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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः

AglaSem पर कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः (शारदा) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 4 (Sharada).
NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः - Page 1 of 38

About NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः

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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा9

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 4: न खलु वयस्तेजसो हेतुः

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

38 – 50 12 55 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 37 pages

Page 2

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 4: न खलु वयस्तेजसो हेतुः
न खलु वयस्तेजसो हेतुः शारदा (कक्षा ९) का चतुथः पाठः है। यह गद्य-पाठ है — बालक्रा न्तवीर खुद राम बोस (१८८९–१९०८) का सं क्षप्त
जीवनवृत्तान्त, जो अमृत महोत्सव के सन्दभ म ज्ञात-अज्ञात क्रा न्तवीर के स्मरण से आरम्भ होता है। पाठ का शीषक ही उसका सन्दे श है — आयु तेज
का कारण नह होती। पाठ के अन्त म सव शब्दे न भासते (शब्दाथ-ता लका, जसका ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भ रक्त है), फर अभ्यासाद्
जायते स द्धः के आठ प्रश्न — पूणवाक्येन उत्तर, सत्यम्/असत्यम्, संवत्सर-मेलनम्, चत्रवणनम्, स न्धच्छे दः, वग्रह से समस्तपद, भूतकाल-
वाक्यप रवतनम् तथा ‘ चत्’-प्रत्ययान्त पद — और अन्त म स्वाध्यायान्मा प्रमदः (युगल-अव्ययपद) तथा यस्तु क्रयावान् मनुजः स व ान्
(प रयोजना-काय) दए गए ह।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

शारदा (कक्षा 9) 38 – 50

खं ड प्रश्न

12 55

माध्यम

हन्द

पाठ्यप्रश्नः — पृष्ठ 38
पाठस्य आर म्भके अनुच्छेदे छात्रान् प्र त पृष्टः प्रश्नः तथा शीषक- वमशः

पाठ्यप्रश्नः

प्र.1 क वयं जानीमः यत् दे शाय स्वातन्त्र्यं प्रदातुं कयन्तः ज्ञाताः अज्ञाताः च क्रा न्तवीराः स्वतन्त्रतायज्ञे स्वीयप रवारं
स्वीयजीवनं च आहु तरूपेण सम पतवन्तः इ त ?

न, वयं तान् सवान् न जानीमः। केचन एव क्रा न्तवीराः इ तहासे नामतः ज्ञाताः स न्त, अन्ये तु सहस्रशः अज्ञाताः एव
अव शष्टाः। तथा प ते सवऽ प अस्मा भः कृतज्ञताभावनया नत्यं वन्दनीयाः। ( हन्द — नह , हम उन सबको नह जानते। कुछ
ही क्रा न्तवीर नाम से इ तहास म ज्ञात ह, शेष हज़ार अज्ञात ही रह गए। फर भी वे सब हमारे लए कृतज्ञता क भावना से नत्य
वन्दनीय ह।)

प्रश्न का प्रयोजन: यह प्रश्न उत्तर पाने के लए नह , पाठक को झकझोरने के लए है। हम स्वतन्त्रता का अमृत
महोत्सव तो मनाते ह (‘अमृतमहोत्सववष वयम् आच रतवन्तः’), कन्तु जनके ब लदान से यह स्वतन्त्रता मली, उनम
से अ धकांश के नाम तक हम ज्ञात नह । इसी अज्ञात-ज्ञात ब लदानी-परम्परा का एक प्र त न ध उदाहरण दे ने के लए
पाठ खुद राम का वृत्तान्त प्रस्तुत करता है — ‘खुद रामः तेषु एव दे शभक्तेषु कश्चन तेजस्वी बालक्रा न्तवीरः हुतात्मा
अ स्त।’

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

ध्यातव्यम्: ‘स्वतन्त्रतायज्ञे … आहु तरूपेण सम पतवन्तः’ — यहाँ स्वतन्त्रता-संग्राम को यज्ञ तथा ब लदान को
आहु त कहा गया है। यह रूपक अलंकार है, और इसी से पता चलता है क लेखक ब लदान को प वत्र कम मानता
है।

प्र.2 पाठस्य शीषकं ‘न खलु वयस्तेजसो हेतुः’ इत्यस्य कः अथः ? कथम् इदं शीषकं समु चतम् ?

स न्धच्छे दः — न + खलु + वयः + तेजसः + हेतुः। अथः — ‘आयुः नश्चयेन तेजसः कारणं न भव त’। ( हन्द — नश्चय ही
आयु तेज (पराक्रम) का कारण नह होती।)

वयः = आयुः (नपुंसकिलङ् गम्, पथमा एकवचनम्)

ते जसः = ते जसः (षष्ठी एकवचनम्) — ‘ते ज का’

हेत ःु = कारणम्

खलु = िनश्चयेन (अव्ययम्)

अन्वयः — वयः खलु ते जसः हेत ःु न (भवित)।

शीषक क्य समु चत है: खुद राम बङ्गभङ्ग-आन्दोलन के समय केवल पन्द्रह वष के थे और अठारह-उन्नीस वष क
आयु म ही फाँसी पर चढ़ गए। उन्ह ने नव कक्षा भी पूरी नह क थी। फर भी उन्ह ने वह कया जो बड़े-बड़े नह कर
सके, और मृत्युदण्ड सुनकर भी उनके मुख पर ‘प्रसन्नता, शा न्तः, तृ प्तः, तेजः’ था। अथात् तेज आयु से नह , संकल्प
और दे शभ क्त से आता है — यही पूरे पाठ का सार है, और यही शीषक कहता है।

व्याकरण-सङ् केत: ‘वयस्तेजसः’ म वसग-स न्ध है — वयः + तेजसः म वसग के बाद त् (खर्-वण) आने से
वसग का स् हो गया। यही पद अभ्यास ५ (ङ) म स न्धच्छे द के लए भी पूछा गया है।

सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 42 – 43

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

शब्दाथ-ता लका — पुस्तक म ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भ रक्त छोड़ा गया है; यहाँ उसे भरा गया है

शब्दाथाः

प्र.1 अधः प्रदत्तायाः ता लकायाः रक्तं स्तम्भं ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त पूरयत।

नीचे पूरी ता लका द गई है। अ न्तम स्तम्भ (‘मातृभाषया अथ लखत’) पुस्तक म खाली छोड़ा गया है — यहाँ उसे हन्द
को मातृभाषा मानकर भरा गया है। जस वद्याथ क मातृभाषा अन्य है (बाङ् ला, मराठ , त मऴ, ओ डआ…), वह इसी
स्तम्भ म अपनी भाषा का शब्द लखे।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः
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शब्दः अथः हन्द ENGLISH मातृभाषया अथ

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(संस्कृतम्) लखत

अिधवक्तॄणाम् .
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a s em अ भभाषकाणाम् वक ल के Of advocates वकीलों का / अिधवक्ताओं

agl
(पुं.ष.ब.व.) का

असाधारणः न साधारणः असामान्य Extra Ordinary असाधारण, जो साधारण

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(नञ् तत्पुरुषः, पुं.प.ए.व.) नही ं

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sमनाये
agl
आचिरतवन्तः पा लतवन्तः Observed (हमने) मनाया
(आ + √चर् + क्तवतु,
पुं.प.ब.व.)

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m.
Fear
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आतङ् कम् भयम् डर आतंक , दहशत

पुं.िद्व.ए.व.) co
m
(आङ् + √तिक + घञ्,
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glआन्दोलनम्
a (√आन्दोल् + ल्युट्,
वप्लवः आन्दोलन Revolution जनान्दोलन, उभार

om a s
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नपुं.प.ए.व.)

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उद् बन्धनम् दण्ड वशेषः फाँसी Execution फाँस ी की सज़ा

agl
(उद् + √बन्ध् + ल्युट्,
नपुं.प.ए.व.)

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कदािचत् एकदा एक बार Once िकसी समय, कभी

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(कदा + िचत्, अव्ययम्)

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ase(पुं.प.ए.व.)
चिकतः व स्मतः च कना चिकत, हैर ान

agl
िदवम् स्वगम् स्वग को To heaven स्वग की ओर
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(स्त्री.िद्व.ए.व.)
com g l a
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ase
agl
िनदयः नगता दया यस्मात् दया र हत Merciless िनद यी, बेर हम
(पुं.प.ए.व.)

m
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पतीकारयत्नः प्रत्युत्तरप्रयासः प्र तरोध का Attempt at जवाबी कोिशश

m
(पुं.प.ए.व.) प्रयास retaliation

भुशo m l a se
. c Gun
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m (स्त्री.प.ए.व.)
ण्ु डी शस्त्र वशेषः बन्दूक बन्दू क , िपस्तौल

ase
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दुः खतः च न्तत Worried
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व्यिथतः दुखी, व्यिथत
(√व्यथ् + क्त, पुं.प.ए.व.)
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िवस्फोटकम् युद्धोपकरण वशेषः व ोटक Explosive बम , िवस्फोटक
(नपुं.प.ए.व.)
a g l सामग्री

co m
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m as e
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

संत्र स्तः भीतः, पी डतः आतं कत Frightened भयभीत, सहमा हुआ
(सम् + √त्रस् + क्त, पुं.प.ए.व.)

सूचना: ता लका के अ न्तम स्तम्भ का उ े श्य यह है क वद्याथ संस्कृत शब्द को अपनी भाषा से जोड़कर याद रखे।
इस लए यहाँ अनुवाद नह , अपना प्रच लत शब्द ल खए — जैसे बाङ् ला म ‘उद्बन्धनम्’ = ‘ফাঁিস’, मराठ म
‘फाशी’।

प्र.2 ता लकायां कोष्ठके प्रदत्तानां व्याकरण-सङ् केतानाम् (यथा — पुं.ष.ब.व., √चर् + क्तवतु, नञ् तत्पुरुषः) अथ
स्पष्टीकुरुत।

ता लका के कोष्ठक म दो प्रकार क सूचना द गई है — (१) पद कैसे बना (प्रकृ त + प्रत्ययः अथवा समास), और (२) पद
कस रूप म प्रयुक्त है ( लङ्गम् · वभ क्तः · वचनम्)।

सङ् केतः वस्तारः अथः

पुं. / स्त्री. / नपुं. पुं लङ्गम् / स्त्री लङ्गम् / नपुंसक लङ्गम् शब्द का िलङ् ग

प. / िद्व. / ष. प्रथमा / द्वतीया / षष्ठी वभ क्तः कारक -िवभिक्त

ए.व. / ब.व. एकवचनम् / बहुवचनम् वचन

√ (मूल िचह्नम्) धातुः क्र
ि या का मूल — यथा √चर् = चलना, √व्यथ् = दुखी होना

क्तवतु भूतका लक कृत्-प्रत्ययः (कतृवाच्ये) ‘…वान्/…वन्तः’ रूप — आचिरतवन्तः = मनाया

क्त भूतका लक कृत्-प्रत्ययः (प्रायः कमवाच्ये/भाववाच्ये) ◌
‘…तः/… ि तः’ रूप — व्यिथतः, संत्र स्तः

ल्युट् भाववाचक कृत्-प्रत्ययः (‘अन’ इ त आदे शः) क्र
ि या से भाववाचक नपुंस क सं ा — आ न्दोलनम्, उद् बन्धनम्

घञ् भाववाचक कृत्-प्रत्ययः (‘अ’ इ त शष्यते) पुंिलङ् ग भाववाचक सं ा — आतङ् कः

नञ् तत्पुरुषः ‘न’ इत्यस्य पूवपदत्वे तत्पुरुषसमासः िनषेध ाथक समास — न साधारणः = असाधारणः

उदाहरणेन बोधः —

आचिरतव तः = आ (उपसगः) + √चर् (धातःु ) + क्तवत ु (पत्ययः) → पुंिलङ् गम्, पथमा, बहुवचनम् (कत ‘वयम्’
न्

इित बहुवचनम्, अतः बहुवचने )।
आतङ् कम् = आङ् + √तिक + घञ् → पुंिलङ् गम्, िद्वतीया, एकवचनम् (‘आतङ् कं जनयिन्त’ — कम, अतः
«कमिण िद्वतीया»)।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

यह सङ् केत क्य उपयोगी है: ये संकेत बताते ह क पद वाक्य म क्या भू मका नभा रहा है। ‘अ धवक्तॄणाम्’ म
षष्ठी है — इसी लए अथ ‘वक ल के’ हुआ, ‘वक ल को’ नह । य द वभ क्त न जानी जाए तो शब्द का शब्दकोशीय
अथ जानकर भी वाक्य का अथ ग़लत नकल सकता है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 44
प्रश्नः १ — अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूणवाक्येन उत्तरा ण लखत

पू ण वाक्ये न उत्तरम्

प्र.1 (क) खुद रामस्य जन्म कुत्र अभवत् ?

खुद रामस्य जन्म बङ्गप्रान्ते मे दनीपुरनामके जनपदे मोहोबनी-ग्रामे अभवत्। ( हन्द — खुद राम का जन्म बङ्गप्रान्त के
मे दनीपुर नामक जनपद के मोहोबनी-ग्राम म हुआ था।)

पाठ-पमाणम् — “तिस्मन् बङ् गपान्ते मेिदनीपुरनामके जनपदे मोहोबनी-गामे नवाशीत्यिधक-अष्टादशशततमे वष

(१८८९) िदसम्बरमासस्य त ृत ीये िदनाङ् के खुद ीरामस्य जन्म अभवत्।”

व्याकरण-दृ ष्टः: प्रश्न ‘कुत्र’ (कहाँ) है, अतः उत्तर म अ धकरण चा हए और «अ धकरणे सप्तमी» के नयम से
सप्तमी वभ क्त आएगी — प्रान्ते, जनपदे , ग्रामे — तीन सप्तमी एकवचन। पूणवाक्य म क्रया ‘अभवत्’ (लङ् -
लकारः, प्रथमपुरुषः, एकवचनम्) अवश्य लख।

पूरा उत्तर चाह तो त थ भी जो ड़ए: “नवाशीत्य धक-अष्टादशशततमे वष (१८८९) दसम्बरमासस्य तृतीये
दनाङ् के बङ्गप्रान्ते मे दनीपुर-जनपदस्य मोहोबनी-ग्रामे खुद रामस्य जन्म अभवत्।”

प्र.1 (ख) खुद रामः कमथ व्य थतः भव त स्म ?

खुद रामः दे शवा सषु जायमानान् अत्याचारान् दृष्ट् वा व्य थतः भव त स्म। ( हन्द — खुद राम दे शवा सय पर होने वाले
अत्याचार को दे खकर व्य थत हो जाते थे।)

पाठ-पमाणम् — “सः दे शवािसषु जायमानान् अत्याचारान् दृ ष्ट् वा व्यिथतः भवित स्म।”

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क्य : साधारण बालक क तरह खेल-कूद म उनका मन नह लगता था (‘साधारणबालानाम् इव क्र डा दषु तस्य मनः
न रमते स्म’)। बचपन से ही वे असाधारण थे — दूसर का दुःख उन्ह अपना दुःख लगता था। यही संवेदना आगे
चलकर क्रा न्त का बीज बनी।

भाषा- बन्दु: ‘भव त स्म’ — लट् -लकार के साथ ‘स्म’ आने पर अथ भूतकाल का हो जाता है (‘हो जाता था’)। यही
बात अभ्यास ७ म प रवतन के लए पूछ गई है। ‘जायमानान्’ शानच्-प्रत्ययान्त वतमानका लक वशेषण है (होते
हुए), जो ‘अत्याचारान्’ का वशेषण होने से द्वतीया बहुवचन म है।

प्र.1 (ग) सत्येन्द्रनाथः कम् उप दष्टवान् ?

सत्येन्द्रनाथः उपा दशत् — “क्रा न्तकाय कतु शरीरं वज्रसदृशं दृढं , बु द्धः अ सधारा इव तीक्ष्णा, मनः गङ्गाजल मव नमलं च
भवेत् इ त”। ( हन्द — सत्येन्द्रनाथ ने उपदे श दया क क्रा न्त का काय करने के लए शरीर वज्र के समान दृढ़, बु द्ध तलवार क
धार के समान तीक्ष्ण तथा मन गङ्गाजल के समान नमल होना चा हए।)

उपदे शस्य अङ्गम् उपमानम् अपे क्षतः गुणः क्य आवश्यक

शरीरम् वज्रम् दृ ढम् कठोर प रश्रम, यातना और भाग-दौड़ सहने के लए

बुि ः अ सधारा तीक्ष्णा योजना बनाने और तत्काल नणय लेने के लए

मनः गङ्गाजलम् िनम लम् स्वाथ, भय और द्वे ष से मुक्त रहने के लए

उपदे श का मम: यह तीन गुण मलकर ही क्रा न्तकारी बनाते ह। केवल दृढ़ शरीर हो तो वह बल है, बु द्ध नह ; केवल
तीक्ष्ण बु द्ध हो और मन म लन हो तो वह षड्यन्त्र बन जाता है। इसी लए सत्येन्द्रनाथ ने मन क नमलता को भी
उतना ही आवश्यक बताया।

अलङ् कारः: तीन म उपमा अलङ् कार है — ‘वज्रसदृशम्’ (सदृश), ‘अ सधारा इव’, ‘गङ्गाजलम् इव’। ‘सदृश’
और ‘इव’ उपमावाचक शब्द ह।

प्र.1 (घ) खुद रामः कदा पयन्तं पादत्राणं न ध रष्या म इ त प्र तज्ञातवान् ?

‘यावत् भारतम् आङ् ग्लशासनात् मुक्तं न भ वष्य त तावत् पादत्राणं न ध रष्या म’ इ त खुद रामः प्र तज्ञातवान्। ( हन्द —
‘जब तक भारत अंग्रेज़ी शासन से मुक्त नह हो जाएगा, तब तक म जूते नह पहनूँगा’ — ऐसी प्र तज्ञा खुद राम ने क थी।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

पित ायाः संरचना —

यावत् भारतम् आङ् ग्लशासनात् मुक्तं न भिवष्यित (शत)

तावत् पादत्राणं न धिरष्यािम (सङ् कल्प)

पेरणा — राणापताप य चिर म्।
स् त्र

यह प्र तज्ञा क्य : महाराणा प्रताप ने भी चत्तौड़ के मुक्त होने तक सुख-सु वधा त्यागने क प्र तज्ञा क थी। खुद राम
ने उसी परम्परा म स्वयं को बाँधा। जूता न पहनना केवल एक बाहरी नयम नह था — यह हर पग पर उन्ह उनका
लक्ष्य याद दलाने वाला जी वत संकल्प था।

व्याकरण: ‘ध रष्या म’ — लृट्-लकारः (भ वष्यत्काल), उत्तमपुरुषः, एकवचनम्। ‘यावत्…तावत्’ युगल-अव्यय है,
जसका अभ्यास ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ म कराया गया है।

प्र.1 (ङ) कमथ न्यायाधीशः आङ् ग्लाः अ धका रणः च च कताः ?

यतः मृत्युदण्डस्य उ ोषणानन्तरम् अ प राष्ट्रभक्तस्य खुद रामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत्, प्रत्युत प्रसन्नता, शा न्तः, तृ प्तः,
तेजः च आसीत् — तत् दृष्ट् वा न्यायाधीशः आङ् ग्लाः अ धका रणः च च कताः। ( हन्द — क्य क मृत्युदण्ड क घोषणा के बाद
भी राष्ट्रभक्त खुद राम के मुख पर भय या दुःख नह था, ब ल्क प्रसन्नता, शा न्त, तृ प्त और तेज था — यह दे खकर न्यायाधीश तथा
अंग्रेज़ अ धकारी च कत रह गए।)

पाठ-पमाणम् — “रा भक्तस्य खुद ीरामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत् पत्युत पसन्नता, शािन्तः, त ृिप्तः, ते जः च

आसीत्। तत् दृ ष्ट् वा न्यायाधीशः आङ् ग्लाः अिधकािरणः चािप चिकताः।”

वे च कत क्य हुए: अंग्रेज़ क सारी श क्त का आधार भय था — दण्ड दे कर वे भारतीय को डराते थे। कन्तु जस
बालक को मृत्यु का भय ही न हो, उस पर उनका कोई शस्त्र नह चलता। यह उनके लए बल्कुल नया अनुभव था,
इसी लए वे च कत हुए। यही पाठ का शीषक सद्ध करता है — न खलु वयस्तेजसो हेतुः।

शब्द-भेद: ‘प्रसन्नता’ (सुख), ‘शा न्तः’ (मन क स्थरता), ‘तृ प्तः’ (कतव्य पूरा होने का सन्तोष), ‘तेजः’ (मुख का
ओज) — चार अलग-अलग भाव ह; उत्तर म चार लखना चा हए, केवल ‘प्रसन्नता’ लखना अधूरा उत्तर है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 44

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः
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प्रश्नः २ — अधः प्रदत्तेषु वाक्येषु क वाक्यं सत्यं क च असत्यम् इ त सूचयत
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सत्यम् / असत्यम्

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a s emदे शभक्तानां जीवनं राष्ट्राय सम पतं भव त। (सत्यम् / असत्यम्)
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सत्यम्। ( हन्द — यह वाक्य सत्य है।)
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पाठ-पमाणम् — “अतः सः नवमी ं कक्षाम् अिप पूण ं कत ुं न शक्तवान्। यतोिह दे शभ क्तानां जीवनं रा ाय समिपतं

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भवित।”

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क्य सत्य: यह वाक्य पाठ म शब्दशः वद्यमान है और खुद राम के जीवन से सद्ध भी होता है — उन्ह ने पढ़ाई, सुख,
a g यहाँ तक क जीवन भी राष्ट्र के लए त्याग दया। ‘राष्ट्राय’ म चतुथ है — «ताद य चतुथ » अथात् ‘राष्ट्र के लए’।
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नदयः कङ् ग्ज़फोड् बालान् अ प दण्डय त स्म। (सत्यम् / असत्यम्)
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सत्यम्। ( हन्द — यह वाक्य सत्य है।)
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m माणम् — “कलकत्ता-जनपदस्य मुख्यः न्याियकः आङ् ग्लः अिधकारी ‘िकङ् ग्ज़फोड् ’ भारतीय-दे शभक्तान्
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अतीवकठोररीत्या दण्डयित स्म। िनद यः सः बालान् अिप न त्यजित स्म।”

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ध्यान द जए: पाठ म ‘बालान् अ प न त्यज त स्म’ (बालक को भी नह छोड़ता था) लखा है — प्रश्न-वाक्य म
उसी बात को सकारात्मक रूप म ‘बालान् अ प दण्डय त स्म’ कहा गया है। अथ एक ही है, अतः वाक्य सत्य है। यही
नदयता उसके वध क योजना का कारण बनी।

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खुद रामस्य आक्रमणेन कङ् ग्ज़फोड् मृतः। (सत्यम् / असत्यम्)

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असत्यम्। ( हन्द — यह वाक्य असत्य है।) शुद्धं वाक्यम् — खुद रामस्य आक्रमणेन कङ् ग्ज़फोड् न मृतः; केनेडीनामकस्य
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अ धका रणः पत्नी पुत्री च मृते।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

पाठ-पमाणम् — “यद्यिप सः िकङ् ग्ज़फोड् महोदयस्य रथः आसीत् तथािप तिस्मन् सः नासीदे व।

के ने डीनामकस्य अिधकािरणः पत्नी पुत्री च तत्र आस्ताम्। ते मृते िक न्त ु िकङ् ग् ज़फोड् रिक्षतः।”

यही पाठ का सबसे करुण मोड़ है: रथ तो कङ् ग्ज़फोड का ही था, पर उस समय उसम वह बैठा नह था। इसी लए
पाठ म ‘ कन्तु हा धक् !’ (हाय, धक्कार है!) जैसा खेद-सूचक वाक्य आया है। ‘आस्ताम्’ द्ववचन है — क्य क
पत्नी और पुत्री दो थ ; इसी से ‘ते मृते’ भी द्ववचन म है।

प्र.2 (घ) खुद रामः कङ् ग्ज़फोड् महोदयस्य रथस्य उप र व ोटकं क्षप्तवान्। (सत्यम् / असत्यम्)

सत्यम्। ( हन्द — यह वाक्य सत्य है।)

पाठ-पमाणम् — “अष्टािधक-नवदशशततमवषस्य एिपलमासस्य अष्टािवंशे िदनाङ् के (२८-०४-१९०८)
िकङ् ग्ज़फोड् इत्यस्य रथिवशेषे पफु ल्ल-खुद ीरामाभ्यां िवस्फोटकं पिक्षप्तम्।”

सूक्ष्म अन्तर, ध्यान र खए: पाठ म यह काय दोन ने मलकर कया — ‘प्रफुल्ल-खुद रामाभ्यां’ (तृतीया द्ववचनम्,
कमवाच्ये कता)। अतः घटना सत्य है, पर पूण उत्तर य ल खए — ‘सत्यम्, कन्तु व ोटकं प्रफुल्ल-खुद रामाभ्यां
सह प्र क्षप्तम्।’ यह वही प रशु द्ध है जसक अपेक्षा कक्षा ९ के वद्याथ से क जाती है।

व्याकरण: पाठ का वाक्य कमवाच्य म है ( व ोटकं प्र क्षप्तम् — कम प्रथमा म, कता तृतीया म), जब क प्रश्न-
वाक्य कतृवाच्य म है (खुद रामः … क्षप्तवान्)। यही वाच्य-प रवतन है।

प्र.2 (ङ) खुद रामः बालानां सङ् घटनं कृत्वा पदयात्राम् आयोजय त स्म। (सत्यम् / असत्यम्)

सत्यम्। ( हन्द — यह वाक्य सत्य है।)

पाठ-पमाणम् — “बालानां संघटनं कृ त्वा सः पदयात्राम् आयोजयित स्म। तस्यां यात्रायां दे शभिक्तयुत ािन

गीतािन, ‘वन्दे मातरम्’ चे त्यादयः घोषणाः भविन्त स्म।”

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

महत्त्व: खुद राम ने अकेले काम नह कया — उन्ह ने अपनी ही आयु के बालक को संग ठत कया, पदयात्रा
नकाली और लोकजागरण के पत्रक बाँटे। यही ‘संगठन’ कशोर आयु म उनके नेतृत्व-गुण का प्रमाण है।

व्याकरण: ‘कृत्वा’ क्त्वा-प्रत्ययान्त अव्यय है — जब एक ही कता के दो काय क्रम से ह तो पहले काय म क्त्वा
लगता है (पहले संगठन कया, फर पदयात्रा क )।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 44
प्रश्नः ३ — अधः प्रदत्तानां संवत्सराणां शब्दानाम् अङ् कैः सह मेलनं कुरुत

मे ल नम्

प्र.3 (क) सप्तचत्वा रशद धक-नवदशशततमं वषम् (ख) अष्टा धक-नवदशशततमं वषम् (ग) पञ्चाशदुत्तर-
नवदशशततमं वषम् (घ) पञ्चा धक-नवदशशततमं वषम् (ङ) नवाशीत्य धक-अष्टादशशततमं वषम् — एतेषाम्
अङ् कैः (१. १९०५ २. १८८९ ३. १९४७ ४. १९०८ ५. १९५०) सह मेलनं कुरुत।

मेलनम् — (क) → ३ (१९४७), (ख) → ४ (१९०८), (ग) → ५ (१९५०), (घ) → १ (१९०५), (ङ) → २ (१८८९)।

क्रमः संवत्सरस्य शब्दरूपम् अङ् कः गणना (कैसे बना) इ तहासे महत्त्वम्

(क) सप्तचत्वािरंशदिधक- ३. नवदशशत (१९००) + भारतस्य स्वातन्त्र्यप्रा प्तः
नवदशशततमं वषम् १९४७ सप्तचत्वा रशत् (४७)

(ख) अष्टािधक-नवदशशततमं वषम् ४. नवदशशत (१९००) + अष्ट कङ् ग्ज़फोड् -आक्रमणम् (२८-०४) तथा
१९०८ (८) खुद रामस्य हौतात्म्यम् (११-०८)

(ग) पञ्चाशदुत्त र-नवदशशततमं ५. नवदशशत (१९००) + भारतस्य सं वधानस्य प्रवतनम् —
वषम् १९५० पञ्चाशत् (५०) गणतन्त्र दवसः

(घ) पञ्चािधक-नवदशशततमं वषम् १. नवदशशत (१९००) + पञ्च कजनेन कृतः बङ्गप्रान्तस्य वभाजनम् —
१९०५ (५) बङ्गभङ्ग-आन्दोलनम्

(ङ) नवाशीत्यिधक-अष्टादशशततमं २. अष्टादशशत (१८००) + खुद रामस्य जन्म ( दसम्बरमासस्य तृतीये
वषम् १८८९ नवाशी त (८९) दनाङ् के)

नयम समझ ली जए, फर कोई भी वष लख सकगे: संस्कृत म वष दो टु कड़ म बनता है —
(१) शतक-भाग : ‘नवदशशततमम्’ = १९ × १०० = १९००; ‘अष्टादशशततमम्’ = १८ × १०० = १८००।
(२) इकाई-भाग : ‘…अ धकम्’ अथवा ‘…उत्तरम्’ = ‘उससे इतना अ धक’। जैसे ‘पञ्चा धक’ = +५, ‘अष्टा धक’ =
+८, ‘सप्तचत्वा रशद धक’ = +४७, ‘पञ्चाशदुत्तर’ = +५०, ‘नवाशीत्य धक’ = +८९।

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परीक्षणम् —

पञ्चािधक + नवदशशततमम् = ५ + १९०० = ९ १ ०५ ✓
सप्तचत्वािरंशदिधक + नवदशशततमम् = ४७ + १९०० = ९ १ ४७ ✓
नवाशीत्यिधक + अष्टादशशततमम् = ८९ + १८०० = ८८९ ✓ १

स न्ध-सूचना: ‘सप्तचत्वा रशत् + अ धक’ म त् + अ = द् + अ (जश्त्व) → सप्तचत्वा रशद धक। ‘नवाशी त +
अ धक’ म इ + अ = य् + अ (यण्) → नवाशीत्य धक। ‘पञ्चाशत् + उत्तर’ म भी जश्त्व से ‘पञ्चाशदुत्तर’ बना।

ध्यातव्यम्: १९४७ तथा १९५० — ये दो वष पाठ म कह नह आए; ये सामान्य राष्ट्रीय ज्ञान से जोड़ने के लए दए
गए ह। शेष तीन (१९०५, १९०८, १८८९) सीधे पाठ से ह।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 45
प्रश्नः ४ — अधः प्रदत्ता न पदा न आधृत्य चत्रं दृष्ट् वा पञ्च वाक्या न लखत (म ूषा — उद्यानं, गृहा ण, प क्षणः, पुष्पा ण, स्वच्छता,
च क्रका, पवतः, वृक्षाः, सूयः, मेघाः)

चत्रवणनम्

प्र.4 अधः प्रदत्ता न पदा न आधृत्य चत्रं दृष्ट् वा पञ्च वाक्या न लखत — उद्यानं, गृहा ण, प क्षणः, पुष्पा ण, स्वच्छता,
च क्रका, पवतः, वृक्षाः, सूयः, मेघाः।

चत्रे क कम् अ स्त (पुस्तकस्थस्य चत्रस्य वणनम्) — पुस्तक के चत्र म एक हरा-भरा खुला उद्यान है। पीछे ऊँचा पवत और
उससे गरता जलप्रपात है; दा हनी ओर छोटे -छोटे गृह (गाँव के घर) दखते ह। आकाश म सूय, श्वेत मेघ और उड़ते पक्षी ह। सामने
बालक-बा लकाएँ खेल रहे ह — कोई कन्दुक (फुटबॉल) से, कोई चटकक्र डा (बैड मटन) से; एक बालक द्वच क्रका चला रहा है और
एक बा लका चक्रयुक्त आसन्द (व्हील-चेयर) पर बैठ खेल दे ख रही है। नीचे लाल पुष्प, तत लयाँ और स्वच्छ हरी घास है।
पञ्च वाक्या न (आदश उत्तरम्) —

(क) िचत्रे एकम् अतीव रमणीयम् उद्य ानम् अिस्त, यत्र बालकाः बािलकाः च आनन्दे न क्रीडिन्त।

(ख) उद्याने बहूिन रक्तवण िन पुष्पािण िवकिसतािन सिन्त, हिरताः वृक्षाः च शोभन्ते ।

(ग) पृष्ठभागे उन्नतः पवतः दृ श्यते , तस्य समीपे च गामस्य लघूिन गृहािण सिन्त।

(घ) आकाशे सूयः पकाशते , श्वेत ाः मेघाः सञ्चरिन्त, पिक्षणः च उड्डयन्ते ।
(ङ) एकः बालकः िद्वचिक्र काम् आरुह्य चलित, एका बािलका च चक्रासन्द्याम् उपिवश्य क्रीडां पश्यित; सवत्र

स्वच् छता िवद्यते इित िचत्रस्य िवशेषता।

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( हन्द अथ — (क) चत्र म एक बहुत सुन्दर उद्यान है, जहाँ लड़के और लड़ कयाँ आनन्द से खेल रहे ह। (ख) उद्यान म बहुत-से लाल
फूल खले ह और हरे वृक्ष शोभा दे रहे ह। (ग) पीछे ऊँचा पवत दखाई दे ता है और उसके पास गाँव के छोटे -छोटे घर ह। (घ) आकाश
म सूय चमक रहा है, सफ़ेद बादल घूम रहे ह और पक्षी उड़ रहे ह। (ङ) एक बालक साइ कल चला रहा है और एक बा लका प हयेदार
कुस पर बैठकर खेल दे ख रही है; सब ओर स्वच्छता है — यही चत्र क वशेषता है।)

अच्छे चत्रवणन म क्या होना चा हए: (१) मञ्जूषा के सभी पद प्रयुक्त ह — ऊपर दस के दस आ गए ह; (२)
वाक्य वतमानकाल (लट् -लकार) म ह , क्य क चत्र का वणन ‘अभी दख रहा है’ के भाव म होता है; (३) कता-
क्रया का वचन मले — ‘पुष्पा ण वक सता न स न्त’ (बहुवचन), ‘सूयः प्रकाशते’ (एकवचन); (४) क्रम ऐसा हो
— पहले पूरा दृश्य, फर वस्तार, अन्त म वशेष बात।

उपयोगी शब्द (य द और वाक्य लखने ह ): जलप्रपातः (झरना), कन्दुकक्र डा (फुटबॉल), चटकक्र डा
(बैड मटन), चत्रपतङ्गः/शलभः ( ततली), ह रतं तृणम् (हरी घास), शुद्धः वायुः, प्राकृ तकसौन्दयम्। एक भावपूण
अ न्तम वाक्य भी जोड़ा जा सकता है — “ दव्याङ्गा अ प बा लका क्र डायाम् उत्साहेन भागं गृ ा त — इदम्
एव समावेशस्य सन्दे शः।” ( दव्यांग बा लका भी उत्साह से खेल म स म्म लत है — यही समावे शता का सन्दे श है।)

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 46
प्रश्नः ५ — स न्धच्छे दं कुरुत

स न्धः

प्र.5 (क) इत्यादयः

इत्यादयः = इ त + आदयः। ( हन्द — ‘इ त’ और ‘आदयः’ के मेल से बना; अथ — इत्या द, आ द।)

सिन्धः — यण् सि धः («इको यणिच»)
न्

इत ि ◌ + आ दयः → इ + आ = य् + आ = या
अतः इत् + या + दयः = इ यादयः
त्

नयम: इ/ई, उ/ऊ, ऋ, लृ के बाद कोई असवण स्वर आए तो क्रमशः य्, व्, र्, ल् हो जाता है। यहाँ ‘इ त’ का
अ न्तम इ और ‘आदयः’ का आ द आ — दोन असवण ह, अतः इ → य्।

पाठ म: “दे शभ क्तयुता न गीता न, ‘वन्दे मातरम्’ चेत्यादयः घोषणाः भव न्त स्म।” — यहाँ ‘च + इत्यादयः’ क भी
स न्ध हुई है (च + इत्यादयः = चेत्यादयः, गुण स न्ध)।

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सवऽ प
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प्र.5 (ख)

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aglप = सव + अ प। ( हन्द — ‘सव’ और ‘अ प’ के मेल से बना; अथ — सब भी, सब के सब।)
सवऽ

सिन्धः — पूव प सि धः («एङः पदान्तादित») .com ag
em ऽ अवगहः िलख्यते )
रू न्

s
सव◌ े + अिप → ए + अ = ए (अकारः लुप्तः,aतत्स्थाने
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= सवऽिप

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se m.
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g है क यहाँ एक ‘अ’ छपा
नयम: पद के अन्त म ए या ओ हो और उसके बाद अ आए, तो वह ‘अ’ लुप्त हो जाता है और पूवरूप (ए/ओ) ही

m .cहै। लुप्त ‘अ’ के स्थान पर अवग्रह चह्न ‘ऽ’ लखा जाता है — यह चह्न aबताता
aहैs। e
शेष रहता

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अन्य उदाहरण: ते + अ प = तेऽ प, वृक्षो + अयम् = वृक्षोऽयम्, सः + अ प = सोऽ प। पाठ म: “ते सवऽ प

s em
क्रा न्तवीराः अस्मा भः कृतज्ञताभावनया नत्यं वन्दनीयाः।”
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agl

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क श्चत्
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प्र.5 (ग)

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उत्तर . a
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aglaक श्चत् = कः + चत्। ( हन्द — ‘कः’ और ‘ चत्’ के मेल से बना; अथ — कोई (पुं लङ्ग)।)
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com सः», ततः «स्तोः श्चुना श्चुः»)
िवसग सि धः (श्चुत्व-सिहतः; «िवसजनीयस्य g l a
सिन्धः — न्
.
m श् a
क ◌ ः + च्ि◌त् → िवसगः → स् →aच् s e-सिन्नधौ
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= क + श् + िचत् = कि चत् श्

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m .
o m l a se
नयम, दो पग म: (१) वसग के बाद च्/छ् आए तो वसग का श् हो जाता है; (२) यही नयम त्/थ् के पूव स् और
g च-वग के संसग से ‘श्’ (श्चत्व)।
.cट्/ठ् के पूव ष् दे ता है। सूत्र इसे य कहता है — वसग पहले ‘स्’ बनता है,aफर
se m
g l a
a c
m .
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तुलना क जए: कः + चत् = कश् चत्; कः + तत्र = कस्तत्र; रामः + ट कते = रामष्ट कते। पाठ म: “खुद रामः
m a s
. co agl
तेषु एव दे शभक्तेषु कश्चन तेजस्वी बालक्रा न्तवीरः हुतात्मा अ स्त”, “कस्य चत् गुप्तमण्डलस्य सञ्चालकः आसीत्

e m
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सत्येन्द्रनाथः।”

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प्र.5 (घ) प्रत्येकम्

प्रत्येकम् = प्र त + एकम्। ( हन्द — ‘प्र त’ और ‘एकम्’ के मेल से बना; अथ — हर एक, प्रत्येक।)

सिन्धः — यण् सि धः («इको यणिच»)
न्

पत ि◌ + एकम् → इ + ए = य् + ए = ये

= पत् + ये + कम् = प येक म् त्

यह भी यण् ही क्य : ‘इ’ के बाद ‘ए’ आया है — ‘ए’ भी ‘इ’ का असवण स्वर है (ए = अ + इ का सन्ध्यक्षर, पर
सवण नह )। अतः इ → य् हुआ। तुलना — प्र त + एकः = प्रत्येकः, अ त + एव = अत्येव, नद + एषा = नद्येषा।

पाठ म: “तत्र अ धवक्तॄणां प्रत्येकं प्रश्नस्य खुद रामस्य न श्चतम् उत्तरम् आसीत् यत् ‘वन्दे मातरम्’ इ त।”

प्र.5 (ङ) वयस्तेजसः

वयस्तेजसः = वयः + तेजसः। ( हन्द — ‘वयः’ (आयु) और ‘तेजसः’ (तेज का) के मेल से बना।)

सिन्धः — िवसग सि धः («िवसजनीयस्य सः»)
न्

वय◌ ः + त्◌ ेजसः → िवसगः त्-पूव स्

= वय + स् + ते जसः = वय ते जसः स्

नयम: वसग के बाद य द त्, थ् (तवग का अघोष) आए तो वसग का स् हो जाता है। इसी नयम से — नमः + ते =
नमस्ते; पुनः + तत्र = पुनस्तत्र; नः + तेजः = नस्तेजः।

यह पाठ का शीषक-पद है: ‘न खलु वयस्तेजसो हेतुः’ = न खलु वयः तेजसः हेतुः — ‘आयु नश्चय ही तेज का
कारण नह है’। यहाँ ‘तेजसो हेतुः’ म भी वसग-स न्ध है — तेजसः + हेतुः म वसग से पूव ‘अ’ और आगे घोष वण
‘ह्’ होने से वसग का उ होकर ‘ओ’ बना (अः + ह = ओ ह)।

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प्र.5 (च) अ चरादे व

अ चरादे व = अ चरात् + एव। ( हन्द — ‘अ चरात्’ (शीघ्र ही) और ‘एव’ के मेल से बना; अथ — शीघ्र ही।)

सिन्धः — ज व सि धः («झलां जशोऽन्ते »)
श्त् न्

अिचरात् + एव → त् + ए = द् + ए

= अिचरा + दे + व = अिचरादे व

नयम: पद के अन्त म आया वग का प्रथम वण (क् च् ट् त् प्) य द उसके बाद स्वर अथवा घोष वण (वग का ३रा/
४था/५वाँ, य् र् ल् व्) आए, तो वह अपने वग का तृतीय वण (ग् ज् ड् द् ब्) बन जाता है। यहाँ त् के बाद स्वर ‘ए’ है,
अतः त् → द्।

अन्य उदाहरण: जगत् + ईशः = जगद◌ीशः; सत् + आनन्दः = सद◌ानन्दः; वाक् + ईशः = वाग◌ीशः। पाठ म:
“भुशु ण्डसञ्चालने अ प तौ अ चरादे व प्रवीणौ सञ्जातौ।”

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 46
प्रश्नः ६ — वग्रहवाक्यं दृष्ट् वा पाठ्यपुस्तकात् समस्तपदा न चत्वा पूरयत

समासः

प्र.6 (क) दे शस्य भक्ताः

समस्तपदम् — दे शभक्ताः। ( हन्द — दे श के भक्त = दे शभक्त।)

िवगहः — दे शस्य भक्ताः → समासः — दे शभ ताः
क्

समासस्य नाम — ष ठी त पु षः
ष् त् रु

यही समास क्य : वग्रह म पूवपद ‘दे श’ षष्ठी वभ क्त म है (दे शस्य) और समास म वह वभ क्त लुप्त हो जाती है
— यही तत्पुरुष का लक्षण है। तत्पुरुष म उत्तरपद प्रधान होता है; यहाँ मुख्य बात ‘भक्त’ ह, ‘दे श’ केवल उनका
सम्बन्ध बताता है। जस वभ क्त का लोप हो, समास उसी नाम से पुकारा जाता है — यहाँ षष्ठी, अतः ‘षष्ठी
तत्पुरुष’।

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पाठ म: “यतो ह दे शभक्तानां जीवनं राष्ट्राय सम पतं भव त।” तथा “कलकत्ता-जनपदस्य … अ धकारी
‘ कङ् ग्ज़फोड् ’ भारतीय-दे शभक्तान् अतीवकठोररीत्या दण्डय त स्म।”

प्र.6 (ख) बालः च क्रा न्तवीरः च

समस्तपदम् — बालक्रा न्तवीरः। ( हन्द — जो बालक भी है और क्रा न्तवीर भी = बाल-क्रा न्तवीर।)

पाठस्य वाक्यम् — “खुद ीरामः ते ष ु एव दे शभक्ते ष ु कश्चन ते जस्वी बालक्र ािन्तवीरः हुत ात्मा अिस्त।”

समास का नाम — ध्यान से: पुस्तक ने वग्रह ‘बालः च क्रा न्तवीरः च’ (द्वन्द्व-शैली म) दया है, कन्तु पाठ का पद
एकवचन म है — बालक्रा न्तवीरः, दो व्य क्त नह । य द द्वन्द्व होता तो रूप ‘बालक्रा न्तवीरौ’ ( द्ववचन) बनता। अतः
यहाँ वस्तुतः कमधारय समास है, जसका शुद्ध वग्रह है — ‘बालः च असौ क्रा न्तवीरः च’ = बालक्रा न्तवीरः, अथात्
एक ही व्य क्त जो बालक भी है और क्रा न्तवीर भी। कमधारय म दोन पद समान वभ क्त म तथा एक ही वस्तु के
वशेषण- वशेष्य होते ह।

तुलना: ‘रामः च कृष्णः च = रामकृष्णौ’ — यह द्वन्द्व (दो अलग व्य क्त, द्ववचन); ‘नीलः च असौ कमलः च =
नीलकमलम्’ — यह कमधारय (एक ही वस्तु)। उत्तर लखते समय समस्तपद ‘बालक्रा न्तवीरः’ ही लख, क्य क
पाठ से यही पद लेना है।

प्र.6 (ग) वज्रेण सदृशम्

समस्तपदम् — वज्रसदृशम्। ( हन्द — वज्र के समान।)

िवगहः — वज्रे ण सदृ शम् → समासः — वज्रसदृ शम्
समासस्य नाम — तृतीया त पु षः
त् रु

यही समास क्य : पूवपद ‘वज्र’ तृतीया वभ क्त म है (वज्रेण), जो समास म लुप्त हो गई — अतः तृतीया तत्पुरुष।
‘सदृश’, ‘तुल्य’, ‘समान’, ‘ नपुण’, ‘कुशल’ जैसे शब्द के साथ तृतीया आती है («तुल्याथः … तृतीया»)।

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पाठ म: सत्येन्द्रनाथ का उपदे श — “क्रा न्तकाय कतु शरीरं वज्रसदृशं दृढं … भवेत्।” यहाँ उपमा अलंकार है —
वज्र सबसे कठोर वस्तु मानी जाती है, अतः क्रा न्तकारी का शरीर भी उतना ही दृढ़ चा हए।

प्र.6 (घ) असेः धारा

समस्तपदम् — अ सधारा। ( हन्द — तलवार क धार।)

िवगहः — असेः धारा → समासः — अिसधारा
समासस्य नाम — ष ठी त पु षः
ष् त् रु

यही समास क्य : ‘अ स’ (तलवार) षष्ठी म है — असेः (‘अ स’ इकारान्त पुं लङ्ग, षष्ठी एकवचन = असेः)। समास म
यह वभ क्त लुप्त हुई, उत्तरपद ‘धारा’ प्रधान रहा — अतः षष्ठी तत्पुरुष।

पाठ म: “बु द्धः अ सधारा इव तीक्ष्णा … भवेत्।” — बु द्ध तलवार क धार जैसी तेज़ हो। ध्यान द जए, यहाँ ‘इव’
के कारण उपमा है; ‘अ सधारा’ उपमान है और ‘बु द्ध’ उपमेय।

प्र.6 (ङ) मृत्युः एव दण्डः

समस्तपदम् — मृत्युदण्डः। ( हन्द — मृत्यु ही जसम दण्ड है = मृत्युदण्ड, प्राणदण्ड।)

िवगहः — मृत्युः एव दण्डः → समासः — मृ युद डः
त् ण्

समासस्य नाम — कमधारयः (अवधारणापूवपद कमधारयः / रूपक-कमधारयः)

यही समास क्य : वग्रह म ‘एव’ (ही) आया है — यह अवधारणा ( नश्चय) का सूचक है और दोन पद प्रथमा
वभ क्त म समान ह। जब दो समाना धकरण पद ‘एव’ से जुड़कर एक-दूसरे का रूप बन जाएँ, तब वह कमधारय का
यही भेद होता है ( जसे रूपक-कमधारय भी कहते ह)। तुलना — वद्या एव धनम् = वद्याधनम्; क्रोधः एव अ ग्नः =
क्रोधा ग्नः।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः
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पाठ म: “न्यायाधीशेन नदयतया बालाय खुद रामाय मृत्युदण्डः उ ो षतः – उद्बन्धनम् इ त।” यहाँ ‘बालाय …
उ ो षतः’ म चतुथ है — «सम्प्रदाने चतुथ » के भाव से ‘बालक के लए/को’ दण्ड सुनाया गया। em
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प्र.6 (च) न साधारणः

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ag नह = असाधारण।)
समस्तपदम् — असाधारणः। ( हन्द — जो साधारण

असाधारणः co m
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िवगहः — न साधारणः → समासः —

m नञ् त पु षः as e
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समासस्य नाम — त् रु
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a यही समास क्य : जब नषेधवाचक ‘न’ ( जसक संज्ञा नञ् है) पूवपद बनता है, तब वह नञ् तत्पुरुष कहलाता है।

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नयम — व्यञ्जन से आरम्भ होने वाले पद के पहले ‘न’ का अ हो जाता है, और स्वर से आरम्भ होने वाले पद के

se m
पहले अन्। यथा — न साधारणः = असाधारणः; न अन्तः = अनन्तः; न उ चतम् = अनु चतम्।

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पाठ म: “बाल्यकालतः एव खुद रामः असाधारणः आसीत्।” — यही समास पुस्तक क शब्दाथ-ता लका म भी
‘नञ् तत्पुरुषः’ लखकर बताया गया है।
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नगता दया यस्मात् सः
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प्र.6 (छ)

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समस्तपदम् — नदयः। ( हन्द — जससे दया नकल गई हो, वह = नदय।)

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िवगहः — िनगता दया यस्मात् सः → समासः — िनदयः
बहुवीिहः co m
समासस्य नाम —
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se m यही समास क्य (सबसे बड़ी पहचान): वग्रह म ‘यस्मात् सः’ / ‘यस्य सः’ जैसा सवनाम आता है — इसका अथ
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.
है क समास का अथ उसके अपने दोन पद म नह , कसी तीसरे (अन्यपद) म है। ‘ नदयः’ न ‘ नगत’ का बोध
कराता है न ‘दया’ का, अ पतु उस व्य क्त का जसम दया नह — इस लए यह बहु ी ह है, तत्पुरुष या कमधारय
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नह । बहु ी ह म अन्यपद प्रधान होता है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

पाठ म: “ नदयः सः बालान् अ प न त्यज त स्म।” — वशेषण कङ् ग्ज़फोड के लए है। अन्य उदाहरण — पीतम्
अम्बरं यस्य सः = पीताम्बरः; चन्द्रः शेखरे यस्य सः = चन्द्रशेखरः।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 46 – 47
प्रश्नः ७ — लङ् लकारः, क्तवतु-प्रत्ययः, स्म, क्तप्रत्ययः — एते सवऽ प भूतकालं सूचय न्त। अधः दत्ता न वाक्या न सूचनानुसारं प रवतयत (यथा
— खुद रामः हुतात्मा जातः। (लङ् -लकारः) → खुद रामः हुतात्मा अजायत।)

वाक्यप रवतनम्

प्र.7 (क) वन्दे मातरम् इत्यादयः घोषणाः भव न्त स्म। (लङ् -लकारः)

वन्दे मातरम् इत्यादयः घोषणाः अभवन्। ( हन्द — ‘वन्दे मातरम्’ आ द घोषणाएँ होती थ / हुईं।)

िनयमः — लट् -लकारः + स्म = भूत कालः। ‘स्म’ हटाकर वही िक्रया लङ् -लकार में रखनी है।
भविन्त (लट् , पथमपुरु षः, बहुवचनम्) → अभवन् (लङ् , पथमपुरुषः, बहुवचनम्)
√भू (भ्वािदगणः, परस्मैपदी) — लङ् : अभवत् · अभवताम् · अभवन्

क्य ‘अभवन्’ ही: कता ‘घोषणाः’ प्रथमा बहुवचन है, अतः क्रया भी प्रथमपुरुष बहुवचन म चा हए। लङ् -लकार
म धातु से पहले अ (अट् -आगम) जुड़ता है — इसी लए ‘भवन्’ नह , ‘अभवन्’। ‘स्म’ हटाना अ नवाय है, क्य क
लङ् स्वयं भूतकाल बता दे ता है; दोन साथ रखना पुनरु क्त होगी।

प्र.7 (ख) सत्येन्द्रनाथः खुद रामम् उपा दशत्। (क्तवतु-प्रत्ययः)

सत्येन्द्रनाथः खुद रामम् उप दष्टवान्। ( हन्द — सत्येन्द्रनाथ ने खुद राम को उपदे श दया था।)

िनयमः — क्तवत -ु पत्ययः धात ु से भूत कािलक कतृवा य िवशेषण बनाता है — रूप ‘…वान् / …वती / …वत्’।
च्

उप + √िदश् + क्तवत ु → उपिद टवान् (पुंिलङ् गम्, पथमा, एकवचनम्)
ष्

कत ‘सत्येन्द नाथः’ पुंिलङ् ग एकवचन है, अतः िवशेषण भी वैसा ही।

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‘ दश्’ से ‘ दष्ट’ क्य : श् के बाद त् आने पर ष्टु त्व होता है — श् → ष् और त् → ट् ; अतः दश् + त = दष्ट। इसी से
‘उप दष्टवान्’, ‘उप दष्टः’, ‘उपदे शः’ बनते ह। पाठ म भी यही रूप आया है — “सत्येन्द्रनाथः उपा दशत्—” (लङ् )
तथा प्रश्न १ (ग) म “ कम् उप दष्टवान्?” (क्तवतु)।

क्तवतु और क्त का भेद: क्तवतु से कता प्रधान होता है (सः उप दष्टवान् = उसने उपदे श दया), जब क क्त से
प्रायः कम प्रधान होता है (तेन उप दष्टम् = उसके द्वारा उपदे श दया गया)।

प्र.7 (ग) सः नवम कक्षां पूणा कतु न शक्तवान्। (लङ् -लकारः)

सः नवम कक्षां पूणा कतु न अशक्नोत्। ( हन्द — वह नव कक्षा भी पूरी न कर सका।)

िनयमः — क्तवत -ु रूप को लङ् -लकार में बदलना है।

शक्तवान् (√शक् + क्तवत )ु → अश नोत्
क्

√शक् (स्वािदगणः, परस्मैपदी) — लङ् : अशक्नोत् · अशक्नुत ाम् · अशक्नुवन्

ध्यान रखने योग्य: ‘शक्’ स्वा दगण (५वाँ गण) का है, अतः लट् म ‘शक्नो त’ और लङ् म ‘अशक्नोत्’ बनता है —
‘अशकत्’ नह । नषेध ‘न’ क्रया से पहले ही रहेगा। कता ‘सः’ प्रथमपुरुष एकवचन है, अतः क्रया भी वह ।

पाठ-सन्दभ: “अतः सः नवम कक्षाम् अ प पूणा कतु न शक्तवान्। यतो ह दे शभक्तानां जीवनं राष्ट्राय सम पतं
भव त।” — पन्द्रह वष क आयु म आन्दोलन म कूद पड़ने के कारण पढ़ाई छू ट गई।

प्र.7 (घ) क्रा न्तवीराः आङ् ग्लानां मन स आतङ् कम् अजनयन्। (स्म)

क्रा न्तवीराः आङ् ग्लानां मन स आतङ् कं जनय न्त स्म। ( हन्द — क्रा न्तवीर अंग्रेज़ के मन म आतंक उत्पन्न करते रहते थे।)

िनयमः — लङ् → लट् + स्म। लङ् का ‘अ’ (अट् -आगम) हटाकर लट् का रूप बनाइए और अन्त में ‘स्म’

जोिड़ ए।

अजनयन् (लङ् , पथमपुरु षः, बहुवचनम्) → जनयि त म (लट् + स्म)
न् स्

√जन् का िणजन्त रूप ‘जनय्’ — जनयित · जनयतः · जनयिन्त

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‘स्म’ का काम: ‘स्म’ लट् -लकार के साथ आकर उसे भूतकाल बना दे ता है और प्रायः बार-बार होने वाली (अभ्यस्त)
क्रया का भाव दे ता है — ‘करते थे’, ‘होता रहता था’। इसी लए पाठ म भी यही रूप है — “गुप्तमण्डला न
आङ् ग्लानां मन स आतङ् कं जनय न्त स्म।”

चेतावनी: ‘स्म’ के साथ कभी भी लङ् का रूप मत ल खए — ‘अजनयन् स्म’ अशुद्ध है। ‘स्म’ सदा लट् (या लोट् /
व ध लङ् के वशेष प्रयोग ) के साथ आता है।

प्र.7 (ङ) प्रफुल्लः भुशुण् ा गो लकाप्रहारं कृतवान्। (लङ् -लकारः)

प्रफुल्लः भुशुण् ा गो लकाप्रहारम् अकरोत्। ( हन्द — प्रफुल्ल ने बन्दूक से गोली चलाई।)

िनयमः — क्तवत -ु रूप को लङ् -लकार में बदलना है।

कृ तवान् (√कृ + क्तवत )ु → अकरोत्
√कृ (तनािदगणः, उभयपदी) — लङ् परस्मैपदे : अकरोत् · अकु रुताम् · अकु वन्

‘भुशुण् ा’ म तृतीया क्य : «कतृकरणयोस्तृतीया» — जस साधन से काम हो, उसम तृतीया आती है। बन्दूक
साधन (करण) है, अतः ‘भुशुण्ड्या’ (भुशुण्डी, स्त्री लङ्ग, तृतीया एकवचन)। ‘गो लकाप्रहारम्’ कम है, अतः «कम ण
द्वतीया» से द्वतीया।

पाठ-सन्दभ: पकड़े जाने से पहले “अनन्यग तकः प्रफुल्लः भारतमातरं मनसा प्रणम्य ‘वन्दे मातरम्’ इ त उ ोष्य च
स्ववक्षःस्थले भुशुण्ड्या गो लकाप्रहारं कृतवान्। वीरबालः प्रफुल्लः हौतात्म्येन अमरः जातः।”

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 47
प्रश्नः ८ — ‘ चत्’-प्रत्ययान्तपदा न प्रयुज्य रक्तस्थाने पूणवाक्यं लखत (म ूषा — क श्चत्, का चत्, क ञ्चत्, कुत्र चत्, कदा चत्)

चत् - प्रत्ययः

प्र.8 (क) बालकः गच्छ त।

क श्चत् बालकः गच्छ त। ( हन्द — कोई बालक जा रहा है।) — यह उदाहरण पुस्तक म स्वयं हल करके दया गया है।

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कः + िचत् = किश्चत् (पुंिलङ् गम्, पथमा एकवचनम्)

िवशेष्यम् — बालकः (पुंिलङ् गम्, पथमा एकवचनम्) ✓ िलङ् ग-िवभिक्त-वचन िमलते है।
ं

‘ चत्’ का काम: प्रश्नवाचक शब्द ( कम् = क:, का, कम्, कदा, कुत्र…) के साथ ‘ चत्’ जुड़ते ही वह प्रश्न से
अ नश्चय म बदल जाता है — ‘कौन?’ से ‘कोई’, ‘कब?’ से ‘कभी’, ‘कहाँ?’ से ‘कह ’। पुस्तक कहती है — “ चत्
प्रत्ययस्य योजनेन अथ अ नश्चयस्य भावः सूच्यते।”

पूरी ता लका (पृष्ठ 47): कदा+ चत् = कदा चत् · कस्य+ चत् = कस्य चत् · केन+ चत् = केन चत् · कुत्र+ चत् =
कुत्र चत् · क त+ चत् = क त चत् · कुतः+ चत् = कुत श्चत् · कथं+ चत् = कथ ञ्चत् · का+ चत् = का चत् · कः+ चत्
= क श्चत् · क+ चत् = क ञ्चत्।

प्र.8 (ख) बा लका गच्छ त।

का चत् बा लका गच्छ त। ( हन्द — कोई बा लका जा रही है।)

का + िचत् = कािचत् — स्त्र ीिलङ् गम्, पथमा, एकवचनम्
िवशेष्यम् — बािलका (स्त्रीिलङ् गम्, पथमा, एकवचनम्) ✓

‘क श्चत्’ क्य नह : ‘ चत्’-प्रत्ययान्त ये पद वशेषण ह, अतः « वशेषणं वशेष्येण समाना धकरणम्» — इन्ह अपने
वशेष्य के लङ्ग, वभ क्त और वचन से मलना चा हए। ‘बा लका’ स्त्री लङ्ग है, इस लए स्त्री लङ्ग रूप ‘का चत्’ ही
आएगा, पुं लङ्ग ‘क श्चत्’ नह ।

अन्य रूप: द्वतीया म — का ञ्चत् बा लकाम् अपश्यम्; तृतीया म — कया चत् बा लकया सह अगच्छत्।

प्र.8 (ग) फलं खादतु।

क ञ्चत् फलं खादतु। ( हन्द — कुछ फल खाइए / थोड़ा फल खाइए।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः
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नपुंसकिलङ् गम्, पथमा/िद्वतीया एकवचनम्
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िकं + िचत् = िकिञ् चत् —
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िवशेष्यम् — फलम् (नपुंसकिलङ् गम्, एकवचनम्) ✓
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l a se लोट् -लकारः, पथमपुरुषः, एकवचनम् — आ ा/पाथना)
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िक्रया — खादत ु (
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स न्ध भी दे खए: क + चत् म अनुस्वार के बाद च्-वग आया, अतः «अनुस्वारस्य य य परसवणः» से अनुस्वार का
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m चत्। इसी नयम से कथं + चत् = कथञ् चत्।
च-वग का पाँचवाँ वण ञ् हो गया — क + चत् =eकञ्
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अथ-भेद: ‘ क ञ्चत्’ का अथ ‘कुछ, थोड़ा’ भी होता है — ‘ क ञ्चत् जलं दे ह’ (थोड़ा जल द जए)।
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m लेखनी लुप्ता। a g
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प्र.8 (घ)

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कुत्र चत् लेखनी लुप्ता। ( हन्द — कलम कह खो गई है।)
m .co agl
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कु त्र + िचत् = कु त्रिचत् — व्
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अ ययम्a (स्थानवाचकम्), अथः ‘कही ं’
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कत — लेखनी (स्त्रीिलङ् गम्, पथमा एकवचनम्); िवशेषणम् — लुप्ता (√लुप ् + क्त, स्त्रीिलङ् गे)

se m
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g तो न श्चत है, पता नह कहाँ
m .c‘का चत्’ क्य नह : वाक्य म अ नश्चय कलम का नह , स्थान का है — कलम a
ase गरी। स्थान के अ नश्चय के लए ‘कुत्र चत्’ (कह ) प्रयुक्त होता है। यह अव्यय है, अतः इसका रूप कभी नह
यहाँ

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बदलता।

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तुलना: ‘का चत् लेखनी लुप्ता’ का अथ होगा ‘कोई (एक) कलम खो गई’ — वह भी शुद्ध वाक्य है, पर पुस्तक

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मञ्जूषा के पाँच पद एक-एक बार प्रयोग कराना चाहती है, अतः यहाँ ‘कुत्र चत्’ ही उपयुक्त है।

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सः आगच्छे त्।
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प्र.8 (ङ)

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agl उत्तर
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कदा चत् सः आगच्छे त्। ( हन्द — शायद वह आए / कभी वह आ सकता है।)
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m . co agl
कदा + िचत् = कदािचत् —
l se (कालवाचकम्), अथः ‘कभी, शायद’
अaययम्
ag -लकारः, पथमपुरुषः, एकवचनम्) — सम्भावना का बोध
व्

िक्रया — आगच्छे त ् (िविधिलङ्

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m ase
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यह जोड़ी क्य बनी: व ध लङ् स्वयं ‘सम्भावना/चा हए’ का अथ दे ता है, और ‘कदा चत्’ भी अ नश्चय-सम्भावना
का — दोन मलकर अथ पूण करते ह: ‘शायद वह आ जाए’। य द ‘कुत्र चत्’ लगाते तो अथ ‘वह कह आए’ बनता,
जो अधूरा है।

पाठ म: “कदा चत् खुद रामः पत्रक वतरणसमये आङ् ग्लानां हस्तगतः जातः।” — यहाँ ‘कदा चत्’ का अथ ‘एक
बार’ है, जैसा शब्दाथ-ता लका म भी दया गया है (कदा चत् = एकदा)।

स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 48 – 49
प्रश्नः १ — अधः प्रदत्ता न युगलपदा न अव्यया न स न्त। तेषां प्रयोगः अधः प्रदत्तेषु वाक्येषु प्रद शतः। ध्यानेन पठन्तु रक्तस्थाना न च पूरयन्तु
(युगला न — यत्…इ त · यदा…तदा · यावत्…तावत् · यद्य प…तथा प)

यु ग ल-अव्यया न

प्र.1 (क) सुभाषचन्द्रः वद त ……………… भवन्तः मह्यं रु धरं यच्छन्तु अहं भवद्भ्यः स्वातन्त्र्यं प्रयच्छा म ………………
।

सुभाषचन्द्रः वद त यत् भवन्तः मह्यं रु धरं यच्छन्तु अहं भवद्भ्यः स्वातन्त्र्यं प्रयच्छा म इ त। ( हन्द — सुभाषचन्द्र कहते ह क
‘आप मुझे रक्त द जए, म आपको स्वतन्त्रता दूँ गा’।)

‘यत्…इ त’ क्य : यह युगल कथन को उद्धत करने के लए आता है — ठ क वैसे ही जैसे हन्द म ‘…कहा क …
ऐसा’। ‘यत्’ कथन का आरम्भ बताता है और ‘इ त’ उसका अन्त। जहाँ ‘वद त / उक्तवान् / अवदत् / कथय त’
जैसी कहने क क्रया हो, वह यही जोड़ी लगेगी। पुस्तक का उदाहरण भी यही है — “स्वामी ववेकानन्दः उक्तवान्
यत् साम यमेव जीवनं दुबलता मृत्युः इ त।”

ऐ तहा सक सन्दभ: यह नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का प्र सद्ध उ ोष है — “तुम मुझे खून दो, म तुम्ह आज़ाद दूँ गा।”
‘मह्यम्’ (चतुथ — मुझे) तथा ‘भवद्भ्यः’ (चतुथ बहुवचन — आप लोग को) दोन «सम्प्रदाने चतुथ » के उदाहरण
ह।

प्र.1 (ख) ……………… अजुनः भीष्मद्रोणाद न् अपश्यत् ……………… शोकं प्रा ोत्।

यदा अजुनः भीष्मद्रोणाद न् अपश्यत् तदा शोकं प्रा ोत्। ( हन्द — जब अजुन ने भीष्म-द्रोण आ द को दे खा, तब वह शोक को
प्राप्त हुआ।)

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‘यदा…तदा’ क्य : दोन वाक्यांश एक ही समय क दो घटनाएँ बताते ह — दे खना और शोक होना। जहाँ ‘जब …
तब’ का सम्बन्ध हो, वहाँ ‘यदा…तदा’ आता है। दोन क्रयाएँ यहाँ भूतकाल (लङ् ) म ह — अपश्यत्, प्रा ोत् — जो
इस कालसम्बन्ध को और स्पष्ट करता है।

सन्दभ: यह श्रीमद्भगव ता के आरम्भ ( वषादयोग) का प्रसङ्ग है — कुरुक्षेत्र म अपने ही गुरुजन को शत्रुपक्ष म
दे खकर अजुन शोकग्रस्त हो गया। ‘भीष्मद्रोणाद न्’ = भीष्मः द्रोणः आ दः येषां ते, तान् — बहु ी ह, द्वतीया
बहुवचन।

प्र.1 (ग) ीरामः भरतम् उक्तवान् ……………… जननी जन्मभू मश्च स्वगाद प गरीयसी ……………… ।

ीरामः भरतम् उक्तवान् यत् जननी जन्मभू मश्च स्वगाद प गरीयसी इ त। ( हन्द — श्रीराम ने भरत से कहा क ‘माता और
जन्मभू म स्वग से भी बढ़कर ह’।)

‘यत्…इ त’ क्य : यहाँ भी ‘उक्तवान्’ (कहा) कथन- क्रया है, अतः उद्धरण को ‘यत्’ से आरम्भ और ‘इ त’ से
समाप्त करना होगा। स्मरण र खए — संस्कृत म उद्धरण- चह्न का काम प्रायः ‘इ त’ ही करता है।

पूरा ोकांश: “अ प स्वणमयी लङ् का न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभू मश्च स्वगाद प गरीयसी॥” —
‘गरीयसी’ ‘गुरु’ शब्द का तरतमभाव (comparative) रूप है, स्त्री लङ्ग म; और ‘स्वगात्’ म पञ्चमी है, क्य क
«तुलनाथ पञ्चमी» — तुलना जससे क जाए, उसम पञ्चमी आती है।

प्र.1 (घ) ……………… भरतः अयोध्यां प्राप्तवान् ……………… ीरामः तत्र नासीत्।

यदा भरतः अयोध्यां प्राप्तवान् तदा ीरामः तत्र नासीत्। ( हन्द — जब भरत अयोध्या पहुँचे, तब श्रीराम वहाँ नह थे।)

‘यदा…तदा’ क्य : वाक्य म समय का सम्बन्ध है — भरत के लौटने का समय और राम के न होने का समय एक ही
है। न नहाल से लौटने पर भरत ने पाया क राम वनवास जा चुके ह।

अन्य सम्भव उत्तर: ‘यद्य प भरतः अयोध्यां प्राप्तवान् तथा प श्रीरामः तत्र नासीत्’ भी व्याकरण क दृ ष्ट से शुद्ध है
(‘यद्य प भरत अयोध्या पहुँचे, फर भी राम वहाँ नह थे’)। कन्तु अभ्यास म ‘यद्य प…तथा प’ का प्रयोग (ङ), (छ),
(झ), (ट) म स्पष्ट रूप से माँगा गया है, अतः यहाँ ‘यदा…तदा’ ही अ धक उपयुक्त है।

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प्र.1 (ङ) ……………… खुद रामाय मृत्युदण्डः उ ो षतः ……………… सः प्रसन्नवदनः आसीत्।

यद्य प खुद रामाय मृत्युदण्डः उ ो षतः तथा प सः प्रसन्नवदनः आसीत्। ( हन्द — यद्य प खुद राम को मृत्युदण्ड सुनाया गया,
तथा प वे प्रसन्नमुख थे।)

‘यद्य प…तथा प’ क्य : दोन वाक्यांश म वरोध है — मृत्युदण्ड सुनकर मनुष्य को दुखी होना चा हए, पर वे प्रसन्न
थे। जहाँ ‘होने पर भी / फर भी’ का भाव हो, वह यह जोड़ी आती है। पुस्तक का उदाहरण भी वरोध ही दखाता है
— “यद्य प मेघाः स न्त तथा प वृ ष्टः न भव त।”

पाठ से मेल: यही बात पाठ म इन शब्द म है — “राष्ट्रभक्तस्य खुद रामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत् प्रत्युत प्रसन्नता,
शा न्तः, तृ प्तः, तेजः च आसीत्।” ‘प्रसन्नवदनः’ = प्रसन्नं वदनं यस्य सः — बहु ी ह समास।

प्र.1 (च) ……………… वृ ष्टः भव त ……………… कृषकाः सन्तुष्टाः भव न्त।

यदा वृ ष्टः भव त तदा कृषकाः सन्तुष्टाः भव न्त। ( हन्द — जब वषा होती है, तब कसान सन्तुष्ट होते ह।)

‘यदा…तदा’ क्य : यह कारण-स हत कालसम्बन्ध का सामान्य कथन है — वषा का समय ही कसान क प्रसन्नता
का समय है। दोन क्रयाएँ लट् -लकार (वतमान) म ह, जो ऐसे सावका लक (सदा सत्य) कथन म आती ह।

‘यावत्…तावत्’ भी सो चए: ‘यावत् वृ ष्टः भव त तावत् कृषकाः सन्तुष्टाः भव न्त’ का अथ होगा ‘जब तक वषा
होती रहती है, तब तक कसान सन्तुष्ट रहते ह’ — अथ क दृ ष्ट से यह अव ध बताता है, जब क प्रश्न म सामान्य
नयम कहा गया है। इस लए ‘यदा…तदा’ ही श्रेष्ठ है।

प्र.1 (छ) ……………… खुद रामः बालः ……………… सः दे शकाय कृतवान्।

यद्य प खुद रामः बालः तथा प सः दे शकाय कृतवान्। ( हन्द — यद्य प खुद राम बालक थे, तथा प उन्ह ने दे श का काय कया।)

‘यद्य प…तथा प’ क्य : ‘बालक होना’ और ‘दे श का बड़ा काय करना’ — साधारण दृ ष्ट से ये दोन परस्पर वरोधी
ह, इसी लए वरोध-सूचक जोड़ी चा हए। यही वाक्य पूरे पाठ का सार भी है — न खलु वयस्तेजसो हेतुः। इस एक
वाक्य से शीषक सद्ध हो जाता है।

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व्याकरण: ‘खुद रामः बालः’ म क्रया ‘आसीत्’ अध्याहृत है ( छपी हुई) — संस्कृत म ‘अस्’ धातु का लोप सामान्य
है। पूण रूप — ‘यद्य प खुद रामः बालः आसीत् तथा प सः दे शकाय कृतवान्।’

प्र.1 (ज) ……………… काय करो त ……………… फलं प्रा ो त।

यावत् काय करो त तावत् फलं प्रा ो त। ( हन्द — जतना काय करता है, उतना ही फल पाता है।)

‘यावत्…तावत्’ क्य : यह युगल प रमाण अथवा अव ध क तुलना बताता है — ‘ जतना…उतना’, ‘जब तक…तब
तक’। यहाँ प रश्रम और फल का अनुपात कहा गया है, इस लए यही जोड़ी उपयुक्त है। पुस्तक का उदाहरण अव ध
दखाता है — “यावत् भूतले गरयः भव न्त तावत् रामायणकथा प्रच लष्य त।”

भाव: यह लोकप्र सद्ध सू क्त का ही रूप है — ‘कमण्येवा धकारस्ते’ क भावना; जतना श्रम, उतना प्र तफल। ऐसे
वाक्य म लट् -लकार सावका लक सत्य बताने के लए आता है।

प्र.1 (झ) प्रफुल्ल-खुद रामाभ्यां ……………… व ोटकं प्र क्षप्तम् ……………… कङ् ग्ज़फोडः न मृतः।

प्रफुल्ल-खुद रामाभ्यां यद्य प व ोटकं प्र क्षप्तम् तथा प कङ् ग्ज़फोडः न मृतः। ( हन्द — यद्य प प्रफुल्ल और खुद राम ने
व ोटक फका, तथा प कङ् ग्ज़फोड नह मरा।)

‘यद्य प…तथा प’ क्य : अपेक्षा यह थी क व ोट से कङ् ग्ज़फोड मारा जाएगा, कन्तु प रणाम उलटा नकला —
यह ठ क वरोध है। पाठ ने भी इसी वरोध को ‘यद्य प…तथा प’ से कहा है — “यद्य प सः कङ् ग्ज़फोड् महोदयस्य
रथः आसीत् तथा प त स्मन् सः नासीदे व।”

व्याकरण: ‘प्रफुल्ल-खुद रामाभ्याम्’ तृतीया वचन है — क्य क वाक्य कमवाच्य म है (‘ व ोटकं प्र क्षप्तम्’),
और कमवाच्य म कता तृतीया म आता है। दो व्य क्त होने से द्ववचन।

प्र.1 (ञ) ……………… अध्ययनं सुदृढं भव त ……………… ज्ञानं वक सतं भव त।

यदा अध्ययनं सुदृढं भव त तदा ज्ञानं वक सतं भव त। ( हन्द — जब अध्ययन सुदृढ़ होता है, तब ज्ञान वक सत होता है।)

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‘यदा…तदा’ क्य : यहाँ एक स्थ त दूसरी स्थ त को जन्म दे ती है — पहले अध्ययन पक्का, फर ज्ञान का वकास।

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‘जब…तब’ का यह क्रम-सम्बन्ध ‘यदा…तदा’ से ही व्यक्त होता है, वरोध नह है इस लए ‘यद्य प…तथा
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चलेगा।

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aglअन्य ठ क वकल्प: ‘यावत् अध्ययनं सुदृढं भव त तावत् ज्ञानं वक सतं भव त’ — ‘ जतना अध्ययन दृढ़ होगा,

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उतना ज्ञान बढ़े गा’ — यह भी अथपूण है। दोन म से कोई भी लख सकते ह, पर कारण अवश्य बताइए।

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……………… खुद रामः आङ् ग्लानां हस्तगतः ……………… सः ततः ब हरागतः।
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प्र.1 (ट)

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c आङ् ग्लानां हस्तगतः तथा प सः ततः ब हरागतः। ( हन्द — यद्य प खुदaरामg अंग्रेज़ के हाथ लग गए, तथा प वे
यद्य प खुद .रामः
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seबाहर नकल आए।)
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वहाँ से

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‘यद्य प…तथा प’ क्य : पकड़े जाने के बाद छू ट नकलना अपेक्षा के वरुद्ध है — यही वरोध इस जोड़ी क माँग

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करता है। पाठ का मूल वाक्य — “कदा चत् खुद रामः पत्रक वतरणसमये आङ् ग्लानां हस्तगतः जातः। कन्तु

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साम यसम्पन्नः खुद रामः आङ् ग्लानां ताडनं कृत्वा ततः नरगच्छत्।” — यहाँ ‘ कन्तु’ वही काम कर रहा है जो
‘तथा प’ करता है। a

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शब्द- व
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ेषण: ‘हस्तगतः’ = हस्तं गतः ( द्वतीया तत्पुरुष) — हाथ म गया हुआ, पकड़ा गया। ‘ब हरागतः’ = ब हः

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+ आगतः ( वसग-स न्ध: ‘ब हः’ के वसग का ‘र्’ हुआ, क्य क आगे स्वर है)।
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यस्तु क्रयावान् मनुजः स व ान् — पृष्ठ 49 – 50
coअव्यय-प्रयोग,
प रयोजना-कायम् — पाँच क्रयात्मक काय (क्रा न्तवीर-च .रत, a g l
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स्वप रचयः, पारा-अल क्-कथा, कलाकार-वणनम्)

प रयोजना-कायम्
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भगत सहः, मङ्गलपाण्डे, चन्द्रशेखरः, लक्ष्मीबाई, बालगङ्गाधर तलकः इत्येतेषां क्रा न्तवीराणां जीवनच रतं संगृह्य
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ततः एकां घटनां कक्षायां वदत।
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a s emउत्तर
agl यह संग्रह-काय है — पाँच क्रा न्तवीर क जानकारी इक क जए और उनम से कसी एक क एक घटना कक्षा म
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सुनाइए। नीचे संग्रह के लए आधार-ता लका और एक पूरा नमूना-कथन दया गया है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

क्रा न्तवीरः जन्म– जन्मस्थानम् प्र सद्धा घटना प्र सद्धं वचनम्/नारा
ब लदानम्

मङ् गलपाण्डे १८२७ – नगवा-ग्रामः, बैरकपुरे सै नक वद्रोहस्य आरम्भः ‘मारो फरङ्ग को’
१८५७ ब लया-जनपदः (१८५७)

लक्ष्म ीबाई १८२८ – वाराणसी झाँसीरक्षणाथ युद्धम्; ग्वा लयरे ‘मम झाँस न दास्या म’ (म
(झाँस ीरा ी) १८५८ वीरग तः अपनी झाँसी नह दूँ गी)

बालगङ् गाधरितलकः १८५६ – रत्ना गरी, महाराष्ट्रम् गणेशोत्सव- शवजयन्ती द्वारा ‘स्वराज्यं मम जन्म सद्धः
१९२० जनजागरणम्; ‘केसरी’ प त्रका अ धकारः अ स्त’

चन्द शेखरः आज़ादः १९०६ – भाबरा-ग्रामः, प्रयागराजस्य अल् े ड-उद्याने ‘अहं स्वतन्त्रः एव अ स्म,
१९३१ मध्यप्रदे शः आत्मब लदानम् स्वतन्त्रः एव म रष्या म’

भगतिसंहः १९०७ – बङ्गा-ग्रामः, पञ्जाबः केन्द्र यसभायां बम-पत्रकक्षेपः ‘इ न्कलाब जन्दाबाद’
१९३१ (१९२९); लाहौरे उद्बन्धनम् (क्रा न्तः चरञ्जीवतु)

नमूना उत्तर (आदशम् उत्तरम्) — एका घटना, संस्कृतभाषया —

“अष्टािवंशत्यिधक-नवदशशततमे वष (१९२८) आङ् ग्लशासने न ‘साइमन आयोगः’ भारतं पेिषतः। तस्य िवरोधे

लाला-लाजपतरायः शािन्तपूण ं जुलूसं नयित स्म। आरक्षकै ः तस्य उपिर लगुडपहाराः कृ ताः, ततः सः िदवङ् गतः।

भगतिसंहः तत् दृ ष्ट् वा अतीव व्यिथतः अभवत्। ततः सः स्विमत्रैः सह पित ातवान् यत् ‘अस्माकं ने त ःु अपमानस्य

पतीकारः अवश्यं करणीयः’ इित। एकोनित्रंशदिधक-नवदशशततमे वष (१९२९) भगतिसंहः बटु के श्वरदत्तः च

के न्द ीयसभायाम् अल्पशिक्तकौ बमौ पत्रकािण च अिक्षपताम्, ‘इिन्कलाब िजन्दाबाद’ इित च उद् घोिषतवन्तौ।

तयोः उ ेश्यं कमिप हन्त ुं नासीत्, अिप त ु ‘बिधरान् ावियत मु ्’ इित आसीत्। तौ न पलाियतौ, अिप त ु स्वेच् छया
गृहीतौ — यतः तयोः इच्छा आसीत् यत् न्यायालयस्य माध्यमेन क्रान्ते ः सन्दे शः सवषु जने ष ु पसरेत ् इित।

एकित्रंशदिधक-नवदशशततमे वष (१९३१) माचमासस्य त्रयोिवंशे िदनाङ् के लाहौरनगरे सः स्विमत्राभ्यां

राजगुरु -सुखदे वाभ्यां सह हसन् एव उद् बन्धनं स्वीकृ तवान्।”

( हन्द — १९२८ म साइमन आयोग के वरोध म शा न्तपूण जुलूस नकाल रहे लाला लाजपतराय पर ला ठयाँ बरस और उनका
दे हान्त हो गया। यह दे खकर भगत सह अत्यन्त व्य थत हुए। १९२९ म उन्ह ने बटु केश्वर दत्त के साथ केन्द्र य असेम्बली म कम श क्त
वाले दो बम तथा पच फके और ‘इ न्कलाब ज़न्दाबाद’ का उ ोष कया; उ े श्य कसी को मारना नह , ‘बहर को सुनाना’ था। वे
भागे नह , स्वयं गरफ़्तारी द — ता क अदालत के माध्यम से क्रा न्त का सन्दे श जन-जन तक पहुँचे। २३ माच १९३१ को लाहौर म
राजगुरु और सुखदे व के साथ हँसते हुए उन्ह ने फाँसी स्वीकार क ।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

अच्छे कथन म क्या हो: (१) एक ही घटना ली जए, पूरा जीवन नह — तभी ववरण जीवन्त बनेगा; (२) सन्, स्थान
और नाम ठ क ह ; (३) घटना के अन्त म यह अवश्य बताइए क उससे क्या शक्षा मलती है; (४) कथन ३–५ मनट
का हो। ऊपर क घटना खुद राम से मेल भी खाती है — दोन ने युवावस्था म ही हँसते हुए फाँसी स्वीकार क , अथात्
न खलु वयस्तेजसो हेतुः।

प्र.2 पाठे वद्यमाना न अव्ययपदा न संगृह्य दश (१०) वाक्या न रचयत।

प्रथमं पाठात् अव्ययपदा न सङ्ग मः — अत्र, इ त, च, अ प, एव, न, वा, नत्यम्, तत्र, ततः, अतः, यत्, यदा, तदा, यावत्, तावत्,
यद्य प, तथा प, केवलम्, कदा चत्, कन्तु, प्रत्युत, इव, सह, संक्षेपेण-रीत्या ( क्रया वशेषण-प्रयोगः), अ प तु, यतो ह, हा धक्।
दश वाक्या न (प्रत्येक स्मन् वाक्ये एकम् अव्ययं रेखाङ् कतम्) —

१. क्रािन्तवीरस्य खुद ीरामस्य जीवनवृत्तान्तः अत्र विणतः अिस्त।

२. सत्येन्द नाथः उपािदशत् — ‘मनः िनमलं भवेत ्’ इित ।

३. खुद ीरामः बालः आसीत्, तथािप सः िनभयः आसीत्।

४. यदा दे शः पराधीनः आसीत् तदा बहवः वीराः बिलदानं कृ तवन्तः।

५. यावत् जीवनम् अिस्त तावत् रा सेवा करणीया।
६. सः के वलं पञ्चदशवष यः आसीत्, िक न्त ु तस्य साहसम् असीमम् आसीत्।

७. कदािचत् सः आङ् ग्लानां हस्तगतः जातः, ततः च मुक्तः अभवत्।

८. तस्य मुखे भयं नासीत्, पत्युत पसन्नता आसीत्।

९. तस्य बुि ः अिसधारा इव तीक्ष्णा आसीत्।

१०. वयं तान् वीरान् िन त्यं स्मरामः, यतोिह ते षां त्यागेन एव अस्माकं स्वातन्त्र्यम् अिस्त।

( हन्द — १. क्रा न्तवीर खुद राम का जीवनवृत्तान्त यहाँ व णत है। २. सत्येन्द्रनाथ ने उपदे श दया क ‘मन नमल होना चा हए’। ३.
खुद राम बालक थे, फर भी नभय थे। ४. जब दे श पराधीन था, तब बहुत-से वीर ने ब लदान दया। ५. जब तक जीवन है, तब तक
राष्ट्रसेवा करनी चा हए। ६. वे केवल पन्द्रह वष के थे, कन्तु उनका साहस असीम था। ७. एक बार वे अंग्रेज़ के हाथ लगे, फर छू ट
गए। ८. उनके मुख पर भय नह , ब ल्क प्रसन्नता थी। ९. उनक बु द्ध तलवार क धार-सी तेज़ थी। १०. हम उन वीर को नत्य स्मरण
करते ह, क्य क उन्ह के त्याग से हमारी स्वतन्त्रता है।)

अव्यय क्या है और उसक पहचान: «सदृशं त्रषु लङ्गे षु सवासु च वभ क्तषु। वचनेषु च सवषु यन्न व्ये त
तदव्ययम्॥» — जसका रूप तीन लङ्ग , सात वभ क्तय और तीन वचन म कभी नह बदलता, वही अव्यय है।
इसी लए ‘च’, ‘अ प’, ‘इ त’, ‘अत्र’ सदा वैसे ही रहते ह। वाक्य बनाते समय ध्यान र खए क अव्यय पर वभ क्त-
प्रत्यय कभी न लगाएँ।

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पाठ का एक वशेष अव्ययपद: ‘आरा त्र’ (आ + रा त्र = रात भर) — “आरा त्र द्वौ अ प क्रा न्तवीरौ अधावताम्।”
यह अव्ययीभाव समास है, जसम पूवपद उपसग ‘आ’ प्रधान है और पूरा पद अव्यय बन जाता है।

प्र.3 खुद रामस्य जन्म नवाशीत्य धके अष्टादशशततमे वष (१८८९) दसम्बरमासस्य तृतीये दनाङ् के अभवत्।
एवंप्रकारेण स्व वषये लखन्तु — (क) मम जन्म … अभवत्। (ख) पतुः जन्म … अभवत्। (ग) मातुः जन्म …
अभवत्। (घ) ातुः जन्म … अभवत्। (ङ) भ गन्याः जन्म … अभवत्।

यह अपने प रवार क सूचना भरने का काय है, अतः उत्तर हर वद्याथ का अपना होगा। पहले साँचा समझ ली जए, फर
अपनी त थ उसम रख द जए।

साँचा — (सम्बन्धपदम्) जन्म [वषस्य शब्दरूपम्] वष (अङ् केन) [मासः]मासस्य [ितथे ः क्र मवाचकं रूपम्]
िदनाङ् के अभवत्।

नमूना उत्तर (आदश उत्तरम्) — अपनी त थयाँ भरकर बदल ली जए:

क्रमः वाक्यम् (संस्कृतम्) हन्द अथ

(क) मम जन्म एकादशािधके िद्वसहस्रतमे वष (२०११) जुल ाईमासस्य पञ्चदशे िदनाङ् के मेरा जन्म सन् २०११ म १५ जुलाई को हुआ।
अभवत्।

(ख) िपतुः जन्म अशीत्यिधके नवदशशततमे वष (१९८०) माचमासस्य दशमे िदनाङ् के पताजी का जन्म सन् १९८० म १० माच को
अभवत्। हुआ।

(ग) मातुः जन्म पञ्चाशीत्यिधके नवदशशततमे वष (१९८५) अगस्तमासस्य द्वािवंशे माताजी का जन्म सन् १९८५ म २२ अगस्त
िदनाङ् के अभवत्। को हुआ।

(घ) भातुः जन्म अष्टािधके िद्वसहस्रतमे वष (२००८) जनवरीमासस्य षष्ठे िदनाङ् के भाई का जन्म सन् २००८ म ६ जनवरी को
अभवत्। हुआ।

(ङ) भिगन्याः जन्म चतुद शािधके िद्वसहस्रतमे वष (२०१४) नवम्बरमासस्य एकोनिवंशे बहन का जन्म सन् २०१४ म १९ नवम्बर को
िदनाङ् के अभवत्। हुआ।

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तीन बात, जनसे उत्तर शुद्ध बनेगा:
(१) वष — ‘ द्वसहस्रतमे’ = २०००, ‘नवदशशततमे’ = १९००; इनसे पहले ‘…अ धके’ लगाकर शेष संख्या जो ड़ए
(२०११ = एकादशअ धके द्वसहस्रतमे → एकादशा धके)।
(२) सम्बन्धपद — पतृ, मातृ, ातृ, भ गनी के षष्ठी एकवचन रूप ह — पतुः, मातुः, ातुः, भ गन्याः («सम्बन्धे
षष्ठी»)।
(३) दनाङ् क — त थ के लए क्रमवाचक (ordinal) रूप सप्तमी म आएगा — प्रथमे, द्वतीये, तृतीये …
पञ्चदशे, वशे, त्रशे दनाङ् के; ‘वष’ और ‘ दनाङ् के’ दोन म सप्तमी है, क्य क «अ धकरणे सप्तमी» — समय भी
अ धकरण ही है।

मासानां नामा न (पाठ क शैली म): जनवरी, फरवरी, माच, ए प्रल, मई, जून, जुलाई, अगस्त, सतम्बर, अक्टू बर,
नवम्बर, दसम्बर — इनके आगे ‘मासस्य’ जो ड़ए, जैसे पाठ म ‘ दसम्बरमासस्य’, ‘ए प्रलमासस्य’, ‘अगस्तमासस्य’
आया है। चाह तो भारतीय मास भी लख सकते ह — चैत्रः, वैशाखः, ज्येष्ठः, आषाढः, श्रावणः, भाद्रपदः, आ श्वनः,
का तकः, मागशीषः, पौषः, माघः, फाल्गुनः।

प्र.4 पारा-अल कस् स्पधायां कस्या प एकस्य यश स्वप्र तभा गनः वषये शक्षकस्य पुरतः कथां ावयत।

यह सुनाने ( ावण) का काय है — पैरा-ओल क के कसी एक सफल खलाड़ी क कहानी शक्षक के सामने कहनी है।
नीचे एक पूरा नमूना-कथन दया गया है; इसे अपने चुने हुए खलाड़ी के अनुसार बदल ली जए।
नमूना उत्तर (आदश उत्तरम्) — अवनी लेखरा (लक्ष्यवे धका) —

“अवनी लेखरा राजस्थानस्य जयपुरनगरस्य िनवािसनी अिस्त। एकादशवष या सा एकिस्मन् वाहन-दुघटनायां

गम्भीरम् आघातम् अवाप्नोत्, तस्याः मेरु दण्डः भग्नः, अधःशरीरं च िनश्चलम् अभवत्। िक न्त ु सा न न्यून ोत्साहा

जाता। िपत ःु पेरणया सा लक्ष्यवेध-क्रीडायाम् (शूिटङ् ग-क्रीडायाम्) अभ्यासम् आरब्धवती। पितिदनं सा बहूिन

घण्टािन अभ्यासं करोित स्म। एकिवंशत्युत्तर-िद्वसहस्रतमे वष (२०२१) टोिकयो-नगरे आयोिजतायां पारा-

अलिम्पक् -स्पध यां सा दशमीटर-वायुरायफल्-पितयोिगतायां स् वणपदकम् अजयत्। एवं सा पारा-अलिम्पक्-
स्पध यां स्वणपदकं पाप्तवती पथमा भारतीया मिहला अभवत्। चत िु वशत्यु
ं त्तर-िद्वसहस्रतमे वष (२०२४) पेिरस-
नगरे अिप सा पुन ः स्वणपदकम् अजयत्। तस्याः जीवनम् अस्मान् िशक्षयित यत् शरीरस्य सीमा मनसः सीमा न

भवित इित।”

( हन्द — अवनी लेखरा जयपुर, राजस्थान क नवासी ह। ग्यारह वष क आयु म एक सड़क दुघटना म उनक रीढ़ क ह ी टू ट गई
और शरीर का नचला भाग नश्चल हो गया। कन्तु उन्ह ने उत्साह नह खोया। पता क प्रेरणा से उन्ह ने नशानेबाज़ी का अभ्यास
आरम्भ कया और प्र त दन घण्ट अभ्यास करती रह । सन् २०२१ म टोक्यो पैराल म्पक म १० मीटर एयर राइफल म उन्ह ने स्वण
पदक जीता और पैराल म्पक म स्वण जीतने वाली पहली भारतीय म हला बन । सन् २०२४ म पे रस म भी उन्ह ने पुनः स्वण जीता।
उनका जीवन सखाता है क शरीर क सीमा मन क सीमा नह होती।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः
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अन्ये यश स्वनः प्र तभा गनः क्र डा उपल ः

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दे वेन्द झाझिरया
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भालाक्षेपः (Javelin)
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एथेन्स (२००४) तथा िरयो (२०१६) — स्वणपदक द्वयम्

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मिरयप्पन् थङ् गवेल ु िरयो (२०१६) — स्वणपदकम्

सुिमत् अिन्तल् भालाक्षेपः टोिकयो (२०२१) — िवश्वकीितमानसिहतं स्वणपदकम्

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अच्छे कथन का ढाँचा (चार पग): (१) प रचयः — नाम, स्थान, क्र डा; (२) सङ् घषः — कौन-सी क ठनाई आई;
agअभ्यास; (४) उपल
(३) पुरुषाथः — उसने क्या कया, कतना ः तथा सन्दे शः — क्या जीता और हम क्या सीख
मलती है। यही क्रम खुद राम के पाठ म भी है — प रचय, क ठनाई, पुरुषाथ, ब लदान और सन्दे श।

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वैस. े ही इन खला ड़य के लए ‘शारी रक दव्याङ्गता’ बाधा नह बनी। दोन हीaसद्ध करते ह — न खलु
सम्बन्ध जो ड़ए: यह प्रश्न पाठ के साथ जानबूझकर जोड़ा गया है — जैसे खुद राम के लए ‘छोट आयु’ बाधा नह
बनी,m
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a g वयस्तेजसो हेतुः, तेज का कारण न आयु है, न शरीर — केवल संकल्प है।

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नृत्यसङ्ग ता दक्षेत्रेषु कस्या प एकस्य जन प्रयस्य कलाकारस्य वषये पञ्चवाक्या न ल खत्वा शक्षकान् दशयत ?
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नृत्य-सङ्ग त आ द क्षेत्र के कसी एक लोक प्रय कलाकार पर पाँच वाक्य लखने ह। नीचे नमूना दया गया है — अपने प्रय

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कलाकार के अनुसार बदल ली जए।
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नमूना उत्तर (आदश उत्तरम्) — लता मङ्गे शकर (गा यका) —

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१. लता मङ् गेशकर भारतस्य सुपिस ा गाियका आसीत्, तस्याः जन्म इन्दौरनगरे अभवत्।
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m ः नाट कलाकारः च आसीत्, अतः सङ् गीतं तस्यै
coगीत g l a
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२. तस्याः िपता दीनानाथ मङ् गेशकरः स्वयं सङ्

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वंशपरम्परया पाप्तम्।

३. सा िहन्दी-मराठी-आिदषु ब ीषु भाषासु सहस्रशः गीतािन गीतवती।

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४. ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ इित तस्याः दे शभिक्तगीतं त्ु वा ोत ॄणां ने त्रेष ु अ ूिण आगच्छिन्त।
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५. भारतसवकारेण सा सव च्चे न नागिरक-सम्माने न ‘भारतरत्न’-इत्यने न सम्मािनता; जनाः तां स्ने हेन
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se m ‘स्वरकोिकला’ इित वदिन्त स्म।
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( हन्द — १. लता मङ्गे शकर भारत क सुप्र सद्ध गा यका थ ; उनका जन्म इन्दौर म हुआ था। २. उनके पता द नानाथ मङ्गे शकर स्वयं
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संगीतज्ञ और नाट्यकलाकार थे, इस लए संगीत उन्ह परम्परा से मला। ३. उन्ह ने हन्द , मराठ आ द अनेक भाषाओं म हज़ार गीत
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s e mे लोग ’ सुनकर श्रोताओं क आँख म आँसू आ जाते ह। ५. भारत सरकार ने उन्ह
aसम्मा नत कया; लोग उन्ह प्यार से ‘स्वर-को कला’ कहते थे।)
गाए। ४. उनका दे शभ क्त-गीत ‘ऐ मेरे वतन क

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सव च्च नाग रक सम्मान ‘भारतरत्न’ से

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

कलाकारः कला-क्षेत्रम् एकवाक्येन प रचयः

पिण्डतः रिवशङ् करः िसतारवादनम् सतारवादनेन भारतीयं शास्त्रीयसङ्ग तं वश्वे प्र सद्धं कृतवान्।

पिण्डतः िबरजू महाराजः कथक -नत्ृ यम् लखनऊ-घरानायाः कथकनृत्यस्य स ाट् इ त प्र सद्धः आसीत्।

रुिक्मणीदे वी अरुण्डेल भरतनाट म् भरतनाट्यं पुनः प्र तष्ठाप यतुं ‘कलाक्षेत्रम्’ इ त संस्थां स्था पतवती।

एम्. एस्. सुब्बुल क्ष्म ी कण टक -सङ् गीतम् तस्याः कण्ठे न गीतं ‘भजगो वन्दम्’ अद्या प जन प्रयम् अ स्त।

पाँच वाक्य म क्या-क्या हो: (१) नाम और क्षेत्र, (२) जन्म/स्थान अथवा गुरु-परम्परा, (३) मुख्य काय या शैली,
(४) कोई एक प्र सद्ध रचना/प्रस्तु त, (५) सम्मान अथवा लोक प्रयता। इसी क्रम से पाँच वाक्य लखने पर उत्तर पूण
माना जाएगा।

भाषा-सङ् केत: य द कलाकार जी वत ह तो लट् -लकार (‘अ स्त’, ‘गाय त’) ल खए, और य द दवङ्गत ह तो लङ्
अथवा ‘आसीत्’ का प्रयोग क जए — ऊपर के नमूने म यही ध्यान रखा गया है। स्त्री लङ्ग कता के साथ क्तवतु-रूप
‘गीतवती’, ‘सम्मा नता’ आते ह, ‘गीतवान्’ नह ।

अध्याय — एक नज़र म
पाठ-प रचय — यह पाठ कसी कथा या ोक-संग्रह का नह , अ पतु एक ऐ तहा सक व्य क्त के जीवनच रत का सरल
संस्कृत गद्य है। आर म्भक अनुच्छेद पाठक से सीधा प्रश्न करता है — ‘क्या हम जानते ह क कतने ज्ञात-अज्ञात क्रा न्तवीर ने
स्वतन्त्रता-यज्ञ म अपने प रवार और जीवन क आहु त द ?’ — और उत्तर स्वरूप एक ऐसे ही हुतात्मा, खुद राम, का वृत्तान्त
प्रस्तुत करता है।
कथावस्तु (क) जन्म और बाल्यकाल — बङ्गप्रान्त के मे दनीपुर जनपद के मोहोबनी-ग्राम म ३ दसम्बर १८८९ को खुद राम
का जन्म हुआ। पता त्रैलोक्यनाथ, माता लक्ष्मी प्रया दे वी। बाल्यकाल म ही माता- पता दवङ्गत हो गए, अतः बड़ी बहन
अपरूपा दे वी ने उनका पालन-पोषण कया। साधारण बालक के समान खेल-कूद म उनका मन नह लगता था; दे शवा सय पर
होते अत्याचार दे खकर वे व्य थत हो जाते थे।
कथावस्तु (ख) बङ्गभङ्ग और आन्दोलन — वायसराय कजन ने बङ्गप्रान्त के वीरत्व को दबाने, उत्साह को नष्ट करने और
दे शभ क्त को कुचलने के लए १९०५ म बङ्ग का पन्थ (सम्प्रदाय) पर आधा रत वभाजन कर दया। इससे न केवल बङ्ग म, पूरे
दे श म जनान्दोलन भड़क उठा — यही ‘बङ्गभङ्ग-आन्दोलन’ है। उस समय खुद राम केवल पन्द्रह वष के थे, फर भी आन्दोलन
म कूद पड़े और नव कक्षा भी पूरी न कर सके।
कथावस्तु (ग) संगठन, प्र शक्षण और प्र तज्ञा — वे बालक का संगठन बनाकर पदयात्रा नकालते, ‘वन्दे मातरम्’ क
घोषणाएँ करते और लोकजागरण के पत्रक बाँटते थे। मत्र प्रफुल्ल के साथ गुप्तमण्डल के सञ्चालक सत्येन्द्रनाथ से मले,
जन्ह ने उपदे श दया — “क्रा न्तकाय करने के लए शरीर वज्र-सा दृढ़, बु द्ध तलवार क धार-सी तीक्ष्ण और मन गङ्गाजल-सा
नमल होना चा हए।” राणाप्रताप के च रत्र से प्रे रत होकर खुद राम ने प्र तज्ञा क — ‘जब तक भारत आङ् ग्लशासन से मुक्त
नह होगा, तब तक पादत्राण (जूते) नह पहनूँगा।’
कथावस्तु (घ) मुज़फ़्फ़रनगर क घटना — कठोर दण्ड दे ने वाले न्या यक अ धकारी कङ् ग्ज़फोड के वध का उत्तरदा यत्व
प्रफुल्ल और खुद राम ने लया। २८-०४-१९०८ को उन्ह ने उसके रथ पर व ोटक फका; कन्तु उस रथ म कङ् ग्ज़फोड नह ,

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

केनेडी नामक अ धकारी क पत्नी और पुत्री थ — वे मारी गईं और कङ् ग्ज़फोड बच गया। भागते हुए दोन पकड़े जाने लगे;
प्रफुल्ल ने ‘वन्दे मातरम्’ कहकर स्वयं को गोली मार ली और हौतात्म्य से अमर हो गया।
कथावस्तु (ङ) न्यायालय और ब लदान — पकड़े गए खुद राम को न्यायालय ले जाया गया। वहाँ वक ल के हर प्रश्न का
उनका एक ही न श्चत उत्तर था — ‘वन्दे मातरम्’। न्यायाधीश ने नदयता से बालक को उद्बन्धन (फाँसी) का मृत्युदण्ड सुनाया।
खुद राम के मुख पर भय या दुःख नह , प्रसन्नता, शा न्त, तृ प्त और तेज था — यही दे खकर न्यायाधीश तथा आङ् ग्ल अ धकारी
च कत रह गए। ११-०८-१९०८ को बाल्य अवस्था म ही वे हुतात्मा हो गए।
मूल सन्दे श — शीषक ही नष्कष है — ‘न खलु वयः तेजसः हेतुः’ = तेज (पराक्रम) का कारण आयु नह होती। पन्द्रह वष
का बालक भी राष्ट्र के लए वह कर सकता है जो बड़े-बड़े नह कर पाते। साथ ही पाठ यह भी सखाता है क दे शभक्त का
जीवन राष्ट्र को सम पत होता है (‘यतो ह दे शभक्तानां जीवनं राष्ट्राय सम पतं भव त’) और ज्ञात के साथ-साथ अज्ञात
ब लदा नय के प्र त भी कृतज्ञता रखनी चा हए।
भा षक वशेषताएँ — भाषा सरल कन्तु संख्यावाची तथा समासबहुल है। संवत्सर संस्कृत क प्राचीन शैली म लखे गए ह —
‘नवाशीत्य धक-अष्टादशशततमे वष (१८८९)’, ‘अष्टा धक-नवदशशततमे वष (१९०८)’। अङ् ग्रेज़ी नाम का दे वनागरीकरण
( कङ् ग्ज़फोड् , केनेडी, वायसरायः कजनः, ए प्रलमासः) तथा उपमाएँ (वज्रसदृशं शरीरम्, अ सधारा इव तीक्ष्णा बु द्धः,
गङ्गाजल मव नमलं मनः) पाठ क शोभा ह।
व्याकर णक बन्दु जनका अभ्यास पाठ कराता है — (१) स न्ध — यण्, पूवरूप, वसग-स न्ध, जश्त्व (इत्यादयः,
सवऽ प, क श्चत्, प्रत्येकम्, वयस्तेजसः, अ चरादे व); (२) समास — षष्ठी/तृतीया तत्पुरुष, नञ् तत्पुरुष, कमधारय तथा
बहु ी ह; (३) भूतकाल के चार साधन — लङ् -लकारः, क्तवतु-प्रत्ययः, ‘स्म’-युक्त लट् , तथा क्त-प्रत्ययः; (४) ‘ चत्’-
प्रत्ययान्त अव्यय — क श्चत्, का चत्, क ञ्चत्, कुत्र चत्, कदा चत् आ द, जो अथ म अ नश्चय का भाव लाते ह; (५) युगल-
अव्यय — यत्…इ त, यदा…तदा, यावत्…तावत्, यद्य प…तथा प।
अभ्यास क्या माँगता है — ‘अभ्यासाद् जायते स द्धः’ के आठ प्रश्न पाठ-बोध (पूणवाक्येन उत्तर, सत्य/असत्य), संख्या-ज्ञान
(संवत्सर-मेलनम्), सजनात्मक लेखन ( चत्र दे खकर पञ्च वाक्य) और व्याकरण (स न्धच्छे द, समास, वाक्यप रवतन, चत्-
प्रत्यय) — तीन प्रकार के कौशल जाँचते ह। ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ म युगल-अव्यय से रक्तस्थान भरने ह और ‘यस्तु
क्रयावान् मनुजः स वद्वान्’ म पाँच प रयोजना-काय ह।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः AglaSem · NCERT Solutions

त्व रत पुनरावृ त्त

शब्दः अथः हन्द अथ पाठ का वाक्य
(संस्कृतम्)

अ धवक्तॄणाम् (पुं.ष.ब.व.) अिभभाषकाणाम् वक ल के तत्र अ धवक्तॄणां प्रत्येकं प्रश्नस्य खुद रामस्य न श्चतम् उत्तरम्
आसीत् यत् ‘वन्दे मातरम्’ इ त।

असाधारणः (नञ् तत्पुरुषः, न साधारणः असामान्य बाल्यकालतः एव खुद रामः असाधारणः आसीत्।
पुं.प्र.ए.व.)

आच रतवन्तः (आ + √चर् + पािलतवन्तः मनाया भारतदे शस्य स्वतन्त्रतायाः अमृतमहोत्सववष वयम् आच रतवन्तः।
क्तवतु, पुं.प्र.ब.व.)

आतङ् कम् (आङ् + √त क + घञ्, भयम् डर गुप्तमण्डला न आङ् ग्लानां मन स आतङ् कं जनय न्त स्म।
पुं. द्व.ए.व.)

आन्दोलनम् (√आन्दोल् + ल्युट्, िवप्लवः आन्दोलन बङ्गभङ्ग-आन्दोलन म त तस्य जनान्दोलनस्य नाम।
नपुं.प्र.ए.व.)

उद्बन्धनम् (उद् + √बन्ध् + ल्युट्, दण्डिवशेषः फाँसी न्यायाधीशेन नदयतया बालाय खुद रामाय मृत्युदण्डः उ ो षतः –
नपुं.प्र.ए.व.) उद्बन्धनम् इ त।

कदा चत् (कदा + चत्, अव्ययम्) एकदा एक बार / कदा चत् खुद रामः पत्रक वतरणसमये आङ् ग्लानां हस्तगतः
कभी जातः।

च कतः (पुं.प्र.ए.व.) िविस्मतः च कत, च का तत् दृष्ट् वा न्यायाधीशः आङ् ग्लाः अ धका रणः चा प च कताः।
हुआ

दवम् (स्त्री. द्व.ए.व.) स्वगम् स्वग को ‘वन्दे मातरम्’ इ त जपन् आनन्दे न दवं गतः।

नदयः (पुं.प्र.ए.व.) िनगता दया यस्मात् दया र हत नदयः सः बालान् अ प न त्यज त स्म।

प्रतीकारयत्नः (पुं.प्र.ए.व.) पत्युत्त रपयासः प्र तरोध का आङ् ग्लानां वरोधे कृतः प्रतीकारयत्नः व्यथः अभूत्।
प्रयास

भुशुण्डी (स्त्री.प्र.ए.व.) शस्त्रिवशेषः बन्दूक स्ववक्षःस्थले भुशुण्ड्या गो लकाप्रहारं कृतवान्।

व्य थतः (√व्यथ् + क्त, पुं.प्र.ए.व.) दुःिखतः च न्तत, दुखी सः दे शवा सषु जायमानान् अत्याचारान् दृष्ट् वा व्य थतः भव त स्म।

व ोटकम् (नपुं.प्र.ए.व.) यु ोपकरणिवशेषः व ोटक कङ् ग्ज़फोड् इत्यस्य रथ वशेषे प्रफुल्ल-खुद रामाभ्यां व ोटकं
सामग्री प्र क्षप्तम्।

संत्रस्तः (सम् + √त्रस् + क्त, भीतः, पीिडतः आतं कत बङ्गप्रान्ते क्रा न्तवीराणां मह द्भः गुप्तग त व ध भः आङ् ग्लाः
पुं.प्र.ए.व.) संत्रस्ताः आसन्।

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Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages38
Updated19 Sep 2026