम है?)
नयम: रेखाङ् कत पद जस वभ क्त-वचन- लङ्ग म हो, प्रश्नवाचक सवनाम भी उसी म र खए। ‘सुखस्य’ =
नपुंसक लङ्ग षष्ठी एकवचन → ‘ कम्’ शब्द का षष्ठी एकवचन = कस्य। शेष वाक्य ज्य -का-त्य रहता है।
प्र.4 (ख) दनस्य आर े धमाथयोः चन्तनम् आवश्यकम्।
दनस्य आर े कयोः चन्तनम् आवश्यकम् ? ( हन्द — दन के आरम्भ म कन दो का चन्तन आवश्यक है?)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
नयम: ‘धमाथयोः’ षष्ठी द्ववचन है (धमाथ — द्वन्द्व समास), अतः प्रश्नवाचक भी षष्ठी द्ववचन म — कयोः।
‘कस्य’ (एकवचन) या ‘केषाम्’ (बहुवचन) लखना अशुद्ध होगा।
जोड़कर दे खए: यही रूप अभ्यास २ (ग) के प्रश्न म भी आया है — ‘ ाह्मे मुहूत कयोः चन्तनम् आवश्यकम् ?’
अथात् पुस्तक स्वयं यही प्रश्न बना चुक है।
प्र.4 (ग) सन्मागण एव धनाजनं करणीयम्।
सन्मागण एव क करणीयम् ? ( हन्द — सन्माग से ही क्या करना चा हए?)
नयम: ‘धनाजनम्’ नपुंसक लङ्ग प्रथमा/ द्वतीया एकवचन है (यहाँ ‘करणीयम्’ के साथ कमरूप म), और
नपुंसक लङ्ग का प्रश्नवाचक इन दोन वभ क्तय म कम् ही होता है।
प्र.4 (घ) अनै तकः आ थकव्यवहारः कदा प न करणीयः।
क दृशः आ थकव्यवहारः कदा प न करणीयः ? ( हन्द — कैसा आ थक व्यवहार कभी नह करना चा हए?)
नयम: रेखाङ् कत पद वशेषण है (गुण बता रहा है), सं ा नह । वशेषण के लए प्रश्नवाचक ‘कः’ नह , क दृशः (=
कैसा) होता है — और वह वशेष्य के अनुसार पुं. प्रथमा एकवचन म।
दे खए: पुस्तक ने यही प्रश्न अभ्यास १ (घ) म स्वयं पूछा है — ‘क दृशः आ थकव्यवहारः कदा प न करणीयः ?’ अतः
यह उत्तर पुस्तक से ही प्रमा णत है।
प्र.4 (ङ) संकटकाले स्वा भमा नजनः अन्यजनस्य आ थकसहायतां नापेक्षते।
संकटकाले कः अन्यजनस्य आ थकसहायतां नापेक्षते ? ( हन्द — संकट के समय कौन दूसरे व्य क्त क आ थक सहायता क
अपेक्षा नह करता?)
नयम: ‘स्वा भमा नजनः’ वाक्य का कता है — पुं ल्लङ्ग प्रथमा एकवचन; अतः प्रश्नवाचक भी पुं. प्रथमा एकवचन म
— कः।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
स -सङ् केत: ‘नापेक्षते’ = न + अपेक्षते (द घस न्धः — अ + अ = आ)। और ‘अपेक्षते’ आत्मनेपद क्रया है —
अभ्यास ५ क ता लका म इसी धातु (अपेक्ष्) के रूप भरने ह।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 19–20
प्रश्न ५ — उ चतैः पदै ः रक्तस्थाना न पूरयत (आत्मनेप दनां धातूनां लट् -लकारः, प्रथमपुरुषः)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.5 उ चतैः पदै ः रक्तस्थाना न पूरयत — [ वद् — वद्यते, वद्येते, वद्यन्ते | लभ् — ………, लभेते, लभन्ते | अपेक्ष्
— अपेक्षते, ………, अपेक्षन्ते | वध् — ………, वधते, ……… | सेव् — ………, ………, सेवन्ते | मोद् —
मोदते, ………, ………]
सवऽ प एते धातवः आत्मनेप दनः; ता लकायाः त्रयः स्त ाः लट् -लकारस्य प्रथमपुरुषस्य एकवचनं, द्ववचनं, बहुवचनं च
दशय न्त। पू रता ता लका — ( हन्द — ये सभी धातुएँ आत्मनेपद ह; ता लका के तीन स्तम्भ लट् -लकार के प्रथमपुरुष का
एकवचन, द्ववचन तथा बहुवचन दखाते ह। भरी हुई ता लका नीचे द गई है।)
धातुः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
िवद् (होना, िवद्यमान रहना) वद्यते वद्येते वद्यन्ते
लभ् (पाना) लभते लभेते लभन्ते
अपेक्ष् (अपेक्षा करना) अपेक्षते अपेक्षेते अपेक्षन्ते
वध् (बढ़ ना) वध ते वधते वध न्ते
से व् (से वा करना) से वते से वेते सेवन्ते
मोद् (पसन्न होना) मोदते मोदे ते मोद न्ते
आ त् मने पद स्य लट् -लकारे पथमपुरु षस्य पत् ययाः —
एकवचनम् → -ते · िद्ववचनम् → -एते · बहुवचनम् → -अन्ते
यथा — लभ् + ते = लभते · लभ् + एते = लभे ते · लभ् + अन्ते = लभन्ते
ता लका को इस तरह प ढ़ए: पहली पं क्त ‘ वद् — वद्यते, वद्येते, वद्यन्ते’ उदाहरण है। उसी साँचे पर शेष धातुएँ
चलती ह। ध्यान रहे — इनम कह भी ‘- त, -तः, - न्त’ (परस्मैपद) नह लगेगा, क्य क ये सभी आत्मनेपद ह। ‘ वद्’
यहाँ ‘ वद्यमान होना’ अथ म है, इसी लए ‘ वद्यते’ (न क ‘वे त्त’)।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः
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पाठ से जो ड़ए — ये छह रूप पाठ म सचमुच आए ह:
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com न च द घका लकं सुखं लभते।”
• वद्यन्ते — “भारतीयधमशास्त्रेषु अनेकाः सूक्तयः वद्यन्ते।”
• लभते — .“धमपालने
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• अपेsक्षeते — “स्वा भमा नजनः अन्यजनस्य आ थकसहायतां नापेक्षते।” (न + अपेक्षते)
la — “लघु-लघुः सञ्चयोऽ प कालान्तरे महत्सम्प त्तरूपेण वधते।”
a•gवधते
• सेवनम् (सेव् धातोः) — “व्यसनपदाथानां सेवनं …।”
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इस लए यह अभ्यास केवल रूप-रटना नह , पाठ क क्रयाओं क पहचान है।
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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 20–21
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प्रश्न ६ — अधो ल खतानां प्रश्नानां शुद्धं वकल्पं चनुत
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अभ्यासाद् जायते स द्धः
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a प्र.6 (क) “सुखस्य मूलं धमः, धमस्य मूलम् अथः” इत्यस्य मुख्यः आशयः कः अ स्त ? (१) सुखस्य आधारः केवलम्
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अथः एव। (२) धमस्य आधारः केवलं सुखम् एव। (३) धमस्य आधारः अथः, सुखस्य आधारः धमः। (४) सुखं,
धमः, अथः – एतेषां मध्ये सम्ब ः ना स्त।
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उत्तर ag
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शुद्धः वकल्पः — (३) धमस्य आधारः अथः, सुखस्य आधारः धमः। ( हन्द — सही वकल्प (३) है — धम का आधार अथ है
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और सुख का आधार धम।)
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gखस्य आधारः धमः, धमपालनस्य
क्य.c(३): पाठ स्वयं यही आशय दे ता है — “अस्य आशयः अ स्त यत् वास्त वकसु
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aseच आधारः अथः।”
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वकल्पः क्य अशुद्ध
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(१)
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सूत्र कहता है िक सुख का आधार धम है, अथ नही ं। अथ तो धम का आधार है — बीच की कड़ी छोड़ दे ना अशुद्ध है।
(२)
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स म् बन्ध उलटा कर िदया गया — सुख धम का फल है, आधार नही ं।
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पाठ स्पष्ट कहता है — “एतेषां त्र याणां पर स्परस म् बन्धः अिविच्छ ः अिस्त”।
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(४)
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ag गरुडपुराणे कम् उप दष्टम् अ स्त ? (१) रात्रौ धनस्य चन्तनं करणीयम्। (२) प्रभाते धमाथयोः चन्तनं
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करणीयम्। (३) केवलं धम चन्तनं करणीयम्। (४) केवलम् अथ चन्तनं करणीयम्।
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शुद्धः वकल्पः — (२) प्रभाते धमाथयोः चन्तनं करणीयम्। ( हन्द — सही वकल्प (२) — प्रातःकाल धम और अथ दोन का
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चन्तन करना चा हए।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
क्य (२): “ ाह्मे मुहूत चो ाय धममथ च चन्तयेत्” — ाह्म मुहूत प्रभात का ही काल है (सूय दय से पूव), और
ोक म ‘धमम् अथ च’ — दोन ह। पाठ का अपना अनुवाद भी यही है — “ दनस्य आरम्भे धमाथयोः चन्तनम्
आवश्यकम्।”
अशुद्ध क्य : (१) म काल ग़लत (रा त्र), (३) तथा (४) म ‘केवलम्’ शब्द ग़लत — ोक दोन का चन्तन कहता है,
कसी एक का नह ।
प्र.6 (ग) “सवषामेव शौचानामथशौचं परं स्मृतम्” इत्यस्य तात्पय कम् ? (१) जलशौचमेव ेष्ठम्। (२) मृद्वा रशौचमेव
ेष्ठम्। (३) अथशौचं सव प र, अन्य वधशौचेभ्यः ेयः। (४) शौचस्य आवश्यकता ना स्त।
शुद्धः वकल्पः — (३) अथशौचं सव प र, अन्य वधशौचेभ्यः ेयः। ( हन्द — सही वकल्प (३) — धन क प वत्रता सबसे
ऊपर है, अन्य सभी शु द्धय से ेष्ठ है।)
क्य (३): ोक का दूसरा चरण स्वयं यह अन्तर स्पष्ट करता है — “योऽथ शु च ह सः शु चः, न मृद्वा रशु चः शु चः”
— जो धन के वषय म प वत्र है वही प वत्र है; केवल म -पानी से शरीर धोकर प वत्र हुआ नह । ‘परं स्मृतम्’ का
अथ ही है ‘ ेष्ठ माना गया’।
अशुद्ध क्य : (१) और (२) ठ क वही कहते ह जसका ोक खण्डन कर रहा है। (४) ोक के वरुद्ध है — शौच
क आवश्यकता है, बस उसका सव ेष्ठ रूप अथशौच है।
प्र.6 (घ) छात्रैः क्रयमाणः अपव्ययः कः ? (१) स्वास्थ्यलाभाय व्ययः। (२) वद्याजनाय व्ययः। (३) आडम्बरयुक्तः
प्रदशनात्मकः व्ययः। (४) आत्मसुरक्षायै व्ययः।
शुद्धः वकल्पः — (३) आडम्बरयुक्तः प्रदशनात्मकः व्ययः। ( हन्द — सही वकल्प (३) — आडम्बरयुक्त, दखावट ख़च।)
क्य (३): पाठ क कसौट स्पष्ट है — “येन व्ययेन स्वास्थ्यलाभः, वद्याजनम्, आत्मसुरक्षा वा भवेत्, सः व्ययः
अवश्यं करणीयः। आडम्बरपूणः प्रदशनकारी व्ययः अथवा वलासव्यसनाय व्ययः अपव्ययः भव त।” अतः वकल्प
(१), (२), (४) तीन ‘करणीय व्यय’ ह, अपव्यय नह — केवल (३) अपव्यय है।
Tip: इस प्रकार के प्रश्न म तीन वकल्प एक ही वग के ह और एक अलग — तो प्रायः वही अलग वकल्प उत्तर होता
है। यहाँ तीन ‘लाभकारी व्यय’ ह, एक ‘ दखावट ’।
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प्र.6 (ङ) “जल बन्दु नपातेन क्रमशः पूयते घटः” इ त वाक्यं कः अवदत् ? (१) बृहस्प तः (२) चाणक्यः (३) मनुः (४)
याज्ञवल्क्यः
शुद्धः वकल्पः — (२) चाणक्यः। ( हन्द — सही वकल्प (२) — चाणक्य।)
क्य (२): पाठ म यह ोक ‘चाणक्यनीतौ उक्तम्’ इस नदश के साथ दया गया है, और चाणक्यनी त के रच यता
आचाय चाणक्य (कौ टल्य / वष्णुगुप्त) ह।
जोड़कर याद र खए: इसी पाठ म चाणक्य दो बार आते ह — एक बार अथशास्त्र के रच यता कौ टल्य के रूप म
(शीषक-सूत्र), दूसरी बार चाणक्यनी त के रूप म (घट- ोक)। दोन एक ही आचाय के ग्रन्थ ह।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 21
क्षेत्रकायम् — वत्तकोषं पत्रालयं वा गत्वा बचतयोजनानां वषये ज्ञानम्, एकस्याः योजनायाः वषये टप्पणी
स्वाध्यायान्मा प्रमदः
प्र.1 छात्राः अ भभावकैः सह समीपस्थं वत्तकोषम् अथवा पत्रालयं गत्वा प्रधानमन्त्री-जनधनयोजना (PMJDY),
सुकन्या-समृ द्ध-योजना (SSY), सावज नक-भ वष्य- न धः (PPF), व रष्ठ-नाग रक-संचय-योजना (SCSS),
कसान- वकास-पत्रम् (KVP), रा य-संचय-प्रमाणपत्रम् (NSC), रा य-पशन-योजना (NPS), नयत नक्षेपः
(FD), आवृ त्त नक्षेपः (RD) चेत्या दयोजनानां वषये ज्ञानं प्रा ुयुः। एकस्याः योजनायाः वषये टप्पण च
लखेयुः।
इदं क्षेत्रकायम् (field work) अ स्त — उत्तरं पुस्तके न लभ्यते, स्वयं गत्वा एव प्राप्तव्यम्। ( हन्द — यह क्षेत्र-काय है;
इसका उत्तर पुस्तक म नह , स्वयं जाकर पाना है। नीचे व ध, अपे क्षत बन्दु तथा एक पूरा नमूना उत्तर दया गया है।)
काय व धः (कैसे कर) —
1. अ भभावकैः सह समीपस्थं वत्तकोषं (बक) अथवा पत्रालयं (डाकघर) गच्छत। (माता- पता या अ भभावक के साथ ही जाएँ।)
2. तत्रत्यान् अ धका रणः वनयेन पृच्छत — कः अस्याः योजनायाः पात्रः ? न्यूनतमं धनं कयत् ? वृ ंशः कयान् ? अव धः का ?
आयकरे क लाभः ? धनं मध्ये नष्का सतुं शक्यते वा ?
3. योजनायाः पत्रकम् (brochure) गृ त; तत्र मु द्रताः सूचनाः एव प्रामा णकाः।
4. गृहम् आगत्य एकस्याः योजनायाः वषये संस्कृतभाषया दश-द्वादश-वाक्या त्मकां टप्पण लखत, शक्षकाय च दशयत।
अच्छ टप्पणी म ये छह बात अवश्य ह : (१) योजनायाः नाम तथा संक्षेपः, (२) कः आरब्धुं शक्नो त (पात्रता),
(३) न्यूनतमः-अ धकतमः नक्षेपः, (४) वृ ंशः तथा अव धः, (५) प्रमुखः लाभः, (६) स्वस्य मतम् — इयं योजना
कस्मै उपयुक्ता।
नमूना उत्तर (आदशा टप्पणी) — सुकन्या-समृ द्ध-योजना
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सुक न्या-समृिद्ध-योजना (SSY) भारतसवकारस्य एका बचतयोजना अिस्त। इयं ‘बेट ी बचाओ, बेट ी पढ़ ाओ’ इित
अिभयानस्य अङ् गरूपेण पवितता। दशवष त् न्यून वयस्कायाः बािलकायाः नाम्ना अस्याः खाता पत्रालये िवत्तकोषे
वा उद् घाटियत ुं शक्यते । एकिस्मन् वष न्यून तमं ₹250 अिधकतमं च ₹1,50,000 िनक्षेप्त ुं शक्यते ।
पञ्चदशवषपयन्तं िनक्षेपः करणीयः, खाता त ु एकिवंशितवषषु पिरपक्वा भवित। अस्यां योजनायां च वृद्ध श
ं ः क्र
लभ्यते , अतः लघुः अिप सञ्चयः कालान्तरेण महती सम्पित्तः भवित। बािलकायाः उच्चिशक्षायै िववाहाय वा एतत्
धनं महते उपकाराय भवित। आयकरे अिप अस्याः छू टः लभ्यते । मम मते न पत्येक िस्मन् गृहे यत्र बािलका अिस्त,
तत्र इयं योजना अवश्यम् आरब्धव्या।
( हन्द अनुवाद — सुकन्या समृ द्ध योजना भारत सरकार क एक बचत योजना है। यह ‘बेट बचाओ, बेट पढ़ाओ’ अ भयान के अंग
के रूप म चलाई गई। दस वष से कम आयु क बा लका के नाम से इसका खाता डाकघर या बक म खोला जा सकता है। एक वष म
कम से कम ₹250 और अ धक से अ धक ₹1,50,000 जमा कए जा सकते ह। पन्द्रह वष तक जमा करना होता है, खाता इक्क स
वष म प रपक्व होता है। इसम चक्रवृ द्ध ब्याज मलता है, इस लए छोट बचत भी समय के साथ बड़ी सम्प त्त बन जाती है। बा लका
क उच्च शक्षा या ववाह के लए यह धन बड़े काम आता है। आयकर म भी छू ट मलती है। मेरे वचार से जस घर म बा लका है,
वहाँ यह योजना अवश्य आरम्भ करनी चा हए।)
ध्यान द: ब्याज-दर, न्यूनतम रा श तथा नयम सरकार समय-समय पर बदलती है। अतः टप्पणी म वही आँकड़े
ल खए जो आपको बक/डाकघर के अ धकारी या ोशर से आज मले ह , और साथ म त थ भी लख
द जए। यही ‘स्वाध्याय’ क ईमानदारी है।
यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् — पृष्ठ 21
प रयोजनाकायम् — पाँच क्रयात्मक काय
प रयोजनाकायम्
प्र.1 अ स्मन् पाठे प ठतानां सूक्तीनां ोकानां च आशयं स्वभाषया व लख्य शक्षकाय दशयत।
पाठे पञ्च सूक्तयः/ ोकाः स न्त। अधः प्रत्येकस्य आशयः स्वभाषया ( हन्द भाषया) संक्षेपेण दत्तः — एतत् एव
उत्तरपु स्तकायां ल खत्वा शक्षकाय दशयत। ( हन्द — पाठ म पाँच सू क्तयाँ/ ोक ह। नीचे प्रत्येक का आशय अपनी भाषा म
संक्षेप म दया गया है — यही लखकर शक्षक को दखाइए।)
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सू क्तः / ोकः ग्रन्थः आशयः (स्वभाषया)
सुखस्य मूल ं धमः, धमस्य मूल म् अथः। अथशास्त्रम् स च्चे सुख की जड़ धम है और धम की जड़ धन। न्याय से कमाया धन
(कौ टल्यः) ही मनुष्य को धम -पालन के योग्य बनाता है, और धम -पालन ही स्थायी
सुख दे ता है।
बाह्मे मुहूत चोत्थाय धममथं च िचन्तयेत।
् गरुडपुराणम् िदन का आर म् भ ही योजना का समय है। बाह्म मुहूत में उठकर सोचना
चािहए — आज कौन-सा ध म् य काय करना है और अथ का पबन्ध कै सा
रहेग ा।
सवषामेव शौचानामथशौचं परं स्म ृतम्। योऽथ मनुस्मृ तः सब शुिद्धयों में धन की शुिद्ध सव ेष्ठ है। िजसका धन ईमानदारी का है
शुिचिह सः शुिचन म ृद्वािरशुिचः शुिचः॥ वही सचमुच पिवत्र है; के वल िम ी-पानी से शरीर धोकर कोई पिवत्र नही ं
हो जाता।
जलिबन्दुिनपातेन क्रमशः पूयते घटः। स क्रमः चाणक्यनी तः बूदँ -बूदँ से घड़ा भरता है। िवद्य ा, धम और धन — तीनों इसी क्रम से
सविवद्यानां धमस्य च धनस्य च॥ बढ़ ते है,ं अथ त् थोड़ा-थोड़ा िक न्तु िनयिमत पयत्न ही बड़ा फल दे ता है।
क्षणशः कणशश्चैव िवद्यामथं च साधयेत।
् (पाठान्ते क्षण-क्षण से िवद्य ा और कण-कण से धन जुटता है। जो क्षण गँवाता है वह
क्षणे नष्टे कु तो िवद्या कणे नष्टे कु तो धनम्॥ उद्धतम्) िवद्य ा खोता है, जो कण गँवाता है वह धन खोता है।
प्रस्तु त-सङ् केत: इसे एक चाट के रूप म बनाइए — बाईं ओर दे वनागरी म ोक (लाल स्याही से), दाईं ओर
अपनी भाषा म आशय, और नीचे एक पं क्त म पूरे पाठ का सार — “धमः, अथः, सुखम् — एतेषां सन्तोलनम् एव
यथाथजीवनस्य लक्षणम्।”
प्र.2 भवन्तः स्वजीवने अपव्ययात् कथं दूरे स्थातुं शक्नुव न्त ? अ स्मन् वषये उपायान् लखत।
अपव्ययात् दूरे स्थातुं पाठे एव त्रयः मूलमन्त्राः दत्ताः — औ चत्यपूणः व्ययः, व्ययस्य लेखः, भ वष्यदृ ा सञ्चयः। तेषाम्
आधारेण अधः दश उपायाः। ( हन्द — फ़ज़ूलख़च से बचने के तीन मूलमन्त्र पाठ म ही ह — उ चत व्यय, व्यय का लेखा और
भ वष्य को दे खकर बचत। उन्ह के आधार पर नीचे दस उपाय दए ह।)
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उपायः (संस्कृतम्) हन्द
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१. पितिदनं व्ययस्य ले खः स्थापनीयः, मासान्ते च तस्य पिरशीलनं
कीिजए — पाठ का अपना िनद श यही है।a
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रोज़ का ख़च एक कॉपी में िलिखए और महीने के अन्त में उसकी समीक्षा
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करणीयम्।
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a२. क्रयणात् पूवं पष्टव्यम् — ‘इदं मम आवश्यकता अिस्त उत कु छ ख़रीदने से पहले स्वयं से पूिछए — यह ज़रूरत है या के वल इच्छा?
के वलम् इच्छा ?’
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३. त्विरताहारस्य शीतपेयस्य पुटीकृ तभोजनस्य च पिरहारः।
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e स्वास्थ्य दोनों बचते है।ं
फ़ ास्ट फ़ू ड, कोल्ड िडंक और िडब्बाबन्द खाने से बिचए — इससे धन और ag
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४. ग ृहिनिमतम् आहारं नयत, जलपात्रं च सह नयत।
a घर का बना खाना और पानी की बोतल साथ ले जाइए।
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५. पदशनकािरपिरधानस्य आडम्बरस्य च त्यागः; अनुक रणेन िदखावटी कपड़े-सामान न लीिजए ; िम त्र ों की दे खा-दे खी ख़रीदारी मत
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क्रयणं न करणीयम्। कीिजए।
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agl७. िपतभ्ृ यां दत्तस्य धनस्य दशांशः पितमासं सञ्चयनीयः।
६. मािसकं व्ययपिरमाणं (बजट) पूवमेव िनध रणीयम्। महीने का बजट पहले ही तय कर लीिजए और उसी में रिहए।
जेब-ख़च का कम -से -कम दसवाँ भाग हर महीने बचाइए (ग ल्ु लक या RD खाते
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में)।
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m .coडाकघर या बैकं में आवत जमा खाता खुलवाइए — छोटी बचत भी चक्रवृिद्ध से agl
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८. पत्रालये िवत्तकोषे वा आवृित्तिनक्षेपः (RD) आरब्धव्यः।
ag l बढ़ ती है।
९. व्यसनपदाथभ्यः सवथा दू र ं स्थातव्यम्। व्यसन की वस्तुओ ं से पूर ी तरह दू र रिहए — यह सबसे बड़ा अपव्यय है।
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१०. यः व्ययः स्वास्थ्यलाभाय िवद्याजनाय आत्मसुर क्षायै वा भवित, िजस ख़च से स्वास्थ् य, पढ़ ाई या अपनी सुर क्षा बढ़ े , वह अवश्य कीिजए —
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सः अवश्यं करणीयः। कं जूस ी उपाय नही ं है।
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agl ध्यान र खए: पाठ का लक्ष्य कंजूसी नह , ववेक है। ‘अपव्ययः’ का अथ ‘कम ख़च’ नह , ‘व्यथ ख़च’ है (ता लका
— व्यथव्ययः)। इसी लए दसवाँ उपाय भी उतना ही ज़रूरी है जतने पहले नौ।
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स्वस्य एकस्य मासस्य आय-व्यय ववरणं व लख्य शक्षकाय दशयत।
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एतत् व्य क्तगतं कायम् — भव ः स्वस्य वास्त वकाः अङ् काः लेखनीयाः। अधः आदशः प्रपत्रः (format) नमूना-अङ् कैः
a s emलखने ह। नीचे नमूना अंक के साथ आदश प्रारूप दया है — आप अपने आँकड़े भ रए।)
सह दत्तः; भवन्तः स्वस्य अङ् कान् एव स्थापयन्तु। ( हन्द — यह व्य क्तगत काय है; इसम आपको अपने वास्त वक आँकड़े
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आयः (आय) व्ययः (ख़च)
मदः रा शः (₹) मदः रा शः (₹)
मािसकं जेबव्ययधनम् (pocket money) 500 ले खनसामग ी (कॉपी, कलम) 120
पविण पाप्तम् उपहारधनम् 200 यात्राव्ययः (बस/साइिकल) 150
पुर ातनपुस्तकानां िवक्रयेण 100 जलपानम् (नाश्ता) 200
— — पुस्तकालयशुल्कम् / पित्रका 50
— — दानम् / सहायता 50
— — सञ्चयः (ग ल्ु लकः / RD) 150
आहत्य आयः 800 आहत्य व्ययः 720
शेषः (आयः − व्ययः) ₹80 — अयं शेषः अिप स ञ्चयनीयः
ववरण बनाते समय तीन नयम: (१) व्यय प्र त दन ल खए, महीने के अन्त म स्मृ त से नह — पाठ कहता है
“प्रत्येकं व्ययस्य लेखः स्थापनीयः”; (२) ‘सञ्चयः’ को व्यय क पहली पं क्त बनाइए, अ न्तम नह — जो बच जाए
उसे बचाना नह , जो बचाना है उसे पहले अलग रखना; (३) महीने के अन्त म ‘प रशीलनम्’ क जए — कौन-सा
ख़च आवश्यक था और कौन-सा अपव्यय।
सङ् केत: यह ववरण संस्कृत म लखने पर आपका शब्द-भण्डार भी बढ़े गा — आयः, व्ययः, शेषः, सञ्चयः, आहत्य
(= कुल मलाकर), मदः। ‘आहत्य’ शब्द पाठ क चक्रवृ द्ध-व्याख्या म भी आया है।
प्र.4 जलस्य संरक्षणं कैः उपायैः करणीय म त कक्षायां चचयत स चत्रं प्रदशयत च।
अयं पाठः धनसञ्चयं शक्षय त; एषः प्रश्नः तम् एव सद्धान्तं जलसञ्चये प्रयोजय त — ‘जल बन्दु नपातेन क्रमशः पूयते
घटः’ इ त ोकः द्वयोः अ प समानरूपेण घटते। ( हन्द — यह पाठ धन क बचत सखाता है; यह प्रश्न उसी सद्धान्त को जल-
संरक्षण पर लागू करता है — ‘बूँद-बूँद से घड़ा भरता है’ वाला ोक दोन पर समान रूप से लागू होता है।)
चचायाः बन्दवः (कक्षा-चचा के लए) —
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उपायः (संस्कृतम्) हन्द
पणािलकायाः (नलस्य) क्षरणं तत्क्षणमेव संस्कतव्यम्। टपकते नल तुर न्त ठीक कराइए — एक बूदँ पित से कं ड से िदन में लगभग 15–
20 लीटर पानी बहता है।
दन्तधावनकाले क्षौरकमकाले च नलः िपधातव्यः। दाँत साफ़ करते या दाढ़ ी बनाते समय नल बन्द रिखए।
वष जलसंग हणम् (rain-water harvesting) करणीयम्। छत का वष -जल संिचत कीिजए तथा भूजल -पुनभरण कू प बनवाइए।
वृक्षाणां से चनं पातःकाले सायंक ाले वा, िबन्दुसे चनपद्धत्या पौधों की िसंचाई सुबह-शाम कीिजए , टपक -िसंचाई अपनाइए — दोपहर में पानी
(drip irrigation)। भाप बनकर उड़ जाता है।
वस्त्रपक्षालनस्य जलम् उद्यानसे चनाय पुनः पयोक्तव्यम्। कपड़े धोने का पानी बग़ ीचे में डािलए — पानी का पुनः उपयोग।
जलाशयानां नदीनां च पदू षणं वजनीयम्। तालाब-नदी में कचरा और रसायन मत डािलए — पदू िषत जल भी खोया हुआ
जल है।
जागरूकता-अिभयानम् — पत्रकम्, िभित्तपत्रम्, नािटका च। क क्षा में पोस्टर , नुक्कड़-नािटका और पच से जाग रूकता फै लाइए।
स चत्रप्रदशनाथ नमूना भ त्तपत्रम् (poster) —
के न्दे — एकः जलिबन्दुः पतन् घटं पूरयन्।
उपिर शीषकम् — “जलिबन्दुिनपाते न क्र मशः पूयते घटः”
अधः वाक्यम् — “जलं जीवनम्। िबन्दुं िबन्दुं रक्षत , भिवष्यं रक्षत।”
पाश्व चत्वािर लघुिचत्रािण — (१) क्षरन् नलः ⊗ (२) वष जलसंगहः ✓ (३) िबन्दुसेच नम् ✓ (४) पदू िषता नदी ⊗
प्रस्तु त-सङ् केत: चचा को दो पक्ष म बाँ टए — ‘गृहे जलसंरक्षणम्’ तथा ‘ग्रामे/नगरे जलसंरक्षणम्’ — और प्रत्येक
दल तीन उपाय तथा एक चत्र प्रस्तुत करे। अन्त म पूरी कक्षा एक प्र तज्ञा-पत्रम् बनाकर हस्ताक्षर करे।
प्र.5 वद्युतः संरक्षणं कथं कतु शक्यते तस्य चत्रं नमाय शक्षकाय दशयत।
वद्युतः संरक्षणम् अ प अपव्ययवजनस्य एव रूपम् — यतः वद्युत् अ प क्र यते, अतः वद्युतः अपव्ययः धनस्य अपव्ययः
एव। ( हन्द — बजली क बचत भी अपव्यय-त्याग का ही रूप है — क्य क बजली भी ख़रीद जाती है, इस लए बजली क
बरबाद धन क ही बरबाद है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
उपायः (संस्कृतम्) हन्द लाभः
कक्षात् िनगच्छन्तः दीपान् पङ् खान् च िपदधीत। कमरे से िनकलते समय पंखा-बत्त ी बन्द सबसे सरल और सबसे बड़ी बचत
कीिजए।
तापदीपानां स्थाने LED-दीपाः योजनीयाः। पुर ाने बल्बों के स्थान पर LED लगाइए। लगभग 80% कम वद्युत्-व्यय
िदवसे सूयपकाशस्य उपयोगः; गवाक्षाः िदन में िखड़िकयाँ खोलकर सूय-पकाश का दन म बत्ती क आवश्यकता ही
उद् घ ाटनीयाः। उपयोग कीिजए। नह
यन्त्रािण (दू र दशनम्, सङ् गणकम्) मुख्यिस्वचेन एव टीवी-क म्प्यूटर को िरमोट से नही,ं मुख्य िस्वच से ‘स्टडबाई’ म होनेवाला छपा व्यय
िपधातव्यािन। बन्द कीिजए। रुकता है
पञ्चतारकािङ् कतािन (5-star) उपकरणािन िफ़ ज, पंखा आिद 5-star रे िटंग वाले ख़रीिदए। द घकाले वद्युद्व्ययः न्यूनः
क्रेतव्यािन।
सौरोज याः (solar) उपयोगः — सौरपटलम्, छत पर सोलर पैनल तथा सोलर वॉटर -हीटर नवीकरणीय ऊजा, स्थायी बचत
सौरजलतापकः। लगवाइए।
चत्रस्य रूपरेखा (poster का ख़ाका) —
वामे भागे — ‘अपव्ययः’ ⊗ : सव दीपाः पज्विलताः, कक्षा िरक्ता, िवद्य ु ेयकम् (िबल) ऊध्व ं गच्छत्।
दिक्षणे भागे — ‘सुव्ययः’ ✓ : एकः LED-दीपः, उद् घािटतः गवाक्षः, छादने सौरपटलम्, दे यकम् अधः गच्छत्।
मध्ये शीषकम् — “िवद्य त
ु ः रक्षणम् एव िवद्य तु ः उत्पादनम्।”
अधः — “क्षणे न ष्टे कु तो िवद्य ा, कणे न ष्टे कु तो धनम्॥” — इित श्लोकं िलिखत्वा तस्य अधः िलखत —
‘एवमेव — िवद्य त्ु कणे नष्टे कु तः ऊज ?’
अङ् कयोजना-सङ् केत (मूल्यांकन म क्या दे खा जाएगा): (क) कम-से-कम पाँच उपाय, संस्कृत म लखे ह — 2
अङ् काः; (ख) चत्र म ‘पहले/बाद’ अथवा ‘ग़लत/सही’ का स्पष्ट वरोधाभास — 2 अङ् काः; (ग) पाठ क कसी
सू क्त का प्रयोग — 1 अङ् कः; (घ) स्वच्छता तथा प्रस्तु त — 1 अङ् कः। कुल 6 अङ् काः।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ-प रचयः — भारतीय धमशास्त्र म अनेक ऐसी सू क्तयाँ ह जो मानव-जीवन के यथाथ तत्त्व का प्र तपादन करती ह। उन्ह
म से एक प्र सद्ध सूत्ररूप वाक्य कौ टल्य के अथशास्त्र म है — “सुखस्य मूलं धमः, धमस्य मूलम् अथः।” यही वाक्य इस पाठ
का शीषक और आधार दोन है।
मूल वषय — वास्त वक सुख का आधार धम है और धमपालन का आधार अथ (धन) है। ‘अथ’ का तात्पय है वह धन जो सब
प्रकार के आजी वका-व्यवहार का प्रमुख साधन है। जीवन म धमः, अथः, सुखम् — इन तीन का परस्पर सम्बन्ध अ व च्छन्न
है। जो न्यायपूवक धनोपाजन करता है, वही धमपालन म समथ होता है और धमपालन से द घका लक सुख पाता है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः AglaSem · NCERT Solutions
धन क्य आवश्यक है — अन्न, वस्त्र, आवास, शक्षा, स्वास्थ्यसेवा आ द मूलभूत आवश्यकताओं क पू त के लए धन चा हए।
पयाप्त धन के अभाव म स्वकतव्य-पालन क ठन हो जाता है; स्वास्थ्य, शक्षा, सेवा, दान आ द काय बा धत होते ह और
दै न न्दन जीवन असन्तु लत हो जाता है। इसी लए धमशास्त्र म चतुवग (धम-अथ-काम-मोक्ष) म अथ को एक अन्यतम स्तम्भ
माना गया है।
स्वस्थ आ थक-व्यवहार त्र वध है — (१) न्यायपूणम् अथ पाजनम् — सन्माग से ही धन कमाना (मनु — “सवषामेव
शौचानामथशौचं परं स्मृतम्”, तथा उप नषद् — “मा गृधः कस्य स्वद्धनम्”); (२) औ चत्यपूणः व्ययः — आवश्यकतानुसार
व्यय, आडम्बर तथा वलास-व्यसन पर व्यय अपव्यय है, अतः प्रत्येक व्यय का लेखा रखना चा हए; (३) भ वष्यदृ ा सञ्चयः
— उपा जत धन का कुछ भाग भ वष्य-सुरक्षा के लए सं चत करना। संचय से मनुष्य स्वावलम्बी बनता है और स्वावलम्बन ही
स्वा भमान का मूल है।
छात्रजीवन म आ थक साक्षरता — छात्र प्रायः माता- पता के कष्टा जत धन का तुच्छ कारण से अपव्यय करते ह — ज ा
क लालसा के लए त्व रताहार (fast food), शीतपेय, पुट कृत भोजन, व्यसन-पदाथ का सेवन, प्रदशनकारी प रधान तथा
वला सतापूण आचरण। इनसे केवल धनहा न ही नह , स्वास्थ्यहा न भी होती है और स्वास्थ्यहा न से पुनः धन-व्यय बढ़ता है।
सञ्चय तथा नवेश — चाणक्यनी त का वचन है — “जल बन्दु नपातेन क्रमशः पूयते घटः।” छोटा-छोटा संचय भी कालान्तर
म महती सम्प त्त बन जाता है। भारत म सुर क्षत नवेश के अनेक माग ह — प्रधानमन्त्री-जनधनयोजना, सुकन्या-समृ द्ध-
योजना, सावज नक-भ वष्य- न धः, व रष्ठ-नाग रक-संचय-योजना, कसान- वकास-पत्रम्, रा य-संचय-प्रमाणपत्रम्, रा य-
पशन-योजना, नयत नक्षेपः (FD) तथा आवृ त्त नक्षेपः (RD)। इनम धन सुर क्षत भी रहता है और चक्रवृ ंश के साथ नरन्तर
बढ़ता भी है।
अत्र इदम् अवधेयम् — चक्रवृ ंशः — इस पाठ का ‘अवधेयम्’ खण्ड क व-प रचय नह , ब ल्क चक्रवृ द्ध ब्याज का
ग णतीय स्पष्टीकरण है। ₹1000 पर 10% वा षक चक्रवृ द्ध से दस वष बाद रा श ₹2,593.74 हो जाती है, जब क साधारण
वृ ंश से केवल ₹2000। नगमन यह है क नवेशकता मूलधन पर ही नह , अ जत वृ ंश पर भी वृ ंश कमाता है।
भा षक तथा व्याकर णक वशेषताएँ — पाठ क भाषा सरल कन्तु समासबहुल है (कष्टा जतधनम्, प्रदशनका रप रधानम्,
आपत्कालीन न धसञ्चयः, द घकालीन नवेशः)। शब्दाथ-ता लका म प्रत्येक पद के साथ समास का नाम तथा लङ्ग- वभ क्त-
वचन दए गए ह। अभ्यास आत्मनेपद धातुओं के लट् -लकार ( वद्यते, लभते, अपेक्षते, वधते, सेवते, मोदते) का अभ्यास
कराता है, तथा व ध लङ् ( चन्तयेत्, साधयेत्), कमवाच्य (पूयते, स्मृतम्) एवं ल्यप्/तुमुन्/क्त-प्रत्ययान्त रूप (उद्धत्य,
अवाप्तुम्, अ जतस्य) से प रचय कराता है।
अभ्यास क्या माँगता है — छह प्रश्न ह — एकपदे न उत्तर (६ उपप्रश्न), पूणवाक्येन उत्तर (५), वाक्य के साथ ग्रन्थ का मेलन
(४ युग्म), रेखाङ् कत पद के आधार पर प्रश्न नमाण (५), आत्मनेपद धातुरूप क ता लका-पू त (६ धातु) तथा बहु वकल्पीय
प्रश्न (५)। इसके पश्चात् स्वाध्यायान्मा प्रमदः म बचत-योजनाओं पर क्षेत्र-काय और यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् म पाँच
प रयोजना-काय दए गए ह।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धमः धमस्य मूलम् अथः
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त्व रत पुनरावृ त्त
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com(संस्कृतम्)
.अथः पाठ का प्रसं ग / वाक्य a g l
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शब्दः हन्द अथ
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सूत्ररूपम् संक्षेपरूपम् सं क्षप्त सूत्र-रूप तेष्वेकं प्र सद्धं सूत्ररूपं वाक्यं कौ टल्यस्य अथशास्त्रे अ स्त।
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यथाथतत्त्वम् यथाथं तत्त्वम् वास्त वक तत्त्व याः मानवजीवनस्य यथाथतत्त्वं प्र तपादय न्त।
अ व च्छन्नः न िविच्छन्नः अटू ट
l a sem त्रयाणां परस्परसम्बन्धः अ व च्छन्नः अ स्त।
अथ पाजनम्
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धन कमाना यः जनः न्यायपूवकम् अथ पाजनं करो त।
अथस्य उपाजनम्
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मूलभूतानाम् मूले भूतम्, तेषाम् मौ लक (आवश्यकताओं) चेत्याद नां मूलभूतानाम् आवश्यकतानां पूतये धनम् आवश्यकम्।
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बा धता न
em अवरोिधतािन बा धत होते ह स्वास्थ्यं, शक्षा, सेवा, दानम् चेत्याद न काया ण बा धता न भव न्त।
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aन्यायपू न्यायेन पूणम् न्यायसङ्गत न्यायपूणम् अथ पाजनम् — सन्मागण एव धनाजनं करणीयम्।
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शु चः पिवत्रः शुद्ध, प वत्र योऽथ शु च ह सः शु चन मृद्वा रशु चः शु चः।
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मा (अ) गृधः लोभं न कु रु
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लालच मत करो “मा गृधः कस्य स्वद्धनम्” इ त उप नषदः वाक्यम्।
औ चत्यपूणः
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उपयुक्त औ चत्यपूणः व्ययः — आवश्यकतानुसारं व्ययः करणीयः।
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आडम्बरपूणः पाखण्डयुक्तः दखावे से भरा आडम्बरपूणः प्रदशनकारी व्ययः … अपव्ययः भव त।
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अपव्ययः अनु चत व्यय अपव्ययः वजनीयः, अतः प्रत्येकं व्ययस्य लेखः स्थापनीयः।
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agl सञ्चयः सङ् ग हः बचत, संचय भ वष्यदृ ा सञ्चयः — उपा जतधनस्य कश्चन भागः भ वष्यसुरक्षायै
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सञ्चयनीयः।
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आत्म नभर
com सञ्चयस्य अभ्यासेन जनः स्वावलम्बी भव त।
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आत्मिनभरः
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asसे कमाए धन का
कष्टा जतधनस्य कष्टेन अिजतं धनं,
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कष्ट छात्राः माता पतृभ्यां कष्टा जतधनस्य तुच्छकारणैः अपव्ययं कुव न्त।
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त्व रताहारः त्विरतः चासौ आहारः फ़ास्ट फ़ूड ज ालालसापूत्यथ त्व रताहारः, शीतपेयं, पुट कृतभोजनम्।
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चक्रवृद्ध ा अंशेन
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चक्रवृ ंशेन चक्रवृ द्ध ब्याज से अ प तु चक्रवृ ंशेन सह तद्धनं सततं वधमानं भव त।
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gl a िववेक ः जागरूकता अथ वषयकसचेतनता अस्मान् अभावात् उद्धत्य आ थकसम्पन्नतां प्र त
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नय त।
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सन्तोलनम् समन्वयः सन्तुलन धमः, अथः, सुखम् चेत्येतेषां सन्तोलनम् एव यथाथजीवनस्य लक्षणम्।
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वपन्ना सम्पन्नतारिहता संकटग्रस्त अस्माकम् आ थक स्थ तः वपन्ना भव त।
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