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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्

AglaSem पर कक्षा 9 संस्कृत पाठ 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् (शारदा) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Chapter 7 (Sharada).
NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् - Page 1 of 50

About NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्

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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Chapter 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा9

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 7: उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च
चन्तयेत्

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

79 – 91 14 47 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 49 pages

Page 2

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 7: उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च
चन्तयेत्
उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् शारदा (कक्षा ९) का सप्तमः पाठः है। यह कथा वधा क रचना है — पञ्चतन्त्र के प्रथम तन्त्र मत्रभेदः
से ली गई धमबु द्ध-पापबु द्ध क प्र सद्ध कथा, जसके रच यता वष्णुशमा ह (यह प रचय पुस्तक स्वयं ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ म दे ती है)। पाठ का
आरम्भ माता-पुत्र के एक चत्र-संवाद से होता है, फर नाट्य-शैली म पूरी कथा चलती है और अन्त म वही सू क्त आती है जो पाठ का शीषक है। कथा
के भीतर चार ोक भी ह। पाठ के साथ पुस्तक सव शब्दे न भासते (शब्दाथ-ता लका, जसका ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भ खाली छोड़ा गया है),
अत्र इदम् अवधेयम् ( नत्यबहुवचनान्तशब्दाः तथा वशेषण- वशेष्य-सम्बन्ध), स्वाध्यायान्मा प्रमदः (पञ्चतन्त्रम्, क्तवतुप्रत्ययः, तत्पुरुषसमासः) तथा
यस्तु क्रयावान् मनुजः स व ान् (कथा-सारांश एवं नाट्य-प्रस्तु त) दे ती है। अभ्यास अभ्यासाद् जायते स द्धः शीषक के नीचे सात प्रश्न म है —
पूणवाक्येन उत्तर, प्रश्न नमाणम्, ‘कः कं प्र त कथय त’, भूतका लक→वतमानका लक वाक्य-प रवतन, ोकाधा रत रक्तस्थानपू त, समस्तपद का
वग्रह/मेलन तथा कथाक्रम-संयोजन। इस पाठ म भावाथः खण्ड नह है — क्य क पाठ गीत नह , कथा है।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

शारदा (कक्षा 9) 79 – 91

खं ड प्रश्न

14 47

माध्यम

हन्द

पाठ-प रचयः — चत्र-संवादः — पृष्ठ 79
मातुः पुत्रस्य च संवादः — कथायाः भू मका

पाठ-प रचयः

प्र.1 पाठस्य आरम्भे चत्रे यः संवादः दत्तः, तं लखत तस्य आशयं च स्पष्टीकुरुत।

चत्रगतः संवादः —

पुत्रः — मातः! पश्यत ,ु अद्य अहं माग पिततं धनं पाप्तवान्। एते न धने न बहूिन ीडनकािन ीणािम।

माता — न िह पुत्र! एतत् अन्यस्य श्रमािजतं धनमिस्त, तस्मै एव पत्यपणीयम्। अन्यस्य धनं त ृणम् इव

गणनीयम्।

पुत्रः — मातः! अन्यस्य धनं त ृणम् इव कथं भवित ?

माता — एिह पुत्र! अहं त भ्ु यं पञ्चतन्त्रस्य काञ्चन कथां श्रावयािम यया त्वं स्वपश्नस्य उत्तरं पाप्त ुं शक्नोिष।

पुत्रः — मातः! तिह कृ पया सत्वरं श्रावयत ।
ु

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

( हन्द — पुत्र: माँ! दे खए, आज मुझे रास्ते म गरा हुआ धन मला है। इस धन से म बहुत-से खलौने खरीदूँ गा। माँ: नह बेटा! यह
कसी दूसरे का प रश्रम से कमाया हुआ धन है, उसी को लौटा दे ना चा हए। दूसरे का धन तनके के समान गनना चा हए। पुत्र: माँ!
दूसरे का धन तनके के समान कैसे होता है ? माँ: आओ बेटा! म तुम्ह पञ्चतन्त्र क एक कथा सुनाती हूँ, जससे तुम अपने प्रश्न का
उत्तर पा सकोगे। पुत्र: माँ! तो कृपया शीघ्र सुनाइए।)

आशयः — यह संवाद पूरे पाठ क कुंजी है। ध्यान द जए, माता ने बालक को उपदे श दे कर चुप नह कराया।
बालक ने प्रश्न पूछा — ‘अन्यस्य धनं तृणम् इव कथं भव त ?’ — और माता ने उत्तर म कथा द । यही भारतीय
शक्षण-परम्परा क व ध है : सद्धान्त पहले नह , कथा पहले; नष्कष वद्याथ स्वयं नकाले। इसी लए पूरा पाठ एक
ही प्रश्न का उत्तर है, और अन्त म जब पापबु द्ध दूसरे का धन हड़पने के कारण नष्ट होता है, तब बालक को उत्तर मल
जाता है — पराया धन तनका इस लए है क वह टकता नह , और जो उसे पकड़ता है उसे ही जला दे ता है।

व्याकरण-सङ् केत: ‘प्रत्यपणीयम्’, ‘गणनीयम्’ — दोन अनीयर् प्रत्ययान्त कृदन्त ह, अथात् ‘लौटाया जाना
चा हए’, ‘ गना जाना चा हए’ — इनम व ध/कतव्य का भाव है (कमवाच्य)। ‘श्रावया म’ णजन्त रूप है — √श्रु
(सुनना) + णच् = श्रावय त (सुनाना)। ‘पश्यतु’, ‘श्रावयतु’ — लोट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन; माता के लए
आदरसूचक प्रयोग।

प्र.2 ‘अन्यस्य धनं तृणम् इव गणनीयम्’ — अस्य वाक्यस्य आशयं भारतीयपरम्परायाः दृष्ट्या स्पष्टीकुरुत।

उत्तरम् — अन्यस्य श्रमेण अ जतं धनं स्वक यम् इव न मन्तव्यम्, अ प तु तृणवत् — मूल्यहीनम् — इ त गणनीयम्। यः
परधनं लोभेन गृ ा त, सः धनं तु न रक्ष त, स्वस्य धमम् अ प नाशय त।
( हन्द — दूसरे के प रश्रम से कमाया धन अपना नह मानना चा हए; उसे तनके के समान — मूल्यहीन — गनना चा हए। जो
लोभवश पराया धन लेता है, वह धन तो बचा नह पाता, अपना धम भी खो दे ता है।)

‘तृणम् इव’ ही क्य : तनका तीन बात का प्रतीक है — वह हल्का है, अपना नह है, और हवा के साथ उड़
जाता है। पराया धन भी ठ क ऐसा ही है : आता आसानी से है, टकता नह , और साथ म आदमी को भी उड़ा ले
जाता है। कथा म यही अक्षरशः घटता है — पापबु द्ध ने धन ग े से नकाल तो लया, पर वह धन उसके पास ठहरा
नह ; उलटे उसके कारण उसका पता जल मरा और वह स्वयं द ण्डत हुआ।

परम्परा से जो ड़ए: यही भाव पाठ के तीसरे ोक म और भी कठोर शब्द म आया है — ‘परद्रव्येषु लोष्ठवत्’
(पराया धन म के ढे ले जैसा)। ईशोप नषद् का प्र सद्ध वचन ‘मा गृधः कस्य स्वद्धनम्’ ( कसी के धन का लोभ मत
करो) तथा इसी पुस्तक के तृतीय पाठ का शीषक ‘आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः प ण्डतः’ — तीन एक ही नी त
के तीन रूप ह।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.3 माता पुत्राय कस्य ग्रन्थस्य कथां श्रावय त ? सा कथा कस्मात् तन्त्रात् स्वीकृता ?

उत्तरम् — माता पुत्राय पञ्चतन्त्रस्य कथां श्रावय त। इयं कथा पञ्चतन्त्रस्य प्रथमतन्त्रात् ‘ मत्रभेदः’ इ त नाम्नः तन्त्रात्
स्वीकृता। पञ्चतन्त्रस्य लेखकः वष्णुशमा अ स्त।
( हन्द — माता पुत्र को पञ्चतन्त्र क कथा सुनाती है। यह कथा पञ्चतन्त्र के प्रथम तन्त्र ‘ मत्रभेद’ से ली गई है। पञ्चतन्त्र के
लेखक वष्णुशमा ह।)

क्रमः तन्त्रम् वषयः

१ िमत्रभेद ः िम त्र ों में फू ट कै से पड़ ती है — यही तन्त्र पस्त ुत कथा का ोत है

२ िमत्रसम्पािप्तः च्
स चे िम त्र कै से िमल ते है ं और िम त्र ता का बल

३ काकोलूक ीयम् कौओं तथा उ ल ुओ ं का वैरल् — शत्र ु से व्यवहार की नीित

४ लब्धपणाशः पाई हुई व स् तु कै से हाथ से िनकल जाती है

५ अपरीिक्षतकारकम् िबना जाँचे िकया गया काम कै से न ट करता है ष्

यह कथा ‘ मत्रभेद’ म ही क्य : कथा का मूल वषय मत्रता का टू टना है — दो मत्र साथ परदे श जाते ह, साथ धन
कमाते ह, और लोभ के कारण एक मत्र दूसरे को ठगता है। ‘ मत्रभेद’ तन्त्र इसी बात क नी त सखाता है क लोभ,
कपट और झूठा आरोप मत्रता क जड़ काट दे ते ह। इस लए इस कथा का स्थान वह ठ क बैठता है।

Did you know? पञ्चतन्त्र संसार का सबसे अ धक अनू दत भारतीय ग्रन्थ माना जाता है — छठ शताब्द म
यह पहलवी (प्राचीन फ़ारसी) म गया, फर अरबी म ‘कलीला व दमना’ बना, और वहाँ से यूरोप क अनेक भाषाओं
म। पुस्तक स्वयं कहती है — ‘पशुप क्षणां कथामाध्यमेन नी तशास्त्रस्य गहनतत्त्वम प सरलतया अत्र श क्षतम्।’ यहाँ
ध्यान दे ने योग्य बात यह है क प्रस्तुत कथा म पात्र पशु-पक्षी नह , मनुष्य ही ह।

कथा — धमबु द्धः पापबु द्धश्च — पृष्ठ 79–84
कथावस्तु, पात्रप रचयः तथा कथायाः सन्दे शः

कथा

प्र.1 ‘उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्’ इ त पाठस्य कथां स्वशब्दे षु संस्कृतेन संक्षेपेण लखत।

कथासारः (संस्कृतेन) —

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्
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किस्मंिश्चद् दे शे धमबुिद्धः पापबुिद्धश्च द्वे िमत्रे पितवसतः स्म।
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पापबुिद्धः अिचन्तयत् — ‘अहं मूखः दिरद तया पीिडतश्च। अतः एनं धमबुिद्धं स्वीकृ त्य दे शान्तरं गच्छािम, तत्र
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अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयािम, अनन्तरम् एनमिप वञ्चियत्वा सुखी भवािम’ इित।
aसः धमबुिद्धं दे शाटनस्य महत्त्वं बोधयित। तौ गुरुजनानाम् अनुमितं पाप्य शुभेऽहिन दे शान्तरं पिस्थतौ।

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पापबुिद्धः धमबुद्ध ेः पभावेण पभूतं धनं सम्पािदतवान्।
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पत्यागमनकाले पापबुद्ध ेः वचने न तौ सव ं धनं गहनारण्ये भूमौ िनिक्षप्य िकिञ्चन्मात्रम् आदाय गृहं गतवन्तौ।
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अनन्तरं पापबुिद्धः िनशीथे एकाकी अटव्यां गत्वा तत्सव ं िवत्तं समादाय गत ं पूरियत्वा स्वभवनं गतवान्।

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कितिचद् िदनानन्तरं द्वाविप तत्र गत्वा यावत् खनतः तावद् िरक्तं भाण्डं दृ ष्टवन्तौ।

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पापबुिद्धः िशरः ताडयन् धमबुिद्धम् एव चौरम् अवदत्, राजकु ले िनवेद नस्य भयं च दिशतवान्।
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िववदमानौ तौ धम िधकािरणं िनकषा गतौ। सािक्षणः अभावात् धम िधकारी वनदे वतायाः न्यायिनणयं

a gl िनिश्चतवान्।
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पापबुिद्धः स्विपतरं शमीवृक्षस्य महाकोटरे िनगूह्य िमथ्यासाक्ष्यं दािपतवान्।
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धमबुिद्धः तत् कोटरं वि भोज्यद व्यैः पिरवेष्ट वि m ना पज्वािलतवान्। अधदग्धशरीरः स्फु िटते क्षणः पापबुद्धेः िपता
बिहरागत्य सत्यम् उक्त्वा मृत ः। agl
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राजपुरु षाः पापबुिद्धं दिण्डतवन्तः धमबुिद्धं पशंिसतवन्तः च।
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सव जनाः अवदन् — ‘पापबुद्ध ेः व्यथपािण्डत्यात् िपता वि ना घािततः। अतः साधूक्तम् — उपायं िच न्तयेत ्
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पाज्ञस्तथापायं च िच न्तयेत ्।’
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a g ( हन्द सारांश —) कसी दे श म धमबु द्ध और पापबु द्ध नाम के दो मत्र रहते थे। पापबु द्ध ने सोचा — ‘म मूख भी हूँ और द रद्रता

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से पी ड़त भी; इस लए इस धमबु द्ध को साथ लेकर परदे श जाता हूँ, वहाँ इसके सहारे धन कमाऊँगा और फर इसे ठगकर सुखी हो
जाऊँगा।’ उसने धमबु द्ध को दे शाटन का महत्त्व समझायाoऔर
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ने धमबु द्ध के प्रभाव से बहुत धन कमाया। लौटतेem
दोन गुरुजन क अनुम त लेकर शुभ दन परदे श चले गए। पापबु द्ध

l asद्ध आधी रात म अकेला जंगल जाकर सारा धन नकाल लाया और ग ा भर दया।
समय पापबु द्ध के कहने पर दोन ने सारा धन घने जंगल म ज़मीन म गाड़ दया
और थोड़ा-सा लेकर घर आ गए। बाद मgपापबु
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कुछ दन बाद दोन गए और खोदने पर घड़ा खाली मला। पापबु द्ध सर पीटता हुआ धमबु द्ध को ही चोर कहने लगा और राजकुल

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म शकायत क धमक द । झगड़ते हुए दोन धमा धकारी के पास पहुँचे। कोई साक्षी न होने से धमा धकारी ने वनदे वता से नणय
m
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कराना तय कया। पापबु द्ध ने अपने पता को शमी वृक्ष के बड़े कोटर म छपाकर झूठ गवाही दलवाई। धमबु द्ध ने कोटर को जलने

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.c रुष ने पापबु द्ध को दण्ड दया और धमबु द्ध क प्रशंसा क । सब लोग बोले —ag‘पापबु द्ध के व्यथ पा ण्डत्य से उसका पता
वाली वस्तुओं से घेरकर आग लगा द ; आधा जला, फट आँख वाला पापबु द्ध का पता बाहर नकला, सच बताकर मर गया।

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se आग से मारा गया। इस लए ठ क ही कहा गया है — बु द्धमान् उपाय सोचे, साथ ही उसक हा न भी सोचे।’
राजपु
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कथा क रचना-कुशलता: ध्यान द जए क कथा म दण्ड बाहर से नह आता। पापबु द्ध को कसी दे वता ने नह

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पकड़ा — उसक अपनी चाल ने उसे पकड़ा। जस कोटर म उसने पता को छपाया, वही चता बन गया; जस झूठ

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को उसने ‘पक्का सबूत’ समझा, वही उसका सबसे बड़ा गवाह बन गया। यही ‘अपाय’ है जसे वह सोचना भूल गया
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

ध्यान द: कथा का यह अंश नाट्य-शैली म है, इस लए कोष्ठक म रङ्ग-सङ् केत (stage directions) आते ह —
‘(तथा करो त)’, ‘(इत्युक्त्वा मृतः)’, ‘(साश्चयम्)’, ‘(यदा तौ स्वनगरसमीपमागतवन्तौ तदा)’। उत्तर लखते समय इन्ह
संवाद के साथ मत मलाइए; ये पात्र के काय बताते ह, उसका कथन नह ।

प्र.2 कथायाः पात्राणां प रचयं दत्त्वा तेषां च रत्रं व ेषयत। ‘पापबुद्धेः व्यथपा ण्डत्यम्’ इत्यस्य कः आशयः ?

उत्तरम् — कथायां पञ्च पात्रा ण स न्त — धमबु द्धः, पापबु द्धः, पापबुद्धेः पता, धमा धकारी, सव जनाः (सामा जकाः)
च।

पात्रम् कः / का च रत्रस्य वशेषता पाठात् प्रमाणम्

धमबुिद्धः कथायाः नायकः, त्
स यिन ठ ः ष् , श्
िव वासपा त्र , द्ध
ः ब ुि मान ् — िक न्त ु ‘धमबु द्धः खल्वहम्। नैतत् चौरकम करो म।’
पापबुद्धेः मत्रम् ष्
द ु टं िम त्र न्
ं पय तं न परीि क्षतवान ्

पापबुिद्धः कथायाः खलनायकः ल ोभी , कपटी, आ त्मिनन्द कः अिप (‘अहं ‘एनम प वञ्च यत्वा सुखी भवा म इ त।’
मूखः ’), िक न्त ु चात ुयण गिवतः

पापबुद्धेः वृद्धः जनकः पुत्रस् न् ;
नेहेन अ धः अधम सहायकः बनकर स्
वयं ‘एतत् सवम प पापबुद्धेः चे ष्टतम्। (इत्युक्त्वा
िपता ष् ; न् त्
न टः अ ते स यवाद ी मृतः)’

धम िधकारी न्यायाधीशः िववेक ी — साक्ष्यं िवना िनणयं न करोित, ‘यत्र मानुषप्रमाणम् अनुपलब्धं तत्र वनदे वता
पचिल तां पथाम् आ श्र यित एव न्याय नणयं क रष्य त।’

सव जनाः सामा जकाः समाज स्
य िववेक ः — पथमं भान्ताः, अन्ते स त्यं ‘अतः साधूक्तम् — उपायं चन्तयेत्
ज्ञ त्
ा वा नीितं घोषयि त न् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्।’

‘व्यथपा ण्डत्यम्’ इत्यस्य आशयः — यत् पा ण्डत्यं केवलं कपटाय प्रयुज्यते, यस्य प रणामः पूव न वचा रतः, तत् पा ण्डत्यं
व्यथम् एव, प्रत्युत वनाशकम्।
( हन्द — ‘व्यथ पा ण्डत्य’ का अथ है वह चतुराई जो केवल छल के लए लगाई जाए और जसका प रणाम पहले न सोचा जाए।
ऐसी चतुराई बेकार ही नह , नाश करने वाली होती है।)

कथा क सबसे तीखी वडम्बना: पूरे न्याय-प्रसंग म ‘धम ह जाना त नरस्य वृत्तम्’ वाला प वत्र साक्षी- ोक
पापबु द्ध स्वयं पढ़ता है — और उसी साँस म झूठ गवाही क व्यवस्था कर चुका होता है। जो व्य क्त सूय, चन्द्र,
अ ग्न, आकाश और धम को साक्षी बुलाकर झूठ बोलता है, वह कसी बाहरी दण्ड क प्रतीक्षा नह करता — वह
पहले ही अपना दण्ड बुला चुका होता है। पुस्तक इसी को ‘व्यथपा ण्डत्य’ कहती है।

तुलना करके दे खए: धमबु द्ध भी उपाय ही करता है — कोटर जलाने का। कन्तु उसका उपाय सत्य को प्रकट
करने के लए है, छपाने के लए नह ; इसी लए वह सफल होता है और सब उसक प्रशंसा करते ह। दोन बु द्ध
लगाते ह; अन्तर बु द्ध क मात्रा म नह , उसक दशा म है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

पाठगताः ोकाः — पृष्ठ 80–84
चत्वारः ोकाः तथा शीषक-सू क्तः — पदच्छे दः, अन्वयः, शब्दाथः, हन्द अथः, भावः

ोकव्याख्या

प्र.1 प्रथमस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “दे शान्तरेषु बहु वधभाषावेषा द येन न ज्ञातम्।
भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यथम्॥”

दे शान्तरेष ु बहुिवधभाषावेषािद येन न ज्ञातम्।

भ मता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यथम्॥

पदच्छे दः — दे श-अन्तरेषु + बहु वध-भाषा-वेष-आ द + येन + न + ज्ञातम् + भ्रमता + धरणी-पीठे + तस्य + फलम् + जन्मनः +
व्यथम्।
अन्वयः — धरणीपीठे भ्रमता येन दे शान्तरेषु बहु वधभाषावेषा द न ज्ञातम्, तस्य जन्मनः फलं व्यथम् (अ स्त)।

पदम् शब्दाथः

दे शान्तरे ष ु न्
अ येष ु दे शेष ु — दू सरे दे शों में (दे श + अन्तर = ‘दू सरा दे श’)

बहुिवधभाषावेषािद बहुिवधाः भाषाः वेषाः आद यः च — अनेक पकार की भाषा, वेशभ ूषा आिद

येन न ज्ञातम् य स् य पु रु षेण न ज्ञ ातम् — िजसने नही ं जाना (भावे/कम िण पयोगः)

भमता भमन ् (शत)ृ इत्यस्य ततीया
ृ — घूम ते हुए (उ सी ‘येन’ का िवशेषण)

धरणीपीठे ण्
धर याः पीठे — पथ्ृ वी के तल पर , धरती पर

जन्मनः फलम् न्
ज म ले ने का फ ल , जीवन की उ पल िब्ध

व्यथम् ष्
िन फ ल म् , िनरथकम् — बेक ार

हन्द अथ — धरती पर घूमते हुए भी जस मनुष्य ने दूसरे दे श क अनेक प्रकार क भाषाओं, वेशभूषा आ द को नह जाना, उसके
जन्म का फल व्यथ है।

भावः — यह ोक दे शाटन क म हमा कहता है। क व क दृ ष्ट तीखी है — वह यह नह कहता क ‘जो घर म बैठा
रहा, उसका जीवन व्यथ’; वह कहता है क जो घूमा भी (‘भ्रमता’) और फर भी कुछ न सीखा, उसका जीवन व्यथ
है। अथात् यात्रा का मूल्य दूरी म नह , सीख म है। जो दूसरे दे श क भाषा और रहन-सहन को समझने क चेष्टा करता
है, वही सचमुच यात्रा करता है; शेष तो केवल स्थान बदलते ह।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

कथा म इसका काम: यह ोक पापबु द्ध बोलता है — धमबु द्ध को परदे श ले जाने के लए। ध्यान द जए, ोक
सत्य है, पर बोलने वाले क नीयत झूठ है। स ी बात भी छल का औज़ार बन सकती है — कथा यह से अपना
पहला पाठ आरम्भ करती है।

व्याकरण: ‘ज्ञातम्’ भावे प्रयोग म क्त-प्रत्ययान्त है, इस लए कता ‘येन’ तृतीया म आया — «भावे प्रयोगे कत र
तृतीया»। ‘भ्रमता’ = √भ्रम् + शतृ (भ्रमत्) क तृतीया एकवचन; वह ‘येन’ का वशेषण है, इस लए उसी वभ क्त-
वचन म है। ‘धरणीपीठे ’ षष्ठी-तत्पुरुष समास है (धरण्याः पीठे ) — पुस्तक क शब्दाथ-ता लका स्वयं यह वग्रह दे ती
है।

प्र.2 तीयस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “ वद्यां वत्तं शल्पं तावन्ना ो त मानवः सम्यक्।
यावद् व्रज त न भूमौ दे शा े शान्तरं हृष्टः॥”

िवद्यां िवत्तं िशल्पं तावन्नाप्नोित मानवः सम्यक् ।

यावद् वजित न भूमौ दे शा ेशान्तरं हृष्टः॥

पदच्छे दः — वद्याम् + वत्तम् + शल्पम् + तावत् + न + आ ो त + मानवः + सम्यक् + यावत् + व्रज त + न + भूमौ + दे शात् +
दे श-अन्तरम् + हृष्टः।
अन्वयः — मानवः तावत् वद्यां वत्तं शल्पं च सम्यक् न आ ो त, यावत् (सः) हृष्टः (सन्) भूमौ दे शात् दे शान्तरं न व्रज त।

पदम् शब्दाथः

िवद्याम् ज्ञ ानम् , शास्त्रज्ञ ानम् — िवद्य ा

िवत्तम् धनम् — धन, स म्पित्त

िशल्पम् कल ा , कौशल म् — हुनर , कारीगरी

तावत् … यावत् तब तक … जब तक (िनत्यस म्बन्धी अव्ययद्वयम्)

आप्नोित प्
पा नोित , ल भते — पाता है (√आप,् ल ट्, प.प.ु ए .व.)

सम्यक् स यक् म् रू ,
पेण पूण तया — भल ी-भाँित

वजित च्
ग छित — जाता है (√वज्, ल ट्, प.प.ु ए .व.)

हृष्टः पस न्न , त्
ः क् —
उ साहय ु तः पस न्न होकर , उ त्साह से भरा हुआ

हन्द अथ — मनुष्य वद्या, धन तथा कला (हुनर) को तब तक भली-भाँ त नह पाता, जब तक वह प्रसन्न मन से पृथ्वी पर एक दे श
से दूसरे दे श क यात्रा नह करता।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

भावः — पछला ोक कहता था क बना सीखे घूमना व्यथ है; यह ोक उसका दूसरा पहलू कहता है — बना
घूमे सीखना अधूरा है। तीन वस्तुएँ जो यहाँ गनाई गई ह, अनुभव से ही पूरी होती ह : वद्या तब पकती है जब वह
भन्न प रवेश म परखी जाए, वत्त तब बढ़ता है जब नए बाज़ार मल, और शल्प तब नखरता है जब दूसरे कारीगर
क कारीगरी दे खी जाए। ‘हृष्टः’ पद सबसे मा मक है — यात्रा ववशता से नह , प्रसन्न मन से होनी चा हए; बोझ क
तरह क गई यात्रा कुछ नह सखाती।

व्याकरण-सङ् केत: ‘तावत् … यावत्’ जोड़े म आने वाले अव्यय ह और वाक्य को दो खण्ड म बाँधते ह।
‘दे शा े शान्तरम्’ = दे शात् + दे शान्तरम् (व्यञ्जनस न्ध — त् + द् → ); ‘दे शात्’ म अपादाने पञ्चमी है (जहाँ से
चला) और ‘दे शान्तरम्’ म कम ण तीया (जहाँ पहुँचा)। ‘तावन्ना ो त’ = तावत् + न + आ ो त (त् + न → न्न्,
फर न + आ = ना)।

प्र.3 तृतीयस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत्सवभूतेषु वीक्षन्ते धमबुद्धयः॥”

मात ृवत्परदारेष ु परद व्येष ु लोष्ठवत्।

आत्मवत्सवभूते ष ु वीक्षन्ते धमबुद्ध यः॥

पदच्छे दः — मातृवत् + परदारेषु + परद्रव्येषु + लोष्ठवत् + आत्मवत् + सवभूतेषु + वीक्षन्ते + धमबुद्धयः।
अन्वयः — धमबुद्धयः परदारेषु मातृवत्, परद्रव्येषु लोष्ठवत्, सवभूतेषु च आत्मवत् वीक्षन्ते।

पदम् शब्दाथः

मातवृ त् मात ुः इव — माता के समान (मात ृ + वित पत्ययः)

परदारे ष ु परे षां द ारे ष ु — दू सरों की िस्त्र यों में (‘द ाराः’ िनत्यबहुवचनान्त शब्द है)

परद व्येष ु व्
परे षां द येष ु — दू सरों के धन में

लोष्ठवत् पाषाणख डवत ् ण् — िम ी के ढे ले / पत्थर के टुक ड़े के समान

आत्मवत् त्
आ मनः इव — अपने ही समान

सवभूतेष ु सवष ु पािणष ु — सब पािणयों में

वीक्षन्ते श् न् —
प यि त दे खते है ं (िव + √ईक्ष्, ल ट्, प.प.ु ब.व., आ त्मनेपद ी)

धमबुद्धयः धािम कब ुि द्ध क्
य ु ताः जनाः — धम -ब ुिद्ध वाले ल ोग

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्
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हन्द अथ — धमबु द्ध वाले लोग दूसर क स्त्रय को माता के समान दे खते ह, दूसर के धन को म
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के ढे ले के समान दे खते ह,
और सब प्रा णय को अपने ही समान दे खते ह।
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भावः — यह
a
ोक कथा म धमबु द्ध का आत्म-प्रमाण है। पापबु द्ध जब उस पर चोरी का आरोप लगाता है, तब
वहl न गाली दे ता है, न लड़ता है — वह अपने नाम का अथ खोलकर रख दे ता है : ‘धमबु द्धः खल्वहम्’ (म तो
g
aधमबु द्ध हूँ), और यह ोक पढ़ दे ता है। शब्द-चातुय दे खए — जसका नाम ‘धमबु द्ध’ है, वह ‘धमबुद्धयः’ क

com
ag
प रभाषा सुनाता है; अथात् नाम केवल पहचान नह , व्रत है।

m .
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ag के तृतीय पाठ का शीषक ही है — ‘आत्मवत्सवभूतेषु यः पश्य त सः
पुस्तक के भीतर जो ड़ए: इसी शारदा पुस्तक
प ण्डतः’। वह ोक इसी ोक का दूसरा पाठभेद है (चाणक्यनी त म ‘मातृवत्परदारेषु परद्रव्या ण लोष्टवत्।

co m
m.
आत्मवत्सवभूता न यः पश्य त स प ण्डतः॥’)। यहाँ ‘प ण्डतः’ के स्थान पर ‘धमबुद्धयः’ है — क्य क कथा का
नायक ही धमबु द्ध है।
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a s em ‘वत्’ (व त प्रत्यय) से बने पद अव्यय होते ह — इनका रूप कभी नह बदलता : मातृवत्, लोष्ठवत्,
a gl व्याकरण:
आत्मवत्, पुत्रवत्। इनका अथ सदा ‘…के समान’ होता है। ‘वीक्षन्ते’ आत्मनेपद क्रया है, इसी लए ‘-न्ते’ अन्त है,

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‘- न्त’ नह ।

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चतुथस्य
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ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “आ दत्यचन्द्राव नलोऽनलश्च द्यौभू मरापो हृदयं
प्र.4
यमश्च। अहश्च रा त्रश्च उभे च संध्ये धम ह जाना त नरस्य वृत्तम्॥”
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a आिदत्यचन्द ाविनलोऽनलश्च द्यौभूिमरापो हृदयं यमश्च।

se m
अहश्च राित्रश्च उभे च संध्ये धम िह जानाित नरस्य वृत्तम्॥
com g l a
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as + च + द्यौः + भू मः + आपः + हृदयम् + यमः + च + अहः + च + रा त्रः + च + उभे
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+ च + संध्ये + धमः + ह + जाना त +aनरस्य + वृत्तम्।
पदच्छे दः — आ दत्य-चन्द्रौ + अ नलः + अनलः

co m
अन्वयः — आ दत्यचन्द्रौ, अ नलः, अनलः, द्यौः, भू मः, आपः, हृदयम्, यमः, अहः, रा त्रः, उभे संध्ये, धमः च — (एते सव) ह नरस्य

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वृत्तं जाना त (जान न्त)।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

पदम् शब्दाथः कसका साक्षी

आिदत्यः सूयः दन का प्रत्यक्षदश

चन्द ः शशी रात का प्रत्यक्षदश

अिनलः पवनः , वाय ुः जो सवत्र पहुँचता है

अनलः ग् ,
अि नः वि ः यज्ञ तथा शपथ का साक्षी

द्यौः आकाशः ऊपर से सब दे खने वाला

भूिमः ृ
पिथवी नीचे से सब सहने वाली

आपः जल म् (िनत्यबहुवचनान्तः शब्द ः) जीवन का आधार

हृदयम् न्
अ तःकरणम् भीतर बैठा सबसे कड़ा गवाह

यमः धम राजः , म ृत्य ुदे वः अ न्तम न्यायाधीश

अहः, राित्रः, उभे संध् ये िद वसः , रजनी, पातःस न्ध् या सायंस न्ध् या च समय के चार पहर

धमः सनातनः िनयमः सबका आधार

वृत्त म् आचरणम् , चिर त्र म् जो जाना जा रहा है

हन्द अथ — सूय, चन्द्रमा, वायु, अ ग्न, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दन, रात, दोन सन्ध्याएँ (प्रातः तथा सायं) और धम —
ये सब मनुष्य के आचरण को जानते ह।

भावः — यह साक्षी- ोक है, जो भारतीय न्याय-परम्परा म शपथ के समय पढ़ा जाता था। इसका सन्दे श एक ही है
— कोई कम गुप्त नह होता। य द कोई मनुष्य न हो तो भी प्रकृ त के तत्त्व और सबसे बढ़कर अपना हृदय साक्षी
रहता ही है। सूची का क्रम भी सोचकर रखा गया है : बाहर से भीतर क ओर — पहले आकाश के प्रकाश पण्ड, फर
पंचमहाभूत, फर हृदय, फर यम और अन्त म धम।

कथा क वडम्बना: यह ोक कथा म पापबु द्ध स्वयं पढ़ता है — वनदे वता के सामने खड़ा होकर, जब उसने
अपने पता को कोटर म झूठ गवाही के लए बैठा रखा है। जो व्य क्त सूय, अ ग्न और धम को साक्षी बुलाकर झूठ
बोलता है, उसका अन्त कथा म तुरन्त आ जाता है — और वह भी अ ग्न के ही हाथ । कथा कहती है क साक्षी
बुलाने से नह , सच बोलने से न्याय मलता है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

स न्ध- वच्छे दः: आ दत्यचन्द्राव नलः = आ दत्यचन्द्रौ + अ नलः (औ + अ → आव् — अया द स न्ध);
अ नलोऽनलः = अ नलः + अनलः ( वसग + अ → ओ, तथा परवत ‘अ’ का लोप, अवग्रह ‘ऽ’ से सू चत —
वसगस न्ध/पूवरूप); द्यौभू मः = द्यौः + भू मः ( वसग → र्); भू मरापः = भू मः + आपः। पुस्तक ‘अत्र इदम्
अवधेयम्’ म वशेष रूप से कहती है क इस ोक म अ नलः, अनलः, द्यौः, भू मः एकवचन म ह, परन्तु ‘आपः’
बहुवचन म — क्य क ‘आपः’ नत्यबहुवचनान्त शब्द है।

प्र.5 पाठस्य शीषकं यस्मात् गृहीतम्, तस्याः सूक्तेः पदच्छे दम् अन्वयं भावं च लखत — “उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं
च चन्तयेत्।”

उपायं िचन्तयेत ् पाज्ञस्तथापायं च िचन्तयेत ्।

पदच्छे दः — उपायम् + चन्तयेत् + प्राज्ञः + तथा + अपायम् + च + चन्तयेत्।
अन्वयः — प्राज्ञः उपायं चन्तयेत्, तथा अपायं च चन्तयेत्।

पदम् शब्दाथः

उपायम् साधनम् , य ुिक्तम् — काम बनाने का ढं ग , तरकीब

अपायम् िव नम् घ् — उ ससे आने वाल ी हािन, संक ट, सम स्या

पाज्ञः ब ुि द्ध ,
मान ् िववेक ी — समझद ार व्यिक्त

िचन्तयेत ् िवचारयेत ् — सोचना चािहए (√िचन्त ् + िणच्, िविधिल ङ् ल कार , प.प.ु ए .व.)

हन्द अथ — बु द्धमान् मनुष्य को (काम बनाने का) उपाय सोचना चा हए, और साथ ही उस उपाय से आने वाली हा न भी सोचनी
चा हए।

भावः — यही पूरे पाठ क एक-पं क्त है। ‘उपाय’ और ‘अपाय’ शब्द क जोड़ी दे खए — दोन म मूल एक ही है
(√इ = जाना), केवल उपसग बदला है : उप + आय = पास ले जाने वाला माग, अप + आय = दूर ले जाने वाला
माग, हा न। क व कहता है क हर उपाय के साथ एक अपाय छपा रहता है; प्राज्ञ वही है जो दोन को एक साथ सोचे।
पापबु द्ध ने उपाय बहुत सोचा — ग ा, गवाही, पता को कोटर म बैठाना — पर अपाय एक बार भी नह सोचा क
य द कोटर जला दया गया तो ? इसी एक चूक ने उसका सब कुछ ले लया।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

मूल ोक पूरा जा नए: पुस्तक ने केवल पूवाध दया है। पञ्चतन्त्र म यह ोक पूरा इस प्रकार है —
उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्। पश्यतो बकमूखस्य नकुलेन हता बकाः॥
अथात् — ‘उस मूख बगुले के दे खते-दे खते ही नेवले ने सब बगुल को मार डाला।’ उत्तराध पञ्चतन्त्र क एक दूसरी
उपकथा क ओर सङ् केत करता है : साँप से बचने के लए एक बगुले ने नेवले को बुलाने का उपाय कया; साँप तो
मरा, पर नेवले ने बगुले के ब को भी खा लया — क्य क उपाय तो सोचा गया था, अपाय नह । यही उदाहरण इस
सू क्त को अमर बनाता है।

व्याकरण: चन्तयेत् — व ध लङ् लकार का रूप है, जो ‘चा हए / उ चत है’ का भाव दे ता है (जैसे पठे त् = पढ़ना
चा हए, कुयात् = करना चा हए)। स न्ध — प्राज्ञस्तथा = प्राज्ञः + तथा ( वसगस न्ध — वसग का ‘स्’, क्य क आगे
‘त्’ है); तथापायम् = तथा + अपायम् (आ + अ = आ, द घ स न्ध)।

सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 84–86
शब्दाथ-ता लका तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त रक्तस्तम्भस्य पू तः

कायकलापः

प्र.1 ‘सव शब्दे न भासते’ इ त ता लकायाः अ न्तमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अथ लखत’ — रक्तः अ स्त। पाठे
प्रयुक्तानां शब्दानाम् अथान् ज्ञात्वा तं स्तम्भं पूरयत।

पुस्तक म यह अ न्तम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — वद्याथ को हर शब्द का अथ अपनी मातृभाषा म लखना है।
नीचे क ता लका म वह स्तम्भ हन्द (हमारी माध्यम-भाषा) म भर दया गया है; जनक मातृभाषा मराठ , बाङ् ग्ला, गुजराती,
त मऴ, तेलुगु, कन्नड, ओ ड़आ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अथ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रख।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

शब्दः अथः हन्द ENGLISH मातृभाषया अथम् (भरा
हुआ — हन्द )

अटव्याम् (स्त्री.स.ए.व.) वने जंगल म In the forest वन में , घने जंग ल के भीतर

अपायम् (पुं.िद्व.ए.व.) वघ्नम् समस्या / संकट Problem आने वाल ी हािन , अड़चन,
िवपि त्त

अहिन (अहन्, नपुं.स.ए.व.) दवसे दन के समय During the day िद न में , िकसी एक िद न

आपः (स्त्री.प.ब.व.) जलम् जल Water पानी (यह शब्द सद ा बहुवचन में
ही चल ता है )

उत्फु ल्ललोचनाः (बहुवीिहः, उत्फुल्ला न लोचना न आश्चय से फट हुई With surprise िजनकी आँखें अचरज से ख ुल ी

पुं.प.ब.व.) येषां ते आँख वाले रह गई हों , चिकत

खिनत्वा (√खन् + क्त्वा) खननं कृत्वा खोद कर Having dug ज़ मीन खोद कर

द्यौः (स्त्री.प.ए.व.) आकाशः आकाश Sky आसमान , अन्तिर क्ष

धरणीपीठे (षष्ठी तत्पुरुषः, धरण्याः पीठे धरती पर On the earth थ्
प ृ वी के तल पर , इस धरती
नपुं.स.ए.व.) पर

िनिक्षप्य (िन + √िक्षप् + स्थाप यत्वा रखकर Having kept डाल कर , गाड़कर , रख दे ने के
ल्यप्) बाद

िनशीथे (पुं.स.ए.व.) अधरात्रे आधी रात म At midnight आधी रात के समय , िनशीथ
काल में

पिरवेष्ट (पिर + √वेष्ट् + आवृत्य घेरकर Encircling चारों ओर से ल पेटकर , घे रा
ल्यप्) बनाकर

पहृष्टमनाः (बहुवीिहः, प्रहृष्टं मनः यस्य सः प्रसन्न मन वाला Joyful minded िजसका मन ख़ ुशी से भरा हो ,
पुं.प.ब.व) हिषत

भाण्डम् (नपुं.िद्व.ए.व.) पात्रम् घड़े को Pot बरतन , घड़ा, मटका

यास्यित (√या + ल ृट्, ग मष्य त जाएगा Will go चल ा जाएगा (भिवष्यकाल )
प.पु.ए.व.)

वञ्चियत्वा (√वञ्च् + वञ्चनं कृत्वा ठग कर Having Deceived धोखा दे कर , छल कर
क्त्वा)

वीक्षन्ते (िव + √ईक्ष्, लट् , पश्य न्त दे खते ह See , ष्
दे खते है ं दृ ि ट रखते है ं

प.पु.ब.व.)

वजित (√वज्, लट् , गच्छ त जाता है He goes जाता है , यात्र ा करता है
प.पु.ए.व.)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्
a g l AglaSem · NCERT Solutions

co m
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लोष्ठवत् (लोष्ठ + वत्) पाषाणखण्डवत् पत्थर के टु कड़े के Like a stone िम ी क ,
े ढे ले जैस ा बेक ार

समान
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स्फु िटतेक्षणः (बहुव.ीिहः, a g l
पुं.प.ब.व)se
m ु टते ईक्षणे यस्य नष्ट हुई आँख One with

a
िजसकी आँखें फू ट गई हों

agl
सः वाला damaged eyes

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नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं म) — मराठ : अटव्याम् = ‘रानात’, भाण्डम् = ‘भांडे’, नशीथे = ‘मध्यरात्री’।

m .
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बाङ् ग्ला: आपः = ‘जल’, द्यौः = ‘आकाश’, वञ्च यत्वा = ‘ठ कये’। गुजराती: ख नत्वा = ‘खोद ने’, लोष्ठवत् =

a g l
‘माट ना ढे फा जेवुं’। त मऴ: अटव्याम् = ‘का ल्’, आपः = ‘नीर्’। अपनी भाषा म लखते समय ध्यान र खए क
अथ वही रहे जो ‘अथः’ स्तम्भ म संस्कृत म दया है।

. c om
s e m शक्षा है। ध्यान
a
इस ता लका को पढ़ने का ढं ग: यह केवल शब्दकोश नह है — कोष्ठक म द गई सूचना ही असली
द जए क oताmलका तीन प्रकार के सङ् केत दे ती है : (१) वभ क्त-वचन (अटव्याम् — glस्त्री.स.ए.व.,
. c a
अथात् सप्तमी

a s em इस लए ‘म’), (२) प्रत्यय- वच्छे द ( न क्षप्य = न + √ क्षप् + ल्यप् — उपसग होने से क्त्वा के स्थान पर
gl ल्यप् आता है), तथा (३) समास का नाम (उत्फुल्ललोचनाः — बहुव्री हः; धरणीपीठे — षष्ठी तत्पुरुषः)। परीक्षा म
एकवचन,

a
s
यही तीन सूचनाएँ प्रश्न बनकर लौटती ह।
m a
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क्त्वा तथा ल्यप् का नयम एक बार पकड़ ली जए: धातु से पहले उपसग न हो तो ‘क्त्वा’ लगता है — खन् +
a
क्त्वा = ख नत्वा, वञ्च् + क्त्वा = वञ्च यत्वा। धातु से पहले उपसग हो तो ‘क्त्वा’ के स्थान पर ‘ल्यप्’ आता है — न

m
+ क्षप् = न क्षप्य, प र + वेष्ट् = प रवेष्ट्य, आ + कण् = आकण्य, स्वी + कृ = स्वीकृत्य। दोन का अथ एक ही है —

. co
m
‘…करके’।

m as e
.co a g l
a s em
a l इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 86–87
gअत्र
१. नत्यबहुवचनान्तशब्दाः · २. वशेषणा न वशेष्या ण च (सवनामशब्दाः अ प वशेषणा न)
se m
com g l a
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व्याकरणम्

प्र.1
agl
‘ नत्यबहुवचनान्तशब्दाः’ के भव न्त ? पाठे दत्तानाम् उदाहरणानां सूच लखत, तथा च वदत यत्

m
‘आ दत्यचन्द्राव नलः…’ इ त ोके कः शब्दः बहुवचने अ स्त, कस्मात् च।

. co
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.co a g

a s em उत्तरम् — ये शब्दाः केवलं बहुवचने एव प्रयुज्यन्ते, एकवचने वचने वा न प्रयुज्यन्ते, ते नत्यबहुवचनान्तशब्दाः कथ्यन्ते।

agl यद्य प अथः एकवचनस्य इव भव त, तथा प रूपं सदा बहुवचनान्तम् एव भव त।
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( हन्द — जो शब्द सदा बहुवचन म ही प्रयुक्त होते ह, एकवचन या द्ववचन म नह , वे ‘ नत्यबहुवचनान्त शब्द’ कहलाते ह। अथ

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भले एक वस्तु का हो, रूप सदा बहुवचन का ही रहेगा।)

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क्रमः शब्दः ENGLISH हन्द अथ

१ आपः Water जल — यही शब्द पाठ के ोक म आया है

२ दाराः Wife पत्नी

३ लाजाः Puffed Rice खील, लावा

४ अक्षतािन Rice-grains अक्षत, साबुत चावल

५ ग ृहाः Wife / House घर (पुं लङ्ग म नत्यबहुवचन)

६ पाणाः Life-force प्राण

७ असवः Life-force प्राण, जीवनश क्त

८ वष ः Rain वषा

९ समाः Rain वषा / वष

१० िसकताः Sand बालू, रेत

११ कित How many कतने

१२ यित As many जतने

१३ तित So many उतने

१४ ित्र-आरभ्य Numbers from three त्रयः / त ः / त्री ण, चत्वारः / चत ः / चत्वा र, पञ्च, षट्
संख्याः onwards इत्या द

ोक-सम्बन्धी उत्तरम् — ‘आ दत्यचन्द्राव नलोऽनलश्च द्यौभू मरापो हृदयं यमश्च’ इ त ोके आपः इ त शब्दः बहुवचने
अ स्त; अ नलः, अनलः, द्यौः, भू मः इ त शब्दाः तु एकवचने वद्यन्ते। कारणम् — ‘आपः’ नत्यबहुवचनान्तः शब्दः, अतः
जलम् एकम् एव सत् अ प तस्य रूपं बहुवचनम् एव भव त।

यह अन्तर क्य दखाया गया: ोक म सूय, चन्द्र, वायु, अ ग्न, आकाश, पृथ्वी — सब एकवचन म ह, फर बीच म
अचानक ‘आपः’ बहुवचन म आ जाता है। पढ़ते समय वद्याथ को लगता है क यह कोई छन्द क मजबूरी है या
छपाई क भूल। पुस्तक यह रोककर बताती है क यह न भूल है न मजबूरी — यह शब्द का अपना स्वभाव है।
‘आपः’ का एकवचन रूप होता ही नह । हन्द म भी ‘प्राण’ और ‘दशन’ ऐसे ही चलते ह — ‘उसके प्राण नकल
गए’, ‘दशन हुए’ — एक ही वस्तु, फर भी बहुवचन।

‘आपः’ के रूप दे ख ली जए (स्त्री लङ्ग, नत्यबहुवचन): प्रथमा — आपः; द्वतीया — अपः; तृतीया — अ ः;
चतुथ — अद्भ्यः; पञ्चमी — अद्भ्यः; षष्ठी — अपाम्; सप्तमी — अप्सु। इसी ‘अ ः’ से ‘अ ब्ध’ (जल का धारक
= समुद्र) तथा ‘अप्सरा’ (अप्सु सर त इ त = जल म वचरने वाली) जैसे शब्द बने ह।

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प्र.2 ‘प्रहृष्टमनाः पापबु द्धः’ इत्यत्र वशेष्यपदं वशेषणपदं च कम् ? वशेषण- वशेष्ययोः मध्ये क दृशः सम्बन्धः भव त
? पाठात् उदाहरणा न दत्त्वा स्पष्टीकुरुत। सवनामशब्दाः अ प कथं वशेषणा न भव न्त ?

उत्तरम् — ‘प्रहृष्टमनाः पापबु द्धः’ इत्यत्र पापबु द्धः वशेष्यपदम्, प्रहृष्टमनाः च वशेषणपदम्। वशेषण- वशेष्ययोः मध्ये
लङ्ग- वभ क्त-वचन — इ त त्र वधः सम्बन्धः भव त, अथात् वशेषणं सदा वशेष्यस्य लङ्गं , वभ क्तं वचनं च अनुसर त।
( हन्द — यहाँ ‘पापबु द्ध’ वशेष्य है और ‘प्रहृष्टमनाः’ वशेषण। वशेषण और वशेष्य के बीच लङ्ग, वभ क्त तथा वचन — तीन
का मेल होता है; वशेषण सदा वशेष्य के अनुसार बदलता है।)
पुस्तक क अपनी ता लका (तीन प्रकार के सम्बन्ध) —

उदाहरणम् १ उदाहरणम् २ कः सम्बन्धः क्या बदला

नूतनं भवनम् नूतनः िवद्यालयः (िल ङ्ग स म्बन्धः) भवनम् नपुंसक लङ्ग है तो ‘नूतनम्’, वद्यालयः पुं लङ्ग है तो ‘नूतनः’

चतुर ः बालः चतुर ाः बालाः (वचन स म्बन्धः) एक बालक → ‘चतुरः’, अनेक बालक → ‘चतुराः’

बुिद्धमती ग ृिहणी बुिद्धमत्या ग ृिहण्या (िवभिक्त स म्बन्धः) प्रथमा → ‘बु द्धमती’, तृतीया → ‘बु द्धमत्या’

सवनामशब्दाः अ प वशेषणा न भव न्त — पुस्तक कहती है : ‘सवनामशब्दाः अ प वशेषणा न भव न्त।’ जब कोई सवनाम
कसी संज्ञा के साथ जुड़कर आता है, तब वह उस संज्ञा का वशेषण बन जाता है और उसी के लङ्ग- वभ क्त-वचन म ढल जाता है।

पाठगतम् उदाहरणम् सवनाम ( वशेषणम्) वशेष्यम् लङ्ग · वभ क्त · वचन

एतेन धनेन एतेन धनेन नपुंसक लङ्ग · तृतीया · एकवचन

एनं धमबुिद्धम् एनम् धमबु द्धम् पुं लङ्ग · द्वतीया · एकवचन

यः चौरः यः चौरः पुं लङ्ग · प्रथमा · एकवचन

तिस्मन् वृक्षे ति स्
मन ् वृक्षे पुं लङ्ग · सप्तमी · एकवचन

कां कथाम् काम् कथाम् स्त्री लङ्ग · द्वतीया · एकवचन

एतत् चौरकम एतत ् चौरकम नपुंसक लङ्ग · प्रथमा/ द्वतीया · एकवचन

पुस्तक क दूसरी ता लका —

एषः िपता एषा माता एतत् िमत्रम्

कः समथः ? का चत ुरा ? िकम् उ त्त मम् ?

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

यह नयम व्यवहार म कैसे काम आता है: संस्कृत म शब्द का क्रम स्वतन्त्र होता है — ‘प्रहृष्टमनाः धमबु द्धः आह’
म वशेषण पहले है, ‘पापबु द्धः प्रहृष्टमनाः’ भी लखा जा सकता था। तब पाठक कैसे जाने क कौन-सा वशेषण
कस संज्ञा का है ? उत्तर यही तीन-सूत्री मेल है — जस संज्ञा से वशेषण का लङ्ग, वभ क्त और वचन तीन मल,
वशेषण उसी का है। इसी लए अनुवाद करते समय पहले वभ क्त दे खए, अथ बाद म।

पाठ से एक क ठन उदाहरण: ‘अधदग्धशरीरः ु टतेक्षणः करुणं वलपन् पापबु द्ध पता ब हरागतः’ — यहाँ
एक ही वशेष्य ‘पापबु द्ध पता’ (पुं लङ्ग, प्रथमा, एकवचन) के चार वशेषण ह और चार उसी रूप म ह :
अधदग्धशरीरः, ु टतेक्षणः, वलपन्, ब हरागतः। एक भी वशेषण का लङ्ग-वचन अलग नह — यही संस्कृत वाक्य
क कसावट है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 87
प्रश्न १ — अधो ल खतप्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.1 (क) नरस्य वृत्तं के जान न्त ?

उत्तरम् — आ दत्यः, चन्द्रः, अ नलः, अनलः, द्यौः, भू मः, आपः, हृदयम्, यमः, अहः, रा त्रः, उभे संध्ये, धमः च — एते सव
नरस्य वृत्तं जान न्त।
( हन्द — सूय, चन्द्रमा, वायु, अ ग्न, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दन, रात, दोन सन्ध्याएँ तथा धम — ये सब मनुष्य के
आचरण को जानते ह।)

आधार-श्लोकः (पृष्ठ ८३) —

आिद यच दाविनलोऽनल च ौभूिमरापो दयं यम च।
त् न् श् द्य हृ श्

अह च राि च उभे च सं ये धम िह जानाित नर य वृ म्॥
श् त्रश् ध् स् त्त

उत्तर कैसे बनाया गया: प्रश्न म ‘के’ है — यह ‘ कम्’ का पुं लङ्ग · प्रथमा · बहुवचन रूप है, अतः उत्तर म अनेक
कता प्रथमा बहुवचन म चा हए और क्रया भी बहुवचन म — ‘जान न्त’। ोक म छन्द के कारण एकवचन क्रया
‘जाना त’ आई है (अ न्तम कता ‘धमः’ के साथ मेल), कन्तु गद्य म पूरे वाक्य के लए ‘जान न्त’ लखना ही शुद्ध है।

ध्यान द: ोक के स न्धयुक्त पद को खोलकर ल खए, वरना उत्तर अशुद्ध हो जाएगा — ‘आ दत्यचन्द्रौ’ =
आ दत्यः + चन्द्रः (द्वन्द्व समास, द्ववचन), ‘द्यौभू मरापः’ = द्यौः + भू मः + आपः। यह ोक इसी पाठ के प्रश्न ५ (क)
म भी लौटकर आया है।

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प्र.1 (ख) धमबुद्धयः क वीक्षन्ते ?

उत्तरम् — धमबुद्धयः परदारेषु मातृवत्, परद्रव्येषु लोष्ठवत्, सवभूतेषु च आत्मवत् वीक्षन्ते।
( हन्द — धमबु द्ध वाले लोग पराई स्त्रय को माता के समान, पराए धन को म के ढे ले के समान और सब प्रा णय को अपने ही
समान दे खते ह।)

आधार-श्लोकः (पृष्ठ ८२) —

मातृव परदारेष ु परद येष ु लो ठवत्।
त् व् ष्

आ मव सवभूतेष ु वी ते धमबु यः॥
त् त् क्षन् द्ध

तीन उपमाएँ एक ही सीढ़ ह: पहली उपमा काम पर संयम सखाती है, दूसरी लोभ पर, और तीसरी अहंकार पर
— क्य क जो सबको अपने समान दे खता है, वह कसी को छोटा नह समझ सकता। कथा म धमबु द्ध यही ोक
तब पढ़ता है जब पापबु द्ध उस पर चोरी का आरोप लगाता है — अथात् वह अपने बचाव म सफ़ाई नह दे ता, अपना
सद्धान्त रखता है।

व्याकरण: ‘वीक्षन्ते’ आत्मनेपद क्रया है ( व + √ईक्ष्), लट् लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन — इसी लए ‘-न्ते’।
‘मातृवत्’, ‘लोष्ठवत्’, ‘आत्मवत्’ — तीन व त-प्रत्ययान्त अव्यय ह; अव्यय होने के कारण इनका रूप कभी नह
बदलता।

प्र.1 (ग) कस्य जन्मनः फलं व्यथम् ?

उत्तरम् — येन धरणीपीठे भ्रमता अ प दे शान्तरेषु बहु वधभाषावेषा द न ज्ञातम्, तस्य जन्मनः फलं व्यथम् (भव त)।
( हन्द — धरती पर घूमते हुए भी जसने दूसरे दे श क अनेक प्रकार क भाषाओं, वेशभूषा आ द को नह जाना, उसके जन्म का
फल व्यथ होता है।)

आधार-श्लोकः (पृष्ठ ८०) —

दे शा तरेष ु बहुिवधभाषावेषािद येन न ातम्।
न् ज्ञ

भमता धरणीपीठे त य फलं ज मनो यथम्॥
स् न् व्

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्
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‘कस्य’ का उत्तर कैसे द: प्रश्न षष्ठी एकवचन म है, इस लए उत्तर भी ‘तस्य’ (षष्ठी एकवचन) से जुड़ना चा हए।
m पूरा कर
सबसे सुर क्षत व ध यह है क ोक के ‘येन … तस्य’ वाले यत्-तत् ढाँचे को ज्य का त्य रखकर eवाक्य
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दया जाए —.cतब
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o न वभ क्त बगड़ेगी, न अथ। gl a
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aglबारीक : ध्यान र खए क ोक उन लोग क नन्दा नह करता जो घर से नह नकले; वह उनक नन्दा करता है जो

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‘भ्रमता’ — घूमते हुए भी — कुछ न सीखे। इसी लए उत्तर म ‘भ्रमता अ प’ लखना अथ को और स्पष्ट कर दे ता है।

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पापबु द्धः स्व पतरं कम् उक्तवान् ?
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प्र.1 (घ)

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g य द मदुक्तप्रकारेण वद त
.c द्धः स्व पतरम् उक्तवान् — “तात! मया धमबुद्धेः प्रभूतः अथः चो रतः।aभवान्

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e म य रं तष्ठ त, अन्यथास्माकं प्राणैः सह यास्य त।” अ प च सः पतरं वनप्रदे शे तस्य महाशमीवृक्षस्य
sतद्धनं
उत्तरम् — पापबु
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तlह
agमहाकोटरे प्रवेष्टुं, प्रभाते च ‘धमबु द्धः चौरः’ इ त वक्तुम् आ दष्टवान्।
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( हन्द — पापबु द्ध ने अपने पता से कहा — ‘ पताजी! मने धमबु द्ध का बहुत-सा धन चुरा लया है। य द आप मेरे कहे अनुसार

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बोलगे तो वह धन मेरे पास टका रहेगा, नह तो हमारे प्राण के साथ ही चला जाएगा।’ आगे उसने पता से कहा क वे वन म स्थत

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महाशमी वृक्ष के बड़े कोटर म अभी जाकर बैठ जाएँ और सवेरे जब वह सत्य-श्रवण के लए नवेदन करे, तब कह द क ‘धमबु द्ध
चोर है’।) a

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क्रमः पापबुद्धेः वचनम् उसका आशय

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१ मया धमबुद्धेः पभूतः अथः चोिरतः। — अथ त ्

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िपता के सामने वह अपना अपराध ख ुल कर मानता है

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उ से अपने पाप का पूर ा ान है

agl २ भवान् यिद मदुक्तपकारे ण वदित तिह तद्धनं मिय िस्थरं ितष्ठित। झूठ ी गवाही की माँग , वह भी ल ाल च िद खाकर

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अन्यथास्माकं पाणैः सह यास्यित। — ‘नही ं तो हम पाणों से भी जाएँग े’
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भय िद खाना

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४ अिस्त वनपदे शे महाशमी नाम वृक्षः। तिस्मन् महाकोटरम् अिस्त। न् — ‘
िछपने का पूर ा पब ध अभी जाकर बैठ जाइए ’
तत्र भवान् साम्पतमेव पिवशतु।

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५ तदा भवता वक्तव्यं यद् धमबुिद्धः चौर इित। , यह भी िसखा िद या

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या बोल ना है

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यह प्रसंग कथा का केन्द्र क्य है: यह पापबु द्ध का ‘उपाय’ पूरा होता है — और यह उसका ‘अपाय’ जन्म लेता
m है। उसने सोचा क लकड़ी के कोटर म बैठा पता सुर क्षत रहेगा; उसने यह नह सोचा क सूखा कोटर आग पकड़ता
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है। इसी लए अन्त म सब लोग कहते ह — ‘पापबुद्धेः व्यथपा ण्डत्यात् पता व ना घा ततः’।

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व्याकरण-सङ् केत: ‘उक्तवान्’ क्तवतु-प्रत्ययान्त पद है (√वच् → उक्तवान्), जो भूतकाल कत र म आता है और
कता ‘पापबु द्धः’ पुं लङ्ग एकवचन होने से ‘-वान्’ रूप म है। ‘मदुक्तप्रकारेण’ = मया उक्तः प्रकारः, तेन — तृतीया
वभ क्त ‘ जस ढं ग से’ के अथ म।

प्र.1 (ङ) प्राज्ञः क- क चन्तयेत् ?

उत्तरम् — प्राज्ञः उपायं चन्तयेत्, तथा अपायं च चन्तयेत्।
( हन्द — बु द्धमान् मनुष्य को उपाय सोचना चा हए और साथ ही उससे आने वाली हा न भी सोचनी चा हए।)

आधार-सूिक्तः (पृष्ठ ८४) — उपायं िच तयेत् पा तथापायं च िच तयेत्।
न् ज्ञस् न्

यही पाठ का शीषक है।

‘ क- कम्’ क्य दोहराया गया: संस्कृत म कसी प्रश्नवाचक शब्द क आवृ त्त का अथ होता है ‘एक-एक करके
सब’ — जैसे ‘कः-कः आगतः ?’ = कौन-कौन आया ? इस लए ‘ क- क चन्तयेत्’ पूछने का अथ है क उत्तर म एक
नह , दो वस्तुएँ चा हए। य द केवल ‘उपायम्’ लख दया तो आधा उत्तर ही हुआ — और मज़े क बात यह है क
पापबु द्ध क भूल भी ठ क यही थी।

शब्द-रचना पकड़ ली जए: दोन शब्द एक ही धातु √इ (जाना) से बने ह — उप + आय = पास लाने वाला माग,
साधन; अप + आय = दूर ले जाने वाला माग, हा न। उपसग बदलते ही अथ उलट गया। यही जोड़ी ‘प्रयोग/
अपप्रयोग’, ‘मान/अपमान’, ‘यश/अपयश’ म भी दखती है।

प्र.1 (च) मानवः कदा वद्यां वत्तं शल्पं च प्रा ो त ?

उत्तरम् — मानवः तदा एव वद्यां वत्तं शल्पं च सम्यक् प्रा ो त, यदा सः हृष्टः (सन्) भूमौ दे शात् दे शान्तरं व्रज त।
( हन्द — मनुष्य वद्या, धन तथा कला को तभी भली-भाँ त पाता है, जब वह प्रसन्न मन से पृथ्वी पर एक दे श से दूसरे दे श क यात्रा
करता है।)

आधार-श्लोकः (पृष्ठ ८०) —

िव ां िव ं िश पं तावन्ना नोित मानवः स यक् ।
द्य त्त ल् प् म्

यावद् वजित न भूमौ दे शा ेशा तरं टः॥ न् हृष्

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दो नषेध को एक वधान म बद लए: ोक कहता है ‘तावत् न आ ो त … यावत् न व्रज त’ — अथात् ‘तब तक
नह पाता, जब तक नह जाता’। ‘कदा’ (कब) का उत्तर दे ते समय इस दोहरे नषेध को सीधे वधान म पलट द जए
— ‘तदा एव प्रा ो त यदा व्रज त’। ग णत क तरह : दो नकार मलकर हाँ बनाते ह। यही अनुवाद क सबसे आम
भूल है, इस लए इसे यह पकड़ ली जए।

‘हृष्टः’ को मत छो ड़ए: ोक केवल यात्रा नह कहता, प्रसन्न मन से क गई यात्रा कहता है। मन मारकर क गई
यात्रा न वद्या दे ती है, न कौशल। उत्तर म यह पद रखने से अथ पूरा होता है।

प्र.1 (छ) पापबु द्धः क चन्त यत्वा दे शान्तरं प्र तः ?

उत्तरम् — पापबु द्धः एवं चन्त यत्वा दे शान्तरं प्र तः — “अहं तावान् मूखः द रद्रतया पी डतश्च। अत एनं धमबु द्ध
स्वीकृत्य अन्यं दे शं गच्छा म, तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादया म, अनन्तरम् एनम प वञ्च यत्वा सुखी भवा म” इ त।
( हन्द — पापबु द्ध ने यह सोचकर परदे श के लए प्रस्थान कया — ‘म इतना मूख हूँ और द रद्रता से पी ड़त भी। इस लए इस
धमबु द्ध को साथ लेकर दूसरे दे श जाता हूँ; वहाँ इसके सहारे धन कमाऊँगा और उसके बाद इसे भी ठगकर सुखी हो जाऊँगा।’)

चरणः पापबुद्धेः वचारः वह क्या दखाता है

१ अहं तावान् मूखः दिरद तया पीिडतश्च। आ म त् -स् वीकृ ित — वह अपनी द िरद ता जानता है और अपनी मूखता भी

२ एनं धमबुिद्धं स्वीकृ त्य अन्यं दे शं गच्छािम। िम त्र ता को साधन बनाना — यही ं छल का बीज है

३ तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयािम। वह जानता है िक कमाई धम ब ुि द्ध के पभाव से होगी , अपनी योग्यता से नही ं

४ अनन्तरम् एनमिप वञ्चियत्वा सुखी भवािम। पहले िद न से ही ठगने की योजना — यात्र ा उ े श्य नही,ं बहाना है

कथा का सबसे बड़ा सन्दे श यह छपा है: पापबु द्ध क योजना का पहला भाग पूरी तरह सफल रहा — वह
परदे श गया, धन भी कमाया। भूल दूसरे भाग म हुई, जहाँ उसने ‘वञ्च यत्वा सुखी भवा म’ सोचा। अथात् उसका
उपाय तो चला, पर उसने यह नह सोचा क छल का अपाय क्या होगा। पूरा पाठ इसी एक वाक्य का वस्तार है।

व्याकरण: ‘ चन्त यत्वा’, ‘स्वीकृत्य’, ‘वञ्च यत्वा’ — तीन पूवका लक कृदन्त ह। ‘स्वीकृत्य’ म उपसग होने से ल्यप्
लगा (स्वी + √कृ + ल्यप्), शेष दोन म उपसग न होने से क्त्वा। ‘प्र स्थतः’ क्त-प्रत्ययान्त (प्र + √स्था) है, जो कता
‘पापबु द्धः’ के अनुसार पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन म है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 87

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प्रश्न २ — अधो ल खतवाक्येषु ूलाक्षरपदा न आ श्रत्य प्रश्न नमाणं कुरुत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.2 (क) एनम् अ प वञ्च यत्वा सुखी भवा म।

प्रश्न नमाणम् — कम् अ प वञ्च यत्वा सुखी भवा म ?
( हन्द — कसको भी ठगकर सुखी होता हूँ ? — अथात् ‘एनम्’ के स्थान पर उसी वभ क्त-वचन का प्रश्नवाचक ‘कम्’ रखा गया।)

स्थूलपदम् — एनम् (एतद् /इदम् इत्यस्य िद्वतीया · एकवचन · पुंिलङ् ग)

तत्स्थाने पश्नवाचकम् — िकम् इत्यस्य िद्वतीया एकवचन पुंिलङ् ग = कम्

शेषं वाक्यं यथावत् एव ितष्ठित।

प्रश्न नमाण का एक ही नयम है: जस पद पर प्रश्न बनाना है, उसे हटाइए और उसी लङ्ग · वभ क्त · वचन का
प्रश्नवाचक सवनाम वह रख द जए; वाक्य का शेष भाग बलकुल न छे ड़ए। ‘एनम्’ पुं लङ्ग द्वतीया एकवचन है (यह
‘एतद्’ का ही अन्वादे श-रूप है), अतः ‘कम्’ आएगा — ‘कः’ या ‘केन’ नह ।

ध्यान द: ‘एनम्’ का प्रयोग तभी होता है जब उस व्य क्त क चचा पहले हो चुक हो — यहाँ धमबु द्ध क । इसी लए
अनुवाद म ‘इसको भी’ आता है, ‘ कसी को’ नह ।

प्र.2 (ख) सव धनं स्वीकृत्य स्वग्रामं गच्छावः।

प्रश्न नमाणम् — सव धनं स्वीकृत्य कुत्र गच्छावः ?
( हन्द — सारा धन लेकर हम दोन कहाँ जाएँ ?)

स्थूलपदम् — स्वगामम् (स्थानवाचकम्, कमिण िद्वतीया — गन्तव्य स्थान)

स्थानस्य पश्नवाचकम् अव्ययम् — कु त्र (कहाँ)

वैक िल्पकम् — कं गामं गच्छावः ? (यिद ‘गाम’ शब्द पर ही बल दे न ा हो)

दोन म से कौन-सा उत्तर लख: जब स्थूल पद कोई ान हो, तब सामान्यतः कुत्र ही सबसे उपयुक्त प्रश्नवाचक है,
क्य क वह अव्यय है और वभ क्त क झंझट नह आती। य द प्रश्न वशेष रूप से ‘कौन-सा गाँव’ पूछना चाहे, तब
‘कं ग्रामम्’ भी शुद्ध है। परीक्षा म ‘कुत्र’ ल खए और चाह तो कोष्ठक म दूसरा वकल्प जोड़ द जए।

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व्याकरण: ‘गच्छावः’ — √गम्, लट् लकार, उत्तमपुरुष वचन (‘हम दोन जाते ह / चल’)। पूरे पाठ म द्ववचन के
रूप बार-बार आते ह, क्य क पात्र दो ही ह — गच्छावः, कुवः, प्र वशावः, आनयावः, आवाम्, आवाभ्याम्।

प्र.2 (ग) नशीथे अटव्यां गत्वा तत् सव वत्तम् आनीतवान्।

प्रश्न नमाणम् — कदा अटव्यां गत्वा तत् सव वत्तम् आनीतवान् ?
( हन्द — कब जंगल म जाकर वह सारा धन ले आया ?)

स्थूलपदम् — िनशीथे (कालवाचकम्, अिधकरणे सप्तमी — ‘आधी रात में’)

कालस्य पश्नवाचकम् अव्ययम् — कदा (कब)

वैक िल्पकम् — किस्मन् काले अटव्यां गत्वा … ?

पहचान का सूत्र: स्थूल पद य द समय बताता है तो ‘कदा’, य द ान बताता है तो ‘कुत्र’, य द कारण बताता है तो
‘कुतः/ कमथम्’, और य द ढं ग बताता है तो ‘कथम्’। ‘ नशीथे’ का अथ पुस्तक स्वयं दे ती है — ‘अधरात्रे’ —
इस लए यह स्पष्ट रूप से कालवाचक है और उत्तर ‘कदा’ ही होगा।

जोड़कर दे खए: यही वाक्य कथा म कुछ बदले रूप म आया है — ‘पापबु द्धः नशीथे अटव्यां गत्वा तत्सव वत्तं
समादाय गत पूर यत्वा स्वभवनं गतवान्।’ अभ्यास म उसे सरल करके ‘आनीतवान्’ कर दया गया है। ‘आनीतवान्’
क्तवतु-प्रत्ययान्त है — आ + √नी + क्तवतु।

प्र.2 (घ) तत् आकण्य सव ते जनाः वस्मयोत्फुल्ललोचनाः स ाताः।

प्रश्न नमाणम् — तत् आकण्य सव ते जनाः क दृशाः स ाताः ?
( हन्द — वह सुनकर वे सब लोग कैसे हो गए ?)

स्थूलपदम् — िवस्मयोत्फु ल्ललोचनाः (िवशेषणम्, बहवु ीिह समासः, पुं.प.ब.व.)

िवगहः — िवस्मयेन उत्फु ल्लािन लोचनािन येषां ते

िवशेषणस्य पश्नवाचकम् — कीदृ शाः (पुंिलङ् ग · पथमा · बहुवचन)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्
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‘क दृश’ का रूप वशेष्य से मलाइए: ‘क दृश’ स्वयं वशेषण है, इस लए वह भी वशेष्य ‘जनाः’ (पुं लङ्ग, प्रथमा,

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o इदम् अवधेयम्’ म ‘ वशेषणा न वशेष्या ण च’ शीषक से पढ़ा चुक हैa।gl
बहुवचन) के अनुसार क दृशाः बनेगा — ‘क दृशः’ (एकवचन) या ‘क दृशी’ (स्त्री लङ्ग) लखना अशु द्ध होगा। यही
नयम पुस्तक.c‘अत्र

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aglसमास पहचा नए: ‘उत्फुल्ललोचनाः’ बहुव्री ह है — इसका अथ न ‘उत्फुल्ल’ है न ‘लोचन’, ब ल्क वे लोग जनक

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आँख फैल गई ह । अथात् समास कसी तीसरे पद (अन्यपद) का बोध कराता है — यही बहुव्री ह क पहचान है। इसी

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पाठ का दूसरा बहुव्री ह है ‘ ु टतेक्षणः’ ( जसक आँख फूट गई ह ) तथा ‘प्रहृष्टमनाः’ ( जसका मन प्रसन्न हो)।

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प्र.2 (ङ) अहम् एतत् शमीकोटरं व ना प्रज्वालया म।

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a ( हन्द — म इस शमी वृक्ष के कोटर को कससे जलाता हूँ ?)
प्रश्न नमाणम् — अहम् एतत् शमीकोटरं केन प्रज्वालया म ?

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em· पुंिलङ् ग) agl
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स्थूलपदम् — वि ना (करणे त ृत ीया · एकवचन
िनयमः — «साधकतमं करणम्» —aिजस gl साधन से ि या की जाए, उसमें तृतीया
तत्स्थाने पश्नवाचकम् — के न (िकम् इत्यस्य त ृत ीया एकवचन)
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g धीरे-धीरे), जब क यहाँ स्थूल
.c ही क्य , ‘कथम्’ क्य नह : ‘कथम्’ का उत्तर ढं ग होता है (कैसे — दौड़कर,
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aseपद एक साधन है — आग। साधन के लए तृतीया आती है और उसका प्रश्नवाचक ‘केन’ (पुं./नपुं.) या ‘कया’
‘केन’

agl (स्त्री.) होता है। जैसे — ‘सः लेखन्या लख त’ → ‘सः कया लख त ?’

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m . भोज्यद्रव्यैः प रवेष्ट्य व ना प्रज्वालया म।’ यहाँ a
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aमs है (जलने योग्य वस्तुओं से) — अथात् एक ही वाक्य म करण-तृतीया दो
पाठ का पूरा वाक्य: ‘अहम् एतत् शमीकोटरं व

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बार आई है। यह वाक्य ध्यान सेaप ढ़ए; इसी म कथा का नणायक मोड़ है।
‘व भोज्यद्रव्यैः’ भी तृतीया बहुवचन

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

प्रश्न ३ — अधो ल खता न वाक्या न कः कं प्र त कथय त इ त लखत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.3 अधो ल खता न वाक्या न कः कं प्र त कथय त इ त लखत — (क) वत्स ! द्रुतं वद येन तद् द्रव्यं रं तष्ठेत्। (ख)
प्रातःकाले युवामस्मा भः सह तत्र वनप्रदे शं गच्छतम्। (ग) त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन। (घ) भोः दुरात्मन् ! मा मैवं
वद। (ङ) एतत् सवम प पापबुद्धेः चे ष्टतम्।

क्रमः वाक्यम् कः कं प्र त (श्रोता) प्रसङ्गः
(वक्ता)

(क) वत्स! द तं वद येन तद् द व्यं पापब ुद्ध ेः िपता पापब ुि द्ध ं पित रात म पुत्र घर आकर चोरी क बात बताता है;
िस्थरं ितष्ठे त।
् व्याकुल पता झट पूछता है क धन कैसे
टकेगा

(ख) पातःकाले युवामस्मािभः सह धम िधकारी धम ब ुि द्ध ं पापब ुि द्ध (द्व )
ं च ौ पित साक्षी न मलने पर वनदे वता से नणय कराने
तत्र वनपदे शं गच्छतम्। का आदे श

(ग) त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन। पापब ुि द्ध ः धम ब ुि द्ध ं पित घड़ा खाली मलने पर सर पीटते हुए झूठा
आरोप

(घ) भोः दुर ात्मन्! मा मैवं वद। धम ब ुि द्ध ः पापब ुि द्ध ं पित आरोप का प्र तवाद — ‘धमबु द्धः खल्वहम्’

(ङ) एतत् सवमिप पापबुद्धेः पापब ुद्ध ेः िपता सव न ् जनान ् (धम िधकािरणं कोटर से जलकर बाहर नकलते हुए अ न्तम
चेिष्टतम्। सामािजकां च श् ) पित सत्य-वचन, और वह मर जाता है

पूणवाक्येन उत्तरा ण —

(क) पापबुद्धेः पता पापबु द्ध प्र त कथय त। ( पता अपने पुत्र से कहता है।)
(ख) धमा धकारी धमबु द्ध पापबु द्ध च प्र त कथय त। (न्यायाधीश दोन मत्र से कहता है।)
(ग) पापबु द्धः धमबु द्ध प्र त कथय त। (पापबु द्ध धमबु द्ध से कहता है।)
(घ) धमबु द्धः पापबु द्ध प्र त कथय त। (धमबु द्ध पापबु द्ध से कहता है।)
(ङ) पापबुद्धेः पता सवान् जनान् प्र त कथय त। (पापबु द्ध का पता वहाँ उप स्थत सब लोग से कहता है।)

वक्ता पहचानने क तीन कुं जयाँ: (१) सम्बोधन — वाक्य म जो सम्बोधन है, वही श्रोता है और उससे वक्ता का
सम्बन्ध खुल जाता है। ‘वत्स!’ पता ही कहेगा; ‘दुरात्मन्!’ वही कहेगा जस पर झूठा आरोप लगा है। (२) पुरुष
तथा वचन — ‘युवाम् … अस्मा भः … गच्छतम्’ — ‘युवाम्’ मध्यमपुरुष द्ववचन है, अथात् श्रोता दो ह; और
‘अस्मा भः’ बताता है क वक्ता अपने साथ कसी दल क बात कर रहा है — यह धमा धकारी ही हो सकता है। (३)
वषय — ‘पापबुद्धेः चे ष्टतम्’ म पापबु द्ध का नाम तीसरे व्य क्त क तरह आया है, अतः वक्ता स्वयं पापबु द्ध नह
हो सकता।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

(घ) का व्याकरण: ‘मा मैवं वद’ = मा + मा + एवम् + वद। ‘मा’ नषेधाथक अव्यय है और इसका प्रयोग सदा लोट् /
लुङ् के साथ होता है (‘मा वद’ = मत बोलो)। यहाँ ‘मा’ दो बार आया है — यह आवृ त्त से आया बल है, अथात्
‘ बलकुल मत बोलो, कभी ऐसा मत कहो’। धमबु द्ध का क्रोध और पीड़ा दोन इसी दोहराव म ह।

(ग) क सूक्ष्म बात: कथा म यह वाक्य ‘त्वयैवापहृतम् एतद्धनं, नान्येन’ रूप म छपा है (त्वया + एव + अपहृतम्),
जब क अभ्यास म उसे सरल करके ‘त्वया हृतम्’ कर दया गया है। दोन का अथ एक ही है; ‘एव’ हट जाने से केवल
बल कम हुआ है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 88
प्रश्न ४ — उदाहरणानुसारं भूतका लकवाक्या न वतमानका लकवाक्येषु प रवतयत (उदाहरणम् — भवान प मया सहैव प्रभूतं धनं प्राप्तवान्। →
भवान प मया सहैव प्रभूतं धनं प्रा ो त।)

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.4 (क) राजपुरुषाः पापबु द्ध द ण्डतवन्तः।

वतमानका लकवाक्यम् — राजपुरुषाः पापबु द्ध दण्डय न्त।
( हन्द — राजपुरुष पापबु द्ध को दण्ड दे ते ह।)

भूत कािलकम् — दिण्डतवन्तः (√दण्ड् + िणच् + क्तवत ,ु पुं.प.ब.व.)

वतमानकािलकम् — दण्डयिन्त (लट् लकार, पथमपुरु ष, बहुवचन )

कत ‘राजपुरु षाः’ बहुवचने अिस्त, अतः ि या अिप बहुवचने ।

नयम पहले, प्रयोग बाद म: क्तवतु-प्रत्ययान्त पद वशेषण क तरह चलता है, इस लए वह कता के लङ्ग-वचन से
मेल खाता है (राजपुरुषाः → द ण्डतवन्तः)। जब उसे वतमानकाल म बदलते ह, तब वह क्रयापद बन जाता है और
अब उसे कता के पुरुष तथा वचन से मलना पड़ता है — ‘राजपुरुषाः’ प्रथमपुरुष बहुवचन है, अतः ‘दण्डय न्त’। यही
एक अन्तर पूरे प्रश्न ४ म लागू होता है।

ध्यान द: ‘दण्ड् ’ धातु का प्रयोग णजन्त रूप म होता है — दण्डय त / दण्डय न्त (दण्ड दे ता है / दे ते ह)। ‘दण्ड त’
लखना अशुद्ध है।

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प्र.4 (ख) पापबु द्धः अत्य धकं धनं सम्पा दतवान्।

वतमानका लकवाक्यम् — पापबु द्धः अत्य धकं धनं सम्पादय त।
( हन्द — पापबु द्ध बहुत अ धक धन कमाता है।)

भूत कािलकम् — सम्पािदतवान् (सम् + √पद् + िणच् + क्तवत ,ु पुं.प.ए.व.)
वतमानकािलकम् — सम्पादयित (लट् , पथमपुरु ष, एकवचन )

कत ‘पापबुिद्धः’ एकवचने , अतः ि या अिप एकवचने ।

‘-वान्’ बनाम ‘-वन्तः’ पर ध्यान द जए: (क) म कता बहुवचन था तो ‘द ण्डतवन्तः’, यहाँ कता एकवचन है तो
‘सम्पा दतवान्’। इसी सङ् केत से आप बना अथ जाने भी बता सकते ह क वतमान क्रया एकवचन म बनेगी या
बहुवचन म — क्तवतु का रूप ही वचन बता दे ता है।

कथा का सन्दभ: मूल पाठ म यह वाक्य है — ‘पापबु द्धः धमबुद्धेः प्रभावेण प्रभूतं धनं सम्पा दतवान्’। अथात् धन
उसने अपने बल पर नह , मत्र के प्रभाव से कमाया — और उसी मत्र को उसने ठगा। अभ्यास म ‘प्रभूतम्’ के स्थान
पर ‘अत्य धकम्’ रखा गया है; दोन का अथ एक ही है — बहुत अ धक।

प्र.4 (ग) पापबु द्धः वनदे वतायाः समीपम् आगतवान्।

वतमानका लकवाक्यम् — पापबु द्धः वनदे वतायाः समीपम् आगच्छ त।
( हन्द — पापबु द्ध वनदे वता के पास आता है।)

भूत कािलकम् — आगतवान् (आ + √गम् + क्तवत ,ु पुं.प.ए.व.)
वतमानकािलकम् — आगच्छित (आ + √गम्, लट् , प.पु.ए.व.)

√गम् धातोः लट् -लकारे ‘गच्छ् ’ इित आदे शः भवित — गच्छित, आगच्छित।

धातु का रूप बदलता है, अथ नह : ‘गम्’ धातु लट् लकार म ‘गच्छ् ’ हो जाती है (शप् वकरण के साथ
‘इषुग मयमां छः’ नयम से), इस लए ‘गम त’ नह , गच्छ त बनता है। भूतकाल के क्तवतु-रूप म यह प रवतन नह
होता — वहाँ मूल ‘गत’ ही रहता है (गतवान्, आगतवान्)। यही कारण है क दोन रूप दे खने म इतने अलग लगते ह।

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‘समीपम्’ का प्रयोग: ‘समीपम्’ के योग म सम्बन्धवाची पद षष्ठी म आता है — ‘वनदे वताया◌ः समीपम्’। इसी
प्रकार ‘गृहस्य समीपम्’, ‘नद्याः समीपम्’। ‘समीपे’ (सप्तमी) भी शुद्ध है, तब अथ ‘पास म’ होगा, ‘पास क ओर’
नह ।

प्र.4 (घ) अत्रान्तरे पापबु द्धः शरस्ताडयन् उक्तवान्।

वतमानका लकवाक्यम् — अत्रान्तरे पापबु द्धः शरस्ताडयन् वद त।
( हन्द — इसी बीच पापबु द्ध सर पीटता हुआ कहता है।) — ‘ब्रवी त’ अथवा ‘कथय त’ भी शुद्ध ह।

भूत कािलकम् — उक्तवान् (√वच् + क्तवत ;ु ‘वच्’ धातोः ‘उक्त’ इित रूपम्)

वतमानकािलकम् — वदित (√वद् , लट् , प.पु.ए.व.)
‘िशरस्ताडयन्’ इित शत ृ-पत्ययान्त पदं यथावत् एव ितष्ठित — तत् कालं न सूच यित, अिप त ु ‘साथ-साथ चलने

वाली ि या’ सूच यित।

‘ शरस्ताडयन्’ को क्य नह बदला: यही इस प्रश्न क परीक्षा है। ‘-अन्’ पर समाप्त होने वाला यह शतृ प्रत्ययान्त
पद (ताडयत् → ताडयन्) मुख्य क्रया के साथ-साथ होने वाली क्रया बताता है — ‘पीटता हुआ’। इसका अपना कोई
काल नह होता; वह मुख्य क्रया से ही काल लेता है। इस लए मुख्य क्रया बद लए, यह पद ज्य का त्य रहने द जए।

धातु-रूप क सावधानी: √वच् का लट् म रूप ‘व क्त’ बनता है, जो सामान्य प्रयोग म वरल है; व्यवहार म ‘वद त’
(√वद्) या ‘ब्रवी त’ (√ब्रू) लखा जाता है। ‘उक्तवान्’ का स्वाभा वक वतमान-प्र तरूप वद त ही है।

प्र.4 (ङ) सव जनाः धमबु द्ध प्रशं सतवन्तः।

वतमानका लकवाक्यम् — सव जनाः धमबु द्ध प्रशंस न्त।
( हन्द — सब लोग धमबु द्ध क प्रशंसा करते ह।)

भूत कािलकम् — पशंिसतवन्तः (प + √शंस ् + क्तवत ,ु पुं.प.ब.व.)

वतमानकािलकम् — पशंसिन्त (प + √शंस,् लट् , प.पु.ब.व.)

‘धमबुिद्धम्’ — कमिण िद्वतीया (संस्कृ ते ‘पशंसा करना’ सकमक ि या अिस्त)

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हन्द और संस्कृत क रचना म अन्तर: हन्द म हम कहते ह ‘धमबु द्ध क प्रशंसा करते ह’ — यहाँ सम्बन्ध-

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gl है।
कारक दखता है। संस्कृत म ‘प्रशंस न्त’ सीधी सकमक क्रया है, इस लए वहाँ कम द्वतीया म आएगा
. co द्धेः’ नह । हन्द क छाया म अनुवाद करने पर यही भूल सबसे अ धकaहोती
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प्रशंस न्त’, ‘धमबु

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aglपाँच उत्तर एक साथ — (क) दण्डय न्त · (ख) सम्पादय त · (ग) आगच्छ त · (घ) वद त · (ङ) प्रशंस न्त। जाँच का

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सरल तरीका : हर वाक्य म कता दे खए और ग नए — एक है तो ‘- त’, अनेक ह तो ‘- न्त’।

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प्रश्न ५ — ोकानां भावाथान् व चन्त्य कोष्ठकात् समु चतपदै ः रक्त ाना न पूरयत

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अभ्यासाद् जायते स द्धः
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a glप्र.5 (क) सूयः चन्द्रः ………… अ ग्नः आकाशः भू मः जलं ………… यमः दवसः रा त्रः प्रभातं सायं च मनुष्याणां
सव वधं ………… जान न्त। अतः वयं सवदा उत्तमं व्यवहारं कुमः। (व्यवहारं / पवनः / हृदयं)
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agl भू मः जलं हृदयं यमः दवसः रा त्रः प्रभातं सायं च मनुष्याणां सव वधं

पूण वाक्यम् — सूयः चन्द्रः पवनः अ ग्नः आकाशः
व्यवहारं जान न्त। अतः वयं सवदा उत्तमं व्यवहारं कुमः।

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( हन्द — सूय, चन्द्रमा, पवन, अ ग्न, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दन, रात, प्रातःकाल और सायंकाल — ये सब मनुष्य के

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सब प्रकार के व्यवहार को जानते ह। इस लए हम सदा उत्तम व्यवहार कर।)
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l a se रक्त ानम् उत्तरम् ोक का कौन- क्य यही

ag सा पद

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पहला — ‘चन्द्रः ___ अिनलः ोक का क्रम ही है — आ दत्य, चन्द्र, अ नल, अनल; ‘अ नल’ का

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पवनः

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अ ग्नः’ हन्द -सुलभ पयाय ‘पवन’ है

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दूसरा — ‘जलं ___ यमः’ हृ द यं ोक म ठ क यही क्रम है — ‘आपो हृदयं यमश्च’

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तीसरा — ‘सव वधं ___ वृत्त म् ‘वृत्तम्’ का अथ है आचरण; उसी का सरल पयाय ‘व्यवहार’ बचा हुआ

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यवहारं

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जान न्त’ तीसरा पद है

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omपद कैसे तय हुए: यह प्रश्न पाठ के चौथे l a
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ोक ‘आ दत्यचन्द्राव नलोऽनलश्च…’ का सरल गद्य-रूपान्तर है।

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सबसे भरोसेमन्द व ध यह है क दए गए वाक्य और ोक को आमने-सामने रखकर मलाया जाए — जो पद वाक्य
म नह है, वही रक्तस्थान का उत्तर है। ‘पवनः’ के लए स्थान भी प्रमाण दे ता है : वह ‘चन्द्रः’ और ‘अ ग्नः’ के बीच
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है, ठ क वैसे ही जैसे ोक म ‘अ नलः’ ‘चन्द्र’ और ‘अनल’ के बीच है।
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पयाय क जोड़ी याद र खए: आ दत्यः = सूयः · अ नलः = पवनः/वायुः · अनलः = अ ग्नः/व ः · द्यौः =
आकाशः · आपः = जलम् · वृत्तम् = व्यवहारः/आचरणम्। परीक्षा म यही पयाय पूछकर एक-अङ् क का प्रश्न बनाया
जाता है।

प्र.5 (ख) यः ………… न अट त, व वधदे शानां संस्कृतीः ………… च न जाना त, पृ थवीपृष्ठे तस्य जन्म …………
भा त। (भाषाः / व्यथ / अन्यदे शेषु)

पूण वाक्यम् — यः अन्यदे शेषु न अट त, व वधदे शानां संस्कृतीः भाषाः च न जाना त, पृ थवीपृष्ठे तस्य जन्म व्यथ भा त।
( हन्द — जो दूसरे दे श म नह घूमता और व वध दे श क संस्कृ तय तथा भाषाओं को नह जानता, पृथ्वी के तल पर उसका जन्म
व्यथ ही जान पड़ता है।)

रक्त ानम् उत्तरम् वभ क्त-सङ् केत ोक का आधार

‘यः ___ न अट त’ न्
अ यदे शेष ु सप्तमी बहुवचन — ‘अट त’ (घूमना) के साथ स्थान सप्तमी म दे शान्तरे ष ु

‘संस्कृतीः ___ च न जाना त’ भाषाः द्वतीया बहुवचन — ‘संस्कृतीः’ के साथ समान वभ क्त चा हए बहुिवधभाषावेषािद

‘तस्य जन्म ___ भा त’ व्
यथ ं क्रया वशेषण/ वशेषण — ‘जन्म’ नपुंसक लङ्ग के अनुरूप तस्य फलं जन्मनो व्यथम्

वभ क्त ही उत्तर पकड़ा दे ती है: तीन वकल्प के रूप दे खए — ‘अन्यदे शेषु’ सप्तमी म है, ‘भाषाः’ प्रथमा/
तीया बहुवचन म और ‘व्यथ’ अव्यय-सा वशेषण। अब वाक्य म दे खए क कस स्थान पर कौन-सी वभ क्त
चा हए : ‘न अट त’ के पहले स्थान चा हए → सप्तमी; ‘संस्कृतीः … च’ म ‘च’ बता रहा है क दूसरा पद भी उसी
वभ क्त म होगा → ‘भाषाः’; बचा ‘व्यथम्’, जो ‘जन्म’ का वशेषण बनेगा। अथ बाद म दे खए, वभ क्त पहले —
इस प्रकार के प्रश्न म यही सबसे तेज़ रास्ता है।

ध्यान द: ‘संस्कृतीः’ ईकारान्त स्त्री लङ्ग ‘संस्कृ त’ का तीया बहुवचन रूप है (संस्कृ तः → संस्कृतीः)। ‘भाषाः’
भी आकारान्त स्त्री लङ्ग का द्वतीया बहुवचन ही है (भाषा → भाषाः) — इसी लए दोन ‘च’ से ठ क जुड़ जाते ह।

प्र.5 (ग) सज्जनाः सवासु नारीषु ………… इव, अन्येषां ………… मृ त्पण्डम् इव, सवषु प्रा णषु च ………… इव
चन्तय न्त। (द्रव्येषु / स्वयम् / मातरः)

पूण वाक्यम् — सज्जनाः सवासु नारीषु मातरः इव, अन्येषां द्रव्येषु मृ त्पण्डम् इव, सवषु प्रा णषु च स्वयम् इव चन्तय न्त।
( हन्द — सज्जन लोग सब स्त्रय म माताओं के समान, दूसर के धन म म के ढे ले के समान और सब प्रा णय म स्वयं अपने ही
समान वचार करते ह।)

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रक्त ानम् उत्तरम् ोक का पद भाव

‘सवासु नारीषु ___ इव’ मातरः मातवृ त् (= मातुः इव) पराई स्त्री माता के समान — काम पर संयम

‘अन्येषां ___ मृ त्पण्डम् इव’ व्
द येष ु परद व्येष ु लोष्ठवत् पराया धन म का ढे ला — लोभ पर संयम

‘सवषु प्रा णषु च ___ इव’ स् वयम् आत्मवत्सवभूतेष ु सब प्राणी अपने समान — अहंकार पर संयम

यह वाक्य तीसरे ोक का गद्य-रूप है: ोक म तीन उपमाएँ ‘-वत्’ प्रत्यय से बनी थ — मातृवत्, लोष्ठवत्,
आत्मवत्। गद्य म ‘वत्’ के स्थान पर ‘इव’ आ गया है, इस लए उससे पहले वाला पद अब प्रथमा म रहेगा — ‘मातरः
इव’, ‘स्वयम् इव’। यही कारण है क उत्तर ‘मातृवत्’ नह , ‘मातरः’ है। दूसरे रक्तस्थान म ‘अन्येषां’ (षष्ठी बहुवचन)
पहले से दया है, इस लए उसके साथ ‘द्रव्येषु’ (सप्तमी बहुवचन) ही बैठता है — ठ क जैसे ‘सवासु नारीषु’, ‘सवषु
प्रा णषु’।

‘मातरः’ बहुवचन क्य : क्य क वशेष्य ‘सवासु नारीषु’ बहुवचन म है — एक नह , अनेक स्त्रयाँ। ‘मातृ’ का प्रथमा
बहुवचन ‘मातरः’ होता है (मातृ → माता, मातरौ, मातरः)।

प्र.5 (घ) बु द्धमान् मनुष्यः ………… मागान् समस्यादूरीकरणस्य ………… च ………… । (कौशला न / कायसाधनस्य /
जानीयात्)

पूण वाक्यम् — बु द्धमान् मनुष्यः कायसाधनस्य मागान् समस्यादूरीकरणस्य कौशला न च जानीयात्।
( हन्द — बु द्धमान् मनुष्य को काम बनाने के माग तथा समस्या दूर करने के कौशल — दोन जानने चा हए।)

रक्त ानम् उत्तरम् वभ क्त / रूप क्य यही

‘मनुष्यः ___ मागान्’ कायसाधन स्य षष्ठी एकवचन ‘मागान्’ के साथ ‘ कसके माग’ चा हए — सम्बन्धे षष्ठी

‘समस्यादूरीकरणस्य कौशल ािन नपुंसक लङ्ग द्वतीया ‘समस्यादूरीकरणस्य’ षष्ठी म है, अतः उसका आश्रयपद (‘ कसके
___ च’ बहुवचन कौशल’) चा हए; और वह ‘मागान्’ क तरह कम होगा

वाक्य का अन्त जानीयात ् √ज्ञा, व ध लङ् वाक्य म कोई क्रया नह थी; ‘जानना चा हए’ का भाव व ध लङ्
लकार, प्र.पु.ए.व. से आता है

यह वाक्य पाठ का शीषक ही खोलता है: ‘कायसाधनस्य मागान्’ = उपायः, और ‘समस्यादूरीकरणस्य कौशला न’
= अपायात् रक्षणम्। अथात् यह वाक्य ‘उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्’ का ही सरल संस्कृत गद्य-रूप है।
‘च’ शब्द बताता है क दोन बात साथ चा हए — केवल एक से काम नह चलेगा; यही पापबु द्ध से हुई चूक थी।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

व ध लङ् क्य , लट् क्य नह : यहाँ बात यह नह हो रही क बु द्धमान् मनुष्य ‘जानता है’, ब ल्क यह क उसे
‘जानना चा हए’ — यह कतव्य/उपदे श का भाव है, और वह व ध लङ् लकार से आता है। इसी लकार म पाठ का
शीषक-पद ‘ चन्तयेत्’ भी है। ‘जाना त’ लखने पर वाक्य का उपदे शात्मक स्वर मर जाएगा।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 89
प्रश्न ६ — उदाहरणं दृष्ट् वा अधो ल खतानां पदानां वग्रहं मेलनं वा कुरुत (उदाहरणम् — अथ पाजनम् = अथस्य उपाजनम्)

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.6 (क) गुरुजनाज्ञया

वग्रहः — गुरुजनानाम् आज्ञया। ( हन्द — गुरुजन क आज्ञा से।)

समस्तपदम् — गुरु जनाज्ञया

सिन्धिवच्छे द ः — गुरु जन + आज्ञया (अ + आ = आ, दीघ सिन्ध)

समासः — षष्ठीत त्पुरु षः (लुप्त िवभिक्त — षष्ठी ‘नाम्’)

पदस्य िवभिक्तः — करणे त ृत ीया एकवचन (‘आज्ञा से’)

समास का नाम कैसे तय होता है: पुस्तक ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ म स्वयं नयम दे ती है — ‘यस्याः वभक्तेः लोपं
कृत्वा पदमेलनं भव त तन्नाम्ना एव तस्य तत्पुरुष-समासस्य नाम भव त।’ यहाँ वग्रह म ‘गुरुजनानाम्’ षष्ठी बहुवचन है
और समास बनाते समय वही वभ क्त लुप्त हुई, अतः यह षष्ठीतत्पुरुष है। ध्यान रहे — समास का नाम पूरे पद क
वभ क्त (यहाँ तृतीया) से नह , पूवपद क लुप्त वभ क्त से तय होता है।

पाठ का वाक्य: ‘अस्तु तावत् गुरुजनाज्ञया गच्छावः।’ — धमबु द्ध का यह उत्तर उसके च रत्र का पहला प रचय है :
परदे श जाने को तैयार तो है, पर बड़ क अनुम त के बना नह । आगे कथा कहती है — ‘ततस्तौ गुरुजनानामनुम त
प्राप्य शुभेऽह न दे शान्तरं प्र स्थतौ।’

प्र.6 (ख) वनदे वता

वग्रहः — वनस्य दे वता। ( हन्द — वन क दे वी / जंगल क अ धष्ठात्री दे वता।)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

समस्तपदम् — वनदे वता

िवगहः — वनस्य दे वता

समासः — षष्ठीत त्पुरु षः (लुप्त िवभिक्त — षष्ठी ‘स्य’)

िलङ् गम् — स्त्रीिलङ् गम् (दे वता), पथमा एकवचन

उत्तरपद ही प्रधान है: तत्पुरुष समास म अथ का भार उत्तरपद पर होता है — ‘वनदे वता’ कोई वन नह , दे वता है;
वन केवल यह बताता है क कौन-सी दे वता। इसी कसौट से इसे बहुव्री ह से अलग क जए : य द ‘वनदे वता’ का अथ
‘वह जसक दे वता वन म हो’ होता, तब वह बहुव्री ह होता — पर यहाँ ऐसा नह है।

कथा म इसक भू मका: धमा धकारी कहता है — ‘यत्र मानुषप्रमाणम् अनुपलब्धं तत्र वनदे वता एव न्याय नणयं
क रष्य त।’ अथात् मनुष्य-साक्षी न मलने पर दै व-साक्ष्य क पुरानी प्रथा। कथा इस प्रथा का मज़ाक नह उड़ाती, पर
यह ज़रूर दखा दे ती है क छल इस प्रथा का दुरुपयोग कर सकता है — और अन्ततः सत्य ववेक से ही सामने आता
है, चमत्कार से नह ।

प्र.6 (ग) ………………… — वग्रहः दत्तः : वत्तस्य अभावात्

समस्तपदम् — वत्ताभावात्। ( हन्द — धन के अभाव से / धन न होने के कारण।)

िवगहः — िवत्तस्य अभावात्

समस्तपदम् — िवत्ताभावात् (िवत्त + अभावात् → अ + अ = आ, दीघ सिन्ध)

समासः — षष्ठीत त्पुरु षः

िवभिक्तः — हेत ौ पञ्चमी (‘के कारण’)

यह उलट दशा वाला प्रश्न है: (क) और (ख) म समस्तपद दया था और वग्रह बनाना था; यहाँ वग्रह दया है और
समस्तपद बनाना है — इसी लए प्रश्न का शीषक ‘ वग्रहं मेलनं वा कुरुत’ है। व ध सीधी है : वग्रह के पूवपद क
वभ क्त (यहाँ ‘ वत्तस्य’ क षष्ठी) हटाइए, प्रा तप दक ‘ वत्त’ बचाइए, और स न्ध करके उत्तरपद जोड़ द जए।

पाठ से मलाइए: कथा म यही भाव दूसरे शब्द से आया है — ‘मम कुटु म्बे बहवः जनाः स न्त, धनाभावात् कष्टम्
अनुभवा म।’ ‘धनाभावात्’ = धनस्य अभावात् — बनावट बलकुल वही है, केवल ‘ वत्त’ के स्थान पर उसका पयाय
‘धन’ है। दोन शुद्ध ह।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्
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बु द्धप्रभावेण
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प्र.6 (घ)

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agl— बुद्धेः प्रभावेण। ( हन्द — बु द्ध के प्रभाव से।)
वग्रहः

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समस्तपदम् — बुिद्धपभावेण
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िवगहः — बुद्ध ेः पभावेण
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समासः — षष्ठीत त्पुरु षः (लुप्त िवभिक्त — षष्ठी)
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‘बुिद्धः’ इकारान्त स्त्रीिलङ् गः → षष्ठी एकवचन बुद्ध ेः (मितः → मते ः इव)

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a s emलखते समय यही एक जगह भूल होती है: वद्याथ प्रायः ‘बु द्धस्य प्रभावेण’ लख दे ते ह। ‘बु द्ध’ इकारान्त
वग्रह

a gl स्त्री लङ्ग शब्द है, इस लए उसक षष्ठी एकवचन बुद्धेः बनती है, ‘बु द्धस्य’ नह । ‘-स्य’ केवल अकारान्त शब्द म आता
है (वन → वनस्य, राम → रामस्य)। समास खोलते समय पूवपद का शब्दरूप ठ क-ठ क लगाना ही असली परीक्षा
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है।

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aglलती रचना आई है — ‘पापबु द्धः धमबुद्धेः प्रभावेण प्रभूतं धनं
कथा से सम्बन्ध: मूल पाठ म मलती-जु
सम्पा दतवान्।’ वहाँ वग्रह-रूप ही रखा गया है; समास बनाने पर वह ‘धमबु द्धप्रभावेण’ हो जाता। दोन को साथ

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रखकर प ढ़ए, तो षष्ठीतत्पुरुष का ढाँचा अपने-आप बैठ जाएगा।
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agl प्र.6 (ङ) ………………… — वग्रहः दत्तः : धरण्याः पीठे

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समस्तपदम् — धरणीपीठे । ( हन्द — धरती पर / पृथ्वी के तल पर।)

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िवगहः — धरण्याः पीठे

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समस्तपदम् — धरणीपीठे
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समासः — षष्ठीत त्पुरु षः (पुस्तक की शब्दाथ-तािलका स्वयं यही नाम दे त ी है)
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िवभिक्तः — अिधकरणे सप्तमी, नपुंसकिलङ् ग एकवचन
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‘धरण्याः’ से ‘धरणी’ कैसे बना: वग्रह म ‘धरणी’ क षष्ठी एकवचन ‘धरण्याः’ है (नद → नद्याः के समान)।
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समास बनाते समय यह वभ क्त लुप्तem
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aglबनी रहती है — ‘धर णपीठे ’ लखना अशुद्ध होगा।
होकर मूल प्रा तप दक ‘धरणी’ बचता है, और वही ‘पीठ’ से जुड़ जाता है।
इसी लए समस्तपद म द घ ‘ई’

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

पाठ का प्रमाण: ‘भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यथम्॥’ — यह पद पहले ोक म आया है और पुस्तक क
शब्दाथ-ता लका उसका वग्रह, समास तथा वभ क्त तीन दे ती है : ‘धरणीपीठे (षष्ठी तत्पुरुषः, नपुं.स.ए.व) —
धरण्याः पीठे — धरती पर — On the earth’।

प्र.6 (च) राजकुले

वग्रहः — राज्ञः कुले। ( हन्द — राजा के कुल म / राजदरबार म।)

समस्तपदम् — राजकु ले

िवगहः — राज्ञः कु ले

समासः — षष्ठीत त्पुरु षः

‘राजन्’ इित नकारान्तः पुंिलङ् गः → षष्ठी एकवचन राज्ञः; समासे तस्य ‘राज’ इित रूपम्

िवभिक्तः — अिधकरणे सप्तमी एकवचन

समास म ‘राजन्’ का ‘राज’ क्य हो जाता है: ‘राजन्’ नकारान्त शब्द है; समास म पूवपद के रूप म आने पर
उसका अ न्तम ‘न्’ लुप्त हो जाता है — राजन् + पुरुषः = राजपुरुषः, राजन् + कुलम् = राजकुलम्, राजन् + पथः =
राजपथः। यही रूप पाठ म भी है — ‘राजपुरुषाः नयमानुसारं पापबु द्ध द ण्डतवन्तः।’

पाठ का वाक्य तथा एक सूचना: ‘तत्प्रयच्छ मे तदधम्। अन्यथा अहं राजकुले नवेद यष्या म।’ — अथात् ‘नह तो
म राजदरबार म शकायत करूँगा’। ध्यान द जए क प्रश्न ६ के सभी छह पद षष्ठीतत्पुरुष ही ह — उदाहरण
‘अथ पाजनम् = अथस्य उपाजनम्’ से लेकर अ न्तम ‘राजकुले’ तक। यह संयोग नह ; पुस्तक जान-बूझकर एक ही
समास को छह बार दोहराकर पक्का करा रही है।

अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 89–90

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प्रश्न ७ — अधो ल खता न वाक्या न कथाक्रमानुसारं पुनः लखत

अभ्यासाद् जायते स द्धः

प्र.7 अधो ल खता न वाक्या न कथाक्रमानुसारं पुनः लखत — (क) भवान् य द मदुक्तप्रकारेण वद त त ह तद्धनं म य
रं तष्ठ त। (ख) ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुम त प्राप्य शुभेऽह न दे शान्तरं प्र तौ। (ग) ाव प गत्वा तत् ानं
यावत् खनतः तावद् रक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। (घ) क स्म श्च े शे धमबु द्धः पापबु द्धश्च े मत्रे प्र तवसतः स्म। (ङ)
यथा ाभ्यां च न्ततं तथैव भू म ख नत्वा तत्रैव धनं न क्षप्य स्वगृहं गतवन्तौ। (च) राजपुरुषाः पापबु द्ध
द ण्डतवन्तः।

शुद्धः कथाक्रमः — (घ) → (ख) → (ङ) → (ग) → (क) → (च)।

१ . किस्मंिश्च ेशे धमबुिद्धः पापबुिद्धश्च द्वे िमत्रे पितवसतः स्म। (घ)

२ . ततस्तौ गुरु जनानाम् अनुमितं पाप्य शुभे ऽ हिन दे शान्तरं पिस्थतौ। (ख)

३ . यथा द्वाभ्यां िचिन्ततं तथै व भूिमं खिनत्वा तत्रैव धनं िनिक्षप्य स्वगृहं गतवन्तौ। (ङ)

४ . द्वाविप गत्वा तत् स्थानं यावत् खनतः तावद् िरक्तं भाण्डं दृ ष्टवन्तौ। (ग)

५ . भवान् यिद मदुक्तपकारेण वदित तिह तद्धनं मिय िस्थरं ितष्ठित। (क )

६ . राजपुरु षाः पापबुिद्धं दिण्डतवन्तः। (च )

क्रमः वाक्यम् (सङ् केतेन) कथायाः घटना क्रम का प्रमाण

१ (घ) किस्मंिश्च े शे … पितवसतः कथा का आर भ म् — द ो िम त्र ों का ‘क स्म श्चद् दे शे’ — कथाओं का पारम्प रक
स्म। पिरचय आरम्भ-वाक्य

२ (ख) ततस्तौ … दे शान्तरं पिस्थतौ। गुरु जनों की अन ुमित ले कर परदे श - ‘ततः’ (उसके बाद) — पछली घटना क ओर
गमन सङ् केत

३ (ङ) यथा द्वाभ्यां िचिन्ततं … स्वग ृहं ल ौटकर धन जंग ल में गाड़ ना धन पहले कमाया गया, तभी गाड़ा जा सकता है
गतवन्तौ।

४ (ग) द्वाविप गत्वा … िरक्तं भाण्डं खोद ने पर घड़ ा खाल ी िमल ना ‘ रक्तं भाण्डम्’ तभी दखेगा जब धन पहले
दृ ष्टवन्तौ। गाड़ा जा चुका हो

५ (क) भवान् यिद मदुक्तपकारे ण वदित पापब ुि द्ध का अपने िपता से झूठ ी गवाही यह ववाद के बाद, न्याय से पहले क रात का
… का अन ुरोध प्रसंग है

६ (च) राजपुरुषाः पापबुिद्धं कथा का अ त न् — पापब ुि द्ध को द ड ण् दण्ड सत्य प्रकट होने के बाद ही सम्भव है
दिण्डतवन्तः।

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क्रम लगाने क व ध (दो कसौ टयाँ): (१) भा षक सङ् केत — वाक्य म छपे शब्द ही क्रम बता दे ते ह।
‘क स्म श्चद् दे शे’ सदा आरम्भ म आता है; ‘ततः’ का अथ ही ‘उसके बाद’ है, इस लए वह पहला वाक्य नह हो
सकता; ‘तत् स्थानम्’ म ‘तत्’ बता रहा है क उस स्थान क चचा पहले हो चुक है। (२) काय-कारण — धन पहले
कमाया जाएगा, तब गाड़ा जाएगा, तब चोरी होगी, तब घड़ा खाली मलेगा, तब ववाद होगा, तब दण्ड मलेगा। दोन
कसौ टयाँ एक ही क्रम दे ती ह — तभी उत्तर पक्का है।

एक चूक से ब चए: (ङ) और (ग) दोन म ‘खनन’ क बात है, इस लए इन्ह उलट दे ने क भूल आम है। अन्तर
पक ड़ए — (ङ) म ख नत्वा … न क्षप्य (खोदकर धन रखा) है, अथात् धन गाड़ा जा रहा है; (ग) म यावत् खनतः
तावद् रक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ (खोदते ही खाली घड़ा दखा) है, अथात् धन नकालने आए ह। रखना पहले, नकालना
बाद म — इस लए (ङ) पहले।

व्याकरण-सङ् केत: ‘प्र तवसतः स्म’ — वतमानका लक क्रया के साथ ‘स्म’ लगने पर अथ भूतकाल का हो जाता है
(‘रहते थे’)। ‘शुभेऽह न’ = शुभे + अह न ( वसग-र हत स न्ध; ‘अ’ का लोप अवग्रह ‘ऽ’ से सू चत)। ‘यावत् …
तावत्’ यहाँ ‘ज्य ही … त्य ही’ के अथ म है, ‘जब तक … तब तक’ के अथ म नह ।

स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 90–91
१. पञ्चतन्त्रम् · २. क्तवतुप्रत्ययः (सारणी तथा उदाहरणवाक्या न) · ३. तत्पुरुषसमासः

स्वाध्यायान्मा प्रमदः

प्र.1 ‘पञ्चतन्त्रम्’ इ त ग्रन्थस्य प रचयं लखत — तस्य लेखकः कः, तत्र क त तन्त्रा ण, का न च ? प्रस्तुतकथा कस्मात्
तन्त्रात् स्वीकृता ?

पुस्तक का मूल पाठ — ‘पञ्चतन्त्रं नी त शक्षाप्रदानां रोचकानां कथानां सङ् ग्रहः वतते। अस्य ग्रन्थस्य लेखकः वष्णुशमा अ स्त।
पशुप क्षणां कथामाध्यमेन नी तशास्त्रस्य गहनतत्त्वम प सरलतया अत्र श क्षतम्। अ स्मन् ग्रन्थे कथाः पञ्चसु तन्त्रेषु वभक्ताः स न्त।
यथा — मत्रभेदः, मत्रस ा प्तः, काकोलूक यम्, लब्धप्रणाशः, अपरी क्षतकारकं चे त। प्रस्तुतकथा मत्रभेदः इ त प्रथमतन्त्रात्
स्वीकृता।’
उत्तरम् — पञ्चतन्त्रं नी त शक्षां प्रदातॄणां रोचकानां कथानां सङ् ग्रहः अ स्त। अस्य लेखकः वष्णुशमा। अ स्मन् ग्रन्थे पञ्च
तन्त्रा ण स न्त — मत्रभेदः, मत्रस ा प्तः, काकोलूक यम्, लब्धप्रणाशः, अपरी क्षतकारकं च। प्रस्तुतकथा प्रथमतन्त्रात्
‘ मत्रभेदः’ इत्यस्मात् स्वीकृता।
( हन्द — पञ्चतन्त्र नी त क शक्षा दे ने वाली रोचक कथाओं का संग्रह है। इसके लेखक वष्णुशमा ह। पशु-प क्षय क कथाओं के
माध्यम से यहाँ नी तशास्त्र के गहरे तत्त्व भी सरलता से सखाए गए ह। इस ग्रन्थ म कथाएँ पाँच तन्त्र म बँट ह — मत्रभेद,
मत्रस ा प्त, काकोलूक य, लब्धप्रणाश तथा अपरी क्षतकारक। प्रस्तुत कथा पहले तन्त्र ‘ मत्रभेद’ से ली गई है।)

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तन्त्रम् शा ब्दक अथ वषय प्र सद्ध कथा

१. िमत्रभेद ः िम त्र ों में फू ट चुगली और लोभ मत्रता कैसे सह पङ्गलक तथा वृषभ सञ्जीवक; धमबु द्ध-
तोड़ते ह पापबु द्ध (यही पाठ)

२. िमत्रसम्पािप्तः िम त्र ों का िमल ना स े मत्र मलकर कैसे संकट कपोत, मूषक हरण्यक, कच्छप तथा मृग क मैत्री
जीतते ह

३. काकोलूक ीयम् काक तथा उ ल ूक शत्रु से व्यवहार, गुप्तचर-नी त, कौओं और उल्लुओं का युद्ध; बकाः तथा नकुलः
स न्ध- वग्रह

४. लब्धपणाशः पाई हुई व स् ष्
त ु का न ट हाथ आई वस्तु मूखता से कैसे वानर तथा मकर (मगर) क कथा
होना नकल जाती है

५. िबना जाँचे काम बना सोचे कया काम कैसे ब्राह्मण तथा नकुल (नेवले) क कथा
अपरीिक्षतकारकम् करना पछतावा दे ता है

‘तन्त्र’ शब्द का अथ यहाँ क्या है: ‘तन्त्र’ का अथ है व्यवस्था, प्रबन्ध, कोई एक सुसंग ठत सद्धान्त (√तन् =
फैलाना, बुनना)। पञ्चतन्त्र इस लए ‘पाँच अध्याय’ नह , ‘राजनी त तथा व्यवहार के पाँच सूत्र’ है। परम्परा कहती है
क वष्णुशमा ने राजा अमरश क्त के तीन मन्दबु द्ध पुत्र को छह महीने म नी तशास्त्र सखाने का वचन दया था —
और उपदे श दे ने के बदले उन्ह ये कथाएँ सुनाईं। यही व ध इस पाठ के आरम्भ म माता भी अपनाती है : प्रश्न का उत्तर
उपदे श से नह , कथा से।

ध्यान दे ने योग्य बात: पुस्तक कहती है ‘पशुप क्षणां कथामाध्यमेन’, कन्तु प्रस्तुत कथा म एक भी पशु-पक्षी नह
है — सब पात्र मनुष्य ह। इससे यह सम झए क पञ्चतन्त्र केवल पशु-कथाओं का ग्रन्थ नह ; उसम मनुष्य-कथाएँ भी
ह। पशु-रूपक वहाँ आता है जहाँ बात सीधे कहने म संकोच हो।

Did you know? पञ्चतन्त्र संसार म सबसे अ धक अनू दत भारतीय ग्रन्थ म है। छठ शताब्द म यह पहलवी म
गया, वहाँ से अरबी म ‘कलीला व दमना’ बना (यह नाम ‘करटक-दमनक’ का ही रूपान्तर है — मत्रभेद तन्त्र के
दो सयार), और फर हब्रू, ला तन तथा यूरोप क अनेक भाषाओं म पहुँचा। भारत म ही इसका एक सं क्षप्त रूप
‘ हतोपदे श’ भी प्र सद्ध है।

प्र.2 ‘क्तवतुप्रत्ययः’ इ त व्याकरण- बन्दुं सोदाहरणं स्पष्टीकुरुत। पुस्तके दत्तां सारण पूरयत तथा उदाहरणवाक्या न
लखत।

पुस्तक का नयम — ‘भूतकालाथ कत र धातोः क्तवतुप्रत्ययस्य प्रयोगः भव त। क्तवतुप्रत्ययान्तपदा न वशेषणपदत्वेन प्रयुज्यन्ते।
कतृपदानुसारं क्तवतुप्रत्ययान्तपदानां लङ्गवचन नधारणं भव त।’
उत्तरम् — भूतकाल म कतृवाच्य का अथ बताने के लए धातु म ‘क्तवतु’ प्रत्यय जोड़ा जाता है। क्तवतु-प्रत्ययान्त पद वाक्य
म वशेषण क तरह प्रयुक्त होते ह, इस लए उनका लङ्ग तथा वचन कता के अनुसार तय होता है।

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पुस्तक क सारणी (पूण रूप म) —
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seंसक लङ्गे m.
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धातुः + प्रत्ययः पुं लङ्गे स्त्री लङ्गे नपु

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पठ् + क्तवतु त्र
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बाल कः पिठतवान ् बािल का पिठतवती िम ं पिठतवत ्

खाद् + क्तवतु बाल कः खािद तवान ् बािल का खािद तवती िम त्र ं खािद तवत ्

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कृ + क्तवतु
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बाल कः कृ तवान ् बािल का कृ तवती िम ं कृ तवत ्

पुस्तक के उदाहरणवाक्या न — a g l

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क्रमः वाक्यम् क्तवतु- कता ( लङ्ग · हन्द अथ

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पदम् वचन)
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m .ह्यःcoिशक्षकः पञ्च श्लोकान् पािठतवान्। agशक्षक ने पाँच ोक पढ़ाए।
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(क) पािठतवान ् शक्षकः — पुं. · कल

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(ख) गतशिनवासरे छात्राः िवद्यालयपिरसरे न् छात्राः — पुं. · पछले श नवार छात्र ने वद्यालय-प रसर म

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कृ तव तः

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स्वच्छतां कृ तवन्तः। ब.व. सफ़ाई क ।

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(ग) माता पातः स्वल्पाहारं दत्तवती। माता — स्त्री. · माता ने सवेरे अल्पाहार दया।

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द वती

ए.व.

(घ) गतवष वािषकोत्सवे नवमकक्षायाः छात्राः न् छात्राः — पुं. ·
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पछले वष वा षकोत्सव म नव कक्षा के

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अिभनीतव तः

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नाटके अिभनीतवन्तः। ब.व. छात्र ने नाटक म अ भनय कया।

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.co गतसप्ताहे वयं जयपुरं गतवन्तः। a g
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(ङ) न्
गतव तः वयम् — उत्तम पछले सप्ताह हम जयपुर गए।

l a s पुरुष · ब.व.

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क्तवतु का असली रहस्य — वह क्रया नह , वशेषण है: ‘गच्छ त’ जैसी क्रया कता के पुरुष तथा वचन से

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मलती है, पर लङ्ग से नह (बालकः गच्छ त / बा लका गच्छ त — क्रया एक ही)। क्तवतु इसके ठ क उलट चलता

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है — वह कता के लङ्ग तथा वचन से मलता
a se है : बालकः गतवान् / बा लका गतवती / मत्रं गतवत्। इसी लए (ङ) म
ag ‘गतवन्तः’ ही है — क्य क क्तवतु पुरुष नह दे खता, वचन दे खता है।
‘वयम्’ उत्तमपुरुष होते हुए भी रूप

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पाठ से क्तवतु-पद क सूची धातु + उपसग कता अथ

सम्पािदतवान् सम् + √पद् + णच् पापबु द्धः (पुं. ए.व.) कमाया

गतवान् / गतवन्तौ √गम् पापबु द्धः / तौ द्वौ गया / द ोनों गए

दृ ष्टवन्तौ √दृश् तौ द्वौ ( द्ववचन) द ोनों ने दे खा

उक्तवान् √वच् पापबु द्धः कहा

पबोिधतवान् प्र + √बुध् + णच् पापबु द्धः समझा िद या

आगतवन्तौ आ + √गम् तौ द्वौ द ोनों आए

दिण्डतवन्तः / पशंिसतवन्तः √दण्ड् + णच् / प्र + √शंस् राजपुरुषाः (ब.व.) ण्
द ड िद या / पशंस ा की

क्त तथा क्तवतु का अन्तर एक बार म सम झए: दोन भूतकाल बताते ह, पर वाच्य अलग है। क्त (‘-त’) प्रायः
कमवाच्य म आता है और कम से मेल खाता है — ‘मया धनं चो रतम्’ (मेरे द्वारा धन चुराया गया), कता तृतीया म।
क्तवतु (‘-तवत्’) कतृवाच्य म आता है और कता से मेल खाता है — ‘अहं धनं चो रतवान्’ (मने धन चुराया), कता
प्रथमा म। पाठ म दोन साथ-साथ मलते ह — ‘मया धमबुद्धेः प्रभूतः अथः चो रतः’ (क्त) और ‘पापबु द्धः …
गतवान्’ (क्तवतु)।

अभ्यास के लए: इसी नयम से पाँच नए वाक्य बनाइए — ‘सीता गीतं गीतवती।’ · ‘बालकाः क्र डाक्षेत्रे
क्र डतवन्तः।’ · ‘पत्रं भूमौ प ततवत्।’ · ‘अहं पुस्तकं प ठतवान्/प ठतवती।’ · ‘छात्रे प्रश्नम् उक्तवत्यौ।’ हर बार
पहले कता का लङ्ग-वचन दे खए, फर प्रत्यय का रूप लगाइए।

प्र.3 ‘तत्पुरुषसमासः’ कम् ? तस्य नामकरणं कथं भव त ? पुस्तके दत्ता न उदाहरणा न वभ क्तनामस हतं लखत।

पुस्तक का नयम — ‘द्वयोः पदयोः, अनेकेषां पदानां वा एकपद करणं भव त समासः। तत्पुरुषसमासे उत्तरपदस्य प्रधानता भव त।
यस्य पदस्य क्रयया सह सम्बन्धः भव त तत् पदं प्रधानम् इत्युच्यते। पूवपदस्य वभक्तीनां लोपः क्रयते। यस्याः वभक्तेः लोपं कृत्वा
पदमेलनं भव त तन्नाम्ना एव तस्य तत्पुरुष-समासस्य नाम भव त।’
उत्तरम् — दो अथवा अनेक पद को मलाकर एक पद बनाना ‘समास’ कहलाता है। जस समास म उत्तरपद प्रधान होता
है, वह तत्पुरुष समास है। समास बनाते समय पूवपद क वभ क्त लुप्त हो जाती है, और जस वभ क्त का लोप हुआ,
उसी के नाम पर तत्पुरुष का नाम पड़ता है।
पुस्तक के उदाहरण —

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वग्रहः समस्तपदम् समासस्य नाम लुप्त वभ क्त हन्द

शरणम् आगतः शरणागतः द्वतीयातत्पुरुषः द्वतीया (‘-म्’) शरण म आया हुआ

सुखेन अिन्वतः सुखाि वतः न् तृतीयातत्पुरुषः तृतीया (‘-एन’) सुख से युक्त

छात्रेभ्यः िहतम् छा त्र िहतम् चतुथ तत्पुरुषः चतुथ (‘-भ्यः’) छात्र के लए हतकर

रोगात् भयम् रोगभयम् पञ्चमीतत्पुरुषः पञ्चमी (‘-आत्’) रोग से भय

दे शस्य भक्तः दे शभ क्तः षष्ठीतत्पुरुषः षष्ठी (‘-स्य’) दे श का भक्त

काय कु शलः कायकु शल ः सप्तमीतत्पुरुषः सप्तमी (‘-ए’) काम म कुशल

‘उत्तरपद प्रधान’ का अथ क्या है: पुस्तक कसौट भी दे ती है — ‘यस्य पदस्य क्रयया सह सम्बन्धः भव त तत् पदं
प्रधानम्’। पर खए : ‘दे शभक्तः वद्यालयम् आगच्छ त’ म आने वाला कौन है — दे श या भक्त ? उत्तर ‘भक्तः’,
अथात् उत्तरपद। इसी लए यह तत्पुरुष है। यही कसौट बहुव्री ह पर लगाइए — ‘उत्फुल्ललोचनाः जनाः’ म क्रया का
सम्बन्ध न ‘उत्फुल्ल’ से है न ‘लोचन’ से, ब ल्क कसी तीसरे पद (जनाः) से; इसी लए वह तत्पुरुष नह , बहुव्री ह है।

प्रथमा तत्पुरुष क्य नह होता: सूची द्वतीया से आरम्भ होकर सप्तमी पर समाप्त होती है — प्रथमा छू ट जाती है।
कारण यह है क प्रथमा ‘सम्बन्ध’ नह दखाती, केवल कता/नाम बताती है; उसका लोप करके कुछ जोड़ने को बचता
ही नह । प्रथमा- वभ क्त वाले समास कमधारय तथा द्वगु कहलाते ह (नीलकमलम् = नीलं कमलम्; त्रभुवनम् =
त्रयाणां भुवनानां समाहारः) — वे भी तत्पुरुष के ही भेद माने जाते ह।

पाठ से तत्पुरुष के अपने उदाहरण: गुरुजनाज्ञया (= गुरुजनानाम् आज्ञया — षष्ठी) · वनदे वता (= वनस्य दे वता —
षष्ठी) · धरणीपीठे (= धरण्याः पीठे — षष्ठी) · बु द्धप्रभावेण (= बुद्धेः प्रभावेण — षष्ठी) · राजकुले (= राज्ञः कुले —
षष्ठी) · अथ पाजनम् (= अथस्य उपाजनम् — षष्ठी) · शमीकोटरम् (= शम्याः कोटरम् — षष्ठी) · धनाभावात् (=
धनस्य अभावात् — षष्ठी) · चौरकम (= चौरस्य कम — षष्ठी)। इसी सूची से अभ्यास का प्रश्न ६ बना है — इस लए
दोन को साथ प ढ़ए।

यस्तु क्रयावान् मनुजः स व ान् — पृष्ठ 91

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

१. पञ्चतन्त्रस्य एकां कथां प ठत्वा तस्याः सारांशं संस्कृतेन श्रावयत · २. कथाधा रतस्य नाटकस्य प्रस्तु तः

यस्तु क्रयावान् मनु जः स व ान्

प्र.1 पुस्तकालयात् पञ्चतन्त्रस्य पुस्तकं स्वीकृत्य एकां कथां पठत। तस्याः कथायाः सारांशं संस्कृतेन ल खत्वा कक्षायां
श्रावयत।

यह स्वाध्याय तथा प्रस्तु त का काय है। इसका उत्तर पुस्तकालय से एक पुस्तक उठाकर, एक कथा पढ़कर और उसका संस्कृत
सारांश कक्षा म सुनाकर दया जाता है। नीचे व ध, अच्छे उत्तर क कसौट और एक पूरा आदश उत्तर दया है, जसे दे खकर आप
अपनी चुनी हुई कथा का सारांश लख सकते ह।
वध—

1. कथा चु नए: छोट और पात्र-कम कथा चु नए (३–४ पात्र पयाप्त ह)। पहली बार म ‘ सहः शशकश्च’, ‘बकः नकुलश्च’, ‘वानरः
मकरश्च’ जैसी कथाएँ सरल पड़ती ह।
2. दो बार प ढ़ए: पहली बार केवल कथा जानने के लए, दूसरी बार क ठन पद को रेखां कत करने के लए। शब्दकोश से उन्ह
का अथ दे खए।
3. घटनाओं क सूची बनाइए: पाँच से सात वाक्य म — आरम्भ, समस्या, उपाय, मोड़, अन्त। सारांश कहानी का दोहराव नह ,
उसका ढाँचा है।
4. संस्कृत म ल खए: छोटे वाक्य र खए और भूतकाल के लए क्तवतु रूप प्रयोग क जए (गतवान्, दृष्टवान्, उक्तवान्) — यही
इस पाठ का व्याकरण- बन्दु भी है।
5. अन्त म नी त ल खए: कथा का ‘नी तवाक्यम्’ अवश्य जो ड़ए, य द हो सके तो मूल ोक के साथ।
6. सुनाइए: धीरे, स्पष्ट, संयुक्ताक्षर को पूरा बोलते हुए। पहले एक बार मत्र के सामने अभ्यास क जए।

अच्छे सारांश म ये पाँच बात अवश्य आएँ — (१) कथा का नाम तथा वह कस तन्त्र से है, (२) पात्र का एक-वाक्य प रचय, (३)
घटनाक्रम सही क्रम म, (४) कथा का मोड़ (turning point) स्पष्ट, (५) नी तवाक्य।
आदश उत्तरम् (नमूना सारांश) — ‘बकाः नकुलश्च’ (काकोलूक यम् इ त तृतीयतन्त्रात्)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत् AglaSem · NCERT Solutions

॥ बकाः नकु लश्च ॥

किस्मंिश्चद् वने एकः महान् न्यगोधवृक्षः आसीत्। तिस्मन् वृक्षे बहवः बकाः िनवसिन्त स्म।

तस्य एव वृक्षस्य कोटरे एकः कृ ष्णसपः वसित स्म। सः पितिदनं बकानां िशशून ् खादित स्म।

बकाः अतीव दुःिखताः अभवन्। तदा एकः वृद्ध ः बकः उपायम् उक्तवान् —

‘अस्मात् वृक्षात् दू रे नकु लस्य िबलम् अिस्त। धीवरस्य गृहात् मत्स्यान् आनीय नकु लिबलात् आरभ्य सपस्य

कोटरपयन्तं माग स्थापयत।

नकु लः मत्स्यान् खादन् खादन् आगिमष्यित, सप ं च हिनष्यित’ इित।

बकाः तथै व कृ तवन्तः। नकु लः मत्स्यमागण आगत्य कृ ष्णसप ं हतवान्। बकाः पहृष्टाः अभवन्।

िकन्त ु ततः परं सः नकु लः वृक्षम् आरुह्य बकानां िशशून ् अिप खािदतवान्, अनन्तरं सव न् बकान् अिप।

मूख ः बकाः पश्यन्तः एव नष्टाः। यतः तै ः उपायः िचिन्ततः, िकन्त ु अपायः न िचि ततः।
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अत एव उक्तम् —

उपायं िच न्तयेत ् पाज्ञस्तथापायं च िच न्तयेत ्।

पश्यतो बकमूखस्य नकु लेन हता बकाः॥

( हन्द अनुवाद —) कसी वन म एक बड़ा बरगद का पेड़ था, जस पर बहुत-से बगुले रहते थे। उसी पेड़ के खोखल म एक काला
साँप रहता था, जो रोज़ बगुल के ब को खा जाता था। बगुले बहुत दुखी हुए। तब एक बूढ़े बगुले ने उपाय बताया — ‘इस पेड़ से
दूर एक नेवले का बल है। मछु ए के घर से मछ लयाँ लाकर नेवले के बल से लेकर साँप के खोखल तक रास्ते म रख दो। नेवला
मछ लयाँ खाता-खाता आएगा और साँप को मार दे गा।’ बगुल ने वैसा ही कया। नेवला मछ लय के रास्ते से आया और उसने काले
साँप को मार डाला। बगुले प्रसन्न हुए। परन्तु उसके बाद वही नेवला पेड़ पर चढ़कर बगुल के ब को भी खा गया और फर सारे
बगुल को भी। मूख बगुले दे खते ही रह गए और नष्ट हो गए — क्य क उन्ह ने उपाय तो सोचा, पर अपाय नह सोचा। इसी लए कहा
गया है — ‘बु द्धमान् उपाय भी सोचे और उससे आने वाली हा न भी सोचे; उस मूख बगुले के दे खते-दे खते ही नेवले ने सब बगुल को
मार डाला।’

यही कथा क्य चुनी गई: पाठ का शीषक जस ोक से लया गया है, पुस्तक ने उसका केवल पूवाध दया है।
उसका उत्तराध — ‘पश्यतो बकमूखस्य नकुलेन हता बकाः’ — सीधे इसी कथा क ओर सङ् केत करता है। अथात्
यह सारांश केवल एक और कहानी नह , आपके पाठ का छू टा हुआ आधा हस्सा है। कक्षा म सुनाते समय यह
सम्बन्ध बताइए — तब आपक प्रस्तु त सबसे अलग खड़ी होगी।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्
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भाषा क जाँच-सूची (सुनाने से पहले): (१) हर वाक्य म कता और क्रया का वचन मला है ? (बकाः … अभवन्,
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m a s emका प्रयोग
gl रहे — कृष्णसपः,
नकुलः … हतवान्) (२) भूतकाल के लए क्तवतु का रूप कता के लङ्ग-वचन से मला है ? (३) ‘स्म’
वतमान क्रया.cकoे साथ ही कया है ? (वस त स्म = रहता था) (४) संयुक्ताक्षर कह टू ट तो नह
eक्षmः, प्रहृष्टाः ? अशुद्ध लम्बे वाक्य से शुद्ध छोटा वाक्य सदा अच्छा है। a
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न्यग्रोधवृ

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प्र.2 कक्षायां छात्राः अध्यापकस्य साहाय्येन कथाधा रतस्य नाटकस्य प्रस्तु त कुवन्तु।

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यह समूह-काय है — अध्यापक क सहायता से पूरी कक्षा इसी पाठ क कथा पर नाटक तैयार करे और प्रस्तुत करे। सु वधा यह है
क पाठ पहले से ही नाट्य-शैली म लखा है — पात्र के नाम बाईं ओर ह और कोष्ठक म रङ्ग-सङ् केत भी m
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c नहmहै, केवल सजानी है। gla
दए ह। अथात् पटकथा
आपको बनानी o
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em (छह पात्र तथा एक सूत्रधार) —
पात्र-sवतरणम्
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पात्रम् कत क्या करना है वेश-सामग्री

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छात्राः

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a केlत यही बोले)
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सूत्र धारः १ दृश्य के बीच जोड़ने वाला ववरण संस्कृत म पढ़े (कोष्ठक के रङ्ग- उत्तरीय, हाथ म पोथी

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धमबुिद्धः १ स्वर शान्त तथा दृढ़; क्रोध केवल ‘भोः दुरात्मन्!’ पर ेत कुता-धोती, पगड़ी

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स्वर मीठा पर आँख चंचल; ‘ शरस्ताडयन्’ का अ भनय आवश्यक रंगीन कुता, कन्धे पर
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पापबुिद्धः

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१

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l a seपापबुद्धेः िपता
ag १ वृद्ध स्वर; अ न्तम संवाद काँपती आवाज़ म ेत केश-दाढ़ , दण्ड

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धम िधकारी गम्भीर, तटस्थ स्वर; कह पक्ष न लेता दखे उत्तरीय, आसन

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१

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सव जनाः / –८ अ न्तम दृश्य म समवेत स्वर; ‘ क मदम् ? क मदम् ?’ एक साथ साधारण वेश

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सामािजकाः

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दृश्य-योजना (पाँच दृश्य) —

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दृश्यम् ानम् घटना मञ्च-सङ् केत

१. दे शान्तरगमनम् ग्रामः पापबु द्ध क योजना; दोन ोक; दो ोक मञ्च के पीछे से सस्वर पढ़े जाएँ
गुरुजन क अनुम त

२. धनिनधानम् गहन अरण्यम् धन गाड़ना; रात म पापबु द्ध का अकेले मञ्च पर एक ‘ग ा’ (कपड़े का घेरा) तथा
आना एक घड़ा

३. िरक्तं भाण्डम् तदे व अरण्यम् खाली घड़ा; झूठा आरोप; पापबु द्ध सर पीटता है; प्रकाश तेज़
‘मातृवत्परदारेषु…’ ोक

४. न्यायसभा तथा धमा धका रणः सभा, वनदे वता का नणय; पता का कोटर म ‘शमीवृक्ष’ के लए एक बड़ा गत्ते का तना;
कोटरः वनप्रदे शः छपना; साक्षी- ोक पता उसके पीछे

५. सत्यपकाशः तत्रैव कोटर म आग; पता का सत्य-कथन तथा लाल-नारंगी कपड़ तथा प्रकाश से ‘आग’
मृत्यु; दण्ड तथा नी तवाक्य दखाइए — वास्त वक अ ग्न कदा प नह

आदश उत्तरम् (नमूना पटकथा — दृश्य ५ का अंश)

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सूत्रधारः — (मञ्चस्य पाश्व िस्थत्वा) अथ पातःकाले सव जनाः वनपदे शं गताः। पापबुिद्धः वनदे वतायाः समीपम्

उपागतः।

पापबुिद्ध ः — (हस्तौ संयोज्य, उच्चै ः) आिदत्यचन्द ाविनलोऽनलश्च द्यौभूिमरापो हृदयं यमश्च।

अहश्च राित्रश्च उभे च संध्ये धम िह जानाित नरस्य वृत्तम्॥

भगवित वनदे वते ! आवयोमध्ये यः चौरः, त्वं कथय।

िपता — (कोटरात् गम्भीरस्वरेण) भोः! शृणत
ु , शृणत
ु ! धमबुिद्धना हृतम् एतद्धनम्।

सव जनाः — (िवस्मयेन , परस्परं पश्यन्तः) अहो! वनदे वता स्वयं वदित!

धमबुिद्ध ः — (िस्थरः, शान्तः) इदं िमथ्याभािषतम् अिस्त। नाहं चोिरतवान्। अहम् एतत् शमीकोटरं वि भोज्यद व्यैः

पिरवेष्ट वि ना पज्वालयािम। (तथा करोित)

सूत्रधारः — अथ ज्वलित तिस्मन् शमीकोटरे अधदग्धशरीरः स्फु िटते क्षणः करुणं िवलपन् पापबुिद्धिपता

बिहरागतः।

जनाः — (साश्चयम्) भोः! िकिमदम् ? िकिमदम् ?

िपता — (क्षीणस्वरेण) एतत् सवमिप पापबुद्ध ेः चे िष्टतम्। (इत्युक्त्वा मृत ः)

धम िधकारी — (उत्थाय) एष पापबुिद्धः दण्डनीयः।

सव जनाः — (समवेत स्वरेण) भो धमबुद्ध े! त्वया सम्यक् कृ तम्। पापबुद्ध ेः व्यथपािण्डत्यात् िपता वि ना घािततः।

अतः साधूक्तम् —

उपायं िच न्तयेत ् पाज्ञस्तथापायं च िच न्तयेत ्।

(यविनकापातः)

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( हन्द सङ् केत —) सूत्रधार दृश्य जोड़ता है; पापबु द्ध हाथ जोड़कर ऊँचे स्वर म साक्षी- ोक पढ़ता है; कोटर से पता क गम्भीर
आवाज़ आती है; लोग च कत होते ह; धमबु द्ध शान्त स्वर म सत्य कहकर कोटर म आग लगाता है; आधा जला पता बाहर आकर
सच बताता है और मर जाता है; धमा धकारी दण्ड सुनाता है और सब लोग एक स्वर म नी तवाक्य दोहराते ह। परदा गरता है।

प्रस्तु त को उत्कृष्ट बनाने वाली पाँच बात —

उ ारण-शु द्ध: संयुक्ताक्षर पूरे बो लए — ‘व भोज्यद्रव्यैः’, ‘ ु टतेक्षणः’, ‘ मथ्याभा षतम्’। हलन्त ‘म्’ को
‘म’ मत बनाइए।
ोक-वाचन: चार ोक सस्वर प ढ़ए, संवाद क तरह नह । य त ( वराम) आधी पं क्त पर ली जए।
रङ्ग-सङ् केत: कोष्ठक म जो लखा है, वह बोलने के लए नह , करने के लए है — ‘ शरस्ताडयन्’,
‘साश्चयम्’, ‘इत्युक्त्वा मृतः’। यही चूक सबसे आम है।
सुरक्षा: अ ग्न का दृश्य केवल प्रकाश, लाल कपड़े तथा ध्व न से दखाइए। मञ्च पर असली आग कभी नह ।
अ न्तम पं क्त: नी तवाक्य सब मलकर एक साथ बोल और वह परदा गरे — दशक के मन म यही पं क्त
बचनी चा हए।

मूल्यांकन-सङ् केत (स्वयं जाँचने के लए): इस पाठ म पुस्तक ने कोई अङ् कयोजना-ता लका नह द है, इस लए
नीचे द गई कसौट अभ्यास के लए है — उ ारण-शु द्ध (५), अ भनय तथा हाव-भाव (५), ोक-वाचन (५),
समूह-समन्वय (५) तथा मञ्च-सज्जा एवं वेशभूषा (५)। पहले तीन बन्दु भाषा के ह और दो प्रस्तु त के —
इस लए अभ्यास का अ धक समय पहले तीन पर लगाइए।

अध्याय — एक नज़र म
पाठ-प रचय — पाठ का आरम्भ चत्र-संवाद से होता है। एक बालक कहता है — ‘मातः! पश्यतु, अद्य अहं माग प ततं धनं
प्राप्तवान्। एतेन धनेन बहू न क्र डनका न क्र णा म।’ माता उत्तर दे ती है — ‘न ह पुत्र! एतत् अन्यस्य श्रमा जतं धनम स्त, तस्मै
एव प्रत्यपणीयम्। अन्यस्य धनं तृणम् इव गणनीयम्।’ बालक पूछता है क दूसरे का धन तनके के समान कैसे होता है, और
माता उसे उत्तर दे ने के लए पञ्चतन्त्र क एक कथा सुनाती है। यही कथा पूरा पाठ है — अथात् पाठ क भू मका ही उसका
प्रश्न है और कथा उसका उत्तर।
वधा तथा ोत — यह कथा है, नाट्य-संवाद क शैली म लखी हुई (पात्र के नाम बाईं ओर और कोष्ठक म रङ्ग-सङ् केत)।
पुस्तक स्वयं बताती है — ‘पञ्चतन्त्रं नी त शक्षाप्रदानां रोचकानां कथानां सङ् ग्रहः वतते। अस्य ग्रन्थस्य लेखकः वष्णुशमा
अ स्त। … प्रस्तुतकथा मत्रभेदः इ त प्रथमतन्त्रात् स्वीकृता।’ पञ्चतन्त्र के पाँच तन्त्र ह — मत्रभेदः, मत्रस ा प्तः,
काकोलूक यम्, लब्धप्रणाशः तथा अपरी क्षतकारकम्।
कथावस्तु — कसी दे श म धमबु द्ध तथा पापबु द्ध नामक दो मत्र रहते थे। पापबु द्ध ने सोचा क वह मूख भी है और द रद्रता
से पी ड़त भी; अतः धमबु द्ध को साथ लेकर परदे श जाकर उसके सहारे धन कमाएगा और फर उसे ठगकर सुखी होगा। दोन
गुरुजन क अनुम त लेकर शुभ दन परदे श गए और पापबु द्ध ने धमबु द्ध के प्रभाव से बहुत धन कमाया। लौटते समय
पापबु द्ध के कहने पर दोन ने सारा धन नगर के पास गहन वन म गाड़ दया। रात म पापबु द्ध अकेला जाकर सारा धन नकाल
लाया और ग ा भर दया।
कथा का मोड़ — कुछ दन बाद वह धमबु द्ध को साथ ले गया; ग ा खोदने पर घड़ा खाली मला। पापबु द्ध सर पीटकर
धमबु द्ध पर ही चोरी का आरोप लगाने लगा और राजकुल म नवेदन करने क धमक द । मामला धमा धकारी के पास गया।

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साक्षी कोई न होने से धमा धकारी ने वनदे वता से नणय कराना तय कया। पापबु द्ध ने रात म अपने पता को शमी वृक्ष के
महाकोटर म छपा दया, और सुबह पता ने कोटर म से ‘धमबु द्धना हृतम् एतद्धनम्’ कह दया।
नणय तथा मूल सन्दे श — धमबु द्ध ने कोटर को जलाने योग्य वस्तुओं से घेरकर आग लगा द ; आधा जला हुआ, फट आँख
वाला पापबु द्ध का पता करुण वलाप करता बाहर नकला, सच बताकर मर गया। राजपुरुष ने पापबु द्ध को दण्ड दया और
धमबु द्ध क प्रशंसा क । तब सब लोग बोले — ‘पापबुद्धेः व्यथपा ण्डत्यात् पता व ना घा ततः। अतः साधूक्तम् — उपायं
चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्।’ अथात् बु द्धमान् को केवल उपाय ही नह , उस उपाय से आने वाली वप त्त भी पहले
सोच लेनी चा हए। यही पाठ का शीषक और यही उसका सन्दे श है।
पाठगत ोक — कथा म चार ोक तथा एक अध ोक ह — (१) ‘दे शान्तरेषु बहु वधभाषावेषा द येन न ज्ञातम्…’ तथा
(२) ‘ वद्यां वत्तं शल्पं तावन्ना ो त मानवः सम्यक्…’ — दोन दे शाटन क म हमा कहते ह; (३) ‘मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु
लोष्ठवत्…’ — धमबु द्ध क सचाई का प्रमाण; (४) ‘आ दत्यचन्द्राव नलोऽनलश्च…’ — साक्षी- ोक, जो पापबु द्ध स्वयं
वनदे वता के सामने पढ़ता है (और वही झूठ भी बोलता है — यही कथा क करारी वडम्बना है); तथा (५) शीषक-सू क्त ‘उपायं
चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्।’
भा षक वशेषताएँ — पूरी कथा ना ात्मक गद्य म है — छोटे संवाद, कोष्ठक म रङ्ग-सङ् केत (‘तथा करो त’, ‘इत्युक्त्वा
मृतः’, ‘साश्चयम्’)। वचन का प्रयोग असाधारण रूप से घना है, क्य क कथा म दो ही मुख्य पात्र ह — गच्छावः, कुवः,
आवाम्, आवाभ्याम्, द्वाभ्याम्, द्वाव प, प्र स्थतौ, गतवन्तौ, दृष्टवन्तौ, युवाम्, आवयोः। क्त्वा/ल्यप् तथा क्तवतु-प्रत्ययान्त पद
पग-पग पर ह — स्वीकृत्य, वञ्च यत्वा, ख नत्वा, न क्षप्य, प रवेष्ट्य, आकण्य, प्राप्य, गतवान्, उक्तवान्, द ण्डतवन्तः।
व्याकर णक बदु — पुस्तक इस पाठ म तीन बन्दु दृढ़ कराती है — (क) क्तवतुप्रत्ययः (भूतकाल कत र; पद वशेषण क
तरह चलता है, अतः कता के लङ्ग-वचन के अनुसार रूप बदलता है — बालकः प ठतवान् / बा लका प ठतवती / मत्रं
प ठतवत्), (ख) तत्पुरुषसमासः (उत्तरपद-प्रधान; लुप्त वभ क्त के नाम से समास का नाम — शरणागतः द्वतीयातत्पुरुषः,
दे शभक्तः षष्ठीतत्पुरुषः आ द), तथा (ग) नत्यबहुवचनान्तशब्दाः (आपः, दाराः, लाजाः, अक्षता न, प्राणाः, सकताः आ द)
और वशेषण- वशेष्य-सम्बन्ध ( लङ्ग, वभ क्त तथा वचन — तीन म मेल)।
अभ्यास क्या माँगता है — ‘अभ्यासाद् जायते स द्धः’ के सात प्रश्न ह : (१) सात प्रश्न के पूणवाक्य म उत्तर, (२) मोटे अक्षर
वाले पद पर पाँच प्रश्न का नमाण, (३) पाँच वाक्य म ‘कः कं प्र त कथय त’, (४) पाँच भूतका लक वाक्य का वतमानकाल म
प रवतन, (५) ोक के भावाथ पर आधा रत चार रक्तस्थान-पू तयाँ, (६) छह पद का वग्रह/मेलन तथा (७) छह वाक्य का
कथाक्रम-संयोजन। इसके ऊपर ‘यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान्’ म पञ्चतन्त्र क कोई एक कथा पढ़कर उसका संस्कृत
सारांश सुनाना तथा कथा पर आधा रत नाटक क प्रस्तु त करनी है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 7 उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्
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त्व रत पुनरावृ त्त
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ पाठ का वाक्य

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अटव्याम् (स्त्री.स.ए.व.) वने जंगल म पापबु द्धः नशीथे अटव्यां गत्वा तत्सव वत्तं समादाय…

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अपायम् (पुं. द्व.ए.व.) िवघ्नम् समस्या / संकट उपायं चन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चन्तयेत्।

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अह न (अहन्, नपुं.स.ए.व.) िदवसे दन के समय अथान्य स्मन् अह न धमबु द्धमुपेत्याह —

आपः (स्त्री.प्र.ब.व.) जलम् जल द्यौभू मरापो हृदयं यमश्च।

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उत्फुल्ललोचनाः (बहुव्री हः, उत्फु ल्लािन लोचनािन आश्चय से फट हुई ते सव जनाः वस्मयेन उत्फुल्ललोचनाः सञ्जाताः।
पुं.प्र.ब.व.)
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आँख वाले
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येषां ते

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ख नत्वा (√खन् खननं कृ त्वा खोदकर भू म ख नत्वा तत्रैव धनं न क्षप्य स्वगृहं गतवन्तौ।

gl(स्त्री.प्र.ए.व.)
aद्यौः आकाशः आकाश द्यौभू मरापो हृदयं यमश्च।

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धरणीपीठे (षष्ठीतत्पुरुषः, धरण्याः पीठे धरती पर भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यथम्॥
नपुं.स.ए.व.)
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न क्षप्य ( न + √ क्षप् + ल्यप्) स्थापियत्वा ag
l a रखकर भूमौ न क्षप्य क ञ्चन्मात्रमादाय गृहं प्र वशावः।

नशीथे (पुं.स.ए.व.) अधरात्रे आधी रात म
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पापबु द्धः नशीथे अटव्यां गत्वा…

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प रवेष्ट्य (प र + √वेष्ट् + ल्यप्) आवृत्य घेरकर शमीकोटरं व भोज्यद्रव्यैः प रवेष्ट्य व ना

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प्रज्वालया म।

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a gl प्रहृष्टमनाः (बहुव्री हः, पहृष्टं मनः यस्य सः प्रसन्न मन वाला तद्वचनमाकण्य प्रहृष्टमनाः धमबु द्धः आह —

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पुं.प्र.ब.व/ए.व.)

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भाण्डम् (नपुं. द्व.ए.व.) पात्रम् घड़े को यावत् खनतः ताव द्रक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ।

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यास्य त (√या + लृट्, जाएगा अन्यथास्माकं प्राणैः सह यास्य त।
प्र.पु.ए.व.)

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वञ्च यत्वा (√वञ्च् + क्त्वा) वञ्चनं कृ त्वा ठगकर अनन्तरम् एनम प वञ्च यत्वा सुखी भवा म इ त।

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प्र.पु..ब.व.) a
वीक्षन्ते ( व + √ईक्ष्, लट् , पश्यिन्त दे खते ह आत्मवत्सवभूतेषु वीक्षन्ते धमबुद्धयः॥

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व्रज त (√व्रज्, लट् , प्र.पु.ए.व.) गच्छित जाता है यावद् व्रज त न भूमौ दे शा े शान्तरं हृष्टः॥

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लोष्ठवत् (लोष्ठ + वत्) पाषाणखण्डवत् पत्थर के टु कड़े के मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।

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ु टतेक्षणः (बहुव्री हः,
पुं.प्र.ए.व.)
a िटतेl ईक्षणे यस्य सः
स्फुg नष्ट हुई आँख वाला अधदग्धशरीरः ु टतेक्षणः करुणं वलपन्
पापबु द्ध पता ब हरागतः।

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages50
Updated19 Sep 2026