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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 3 आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः

AglaSem पर कक्षा 9 संस्कृत पाठ 3 आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः (शारदा) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 3 (Sharada).
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About NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 3 आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः

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Frequently Asked Questions

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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 3 आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

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एनसीईआरट समाधान

अध्याय 3: आत्मवत्सवभूतष
े ु यः पश्य त सः
प डतः

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

22 – 37 14 72 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 45 pages

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 3: आत्मवत्सवभूतष
े ु यः पश्य त सः
प ण्डतः
आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः शारदा (कक्षा ९) का तृतीयः पाठः है। यह संवादात्मक गद्यपाठ है — मातामही अपने दौ हत्र क पल तथा
दौ हत्री माधवी को महाराष्ट्र के सन्तक व नामदे वमहाराज क एक शक्षाप्रद घटना सुनाती ह, जसम भूखे कुत्ते के पीछे घी का पात्र लेकर दौड़ते नामदे व
यह सद्ध कर दे ते ह क ईश्वर केवल म न्दर म नह , सवषु भूतेषु बसता है। व्याकरण क दृ ष्ट से पाठ उपपद वभक्तयः (प्र त, वना, धक्, नकषा,
प रतः, सह-साकं-साध-समम्, अलम्) तथा क्तवतु-प्रत्यय सखाता है। अभ्यास म प्रश्नोत्तर, भूतकाल-प रवतन, ‘कः/का — कं/कां प्र त’ कथन-
नधारण, प्रश्न नमाण, घटनाक्रम, वभ क्त-योजना, क्तवतु-रूपान्तरण तथा समस्तपद-चयन — कुल आठ प्रकार के प्रश्न आते ह।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
शारदा (कक्षा 9) 22 – 37

खं ड प्रश्न

14 72

माध्यम

हन्द

पाठ-प्रवेशः — पृष्ठ 22
आर म्भकः गद्यांशः तथा कथायाः प्रारम्भः — अन्वयः, अथः, भावः

पाठ-प रचयः

प्र.1 पाठस्य आर म्भकं गद्यांशम् अन्वयेन सह व्याख्यात — “भारतदे शः बहूनां ब्रह्मष णां महात्मनां च भू मः … यां
प ठत्वा अस्माकं जीवनं प रव ततं भवेत्।”

भारतदे शः बहून ां बह्मष णां महात्मनां च भूिमः। ते षां चिरत्रािण सकलस्य िवश्वस्य कृ ते पेरणास्पदम्।

ते षां चिरत्रेष ु पितपदं भूत दया, समता, क्षमा, अिहंसा, करुणा, ऋजुत ा, बन्धुत ा चे त्यादीिन जीवनमूल्यािन पाप्यन्ते ।

महारा स्य पिसद्धः महात्मा नामदे वमहाराजः स्वीयव्यवहारेण करुणायाः महान्तम् आदशम् उपस्थािपतवान्।

सः सव त्मकस्य ईश्वरस्य न के वलं सङ् कीतनं कृ तवान् अिप त ु सवषु जीवेष ु सः भगवन्तं दृ ष्टवान्।

हन्द अथ — भारतदे श बहुत-से ब्रह्म षय और महात्माओं क भू म है। उनके च रत्र सारे वश्व के लए प्रेरणा के ान ह। उनके
च रत्र म पद-पद पर भूतदया, समता, क्षमा, अ हसा, करुणा, ऋजुता, ब ुता आ द जीवनमूल्य मलते ह। महाराष्ट्र के प्र सद्ध महात्मा
नामदे वमहाराज ने अपने व्यवहार से करुणा का महान् आदश उप त कया। उन्ह ने सवात्मक (सबम व्याप्त) ईश्वर का केवल
सङ् क तन ही नह कया, अ पतु सब जीव म उन्ह ने भगवान् को दे खा। नामदे वमहाराज के जीवन क एक शक्षाप्रद घटना यहाँ
दखाई गई है, जसे पढ़कर हमारा जीवन बदल जाना चा हए।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions

पदम् व्याकरण-सङ् केतः अथः

बह्मष णाम् ब्रह्मन् + ऋ ष → ब्रह्म ष (गुण-स ः); पुं., षष्ठी, बहुवचनम् बह्म ानी ऋिषयों का

पेर णास्पदम् प्रेरणायाः आस्पदम् — षष्ठीतत्पुरुषः; नपुं., प्रथमा, ए.व. पेर णा का स्थान

पितपदम् पदे पदे — अव्ययीभावः पद -पद पर , हर जगह

स्वीयव्यवहारे ण स्वीयः व्यवहारः — कमधारयः; पुं., तृतीया, ए.व. (करणे तृतीया) अपने व्यवहार से

उपस्थािपतवान् उप + √ ा ( णच्) + क्तवतु, पुं., प्र., ए.व. उपिस्थत िकया

दृ ष्टवान् √दृश् + क्तवतु, पुं., प्र., ए.व. दे खा

भावः: गद्यांश का केन्द्र य शब्द है ‘सवात्मकस्य’ — जो सब आत्माओं म व्याप्त है। लेखक ‘सङ् क तनं कृतवान्’ और
‘भगवन्तं दृष्टवान्’ म सूक्ष्म भेद रखता है : भ क्त का नाम लेना सरल है, हर प्राणी म भगवान् को दे ख लेना क ठन।
नामदे व क महत्ता इसी दूसरी बात म है — और आगे क पूरी कथा इसी एक वाक्य का वस्तार है।

ध्यान द: ‘न केवलं … अ प तु …’ यह युग्म पूरे पाठ म तीन बार आता है — यहाँ, ‘न केवलं पाण्डु रङ्गस्य प्रयभक्तः
अ प तु प्रय मत्रम प’ म, तथा ‘ईश्वरः न केवलं म न्दरे भव त, अ प तु सवषु भूतेषु’ म। यह पाठ क शैलीगत
वशेषता है।

प्र.2 कथायाः प्रारम्भे क पलः माधवी च कम् अकुरुताम् ? — “क पलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ …
मातामही तं प्रसङ्गं दूरात् दृष्टवती, तौ आहूतवती च।”

क पलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ। तत्र क्र डावेलायां कञ्चन शुनकं दृष्टवन्तौ। तं दृष्ट् वा पाषाणखण्डं हस्ते
स्वीकृत्य तं मार यतुं धा वतवन्तौ। शुनकः भयेन आक्रोशं कुवन् वेगेन धा वतवान्। तत् दृष्ट् वा क पलः माधवी च उच्चैः
ह सतवन्तौ। ( हन्द — क पल और माधवी छु के समय मामा के घर गए। वहाँ खेल के समय उन्ह ने एक कुत्ता दे खा। उसे दे खकर
हाथ म पत्थर का टु कड़ा लेकर उसे मारने के लए दौड़े। कुत्ता डर से चल्लाता हुआ तेज़ी से भागा। यह दे खकर क पल और माधवी
ज़ोर से हँसे।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions

घटना पाठस्य पदम् क्तवतु-रूपम्

मामा के घर जाना मातुलगृहं गतवन्तौ √गम् + क्तवतु, पुं., प., ि वचनम्

कु त्ता दे खना शुनकं दृष्टवन्तौ √दृ श ् + क्तवतु, ि वचनम्

मारने दौड़ना मार यतुं धा वतवन्तौ √धाव् + क्तवतु, ि वचनम्

हँस ना उच्चैः ह सतवन्तौ √हस् + क्तवतु, ि वचनम्

मातामही का दे खना-बुल ाना दृष्टवती, आहूतवती क्तवतु, स्त्री., प., एकवचनम्

क्य यह अंश महत्त्वपूण है: यह छोटा-सा अनुच्छेद पूरे पाठ क भू मका है। बच्च ने बना कारण एक जीव को पीड़ा
द और उस पर हँसे भी — ठ क इसी व्यवहार के वरुद्ध आगे नामदे व का आचरण रखा गया है। कथा के अन्त म
यही दोन बच्चे कहते ह — ‘अकारणं ह शुनकं ता डतवान्’ — अथात् कथा ने उन्ह बदल दया।

व्याकरण-सङ् केत: ‘तौ आहूतवती च’ म ‘तौ’ द्वतीया वभ क्त, द्ववचनम् है (कम ण तीया) — यही अभ्यास
के प्रश्न १ (ज) का उत्तर है।

कथा-संवादः — पाठ्यप्रश्नाः — पृष्ठ 23–26
मातामही-क पल-माधवी-संवादे उप ताः प्रश्नाः तथा तेषाम् उत्तरा ण

पाठ्यप्रश्नाः

प्र.1 भोः क पल ! माध व ! क कुरुतः ? (मातामही)

आवां क्र डावः। एकः शुनकः आवयोः क्र डायां मध्ये मध्ये प्र वश्य आवां पीडय त स्म, अतः आवां तं सम्यक् द ण्डतवन्तौ।
( हन्द — हम दोन खेल रहे ह। एक कुत्ता बार-बार हमारे खेल के बीच म घुसकर हम परेशान कर रहा था, इस लए हमने उसे अच्छ
तरह दण्ड दया।)

पाठ का आधार: यह क पल का ही उत्तर है — “माताम ह! पश्यतु कल। सः शुनकः आवयोः क्र डायां मध्ये मध्ये
प्र वश्य आवां पीडय त स्म। अतः आवां तं सम्यक् द ण्डतवन्तौ।” ध्यान द जए, वह अपने कृत्य को अपराध नह ,
दण्ड कहता है और उस पर फर से हँसता है — (पुनः उच्चैः ह सतवन्तौ)। यही नदयता आगे पश्चात्ताप म बदलती है।

व्याकरण: ‘आवाम्’ = अस्मद्-शब्द, प्रथमा/ तीया वचनम्। ‘द ण्डतवन्तौ’ = √दण्ड् + क्तवतु, पुं लङ्ग प्रथमा
द्ववचन — क्य क कता दो ह (क पलः माधवी च)।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः
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वत्सौ, अधुना क्र डया अलम्। कथां श्रोतुम् इच्छतः वा ? (मातामही)
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l ह! आवाम् अवश्यं कथां श्रोतुम् इच्छावः। मातामह्याः कथा ! रोचते मे कथा … रोचते मे मातामही। ( हन्द —
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हाँ नानी! हम दोन अवश्य कथा सुनना चाहते ह। नानी क कथा! मुझे कथा अच्छ लगती है… मुझे नानी अच्छ लगती है।)

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ध्यान दे ने योग्य प्रयोग: ‘क्र डया अलम्’ — अलम्-शब्द के योग म तृतीया वभ क्त होती है, और यहाँ ‘अलम्’ का

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अथ है ‘बस, अब मत करो’ ( नषेध)। अथात् ‘अब खेल बहुत हुआ’। यही नयम ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ खण्ड के भाग
(छ) म सखाया गया है — अलं क्र डया, अलं वस्तरेण, अलम् आलस्येन, अलं कलहेन, अलं क्रोधेन।

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m a s em मे कथा’ = मुझे
‘रोचते’ का प्रयोग: ‘रुच्’ धातु के योग म जसे अच्छा लगता है वह चतुथ म आता है — ‘रोचते

. coलगती है। यहाँ ‘कथा’ कता (प्रथमा) है, ‘मे’ (मह्यम्) चतुथ । a gl
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कथा अच्छ

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प्र.3 क भवन्तौ महात्मानं नामदे वं जानीतः ? (मातामही)

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आम्, आवां महात्मानं नामदे वं जानीवः। माधवी श्रुतवती यत् तस्य क तने स्वयं दे वः पाण्डु रङ्गः नृत्यं कृतवान् इ त। ( हन्द —

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हाँ, हम दोन महात्मा नामदे व को जानते ह। माधवी ने सुना है क उनके क तन म स्वयं भगवान् पाण्डु रङ्ग नाचे थे।)

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प्रश्नः उत्तरम् (पाठात्)

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तस्य कीतने िकम् अभवत् ? स्वयं दे वः पाण्डुरङ् गः नत्ृ यं कृतवान्
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cं oनररmत्नानां बह्मष णां राजष णां च
अनेके.षा g l a
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भारतभूिमः के षां पसिवत्री ?

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सन्दभ: मातामही पहले भू मका बाँधती है — ‘अस्माकं भारतभू मः अनेकेषां नररत्नानां ब्रह्मष णां राजष णां च
प्रस वत्री। बहवः सत्पुरुषाः स्वीयकतृत्वेन जन्म साथकं कृतवन्तः।’ — फर उन्ह म से एक, नामदे व का नाम लेती है।
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यह कथा-कथन क सुन्दर पद्ध त है : पहले वग, फर व्य क्त।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions

प्र.4 क सत्यमेव नामदे वस्य मत्रम् आसीत् पाण्डु रङ्गः ? (माधवी)

आम्, सत्यमेव। दे वः पाण्डु रङ्गः नामदे वस्य प्रयसुहृद् आसीत्। नामदे वः न केवलं पाण्डु रङ्गस्य प्रयभक्तः अ प तु प्रय मत्रम प
आसीत्। दे वः नामदे वं प रतः भव त स्म। ( हन्द — हाँ, सचमुच। भगवान् पाण्डु रङ्ग नामदे व के प्रय मत्र थे। नामदे व पाण्डु रङ्ग के
केवल प्रय भक्त ही नह , प्रय मत्र भी थे। भगवान् नामदे व के चार ओर रहते थे।)

भ क्त का स्वरूप: ‘दे वः नामदे वं प रतः भव त स्म’ — यह वाक्य भ क्त के उस रूप को दखाता है जसे सख्य-
भाव कहते ह। नामदे व प्र त दन पाण्डु रङ्ग को नैवेद्य अ पत करते, उन्ह भोजन कराते, तभी स्वयं अन्न ग्रहण करते —
‘तं भोज यत्वा ततः परमेव अन्नं सेवते स्म’।

व्याकरण: ‘नामदे वं प रतः’ म प रतः-शब्द के योग म द्वतीया वभ क्त है (उपपद वभ क्तः)। ‘प रतः’ का अथ है
— चार ओर, सब ओर।

प्र.5 क दे वेन सह अ प मत्रता सम्भव त ? (क पलः)

आम्, सम्भव त। य द भक्तः नष्कपटे न प्रेम्णा भजते त ह दे वः अ प तस्य सखा भव त। नामदे वस्य दे वेन सह तादृशी एव
मत्रता आसीत् — सः पाण्डु रङ्गं भोज यत्वा एव स्वयम् अ ं सेवते स्म। ( हन्द — हाँ, सम्भव है। य द भक्त नष्कपट प्रेम से
भजता है तो भगवान् भी उसके सखा बन जाते ह। नामदे व क भगवान् से ऐसी ही मत्रता थी — वे पाण्डु रङ्ग को भोजन कराकर ही
स्वयं अन्न ग्रहण करते थे।)

पाठ का उत्तर: मातामही कहती ह — ‘आम् वत्सौ। दे वः पाण्डु रङ्गः नामदे वस्य प्रयसुहृद् आसीत्।’ और कथा के
अन्त म स्वयं पाण्डु रङ्ग प्रकट होकर नामदे व को ‘वत्स’ कहकर सम्बो धत करते ह — यह मत्रता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

व्याकरण: ‘दे वेन सह’ — सह के योग म तृतीया वभ क्त। इसी नयम से — क पलेन सह, जनकेन सह, मत्रेण
साकम्, पत्रा साधम्, लक्ष्मणेन समम्।

प्र.6 माताम ह ! क सत्यमेव ईश्वरः सवषु भूतेषु नवस त ? (क पलः)

आम् वत्स ! सत्यमेव ईश्वरः सवषु भूतेषु नवस त। नामदे वस्य गुरुः वसोबा तम् एतत् एव अध्या पतवान् — ‘ईश्वरः न केवलं
म न्दरे भव त, अ प तु सवषु भूतेषु तस्य नवासो भव त। अतः तस्य सवात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु’ इ त। ( हन्द — हाँ
बेटा! सचमुच ईश्वर सब प्रा णय म नवास करता है। नामदे व के गुरु वसोबा ने उन्ह यही सखाया था — ‘ईश्वर केवल म न्दर म नह
होता, अ पतु सब प्रा णय म उसका नवास होता है। इस लए उस सवात्मक ईश्वर क पूजा करो।’)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions

यही पाठ का मूल सद्धान्त है: पूरे पाठ का शीषक — आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः — इसी वाक्य का
दूसरा रूप है। ‘जो सब प्रा णय को अपने ही समान दे खता है, वही सच्चा प ण्डत है।’ इसी उपदे श क परीक्षा आगे
कुत्ते के रूप म ली जाती है, और नामदे व उसम उत्तीण होते ह।

शब्द-सङ् केत: ‘भूतेषु’ यहाँ ‘प्रा णय म’ (जीवेषु) अथ म है, ‘भूत-प्रेत’ अथ म नह । पाठ म आगे यही बात ‘सवषु
जीवेषु ईश्वरः नवस त’ कहकर दोहराई गई है।

प्र.7 पाण्डु रङ्गः आगत्य भ क्षतवान् कल ? (माधवी)

न ह। कश्चन बुभु क्षतः शुनकः आगत्य रो टकां मुखे गृहीत्वा धा वतवान्। ( हन्द — नह । कोई भूखा कुत्ता आकर रोट को मुँह
म लेकर भाग गया।)

घटना-क्रमः —
नामदे वः नै वेद्य स्थािलकां गृहीत्वा िवगहस्य पुरतः स्थािपतवान्।

→ ने त्रे िनमील्य पाथनां कृ तवान्।

→ मन्त्रम् उच्चाय श्रद्धया पणम्य ने त्रे उद् घािटतवान्।

→ अहो आश्चयम् ! पुरतः िस्थतायां स्थािलकायां रोिटका नासीत्।

कथा-कौशल: लेखक यहाँ जानबूझकर पाठक को भ्रम म डालता है — माधवी क तरह पाठक भी सोचता है क
भगवान् ने नैवेद्य स्वीकार कर लया। असली उत्तर (‘एक भूखा कुत्ता ले भागा’) कथा को साधारण जगत् म लौटा
लाता है, और तभी असली चमत्कार सम्भव होता है — क्य क चमत्कार भगवान् के खाने म नह , नामदे व क करुणा
म है।

प्र.8 पुत्रकौ, शृणुताम्। नामदे वः शुनकस्य पृष्ठे अनुधा वतवान्। जानीतः कमथ कथं च ? (मातामही)

नामदे वः कोपेन न धा वतवान्, प्रत्युत सः करुणया धा वतवान्। न लगुडं, न पाषाणखण्डम्, अ प तु घृतपात्रं धृत्वा
धा वतवान्। तस्य चन्ता आसीत् — य द शुनकः शुष्करो टकां खादे त् त ह तस्य उदरवेदना भवेत् इ त। ( हन्द — नामदे व
क्रोध से नह दौड़े, ब ल्क करुणा से दौड़े। न लाठ लेकर, न पत्थर लेकर, अ पतु घी का पात्र लेकर दौड़े। उनक चन्ता यह थी क य द
कुत्ता सूखी रोट खाएगा तो उसके पेट म दद होगा।)

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प्रश्नः साधारणजनस्य उत्तरम् नामदे वस्य आचरणम्

िकमथम् अनुध ािवतवान् ? शुनकं दण्ड यतुम् शुनकाय घ ृतं दातुम ् — ‘तस्य पीडा मा भवतु’ इित

कथम् अनुध ािवतवान् ? लगुडम् / पाषाणखण्डम् आदाय घ ृतपात्र म् आदाय

के न भावेन ? कोपेन क रुणया

भावः: यही पूरे पाठ का मोड़- बन्दु है। क पल और माधवी दोन ने अनुमान लगाया क नामदे व लाठ या पत्थर लेकर
दौड़े ह गे — क्य क सामान्य मनुष्य यही करता। नामदे व का उत्तर उलटा है, और इसी उलटे पन म सन्तत्व है। उन्ह ने
कहा — ‘हे दे व! शुष्कां रो टकां मा खादतु, घृतम् अ प स्वीकरोतु’ — अथात् उन्ह ने कुत्ते को ‘हे दे व’ कहकर
सम्बो धत कया। जो सब म ईश्वर दे खता है, उसके लए कुत्ता भी ‘दे व’ है।

समास: ‘उदरवेदना’ = उदरे वेदना — सप्तमीतत्पुरुषः। यही अभ्यास प्रश्न ८ (घ) का उत्तर है।

प्र.9 क घृतपात्रम् आधृत्य ? कन्तु कमथम् ? (उभाव प / उभौ) — कथायाः अ न्तमः भागः कः ?

आम्, घृतपात्रम् आधृत्य एव। धावन् शुनकः अदृश्यः जातः। तस्य ाने पाण्डु रङ्गः आ वभूतः। सः नामदे वम् उक्तवान् —
‘वत्स नामदे व ! उत्तीणः भवान् परीक्षाम्। ईश्वरः सवषु भूतेषु नवस त इ त गुरूपदे शं न केवलं भवान् श्रुतवान् अ प तु
अनुपा लतवान्। सुतरां धन्यो भवान्।’ ( हन्द — हाँ, घी का पात्र लेकर ही। दौड़ता हुआ कुत्ता अदृश्य हो गया। उसके ान पर
पाण्डु रङ्ग प्रकट हुए। उन्ह ने नामदे व से कहा — ‘वत्स नामदे व! तुम परीक्षा म उत्तीण हुए। ईश्वर सब प्रा णय म बसता है — इस गुरु-
उपदे श को तुमने केवल सुना ही नह , उसका पालन भी कया। इस लए तुम धन्य हो।’)

कथायाः िनष्कषः —

किपलः — ‘अहं पमादं कृ तवान्। अकारणं िह शुन कं तािडतवान्। … अतः कमिप न पीडियष्यािम इित।’

माधवी — ‘अहमिप कदािप कस्यािप पीडां न जनियष्यािम।’

मातामही — ‘अस्माकं कायेन वाचा मनसा वा कस्यािप पीडा न भवेत ्। … इदमस्त ु अस्माकं ध्येयम् —

आ त् मवत् सवभूते ष ु यः पश्यित स पिण्डतः।’

कथा-रचना क सुन्दरता: कथा वह समाप्त होती है जहाँ से आरम्भ हुई थी — एक कुत्ते पर। आरम्भ म बच्चे पत्थर
लेकर कुत्ते के पीछे दौड़े थे; अन्त म वे यही सङ् कल्प करते ह क कसी जीव को पीड़ा नह दगे। बीच म नामदे व क
कथा एक दपण का काम करती है, जसम बच्च को अपना चेहरा दखता है — इसी लए ‘अपराधभावनया तयोः
मुखे म्लाने आस्ताम्’।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions

ध्येय-वाक्य का अथ: ‘आत्मवत्’ = अपने समान; ‘सवभूतेषु’ = सब प्रा णय म; ‘यः पश्य त’ = जो दे खता है; ‘सः
प ण्डतः’ = वही व ान् है। अथात् पा ण्डत्य पुस्तक म नह , दृ ष्ट म है।

सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 27–29
शब्दाथ-ता लका — रक्तः ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त स्तम्भः पू रतः

शब्दाथः

प्र.1 ‘सव शब्दे न भासते’ इ त सारण्यां रक्तं ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त स्तम्भं पूरयत।

पुस्तक म अ न्तम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — वद्याथ को अपनी मातृभाषा म अथ लखना है। यहाँ वह स्तम्भ
हन्द (इस पुस्तक क माध्यम-भाषा) म भरा गया है, और अथ को केवल शब्द नह , प्रसङ्ग-स हत दया गया है ता क प्रयोग समझ म
आए। जनक मातृभाषा मराठ , गुजराती, बाङ् ला, त मळ आ द है, वे इसी ढं ग से अपनी भाषा म लख।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः
a g l AglaSem · NCERT Solutions

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( हन्द )m.
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH मातृभाषया अथ लखत

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अनुध ािवतवान् (अनु + √धाव् पृष्ठतः अधावत् पीछे दौड़ा Chased िकसी के पीछे -पीछे दौड़ा —
a
agl
+ क्तवतु, पुं.प.ए.व.) जैसे नामदे व कु त्ते के पीछे दौड़े

अनुपािलतवान् (अनु + √पाल् अनुसरणम् अकरोत् पालन कया Followed कहे हुए पर चला, उपदे श को

m
.co ag
+ क्तवतु, पुं.प.ए.व.) जीवन में उतारा

m
sचुeराकर
a
agl
अपहृत्य (अप + √हृ + ल्यप्, चोर यत्वा Having stolen छीनकर / उठा ले जाकर
अव्ययम्)

आिवभूतवान् (आिवस् + √भू प्रत्यक्षीभूतः प्रकट हुए Appeared
co m
सामने पकट हो गए , िदखाई पड़े

e m.
+ क्तवतु, पुं.प.ए.व.)

m l a sदोनों
m .co
आिलङ् गनं कृ तवन्तौ (√कृ + आ ष्टौ दोन गले मले Hugged
ag ने गले लगा िलया

l a se
क्तवतु, पुं.प.ि .व.)

g
a ऋजुता (स्त्री.प.ए.व.) सरलता सीधापन Simplicity सरल -स्वभाव, कपट का न होना

m a s
.co agl
करुणया (स्त्री.त.ृ ए.व.) दयया दया से With mercy

emशरीर
दया-भाव से , तरस खाकर

a s
कायः (पु.ं प.ए.व.) दे हः
a gl Body दे ह, तन (‘कायेन वाचा मनसा’
= तन, वाणी और मन से )

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.
घ ृतम् (नपु.ं प.ए.व.) ह वः घी Clarified butter घी

m
e दोनों ने सज़ा दी
om g l as
क्तवतु.,cपुं.प.ि .व.)
दिण्डतवन्तौ (√दण्ड् + दण्डं दत्तवन्तौ दण्ड दया Punished

m a
ase
agl नैवेद्य म् (नपुं.प.ए.व.) दे वाय समप यतुं भोग Offering to God भगवान् को अिपत िकया जाने

se m
न मतः पदाथः वाला भोजन, भोग

om
cपास g l a
m . Near
a
e
िनकषा (अव्ययम्) समीपे पास , िनकट (‘मां िनकषा

a s आग च्छताम्’ = मेरे पास आओ )

िनमील्य (िन + √िमल् +
agl
पधाय बंद करके Having closed (आँखें) मूँद कर

om
ल्यप्)

. c
Piece of Stone m पत्थर का टुक ड़ा, ढे ल ा
a se
com l
पाषाणखण्डम् (पुं.ि .ए.व.) शलाखण्डम् पत्थर का टु कड़ा

e m .पुण्यश्लोकः (पुं.प.ए.व.) ag
as
पुण्यः ोकः प वत्र च रत्रवाला Virtuous िजसका यश पिवत्र है, पुण् य-

agl
(च रतं) यस्य सः character कीित वाला

.c
One who gives जन्म दे ने वाली, जननी
s e m
m a
पसिवत्री (स्त्री.प.ए.व.) जन यत्री जन्म दे ने वाली

.co agl
birth

se m
g l a
ब्रह्म ा ननाम् ब्रह्म को जानने Of Seers of बह्म ानी ऋिषयों का
aऋषीणाम्
बह्मष णाम् (पुं.ष.ब.व.)
वाले ऋ षय का Brahman

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m .
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions

बुभिु क्षतः (पुं.प.ए.व.) क्षुधातः भूखा Hungry भूख से व्याकु ल , भूखा

भिक्षतवान् (√भक्ष् + क्तवतु, खा दतवान् खाया Ate खा िलया
पुं.प.ए.व.)

मातुल ः (पुं.प.ए.व.) मातुः भ्राता मामा Maternal uncle माँ का भाई, मामा

म्लाने (नपु.ं प.ि .व.) का न्तहीने कुम्हलाया Withered (दोनों मुख) मुर झाए हुए , उदास

लग ड
ु म् (पुं.ि .ए.व.) दण्डम् लाठ Stick लाठी, डण् डा

िशक्षापदा (उपपदतत्पुरुषः, शक्षां प्रददा त इ त सीख दे ने वाली Which imparts सीख दे ने वाली, िशक्षापद
स्त्री.प.ए.व.) education

सुहृ त् (पु.ं प.ए.व.) सखा मत्र Friend स च्चा िम त्र (सु + हृ द् = अच्छे
हृदय वाला)

ता लका पढ़ने का ढं ग: कोष्ठक म दया गया सङ् केत केवल सजावट नह है। ‘अनु + √धाव् + क्तवतु, पुं.प्र.ए.व.’
का अथ है — उपसग ‘अनु’, धातु ‘धाव्’, प्रत्यय ‘क्तवतु’, और रूप पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन। इसी से पता चलता है
क वाक्य म इस शब्द का कता एकवचन पु ल्लङ्ग होगा। इसी तरह ‘द ण्डतवन्तौ’ के साथ लखा ‘पुं.प्र. .व.’ बताता
है क कता दो ह।

ध्यान द: ‘अपहृत्य’ और ‘ नमील्य’ के आगे लङ्ग- वभ क्त नह लखी, क्य क ल्यप्-प्रत्ययान्त शब्द अव्यय होते ह
— उनके रूप नह चलते। ‘ नकषा’ भी अव्यय है।

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 29–30
उपपद वभक्तयः — प्र त, वना, धक्, नकषा, प रतः, सह-साकं-साध-समम्, अलम्

व्याकरणम्

प्र.1 उपपद वभ क्तः का ? ‘प्र त’, ‘ वना’, ‘ धक्’ तथा ‘ नकषा’ इत्येतेषां योगे का वभ क्तः भव त ?

‘उप’ इत्यस्य अथः सामीप्यम् इ त। समीप ं पदम् आ श्रत्य जायमाना वभ क्तः उपपद वभ क्तः इ त कथ्यते। ( हन्द —
‘उप’ का अथ है समीपता। पास म रखे कसी पद के कारण जो वभ क्त लगती है, उसे उपपद वभ क्त कहते ह। अथात् वभ क्त
कारक से नह , पास के शब्द से तय होती है।)

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उपपदम् अथः वभ क्तः पुस्तकस्य उदाहरणम्

पित आ भमुख्यम् (क ि तीया नामदे वः प्र त दनं म न्दरं प्र त गच्छ त स्म। / बालः सदा मातरं प्र त
ओर) धाव त।

िवना बना ि तीया, ततृ ीया, पञ्चमी — अहं कारणं वना शुनकं ता डतवान्। / कारणेन वना … /
तीनों कारणात् वना …

िधक् नन्दावाचकः ि तीया धक् शुनकम्। / धक् दुजनम्।
( धक्कार)

िनकषा समीपम् (पास) ि तीया क पलः मातामह नकषा आगतवान्। / केशवस्य गृहं पाठशालां
नकषा अ स्त।

नयम कैसे लगाएँ: पहले वाक्य म उपपद खो जए (प्र त / वना / धक् / नकषा …), फर उससे जुड़े सं ाशब्द को
उस वभ क्त म र खए। जैसे — ‘आपण … गत्वा’ म साधारणतः तीया ‘आपणम्’ आती; पर ‘आपण प्र त गत्वा’
म भी तीया ही — आपणं प्र त। और ‘आपण नकषा वाहना न’ म भी तीया — आपणं नकषा।

‘ वना’ क वशेषता: यह अकेला ऐसा उपपद है जसके साथ तीन वभ क्तयाँ चलती ह। परीक्षा म कोई भी एक
ल खए, तीन शुद्ध ह — शकराम् वना / शकरया वना / शकरातः वना।

प्र.2 ‘प रतः’, ‘सह-साकं-साध-समम्’ तथा ‘अलम्’ इत्येतेषां योगे का वभ क्तः भव त ? सोदाहरणं लखत।

उपपदम् अथः वभ क्तः पुस्तकस्य उदाहरणम्

पिरतः प रवृत्य / ि तीया दे वं प रतः भक्ताः स न्त। / शक्षकं प रतः छात्राः भव न्त।
सव स्मन् पाश्व
(चार ओर)

सह, साकम्, साथ ततृ ीया माधवी क पलेन सह भ्रम त। / जनकेन सह पुत्री क्र ड त। / त्वं मत्रेण साकं
साधम्, समम् धाव स। / सः पत्रा साधम् आगच्छ त। / रामः लक्ष्मणेन समं वनं गच्छ त। /
अहम् अनुजेन साकं ग्रामं गच्छा म।

अलम् पयाप्तम् / नषेधः ततृ ीया अलं क्र डया। / अलं वस्तरेण। / अलम् आलस्येन। / अलं कलहेन। / अलं
(बस, मत करो) क्रोधेन।

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ध्यान दे ने योग्य भेद: ‘प रतः’ का अथ ‘पास’ नह , चार ओर है — इसी लए पाठ म ‘दे वः नामदे वं प रतः भव त स्म’
का अथ हुआ ‘भगवान् नामदे व के चार ओर (सदा साथ) रहते थे’। और ‘अलम्’ के दो अथ ह — ‘पयाप्त’ (अलं
धनम् = धन पयाप्त है, यहाँ प्रथमा) तथा ‘ नषेध’ (अलं क्रोधेन = क्रोध मत करो, यहाँ तृतीया)। इस पाठ म सवत्र
नषेधाथक प्रयोग है।

याद रखने क कुंजी: द्वतीया लेने वाले पाँच — प्र त, धक्, नकषा, प रतः और ( वकल्प से) वना। तृतीया लेने
वाले दो वग — सह/साकम्/साधम्/समम् तथा अलम्। ‘ वना’ तीन म जाता है।

प्र.3 अधो ल खतेषु वाक्येषु उपपदस्य नदशं कृत्वा वभ क्तं स्पष्टीकुरुत — (क) मां नकषा आगच्छताम्। (ख) दे वः
नामदे वं प रतः भव त स्म। (ग) अधुना क्र डया अलम्। (घ) क दे वेन सह अ प मत्रता सम्भव त ? (ङ) धक्
शुनकम्।

वाक्यम् उपपदम् पदम् + वभ क्तः नयमः

(क) मां िनकषा आगच्छताम्। नकषा माम् — ि तीया, एकवचनम् (अस्मद् ) नकषा-योगे तीया

(ख) दे वः नामदे वं पिरतः भवित स्म। प रतः नामदे वम् — ि तीया, ए .व. प रतः-योगे तीया

(ग) अध नु ा क्रीडया अलम्। अलम् क्रीडया — ततृ ीया, ए.व. (स्त्री.) अलम्-योगे तृतीया

(घ) िकं दे वेन सह अिप िमत्रता सम्भवित ? सह दे वेन — ततृ ीया, ए .व. सह-योगे तृतीया

(ङ) िधक् शुनकम्। धक् शुनकम् — ि तीया, ए .व. धक्-योगे तीया

क्य यह अभ्यास ज़रूरी है: ये पाँच वाक्य पाठ के भीतर से लए गए ह — अथात् व्याकरण अलग से नह पढ़ाया
गया, कथा म ही बरता गया है। अभ्यास का प्रश्न ६ ठ क यही परखता है : वहाँ कोष्ठक म मूल शब्द दया है और
आपको उपपद दे खकर वभ क्त चुननी है।

Tip: उत्तर लखते समय क्रम र खए — पहले उपपद, फर नयम, फर रूप। जैसे : “यहाँ ‘ नकषा’ उपपद है;
नकषा के योग म तीया होती है; अतः ‘अहम्’ का तीया एकवचन रूप ‘माम्’ हुआ।” इसी क्रम म लखने पर पूरे
अंक मलते ह।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 30–31

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प्रश्न १ — अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण संस्कृतभाषया लखत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.1 (क) मातामही कस्य कथां श्रा वतवती ?

मातामही महाराष्ट्रस्य प्र सद्धस्य महात्मनः पुण्य ोकस्य नामदे वमहाराजस्य कथां श्रा वतवती। ( हन्द — नानी ने महाराष्ट्र के
प्र सद्ध महात्मा, पुण्य ोक नामदे वमहाराज क कथा सुनाई।)

नयम: प्रश्न ‘कस्य’ से पूछा गया है — यह षष्ठी वभ क्त, एकवचन है (सम्ब े षष्ठी)। अतः उत्तर भी षष्ठी म ही
आना चा हए — ‘नामदे वमहाराजस्य’, ‘नामदे वमहाराजः’ नह । पाठ का आधार-वाक्य — ‘तस्यैव पुण्य ोकस्य
पाण्डु रङ्ग मत्रस्य नामदे वमहाराजस्य एषा कथा।’

‘श्रा वतवती’ का व ेषण: √श्रु के णजन्त (प्रेरणाथक) रूप ‘श्रावय्’ से क्तवतु — ‘श्रा वतवती’ = सुनाया।
स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन, क्य क कता ‘मातामही’ है।

प्र.1 (ख) नामदे वस्य गुरुः नामदे वं कम् अध्या पतवान् ?

नामदे वस्य गुरुः वसोबा नामदे वम् अध्या पतवान् यत् — ‘ईश्वरः न केवलं म न्दरे भव त, अ प तु सवषु भूतेषु तस्य नवासो
भव त। अतः तस्य सवात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु’ इ त। ( हन्द — नामदे व के गुरु वसोबा ने नामदे व को यह पढ़ाया क —
‘ईश्वर केवल म न्दर म नह होता, अ पतु सब प्रा णय म उसका नवास होता है। इस लए उस सवात्मक ईश्वर क पूजा करो।’)

यही उपदे श कथा क धुरी है: गुरु का वाक्य नामदे व के लए केवल सद्धान्त नह रहा — कुत्ते के प्रसङ्ग म वे उसे
आचरण म उतारते ह। इसी लए अन्त म पाण्डु रङ्ग कहते ह — ‘गुरूपदे शं न केवलं भवान् श्रुतवान् अ प तु
अनुपा लतवान्’। यह वाक्य ‘सुनना’ और ‘पालन करना’ का भेद स्पष्ट कर दे ता है।

व्याकरण: ‘अध्या पतवान्’ = अ ध + √इ ( णच्) + क्तवतु = पढ़ाया। इसका कमक प्रयोग है — ‘नामदे वम्’ (गौण
कम) तथा उपदे श (मुख्य कम) — इसी लए प्रश्न म ‘नामदे वं कम्’ दोन तीया म ह।

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नामदे वः कया भावनया धावनं कृतवान् ?
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प्र.1 (ग)

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a glवः करुणया (करुणाभावनया) धावनं कृतवान्। सः कोपेन न धा वतवान्, प्रत्युत ‘शुनकस्य उदरवेदना मा भवतु’ इ त
नामदे
चन्तयन् घृतपात्रम् आदाय धा वतवान्। ( हन्द — नामदे व करुणा क भावना से दौड़े। वे क्रोध से नह दौड़े, ब ल्क ‘कुत्ते के पेट म

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दद न हो’ ऐसा सोचते हुए घी का पात्र लेकर दौड़े।)

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नयम: प्रश्न ‘कया’ से आरम्भ होता है — यह तृतीया वभ क्त, स्त्री लङ्ग, एकवचन है (करणे तृतीया)। इस लए
उत्तर भी तृतीया म — ‘करुणया’। ‘करुणा’ लखना अशुद्ध होगा।

. c om
s e m।’ — दोन पद म
omलेखक ने वरोध दखाने के लए ही उन्ह आमने-सामने रखा है। agla
पाठ का वाक्य: ‘न ह बालौ! नामदे वः कोपेन न धा वतवान्, प्रत्युत सः करुणया धा वतवान्
तृतीया है,cऔर
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m a s
.co agl
प्र.1 (घ) बालकयोः मुखे कमथ म्लाने संजाते ?

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अपराधभावनया बालकयोः मुखे म्लाने संजाते। यतः तौ अकारणम् एव शुनकं पाषाणखण्डेन ता डतवन्तौ, तस्य उप र
ह सतवन्तौ च — नामदे वस्य कथां श्रुत्वा तौ स्वक यम् अपराधं ातवन्तौ। ( हन्द — अपराध-भावना से दोन बालक के मुख
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मुरझा गए। क्य क उन्ह ने बना कारण ही कुत्ते को पत्थर से मारा था और उस पर हँसे भी थे — नामदे व क कथा सुनकर उन्ह अपने
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अपराध का बोध हुआ।)

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a gl पाठ का सङ् केत: कोष्ठक म रङ्गसङ् केत है — (उभौ परस्परं पश्यतः। अपराधभावनया तयोः मुखे म्लाने आस्ताम्।)
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— अथात् यह भाव संवाद म कहा नह गया, दखाया गया है। यह नाट्य-शैली क वशेषता है।

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व्याकरण: ‘मुखे’ तथा ‘म्लाने’ दोन नपुंसक लङ्ग, प्रथमा, द्ववचन ह (दो बालक = दो मुख)। ‘बालकयोः’ षष्ठी
वचन। वशेषण अपने वशेष्य के लङ्ग-वचन- वभ क्त का अनुसरण करता है — यही कारण है क ‘म्लाना’ या
‘म्लानम्’ नह , ‘म्लाने’ आया।

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m as e
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s e m क पलः माधवी च कं सङ् कल्पं कृतवन्तौ ?
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प्र.1 (ङ)

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क पलः माधवी च इमं सङ् कल्पं कृतवन्तौ — ‘अस्माकं कायेन वाचा मनसा वा कस्या प पीडा न भवेत्। तथैव कस्या प या
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का प पीडा स्यात् तां नवार यतुं प्रयतामहेm
s e
‘कदा प कस्या प पीडां न जन यष्याlaम’ इ त। ( हन्द — क पल और माधवी ने यह सङ् कल्प कया क — ‘हमारे शरीर, वाणी या
’ इ त। क पलः पृथक् उक्तवान् — ‘कम प न पीड यष्या म’, माधवी च —

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मन से कसी को पीड़ा न हो। और वैसे ही कसी क जो भी पीड़ा हो, उसे दूर करने का हम प्रयत्न कर।’ क पल ने अलग से कहा —
‘म कसी को नह सताऊँगा’, और माधवी ने — ‘म कभी कसी को पीड़ा नह दूँ गी।’)

सङ् कल्पस्य ौ भागौ —

१. िनषेधात्मकः — कायेन वाचा मनसा वा कस्यािप पीडा न भवेत ् (िकसी को दुःख न दे )ं

२. िवधेयात्मकः — कस्यािप पीडां िनवारियत ुं पयतामहे (दू सरे का दुःख दू र भी करे)ं

क्य दो भाग: केवल ‘नुकसान न पहुँचाना’ अ हसा का आधा रूप है; दूसरा आधा है ‘दूसरे क पीड़ा दूर करना’ —
और नामदे व ने यही दूसरा काम कया था। इसी लए मातामही सङ् कल्प को दो भाग म कहती है, और उसके तुरन्त
बाद ध्येय-वाक्य आता है।

प्र.1 (च) ‘तं दृष्ट् वा पाषाणखण्डं स्वीकृत्य मार यतुं धा वतवन्तौ’ इ त वाक्ये ‘तम्’ इ त सवनामशब्दः कस्य कृते प्रयुक्तः
?

‘तम्’ इ त सवनामशब्दः शुनकस्य कृते प्रयुक्तः। ( हन्द — ‘तम्’ सवनाम शब्द कुत्ते के लए प्रयुक्त हुआ है।)

कैसे जाना: इससे ठ क पहले का वाक्य है — ‘तत्र क्र डावेलायां कञ्चन शुनकं दृष्टवन्तौ।’ सवनाम सदा अपने
नकटतम पूववत सं ा (पूवापर-सङ्ग त) का ान लेता है। यहाँ पूववत सं ा ‘शुनकम्’ है, अतः ‘तम्’ = ‘शुनकम्’।

व्याकरण: ‘तम्’ = तद्-शब्द, पुं लङ्ग, द्वतीया वभ क्त, एकवचन — कम ण तीया, क्य क ‘मार यतुं’ क्रया का
कम वही है। और ‘शुनकः’ पुं लङ्ग है, इसी लए ‘ताम्’ या ‘तत्’ नह , ‘तम्’ आया।

प्र.1 (छ) क पलः माधवी च कुत्र गतवन्तौ ?

क पलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ। ( हन्द — क पल और माधवी छु के समय मामा के घर गए।)

नयम: ‘कुत्र’ (कहाँ) का उत्तर ानवाचक पद से दया जाता है। यहाँ ग त- क्रया (गतवन्तौ) का कम होने से
‘मातुलगृहम्’ द्वतीया म है — ‘कम ण तीया’। ‘मातुलगृहे’ लखना अशुद्ध होगा, क्य क जाने क क्रया के साथ
गन्तव्य तीया म आता है।

समास: मातुलस्य गृहम् = मातुलगृहम् — षष्ठीतत्पुरुषः। यही अभ्यास प्रश्न ८ (छ) का उत्तर है।

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प्र.1 (ज) ‘मातामही तं प्रसङ्गं दृष्टवती, तौ आहूतवती च’। इ त वाक्ये ‘तौ’ इ त शब्दः कस्यां वभक्तौ अ स्त ?

‘तौ’ इ त शब्दः द्वतीयायां वभक्तौ (पुं लङ्गे , द्ववचने) अ स्त। ( हन्द — ‘तौ’ शब्द तीया वभ क्त म है — पु ल्लङ्ग,
वचन।)

िवश्लेषणम् —

िक्रयापदम् : आहूत वती (आ + √ े + क्तवत )ु — सकमकम्

कत : मातामही (पथमा, ए.व.)

कम : तौ (= किपलं माधवी ं च) → कमिण ि तीया, ि वचनम्

तद् -शब्दः, पुंिलङ् गम् : सः – तौ – ते (पथमा) · तम् – तौ – तान् (ि तीया)

ध्यान द — रूप एक, वभ क्त दो: ‘तौ’ प्रथमा वचन भी होता है और तीया वचन भी। भेद क्रया से
पहचा नए : यहाँ कता ‘मातामही’ पहले ही आ चुका है और ‘आहूतवती’ स्त्री लङ्ग एकवचन है, अथात् ‘तौ’ कता नह
हो सकता — इस लए वह कम है, और तीया म है।

पुं लङ्ग क्य : क पल (पुं.) और माधवी (स्त्री.) — दो भन्न लङ्ग के समुच्चय म संस्कृत म पुं लङ्ग प्रयुक्त होता है।
इसी लए ‘ते’ नह , ‘तौ’।

प्र.1 (अ त रक्तः – १) नामदे वः पाण्डु रङ्गस्य क दृशः आसीत् ? (पाठाधा रतः अ त रक्तः प्रश्नः)

नामदे वः पाण्डु रङ्गस्य न केवलं प्रयभक्तः, अ प तु प्रय मत्रम् अ प आसीत्। सः प्र त दनं पाण्डु रङ्गाय नैवेद्यं समप्य, तं
भोज यत्वा, ततः परमेव अ ं सेवते स्म। दे वः अ प तं प रतः भव त स्म। ( हन्द — नामदे व पाण्डु रङ्ग के केवल प्रय भक्त ही
नह , प्रय मत्र भी थे। वे प्र त दन पाण्डु रङ्ग को नैवेद्य अ पत करके, उन्ह भोजन कराकर, उसके बाद ही स्वयं अन्न ग्रहण करते थे।
भगवान् भी उनके चार ओर रहते थे।)

‘ततः परमेव’ का महत्त्व: यह छोटा-सा शब्द नामदे व क भ क्त क गहराई बता दे ता है — भगवान् को खलाए बना
वे स्वयं नह खाते थे। भ क्त यहाँ कमकाण्ड नह , दै नक जीवन का नयम है। इसी नयम का पालन उस दन भी हुआ
जब रोट कुत्ता ले भागा।

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प्र.1 (अ त रक्तः – २) शुनकस्य ाने आ वभूतः पाण्डु रङ्गः नामदे वं कम् उक्तवान् ? (पाठाधा रतः अ त रक्तः प्रश्नः)

पाण्डु रङ्गः नामदे वम् उक्तवान् — ‘वत्स नामदे व ! उत्तीणः भवान् परीक्षाम्। ‘‘ईश्वरः सवषु भूतेषु नवस त’’ इ त गुरूपदे शं न
केवलं भवान् श्रुतवान् अ प तु अनुपा लतवान्। सुतरां धन्यो भवान्।’ ( हन्द — पाण्डु रङ्ग ने नामदे व से कहा — ‘बेटा नामदे व!
तुम परीक्षा म उत्तीण हुए। ‘ईश्वर सब प्रा णय म बसता है’ — इस गुरु-उपदे श को तुमने केवल सुना ही नह , अ पतु उसका पालन भी
कया। इस लए तुम धन्य हो।’)

‘परीक्षा’ शब्द पर ध्यान द जए: कुत्ते का रोट ले भागना दुघटना नह , परीक्षा थी — और परीक्षा भोजन क नह ,
दृ ष्ट क थी : क्या नामदे व कुत्ते म भी वही ईश्वर दे ख पाएँगे जसक मू त के सामने वे प्राथना कर रहे थे ? उन्ह ने कुत्ते
को ‘हे दे व!’ कहकर पुकारा — यही उनका उत्तीण होना है।

व्याकरण: ‘उत्तीणः भवान् परीक्षाम्’ — ‘परीक्षाम्’ तीया म है, क्य क ‘उत्तीण’ (उत् + √तॄ) कमवाची क्रया-
वशेषण है — ‘परीक्षा को पार कर गए’। ‘भवान्’ आदराथक प्रथमपुरुष है, अतः क्रया भी प्रथमपुरुष एकवचन म
आती है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 31
प्रश्न २ — अधो ल खता न वाक्या न भूतकालेन प रवत्य पुनः लखत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.2 (यथा) यथा — नामदे वः ा लकां स्वीकृत्य म न्दरं गच्छ त। → नामदे वः ा लकां स्वीकृत्य म न्दरं गतवान्।

यह प्रश्न ‘लट् -लकार → क्तवतु-प्रत्ययान्त भूतकाल’ का अभ्यास है। ( हन्द — वतमानका लक क्रया को क्तवतु-प्रत्यय वाले
भूतका लक रूप म बदलना है।)

पिरवतनस्य िनयमः —

१. िक्रयापदस्य धातुं िनष्कासयत (गच्छित → √गम्)।
२. तस्मात् क्तवतु-पत्ययान्तं रूपं रचयत (√गम् + क्तवत ु → गतवत्)।

३. तत् रूपं कत ःु िलङ् गे, वचने , पथमायां िवभ क्तौ योजयत —

पुं. ए.व. → गतवान् · पुं. ि .व. → गतवन्तौ · पुं. ब.व. → गतवन्तः

स्त्री. ए.व. → गतवती · स्त्री. ब.व. → गतवत्यः

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क्तवतु क्य , लङ् क्य नह : संस्कृत म भूतकाल लङ् -लकार (अगच्छत्) से भी बनता है, पर क्तवतु-रूप कता के
लङ्ग और वचन दखाता है — ‘गतवती’ से पता चल जाता है क कता स्त्री है। पूरा पाठ इसी शैली म लखा गया है,
इसी लए यही अभ्यास कराया जा रहा है।

ध्यान द: केवल मुख्य क्रया बदलती है। ‘स्वीकृत्य’ (ल्यबन्त) अव्यय है, वह अप रव तत रहता है — यही बात
‘ नमील्य’, ‘आदाय’, ‘गृहीत्वा’ पर भी लागू है।

प्र.2 (क) नैवेद्यं वग्रहस्य पुरतः ापय त।

नैवेद्यं वग्रहस्य पुरतः ा पतवान्। ( हन्द — नैवेद्य को मू त के सामने रख दया।)

स्थापयित → √स्था (िणच्) + क्तवत ु = स्थािपतवत् → पुं. प. ए.व. = स्थािपतवान्

कता कौन: यह वाक्य नामदे व के वषय म है (‘एकदा सः नैवेद्य ा लकां गृहीत्वा वग्रहस्य पुरतः ा पतवान्’),
अतः कता पुं लङ्ग एकवचन — रूप ‘ ा पतवान्’। य द कता स्त्री होती तो ‘ ा पतवती’ आता।

‘पुरतः’ का प्रयोग: ‘पुरतः’ (सामने) के योग म षष्ठी होती है — इसी लए ‘ वग्रहस्य पुरतः’। यह भी एक
उपपद वभ क्त ही है।

प्र.2 (ख) नेत्रे नमील्य प्राथनायाः आरम्भं करो त।

नेत्रे नमील्य प्राथनायाः आरम्भं कृतवान्। ( हन्द — आँख मूँदकर प्राथना का आरम्भ कया।)

करोित → √कृ + क्तवत ु = कृ तवत् → पुं. प. ए.व. = कृ तवान्

ध्यान द: ‘ नमील्य’ ल्यबन्त अव्यय है — भूतकाल म बदलने पर भी वही रहेगा। ‘नेत्रे’ नपुंसक लङ्ग द्ववचन है (दो
आँख) — यह भी नह बदलता। बदलती है केवल अ न्तम क्रया।

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गुरुः वसोबा तम् अध्यापय त।
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प्र.2 (ग)

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a वसोबा तम् अध्या पतवान्। ( हन्द — गुरु वसोबा ने उसे पढ़ाया।)

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अध्यापयित → अिध + √इ (िणच् = अध्यापय्) + क्तवत ु = अध्यािपतवत् → पुं. प. ए.व. = अध्यािपतवान्
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णजन्त धातु: ‘अ ध + √इ’ का अथ है ‘पढ़ना’; उसम णच् (प्रेरणाथक) जोड़ने पर अथ हो जाता है ‘पढ़ाना’। पाठ
म ठ क यही रूप आया है — ‘ वसोबा तम् अध्या पतवान्’।
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m अहं शृणो म। a g
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com— मने सुना। / मने (स्त्री ने) सुना।) agl

अहं श्रुतवान्। (य द कता स्त्री हो तो — अहं श्रुतवती।) (.हन्द
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शणोिम → √श्रु + क्तवत ु = श्र त
ृ ु वत्

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पुं. प. ए.व. → श्र त
ु वान् · स्त्री. प. ए.व. → श्र त
ु वती
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s m दे ने योग्य बात: ‘अहम्’ शब्द से कता का लङ्ग पता नह चलता — इसी लए दोन रूप शुद्ध ह। पाठ म माधवी
eध्यान
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gl कहती है — ‘अहं श्रुतवती यत् …’, और क पल कहता है — ‘अद्य अहं ातवान् …’। दोन उदाहरण साथ रखने से
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भेद स्पष्ट हो जाता है।
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Tip: उत्तरपु स्तका म य द आप छात्रा ह तो ‘श्रुतवती’ लखना अ धक स्वाभा वक है — क्तवतु-रूप कता के लङ्ग
का अनुसरण करता है, क्रया का नह ।

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m सत्पुरुषाः स्वकतृत्वेन जन्म साथकं कुव न्त। as e
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प्र.2 (ङ)

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सत्पुरुषाः स्वकतृत्वेन जन्म साथकं कृतवन्तः। ( हन्द — सत्पुरुष ने अपने कतृत्व से जन्म साथक कया।)

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कु विन्त → √कृ + क्तवत ु = कृ तवत् → पुं. प. बहवु चनम् = कृ तवन्तः
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वचन का ध्यान: कता ‘सत्पुरुषाः’ बहुवचन है, अतः क्रया भी बहुवचन म — ‘कृतवान्’ लखना अशुद्ध होगा। पाठ
म यही वाक्य है — ‘बहवः सत्पुरुषाः स्वीयकतृत्वेन जन्म साथकं कृतवन्तः।’

समास: स्वीयं कतृत्वम् = स्वीयकतृत्वम् (कमधारयः); तृतीया एकवचन म ‘स्वीयकतृत्वेन’ — यही अभ्यास प्रश्न ८
(झ) का उत्तर है।

प्र.2 (च) नामदे वः शुनकस्य पृष्ठे अनुधाव त।

नामदे वः शुनकस्य पृष्ठे अनुधा वतवान्। ( हन्द — नामदे व कुत्ते के पीछे दौड़े।)

अनुधावित → अनु + √धाव् + क्तवत ु = अनुधािवतवत् → पुं. प. ए.व. = अन ध
ु ािवतवान्

उपसग नह हटता: क्तवतु-रूप बनाते समय उपसग (अनु) धातु के साथ ही रहता है — ‘धा वतवान्’ नह ,
‘अनुधा वतवान्’। ‘धा वतवान्’ का अथ केवल ‘दौड़ा’ होगा, जब क ‘अनुधा वतवान्’ = ‘पीछे -पीछे दौड़ा’ — यही
यहाँ अभीष्ट है।

शब्दाथ-ता लका से मेल: पुस्तक क ता लका म यही शब्द पहली पङ् क्त म है — ‘अनुधा वतवान् (अनु + √धाव् +
क्तवतु, पुं.प्र.ए.व.) — पृष्ठतः अधावत् — पीछे दौड़ा — Chased’।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 31–32
प्रश्न ३ — अधो ल खता न कथना न कः/का — कं/कां प्र त कथय त इ त लखत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.3 (यथा) यथा — ‘हे दे व ! शुष्कां रो टकां न खादतु घृतम प स्वीकरोतु।’ → नामदे वः — शुनकम्

यह प्रश्न कथन का वक्ता (कः/का) तथा श्रोता (कं/कां) पहचानने का है। ( हन्द — कौन बोल रहा है और कससे बोल रहा है,
यह बताना है।)

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उत्तर िलखने का ढाँच ा —

वक्ता → पथमा िवभिक्त (कः / का)

श्रोता → ि तीया िवभिक्त (कं / कां) — यतः ‘पित’ शब्दस्य योगे ि तीया भवित

उदाहरण क व्याख्या: ‘हे दे व! शुष्कां रो टकां मा खादतु, घृतम् अ प स्वीकरोतु’ — यह वाक्य नामदे व ने भागते हुए
कुत्ते से कहा था। ध्यान द जए क उन्ह ने कुत्ते को ‘हे दे व’ कहकर पुकारा — यही पूरे पाठ का सार है, और इसी लए
पुस्तक ने यही वाक्य उदाहरण के लए चुना है।

ध्यान द: श्रोता का नाम सदा द्वतीया म ल खए — ‘शुनकः’ नह , ‘शुनकम्’; ‘मातामही’ नह , ‘मातामहीम्’।

प्र.3 (क) कथां श्रोतुम् इच्छतः वा ?

मातामही — क पलं माधव च (उभौ बालकौ) ( हन्द — नानी — क पल और माधवी से।)

कैसे पहचाना: पूरा वाक्य है — ‘वत्सौ, अधुना क्र डया अलम्। कथां श्रोतुम् इच्छतः वा?’ — क्रया ‘इच्छतः’
मध्यमपुरुष का नह , प्रथमपुरुष द्ववचन रूप है और सम्बोधन ‘वत्सौ’ वचन है — अथात् सुनने वाले दो ह।
सम्बोधन ‘वत्सौ’ मातामही ही करती ह।

प्र.3 (ख) अहं श्रुतवती यत् तस्य क तने स्वयं दे वः पाण्डु रङ्गः नृत्यं कृतवान् इ त।

माधवी — मातामहीम् ( हन्द — माधवी — नानी से।)

नणायक सङ् केत: ‘श्रुतवती’ — क्तवतु का स्त्री लङ्ग रूप है, अतः वक्ता स्त्री ही होगी। संवाद म उस समय दो
स्त्रयाँ ह — मातामही और माधवी। कन्तु यह उत्तर मातामही के प्रश्न ‘ क भवन्तौ महात्मानं नामदे वं जानीतः?’ का
है, अतः वक्ता माधवी और श्रोता मातामही।

Tip: इस प्रकार के प्रश्न म सबसे पहले क्रया का लङ्ग-वचन दे खए — वही आधा उत्तर दे दे ता है।

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प्र.3 (ग) क दे वेन सह अ प मत्रता सम्भव त ?

क पलः — मातामहीम् ( हन्द — क पल — नानी से।)

सन्दभ: माधवी पूछती है — ‘ क सत्यमेव नामदे वस्य मत्रम् आसीत् पाण्डु रङ्गः?’ और उसके तुरन्त बाद क पल
अपना सन्दे ह जोड़ता है — ‘ क दे वेन सह अ प मत्रता सम्भव त?’ दोन प्रश्न मातामही से ही पूछे गए ह, क्य क
कथा वही सुना रही ह।

व्याकरण: ‘दे वेन सह’ — सह-योगे तृतीया वभ क्तः।

प्र.3 (घ) अतः तस्य सवात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु।

(गुरुः) वसोबा — नामदे वम् ( हन्द — गुरु वसोबा — नामदे व से।)

सन्दभ: मातामही उद्धरण दे कर कहती है — ‘तस्य गुरुः आसीत् वसोबा। वसोबा तम् अध्या पतवान् यत् ‘‘ईश्वरः न
केवलं म न्दरे भव त … अतः तस्य सवात्मकस्य ईश्वरस्य पूजनं कुरु’’ इ त।’ — अथात् यह वाक्य कथा के भीतर क
कथा है : बोलने वाले गुरु वसोबा ह, सुनने वाले नामदे व।

ध्यान द: ‘कुरु’ लोट् -लकार, मध्यमपुरुष एकवचन है — अथात् आदे श एक ही व्य क्त को दया गया है, गुरु का
शष्य को।

प्र.3 (ङ) नैवेद्यं गृह्यतां दे व भ क्तं मे ह्यचलां कुरु।

नामदे वः — पाण्डु रङ्गम् (दे वं वग्रहरू पणम्) ( हन्द — नामदे व — भगवान् पाण्डु रङ्ग से।)

सन्दभ: ‘एकदा सः नैवेद्य ा लकां गृहीत्वा वग्रहस्य पुरतः ा पतवान्। नेत्रे नमील्य प्राथनां कृतवान् —’ इसके बाद
यही ोक आता है। सम्बोधन ‘दे व’ (हे दे व!) स्वयं बता दे ता है क श्रोता भगवान् ह।

व्याकरण: ‘गृह्यताम्’ तथा ‘प्र तगृह्यताम्’ कमवाच्य लोट् -लकार के रूप ह (‘ग्रहण कया जाए’) — प्राथना म
वनम्रता दखाने के लए कमवाच्य का प्रयोग होता है।

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प्र.3 (च) धक् शुनकम्।

क पलः — मातामहीम् (शुनकं प्र त नन्दां प्रकटयन्) ( हन्द — क पल — नानी से (कुत्ते क नन्दा करते हुए)।)

दो बात अलग-अलग ह: नन्दा कुत्ते क है, पर वाक्य मातामही से कहा गया है — पूरा कथन है : ‘ धक् शुनकम्!
माताम ह! पश्यतु, शुनकाः दुष्टाः एव भव न्त।’ सम्बोधन ‘माताम ह’ स्पष्ट कर दे ता है क श्रोता कौन है। अतः उत्तर —
क पलः — मातामहीम्।

व्याकरण: ‘ धक्’ नन्दावाचक अव्यय है; धक्-योगे द्वतीया वभ क्तः — इसी लए ‘शुनकः’ नह , ‘शुनकम्’।

प्र.3 (छ) नामदे वस्य कयत् दुःखं जातं स्यात् खलु ?

माधवी — क पलम् ( ातरम्) ( हन्द — माधवी — अपने भाई क पल से।)

नणायक सङ् केत: पूरा कथन है — ‘सत्यं भ्रातः! नामदे वस्य कयत् दुःखं जातं स्यात् खलु।’ सम्बोधन ‘भ्रातः’ (हे
भाई!) सीधे बता दे ता है क माधवी अपने भाई क पल से बोल रही है, मातामही से नह ।

ध्यान द: इस पूरे प्रश्न म यही एकमात्र कथन है जो एक बालक दूसरे बालक से कहता है — शेष सब संवाद मातामही
से जुड़े ह। सम्बोधन-पद ही उत्तर क कुंजी है।

प्र.3 (ज) क घृतपात्रम् आधृत्य ?

उभौ (क पलः माधवी च) — मातामहीम् ( हन्द — दोन (क पल और माधवी) — नानी से।)

पाठ का सङ् केत: वक्ता के ान पर पुस्तक म ‘उभाव प’ लखा है और कोष्ठक म रङ्गसङ् केत — (साश्चयम् उच्चैः)
— अथात् दोन एक साथ आश्चय से ज़ोर से बोल उठे । इस लए वक्ता एक नह , दो ह।

Tip: उत्तर म ‘उभौ’ या ‘क पलः माधवी च’ — दोन म से कुछ भी लख सकते ह, पर वचन का बोध अवश्य
रहना चा हए।

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अद्य अहं ातवान् यत् सवषु ईश्वरः नवस त इ त।
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प्र.3 (झ)

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agl — मातामहीम् ( हन्द — क पल — नानी से।)
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नणायक सङ् केत: ‘ ातवान्’ क्तवतु का पुं लङ्ग रूप है, अतः वक्ता पुरुष — क पल। और कथन का आरम्भ ही

s e m मातामही।
‘माताम ह! अहं प्रमादं कृतवान्’ से होता है, अतः श्रोता
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भाव: यह वाक्य क पल के हृदय-प रवतन क घोषणा है — कथा सुनकर वह वही बात जान लेता है जो नामदे व ने

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गुरु से सीखी थी। पूरी कथा का प्रभाव इसी एक वाक्य म दखता है।

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a glप्र.3 (ञ) उत्तीणः भवान् परीक्षाम्।
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पाण्डु रङ्गः (दे वः) — नामदे वम् ( हन्द — भगवान् पाण्डु रङ्ग — नामदे व से।)

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सन्दभ: ‘धावन् शुनकः अदृश्यः जातः। तस्य ाने पाण्डु रङ्गः आ वभूतः। स नामदे वम् उक्तवान् — ‘‘वत्स नामदे व!

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उत्तीणः भवान् परीक्षाम्।’’’ — सम्बोधन म ही श्रोता का नाम है।

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m .c ‘भवान्’ आदरसूचक सवनाम है और प्रथमपुरुष म चलता है — इसीagलए ‘उत्तीणः भवान्’, ‘उत्तीणः
aseत्वम्’ नह । भगवान् भी भक्त को आदर से सम्बो धत करते ह — यही इस मत्रता क मठास है।
व्याकरण:

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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 32sem
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प्रश्न ४ — रेखाङ् कतपदा न आधृत्य प्रश्न नमाणं कुरुत agl

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अभ्यासाद् जायते स द्धः

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यथा — पाण्डु रङ्गः नामदे वस्य मत्रम् आसीत्। → पाण्डु रङ्गः कस्य मत्रम् आसीत् ?l
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प्र.4 (यथा)

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प्रश्न नमाण का नयम — रेखाङ् कत पद जस वभ क्त, लङ्ग तथा वचन म है, प्रश्नवाचक शब्द भी ठ क उसी वभ क्त,

m . co agl
लङ्ग और वचन म र खए; शेष वाक्य ज्य का त्य रहेगा।

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रेखाङ् कतं पदम् वभ क्तः प्रश्नवाचकः शब्दः

व्यिक्तवाचकः कत (पुं.) प्रथमा कः

व्यिक्तवाचकः कत (स्त्री.) प्रथमा का

कम (पुं. / स्त्री.) तीया कम् / काम्

सम्बन्धः षष्ठी क स्य / क स्याः

अिधकरणम् (ब.व.) सप्तमी के षु / कासु

उदाहरण क जाँच: ‘नामदे वस्य’ पुं लङ्ग षष्ठी एकवचन है, अतः उसका प्रश्नवाचक भी षष्ठी एकवचन — ‘कस्य’।
बाक वाक्य ‘पाण्डु रङ्गः … मत्रम् आसीत्’ बलकुल नह बदला — केवल अन्त म प्रश्न चह्न लगा।

प्र.4 (क) दे वः नामदे वं प रतः भव त स्म।

दे वः कं प रतः भव त स्म ? ( हन्द — भगवान् कसके चार ओर रहते थे?)

नामदे वम् → पुंिलङ् गम्, ि तीया िवभिक्तः, एकवचनम् (पिरतः-योगे ि तीया)

अतः पश्नवाचकः → कम्

क्य ‘कम्’, ‘कः’ नह : ‘नामदे वम्’ यहाँ कता नह है — कता ‘दे वः’ है। ‘नामदे वम्’ ‘प रतः’ के कारण तीया म
आया है, अतः प्रश्नवाचक भी तीया म ही आएगा।

प्र.4 (ख) ईश्वरः सवषु भूतेषु नवस त।

ईश्वरः केषु नवस त ? ( हन्द — ईश्वर कनम नवास करता है?)

सवषु भूते ष ु → नपुंसकिलङ् गम्, सप्त मी िवभिक्तः, बहुवचनम् (अिधकरणे सप्तमी)

अतः पश्नवाचकः → के षु

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ध्यान द: ‘केषु’ एकवचन ‘क स्मन्’ का बहुवचन है। रेखाङ् कत पद बहुवचन म है, इस लए ‘क स्मन्’ लखना अशुद्ध
होगा। ‘भूत’ शब्द नपुंसक लङ्ग है — पर सप्तमी बहुवचन म पुं लङ्ग और नपुंसक लङ्ग दोन का रूप ‘केषु’ ही होता
है।

प्र.4 (ग) शुनकः आगत्य मुखे रो टकां धृत्वा धा वतवान्।

शुनकः आगत्य मुखे कां धृत्वा धा वतवान् ? ( हन्द — कुत्ता आकर मुँह म क्या ( कसको) लेकर भागा?)

रोिटकाम् → स्त्रीिलङ् गम्, ि तीया िवभिक्तः, एकवचनम् (कमिण ि तीया)

अतः पश्नवाचकः → काम्

लङ्ग का ध्यान: ‘रो टका’ आकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द है, इसी लए ‘ कम्’ या ‘कम्’ नह , ‘काम्’ आएगा। संस्कृत म
प्रश्नवाचक शब्द भी वशेष्य के लङ्ग का अनुसरण करता है — हन्द क तरह एक ही ‘क्या’ नह चलता।

प्र.4 (घ) शुनकस्य ाने पाण्डु रङ्गः आ वभूतवान्।

शुनकस्य ाने कः आ वभूतवान् ? ( हन्द — कुत्ते के ान पर कौन प्रकट हुआ?)

पाण्डुरङ् गः → पुंिलङ् गम्, पथमा िवभिक्तः, एकवचनम् (कतिर पथमा)

अतः पश्नवाचकः → कः

क्य प्रथमा: ‘आ वभूतवान्’ अकमक क्रया है और उसका कता ‘पाण्डु रङ्गः’ है — कता सदा प्रथमा म रहता है
(‘कत र प्रथमा’)। अतः प्रश्नवाचक भी प्रथमा म — ‘कः’।

प्र.4 (ङ) आत्मवत् सवभूतेषु यः पश्य त स प ण्डतः।

आत्मवत् सवभूतेषु यः पश्य त सः कः ? ( हन्द — जो सब प्रा णय को अपने समान दे खता है, वह कौन (कैसा) है?)

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पिण्डतः → पुंिलङ् गम्, पथमा िवभिक्तः, एकवचनम् (िवधेय-िवशेषणम्)

अतः पश्नवाचकः → कः (अथवा ‘कीदृ शः’ अिप साधुः)

दो उत्तर सम्भव ह: य द ‘प ण्डतः’ को सं ा माना जाए तो प्रश्न होगा ‘सः कः?’; य द उसे वशेषण (कैसा व्य क्त)
माना जाए तो ‘सः क दृशः?’ भी शुद्ध है। परीक्षा म दोन म से कोई भी स्वीकाय है — ‘कः’ अ धक सीधा है।

‘आत्मवत्’ का वग्रह: आत्मनः इव = आत्मवत् — ‘व त’ प्रत्यय से बना अव्यय, अथ ‘अपने समान’। यही पाठ का
शीषक-पद है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 33
प्रश्न ५ — घटनाक्रमानुसारं लखत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.5 घटनाक्रमानुसारं लखत — (क) नामदे वः मन्त्रम् उच्चाय श्रद्धया प्रणम्य नेत्रे उ ा टतवान्। (ख) नामदे वः घृतपात्रम्
आधृत्य अनुधा वतवान्। (ग) नामदे वः नैवेद्य ा लकां वग्रहस्य पुरतः ा पतवान्। (घ) शुनकः शुष्करो टकाम्
अपहृत्य पला यतवान्। (ङ) शुनकस्य ाने पाण्डु रङ्गः आ वभूतवान्। (च) नामदे वः म न्दरं गतवान्।

शुद्धः घटनाक्रमः — (च) → (ग) → (क) → (घ) → (ख) → (ङ)

क्रमः पुस्तकस्य वणः घटना हन्द

१. (च) नामदे वः म न्दरं गतवान्। नामदे व म न्दर गए।

२. (ग ) नामदे वः नैवेद्य ा लकां वग्रहस्य पुरतः ा पतवान्। नैवेद्य क थाली मू त के सामने रखी।

३. (क ) नामदे वः मन्त्रम् उच्चाय श्रद्धया प्रणम्य नेत्रे उ ा टतवान्। मन्त्र बोलकर, प्रणाम करके आँख खोल ।

४. (घ ) शुनकः शुष्करो टकाम् अपहृत्य पला यतवान्। कुत्ता सूखी रोट लेकर भाग गया।

५. (ख) नामदे वः घृतपात्रम् आधृत्य अनुधा वतवान्। नामदे व घी का पात्र लेकर पीछे दौड़े।

६. (ङ) शुनकस्य ाने पाण्डु रङ्गः आ वभूतवान्। कुत्ते के ान पर पाण्डु रङ्ग प्रकट हुए।

क्रम कैसे तय कया: पहचान का सूत्र है कारण-काय शृङ् खला — म न्दर पहुँचे तभी थाली रख सके; थाली रखी
तभी प्राथना क ; आँख खोल तभी पता चला क रोट नह है (अथात् कुत्ता उससे पहले ही ले जा चुका था, पर कथा
म वह घटना यह खुलती है); रोट गई तभी पीछे दौड़े; दौड़े तभी भगवान् प्रकट हुए।

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ध्यान द (घ) क त: कुत्ता रोट उस समय ले गया जब नामदे व आँख मूँदे प्राथना कर रहे थे। कन्तु कथा म यह
बात (क) के बाद ही प्रकट होती है — ‘पुरतः तायां ा लकायां रो टका नासीत्’। इस लए कथा-क्रम म (घ) को
(क) के बाद ही रखा जाता है। यही पुस्तक क कथन-शैली है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 33
प्रश्न ६ — कोष्ठकेषु दत्तानां पदानाम् उ चतां वभ क्तं योज यत्वा अनुच्छेदं पूरयत (आगच्छन्तु, पायसं कुमः)

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.6 कोष्ठकेषु दत्तानां पदानाम् उ चतां वभ क्तं योज यत्वा अनुच्छेदं पूरयत — “आगच्छन्तु, पायसं कुमः। ………
(क्षीर) सह तण्डु लाः पक्वाः। ……… (शकरा) वना कथं शक्यते। शीघ्रमेव ……… (आपण) प्र त गत्वा शकराम्
आनयतु। ……… (आपण) नकषा वाहना न तष्ठ न्त। शकरा महानसे ा पता। ……… (शकरा) प रतः
पपी लकाः आगताः। पपी लकाः अपनीय पायसे शकरा यो जता। ……… (मधुर) वना पायसं रु चकरं न भव त।
अधुना ……… (पायस) प रतः बालक-बा लकावृन्दं तष्ठ त। धक् ……… (अन्ये मधुरपदाथाः) इ त एकः वद त,
……… (तत्) वना जीवनम् अपूणम् इ त अपरः। ……… (पायस) सह एव भोजनं सरसम् इ त अन्यः। तेषां
वचना न श्रुत्वा पायसं यच्छन्त्याः अम्बायाः मुखे मन्दहासः वलस त।”

पू रतः अनुच्छेदः —

आगच्छन्त ,ु पायसं कु मः। क्षीरेण सह तण्डुलाः पक्वाः। शक राम् िवना कथं शक्यते । शीघमेव आपणं पित गत्वा

ु आपणं िनकषा वाहनािन ितष्ठिन्त। शक रा महानसे स्थािपता। शक राम् पिरतः िपपीिलकाः
शक राम् आनयत ।

आगताः। िपपीिलकाः अपनीय पायसे शक रा योिजता। मधुरम् िवना पायसं रुिचकरं न भवित। अधुन ा पायसं

पिरतः बालक-बािलकावृन्दं ितष्ठित। िधक् अन्यान् मधुरपदाथ न् इित एकः वदित, तत् िवना जीवनम् अपूणम् इित
अपरः। पायसेन सह एव भोजनं सरसम् इित अन्यः। ते षां वचनािन श्रुत्वा पायसं यच्छन्त्याः अम्बायाः मुखे मन्दहासः

िवलसित।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः
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रक्त ानम् कोष्ठक ं पदम् उपपदम् नयमः उत्तरम्

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१ क्षीर सह सह-योगे तृतीया

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२ शकरा वना वना-योगे तीया / तृतीया / पञ्चमी शक राम् (वा शक रया / शक रातः)

३ आपण प्र त प्र त-योगे तीया आपणम्

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seप रतः-योगे तीया
४ आपण नकषा नकषा-योगे आपणम्

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५ शकरा
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प रतः शक राम्

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६ मधुर वना वना-योगे तीया / तृतीया / पञ्चमी मध रु म् (वा मध रु े ण / मध रु ात्)

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७ पायस प रतः प रतः-योगे तीया पायसम्

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८ अन्ये मधुरपदाथाः धक् धक्-योगे तीया अन्यान् मध रु पदाथ न्

agl९ तत् वना वना-योगे तीया / तृतीया / पञ्चमी तत् (वा तेन / तस्मात्)

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१० पायस सह सह-योगे तृतीया पायसे न

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अनुच्छेदस्य हन्द अथः — आइए, खीर बनाते ह। दूध के साथ चावल पक गए। शक्कर के बना यह कैसे सम्भव होगा? जल्द ही
बाज़ार जाकर शक्कर ले आइए। बाज़ार के पास वाहन खड़े ह। शक्कर रसोई म रख द गई। शक्कर के चार ओर च टयाँ आ गईं।

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च टयाँ हटाकर खीर म शक्कर मला द गई। मीठे के बना खीर स्वा दष्ट नह होती। अब खीर के चार ओर लड़के-लड़ कय का

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झुण्ड खड़ा है। ‘बाक मठाइय को धक्कार है’ — एक कहता है; ‘उसके बना जीवन अधूरा है’ — दूसरा कहता है; ‘खीर के साथ

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ही भोजन रसीला होता है’ — तीसरा कहता है। उनक बात सुनकर खीर परोसती हुई माँ के मुख पर मुस्कान खल उठती है।

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क कुंजी: यहाँ वभ क्त कारक से नह , पास खड़े शब्द से तय हो रही है — यही ‘उपपद वभ क्त’ का पूरा
मम है। ‘आपण’ शब्द अनुच्छेद म दो बार आया है और दोन बार द्वतीया म — एक बार ‘प्र त’ के कारण, दूसरी

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बार ‘ नकषा’ के कारण। य द उपपद न होता तो ‘आपणे’ (सप्तमी) आता।
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‘ वना’ वाले तीन ान पर सावधानी: तीन म से कसी भी एक वभ क्त का प्रयोग शुद्ध है, पर एक ही उत्तर
ल खए, तीन एक साथ नह । सबसे प्रच लत प्रयोग तीया का है — शकराम् वना, मधुरं वना, तद् वना।

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प्रश्न ७ — अनुच्छेदे ूलाक्षरेण दत्तानां क्रयापदानां ाने उ चतं क्तवतुप्रत्ययान्तरूपं योज यत्वा पुनः लखत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.7 अनुच्छेदे ूलाक्षरेण दत्तानां क्रयापदानां ाने उ चतं क्तवतुप्रत्ययान्तरूपं योज यत्वा पुनः लखत — “क ञ्चत्
ग्रामं नकषा एका नद आसीत्। नद सवदा स्वच्छजलम् अददात्। जनाः तस्याः जलं पीत्वा सुखेन अजीवन्। एकः
कृषकः तेन जलेन सवदा कृ षम् अकरोत्। कालान्तरम् अन्ये कृषकाः अ प तेन जलेन क्षेत्रसेचनम् अकुवन्। म हलाः
पवसमये नद म् अपूजयन्। एकवारं क श्चत् प रवारः नद्यां मा लन्या न अ क्षपत्। क्रमशः अन्ये अ प अ क्षपन्। तेन
नद म लना अभवत्, मीनाः अ यन्त। स्त्रयः रोगैः पी डताः अभवन्। तदा एका श क्षता बा लका जलस्य महत्त्वं
सवान् अवदत्। सा नद तीरम् आगत्य स्वयं वृक्षम् अरोपयत्। म हलाः अ प ततः प्रेरणां प्राप्य तस्याः साहाय्यम्
अकुवन्। सव ग्रामवा सनः म लत्वा नद म् अशोधयन्। पुनः नद स्वच्छा जाता नमलं जलं च अददात्। ततः
आरभ्य वष एकवारं जनाः नद म् अपूजयन् वृक्षारोपणं च अकुवन्।”

पुन ल खतः अनुच्छेदः —

किञ्चत् गामं िनकषा एका नदी आसीत्। नदी सवदा स्वच्छजलम् द त्तवती। जनाः तस्याः जलं पीत्वा सुखेन

जीिवतवन्तः। एकः कृ षकः ते न जलेन सवदा कृ िषम् कृ तवान्। कालान्तरम् अन्ये कृ षकाः अिप ते न जलेन
क्षेत्रसेच नम् कृ तवन्तः। मिहलाः पवसमये नदीम् पूिजतवत्यः। एकवारं किश्चत् पिरवारः नद्यां मािलन्यािन

िक्षप्त वान्। क्रमशः अन्ये अिप िक्षप्त वन्तः। ते न नदी मिलना अभवत्, मीनाः मृत वन्तः। िस्त्रयः रोगैः पीिडताः
भूत वत्यः। तदा एका िशिक्षता बािलका जलस्य महत्त्वं सव न् उक्तवती। सा नदीतीरम् आगत्य स्वयं वृक्षम्
रोिपतवती। मिहलाः अिप ततः पेरणां पाप्य तस्याः साहाय्यम् कृ तवत्यः। सव गामवािसनः िमिलत्वा नदीम्
शोिधतवन्तः। पुन ः नदी स्वच्छा जाता िनमलं जलं च द त्तवती। ततः आरभ्य वष एकवारं जनाः नदीम् पूिजतवन्तः
वृक्षारोपणं च कृ तवन्तः।

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क्र. ूलाक्षरं क्रयापदम् (लङ् ) कता लङ्गम् · वचनम् क्तवतु-रूपम्

१ अददात् नद स्त्री. · ए.व. द त्त वती

२ अजीवन् जनाः पुं. · ब.व. जीिवतवन्तः

३ अकरोत् एकः कृषकः पुं. · ए.व. कृ तवान्

४ अकुवन् अन्ये कृषकाः पुं. · ब.व. कृ तवन्तः

५ अपूजयन् म हलाः स्त्री. · ब.व. पूिजतवत्यः

६ अ क्षपत् क श्चत् प रवारः पुं. · ए.व. िक्षप्तवान्

७ अ क्षपन् अन्ये पुं. · ब.व. िक्षप्तवन्तः

८ अ म्रयन्त मीनाः पुं. · ब.व. म ृतवन्तः

९ अभवन् स्त्रयः स्त्री. · ब.व. भूतवत्यः

१० अवदत् एका श क्षता बा लका स्त्री. · ए.व. उ क्तवती (उिदतवती इत्यिप साध )ु

११ अरोपयत् सा (बा लका) स्त्री. · ए.व. रोिपतवती

१२ अकुवन् म हलाः स्त्री. · ब.व. कृ तवत्यः

१३ अशोधयन् सव ग्रामवा सनः पुं. · ब.व. शोिधतवन्तः

१४ अददात् नद स्त्री. · ए.व. द त्त वती

१५ अपूजयन् जनाः पुं. · ब.व. पूिजतवन्तः

१६ अकुवन् जनाः पुं. · ब.व. कृ तवन्तः

अनुच्छेदस्य हन्द अथः — कसी गाँव के पास एक नद थी। नद सदा स्वच्छ जल दे ती थी। लोग उसका जल पीकर सुख से जीते
थे। एक कसान उसी जल से सदा खेती करता था। कुछ समय बाद दूसरे कसान ने भी उसी जल से खेत क सचाई क । स्त्रयाँ पव
के समय नद क पूजा करती थ । एक बार कसी प रवार ने नद म गन्दगी फक । धीरे-धीरे दूसर ने भी फक । इससे नद मैली हो
गई, मछ लयाँ मर गईं। स्त्रयाँ रोग से पी ड़त हो गईं। तब एक पढ़ - लखी लड़क ने सबको जल का महत्त्व बताया। वह नद के
कनारे आकर स्वयं पेड़ लगाने लगी। स्त्रय ने भी उससे प्रेरणा पाकर उसक सहायता क । सब गाँववाल ने मलकर नद को साफ़
कया। फर नद स्वच्छ हो गई और नमल जल दे ने लगी। तब से वष म एक बार लोग नद क पूजा करते ह और वृक्षारोपण करते ह।

नयम — क्तवतु रूप कता के अनुसार बदलता है: लङ् -लकार का क्रयापद केवल पुरुष और वचन बताता है,
लङ्ग नह । क्तवतु-रूप लङ्ग भी बताता है। इसी लए ‘अपूजयन्’ के दो अलग-अलग उत्तर बने — ‘म हलाः …
पू जतवत्यः’ (स्त्री बहुवचन) पर ‘जनाः … पू जतवन्तः’ (पुं. बहुवचन)। इसी तरह ‘अकुवन्’ के तीन उत्तर —
कृतवन्तः / कृतवत्यः / कृतवन्तः। पहले कता दे खए, फर रूप चु नए।

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ध्यान द: ‘नद म लना अभवत्’ तथा ‘नद स्वच्छा जाता’ — ये मोटे अक्षर म नह ह, अतः इन्ह नह बदलना है।
परीक्षा म केवल ूलाक्षर वाले पद ही बदले जाते ह।

‘अवदत्’ पर टप्पणी: √वद् क नष्ठा ‘उ दत’ है, अतः शुद्ध रूप ‘उ दतवती’ बनता है; कन्तु प्रयोग म √वच् से बना
‘उक्तवती’ ही अ धक चलता है और पाठ म भी वही आया है — ‘स नामदे वम् उक्तवान्’। दोन म से कोई भी लखा
जा सकता है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 34
प्रश्न ८ — एतेषां समस्तपदा न पाठात् चत्वा लखत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.8 (यथा) यथा — महान् आत्मा, तेषां → महात्मनाम्

इस प्रश्न म वग्रह दया है और पाठ म से समस्तपद ढूँ ढ़कर लखना है — साथ ही जस वभ क्त का सङ् केत (तेषां, तत्,
तम्, तया, तेन) दया है, उसी वभ क्त म लखना है।

महान् आत्मा = महात्मा (कमधारयः)

‘ते षाम्’ इित सङ् के तात् → षष्ठी बहुवचनम् → महात्मनाम्
पाठे — ‘भारतदे शः बहून ां बह्मष णां महात्मनां च भूिमः।’

दो काम एक साथ: (१) समास बनाइए, (२) सङ् केत-शब्द के अनुसार वभ क्त लगाइए। ‘तेषाम्’ = षष्ठी बहुवचन,
‘तत्/तम्’ = तीया एकवचन, ‘तया’ = तृतीया एकवचन स्त्री लङ्ग, ‘तेन’ = तृतीया एकवचन। य द सङ् केत न दया
हो तो प्रथमा म ल खए।

प्र.8 (क) घृतस्य पात्रम्, तत्

घृतपात्रम् ( हन्द — घी का पात्र) — षष्ठीतत्पुरुषः; ‘तत्’ इ त सङ् केतात् नपुंसक लङ्गे तीया एकवचनम्।

समास क्य षष्ठीतत्पुरुष: वग्रह म ‘घृतस्य’ षष्ठी वभ क्त म है और वही लुप्त होकर समास बना — यही
षष्ठीतत्पुरुष का लक्षण है।

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पाठ का वाक्य: ‘न लगुडं, न पाषाणखण्डम्, अ प तु घृतपात्रं धृत्वा।’ तथा ‘… चन्तयन् घृतपात्रम् आदाय’।

प्र.8 (ख) पाषाणस्य खण्डः, तम्

पाषाणखण्डम् ( हन्द — पत्थर का टु कड़ा) — षष्ठीतत्पुरुषः; तीया एकवचनम्।

पाठ का वाक्य: ‘तं दृष्ट् वा पाषाणखण्डं हस्ते स्वीकृत्य तं मार यतुं धा वतवन्तौ।’ शब्दाथ-ता लका म भी यही शब्द है
— ‘पाषाणखण्डम् (पुं. .ए.व.) — शलाखण्डम् — पत्थर का टु कड़ा’।

प्र.8 (ग) प्रयः सुहृद्

प्रयसुहृद् ( हन्द — प्रय मत्र) — कमधारयः ( वशेषण-पूवपद कमधारय)।

कमधारय क्य : यहाँ ‘ प्रयः’ वशेषण है और ‘सुहृद्’ वशेष्य — दोन एक ही वभ क्त (प्रथमा) म ह। जब समास के
दोन पद समान वभ क्त म ह और एक दूसरे का वशेषण हो, तब कमधारय होता है, तत्पुरुष नह ।

पाठ का वाक्य: ‘दे वः पाण्डु रङ्गः नामदे वस्य प्रयसुहृद् आसीत्।’ (पुस्तक म स स हत — ‘ प्रयसुहृदासीत्’।)

प्र.8 (घ) उदरे वेदना

उदरवेदना ( हन्द — पेट का दद) — सप्तमीतत्पुरुषः।

सप्तमी क्य : वग्रह म ‘उदरे’ सप्तमी वभ क्त म है (अ धकरणे सप्तमी — ‘पेट म होने वाली पीड़ा’), और वही लुप्त
होकर समास बना।

पाठ का वाक्य: ‘य द शुनकः शुष्करो टकां खादे त् त ह तस्य उदरवेदना भवेत् इ त।’ — यही चन्ता नामदे व को
दौड़ाती है।

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स्वीयः व्यवहारः
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प्र.8 (ङ)

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स्वीयव्यवहारः ( हन्द — अपना व्यवहार) — कमधारयः।

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पाठ का वाक्य: ‘नामदे वमहाराजः स्वीयव्यवहारेण करुणायाः महान्तम् आदशम् उप ा पतवान्।’ (वहाँ तृतीया

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एकवचन म है — करणे तृतीया।)
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प्र.8 (च) जीवनस्य मूल्या न

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जीवनमूल्या न ( हन्द — जीवन-मूल्य) — षष्ठीतत्पुरुषः; नपुंसक लङ्गे प्रथमा बहुवचनम्।

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पाठ का वाक्य: ‘तेषां च रत्रेषु प्र तपदं भूतदया, समता, क्षमा, अ हसा, करुणा, ऋजुता, ब ुता चेत्याद न
जीवनमूल्या न प्राप्यन्ते।’
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मातुलस्य गृहम्, तत्
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प्र.8 (छ)

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पाठ का वाक्य: ‘क पलः माधवी च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ।’ यही अभ्यास प्रश्न १ (छ) का भी उत्तर है।
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प्र.8 (ज) नरेषु रत्ना न इव, तेषाम्

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m .c ( हन्द — नर-रत्न का, मनुष्य म रत्न के समान श्रेष्ठ पुरुष का) — उपagमतसमासः (कमधारयस्य भेदः); षष्ठी
se बहुवचनम्।
नररत्नानाम्
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उप मतसमास क्या है: जब उपमेय (नराः) पहले आए और उपमान (रत्ना न) बाद म, तथा ‘इव’ लुप्त हो जाए —
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तब उप मतसमास होता है। जैसे — पुरुषः व्या ः इव = पुरुषव्या ः। यह कमधारय समास का ही एक भेद है।

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पाठ का वाक्य: ‘अस्माकं भारतभू मः अनेकेषां नररत्नानां ब्रह्मष णां राजष णां च प्रस वत्री।’

प्र.8 (झ) स्वीयं कतृत्वम्, तेन

स्वीयकतृत्वेन ( हन्द — अपने कतृत्व से) — कमधारयः; तृतीया एकवचनम् (करणे तृतीया)।

पाठ का वाक्य: ‘बहवः सत्पुरुषाः स्वीयकतृत्वेन जन्म साथकं कृतवन्तः।’ अभ्यास प्रश्न २ (ङ) म यही वाक्य
‘स्वकतृत्वेन’ रूप म आया है — दोन शुद्ध ह।

प्र.8 (ञ) अपराधस्य भावना, तया

अपराधभावनया ( हन्द — अपराध-भावना से) — षष्ठीतत्पुरुषः; स्त्री लङ्गे तृतीया एकवचनम्।

पाठ का वाक्य: रङ्गसङ् केत म — (उभौ परस्परं पश्यतः। अपराधभावनया तयोः मुखे म्लाने आस्ताम्।) यही
अभ्यास प्रश्न १ (घ) का उत्तर भी है।

प्र.8 (ट) गुरोः उपदे शः, तम्

गुरूपदे शम् ( हन्द — गुरु का उपदे श) — षष्ठीतत्पुरुषः; तीया एकवचनम्।

सिन्धः — गुरु + उपदे शः → गुरूपदे शः

िनयमः : सवणदीघ-सिन्धः — उ + उ = ऊ (‘अकः सवण दीघः’)

पाठ का वाक्य: ‘‘‘ईश्वरः सवषु भूतेषु नवस त’’ इ त गुरूपदे शं न केवलं भवान् श्रुतवान् अ प तु अनुपा लतवान्।’
— यहाँ समास के साथ-साथ स भी परखी जा रही है, इस लए ‘गुरुउपदे शम्’ लखना अशुद्ध होगा।

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प्र.8 (ठ) दने दने

प्र त दनम् ( हन्द — प्र त दन, हर दन) — अव्ययीभावः।

अव्ययीभाव क्य : जस समास का पूवपद अव्यय हो और पूरा समस्तपद अव्यय बन जाए, वह अव्ययीभाव है।
‘प्र त’ अव्यय है और ‘प्र त दनम्’ के रूप नह चलते — वह सदा इसी रूप म रहता है। ‘वीप्सा’ (पुनरावृ त्त) के अथ
म ‘प्र त’ का यही प्रयोग होता है।

पाठ के वाक्य: ‘नामदे वः प्र त दनं पाण्डु रङ्गाय नैवेद्यं समप्य …’ तथा ‘नामदे वः प्र त दनम् अतीवश्रद्धया नष्ठया
भक्त्या च नैवेद्य ा लकाम् आदाय म न्दरं गच्छ त स्म।’

प्र.8 (ड) राजा ऋ षः इव, तेषाम्

राजष णाम् ( हन्द — राज षय का, ऋ ष के समान राजाओं का) — उप मतसमासः (कमधारयस्य भेदः); षष्ठी बहुवचनम्।

सिन्धः — राज + ऋिष → राजिष
िनयमः : गुणसिन्धः — अ + ऋ = अर् (‘आद् गण
ु ः’)

तथा च — बह्मन् + ऋिष → बह्मिष (उसी िनयम से)

पाठ का वाक्य: ‘अस्माकं भारतभू मः अनेकेषां नररत्नानां ब्रह्मष णां राजष णां च प्रस वत्री।’ — ध्यान द जए, इसी
एक वाक्य से इस प्रश्न के तीन उत्तर (ज, ड तथा शब्दाथ का ‘ब्रह्मष णाम्’) नकलते ह।

स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 35–36
क्तवतु-प्रत्ययान्तशब्दानां त्रषु लङ्गे षु रूपा ण · पाण्डु रङ्गः · वषयप्रबोधनम् ( ोकः)

स्वाध्यायान्मा प्रमदः

प्र.1 ‘क्तवतु’-प्रत्ययान्तशब्दानां पुं लङ्गे , स्त्री लङ्गे नपुंसक लङ्गे च रूपा ण लखत तथा तेषां प्रयोगं स्पष्टीकुरुत।

‘गतवत्’ (√गम् + क्तवतु) इ त शब्दस्य त्रषु लङ्गे षु सप्तसु वभ क्तषु त्रषु च वचनेषु रूपा ण —

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(क) पुं लङ्गम् — गतवान्

वभक्तयः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्

पथमा गतवान् गतवन्तौ गतवन्तः

ि तीया गतवन्तम् गतवन्तौ गतवतः

ततृ ीया गतवता गतवद् भ्याम् गतविद् भः

चतुथ गतवते गतवद् भ्याम् गतवद् भ्यः

पञ्चमी गतवतः गतवद् भ्याम् गतवद् भ्यः

षष्ठी गतवतः गतवतोः गतवताम्

सप्तमी गतवित गतवतोः गतवत्स ु

(ख) स्त्री लङ्गम् — गतवती (‘ङ प्’ प्रत्ययं योज यत्वा नद -वत् रूपा ण)

वभक्तयः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्

पथमा गतवती गतवत्यौ गतवत्यः

ि तीया गतवतीम् गतवत्यौ गतवतीः

ततृ ीया गतवत्या गतवतीभ्याम् गतवतीिभः

चतुथ गतवत्यै गतवतीभ्याम् गतवतीभ्यः

पञ्चमी गतवत्याः गतवतीभ्याम् गतवतीभ्यः

षष्ठी गतवत्याः गतवत्योः गतवतीनाम्

सप्तमी गतवत्याम् गतवत्योः गतवतीषु

(ग) नपुंसक लङ्गम् — गतवत्

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वभक्तयः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्

पथमा गतवत् गतवती गतविन्त

ि तीया गतवत् गतवती गतविन्त

ततृ ीया गतवता गतवद् भ्याम् गतविद् भः

चतुथ गतवते गतवद् भ्याम् गतवद् भ्यः

पञ्चमी गतवतः गतवद् भ्याम् गतवद् भ्यः

षष्ठी गतवतः गतवतोः गतवताम्

सप्तमी गतवित गतवतोः गतवत्स ु

तीन ता लकाओं क तुलना: ध्यान द जए — पुं लङ्ग और नपुंसक लङ्ग के रूप तृतीया से सप्तमी तक बलकुल
एक जैसे ह। भेद केवल प्रथमा और तीया म है (गतवान् / गतवन्तम् बनाम गतवत् / गतवत्)। नपुंसक लङ्ग क
वशेषता यह है क उसम प्रथमा और तीया के रूप सदा समान होते ह — यह हर नपुंसक लङ्ग शब्द पर लागू होता
है।

प्रयोग का सूत्र: क्तवतु-प्रत्ययान्त शब्द भूतकाल क क्रया के रूप म प्रयुक्त होता है और कता के लङ्ग-वचन के
अनुसार चलता है — बालकः गतवान् · बा लका गतवती · मत्रं गतवत् · बालकाः गतवन्तः · बा लकाः गतवत्यः। इसी
नयम से पाठ के सारे भूतका लक वाक्य बने ह, और अभ्यास के प्रश्न २ तथा ७ इसी क परीक्षा लेते ह।

प्र.2 ‘पाण्डु रङ्गः’ इ त अनुच्छेदस्य आधारेण पाण्डु रङ्गस्य वषये लखत।

पाण्डु रङ्गस्य एव वट्ठलः, वठोबा, पण्ढरीनाथः, वठु माऊली च इत्याद न बहू न नामा न स न्त। महाराष्ट्रस्य सोलापुरजनपदे
पण्ढरपुरम् इ त प्र सद्धं तीथक्षेत्रं वतते। तच्च चन्द्रभागानद्याः तीरे वराजमानम् अ स्त। वारकरीसम्प्रदायस्य आराध्यं दै वतम्
अ स्त पाण्डु रङ्गः। सः इ ष्टकायां समचरणः तः वतते। हस्तौ कट्यां सं ाप्य ‘भक्तानां रक्षणाथम् अहं सवदा कट बद्धः
अ स्म’ इ त सः भक्तान् सूचय त।
हन्द अथ — पाण्डु रङ्ग के ही वट्ठल, वठोबा, पण्ढरीनाथ और वठु माऊली आ द बहुत-से नाम ह। महाराष्ट्र के सोलापुर ज़ले म
पण्ढरपुर नाम का प्र सद्ध तीथक्षेत्र है, जो चन्द्रभागा नद के तट पर सुशो भत है। पाण्डु रङ्ग वारकरी सम्प्रदाय के आराध्य दे वता ह। वे
एक ईंट पर दोन पैर बराबर रखकर खड़े ह। दोन हाथ कमर पर रखकर वे भक्त को यह सू चत करते ह क ‘भक्त क रक्षा के लए
म सदा कमर कसे हुए हूँ।’

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बन्दुः ववरणम्

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अन्यािन नामािन
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िवट्ठलः, िवठोबा, पण् ढरीनाथः, िवठुम ाऊली
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g l a पण् ढरपुर म् (महारा स्य सोलापुर जनपदे )
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तीथक्षेत्र म्

नदी चन्द भागा

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वारकरीस म्पदायः
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सम्पदायः

इिष्टकायाg l a
िवग हस्य स्वरूपम्
aं समचरणः, हस्तौ कट ां संस्थाप्य िस्थतः
मुद ायाः अथः ‘भक्तानां र क्षणाथम् अहं सवदा कटीबद्धः’
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यह अनुच्छेद पाठ से कैसे जुड़ा है: कथा म बार-बार आने वाला नाम ‘पाण्डु रङ्गः’ वद्याथ के लए अप र चत हो
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a s emहै, इस लए पुस्तक यहाँ उसका प रचय दे ती है। ‘कट बद्धः’ शब्द वशेष रूप से ध्यान दे ने योग्य है — कमर पर
gl हाथ रखी मू त का अथ ही यह है क भगवान् भक्त क सहायता के लए तैयार खड़े ह। कथा म यही ‘तैयारी’ प्रत्यक्ष
सकता

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होती है, जब वे कुत्ते के ान पर प्रकट हो जाते ह।
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सन्त-परम्परा: नामदे व, ानेश्वर, एकनाथ, तुकाराम — ये सब वारकरी सम्प्रदाय के सन्त ह, जो प्र तवष आषाढ़ म
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पण्ढरपुर क ‘वारी’ (पदयात्रा) करते ह। नामदे व इस परम्परा के आर म्भक और सवा धक प्रय सन्त म ह।

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‘ वषयप्रबोधनम्’ इ त
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ोकद्वयस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ हन्द -अथ भावं च लखत — “नैवेद्यं गृह्यतां दे व

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प्र.3

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भ क्तं मे ह्यचलां कुरु। ई प्सतं मे वरं दे ह परत्र च परां ग तम्॥ शकराखण्डखाद्या न द धक्षीरघृता न च। आहारं

agl भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्र तगृह्यताम्॥”

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नै वेद्यं गृह्यतां दे व भिक्तं मे ह्यचलां कु रु।

ईिप्सतं मे वरं दे िह परत्र च परां गितम्॥ १॥
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शक राखण्डखाद्यािन दिधक्षीरघृत ािन च।
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m .coआहारं भक्ष्यभोज्यं च नै वेद्यं पितगृह्यताम्॥ २॥
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पदच्छे दः — नैवेद्यम् + गृह्यताम् + दे व + भ क्तम् + मे + ह + अचलाम् + कुरु। ई प्सतम् + मे + वरम् + दे ह + परत्र + च + पराम् +
ग तम्॥ शकरा-खण्ड-खाद्या न + द ध-क्षीर-घृता न + च। आहारम् + भक्ष्य-भोज्यम् + च + नैवेद्यम् + प्र तगृह्यताम्॥
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emवरं मे दे ह। परत्र च परां ग त दे ह।
अन्वयः (पुस्तकानुसारम्) — हे दे व ! नैवेद्यं गृह्यताम्। शकराखण्डखाद्या न द धक्षीरघृता न च आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं
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प्र तगृह्यताम्। भ क्तं ह अचलां मे कुरु। ई प्सतं

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पदम् अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ

नैवेद्य म् दे वाय समप यतुं न मतः पदाथः भगवान् को अिपत भोग

ग ृह्यताम् / पितग ृह्यताम् स्वी क्रयताम् (कमवाच्ये लोट् ) स्वीकार िकया जाए / गहण िकया जाए
अचलाम् राम्, दृढाम् अटल , अिडग

ईिप्सतम् अभीष्टम्, वा ञ्छतम् मनचाहा, इिच्छत

वरम् वरदानम् वरदान

परत्र परलोके परलोक में

परां गितम् उत्तमां ग तम्, मोक्षम् श्रेष्ठ गित, मोक्ष
शक राखण्डखाद्यािन शकराखण्डयुक्ता न खाद्या न शक्कर -िम श्री से बने खाद्य पदाथ

दिधक्षीरघ ृतािन द ध, क्षीरं, घृतं च दही, दू ध और घी

भक्ष्यभोज्यम् चवणीयं पेयं च चबाने और खाने योग्य पदाथ

हन्द अथ — हे दे व! यह नैवेद्य स्वीकार क जए। मेरी भ क्त को अटल बना द जए। मुझे मनचाहा वरदान द जए और परलोक म
श्रेष्ठ ग त द जए। शक्कर- मश्री से बने खाद्य पदाथ, दही-दूध-घी, तथा खाने-चबाने योग्य सब आहार — यह नैवेद्य ग्रहण क जए।

भावः: प्राथना म दो प्रकार क माँग ह, और उनका क्रम ध्यान दे ने योग्य है। भक्त पहले दे ता है (नैवेद्य), फर माँगता है
— और माँगता भी क्या ? पहली माँग है ‘भ क्तं अचलां कुरु’ — भ क्त र रहे; धन, यश या सुख नह । दूसरी माँग
‘परां ग तम्’ है, जो लौ कक नह , पारलौ कक है। अथात् नामदे व भोग चढ़ाकर बदले म भोग नह माँगते, भाव माँगते
ह। यही सच्ची भ क्त का लक्षण है — और यही र भ क्त उन्ह कुत्ते के पीछे घी लेकर दौड़ा दे ती है।

व्याकरण-सङ् केत: ‘गृह्यताम्’ और ‘प्र तगृह्यताम्’ कमवाच्य लोट् -लकार, प्रथमपुरुष एकवचन ह (√ग्रह् →
गृह्यते → गृह्यताम्)। प्राथना म प्रत्यक्ष आ ा (‘गृहाण’) के ान पर कमवाच्य का प्रयोग वनयशीलता दखाता है —
‘स्वीकार कया जाए’। ‘दे ह’ और ‘कुरु’ अवश्य कतृवाच्य लोट् मध्यमपुरुष एकवचन ह।

पाठ से सम्बन्ध: यही ोक पृष्ठ 24 पर कथा के भीतर भी आया है — नामदे व इन्ह शब्द म प्राथना करके आँख
खोलते ह और थाली खाली पाते ह। इस लए यह केवल प र शष्ट नह , कथा का ही अंग है।

यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् — पृष्ठ 37

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प रयोजनाकायम् — चत्रसंकलनम्, वाक्यरचना, महापुरुषवणनम्

प रयोजनाकायम्

प्र.1 स्वप्रदे शे वद्यमानानां द्वत्राणां महात्मनां चत्रा ण संकलयत। तेषां वषयकं ववरणं पञ्चषैः वाक्यैः च लखत।
उदाहरणम् — छत्तीसगढ़प्रान्तस्य गरौदपुरी-ग्रामे गुरु-घा सदासमहाराजस्य जन्म जातम् … सतनामी इ त
सम्प्रदायस्य सः सं ापकः आसीत्।

काय व धः (यह करना है) — अपने प्रदे श के दो-तीन महात्माओं/सन्त के चत्र (प त्रका, समाचारपत्र, अन्तजाल या स्वयं बनाया
चत्र) एकत्र क जए, उन्ह चाट पर चपकाइए और नीचे प्रत्येक के वषय म पाँच-छह वाक्य संस्कृत म ल खए।

उत्तमोत्तरे कम् कम् आवश्यकम् ववरणम्

१. जन्मस्थानम् · कालः ‘… पान्तस्य … ग ामे … महाराजस्य जन्म जातम्। ’

२. मुख्यः उपदे शः उ द्धरणसिहतम् — यथा ‘मनखे मनखे एक समान’

३. समाजाय योगदानम् िवषमतायाः िनवारणम्, समानतायाः स्थापनम्, जीवदया

४. सम्पदायः / परम्परा यथा — सतनामी-स म्पदायस्य संस्थापकः

५. अस्माकं कृ ते िशक्षा एकं वाक्यम् — िकम् अस्मािभः ग ाह्यम्

नमूना उत्तर (आदशम् उत्तरम्) — सन्तः नामदे वमहाराजः

महारा पान्तस्य नरसीबामणी-गामे सन्त-नामदे वमहाराजस्य जन्म जातम्।

सः पण्ढरपुरस्य पाण्डुरङ् गस्य परमः भक्तः आसीत्।

‘ईश्वरः सवषु भूते ष ु िनवसित’ इित गुरोः िवसोबायाः उपदे शं सः के वलं न श्रुत वान्, अिप त ु आचिरतवान्।
एकदा शुन कः तस्य रोिटकाम् अपहृत्य पलाियतवान्, तदा सः क्रोधं िवहाय घृत पात्रम् आदाय तस्य पृष्ठे

अनुधािवतवान्।

मराठीभाषायां िहन्दीभाषायां च ते न बहवः अभङ् गाः पदािन च रिचताः, ये गुरु गन्थसािहबे अिप सङ् गृहीताः सिन्त।

अस्मािभः तस्मात् भूत दया, िवनमता, सवषु समदृ िष्टः च गहणीया।

हन्द अथ — महाराष्ट्र प्रान्त के नरसी-बामणी गाँव म सन्त नामदे वमहाराज का जन्म हुआ। वे पण्ढरपुर के पाण्डु रङ्ग के परम भक्त
थे। ‘ईश्वर सब प्रा णय म बसता है’ — गुरु वसोबा के इस उपदे श को उन्ह ने केवल सुना ही नह , आचरण म भी उतारा। एक बार
कुत्ता उनक रोट लेकर भागा, तब उन्ह ने क्रोध छोड़कर घी का पात्र लेकर उसका पीछा कया। उन्ह ने मराठ और हन्द म अनेक
अभङ्ग और पद रचे, जो गुरुग्रन्थ सा हब म भी संगृहीत ह। हम उनसे भूतदया, वनम्रता और सबके प्र त समदृ ष्ट ग्रहण करनी चा हए।

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Tip: अपने ही प्रदे श के सन्त चु नए — जैसे राज ान म मीराबाई तथा सन्त पीपा, कणाटक म बसवेश्वरः, प ाब
म गुरुनानकदे वः, बङ्गाल म श्रीचैतन्यमहाप्रभुः, त मळनाडु म तरुवल्लुवरः, ओ डशा म सन्तक व-भीमभोई। चाट पर
चत्र के नीचे नाम दे वनागरी म संस्कृतरूप म ल खए — यही अङ् क बढ़ाता है।

प्र.2 पाठे आगता न क्तवतुप्रत्यययुता न वाक्या न संगृह्य तादृशा न अन्या न वाक्या न लखत। यथा — क पलः माधवी
च अवकाशकाले मातुलगृहं गतवन्तौ। → रामः लक्ष्मणः च सीतया सह वनं गतवन्तौ।

काय व धः — पहले पाठ म से क्तवतु-प्रत्यय वाले वाक्य चु नए, फर उसी साँचे पर अपने वाक्य बनाइए — कता बद लए, पर
लङ्ग-वचन का मेल बनाए र खए।

पाठस्य वाक्यम् क्तवतु-रूपम् तादृशं नूतनं वाक्यम् (नमूना)

किपलः माधवी च अवकाशकाले मातुल ग ृहं गतवन्तौ। पुं. प. ि .व. रामः लक्ष्मणः च सीतया सह वनं गतवन्तौ।

तत्र क्रीडावेल ायां कञ्चन शुनकं दृ ष्टवन्तौ। पुं. प. ि .व. वयं उद्याने कञ्चन मयूरं दृष्टवन्तः।

नामदे वः शुनकस्य पष्ृ ठे अनुध ािवतवान्। पुं. प. ए .व. बालकः कन्दुकस्य पृष्ठे अनुधा वतवान्।

अहं श्रतु वती यत् … स्त्री. प. ए.व. अहं श्रुतवती यत् अद्य वद्यालये उत्सवः भ वष्य त इ त।

बहवः सत्पुरुषाः जन्म साथकं कृ तवन्तः। पुं. प. ब.व. छात्राः प रश्रमेण परीक्षायां सफलतां प्राप्तवन्तः।

मातामही तं पसङ् गं दृ ष्टवती, तौ आहूतवती च। स्त्री. प. ए.व. माता पुत्रं दृष्टवती, तं आहूतवती च।

किपलः … शुनकं तािडतवान्। पुं. प. ए .व. कृषकः क्षेत्रे बीजा न वा पतवान्।

आवां तं सम्यक् दिण् डतवन्तौ। पुं. प. ि .व. आवां गृहकाय सम्यक् कृतवन्तौ।

वाक्य बनाते समय दो बात जाँ चए: (१) कता का लङ्ग — बा लकाएँ ह तो ‘गतवत्यः’, बालक ह तो ‘गतवन्तः’।
(२) कता का वचन — एक, दो या बहुत। यही दो जाँच सारी गल तयाँ रोक दे ती ह।

ध्यान द: क्तवतु-रूप के साथ ‘अ स्त/आसीत्’ जोड़ने क आवश्यकता नह — ‘सः गतवान्’ ही पूरा वाक्य है, ‘सः
गतवान् आसीत्’ लखना अनावश्यक है।

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प्र.3 गुलावराव-महाराजः सन्तक व-भीमभोई चे त एतयोः महापुरुषयोः वषये पञ्च भः वाक्यैः दश भः वाक्यैः वा
वण यत्वा शक्षकान् दशयत।

काय व धः — दोन महापुरुष के वषय म पाँच से दस वाक्य संस्कृत म ल खए और शक्षक को दखाइए। पुस्तक के पृष्ठ 37 पर
दोन के चत्र भी दए गए ह। अच्छे उत्तर म — जन्म ान, बाधा/संघष, प्रमुख सन्दे श, रचनाएँ तथा हमारे लए सीख — ये पाँच बात
अवश्य आनी चा हए।
नमूना उत्तर (आदशम् उत्तरम्) — १. गुलावरावमहाराजः

गुलावरावमहाराजः महारा पान्तस्य अमरावतीजनपदे जातः।

बाल्ये एव सः ने त्रज्योितं हािरतवान्, तथािप तस्य ानदृ िष्टः न मन्दा अभवत्।

सः स्वयं प ाच क्षःु सन् अिप मराठीभाषायां संस्कृ तभाषायां च शतशः गन्थान् रिचतवान्।

ाने श्वरमहाराजं सः स्वगुरुं मन्यते स्म, ‘मधुरा ैत ’ इित भिक्तमाग ं च पविततवान्।

वेद -उपिनषद् -गीता-भागवतादीनां सारं सरलया भाषया जने भ्यः सः उपिदष्टवान्।

तस्मात् वयं िशक्षामहे — शारीिरकी दुबलता ान स्य बािधका न भवित ।

हन्द अथ — गुलावराव महाराज महाराष्ट्र के अमरावती ज़ले म जन्मे। बचपन म ही उन्ह ने आँख क ज्यो त खो द , फर भी
उनक ानदृ ष्ट मन्द नह हुई। नेत्रहीन होते हुए भी उन्ह ने मराठ और संस्कृत म सैकड़ ग्रन्थ रचे। वे ानेश्वर महाराज को अपना गुरु
मानते थे और उन्ह ने ‘मधुरा ै त’ नामक भ क्तमाग चलाया। वेद, उप नषद्, गीता और भागवत का सार उन्ह ने सरल भाषा म लोग
को समझाया। उनसे हम यह सीखते ह क शारी रक दुबलता ान म बाधा नह बनती।
नमूना उत्तर (आदशम् उत्तरम्) — २. सन्तक वः भीमभोई

सन्तकिवः भीमभोई ओिडशापान्तस्य एकिस्मन् िनधने आिदवािस-कु ले जातः।

सः अिप ने त्रहीनः आसीत्, तथािप तस्य वाणी सहस्रशः पदािन सष्ृ टवती।

‘भीम-भोई’ इित नाम्ना सः मिहमाधमस्य पमुखः पचारकः किवः च आसीत्।

‘स्त िु तिचन्तामिणः’ इित तस्य पिसद्धा रचना वतते ।

तस्य पिसद्धा उिक्तः — ‘मो जीवन पछे नरके पिडथाउ, जगत उद्ध ार हेउ’ — अथ त् ‘मेरा जीवन चाहे नरक में
पड़ ा रहे, पर संसार का उद्धार हो’ इित।

तस्मात् वयं िशक्षामहे — पराथ ं जीवनम् एव श्र ेष्ठं जीवनम्।

हन्द अथ — सन्तक व भीमभोई ओ डशा प्रान्त के एक नधन आ दवासी कुल म जन्मे। वे भी नेत्रहीन थे, फर भी उनक वाणी ने
हज़ार पद रचे। वे म हमा-धम के प्रमुख प्रचारक और क व थे। ‘स्तु त चन्ताम ण’ उनक प्र सद्ध रचना है। उनक प्र सद्ध उ क्त है —
‘मेरा जीवन चाहे नरक म पड़ा रहे, पर जगत् का उद्धार हो।’ उनसे हम यह सीखते ह क दूसर के लए जया गया जीवन ही श्रेष्ठ
जीवन है।

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दोन म समानता क्या है: पुस्तक ने ये दो नाम साथ क्य रखे ? क्य क दोन नेत्रहीन सन्तक व थे और दोन ने सद्ध
कया क करुणा और भ क्त क ‘दृ ष्ट’ आँख क मुहताज नह । यही बात पाठ के मूल वषय से जुeड़m
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gl दृ ष्ट के वषय म है।
ती है — नामदे व
. cा’oजो आँख से नह दखता : कुत्ते के भीतर का ईश्वर। इस लए पूरा पाठ अन्ततः
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ने भी वह ‘दे ख

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Tip: शक्षक को दखाने से पहले जाँच ली जए क हर वाक्य म कता और क्रया का पुरुष-वचन मेल खाता है, और

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भूतकाल म क्तवतु-रूप का लङ्ग कता के अनुसार है — इसी पाठ ने तो यही सखाया है।

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अध्याय — एक नज़र म
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em पर भूतदया, समता, क्षमा, अ हसा, करुणा, ऋजुता तथा बन्धुता — ये जीवनमूल्य मलते ह। महाराष्ट्र के प्र सद्ध
पाठ-प रचय — पाठ का आरम्भ एक गद्यांश से होता है : ‘भारतदे शः बहूनां ब्रह्मष णां महात्मनां च भू मः।’ उनके च रत्र म

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gl महात्मा नामदे वमहाराज ने अपने व्यवहार से करुणा का महान् आदश उप त कया — उन्ह ने सवात्मक ईश्वर का केवल
पद-पद

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सङ् क तन नह कया, अ पतु सब जीव म भगवान् को दे खा।
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कथावस्तु (आरम्भ) — क पल और माधवी अवकाश म मातुलगृह गए। खेलते समय उन्ह ने एक कुत्ता दे खा, पत्थर उठाकर
उसे मारने दौड़े; कुत्ता भय से चल्लाता हुआ भागाm
लया — यह से कथा-संवाद आरम्भ होताlहैa। s e और दोन ज़ोर से हँसे। मातामही ने यह प्रसङ्ग दूर से दे खा और दोन को बुला

नामदे व-कथा — नामदे व पाण्डु रङ्ग ( a
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वट्ठल) के केवल प्रयभक्त ही नह , प्रय मत्र भी थे। वे प्र त दन नैवेद्य- ा लका लेकर

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म न्दर जाते, वग्रह के सामने रखकर नेत्र मूँदकर प्राथना करते। एक दन प्राथना के बाद आँख खोल तो ा लका म रोट नह

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थी — एक भूखा कुत्ता उसे मुँह म दबाकर भाग गया था।

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l मा खादतु, घृतम् अ प स्वीकरोतु।’
cीoरोट खाने से कुत्ते के पेट म पीड़ा होगी’ और कहते जाते थे — ‘हे देव! शुष्कांaरोgटकां
कथा का मोड़ — नामदे व न क्रोध से लाठ लेकर दौड़े, न पत्थर लेकर — वे करुणा से घृतपात्र लेकर दौड़े, यह सोचकर क
‘सू.ख
a semदौड़ता हुआ कुत्ता अदृश्य हो गया और उसके ान पर स्वयं पाण्डु रङ्ग प्रकट हुए — ‘वत्स नामदेव! उत्तीणः भवान् परीक्षाम्।’
agl मूल सन्दे श — गुरु वसोबा का उपदे श था — ‘ईश्वरः न केवलं म न्दरे भव त, अ प तु सवषु भूतेषु तस्य नवासो भव त।’

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नामदे व ने इस उपदे श को केवल सुना नह , जीकर दखाया। कथा सुनकर क पल और माधवी को अपने अपराध का बोध होता

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है और तीन सङ् कल्प करते ह — काया, वाणी या मन से कसी को पीड़ा न हो, और कसी क पीड़ा हो तो उसे दूर करने का
प्रयत्न कर। यही पाठ का ध्येय-वाक्य है — e‘आत्मवत्सवभू
l as वाद शैली म है (मातामही, क पलः, माधवी, उभाव प, उभौ)। कोष्ठक म रङ्गसङ् केत
तेषु यः पश्य त स प ण्डतः।’

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भा षक वशेषताएँ — पूरा पाठ नाट्य-सं
दए गए ह — (पुनः उच्चैः ह सतवन्तौ), (मातामहीम् आ ल ङ्गतवन्तौ), (साश्चयम् उच्चैः), (आ लङ्गनं कृत्वा)। सम्बोधन-प्रयोग

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बहुत ह — वत्सौ, बालौ, पुत्रकौ, जातौ, चर ी वनौ, भ्रातः, माताम ह। भूतकाल के लए लङ् -लकार के ान पर लगभग

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m णक बन्दु १ — उपपद वभक्तयः : ‘उप’ का अथ है सामीप्य; समीप मglaतsपद के आश्रय से जो वभ क्त होती है
सवत्र क्तवतु-प्रत्ययान्त रूप प्रयुक्त ह — गतवन्तौ, दृष्टवन्तौ, धा वतवान्, ह सतवन्तौ, ा पतवान् , अनुधा वतवान्।

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em वह उपपद वभ क्त कहलाती है। पाठ सात नयम सखाता है — प्र त ( तीया),a वना ( तीया/तृतीया/पञ्चमी), धक्
व्याकर

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( तीया), नकषा ( तीया), प रतः ( तीया), सह–साकं–साध–समम् (तृतीया), अलम् (तृतीया)।

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व्याकर णक बन्दु २ — क्तवतु-प्रत्ययः : ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ खण्ड म क्तवतु-प्रत्ययान्त शब्द (गतवत्) के तीन लङ्ग —

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पुं लङ्ग (गतवान्), स्त्री लङ्ग (गतवती), नपुंसक लङ्ग (गतवत्) — के सात वभ क्तय तथा तीन वचन के रूप दए गए ह।

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अभ्यास का प्रश्न ७ इसी का प्रयोग कराता है — लङ् -लकार के क्रयापद को क्तवतु-रूप म बदलना।

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agपर प्रश्न नमाण, (५) घटनाक्रम-संयोजन, (६) उपपद वभ क्त क योजना, (७) क्तवतु-
अभ्यास क्या माँगता है — (१) संस्कृत म पूण उत्तर, (२) वतमानका लक वाक्य का भूतकाल-प रवतन, (३) ‘कौन कससे
कहता है’, (४) रेखाङ् कत पद

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 3 आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः AglaSem · NCERT Solutions

रूपान्तरण, (८) समस्तपद-चयन। अन्त म प रयोजना-काय म अपने प्रदे श के महात्माओं का चत्र-संकलन तथा गुलावराव-
महाराज एवं सन्तक व भीमभोई का वणन माँगा गया है।

त्व रत पुनरावृ त्त

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ पाठ का वाक्य

अनुधा वतवान् पष्ृ ठतः अधावत् पीछे दौड़ा नामदे वः शुनकस्य पृष्ठे अनुधा वतवान्।

अनुपा लतवान् अनुस रणम् अकरोत् पालन कया न केवलं भवान् श्रुतवान् अ प तु अनुपा लतवान्।

अपहृत्य चोरियत्वा चुराकर शुनकः शुष्करो टकाम् अपहृत्य पला यतवान्।

आ वभूतवान् पत्यक्षीभूतः प्रकट हुए तस्य ाने पाण्डु रङ्गः आ वभूतः।

करुणया दयया दया से नामदे वः कोपेन न धा वतवान्, प्रत्युत सः करुणया धा वतवान्।

घृतम् हिवः घी न लगुडं, न पाषाणखण्डम्, अ प तु घृतपात्रं धृत्वा।

नैवेद्यम् दे वाय समपियतुं िनिमतः पदाथः भोग नैवेद्यं गृह्यतां दे व भ क्तं मे ह्यचलां कुरु।

नकषा समीपे पास मां नकषा आगच्छताम्।

बुभु क्षतः क्षध
ु ातः भूखा कश्चन बुभु क्षतः शुनकः आगत्य रो टकां मुखे गृहीत्वा धा वतवान्।

म्लाने कािन्तहीने कुम्हलाए हुए अपराधभावनया तयोः मुखे म्लाने आस्ताम्।

लगुडम् दण्डम् लाठ क्रोधेन लगुडम् आदाय शुनकं ताड यतुं धा वतवान् स्यात्!

सुहृत् सखा मत्र दे वः पाण्डु रङ्गः नामदे वस्य प्रयसुहृद् आसीत्।

प्रस वत्री जनियत्री जन्म दे ने वाली भारतभू मः अनेकेषां नररत्नानां ब्रह्मष णां राजष णां च प्रस वत्री।

शक्षाप्रदा िशक्षां पददाित इित सीख दे ने वाली नामदे वमहाराजस्य जीवनस्य का चत् शक्षाप्रदा घटना अत्र प्रद शता।

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Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages46
Updated19 Sep 2026