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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 6 मनःपूतं समाचरेत्

AglaSem पर कक्षा 9 संस्कृत पाठ 6 मनःपूतं समाचरेत् (शारदा) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 6 (Sharada).
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About NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 6 मनःपूतं समाचरेत्

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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 6 मनःपूतं समाचरेत् – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा9

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 6: मनःपूतं समाचरेत्

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

67 – 78 15 62 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 57 pages

Page 2

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 6: मनःपूतं समाचरेत्
मनःपूतं समाचरेत् शारदा (कक्षा ९) का षष्ठः पाठः है। यह कसी एक क व क रचना नह , ब ल्क आठ सुभा षत का सङ् कलन है — दो मनुस्मृ त
से, एक श्रीमद्भगव ता से, एक सुभा षतरत्नभाण्डागार से, एक भतृह र के नी तशतक से, एक पञ्चतन्त्र ( मत्रभेदः) से, एक का लदास के
माल वका ग्न मत्रम् से तथा एक भार व के कराताजुनीयम् से। पाठ का आरम्भ एक चत्रकथा-संवाद से होता है जसम आचाया और छात्र मलकर यह
नष्कष नकालते ह क हर काम प वत्र मन से करना चा हए। पाठ के साथ पुस्तक सव शब्दे न भासते (उनतीस पद क शब्दाथ-ता लका, जसका
‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भ खाली है), अत्र इदम् अवधेयम् (आठ ोक का अन्वय), स्वाध्यायान्मा प्रमदः (भारतीय- ान-परम्परा क ग्रन्थ-
सा रणी) तथा यस्तु क्रयावान् मनुजः स व ान् (दो प रयोजना-काय) दे ती है। अभ्यास अभ्यासाद् जायते स द्धः शीषक के नीचे नौ प्रश्न म है —
पूणवाक्येन उत्तर, ोकांश म रक्तस्थानपू त, प्रश्न नमाणम्, ोक-आधा रत प्रश्नोत्तर, मञ्जूषा से भावाथपू त, अन्वय-पू त, मेलनम्, स न्ध वच्छे दः
तथा वग्रहवाक्य से समस्तपद।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

शारदा (कक्षा 9) 67 – 78

खं ड प्रश्न

15 62

माध्यम

हन्द

पाठ-प्रस्तावना — चत्रकथा-संवादः — पृष्ठ 67–68
आचायायाः छात्राणां च संवादः — पाठस्य भू मका

पाठ-प रचयः

प्र.1 प्रथमे चत्रे आचाया छात्रान् क पृच्छ त ? छात्राः कम् उत्तरं दद त ? संवादस्य आशयं लखत — “ प्रयच्छात्राः !
वदन्तु, कम प काय करणीयम् अ स्त चेत् आदौ कम् आवश्यकम् ?”

उत्तरम् — आचाया पृच्छ त यत् ‘ कम प काय करणीयम् अ स्त चेत् आदौ कम् आवश्यकम् ?’ इ त। छात्राः त्री ण उत्तरा ण
दद त — (१) व चन्त्य कायकरणम्, (२) उ चत व धना कायकरणम्, (३) पूणमनसा कायकरणम्।
( हन्द — आचाया पूछती ह क य द कोई काम करना हो तो सबसे पहले क्या आवश्यक है ? छात्र तीन उत्तर दे ते ह — (१) सोच-
वचारकर काम करना, (२) उ चत व ध से काम करना, और (३) पूरे मन से काम करना।)

छात्रस्य उत्तरम् हन्द अथ यह पाठ के कस ोक म खुलता है

िविचन्त्य कायकरणम् सोच-िवचारकर काम करना ोक ८ — ‘सहसा वदधीत न क्रयाम्’ तथा ‘वृणते ह
वमृश्यका रणम्’

उिचतिविधना उिचत िविध से , ठीक ढं ग से काम ोक ४ — ‘अभ्यासेन क्रयाः सवाः’ ( व ध अभ्यास से ही आती है)
कायकरणम् करना

पूणमनसा कायकरणम् पूरे मन से काम करना ोक १ — ‘मनःपूतं समाचरेत्’ — यही पाठ का शीषक है

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

यह संवाद पाठ क भू मका कैसे है: ध्यान द जए, आचाया ने ‘कैसे कर’ नह पूछा, ‘आदौ कम् आवश्यकम्’ पूछा
— सबसे पहले क्या चा हए। तीन छात्र-उत्तर सही ह और आचाया भी कहती ह ‘सव उ चतमेव वद न्त’। पर तीन म
जो सबसे भीतर क बात है — ‘पूणमनसा’ — उसी को पकड़कर आचाया आगे बढ़ती ह। इस प्रकार यह संवाद पाठ
के आठ सुभा षत का ार खोल दे ता है।

व्याकरण: ‘ व चन्त्य’ = व + √ चन्त् + ल्यप् (उपसग रहने पर क्त्वा का ल्यप् हो जाता है) — ‘सोचकर’।
‘कायकरणम्’ = कायस्य करणम् (षष्ठी-तत्पुरुष)। ‘पूणमनसा’ = पूणन मनसा (तृतीया) — ‘पूरे मन से’; यही तृतीया
आगे ‘मनसा पूतम्’ म भी है।

प्र.2 “सव उ चतमेव वद न्त। अधुना वचारयन्तु, य द मनः एव म लनं स्यात्, उ े श्यम् एव अनु चतं स्यात् त ह कम प
काय सम्यक् कथं भवेत् ?” — आचायायाः अस्य कथनस्य आशयं स्पष्टीकुरुत।

उत्तरम् — आचायायाः आशयः अ स्त यत् कायस्य शु द्धः कायकतुः मनसः शु ा एव भव त। य द मनः म लनं भवेत्,
उ े श्यं च अनु चतं भवेत्, त ह काय व धः यथो चतः अ प भवतु, कायस्य फलं दू षतम् एव स्यात्। अतः एव अस्मा भः
सवा ण काया ण प वत्रेण मनसा करणीया न।
( हन्द — आचाया का आशय यह है क काम क शु द्ध करने वाले के मन क शु द्ध से ही होती है। य द मन ही मैला हो और उ े श्य
ही अनु चत हो, तो काम करने का ढं ग चाहे कतना ही ठ क क्य न हो, उसका फल दू षत ही होगा। इसी लए हम सारे काम प वत्र मन
से करने चा हए।)

मिलनं मनः + अनुिचतम् उ ेश्यम्

↓

उिचतिविधना कृ तम् अिप कायम्

↓

दू िषतं फलम्

तक कैसे चलता है: छात्र ने अभी-अभी कहा था ‘एवं चेत् तस्य कायस्य फलम् अ प दू षतम् एव स्यात्’ — यही इस
पूरे पाठ क धुरी है। व ध बाहर क चीज़ है, मन भीतर क । बाहर क व ध सुधारने से भीतर का मैल नह धुलता, पर
भीतर का मन शुद्ध हो तो व ध अपने-आप ठ क हो जाती है। इसी लए आचाया अन्त म नष्कष दे ती ह — ‘अत एव
अस्मा भः सवा ण काया ण प वत्रेण मनसा करणीया न। एतदे व शक्षय त प्रस्तुतः पाठः — मनःपूतं समाचरेत् इ त।’

व्याकरण: ‘स्यात्’ = √अस् व ध लङ् प्र.पु.ए.व. — ‘हो / हो जाए’। ‘भवेत्’ = √भू व ध लङ् — ‘होगा / हो
सकेगा’। ‘अस्मा भः … करणीया न’ कमवाच्य का प्रयोग है — कता तृतीया म (अस्मा भः), कम तथा कृत्य-
प्रत्ययान्त पद प्रथमा म (काया ण करणीया न)। यही रचना ‘मया पुस्तकं पठनीयम्’ म भी है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.3 “आचाय ! अ स्मन् पाठे व वधेभ्यः ग्रन्थेभ्यः सुभा षता न सङ् क लता न दृश्यन्ते। कम् एता न सुभा षता न
वतमानसमये अ प उपयोगी न स न्त ?” — छात्रस्य अस्य प्रश्नस्य उत्तरं स्वशब्दे षु लखत।

उत्तरम् — आम्, एता न सुभा षता न अद्यत्वे अ प पूणतया उपयोगी न स न्त। यतः एतेषु न का प व शष्टा घटना व णता,
अ पतु मानवस्य स्वभावः, कम, ववेकः, अभ्यासः, प रश्रमः च व णताः — एते च कदा प न पुरातनाः भव न्त। पाठे एव
छात्रा वद त — ‘एता न सुभा षता न न केवलं पठनाय अ पतु जीवने आचरणाय स न्त’ इ त। आचाया अ प सम्मन्यते —
‘सम्यक् उक्तम्। आयान्तु, वयं सुभा षता न पठामः जीवने च आचरामः।’
( हन्द — हाँ, ये सुभा षत आज भी पूरी तरह उपयोगी ह। इनम कसी एक घटना का वणन नह है, ब ल्क मनुष्य के स्वभाव, कम,
ववेक, अभ्यास और प रश्रम क बात है — और ये कभी पुराने नह पड़ते। पाठ म ही छात्रा कहती है क ये सुभा षत केवल पढ़ने के
लए नह , जीवन म आचरण करने के लए ह।)

सुभा षतम् आज के जीवन म उसका उपयोग

दृ िष्टपूतं न्यसे त ् पादम् सड़ क पार करते समय, सीढ़ ी उतरते समय दे खकर पैर रखना — दुघ टना से बचाव।

वस्त्रपूतं जलं िपबेत ् छना/शुद्ध जल पीना — आज भी जल -जिनत रोगों से बचने का पहला िनयम यही है।

अभ्यासे न िक्रयाः सव ः खेल , संगीत, गिणत, भाषा — हर कौशल आज भी अभ्यास से ही सधता है।

यद्यदाचरित श्रेष्ठः बड़ े, िशक्षक और पिस द्ध व्यिक्त जो करते है,ं समाज वही दोहराता है — इसिलए उनका उ त्तरदाियत्व बड़ ा है।

पुर ाणिमत्येव न साध ु कोई बात इसिलए ठीक नही ं िक पुरानी है, न इसिलए ग़ ल त िक नई है — आज के ‘सूचना-िवस्फोट’ में यही सबसे बड़ ी
सवम् कसौटी है।

सहसा िवदधीत न इंटरनेट पर पढ़ ी बात को िबना जाँचे आगे न भेजना; जल्दबाज़ ी में िनणय न ले ना।
िक्रयाम्

आचाया ने सीधा उत्तर क्य नह दया: छात्र के प्रश्न पर आचाया कहती ह — ‘भवन्तः स्वयमेव चन्तयन्तु’ (आप
स्वयं ही सो चए)। यह शक्षा-पद्ध त क सुन्दर बात है : सुभा षत का मूल्य तब समझ आता है जब वद्याथ स्वयं उसे
अपने जीवन से जोड़कर दे खे। तैयार उत्तर याद रह जाता है, पर स्वयं नकाला हुआ उत्तर आचरण बन जाता है —
और यही पूरे पाठ क माँग है।

व्याकरण: ‘सङ् क लता न दृश्यन्ते’ — कमवाच्य, √दृश् + लट् प्र.पु.ब.व. (‘ दखाई दे ते ह’)। ‘पठनाय’ तथा
‘आचरणाय’ म ताद य चतुथ है — ‘पढ़ने के लए’, ‘आचरण के लए’। ‘उपयोगी न’ = उपयो गन् (नपुंसक लङ्ग
प्रथमा बहुवचन), वशेष्य ‘सुभा षता न’ नपुंसक लङ्ग है, इस लए वशेषण भी वही रूप लेता है।

सुभा षता न — अष्टानां ोकानां व्याख्या — पृष्ठ 69–70

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत्
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प्रत्येकं ोकस्य पदच्छे दः · अन्वयः · शब्दाथः · हन्द अथः · भावः
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ोक-व्याख्या

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प्रथमस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “दृ ष्टपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पबेत्।
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प्र.1
सत्यपूतां वदे त् वाचं मनः पूतं समाचरेत्॥ १॥” (मनुस्मृ तः — ६.४६)

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दृ िष्टपूतं न्यसेत ् पादं वस्त्रपूतं जलं िपबेत ्। a
सत्यपूत ां वदे त ् वाचं मनः पूतं समाचरेत ्॥ १॥
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(मनुस्मृितः — ६.४६)
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पदच्छे दः — दृ ष्टपूतम् + न्यसेत् + पादम् + वस्त्रपूतम् + जलम् + पबेत् + सत्यपूताम् + वदे त् + वाचम् + मनःपूतम् + समाचरेत्।
a अन्वयः — दृ ष्टपूतं पादं न्यसेत्, वस्त्रपूतं जलं पबेत्, सत्यपूतां वाचं वदेत्, मनःपूतं समाचरेत्। (यही अन्वय पुस्तक ने ‘अत्र इदम्
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अवधेयम्’ म दया है।)

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पदम् शब्दाथः
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पूतम् शुद्धम् — शुद्ध िकया हुआ, छाना हुआ (√पू + क्त)

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दृ ष्ट ा पूतम् — आँख से जाँचा हुआ, दे खकर शुद्ध िकया हुआ
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दृ िष्टपूतम्

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न्यसे त ् स्थापयेत ् — रखे (िन + √अस्, िविधिलङ् )
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वस्त्रेण पूतम् — कपड़ े से छाना हआ
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वस्त्रपूतम्

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स त्येन पूताम् — स त्य से शुद्धm a
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सत्यपूताम्

वाचम् वाणीम् — वाणीaकोg
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मनसा पूतम् — मन से शुद्ध, जो मन को खरा लगे
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मनःपूतम्

स म्यक् आचरे त ् — भली-भाँित आचरण करे (सम् + आ + √चर्, िविधिलङ् ) se m
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समाचरे त ्

a s emहन्द अथ — दृ ष्ट से शुद्ध कया हुआ, अथात् देख-भालकर पैर रखे; वस्त्र से छाना हुआ जल पए; सत्य से प वत्र वाणी बोले; और
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मन से प वत्र आचरण करे — अथात् वही काम करे जसे उसका अपना मन शुद्ध ठहराता है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

भावः — चार ार, चार छ न्नयाँ। मनु ने मनुष्य के चार व्यवहार को गनकर हर एक पर एक अलग छन्नी रख द है
: चलना — आँख क छन्नी, पीना — कपड़े क छन्नी, बोलना — सत्य क छन्नी, करना — मन क छन्नी। पहले तीन
बाहर के ह और सरल ह; चौथा भीतर का है और सबसे क ठन। ध्यान द जए, क्रम भी सोचा हुआ है — स्थूल से
सूक्ष्म क ओर। जो दे खकर पैर रखना सीख गया, वह जाँचकर बोलना भी सीखेगा; और जो सत्य से वाणी छानना
सीख गया, वही अन्त म मन से कम छान सकेगा। पाठ का शीषक इसी अ न्तम चरण से लया गया है।

व्याकरण तथा जीवन-मूल्य: चार क्रयाएँ — न्यसेत्, पबेत्, वदे त्, समाचरेत् — व ध लङ् लकार, प्रथमपुरुष,
एकवचन म ह; व ध लङ् का अथ है ‘चा हए’, इस लए यह उपदे श है, वणन नह । चार समस्तपद (दृ ष्टपूतम्,
वस्त्रपूतम्, सत्यपूताम्, मनःपूतम्) तृतीया-तत्पुरुष ह — ‘दृ ा पूतम्’ इत्या द। ‘सत्यपूताम्’ तथा ‘वाचम्’ स्त्री लङ्ग
तीया एकवचन ह, क्य क ‘वाच्’ स्त्री लङ्ग शब्द है — इसी लए वशेषण भी स्त्री लङ्ग रूप लेता है। जीवनमूल्यम्
— अ हसा (दे खकर चलने से नीचे के छोटे जीव नह कुचलते), स्वास्थ्य, सत्यवचन तथा ववेक।

प्र.2 तीयस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “धृ तः क्षमा दमोऽस्तेयं शौच म न् य नग्रहः।
धी वद्या सत्यमक्रोधो दशकं धमलक्षणम्॥ २॥” (मनुस्मृ तः — ६.९२)

धृितः क्षमा दमोऽस्ते यं शौचिमिन्द यिनगहः।

धीिवद्या सत्यमक्रोधो दशकं धमलक्षणम्॥ २॥

(मनुस्मृितः — ६.९२)

पदच्छे दः — धृ तः + क्षमा + दमः + अस्तेयम् + शौचम् + इ न् य नग्रहः + धीः + वद्या + सत्यम् + अक्रोधः + दशकम् +
धमलक्षणम्।
अन्वयः — धृ तः क्षमा दमः अस्तेयं शौचम् इ न् य नग्रहः धीः वद्या सत्यम् अक्रोधः (च इ त) दशकं धमलक्षणं (भव त)।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

क्रमः धमलक्षणम् अथः व्यवहारे कथम्

१ ध ृितः धै यम्, िस्थरता क ठनाई म भी मन न डोले

२ क्षमा सहनशीलता, अपराध को माफ़ करना कसी क ग़लती पर बदला न लेना

३ दमः इिन्द याणां मनसः च िनयन्त्रणम् मन को वषय क ओर दौड़ने से रोकना

४ अस्तेयम् न स्तेयम् — चोरी न करना दूसरे क वस्तु बना पूछे न लेना, नक़ल न करना

५ शौचम् शुचेः भावः, पािवत्र्यम् शरीर, वस्त्र, स्थान तथा मन — चार क स्वच्छता

६ इिन्द यिनग हः इिन्द याणां िनगहः आँख, कान, जीभ को अनु चत क ओर न जाने दे ना

७ धीः बुिद्धः सही-ग़लत पहचानने क समझ

८ िवद्या ानम्, शास्त्र ानम् पढ़ाई तथा अनुभव से अ जत ान

९ सत्यम् यथाथवचनम् जो दे खा-जाना, वही कहना

१० अक्रोधः क्रोधस्य अभावः क्रोध आने पर भी उसे वचन-कम म न आने दे ना

हन्द अथ — धैय, क्षमा, संयम, चोरी न करना, प वत्रता, इ न् य का नग्रह, बु द्ध, वद्या, सत्य तथा अक्रोध — ये दस धम के
लक्षण ह।

भावः — धम कोई कमकाण्ड नह , दस गुण का समुच्चय है। मनु यहाँ ‘धम’ क प रभाषा पूजा-पाठ से नह ,
च रत्र से दे ते ह। सूची को ध्यान से दे खए — इसम तीन प्रकार के गुण ह : मन के (धृ त, क्षमा, अक्रोध), संयम के
(दम, अस्तेय, शौच, इ न् य नग्रह) और ान के (धी, वद्या, सत्य)। अथात् धम वही है जो मन से स्थर हो, इ न् य से
संयत हो और बु द्ध से जागरूक हो। पहले ोक ने कहा था ‘मन से प वत्र आचरण करो’; यह दूसरा ोक बताता है
क वह प वत्र आचरण दखता कैसा है — इन्ह दस लक्षण म।

स वच्छे दः (पूरी पं क्त): दमोऽस्तेयम् = दमः + अस्तेयम् ( वसगस न्ध — अः + अ → ओ, तथा अगला ‘अ’
लुप्त होकर अवग्रह ‘ऽ’ बनता है)। शौच म न् य नग्रहः = शौचम् + इ न् य नग्रहः। धी वद्या = धीः + वद्या
( वसगस न्ध — ईः + व → ईर्)। सत्यमक्रोधो दशकम् = सत्यम् + अक्रोधः + दशकम् (अक्रोधः + द → अक्रोधो
द)। अस्तेयम् तथा अक्रोधः दोन नञ्-तत्पुरुष समास ह — न स्तेयम्, न क्रोधः।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.3 तृतीयस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “यद्यदाचर त श्रेष्ठः तत्तदे वेतरो जनः। स यत्प्रमाणं
कुरुते लोकस्तदनुवतते॥ ३॥” (श्रीमद्भगव ता — ३.२१)

यद्यदाचरित श्रेष्ठः तत्तदे वेत रो जनः।

स यत्पमाणं कु रुते लोकस्तदनुवतते ॥ ३॥

(श्रीमद्भगवद्गीता — ३.२१)

पदच्छे दः — यत् + यत् + आचर त + श्रेष्ठः + तत् + तत् + एव + इतरः + जनः + सः + यत् + प्रमाणम् + कुरुते + लोकः + तत् +
अनुवतते।
अन्वयः — श्रेष्ठः यत् यत् आचर त इतरः जनः तत् तत् एव (आचर त)। सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवतते।

पदम् शब्दाथः

श्रेष्ठः उ त्तमः जनः, अगणीः — श्रेष्ठ पुरुष, अगुआ

आचरित आचरणं करोित — आचरण करता है

इतरः जनः अन्यः जनः, सामान्यजनः — दू स रा (सामान्य) व्यिक्त

पमाणम् मानद ण्डः, आदशः — कसौटी, मानक

कु रुते करोित (आत्मनेपदे ) — बनाता है, ठहराता है

लोकः जनसमूहः — समाज, लोग

अनुवतते अनुस रित — पीछे -पीछे चलता है (अनु + √वृत)्

हन्द अथ — श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरा (सामान्य) व्य क्त भी वही-वही करता है। वह जसे प्रमाण — अथात्
मानक — बना दे ता है, सारा समाज उसी का अनुसरण करता है।

भावः — बड़े का आचरण ही समाज का पाठ्यक्रम है। यह गीता का प्र सद्ध ोक है, जसम श्रीकृष्ण अजुन को
समझाते ह क श्रेष्ठ व्य क्त का हर काम केवल उसका अपना काम नह रहता — वह दूसर के लए नयम बन जाता
है। ‘यत् यत्’ और ‘तत् तत्’ क जोड़ी यही जताती है क छू ट कसी भी बात म नह है : जो-जो वह करेगा, वही-वही
लोग दोहराएँगे — अच्छा भी, बुरा भी। इसी लए बड़े होने का अथ है अ धक स्वतन्त्रता नह , अ धक उत्तरदा यत्व।
अध्यापक, माता- पता, बड़े भाई-बहन, कक्षा के मॉनीटर — सब पर यह ोक उतना ही लागू है जतना कसी राजा
पर।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

स वच्छे दः तथा व्याकरण: यद्यदाचर त = यत् + यत् + आचर त (जश्त्व — त् + य → द्य)। तत्तदे वेतरो जनः
= तत् + तत् + एव + इतरः + जनः (एव + इतरः → एवेतरः, गुण स न्ध से नह — यहाँ ‘अ + इ = ए’ गुणस है;
इतरः + जनः → इतरो जनः, वसगस न्ध)। यत्प्रमाणम् = यत् + प्रमाणम्। लोकस्तदनुवतते = लोकः + तत् +
अनुवतते ( वसगस न्ध — अः + त् → अस्त्)। ‘कुरुते’ तथा ‘अनुवतते’ दोन आत्मनेपद के रूप ह, लट् लकार,
प्रथमपुरुष, एकवचन।

प्र.4 चतुथस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “अभ्यासेन क्रयाः सवाः अभ्यासात् सकलाः
कलाः। अभ्यासाद् ध्यानमौना द कमभ्यासस्य दुष्करम्॥ ४॥” (सुभा षतरत्नभाण्डागारः)

अभ्यासेन िक्रयाः सव ः अभ्यासात् सकलाः कलाः।

अभ्यासाद् ध्यानमौनािद िकमभ्यासस्य दुष्करम्॥ ४॥
(सुभािषतरत्नभाण्डागारः)

पदच्छे दः — अभ्यासेन + क्रयाः + सवाः + अभ्यासात् + सकलाः + कलाः + अभ्यासात् + ध्यानमौना द + कम् + अभ्यासस्य +
दुष्करम्।
अन्वयः — सवाः क्रयाः अभ्यासेन ( सध्य न्त)। सकलाः कलाः अभ्यासात् ( सध्य न्त)। ध्यानमौना द (अ प) अभ्यासात् ( सध्य त)।
अभ्यासस्य दुष्करं कम् (अ स्त) ?

पदम् शब्दाथः

अभ्यासे न / अभ्यासात् पुनःपुनःकरणेन / पुनःपुनःकरणात् — बार-बार करने से (ततृ ीया = साधन, पञ्चमी = हेत)ु

िक्रयाः कम िण — काम, काय

सकलाः कलाः सव ः कलाः — सारी कलाएँ (संगीत, िचत्र, नत्ृ य आिद )

ध्यानमौनािद ध्यानं मौनम् आिद येषां तािन — ध्यान, मौन आिद साधनाएँ

दुष्करम् कतुम् अशक्यम्, किठनम् — किठन, न होने योग्य

हन्द अथ — सारे काम अभ्यास से सद्ध होते ह, सारी कलाएँ अभ्यास से सद्ध होती ह, ध्यान-मौन आ द (क ठन साधनाएँ) भी
अभ्यास से ही सद्ध होती ह — फर भला अभ्यास के लए क ठन क्या है ?

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत्
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भावः — अ न्तम पं क्त ही
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ोक क चोट है। पहली तीन पं क्तयाँ तीन उदाहरण दे ती ह और चौथी पं क्त उन्ह

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l ह, और उसका
एक प्रश्न म बदल दे ती है — ‘ कमभ्यासस्य दुष्करम्’ (अभ्यास के लए असम्भव क्या है?)। यह प्रश्न उत्तर माँगने के
. coदे ने के लए है; ऐसे प्रश्न को काव्य म ‘काकु’ या भाषा म ‘अलंका रक प्रश्न’
a gकहते
emकुछ भी क ठन नह । ध्यान द जए, उदाहरण का क्रम भी चढ़ता हुआ है : पहले साधारण क्रया, फर
लए नह , उत्तर
अथ हैs—
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aकglठन कला, फर सबसे क ठन ध्यान और मौन — जो पूरी तरह भीतर क साधना है। जब वह भी अभ्यास से
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सधती है, तो शेष कस गनती म?

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व्याकरण तथा उपयोग: ‘अभ्यासेन’ म करणे तृतीया (साधन के अथ म) और ‘अभ्यासात्’ म हेतौ / अपादाने
पञ्चमी है — क व ने एक ही बात दो वभ क्तय म कहकर पं क्त म व वधता ला द है। इसी लए अभ्यास का प्रश्न

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३ (ख) पूछता है ‘सकलाः कलाः कस्मात् सध्य न्त?’ — पञ्चमी का प्रश्न ‘कस्मात्’ ही होगा, ‘केन’ नह । स :
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अभ्यासाद् ध्यानम् = अभ्यासात् + ध्यानम् (जश्त्व — त् + ध → द्); कमभ्यासस्य = कम् + अभ्यासस्य।

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gl पञ्चमस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “प्रारभ्यते न खलु वघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य
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वघ्न वहता वरम न्त मध्याः। वघ्नैः पुनः पुनर प प्र तहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न प रत्यज न्त॥ ५॥”
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(नी तशतकम् — २७)

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पारभ्यते न खलु िवघ्नभयेन नीचै ः पारभ्य िवघ्निवहता िवरमिन्त मध्याः।
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िवघ्नै ः पुन ः पुन रिप पितहन्यमानाः पारभ्य चोत्तमजनाः न पिरत्यजिन्त॥ ५॥
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l a se (नीितशतकम् — २७)

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पदच्छे दः — प्रारभ्यते + न + खलु + वघ्नभयेन + नीचैः + प्रारभ्य + वघ्न वहताः + वरम न्त + मध्याः + वघ्नैः + पुनः + पुनः +
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अ प + प्र तहन्यमानाः + प्रारभ्य + च + उत्तमजनाः + न + प रत्यज न्त।
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अन्वयः — नीचैः वघ्नभयेन (काय) न प्रारभ्यते खलु। मध्याः (काय) प्रारभ्य वघ्न वहताः (कायात्) वरम न्त। उत्तमजनाः (काय)
प्रारभ्य वघ्नैः पुनः पुनः अ प प्र तहन्यमानाः (काय) न प रत्यज न्त।

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पदम् शब्दाथः

पारभ्यते आरम्भः िक्रयते — आरम्भ िकया जाता है (कमवाच्य)

िवघ्नभयेन िवघ्नानां भयेन — रुकावट के डर से

नीचैः अधमजनैः — अधम (िनकृ ष्ट) लोगों द्वारा

मध्याः मध्यमजनाः — बीच के दज के लोग

िवघ्निवहताः िवघ्नैः िवहताः — िवघ्नों से आहत, चोट खाए हुए

िवरमिन्त स्थगनं कु विन्त — रुक जाते है,ं छोड़ दे ते है ं

पितहन्यमानाः बािधताः — बार-बार रोके जाते हुए (पित + √हन् + यक् शानच्)

उत्तमजनाः श्रेष्ठाः जनाः — उ त्त म कोिट के लोग

न पिरत्यजिन्त न त्यजिन्त — नही ं छोड़ ते

हन्द अथ — अधम लोग वघ्न के डर से काम आरम्भ ही नह करते। मध्यम श्रेणी के लोग काम आरम्भ तो कर दे ते ह, पर वघ्न
क चोट खाकर बीच म ही छोड़ दे ते ह। उत्तम लोग काम आरम्भ करके वघ्न से बार-बार रोके जाने पर भी उसे नह छोड़ते।

भावः — वघ्न सबके आते ह; अन्तर उनके सामने के व्यवहार का है। भतृह र ने मनुष्य को तीन श्रे णय म बाँटा
है और कसौट एक ही रखी है — वघ्न। अधम वघ्न क कल्पना से ही हार जाता है (आरम्भ ही नह करता); मध्यम
वघ्न के पहले प्रहार से हार जाता है; उत्तम बार-बार प्रहार खाकर भी नह हारता। ध्यान द जए, क व यह नह
कहता क उत्तम को वघ्न नह आते — उसे तो ‘पुनः पुनर प’ आते ह, सबसे अ धक आते ह। श्रेष्ठता वघ्न के अभाव
म नह , वघ्न के बावजूद टके रहने म है।

व्याकरण तथा छन्द: यह ोक वसन्त तलका छन्द म है (प्रत्येक चरण म १४ वण) — इसी लए पं क्तयाँ लम्बी ह
और तीन प्रकार के लोग एक ही साँस म गनाए जा सके। ‘प्रारभ्यते’ कमवाच्य है, इस लए उसका कता ‘नीचैः’
तृतीया म है (कमवाच्ये कत र तृतीया)। यही कारण है क अभ्यास का प्रश्न ३ (क) ‘नीचैः’ पर प्रश्न बनवाता है और
उत्तर ‘कैः’ बनेगा। ‘प्र तहन्यमानाः’ कमवाच्य का वतमान कृदन्त है — प्र त + √हन् + यक् (कमवाच्य का चह्न) +
शानच्; अथ ‘रोके जाते हुए’। ‘ वघ्न वहताः’ तृतीया-तत्पुरुष समास है — वघ्नैः वहताः।

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प्र.6 षष्ठस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “उद्यो गनं पुरुष सहमुपै त लक्ष्मीः दै वेन दे य म त
कापुरुषा वद न्त। दै वं नहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते य द न सध्य त कोऽत्र दोषः॥ ६॥” (पञ्चतन्त्रम् —
मत्रभेदः — १४९)

उद्योिगनं पुरु षिसंहमुपैित लक्ष्मीः दै वेन दे यिमित कापुरु षा वदिन्त।

दै वं िनहत्य कु रु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृ ते यिद न िसध्यित कोऽत्र दोषः॥ ६॥

(पञ्चतन्त्रम् — िमत्रभेदः — १४९)

पदच्छे दः — उद्यो गनम् + पुरुष सहम् + उपै त + लक्ष्मीः + दै वेन + दे यम् + इ त + कापुरुषाः + वद न्त + दै वम् + नहत्य + कुरु +
पौरुषम् + आत्मशक्त्या + यत्ने + कृते + य द + न + सध्य त + कः + अत्र + दोषः।
अन्वयः — लक्ष्मीः उद्यो गनं पुरुष सहम् उपै त, दै वेन दे यम् इ त (तु) कापुरुषाः वद न्त, दै वं नहत्य पौरुषं कुरु, यत्ने कृते य द (काय)
न सध्य त, (त ह) अत्र कः दोषः (स्यात्) ?

पदम् शब्दाथः

उद्योिगनम् उ द्योगः अस्य अिस्त इित, तम् — पयत्नशील पुरुष को

पुरुषिसंहम् पुरुषः िसंहः इव, तम् — िसंह जैसे पराक्रमी पुरुष को

उपैित समीपम् आगच्छित (उप + √इ) — पास आती है

दै वम् / दै वेन िविधः, भाग्यम्, दे वस्य इदम् — भाग्य / भाग्य से

दे यम् दातव्यम् — िदया जाना चािहए

कापुरुषाः कु ित्सताः पुरुषाः — कायर, अधम पुरुष

िनहत्य अितक्रम्य — पीछे धके लकर, हराकर (िन + √हन् + ल्यप्)

पौरुषम् पुरुषस्य कम, पराक्रमः — पुरुषाथ

आत्मशक्त्या स्वसाम यन — अपनी शिक्त से

यत्ने कृ ते पयत्ने स म्पािदते सित — पयत्न कर ले ने पर (सित स प्तमी)

हन्द अथ — लक्ष्मी उद्यमी, सह जैसे पराक्रमी पुरुष के पास स्वयं आती है; ‘भाग्य से मलना चा हए’ — ऐसा तो कायर लोग
कहते ह। इस लए भाग्य को पीछे धकेलकर अपनी श क्त से पुरुषाथ करो; और य द पूरा प्रयत्न कर लेने पर भी काम सद्ध न हो, तो
इसम दोष ही क्या है ?

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भावः — भाग्य का इन्तज़ार करना कायरता है। यह ोक पञ्चतन्त्र के ‘ मत्रभेद’ तन्त्र से है और उसक शैली भी
वैसी ही सीधी है। दो पक्ष आमने-सामने रखे गए ह — उद्योगी और कापुरुष। कापुरुष कहता है ‘दै वेन दे यम्’ — जो
मलना है, भाग्य दे गा; उद्योगी ‘दै वं नहत्य’ — भाग्य को हराकर आगे बढ़ता है। सबसे सुन्दर बात अ न्तम पं क्त है :
क व सफलता क गारण्ट नह दे ता, वह कहता है क पूरा प्रयत्न कर लेने के बाद असफलता म कोई दोष नह ।
अथात् मनुष्य का उत्तरदा यत्व प्रयत्न तक है, फल तक नह — यही बात गीता भी ‘कमण्येवा धकारस्ते’ म कहती है।

व्याकरण, समास तथा छन्द: छन्द वसन्त तलका। ‘पुरुष सहम्’ उपमानोत्तरपद कमधारय समास है — पुरुषः
सहः इव ( सह जैसा पुरुष); इसी लए अभ्यास का प्रश्न ९ (ग) इसी का वग्रह दे कर समस्तपद पूछता है। ‘कापुरुषाः’
म ‘कु/का’ उपसग नन्दा के अथ म है — कु त्सताः पुरुषाः (कमधारय)। ‘यत्ने कृते’ स त सप्तमी (भावे सप्तमी) है
— ‘प्रयत्न कर लए जाने पर’। ‘कोऽत्र’ = कः + अत्र ( वसगस न्ध, अः + अ → ओऽ)। ‘उपै त’ = उप + ए त (वृ द्ध
स न्ध — अ + ए → ऐ)।

प्र.7 सप्तमस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “पुराण मत्येव न साधु सव न चा प काव्यं
नव मत्यवद्यम्। सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबु द्धः॥ ७॥” (माल वका ग्न मत्रम् — १.२)

पुराणिमत्येव न साधु सव ं न चािप काव्यं नविमत्यवद्यम्।

सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भ जन्ते मूढः परपत्ययने यबुिद्धः॥ ७॥

(मालिवकािग्निमत्रम् — १.२)

पदच्छे दः — पुराणम् + इ त + एव + न + साधु + सवम् + न + च + अ प + काव्यम् + नवम् + इ त + अवद्यम् + सन्तः + परीक्ष्य +
अन्यतरत् + भजन्ते + मूढः + परप्रत्ययनेयबु द्धः।
अन्वयः — पुराणम् इ त सव साधु न (वतते), काव्यं नवम् इ त अवद्यं न (वतते), सन्तः परीक्ष्य अन्यतरत् भजन्ते, मूढः
परप्रत्ययनेयबु द्धः (भव त)।

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पदम् शब्दाथः

पुर ाणम् पुरातनम् — पुराना

साध ु उ त्तमम्, समीचीनम् — अच्छा, ठीक

नवम् नूतनम् — नया

अवद्यम् न वद्यम् — िनन्दनीय, िनम्नस्तरीय

सन्तः स ज्जनाः — स ज्जन, िववेक ी लोग

परीक्ष्य परीक्षां कृ त्वा — जाँच-परखकर

अन्यतरत् द्वयोः एकम् — दोनों में से जो (ठीक हो) वह

भजन्ते स्वीकु विन्त — स्वीकार करते है,ं अपनाते है ं

मूढः मूखः — मूख

परपत्ययनेयबुिद्धः परपत्ययेन नेया बुिद्धः यस्य सः — िजसकी बुिद्ध दू स रों के भरोसे चलाई जाती है

हन्द अथ — कोई रचना केवल इस लए अच्छ नह हो जाती क वह पुरानी है, और न कोई काव्य केवल इस लए नन्दनीय है क
वह नया है। सज्जन लोग परीक्षा करके दोन म से (जो उत्तम हो) उसी को अपनाते ह; मूख वही है जसक बु द्ध दूसर क राय के
सहारे चलती है।

भावः — कसौट न पुरानापन है, न नयापन; कसौट परीक्षा है। यह ोक का लदास के नाटक
माल वका ग्न मत्रम् क प्रस्तावना का है, जहाँ सूत्रधार से पूछा जाता है क भास जैसे पुराने क वय को छोड़कर
का लदास जैसे नए क व का नाटक क्य खेला जा रहा है। उत्तर यही ोक है। दो झूठ कसौ टयाँ यहाँ एक साथ
तोड़ी गई ह — ‘पुराना है इस लए ठ क’ और ‘नया है इस लए ग़लत’। सज्जन इनम से कसी पर नह चलते; वे
परीक्ष्य — जाँचकर — चुनते ह। और जो स्वयं नह जाँचता, दूसर के कहे पर चलता है, क व उसे मूख कहता है —
क्य क उसक बु द्ध उसक अपनी है ही नह । आज के समय म, जब कोई भी बात क्षण भर म सबके पास पहुँच
जाती है, यह ोक और भी काम का है।

व्याकरण, समास तथा छन्द: छन्द उपजा त। स : पुराण मत्येव = पुराणम् + इ त + एव (यण् स न्ध — इ + ए
→ य्ए); नव मत्यवद्यम् = नवम् + इ त + अवद्यम्; परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते = परीक्ष्य + अन्यतरत् + भजन्ते (द घ स न्ध
तथा जश्त्व)। समास: ‘अवद्यम्’ नञ्-तत्पुरुष है (न वद्यम्; व्युत्प त्त न + वद् + यत्); ‘परप्रत्ययनेयबु द्धः’ बहु ी ह
है — ‘परप्रत्ययेन नेया बु द्धः यस्य सः’, अथात् वह पद स्वयं बु द्ध का नह , बु द्ध वाले व्य क्त का बोध कराता है,
इसी लए वह ‘मूढः’ का वशेषण बनकर आया है। ‘परीक्ष्य’ = प र + √ईक्ष् + ल्यप् — ‘जाँचकर’।

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ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “सहसा वदधीत न क्रयाम ववेकः परमापदां

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पदम्। वृणते ह वमृश्यका रणं गुणलु ाः स्वयमेव सम्पदः॥ ८॥” ( कराताजुनीयम् — २.३०)

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सहसा िवदधीत न िक्रयामिववेक ः परमापदां पदम्।
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ृवणते िह िवमृश्यकािरणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥
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(िकराताजुनीयम् — २.३०) agl

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पदच्छे दः — सहसा + वदधीत + न + क्रयाम् + अ ववेकः + परम् + आपदाम् + पदम् + वृणते + ह + वमृश्यका रणम् +

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गुणलु ाः + स्वयम् + एव + सम्पदः।
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अन्वयः — .क्रयां a g स्वयमेव वमृश्यका रणं वृणते।
c सहसा न वदधीत, अ ववेकः परम् आपदां पदम् (भव त), ह गुणलु ाः सम्पदः
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ag पदम् शब्दाथः

अक स्मात्, अिवचाय — अचानक , िबनाmसोचे a s
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सहसा

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िवदधीत कु य त् — करना चािहए

िक्रयाम् कम, कायम् — काम को

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न िववेक ः — िबना सोचे-समझे काम करना
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अिववेक ः

परम् .co
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श्रेष्ठम्, अत्यन्तम् — सबसे बड़ ा a
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agl आपदाम् िवपत्तीनाम् — िवपित्तयों का

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स्थानम् — घर , िठकाना
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पदम्

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आश्रयन्ते, वरणं कु वeिन्तm— वरण करती है,ं आश्रय ले ती है ं a g
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वृणते

िवम ृश्यकािरणम् यः िचन्तिय
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a त्वा काय ं करोित, तम् — सोच-िवचारकर काम करने वाले को

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ु लुब्धाः गुणेष ु लुब्धाः, गुणानाम् अिभलािषण्यः — गुणों की चाह रखने वाली
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ऐ श्वयम्, स म्पत्तयः — स म्पित्तयाँ
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सम्पदः

a s emहन्द अथ — कोई भी काम जल्दबाज़ी म नह करना चा हए, क्य क अ ववेक ( बना सोचे काम करना) वप त्तय का सबसे बड़ा
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घर है। गुण क चाह रखने वाली सम्प त्तयाँ तो सोच- वचारकर काम करने वाले पुरुष का स्वयं ही वरण कर लेती ह।

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भावः — जल्दबाज़ी वप त्त को बुलावा है, वचार सम्प त्त को। ोक क रचना बहुत कसी हुई है : पहला आधा
नषेध है (क्या न कर — सहसा काम) और उसका कारण दे ता है (अ ववेक वप त्तय का ठकाना); दूसरा आधा
व ध है (क्या कर — वमृश्य काम) और उसका फल दे ता है (सम्प त्त स्वयं आती है)। सबसे सुन्दर कल्पना
‘गुणलु ाः सम्पदः वृणते’ है — यहाँ सम्प त्तय को स्त्रय के रूप म क ल्पत कया गया है जो गुण क लोभी ह और
स्वयंवर म वचारशील पुरुष को वर लेती ह। इस मानवीकरण से बात याद रह जाती है : धन को ख चना नह पड़ता,
गुण हो तो वह स्वयं आता है। यही बात छठे ोक म ‘उद्यो गनं पुरुष सहमुपै त लक्ष्मीः’ म भी थी — वहाँ उद्योग
ख चता है, यहाँ ववेक।

व्याकरण, समास तथा छन्द: छन्द वयो गनी (सुन्दरी) — वषम वृत्त, जसम पहले-तीसरे चरण छोटे और दूसरे-
चौथे बड़े होते ह। स : क्रयाम ववेकः = क्रयाम् + अ ववेकः; परमापदाम् = परम् + आपदाम् (द घ स न्ध);
स्वयमेव = स्वयम् + एव। समास: ‘अ ववेकः’ नञ्-तत्पुरुष; ‘गुणलु ाः’ सप्तमी-तत्पुरुष (गुणेषु लु ाः);
‘ वमृश्यका रणम्’ उपपद-तत्पुरुष ( वमृश्य करो त इ त वमृश्यकारी, तम्)। ‘ वदधीत’ आत्मनेपद व ध लङ्
प्र.पु.ए.व. है — इसी लए अभ्यास के प्रश्न ३ (च) म उसी वाक्य पर प्रश्न बनाना है। ‘ ह’ अव्यय यहाँ ‘क्य क / नश्चय
ही’ के अथ म है।

सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 70–73
एकोन त्रशत् पदानां शब्दाथ-ता लका तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त रक्तस्तम्भस्य पू तः

कायकलापः

प्र.1 ‘सव शब्दे न भासते’ इ त ता लकायाः अ न्तमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अथ लखत’ — रक्तः अ स्त। पाठे
प्रयुक्तानां सवषां पदानाम् अथान् ात्वा तं स्तम्भं पूरयत।

पुस्तक ने इस ता लका का अ न्तम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा है — वद्याथ को हर शब्द का अथ अपनी मातृभाषा म लखना
है। नीचे पूरी ता लका (उनतीस पद) द है और वह स्तम्भ हन्द म भर दया गया है। जनक मातृभाषा मराठ , बाङ् ग्ला, गुजराती,
त मऴ, तेलुगु, कन्नड, ओ ड़आ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अथ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रख।

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शब्दः अथः हन्द ENGLISH मातृभाषया अथम्
(संस्कृतम्) (भरा हुआ —
हन्द )

अनुवतते (अनु + √वृत,् अनुसर त अनुसरण करता है Follows पीछे -पीछे चलता है,
लट् .प.पु.ए.व.) वैस ा ही करने लगता है

अवद्यम् (नञ्-तत्पुरुषः, न वद्यम् नम्नस्तरीय Inferior िनन्दा के योग्य, घिटया
न+वद् +यत्)

अस्तेयम् (नञ्-तत्पुरुषः, न स्तेयम् चोरी न करना Not stealing पराया धन न ले ना,
नपुं.प.ए.व.) चोरी से बचना

आपदाम् (स्त्री.ष.ब.व.) वपत्तीनाम् खतर का Of dangerous िवपित्तयों का, मुस ीबतों
का

उद्योिगनम् (पुं.िद्व.ए.व.) उद्योगः अस्य अ स्त प्रयत्न करने वाले Industrious मेहनती को, उ द्यमी को
इ त, तम् को

कापुरुषाः कु त्सताः पुरुषाः कायर / अधम Cowards डरपोक लोग, नीच
(कमधारयसमासः, पुरुष
पुं.प.ब.व.)

गण
ु लुब्धाः (सप्तमीतत्पुरुषः, गुणानाम् गुण को चाहने वाले Those who desire गुणों के लोभी, गुण
पुं.प.ब.व.) अ भला षणः, good qualities दे खकर आने वाले
गुणेषु लु ाः

दमः (पुं.प.ए.व.) इ न् याणां मनसः च इ न् य एवं मन को Controlling senses आत्म-संयम, मन पर
नयन्त्रणम् वश म करना काबू

दै वम् (नपु.ं प.ए.व.) व धः / भाग्यम्, भाग्य Luck िक स्मत, नसीब,
दे वस्य इदम् होनहार

िनहत्य (िन + √हन् + ल्यप्) अ तक्रम्य अ तक्रमण करके Having crossed पीछे धके लकर, हराकर

नीचैः (कमवाच्ये, त.ृ ब.व.) अधमजनैः अधम लोग ारा By inferior people नीच लोगों के द्वारा, हीन
पकृ ित के लोगों से

न्यसे त ् (िन + √अस् + स्थापयेत् रखे Should place रखना चािहए , िटकाना
िविध, प.पु.ए.व.) चािहए

पदम् (नपु.ं प.ए.व.) स्थानम् स्थान Place िठकाना, जगह, घर

पुर ाणम् (नपुं.प.ए.व.) पुरातनम् पुराना Old पाचीन, पहले का

पूतम् (√पू + क्त, शुद्धम् शुद्ध Cleansed छाना हुआ, साफ़ िकया
नपुं.प.ए.व.) हुआ, पिवत्र

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परपत्ययनेयबुिद्धः (बहुवीिहः, परप्रत्ययेन नेया दूसर के ारा One who is जो अपनी अक्ल से
स्त्री.प.ए.व.) बु द्धः यस्य सः नद शत बु द्ध वाला influenced by the नही,ं दू स रों के कहे पर
thinking of others चलता है

पितहन्यमानाः (पित + √हन् बा धताः बा धत Obstructed बार-बार रोके जाते हुए ,
+ यक् शानच्, पुं.प.ब.व.) टकराते हएु

भजन्ते (√भज् + लट् , स्वीकुव न्त स्वीकारते ह Accept अपना ले ते है,ं गहण
प.पु.ब.व.) करते है ं

मूढः (पुं.प.ए.व.) मूखः मूख Fool नासमझ, बुिद्धहीन

यत्ने (पुं.स.ए.व.) श्रमे यत्न म By doing effort पयत्न कर ले ने पर,
मेहनत में

वाचम् (स्त्री.िद्व.ए.व.) वाणीम् वाणी को Speech बोली को, बात को

िवदधीत (िव + √धा + कुयात् करना चा हए Should be done करे , कर डाले
िविधिलङ् , प.पु.ए.व.) (‘चािहए ’ के अथ में)

िवघ्निवहताः (ततृ ीया- वघ्नैः वहताः वघ्न से हत Struck by obstacles रुकावटों की चोट खाए
तत्पुरुषः, पुं.प.ब.व.) हुए

िवम ृश्यकािरणम् (पुं.िद्व.ए.व.) यः चन्त यत्वा काय भली-भाँ त चन्तन One who acts सोच-समझकर काम
करो त, तम् करके काय करने thoughtfully करने वाले को
वाले को

िवरमिन्त (िव + √रम् + स्थगनं कुव न्त छोड़ते ह Leave बीच में ही रुक जाते है,ं
लट् , प.पु.ब.व.) हाथ खी ंच ले ते है ं

वृणते (√वृ + लट् , प.ब.व.) आश्रयन्ते आश्रय लेते ह Take refuge वरण कर ले ती है,ं स्वयं
चुन ले ती है ं

शौचम् (नपुं.प.ए.व.) शुचेः भावः, प वत्रता Purity स्वच्छता — तन, मन
पा वत्र्यम् तथा स्थान की

सन्तः (प.ब.व.) सज्जनाः सज्जन लोग Great people भले लोग, िववेक ी लोग

सम्पदः (स्त्री.प.ब.व.) ऐश्वयम् सम्प त्त Wealth धन-स म्पदा, समृिद्ध

नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं म) — मराठ : पूतम् = ‘शुद्ध / गाळलेले’, दै वम् = ‘नशीब’, मूढः = ‘मूख’,
सम्पदः = ‘संपत्ती’। बाङ् ग्ला: वाचम् = ‘कथा/वाणी’, सन्तः = ‘सज्जन लोकेरा’, पदम् = ‘स्थान’। गुजराती:
उद्यो गनम् = ‘महेनतु ने’, आपदाम् = ‘आफतो नुं’। त मऴ: पुराणम् = ‘पऴमै’, नवम् = ‘पु दय’। अपनी भाषा म
लखते समय ध्यान र खए क अथ वही रहे जो संस्कृत स्तम्भ म दया है, और वभ क्त का भाव भी सुर क्षत रहे
(जैसे ‘आपदाम्’ = ‘का/क ’, ‘उद्यो गनम्’ = ‘को’)।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

यह स्तम्भ क्य रखा गया: संस्कृत का शब्द जब अपनी मातृभाषा के शब्द से जुड़ जाता है, तभी वह याद रहता है।
इस ता लका के अनेक पद तो अ धकांश भारतीय भाषाओं म ज्य के त्य चलते ह — ‘शौच’, ‘क्षमा’, ‘दै व’,
‘सम्पदा’, ‘मूढ’, ‘ वद्या’, ‘सत्य’। इन्ह पहचान लेने पर शेष क ठन पद (परप्रत्ययनेयबु द्धः, प्र तहन्यमानाः,
वमृश्यका रणम्) भी टु कड़े-टु कड़े करके खुल जाते ह।

ता लका पढ़ते समय दो बात ध्यान म र खए: (१) ‘आपदाम्’ के सामने अंग्रेज़ी म Of dangerous छपा है;
व्याकरण क दृ ष्ट से वहाँ Of dangers / Of calamities होना चा हए — संस्कृत स्तम्भ ‘ वपत्तीनाम्’ ही
ठ क अथ दे ता है। (२) ‘परप्रत्ययनेयबु द्धः’ के सामने ‘स्त्री.प्र.ए.व.’ छपा है, क्य क समास का अ न्तम पद ‘बु द्धः’
स्त्री लङ्ग है; पर बहु ी ह होने से यह पद ‘मूढः’ का वशेषण है और ोक म पुं लङ्ग ही समझा जाएगा — बहु ी ह
का लङ्ग वशेष्य से आता है, अ न्तम पद से नह । (३) पद का क्रम अकारा द है, पर ‘परप्रत्ययनेयबु द्धः’ ‘पूतम्’ के
बाद छपा है; वणक्रम से वह ‘पदम्’ के ठ क बाद आना चा हए था।

अत्र इदम् अवधेयम् ( ोकानाम् अन्वयः) — पृष्ठ 73
पुस्तकेन प्रदत्तः अष्टानां ोकानाम् अन्वयः — तस्य उपयोगः

अत्र इदम् अवधे य म्

प्र.1 ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ इ त खण्डे कम् दत्तम् अ स्त ? तस्य कः उपयोगः ? अन्वयस्य नमाणस्य नयमान् उदाहरणेन
सह लखत।

उत्तरम् — ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ इ त खण्डे पाठस्य अष्टानां ोकानाम् अन्वयः दत्तः अ स्त। ोके पदा न छन्दसः
अनुरोधात् इतस्ततः ा पता न भव न्त; अन्वये ता न एव पदा न गद्यक्रमेण यो जता न स न्त, केचन अध्याहृतशब्दाः च
कोष्ठके दत्ताः। अनेन ोकस्य अथः सुगमः भव त।
( हन्द — इस खण्ड म पाठ के आठ ोक का अन्वय दया गया है। ोक म पद छन्द के कारण इधर-उधर रखे होते ह; अन्वय म
वही पद गद्य के क्रम म जमा दए जाते ह और जो शब्द ोक म छू ट गए ह वे कोष्ठक म जोड़ दए जाते ह। इससे ोक का अथ
सरलता से खुल जाता है।)
अन्वय बनाने के नयम —

1. पहले कता (प्रथमा वभ क्त का पद) र खए, फर उसके वशेषण।
2. फर कम ( तीया), फर करण/सम्प्रदान/अपादान/सम्बन्ध/अ धकरण के पद — अथ के क्रम से।
3. अन्त म क्रयापद र खए। संस्कृत गद्य म क्रया प्रायः वाक्य के अन्त म आती है।
4. अव्यय (न, खलु, ह, एव, अ प, तु) उसी पद के साथ रह जसका वे अथ बदलते ह।
5. जो क्रया या पद ोक म लुप्त हो पर अथ के लए चा हए, उसे कोष्ठक म जो ड़ए — जैसे (अ स्त), (भव त), ( सध्य न्त),
(कायम्)।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत्
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ोकः ोक-क्रमः (जैसा छपा है) अन्वय-क्रमः (पुस्तक का)

m दृ िष्टपूतं पादं न्यसे त ् — कम ‘पादम्’ िक्रया से पहले आ गयाlas
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१ दृ िष्टपूतं न्यसे त ् पादम्

a semतत्तदे वेतरो जनः
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३ इतरः जनः तत् तत् एव (आचरित) — कत पहले , लुप्त िक्रया कोष्ठक में

४ अभ्यासे न िक्रयाः सव ः सव ः िक्रयाः अभ्यासे न (िस ध्यिन्त) — िवशेषण ‘सव ः’ िवशेष्य से पहले , िक्रया जोड़ ी गई
m
नीचैः िवघ्नभये.नc(oकाय)ं न पारभ्यते खलु — कमवाच्य का कत ‘नीचैः’ पहले ag
sem
५ पारभ्यते न खलु िवघ्नभयेन नीचैः

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८ सहसा िवदधीत न िक्रयाम्
agिlक्रयां सहसा न िवदधीत — कम पहले , िक्रया अन्त में

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अन्वय क्य सीखना चा हए: ोक का अथ तब तक नह खुलता जब तक यह न पता चले क कौन-सा पद कस

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comइस बात क है क आपने l
पद से जुड़ा है। अन्वय यही जोड़ दखाता है। इसी लए अभ्यास का प्रश्न ६ सीधे अन्वय म रक्तस्थान भरवाता है —
. g गया, वह भूला हुआ पद
ोक रटा है या समझा है। जो पद-सम्बन्धaसमझ
m -आप भर दे गा।
eअपने
अथात् परीक्षा
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भी
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ध्यान द: इस पाठ म ‘भावाथः’ खण्ड नह है — जो अन्य पाठ म ोक का संस्कृत सारांश दे ता है। यहाँ उसक

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जगह अन्वय दया गया है, क्य क पाठ सुभा षतm का सङ् कलन है और हर सुभा षत अपने-आप म पूण है; उसे
a से कहने क नह ।
केवल क्रम म लगाने क आवश्यकता है, lफर
ag

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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 74
. coप्रदत्तानां a g
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s जायते स द्धः
प्रश्न १ — अधः प्रश्नानां पूणवाक्येन उत्तरं लखत

g l aअभ्यासाद्
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com g l a
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लोकः कस्य आचरणम् अनुकरो त ?
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प्र.1 (क)

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उत्तर agl
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उत्तरम् — लोकः श्रेष्ठस्य (जनस्य) आचरणम् अनुकरो त।

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( हन्द — समाज श्रेष्ठ पुरुष के आचरण का अनुकरण करता है।)

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m पाठ की पंिक्त — यद्यदाचरित श्रेष्ठः तत्तदे वेतरो जनः a g
l a se
ag तथा — स यत्पमाणं कु रुते लोक स्तदनुवत ते
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पश्न ‘कस्य’ = षष्ठी · एकवचन → उत्तर भी षष्ठी में — श्र ेष्ठस्य

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नयम तथा कारण: ‘आचरणम्’ जसका है, उसम सम्बन्धे षष्ठी होती है — इसी लए ‘श्रेष्ठस्य आचरणम्’। ोक ३
ठ क यही कहता है : श्रेष्ठ जो करता है, इतर जन वही करते ह, और वह जसे प्रमाण बनाता है, समाज उसी के पीछे
चलता है। ‘अनुवतते’ तथा ‘अनुकरो त’ दोन का भाव एक ही है — पीछे -पीछे चलना।

पूणवाक्य कैसे बनाएँ: प्रश्न के शब्द ही उत्तर का ढाँचा दे दे ते ह। ‘लोकः … आचरणम् अनुकरो त’ ज्य का त्य
र खए और ‘कस्य’ के स्थान पर ‘श्रेष्ठस्य’ रख द जए। केवल ‘श्रेष्ठस्य’ लख दे ना एकपदे न उत्तर होगा — यहाँ
पूणवाक्य माँगा गया है।

प्र.1 (ख) क दृशी वाणी वक्तव्या ?

उत्तरम् — सत्यपूता वाणी वक्तव्या।
( हन्द — सत्य से प वत्र क हुई वाणी बोलनी चा हए।)

पाठ की पंिक्त — सत्यपूत ां वदे त ् वाचम् (श्लोक १)
‘कीदृ शी’ = स्त्रीिलङ् ग · पथमा · एकवचन (गुण/स्वरूप पूछता है)

अतः उत्तर का िवशेषण भी स्त्रीिलङ् ग पथमा में — सत्यपूत ा

वभ क्त क्य बदली: ोक म ‘सत्यपूतां वाचम्’ तीया म है, क्य क वहाँ ‘वदे त्’ का कम है। प्रश्न म ‘वक्तव्या’
(कृत्य प्रत्ययान्त) है, जसके साथ कम प्रथमा म आता है — इस लए उत्तर ‘सत्यपूता वाणी’ बनेगा, ‘सत्यपूतां
वाणीम्’ नह । यही अन्तर दे खने के लए यह प्रश्न रखा गया है।

भाव: ‘सत्यपूता’ = सत्येन पूता — सत्य क छन्नी से छनी हुई। जैसे जल वस्त्र से छानकर पीते ह, वैसे ही बात सत्य
से छानकर बोलनी चा हए। बोलने से पहले तीन बात जाँ चए — क्या यह सच है ? क्या यह आवश्यक है ? क्या
यह कसी को दुख तो नह दे गा ?

प्र.1 (ग) लक्ष्मीः कम् उपै त ?

उत्तरम् — लक्ष्मीः उद्यो गनं पुरुष सहम् उपै त।
( हन्द — लक्ष्मी उद्यमी, सह जैसे पराक्रमी पुरुष के पास जाती है।)

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पाठ की पंिक्त — उद्य ोिगनं पुरु षिसंहमुपैित लक्ष्मीः (श्लोक ६)

‘कम्’ = पुंिलङ् ग · िद्वतीया · एकवचन

अतः उत्तर भी िद्वतीया में — उद्य ोिगनं पुरु षिसंहम्

यहाँ तीया क्य : ‘उपै त’ (उप + √इ) यहाँ सकमक क तरह प्रयुक्त है — ‘के पास जाती है’; जसके पास जाती
है, वह कम है, इस लए तीया। ‘उपै त’ का शब्दाथ पुस्तक ‘समीपम् आगच्छ त’ दे ती है — यही अथ अभ्यास के
प्रश्न ५ (क) के भावाथ म भी आया है।

ध्यान द: उत्तर म दोन वशेषण र खए — ‘उद्यो गनम्’ (उद्यमी) तथा ‘पुरुष सहम्’ ( सह-सा पराक्रमी)। क व ने
दोन जान-बूझकर रखे ह : केवल प रश्रम पयाप्त नह , उसम सह जैसा साहस भी चा हए। ‘पुरुष सहम्’ का वग्रह
है — पुरुषः सहः इव, तम् (अभ्यास प्रश्न ९ (ग) म यही पूछा गया है)।

प्र.1 (घ) उत्तमजनाः काय प्रारभ्य क न कुव न्त ?

उत्तरम् — उत्तमजनाः काय प्रारभ्य वघ्नैः पुनः पुनः प्र तहन्यमानाः अ प तत् काय न प रत्यज न्त।
( हन्द — उत्तम लोग काम आरम्भ करके, वघ्न से बार-बार रोके जाने पर भी, उस काम को नह छोड़ते।)

पाठ की पंिक्त — िवघ्नै ः पुन ः पुन रिप पितहन्यमानाः पारभ्य चोत्तमजनाः न पिरत्यजिन्त (श्लोक ५)

पश्न में ‘िकं न कु विन्त’ — अथ त् वे क्या नही ं करते

उत्तर — काय ं न पिरत्यजिन्त (काम नही ं छोड़ ते )

तीन श्रे णय म अन्तर: ोक तीन प्रकार के लोग गनाता है — अधम वघ्न के डर से आरम्भ ही नह करते;
मध्यम आरम्भ करके वघ्न क चोट खाकर रुक जाते ह ( वघ्न वहता वरम न्त मध्याः); और उत्तम बार-बार चोट
खाकर भी नह छोड़ते। ध्यान द जए, उत्तम को वघ्न कम नह आते — ‘पुनः पुनर प’ अथात् सबसे अ धक आते ह।
अन्तर वघ्न म नह , वघ्न के सामने के व्यवहार म है।

व्याकरण: ‘प्रारभ्य’ = प्र + आ + √रभ् + ल्यप् (‘आरम्भ करके’)। ‘प्र तहन्यमानाः’ कमवाच्य का वतमान कृदन्त है
— प्र त + √हन् + यक् + शानच्, पुं.प्र.ब.व.; इसका कता ‘ वघ्नैः’ तृतीया म है (कमवाच्ये कत र तृतीया)।

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प्र.1 (ङ) धमस्य लक्षणा न का न ?

उत्तरम् — धृ तः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इ न् य नग्रहः, धीः, वद्या, सत्यम्, अक्रोधः च — एता न दश धमस्य
लक्षणा न स न्त।
( हन्द — धैय, क्षमा, संयम, चोरी न करना, प वत्रता, इ न् य नग्रह, बु द्ध, वद्या, सत्य तथा अक्रोध — ये दस धम के लक्षण ह।)

पाठ की पंिक्त (श्लोक २) —

धृितः क्षमा दमोऽ स्ते यं शौचिमिन्द यिनगहः।
धीिवद्य ा सत्यमक्र ोधो दशकं धमलक्षणम्॥
‘दशकम्’ = दश अवयवाः यस्य तत् → दस का समूह

‘दशकम्’ शब्द पर ध्यान द जए: मनु ने दस गुण गनाकर उन्ह एक शब्द म बाँध दया — ‘दशकं धमलक्षणम्’,
अथात् ये दस अलग-अलग नयम नह , धम का एक ही दस-अंग वाला स्वरूप है। इसी लए उत्तर म दस नाम गनाना
आवश्यक है; तीन-चार गनाकर छोड़ दे ना अधूरा उत्तर होगा। गनती याद रखने के लए इन्ह तीन समूह म बाँट
ली जए — मन के तीन (धृ त, क्षमा, अक्रोध), संयम के चार (दम, अस्तेय, शौच, इ न् य नग्रह), बु द्ध के तीन (धी,
वद्या, सत्य)।

ध्यान द: उत्तर लखते समय स न्ध खोलकर ल खए — ‘दमोऽस्तेयम्’ नह , ‘दमः, अस्तेयम्’; ‘धी वद्या’ नह , ‘धीः,
वद्या’; ‘सत्यमक्रोधः’ नह , ‘सत्यम्, अक्रोधः’। गनाते समय पद अलग-अलग प्रथमा म रहगे।

प्र.1 (च) सकलाः कलाः कस्मात् सध्य न्त ?

उत्तरम् — सकलाः कलाः अभ्यासात् सध्य न्त।
( हन्द — सारी कलाएँ अभ्यास से सद्ध होती ह।)

पाठ की पंिक्त — अभ्यासात् सकलाः कलाः (श्लोक ४)

‘कस्मात्’ = पञ् चमी · एकवचन

अतः उत्तर भी पञ्चमी में — अभ्यासात् (‘अभ्यासेन ’ नही ं)

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यहाँ पञ्चमी क्य , तृतीया क्य नह : ोक क पहली पं क्त म क व ने दोन वभ क्तयाँ रखी ह — ‘अभ्यासेन
क्रयाः सवाः’ (करणे तृतीया — साधन) और ‘अभ्यासात् सकलाः कलाः’ (हेतौ पञ्चमी — कारण)। प्रश्न ‘कस्मात्’
पूछता है, इस लए उसी पं क्त का पञ्चमी वाला रूप लेना है। य द प्रश्न ‘केन’ होता तो उत्तर ‘अभ्यासेन’ बनता। प्रश्न
का प्रश्नवाचक ही उत्तर क वभ क्त तय करता है — यही इस अभ्यास का असली पाठ है।

जोड़कर दे खए: यही वाक्य अभ्यास के प्रश्न ३ (ख) म भी है, जहाँ ‘अभ्यासात्’ रेखां कत है और उसी पर प्रश्न
बनाना है — उत्तर वही ‘कस्मात्’ बनेगा। दोन प्रश्न एक ही सूत्र के दो सरे ह।

प्र.1 (छ) सम्पदः कं वृणते ?

उत्तरम् — सम्पदः वमृश्यका रणं (पुरुषं) वृणते।
( हन्द — सम्प त्तयाँ सोच- वचारकर काम करने वाले पुरुष का वरण करती ह।)

पाठ की पंिक्त — वृणते िह िवमृश्यकािरणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः (श्लोक ८)

‘कम्’ = पुंिलङ् ग · िद्वतीया · एकवचन

‘िवमृश्यकािरन्’ → िद्वतीया एकवचन िवमृश्यकािरणम् (नकारान्त, ‘गुिणन् → गुिणनम्’ इव)

शब्द कैसे बना और क्य यही उत्तर: ‘ वमृश्यकारी’ = वमृश्य (सोचकर) + कारी (करने वाला) — उपपद-तत्पुरुष
समास। ोक का पूरा तक यही है : पहले आधे म कहा ‘सहसा काम मत करो, अ ववेक वप त्तय का घर है’; दूसरे
आधे म उसका उल्टा फल दखाया — सोचकर काम करने वाले को सम्प त्त स्वयं वरती है। ‘स्वयमेव’ शब्द इसी बल
के लए है — उसे धन के पीछे भागना नह पड़ता।

सुन्दर कल्पना: ‘सम्पदः … वृणते’ म सम्प त्तय को स्वयंवर करती हुई कन्याओं के रूप म क ल्पत कया गया है, जो
‘गुणलु ाः’ — गुण क लोभी — ह। ‘वृणते’ का सामान्य अथ ‘आश्रय लेना/चुनना’ है, पर ववाह-प्रसंग म उसका
अथ ‘वरण करना’ ही होता है। यही चत्र ोक ६ म भी था, जहाँ लक्ष्मी स्वयं उद्योगी के पास आती है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 74

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत्
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प्रश्न २ — अधो ल खतेषु ोकांशेषु रक्त ाना न पूरयत
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अभ्यासाद् जायते स द्धः

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a s em…………………………………… परमापदां पदम्।
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उत्तरम् — सहसा वदधीत न क्रयाम ववेकः परमापदां पदम्
a क वप त्तय का सबसे बड़ा घर है।)
( हन्द — जल्दबाज़ी म काम नह करना चा हए; अlववे
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पूरा श्लोकाश
ं (श्लोक ८, िकराताजुन ीयम् २.३०) —

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सहसा िवदधीत न ि यामिववेक ः परमापदां पदम्।
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पदच्छे द ः — सहसा + िवदधीत + न + िक्रयाम् + अिववेक ः + परम् + आपदाम् + पदम्

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रक्त ान कैसे पहचाना: जो अंश दया है — ‘परमापदां पदम्’ — वह वधेय है (‘ वप त्तय का सबसे बड़ा घर’)।

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वधेय है तो उ े श्य कहाँ है ? वही रक्त है — ‘अ ववेकः’। और उससे पहले जो नषेध-वाक्य है (‘सहसा वदधीत न

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क्रयाम्’) वही अ ववेक क व्याख्या करता है। इस प्रकार कता खोजो — यही रक्तस्थान-पू त क पहली यु क्त है।
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स : क्रयाम ववेकः = क्रयाम् + अ ववेकः; परमापदाम् = परम् + आपदाम् (द घ स न्ध — अ + आ = आ)।

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‘परम्’ यहाँ ‘सबसे बड़ा / परम’ के अथ म ‘पदम्’ का वशेषण है।
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ag सन्तः …………………………………… अन्यतरद् भजन्ते।
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प्र.2 (ख)

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उत्तरम् — सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते।
( हन्द — सज्जन लोग परीक्षा करके दोन म से (जो उत्तम हो) उसी को अपनाते ह।)

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पूरा श्लोकांश (श्लोक ७, मालिवकािग्निमत्रम् १.२) —

m .सcoन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परपत्ययने यबुिद्धः॥ a g
l a se
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सिन्धिवच्छे द ः — परीक्ष्य + अन्यतरत् + भजन्ते
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‘परीक्ष्य’ ही क्य : इस ोक क पूरी बात एक ही शब्द पर टक है। पहले दो चरण दो झूठ कसौ टयाँ हटाते ह —

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पुराना होने से कुछ अच्छा नह हो जाता, नया होने से बुरा नह । तो कसौट क्या है ? — परीक्षा। ‘परीक्ष्य’ हटा द जए
तो ोक का उत्तर ही ग़ायब हो जाता है। यही कारण है क पुस्तक ने ठ क यही पद रक्त रखा।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

व्याकरण: ‘परीक्ष्य’ = प र + √ईक्ष् + ल्यप्। नयम — समासेऽनञ्पूव क्त्वो ल्यप्, अथात् उपसग लगने पर क्त्वा
प्रत्यय ‘य’ (ल्यप्) हो जाता है : दृष्ट् वा → सन्दृश्य, कृत्वा → वकृत्य, ई क्षत्वा → परीक्ष्य। ‘अन्यतरत्’ = दो म से एक
(नपुंसक लङ्ग, तीया एकवचन)।

प्र.2 (ग) दै वं नहत्य कुरु …………………………………… आत्मशक्त्या।

उत्तरम् — दै वं नहत्य कुरु पौरुषम् आत्मशक्त्या।
( हन्द — भाग्य को पीछे धकेलकर अपनी श क्त से पुरुषाथ करो।)

पूरा श्लोकाश
ं (श्लोक ६, पञ्चतन्त्रम् — िमत्रभे द ः १४९) —
दै वं िनहत्य कु रु पौरु षमात्मशक्त्या यत्ने कृ ते यिद न िसध्यित कोऽ त्र दोषः॥

सिन्धिवच्छे द ः — पौरुषम् + आत्मशक्त्या

क्रया का कम खो जए: ‘कुरु’ (करो) लोट् लकार, मध्यमपुरुष, एकवचन क आ ा है — और हर सकमक क्रया
को कम चा हए। ‘क्या करो ?’ का उत्तर ही रक्त है : पौरुषम् ( तीया एकवचन)। ‘आत्मशक्त्या’ तृतीया म है —
साधन बताता है, कम नह ; इस लए वह रक्तस्थान नह भर सकता।

भाव तथा व्याकरण: ‘दै वं नहत्य’ का शब्दशः अथ है ‘भाग्य को मारकर’ — पुस्तक इसका अथ ‘अ तक्रम्य’
(अ तक्रमण करके) दे ती है, अथात् भाग्य के भरोसे बैठे रहने क वृ त्त को हराकर। ‘ नहत्य’ = न + √हन् + ल्यप्।
‘आत्मशक्त्या’ = आत्मनः शक्त्या (षष्ठी-तत्पुरुष, फर करणे तृतीया)।

प्र.2 (घ) स यत् …………………………………… कुरुते।

उत्तरम् — स यत् प्रमाणं कुरुते।
( हन्द — वह (श्रेष्ठ पुरुष) जसे प्रमाण — अथात् मानक — बना दे ता है।)

पूरा श्लोकांश (श्लोक ३, श्रीमद् भ गवद् गीता ३.२१) —

स यत्पमाणं कु रु ते लोक स्तदनुवत ते ॥

अन्वयः — सः यत् पमाणं कु रुते , लोकः तत् अनुवतते ।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

‘प्रमाणम्’ का अथ यहाँ क्या है: ‘प्रमाण’ का सामान्य अथ है नाप, प्रमाण, साक्ष्य; पर यहाँ उसका अथ है मानक /
आदश — वह वस्तु जसे दे खकर बाक़ लोग अपना व्यवहार नापते ह। श्रेष्ठ पुरुष जस बात को अपने आचरण से
‘ठ क’ ठहरा दे ता है, समाज उसी को नयम मान लेता है। इसी लए अगली पं क्त म ‘लोकस्तदनुवतते’ आता है —
‘तत्’ का सम्बन्ध इसी ‘प्रमाणम्’ से है।

ध्यान द: ‘कुरुते’ आत्मनेपद का रूप है (√कृ, लट् , प्र.पु.ए.व.)। ‘करो त’ और ‘कुरुते’ दोन ‘करता है’ ही ह; क व
ने छन्द के अनुरोध से आत्मनेपद लया है। ‘स’ = सः ( वसग का लोप, ‘सः’ का ‘स’ रूप ोक म सामान्य है)।

प्र.2 (ङ) धी वद्या सत्यमक्रोधो …………………………………… धमलक्षणम्।

उत्तरम् — धी वद्या सत्यमक्रोधो दशकं धमलक्षणम्।
( हन्द — बु द्ध, वद्या, सत्य तथा अक्रोध — (इस प्रकार ये) दस धम के लक्षण ह।)

पूरा श्लोक (श्लोक २, मनुस्मृितः ६.९२) —
धृितः क्षमा दमोऽ स्ते यं शौचिमिन्द यिनगहः।

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धीिवद्य ा सत्यम ोधो दशकं धमलक्षणम्॥

‘दशकम्’ क्य आवश्यक है: ोक ने दस गुण गनाए और अन्त म उन्ह एक शब्द म समेट दया — ‘दशकम्’
अथात् ‘दस का समूह’। यही पद पूरे ोक को एक वाक्य बना दे ता है; उसके बना केवल नाम क सूची रह जाती।
गनकर दे खए — धृ त, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इ न् य नग्रह, धी, वद्या, सत्य, अक्रोध : ठ क दस।

स : ‘सत्यमक्रोधो दशकम्’ = सत्यम् + अक्रोधः + दशकम्; ‘अक्रोधः’ का वसग ‘द’ (घोष वण) से पहले ‘ओ’ हो
गया — वसगस (अः + घोष वण → ओ)। ‘धी वद्या’ = धीः + वद्या (ईः + व → ईर्)।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 74
प्रश्न ३ — रेखाङ् कता न पदा न आधृत्य प्रश्न नमाणं कुरुत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.3 (क) नीचैः वघ्नभयेन काय न प्रारभ्यते।

उत्तरम् — कैः वघ्नभयेन काय न प्रारभ्यते ?

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

( हन्द — वघ्न के डर से कनके ारा काम आरम्भ नह कया जाता ?)

िनयम — पश्निनम ण में रेखािङ् कत पद का िलङ् ग · िवभिक्त · वचन जाँिचए, और उसी िलङ् ग-िवभिक्त-वचन

का पश्नवाचक ‘िकम्’ रूप रिखए।

नीचै ः = ‘नीच’ (पुंिलङ् ग), त ृत ीया · बहुवचन

‘िकम्’ का पुंिलङ् ग त ृत ीया बहुवचन = कै ः

यहाँ तृतीया क्य है: वाक्य कमवाच्य का है — ‘प्रारभ्यते’ (आरम्भ कया जाता है)। नयम है «कमवाच्ये कत र
तृतीया» — कमवाच्य म कता तृतीया म आता है। इसी लए पुस्तक क शब्दाथ-ता लका भी ‘नीचैः’ के आगे
‘(कमवाच्ये, तृ.ब.व.)’ लखती है। कता तृतीया म है, इस लए प्रश्न भी तृतीया म ही बनेगा — ‘के’ नह , ‘कैः’।

सावधान: ‘ वघ्नभयेन’ भी तृतीया म है, पर वह कारण बताता है, कता नह — और वह रेखाङ् कत भी नह है। प्रश्न
केवल रेखाङ् कत पद पर बनाना है, शेष वाक्य ज्य का त्य रखना है।

प्र.3 (ख) सकलाः कलाः अभ्यासात् सध्य न्त।

उत्तरम् — सकलाः कलाः कस्मात् सध्य न्त ?
( हन्द — सारी कलाएँ कससे सद्ध होती ह ?)

अभ्यासात् = ‘अभ्यास’ (पुंिलङ् ग), पञ् चमी · एकवचन

‘िकम्’ का पञ्चमी एकवचन = क स्मात्
ु ना — त ृत ीया एकवचन ‘के न’, षष्ठी एकवचन ‘कस्य’, सप्तमी एकवचन ‘किस्मन्’)
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पञ्चमी क्य , तृतीया क्य नह : ोक क पं क्त है ‘अभ्यासेन क्रयाः सवाः अभ्यासात् सकलाः कलाः’ — पहले
आधे म तृतीया (करण) है और दूसरे म पञ्चमी (हेतु/अपादान)। यहाँ रेखाङ् कत पद ‘अभ्यासात्’ है, इस लए प्रश्न
‘कस्मात्’ बनेगा। य द ‘अभ्यासेन’ रेखाङ् कत होता तो प्रश्न ‘केन’ बनता। रूप दे खए, अथ अनुमान से मत लगाइए।

जोड़कर दे खए: यही प्रश्न अभ्यास के प्रश्न १ (च) म तैयार रूप म पूछा गया है — ‘सकलाः कलाः कस्मात् सध्य न्त
?’ अथात् पुस्तक ने एक ही वाक्य से दो अभ्यास कराए ह : एक म प्रश्न से उत्तर बनाना है, दूसरे म उत्तर से प्रश्न।

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प्र.3 (ग) वस्त्रपूतं जलं पबेत्।

उत्तरम् — क दृशं जलं पबेत् ?
( हन्द — कैसा जल पीना चा हए ?)

िनयम — रेखािङ् कत पद यिद िवशेषण हो (गुण/स्वरूप बताता हो), तो पश्न ‘िकम्’ से नही ं, ‘कीदृ श’ से बनता
है।

वस्त्रपूत म् = ‘जलम्’ का िवशेषण, नपुंसकिलङ् ग · िद्वतीया · एकवचन

अतः पश्नवाचक भी वही रूप — कीदृ शम्

‘ क जलं पबेत्’ क्य नह : ‘ कम्’ वस्तु पूछता है, ‘क दृश’ गुण पूछता है। यहाँ पीने क वस्तु (जल) पहले से वाक्य
म है और रेखाङ् कत वही पद है जो उस जल का प्रकार बताता है। इसी लए ‘क दृशम्’ ही ठ क है। यह भेद पुस्तक ने
प्रश्न ४ म और भी स्पष्ट कराया है, जहाँ ‘ क पबेत् ?’ (उत्तर — जलम्) और ‘क दृशं जलं पबेत् ?’ (उत्तर —
वस्त्रपूतम्) दोन अलग-अलग पूछे गए ह।

व्याकरण: ‘वस्त्रपूतम्’ = वस्त्रेण पूतम् — तृतीया-तत्पुरुष समास। वशेषण अपने वशेष्य के लङ्ग- वभ क्त-वचन
को अपनाता है : जलम् नपुंसक लङ्ग तीया एकवचन है, इस लए ‘वस्त्रपूतम्’ भी वही; और प्रश्नवाचक ‘क दृशम्’
भी वही।

प्र.3 (घ) लक्ष्मीः पुरुष सहम् उपै त।

उत्तरम् — लक्ष्मीः कम् उपै त ?
( हन्द — लक्ष्मी कसके पास जाती है ?)

पुरु षिसंहम् = पुंिलङ् ग · िद्वतीया · एकवचन (‘उपैित’ का कम)

‘िकम्’ का पुंिलङ् ग िद्वतीया एकवचन = कम्

(नपुंसकिलङ् ग होता तो ‘िकम्’, स्त्रीिलङ् ग होता तो ‘काम्’)

लङ्ग का ध्यान र खए: यह वही स्थान है जहाँ वद्याथ प्रायः चूकते ह — ‘ कम्’ लखकर छोड़ दे ते ह। ‘पुरुष सहम्’
पुं लङ्ग है, इस लए प्रश्न ‘कम्’ बनेगा। यही प्रश्न पुस्तक ने अभ्यास के प्रश्न १ (ग) म तैयार रूप म पूछा है — ‘लक्ष्मीः
कम् उपै त ?’ — इससे अपना उत्तर जाँच ली जए।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत्
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ध्यान द: ोक म कम दो वशेषण के साथ है — ‘उद्यो गनं पुरुष सहम्’। यहाँ रेखाङ् कत केवल ‘पुरुष सहम्’ है,

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इस लए प्रश्न म ‘उद्यो गनम्’ नह रखा गया; अभ्यास के वाक्य म वह पहले ही हटा दया गया है।

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प्र.3 (ङ) सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते।

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उत्तरम् — के परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते ? a g
( हन्द — कौन लोग परीक्षा करके दोन म से (उत्तम) को अपनाते ह ?)

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सन्तः = ‘सत्’ (पुंिलङ् ग), पथमा · बहुवचन — वाक्य का कत
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‘िकम्’ का पुंिलङ् ग पथमा बहुवचन = के
a g (एकवचन होता तो ‘कः’, िद्ववचन होता तो ‘कौ’)

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वचन पर ध्यान: यह वाक्य कतृवाच्य का है, eइस
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mलए कता प्रथमा म है — तुलना क जए (क) से, जहाँ कमवाच्य agl
होने के कारण कता तृतीया म था और g
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la‘कैः’ बना। यहाँ ‘भजन्ते’ बहुवचन क क्रया है, ‘सन्तः’ बहुवचन का कता
a प्रश्न
— इस लए प्रश्न भी बहुवचन म ‘के’ ही बनेगा, ‘कः’ नह ।

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शब्द-प रचय: ‘सत्’ (√अस् + शतृ) का अथ है ‘होने वाला, वद्यमान’, और नी त-सा हत्य म ‘सत्’ का अथ
g / सन्तौ / सतः। पुस्तक क
.c हो जाता है। इसके रूप — प्रथमा : सन् / सन्तौ / सन्तः; तीया : सन्तम्
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aseता लका भी ‘सन्तः = सज्जनाः’ ही दे ती है।
‘सज्जन’

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क्रयां सहसा न वदधीत।

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प्र.3 (च)

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उत्तरम् — कां सहसा न वदधीत ?
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( हन्द — कस काम को जल्दबाज़ी म नह करना चा हए ?)

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िक्रयाम् = ‘िक्रया’ (स्त्रीिलङ् ग, आकारान्त), िद्वतीया · एकवचन
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‘िकम्’ का स्त्रीिलङ् ग िद्वतीया एकवचन = काम् (िलखने में ‘कां’)
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ु ना — पुंिलङ् ग ‘कम्’, नपुंसकिलङ् ग ‘िकम्’, स्त्रीिलङ् ग ‘काम्’
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तीन लङ्ग का भेद एक साथ दे खए: इस प्रश्न-समूह ने जान-बूझकर तीन रूप एक साथ अभ्यास कराए ह —
(घ) म पुं लङ्ग कम ‘पुरुष सहम्’ → कम्; यहाँ स्त्री लङ्ग कम ‘ क्रयाम्’ → काम्; और प्रश्न ४ (ङ) म नपुंसक लङ्ग
कम ‘जलम्’ → कम्। कम का लङ्ग बदलते ही प्रश्नवाचक बदल जाता है — यही इस अभ्यास का मम है।

व्याकरण: ‘ वदधीत’ = व + √धा, व ध लङ् लकार, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष, एकवचन — ‘करना चा हए’।
‘सहसा’ अव्यय है (‘अचानक, बना वचारे’), इस लए प्रश्न बनाते समय वह ज्य का त्य रहता है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 75
प्रश्न ४ — अधो ल खतं ोकं प ठत्वा प्रश्नानाम् उत्तरा ण लखत (“दृ ष्टपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पबेत्। सत्यपूतां वदे त् वाचं मनः पूतं
समाचरेत्॥”)

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.4 (क) अ स्मन् ोके प्रथमं क्रयापदं कम् ?

उत्तरम् — न्यसेत्। ( हन्द — ‘रखे / रखना चा हए’।)

श्लोक की पहली पंिक्त — दृ िष्टपूतं न्यसेत ् पादं वस्त्रपूतं जलं िपबेत ्।

न्यसेत ् = िन + √अस् , िविधिलङ् लकार · पथमपुरु ष · एकवचन

अथः — स्थापयेत ् (रखना चािहए)

क्रयापद कैसे पहचान: जस पद से काय का बोध हो और जो लकार म चला हो, वही क्रयापद है। इस ोक म
चार क्रयापद ह — न्यसेत्, पबेत्, वदे त्, समाचरेत् — और चार व ध लङ् म ह। व ध लङ् का अथ है ‘चा हए’,
इस लए पूरा ोक उपदे श बन जाता है, वणन नह । क्रम म सबसे पहला ‘न्यसेत्’ है।

ध्यान द: ‘दृ ष्टपूतम्’ क्रयापद नह , कृदन्त वशेषण है (√पू + क्त)। क्त-प्रत्ययान्त पद क्रया जैसा लगता है, पर वह
वशेषण क तरह वभ क्त लेता है — इसी लए वह ‘पादम्’ के साथ तीया म है।

प्र.4 (ख) कं न्यसेत् ?

उत्तरम् — पादम्। ( हन्द — पैर।)

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श्लोक — दृ िष्टपूतं न्यसेत ् पादम्

‘कम्’ = पुंिलङ् ग · िद्वतीया · एकवचन → उत्तर भी उसी रूप में

‘पाद’ पुंिलङ् ग अकारान्त → िद्वतीया एकवचन पादम्

नयम: «कम ण तीया» — क्रया का जो कम हो, उसम तीया वभ क्त होती है। ‘न्यसेत्’ (रखे) — क्या रखे ?
पैर। इस लए ‘पादम्’ तीया म है और प्रश्न भी पुं लङ्ग तीया ‘कम्’ म पूछा गया है।

सावधान: उत्तर ‘पादः’ (प्रथमा) लखना अशुद्ध होगा। एक पद म उत्तर दे ते समय भी वभ क्त प्रश्न के अनुसार
रखनी है — यही बात प्रश्न ४ के सभी उत्तर पर लागू है।

प्र.4 (ग) क दृशं पादं न्यसेत् ?

उत्तरम् — दृ ष्टपूतम् (पादं न्यसेत्)। ( हन्द — दृ ष्ट से शुद्ध कया हुआ, अथात् दे ख-भालकर।)

श्लोक — दृ िष्टपूतं न्यसेत ् पादम्

िवगहः — दृ ष्ट ा पूत म् (त ृत ीया-त त्पुरु ष समास)

‘कीदृ शम्’ गुण पूछता है → उत्तर िवशेषण ही होगा, नपुंसक िलङ् गवत् िद्वतीया एकवचन में — दृ िष्टपूत म्

अथ खो लए: ‘पूत’ का अथ है ‘छाना हुआ, शुद्ध कया हुआ’। जल कपड़े से छानते ह; पैर कससे छान ? — आँख
से। अथात् जहाँ पैर रखना है, वहाँ पहले दृ ष्ट डा लए। इससे दो लाभ ह : स्वयं ठोकर से बचाव, और नीचे के छोटे
जीव क रक्षा — यही अ हसा का व्यावहा रक रूप है। जैन तथा बौद्ध परम्परा म इसी को ‘ईयापथ-शु द्ध’ कहा गया
है।

तुलना क जए: ोक म चार वशेषण एक ही ढाँचे के ह — दृ ष्टपूतम् (दृ ा पूतम्), वस्त्रपूतम् (वस्त्रेण पूतम्),
सत्यपूताम् (सत्येन पूताम्), मनःपूतम् (मनसा पूतम्)। चार तृतीया-तत्पुरुष ह और चार म ‘पूत’ उत्तरपद है।

प्र.4 (घ) तीयं क क्रयापदम् अ स्त ?

उत्तरम् — पबेत्। ( हन्द — ‘ पए / पीना चा हए’।)

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श्लोक की पहली पंिक्त — … वस्त्रपूतं जलं िपबेत ्।

िपबेत ् = √पा (िपब् आदे श) , िविधिलङ् · पथमपुरु ष · एकवचन

धात ु ‘पा’ है, पर लट् /िविधिलङ् में उसका अङ् ग ‘िपब्’ हो जाता है — िपबित, िपबेत ्।

धातु और अङ्ग का भेद: संस्कृत म कुछ धातुओं का अङ्ग बदल जाता है — √पा → पब्, √गम् → गच्छ् , √स्था →
तष्ठ्, √दृश् → पश्य्। इस लए ‘ पबेत्’ का मूल खोजते समय ‘ पब्’ नह , √पा ल खए। यही धातु ‘पानम्’, ‘पेयम्’,
‘पीत्वा’ म भी है।

क्रम याद र खए: ोक के चार क्रयापद क्रम से — (१) न्यसेत्, (२) पबेत्, (३) वदे त्, (४) समाचरेत्। प्रश्न ४ इन्ह
चार को क्रम से पूछता है और बीच-बीच म उनके कम तथा वशेषण पूछता है — इस प्रकार पूरा ोक व्याकरण क
दृ ष्ट से खोलकर रख दया जाता है।

प्र.4 (ङ) क पबेत् ?

उत्तरम् — जलम्। ( हन्द — जल / पानी।)

श्लोक — वस्त्रपूतं जलं िपबेत ्

‘जल’ नपुंसकिलङ् ग अकारान्त → िद्वतीया एकवचन जलम्

नपुंसकिलङ् ग में पथमा तथा िद्वतीया के रूप समान होते है ं — इसीिलए पश्न भी ‘िकम्’ ही है।

‘ कम्’ और ‘कम्’ का भेद: ठ क पहले (ख) म कम ‘पादम्’ पुं लङ्ग था, इस लए प्रश्न ‘कम्’ बना; यहाँ कम ‘जलम्’
नपुंसक लङ्ग है, इस लए प्रश्न ‘ कम्’ बना। दोन प्रश्न आस-पास रखकर पुस्तक यही भेद पक्का करा रही है।

ध्यान द: यहाँ ‘ कम्’ का उत्तर वस्तु है (जल), गुण नह । अगला प्रश्न (च) उसी जल का गुण पूछता है — ‘क दृशं
जलं पबेत् ?’ — और उसका उत्तर ‘वस्त्रपूतम्’ है। दोन को मलाकर प ढ़ए, अन्तर स्पष्ट हो जाएगा।

प्र.4 (च) क दृशं जलं पबेत् ?

उत्तरम् — वस्त्रपूतम् (जलं पबेत्)। ( हन्द — वस्त्र से छाना हुआ जल।)

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श्लोक — वस्त्रपूतं जलं िपबेत ्

िवगहः — वस्त्रेण पूत म् (त ृत ीया-त त्पुरु ष)

‘कीदृ शम्’ = गुण-पश्न → उत्तर िवशेषण, नपुंसकिलङ् ग िद्वतीया एकवचन

यह उपदे श आज भी क्य खरा है: प्राचीन काल म कुएँ और नद का जल कपड़े से छानकर पया जाता था। आज
हम फ़ल्टर या उबालकर वही करते ह — व ध बदली है, नयम नह । हैज़ा, टाइफ़ाइड, पी लया जैसे रोग आज भी
दू षत जल से ही फैलते ह। यही उदाहरण अभ्यास-पूव संवाद के उस प्रश्न का उत्तर भी है क ‘क्या ये सुभा षत आज
भी उपयोगी ह ?’

अ त रक्त अथ: पुरानी परम्परा म वस्त्र से छानने के पीछे केवल स्वच्छता नह , अ हसा भी थी — छानने से जल के
सूक्ष्म जीव कपड़े म रह जाते और उन्ह फर जल म लौटा दया जाता था। इस प्रकार ोक का पहला चरण (दे खकर
पैर रखना) और दूसरा चरण (छानकर जल पीना) — दोन एक ही भाव के दो रूप ह।

प्र.4 (छ) तृतीयं क क्रयापदम् अ स्त ?

उत्तरम् — वदे त्। ( हन्द — ‘बोले / बोलना चा हए’।)

श्लोक की दू सरी पंिक्त — सत्यपूत ां वदे त ् वाचम्

वदे त ् = √वद् , िविधिलङ् · पथमपुरु ष · एकवचन (परस्मैपद)

रूपमाला — वदे त ् / वदे त ाम् / वदे यःु

व ध लङ् क पहचान: परस्मैपद के व ध लङ् म धातु के आगे ‘ए’ आता है और प्रथमपुरुष एकवचन म ‘-एत्’
प्रत्यय दखता है — पठ् → पठे त्, गम् → गच्छे त्, वद् → वदे त्, चर् → चरेत्। इस ोक के चार क्रयापद इसी
साँचे म ढले ह, इसी लए चार का अथ ‘चा हए’ है।

ध्यान द: ‘वदे त्’ का कता ोक म कह नह लखा — वह अध्याहृत है : ‘(मनुष्यः) वदे त्’। सुभा षत म कता प्रायः
छोड़ दया जाता है, क्य क उपदे श सबके लए है, कसी एक के लए नह ।

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कां वदे त् ?
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agl — वाचम्। ( हन्द — वाणी को।)
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श्लोक — सत्यपूत ां वदे त ् वाचम्
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‘वाच्’ स्त्रीिलङ् ग चकारान्त शब्द → िद्वतीया एकवचन वाचम्
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‘काम्’ = स्त्रीिलङ् ग · िद्वतीया · एकवचन (इसीिलए पश्न ‘कां’ है, ‘कं ’ नही ं)

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g ’ शब्द के तीन लङ्ग के रूप
लङ्ग ने प्रश्न बदल दया: इसी प्रश्न-समूह म तीन कम आए ह — ‘पादम्’ (पुं लङ्ग → कम्), ‘जलम्’ (नपुंसक लङ्ग
→ कम्.)cऔर ‘वाचम्’ (स्त्री लङ्ग → काम्)। तीन को साथ रखकर दे खए; इससे ‘ a
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seही ोक से याद हो जाएँगे।
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शब्द-प रचय: ‘वाच्’ के रूप — प्रथमा : वाक् / वाचौ / वाचः; तीया : वाचम् / वाचौ / वाचः; तृतीया : वाचा।
इसी से ‘वाक्’ (वाणी), ‘वाग्दे वी’, ‘वाक्यम्’ बनेm
a s e ह। पुस्तक क ता लका ‘वाचम् = वाणीम्’ ही दे ती है।

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क दृश वाण वदे त् ?
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agl उत्तरम् — सत्यपूताम् (वाण वदे त्)। ( हन्द — सत्य से प वत्र क हुई वाणी।)
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श्लोक — सत्यपूत ां वदे त ् वाचम्
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िवगहः — सत्येन पूत ाम् (त ृत ीया-त त्पुरु ष)
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‘कीदृ शीम्’ स्त्रीिलङ् ग िद्वतीया एकवचन है → उत्तर भी स्त्रीिलङ् ग में — सत्यपूत ाम् (‘सत्यपूत म्’ नही ं)

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यहाँ ‘क दृशीम्’ क्य , ‘क दृशम्’ क्य नह : वशेषण तथा प्रश्नवाचक — दोन अपने वशेष्य का लङ्ग अपनाते ह।
.cवशेष्य ‘वाणी/वाच्’ स्त्री लङ्ग है, इस लए ‘क दृशीम्’ और उत्तर ‘सत्यपूताम्a’g— दोन स्त्री लङ्ग रूप म। तुलना
m क जए (ग) तथा (च) से, जहाँ वशेष्य ‘पादम्’ तथा ‘जलम्’ थे और रूप ‘क दृशम्’, ‘दृ ष्टपूतम्’, ‘वस्त्रपूतम्’ बने।
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भाव: ‘सत्यपूता वाणी’ का अथ केवल ‘सच बोलना’ नह — वाणी को सत्य क छन्नी से छानकर बोलना। इसी लए
a g la
यह
s e m तां वदे त् वाचम्’ कहता है — बोलने से पहले जाँचने क क्रया पर बल है।
ोक ‘सत्यं वदे त्’ नह कहता, ‘सत्यपू
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प्र.4 (ञ) चतुथ क क्रयापदम् अ स्त ?

उत्तरम् — समाचरेत्। ( हन्द — ‘आचरण करे / भली-भाँ त आचरण करना चा हए’।)

श्लोक की अिन्तम पंिक्त — मनः पूतं समाचरेत ्।

समाचरेत ् = सम् + आ + √चर् , िविधिलङ् · पथमपुरु ष · एकवचन

‘सम्’ = भली-भाँित, ‘आ’ = पूणता — अतः ‘सम्यक् आचरणं कु य त्’

यही पद पाठ का शीषक है: पूरे पाठ का नाम ‘मनःपूतं समाचरेत्’ इसी पं क्त से लया गया है — और यह चौथा
तथा अ न्तम क्रयापद है, यह संयोग नह । पहले तीन उपदे श बाहर के व्यवहार के ह (चलना, पीना, बोलना), चौथा
भीतर के आचरण का है और सबसे व्यापक है — क्य क ‘आचरण’ म शेष तीन आ जाते ह। इसी लए क व ने उसे
अन्त म रखा और शीषक भी वह से बना।

उपसग का काम: ‘चर त’ = चलता है; ‘आचर त’ = आचरण करता है; ‘समाचर त’ = भली-भाँ त आचरण करता
है। दो उपसग जुड़ते ही धातु का अथ कैसे गहरा हो जाता है — यह दे ख लेना संस्कृत पढ़ने क बड़ी कुंजी है।

प्र.4 (ट) कथं समाचरेत् ?

उत्तरम् — मनःपूतम् (समाचरेत्)। ( हन्द — मन से प वत्र होकर, अथात् जो मन को शुद्ध लगे वैसा आचरण करे।)

श्लोक — मनः पूतं समाचरेत ्

िवगहः — मनसा पूत म् (त ृत ीया-त त्पुरु ष) → समस्तपदम् मनःपूत म्

‘कथम्’ = पकार पूछने वाला अव्यय → उत्तर िक्रयािवशेषण की तरह — मनःपूत म्

यही ोक का शखर है: पहले तीन उपदे श म छन्नी बाहर थी — आँख, कपड़ा, सत्य। यहाँ छन्नी भीतर है —
अपना मन। अथात् अन्ततः हर काम क परीक्षा अपने ही मन से करनी है : ‘क्या यह काम करते हुए मेरा मन साफ़ है
?’ य द उत्तर ‘नह ’ है, तो काम बाहर से कतना ही ठ क दखे, वह करने योग्य नह । पाठ क प्रस्तावना म आचाया ने
यही कहा था — ‘य द मनः एव म लनं स्यात् … त ह कम प काय सम्यक् कथं भवेत् ?’

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छपाई क बात: ोक म यह पद ‘मनः पूतं’ — दो टु कड़ म — छपा है, जब क पाठ का शीषक ‘मनःपूतं’ एक
साथ। दोन शुद्ध ह; समस्तपद होने से एक साथ लखना अ धक ठ क है, और अभ्यास का प्रश्न ९ (यथा-पङ् क्त) भी
उत्तर ‘मनःपूतम्’ ही दे ता है। स न्ध क दृ ष्ट से — मनस् + पूतम् → मनःपूतम् (सकार का वसग)।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 75–76
प्रश्न ५ — मञ्जूषातः पदा न चत्वा भावाथषु रक्त ाना न पूरयत (मञ्जूषा : बु द्धः, लक्ष्यं, पुरुषस्य, अ भप्रायं, धीराः, नूतनम्)

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.5 (क) लक्ष्मीः प्रयत्नशीलस्य पराक्र मणः …………………… समीपं स्वयम् आगच्छ त। कापुरुषाः तु ‘ व धः एव
बलीयान्’ इ त वद न्त। ये पौरुषेण प र तम् अ तक्रम्य काया ण साधय न्त ते एव …………………… ।
प्रयत्नं कृत्वा अ प य द …………………… न प्राप्तं त ह तत्र दोषः ना स्त खलु।

पूणः भावाथः — लक्ष्मीः प्रयत्नशीलस्य पराक्र मणः पुरुषस्य समीपं स्वयम् आगच्छ त। कापुरुषाः तु ‘ व धः एव बलीयान्’
इ त वद न्त। ये पौरुषेण प र तम् अ तक्रम्य काया ण साधय न्त ते एव धीराः। प्रयत्नं कृत्वा अ प य द लक्ष्यं न प्राप्तं त ह
तत्र दोषः ना स्त खलु।
( हन्द — लक्ष्मी प्रयत्नशील, पराक्रमी पुरुष के पास स्वयं आती है। कायर लोग तो कहते ह क ‘भाग्य ही बलवान् है’। जो लोग
पुरुषाथ से प र स्थ त को लाँघकर काम सद्ध करते ह, वे ही धीर ह। प्रयत्न कर लेने पर भी य द लक्ष्य न मले, तो उसम कोई दोष
नह है।)

रक्त ानम् भृतम् क्य यही पद ोक का आधार
पदम्

१ पुरुषस्य ‘पयत्नशील स्य परा क्रिमणः’ दोनों षष्ठी के िवशेषण है;ं उन्हे ं िवशेष्य चािहए, और उद्यो गनं पुरुष सहम्
वह भी षष्ठी में — मञ्जूषा में के वल ‘पुरुषस्य’ ही षष्ठी में है। उपै त लक्ष्मीः

२ धीराः ‘ये … साधयिन्त ते एव ___’ — ‘ते’ पुंिलङ् ग पथमा बहुवचन है, इसिलए दै वं नहत्य कुरु पौरुषम्
िवधे य भी पथमा बहवु चन चािहए। मञ्जूषा में वही रूप ‘धीराः’ है। आत्मशक्त्या

३ लक्ष्यं ‘न पाप्तम्’ नपुंस किलङ् ग कम वाच्य का रूप है; उसका कम भी नपुंस किलङ् ग यत्ने कृते य द न सध्य त
चािहए — ‘ल क्ष्यम्’। कोऽत्र दोषः

यह भावाथ कस ोक का है: यह पूरा गद्यांश छठे ोक (पञ्चतन्त्रम् — ‘उद्यो गनं पुरुष सहमुपै त लक्ष्मीः’) का
हन्द -नुमा संस्कृत सारांश है। तीन वाक्य ोक के तीन भाग को दोहराते ह — (१) लक्ष्मी उद्यमी के पास आती है,
(२) भाग्य को हराकर पुरुषाथ करने वाला ही धीर है, (३) प्रयत्न के बाद असफलता म दोष नह । ध्यान द जए,
‘ व धः एव बलीयान्’ ोक के ‘दै वेन दे यम्’ का ही रूपान्तर है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

पद चुनने क यु क्त: पहले रक्तस्थान के आस-पास के पद क वभ क्त दे खए, फर मञ्जूषा म उसी वभ क्त-
वचन- लङ्ग वाला पद ढूँ ढ़ए। ‘पुरुषस्य’ (षष्ठी ए.व.), ‘धीराः’ (प्रथमा ब.व.), ‘लक्ष्यम्’ (नपुं. प्र./ . ए.व.) — तीन
का रूप ही उनका स्थान बता दे ता है, अथ पर बाद म सो चए।

प्र.5 (ख) पुरातनम् अ स्त इ त कारणेन कम प वस्तु तत्त्वं व्य क्तत्वं वा समीचीनं भवेदेव इ त नयमः ना स्त। तथैव
…………………… अ स्त इ त कारणेन दोषर हतं भवेत् इत्य प नयमः ना स्त। येषां …………………… पक्वा
अ स्त ते परीक्षण- नरीक्षणानन्तरम् एव उत्तमं स्वीकुव न्त। कन्तु अ ानाः अन्येषाम् …………………… श्रुत्वा
तदनुसारेण प्रवतन्ते।

पूणः भावाथः — पुरातनम् अ स्त इ त कारणेन कम प वस्तु तत्त्वं व्य क्तत्वं वा समीचीनं भवेदेव इ त नयमः ना स्त। तथैव
नूतनम् अ स्त इ त कारणेन दोषर हतं भवेत् इत्य प नयमः ना स्त। येषां बु द्धः पक्वा अ स्त ते परीक्षण- नरीक्षणानन्तरम्
एव उत्तमं स्वीकुव न्त। कन्तु अ ानाः अन्येषाम् अ भप्रायं श्रुत्वा तदनुसारेण प्रवतन्ते।
( हन्द — कोई वस्तु, तत्त्व या व्य क्तत्व केवल इस लए ठ क हो — ऐसा कोई नयम नह क वह पुराना है। वैसे ही यह भी नयम
नह क नया होने के कारण वह दोषर हत होगा। जनक बु द्ध पक हुई है, वे जाँच-परखकर ही उत्तम को स्वीकार करते ह। कन्तु
अ ानी लोग दूसर क राय सुनकर उसी के अनुसार चलने लगते ह।)

रक्त ानम् भृतम् क्य यही पद ोक का आधार
पदम्

१ नूतनम् िपछले वाक्य में ‘पुरातनम्’ था; ‘तथैव’ के बाद उसका िवपरीत चािहए — न चा प काव्यं नवम्
नया। मञ्जूषा में वही ‘नूतनम्’ (नपुं.प.ए .व.) है। इत्यवद्यम्

२ बुिद्धः ‘पक्वा अिस्त’ — ‘पक्वा’ स्त्र ीिलङ् ग पथमा एकवचन है, अतः कत भी सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद्
स्त्रीिलङ् ग पथमा एकवचन चािहए। मञ्जूषा में के वल ‘बुिद्धः’ ही ऐसा है। भजन्ते

३ अिभपायं ‘श्रत्ु वा’ सकम क है — क्या सुनकर ? अतः िद्वतीया का पद चािहए ; मूढः परप्रत्ययनेयबु द्धः
‘अिभपायम्’ वही है।

यह भावाथ कस ोक का है: यह पूरा गद्यांश सातव ोक (माल वका ग्न मत्रम् — ‘पुराण मत्येव न साधु
सवम्’) का सारांश है और उसके चार चरण को क्रम से खोलता है : पुराना = अच्छा नह , नया = बुरा नह , सन्तः
परीक्ष्य भजन्ते = पक बु द्ध वाले जाँचकर लेते ह, और मूढः परप्रत्ययनेयबु द्धः = अ ानी दूसर क राय पर चलते ह।
ध्यान द जए, ‘परप्रत्ययनेयबु द्धः’ को यहाँ ‘अन्येषाम् अ भप्रायं श्रुत्वा तदनुसारेण प्रवतन्ते’ कहकर सरल कर दया
गया है — यही अनुवाद क अच्छ व ध है।

ध्यान द: मञ्जूषा म छह पद ह और रक्तस्थान भी छह — (क) म तीन, (ख) म तीन। इस लए एक पद दो बार नह
आएगा। जो पद न श्चत रूप से पहचान म आ जाएँ उन्ह पहले भर द जए, शेष अपने-आप बच जाएँगे — यह
ब हष्करण क व ध मेलन तथा मञ्जूषा दोन प्रकार के प्रश्न म काम आती है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 76
प्रश्न ६ — ोकानाम् अन्वयेषु रक्त ाना न पूरयत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.6 (क) सवाः …………… अभ्यासेन ( सध्य न्त)। …………… कलाः अभ्यासात् ( सध्य न्त)। ध्यानमौना द (अ प)
…………… ( सध्य त)। अभ्यासस्य …………… कम् (अ स्त) ?

पूणः अन्वयः — सवाः क्रयाः अभ्यासेन ( सध्य न्त)। सकलाः कलाः अभ्यासात् ( सध्य न्त)। ध्यानमौना द (अ प)
अभ्यासात् ( सध्य त)। अभ्यासस्य दुष्करं कम् (अ स्त) ?
( हन्द — सारे काम अभ्यास से सद्ध होते ह। सारी कलाएँ अभ्यास से सद्ध होती ह। ध्यान-मौन आ द भी अभ्यास से ही सद्ध होते
ह। फर अभ्यास के लए क ठन क्या है ?)

मूल श्लोक (श्लोक ४) —

क्र
अभ्यासेन ि याः सव ः अभ्यासात् सकलाः कलाः।
अभ्यासाद् ध्यानमौनािद िकमभ्यासस्य दुष्करम्॥

रक्त ानम् भृतम् पदम् पहचानने का सूत्र

१ िक्रयाः ‘सव ः’ स्त्र ीिलङ् ग पथमा बहवु चन का िवशेषण है — उसे वही रूप वाला िवशेष्य चािहए : ि क्रयाः
२ सकलाः ‘कलाः’ िवशेष्य िदया है, िवशेषण िर क्त है; श्लोक में उसका जोड़ ीदार सकलाः है

३ अभ्यासात् तीसरे चरण में भी वही पञ्चमी चािहए जो दू स रे में थी — ‘अभ्यासाद् ध्यानमौनािद ’

४ दुष्करं ‘िकम् (अिस्त)?’ का िवधे य-िवशेषण चािहए — नपुंस किलङ् ग पथमा एकवचन दुष्क रम्

अन्वय-क्रम पर ध्यान द जए: ोक म ‘अभ्यासेन क्रयाः सवाः’ है, पर अन्वय म ‘सवाः क्रयाः अभ्यासेन’ हो गया
— क्य क गद्य-क्रम म वशेषण वशेष्य से पहले आता है और करण-पद क्रया के पास। इसी तरह
‘ कमभ्यासस्य दुष्करम्’ का अन्वय ‘अभ्यासस्य दुष्करं कम् (अ स्त)’ बना — प्रश्नवाचक अन्त म। यही अन्वय बनाने
का नयम है।

कोष्ठक क्य ह: ‘( सध्य न्त)’ तथा ‘(अ स्त)’ ोक म ह ही नह — वे अध्याहृत क्रयाएँ ह जन्ह अथ पूरा करने के
लए जोड़ना पड़ता है। संस्कृत म ‘अ स्त/भव त’ तथा प्रसंग से स्पष्ट क्रया प्रायः छोड़ द जाती है; अन्वय लखते
समय उसे कोष्ठक म जोड़ दे ना चा हए।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत्
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श्रेष्ठः यत् यत् …………… इतरः जनः तत् तत् एव (आचर त)। सः यत् …………… कुरुते, लोकः तत्
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प्र.6 (ख)

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…………… ।

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पूणः अन्वयः — श्रेष्ठः यत् यत् आचर त इतरः जनः तत् तत् एव (आचर त)। सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवतते।

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( हन्द — श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरा व्य क्त भी वही-वही करता है। वह जसे प्रमाण बनाता है, समाज उसी का

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अनुसरण करता है।)

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मूल श्लोक (श्लोक ३, श्रीमद् भ गवद् गीता ३.२१) —
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यद्य दाचरित श्र ेष्ठः त त्तदे वेत रो जनः।

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स यत्पमाणं कु रु ते लोक स्तदनुवत ते ॥
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a gl रक्त ानम् भृतम् पहचानने का सूत्र

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पदम्

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o ; कोष्ठक में आगे ‘(आचरित)’ दोहराया गया है — वही िक्रया यहाँ मूल
क्र.याcचािहए agl
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१ आचरित ‘श्रेष्ठः’ कत है, उसे ि
रूप में है
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२ पमाणं
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‘कु रुते’ सकम क है — क्या बनाता है ? उ त्त र नपुंस किलङ् ग िद्वतीया पमाणम्

क्रया िरक्त है : अनुवतते (अनु +.c√oवृतm
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३ ‘लोकः तत् ___’ — कत तथा कम दोनों है,ं ि ,् लट् , आ त्मनेपद )

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अनुवतते

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m . यत् — तत् तत्’ क जोड़ी: संस्कृत म यत् (जो) और तत् (वह) सदा जोड़ेa म चलते ह — ‘यत् … तत् …’।
as e‘यत्

agl यहाँ दोन क आवृ त्त हुई है (यत् यत् / तत् तत्), जसका अथ है ‘जो-जो … वही-वही’ — अथात् कोई भी बात
छू टती नह । दूसरी पं क्त म भी वही जोड़ी है — ‘सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवतते’।
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स जोड़कर दे खए: ‘यद्यदाचर त’ = यत् + यत् + आचर त; ‘तत्तदे वेतरो जनः’ = तत् + तत् + एव + इतरः +
जनः; ‘लोकस्तदनुवतते’ = लोकः + तत् + अनुवतते। यही अ न्तम पद अभ्यास के प्रश्न ८ (च) म स न्ध वच्छे द के लए
दया गया है — वहाँ उत्तर तीन भाग म आएगा।

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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 76
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

प्रश्न ७ — यथो चतं मेलनं कुरुत ( ोकांशः — ोतोग्रन्थः)

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.7 यथो चतं मेलनं कुरुत — ोकांशः : (क) पुराण मत्येव न साधु सवम् (ख) प्रारभ्य चोत्तमजनाः न प रत्यज न्त (ग)
यद्यदाचर त श्रेष्ठः (घ) धृ तः क्षमा दमोऽस्तेयम् (ङ) उद्यो गनं पुरुष सहमुपै त लक्ष्मीः ॥ ोतोग्रन्थः : १. मनुस्मृ तः
२. पञ्चतन्त्रम् ३. नी तशतकम् ४. माल वका ग्न मत्रम् ५. श्रीमद्भगव ता

शुद्धं मेलनम् — (क)–४, (ख)–३, (ग)–५, (घ)–१, (ङ)–२।
( हन्द — (क) माल वका ग्न मत्रम्, (ख) नी तशतकम्, (ग) श्रीमद्भगव ता, (घ) मनुस्मृ तः, (ङ) पञ्चतन्त्रम्।)

क्रमः ोकांशः ोतोग्रन्थः ग्रन्थकता / पहचानने का सूत्र
काव्यरूपम्

(क) पुर ाणिमत्येव न साध ु ४. मालिवकािग्निमत्रम् का लदासः — यह नाटक क प्रस्तावना का ोक है, जहाँ
सवम् (१.२) रूपकम् (नाटक) पुराने और नए क व क तुलना पर उत्तर दया
गया है

(ख) पारभ्य चोत्तमजनाः न ३. नीितशतकम् (२७) भतृह रः — नी त- अधम-मध्यम-उत्तम क त्र वध वग करण-
पिरत्यजिन्त सा हत्यम् शैली भतृह र क अपनी पहचान है

(ग) यद्यदाचरित श्रेष्ठः ५. श्रीमद् भगवद् गीता मह षः व्यासः — ‘लोकसंग्रह’ का प्रसंग — कमयोग-अध्याय का
(३.२१) ानोपदे शः प्र सद्ध ोक

(घ) ध ृितः क्षमा १. मनुस्मृितः (६.९२) मनुः — ‘धमलक्षणम्’ क प रभाषा दे ना धमशास्त्र का
दमोऽस्तेयम् धमशास्त्रीयग्रन्थः ही काम है

(ङ) उद्योिगनं २. पञ्चतन्त्रम् — वष्णुशमा — कथा- पञ्चतन्त्र क सीधी, व्यावहा रक उद्यम-प्रशंसा
पुरुषिसंहमुपैित लक्ष्म ीः िमत्रभेद ः (१४९) सा हत्यम् — कथा के बीच रखा उपदे श- ोक

मेलन कैसे जाँच: दो कसौ टयाँ एक साथ लगाइए। पहली — वषय: धम क प रभाषा धमशास्त्र से आएगी (घ–१);
उद्यम क प्रशंसा कथा-सा हत्य से (ङ–२); तीन प्रकार के मनुष्य का वग करण नी त-सा हत्य से (ख–३); नए-पुराने
काव्य क चचा नाटक क प्रस्तावना से (क–४); और श्रेष्ठ पुरुष के अनुकरण क बात गीता से (ग–५)। दूसरी —
पाठ: पृष्ठ ६९–७० पर हर ोक के नीचे उसका ोत कोष्ठक म छपा है; अपना उत्तर वह से मला ली जए। वषय से
अनुमान लगाइए, पाठ से पु ष्ट क जए — तभी उत्तर पक्का होगा।

ध्यान द: पाठ म आठ ोक ह पर मेलन म केवल पाँच ोत दए गए ह। छू टे हुए तीन ह — मनुस्मृ त ६.४६ ( ोक
१, जसका ोत (घ) वाले से एक ही है), सुभा षतरत्नभाण्डागारः ( ोक ४) तथा कराताजुनीयम् ( ोक ८)। इन
तीन के ोत भी याद र खए — परीक्षा म वही पूछे जा सकते ह। ‘सुभा षतरत्नभाण्डागार’ कसी एक क व क रचना
नह , अनेक क वय के सुभा षत का सङ् ग्रह-ग्रन्थ है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 76–77
प्रश्न ८ — रेखाङ् कतेषु पदे षु स वच्छे दं कुरुत (यथा — यो बहून्य प साधयेत् = बहू न + अ प)

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.8 (क) धृ तः क्षमा दमोऽस्तेयम्।

उत्तरम् — दमोऽस्तेयम् = दमः + अस्तेयम्।
( हन्द — दम = इ न् य तथा मन का संयम; अस्तेय = चोरी न करना।)

दमः + अस्ते यम्

िवसग ‘अः’ के बाद ‘अ’ आया → अः + अ = ओ , और अगला ‘अ’ लुप्त होकर अवगह (ऽ) से िदखाया जाता है

दमः + अस्ते यम् → दमो + ऽस्ते यम् → दमोऽ स्ते यम्

नयम — वसगस : «अतोऽ त नत्यम्» — य द ‘अ’ के बाद वसग हो और उसके आगे भी ‘अ’ हो, तो वसग
तथा उससे पहले का ‘अ’ मलकर ‘ओ’ बन जाते ह और आगे वाला ‘अ’ लुप्त हो जाता है; उस लोप का चह्न ही
अवग्रह ‘ऽ’ है। उदाहरण — कः + अत्र → कोऽत्र (यह भी इसी पाठ के छठे ोक म है), शवः + अ प →
शवोऽ प, सः + अयम् → सोऽयम्।

ध्यान द: अवग्रह ‘ऽ’ कोई अक्षर नह , लुप्त ‘अ’ का चह्न है। स न्ध वच्छे द करते समय उसे हटाकर ‘अ’ लौटा
द जए — इसी लए उत्तर ‘दमो + स्तेयम्’ नह , ‘दमः + अस्तेयम्’ है। ‘अस्तेयम्’ स्वयं नञ्-तत्पुरुष समास है (न
स्तेयम् = चोरी न करना)।

प्र.8 (ख) पुराण मत्येव न साधु सवम्।

उत्तरम् — पुराण मत्येव = पुराणम् + इ त + एव।
( हन्द — ‘पुराना है — केवल इसी कारण’।)

चरण १ — पुराणम् + इित → पुराणिमित (म् के बाद स्वर आने पर वह अगले स्वर से जुड़ जाता है)

चरण २ — इित + एव → इत्येव (यण् सिन्ध — इ + ए में ‘इ’ का ‘य्’)

पूण रूप — पुराणिमत्येव

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नयम — यण् स : «इको यण च» — इ/ई, उ/ऊ, ऋ के बाद कोई भन्न स्वर आए तो क्रमशः य् , व् , र् हो जाता
है। यहाँ ‘इ त’ का अ न्तम ‘इ’ आगे ‘एव’ का ‘ए’ पाकर ‘य्’ बन गया — इ त + एव = इत्येव। इसी नयम से —
अ त + अन्तः → अत्यन्तः, सु + आगतम् → स्वागतम्, पतृ + आदे शः → पत्रादे शः।

तीन भाग क्य : पुस्तक ने इस पद के लए तीन रक्तस्थान दए ह, इस लए वच्छे द भी तीन पद म करना है —
पुराणम् + इ त + एव। यहाँ ‘इ त’ उद्धरण-सूचक अव्यय है (‘ऐसा कहकर, इस कारण’) और ‘एव’ अवधारण का —
‘केवल इसी कारण’। अथ बनता है : ‘केवल पुराना है — इसी कारण सब कुछ अच्छा नह होता’।

प्र.8 (ग) वघ्नैः पुनर प प्र तहन्यमानाः।

उत्तरम् — पुनर प = पुनः + अ प।
( हन्द — ‘ फर भी, बार-बार होने पर भी’।)

पुन ः + अिप
‘पुन र्’ का िवसग स्वर के बाद और घोष वण/स्वर के आगे िफर से र् हो जाता है

पुन ः + अिप → पुन र् + अिप → पुन रिप

नयम — वसगस (रत्व): जन शब्द का मूल रूप ही ‘र्’ म समाप्त होता है (पुनर्, प्रातर्, अन्तर्, पुनश्च के
‘पुनर्’), उनका वसग स्वर या घोष व्यञ्जन के आगे फर से ‘र्’ बन जाता है। उदाहरण — पुनः + आगमनम् →
पुनरागमनम्, प्रातः + उ ाय → प्रातरु ाय, अन्तः + आत्मा → अन्तरात्मा। यही कारण है क ‘पुनः’ का वच्छे द
‘पुन + र’ नह , ‘पुनः + अ प’ है।

अथ पर ध्यान: ोक म ‘पुनः पुनर प’ है — अथात् ‘बार-बार, फर भी’। दोहराव जान-बूझकर है : उत्तम जन पर
वघ्न एक बार नह , बार-बार टकराते ह, तब भी वे नह छोड़ते। ‘अ प’ यहाँ ‘ फर भी’ के अथ म है, ‘भी’ के साधारण
अथ म नह ।

प्र.8 (घ) प्रारभ्य चोत्तमजनाः न प रत्यज न्त।

उत्तरम् — चोत्तमजनाः = च + उत्तम + जनाः (स क दृ ष्ट से — च + उत्तमजनाः)।
( हन्द — ‘और उत्तम लोग’।)

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सिन्धः — च + उत्तमजनाः

अ + उ = ओ (गुण सिन्ध)

च + उत्तमजनाः → चोत्तमजनाः

समासः — उत्तमाः जनाः = उत्तमजनाः (कमधारय)

नयम — गुण स : «आ णः» — अ/आ के बाद इ/ई आए तो ‘ए’, उ/ऊ आए तो ‘ओ’, और ऋ आए तो ‘अर्’
हो जाता है। यहाँ ‘च’ का ‘अ’ और ‘उत्तम’ का ‘उ’ मलकर ‘ओ’ बने — च + उ = चो। इसी नयम से — सूय +
उदयः → सूय दयः, गङ्गा + उदकम् → गङ्गोदकम्, दे व + इन् ः → दे वेन् ः।

तीन रक्त ान क्य : पुस्तक ने यहाँ तीन खाने दए ह, इस लए उत्तर ‘च + उत्तम + जनाः’ लखना अपे क्षत है। पर
सावधान र हए — स न्ध केवल ‘च’ और ‘उत्तम’ के बीच है; ‘उत्तम’ तथा ‘जनाः’ के बीच स न्ध नह , समास है
(उत्तमाः जनाः = उत्तमजनाः, कमधारय)। परीक्षा म य द केवल दो खाने ह तो ‘च + उत्तमजनाः’ ही ल खए।

प्र.8 (ङ) वघ्न वहता वरम न्त मध्याः।

उत्तरम् — वघ्न वहता वरम न्त = वघ्न वहताः + वरम न्त।
( हन्द — ‘ वघ्न से आहत (लोग) रुक जाते ह’।)

िवघ्निवहताः + िवरमिन्त

‘आः’ के बाद घोष व्यञ्जन (व्) आया → िवसग का लोप हो जाता है और ‘आ’ शेष रहता है

िवघ्निवहताः + िवरमिन्त → िवघ्निवहता िवरमिन्त

नयम — वसगस (आः + घोष): «भोभगोअघोअपूवस्य योऽ श» के अन्तगत — य द ‘आः’ के आगे कोई घोष
व्यञ्जन (ग, घ, द, ध, ब, भ, य, र, ल, व, ह, तथा सब अनुना सक) या स्वर हो, तो वसग लुप्त हो जाता है और
‘आ’ ज्य का त्य रहता है। उदाहरण — बालकाः + गच्छ न्त → बालका गच्छ न्त; दे वाः + वद न्त → दे वा वद न्त;
नराः + याचन्ते → नरा याचन्ते।

अथ न बदले: वसग लुप्त होने से रूप ‘ वघ्न वहता’ दखता है, पर वह बहुवचन ही है — ‘मध्याः’ (बहुवचन) का
वशेषण। इस लए अथ है ‘ वघ्न से आहत हुए मध्यम श्रेणी के लोग’। ‘ वघ्न वहताः’ स्वयं तृतीया-तत्पुरुष समास है
— वघ्नैः वहताः; यही वग्रह अभ्यास के प्रश्न ९ (क) म समस्तपद बनाने के लए दया गया है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत्
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लोकस्तदनुवतते।
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प्र.8 (च)

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agl — लोकस्तदनुवतते = लोकः + तत् + अनुवतते।
उत्तरम्
( हन्द — ‘समाज उसी का अनुसरण करता है’।)

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चरण १ — लोकः + तत् → लोक स्तत् (िवसगसिन्ध — अः + त् → अस्त्)
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चरण २ — तत् + अनुवतते → तदनुवत ते (जश्त्व — त् + अ → द् )

पूण रूप — लोक स्तदनुवत ते
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g ‘स्’ बन जाता है (उसी वग
m .cएक साथ: (१) वसगस (सत्व): वसग के आगे य द त्, थ् हो तो वसग a
aकाseऊष्म वण) — रामः + तत्र → रामस्तत्र; बालकः + तष्ठ त → बालक स्तष्ठ त। (२) जश्त्व स : «झलां
दो नयम

agl जशोऽन्ते» — पद के अन्त का कठोर व्यञ्जन स्वर या घोष व्यञ्जन के आगे अपने वग का तीसरा वण बन जाता है :
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त् → द्, क् → ग्, प् → ब्, च् → ज्। यहाँ ‘तत् + अनुवतते’ म त् का द् हो गया।

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ध्यान द: तीन रक्तस्थान ह, अतः वच्छेglद भी तीन पद म — लोकः + तत् + अनुवतते। ‘तत्’ यहाँ पछली पं क्त के
‘यत् प्रमाणम्’ का जोड़ीदार है, अथात् ‘उसी प्रमाण का’। यह पूरा पद अभ्यास के प्रश्न ६ (ख) म भी आया है, जहाँ

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अन्वय म ‘अनुवतते’ भरना था।

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a s em(छ)
agl प्र.8 सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते।

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उत्तरम् — परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते = परीक्ष्य + अन्यतरत् + भजन्ते।

agl
( हन्द — ‘जाँचकर दोन म से (जो उत्तम हो) उसे अपनाते ह’।)

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चरण १ — परीक्ष्य + अन्यतरत् → परीक्ष्यान्यतरत् (दीघ सिन्ध — अ + अ = आ)
m .
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चरण २ — अन्यतरत् + भजन्ते → अन्यतरद् भ जन्ते (जश्त्व — त् + भ् → द् )
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se m पूण रूप — परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते
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co agl
दोन नयम: (१) द घ स : «अकः सवण द घः» — समान स्वर मल तो दोन मलकर द घ हो जाते ह : अ + अ

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ase
= आ, इ + इ = ई, उ + उ = ऊ। यहाँ ‘परीक्ष्य’ का अ न्तम ‘अ’ और ‘अन्यतरत्’ का आ द ‘अ’ मलकर ‘आ’ बने।

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(२) जश्त्व: पद के अन्त का ‘त्’ घोष व्यञ्जन ‘भ्’ के आगे ‘द्’ बन गया।

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अथ जोड़कर दे खए: ‘परीक्ष्य’ (जाँचकर) + ‘अन्यतरत्’ (दोन म से एक को) + ‘भजन्ते’ (अपनाते ह) — यही
सातव ोक का सार है। ‘अन्यतर’ शब्द वशेष है : इसका अथ ‘कोई एक’ नह , ‘दो म से एक’ होता है — यहाँ
‘पुराना’ और ‘नया’ — इन्ह दो म से जो परीक्षा म खरा उतरे, वही।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 77
प्रश्न ९ — अत्र क तचन वग्रहवाक्या न दत्ता न स न्त। तेषां समस्तपदा न पाठात् चत्वा लखत (यथा — मनसा पूतं समाचरेत् = मनःपूतम्)

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.9 (क) वघ्नैः वहताः (कायात्) वरम न्त।

समस्तपदम् — वघ्न वहताः। ( हन्द — वघ्न से आहत, रुकावट क चोट खाए हुए।)

िवगहः — िवघ्नै ः िवहताः

समस्तपदम् — िवघ्निवहताः

समासस्य नाम — त ृत ीया-त त्पुरु षः (‘िवघ्नै ः’ त ृत ीया में है, वही समास में लुप्त हो गई)

पाठ की पंिक्त — पारभ्य िवघ्निवहता िवरमिन्त मध्याः (श्लोक ५)

यही तत्पुरुष क्य , दूसरा क्य नह : तत्पुरुष समास का नाम उस वभ क्त से पड़ता है जो पूवपद म वग्रह करते
समय आती है। यहाँ वग्रह ‘ वघ्न◌ैः वहताः’ है — तृतीया; इस लए यह तृतीया-तत्पुरुष हुआ। य द वग्रह ‘ वघ्नानां
वहताः’ होता तो षष्ठी-तत्पुरुष कहलाता। अथ भी यही माँगता है : वघ्न कता ह (उन्ह ने चोट पहुँचाई), इस लए
तृतीया ही ठ क है — «कतृकरणे तृतीया»।

व्याकरण: ‘ वहताः’ = व + √हन् + क्त प्रत्यय, पुं.प्र.ब.व. — ‘मारे गए, आहत’। पुस्तक क शब्दाथ-ता लका इसी
पद को ‘ वघ्नैः वहताः = वघ्न से हत’ दे कर वग्रह पहले ही बता दे ती है। यही पद अभ्यास के प्रश्न ८ (ङ) म
स न्ध वच्छे द के लए भी आया है।

प्र.9 (ख) वस्त्रेण पूतं जलं पबेत्।

समस्तपदम् — वस्त्रपूतम्। ( हन्द — वस्त्र से छाना हुआ।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

िवगहः — वस्त्रेण पूत म्

समस्तपदम् — वस्त्रपूत म्

समासस्य नाम — त ृत ीया-त त्पुरु षः
पाठ की पंिक्त — वस्त्रपूतं जलं िपबेत ् (श्लोक १)

पूरे ोक का साँचा एक ही है: पहले ोक के चार वशेषण इसी ढाँचे म बने ह और चार तृतीया-तत्पुरुष ह —
दृ ा पूतम् = दृ ष्टपूतम्, वस्त्रेण पूतम् = वस्त्रपूतम्, सत्येन पूताम् = सत्यपूताम्, मनसा पूतम् = मनःपूतम्। एक बार
यह साँचा पकड़ ली जए, चार के वग्रह अपने-आप बन जाएँगे। इसी लए पुस्तक ने ‘यथा’ म ‘मनसा पूतं =
मनःपूतम्’ दे कर साँचा पहले ही दखा दया।

ध्यान द: समास बनाते समय पूवपद क वभ क्त का लोप होता है — ‘वस्त्रेण’ का ‘एन’ गरकर केवल ‘वस्त्र’ शेष
रहा। समस्तपद का लङ्ग- वभ क्त-वचन उत्तरपद से आता है : ‘जलम्’ नपुंसक लङ्ग तीया एकवचन है, इस लए
‘वस्त्रपूतम्’ भी वही।

प्र.9 (ग) पुरुषः सहः इव तम् उपै त लक्ष्मीः।

समस्तपदम् — पुरुष सहम्। ( हन्द — सह जैसे (पराक्रमी) पुरुष को।)

िवगहः — पुरु षः िसंहः इव

समस्तपदम् — पुरु षिसंहम् (श्लोक में िद्वतीया एकवचन में)

समासस्य नाम — कमधारयः (उपमानोत्तरपद कमधारय)

पाठ की पंिक्त — उद्योिगनं पुरु षिसंहम् उपैित लक्ष्मीः (श्लोक ६)

यह कमधारय क्य है, तत्पुरुष क्य नह : तत्पुरुष म दोन पद भन्न वस्तुओं के होते ह (राजपुरुषः = रा ः पुरुषः
— राजा और पुरुष अलग)। पर यहाँ दोन पद एक ही वस्तु के ह — वही पुरुष, और वही सह-सा; अथात् दोन पद
समाना धकरण ह। जहाँ पूवपद और उत्तरपद एक ही वस्तु को कह, वहाँ कमधारय होता है। और चूँ क उत्तरपद
‘ सह’ उपमान है ( जससे तुलना क गई), इसे वशेष रूप से ‘उपमानोत्तरपद कमधारय’ कहते ह।

ऐसे और उदाहरण: पुरुषव्याघ्रः (व्याघ्र-सा पुरुष), नर सहः, मुखकमलम् (कमल-सा मुख), वद्यारत्नम्। ध्यान
द जए, इनम ‘इव’ लुप्त हो जाता है — वग्रह म वह लौट आता है। पाठ म इस पद का प्रयोजन भी यही है : लक्ष्मी
केवल प रश्रमी को नह , सह जैसे नभय और पराक्रमी प रश्रमी को मलती है।

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प्र.9 (घ) उत्तमाः जनाः न प रत्यज न्त।

समस्तपदम् — उत्तमजनाः। ( हन्द — उत्तम श्रेणी के लोग।)

िवगहः — उत्तमाः जनाः

समस्तपदम् — उत्तमजनाः

समासस्य नाम — कमधारयः (िवशेषण-पूवपद कमधारय)

पाठ की पंिक्त — पारभ्य चोत्तमजनाः न पिरत्यजिन्त (श्लोक ५)

कमधारय क पहचान: यहाँ ‘उत्तमाः’ वशेषण है और ‘जनाः’ वशेष्य — दोन एक ही वस्तु (उन्ह लोग ) को
कहते ह और दोन प्रथमा बहुवचन म ह, अथात् समाना धकरण ह। जहाँ वशेषण और वशेष्य का समास हो, वहाँ
कमधारय होता है — नीलकमलम् (नीलं कमलम्), महापुरुषः (महान् पुरुषः), पीताम्बरम् (पीतम् अम्बरम्)।

पाठ म तीन श्रे णयाँ: पाँचव ोक म तीन प्रकार के लोग ह — नीचैः (अधम), मध्याः (मध्यम) तथा उत्तमजनाः।
तीन म केवल अ न्तम पद समस्तपद है; पहले दो एक ही शब्द ह। समास बनाने का अभ्यास इसी पर कराया गया है।

प्र.9 (ङ) न ववेकः परमापदां पदम्।

समस्तपदम् — अ ववेकः। ( हन्द — अ ववेक, बना सोचे-समझे काम करना।)

िवगहः — न िववेक ः

समस्तपदम् — अिववेक ः
समासस्य नाम — नञ्-त त्पुरु षः

पाठ की पंिक्त — सहसा िवदधीत न िक्रयाम् अिववेक ः परमापदां पदम् (श्लोक ८)

नञ्-तत्पुरुष का नयम: ‘न’ (नञ्) के साथ बने समास को नञ्-तत्पुरुष कहते ह। नयम यह है — व्यञ्जन से
आरम्भ होने वाले शब्द के आगे ‘न’ का ‘अ’ हो जाता है और स्वर से आरम्भ होने वाले के आगे ‘अन्’। जैसे — न
ववेकः = अ ववेकः, न धमः = अधमः, न सत्यम् = असत्यम्; कन्तु न आ दः = अन◌ा दः, न इच्छा = अ नच्छा, न
अन्तः = अनन्तः। इसी पाठ म ‘अस्तेयम्’ (न स्तेयम्), ‘अक्रोधः’ (न क्रोधः) तथा ‘अवद्यम्’ (न वद्यम्) भी इसी प्रकार
के समास ह।

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अथ पर ध्यान: ‘अ ववेक’ का अथ केवल ‘ ववेक न होना’ नह , ववेक का उलटा — जल्दबाज़ी म, बना सोचे
काम कर बैठना — है। नञ्-तत्पुरुष प्रायः अभाव नह , वरोध बताता है : ‘अधम’ धम का न होना नह , धम के
वरुद्ध आचरण है। ोक इसी लए उसे ‘परमापदां पदम्’ ( वप त्तय का सबसे बड़ा घर) कहता है।

स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 78
भारतीय- ान-परम्परायाः ग्रन्थ-सा रणी — ग्रन्थस्य नाम · परम्परा- ानम् · ग्रन्थकता

स्वाध्यायान्मा प्रमदः

प्र.1 “अधो ल खतां सा रण प ठत्वा भारतीय- ान-परम्परा- वषये, कवीनां काल वषये च जानीत।” — सा रण
पूरयत, तस्याः प रचयं च लखत। एतेषु ग्रन्थेषु केषां ोकाः अ स्मन् पाठे आगताः ?

उत्तरम् — सा रणी अष्टानां प्र सद्धानां संस्कृतग्रन्थानां नाम, भारतीय- ान-परम्परायां तेषां ानं, तेषां ग्रन्थकतारं च
दशय त। एतेषु मनुस्मृ तः, श्रीमद्भगव ता, नी तशतकम्, पञ्चतन्त्रम्, माल वका ग्न मत्रम्, कराताजुनीयम् — इ त षड् भ्यः
ग्रन्थेभ्यः पाठस्य ोकाः गृहीताः स न्त।
( हन्द — यह सा रणी आठ प्र सद्ध संस्कृत ग्रन्थ का नाम, भारतीय ान-परम्परा म उनका स्थान और उनके रच यता बताती है।
इनम से छह ग्रन्थ — मनुस्मृ त, श्रीमद्भगव ता, नी तशतक, पञ्चतन्त्र, माल वका ग्न मत्र तथा कराताजुनीय — से इस पाठ के
ोक लए गए ह।)
पुस्तक क सा रणी (पूण रूप म, काल नदशस हता) —

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत्
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क्रमः ग्रन्थस्य नाम भारतीय- ान- ग्रन्थकता अनुमा नतः कालः तथा सं क्षप्तः प रचयः (जोड़ी

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परम्परा- ानम् गई जानकारी)
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१.
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रामायणम् ऐ तहा सकं काव्यम् मह षः आिदकाव्य; वाल्मीिक ‘आिदकिव’ कहलाते है।ं सात काण्ड,
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वाल्मी कः अनुष्टुप ् छन्द। इसी से भारत की समस्त काव्य-परम्परा
आरम्भ होती है।

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२. मनुस्म ृितः धमशास्त्रीयग्रन्थः मनुः सबसे पिस द्ध स्मृित-गन्थ; आचार, धम तथा समाज-व्यवस्था

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का िववेचन। पाठ के श्लोक १ (६.४६) तथा श्लोक २ (६.९२)

gl a इसी से है।ं
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३. श्रीमद् भगवद् ग ीता ानोपदे शः मह षः महाभारत के भीष्मपव का अंश; १८ अध्याय, ७०० श्लोक।
व्यासः
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पाठ का श्लोक ३ (३.२१) कमयोग-अध्याय से है।
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e , पाणायाम, मुदा तथा
हठयोग का पामािणक गन्थ —sआसन
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४. हठयोगपदीिपका योग-दशनम् स्वात्मारामः

m ag पाठ में कोई श्लोक नही ं िलया
समािध का िववेचन। इससे

l a se गया।
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a ५. नीितशतकम् नी त-सा हत्यम् भतृह रः ृ के तीन शतकों (नीित, शङृ ् गार, वैराग्य) में पथम। पाठ
भतहिर

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का श्लोक ५ (२७) इसी से — अधम, मध्यम तथा उ त्तम जनों
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का पिस द्ध वग करण।
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६. पञ्चतन्त्रम् कथा-सा हत्यम् वष्णुशमा पाँच तन्त्रों (िमत्रभेद ः, िमत्रस म्पािप्तः, काकोलूक ीयम्,
ल ब्धपणाशम्, अपरीिक्षतकारकम्) में नीित-कथाएँ। पाठ का
श्लोक ६ (िमत्रभेद ः १४९) इसी से ।

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कािलदास के तीन नाटकों मेm .
७.
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मालिवकािग्निमत्रम् रूपकम् का लदासः
e ं कापथमश्लोक
अिभ ानशाकु न्तलम्)a।sपाठ
(अन्य — िवक्रमोवशीयम्,

. co पस्तावना से ।a g l ७ (१.२) इसकी

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ag ८. िकराताजुनीयम् महाकाव्यम् भार वः अठारह सग ं का महाकाव्य; अजुन तथा िकरातरूपधारी िशव
की कथा। ‘भारवेरथगौरवम्’ पिस द्ध है। पाठ का श्लोक ८
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(२.३०) इसी से ।
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यह सा रणी यहाँ क्य द गई: पाठ के आठ सुभा षत आठ अलग-अलग ग्रन्थ से आए ह, और वे ग्रन्थ भी अलग-
अलग वधाओं के ह। सा रणी यही दखाती है क एक ही जीवन-मूल्य को भारतीय परम्परा ने कतने रूप म कहा

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— धमशास्त्र ने नयम बनाकर, गीता ने उपदे श दे कर, नी तशतक ने वग करण करके, पञ्चतन्त्र ने कथा म परोकर,

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नाटक ने प्रस्तावना म रखकर और महाकाव्य ने वणन के बीच। इसी लए ‘भारतीय- ान-परम्परा’ केवल ग्रन्थ क

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ी नह , वधाओं का जाल है।
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दो बात ध्यान दे ने योग्य: (१) सा रणी का शीषक ‘कवीनां काल वषये च जानीत’ कहता है, पर ता लका म काल
का कोई स्तम्भ नह है — इस लए ऊपर क ता लका के अ न्तम स्तम्भ म वह जानकारी जोड़ द गई है; वद्याथ
पुस्तकालय या शक्षक क सहायता से उसे और वस्तार दे सकते ह। (२) सा रणी म रामायणम् तथा
हठयोगप्रद पका ह, जनसे पाठ म कोई ोक नह लया गया; और पाठ के चौथे ोक का ोत
सुभा षतरत्नभाण्डागारः सा रणी म नह है — क्य क वह कसी एक क व क रचना नह , अनेक क वय के
सुभा षत का सङ् ग्रह-ग्रन्थ है।

यस्तु क्रयावान् मनुजः स व ान् — पृष्ठ 78
१. जीवनमूल्या न अ धकृत्य पञ्च-पञ्च सुभा षतानां सङ् ग्रहः · २. दृ ष्टपूतं, वस्त्रपूतं, सत्यपूतं च आचरणं — स्वानुभवकथनम्

यस्तु क्रयावान् मनु जः स व ान्

प्र.1 पाठे आगतेषु सुभा षतेषु का न-का न जीवनमूल्या न स न्त ? ता न जीवनमूल्या न अ धकृत्य पञ्च पञ्च
सुभा षता न सङ्ग त। तेषां सन्दभग्रन्थानां नामा न अ प लखत।

यह सङ् ग्रह-प रयोजना है। इसे दो चरण म क जए — पहले पाठ के आठ सुभा षत से जीवनमूल्य नका लए, फर हर मूल्य के
लए अन्यत्र से पाँच-पाँच सुभा षत ढूँ ढ़कर ोत स हत ल खए।
चरण १ — पाठ के सुभा षत म कौन-से जीवनमूल्य ह —

ोकः जीवनमूल्यम् हन्द म ोतोग्रन्थः

१ िववेक ः, अिहंस ा, स्वच्छता, सत्यवचनम्, दे खकर चलना, छानकर पीना, स त्य बोलना, मन से मनुस्मृ तः ६.४६
मनःशुिद्धः पिवत्र आचरण

२ धम चरणम् (दश धमलक्षणािन) धै य, क्षमा, संयम, अस्तेय, शौच, इिन्द यिनगह, बुिद्ध, मनुस्मृ तः ६.९२
िवद्या, स त्य, अक्रोध

३ आदशस्थापनम्, उत्तरदाियत्वम् बड़ ों का आचरण ही समाज का उदाहरण बनता है श्रीमद्भगव ता ३.२१

४ अभ्यासः, पिरश्रमः बार-बार करने से हर किठन काम सधता है सुभा षतरत्नभाण्डागारः

५ धै यम्, अध्यवसायः (लगन) िवघ्न आने पर भी काम न छोड़ ना नी तशतकम् २७

६ पुरुषाथः, आत्मिवश्वासः भाग्य के भरोसे न बैठना, अपनी शिक्त से काम करना पञ्चतन्त्रम् — मत्रभेदः
१४९

७ िववेचनशिक्तः, स्वतन्त्रिचन्तनम् पुराने या नए के मोह में न पड़ कर जाँचकर स्वीकार माल वका ग्न मत्रम् १.२
करना

८ िवमशः, दू र दिशता जल्दबाज़ ी से बचना, सोच-िवचारकर काम करना कराताजुनीयम् २.३०

अच्छे सङ् ग्रह म क्या होना चा हए —

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हर सुभा षत शुद्ध लखा हो — वसग, अनुस्वार तथा संयुक्ताक्षर सही ह ।
हर सुभा षत के नीचे सन्दभग्रन्थ का नाम कोष्ठक म हो, जैसा पाठ म ही छपा है।
साथ म हन्द अथ क एक पं क्त हो, ता क सङ् ग्रह पढ़ने योग्य बने।
एक ही ग्रन्थ से पाँच न ली जए; दो-तीन भन्न ग्रन्थ से ली जए — इससे परम्परा क व्यापकता दखती है।

आदश उत्तरम् (नमूना सङ् ग्रह — ‘अभ्यासः तथा प रश्रमः’ इ त जीवनमूल्यम्) —

॥ अभ्यासः पिरश्रमश्च ॥

१. अभ्यासेन िक्रयाः सव ः अभ्यासात् सकलाः कलाः।

अभ्यासाद् ध्यानमौनािद िकमभ्यासस्य दुष्करम्॥ (सुभािषतरत्नभाण्डागारः)

— अभ्यास से सब कु छ सधता है; अभ्यास के िलए किठन कु छ नही ं।

२. उद्यमेन िह िसध्यिन्त काय िण न मनोरथै ः।

न िह सुप्तस्य िसंहस्य पिवशिन्त मुखे मृगाः॥ (िहतोपदेशः — पस्तावना)

— काम उद्यम से िसद्ध होते है,ं के वल मन की इच्छाओं से नही ं।

३. उद्योिगनं पुरु षिसंहमुपैित लक्ष्मीः दै वेन दे यिमित कापुरु षा वदिन्त।

दै वं िनहत्य कु रु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृ ते यिद न िसध्यित कोऽत्र दोषः॥ (पञ्चतन्त्रम् — िमत्रभेदः)

— लक्ष्मी उद्यमी के पास स्वयं आती है; भाग्य को हराकर पुरु षाथ करो।

४. पारभ्यते न खलु िवघ्नभयेन नीचै ः पारभ्य िवघ्निवहता िवरमिन्त मध्याः।

िवघ्नै ः पुन ः पुन रिप पितहन्यमानाः पारभ्य चोत्तमजनाः न पिरत्यजिन्त॥ (नीितशतकम् — २७)

— उत्तम लोग िवघ्नों की बार-बार चोट खाकर भी काम नही ं छोड़ ते ।

५. काकचे ष्टा बकोध्यानं श्वानिनद ा तथै व च।
अल्पाहारी गृहत्यागी िवद्यािथनः पञ्चलक्षणम्॥ (चाणक्यनीितः)

— कौए-सी चे ष्टा, बगुले-सा ध्यान, कु त्ते-सी हल्की नी ंद — ये िवद्याथ के लक्षण है।
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(इसी ढं ग से शेष चार मूल्य के लए भी पाँच-पाँच सुभा षत एकत्र क जए —)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

जीवनमूल्यम् सङ् ग्रह के लए सुझाए गए सुभा षत के आर म्भक पद सन्दभग्रन्थाः

सत्यम् तथा स त्यं बयू ात् िपयं बयू ात् · स त्यमेव जयते नानतृ म् · स त्यपूतां वदे त ् वाचम् · मनुस्मृ तः · मुण्डकोप नषद् · मनुस्मृ तः ·
वाक्संयमः वाणी रसवती यस्य · िपयवाक्यपदानेन सव तुष्यिन्त जन्तवः नी तशतकम् · हतोपदे शः

िववेक ः तथा सहसा िवदधीत न िक्रयाम् · पुराणिमत्येव न साधु सवम् · अनागतिवधाता कराताजुनीयम् · माल वका ग्न मत्रम् ·
दू र दिशता च पत्युत्पन्नमितस्तथा · सव गुणाः काञ्चनमाश्रयिन्त · परोक्षे कायहन्तारं पञ्चतन्त्रम् · नी तशतकम् · चाणक्यनी तः
पत्यक्षे िपयवािदनम्

धमः तथा सदाचारः धृितः क्षमा दमोऽस्तेयम् · धम एव हतो हिन्त · अिहंस ा परमो धमः · न िह मनुस्मृ तः · महाभारतम् · महाभारतम् ·
ानेन सदृ शं पिवत्रिमह िवद्यते · आचारः परमो धमः श्रीमद्भगव ता · मनुस्मृ तः

आदशः तथा यद्यदाचरित श्रेष्ठः · महाजनो येन गतः स पन्थाः · परोपकाराय फलिन्त श्रीमद्भगव ता · महाभारतम् · सुभा षतम्
उत्तरदाियत्वम् वक्षृ ाः · िवद्या ददाित िवनयम् · गुणाः गुण े ष ु गुणा भविन्त · हतोपदे शः · हतोपदे शः

यह काय क्य दया गया: सुभा षत तब तक ‘पाठ’ रहता है जब तक वह अकेला रहे; जब उसी भाव के पाँच
सुभा षत एक साथ रखे जाएँ, तब वह जीवनमूल्य बन जाता है। इसी से यह भी दखता है क एक ही बात को अलग-
अलग क वय ने अलग-अलग चत्र से कहा — कोई सह का उदाहरण दे ता है, कोई बगुले का, कोई वृक्ष का।
इसी लए पुस्तक ‘सन्दभग्रन्थानां नामा न अ प लखत’ पर बल दे ती है : सुभा षत के साथ उसका घर भी जानना
चा हए।

काय क व ध: (१) एक अलग ‘सुभा षत-वही’ बनाइए और हर पृष्ठ पर एक मूल्य र खए। (२) सुभा षत
पुस्तकालय से — ‘सुभा षतरत्नभाण्डागारः’, ‘चाणक्यनी तः’, ‘ हतोपदे शः’, ‘नी तशतकम्’ — या शक्षक क
सहायता से ली जए; इंटरनेट से ल तो दो ोत से मलाकर जाँच ली जए (यही तो सातवाँ ोक सखाता है —
‘सन्तः परीक्ष्य अन्यतरद् भजन्ते’)। (३) हर सुभा षत को कण्ठस्थ क जए; लखा हुआ सङ् ग्रह भूल जाता है,
कण्ठस्थ कया हुआ काम आता है।

प्र.2 दृ ष्टपूतं, वस्त्रपूतं, सत्यपूतं च आचरणं कथं भवेत् इ त वषये स्वस्य अनुभवं कक्षायां कथयत।

यह अनुभव-कथन (भाषण) का काय है — कक्षा म खड़े होकर अपने जीवन का कोई स ा प्रसंग सुनाना है जसम ‘दे खकर
चलना’, ‘छानकर पीना’ या ‘सत्य बोलना’ काम आया हो। इसका उत्तर कॉपी म नह , बोलकर दया जाता है; नीचे व ध और एक
नमूना दया है, जसे अपने अनुभव से बदलकर बो लए।
अच्छे उत्तर म ये बात अवश्य ह —

1. तीन बन्दुओं म से कम से कम दो पर अपनी बात हो — केवल एक पर नह ।
2. बात घटना के रूप म हो — कब, कहाँ, क्या हुआ। सामान्य उपदे श (‘हम सदा सच बोलना चा हए’) से ब चए।
3. अन्त म उसे ोक क पं क्त से जो ड़ए — ‘अतः एव मनुः अवदत् — दृ ष्टपूतं न्यसेत् पादम्’।
4. भाषा सरल संस्कृत हो; क ठन वाक्य क अपेक्षा शुद्ध छोटा वाक्य अच्छा है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

बन्दुः कस प्रकार का अनुभव सुनाया जा सकता है ोक से
जोड़

दृ िष्टपूतम् सड़ क पार करते समय दे खकर चलना; सीढ़ ी उतरते समय ध्यान रखना; रास्ते में ची ंिटयों की पंिक्त दे खकर दृ ष्टपूतं न्यसेत्
बचाकर पैर रखना; अँधेरे में टॉच जलाकर चलना। पादम्

वस्त्रपूतम् यात्रा में खुल ा जल न पीना; वष -ऋतु में उबालकर या छानकर जल पीना; पिरवार में िकसी के बीमार पड़ ने पर वस्त्रपूतं जलं
जल की शुिद्ध का ध्यान रखना। पबेत्

सत्यपूतम् कोई वस्तु टू ट जाने पर स्वयं सच बता दे ना; परीक्षा में नक़ ल न करना; सुनी-सुनाई बात िबना जाँचे आगे न सत्यपूतां वदे त्
फै लाना। वाचम्

आदश उत्तरम् (नमूना अनुभव-कथनम्) —

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत्
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माननीयाः अध्यािपकाः, िपयाः सहपािठनः, सवभ्यः नमस्कारः।
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अद्य अहं स्वस्य त्रीिण लघूिन अनुभ वािन कथियत मु ् इच्छािम।
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पथमम् — दृ िष्टपूत म्।
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एकदा अहं िवद्यालयात् गृहं गच्छन् आसम्। माग िपपीिलकानां पिङ् क्तः आसीत्।
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अहं दृ ष्ट् वा पादं पाश्व न्यस्तवान्। मम िमत्रं त ु न दृ ष्टवान्, अतः सः स्खिलतः।

तदा अहम् अजानाम् — ‘दृ िष्ट पूतं न्यसेत ् पादम्’ इित के वलं श्लोकः न, अिपत ु पितिदनस्य िनयमः अिस्त।
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िद्वतीयम् — वस्त्रपूत म्।

a gl गतवष वष काले अस्माकं गामे बहवः जनाः रुग्णाः अभवन्।
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वैद्य ः अवदत् — ‘अशुद्ध ं जलं कारणम्’ इित। ततः पभ ृित वयं जलं वस्त्रेण गालियत्वा,
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s e m न रुग्णः भवित।
क्वथियत्वा च िपबामः। अद्य अस्माकं गृहे कोऽिप
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त ृत ीयम् — सत्यपूत म्।
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एकदा क्रीडन् अहं कक्षायाः कु ण्डम् अभञ्जम्। कोऽिप न अपश्यत्।
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अहं भीतः आसम्, तथािप अध्यािपकायै सत्यम् अकथयम्।
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a s eअध्यािपका
agl न अकु प्यत्, पत्युत अवदत् — ‘सत्यं वदन्तं छात्रम् अहं सवदा िवश्विसिम’ इित।

तिस्मन् िदने अहम् अजानाम् यत् सत्येन भयं न वधते , अिपत ु न्यून ं भवित।
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asदृ िष्टः, वस्त्रं, सत्यं च त्रीिण पिर ावणािन सिन्त,
एतै ः ित्रिभः अनुभ वैः अहं िशिक्षतवान्l—
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ु ं पिर ावणं सवषाम् उपिर अिस्त — मनः। अतः एव उक्तम् — ‘मनःपूतं समाचरेत ’् ।
िकन्त ु चत थ

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एतावत् एव। धन्यवादः।
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agl ( हन्द अनुवाद —) आदरणीय अध्या पका जी, प्रय सहपा ठयो, सबको नमस्कार। आज म अपने तीन छोटे अनुभव सुनाना
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चाहता/चाहती ँ। पहला — दृ ष्टपूत। एक दन म वद्यालय से घर जा रहा था। रास्ते म च टय क एक पं क्त थी। मने दे खकर पैर
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omम हमारे गाँव म बहुत लोग बीमार पड़े। वैद्य ने कहा क कारण अशुद्ध जलaहैg। la
बग़ल म रखा; मेरे मत्र ने नह दे खा, इस लए वह फसल गया। तब मने जाना क ‘दृ ष्टपूतं न्यसेत् पादम्’ केवल ोक नह , रोज़ का
नयम है। दूसरा — वस्त्रपूत। पछले वष वषा क.े cदन

a s eह;mअब हमारे घर म कोई बीमार नह पड़ता। तीसरा — सत्यपूत। एक बार खेलते हुए
glने नह देखा था। म डरा हुआ था, फर भी मने अध्या पका को सच बता दया। वे नाराज़ नह
तब से हम जल छानकर और उबालकर पीते
मने कक्षा का गमला तोड़ दया। aकसी

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

हुईं, ब ल्क बोल — ‘सच बोलने वाले वद्याथ पर मुझे हमेशा भरोसा रहता है।’ उस दन मने जाना क सच बोलने से डर बढ़ता नह ,
घटता है। इन तीन अनुभव से मने सीखा क दृ ष्ट, वस्त्र और सत्य — ये तीन छ न्नयाँ ह, पर चौथी छन्नी सबसे ऊपर है — मन।
इसी लए कहा गया है — ‘मनःपूतं समाचरेत्’। बस इतना ही। धन्यवाद।

यह नमूना अच्छा उत्तर क्य है: (१) तीन बन्दुओं पर अलग-अलग घटना है, उपदे श नह — और घटना ही सुनने
वाले को याद रहती है। (२) हर घटना के अन्त म एक सीख है, जो ोक क पं क्त से जुड़ती है। (३) अन्त म चौथी
छन्नी ‘मनः’ जोड़कर पूरा भाषण पाठ के शीषक पर आ टकता है — इससे बात गोल होकर पूरी हो जाती है। (४)
वाक्य छोटे ह, इस लए बोलते समय प्रवाह नह टू टेगा और व्याकरण क भूल क सम्भावना भी कम रहेगी।

प्रस्तु त क यु क्तयाँ: (१) अपना सच्चा अनुभव सुनाइए — गढ़ हुई कहानी सुनने वाले को तुरन्त पकड़ म आ
जाती है। (२) दो-तीन मनट पयाप्त ह। (३) आरम्भ का सम्बोधन और अन्त का ‘धन्यवादः’ न भू लए। (४) संस्कृत म
जो वाक्य क ठन लगे, उसे सरल कर ली जए — ‘अहं स्ख लतः’ के स्थान पर ‘सः प ततः’ भी चलेगा। (५) एक बार
घर पर बोलकर अभ्यास क जए और कसी से केवल यह पू छए — ‘कहाँ अटका ?’

अध्याय — एक नज़र म
पाठ-प रचय — पाठ का शीषक ही उसका सार है — ‘मनःपूतं समाचरेत्’ अथात् ‘जो मन से प वत्र हो, वही आचरण करो’।
यह वाक्य मनुस्मृ त के पहले ही ोक से लया गया है। आरम्भ म एक चत्रकथा है : आचाया पूछती ह क कोई काम करना हो
तो सबसे पहले क्या आवश्यक है? छात्र उत्तर दे ते ह — व चन्त्य कायकरणम्, उ चत व धना कायकरणम्, पूणमनसा
कायकरणम्। आचाया तब मूल बात कहती ह — ‘य द मनः एव म लनं स्यात्, उ े श्यम् एव अनु चतं स्यात्, त ह कम प काय
सम्यक् कथं भवेत्?’ इसी प्रश्न का उत्तर पाठ के आठ सुभा षत दे ते ह।
वधा तथा ोत — यह सुभा षत-सङ् कलन है; इसका कोई एक रच यता नह । आठ ोक आठ अलग-अलग परम्पराओं
से आए ह — धमशास्त्र (मनुस्मृ त २), दशन-उपदे श (गीता), सुभा षत-सङ् ग्रह (सुभा षतरत्नभाण्डागारः), नी त-काव्य
(नी तशतकम्), कथा-सा हत्य (पञ्चतन्त्रम्), रूपक (माल वका ग्न मत्रम्) तथा महाकाव्य ( कराताजुनीयम्)। इसी से यह भी
दखता है क एक ही जीवन-मूल्य को भारतीय परम्परा ने अनेक वधाओं म दोहराया है।
वषयवस्तु — आठ ोक एक सीढ़ बनाते ह। ोक १ — आचरण क चार छ न्नयाँ (दृ ष्ट, वस्त्र, सत्य, मन)। ोक २ —
धम के दस लक्षण। ोक ३ — श्रेष्ठ पुरुष का आचरण ही समाज का प्रमाण। ोक ४ — अभ्यास से सब सद्ध। ोक ५ —
उत्तम, मध्यम और अधम — तीन प्रकार के कता। ोक ६ — पुरुषाथ बनाम भाग्य। ोक ७ — पुराना या नया नह , परीक्षा
कसौट है। ोक ८ — जल्दबाज़ी नह , वचारपूवक काम।
मूल सन्दे श — काम क सफलता केवल कुशलता पर नह , कता के मन क शुद्धता, ववेक और अभ्यास पर टक है। मन
मैला हो तो फल भी दू षत होगा — यही आचाया ने चत्रकथा म कहा और यही आठ सुभा षत अलग-अलग ढं ग से दोहराते ह।
इसी लए पाठ के अन्त म छात्रा कहती है — ‘एता न सुभा षता न न केवलं पठनाय अ पतु जीवने आचरणाय स न्त।’
भा षक वशेषताएँ — पहले चार ोक अनुष्टुप् छन्द म ह — छोटे , सूत्र जैसे, कण्ठस्थ करने योग्य। ोक ५, ६ तथा ७ लम्बे
वृत्त (वसन्त तलका, उपजा त) म ह और ोक ८ वयो गनी म — इनम वाक्य फैलता है और वचार क्रम से खुलता है। ोक
१ म ‘पूत’ शब्द क चार आवृ त्तयाँ (दृ ष्टपूतम्, वस्त्रपूतम्, सत्यपूताम्, मनःपूतम्) पूरे ोक को एक ताल दे दे ती ह, और ोक
४ म ‘अभ्यास’ क चार आवृ त्तयाँ वही काम करती ह।
व्याकर णक बदु — पूरा पाठ व ध लङ् लकार का अभ्यास है — न्यसेत्, पबेत्, वदे त्, समाचरेत्, वदधीत, भवेत् : ‘करना
चा हए’ का अथ। साथ ही कमवाच्य (प्रारभ्यते), शानच् प्रत्यय (प्र तहन्यमानाः), क्त्वा/ल्यप् ( नहत्य, प्रारभ्य, परीक्ष्य, कृत्वा),

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् AglaSem · NCERT Solutions

क्त प्रत्यय (पूतम्, वहताः, कृते) तथा तृतीया-तत्पुरुष समास (दृ ष्टपूतम्, वस्त्रपूतम्, मनःपूतम्, वघ्न वहताः) बार-बार आते
ह।
स का अभ्यास — अभ्यास का प्रश्न ८ पूरा स न्ध पर है — वसगस न्ध (दमः + अस्तेयम् → दमोऽस्तेयम्; पुनः + अ प →
पुनर प; लोकः + तत् → लोकस्त्; वघ्न वहताः + वरम न्त → वघ्न वहता वरम न्त), यण् स न्ध (इ त + एव → इत्येव), गुण
स न्ध (च + उत्तमजनाः → चोत्तमजनाः) तथा द घ/जश्त्व (अन्यतरत् + भजन्ते → अन्यतरद्भजन्ते)। ये सब पाठ के ोक म
ही मलते ह, इस लए ोक याद हो तो स न्ध अपने-आप याद हो जाती है।
अभ्यास क्या माँगता है — नौ प्रश्न : (१) सात प्रश्न के पूणवाक्य उत्तर, (२) पाँच ोकांश म रक्तस्थानपू त, (३) छह
रेखाङ् कत पद पर प्रश्न नमाण, (४) पहले ोक को पढ़कर ग्यारह प्रश्न के उत्तर, (५) मञ्जूषा से भावाथ क पू त, (६) अन्वय
म रक्तस्थानपू त, (७) ोकांश और ोतोग्रन्थ का मेलन, (८) स न्ध वच्छे द तथा (९) वग्रहवाक्य के समस्तपद। इसके ऊपर
‘यस्तु क्रयावान् मनुजः स व ान्’ म जीवनमूल्य के अनुसार पाँच-पाँच सुभा षत एकत्र करने और अपना अनुभव सुनाने का
काय है।
अ त रक्त सामग्री — ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ म आठ प्र सद्ध ग्रन्थ क सा रणी है — रामायणम्, मनुस्मृ तः, श्रीमद्भगव ता,
हठयोगप्रद पका, नी तशतकम्, पञ्चतन्त्रम्, माल वका ग्न मत्रम् तथा कराताजुनीयम् — उनका भारतीय- ान-परम्परा म
स्थान और उनके ग्रन्थकता। यह सा रणी बताती है क पाठ के सुभा षत कस- कस ान-परम्परा से आए ह।

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त्व रत पुनरावृ त्त

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ पाठ का वाक्य / ोक

पूतम् (√पू + क्त) शुद्धम् शुद्ध, प वत्र कया हुआ दृ ष्टपूतं न्यसेत् पादम् ( ोक १)

न्यसेत् ( न + √अस्, व ध लङ् ) स्थापयेत ् रखे दृ ष्टपूतं न्यसेत् पादम् ( ोक १)

शौचम् (नपुं.) शुचेः भावः, पािवत्र्यम् प वत्रता शौच म न् य नग्रहः ( ोक २)

दमः (पुं.) इिन्द याणां मनसः च इ न् य एवं मन को वश म करना धृ तः क्षमा दमोऽस्तेयम् ( ोक २)
िनयन्त्रणम्

अस्तेयम् (नञ्-तत्पुरुषः) न स्तेयम् चोरी न करना धृ तः क्षमा दमोऽस्तेयम् ( ोक २)

अनुवतते (अनु + √वृत्) अनुस रित अनुसरण करता है लोकस्तदनुवतते ( ोक ३)

नीचैः अधमजनैः अधम लोग ारा प्रारभ्यते न खलु वघ्नभयेन नीचैः
( ोक ५)

वघ्न वहताः (तृतीया-तत्पुरुषः) िवघ्नैः िवहताः वघ्न से आहत वघ्न वहता वरम न्त मध्याः ( ोक
५)

प्र तहन्यमानाः (प्र त + √हन् + यक् बािधताः बार-बार रोके जाने पर भी वघ्नैः पुनः पुनर प प्र तहन्यमानाः
शानच्) ( ोक ५)

उद्यो गनम् (पुं. .ए.व.) उद्योगः अस्य अिस्त इित, प्रयत्न करने वाले को उद्यो गनं पुरुष सहमुपै त लक्ष्मीः
तम् ( ोक ६)

कापुरुषाः (कमधारयसमासः) कु ित्सताः पुरुषाः कायर, अधम पुरुष दै वेन दे य म त कापुरुषा वद न्त
( ोक ६)

नहत्य ( न + √हन् + ल्यप्) अितक्रम्य अ तक्रमण करके, हराकर दै वं नहत्य कुरु पौरुषम् ( ोक ६)

अवद्यम् (नञ्-तत्पुरुषः, न+वद्+यत्) न वद्यम् नम्नस्तरीय, नन्दनीय काव्यं नव मत्यवद्यम् ( ोक ७)

परप्रत्ययनेयबु द्धः (बहु ी हः) परपत्ययेन नेया बुिद्धः यस्य जसक बु द्ध दूसर के भरोसे मूढः परप्रत्ययनेयबु द्धः ( ोक ७)
सः चलती हो

वदधीत ( व + √धा, व ध लङ् ) कु य त् करना चा हए सहसा वदधीत न क्रयाम् ( ोक ८)

वमृश्यका रणम् (पुं. .ए.व.) यः िचन्तियत्वा काय ं करोित, सोच- वचारकर काम करने वाले वृणते ह वमृश्यका रणम् ( ोक ८)
तम् को

गुणलु ाः (सप्तमीतत्पुरुषः) गण
ु ेष ु लुब्धाः, ग ण
ु ानाम् गुण क चाह रखने वाली गुणलु ाः स्वयमेव सम्पदः ( ोक ८)
अिभलािषणः

सम्पदः (स्त्री.प्र.ब.व.) ऐश्वयम् सम्प त्तयाँ गुणलु ाः स्वयमेव सम्पदः ( ोक ८)

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Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages58
Updated19 Sep 2026