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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 5 एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी

AglaSem पर कक्षा 9 संस्कृत पाठ 5 एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी (शारदा) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 5 (Sharada).
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About NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 5 एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी

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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 5 एषा सा कृतकबुद्धिः मानवबुद्धेः सहकरी – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा9

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 5: एषा सा कृतकबु ः ◌ः
मानवबु े ः सहकरी

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

51 – 66 17 63 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 61 pages

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 5: एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः
सहकरी
एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी शारदा (कक्षा ९) का पञ्चमः पाठः है। यह संवाद (वातालाप) वधा क आधु नक रचना है — वद्यालय क
एक कक्षा म अध्यापक तथा य शका, कात्यायनी, श्रेया, अथवः, अक्षतः, आयः, वेदः, आकाशः, पावनी, भास्करः आ द छात्र मलकर कृतकबु द्ध
(Artificial Intelligence) के स्वरूप, प्रकार, उपयोगक्षेत्र , लाभ तथा सीमाओं पर चचा करते ह। बीच म चैट-जीपीट से प्राप्त एक अनुष्टुप्
ोक भी आता है। पाठ के साथ पुस्तक सव शब्दे न भासते (शब्दाथ-ता लका, जसका ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भ खाली है), तन्त्रांशाः/
अनुप्रयोगाः (संस्कृत-अंग्रेज़ी नाम-सूची), अत्र इदम् अवधेयम् (पञ्चमी, षष्ठी तथा सप्तमी वभ क्त का व्याकरण), स्वाध्यायान्मा प्रमदः (अमरकोश
का धीवग- ोक) तथा यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् (क्षेत्रानुसार ए.आई.-उपकरण क सूची बनाने का प्रकल्प) दे ती है। अभ्यास अभ्यासाद्
जायते स द्धः शीषक के नीचे आठ प्रश्न म है — पूणवाक्येन उत्तर, मेलनम्, मञ्जूषा से रक्तस्थानपू त, वग चत्रजालम् (शब्द-खोज), शुद्धम्/अशुद्धम्
चयन, चत्र-आधा रत वाक्यरचना, कतृपद- क्रयापद-चयन तथा वशेषण- वशेष्य-चयन।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

शारदा (कक्षा 9) 51 – 66

खं ड प्रश्न

17 63

माध्यम

हन्द

पाठ-प रचयः — पृष्ठ 51
पाठस्य प्रस्तावना — गद्यांशः तथा शीषकस्य अथः

पाठ-प रचयः

प्र.1 पाठस्य आरम्भे यः गद्यांशः दत्तः, तस्य आशयं लखत — “आधु नके वज्ञानयुगे यदा मानवजीवनं द्रुतगत्या
प रवतनशीलम् अ स्त, तदा अत्र कृतकबु द्धः प्रभावशा ल-साधनरूपेण समुप स्थता वतते। अत्र यन्त्रा ण मानववत्
चन्तय न्त, नणयं च कुव न्त। अहो ! अवलोकनीयं कृतकबुद्धेः सामथ्य तत्र। अ स्मन् पाठे ‘कृतकबु द्धः-
मानवबुद्धेः सहकरी’ इ त क श्चत् वातालापः प्रस्तुतः अ स्त। यत्र अध्यापकः छात्राः च म लत्वा कृतकबुद्धेः
स्वरूपम्, उपयोगक्षेत्रा ण, लाभान् सीमां च अ धकृत्य चचा कुव न्त। एषः पाठः न केवलं कृतकबुद्धेः वषये सूचनां
प्रयच्छ त अ प तु वद्या थनां चन्तन-श क्तं ववेकं च जागरय त। एषा कृतकबु द्धः कथं मानव हताय उपयो गनी
भवेत् इ त चन्तनीयः वषयः।”

अस्य गद्यांशस्य आशयः — आधु नके वज्ञानयुगे मानवजीवनं शी ं प रवतते। अ स्मन् एव काले कृतकबु द्धः एकं
प्रभावशा ल साधनम् इव उप स्थता। अत्र यन्त्रा ण मानवाः इव चन्तय न्त, नणयं च कुव न्त — इदम् एव तस्याः
आश्चयजनकं सामथ्यम्। अ स्मन् पाठे अध्यापकः छात्राः च म लत्वा कृतकबुद्धेः स्वरूपम्, उपयोगक्षेत्रा ण, लाभान् सीमां च
अ धकृत्य चचा कुव न्त। पाठस्य प्रयोजनं केवलं सूचनादानं ना स्त, अ प तु छात्राणां चन्तनशक्तेः ववेकस्य च जागरणम्।
( हन्द — आधु नक वज्ञान-युग म जब मानव-जीवन तेज़ ग त से बदल रहा है, तब कृतकबु द्ध एक प्रभावशाली साधन के रूप म
सामने आ खड़ी हुई है। यहाँ यन्त्र मनुष्य क तरह सोचते ह और नणय भी लेते ह — अहो! कृतकबु द्ध का यह सामथ्य दे खने योग्य
है। इस पाठ म ‘कृतकबु द्ध — मानवबु द्ध क सहयो गनी’ नाम का एक वातालाप प्रस्तुत है, जसम अध्यापक और छात्र मलकर

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

कृतकबु द्ध के स्वरूप, उपयोग-क्षेत्र , लाभ तथा सीमाओं पर चचा करते ह। यह पाठ केवल कृतकबु द्ध के वषय म सूचना ही नह
दे ता, ब ल्क वद्या थय क चन्तन-श क्त और ववेक को भी जगाता है। ‘यह कृतकबु द्ध मानव के हत के लए कैसे उपयोगी बने’
— यही सोचने योग्य वषय है।)

वाक्यम् क्या कहता है

मानवजीवनं द तगत्या पिरवतनशीलम् अिस्त आज का जीवन तेज़ी से बदल रहा है — यही वह प ृ ठभूिम है िजसमें ए.आई.
ष्

आया।
कृ तकबुि ः पभावशािल-साधनरूपेण समुपिस्थता वतते वह साधन (उपकरण) है, वामी नहीं — यही पूरे पाठ का दृ ि टकोण है।
स् ष्

यन्त्रािण मानववत् िचन्तयिन्त, िनणयं च कु विन्त यही ए.आई. की पिरभाषा का बीज है; आगे अ यापक इसे दोहराते है।ं
ध्

स्वरूपम्, उपयोगक्षेत्र ािण, लाभान् सीमां च अिधकृ त्य चच ं पाठ की परे खा — या है, कहाँ काम आता है, या लाभ है,ं और उसकी सीमा
रू क् क्

कु विन्त या है।
क्

िचन्तन-शिक्तं िववेकं च जागरयित पाठ का उ े य — जानकारी नहीं,
श् ।
िववेक

शीषक का अथ खो लए: ‘एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी’ — ‘एषा सा’ = ‘यही वह’ (इशारा करते हुए);
‘कृतकबु द्धः’ = बनावट बु द्ध; ‘मानवबुद्धेः’ = मनुष्य क बु द्ध क (सम्बन्धे षष्ठी); ‘सहकरी’ = साथ काम करने
वाली, सहयो गनी। पूरा अथ — ‘यही वह कृ त्रम बु द्ध है जो मानव-बु द्ध क सहयो गनी है।’ ध्यान द जए,
शीषक म ‘स्वा मनी’ या ‘प्र तस्प धनी’ नह , ‘सहकरी’ शब्द है — पाठ का पूरा नष्कष इसी एक शब्द म रखा हुआ
है।

शब्द कैसे बना — कृतकबु द्धः: कृतक = कृत (√कृ + क्त = ‘ कया हुआ, बनाया हुआ’) + क (स्वाथ ‘कन्’
प्रत्यय) → ‘बनाया हुआ, कृ त्रम, नक़ली’। स्त्री लङ्ग म कृतका। अब ‘कृतका चासौ बु द्धः च’ = कृतकबु द्धः — यह
कमधारय समास है ( वशेषण + वशेष्य), जैसा पुस्तक क शब्दाथ-ता लका स्वयं लखती है। चूँ क ‘बु द्ध’ स्त्री लङ्ग
इकारान्त शब्द है, अतः पूरा समस्तपद भी स्त्री लङ्ग रहता है — इसी लए पाठ म सवत्र ‘एषा’, ‘समुप स्थता’,
‘सहकरी’, ‘सहा यका’ जैसे स्त्री लङ्ग रूप आए ह। रूप याद र खए — प्रथमा कृतकबु द्धः, तीया कृतकबु द्धम्,
तृतीया कृतकबु ा, षष्ठी/पञ्चमी कृतकबुद्धेः, सप्तमी कृतकबुद्धौ (म त-शब्दवत्)।

ध्यान द: ‘सामथ्य तत्र’ म ‘अवलोकनीयम्’ व ध-कृदन्त (अव + √लोक् + अनीयर्) है — ‘दे खने योग्य’। ‘अ धकृत्य’
(अ ध + √कृ + ल्यप्) तीया के साथ आता है और उसका अथ है ‘को लेकर, के वषय म’। ‘भवेत्’ व ध लङ्
लकार है — ‘होना चा हए’।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 ‘कृतकबु द्धः’ इ त नूतनपदम् कथं न मतम् ? पाठे आगता न एतादृशा न अन्या न नूतनपदा न अ प
उदाहरणस हतं व्याख्यात।

उत्तरम् — एता न सवा ण पदा न समासेन प्रत्ययेन च न मता न स न्त। संस्कृतभाषा नूतनवस्तूनां कृते नूतनान् शब्दान् एवं
रचय त — मूलधातुम् उपसग प्रत्ययं च योज यत्वा, अथवा द्वयोः त्रयाणां वा पदानां समासं कृत्वा।
( हन्द — संस्कृत नए शब्द उधार नह लेती, गढ़ती है। धातु + उपसग + प्रत्यय, अथवा समास — यही दो औज़ार ह। नीचे पाठ के
हर आधु नक शब्द क बनावट द गई है।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी
a g l AglaSem · NCERT Solutions

m /
coसमास
.
नूतनपदम् अङ् ग्लभाषायाम् कैसे बना (व्युत्प त्त / वग्रह)

em प्रत्यय
m l as
m .co Artificial Intelligence a g
ase
कृ तकबुि ः कृत (√कृ + त) + क ( वाथ कन्) = कृतक ‘बनाया हुआ’; कमधारयः

agl
क् स्

कृतका चासौ बुि ः च
सङ् कु िचतकृ तकबुि ः Narrow AI सम् + √कु च् (िसकु ड़ ना) + त = सङ् कुिचत ‘सीिमत’; कमधारयः
सङ् कुिचता m
क्

co
चासौ कृतकबुि ः च
m . ag
l a seअित + उ कृ ट (उत् + √कृष् + त) = अ यु कृ ट ‘अ य त
ag े ठ’ (यण् सि ध — इ + उ = यु)
अत्युत्कृ ष्टकृ तकबुि ः Super AI त् ष् क् त् त् ष् त् न् कमधारयः
श्रष् न्

य य अिधगमः; अिधगमः = अिध + √गम् + घञ् ‘सीखना, mषष्ठी-तत्पुरुषः
.co
यन्त्रािधगमः Machine Learning न्त्रस्

पा त करना’ (दीघ सि ध — अ + अ = आ)
se m
प् न्

गहनािधगमः com
. गहनः अिधगमः — ‘गहरा सीखना’ (दीघ सिagधl) a
m
Deep Learning कमधारयः
e
न्

asंशः
lदत्ता
ag
Data द ः (√दा + त ‘िदया हुआ’) अंशः — ‘िदया हुआ अंश/
त्त क् कमधारयः
टुकड़ ा’ (दीघ सि ध — अ + अ = आ) न्

त coयmअंशः — य का वह भाग जो छु आ नहीं जा सकता, a s
. agl
Software षष्ठी-तत्पुरुषः

emके वल चलता है
तन्त्रांशः न्त्रस् न्त्र

g l as
संवादोपकरणम् a tool संवाद य उपकरणम् (गुण सि ध — अ + उ = ओ)
Communication स् न् षष्ठी-तत्पुरुषः

मुख य पिरचय य पणाली — ‘चेहरा पहचानने की पणालीo’ m
c
m.
मुखपिरचयपणाली Facial Recognition स् स् षष्ठी-तत्पुरुषः

se
System

com l a
g ) — ‘चतुर गाड़ ी’
m . पटु ‘चतुर’ + कारयानम् (कार- पं aयानम्
ase
पटु-कारयानम् Smart Car रू कमधारयः

agl गूग ल-सहायकम् Google Assistant गूगल -नामकं सहायकम् कमधारयः

se m
रिश्मपरीक्षणिवद्या Radiology
co
रmमीनां परी ण य िव ा — ‘िकरणों की जाँच का शा ’ षष्ठी-तत्पुरुषः
g l a
. a
श् क्ष स् द्य स्त्र

m अपराध य शमनाय — ‘अपराध को शा त करने के िलए’
ase
agl
अपराधशमनाय Reducing crime स् न् षष्ठी-तत्पुरुषः
( चतुथ — ताद य) थ्

जाल य पवेशः — ‘जाल (नेट) में पवेश’
com
जालपवेशः Internet access स् षष्ठी-तत्पुरुषः

m.गणना करे ’
सम् + √गण् (िगनना) + वुल ् — ‘जो एकeसाथ
om las
सङ् गणकः Computer ण् कृदन्तम्

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m सहकरी सह + √कृ से बना ीिलङ् ग aकतgवाचक
ृ पद — ‘साथ
las
Helper (fem.) स्त्र कृदन्तम्
िमलकर करने वाली’
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a

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m .
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

यह दे खना क्य ज़रूरी है: जो वद्याथ ‘कृतकबु द्धः’ को एक क ठन नया शब्द मानकर रट लेता है, वह अगली बार
‘गहना धगमः’ पर फर अटक जाएगा। पर जो बनावट पकड़ लेता है — क हर शब्द दो-तीन जाने-पहचाने टु कड़ से
जुड़ा है — वह इन शब्द को पढ़कर ही समझ लेता है। संस्कृत क यही श क्त है : वह नए शब्द बाहर से नह लाती,
अपने ही धातु-प्रत्यय से गढ़ लेती है। इसी कारण दो हज़ार वष पुरानी भाषा म ‘Deep Learning’ का नाम भी
सहज बन जाता है।

Try this: इसी व ध से आप स्वयं नाम ग ढ़ए — e-mail = वद्युत्पत्रम्, mobile = चलदूरभाषः /
जङ्गमदूरवाणी, website = जालपुटम्, password = गुप्तशब्दः, screen = पटलम्, robot = यन्त्रमानवः,
drone = चालकर हत वमानम्। ध्यान र खए — दोन खण्ड का अथ मलकर पूरे शब्द का अथ दे ना चा हए, तभी
शब्द चलेगा।

संवादः (भागः १) — पृष्ठ 52–53
कृतकबुद्धेः स्वरूपम्, उदाहरणा न, प्रकाराः तथा प्र शक्षण व धः

सं वादः

प्र.1 संवादस्य आरम्भः कथं भव त ? य शकायाः प्रश्नः कः आसीत्, अध्यापकः च कम् उत्तरम् अयच्छत् ?

उत्तरम् — स्थानं वद्यालयकक्षा अ स्त। अध्यापके कक्षायां प्र वश त स त सव छात्राः ‘शुभप्रभातं, गुरुवय !’ इ त वद न्त,
अध्यापकः च ‘शुभप्रभातं, प्रयच्छात्राः !’ इ त प्रत्युत्तरं ददा त। ततः य शका पृच्छ त — ‘महोदय ! अद्य अहं कञ्चन
चालकर हतं पटु -कारयानं दृष्टवती। अहम् आश्चयच कता। कम् एतत् संभवम् ?’ अध्यापकः उत्तरं ददा त — ‘अवश्यं
य शके ! एतत् कृतकबु ा सम्भव त।’
( हन्द — स्थान है वद्यालय क कक्षा। अध्यापक कक्षा म प्रवेश करते ह, सब छात्र ‘शुभप्रभात, गुरुवय!’ कहते ह। तब य शका
पूछती है — ‘महोदय! आज मने एक बना चालक क स्माट कार दे खी। म आश्चयच कत ँ। क्या यह सम्भव है?’ अध्यापक उत्तर दे ते
ह — ‘अवश्य य शके! यह कृतकबु द्ध से सम्भव होता है।’)

चालकरिहतम् = चालके न रिहतम् — त ृत ीया-त त्पुरु ष (‘रिहत’ के योग में त ृत ीया)

पटु -कारयानम् = पटु (चत रु ) + कारयानम् (कार-रूपी यान) — Smart Car

दृ ष्टवती = √दृ श् + क्तवत ु + ङीप् (स्त्रीिलङ् ग) — ‘उसने दे खा’

आश्चयचिकता = आश्चयण चिकता — त ृत ीया-तत्पुरु ष, स्त्रीिलङ् ग

ध्यान द जए क पाठ आरम्भ कहाँ से करता है: कसी प रभाषा से नह , ब ल्क एक दृश्य से — बना ाइवर क
चलती हुई कार। यही अच्छ शक्षण- व ध है : पहले आश्चय, फर प्रश्न, फर उत्तर। य शका ‘ कम् एतत् संभवम्?’
पूछती है — और यही प्रश्न पूरे पाठ को खोल दे ता है। ध्यान द जए, अध्यापक ने पहले पूरी प रभाषा नह द ; केवल
‘एतत् कृतकबु ा सम्भव त’ कहकर वषय का नाम रखा और आगे छात्र से ही प रभाषा नकलवाई।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

व्याकरण: ‘य शके !’ — सम्बोधन प्रथमा, स्त्री लङ्ग आकारान्त शब्द का सम्बोधन एकवचन ‘-ए’ पर समाप्त होता
है (य शका → य शके, लता → लते, श्रेया → श्रेये)। ‘कृतकबु ा’ — तृतीया एकवचन; ‘बु द्ध’ + टा म यण् स न्ध
होकर ‘इ’ का ‘य्’ हो जाता है (बु द्ध + आ → बु ा)।

प्र.2 अध्यापकः कृतकबुद्धेः का प रभाषा दत्तवान् ? ेयायाः उत्तरं च कम् आसीत् ?

उत्तरम् — प्रथमं ेया वद त — ‘आचाय ! अहं जाना म। यदा यन्त्रा ण मनुष्यवत् चन्तय न्त, नणयं कुव न्त, काय च
कुव न्त, तदा तत्र कृतकबु द्धः उप स्थता अ स्त इ त जानीमः।’ ततः अध्यापकः तां प्रशंस त — ‘सुष्ठु !’ — तथा प रभाषां
प रष्कृत्य वद त — ‘यया अचेतनयन्त्रा ण मानवबु द्धवत् काय कुव न्त, सा कृतकबु द्धः इ त वैज्ञा नकाः मन्यन्ते।’
( हन्द — श्रेया कहती है — ‘आचाय! म जानती ँ। जब यन्त्र मनुष्य क तरह सोचते ह, नणय करते ह और काम करते ह, तब हम
जानते ह क वहाँ कृतकबु द्ध उप स्थत है।’ अध्यापक ‘बहुत सुन्दर!’ कहकर प रभाषा को और स्पष्ट करते ह — ‘ जसके ारा
चेतनाहीन यन्त्र मानव-बु द्ध क तरह काय करते ह, उसी को वैज्ञा नक कृतकबु द्ध मानते ह।’)

पदम् अथः क्य महत्त्वपूण

अचेतनयन्त्रािण न चेतनािन इित अचेतनािन, तािन य ािण —
न्त्र यही प रभाषा क जान है — यन्त्र म चेतना नह , फर भी वह चेतन-
चेतनारिहत य न्त्र जैसा काम करता है।

मानवबुि वत् मानवबुि ः इव — मानव-बुि की तरह ‘वत्’ प्रत्यय ‘जैसा’ कहता है, ‘वही’ नह — यन्त्र मानव-बु द्ध जैसा
है, मानव-बु द्ध नह ।

यया … सा िजससे … वह (करण-ततृ ीया + पथमा) कृतकबु द्ध साधन है — ‘यया’ ( जसके ारा) — कता नह ।

दोन प रभाषाओं का अन्तर पक ड़ए: श्रेया ने लक्षण बताया — जब यन्त्र सोच, नणय कर, काम कर, तब समझो
ए.आई. है। अध्यापक ने प रभाषा द — जसके ारा अचेतन यन्त्र मानव-बु द्ध जैसा काम कर, वही कृतकबु द्ध है।
श्रेया ने बाहरी चह्न बताए, अध्यापक ने भीतरी कारण। परीक्षा म ‘कृतकबु द्धः का अ स्त?’ पूछा जाए तो अध्यापक
का वाक्य ही उत्तर है, क्य क वही ‘वैज्ञा नकाः मन्यन्ते’ कहकर प्रामा णक ठहराया गया है।

व्याकरण: ‘मनुष्यवत्’, ‘मानववत्’, ‘मानवबु द्धवत्’ म व त प्रत्यय है, जो सादृश्य (समानता) बताता है — ‘…के
समान’। इस प्रत्यय से बने पद अव्यय होते ह, इस लए इनका रूप कभी नह बदलता। ‘सुष्ठु’ भी अव्यय है — ‘भली-
भाँ त, बहुत अच्छा’।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

प्र.3 अध्यापकः कृतकबुद्धेः का न उदाहरणा न उक्तवान् ? अथवः य शका पावनी च स्वानुभवात् क कम् अवदन् ?

उत्तरम् — अध्यापकः वद त — ‘साधु ! चैट-जीपीट , स र, एलेक्सा, गूगल मान चत्रं, जे म न, मेटा-कृतकबु द्धः,
परप्ले क्स ट चेत्यादयः अनुप्रयुक्ततन्त्र वशेषाः कृतकबु द्धयुक्ताः स न्त।’
( हन्द — अध्यापक कहते ह — ‘साधु! चैट-जीपीट , स र, एलेक्सा, गूगल मान चत्र, जे म न, मेटा-ए.आई., परप्ले क्स ट इत्या द
प्रयुक्त होने वाले वशेष तन्त्र (ए प्लकेशन) कृतकबु द्ध से युक्त ह।’)

कः तस्य अनुभवः (संस्कृतम्) हन्द म
वद त

अथवः आम्, चैट-जीपीटी इित नामकं संवादोपकरणमिप कृतकबु ा चैट-जीपीट नाम का संवाद-उपकरण भी कृतकबु द्ध से युक्त
यु तम् अि त।
क् स् है।

यिशका अहं चैट-जीपीटी इ यनेन अनेकेषां प नानां यथे टम् उ रािण
त् श् ष् त्त मने चैट-जीपीट से अनेक प्रश्न के मनचाहे उत्तर पाए। यह
पा तवती। इदं कृतकबु ाः कारणात् एव संभवम्।
प् कृतकबु द्ध के ही कारण सम्भव है।

अथवः मम माता ‘एले सा’-नामक य य य उपयोगं करोित। एतत्
क् स् न्त्रस् मेरी माता ‘एलेक्सा’ नामक यन्त्र का उपयोग करती ह। वह गीत
गीतं गायित, िव ु ीपं वालयित, दै िनकसंवादं वातावरणि थितं
द्य ज् स् गाता है, बजली का द पक जलाता है, दै नक समाचार तथा
च सूचयित। मौसम क जानकारी दे ता है।

पावनी अहो ! मम माता गूगल -सहायके न सह वात ं करोित। अहो! मेरी माता गूगल-अ सस्टट से बातचीत करती ह।

पाठ क रचना-कुशलता: अध्यापक ने सूची गनाई, पर पाठ उसे सूखी सूची नह रहने दे ता — तुरन्त तीन छात्र
अपने घर का अनुभव जोड़ दे ते ह। इसी से वषय ‘ कताबी’ से ‘अपना’ बन जाता है। ध्यान द जए क तीन उदाहरण
घर के ह — माता एलेक्सा चलाती ह, माता गूगल-सहायक से बात करती ह — अथात् ए.आई. कसी प्रयोगशाला म
नह , हमारी रसोई और बैठक तक पहुँच चुका है।

व्याकरण तथा शब्द: ‘चेत्यादयः’ = च + इत्यादयः (यण् स न्ध — इ + आ = या)। ‘अनुप्रयुक्ततन्त्र वशेषाः’ =
अनुप्रयुक्ताः ये तन्त्र वशेषाः — ‘प्रयोग म लाए गए वशेष तन्त्र’ अथात् applications। ‘इत्यनेन’ = इ त + अनेन
— ‘इसके ारा’। ‘प्राप्तवती’ स्त्री लङ्ग क्तवतु-रूप है (य शका बा लका है, इस लए ‘प्राप्तवान्’ नह )। ‘गूगल-
सहायकेन सह’ — ‘सह’ के योग म तृतीया होती है।

प्र.4 कृतकबुद्धेः क त प्रमुखाः प्रकाराः स न्त ? तान् सोदाहरणं ववृणुत।

उत्तरम् — कृतकबुद्धेः त्रयः प्रमुखाः प्रकाराः स न्त। अक्षतस्य प्रश्नं (‘के ते प्रकाराः मान्यवर !’) ुत्वा अध्यापकः फलके
एतान् लख त —

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

• सङ् कु िचतकृ तकबुि ः — जीपीटी, गूगल-मानिचत्रं, यू-ट बू ।
्

• सामान्यकृ तकबुि ः — मानवसमाना बुि मत्ता (एतत् लक्ष्यं भवित)।

• अत्युत्कृ ष्टकृ तकबुि ः — मानवात् अिप अिधका बुि मती — एषा काल्पिनकी अिस्त।

प्रकारः ENGLISH स्वरूपम् उदाहरणम् / स्थ तः

सङ् कु िचतकृ तकबुि ः Narrow AI एकं न श्चतं कायम् एव करो त, अन्यत् न जीपीट , गूगल-मान चत्रम्, यू- ूब् —
अद्य एषा एव वद्यमाना अ स्त

सामान्यकृ तकबुि ः General AI मानवसमाना बु द्धमत्ता — यत् कम प मानवः अद्या प न सद्धा — एतत् लक्ष्यं भव त
कतु शक्नो त, तत् सव कतु समथा (वैज्ञा नकानां लक्ष्यम्)

अत्युत्कृ ष्टकृ तकबुि ः Super AI मानवात् अ प अ धका बु द्धमती एषा काल्प नक अ स्त — केवलं
कल्पनायाम्, न तु वास्तवे

( हन्द — तीन प्रकार ह। सङ् कु चत — जो केवल एक न श्चत काम करती है; आज जो भी ए.आई. हमारे पास है, वह यही है।
सामान्य — मनुष्य के बराबर बु द्ध; यह अभी बनी नह , यही वैज्ञा नक का लक्ष्य है। अत्युत्कृष्ट — मनुष्य से भी अ धक बु द्धमती;
यह अभी केवल कल्पना है।)

तीन म क्रम क्य है: यह सीढ़ वतमान → लक्ष्य → कल्पना क है। जो ‘है’ वह सङ् कु चत है, जो ‘बनाना है’ वह
सामान्य है, और जो ‘सोचा भर गया है’ वह अत्युत्कृष्ट है। इसी लए पाठ म तीसरे के साथ ‘एषा काल्प नक अ स्त’
जोड़ा गया — पुस्तक वद्याथ को चल चत्र वाले भय से बचाना चाहती है। आगे वेदः ठ क यही भय उठाता है
(‘चल त्रे दृष्टवान् यत् यन्त्रा ण मानवेभ्यः संसारम् अ धगृह्ण न्त’), और अध्यापक उसे शान्त करते ह।

शब्द नमाण: सङ् कु चत = सम् + √कुच् + क्त — ‘ सकुड़ा हुआ, सी मत’ (इसी से हन्द ‘संकु चत’)। अत्युत्कृष्ट
= अ त + उत्कृष्ट; ‘इ’ के बाद असवण स्वर ‘उ’ आने पर ‘इ’ का ‘य्’ हो गया — यण् स न्ध। बु द्धमत्ता = बु द्धमत् +
तल् + टाप् — भाववाचक स्त्री लङ्ग संज्ञा। काल्प नक = कल्पना + ठक् (इक) + ङ प् — ‘कल्पना से सम्ब न्धत’,
स्त्री लङ्ग (क्य क वशेष्य ‘कृतकबु द्धः’ स्त्री लङ्ग है)।

छपाई क सूचना: पृष्ठ ५३ पर यही तीन बन्दु दो बार छपे ह — एक बार अध्यापक के श्यामपट्ट के चत्र म और एक
बार उसके नीचे मु द्रत रूप म। चत्र वाली सूची अ न्तम पं क्त म ‘एषा काल्प न…’ पर कट हुई है; पूण पाठ नीचे क
मु द्रत सूची म है — ‘एषा काल्प नक अ स्त।’ उत्तर लखते समय नीचे वाली पूण सूची ही ली जए।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी
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वेदस्य शङ् का का आसीत् ? यन्त्रा ण कथं शक्ष्यन्ते इ त अध्यापकः कम् उक्तवान् ?
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प्र.5

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a gl — वेदः शङ् कते — ‘ कन्तु आचाय ! अस्माकं बु द्धस्तु ईश्वरेण म स्तष्के स्था पता अ स्त, कथम् एषा बु द्धः यन्त्रे
उत्तरम्
स्थाप्यते ?’ अध्यापकः तं प्रशंस त — ‘उत्तमः प्रश्नः’ — तथा वद त — ‘प्रौद्यो गक वशारदाः यन्त्रा धगमः, गहना धगमः

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चे त व धना एता न यन्त्रा ण प्र शक्षय न्त, अनुप्रयोगाय च स ीकुव न्त।’
( हन्द — वेद पूछता है — ‘ कन्तु आचाय! हमारी बु द्ध तो m .
s e ईश्वर ने म स्तष्क म रखी है; यह बु द्ध यन्त्र म कैसे रखी जाती है?’

a g laयन्त्रा धगम (Machine Learning) तथा गहना धगम (Deep
अध्यापक कहते ह — ‘उत्तम प्रश्न! तकनीक वशेषज्ञ
Learning) — इस व ध से इन यन्त्र को प्र श क्षत करते ह और उपयोग के लए तैयार करते ह।’)

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पदम् वग्रहः / व्युत्प त्तः अथः

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.co पौ ोिगकीशा े िवशारदाः (कु शलाः) जनाः
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तकनीक वशेषज्ञ — Technology Experts
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पौद्योिगकीिवशारदाः

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द्य स्त्र

g l a य य अिधगमः; अिध + √गम् + घञ्
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यन्त्रािधगमः न्त्रस् यन्त्र का सीखना — Machine Learning

गहनः अिधगमः
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गहरा सीखना — Deep Learning
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गहनािधगमः

प + √िश ् + िणच् + लट् m .co agl
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पिशक्षयिन्त प्र शक्षण दे ते ह — They coach

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सज्जीकु विन्त स जम् + √कृ (aि वg-पयोगः)
ज् च् तैयार कर दे ते ह

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वेद का प्रश्न वास्तव म गहरा है: वह पूछ रहा है — बु द्ध तो द हुई वस्तु है, बनाई हुई नह ; फर यन्त्र म वह आती

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gश (data) दे ख-दे खकर सीखता
.c जाती है। जैसे बालक उदाहरण दे ख-दे खकर सीखता है, वैसे ही यन्त्र दत्तां
कहाँ से है ? अध्यापक का उत्तर सीधा है और उसम पूरे वषय क कुंजी है — यन्त्र म बु द्ध ‘रखी’ नह जाती,
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सखाई
a है। इसी लए आगे आय का प्रश्न — ‘यन्त्राणाम प पाठशाला अ स्त वा?’ — इतना उपयुक्त लगता है, और अध्यापक
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का उत्तर ‘डेटासेट्’ इतना सुन्दर।

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ध्यान द: ‘बु द्धस्तु’ = बु द्धः + तु ( वसगस न्ध — वसग के बाद ‘त्’ आने पर वसग ‘स्’ हो जाता है)। ‘ईश्वरेण
स्था पता’ — कमवाच्य म कता तृतीया म आता है (‘करणे/कत र तृतीया’), और कृदन्त ‘स्था पता’ कम ‘बु द्धः’ के
लङ्ग-वचन का अनुसरण करता है। ‘स्थाप्यते’ भी कमवाच्य लट् है — ‘रखी जाती है’।

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संव ादः २) — पृष्ठ 54–55

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डेटासेट्, पूवग्रहः, उपयोगक्षेत्रा ण, शक्षा, च कत्सा, कृ षः तथा अपराधशमनम्

सं वादः

प्र.1 ‘डेटासेट्’ कम् अ स्त ? आयस्य प्रश्नस्य अध्यापकः कम् उत्तरम् अयच्छत् ?

उत्तरम् — आयः वनोदे न पृच्छ त — ‘यन्त्राणाम प पाठशाला अ स्त वा ?’ (सव हस न्त)। अध्यापकः उत्तरं ददा त —
‘अस्याः यन्त्रपाठशालायाः नाम “डेटासेट्” इ त ! कृतकबु द्धः यन्त्रं दत्तांशमाध्यमेन शक्षणं करो त।’
( हन्द — आय पूछता है — ‘क्या यन्त्र क भी पाठशाला होती है?’ सब हँस पड़ते ह। अध्यापक कहते ह — ‘इस यन्त्र-पाठशाला
का नाम ‘डेटासेट्’ है! कृतकबु द्ध यन्त्र को दत्तांश (डेटा) के माध्यम से शक्षा दे ती है।’)

डेट ासेट् = यन्त्रपाठशाला

दत्तांशः (Data) = द त्तः अंशः — वह ‘िदया हुआ अंश’ िजससे यन्त्र सीखता है

यन्त्रपाठशालायाः = यन्त्रस्य पाठशाला — षष्ठी-तत्पुरु ष, षष्ठी एकवचन

यह उपमा इतनी अच्छ क्य है: ‘डेटासेट्’ को ‘यन्त्रपाठशाला’ कहना पूरे वषय का सबसे सरल और सबसे सही
चत्र है। बालक पाठशाला म जो पढ़ता है, वैसा ही बनता है; यन्त्र डेटासेट् म जो दे खता है, वैसा ही सीखता है। और
इसी उपमा से अगला प्रश्न अपने आप नकल आता है — य द पाठशाला ही ग़लत पढ़ाए तो ? यही य शका पूछती
है।

ध्यान द: ‘यन्त्राणाम प’ = यन्त्राणाम् + अ प। ‘अस्याः’ इदम् शब्द का स्त्री लङ्ग षष्ठी एकवचन है (पाठशाला स्त्री लङ्ग
है)। ‘दत्तांशमाध्यमेन’ म तृतीया करण के अथ म है — ‘डेटा के ारा’ (‘करणे तृतीया’)।

प्र.2 य द अशुद्धदत्तांशः द यते त ह का समस्या भव त ? ‘पूवग्रहः’ इ त कः दोषः ?

उत्तरम् — य शका पृच्छ त — ‘ कन्तु आचाय ! य द अशुद्धदत्तांशः द यते त ह कृतकबु द्धः अ प त्रु ट करो त ?’ अध्यापकः
वद त — ‘आम्। यदा प्र शक्षणदत्तांशः पक्षपातयुक्तः भव त, तदा नष्कषाः अ प पक्षपातयुक्ताः भव न्त। एषः दोषः
‘पूवग्रहः’ इ त कथ्यते। कृतकबु द्धः अद्या प वकासपदे अ स्त। सेदान मानवीयप रचया- ववेकेन सह त्रु टर हतरूपेण ग्रहीतुं
शक्यते।’
( हन्द — य शका पूछती है — ‘ कन्तु आचाय! य द अशुद्ध डेटा दया जाए तो क्या कृतकबु द्ध भी त्रु ट करती है?’ अध्यापक कहते
ह — ‘हाँ। जब प्र शक्षण का डेटा पक्षपात से भरा होता है, तब नष्कष भी पक्षपातपूण हो जाते ह। इस दोष को ‘पूवग्रह’ (Bias)
कहा जाता है। कृतकबु द्ध अभी वकास क अवस्था म है। इसी लए अब मानवीय दे खभाल तथा ववेक के साथ ही इसे त्रु टर हत
रूप म ग्रहण कया जा सकता है।’)

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चरणम् यत् भव त हन्द म

१ पिशक्षणदत्तांशः पक्षपातयुक्तः भवित िजस डेटा पर य िसखाया गया, वही एकप ीय था
न्त्र क्ष

२ यन्त्रं तम् एव दत्तांशं िशक्षते य वही सीखता है जो उसे िदखाया गया
न्त्र

३ िनष्कष ः अिप पक्षपातयुक्ताः भविन्त इसिलए उसके िन कष भी प पाती िनकलते है ं
ष् क्ष

४ एषः दोषः ‘पूवग हः’ इित कथ्यते इसी दोष का नाम है पूवगह / पूव गह (Bias)

पूवाग्रह क्या है, एक उदाहरण से: मान ली जए कसी यन्त्र को केवल शहरी वद्यालय क उत्तरपु स्तकाएँ दखाकर
‘अच्छा उत्तर’ पहचानना सखाया गया। अब वह ग्रामीण वद्याथ के सही उत्तर को भी कम अंक दे गा — इस लए
नह क उत्तर ग़लत है, ब ल्क इस लए क उसने वैसा उत्तर कभी दे खा ही नह । दोष यन्त्र का नह , उसक
‘पाठशाला’ का है। इसी लए अध्यापक कहते ह — कृतकबु द्ध ‘अद्या प वकासपदे अ स्त’, और उसे मानवीय
ववेक के साथ ही लेना चा हए। यही पाठ का केन्द्र य सन्दे श है।

शब्द-भेद (पुस्तक म दोन रूप छपे ह): पाठ (पृष्ठ ५४) तथा अभ्यास-प्रश्न २ (झ) म पूवग्रहः छपा है, जब क
शब्दाथ-ता लका (पृष्ठ ५८) तथा प्रश्न ३ क मञ्जूषा (पृष्ठ ६२) म पूवाग्रहः। दोन रूप शुद्ध ह और अथ एक ही है —
‘पूव + ग्रह’ (पहले से पकड़ा हुआ मत) तथा ‘पूव + आग्रह’ (पहले से जमा हुआ आग्रह)। उत्तर म जो रूप प्रश्न म
दया हो, वही ल खए।

ध्यान द: ‘सेदान ’ = स + इदानीम्? नह — यहाँ पुस्तक का पाठ ‘सेदानीम्’ है, जसका आशय ‘सा इदानीम्’ (वह
अब) है; अथ क दृ ष्ट से ‘अतः इदानीम्’ (अतः अब) पढ़ना सबसे सहज है। ‘ग्रहीतुं शक्यते’ — तुमुन्-प्रत्ययान्त +
कमवाच्य क्रया, ‘ग्रहण कया जा सकता है’।

प्र.3 कृतकबु द्धः केषु स्थलेषु उपयुज्यते ? ेयायाः प्रश्नस्य अध्यापकस्य च उत्तरं लखत।

उत्तरम् — ेया पृच्छ त — ‘गुरुवर ! एषा बु द्धः केषु स्थलेषु उपयुज्यते ?’ अध्यापकः वद त — ‘ ेये ! तव प्रश्नः अतीव
महत्त्वपूणः। शक्षायां, च कत्सायां, कृ ष-क्षेत्रे, न्यायालये, सञ्चारे, वत्ते, कलासङ्ग तक्षेत्रे मनोरञ्जना दषु क्षेत्रेषु च
कृतकबु द्धः भू रशः उपयुज्यते।’
( हन्द — श्रेया पूछती है — ‘गुरुवर! यह बु द्ध कन- कन स्थान पर प्रयुक्त होती है?’ अध्यापक कहते ह — ‘श्रेये! तुम्हारा प्रश्न
अत्यन्त महत्त्वपूण है। शक्षा म, च कत्सा म, कृ ष-क्षेत्र म, न्यायालय म, सञ्चार म, वत्त म, कला-सङ्ग त तथा मनोरञ्जन आ द क्षेत्र
म कृतकबु द्ध बहुतायत से प्रयुक्त होती है।’)

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क्षेत्रम् (सप्तमी वभक्तौ) हन्द पाठ म आगे दया गया उदाहरण

िशक्षायाम् िश ा में
क्ष द क्षा, स्वयम्, पी.एम्.-ई वद्या, चैट्बोट् , भाषानुवादोपकरणा न

िचिकत्सायाम् िचिक सा मेंत् रोबो टक्-सजरी, रोग-पूवज्ञानम्, र श्मपरीक्षण वद्या, औषधशुश्रूषा

कृ िष-क्षेत्र े खेती में ोन से बीज-वपन, क ट नरीक्षण, भू मक्षमता-परीक्षण

न्यायालये यायालय में
न् (पाठ म वस्तार नह ; ‘यस्तु क्रयावान्’ खण्ड म व धक्षेत्र माँगा गया है)

सञ्चारे स चार में
ञ् संवादोपकरणा न — चैट-जीपीट , गूगल-सहायकम्

िवत्ते िव (धन- यव था) में
त्त व् स् शब्दाथ-ता लका : वत्ते = अथव्यवस्थायाम् (In finance)

कलासङ् गीतक्षेत्र े कला तथा सङ् गीत के े में क्ष त्र काव्यरचना (वेदः ारा प्राप्त ोकः), दॅ ल्ल्-ई ( चत्रोत्पादनम्)

मनोरञ्जनािदषु क्षेत्र ेष ु मनोर जन आिद े ों में
ञ् क्ष त्र यू- ूब्, एलेक्सा का गीत गाना

व्याकरण का सूत्र यह पक ड़ए: प्रश्न ‘केषु स्थलेषु’ सप्तमी बहुवचन म है, इस लए पूरा उत्तर भी सप्तमी म ही
आया — शक्षायाम्, च कत्सायाम्, क्षेत्रे, न्यायालये, सञ्चारे, वत्ते, क्षेत्रेषु। यही ‘अ धकरणे सप्तमी’ का नयम है,
जसे पुस्तक ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ म अलग से समझाती है। संस्कृत म प्रश्न क वभ क्त ही उत्तर क वभ क्त तय
कर दे ती है — इसे पकड़ लेने पर आधा अभ्यास अपने आप सध जाता है।

शब्द: ‘भू रशः’ अव्यय है — ‘बहुत अ धक मात्रा म, बहुतायत से’ (भू र + शस्)। ‘मनोरञ्जना दषु’ = मनोरञ्जनम्
आ दः येषां तेषु — बहु ी ह। ‘श्रेये !’ सम्बोधन एकवचन है (श्रेया → श्रेये)।

प्र.4 शक्षायां कृतकबुद्धेः उपयोगः कथं भव त ? क कृतकबु द्धः शक्षकस्य स्थानं ग्रहीतुं शक्नो त ?

उत्तरम् (उपयोगः) — अथवस्य प्रश्नस्य उत्तरे अध्यापकः वद त — ‘द क्षा, स्वयम्, सवषां कृते कृतकबु द्धः, पी.एम्.-ई वद्या,
संशय नराकरणाथ चैट्बोट् , भाषानुवादोपकरणा न च यत्र तत्र प्रयुज्यन्ते। एता न कृतकबु ाधा रता न उपकरणा न स न्त।
एतेषां साहाय्येन छात्राः शक्षकाणाम् अनुप स्थतौ अ प स्वयम् अध्येतुं शक्नुव न्त।’
उत्तरम् ( शक्षकस्य स्थानम्) — आकाशः शङ् कते — ‘हा धक् ! एतेषां कारणेन मानव शक्षकः क प्रयोजनर हतः
भ वष्य त ?’ अध्यापकः स्पष्टं वद त — ‘न न ! कृतकबु द्धः गुरु मत्रम् अ स्त, गुरु वकल्पः ना स्त। शक्षकाणां सा न्नध्ये
छात्रेषु व्य क्तत्व वकासः भव त। शक्षकाः पुस्तक यज्ञानेन सह छात्रेषु मानवीयमूल्यबोधम् अ प जनय न्त। ते अनुशासनं,
परोपकारं, करुणां, तथैव व्यवहारज्ञानं च शक्षय न्त। सदा स्मरणीयं यत् कृतकबु द्धः उपकरणम् अ स्त, प्रेरणा तु मानवेभ्यः
एव आगच्छ त।’
( हन्द — शक्षा म द क्षा, स्वयम्, ‘सव के लए ए.आई.’, पी.एम्. ई- वद्या, शङ् का दूर करने के लए चैटबोट तथा भाषानुवाद के
उपकरण जगह-जगह प्रयुक्त हो रहे ह। ये सब ए.आई.-आधा रत उपकरण ह। इनक सहायता से छात्र शक्षक क अनुप स्थ त म भी
स्वयं पढ़ सकते ह। कन्तु कृतकबु द्ध गुरु क मत्र है, गुरु का वकल्प नह । शक्षक के सा न्नध्य म ही छात्र का व्य क्तत्व- वकास

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होता है; शक्षक पुस्तक य ज्ञान के साथ मानवीय मूल्य का बोध भी जगाते ह, अनुशासन, परोपकार, करुणा तथा व्यवहार-ज्ञान
सखाते ह। सदा याद रखना चा हए क कृतकबु द्ध उपकरण है — प्रेरणा तो मनुष्य से ही आती है।)

यत् कृतकबु द्धः दातुं शक्नो त यत् केवलं मानव शक्षकः दातुं शक्नो त

सूचना, पाठ सामग ी, पश्नोत्तरम् यि त विवकासः (साि येन)
व् क् त् न्न ध्

संशयिनराकरणम् (चैट्बोट् ) मानवीयमू यबोधः ल्

भाषानुवादः अनुशासनम्, परोपकारः, क णा रु

अनुपिस्थतौ अिप स्वयम्-अध्ययनम् यवहार ानम् तथा पेरणा
व् ज्ञ

‘गुरु मत्रम्, न गुरु वकल्पः’ — यही उत्तर क जान है: ध्यान द जए क अध्यापक ने तक कैसे रखा। उन्ह ने यह
नह कहा क ए.आई. कमज़ोर है; उन्ह ने यह कहा क शक्षक जो दे ता है, वह सूचना नह , संस्कार है — और संस्कार
सा न्नध्य से मलता है, स्क्र न से नह । ‘प्रेरणा तु मानवेभ्यः एव आगच्छ त’ — इस एक वाक्य म ‘एव’ (ही) शब्द
नणायक है। यन्त्र उत्तर दे सकता है, पर पढ़ने क इच्छा नह जगा सकता।

व्याकरण: ‘कृतकबु ाधा रता न’ = कृतकबु द्ध + आधा रता न (यण् स न्ध के बाद द घ) — ‘ए.आई. पर
आधा रत’। ‘अनुप स्थतौ’ सप्तमी एकवचन है और यहाँ भावे सप्तमी जैसी है — ‘न होने पर’। ‘अध्येतुम्’ = अ ध +
√इ + तुमुन् — ‘पढ़ने के लए’ (यही पद शब्दाथ-ता लका क पहली पं क्त म दया है)। ‘हा धक्’ खेद-सूचक
अव्यय-युग्म है — ‘हाय!’

प्र.5 च कत्साक्षेत्रे, कृ षक्षेत्रे तथा अपराधशमने कृतकबु द्धः कथं साहाय्यं करो त ? वेदस्य तथा य शकायाः भयं च
क दृशम् आसीत् ?

उत्तरम् (त्री ण क्षेत्रा ण) —

क्षेत्रम् पाठस्य वाक्यम् हन्द

िचिकत्सायाम् आम् ! रोबोिटक् -सजरी, रोग-पूव ानं, कृतकबुि ः ज्ञ रोबो टक सजरी, रोग का पूवानुमान, ए.आई.-आधा रत
(आयस्य पश्नः) रि मपरी णिव ा, चैट-कृतकबुि ः, औषधशु ूषा चे यादीिन
श् क्ष द्य श्र त् रे डयोलॉजी, चैट-ए.आई. तथा औषध-शुश्रूषा — ये
तदाधािरतािन िचिक सोपकरणािन सि त। त् न् सब ए.आई.-आधा रत च कत्सा-उपकरण ह।

कृ िष-क्षेत्र े (अक्षतस्य नूनं ! कृिष- े े अिप डोनमा यमेन बीज-वपनं,
क्ष त्र ध् नश्चय ही! खेती म भी ोन के ारा बीज बोना, क ट
पश्नः) कीटिनरी णं, भूिम मता-चे यादीनां परी णम् अिप य ैः
क्ष क्ष त् क्ष न्त्र का नरीक्षण तथा भू म क क्षमता क जाँच — ये सब
भवि त। न् यन्त्र से होते ह।

अपराधशमनाय मुखपिरचयपणाली, पूव नुमेय-िनय णं चे यािद-योजनासु न्त्र त् चेहरा पहचानने क प्रणाली तथा पूवानुमान-आधा रत
(अथवस्य पश्नः) कृतकबु ेः पयोगः अि त। स् नयन्त्रण (Predictive Policing) जैसी योजनाओं
म ए.आई. का प्रयोग है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी
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उत्तरम् (भयम्) — वेदः वद त — ‘अहं क स्म श्चत् चल
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त्रे दृष्टवान् यत् यन्त्रा ण मानवेभ्यः संसारम् अ धगृह्ण न्त इ त।’
य शका च पृच्छ त — ‘अ प च, आचाय ! क कृतकबु द्धः मानवस्य स्थानं हतु शक्नो त ?’ अध्यापकः शमय त — ‘एषा
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चन्ता समाजे प्रगाढं जायमाना अ स्त, कन्तु अत्र बोद्धव्यं यत् कृतकबु द्धः सहा यका अ स्त, मनुष्यस्य प्र तस्प धनी न।’

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( हन्द — वेद कहता है — ‘मने कसी चल चत्र म दे खा क यन्त्र मनुष्य से संसार छ न लेते ह।’ य शका पूछती है — ‘क्या

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कृतकबु द्ध मनुष्य का स्थान छ न सकती है?’ अध्यापक कहते ह — ‘यह चन्ता समाज म गहरी होती जा रही है, कन्तु यहाँ समझने
योग्य बात यह है क कृतकबु द्ध सहा यका है, मनुष्य क प्र तस्प धनी नह ।’)

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पाठ भय का उत्तर कैसे दे ता है: दो शब्द को आमने-सामने रखकर — ‘सहा यका’ बनाम ‘प्र तस्प धनी’। और ag
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ध्यान द जए, अध्यापक भय को झूठा नह कहते — ‘एषा चन्ता समाजे प्रगाढं जायमाना अ स्त’, अथात् चन्ता
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सचमुच बढ़ रही है। पहले भय को स्वीकार करना, फर उसे सही दशा दे ना — यही प रपक्व उत्तर क व ध है। इसी

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दृ ष्ट से आगे (पृष्ठ ५७) वे कहते ह — ‘कृतकबु द्धः स्वतः कस्या प वृ त्त न हर त’ — ए.आई. स्वयं कसी क नौकरी
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नह छ नती।

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a s emक सूचना: पाठ (पृष्ठ ५५) म यह पद ‘पूवानुमेय- नयन्त्रणम्’ (Predictive Policing) छपा है, कन्तु
gl अभ्यास-प्रश्न २ (छ) म वही पद ‘अपूवानुमेय- नयन्त्रणम्’ छपा है। ‘अ’ उपसग लगने से अथ उलट जाएगा
छपाई

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(‘ जसका पूवानुमान न हो सके’), इस लए शुद्ध पद पूवानुमेय- नयन्त्रणम् ही है — पूवम् अनुमेयम् (पहले से
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अनुमान करने योग्य) नयन्त्रणम्।

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व्याकरण: ‘चल a
त्रे’ = चलत् + चत्रे (श्चत्व स न्ध — त् + च् = ्); ‘चलत्’ शतृ-प्रत्ययान्त है — ‘चलता हुआ
चत्र’ अथात् film। ‘मानवेभ्यः … अ धगृह्ण न्त’ — यहाँ पञ्चमी अपादान म है ( जससे छ ना जाए)। ‘हतुम्’ = √हृ

co m
+ तुमुन्। ‘बोद्धव्यम्’ = √बुध् + तव्यत् — ‘समझना चा हए’, व ध-कृदन्त।
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gपाठान्तगतः ोकः — पृष्ठ 55–56
चैट-जीपीट -प्राप्तः अनुष्टुप् ोकः — पदच्छे दः, अन्वयः, शब्दाथः, हन्द अथः, भावः
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ोकः
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प्र.1 वेदः चैट-जीपीट इत्यस्मात् यं agl ोकं प्राप्तवान्, तस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ हन्द -अथ भावं च लखत —
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“ वद्युत्प्रज्ञया यन्त्रा ण नत्यं वद न्त चेतनाः। अहोरात्रं न व ान्ताः मानवान् धारय न्त ते॥”

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.c — य शका पृच्छ त ‘ क कृतकबु द्धः काव्यम प रच यतुं समथा ?’ अध्यापकःaप्रgतप्रश्नं करो त ‘अत्र भवन्तः क चन्तय न्त ?’

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प्रसङ्गः
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तदा वेदः वद त — ‘अहं चैट-जीपीट इत्यस्मात् एनं ोकं प्राप्तवान् —’ । ोकं श्रुत्वा सव सोत्साहं पठ न्त, आश्चय च कुव न्त।

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िवद्य त्ु पज्ञया यन्त्रािण िनत्यं वदिन्त चे त नाः।
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अहोरात्रं न िवश्रान्ताः मानवान् धारयिन्त ते ॥
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पदच्छे दः — वद्युत्-प्रज्ञया + यन्त्रा ण + नत्यम् + वद न्त + चेतनाः। अहोरात्रम् + न + वश्रान्ताः + मानवान् + धारय न्त + ते।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

अन्वयः — चेतनाः यन्त्रा ण वद्युत्प्रज्ञया नत्यं वद न्त। ते अहोरात्रं न वश्रान्ताः (सन्तः) मानवान् धारय न्त।

पदम् व्युत्प त्तः / वग्रहः शब्दाथः

िवद्य त्ु पज्ञया िव तु ः प ा, तया — ष ठी-त पु ष, ततृ ीया ए.व.
द्य ज्ञ ष् त् रु बजली क बु द्ध से — अथात् कृतकबु द्ध से

यन्त्रािण नपुंसकिलङ् ग, पथमा बहुवचन यन्त्र (मशीन)

िनत्यम् अ ययम्
व् प्र त दन, सदा

वदिन्त √ वद् + लट् , प.पु.ब.व. बोलते ह

चेतनाः चेतना िव ते येषां ते — बहुवीिह
द्य चेतन (जैसे जी वत), सजग

अहोरात्रम् अह च राि च —
श् त्रश् द्वन्द्व समाहार), ि यािवशेषण
( दन-रात

िवश्रान्ताः िव + √ म् + त श्र क् वश्राम कए हुए — ‘न वश्रान्ताः’ = बना थके

धारयिन्त धृ िणच् + लट्
√ + धारण करते ह, सँभालते ह

हन्द अथ — बजली क बु द्ध (कृतकबु द्ध) से चलने वाले ये यन्त्र चेतन प्रा णय क तरह नत्य बोलते ह। दन-रात बना थके ये
मनुष्य को सँभालते रहते ह।

भावः: ोक का हृदय अ न्तम क्रया म है — ‘मानवान् धारय न्त’। ‘धारण करना’ का अथ है सँभालना, थामे
रखना, बोझ उठाना — जैसे पृथ्वी प्रा णय को धारण करती है। अथात् क व (यहाँ यन्त्र स्वयं!) कहता है क ये
मशीन मनुष्य पर शासन नह करत , उसे थामे रहती ह। यही पाठ के शीषक ‘मानवबुद्धेः सहकरी’ का काव्यरूप है।
दूसरा सुन्दर बन्दु ‘चेतनाः’ शब्द है — यन्त्र चेतन नह ह (अध्यापक ने उन्ह ‘अचेतनयन्त्रा ण’ कहा था), पर वे चेतन
जैसे लगते ह; काव्य इसी भ्रम को सुन्दरता म बदल दे ता है। तीसरा — ‘अहोरात्रं न वश्रान्ताः’ यन्त्र क सबसे बड़ी
वशेषता बताता है : वह थकता नह । मनुष्य को वश्राम चा हए, यन्त्र को नह — इसी लए दोन मलकर काम कर
तो श्रम और ववेक दोन बचे रहते ह।

छन्दः: यह अनुष्टुप् छन्द है — चार पाद, प्रत्येक पाद म आठ अक्षर ( व-द्यु-त्प्र-ज्ञ-या-य-न्त्रा- ण = ८)। यही सबसे
प्र सद्ध ोक-छन्द है, जसम रामायण-महाभारत रचे गए ह।

पाठक के लए एक ईमानदार टप्पणी: इस ोक क रचना यन्त्र ने क है, इस लए इसम एक व्याकर णक
श थलता रह गई है — ‘यन्त्रा ण’ नपुंसक लङ्ग है, पर उसके वशेषण ‘चेतनाः’, ‘ वश्रान्ताः’ तथा सवनाम ‘ते’
पुं लङ्ग रूप म आए ह। शुद्ध रूप होता — ‘चेतना न … न वश्रान्ता न … ता न’। यह त्रु ट पाठ क उसी सीख को
प्रमा णत करती है जो अध्यापक बार-बार दोहराते ह — कृतकबु द्ध रचना कर सकती है, कन्तु अ न्तम जाँच
मानवीय ववेक क ही चा हए (‘मानवीयप रचया- ववेकेन सह त्रु टर हतरूपेण ग्रहीतुं शक्यते’)। इसी दृ ष्ट से यह
ोक पाठ का सबसे शक्षाप्रद अंश है।

संवादः (भागः ३) — पृष्ठ 56–57

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

साइबर-अपराधः, डीप्-फेक्, नराकरणोपायाः, वृ त्त-प्रश्नः तथा उपसंहारः

सं वादः

प्र.1 कृतकबुद्धेः दुरुपयोगेन क दृशं भयम् अ स्त ? ‘डीप्-फेक्’ कम् अ स्त ?

उत्तरम् (भयम्) — पावनी वद त — ‘ कन्तु ीमन्, कृतकबु द्ध-सकाशात् समाजे महत् भयम् अ प अ स्त।’ अध्यापकः
स्वीकुव न्त — ‘सत्यं, भयस्य कारणम प यथाथम् अ स्त। अद्यत्वे कृतकबुद्धेः दुरुपयोगेन ह व भन्नप्रकारकाः साइबर्-
अपराधाः समाजेषु दे शेषु च चल न्त।’
उत्तरम् (डीप्-फेक्) — आकाशस्य प्रश्ने (‘गुरुवर ! तत् डीप्-फेक् इ त कम स्त ?’) अध्यापकः वद त — ‘डीप्-फेक्
कृतकबु ा न मतं मथ्या चत्रं, दृश्यं, ध्व नः वा अ स्त। मथ्यादृश्ये यत्र मुखं वाणी च मथ्या प्रस्तूयते — उपहासाय,
अनेकदा अपराधाय चा प।’
( हन्द — पावनी कहती है — ‘ कन्तु श्रीमन्, कृतकबु द्ध के कारण समाज म बड़ा भय भी है।’ अध्यापक कहते ह — ‘सत्य है, भय
का कारण भी यथाथ है। आजकल कृतकबु द्ध के दुरुपयोग से ही भाँ त-भाँ त के साइबर-अपराध समाज और दे श म चल रहे ह।’
डीप्-फेक् कृतकबु द्ध से बनाया गया झूठा चत्र, दृश्य या ध्व न है — ऐसा झूठा दृश्य जसम चेहरा और वाणी दोन झूठे प्रस्तुत कए
जाते ह; कभी उपहास के लए, और अनेक बार अपराध के लए भी।)

पदम् वग्रहः अथः

कृ तकबुि -सकाशात् प चमी — ‘सकाशात्’ के योग में
ञ् कृतकबु द्ध के कारण / क ओर से

िमथ्यािचत्रम् िम या च तत् िच ं च — कमधारय
थ् त्र झूठा चत्र

पस्तूयते प + √ तु + लट् , कमवा यम्
स् च् प्रस्तुत कया जाता है

उपहासाय / अपराधाय ताद य चतुथ
थ् हँसी के लए / अपराध के लए

डीप्-फेक् इतना ख़तरनाक क्य है: झूठ पहले भी होता था, पर वह शब्द का झूठ था — और शब्द पर सन्दे ह
करना हम जानते ह। डीप्-फेक् आँख और कान का झूठ है : कसी का चेहरा और उसी क आवाज़ दखाकर वह
कहलवा दे ता है जो उसने कभी कहा ही नह । जस प्रमाण पर मनुष्य सबसे अ धक भरोसा करता है — ‘मने स्वयं
दे खा, स्वयं सुना’ — वही प्रमाण अब झूठा हो सकता है। इसी लए अध्यापक का उत्तर ‘कृतकबु द्ध-साक्षरता’ से
आरम्भ होता है : बचाव जानकारी से ही होगा।

शब्द: ‘सकाशात्’ पञ्चमी- वभक्त्यन्त अव्ययवत् पद है — ‘के पास से, के कारण’। ‘अद्यत्वे’ = आजकल (अद्य +
त्व + सप्तमी)। ‘ व भन्नप्रकारकाः’ = व भन्नाः प्रकाराः येषां ते — बहु ी ह। ‘चा प’ = च + अ प।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 डीप्-फेक् इत्यस्य तथा साइबर्-अपराधानां नराकरणाथम् उपायाः के ? भास्करस्य वाक्यं च कम् आसीत् ?

उत्तरम् — अथवस्य प्रश्ने (‘अस्य नराकरणाथम् उपायः कः ?’) अध्यापकः चतुरः उपायान् गणय त — ‘अस्माकं
कृतकबु द्ध-साक्षरता, नै तकतापू रतं प्र शक्षणं, सवकारेण नयन्त्रणम्, आत्म नयन्त्रणं चे त व वधाः उपायाः अस्मा भः
करणीयाः।’

उपायः अथः व्यवहारे क्या करना है

कृ तकबुि -साक्षरता ए.आई. की समझ जा नए क चत्र-ध्व न बनाए जा सकते ह; ोत जाँचे बना कुछ भी आगे न भेज।

नैितकतापूिरतं नैितकता से भरा जो ए.आई. बनाते ह, उन्ह ‘क्या बना सकते ह’ के साथ ‘क्या बनाना चा हए’ भी
पिशक्षणम् पिश णक्ष सखाया जाए।

सवकारे ण िनयन्त्रणम् सरकार ारा िनय ण
द्व न्त्र क़ानून, दण्ड-व्यवस्था तथा साइबर-सुरक्षा का तन्त्र।

आत्मिनयन्त्रणम् वयं पर संयम
स् अपने ऊपर स्वयं अंकुश — यही सबसे टकाऊ उपाय है।

भास्करस्य वाक्यम् — ‘अहो ! “कृतकबु द्धः मत्रं भवेत्, न भवेत् स्वामी” इ त वाक्यं मम मनः स्पृश त।’ ( हन्द — ‘अहो!
“कृतकबु द्ध मत्र बने, स्वामी न बने” — यह वाक्य मेरे मन को छू जाता है।’)

चार उपाय का क्रम दे खए: पहला उपाय ज्ञान का है (साक्षरता), दूसरा शक्षा का (नै तक प्र शक्षण), तीसरा
बाहरी अंकुश का (सरकारी नयन्त्रण) और चौथा भीतरी अंकुश का (आत्म नयन्त्रण)। ध्यान द जए, सूची बाहर से
भीतर क ओर आती है और अन्त ‘आत्म नयन्त्रण’ पर होता है — क्य क क़ानून वह तक जाता है जहाँ तक पु लस
पहुँचे, पर आत्म नयन्त्रण हर जगह साथ रहता है। भारतीय परम्परा का ‘संयम’ यहाँ आधु नक समस्या का उत्तर
बनकर आया है।

व्याकरण: ‘भवेत्’ व ध लङ् लकार है — ‘होना चा हए’, न क ‘होता है’। इसी लए भास्कर का वाक्य आदे श नह ,
आकांक्षा है — ‘ मत्र बने, स्वामी न बने’। ‘करणीयाः’ व ध-कृदन्त (√कृ + अनीयर्) है और ‘अस्मा भः’ के साथ
कमवाच्य बनाता है — ‘हम करने चा हए’; इसम कता तृतीया म और कृदन्त कम (उपायाः) के लङ्ग-वचन म आता
है।

प्र.3 ‘कृतकबु द्धः मनुष्याणां वृ त्त हर त’ इ त वेदस्य शङ् कायाः अध्यापकः कम् उत्तरम् अयच्छत् ? भारतसवकारस्य
काः योजनाः पाठे उक्ताः ?

उत्तरम् — वेदः पृच्छ त — ‘तथा प य द कृतकबु द्धः मनुष्यान् स्वस्ववृत्तेः नष्कासय त त ह कः तत्र रक्षणोपायः ?’
अध्यापकः वद त — ‘तथा वधः सङ् कटः नापतेत् इ त भारतसवकारेण स्कल्-इ ण्डया, ड जटल्-इ ण्डया, ई- स्कल्-
इ ण्डया चेत्याद्याः अनेकाः योजनाः सञ्चाल्यन्ते। एता भः योजना भः प्र श क्षताः युवानः नवीनवृत्तीः प्राप्तुम् अह न्त।

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वस्तुतः कृतकबु द्धः स्वतः कस्या प वृ त्त न हर त। अ प तु कृतकबु द्धप्र श क्षतः जनः कदा चत् अप्र श क्षतस्य जनस्य
पारम्प रकवृ त्त हरेत्।’
( हन्द — वेद पूछता है — ‘ फर भी य द कृतकबु द्ध मनुष्य को उनक अपनी-अपनी आजी वका से नकाल बाहर करे, तो वहाँ
बचाव का उपाय क्या है?’ अध्यापक कहते ह — ‘ऐसा सङ् कट न आ पड़े, इसके लए भारत सरकार ारा स्कल इं डया, ड जटल
इं डया, ई- स्कल इं डया आ द अनेक योजनाएँ चलाई जाती ह। इन योजनाओं से प्र श क्षत युवा नई आजी वकाएँ पाने के योग्य होते
ह। वस्तुतः कृतकबु द्ध स्वयं कसी क आजी वका नह छ नती। हाँ, कृतकबु द्ध म प्र श क्षत व्य क्त कभी-कभी अप्र श क्षत व्य क्त
क पारम्प रक आजी वका ले ज़रूर सकता है।’)

तीन योजनाः — िस्कल्-इिण्डया · िडिजटल्-इिण्डया · ई-िस्कल्-इिण्डया

िनष्कषः — कृ तकबुि ः स्वतः वृित्तं न हरित ;

पिशिक्षतः जनः अपिशिक्षतस्य वृित्तं हरेत ्।

यह उत्तर पूरे पाठ का सबसे तीखा और सबसे उपयोगी वाक्य है: अध्यापक भय को न नकारते ह, न बढ़ाते ह —
वे उसका पता बदल दे ते ह। ख़तरा ‘यन्त्र बनाम मनुष्य’ का नह है, ‘प्र श क्षत मनुष्य बनाम अप्र श क्षत मनुष्य’
का है। इससे वद्याथ के हाथ म काम आ जाता है : यन्त्र से डरने के बदले उसे सीख लो। ध्यान द जए क दोन
क्रयाओं के लकार अलग ह — ‘न हर त’ (लट् — न श्चत तथ्य) और ‘हरेत्’ ( व ध लङ् — सम्भावना)। एक ही
धातु के दो लकार पूरे तक को सँभाल लेते ह।

व्याकरण: ‘स्वस्ववृत्तेः नष्कासय त’ — नकालने के अथ म अपादान पञ्चमी (‘ ुवमपायेऽपादानम्’)। ‘नापतेत्’ =
न + आपतेत् ( व ध लङ् , आ + √पत्) — ‘न आ पड़े’। ‘सञ्चाल्यन्ते’ कमवाच्य लट् है — ‘चलाई जाती ह’, और
उसका कता ‘भारतसवकारेण’ तृतीया म है। ‘अह न्त’ (√अह् + लट् ) = ‘योग्य होते ह’ — यही पद शब्दाथ-ता लका
म है।

प्र.4 संवादस्य उपसंहारः कथं भव त ? ेयायाः मतम्, अध्यापकस्य कथनं सवषां छात्राणां सङ् कल्पं च लखत।

उत्तरम् — संवादः तसृ भः चरणैः समाप्यते —

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कः वाक्यम् (संस्कृतम्) हन्द

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यिशका (पश्नः)
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गु वर ! कृतकबुि - ारा भिव ये मानुषजीवनं कीदृ शं भिव यित ?
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गुरुवर! कृतकबु द्ध के ारा भ वष्य म मानव-

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रु द्व ष् ष्

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जीवन कैसा होगा?

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aअध्यापकः यिद िववेकपूवकं पयु यते, तिह जीवनम् अिधकं सुगमं, सुरि तं
ज् क्ष य द ववेकपूवक प्रयोग हो, तो जीवन अ धक
(शतसिहतम् ेय करं च भिव यित। सुगम, सुर क्षत तथा कल्याणकारी होगा।

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श्र स् ष्

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उत्तरम्)

sं चeि गुिणतां किर यित इित m
श्रेया (मतम्)
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कृतकबुि ः एव मानवीयबुि ं काय मता
मम मतम्। भारतीय-कृतकबुaि gपभाव-स मेल नम् – २०२६ (India
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द्व ष् मेरा मत है क कृतकबु द्ध ही मानवीय बु द्ध तथा
कायक्षमता को दुगुना करेगी। ‘भारतीय ए.आई.
AI Impact Summit – 2026) इ य ािप उ तमेतम्। त् त्र क् प्रभाव सम्मेलन – २०२६’ म भी यही कहा गया।

उ मं कथनम् ! ‘कृतकबुि ः मानवबु ेः सहकरी’ — इित वा यम् . com
m हमारे मन म स्पष्ट रहे।
सहयो गनी है’ — यहeवाक्य
अध्यापकः उत्तम कथन! ‘कृतकबु द्ध मानवबु द्ध क

s
त्त क्

अ माकं मनिस प टं यात्।
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(समापनम्) स् स् ष् स्

se m आम् ! वयं जाग काः नागिरकाः भवाम, सुरि तं जालपवेशं
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सव (सङ् कल्पः) हाँ! हम जागरूक नाग रक बन, सुर क्षत इंटरनेट-

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रू क्ष

करवाम, अिप च िडिजटल्-भारतं समृ ं करवाम।
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प्रवेश कर, और ड जटल भारत को समृद्ध कर।

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उपसंहार क रचना दे खए: पाठ प्रश्न से आरम्भ हुआ था (य शका क स्माट कार) और प्रश्न पर ही लौटता है

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(य शका का भ वष्य-प्रश्न) — यह वृत्ताकार रचना है। अध्यापक का उत्तर शत के साथ है — ‘य द ववेकपूवकं

a l नह करेगा, हमारा ववेक तय करेगा। और अन्त सूचना पर नह ,
प्रयुज्यते, त ह…’, अथात् भ वष्य यन्त्रgतय
सङ् कल्प पर होता है — ‘भवाम, करवाम, करवाम’ (लोट् लकार, उत्तमपुरुष बहुवचन)। जो पाठ संकल्प पर समाप्त

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हो, वही सचमुच पढ़ा हुआ माना जाता है।

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g ‘स्यात्’ व ध लङ् (√अस्) —
m .c ‘भवाम, करवाम’ — लोट् लकार, उत्तमपुरुष, बहुवचन (‘हम कर’)। a
ase‘रहे, हो’। ‘ गु णताम्’ = गुण + इतच्, स्त्री लङ्ग तीया ( वशेष्य ‘कायक्षमताम्’)। ‘उक्तमेतम्’ = उक्तम् + एतत्
व्याकरण:

agl (छपाई म ‘एतम्’)। ‘जालप्रवेशम्’ = जालस्य प्रवेशः — internet access; ‘जालम्’ (जाल) ही आज ‘नेट’ का

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संस्कृत नाम है।
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सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 57–59

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शब्दाथ-ता लका तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त रक्तस्तम्भस्य पू तः

कायकलापः

प्र.1 ‘सव शब्दे न भासते’ इ त ता लकायाः अ न्तमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अथ लखत’ — रक्तः अ स्त। पाठे
प्रयुक्तानां शब्दानाम् अथान् ज्ञात्वा तं स्तम्भं पूरयत।

पुस्तक म यह अ न्तम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — वद्याथ को हर शब्द का अथ अपनी मातृभाषा म लखना है।
नीचे पूरी ता लका द है और वह स्तम्भ हन्द (हमारी माध्यम-भाषा) म भर दया गया है। जनक मातृभाषा मराठ , बाङ् ग्ला,
गुजराती, त मऴ, तेलुगु, कन्नड, ओ ड़आ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अथ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रख।

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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH मातृभाषया अथम्
(भरा हुआ —
हन्द )

अध्येतमु ् (अिध + √इ + अध्ययनं कतुम् अध्ययन करने के For Studying पढ़ ने के िलए, सीखने के
तुम ुन)् लए िलए
अिधग ृह्ण िन्त (अिध + √ग ह् स्वीकुव न्त अ धग्रहण करते ह Aquire अपने अिधकार में ले ले ते
+ लट् , प.पु.ब.व.) है,ं क़ ज़ ा कर ले ते है ं
ब्

अपराधशमनाय (षष्ठी- अपराधस्य शमनाय अपराध क Reducing crime जुम रोकने के िलए
तत्पुरुषः, नपुं.च.ए.व.) रोकथाम के लए

अहिन्त (√अह् + लट् , शक्नुव न्त योग्य होते ह Deserve पाने के कािबल होते है,ं
प.पु.ब.व.) समथ होते है ं
कृ तकबुि ः (कमधारयः, कृतका बु द्धः मनुष्य-बु द्ध जैसे Artificial बनावटी बुि — मशीन
स्त्री.प.ए.व.) यन्त्र का चन्तन- Intelligence की सोचने की शि त क्

कौशल

िचिकत्सायाम् रोगोपचारस्य क्षेत्रे च कत्सा म In medicine इलाज के े में, दवा-
क्ष त्र

(स्त्री.स.ए.व.) दा के काम में
रू

डीप्-फे क् गहन मथ्या चत्रं कृ त्रम बु द्ध ारा AI-generated fake मशीन से बनाया गया
कृतकबु ा न मतम् न मत मथ्या चत्र media नक़ ली चेहरा, दृ य या श्

आवाज़
तन्त्राश
ं ः (पुं.प.ए.व.) संगणक-तन्त्रः सॉफ्टवेयर Software क यूटर में चलने वाला
म्प्

पोगाम
दत्तांशः (पुं.प.ए.व.) पूवदत्तं ज्ञानम् डेटा, आँकड़े Data इक ी की हुई जानकारी,
आँकड़ े
नैितकता (स्त्री.प.ए.व.) सदाचारः, धम नष्ठा नै तक मूल्य Ethics सही-ग़ ल त की समझ,
अ छा आचरण
च्

परीक्षणम् (नपुं.प.ए.व.) समीक्षणम् जाँच पड़ताल करना Examination परखना, जाँचना
पूव ग हः (पुं.प.ए.व.) पूव स्था पतं पूवपक्षपात Bias पहले से बनी हुई
पक्षपातयुक्तं मतम् एकतरफ़ ा राय
पिशक्षयिन्त (प + √िशक्ष् + शक्षय न्त, अभ्यासं प्र शक्षण दे ते ह They coach िसखाते है,ं अ यास भ्

लट् , पुं.प.ब.व.) कारय न्त कराते है ं
पितस्पिधनी (स्त्री.प.ए.व.) स्पधायुक्ता प्र तयोगी Competitor होड़ करने वाली,
मुक़ाबला करने वाली
पौद्योिगकीिवशारदाः प्रौद्यो गक शास्त्रे तकनीक वशेषज्ञ Technology तकनीक के जानकार
(पुं.प.ब.व.) कुशलाः जनाः Experts लोग

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

रिश्मपरीक्षणिवद्या (षष्ठी- र श्मपरीक्षणस्य वद्या करण वज्ञान Radiology ए स-रे आिद िकरणों से
क्

तत्पुरुषः, स्त्री.प.ए.व.) च कत्सा जाँच का शा स्त्र

वाञ्छामः (√वाञ्छ् + लट् , इच्छामः (हम) इच्छा करते ह We wish हम चाहते है ं
प.पु.ब.व.)

िवत्ते (नपु.ं स.ए.व.) अथव्यवस्थायाम् वत्त क्षेत्र म In finance पैसे-कारोबार के े मेंक्ष त्र

संवादोपकरणम् संवादसाधनम् वातालाप करने का Communication बातचीत का साधन
(नपुं.प.ए.व.) साधन tool

सहकरी (स्त्री.प.ए.व.) सहयो गनी सहयोगी Helper साथ िमलकर काम करने
वाली, मददगार

नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं म) — मराठ : सहकरी = ‘सहकारी / मदतनीस’, दत्तांशः = ‘मा हती’, नै तकता
= ‘नी तमत्ता’। बाङ् ग्ला: सहकरी = ‘सहयोगी’, परीक्षणम् = ‘परीक्षा/यांचाई’, अह न्त = ‘योग्य हय’। गुजराती:
तन्त्रांशः = ‘सॉफ्टवेर’, पूवाग्रहः = ‘पूवग्रह’, वत्ते = ‘नाणाक य क्षेत्रमां’। त मऴ: कृतकबु द्धः = ‘सेयक नुण्ण ऱवु’,
सहकरी = ‘उद वयाळर्’। तेलुगु: दत्तांशः = ‘डेटा/समाचारं’, नै तकता = ‘नी त’। अपनी भाषा म लखते समय ध्यान
र खए क अथ वही रहे जो संस्कृत स्तम्भ म दया है।

यह स्तम्भ क्य रखा गया: तकनीक शब्द तभी अपने बनते ह जब वे मातृभाषा क कसी जानी-पहचानी छ व से
जुड़ जाएँ। ‘Data’ अजनबी है, ‘आँकड़े’ अपना है — और ‘दत्तांशः’ ( दया हुआ अंश) दोन को जोड़ दे ता है। यही
इस स्तम्भ का उ े श्य है : संस्कृत → मातृभाषा → अंग्रेज़ी, तीन को एक पं क्त म दे ख लेने पर शब्द याद रखने क
आवश्यकता ही नह पड़ती, वह समझ म आ जाता है।

पुस्तक म छपी दो बात ध्यान दे ने योग्य: (१) ‘अ धगृह्ण न्त’ के सामने अंग्रेज़ी म Aquire छपा है — शुद्ध वतनी
Acquire है। (२) ‘प्र शक्षय न्त’ के सामने कोष्ठक म ‘पुं.प्र.ब.व.’ लखा है, जब क यह क्रयापद है, अतः वहाँ
‘प्र.पु.ब.व.’ (प्रथमपुरुष बहुवचन) होना चा हए — जैसा ‘अह न्त’ तथा ‘अ धगृह्ण न्त’ के सामने ठ क छपा है। (३)
‘वाञ्छामः’ पद ता लका म तो है, कन्तु संवाद के मु द्रत अंश म कह नह आता — इसे अ त रक्त शब्द-सम्पदा के
रूप म सीख ली जए।

प्र.2 ‘तन्त्रांशाः/अनुप्रयोगाः’ इ त सूच्यां प्रदत्तानां संस्कृतनामानाम् आङ् ग्लपयायान् लखत, तेषां च शब्द नमाणं
स्पष्टीकुरुत।

उत्तरम् — पुस्तक म यह सूची पृष्ठ ५९–६० पर दो स्तम्भ म द गई है। नीचे उसम एक तीसरा स्तम्भ जोड़ दया गया है, जो
बताता है क हर संस्कृत नाम कैसे बना।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

संस्कृतनाम ENGLISH नाम कैसे बना / क्या करता है

िसिर Siri ध्व न के अनुसार ज्य का त्य लप्यन्तरण — एप्पल का वाक्-सहायक

जेिमिन Gemini लप्यन्तरण — गूगल का संवाद-तन्त्रांश

मेटा-कृ तकबुि ः Meta AI ‘मेटा’ (नाम) + कृतकबु द्धः (AI) — अधानुवाद

परप्ले िक्सिट- Perplexity AI ‘परप्ले क्स ट’ (नाम) + कृतकबु द्धः
कृ तकबुि ः

पटु-कारयानम् Smart Car पटु = चतुर, कुशल; कारयानम् = कार-रूपी यान — ‘चतुर गाड़ी’ (कमधारय)

गूग ल-सहायकम् Google Assistant गूगल-नामकं सहायकम् — ‘सहायक’ का सीधा अनुवाद

सङ् कु िचतकृ तकबुि ः Narrow AI सङ् कु चता (सम् + √कुच् + क्त = सकुड़ी, सी मत) चासौ कृतकबु द्धः च

सामान्यकृ तकबुि ः General AI सामान्या (सवसाधारण, मानव-समान) कृतकबु द्धः

अत्युत्कृ ष्टकृ तकबुि ः Super AI अ त + उत्कृष्ट (यण् स न्ध) = अत्यन्त श्रेष्ठ — ‘Super’ का सट क अनुवाद

यन्त्रािधगमः Machine Learning यन्त्रस्य अ धगमः; अ धगमः = अ ध + √गम् + घञ् = ‘सीखना’ (षष्ठी-तत्पुरुष)

गहनािधगमः Deep Learning गहनः अ धगमः — ‘गहरा सीखना’ (कमधारय); ‘Deep’ = गहन

स्वयम् SWAYAM भारत सरकार का ऑनलाइन पाठ्यक्रम-मञ्च; ‘स्वयम्’ शब्द स्वयं संस्कृत अव्यय
है — ‘अपने आप’

सवषां कृ ते कृ तकबुि ः AI for All ‘कृते’ (के लए) के योग म षष्ठी — पूरा शब्दशः अनुवाद

पी.एम्. ई-िवद्या PM e-Vidya योजना का नाम; ‘ वद्या’ संस्कृत शब्द है

मुखपिरचयपणाली Facial Recognition मुखस्य प रचयस्य प्रणाली — ‘चेहरा पहचानने क प्रणाली’ (षष्ठी-तत्पुरुष)
System

दीक्षा DIKSHA शक्षक -छात्र का रा ीय ड जटल मञ्च; ‘द क्षा’ = व धपूवक शक्षा का आरम्भ

तीन व धयाँ पहचा नए: इस सूची म नाम तीन ढं ग से बने ह — (१) लप्यन्तरण ( स र, जे म न — व्य क्त/उत्पाद
के नाम का अनुवाद नह होता); (२) अधानुवाद (मेटा-कृतकबु द्धः — नाम ज्य का त्य , संज्ञा का अनुवाद); (३)
पूण अनुवाद (यन्त्रा धगमः, मुखप रचयप्रणाली, सवषां कृते कृतकबु द्धः)। नयम सरल है — जो नाम है वह ज्य का
त्य , जो अथ है उसका अनुवाद। यही नयम आप कसी भी नए तकनीक शब्द पर लगा सकते ह।

Did you know? ‘द क्षा’, ‘स्वयम्’ तथा ‘ वद्या’ — भारत सरकार क इन तीन शै क्षक योजनाओं के नाम
संस्कृत से लए गए ह। जस भाषा को कुछ लोग ‘पुरानी’ कहते ह, आज क नई-से-नई ड जटल योजनाएँ उसी से
अपना नाम पाती ह।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी
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अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 60–61
m as e
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पञ्चमी (अपादानम्), षष्ठी (सम्बन्धः) तथा सप्तमी (अ धकरणम्) वभक्तयः
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व्याकरणम्

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पञ्चमी वभक्तेः (अपादानकारकस्य) उपयोगं प्रयोग वधानं च पुस्तकानुसारं लखत। पाठात् अ प उदाहरणा न
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प्र.1
दत्त।
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पुस्तक का कथन — ‘पञ्चमी वभ क्तः (अपादानकारकम्) — उपयोगः : ‘कस्मात्’ ? इत्यस्य उत्तररूपेण उपयुज्यते।
वयोगं, कारणम् अपसरणं च सूचय त।’
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mतीन बात बताती है —
( हन्द — पञ्चमी वभ क्त ‘कस्मात्?’ अथात् ‘ कससे / कहाँ से / कस कारण?’ के उत्तर म आती है।eयह
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वयोग (अलगco m
होना), कारण और अपसरण (हटना, दूर जाना)। हन्द म इसका चह्न है ‘से’।)gl a
m . a
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a g lप्रयोग वधानम् पुस्तक का हन्द अथ पञ्चमीपदम्
उदाहरण

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मूषकः िबडालात्
m .co agl
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(क) कारणबोधकः चूहा बल्ली से डरता है। बडालात् — ‘भी’ (डरना) धातु के योग म जससे डर
िबभेित।
g l a हो, उसम पञ्चमी

(ख) िवयोगबोधकः छा ः िव ालयात् a
त्र द्य छात्र वद्यालय से आया। वद्यालयात् — जहाँ से अलग होकर आया
आगतः।
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.
mगया
धमात् — जससे eहट
दुजनः मूखतया धम त्
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com agl
(ग) दुजन मूखता के कारण धम से

m .
अपसरणबोधकः भ टः। भ्रष्ट हो गया।

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ष्

agl पाठात् उदाहरणा न (इसी पाठ से) —
se m
१. मानवात् अिप अिधका बुि मती। (मानवात्co =m g l a
. मनुष्य से — त ल
ु ना में पञ्चमी)
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२. यन्त्रािण मानवेभ्यः संसारम् अिधगaृह्णs em(मनुष्यों से — अपादान)
gl
िन्त।
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३. पेरणा त ु मानवेभ्यः एव आगच्छित। (मनुष्यों से ही आती है — िवयोग/उद् गम)

co m
४. कृ तकबुि -सकाशात् समाजे महत् भयम्। (के कारण — ‘सकाशात्’ पञ्चम्यन्त)
m .
m as e
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५. अहं चै ट -जीपीटी इत्यस्मात् एनं श्लोकं पाप्तवान्। (उससे पाप्त िकया)
a g l
se m ६. मनुष्यान् स्वस्ववृत्तेः िनष्कासयित। (अपनी-अपनी आजीिवका से िनकालना)
g l a
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m a s e
co agl
नयम याद रखने क कुंजी: पा ण न का सूत्र है — ‘ ुवमपायेऽपादानम्’ अथात् जब कोई वस्तु हटती है, तो जो

m .
e
स्थर ( ुव) रहकर पीछे छू ट जाता है, वही अपादान है और उसम पञ्चमी होती है। ‘छात्रः वद्यालयात् आगतः’ म

g l as
a
छात्र चला, वद्यालय वह रहा — इस लए ‘ वद्यालयात्’। यही परीक्षण हर वाक्य पर लगाइए : कौन चला और कौन
ठहरा रहा ? जो ठहरा, उसम पञ्चमी।

co m
m .
m ase
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पञ्चमी क अन्य प्र सद्ध जगह: भय ( बभे त), रक्षा (रक्ष त), तुलना (श्रेष्ठः/अ धकः), दूरी- नकटता (दूरात्,
समीपात्), पहले-बाद (प्राक्, अनन्तरम्), तथा ‘ऋते’, ‘ वना’, ‘ब हः’, ‘सकाशात्’ जैसे अव्यय। पाठ का ‘मानवात्
अ प अ धका’ इसी तुलना- नयम का उदाहरण है।

प्र.2 षष्ठी वभक्तेः (सम्बन्धस्य) उपयोगं प्रयोग वधानं च लखत। पाठात् अ प उदाहरणा न दत्त।

पुस्तक का कथन — ‘षष्ठी वभ क्तः (सम्बन्धः) — उपयोगः : ‘कस्य’ ? इत्यस्य उत्तररूपेण प्रयुज्यते। सम्बन्धं, स्वा मत्वम्,
अंशं वषयं च दशय त।’
( हन्द — षष्ठी ‘कस्य?’ अथात् ‘ कसका/ कसक / कसके?’ के उत्तर म आती है और चार बात दखाती है — सम्बन्ध, स्वा मत्व,
अंश तथा वषय। ध्यान र खए — षष्ठी कोई कारक नह है, वह दो संज्ञाओं के बीच का सम्बन्ध बताती है; इसी लए पुस्तक ने इसके
आगे ‘कारकम्’ नह लखा, केवल ‘सम्बन्धः’ लखा है।)

प्रयोग वधानम् पुस्तक का उदाहरण हन्द अथ क्या दखाता है

(क) सम्बन्धबोधकः मम िम म्। त्र मेरा मत्र। दो व्य क्तय का आपसी
नाता

(ख) बालक य पु तकम्।
स् स् बालक क पुस्तक। कसक है — अ धकार
स्वािमत्वबोधकः

(ग) अंशबोधकः शरीर य ऊ वभागे दयं मि त कं च
स् ध् हृ स् ष् शरीर के ऊपरी भाग म हृदय और पूण म से एक भाग
तः।
स् म स्तष्क ह।

(घ) िवषयबोधकः फल य वादः िचकरः।
स् स् रु फल का स्वाद रु चकर है। कस वषय का गुण

पाठात् उदाहरणा न —

१. कृ तकबुि ः मानवबु ेः सहकरी। (शीषक — सम्बन्ध)
२. अस्याः यन्त्रपाठशालायाः नाम ‘डेट ासेट् ’। (सम्बन्ध/नाम)

३. कृ तकबु ेः दुरु पयोगेन साइबर्-अपराधाः चलिन्त। (िवषय)

४. िशक्षकाणां सािन्नध्ये व्यिक्तत्विवकासः भवित। (सम्बन्ध)

५. मनुष्यस्य पितस्पिधनी न। (सम्बन्ध)

६. अपराधस्य शमनाय — ‘अपराधशमनाय’ इित समासे। (िवषय)

७. सवषां कृ ते कृ तकबुि ः। (‘कृ ते ’ के योग में षष्ठी)

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समास और षष्ठी का रश्ता: इस पाठ के प्रायः सब नए शब्द षष्ठी-तत्पुरुष ह — यन्त्रा धगमः (यन्त्रस्य अ धगमः),
संवादोपकरणम् (संवादस्य उपकरणम्), र श्मपरीक्षण वद्या (र श्मपरीक्षणस्य वद्या), मुखप रचयप्रणाली। अथात्
समास तोड़ते ही षष्ठी प्रकट हो जाती है — यही कारण है क षष्ठी को ठ क से जान लेने पर वग्रह अपने आप बनने
लगता है। पुस्तक ने शब्दाथ-ता लका म स्वयं ‘(षष्ठी-तत्पुरुषः)’ लखकर यह सङ् केत दया है।

सावधान: षष्ठी क्रया से नह जुड़ती, संज्ञा से जुड़ती है। ‘बालकस्य पुस्तकम्’ म ‘बालकस्य’ का सम्बन्ध ‘पुस्तकम्’
से है, कसी क्रया से नह । इसी लए व्याकरण म कहा जाता है — ‘कारके षष्ठी न भव त’, अथात् जहाँ कारक-
सम्बन्ध हो वहाँ षष्ठी नह आती। कुछ अपवाद अव्यय के साथ ह — ‘कृते’, ‘अधः’, ‘उप र’, ‘पुरतः’, ‘समीपे’ के
योग म षष्ठी होती है।

प्र.3 सप्तमी वभक्तेः (अ धकरणकारकस्य) उपयोगं प्रयोग वधानं च लखत। पाठात् अ प उदाहरणा न दत्त।

पुस्तक का कथन — ‘सप्तमी वभ क्तः (अ धकरणकारकम्) — उपयोगः : ‘क स्मन्’ ? इत्यस्य उत्तररूपेण प्रयुज्यते।
स्थानं, कालम् आधारं च बोधय त।’
( हन्द — सप्तमी ‘क स्मन्?’ अथात् ‘ कसम / कहाँ / कब?’ के उत्तर म आती है और तीन बात बताती है — स्थान, काल तथा
आधार। हन्द म इसके चह्न ह ‘म’ और ‘पर’।)

प्रयोग वधानम् पुस्तक का उदाहरण हन्द अथ कौन-सा अ धकरण

(क) स्थानबोधकः िव ालये पठित।
द्य वद्यालय म पढ़ता है। औप े षक — भीतर होना

(ख) कालबोधकः पभाते सूयः उदे ित। प्रातःकाल सूय उगता है। काला धकरण

(ग) आधारबोधकः भूमौ पादपाः रोहि त। न् भू म पर पौधे उगते ह। आधार — जस पर टका हो

पाठात् उदाहरणा न —

१. िशक्षायां, िचिक त्सायां, कृ िष-क्षेत्रे, न्यायालये, सञ् चारे, िवत्ते … कृ तकबुि ः उपयुज्यते । (स्थान/क्षेत्र)

२. अध्यापकः क क्षायां पिवशित। (स्थान)

३. एषा बुि ः यन्त्रे स्थाप्यते । (आधार)

४. अस्माकं बुि ः मिस्त ष्के स्थािपता। (स्थान)

५. कृ तकबुि ः अद्यािप िवकासपदे अिस्त। (अवस्था — आधार)
६. िशक्षकाणाम् अनुपिस्थतौ अिप छात्राः अध्येत ुं शक्नुविन्त। (काल/अवस्था)

७. एताद् वाक्यम् अस्माकं मनिस स्पष्टं स्यात्। (आधार)

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तीन वभ क्तय को एक पं क्त म पक ड़ए: ये तीन तीन अलग प्रश्न के उत्तर ह — कस्मात्? (कहाँ से) →
पञ्चमी; कस्य? ( कसका) → षष्ठी; क स्मन्? (कहाँ/ कसम) → सप्तमी। एक ही वाक्य म तीन दे खए — ‘छात्रः
वद्यालयात् (५) आचायस्य (६) सा न्नध्ये (७) ज्ञानं लभते।’ — वद्यालय से, आचाय के, सा न्नध्य म। जस दन प्रश्न-
शब्द पकड़ म आ जाए, उस दन वभ क्त कभी नह भूलेगी।

Tip: अभ्यास के प्रश्न १ म ‘कृतकबु द्धः कुत्र प्रयुज्यते ?’ पूछा गया है। ‘कुत्र’ भी सप्तमी का ही अव्यय-रूप है,
इस लए उसका उत्तर भी सप्तमी म ही दे ना है — ‘ शक्षायां, च कत्सायां, कृ षक्षेत्रे…’। प्रश्न-शब्द ही उत्तर क
वभ क्त तय करता है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 61
प्रश्न १ — पाठस्य आधारेण अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.1 (क) कृतकबु द्धः का अ स्त ?

उत्तरम् — यया अचेतनयन्त्रा ण मानवबु द्धवत् काय कुव न्त, सा कृतकबु द्धः अ स्त इ त वैज्ञा नकाः मन्यन्ते।
( हन्द — जसके ारा चेतनार हत यन्त्र मानव-बु द्ध क तरह काय करते ह, उसी को वैज्ञा नक कृतकबु द्ध मानते ह।)

पाठ की पंिक्त (पृष्ठ ५२) — यया अचे त नयन्त्रािण मानवबुि वत् काय ं कु विन्त , सा कृ तकबुि ः इित वैज्ञािनकाः

मन्यन्ते ।
पश्नपदम् ‘का’ = स्त्रीिलङ् ग · पथमा · एकवचन

अतः उत्तर भी स्त्रीिलङ् ग पथमा में — सा कृ तकबुि ः अिस्त

‘का’ का उत्तर स्त्री लङ्ग म ही क्य : ‘बु द्ध’ इकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द है, इस लए ‘कृतकबु द्धः’ भी स्त्री लङ्ग है और
उसका प्रश्नवाचक ‘कः’ नह , ‘का’ बनता है। यही कारण है क पूरे पाठ म उसके साथ ‘एषा’, ‘समुप स्थता’,
‘सहा यका’, ‘सहकरी’, ‘प्र तस्प धनी’ — सब स्त्री लङ्ग रूप आए ह। ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ खण्ड का अमरकोश-
वचन इसी क पु ष्ट करता है — बु द्ध के सारे पयाय ‘स्त्री लङ्गे वद्यन्ते’।

सं क्षप्त उत्तर भी बना सकते ह: ‘मानवबु द्धवत् काय कतु समथा यन्त्रप्रणाली एव कृतकबु द्धः अ स्त।’ कन्तु
परीक्षा म पाठ का ही वाक्य दे ना सबसे सुर क्षत है, क्य क उसी को पुस्तक ने ‘वैज्ञा नकाः मन्यन्ते’ कहकर
प्रामा णक ठहराया है।

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प्र.1 (ख) अध्यापकः कृतकबुद्धेः का न उदाहरणा न उक्तवान् ?

उत्तरम् — अध्यापकः कृतकबुद्धेः एता न उदाहरणा न उक्तवान् — चैट-जीपीट , स र, एलेक्सा, गूगल मान चत्रं, जे म न,
मेटा-कृतकबु द्धः, परप्ले क्स ट चेत्यादयः अनुप्रयुक्ततन्त्र वशेषाः कृतकबु द्धयुक्ताः स न्त।
( हन्द — अध्यापक ने ये उदाहरण बताए — चैट-जीपीट , स र, एलेक्सा, गूगल मान चत्र, जे म न, मेटा-ए.आई. तथा परप्ले क्स ट;
ये सब प्रयोग म आने वाले वशेष तन्त्र (ए प्लकेशन) कृतकबु द्ध से युक्त ह।)

क्रमः उदाहरणम् ENGLISH क करो त

१ चैट-जीपीटी Chat-GPT संवादोपकरणम् — प्रश्नानाम् उत्तरा ण ददा त

२ िसिर Siri वाक्-सहायकः

३ एले क्सा Alexa गीतं गाय त, वद्यु पं ज्वालय त, वातावरण स्थ त सूचय त

४ गूग ल मानिचत्रम् Google Maps पथ नदशनं करो त

५ जेिमिन Gemini संवाद-तन्त्रांशः

६ मेटा-कृ तकबुि ः Meta AI सामा जक-माध्यमेषु सहायकः

७ परप्ले िक्सिट Perplexity AI अन्वेषण-सहायकः

ध्यान द जए कसने क्या जोड़ा: ये सात नाम अध्यापक ने गनाए। इनके अ त रक्त छात्र ने अपने घर के
उदाहरण जोड़े — अथव ने ‘एलेक्सा’ का वस्तार से वणन कया और पावनी ने ‘गूगल-सहायकम्’ बताया। प्रश्न
‘अध्यापकः … उक्तवान्’ पूछ रहा है, इस लए उत्तर म अध्यापक क ही सूची द जए।

व्याकरण: ‘का न’ = नपुंसक लङ्ग · प्रथमा/ तीया · बहुवचन — इसी लए उत्तर भी ‘उदाहरणा न’ (बहुवचन) म है।
‘उक्तवान्’ = √वच् + क्तवतु, पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन — ‘उसने कहा’ (भूतकाल)।

प्र.1 (ग) यन्त्रा ण कथं शक्ष्यन्ते ?

उत्तरम् — प्रौद्यो गक वशारदाः यन्त्रा धगमः गहना धगमः चे त व धना एता न यन्त्रा ण प्र शक्षय न्त, अनुप्रयोगाय च
स ीकुव न्त। कृतकबु द्धः यन्त्रं दत्तांशमाध्यमेन शक्षणं करो त।
( हन्द — तकनीक वशेषज्ञ ‘यन्त्रा धगम’ (Machine Learning) तथा ‘गहना धगम’ (Deep Learning) — इस व ध से
इन यन्त्र को प्र श क्षत करते ह और उपयोग के लए तैयार करते ह। कृतकबु द्ध यन्त्र को दत्तांश (डेटा) के माध्यम से पढ़ाती है।)

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कः िशक्षयित ? — पौद्य ोिगकीिवशारदाः
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कया िविधना ? — यन्त्रािधगमेन , गहनािधगमेन च
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के न माध्यमेन ? — द त्तांशमाध्यमेन (डेट ासेट् नामकः दत्तांशसमूहः)
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aिकमथम् ? — अनुपयोगाय (उपयोग के िलए)

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l a se
g सखाता है, कस व ध से सखाता है, और कस सामग्री से सखाता
‘कथम्’ का उत्तर व ध बताता है: प्रश्न ‘कैसे?’ पूछ रहा है, इस लए उत्तर म प्र क्रया चा हए, केवल नाम नह ।
इस लए पूरा उत्तर तीन बात कहता है —aकौन
है। ध्यान र खए, ‘ शक्ष्यन्ते’ कमवाच्य है (‘ सखाए जाते ह’), इस लए उत्तर म सखाने वाले को तृतीया म भी रखा

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जा सकता है — ‘प्रौद्यो गक वशारदै ः यन्त्रा धगम-गहना धगम व धना यन्त्रा ण शक्ष्यन्ते।’

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शब्द फर से: यन्त्रा धगमः = यन्त्रस्य अ धगमः (Machine Learning) — यन्त्र का उदाहरण से सीखना;

a gl गहना धगमः = गहनः अ धगमः (Deep Learning) — अनेक परत वाला गहरा सीखना, जो चत्र-ध्व न-भाषा
जैसे क ठन काम सँभालता है। दोन म ‘अ धगमः’ (अ ध + √गम् + घञ्) समान है — अथात् दोन ‘सीखने’ क ही

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व धयाँ ह।

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‘डेटासेट्’ केषां पाठशाला अ स्त ?
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प्र.1 (घ)

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co‘डेmटासेट्’ यन्त्राणां पाठशाला अ स्त।
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उत्तरम् .— a
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a gl ( हन्द — ‘डेटासेट्’ यन्त्र क पाठशाला है।)

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पाठ की पंिक्त (पृष्ठ ५४) — अस्याः यन्त्रपाठशालायाः नाम “डेट ासेट् ” इित !
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पश्नपदम् ‘के षाम्’ = षष्ठी · बहुवचन · पुंिलङ् ग/नपुंसकिलङ् ग

‘यन्त्रम्’ नपुंसकिलङ् ग अकारान्त → षष्ठी बहुवचन यन्त्राणाम्

co m
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(फलम् → फलानाम् इव; ‘न’ का ‘ण’ णत्व-िवधान से)

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m .cबहुवचन क्य : प्रश्न म ‘कस्य’ नह , ‘केषाम्’ है — इस लए उत्तर एक यन्त्रaकाg नह , सब यन्त्र का होना चा हए।
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यही आय के मूल प्रश्न म भी था — ‘यन्त्राणाम् अ प पाठशाला अ स्त वा ?’ (बहुवचन)। संस्कृत म प्रश्न का वचन ही
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उत्तर का वचन तय कर दे ता है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

यह उपमा क्य याद रह जाती है: बालक वद्यालय म जैसी पुस्तक पढ़ता है, वैसा ही बनता है; यन्त्र डेटासेट् म जैसे
उदाहरण दे खता है, वैसा ही सीखता है। इसी लए अगला प्रश्न (छ) अपने आप बनता है — य द पाठशाला ही ग़लत
पढ़ाए तो ?

प्र.1 (ङ) कृतकबु द्धः कुत्र प्रयुज्यते ?

उत्तरम् — शक्षायां, च कत्सायां, कृ ष-क्षेत्रे, न्यायालये, सञ्चारे, वत्ते, कलासङ्ग तक्षेत्रे मनोरञ्जना दषु क्षेत्रेषु च
कृतकबु द्धः भू रशः प्रयुज्यते (उपयुज्यते)।
( हन्द — शक्षा म, च कत्सा म, कृ ष-क्षेत्र म, न्यायालय म, सञ्चार म, वत्त म, कला-सङ्ग त तथा मनोरञ्जन आ द क्षेत्र म
कृतकबु द्ध बहुतायत से प्रयुक्त होती है।)

पश्नपदम् ‘कु त्र’ = कहाँ ? — यह सप्तमी का अव्यय-रूप है

अतः उत्तर के सब पद सप्तमी में — िशक्षायाम्, िचिकत्सायाम्, क्षेत्रे, न्यायालये, सञ्चारे, िवत्ते, क्षेत्रेष ु

िनयम — अिधकरणे सप्तमी (‘आधारोऽिधकरणम्’)

आठ क्षेत्र, आठ जीवन-प्रसङ्ग: यह सूची यूँ ही नह बनी — इसम वद्यालय ( शक्षा), अस्पताल ( च कत्सा), खेत
(कृ ष), अदालत (न्यायालय), फ़ोन (सञ्चार), बक ( वत्त), कला-सङ्ग त तथा मनोरञ्जन — अथात् एक साधारण
भारतीय का पूरा दन आ गया है। पाठ यही दखाना चाहता है क ए.आई. कसी दूर क प्रयोगशाला क वस्तु नह ,
आज के जीवन के हर कोने म है। ‘भू रशः’ (बहुतायत से) शब्द इसी वस्तार को बल दे ता है।

ध्यान द: ‘मनोरञ्जना दषु’ म ‘आ द’ जुड़ा है — अथात् सूची यह समाप्त नह होती। ‘यस्तु क्रयावान् मनुजः स
व ान्’ खण्ड इसी को आगे बढ़ाकर नौ क्षेत्र गनवाता है, जनम सैन्यक्षेत्र, वास्तुकलाक्षेत्र तथा व धक्षेत्र नए जुड़ते
ह।

प्र.1 (च) शक्षायां कृतकबुद्धेः उपयोगः कथं भव त ?

उत्तरम् — शक्षायां द क्षा, स्वयम्, सवषां कृते कृतकबु द्धः, पी.एम्.-ई वद्या, संशय नराकरणाथ चैट्बोट् ,
भाषानुवादोपकरणा न च यत्र तत्र प्रयुज्यन्ते। एता न कृतकबु ाधा रता न उपकरणा न स न्त। एतेषां साहाय्येन छात्राः
शक्षकाणाम् अनुप स्थतौ अ प स्वयम् अध्येतुं शक्नुव न्त।
( हन्द — शक्षा म द क्षा, स्वयम्, ‘सव के लए ए.आई.’, पी.एम्. ई- वद्या, शङ् का दूर करने के लए चैटबोट तथा भाषानुवाद के
उपकरण जगह-जगह प्रयुक्त होते ह। ये सब ए.आई.-आधा रत उपकरण ह। इनक सहायता से छात्र शक्षक क अनुप स्थ त म भी
स्वयं पढ़ सकते ह।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

उपकरणम् ENGLISH छात्राय कः लाभः

दीक्षा DIKSHA पाठ्यपुस्तकानां ड जटल-सामग्री, वी डयो-पाठाः

स्वयम् SWAYAM नःशुल्काः ऑनलाइन-पाठ्यक्रमाः

सवषां कृ ते कृ तकबुि ः AI for All सवभ्यः जनेभ्यः कृतकबु द्ध-साक्षरता

पी.एम्. ई-िवद्या PM e-Vidya दूरदशनेन, बेतारवाणी भः, जालेन च शक्षणम्

चैट्बोट् Chatbot संशय नराकरणम् — तत्क्षणम् उत्तरम्

भाषानुवादोपकरणािन Translation tools स्वभाषया अन्यभाषायाः सामग्रीपाठनम्

उत्तर म यह वाक्य अवश्य जो ड़ए: ‘एतेषां साहाय्येन छात्राः शक्षकाणाम् अनुप स्थतौ अ प स्वयम् अध्येतुं
शक्नुव न्त’ — यही इस पूरे उत्तर का नष्कष है। ए.आई. का शै क्षक लाभ यह नह क वह शक्षक क जगह ले,
ब ल्क यह क जहाँ शक्षक उपलब्ध न हो — दूरस्थ गाँव, रात का समय, कोई क ठन वषय — वहाँ भी पढ़ाई रुके
नह । इसी लए अगली पं क्त म अध्यापक तुरन्त जोड़ते ह — ‘कृतकबु द्धः गुरु मत्रम् अ स्त, गुरु वकल्पः ना स्त।’

शब्द: ‘संशय नराकरणाथम्’ = संशयस्य नराकरणाथम् — ‘शङ् का दूर करने के लए’ (‘अथम्’ के योग म षष्ठी)।
‘यत्र तत्र’ = जहाँ-तहाँ, सवत्र। ‘शक्नुव न्त’ = √शक् + लट् , प्र.पु.ब.व. — ‘समथ होते ह’ (शब्दाथ-ता लका म
‘अह न्त = शक्नुव न्त’ दया है)।

प्र.1 (छ) य द अशुद्धदत्तांशः द यते त ह का समस्या भव त ?

उत्तरम् — य द अशुद्धदत्तांशः द यते त ह कृतकबु द्धः अ प त्रु ट करो त। यदा प्र शक्षणदत्तांशः पक्षपातयुक्तः भव त, तदा
नष्कषाः अ प पक्षपातयुक्ताः भव न्त। एषः दोषः ‘पूवग्रहः’ (Bias) इ त कथ्यते।
( हन्द — य द अशुद्ध डेटा दया जाए तो कृतकबु द्ध भी त्रु ट करती है। जब प्र शक्षण का डेटा पक्षपात से भरा होता है, तब उसके
नष्कष भी पक्षपातपूण हो जाते ह। इसी दोष को ‘पूवग्रह’ कहा जाता है।)

ं ः → यन्त्रं तम् एव िशक्षते → िन ष्कष ः अिप पक्षपातयुक्ताः → दोषस्य नाम ‘पूवगहः’
अशु ः दत्ताश

समाधानम् — ‘मानवीयपिरचय -िववेके न सह त्रुिटरिहतरूपेण गहीत ुं शक्यते ’

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दोष यन्त्र का नह , उसक पाठशाला का है: यन्त्र स्वयं झूठ बोलना नह जानता; वह केवल वही लौटाता है जो उसे
दखाया गया। य द उसे एकपक्षीय उदाहरण दखाए जाएँ, तो वह उसी एक पक्ष को ‘सत्य’ मान बैठता है। इसी लए
अध्यापक उत्तर को अधूरा नह छोड़ते — वे उपाय भी बताते ह : कृतकबु द्ध अद्या प वकासपदे है, अतः उसे
मानवीय दे खभाल तथा ववेक के साथ ही ग्रहण करना चा हए। उत्तर लखते समय यह अ न्तम वाक्य अवश्य जो ड़ए
— इसी से उत्तर पूण माना जाएगा।

व्याकरण: ‘द यते’ = √दा + लट् , कमवाच्य — ‘ दया जाता है’। ‘कथ्यते’ = √कथ् + लट् , कमवाच्य — ‘कहा जाता
है’। ‘य द … त ह’ तथा ‘यदा … तदा’ — ये नत्य-सम्बन्धी युग्म ह; एक के बना दूसरा वाक्य अधूरा रहता है।

प्र.1 (ज) कृतकबुद्धेः दुरुपयोगेन क दृशं भयम् अ स्त ?

उत्तरम् — कृतकबुद्धेः दुरुपयोगेन ह व भन्नप्रकारकाः साइबर्-अपराधाः समाजेषु दे शेषु च चल न्त। तेषु प्रमुखः ‘डीप्-फेक्’
अ स्त — यत् कृतकबु ा न मतं मथ्या चत्रं, दृश्यं, ध्व नः वा भव त, यत्र मुखं वाणी च मथ्या प्रस्तूयते — उपहासाय,
अनेकदा अपराधाय चा प।
( हन्द — कृतकबु द्ध के दुरुपयोग से भाँ त-भाँ त के साइबर-अपराध समाज और दे श म चल रहे ह। इनम प्रमुख है ‘डीप्-फेक्’ —
कृतकबु द्ध से बनाया गया झूठा चत्र, दृश्य या ध्व न, जसम चेहरा और आवाज़ दोन झूठे प्रस्तुत कए जाते ह; कभी हँसी-मज़ाक के
लए और अनेक बार अपराध के लए भी।)

भयस्य पाठे कः वद त हन्द
प्रकारः

साइबर्-अपराधाः अ यापकः — ‘िविभ पकारकाः साइबर्-अपराधाः समाजेष ु दे शेष ु
ध् न्न तरह-तरह के साइबर अपराध
च चलि त’न्

डीप्-फे क् अ यापकः — ‘िम यािच ं, दृ यं, विनः वा’
ध् थ् त्र श् ध् झूठा चेहरा-आवाज़ बनाकर ठगना या बदनाम करना

पूवग हः अ यापकः — ‘िन कष ः अिप प पातयु ताः भवि त’
ध् ष् क्ष क् न् पक्षपाती नणय

वृित्तहरणस्य वेदः — ‘यिद कृतकबुि ः मनु यान् व ववृ े ः िन कासयित…’
ष् स् स् त्त ष् रोज़गार छन जाने का डर
भयम्

स्वािमत्वस्य वेदः — ‘य ािण मानवे यः संसारम् अिधगृह्णि त’ (चलि च े
न्त्र भ् न् च् त्र यन्त्र संसार पर अ धकार कर लगे — यह चल चत्र
भयम् दृ टम्)
ष् वाला भय

पाठ भय को कैसे सँभालता है: ध्यान द जए, अध्यापक भय को झूठा नह कहते — ‘भयस्य कारणम प यथाथम्
अ स्त’। पर वे यह भी दखाते ह क दोष यन्त्र का नह , दुरुपयोग का है (‘दुरुपयोगेन ह’ — यहाँ ‘ ह’ कारण पर
बल दे ता है)। और उपाय भी चार बताते ह — कृतकबु द्ध-साक्षरता, नै तक प्र शक्षण, सरकारी नयन्त्रण तथा
आत्म नयन्त्रण। पूण उत्तर वही है जो भय के साथ उपाय भी कहे।

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प्र.1 (झ) ‘कृतकबु द्धः मत्रं भवेत्, न भवेत् स्वामी’ इ त वाक्यस्य कः अथः ?

उत्तरम् — अस्य वाक्यस्य अयम् अथः यत् कृतकबु द्धः अस्माकं सहा यका मत्रम् इव भवेत्, न तु अस्माकं स्वा मनी। वयं
तस्याः उपयोगं कुयाम, न तु सा अस्मान् चालयेत्। सा उपकरणम् अ स्त, प्रेरणा तु मानवेभ्यः एव आगच्छ त। अतः ववेकेन
तस्याः प्रयोगः करणीयः — तदा एव सा ‘मानवबुद्धेः सहकरी’ भ वतुम् अह त।
( हन्द — इस वाक्य का अथ है क कृतकबु द्ध हमारी सहायक मत्र बने, हमारी स्वा मनी नह । हम उसका उपयोग कर, वह हम न
चलाए। वह उपकरण है — प्रेरणा तो मनुष्य से ही आती है। इस लए उसका प्रयोग ववेकपूवक करना चा हए; तभी वह सचमुच
‘मानवबु द्ध क सहयो गनी’ बन सकती है।)

यदा सा ‘ मत्रम्’ भव त यदा सा ‘स्वामी’ भव त

वयं स्वयं िचन्तयामः, सा साहाय्यं करोित वयं िच तनम् एव यजामः, सा यत् वदित तत् एव म यामहे
न् त् न्

तस्याः उत्तरं िववेके न परीक्षामहे त याः उ रं िबना परी णं वीकु मः
स् त्त क्ष स्

कालः, श्रमः च रक्ष्यते मृितः, कौशलं, िनणयशि तः च ीय ते
स् क् क्ष न्

सा उपकरणम् — वयं कत रः सा क — वयं के वलं अनुगािमनः
त्र

‘भवेत्’ शब्द पर ध्यान द जए: यह व ध लङ् लकार है, अथात् ‘होना चा हए’ — यह वणन नह , चेतावनी और
संकल्प है। भास्कर ने यह वाक्य सुनकर कहा — ‘इ त वाक्यं मम मनः स्पृश त’ (यह वाक्य मेरे मन को छू जाता है),
क्य क यह वाक्य पूरे पाठ का नचोड़ है। मत्र और स्वामी म अन्तर यही है क मत्र से हम सलाह लेते ह, स्वामी
क हम आज्ञा मानते ह। जस दन वद्याथ बना सोचे ए.आई. का उत्तर उतारने लगे, उसी दन वह मत्र से स्वामी
बन जाती है।

पाठ के तीन समानाथ वाक्य साथ जो ड़ए: (१) ‘कृतकबु द्धः गुरु मत्रम् अ स्त, गुरु वकल्पः ना स्त।’ (२)
‘कृतकबु द्धः सहा यका अ स्त, मनुष्यस्य प्र तस्प धनी न।’ (३) ‘कृतकबु द्धः उपकरणम् अ स्त, प्रेरणा तु मानवेभ्यः
एव आगच्छ त।’ — तीन क रचना एक ही है : पहले कहो वह क्या है, फर कहो वह क्या नह है। यह सूत्र उत्तर
लखने म भी काम आता है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 61–62

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प्रश्न २ — मेलनं कुरुत : तन्त्रांशानां काया ण व चन्त्य यथो चतं वकल्पं चनुत
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अभ्यासाद् जायते स द्धः

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a s eनंmकुरुत — तन्त्रांशानां काया ण व चन्त्य यथो चतं वकल्पं चनुत — स्तम्भः अ : (क) चैट-जीपीट (Chat-
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GPT) (ख) डीप्-फेक् (Deepfake) (ग) शक्षकः (घ) एलेक्सा (Alexa) (ङ) डेटासेट् (Dataset) (च) द क्षा
(DIKSHA) (छ) अपूवानुमेय- नयन्त्रणम् (Predictive Policing) (ज) गूगल मान चत्रं (Google Maps)

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(झ) पूवग्रहः (ञ) दॅ ल्ल्-ई (DALL-E) ॥ स्तम्भः ब : १. नै तकतायाः शक्षां करो त २. ए.आई. आधा रत-
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a s em ५. पक्षपातयुक्तं प्र शक्षणफलम् ६. गीतं गाय त, द पं
शक्षाप्रणाली ३. पथ नदशनं करो त ४. संवादयन्त्रम्
l ८. चत्रोत्पादनाय ए.आई. अनुप्रयोगः ९. यन्त्रपाठशालायाः नाम
प्रका शतं करो त च ७. मथ्या चत्रस्य gनमाणम्
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१०. अपराधशमनाय प्रयोगः

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शुद्धं मेलनम् — (क)–४, (ख)–७, (ग)–१, (घ)–६, (ङ)–९, (च)–२, (छ)–१०, (ज)–३, (झ)–५, (ञ)–८।
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क्रमः स्तम्भः अ स्तम्भः ब पाठ का आधार मेल का कारण

(क) चैट-जीपीटी ४. संवादय म् न्त्र ‘चैट-जीपीट इ त नामकं संवादोपकरणम् अ प वह मनुष्य से बातचीत करके
कृतकबु ा युक्तम् अ स्त।’ (पृष्ठ ५२) प्रश्न के उत्तर दे ता है

(ख) डीप्-फे क् ७. िम यािच य
थ् त्रस् ‘डीप्-फेक् कृतकबु ा न मतं मथ्या चत्रं, पुस्तक क शब्दाथ-ता लका
िनम णम् दृश्यं, ध्व नः वा अ स्त।’ (पृष्ठ ५६) भी यही अथ दे ती है

(ग) िशक्षकः १. नैितकतायाः िश ां क्ष ‘ शक्षकाः … छात्रेषु मानवीयमूल्यबोधम् अ प यही वह काम है जो कोई यन्त्र
करोित जनय न्त। ते अनुशासनं, परोपकारं, करुणां … नह कर सकता
शक्षय न्त।’ (पृष्ठ ५५)

(घ) एले क्सा ६. गीतं गायित, दीपं ‘एतत् गीतं गाय त, वद्यु पं ज्वालय त, अथव ने अपनी माता के
पकािशतं करोित च दै नकसंवादं वातावरण स्थ त च सूचय त।’ (पृष्ठ अनुभव से यही बताया
५२)

(ङ) डेटासे ट् ९. यन्त्रपाठशालायाः ‘अस्याः यन्त्रपाठशालायाः नाम “डेटासेट्” इ त पाठ का वाक्य शब्दशः यही है
नाम !’ (पृष्ठ ५४)

(च) दीक्षा २. ए.आई. आधािरत- ‘द क्षा, स्वयम्, … एता न कृतकबु ाधा रता न यह शक्षा-मन्त्रालय का
िश ापणाली
क्ष उपकरणा न स न्त।’ (पृष्ठ ५४) ड जटल शक्षा-मञ्च है

(छ) (अ)पूव नुम ेय- १०. अपराधशमनाय ‘मुखप रचयप्रणाली, पूवानुमेय- नयन्त्रणं अथव का प्रश्न ही था —
िनयन्त्रणम् पयोगः चेत्या द-योजनासु कृतकबुद्धेः प्रयोगः अ स्त।’ ‘अपराधशमनाय कृतकबु द्धः
(पृष्ठ ५५) कथं साहाय्यं करो त ?’

(ज) गूग ल ३. पथिनदशनं करोित ‘सङ् कु चतकृतकबु द्धः — जीपीट , गूगल- मान चत्र का काम ही माग
मानिचत्रम् मान चत्रं, यू- ूब्।’ (पृष्ठ ५३) दखाना है

(झ) पूवग हः ५. प पातयु तं
क्ष क् ‘यदा प्र शक्षणदत्तांशः पक्षपातयुक्तः भव त, ‘प्र शक्षण का फल जो
पिश णफलम्
क्ष तदा नष्कषाः अ प पक्षपातयुक्ताः भव न्त। एषः पक्षपाती हो’ — यही पूवग्रह
दोषः “पूवग्रहः” इ त कथ्यते।’ (पृष्ठ ५४) क प रभाषा है

(ञ) दॅल्ल्-ई ८. िचत्रोत्पादनाय पाठ म नाम नह ; शेष सब जो ड़याँ बन जाने पर DALL-E शब्द से चत्र बनाने
(DALL-E) ए.आई. अनुपयोगः यही बचता है वाला ए.आई. है

मेलन हल करने क व ध (यही सबसे उपयोगी बात है): तीन चरण म च लए। पहला — जन जो ड़य का
वाक्य पाठ म शब्दशः मलता है, उन्ह पहले पक्का क जए : (ङ)–९ और (झ)–५ तो पाठ क पं क्तयाँ ही ह। दूसरा
— जनका काम नाम से ही स्पष्ट है, उन्ह जो ड़ए : मान चत्र → पथ नदशन, एलेक्सा → गीत-द प। तीसरा — जो
नाम पाठ म है ही नह (दॅ ल्ल्-ई), उसे अन्त म शेषानुसार जो ड़ए — यही ‘elimination’ क व ध है। कभी भी
अनुमान से आरम्भ मत क जए; पाठ से आरम्भ क जए।

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छपाई क सूचना: (छ) म पुस्तक ने ‘अपूवानुमेय- नयन्त्रणम्’ छापा है, जब क पाठ (पृष्ठ ५५) म तथा अंग्रेज़ी पयाय
(Predictive Policing) के अनुसार शुद्ध पद ‘पूवानुमेय- नयन्त्रणम्’ है — पूवम् अनुमेयम् ( जसका पहले से
अनुमान हो सके) नयन्त्रणम्। ‘अ’ लगते ही अथ उलट जाता है। इसी प्रकार (झ) म ‘पूवग्रहः’ छपा है, जब क
शब्दाथ-ता लका तथा प्रश्न ३ क मञ्जूषा म ‘पूवाग्रहः’ — दोन रूप शुद्ध ह, अथ एक ही है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 62–63
प्रश्न ३ — अधः प्रदत्तमञ्जूषातः शब्दान् चत्वा रक्तस्थाना न पूरयत (मञ्जूषा : कृतकबु द्धः, डेटासेट्, शक्षकः, डीप्-फेक्, सम्वादयन्त्रम्,
कृ षक्षेत्रे, प्र शक्षणम्, पूवाग्रहः, नै तकता)

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.3 (क) यन्त्राणां शक्षणाय …………………… नामकः दत्तांशसमूहः उपयुज्यते।

उत्तरम् — यन्त्राणां शक्षणाय डेटासेट् नामकः दत्तांशसमूहः उपयुज्यते।
( हन्द — यन्त्र को सखाने के लए ‘डेटासेट्’ नाम का दत्तांश-समूह (आँकड़ का ढे र) प्रयोग म लाया जाता है।)

कैसे पहचान: वाक्य म ‘नामकः दत्तांशसमूहः’ शब्द नणायक है — अथात् रक्तस्थान म कोई नाम चा हए, वह भी
आँकड़ के समूह का। मञ्जूषा म एक ही ऐसा नाम है — डेटासेट्। पाठ क पं क्त भी यही कहती है — ‘अस्याः
यन्त्रपाठशालायाः नाम “डेटासेट्” इ त ! कृतकबु द्धः यन्त्रं दत्तांशमाध्यमेन शक्षणं करो त।’

व्याकरण: ‘ शक्षणाय’ चतुथ है — तादथ्य (प्रयोजन) के अथ म (‘के लए’)। ‘नामकः’ वशेषण है और
‘दत्तांशसमूहः’ (पुं लङ्ग प्रथमा) का अनुसरण करता है।

प्र.3 (ख) चैट-जीपीट , एलेक्सा, स र इत्याद न …………………… इत्यस्य उदाहरणा न स न्त।

उत्तरम् — चैट-जीपीट , एलेक्सा, स र इत्याद न कृतकबु द्धः इत्यस्य उदाहरणा न स न्त।
( हन्द — चैट-जीपीट , एलेक्सा, स र इत्या द ‘कृतकबु द्ध’ के उदाहरण ह।)

‘इत्यस्य’ के कारण प्रथमा ही चलेगी: यहाँ रक्तस्थान के तुरन्त बाद ‘इ त’ (जो ‘इत्यस्य’ म छपा है) आया है।
‘इ त’ उद्धरण- चह्न का काम करता है, और उद्धरण के भीतर शब्द अपने मूल प्रथमा रूप म ही रहता है — वभ क्त
‘इ त’ के बाद वाले शब्द पर लगती है। इसी लए ‘कृतकबुद्धेः उदाहरणा न’ नह , ‘कृतकबु द्धः इत्यस्य उदाहरणा न’
शुद्ध है — ठ क वैसे ही जैसे ‘रामः इत्यस्य नाम’।

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ध्यान द: तीन उदाहरण पाठ के ह — चैट-जीपीट तथा स र अध्यापक क सूची से, और एलेक्सा अथव के घर के
अनुभव से। स न्ध करने पर वाक्य बनेगा — ‘कृतकबु द्ध रत्यस्य’ ( वसग का ‘र्’)।

प्र.3 (ग) यः मनुष्यवत् प्रश्नोत्तरं करो त, सः …………………… इ त उच्यते।

उत्तरम् — यः मनुष्यवत् प्रश्नोत्तरं करो त, सः सम्वादयन्त्रम् इ त उच्यते।
( हन्द — जो मनुष्य क तरह प्रश्न का उत्तर दे ता है, उसे ‘संवादयन्त्र’ (चैटबोट) कहा जाता है।)

कैसे पहचान: ‘प्रश्नोत्तरं करो त’ — प्रश्न-उत्तर करना ही संवाद है, और जो यन्त्र संवाद करे वही ‘संवादयन्त्रम्’। पाठ
इसी को दो नाम से कहता है — ‘संवादोपकरणम्’ (चैट-जीपीट के लए, पृष्ठ ५२) तथा ‘चैट्बोट् ’ (पृष्ठ ५४)।
अभ्यास के प्रश्न २ म भी चैट-जीपीट का जोड़ीदार ‘संवादयन्त्रम्’ ही है।

व्याकरण क सूक्ष्म बात: वाक्य म सवनाम ‘सः’ पुं लङ्ग है, जब क ‘सम्वादयन्त्रम्’ नपुंसक लङ्ग। यह वरोध नह है,
क्य क बीच म ‘इ त’ है — ‘इ त’ के भीतर का शब्द केवल नाम के रूप म रखा जाता है, वशेषण के रूप म नह ।
‘सः “संवादयन्त्रम्” इ त उच्यते’ = ‘उसे “संवादयन्त्र” कहा जाता है’ — बलकुल शुद्ध। य द ‘इ त’ हटा द तो ‘सः
संवादयन्त्रं भव त’ लखना पड़ता और लङ्ग मलाना पड़ता।

छपाई: मञ्जूषा म ‘सम्वादयन्त्रम्’ (अनुस्वार के स्थान पर ‘म्’) छपा है; सामान्य लेखन म यह ‘संवादयन्त्रम्’ लखा
जाता है — जैसा प्रश्न २ के स्तम्भ ‘ब’ म छपा है। दोन शुद्ध ह।

प्र.3 (घ) यदा पक्षपातयुक्तः दत्तांशः प्रयुज्यते त ह कृतकबु द्धः अ प …………………… करो त।

उत्तरम् — यदा पक्षपातयुक्तः दत्तांशः प्रयुज्यते त ह कृतकबु द्धः अ प पूवाग्रहम् (मञ्जूषायां दत्तं रूपम् — ‘पूवाग्रहः’)
करो त।
( हन्द — जब पक्षपात से भरा डेटा प्रयोग म लाया जाता है, तब कृतकबु द्ध भी पूवाग्रह करती है।)

वभ क्त सुधारकर ल खए: मञ्जूषा म शब्द प्रथमा म दया है — ‘पूवाग्रहः’। कन्तु वाक्य म क्रया ‘करो त’ है,
और ‘करो त’ का कम तीया म आता है (कम ण द्वतीया)। अतः शुद्ध वाक्य बनेगा — ‘कृतकबु द्धः अ प पूवाग्रहं
करो त।’ मञ्जूषा के शब्द को ज्य का त्य रक्तस्थान म रख दे ना यहाँ अशुद्ध होगा। मञ्जूषा-प्रश्न म यही सबसे बड़ी
सावधानी है — शब्द मञ्जूषा से ली जए, वभ क्त वाक्य से।

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पाठ का आधार: ‘यदा प्र शक्षणदत्तांशः पक्षपातयुक्तः भव त, तदा नष्कषाः अ प पक्षपातयुक्ताः भव न्त। एषः दोषः
“पूवग्रहः” इ त कथ्यते।’ (पृष्ठ ५४)

प्र.3 (ङ) …………………… सदै व करुणां, ववेकं च शक्षय न्त, कृतकबु द्धः तु तस्य सहा यका अ स्त।

उत्तरम् — शक्षकाः सदै व करुणां, ववेकं च शक्षय न्त, कृतकबु द्धः तु तस्य सहा यका अ स्त। (मञ्जूषायां दत्तं रूपम् —
‘ शक्षकः’)
( हन्द — शक्षक सदा करुणा और ववेक सखाते ह; कृतकबु द्ध तो उसक सहा यका मात्र है।)

वचन सुधारकर ल खए: वाक्य क क्रया ‘ शक्षय न्त’ बहुवचन है, इस लए कता भी बहुवचन ही होना चा हए —
‘ शक्षकाः’। मञ्जूषा म एकवचन ‘ शक्षकः’ दया है; उसे ज्य का त्य रखने पर ‘ शक्षकः शक्षय न्त’ बनेगा, जो कतृ-
क्रया-वचन-भङ्ग है। संस्कृत का नयम है — कता और क्रया का पुरुष तथा वचन सदा मलना चा हए। (य द
एकवचन ही रखना हो तो क्रया भी बदलनी पड़ेगी — ‘ शक्षकः … शक्षय त’।)

पाठ का आधार: ‘ शक्षकाः पुस्तक यज्ञानेन सह छात्रेषु मानवीयमूल्यबोधम् अ प जनय न्त। ते अनुशासनं, परोपकारं,
करुणां, तथैव व्यवहारज्ञानं च शक्षय न्त।’ (पृष्ठ ५५) — इसी वाक्य से यह रक्तस्थान बना है, और वहाँ भी
‘ शक्षकाः’ बहुवचन म ही है।

प्र.3 (च) कृतकबु द्धः यन्त्रा ण अभ्यासेन …………………… प्रा ुव न्त।

उत्तरम् — कृतकबु द्धः यन्त्रा ण अभ्यासेन प्र शक्षणम् प्रा ुव न्त। (शुद्धतरं रूपम् — ‘कृतकबु द्ध-यन्त्रा ण अभ्यासेन
प्र शक्षणं प्रा ुव न्त।’)
( हन्द — कृतकबु द्ध-युक्त यन्त्र अभ्यास से प्र शक्षण प्राप्त करते ह।)

क्य यही शब्द: ‘अभ्यासेन … प्रा ुव न्त’ — अभ्यास से जो पाया जाता है वह प्र शक्षण ही है। मञ्जूषा क शब्दाथ-
ता लका भी यही जोड़ती है — ‘प्र शक्षय न्त = शक्षय न्त, अभ्यासं कारय न्त’। शेष सब शब्द या तो नाम ह (डेटासेट्,
डीप्-फेक्) या दोष (पूवाग्रहः), इस लए यहाँ नह बैठते।

वाक्य-रचना क सावधानी: जैसा छपा है, वैसा पढ़ने पर कता दो हो जाते ह — ‘कृतकबु द्धः’ (एकवचन) तथा
‘यन्त्रा ण’ (बहुवचन) — और क्रया ‘प्रा ुव न्त’ बहुवचन है। इस लए वाक्य को समास मानकर प ढ़ए —
‘कृतकबु द्ध-यन्त्रा ण अभ्यासेन प्र शक्षणं प्रा ुव न्त’ (कृतकबु द्धयुक्ता न यन्त्रा ण)। तब कता एक ही रहेगा और
वचन मल जाएगा। ‘अभ्यासेन’ म करणे तृतीया है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी
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मथ्या चत्रं, मथ्यावाणी च य द कृतकबु ा नम यते त ह सः दोषः …………………… इ त कथ्यते।
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प्र.3 (छ)

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agl — मथ्या चत्रं, मथ्यावाणी च य द कृतकबु
उत्तरम् ा नम यते त ह सः दोषः डीप्-फेक् इ त कथ्यते।
( हन्द — य द झूठा चत्र और झूठ आवाज़ कृतकबु द्ध से बनाई जाए, तो उस दोष को ‘डीप्-फेक्’ कहा जाता है।)

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कैसे पहचान: वाक्य म तीन सङ् केत मौजूद ह — ‘m
a s e मथ्या चत्रम्’, ‘ मथ्यावाणी’ तथा ‘कृतकबु ा नम यते’। पाठ

a l -फेक् कृतकबु ा न मतं मथ्या चत्रं, दृश्यं, ध्व नः वा अ स्त।
क प रभाषा इन्ह तीन शब्द से बनी है —g‘डीप्
मथ्यादृश्ये यत्र मुखं वाणी च मथ्या प्रस्तूयते।’ (पृष्ठ ५६)

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व्याकरण: ‘ नम यते’ = नः + √मा + लट् , कमवाच्य — ‘बनाई जाती है’। कमवाच्य म कता तृतीया म आता है,
इसी लए.c‘क
em agदोन क्रयाएँ एक-सी लगती ह।
ा’ (तृतीया एकवचन)। ‘कथ्यते’ भी कमवाच्य है — इसी कारण

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प्र.3 (ज) ोनस्य माध्यमेन बीज-वपनं, भू मक्षमतापरीक्षणं च …………………… भव त।

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उत्तरम् — ोनस्य माध्यमेन बीज-वपनं, भू मक्षमतापरीक्षणं च कृ षक्षेत्रे भव त।

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( हन्द — ोन के माध्यम से बीज बोना तथा भू म क क्षमता क जाँच — ये कृ ष-क्षेत्र म होते ह।)
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कैसे.cपहचान: ‘बीज-वपनम्’ (बीज बोना) तथा ‘भू मक्षमतापरीक्षणम्’ ( मट्ट क
a gजाँच) — दोन खेती के ही काम
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seह। और ध्यान द जए, मञ्जूषा म यह शब्द पहले से ही सप्तमी म दया है — ‘कृ षक्षेत्रे’ — क्य क वाक्य म स्थान
a
agl (अ धकरण) चा हए। यह मञ्जूषा का दया हुआ सङ् केत है : जो शब्द सप्तमी म छपा हो, वह स्थान बताने वाले

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रक्तस्थान म ही जाएगा।

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g l aपs ोनमाध्यमेन बीज-वपनं, क ट नरीक्षणं, भू मक्षमता-चेत्याद नां परीक्षणम्
a
पाठ का आधार: ‘नूनं ! कृ ष-क्षेत्रे अ
अ प यन्त्रैः भव न्त।’ (पृष्ठ ५५) — यह अक्षत के प्रश्न ‘ क कृ ष-क्षेत्रे अ प प्रयुज्यते ?’ का उत्तर है।

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. c (झ) a g प्रा ो त।
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प्र.3 यदा कृ तकबु द्धः ववे कहीनतया उपयु ज्यते त ह …………………… हा न

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उत्तरम् — यदा कृतकबु द्धः ववेकहीनतया उपयुज्यते त ह नै तकता हा न प्रा ो त।

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( हन्द — जब कृतकबु द्ध ववेकहीनता से प्रयुक्त होती है, तब नै तकता क हा न होती है।)

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क्य यही शब्द बचता है और क्य यही ठ क है: क्रया ‘प्रा ो त’ एकवचन है, इस लए कता भी एकवचन चा हए;
और शेष सब शब्द (डेटासेट्, डीप्-फेक्, शक्षकः, कृ षक्षेत्रे…) पहले ही प्रयुक्त हो चुके ह। अथ क दृ ष्ट से भी यही
ठ क है — ववेक छोड़कर यन्त्र चलाने पर जो सबसे पहले टू टता है, वह नै तकता ही है। पाठ इसी को उपाय-रूप म
उलटकर कहता है — ‘नै तकतापू रतं प्र शक्षणम्’ आवश्यक है (पृष्ठ ५६)।

शब्द: ‘ ववेकहीनतया’ = ववेकहीनता + तृतीया — ‘ ववेकहीनता से’ (प्रकारे/हेतौ तृतीया)। ‘नै तकता’ = नी त +
ठक् (नै तक) + तल् + टाप् — भाववाचक स्त्री लङ्ग संज्ञा; शब्दाथ-ता लका म इसका अथ ‘सदाचारः, धम नष्ठा’ दया
है।

पूरी मञ्जूषा का हसाब मलाइए: कृतकबु द्धः → (ख), डेटासेट् → (क), शक्षकः → (ङ), डीप्-फेक् → (छ),
सम्वादयन्त्रम् → (ग), कृ षक्षेत्रे → (ज), प्र शक्षणम् → (च), पूवाग्रहः → (घ), नै तकता → (झ)। नौ शब्द, नौ
रक्तस्थान — कोई शब्द बचा नह , कोई दुहराया नह । मञ्जूषा-प्रश्न का उत्तर लखकर यह हसाब अवश्य मलाइए;
य द कोई शब्द बच जाए तो कह भूल हुई है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 63
प्रश्न ४ — वग चत्रजालम् : पाठे आगतानां नूतन-पदानां रेखाङ् कनं कुरुत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.4 पाठे आगतानां शब्दानाम् आधारेण शब्दजालं प्रदत्तम् अ स्त। अत्र वामतः द क्षणं (यथा-कृतकबु द्धः) उप रतः अधः
(यथा-डेटासेट्) च उदाहरणानुसारं नूतन-पदानां रेखाङ् कनं कुरुत इ त।

उत्तरम् — पुस्तक ने दो पद उदाहरण के रूप म पहले ही घेर दए ह — कृतकबु द्धः (पं क्त १, बाएँ से दाएँ) तथा डेटासेट्
(स्तम्भ ८, ऊपर से नीचे)। शेष तेरह पद नीचे दए ह।
सबसे पहले पूरा वग चत्रजाल (९ × ९) पं क्त-स्तम्भ क संख्या के साथ दे ख ली जए, ता क हर पद का ठकाना जाँचा जा सके —

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पं.\स्त. १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९

१ ू आ कृ त क बु िः च चा

२ त चा गू ग ल मा न च त्रः

३ प यः ग र डी प् आ ट क

४ ट गो ल द प म् ए आ ई

५ ल चै स क्षा फे स र डे जै

६ म् ट हा य क् श क्षा टा म

७ द जी य न्त्रा ध ग मः से ना

८ त्तां पी कः र चै ट बो ट् ई

९ शः ट ए ले क्सा ड ज ट ल्

(अ) वामतः द क्षणं (बाएँ से दाएँ) मलने वाले पद —

पदम् स्थानम् अथः / पाठे कुत्र आगतम्

कृ तकबुि ः पंि त १, त भ ३–७ (
क् स् म् उदाहरणम् — पस्ु तके एव Artificial Intelligence — पाठ का मुख्य वषय
अिङ्कतम् )

चच पंि त १, त भ ८–९
क् स् म् ‘…अ धकृत्य चचा कुव न्त।’ (पृष्ठ ५१)

गूग लमानिचत्रः पंि त २, त भ ३–९
क् स् म् Google Maps — ‘सङ् कु चतकृतकबु द्धः — जीपीट , गूगल-
मान चत्रं, यू- ूब्’

िसिर पंि त ५, त भ ६–७
क् स् म् Siri — अध्यापक क उदाहरण-सूची म

िशक्षा पंि त ६, त भ ६–७
क् स् म् ‘ शक्षायां, च कत्सायां…’ — प्रथम उपयोगक्षेत्र

यन्त्रािधगमः पंि त ७, त भ ३–७
क् स् म् Machine Learning — ‘यन्त्रा धगमः, गहना धगमः चे त व धना’

चैटबोट् पंि त ८, त भ ५–८
क् स् म् ‘संशय नराकरणाथ चैट्बोट् ’ (पृष्ठ ५४)

एले क्सा पंि त ९, त भ ३–५
क् स् म् Alexa — अथव क माता जसका उपयोग करती ह

िडिजटल् पंि त ९, त भ ६–९
क् स् म् ‘ ड जटल्-इ ण्डया’ तथा ‘ ड जटल्-भारतं समृद्धं करवाम’

(आ) उप रतः अधः (ऊपर से नीचे) मलने वाले पद —

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पदम् स्थानम् अथः / पाठे कुत्र आगतम्

डेटासे ट् स्त भ ८, पंि त ५–८ (
म् क् उदाहरणम् — पस्ु तके एव यन्त्रपाठशालायाः नाम
अिङ्कतम् )

आचायः स्त भ २, पंि त १–३
म् क् ‘आचाय ! अहं जाना म…’ — छात्र अध्यापक को इसी नाम से
पुकारते ह

चैटजीपीटी स्त भ २, पंि त ५–९
म् क् Chat-GPT — ‘अहं चैट-जीपीट इत्यस्मात् एनं ोकं
प्राप्तवान्’

गूग लसहायकः स्त भ ३, पंि त २–८
म् क् Google Assistant — ‘मम माता गूगल-सहायकेन सह वाता
करो त’

दीक्षा स्त भ ४, पंि त ४–५
म् क् DIKSHA — शक्षाक्षेत्रे कृतकबु ाधा रतम् उपकरणम्

डीपफे क् स्त भ ५, पंि त ३–६
म् क् Deepfake — ‘कृतकबु ा न मतं मथ्या चत्रम्’

दत्तांशः स्त भ १, पंि त ७–९
म् क् Data — ‘यन्त्रं दत्तांशमाध्यमेन शक्षणं करो त’

शब्दजाल हल करने क व ध: अटकल मत लगाइए — पाठ क शब्द-सूची पहले बनाइए, फर उसे जाल म ढूँ ढ़ए।
पाठ के नए पद ह : कृतकबु द्धः, दत्तांशः, डेटासेट्, डीप्-फेक्, चैट-जीपीट , चैट्बोट् , एलेक्सा, स र, जे म न, गूगल-
मान चत्रम्, गूगल-सहायकम्, यन्त्रा धगमः, गहना धगमः, द क्षा, ड जटल्, आचायः, शक्षा, चचा। अब हर पद का
पहला अक्षर जाल म खो जए (जैसे ‘डे’, ‘चै’, ‘गू’), और वह से दाएँ तथा नीचे — केवल इन्ह दो दशाओं म —
प ढ़ए। इस व ध से पन्द्रह-सोलह पद दस मनट म मल जाते ह।

दो सूक्ष्म बात: (१) जाल म ‘डीपफेक्’ स्तम्भ ५ म ‘डी-प-फे-क्’ रूप म है, जब क पाठ म यह ‘डीप्-फेक्’ (हलन्त
‘प्’ के साथ) छपा है — जाल म हलन्त हटा दया गया है, अथ वही है। (२) स्तम्भ १ क पं क्त ३–६ म ‘प-ट-ल-म्’
= ‘पटलम्’ (स्क्र न) भी पढ़ा जा सकता है, कन्तु यह पद पाठ म कह नह आया; इसी प्रकार पं क्त १–२ के ‘ ू -त’
से कोई पाठगत शब्द नह बनता। ये अक्षर पूरक (filler) ह — शब्दजाल म ऐसे अक्षर जान-बूझकर रखे जाते ह
ता क खोज सरल न रह जाए।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 64
प्रश्न ५ — अधो ल खता न वाक्या न प ठत्वा शुद्धम् (✓) अशुद्धं (✗) वा चनुत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.5 (क) आयः य शका च वद्यालये कृतकबुद्धेः उपयोगं कुरुत। ( )

उत्तरम् — अशुद्धम् (✗)

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कारणम् — पाठे एतादृशं कथनं ना स्त। य शका केवलम् एतावत् वद त यत् ‘अहं चैट-जीपीट इत्यनेन अनेकेषां प्रश्नानां यथेष्टम्
उत्तरा ण प्राप्तवती’ — कन्तु ‘ वद्यालये’ इ त तत्र न उक्तम्। आयः तु केवलं प्रश्नान् पृच्छ त (‘यन्त्राणाम प पाठशाला अ स्त वा ?’,
‘ क कृतकबु द्धः च कत्सायाम् अ प प्रयुज्यते ?’); सः कुत्रा प कृतकबुद्धेः उपयोगं न करो त।
( हन्द — पाठ म ऐसा कह नह कहा गया। य शका ने केवल इतना कहा क उसने चैट-जीपीट से प्रश्न के उत्तर पाए — ‘ वद्यालय
म’ यह नह कहा। और आय तो केवल प्रश्न पूछता है, उपयोग कह नह करता।)

व्याकरण क भी भूल: वाक्य म कता दो ह — ‘आयः य शका च’ — अतः क्रया द्ववचन म चा हए : ‘कुरुतः’।
‘कुरुत’ तो लोट् लकार, मध्यमपुरुष, बहुवचन (‘तुम सब करो’) का रूप है, जो यहाँ बलकुल नह बैठता। शुद्ध वाक्य
होता — ‘आयः य शका च वद्यालये कृतकबुद्धेः उपयोगं कुरुतः।’

प्र.5 (ख) कृतकबु द्धः केवलं वनोदानुकूलम् उपकरणम् अ स्त। ( )

उत्तरम् — अशुद्धम् (✗)
कारणम् — पाठे स्पष्टम् उक्तं यत् ‘ शक्षायां, च कत्सायां, कृ ष-क्षेत्रे, न्यायालये, सञ्चारे, वत्ते, कलासङ्ग तक्षेत्रे मनोरञ्जना दषु
क्षेत्रेषु च कृतकबु द्धः भू रशः उपयुज्यते।’ अतः सा केवलं वनोदस्य (मनोरञ्जनस्य) उपकरणं ना स्त — मनोरञ्जनं तु तस्याः अष्टानां
क्षेत्राणाम् एकम् एव क्षेत्रम्।
( हन्द — पाठ म स्पष्ट कहा गया है क कृतकबु द्ध शक्षा, च कत्सा, कृ ष, न्यायालय, सञ्चार, वत्त, कला-सङ्ग त तथा मनोरञ्जन
— इन सब क्षेत्र म बहुतायत से प्रयुक्त होती है। मनोरञ्जन तो उसका केवल एक क्षेत्र है।)

‘केवलम्’ शब्द पर ध्यान द जए: इस वाक्य को अशुद्ध बनाने वाला शब्द ‘केवलम्’ है। य द यह हटा द —
‘कृतकबु द्धः वनोदानुकूलम् अ प उपकरणम् अ स्त’ — तो वाक्य शुद्ध हो जाएगा। सत्य/असत्य के प्रश्न म
‘केवलम्’, ‘सवदा’, ‘कदा प न’ जैसे सीमा बाँधने वाले शब्द प्रायः वाक्य को असत्य कर दे ते ह। पढ़ते समय इन्ह
रेखां कत कर ली जए।

प्र.5 (ग) अथवः अ प शक्षायां कृतकबुद्धेः प्रयोगं करो त। ( )

उत्तरम् — अशुद्धम् (✗)
कारणम् — अथवः शक्षायां कृतकबुद्धेः उपयोगं न करो त, अ प तु त षये प्रश्नं पृच्छ त — ‘महोदय ! कृतकबु द्धः कथं शक्षायां
साहाय्यं करो त ? क शक्षकस्य स्थाने कृतकबु द्धः अस्मान् पाठ यष्य त ?’ अन्यत्र सः केवलम् एतत् वद त यत् ‘मम माता
‘एलेक्सा’-नामकस्य यन्त्रस्य उपयोगं करो त’ — अथात् उपयोगः मातुः, न तु तस्य, तथा सः उपयोगः गृहे भव त, न शक्षायाम्।
( हन्द — अथव शक्षा म ए.आई. का उपयोग नह करता, ब ल्क उसके वषय म प्रश्न पूछता है। एलेक्सा का उपयोग भी उसक
माता करती ह, वह भी घर म — शक्षा म नह ।)

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पढ़ने क सावधानी: इस प्रकार के वाक्य म तीन बात अलग-अलग जाँ चए — कौन (अथवः), क्या करता है
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m a s em‘कौन’ ही नह
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(प्रयोगं करो त), कहाँ ( शक्षायाम्)। य द तीन म से एक भी पाठ से न मले, तो वाक्य अशुद्ध है। यहाँ
. co माता करती ह, अथव नह । a
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मलता — प्रयोग

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अक्षतः चैट्बोट् इत्यस्य साहाय्येन उपन्यासलेखनं करो त। ( )
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प्र.5 (घ)

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उत्तरम् — अशुद्धम् (✗)

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कारणम् — पाठे अक्षतः केवलं ौ प्रश्नौ पृच्छ त — ‘के ते प्रकाराः मान्यवर !’ तथा ‘ क कृ ष-क्षेत्रे अ प प्रयुज्यते ?’।

m a s emवषये पाठः केवलम्
‘उपन्यासलेखनम्’ इ त शब्दः पाठे कुत्रा प ना स्त, न च केना प छात्रेण एतादृशं कम कृतम्। चैट्बोट् इत्यस्य
o सः ‘संशय नराकरणाथम्’ प्रयुज्यते।
एतावत् वद तcयत्
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( हन्दse
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agकहl नह है। चैटबोट का उल्लेख केवल ‘शङ् का दूर करने के लए’ हुआ है।)
— पाठ म अक्षत केवल दो प्रश्न पूछता है — प्रकार के वषय म और कृ ष-क्षेत्र के वषय म। ‘उपन्यास-लेखन’ शब्द पाठ म

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ए.आइ. डीप्-फेक् इत्य प कश्चन दुरुपयोगः अ स्त। ( )
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प्र.5 (ङ)

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उत्तरम् — शुद्धम् (✓)
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कारणम् — अध्यापकः स्पष्टम् एव वद त — ‘अद्यत्वे कृतकबुद्धेः दुरुपयोगेन ह व भन्नप्रकारकाः साइबर्-अपराधाः समाजेषु दे शेषु

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laअनेकदा अपराधाय चा प।’ यत् उपहासाय अपराधाय च प्रयुज्यते, तत् दुरुपयोगः एव।
च चल न्त।’ ततः सः डीप्-फेक् इत्यस्य स्वरूपं व्याख्या त — ‘कृतकबु
ा न मतं मथ्या चत्रं, दृश्यं, ध्व नः वा … उपहासाय,

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( हन्द — अध्यापक स्वयं कहते ह क कृतकबु द्ध के दुरुपयोग से साइबर-अपराध चल रहे ह, और डीप्-फेक् का प्रयोग उपहास तथा
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com g l a
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अनेक बार अपराध के लए होता है। जो हँसी उड़ाने और अपराध के लए प्रयोग हो, वह दुरुपयोग ही है।)

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l s ५ के सात वाक्य म यही एक वाक्य पाठ से पूरी तरह प्रमा णत होता है।
aप्रश्न
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शेष छह म कसी पात्र के नाम कaे साथ ऐसा काम जोड़ दया गया है जो पाठ म उसने कया ही नह , अथवा कोई
इस समूह का एकमात्र शुद्ध वाक्य:

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अत्यु क्त (‘केवलम्’) रख द गई है। इसी लए यह अभ्यास ध्यान से पढ़ने का अभ्यास है, स्मृ त का नह — उत्तर दे ने
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से पहले उस पात्र क पं क्तयाँ फर से दे ख लेना ही सही व ध है।
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प्र.5 (च) आयः चत्र नमाणाय कृतकबुद्धेः साहाय्यं प्रा ो त। ( )

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उत्तरम् — अशुद्धम् (✗)
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कारणम् — पाठे आयस्य त्रयः एव संवादाः स न्त — ‘यन्त्राणाम प पाठशाला अ स्त वा ?’, ‘महोदय ! क कृतकबु द्धः च कत्सायाम्
अ प प्रयुज्यते ?’ तथा (पूव) आश्चयसूचकाः वाक्या न। सः चत्र नमाणाय कृतकबुद्धेः साहाय्यं न प्रा ो त। ‘ चत्रोत्पादनम्’ इ त वषयः
केवलम् अभ्यासस्य तीयप्रश्ने ‘दॅ ल्ल्-ई’ इत्यनेन सह आगच्छ त, पाठे न।
( हन्द — पाठ म आय केवल प्रश्न पूछता है — यन्त्र क पाठशाला के वषय म और च कत्सा के वषय म। चत्र बनाने के लए
ए.आई. क सहायता लेने क बात पाठ म कह नह है; ‘ चत्रोत्पादन’ का उल्लेख केवल अभ्यास के प्रश्न २ म DALL-E के साथ
आया है।)

प्र.5 (छ) शक्षकः गम्भीरतया चैट्बोट् वाक्यानां मूल्याङ् कनं करो त। ( )

उत्तरम् — अशुद्धम् (✗)
कारणम् — पाठे शक्षकस्य वषये यत् उक्तं तत् एतत् — सः ‘पुस्तक यज्ञानेन सह मानवीयमूल्यबोधम् अ प जनय त’, ‘अनुशासनं,
परोपकारं, करुणां, व्यवहारज्ञानं च शक्षय त’। ‘चैट्बोट् इत्यस्य वाक्यानां मूल्याङ् कनम्’ इ त कम पाठे कुत्रा प न व णतम्।
( हन्द — पाठ म शक्षक के वषय म इतना ही कहा गया है क वह पुस्तक य ज्ञान के साथ मानवीय मूल्य, अनुशासन, परोपकार,
करुणा तथा व्यवहार-ज्ञान सखाता है। चैटबोट के वाक्य का मूल्याङ् कन करने क बात पाठ म नह है।)

सम्पूण उत्तर एक दृ ष्ट म: (क) ✗ · (ख) ✗ · (ग) ✗ · (घ) ✗ · (ङ) ✓ · (च) ✗ · (छ) ✗। — सात म केवल एक
शुद्ध। उत्तर लखते समय प्रत्येक के आगे कारण भी ल खए; ‘✗’ अकेला आधा उत्तर है।

Tip — सत्य/असत्य कैसे जाँच: हर वाक्य को तीन टु कड़ म तो ड़ए — कता (कौन), क्रया (क्या कया),
स्थान/ वषय (कहाँ, कस वषय म)। फर पाठ म उसी पात्र क पं क्तयाँ ढूँ ढ़ए। तीन टु कड़े मल तभी ‘✓’; एक भी
न मले तो ‘✗’। और ‘केवलम्’, ‘सवदा’, ‘सवत्र’, ‘कदा प’ जैसे शब्द दखते ही सतक हो जाइए।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 64
प्रश्न ६ — एतत् चत्रम् आधारीकृत्य संस्कृतभाषायां पञ्च वाक्या न रचयत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.6 एतत् चत्रम् आधारीकृत्य संस्कृतभाषायां पञ्च वाक्या न रचयत — (क) …… (ख) …… (ग) …… (घ) …… (ङ)
……

चत्रे क दृश्यते (पृष्ठ ६४) — एका आधु नका प्रयोगशाला (कृतकबु द्ध-केन्द्रम्) अ स्त। तस्याः वामभागे एकः श्वेतवणः यन्त्रमानवः
(robot) तष्ठ त। तस्य सम्मुखे एकः वैज्ञा नकः (चश्मधारी पुरुषः) उप वश्य तेन सह वाता करो त। पृष्ठभागे द्वौ छात्रौ
सङ्गणकयन्त्रयोः काय कुरुतः। भ त्तषु ‘AI’ इ त ल खता न नीला न पटला न, आलेखाः, म स्तष्कस्य चत्रं च दृश्यन्ते।
नमूना उत्तर (आदशम् उत्तरम्) — पञ्च वाक्या न —

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(क) इदं कृ तकबु ेः पयोगशालायाः िचत्रम् अिस्त।

(ख) अत्र एकः श्वेत वणः यन्त्रमानवः वैज्ञािनकस्य सम्मुखे ितष्ठित।

(ग) वैज्ञािनकः यन्त्रमानवेन सह संस्कृ तभाषया वात ं करोित।
(घ) पृष्ठभागे द्वौ छात्रौ सङ् गणकयन्त्रयोः दत्तांशं पश्यतः।

(ङ) िभत्तौ ‘कृ तकबुि ः’ इित आलेखाः िचत्रािण च पदिशतािन सिन्त।

( हन्द — (क) यह कृतकबु द्ध क प्रयोगशाला का चत्र है। (ख) यहाँ एक सफ़ेद रंग का यन्त्रमानव वैज्ञा नक के सामने खड़ा है। (ग)
वैज्ञा नक यन्त्रमानव से संस्कृत भाषा म बातचीत कर रहा है। (घ) पीछे क ओर दो छात्र कम्प्यूटर पर आँकड़े दे ख रहे ह। (ङ) द वार
पर ‘कृतकबु द्ध’ सम्बन्धी आलेख तथा चत्र प्रद शत ह।)
अन्या न वाक्या न ( वकल्परूपेण प्रयोक्तुं शक्यन्ते) —

अद्यत्वे यन्त्रा ण मानववत् चन्तय न्त, वद न्त च।
यन्त्रमानवः मनुष्यस्य सहायकः अ स्त, न तु तस्य स्वामी।
छात्राः कृतकबु ाः साहाय्येन नूतनं ज्ञानम् अजय न्त।
एतत् चत्रं दृष्ट् वा वयं वदामः — ‘एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी।’
अत्र यन्त्रं मानवः च म लत्वा काय कुरुतः।

चत्रवणन क व ध (यही सीखने योग्य है): पाँच वाक्य पाँच अलग-अलग बात पर ल खए, एक ही बात पाँच बार
नह । क्रम यह र खए — १. यह कसका चत्र है (प रचय) → २. मुख्य पात्र कौन है और कहाँ है (स्थान-वणन) →
३. वह क्या कर रहा है ( क्रया) → ४. पृष्ठभू म म क्या है ( वस्तार) → ५. इससे क्या सन्दे श मलता है ( नष्कष)।
अ न्तम वाक्य म पाठ का शीषक या कोई सूत्रवाक्य जोड़ द जए — इससे उत्तर पूरा भी दखता है और पाठ से जुड़ा
भी।

शुद्धता क चार जाँच: (१) कता- क्रया का वचन मले — एक के लए ‘ तष्ठ त’, दो के लए ‘ तष्ठतः’, बहुत के
लए ‘ तष्ठ न्त’। चत्र म दो छात्र ह, इस लए द्ववचन — ‘छात्रौ … पश्यतः’। (२) वशेषण- वशेष्य का लङ्ग-वचन-
वभ क्त मले — ‘श्वेतवणः यन्त्रमानवः’। (३) ‘सह’ के योग म तृतीया — ‘यन्त्रमानवेन सह’। (४) स्थान बताने म
सप्तमी — ‘ भत्तौ’, ‘पृष्ठभागे’, ‘सम्मुखे’। ये चार जाँच लगा लेने पर वाक्य प्रायः शुद्ध नकलते ह।

उपयोगी शब्द-भण्डार: यन्त्रमानवः (robot) · सङ्गणकयन्त्रम् (computer) · पटलम् (screen) · प्रयोगशाला
(laboratory) · वैज्ञा नकः · दत्तांशः (data) · आलेखः (chart) · भ त्तः (द वार) · सम्मुखे (सामने) · पृष्ठभागे
(पीछे ) · उप वष्टः (बैठा हुआ) · तष्ठ त (खड़ा है)।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 65

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

प्रश्न ७ — अधो ल खत-वाक्येषु कतृपदं क्रयापदं च चनुत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.7 (क) आयः संगणकस्य उपयोगं कुवन् आसीत्। — कतृपदम् ? क्रयापदम् ?

उत्तरम् — कतृपदम् : आयः · क्रयापदम् : आसीत् (‘कुवन् आसीत्’ इ त सम्पूण क्रयापदम्)।
( हन्द — कतृपद ‘आयः’ है और क्रयापद ‘आसीत्’ — पूरा क्रया-रूप ‘कुवन् आसीत्’ = ‘कर रहा था’।)

कत ृपदम् — जो ि या करता है, वह पथमा िवभिक्त में होता है (‘कतिर पथमा’)

आयः = पुंिलङ् ग · पथमा · एकवचन

ि यापदम् — आसीत् (√अस्, लङ् लकार, प.पु.ए.व. — ‘था’)

कु वन् = √कृ + शत ृ पत्ययः — ‘करता हुआ ’ (िवशेषणवत्, ि या नही ं)

‘कुवन्’ क्रया क्य नह है: क्रयापद वही होता है जसम लकार, पुरुष तथा वचन ह । ‘कुवन्’ म ये नह ह — वह
शतृ-प्रत्ययान्त कृदन्त है और कता ‘आयः’ का वशेषण बनकर आया है (आयः + कुवन् — दोन पुं लङ्ग प्रथमा
एकवचन)। जसम लकार है, वह ‘आसीत्’ है — इस लए क्रयापद वही है। ‘कुवन् आसीत्’ मलकर अपूण
भूतकाल का अथ दे ता है — ‘कर रहा था’। उत्तर लखते समय ‘आसीत्’ ल खए और कोष्ठक म ‘कुवन् आसीत्’
जोड़ द जए — दोन दृ ष्टयाँ सध जाएँगी।

प्र.7 (ख) य शका कृतकबुद्धेः उपयुक्तानाम् उपयोगान् वणय त। — कतृपदम् ? क्रयापदम् ?

उत्तरम् — कतृपदम् : य शका · क्रयापदम् : वणय त।
( हन्द — कतृपद ‘य शका’ और क्रयापद ‘वणय त’ (वणन करती है)।)

यिशका = स्त्रीिलङ् ग · पथमा · एकवचन (आकारान्त, ‘लता’-वत्)

वणयित = √वण् + िणच् + लट् , पथमपुरु ष · एकवचन

उपयोगान् = िद्वतीया बहुवचन — कम (‘कमिण िद्वतीया’)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

कता ढूँ ढ़ने क सरल व ध: क्रया से पू छए ‘कः / का वणय त ?’ — जो उत्तर आए, वही कता। यहाँ ‘का वणय त
?’ → ‘य शका’। दूसरी जाँच — कता सदा प्रथमा म होता है और उसका वचन क्रया के वचन से मलता है।
‘य शका’ एकवचन, ‘वणय त’ भी एकवचन — मेल ठ क है। ध्यान द जए, ‘कृतकबुद्धेः’ (षष्ठी) तथा ‘उपयोगान्’
( तीया) कता नह हो सकते, क्य क वे प्रथमा म नह ह।

प्र.7 (ग) शक्षकः बालेभ्यः सतकतायाः आवश्यकतां सूचय त। — कतृपदम् ? क्रयापदम् ?

उत्तरम् — कतृपदम् : शक्षकः · क्रयापदम् : सूचय त।
( हन्द — कतृपद ‘ शक्षकः’ और क्रयापद ‘सूचय त’ (सू चत करता है, बताता है)।)

िशक्षकः — पथमा ए.व. (कत )

बालेभ्यः — चतुथ बहुवचन (‘सम्पदाने चत थ
ु ’ — िजनके िलए/िजन्हे ं बताया जाए)

आवश्यकताम् — िद्वतीया ए.व. (कम)

सतक तायाः — षष्ठी ए.व. (सम्बन्ध — ‘सतक ता की आवश्यकता’)

सूच यित — √सूच ् + िणच् + लट् , प.पु.ए.व.

एक ही वाक्य म चार वभ क्तयाँ: यह वाक्य अभ्यास का सबसे अच्छा उदाहरण है — इसम प्रथमा (कता),
तीया (कम), चतुथ (सम्प्रदान) तथा षष्ठी (सम्बन्ध) — चार एक साथ ह। ऐसे वाक्य म कता पहचानने के लए
वभ क्त दे खए, स्थान नह : जो प्रथमा म है वही कता है, चाहे वह वाक्य म कह भी खड़ा हो। ‘बालेभ्यः’ चतुथ है,
इस लए वह कता नह हो सकता।

प्र.7 (घ) अथवः अ प कस्य चत् रोबो टक्-यन्त्रस्य ज्ञानं दत्तवान्। — कतृपदम् ? क्रयापदम् ?

उत्तरम् — कतृपदम् : अथवः · क्रयापदम् : दत्तवान्।
( हन्द — कतृपद ‘अथवः’ और क्रयापद ‘दत्तवान्’ (उसने दया)।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी
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अथवः — पथमा ए.व., पुंिलङ् ग
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दत्तवान् = √दा + क्तवतु, पुंिलङ् ग पथमा एकवचन — भूत काल का अथ
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कस्यिचत् रोबोिटक् -यन्त्रस्य — षष्ठी (सम्बन्ध), ‘िकसी रोबोिटक यन्त्र का’
aज्ञानम् — िद्वतीया ए.व. (कम)

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ag क्रया क आवश्यकता नह — ‘अथवः … दत्तवान्’ पूरा वाक्य है।
क्तवतु-रूप भी क्रयापद ही है: ‘दत्तवान्’ म लकार नह है, फर भी वह क्रयापद माना जाता है, क्य क वह स्वयं
वाक्य क मुख्य क्रया है और उसे कसी सहायक
यही उसका ‘कुवन्’ से अन्तर है : ‘कुवन्’ अकेला वाक्य नह बना सकता, उसे ‘आसीत्’ चा हए। पाठ म भी ऐसे

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अनेक क्तवतु-रूप ह — ‘दृष्टवती’, ‘प्राप्तवती’, ‘प्राप्तवान्’, ‘उक्तवान्’।

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ध्यान द: ‘दत्तवान्’ का स्त्री लङ्ग रूप ‘दत्तवती’ होगा। इसी लए य शका के लए पाठ म ‘दृष्टवती’, ‘प्राप्तवती’

a gl लङ्ग) आया और वेद के लए ‘प्राप्तवान्’ (पुं लङ्ग)।
(स्त्री

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वेदः अ प कृतकबुद्धेः दोषान् ववेचय त। — कतृपदम् ? क्रयापदम् ?
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प्र.7 (ङ)

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उत्तरम् — कतृपदम् : वेदः · क्रयापदम् : ववेचय त।

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( हन्द — कतृपद ‘वेदः’ और क्रयापद ‘ ववेचय त’ ( ववेचन करता है, दोष को गनाकर समझाता है)।)
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agl वेदः — पथमा ए.व. (कत ; ‘वेदः’ यहाँ छात्र का नाम है)
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दोषान् — िद्वतीया बहुवचन (कम)
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कृ तकबु ेः — षष्ठी ए.व. (सम्बन्ध — ‘कृ तकबुि के दोष’)

agl
िववेच यित — िव + √िवच् + िणच् + लट् , प.पु.ए.व.

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अिप — अव्यय (‘भी’), कत नही ं

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m एषा बु द्धः यन्त्रे स्थाप्यते ?’, ‘यन्त्रा ण मानवेभ्यः संसारम् अ धगृह्ण न्त’, ‘य द कृतकबु द्धः मनुष्यान् स्वस्ववृत्तेः
पाठ से मेल: यह वाक्य पाठ के अनुरूप है — वेदः ही वह छात्र है जो बार-बार शङ् काएँ तथा दोष उठाता है : ‘कथम्

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नष्कासय त त ह कः रक्षणोपायः ?’ — इस लए ‘वेदः दोषान् ववेचय त’ कहना पूरी तरह उ चत है।

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सम्पूण उत्तर एक दृ ष्ट म: (क) आयः — आसीत् (कुवन् आसीत्) · (ख) य शका — वणय त · (ग) शक्षकः —
सूचय त · (घ) अथवः — दत्तवान् · (ङ) वेदः — ववेचय त। ध्यान द जए, पाँच कता प्रथमा एकवचन म ह और
पाँच क्रयाएँ प्रथमपुरुष एकवचन म — कता तथा क्रया का यह मेल ही वाक्य को शुद्ध बनाता है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 65
प्रश्न ८ — अधो ल खतेषु वाक्येषु वशेषणं वशेष्यं च चनुत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.8 (क) अद्यतनं संगणकयन्त्रम् अ तस क्रयम् अ स्त। — वशेषणम् ? वशेष्यम् ?

उत्तरम् — वशेषणम् : अद्यतनम् (तथा वधेय- वशेषणम् ‘अ तस क्रयम्’) · वशेष्यम् : संगणकयन्त्रम्।
( हन्द — वशेषण ‘अद्यतनम्’ (आजकल का, आधु नक) और वशेष्य ‘संगणकयन्त्रम्’ (कम्प्यूटर)। ‘अ तस क्रयम्’ भी उसी का
वशेषण है, पर वह क्रया के बाद आया वधेय- वशेषण है।)

िनयमः — िवशेषणं िवशेष्यस्य िलङ् गं वचनं िवभिक्तं च अनुसरित।

संगणकयन्त्रम् = नपुंसकिलङ् ग · पथमा · एकवचन

अतः अद्यतन म्, अितसि यम् — दोनों नपुंसकिलङ् ग पथमा एकवचन

दो वशेषण, दो भू मकाएँ: ‘अद्यतनम्’ संज्ञा से सटकर आया है और उसे सीधे वशे षत करता है — इसे वशेष्य-
वशेषण कहते ह। ‘अ तस क्रयम्’ क्रया ‘अ स्त’ के साथ आया है और बताता है क यन्त्र कैसा है — इसे वधेय-
वशेषण कहते ह। दोन ही वशेषण ह और दोन का लङ्ग-वचन- वभ क्त एक ही वशेष्य से मला है। परीक्षा म
‘अद्यतनम्’ लखकर कोष्ठक म ‘अ तस क्रयम् — वधेय वशेषणम्’ जोड़ दे ना सबसे पूण उत्तर है।

शब्द: ‘अद्यतनम्’ = अद्य + ुल् (तन) — ‘आज का, वतमान समय का’। ‘संगणकयन्त्रम्’ = सम् + √गण् + ण्वुल्
= सङ्गणकः (जो गणना करे) + यन्त्रम् — computer।

प्र.8 (ख) वेदस्य गवेषणं गम्भीरम् आसीत्। — वशेषणम् ? वशेष्यम् ?

उत्तरम् — वशेषणम् : गम्भीरम् · वशेष्यम् : गवेषणम्।
( हन्द — वशेषण ‘गम्भीरम्’ (गहरा) और वशेष्य ‘गवेषणम्’ (खोज, अनुसन्धान)। अथ — वेद क खोज गहरी थी।)

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गवेषणम् = नपुंसकिलङ् ग · पथमा · एकवचन → िवशेषणम् अिप ‘गम्भीरम्’

वेद स्य = षष्ठी ए.व. — सम्बन्ध बताता है, िवशेषण नही ं

‘वेदस्य’ वशेषण क्य नह है: क्य क वह षष्ठी म है, प्रथमा म नह । वशेषण को वशेष्य क वभ क्त भी
अपनानी पड़ती है; ‘वेदस्य’ ने केवल सम्बन्ध बताया — ‘ कसक खोज’ — गुण नह बताया। यही षष्ठी और वशेषण
का भेद है : षष्ठी ‘ कसका’ बताती है, वशेषण ‘कैसा’ बताता है। प्रश्न ‘क दृशं गवेषणम् ?’ पू छए — उत्तर
‘गम्भीरम्’ आएगा, ‘वेदस्य’ नह ।

प्र.8 (ग) य शकायाः प्रस्तु तः सुबोधा आसीत्। — वशेषणम् ? वशेष्यम् ?

उत्तरम् — वशेषणम् : सुबोधा · वशेष्यम् : प्रस्तु तः।
( हन्द — वशेषण ‘सुबोधा’ (सरलता से समझ म आने वाली) और वशेष्य ‘प्रस्तु तः’ (प्रस्तु त)। अथ — य शका क प्रस्तु त
सरलता से समझ म आने वाली थी।)

पस्त िु तः = स्त्रीिलङ् ग · इकारान्त · पथमा एकवचन

◌
अतः िवशेषणम् अिप स्त्रीिलङ् ग — ‘सुबोध ा’ (न त ु ‘सुबोधः’ अथवा ‘सुबोधम्’)

यिशकायाः = षष्ठी ए.व. (सम्बन्ध)

यहाँ ‘आ’ अन्त क्य : ‘सुबोध’ शब्द का मूल रूप पुं लङ्ग म ‘सुबोधः’, नपुंसक म ‘सुबोधम्’ तथा स्त्री लङ्ग म
‘सुबोधा’ बनता है। चूँ क वशेष्य ‘प्रस्तु तः’ स्त्री लङ्ग है, वशेषण को भी स्त्री लङ्ग होना ही पड़ा। यही नयम पाठ म भी
दखता है — ‘कृतकबु द्धः सहा यका अ स्त’, ‘एषा काल्प नक अ स्त’, ‘मानवसमाना बु द्धमत्ता’ — सवत्र
स्त्री लङ्ग वशेषण, क्य क वशेष्य स्त्री लङ्ग है।

शब्द: ‘सुबोधा’ = सु (सरलता से) + बोध (समझ) — ‘जो सरलता से समझी जा सके’। इसका वलोम ‘दुब धा’ है।

प्र.8 (घ) शक्षकस्य सन्दे शः सुस्पष्टः आसीत्। — वशेषणम् ? वशेष्यम् ?

उत्तरम् — वशेषणम् : सुस्पष्टः · वशेष्यम् : सन्दे शः।
( हन्द — वशेषण ‘सुस्पष्टः’ ( बलकुल साफ़) और वशेष्य ‘सन्दे शः’। अथ — शक्षक का सन्दे श बलकुल स्पष्ट था।)

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सन्दे शः = पुंिलङ् ग · अकारान्त · पथमा एकवचन

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अतः िवशेषणम् ‘सुस्पष्ट ः’ — पुंिलङ् ग पथमा एकवचन

िशक्षकस्य = षष्ठी (सम्बन्ध)

पाठ से जो ड़ए: शक्षक का सन्दे श सचमुच सुस्पष्ट था और वह अ न्तम पं क्त म स्वयं कहा गया — ‘कृतकबु द्धः
मानवबुद्धेः सहकरी — इ त वाक्यम् अस्माकं मन स स्पष्टं स्यात्।’ ध्यान द जए, वहाँ भी ‘स्पष्टम्’ वशेषण है और
उसका वशेष्य ‘वाक्यम्’ (नपुंसक लङ्ग) है, इस लए रूप ‘स्पष्टम्’ बना — यहाँ वशेष्य ‘सन्दे शः’ पुं लङ्ग है, इस लए
‘सुस्पष्टः’।

प्र.8 (ङ) आयस्य दृ ष्टकोणः आधु नकः आसीत्। — वशेषणम् ? वशेष्यम् ?

उत्तरम् — वशेषणम् : आधु नकः · वशेष्यम् : दृ ष्टकोणः।
( हन्द — वशेषण ‘आधु नकः’ (आज के समय का, नया) और वशेष्य ‘दृ ष्टकोणः’ (दे खने का ढं ग)। अथ — आय का दृ ष्टकोण
आधु नक था।)

दृ िष्टकोणः = पुंिलङ् ग · पथमा · एकवचन → िवशेषणम् ‘आधुिनक ः’ ◌
आधुिनकः = अधुन ा (अब) + ठक् (इक) — ‘अब के समय का’

आयस्य = षष्ठी (सम्बन्ध)

सम्पूण उत्तर एक दृ ष्ट म —

वाक्यम् वशेषणम् वशेष्यम् लङ्गम्

(क) अद्यतनं संगणकयन्त्रम् अ तस क्रयम् अ स्त। अद्यतनम् (अितसि यम्) संगणकय म् न्त्र नपुंसक लङ्गम्

(ख) वेदस्य गवेषणं गम्भीरम् आसीत्। गम्भीरम् गवेषणम् नपुंसक लङ्गम्

(ग) य शकायाः प्रस्तु तः सुबोधा आसीत्। सुबोधा प तुितः
स् स्त्री लङ्गम्

(घ) शक्षकस्य सन्दे शः सुस्पष्टः आसीत्। सुस्पष्टः स दे शः
न् पुं लङ्गम्

(ङ) आयस्य दृ ष्टकोणः आधु नकः आसीत्। आध िु नकः दृ ि टकोणः
ष् पुं लङ्गम्

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एक सूत्र से पाँच प्रश्न: हर वाक्य म तीन पद ह — एक षष्ठी वाला (वेदस्य, य शकायाः, शक्षकस्य, आयस्य), एक
प्रथमा संज्ञा और एक प्रथमा वशेषण। षष्ठी वाला पद कभी वशेषण नह होता। शेष दो म से जो गुण बताए वह
वशेषण, जो वस्तु बताए वह वशेष्य। और जाँच यह है क दोन का लङ्ग-वचन- वभ क्त एक ही हो — ‘प्रस्तु तः
सुबोधा’ (दोन स्त्री.प्र.ए.व.), ‘सन्दे शः सुस्पष्टः’ (दोन पुं.प्र.ए.व.)।

स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 66
अमरकोशस्य धीवगः (१.५.१-२) — बुद्धेः पयायवाचकाः शब्दाः

स्वाध्यायान्मा प्रमदः

प्र.1 ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ खण्डे प्रदत्तयोः ोकयोः पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत — “बु द्धमनीषा धषणा
धीः प्रज्ञा शेमुषी म तः। प्रेक्षोपल श्चत्सं वत्प्र तपज्ज्ञ प्तचेतना॥ धीधारणावती मेधा सङ् कल्पः कम मानसम्।
अवधानं समाधानं प्र णधानं तथैव च॥ (१.५.१-२, अमरकोशः)”

बुि मनीषा िधषणा धीः पज्ञा शेमषु ी मितः।

पेक्षोपलिब्धिश्चत्संिवत्पितपज्ज्ञिप्तचे त ना॥
धीध रणावती मेधा सङ् कल्पः कम मानसम्।

अवधानं समाधानं पिणधानं तथै व च॥

पदच्छे दः — बु द्धः + मनीषा + धषणा + धीः + प्रज्ञा + शेमुषी + म तः। प्रेक्षा + उपल ब्धः + चत् + सं वत् + प्र तपत् + ज्ञ प्तः +
चेतना॥ धीः + धारणावती + मेधा + सङ् कल्पः + कम + मानसम्। अवधानम् + समाधानम् + प्र णधानम् + तथा + एव + च॥
अन्वयः — मनीषा, धषणा, धीः, प्रज्ञा, शेमुषी, म तः, प्रेक्षा, उपल ब्धः, चत्, सं वत्, प्र तपत्, ज्ञ प्तः, चेतना (इ त एते शब्दाः)
‘बु द्धः’ (इत्यथ प्रयुज्यन्ते)। धारणावती धीः ‘मेधा’ (कथ्यते)। मानसं कम ‘सङ् कल्पः’ (कथ्यते)। तथा एव च अवधानम्, समाधानम्,
प्र णधानम् (इ त त्रयः शब्दाः एकाथकाः स न्त)।
अथः — ‘बु द्ध’ के लए ये शब्द प्रयुक्त होते ह — मनीषा, धषणा, धी, प्रज्ञा, शेमुषी, म त, प्रेक्षा, उपल ब्ध, चत्, सं वत्, प्र तपत्,
ज्ञ प्त तथा चेतना। जो धी धारणावती हो, अथात् जो सीखे हुए को धारण कर रखे, वह ‘मेधा’ कहलाती है। मन का जो कम है, वह
‘सङ् कल्प’ कहलाता है। और ‘अवधान’, ‘समाधान’ तथा ‘प्र णधान’ — ये तीन (एकाग्रता के) पयाय ह।
पुस्तक का अपना स्पष्टीकरण — ‘बु द्धः इत्यथ अमरकोषे बहवः पयायवाचकाः शब्दाः उ ल्ल खताः स न्त। ते यथा — मनीषा,
धषणा, धी, प्रज्ञा, शेमुषी, म त, प्रेक्षा, उपल ब्धः, चत्, सं वद्, प्र तपत्, ज्ञ प्तः, चेतना, धारणावती मेधा च — एते सवऽ प शब्दाः
स्त्री लङ्गे वद्यन्ते।’

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी
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क्रमः पयायः शब्द का वशेष भाव

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बुि ः मूल श द — समझने की शि त (√बुध् = जानना)
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२ मन को वश में रखने वाली बुि ; इसीिलए िव ान् ‘मनीषी’ कहलाता है
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३ िधषणा तेज, पखर बुि
सबसे पाचीन तथा छोटा श .दc; oगायmी-म का ‘िधयो यो नः पचोदयात्’ इसी से ag
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४ धीः ब् त्र न्त्र

५ पज्ञा गहरी, तaवgतकlaपहचु ँ ने वाली बुि ; ‘प ावान्’ = िववेकी
त्त् ज्ञ

का यों में पयु त सु दर पय य
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६ शेम ुषी

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व् क् न्

राय, िन चय करने वाली बुि (‘इित मम मतम्’ — ेया का वा य) se
com la
७ मितः

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८
e दे खने-परखने की शि त (प + √ई )्
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क् क्ष

उपलिब्धः जो पा त करे , पकड़ ले — बोध
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चेतनाशि त; वेदा त का o‘सत्m-िचत्-आन द’ इसी का a s
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१० िचत्

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क् न् न्

पूण ानl, aस sयक्e बोध
ag
११ संिवत् ज्ञ म्

१२ पितपत् तुर त समझ ले ने की शि त
m
न् क्

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जानने की ि या, बोध (√ ा से )
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१३ ज्ञिप्तः ज्ञ

m
१४ .co चेतना g l
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सजगता — पाठ के लोक का ‘चेतनाः’ इसी से a
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श्

agl १५ धारणावती मेध ा धारण करने वाली बुि — मरणशि त से यु त पितभा स् क् क्

m
भावः — यह खण्ड यह क्य रखा गया: पूरा cपाठ o m‘बु द्ध’ शब्द के इद- गद घूमता है — कृतकबु द्धः, मानवबु द्धः, glase
.
mदखाती a
e
बु द्धमती, बु द्धमत्ता। तो पुस्तक अन्त मsयह
la बु द्ध के एक अलग रंग को पकड़ता है : कोई दे खने क श क्त (प्रेक्षा), कोई
है क जस ‘बु द्ध’ क चचा हम कर रहे ह, उसके लए संस्कृत
के पास पन्द्रह शब्द ह — और हर agशब्द
पकड़ने क (उपल ब्ध), कोई धारण करने क (मेधा), कोई नश्चय करने क (म त)। यही इस खण्ड का सबसे बड़ा

com
.
सन्दे श है — यन्त्र के पास सूचना है, भाषा के पास भेद है। जो भाषा बु द्ध के पन्द्रह रूप पहचानती है, वही उस
e m
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बु द्ध क सूक्ष्मता भी समझा सकती है।

.co a g l
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दूसरा सन्दे श — सब स्त्री लङ्ग: पुस्तक वशेष रूप से जोड़ती है क ये सारे शब्द स्त्री लङ्ग ह। इसी कारण पूरे पाठ

.c
m
म ‘कृतकबु द्धः’ स्त्री लङ्ग रूप के साथ चली — ‘एषा सा कृतकबु द्धः’, ‘समुप स्थता’, ‘सहकरी’, ‘सहा यका’,

m a s e
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‘प्र तस्प धनी’, ‘काल्प नक ’, ‘बु द्धमती’। व्याकरण क यह एक जानकारी पूरे पाठ के दजन रूप एक साथ समझा

m .
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दे ती है।

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m .
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

स न्ध- वच्छे द (परीक्षा के लए): बु द्धमनीषा = बु द्धः + मनीषा ( वसगस न्ध — वसग का ‘र्’)। प्रेक्षोपल ः=
प्रेक्षा + उपल ब्धः (गुण स न्ध — आ + उ = ओ)। उपल श्चत् = उपल ब्धः + चत् ( वसगस न्ध — श्चत्व, वसग
का ‘श्’)। प्र तपज्ज्ञ प्तः = प्र तपत् + ज्ञ प्तः (त् + ज् = ् — श्चत्व)। धीधारणावती = धीः + धारणावती ( वसग
का ‘र्’)। तथैव = तथा + एव (वृ द्ध स न्ध — आ + ए = ऐ)।

ग्रन्थ-प रचय: अमरकोशः (‘नाम लङ्गानुशासनम्’) आचाय अमर सह र चत संस्कृत का सवा धक प्र सद्ध
पयायवाची-कोश है। यह तीन काण्ड म है और पूरा ोकबद्ध है, ता क कण्ठस्थ कया जा सके। यहाँ उद्धत अंश
प्रथम काण्ड के धीवग (१.५) से है — अथात् ‘बु द्ध से सम्ब न्धत शब्द का वग’। पुस्तक ने इसे ‘स्वाध्यायान्मा
प्रमदः’ (स्वाध्याय म प्रमाद मत करो — तै त्तरीय उप नषद् क शक्षावल्ली का वचन) शीषक के नीचे रखा है।

प्र.2 अमरकोशस्य एतस्य ोकस्य पाठे न सह कः सम्बन्धः ? पयायपदा न प्रयुज्य पञ्च वाक्या न रचयत।

उत्तरम् (सम्बन्धः) — अस्य पाठस्य केन् े ‘बु द्धः’ इ त शब्दः एव अ स्त — कृतकबु द्धः, मानवबु द्धः, बु द्धमती, बु द्धमत्ता।
अमरकोशः दशय त यत् एतस्याः एकस्याः ‘बुद्धेः’ कृते संस्कृतभाषायां पञ्चदश पयायाः स न्त, तेषु च प्रत्येकः बुद्धेः भन्नं
रूपं सूचय त। अतः अयं ोकः पाठस्य शब्दसम्पदं वधय त, ‘कृतकबु द्धः’ इत्यस्य स्त्री लङ्गत्वं च स्पष्टीकरो त।
( हन्द — यह पाठ ‘बु द्ध’ के चार ओर घूमता है, और अमरकोश दखाता है क उसी एक बु द्ध के लए संस्कृत म पन्द्रह शब्द ह,
जनम हर शब्द बु द्ध का एक अलग रूप बताता है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है क ये सब स्त्री लङ्ग ह — इसी लए पूरे पाठ म
‘कृतकबु द्धः’ के साथ स्त्री लङ्ग वशेषण आए ह।)
नमूना उत्तर — पयायपदै ः पञ्च वाक्या न —

(क) मनीिषणां मनीषा सवदा लोकिहताय पवतते ।

(ख) यस्य मेधा धारणावती, सः पिठतं न िवस्मरित।

(ग) पज्ञा तत्त्वं दशयित, सूच ना त ु के वलं वृत्तान्तं कथयित।

(घ) यन्त्रेष ु चे त ना नािस्त, तथािप तािन चे त नवत् काय ं कु विन्त।

(ङ) कृ तकबु ेः पयोगे मितः िववेक ः च अपेिक्षतौ।

( हन्द — (क) मनी षय क मनीषा सदा लोक के हत म लगती है। (ख) जसक मेधा धारण करने वाली है, वह पढ़ा हुआ नह
भूलता। (ग) प्रज्ञा तत्त्व दखाती है, सूचना तो केवल वृत्तान्त बताती है। (घ) यन्त्र म चेतना नह है, फर भी वे चेतन क तरह काम
करते ह। (ङ) कृतकबु द्ध के प्रयोग म म त तथा ववेक — दोन अपे क्षत ह।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी AglaSem · NCERT Solutions

पयायः प्र सद्धः प्रयोगः कहाँ मलेगा

धीः ‘िधयो यो नः पचोदयात्’ गायत्री मन्त्र — ‘जो हमारी बु द्धय को प्रे रत करे’

पज्ञा ि थतप य का भाषा’
‘ स् ज्ञस् श्रीमद्भगव ता २.५४

मेध ा ‘मेधावी’ — िजसकी मेधा तीव हो प्रच लत शब्द

मनीषा ‘मनीषी’ — िव ान्, िवचारक
द्व प्रच लत शब्द

चेतना ‘िन यं वदि त चेतनाः’
त् न् इसी पाठ का ोक (पृष्ठ ५६)

मितः ‘इित मम मतम्’ श्रेया का वाक्य (पृष्ठ ५७)

वाक्य बनाते समय दो बात ध्यान र खए: (१) ये सारे शब्द स्त्री लङ्ग ह, अतः इनके वशेषण तथा क्रया-सम्बन्धी
पद भी स्त्री लङ्ग रहगे — ‘मेधा धारणावती’, ‘प्रज्ञा गम्भीरा’, ‘चेतना जागृता’। (२) पयाय होने का अथ यह नह क
सब जगह एक-दूसरे के स्थान पर रखे जा सक। ‘मेधा’ स्मरण-श क्त क ओर झुकती है, ‘प्रज्ञा’ ववेक क ओर,
‘म त’ नश्चय क ओर। अच्छा लेखक प्रसंग के अनुसार पयाय चुनता है — यही शब्द-सम्पदा का स ा उपयोग है।

यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् — पृष्ठ 66
प्रकल्पकायम् — नवसु क्षेत्रेषु कृतकबु ा युक्तानाम् उपकरणानां, तन्त्राणाम्, अनुप्रयोगाणां च नामा न सङ्गह्य लेखनम्

यस्तु क्रयावान् मनु जः स वद्वान्

प्र.1 अधो ल खतेषु क्षेत्रेषु कृतकबु ा युक्तानाम् उपकरणानां, तन्त्राणाम् अनुप्रयोगाणां च क्षेत्रानुसारं नामा न सङ्गह्य
लखत — शक्षाक्षेत्रे, च कत्साक्षेत्रे, वा णज्ये, सैन्यक्षेत्रे, कृ षक्षेत्रे, मनोरञ्जनक्षेत्रे, वास्तुकलाक्षेत्रे, व धक्षेत्रे,
सामान्यजीवनक्षेत्रे च।

यह प्रकल्प-काय (project) है — नौ क्षेत्र के लए ए.आई.-आधा रत उपकरण , तन्त्रांश तथा अनुप्रयोग के नाम इक े करके
क्षेत्रवार लखने ह। नीचे पहले व ध द है, फर आदश उत्तर।
काय कैसे क जए ( व ध) —

1. एक बड़ी चाट-शीट ली जए और उस पर नौ खाने बनाइए — प्रत्येक क्षेत्र के लए एक।
2. सबसे पहले पाठ से नाम उठाइए — पाठ म तथा ‘तन्त्रांशाः/अनुप्रयोगाः’ क सूची म सोलह से अ धक नाम पहले से दए ह।
3. फर घर- वद्यालय म पू छए, समाचार-पत्र दे खए, और भारतीय योजनाओं के नाम वशेष रूप से खो जए — इससे प्रकल्प
भारत-के न्द्रत बनेगा।
4. हर नाम के आगे संस्कृत नाम भी ल खए। जसका संस्कृत नाम पुस्तक म न हो, उसे स्वयं समास से ग ढ़ए — जैसे
‘चालकर हतयानम्’ (self-driving car), ‘मुखप रचयप्रणाली’ (face recognition)।
5. अन्त म एक वाक्य म ल खए क उस क्षेत्र म ए.आई. से क्या लाभ हुआ और क्या सावधानी चा हए — तभी प्रकल्प पूण माना
जाएगा।

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आदश उत्तरम् (नमूना ता लका) —

क्षेत्रम् कृतकबु ा युक्ता न उपकरणा न / तन्त्रा ण / अनुप्रयोगाः कायम् ( हन्द म)

िशक्षाक्षेत्र े दी ा (DIKSHA), वयम् (SWAYAM), पी.एम्. ई-िव ा, सवषां कृते
क्ष स् द्य पाठ्यसामग्री, शङ् का-समाधान,
कृतकबुि ः (AI for All), चैट्बोट् , भाषानुवादोपकरणािन, चैट-जीपीटी, जेिमिन अनुवाद, स्वयं-अध्ययन

िचिकत्साक्षेत्र े रोबोिटक् -सजरी, रोग-पूव ानम्, रि मपरी णिव ा (AI Radiology), चैट-
ज्ञ श् क्ष द्य शल्य क्रया, रोग क पहचान, एक्स-रे
कृतकबुि ः, औषधशु ूषा, ई-स जीवनी श्र ञ् क जाँच, दूर च कत्सा

वािणज्ये (िवत्ते ) कपटले नदे न-िनरी णम् (fraud detection), अनुशंसा-पणाली
क्ष धोखाधड़ी पकड़ना, ग्राहक को
(recommendation system), ग ाहकसे वा-चैट्बोट् , यू.पी.आई.-सुर ात म् क्ष न्त्र सुझाव दे ना, चौबीस घंटे सेवा

सै न्यक्षेत्र े डोन् (चालकरिहतिवमानम्), मुखपिरचयपणाली, उपगहिच -िव ले षणम्, त्र श् नगरानी, सीमा-रक्षा, चत्र का
वचािलत-सीमािनरी णम्
स् क्ष व ेषण

कृ िषक्षेत्र े डोनमा यमेन बीज-वपनम्, कीटिनरी णम्, भूिम मतापरी णम्, िकसान्-ई-िम म्
ध् क्ष क्ष क्ष त्र बीज बोना, क ट पहचानना, मट्ट
(चैट्बोट् ), वातावरण-पूव नुम ानम् जाँचना, मौसम बताना

मनोरञ्जनक्षेत्र े यू-ट ूब,् अनुशंसा-पणाली, दॅ ल्-ई (DALL-E), सङ् गीतरचना-त ांशाः,ल् न्त्र पसन्द के अनुसार सुझाव, चत्र-
चलि च -स पादन-उपकरणािन
च् त्र म् सङ्ग त क रचना

वास्तुक लाक्षेत्र े आक पन-त ांशाः (design software), ि िवम-मुदणम् (3D printing),
ल् न्त्र त्र नक़्शा बनाना, त्रआयामी प्र तरूप,
भवन-पित प-िनम णम्, ऊज -द ता-गणनम्
रू क्ष ऊजा-बचत क गणना

िविधक्षेत्र े सुवास् (SUVAS — िविधक-अनुवाद-त ांशः), सुपेस् (SUPACE), याियक- न्त्र न् नणय का भाषानुवाद, पुराने
अिभले ख-अ वेषणम्, पूव नुमेय-िनय णम्, मुखपिरचयपणाली
न् न्त्र मुक़दमे खोजना, अपराध- नयन्त्रण

सामान्यजीवनक्षेत्र े िसिर, एले सा, गूगल -सहायकम्, गूगल -मानिच म्, पटु-कारयानम्, मेटा-
क् त्र मागदशन, घर के उपकरण चलाना,
कृतकबुि ः, पर ले ि सिट-कृतकबुि ः प् क् प्रश्न के उत्तर, मौसम-समाचार

प्रकल्पस्य उपसंहारः (संस्कृतेन) —

एतत् सव ं दृ ष्ट् वा वयं वदामः — कृ तकबुि ः अद्य जीवनस्य पायः सवषु क्षेत्रेष ु पिवष्टा अिस्त।
िशक्षायां सा गुरोः िमत्रम्, िचिकत्सायां वैद्य स्य सहाियका, कृ षौ कृ षकस्य साधनम् अिस्त।

िकन्त ु सवत्र एकम् एव स्मरणीयम् — यन्त्रं सूच नां ददाित, िववेकं त ु मानवः एव ददाित।

अतः वयं कृ तकबुि ं िववेके न पयुञ् जीमिह, यतः ‘कृ तकबुि ः िमत्रं भवेत ्, न भवेत ् स्वामी’।

( हन्द — यह सब दे खकर हम कहते ह क कृतकबु द्ध आज जीवन के प्रायः सभी क्षेत्र म प्रवेश कर चुक है। शक्षा म वह गुरु क
मत्र है, च कत्सा म वैद्य क सहा यका, और खेती म कसान का साधन। कन्तु सवत्र एक ही बात याद रखने योग्य है — यन्त्र सूचना
दे ता है, ववेक तो मनुष्य ही दे ता है। इस लए हम कृतकबु द्ध का प्रयोग ववेक से कर, क्य क ‘कृतकबु द्ध मत्र बने, स्वामी न बने’।)

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अच्छे प्रकल्प म ये चार बात अवश्य ह : (१) क्षेत्रवार क्रम — नौ क्षेत्र, नौ अलग खाने; एक क्षेत्र का नाम दूसरे म
न जाए। (२) पाठ से जुड़ाव — कम-से-कम आधे नाम पाठ या ‘तन्त्रांशाः/अनुप्रयोगाः’ क सूची से ली जए; इससे
शक्षक को दखेगा क पाठ पढ़ा गया है। (३) संस्कृत नामकरण — हर नाम के आगे संस्कृत पयाय; जो न मले उसे
समास से स्वयं ग ढ़ए और वग्रह भी ल खए। (४) नष्कष-वाक्य — अन्त म पाठ का सूत्रवाक्य। जो प्रकल्प केवल
नाम क सूची है, वह अधूरा है; जो नाम + काय + सन्दे श तीन दे ता है, वही पूण है।

ध्यान द: ऊपर क ता लका म जो नाम पाठ म नह आए (जैसे ई-सञ्जीवनी, सुवास्, कसान्-ई- मत्रम्, त्र वम-
मुद्रणम्), वे भारत म प्रच लत वास्त वक सेवाएँ/तकनीक ह — प्रकल्प म इन्ह जोड़ते समय अपने वद्यालय के
शक्षक से एक बार पु ष्ट अवश्य कर ली जए तथा जस ोत से नाम लया, उसका उल्लेख भी क जए। कसी भी
सूची म नाम क शुद्धता ही उसका मूल्य है।

Try this — अपने क्षेत्र का दसवाँ खाना बनाइए: पुस्तक ने नौ क्षेत्र दए ह। आप एक दसवाँ जो ड़ए जो आपके
अपने जीवन से जुड़ा हो — ‘क्र डाक्षेत्रे’ (खेल म — ग त- व ेषण, नणायक-सहायता), ‘यातायातक्षेत्रे’ (यातायात
म — सङ् केत- नयन्त्रण, माग-सुझाव), अथवा ‘पयावरणक्षेत्रे’ (वन- नरीक्षण, वायुगुणवत्ता-मापन)। अपने क्षेत्र के
लए संस्कृत नाम स्वयं ग ढ़ए — यही इस पाठ का सबसे अच्छा अभ्यास है।

अध्याय — एक नज़र म
पाठ-प रचय — पाठ का आरम्भ एक छोटे गद्यांश से होता है — ‘आधु नके वज्ञानयुगे यदा मानवजीवनं द्रुतगत्या
प रवतनशीलम् अ स्त, तदा अत्र कृतकबु द्धः प्रभावशा ल-साधनरूपेण समुप स्थता वतते।’ अथात् आज जब मानव-जीवन तेज़
ग त से बदल रहा है, तब कृतकबु द्ध एक प्रभावशाली साधन के रूप म सामने आ खड़ी हुई है। यन्त्र मनुष्य क तरह सोचते ह
और नणय लेते ह — यही इस पाठ का वषय है।
वधा तथा पात्र — यह संवाद है, कोई कथा या ोक-संग्रह नह । स्थान है ‘ वद्यालयकक्षा’। पात्र ह — अध्यापकः तथा दस
छात्र : य शका, कात्यायनी, श्रेया, अथवः, अक्षतः, आयः, वेदः, आकाशः, पावनी तथा भास्करः। संवाद छात्र के प्रश्न से आगे
बढ़ता है, इस लए पूरा पाठ प्रश्नोत्तर क शैली म है — यही उसे पढ़ने म सरल और याद रखने म सुगम बनाता है।
वषयवस्तु — संवाद पाँच चरण म चलता है : (१) कृतकबु द्ध क्या है — ‘यया अचेतनयन्त्रा ण मानवबु द्धवत् काय कुव न्त,
सा कृतकबु द्धः’; (२) उसके तीन प्रकार — सङ् कु चत, सामान्य तथा अत्युत्कृष्ट कृतकबु द्ध; (३) यन्त्र सीखते कैसे ह —
यन्त्रा धगम तथा गहना धगम क व ध से, और उनक पाठशाला का नाम ‘डेटासेट्’ है; (४) उपयोगक्षेत्र — शक्षा, च कत्सा,
कृ ष, न्यायालय, सञ्चार, वत्त, कला-सङ्ग त तथा मनोरञ्जन; (५) भय तथा सीमा — पूवग्रह, साइबर-अपराध, डीप्-फेक् तथा
रोज़गार का प्रश्न, और उनके उपाय।
मूल सन्दे श — पाठ का शीषक ही उसका नष्कष है — कृतकबु द्ध मानवबु द्ध क सहकरी (सहयो गनी) है, प्र तस्प धनी
नह । अध्यापक दो वाक्य म यह बात बाँध दे ते ह — ‘कृतकबु द्धः उपकरणम् अ स्त, प्रेरणा तु मानवेभ्यः एव आगच्छ त’ तथा
‘कृतकबु द्धः गुरु मत्रम् अ स्त, गुरु वकल्पः ना स्त’। भास्कर का वाक्य — ‘कृतकबु द्धः मत्रं भवेत्, न भवेत् स्वामी’ — पूरे पाठ
का सूत्रवाक्य है।
भा षक वशेषताएँ — पाठ क सबसे बड़ी वशेषता है नवीन संस्कृत-शब्द नमाण। अंग्रेज़ी क तकनीक शब्दावली के लए
पुस्तक ने समास तथा प्रत्यय के बल पर नए शब्द गढ़े ह — कृतकबु द्धः (Artificial Intelligence), दत्तांशः (Data),
तन्त्रांशः (Software), यन्त्रा धगमः (Machine Learning), गहना धगमः (Deep Learning), संवादोपकरणम्
(Communication tool), मुखप रचयप्रणाली (Facial Recognition System), पटु -कारयानम् (Smart Car),

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 5 एषा सा कृतकबु द्धः मानवबुद्धेः सहकरी
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जालप्रवेशः (internet access)। ध्वन्यात्मक नाम ज्य के त्य दे वनागरी म लखे गए ह — चैट-जीपीट , एलेक्सा, स र,
co m
जे म न, डीप्-फेक्, डेटासेट्।
se m.
o m l a
gतथा सप्तमी (अ धकरण —
.c अपसरण), षष्ठी (सम्बन्ध — ‘कस्य?’ का उत्तर; सम्बन्ध, स्वा मत्व, अंश, वषय) a
व्याकर णक बदु — ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ खण्ड तीन वभ क्तयाँ दोहराता है — पञ्चमी (अपादान — ‘कस्मात्?’ का उत्तर;

m
se?’ का उत्तर; स्थान, काल, आधार)। पाठ स्वयं इनके उदाहरण से भरा है — ‘मानवात् अ प अ धका’ (पञ्चमी),
वयोग, कारण,

l a
ag‘कृतकबुद्धेः प्रयोगः’ (षष्ठी), ‘ शक्षायां च कत्सायां च’ (सप्तमी)। अभ्यास के प्रश्न ७ तथा ८ कतृपद- क्रयापद तथा वशेषण-
‘क स्मन्

m
वशेष्य का चयन कराते ह।

. co ag
m
पाठ के भीतर का ोक — वेदः चैट-जीपीट से प्राप्त एक अनुष्टुप् ोक सुनाता है — ‘ वद्युत्प्रज्ञया यन्त्रा ण नत्यं वद न्त

l a se
चेतनाः। अहोरात्रं न वश्रान्ताः मानवान् धारय न्त ते॥’ यह पूरे पाठ का सबसे रोचक क्षण है — यहाँ यन्त्र ने ही संस्कृत ोक

agआश्चय करते ह।
रचा है, और सब उसे उत्साह से पढ़ते ह तथा
अ त रक्त सामग्री — ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ म अमरकोश (१.५.१-२, धीवगः) के दो ोक ह जो ‘बु द्ध’ के पन्द्रह पयायवाची

c o m
.
गनाते ह — मनीषा, धषणा, धी, प्रज्ञा, शेमुषी, म त, प्रेक्षा, उपल ब्धः, चत्, सं वद्, प्र तपत्, ज्ञ प्तः, चेतना तथा धारणावती
मेधा — और पुस्तक जोड़ती है क ये सब स्त्री लङ्ग ह। इसी कारण पूरे पाठ म ‘कृतकबु द्धः’ स्त्री लङ्गm
s e म चली है — ‘एषा’,

. c m यका’, ‘प्र तस्प धनी’, ‘समुप स्थता’।
‘सहकरी’,o‘सहा
a gla
a s em क्या माँगता है — नौ प्रश्न के पूण वाक्य म उत्तर, दस जोड़ का मेलन, मञ्जूषा से नौ रक्तस्थान क पू त,
gl वग चत्रजाल म पाठ के नए पद का रेखाङ् कन, सात वाक्य म शुद्ध/अशुद्ध का चयन, चत्र देखकर पाँच संस्कृत वाक्य, पाँच
अभ्यास

a वाक्य म कतृपद- क्रयापद तथा पाँच म वशेषण- वशेष्य का चयन। इसके ऊपर ‘यस्तु क्रयावान् मनुजः स व ान्’ म नौ क्षेत्र

m a s
.co agl
— शक्षा, च कत्सा, वा णज्य, सैन्य, कृ ष, मनोरञ्जन, वास्तुकला, व ध तथा सामान्यजीवन — के ए.आई.-उपकरण क
सूची बनानी है।
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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages62
Updated19 Sep 2026