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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 8: अ ाद् आनन्दं प्र त
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
92 – 111 17 68 हन्द
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 8: अन्नाद् आनन्दं प्र त
अन्नाद् आनन्दं प्र त शारदा (कक्षा ९) का अष्टमः पाठः है और पूरी पुस्तक का सबसे बड़ा पाठ (२० पृष्ठ)। यह संवाद वधा क रचना है —
तै त्तरीयोप नषद् के भृगुवल्ली प्रकरण पर आधा रत पता वरुण तथा पुत्र भृगु का संवाद, जसम भृगु तप करते-करते क्रमशः अन्न → प्राण → मन →
व ान → आनन्द — इन पाँच कोष को ब्रह्म के रूप म जानता है। पाठ के साथ पुस्तक स्वयं सव शब्दे न भासते (शब्दाथ-ता लका, जसका
‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भ खाली छोड़ा गया है), अत्र इदम् अवधेयम् (पञ्चकोष- ववेक), कतृ-कमवाच्य नयमः तथा तव्यत्-अनीयर्-
प्रत्ययप्रयोगः के व्याकरण-बक्से, स्वाध्यायान्मा प्रमदः (धातुरूप-ता लकाएँ तथा छह ोक/उप नषद्वचन) और यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान्
(सात प रयोजना-काय) दे ती है। अभ्यास अभ्यासाद् जायते स द्धः शीषक के नीचे नौ प्रश्न म है — रक्तस्थानपू तः, पूणवाक्येन उत्तरा ण, सत्यम्/
असत्यम्, मेलनम् ( क्रयापदे न सह पदयोजनम्), अव शष्ट-धातुरूपपू तः, लट् -लकारे त्रषु पुरुषेषु रूपा ण, आत्मनेप दधातूनां लोट् -लकाराभ्यासः, लोट् -
लकारे त्रषु पुरुषेषु रूपा ण तथा कतृपदानुसारं लोट् -लकारेण क्रयापद-प रवतनम्।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
शारदा (कक्षा 9) 92 – 111
खं ड प्रश्न
17 68
माध्यम
हन्द
पाठ-प रचयः — पृष्ठ 92
पाठस्य आरम्भे दत्तः गद्यांशः — उप नषद्-सा हत्यं तथा पञ्चकोषाः
पाठ-प रचयः
प्र.1 पाठस्य आरम्भे यः गद्यांशः दत्तः, तस्य आशयं लखत — “संस्कृतवाङ्मये उप नषत्-सा हत्यस्य व शष्टं महत्त्वपूण च
स्थानम् अ स्त। उप नषत्सु अनेके ानप्रदाः संवादाः स न्त। तै त्तरीयोप नष द समग्रजीवन वकासाय पञ्चकोषाणां
महत्त्वं पतापुत्रसंवादरूपेण व णतम्। तादृश ानप्रदसंवादानाम् अध्ययनेन बोधनेन च वयम् आत्म वकासं कतु
शक्नुमः। अ स्मन् पाठे वयम् पतापुत्रयोः भृगुवरुणयोः संवादं प ठष्यामः।”
अस्य गद्यांशस्य आशयः — संस्कृतवाङ्मये उप नषदां स्थानं व शष्टं महत्त्वपूण च अ स्त, यतः तेषु अनेके ानप्रदाः संवादाः
वद्यन्ते। तै त्तरीयोप नष द समग्रजीवनस्य वकासाय पञ्चानां कोषाणां महत्त्वं पतापुत्रयोः संवादरूपेण व णतम् अ स्त।
तादृशान् संवादान् प ठत्वा बुदध्् वा च वयम् आत्मनः वकासं कतु शक्नुमः। अ स्मन् पाठे भृगुवरुणयोः — पुत्र पत्रोः —
संवादः पठ्यते।
( हन्द — संस्कृत वाङ्मय म उप नषद्-सा हत्य का व शष्ट और महत्त्वपूण स्थान है। उप नषद म अनेक ज्ञान दे ने वाले संवाद ह।
तै त्तरीयोप नषद् म समग्र जीवन के वकास के लए पाँच कोष का महत्त्व पता-पुत्र के संवाद के रूप म व णत है। ऐसे ज्ञानप्रद
संवाद को पढ़कर और समझकर हम अपना आत्म वकास कर सकते ह। इस पाठ म हम पता-पुत्र — भृगु और वरुण — का संवाद
पढ़गे।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
वाक्यम् क्या कहता है
संस्कृ तवाङ् मये उपिनषत्-सािहत्यस्य िविशष्टं… उपिनषद् संस्कृ त सािहत्य का दाशिनक िशखर है ं — वेद ों का अिन्तम भाग, इसीिलए इन्हे ं
स्थानम् अिस्त ‘वेद ान्त’ भी कहते है।
ं
उपिनषत्सु अनेके ज्ञानपदाः संवादाः सिन्त उपिनषदों की शैल ी पश्नोत्त र की है — निचके ता-यम , याज्ञ वल्क्य-मैत्रेयी, श्वेतके तु-
उ ालक , और यहाँ भगृ -ु वरुण।
तैित्तरीयोपिनषिद… पञ्चकोषाणां महत्त्वं… विणतम् यह पाठ िकसी की क ल्पना नही,ं तैित्त रीयोपिनषद् की भगृ वु ल्ली का सरल संस्कृ त रूपान्तर
है।
तादृ शसंवादानाम् अध्ययनेन… आत्मिवकासं कतु ं पढ़ ने का पयोजन सूचना नही,ं आत्मिवकास है — यही पूरे पाठ का स्वर है।
शक्नुम ः
यह गद्यांश संवाद से कैसे जुड़ता है: गद्यांश म एक शब्द रखा गया है — ‘समग्रजीवन वकासाय’। पूरा संवाद इसी
शब्द को खोलता है। मनुष्य का वकास एकांगी नह होता : केवल शरीर बना लेने से काम नह चलता, केवल बु द्ध
माँज लेने से भी नह । इसी लए भृगु को पाँच बार तप करना पड़ता है और पाँच उत्तर मलते ह — अन्न, प्राण, मन,
वज्ञान, आनन्द। ‘अन्नाद् आनन्दं प्र त’ — यही पाठ का शीषक और यही उसक यात्रा है।
ध्यान द: ‘वाङ्मय’ = वाक् + मय (वाणी से बना हुआ, अथात् सा हत्य); यहाँ ‘संस्कृतवाङ्मये’ सप्तमी म है —
अ धकरणे सप्तमी। ‘ज्ञानप्रदाः’ = ज्ञानं प्रदद त इ त (उपपद-तत्पुरुष)। ‘ पतापुत्रसंवादरूपेण’ म तृतीया प्रकार/
रूप के अथ म है — ‘संवाद के रूप म’।
भृगव
ु रुणसंवादः — पृष्ठ 92–97
पञ्च सोपाना न — ज ासा · अन्नं वै ब्रह्म · प्राणो वै ब्रह्म · मनो वै ब्रह्म · व ानं वै ब्रह्म · आनन्दो वै ब्रह्म
सं वादः
प्र.1 संवादस्य आरम्भे भृगुः पतरं कम् अपृच्छत् ? वरुणः च कम् उत्तरम् अददात् ? — “अ य भो पतः! अ भवादयेऽहं
सादरम्। भगवन्! ब्रह्म वषये म य का चद् ज ासा वतते। क तद् ब्रह्म येन सव जग ददं सञ्चाल्यते? कृपया
उप दशतु।” / “पुत्र! शुभं भूयात्। ब्रह्म ानाय त्वया स्वयमेव अन्वेषणं क्रयताम्। यत्नः अभ्यासश्च क्रयेताम्।
तपस्तप्यताम्। तपसैव ायते।”
उत्तरम् — भृगुः सादरम् अ भवाद्य पतरं वरुणम् अपृच्छत् — ‘भगवन्! म य ब्रह्म वषये ज ासा वतते। क तद् ब्रह्म येन इदं
सव जगत् सञ्चाल्यते? कृपया उप दशतु।’ वरुणः तु साक्षात् उत्तरं न अददात्। सः अवदत् — ‘पुत्र! तव शुभं भूयात्।
ब्रह्म ानाय त्वया स्वयमेव अन्वेषणं क्रयताम्, यत्नः अभ्यासश्च क्रयेताम्, तपः तप्यताम्। तपसा एव ब्रह्म ायते।’
( हन्द — भृगु ने आदरपूवक प्रणाम करके पता वरुण से पूछा — ‘भगवन्! मेरे मन म ब्रह्म के वषय म जज्ञासा है। वह ब्रह्म क्या है
जससे यह सारा संसार चलाया जाता है? कृपया उपदे श द जए।’ वरुण ने सीधा उत्तर नह दया। उन्ह ने कहा — ‘पुत्र! तुम्हारा
कल्याण हो। ब्रह्मज्ञान के लए तुम स्वयं ही खोज करो, प्रयत्न और अभ्यास करो, तप करो। तप से ही वह जाना जाता है।’)
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पदम् व्याकरण-प रचयः अथः
अिभवादये अ भ + √वद् ( णच्), लट् , आत्मनेपद, उत्तमपुरुष, एकवचन मैं पणाम करता हू ँ
सञ्चाल्यते सम् + √चल् ( णच्), लट् , कमवाच्य, प्रथमपुरुष, एकवचन चलाया जाता है
िक्रयताम् √कृ, लोट् , कमवाच्य, प्रथमपुरुष, एकवचन (तुम्हारे ारा) िकया जाए
िक्रयेताम् √कृ, लोट् , कमवाच्य, प्रथमपुरुष, द्ववचन (यत्नः + अभ्यासः = दो कता) (दोनों) िकए जाएँ
तप्यताम् √तप्, लोट् , कमवाच्य, प्रथमपुरुष, एकवचन तप िकया जाए
भूयात् √भू, आशी लङ् , प्रथमपुरुष, एकवचन हो (आशीव द का रूप)
वरुण ने उत्तर क्य नह दया: यही इस पाठ का पहला और सबसे बड़ा शक्षा-सूत्र है। भारतीय ज्ञान-परम्परा म ब्रह्म
कोई ऐसी सूचना नह है जो बता द जाए; वह अनुभव है। इसी लए वरुण उत्तर के स्थान पर व ध दे ते ह —
‘अन्वेषणं क्रयताम्, यत्नः अभ्यासश्च क्रयेताम्, तपस्तप्यताम्।’ ध्यान द जए, तीन वाक्य कमवाच्य म ह और तीन
म क्रया लोट् -लकार क है — अथात् आदे श तो है, पर वनम्र आदे श। और अ न्तम वाक्य नणायक है — ‘तपसैव
ायते’ — तप से ही जाना जाता है, कसी और उपाय से नह । पूरे संवाद म वरुण यही वाक्य पाँच बार दोहराते ह।
स न्ध-सङ् केत: अ भवादयेऽहम् = अ भवादये + अहम् → ए + अ = ए, ‘अ’ का लोप तथा अवग्रह (पूवरूप
स न्ध)। जग ददम् = जगत् + इदम् (व्यञ्जनस न्ध — त् + इ → द्)। तपस्तप्यताम् = तपः + तप्यताम् ( वसगस न्ध
— वसग का ‘स्’)। तपसैव = तपसा + एव (वृ द्ध स न्ध — आ + ए = ऐ)।
प्र.2 ‘अन्नं वै ब्रह्म’ इ त भृगुः कथं ातवान् ? वरुणस्य उपदे शः कः आसीत् ? — तपस्तप्त्वा भृगुणा उक्तं “हे पतः!
अन्नाद् एव प्रा णनः जायन्ते। अन्नेन एव प्रा णनः जीव न्त। अन्नेनैव शरीरं बलं च वधते। अतोऽन्नं ब्रह्म इ त।”
उत्तरम् — भृगुः अनेकवषा ण तपः आच रत्वा एतद् अवबुद्धवान् यत् ‘अन्नं वै ब्रह्म’। तस्य हेतुत्रयम् आसीत् — (१) अन्नाद्
एव प्रा णनः जायन्ते, (२) अन्नेन एव प्रा णनः जीव न्त, (३) अन्नेन एव शरीरं बलं च वधते। अतः सः अन्नम् एव ब्रह्मरूपेण
ातवान्।
वरुणस्य उपदे शः — ‘पुत्र! त्वया सम्यग् अवबुद्धम्। अन्नं ह भूतानां ज्येष्ठम्, तस्मात् सव षधम् इ त उच्यते। अतः कदा प
अन्नं न नन्द्यात्। अन्नं सदा ईश्वरबु ा सेवताम्। कदा प अन्नं न प रहतव्यम्। प्रयत्नेन अन्नं बहु कुव त। सवदा सा त्त्वकं
हतकारकं च आहारं सेवताम्। परं च ब्रह्म ातुम् इतोऽ प यतताम्, तपः कुरुताम्।’
( हन्द — भृगु ने अनेक वष तक तप करके यह समझा क ‘अन्न ही ब्रह्म है’। उसके तीन कारण थे — प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते
ह, अन्न से ही जीते ह, और अन्न से ही शरीर तथा बल दोन बढ़ते ह। वरुण ने कहा — ‘पुत्र! तुमने ठ क समझा। अन्न ही प्रा णय म
ज्येष्ठ है, इस लए उसे सव षध कहा जाता है। अन्न क कभी नन्दा न करो, उसे सदा ईश्वर-बु द्ध से ग्रहण करो, कभी उसका त्याग मत
करो, प्रयत्नपूवक अन्न को बहुत उपजाओ, और सदा सा त्त्वक तथा हतकारी आहार लो। पर ब्रह्म को जानने के लए इससे भी आगे
प्रयत्न करो, तप करो।’)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त
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आहारात् सवभूत ािन सम्भविन्त महीपते ।
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आहारेण िववधन्ते ते न जीविन्त जन्तवः॥
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(महाभारतम्, वनपव १३१ /७ )
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पृष्ठ ९३ के चत्र म अन्न से मलने वाले आठ फल लखे ह —
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संस्कृतम् हन्द
g l as संस्कृतम् हन्द
आयुः आयु, जीवन की ल म्बाई
a बलम् शारीिरक शिक्त
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समझ, िववेक तेजिस्वता, पाणशिक्त
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पज्ञा ओजः
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मेध ा
m .co गहण-शिक्त आरोग्यम्
a g िनरोगता
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a g तेजः कािन्त, ओज स्म ृितः स्मरण-शिक्त
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भावः: यह पहला सोपान है और सबसे स्थूल भी। भृगु ने वही दे खा जो आँख से दखता है — शरीर अन्न से बनता है,
इस लए अन्न ही ब्रह्म है। वरुण उसे ग़लत नह eकहते
s m (‘सम्यग् अवबुद्धम्’), पर अधूरा कहते ह। ध्यान द जए, वरुण
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का उपदे श केवल दाश नक नह , बलक
agु लl व्यावहा रक है — अन्न क नन्दा मत करो, थाली म छोड़ो मत, अन्न खूब
उपजाओ, सा त्त्वक भोजन लो। यही आज क भाषा म ‘अन्न क बरबाद रोको’ तथा ‘सन्तु लत आहार लो’ है —
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और अभ्यास का ‘अन्नरक्षणाय भवता के उपायाः क्रयन्ते?’ प्रश्न सीधे यह से नकला है।
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m .c ‘वधते’ — √वृध्, लट्, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष, द्ववचन (कता दो हa—g शरीरं बलं च)। ‘ नन्द्यात्’ —
ase√ नन्द्, व ध लङ् , प्रथमपुरुष, एकवचन (‘ नन्दा करनी चा हए’ का नषेध)। ‘कुव त’ — √कृ, व ध लङ् ,
व्याकरण:
agl आत्मनेपद। ‘सेवताम्’ तथा ‘यतताम्’, ‘कुरुताम्’ — तीन लोट् -लकार, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष, एकवचन (आदराथ
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प्रयोग)। ‘अतोऽन्नम्’ = अतः + अन्नम् ( वसगस न्ध — उत्वम् तथा पूवरूप)।
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प्र.3
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‘प्राणो वै ब्रह्म’ इ त भृगुः कथं ातवान् ? अत्र वरुणेन क दृशः उपदे शः दत्तः ? — “प्राणो ह भूतानाम् आयुः। प्राणे
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शरीरं प्र त ष्ठतम्। प्राण एव अस्माकं जीवनम्। प्राणेन वना शरीरं क्रयाशून्यं भव त। अतः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च।”
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a s emउत्तरम् — पुनः तपस्तप्त्वा भृगुः अवदत् — ‘प्राणो वै ब्रह्म’, यतः (१) प्राणः एव भूतानाम् आयुः अ स्त, (२) प्राणे एव शरीरं
agl प्र त ष्ठतम्, (३) प्राणः एव अस्माकं जीवनम्, (४) प्राणेन वना शरीरं क्रयाशून्यं भव त। अतः प्राणः ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च — तस्मात्
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‘प्राणो वै ब्रह्म’ इ त व ातम्।
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वरुणस्य उपदे शः — ‘पुत्र! त्वया सत्यम् उद रतम्। प्राणाद् एव इमा न भूता न जायन्ते, प्राणेन जाता न जीव न्त।
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प्राणशक्त्या एव शारी रक क्रयाशक्तेः वकासो भव त। अत एव प्राणः सवथा रक्षणीयः। तस्मात् प्राण वकासाय प्र त दनं
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प्राणायामः कतव्यः। कन्तु ब्रह्म ानाय इतोऽ प कठोरं तपः कुरुताम्।’
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( हन्द — फर तप करके भृगु ने कहा — ‘प्राण ही ब्रह्म है’, क्य क प्राण ही प्रा णय क आयु है, प्राण म ही शरीर टका है, प्राण ही
हमारा जीवन है और प्राण के बना शरीर क्रयाहीन हो जाता है; इस लए प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। वरुण ने कहा — ‘तुमने सच कहा।
प्राण से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते ह और प्राण से ही जीते ह। प्राणश क्त से ही शरीर क क्रयाश क्त का वकास होता है। इस लए
प्राण क सब प्रकार से रक्षा करनी चा हए और प्र त दन प्राणायाम करना चा हए। कन्तु ब्रह्मज्ञान के लए इससे भी कठोर तप करो।’)
यावद् वायुः िस्थतो दे हे तावज्जीवनमुच् यते ।
मरणं तस्य िनष्क्रािन्तस्ततो वायुं िनरोधयेत ्॥
(हठयोगपदीिपका)
भावः: दूसरा सोपान पहले से एक कदम सूक्ष्म है। अन्न दखता है, प्राण नह दखता — पर उसके बना अन्न से बना
शरीर भी ‘ क्रयाशून्य’ है। यही तक भृगु दे ता है : शरीर आधेय है, प्राण आधार — ‘प्राणे शरीरं प्र त ष्ठतम्’। इसी लए
वरुण का उपदे श भी व्यावहा रक है — प्र त दनं प्राणायामः कतव्यः। ध्यान द जए, हर सोपान पर वरुण एक ‘करने
का काम’ दे ते ह : पहले सोपान पर सा त्त्वक आहार, दूसरे पर प्राणायाम, तीसरे पर सत्कम, चौथे पर ध्यान-योगासन,
पाँचव पर दया-परोपकार। दशन कभी उपदे श म नह रुकता, अभ्यास म उतरता है।
व्याकरण: ‘प्राणेन वना’ — वना के योग म यहाँ तृतीया है ( वना, ऋते के योग म द्वतीया, तृतीया तथा पञ्चमी —
तीन चल सकती ह; अभ्यास प्र. ३ (ज) इसी नयम क परीक्षा है)। ‘प्राणे शरीरं प्र त ष्ठतम्’ — अ धकरणे सप्तमी।
‘प्राणाद् एव’ — अपादाने पञ्चमी (जहाँ से उत्प त्त हो)। ‘रक्षणीयः’ = √रक्ष् + अनीयर्, ‘कतव्यः’ = √कृ + तव्यत्
— दोन वशेषण ह, इस लए कमपद के लङ्ग-वचन लेते ह (प्राणः रक्षणीयः, प्राणायामः कतव्यः — दोन पुं लङ्ग
एकवचन)।
प्र.4 ‘मनो वै ब्रह्म’ इ त भृगोः अनुभवः क दृशः आसीत् ? उप नष द मनसः वषये कम् उक्तम् ? — “अस्माकं मन एव
सवकमणः प्रवतकम्। समस्ता न इ न् या ण अ प मनसा सञ्चाल्यन्ते। मानवः मनसा एव सव काय सम्पादय त।
मनसः सङ् कल्पाः, भावाः, वचाराश्च जायन्ते। अतो मनो वै ब्रह्म इ त।”
उत्तरम् — तृतीयवारं तपस्तप्त्वा भृगुः अवदत् — ‘मनो वै ब्रह्म’। तस्य अनुभवः आसीत् — (१) अस्माकं मनः एव सवकमणः
प्रवतकम् अ स्त, (२) समस्ता न इ न् या ण मनसा एव सञ्चाल्यन्ते, (३) मानवः मनसा एव सव काय सम्पादय त, (४)
मनसः एव सङ् कल्पाः, भावाः, वचाराश्च जायन्ते। अतः मनः एव ब्रह्म।
वरुणस्य उपदे शः — ‘हे वत्स! त्वया सम्यग् अनुभूतं यद् मन एव सवम् इ त। मानवः चन्तनशक्त्या, मननशक्त्या,
दृढसङ् कल्पशक्त्या च सव ल ुं शक्नो त। अतः मनसः श क्तप्राप्तये मनः सदा सत्कमणा साधनीयम्, शोका दर हतम्
उत्साहयुक्तं शान्तं च करणीयम्, आहारशु द्धश्च करणीया। कञ्च ब्रह्म ानाय इतोऽ प प्रयतस्व।’
( हन्द — तीसरी बार तप करके भृगु ने कहा — ‘मन ही ब्रह्म है’, क्य क मन ही सब कम का प्रवतक है, सारी इ न् याँ मन से ही
चलाई जाती ह, मनुष्य मन से ही सब काय पूरा करता है, और मन से ही संकल्प, भाव तथा वचार उत्पन्न होते ह। वरुण ने कहा —
‘वत्स! तुमने ठ क अनुभव कया क मन ही सब कुछ है। मनुष्य चन्तन-श क्त, मनन-श क्त और दृढ़ संकल्प-श क्त से सब कुछ पा
सकता है। इस लए मन क श क्त पाने के लए मन को सदा सत्कम से साधना चा हए, उसे शोक आ द से र हत, उत्साह से युक्त और
शान्त बनाना चा हए, और आहार क शु द्ध भी करनी चा हए। पर ब्रह्मज्ञान के लए इससे भी आगे प्रयत्न करो।’)
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कामः संक ल्पो िविचिकत्सा श्रद्धाऽश्रद्धा
धृितरधृित ध भ िरत्येत त् सव ं मन एव।
(बहृ दारण्यकोपिनषद् १ /५ /३ )
यह वाक्य मन के दस वषय गनाता है — पृष्ठ ९४ के चत्र म भी यही दस लखे ह :
पदम् पदच्छे दः अथः
कामः कामः इच्छा
संक ल्पः संकल्पः िनश्चय, पितज्ञ ा
िविचिकत्सा व च कत्सा स न्दे ह
श्रद्धाऽश्रद्धा श्रद्धा + अश्रद्धा िनष्ठा तथा अिनष्ठा
ध ृितरध ृितः धृ तः + अधृ तः धै य तथा अधै य
ीः ीः ल ज्जा
धीः धीः बुिद्ध
भीः भीः भय
भावः: तीसरा सोपान और सूक्ष्म है। प्राण तो पशु-पक्षी म भी है; पर संकल्प, सन्दे ह, श्रद्धा, लज्जा, भय — ये
मनुष्य के मन के व्यापार ह। उप नषद्-वाक्य का बल इसी पर है : सुख-दुःख, डर- हम्मत, वश्वास-अ वश्वास — सब
बाहर से नह आते, ‘एतत् सव मन एव’ — यह सब मन ही है। इसी लए वरुण का उपाय भी मन को ही ठ क करना है
— सत्कम से साधना, शोकर हत तथा शान्त बनाना, और आहार शुद्ध रखना (क्य क ‘आहारशुद्धौ सत्त्वशु द्धः’)।
स न्ध: ‘श्रद्धाऽश्रद्धा’ = श्रद्धा + अश्रद्धा (पूवरूप — ‘अ’ का लोप, अवग्रह)। ‘धृ तरधृ त ध भ रत्येतत्’ = धृ तः +
अधृ तः + ीः + धीः + भीः + इ त + एतत् — यहाँ चार बार वसगस न्ध ( वसग का ‘र्’) तथा एक बार यण् स न्ध
(इ त + एतत् → इत्येतत्) हुई है। इसे तोड़कर पढ़ने पर ही वाक्य खुलता है।
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प्र.5 ‘ व ानं वै ब्रह्म’ इत्यत्र ‘ व ानम्’ इ त कस्य नाम ? भृगुः कैः हेतु भः व ानं ब्रह्मरूपेण अजानात् ? —
“बु द्धतत्त्वमेव व ानम्।… बु द्धतत्त्वं वना अस्माकं बोधशक्तेः, तकशक्तेः, ववेकशक्तेः, नणयशक्तेः,
स्मृ तशक्तेश्च वकासो न भव त। बु द्धरेव सार थरूपेण अस्मान् कम ण प्रवतय त। समग्र ानं बुद्धौ एव वद्यते।”
उत्तरम् — अत्र ‘ व ानम्’ इ त बु द्धतत्त्वस्य नाम — ‘बु द्धतत्त्वमेव व ानम्’ इ त भृगुः स्पष्टं वद त। सः त्र भः हेतु भः
व ानं ब्रह्मरूपेण अजानात् — (१) बु द्धतत्त्वं वना अस्माकं बोधशक्तेः, तकशक्तेः, ववेकशक्तेः, नणयशक्तेः,
स्मृ तशक्तेश्च वकासः न भव त; (२) बु द्धः एव सार थरूपेण अस्मान् कम ण प्रवतय त; (३) समग्रं ानं बुद्धौ एव वद्यते।
अत एव ‘ व ानं वै ब्रह्म’।
वरुणस्य उपदे शः — ‘पुत्र! सत्यं भाषसे। अतः बौ द्धक वकासाय व ानमयकोषस्य वकासः कतव्यः। तदथ प्र त दनं ध्यानं
योगासनं च कतव्यम्। कञ्च य द ब्रह्मणः स्वरूपं वेत्तुम् इच्छ त त ह इतोऽ प प्रयतताम्, अ न्वष्यतां च।’
( हन्द — यहाँ ‘ वज्ञान’ का अथ है बु द्धतत्त्व। भृगु ने तीन कारण से बु द्ध को ब्रह्म जाना — बु द्ध के बना हमारी बोधश क्त,
तकश क्त, ववेकश क्त, नणयश क्त और स्मृ तश क्त का वकास नह होता; बु द्ध ही सार थ बनकर हम कम म लगाती है; और
सारा ज्ञान बु द्ध म ही रहता है। वरुण ने कहा — ‘तुम सच कहते हो। इस लए बौ द्धक वकास के लए वज्ञानमयकोष का वकास
करना चा हए और उसके लए प्र त दन ध्यान तथा योगासन करना चा हए। पर य द ब्रह्म का स्वरूप जानना चाहते हो तो इससे भी
आगे प्रयत्न करो और खोज करो।’)
पृष्ठ ९६ के चत्र म बु द्ध क छह श क्तयाँ अङ् कत ह —
श क्तः क्या करती है श क्तः क्या करती है
िववेक ः सही-ग़ ल त में भेद करना तक ः कारण-काय जोड़ कर सोचना
िनश्चयः िनणय पर पहच
ु ँ ना स्म ृितः पढ़ ा-दे खा याद रखना
बोधः िवषय को समझना अनुभवः अनुभव से सीखना
भावः तथा एक सुन्दर रूपक: मन और बु द्ध म क्या अन्तर है — यही चौथे सोपान का प्रश्न है। मन चाहता है, बु द्ध
तय करती है। इसी लए भृगु कहता है ‘बु द्धरेव सार थरूपेण अस्मान् कम ण प्रवतय त’ — बु द्ध ही सार थ बनकर
हम कम म जोतती है। यहाँ रूपक अलङ् कार है और यह कठोप नषद् के प्र सद्ध रथ-रूपक क गूँज है, जहाँ शरीर
रथ है, इ न् याँ घोड़े, मन लगाम, बु द्ध सार थ और आत्मा रथी। ध्यान र खए — अभ्यास के प्रश्न ३ (ङ) म ‘मनः
सार थरूपेण अस्मान् कम ण प्रवतय त’ लखा है; वह असत्य है, क्य क पाठ म सार थ बु द्ध है, मन नह ।
ध्यान द: यहाँ ‘ वज्ञान’ का अथ आधु नक Science नह है — पुस्तक क शब्दाथ-ता लका भी ‘ वज्ञानम् = बु द्धः,
Intellect’ ही दे ती है। ‘बुद्धौ’ अ धकरण सप्तमी है। ‘बोधशक्तेः, तकशक्तेः…’ सब षष्ठी म ह क्य क ‘ वकासः’ के
साथ सम्बन्ध है — सम्बन्धे षष्ठी। ‘वेत्तुम्’ = √ वद् + तुमुन् (जानने के लए)।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
प्र.6 ‘आनन्दो वै ब्रह्म’ इ त भृगुः कथम् अवाबुध्यत ? संवादस्य अन्ते वरुणः पञ्चकोष वषये कम् उपा दशत् ? —
“अस्माकं सवकमा ण आनन्दाय भव न्त। अस्माकं कमणो लक्ष्यम् आनन्दप्रा प्तरेव। आनन्दे न एव प्रा णनो
जीव न्त। आनन्दे न र हतं जीवनं मृत्युरूप म त।”
उत्तरम् — अत्यन्तं सूक्ष्म चन्तनेन तपसा च भृगुः एवम् अवबुद्धवान् — ‘आनन्दो वै ब्रह्म’। तस्य हेतवः — (१) अस्माकं
सवकमा ण आनन्दाय एव भव न्त, (२) अस्माकं कमणः लक्ष्यम् आनन्दप्रा प्तः एव, (३) आनन्दे न एव प्रा णनः जीव न्त, (४)
आनन्दे न र हतं जीवनं मृत्युरूपम् एव। तस्मात् ‘आनन्दो वै ब्रह्म’।
वरुणस्य उपदे शः — ‘हे वत्स! त्वया सत्यं प्रक टतम्। अतः आनन्दप्राप्तये प्र त दनं ध्यानं योगासनं च कतव्यम्। प्रा णषु दया
कतव्या। परोपकारः कतव्यः। रागः, द्वे षः, ईष्या, क्रोधः, लोभः, मोहश्च हातव्याः। सवदा ईश्वरं सेवतां मोदतां च।’
उपसंहारे वरुणः अवदत् — ‘हे पुत्र! त्वं तपसा सूक्ष्म व ानेन च अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, व ानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं
ातवान्। एतैः पञ्च भः एव अस्माकं पूण वकासो भव त, अतः एते ब्रह्मपदे न व्यव यन्ते। ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽ प परे
अ स्त। एता न ब्रह्म ानाय द्वारा ण स न्त। य द एतेषां क्रमशः वकासं क रष्य स त ह ब्रह्मणः स्वरूपबोधो भ वष्य त।’
( हन्द — अत्यन्त सूक्ष्म चन्तन और तप से भृगु ने समझा क ‘आनन्द ही ब्रह्म है’ — क्य क हमारे सारे कम आनन्द के लए ही होते
ह, कम का लक्ष्य ही आनन्द-प्रा प्त है, प्राणी आनन्द से ही जीते ह, और आनन्द से र हत जीवन मृत्यु के समान है। वरुण ने कहा —
‘तुमने सच प्रकट कया। इस लए आनन्द क प्रा प्त के लए प्र त दन ध्यान और योगासन करना चा हए, प्रा णय पर दया करनी
चा हए, परोपकार करना चा हए; राग, द्वे ष, ईष्या, क्रोध, लोभ और मोह छोड़ दे ने चा हए; सदा ईश्वर क सेवा करो और प्रसन्न रहो।’
अन्त म वरुण बोले — ‘पुत्र! तुमने अन्न, प्राण, मन, वज्ञान और आनन्द — पाँच का महत्त्व जान लया। इन्ह पाँच से हमारा पूण
वकास होता है, इस लए इन्ह ब्रह्म कहा जाता है। कन्तु ब्रह्म का स्वरूप इनसे भी परे है। ये तो ब्रह्मज्ञान के द्वार ह। य द तुम इनका
क्रम से वकास करोगे तो ब्रह्म के स्वरूप का बोध हो जाएगा।’)
आहारशुद्ध ौ सत्त्वशुिद्धः सत्त्वशुद्ध ौ धु वा स्मृितः।
स्मृितलम्भे सवगन्थीनां िवपमोक्षः इित॥
(छान्दोग् योपिनषद् ७ /२६ /२ )
भावः — पूरे पाठ का नचोड़: पाँचवाँ सोपान सबसे सूक्ष्म है और सबसे स ा भी। पू छए : हम खाते क्य ह? जीते
क्य ह? पढ़ते क्य ह? हर उत्तर के पीछे अन्ततः एक ही उत्तर है — आनन्द के लए। ‘आनन्दे न र हतं जीवनं
मृत्युरूपम्’ — यह वाक्य पूरे पाठ का शखर है। पर सबसे बड़ी बात वरुण क अ न्तम पं क्त है : ये पाँच ब्रह्म ‘ह’
नह , ब्रह्म तक पहुँचने के द्वार ह — ‘ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽ प परे अ स्त’। और द्वार क्रम से ही खुलते ह : ‘य द
एतेषां क्रमशः वकासं क रष्य स’। यही ‘अन्नाद् आनन्दं प्र त’ — अन्न से चलकर आनन्द तक क यात्रा।
व्याकरण: ‘हातव्याः’ = √हा + तव्यत्, पुं लङ्ग प्रथमा बहुवचन — क्य क कम छह ह (रागः, द्वे षः… मोहः)। ‘दया
कतव्या’ स्त्री लङ्ग, ‘परोपकारः कतव्यः’ पुं लङ्ग, ‘योगासनं कतव्यम्’ नपुंसक लङ्ग — तव्यत्-प्रत्ययान्त पद का लङ्ग-
वचन सदा कमपद के अनुसार होता है; यही नयम पृष्ठ १०६–१०७ के व्याकरण-बक्से म ता लका बनाकर समझाया
गया है। ‘व्यव यन्ते’ — व + अव + √हृ, लट् , कमवाच्य, बहुवचन। ‘मोदताम्’ — √मुद,् लोट् , आत्मनेपद (‘प्रसन्न
रह’)।
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सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 98–100
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शब्दाथ-ता लका तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त रक्तस्तम्भस्य पू तः
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कायकलापः
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‘सव शब्दे न भासते’ इ त ता लकायाः अ न्तमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अथ लखत’ — रक्तः अ स्त। पाठे
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प्र.1
प्रयुक्तानां शब्दानाम् अथान् ात्वा तं स्तम्भं पूरयत।
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पुस्तक म यह अ न्तम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — वद्याथ को हर शब्द का अथ अपनी मातृभाषा म लखना है।
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नीचे क ता लका म वह स्तम्भ हन्द (हमारी माध्यम-भाषा) म भर दया गया है; जनक मातृभाषा मराठ , बाङ् ग्ला, गुजराती,
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त मऴ, तेलुगु, ओ ड़आ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अथ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रख।
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शब्दः अथः हन्द ENGLISH मातृभाषया अथम्
(भरा हुआ —
हन्द )
अन्वेष्टव्यम् (अनु + अनुसन्धेयम् खोज करनी चा हए Explore ढू ँढ़ना चािहए ,
√इष् + तव्यत्, अनुस न्धान करना
नपुं.प.ए.व.) चािहए
अवबुद्धम् (अव + √बुध ् ज्ञातम् समझा गया Understood जान िलया गया, भली-
+ क्त, नपुं.प.ए.व.) भाँित समझ िलया
उदीिरतम् (उद् + √ईर् उक्तम् / कहा गया Spoken कहा गया, बोला गया
+ क्त, नपुं.प.ए.व.) प्रक टतम्
कामः (पु.ं प.ए.व.) इच्छा इच्छा Desire चाह, कामना
कु व त (√कृ , िविधिलङ् , कुयात् करना चा हए Should do करना चािहए , िकया
आ.प.पु.ए.व.) जाना उिचत है
ध ृितः (स्त्री.प.ए.व.) धैयम् धैय Courage धीरज, िहम्मत
धीः (स्त्री.प.ए.व.) बु द्धः बु द्ध Intelligence अक्ल , समझ
िनष्क्रािन्तः (िनस् + ब ह नगमनम् बाहर जाना Going out िनकल जाना, बाहर
√क्रम् + िक्तन्, चला जाना
स्त्री.प.ए.व.)
पिरहतव्यम् (पिर + √हृ त्यक्तव्यम् त्याग करना चा हए To be discarded छोड़ दे ना चािहए ,
+ तव्यत्, नपुं.ए.व.) ितर स्कार करना चािहए
पकिटतम् (प + √कट् प्रका शतम् प्रकट हुआ Revealed ज़ ािहर िकया गया,
+ क्त, नपुं.प.ए.व.) खोलकर कहा गया
पाणः (पु.ं प.ए.व.) प्राणवायुः प्राण वायु Life-breathe साँस , जीवन-वायु
बह्म (नपु.ं प.ए.व.) परमात्मा / ईश्वरः परमात्मा Supreme being परबह्म, सवव्यापी परम
स त्त ा
भूतािन (नपुं.प.ब.व.) प्रा णनः प्राणी जन Living beings जीव-जन्तु, सब पाणी
िविचिकत्सा सन्दे हः सन्दे ह Doubt शक , दुिवधा
(स्त्री.प.ए.व.)
िवज्ञानम् (नपुं.प.ए.व.) बु द्धः बु द्ध Intellect बुिद्ध-तत्त्व, िववेक -शिक्त
िवपमोक्षः (िव + प + अत्यन्तं मोक्षः अत्यन्त मोक्ष Final liberation पूर ी तरह छू ट जाना,
मोक्षः) अिन्तम मुिक्त
िववधन्ते (िव + √वृध ् + वशेषेण वृ द्ध वशेष रूप से वृ द्ध Grow ख़ूब बढ़ ते है,ं फलते-
लट् , आ.प.पु.ब.व.) प्रा ुव न्त को प्राप्त होते ह फू लते है ं
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
श्रद्धा (स्त्री.प.ए.व.) आदरः नष्ठा Faith िवश्वास , आस्था
सङ् कल्पः (पुं.प.ए.व.) प्र तज्ञा सङ् कल्प Come into being पक्का इरादा, ठान ले ना
सम्भविन्त (सम् + √भू जायन्ते उत्पन्न होते ह Arise पैद ा होते है,ं जन्म ले ते है ं
+ लट् , प.पु.ब.व.)
सवग न्थीनाम् सवषां ग्र ीनाम् सभी गाँठ (सन्दे ह Of all the doubts सब गाँठों का, सब
(पुं.ष.ब.व.) (सन्दे हानाम्) के) स न्दे हों का
साधनीयम् (√साध् + संस्करणीयम् संस्कार करना Should be achieved साधना चािहए , माँजकर
अनीयर्, नपुं.प.ए.व.) चा हए तैयार करना चािहए
स्म ृितलम्भे (षष्ठी- स्मृतेः लम्भे ुवस्मृ त Obtaining the everlasting अटल स्म ृित —
तत्पुरुषः, पुं.स.ए.व.) ( ुवस्मृतेः प्राप्तौ) (आत्मज्ञान) क memory or self आत्म ज्ञ ान — िमल जाने
प्रा प्त होने पर actualization पर
हातव्याः (√हा + तव्यत्, त्यक्तव्याः त्याग करना चा हए Should be sacrificed छोड़ दे ने चािहए , त्यागने
पुं.प.ब.व.) योग्य है ं
ीः (स्त्री.प.ए.व.) लज्जा लज्जा Modesty शम , संक ोच
नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं म) — मराठ : प्राणः = ‘श्वास’, धृ तः = ‘धीर’, ीः = ‘लाज’, भूता न =
‘प्रा णमात्र’। बाङ् ग्ला: कामः = ‘इच्छा’, व च कत्सा = ‘सन्दे ह’, श्रद्धा = ‘ बश्वास’। गुजराती: धीः = ‘बु द्ध’, प्राणः
= ‘श्वास’, हातव्याः = ‘छोड़वा जेवा’। त मऴ: धीः = ‘अ ऱवु’, प्राणः = ‘उ यर्’, ीः = ‘वेट्कम्’। अपनी भाषा म
लखते समय ध्यान र खए क अथ वही रहे जो संस्कृत स्तम्भ म दया है।
इस ता लका म एक बड़ी सीख छपी है: गनकर दे खए — प ीस म से तेरह शब्द कृदन्त ह, अथात् धातु +
प्रत्यय से बने। तीन प्रकार बार-बार लौटते ह : क्त (अवबुद्धम्, उद रतम्, प्रक टतम् — ‘हो चुका’ भूतकाल), तव्यत्
(अन्वेष्टव्यम्, प रहतव्यम्, हातव्याः — ‘करना चा हए’) तथा अनीयर् (साधनीयम् — ‘करने योग्य’)। यही तीन
प्रत्यय आगे पृष्ठ १०६–१०७ के व्याकरण-खण्ड का वषय ह। इस लए ता लका केवल शब्द-सूची नह , आगे के
व्याकरण क भू मका है।
पुस्तक म छपी दो छोट असंग तयाँ: (१) ‘सङ् कल्पः’ के सामने अंग्रेज़ी म Come into being छपा है, जो वहाँ
नह बैठता — ‘सङ् कल्पः’ का अथ Resolve / Determination है, और Come into being वस्तुतः नीचे
के ‘सम्भव न्त’ का अथ है ( जसके सामने Arise छपा है)। लगता है दोन पं क्तय म अंग्रेज़ी अथ ऊपर-नीचे खसक
गया है। (२) ‘प्राणः’ के सामने Life-breathe छपा है; शुद्ध रूप Life-breath है।
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 100
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पञ्चकोष ववेकः — क्र मक- वकासपद्ध तः
अत्र इदम् अवधे य म्
प्र.1 ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ इ त खण्डे पञ्चकोषाणां वषये कम् उक्तम् ? पञ्चकोषाः के के ? तेषां परस्परं सम्बन्धः
क दृशः ?
उत्तरम् — मानवः क्रमशः शरीरेण, प्राणेन, मनसा, बु ा, अध्यात्मशक्त्या च पूण वकासं लभते। अतः
समग्रजीवन वकासाय शास्त्रेषु पञ्च कोषाः व णताः — (१) अन्नमयकोषः, (२) प्राणमयकोषः, (३) मनोमयकोषः, (४)
व ानमयकोषः, (५) आनन्दमयकोषः। एतेषां परस्परं सम्बन्धः अ स्त — अन्नमयकोषस्य वकासं वना प्राणमयकोषस्य
वकासः नैव भ वतुं शक्नो त; अन्नमयकोषस्य प्राणमयकोषस्य च वकासं वना मनोमयकोषस्य वकासो न भव त। अतः
आदौ अन्नमयकोषस्य वकासाय यत्नः कतव्यः, ततः क्रमेण प्राणमय-मनोमय- व ानमय-आनन्दमयकोषाणां वकासः
कतव्यः। अनया क्र मक- वकासपद्धत्या एव मानवः पूणतां प्रा ो त।
( हन्द — मनुष्य क्रमशः शरीर, प्राण, मन, बु द्ध और अध्यात्म-श क्त से पूण वकास पाता है। इस लए समग्र जीवन- वकास के लए
शास्त्र म पाँच कोष बताए गए ह — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, वज्ञानमय और आनन्दमय। इनका आपस म सम्बन्ध है :
अन्नमयकोष के वकास के बना प्राणमयकोष का वकास हो ही नह सकता; अन्नमय और प्राणमय के वकास के बना मनोमयकोष
का वकास नह होता। इस लए पहले अन्नमयकोष के वकास का यत्न करना चा हए, फर क्रम से बाक कोष का। इसी क्र मक-
वकास-पद्ध त से मनुष्य पूणता पाता है।)
क्रमः कोषः कससे बनता है संवाद का वकास का उपाय (वरुण के अनुसार)
सूत्र
१ अन्नमयकोषः अ से बना स्थूल शरीर
न्न अन्नं वै ब्रह्म सा त्त्वक तथा हतकारी आहार; अन्न क नन्दा न करना;
अन्न खूब उपजाना
२ पाणमयकोषः पाणवायु तथा ि याशिक्त
क्र प्राणो वै ब्रह्म प्र त दन प्राणायाम तथा आसन; समय पर सोना-जागना
३ मनोमयकोषः मन — संक ल्प, भाव, िवचार मनो वै ब्रह्म सत्कम से मन को साधना; शोकर हत, उत्साहयुक्त,
शान्त मन; आहारशु द्ध
४ िवज्ञानमयकोषः बुिद्धतत्त्व — बोध , तक , िववेक , वज्ञानं वै प्र त दन ध्यान तथा योगासन; स्वाध्याय
िनणय, स्म ृित ब्रह्म
५ आनन्दमयकोषः आित्मक आनन्द आनन्दो वै ध्यान-योगासन; प्रा णय पर दया; परोपकार; राग-द्वे ष-
ब्रह्म ईष्या-क्रोध-लोभ-मोह का त्याग
क्रम क्य नह तोड़ा जा सकता: यह खण्ड एक ही बात पर ज़ोर दे ता है — ‘एवं क्रमेण क्र मक वकासाय तावद्
आदौ अन्नमयकोषस्य वकासाय यत्नः कतव्यः’। सो चए क्य : भूखे पेट प्राणायाम नह सधता, थके-अस्वस्थ प्राण से
मन एकाग्र नह होता, अशान्त मन से बु द्ध नणय नह ले पाती, और बु द्ध क उलझन म आनन्द टकता नह ।
इसी लए भृगु को भी उत्तर इसी क्रम म मले — पहले अन्न, अन्त म आनन्द। पाठ का नाम ‘अन्नाद् आनन्दं प्र त’
इसी सीढ़ का नाम है।
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ध्यान द: ‘कोष’ का अथ है खोल / आवरण — जैसे तलवार का म्यान। पाँच कोष एक-दूसरे के भीतर ह, स्थूल से
सूक्ष्म क ओर; भीतर आत्मा है। इसी लए वरुण ने अन्त म कहा — ‘ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽ प परे अ स्त। एता न
ब्रह्मज्ञानाय द्वारा ण स न्त।’ ‘भ वतुम्’ = √भू + तुमुन्; ‘नैव’ = न + एव (वृ द्ध स न्ध)।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 101
प्रश्न १ — एकेन पदे न रक्तस्थानं पूरयत (उदाहरणम् — अन्नेन शरीरं वधते।)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.1 (क) …………… शरीरं वधते।
उत्तरम् — अन्नेन शरीरं वधते। ( हन्द — अन्न से शरीर बढ़ता है।)
क्य यही पद: पाठ म भृगु का वाक्य है — ‘अन्नेनैव शरीरं बलं च वधते’ (पृ. ९३)। ‘वधते’ क्रया अपने आप नह
होती, कसी साधन से होती है; और साधन के अथ म तृतीया आती है — «करणे तृतीया»। अन्न ही यहाँ करण है,
इस लए ‘अन्नेन’ (अन्न, नपुंसक लङ्ग, तृतीया, एकवचन)।
ध्यान द: पुस्तक म यह पहला उपभेद उदाहरण के साथ ही हल करके (लाल स्याही म ‘अन्नेन’) छापा गया है —
उदाहरण और (क) दोन एक ही वाक्य ह। इस लए असल म भरने के लए (ख) से (छ) तक छह रक्तस्थान बचते ह।
प्र.1 (ख) …………… शरीरं प्र त ष्ठतम्।
उत्तरम् — प्राणे शरीरं प्र त ष्ठतम्। ( हन्द — शरीर प्राण म टका हुआ है।)
क्य यही पद: पाठ का वाक्य ज्य का त्य यही है — ‘प्राणे शरीरं प्र त ष्ठतम्’ (पृ. ९४)। ‘प्र त ष्ठतम्’ का अथ है
‘ स्थत है, टका है’; और जस आधार पर कोई वस्तु टकती है, वह अ धकरण होता है — «अ धकरणे सप्तमी»।
इस लए ‘प्राणः’ का सप्तमी एकवचन रूप ‘प्राणे’ चा हए, ‘प्राणेन’ या ‘प्राणात्’ नह ।
तुलना क जए: (ख) म ‘प्राणे’ (सप्तमी — आधार), (ग) म ‘प्राणेन’ (तृतीया — वना के योग म), (घ) म ‘प्राणाद्’
(पञ्चमी — उत्प त्त का ोत)। एक ही शब्द तीन वभ क्तय म — यही इस प्रश्न क असली परीक्षा है।
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…………… वना शरीरं क्रयाशून्यं भव त।
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agl — प्राणेन वना शरीरं क्रयाशून्यं भव त। ( हन्द — प्राण के बना शरीर क्रयाहीन हो जाता है।)
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नयम पहले, प्रयोग बाद म: « वना, ऋते» — इन अव्यय के योग म द्वतीया, तृतीया अथवा पञ्चमी वभ क्त
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m‘प्राणेन वना शरीरं क्रयाशून्यं भव त’ (पृ. ९४) — इस लए
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होती है। पाठ म यही वाक्य तृतीया के साथ छपा है —
यहाँ ‘प्राणेन’ ही ल खए। भाव यह है क प्राणlaनकल जाने पर शरीर बचा तो रहता है, पर उसम कोई क्रया नह
होती।
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इसी पाठ से दूसरा उदाहरण: ‘बु द्धतत्त्वं वना अस्माकं बोधशक्तेः… वकासो न भव त’ (पृe.m
m a s ९६) — यहाँ ‘ वना’
के साथ .c
a gl का प्रश्न ३ (ज) इसी
o है। तीसरा रूप पञ्चमी होता है — ‘प्राणाद् वना’। तीन शुद्ध ह। अभ्यास
emक परीक्षा लेता है।
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…………… एव इमा न भूता न जायन्ते। .c
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उत्तरम् — प्राणाद् एव इमा न भूता न जायन्ते। ( हन्द — प्राण से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते ह।)
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m होते ह) के साथ जससे उत्प त्त हो, वह अपादान होता है — « ुवमपायेऽपादानम्», और «अपादाने
क्य यही पद: वरुण का वाक्य ज्य का त्य यही है — ‘प्राणाद् एव इमा न भूता न जायन्ते’ (पृ. ९४)। ‘जायन्ते’
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agl पञ्चमी»। ‘प्राणः’ का पञ्चमी एकवचन ‘प्राणात्’; ‘एव’ से पहले ‘त्’ का ‘द्’ हो जाता है (व्यञ्जनस न्ध) —
इस लए ‘प्राणाद् एव’।
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एक और स्वीकाय उत्तर: पृष्ठ १११ क
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इस लए ‘अन्नाद्’ भी अशुद्ध नहaहै। पर पाठ के संवाद म यही वाक्य ‘प्राणाद् एव’ के साथ आया है, और प्रश्न म
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‘खलु’ नह है — इस लए प्राणाद् ही सवा धक उपयुक्त उत्तर है। परीक्षा म उत्तर के आगे कोष्ठक म ‘(अन्नाद् अ प)’
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लख दे ना अच्छा रहता है।
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agl …………… समस्ता न इ न् या ण सञ्चाल्यन्ते।
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उत्तरम् — मनसा समस्ता न इ न् या ण सञ्चाल्यन्ते। ( हन्द — मन के द्वारा सारी इ न् याँ चलाई जाती ह।)
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दो कारण से तृतीया: (१) ‘सञ्चाल्यन्ते’ कमवाच्य क क्रया है (सम् + √चल् णच् + लट् + कमवाच्य), और
«कमवाच्ये कत र तृतीया» — कमवाच्य म कता तृतीया म आता है। चलाने वाला मन है, इस लए ‘मनसा’। (२) यही
रूप पाठ म छपा है — ‘समस्ता न इ न् या ण अ प मनसा सञ्चाल्यन्ते’ (पृ. ९५)।
रूप याद र खए: ‘मनस्’ नपुंसक लङ्ग सकारान्त शब्द है — प्रथमा/ द्वतीया ‘मनः’, तृतीया ‘मनसा’, चतुथ ‘मनसे’,
पञ्चमी/षष्ठी ‘मनसः’, सप्तमी ‘मन स’। पाठ म ये सभी रूप आए ह, इस लए इन्ह एक साथ याद कर ली जए।
प्र.1 (च) …………… वना बोधशक्तेः तकशक्तेश्च वकासो न भव त।
उत्तरम् — बु द्धतत्त्वं वना बोधशक्तेः तकशक्तेश्च वकासो न भव त। ( हन्द — बु द्धतत्त्व के बना बोध-श क्त और तक-श क्त
का वकास नह होता।)
क्य यही पद: पाठ म भृगु का वाक्य है — ‘बु द्धतत्त्वं वना अस्माकं बोधशक्तेः, तकशक्तेः, ववेकशक्तेः,
नणयशक्तेः, स्मृ तशक्तेश्च वकासो न भव त’ (पृ. ९६)। ‘ वना’ के योग म यहाँ द्वतीया प्रयुक्त है ( नयम वही जो
(ग) म — वना के साथ द्वतीया/तृतीया/पञ्चमी)। ‘बु द्धतत्त्वेन वना’ लखना भी शुद्ध है, पर पाठ का रूप
‘बु द्धतत्त्वं’ ही है।
जोड़कर प ढ़ए: ‘बोधशक्तेः … वकासः’ म सम्बन्धे षष्ठी है — ‘श क्त का वकास’। ‘तकशक्तेश्च’ = तकशक्तेः +
च ( वसगस न्ध — वसग का ‘श्’, क्य क आगे ‘च्’ है)।
प्र.1 (छ) …………… एव सवकमणः प्रवतकम्।
उत्तरम् — मनः एव सवकमणः प्रवतकम्। ( हन्द — मन ही सब कम का प्रवतक है।)
क्य यही पद: पाठ का वाक्य है — ‘अस्माकं मन एव सवकमणः प्रवतकम्’ (पृ. ९५)। यहाँ ‘प्रवतकम्’ वधेय-
वशेषण है और नपुंसक लङ्ग म है; इस लए कता भी नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन चा हए — ‘मनः’ ठ क बैठता है
(‘बु द्धः’ स्त्री लङ्ग है, इस लए वह नह चलेगा — तब ‘प्रव तका’ होना पड़ता)। यही लङ्ग- मलान इस रक्तस्थान क
कुंजी है।
स न्ध: लखते समय ‘मनः + एव’ क स न्ध होकर ‘मन एव’ बनता है ( वसगलोप — अकार के बाद वसग, आगे
स्वर)। पुस्तक ने वाक्य इसी स न्ध-रूप म छापा है। ‘सवकमणः’ — कमन् शब्द क षष्ठी एकवचन, सम्बन्धे षष्ठी।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 101
प्रश्न २ — अधो ल खतानां प्रश्नानां पूणवाक्येन उत्तरा ण लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.2 (क) भृगोः ज ासा क स्मन् वषये आसीत् ?
उत्तरम् — भृगोः ज ासा ब्रह्म वषये आसीत्।
( हन्द — भृगु क जज्ञासा ब्रह्म के वषय म थी।)
पाठ से प्रमाण: भृगु स्वयं कहता है — ‘भगवन्! ब्रह्म वषये म य का चद् ज ासा वतते। क तद् ब्रह्म येन सव
जग ददं सञ्चाल्यते?’ (पृ. ९२)। अथात् उसका प्रश्न यह था क वह ब्रह्म क्या है जससे यह सारा संसार चलाया जाता
है।
उत्तर क बनावट: प्रश्न म ‘क स्मन् वषये’ — सप्तमी है, इस लए उत्तर भी सप्तमी म ही आएगा — ‘ब्रह्म वषये’।
प्रश्न क वभ क्त ही उत्तर क वभ क्त तय करती है — यह नयम पूरे प्रश्न २ पर लागू होता है।
प्र.2 (ख) भृगुणा ब्रह्म ानाय कम् आच रतम् ?
उत्तरम् — भृगुणा ब्रह्म ानाय तपः आच रतम्। ( वस्तरेण — भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय पञ्चवारं वनं पवतं च गत्वा अनेकवषा ण कठोरं
तपः आच रतम्।)
( हन्द — भृगु ने ब्रह्मज्ञान के लए तप कया। — वस्तार से : भृगु ने ब्रह्मज्ञान के लए पाँच बार वन तथा पवत जाकर अनेक वष
तक कठोर तप कया।)
पाठ से प्रमाण: पता वरुण ने पहले ही कह दया था — ‘तपस्तप्यताम्। तपसैव ायते।’ इसके बाद हर बार वही
वाक्य लौटता है — ‘ततो भृगुः अनेकवषा ण तप आचर त’, ‘पुनः भृगुः पवतं गत्वा बहू न वषा ण तप आचर त’, ‘सः
पुनः बहुकालं यावद् वनं गत्वा तपश्चया कुरुते’। पूरे पाठ म यह पाँच बार दोहराया गया है।
व्याकरण: वाक्य कमवाच्य म है — इस लए कता ‘भृगुणा’ तृतीया म, कम ‘तपः’ प्रथमा म, और क्रया ‘आच रतम्’
कमपद के अनुसार नपुंसक लङ्ग एकवचन म। प्रश्न भी कमवाच्य म ही पूछा गया है (‘भृगुणा… कम् आच रतम्?’),
इस लए उत्तर भी उसी वाच्य म दे ना चा हए।
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प्र.2 (ग) भृगुः प्रथमं तपसा ब्रह्मरूपेण क ातवान् ?
उत्तरम् — भृगुः प्रथमं तपसा अन्नं ब्रह्मरूपेण ातवान् — ‘अन्नं वै ब्रह्म’ इ त।
( हन्द — भृगु ने पहले तप से अन्न को ब्रह्म के रूप म जाना — ‘अन्न ही ब्रह्म है’।)
पाठ से प्रमाण तथा तक: पहली बार तप करके लौटने पर भृगु कहता है — ‘भोः पतः! अन्नं वै ब्रह्म इ त’ (पृ.
९३)। उसके तीन कारण भी वह गनाता है — ‘अन्नाद् एव प्रा णनः जायन्ते। अन्नेन एव प्रा णनः जीव न्त। अन्नेनैव
शरीरं बलं च वधते।’ इसी उत्तर से पाठ का पहला कोष — अन्नमयकोषः — खुलता है।
शब्द पर ध्यान: ‘वै’ अव्यय है और नश्चय/बल के अथ म आता है — ‘ नश्चय ही’। पाठ के पाँच उत्तर इसी साँचे म
ह : अन्नं वै ब्रह्म, प्राणो वै ब्रह्म, मनो वै ब्रह्म, वज्ञानं वै ब्रह्म, आनन्दो वै ब्रह्म — यह आवृ त्त उप नषद् क अपनी शैली
है।
प्र.2 (घ) मनसः के जायन्ते ?
उत्तरम् — मनसः सङ् कल्पाः, भावाः, वचाराश्च जायन्ते।
( हन्द — मन से संकल्प, भाव और वचार उत्पन्न होते ह।)
पाठ से प्रमाण: भृगु का वाक्य ज्य का त्य यही है — ‘मनसः सङ् कल्पाः, भावाः, वचाराश्च जायन्ते’ (पृ. ९५)।
यही उसका तीसरा तक है जससे वह ‘मनो वै ब्रह्म’ पर पहुँचता है — जो सब सोच- वचार का ोत है, वही सबसे
बड़ा है।
व्याकरण: प्रश्न म ‘के’ — पुं लङ्ग प्रथमा बहुवचन है, इस लए उत्तर भी बहुवचन म तीन कता दे कर ही पूरा होगा;
एक शब्द से उत्तर अधूरा रहेगा। ‘मनसः’ यहाँ अपादान पञ्चमी है ( जससे उत्प त्त हो)। ‘ वचाराश्च’ = वचाराः + च
( वसगस न्ध — वसग का ‘श्’)।
प्र.2 (ङ) प्रा णनः कस्मात् जायन्ते ?
उत्तरम् — प्रा णनः अन्नात् जायन्ते। (पाठस्य वाक्यम् — ‘अन्नाद् एव प्रा णनः जायन्ते।’)
( हन्द — प्राणी अन्न से उत्पन्न होते ह।)
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पाठ से प्रमाण: ‘हे पतः! अन्नाद् एव प्रा णनः जायन्ते। अन्नेन एव प्रा णनः जीव न्त’ (पृ. ९३); और पृष्ठ १११ का
उप नषद्वचन भी यही दोहराता है — ‘अन्नादे व खलु इमा न भूता न जायन्ते। अन्नेन जाता न जीव न्त।’
वभ क्त का मलान: प्रश्न ‘कस्मात्’ — पञ्चमी एकवचन म है, इस लए उत्तर भी पञ्चमी म — ‘अन्नात्’। य द
प्रश्न ‘केन जीव न्त?’ होता तो उत्तर तृतीया म ‘अन्नेन’ होता। दोन वाक्य पाठ म साथ-साथ छपे ह — तुलना क जए
और अन्तर पक ड़ए।
प्र.2 (च) इ न् या ण केन सञ्चाल्यन्ते ?
उत्तरम् — इ न् या ण मनसा सञ्चाल्यन्ते।
( हन्द — इ न् याँ मन के द्वारा चलाई जाती ह।)
पाठ से प्रमाण तथा नयम: ‘समस्ता न इ न् या ण अ प मनसा सञ्चाल्यन्ते’ (पृ. ९५)। वाक्य कमवाच्य म है —
इस लए कम ‘इ न् या ण’ प्रथमा म, कता ‘मनः’ तृतीया म («कमवाच्ये कत र तृतीया»), और क्रया कमपद के
अनुसार बहुवचन म। इसी उदाहरण को पृष्ठ १०५ के वाच्य-बक्से म भी रखा गया है — ‘मनः सवा ण इ न् या ण
सञ्चालय त’ (कतृवाच्य) = ‘मनसा सवा ण इ न् या ण सञ्चाल्यन्ते’ (कमवाच्य)।
भाव भी सम झए: आँख दे खती है, कान सुनते ह — पर मन कह और हो तो न दखता है, न सुनाई दे ता है।
इसी लए भृगु कहता है क इ न् याँ स्वतन्त्र नह , मन से चलाई जाती ह — इसी लए क्रया कमवाच्य म है।
प्र.2 (छ) शरीरं कुत्र प्र त ष्ठतम् अ स्त ?
उत्तरम् — शरीरं प्राणे प्र त ष्ठतम् अ स्त।
( हन्द — शरीर प्राण म टका हुआ है।)
पाठ से प्रमाण: भृगु का वाक्य — ‘प्राणो ह भूतानाम् आयुः। प्राणे शरीरं प्र त ष्ठतम्’ (पृ. ९४); यही वाक्य पृष्ठ
१११ के उप नषद्वचन ४ म भी दोहराया गया है। भाव यह है क शरीर आधेय है और प्राण आधार — प्राण नकलते
ही शरीर ‘ क्रयाशून्यं भव त’।
व्याकरण: प्रश्न ‘कुत्र’ (कहाँ) — इसका उत्तर सदा सप्तमी म या स्थानवाचक अव्यय म आता है, इस लए ‘प्राणे’ ही
ठ क है। «आधारोऽ धकरणम्» तथा «अ धकरणे सप्तमी» — यही नयम यहाँ लगा है।
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केन वना स्मृ तशक्ते वकासो न भव त ?
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प्र.2 (ज)
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agl — बु द्धतत्त्वेन वना स्मृ तशक्तेः वकासो न भव त।
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( हन्द — बु द्धतत्त्व के बना स्मृ त-श क्त का वकास नह होता।)
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पाठ से प्रमाण: ‘बु द्धतत्त्वं वना अस्माकं बोधशक्तेःm
a s e , तकशक्तेः, ववेकशक्तेः, नणयशक्तेः, स्मृ तशक्तेश्च वकासो
agवl है जो पाँच श क्तय — बोध, तक, ववेक, नणय तथा स्मृ त — को
न भव त’ (पृ. ९६)। अथात् बु द्ध ही वह तत्त्
बढ़ाती है।
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वभ क्त क्य बदली: पाठ म ‘बु द्धतत्त्वं वना’ ( द्वतीया) है, पर प्रश्न म ‘केन वना’ — तृतीया है; इस लए उत्तर
g — तीन चलती ह,
.c म ‘बु द्धतत्त्वेन वना’ दे ना चा हए। ‘ वना’ के साथ द्वतीया, तृतीया औरaपञ्चमी
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seलए दोन रूप शुद्ध ह; पर प्रश्न से मेल खाता रूप ही सव त्तम उत्तर होता है।
भी तृतीया
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भृगुः तपसा केषां महत्त्वं ातवान् ?
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उत्तरम् — भृगुः तपसा अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, व ानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ातवान् — अथात् सः पञ्चानां कोषाणां
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महत्त्वं ातवान्।
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.c भृगु ने तप से अन्न, प्राण, मन, वज्ञान और आनन्द का — अथात् पाँच कोष aकाg— महत्त्व जाना।)
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( हन्द —
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a पाठ से प्रमाण: संवाद के अन्त म वरुण स्वयं यह गनाते ह — ‘हे पुत्र! त्वं तपसा सूक्ष्म वज्ञानेन च अन्नस्य, प्राणस्य,
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m व ानमय तथा आनन्दमय कोष कहलाए ह। a
मनसः, व ानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ातवान्। एतैः पञ्च भरेव अस्माकं पूण वकासो भव त’ (पृ. ९७)। यही
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पाँच ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ म अन्नमय, प्राणमय,
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व्याकरण: प्रश्न ‘केषां’ — षष्ठीaबहुवचन है, इस लए उत्तर म सारे नाम षष्ठी म आएँगे और अन्त म ‘च’ लगेगा।
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‘महत्त्वम्’ के साथ सदा सम्बन्धे षष्ठी ही आती है — ‘अन्नस्य महत्त्वम्’, न क ‘अन्नं महत्त्वम्’।
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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 102
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प्रश्न ३ — उदाहरणं दृष्ट् वा ‘ क सत्यं कम् असत्यम्’ इ त रक्तस्थाने पूरयत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.3 (क) प्रस्तुते पाठे पतापुत्रयोः संवादः अ स्त — ………
उत्तरम् — सत्यम्। (यह वाक्य पुस्तक म उदाहरण के रूप म स्वयं भरा हुआ है।)
क्य सत्य: पूरा पाठ आद्योपान्त दो व्य क्तय क बातचीत है — बाईं ओर ‘भृगुः’ और ‘वरुणः’ लखा है और उनके
आगे उनका कथन। और ये दोन पता-पुत्र ही ह : पहले ही वाक्य म लखा है — ‘वरुणस्य पुत्रः भृगुः स वनयं पतरं
प्र त गत्वा नवेदय त’ (पृ. ९२)। इसके अ त रक्त पाठ-प रचय भी कहता है — ‘अ स्मन् पाठे वयम् पतापुत्रयोः
भृगुवरुणयोः संवादं प ठष्यामः।’
व्याकरण: ‘ पतापुत्रयोः’ — द्वन्द्व समास ( पता च पुत्रश्च = पतापुत्रौ), षष्ठी द्ववचन। ‘संवादः’ के साथ बोलने वाले
सदा षष्ठी म आते ह — ‘ पतापुत्रयोः संवादः’, ‘भृगुवरुणयोः संवादः’।
प्र.3 (ख) अ स्मन् संवादे अन्नस्य महत्त्वं व णतम् — ………
उत्तरम् — सत्यम्।
क्य सत्य: संवाद का पहला पूरा सोपान अन्न पर ही है। भृगु कहता है ‘अन्नं वै ब्रह्म’ और वरुण उसका समथन करते
हुए कहते ह — ‘अन्नं ह भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात् सव षधम् इ त उच्यते। अतः कदा प अन्नं न नन्द्यात्… प्रयत्नेन
अन्नं बहु कुव त’ (पृ. ९३)। साथ ही महाभारत का ोक ‘आहारात् सवभूता न सम्भव न्त महीपते’ भी यह उद्धत है।
इससे बढ़कर अन्न-म हमा का वणन और क्या होगा।
जोड़ ली जए: पाठ का नाम ही ‘अन्नाद् आनन्दं प्र त’ है — यात्रा का आरम्भ ही अन्न से होता है। और पृष्ठ ९३ के
चत्र म अन्न से मलने वाले आठ फल भी लखे ह — आयुः, प्रज्ञा, मेधा, तेजः, बलम्, ओजः, आरोग्यम्, स्मृ तः।
प्र.3 (ग) प्रा णनः मनसः जायन्ते इ त कथनम् — ………
उत्तरम् — असत्यम्। शुद्धं कथनम् — प्रा णनः अन्नात् (प्राणाद् वा) जायन्ते।
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क्य असत्य: पाठ म उत्प त्त के दो ही ोत बताए गए ह — ‘अन्नाद् एव प्रा णनः जायन्ते’ (पृ. ९३) तथा ‘प्राणाद्
एव इमा न भूता न जायन्ते’ (पृ. ९४)। मन के वषय म जो कहा गया है वह उत्प त्त नह , सञ्चालन तथा संकल्प-
भाव- वचार क उत्प त्त है — ‘मनसः सङ् कल्पाः, भावाः, वचाराश्च जायन्ते’। अथात् मन से वचार उपजते ह, प्राणी
नह । दोन को मलाना ही इस कथन क भूल है।
परीक्षा क यु क्त: ऐसे प्रश्न म पाठ का ठ क वही वाक्य खो जए और दोन म केवल एक शब्द का अन्तर पक ड़ए।
यहाँ अन्तर ‘मनसः’ बनाम ‘अन्नात्/प्राणात्’ का है, बाक वाक्य ज्य का त्य है — ऐसे ही प्रश्न सबसे अ धक धोखा
दे ते ह।
प्र.3 (घ) अन्नेन शरीरं वधते इ त — ………
उत्तरम् — सत्यम्।
क्य सत्य: पाठ का वाक्य है — ‘अन्नेनैव शरीरं बलं च वधते’ (पृ. ९३), और यही वाक्य अभ्यास के प्रश्न १ का
उदाहरण भी है — ‘अन्नेन शरीरं वधते’। महाभारत का उद्धत ोक भी यही कहता है — ‘आहारेण ववधन्ते तेन
जीव न्त जन्तवः’।
एक बारीक : पाठ म क्रया ‘वध◌ेते’ ( द्ववचन) है क्य क वहाँ दो कता ह — शरीरं और बलं। अभ्यास के इस वाक्य
म केवल एक कता ‘शरीरम्’ है, इस लए क्रया ‘वधते’ एकवचन म है। कता बदलने पर क्रया का वचन बदलता है —
यही कतृवाच्य का नयम है।
प्र.3 (ङ) मनः सार थरूपेण अस्मान् कम ण प्रवतय त — ………
उत्तरम् — असत्यम्। शुद्धं कथनम् — बु द्धरेव सार थरूपेण अस्मान् कम ण प्रवतय त।
क्य असत्य: यह वाक्य पाठ म है अवश्य, पर ‘मनः’ के स्थान पर ‘बु द्धः’ के साथ — ‘बु द्धरेव सार थरूपेण
अस्मान् कम ण प्रवतय त’ (पृ. ९६), और यह भृगु के वज्ञानमयकोष वाले उत्तर का अंश है, मनोमयकोष का नह ।
मन के वषय म पाठ कहता है — ‘मन एव सवकमणः प्रवतकम्’ तथा ‘समस्ता न इ न् या ण मनसा सञ्चाल्यन्ते’।
अथात् मन प्रेरणा दे ता है, पर सार थ बु द्ध है — वही दशा तय करती है।
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रूपक सम झए: कठोप नषद् का प्र सद्ध रूपक है — शरीर रथ, इ न् याँ घोड़े, मन लगाम, बु द्ध सार थ और
आत्मा रथी। घोड़े दौड़ते ह, लगाम उन्ह थामती है, पर रथ कधर जाएगा — यह सार थ तय करता है। इसी लए मन
को सार थ कहना रूपक को ही उलट दे ना है।
प्र.3 (च) भृगुः वरुणस्य पुत्रोऽ स्त — ………
उत्तरम् — सत्यम्।
क्य सत्य: पाठ के पहले ही कोष्ठक-वाक्य म लखा है — ‘(एकदा ब्रह्मज्ञानाय तत्परः वरुणस्य पुत्रः भृगुः स वनयं
पतरं प्र त गत्वा नवेदय त)’ (पृ. ९२)। इसके अ त रक्त पूरे संवाद म वरुण भृगु को ‘पुत्र!’, ‘वत्स!’ कहते ह और
भृगु उन्ह ‘ पतः!’, ‘तात!’, ‘भगवन्!’, ‘श्रीमन्!’ कहकर सम्बो धत करता है — यही सम्बन्ध का सबसे स्पष्ट प्रमाण
है।
स न्ध: ‘पुत्रोऽ स्त’ = पुत्रः + अ स्त → वसग का ‘उ’, फर अ + उ = ओ (उत्वम्), और आगे के ‘अ’ का लोप
अवग्रह (ऽ) से दखाया जाता है — यही वसगस न्ध का सबसे आम रूप है।
प्र.3 (छ) भृगुः तपसा मनो ब्रह्मरूपेण ातवान् — ………
उत्तरम् — सत्यम्।
क्य सत्य: तीसरी बार तप करके लौटने पर भृगु स्वयं कहता है — ‘हे तात! मया तपसा मनो वै ब्रह्म इ त ातम्’
(पृ. ९५)। और वरुण उसका अनुमोदन भी करते ह — ‘हे वत्स! त्वया सम्यग् अनुभूतं यद् मन एव सव म त।’ इस लए
कथन सत्य है।
पूरा क्रम याद र खए: भृगु ने क्रमशः पाँच उत्तर पाए — अन्नं → प्राणः → मनः → वज्ञानम् → आनन्दः। ‘मनः’
बीच का, अथात् तीसरा उत्तर है। परीक्षा म यह क्रम पूछा जाना बहुत सामान्य है, इस लए इसे उँ ग लय पर गनकर
याद कर ली जए।
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प्र.3 (ज) वना योगे तृतीया वभ क्तभव त — ………
उत्तरम् — सत्यम्। (परन्तु पूणः नयमः इत्थम् — वना-योगे द्वतीया, तृतीया, पञ्चमी — इ त त ः वभक्तयः भ वतुम् अह न्त।)
नयम पहले: « वना, ऋते» — इन अव्यय के योग म द्वतीया, तृतीया अथवा पञ्चमी वभ क्त होती है। अतः ‘ वना
के योग म तृतीया होती है’ — यह कथन सत्य है, बस अधूरा है : तृतीया के साथ अन्य दो भी शुद्ध ह।
वभ क्तः उदाहरणम् कहाँ से
ततृ ीया पाणेन िवना शरीरं ि याशून्यं भवित।
क्र पाठ, पृष्ठ ९४
ि तीया बुिद्धतत्त्वं िवना… िवकासो न भवित। पाठ, पृष्ठ ९६
पञ्चमी ज्ञ ानाद् िवना मुिक्तः न भवित। नयम का तीसरा रूप
दे खए कैसे पाठ स्वयं दोन रूप दे ता है: एक ही पाठ म ‘प्राणेन वना’ (तृतीया) और ‘बु द्धतत्त्वं वना’ ( द्वतीया)
— दोन छपे ह। इस लए उत्तर म ‘सत्यम्’ लखकर एक पं क्त म यह जोड़ दे ना सबसे अच्छा उत्तर है क तीन
वभ क्तयाँ चलती ह।
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प्रश्न ४ — क्रयापदे न सह समु चतं पदं योजयत (मेलनम्)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.4 क्रयापदे न सह समु चतं पदं योजयत — (क) प्रा णनः · (ख) शरीरम् · (ग) तपः · (घ) पतरं · (ङ) यत्नः ॥ १.
क्रयताम् · २. कुरुताम् · ३. जायन्ते · ४. वधते · ५. ब्रूते
उत्तरम् — मेलनम् एवम् अ स्त :
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त
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पदम् क्रयापदम् पूण वाक्यम् मेलनस्य कारणम् ( नयमः)
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३. जायन्ते अन्नाद् एव प्रा णनः
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‘प्रा णनः’ प्रथमा बहुवचन है, इस लए क्रया भी बहुवचन चा हए — « क्रया
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पािणनः जायन्ते। कतृपदानुसा रणी भव त»। (पाठ, पृ. ९३)
a(ख)gl ४. वध ते अन्नेन शरीरं वधते। ‘शरीरम्’ नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन — इस लए क्रया भी एकवचन। (प्रश्न १ का
शरीरम् उदाहरण)
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(ग) तपः २. कु रुताम् तपः कुरुताम्।
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वरुण का आदे श — ‘तपः कुरुताम्’ (पृ. ९३, ९४)। ‘तपः’ यहाँ कम है और ag
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‘कुरुताम्’ लोट् -लकार आत्मनेपद।
(घ) ५. बतू े भृगुः पतरं ब्रूते।
a ‘ब्रूते’ (कहता है) सकमक है और ‘ पतरम्’ द्वतीया म — «कम ण द्वतीया»। शेष
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िपतरं चार क्रयाओं के साथ द्वतीया नह बैठती।
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com agl एकवचन ‘ क्रयताम्’।
(ङ) यत्नः १. ि यताम् त्वया यत्नः पाठ का वाक्य — ‘यत्नः अभ्यासश्च क्रयेताम्’ (पृ. ९२)। वहाँ दो कता थे इस लए
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क्रयताम्। द्ववचन ‘ क्रयेताम्’; यहाँ अकेला ‘यत्नः’ है इस लए
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मेलन कैसे क जए — तीन कसौ टयाँ: (१) वचन मलाइए — ‘प्रा णनः’ बहुवचन है तो ‘जायन्ते’ ही चलेगा,
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‘वधते’ नह । (२) वभ क्त दे खए — ‘ पतरम्’ द्वतीया म है, इस लए उसे कम लेने वाली क्रया ‘ब्रूते’ ही मलेगी;
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प्रथमा वाले पद (प्रा णनः, शरीरम्, यत्नः) कता ह। (३) पाठ का वाक्य याद क जए — ‘तपः कुरुताम्’ और ‘यत्नः
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क्रयताम्’ दोन पाठ म ज्य के त्य ह। तीन कसौ टयाँ मलकर उत्तर एक ही नकालती ह।
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ध्यान द: ‘ क्रयताम्’ तथा ‘कुरुताम्’ — दोन √कृ के लोट् -लकार के रूप ह, पर वाच्य अलग है। ‘ क्रयताम्’
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कमवाच्य का रूप है (‘ कया जाए’ — इस लए कता तृतीया म : त्वया), और ‘कुरुताम्’ कतृवाच्य आत्मनेपद का
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रूप है (‘कर’ — आदराथ)। यही अन्तर पृष्ठ १०५ क वाच्य-ता लका म भी दखाया गया है।
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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 102
प्रश्न ५ — अव शष्ट-धातुरूपा ण पूरयत (दत्तं पदम् — वतते.)co a g l
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अभ्यासाद् जायते स द्धः
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अव शष्ट-धातुरूपा ण पूरयत — एकवचनम् / द्ववचनम् / बहुवचनम् (प्रथमं पदं दत्तम् — ‘वतते’)।
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उत्तरम् — दत्तं पदं ‘वतते’ अ स्त; इदं √वृत् धातोः लट् -लकारस्य आत्मनेप द प्रथमपुरुषैकवचनम् रूपम्। अतः ता लका एवं
पूयते :
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√वृत् (वतते) — लट् -लकारः, आत्मनेपदम्
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमपुरुषः वतते वतते वतन्ते
मध्यमपुरुषः वतसे वतथे वतध् वे
उत्तमपुरुषः वत वत वहे वत महे
रूप कैसे बने — नयम: आत्मनेपद के लट् -लकार के नौ प्रत्यय ये ह — ते, इते (एते), अन्ते; से, इथे (एथे), ध्वे;
ए, आवहे, आमहे। धातु √वृत् गुण होकर ‘वत्’ बनता है और शप् (अ) लगकर अङ्ग ‘वत’ हो जाता है; उसी म ऊपर
के नौ प्रत्यय जोड़ द जए — वतते, वतते, वतन्ते; वतसे, वतथे, वतध्वे; वत, वतावहे, वतामहे। इसी साँचे पर पाठ के
सारे आत्मनेपद पद चलते ह — लभते, सेवते, यतते, मोदते…
पाठ से जो ड़ए: ‘वतते’ पाठ के पहले ही वाक्य म आया है — ‘ब्रह्म वषये म य का चद् जज्ञासा वतते’ (पृ. ९२)।
यहाँ इसका अथ है ‘है / वद्यमान है’। इसी धातु से ‘प्रवतकम्’, ‘प्रवतय त’ तथा ‘प रवतयत’ जैसे पद भी बने ह जो
इसी पाठ म आगे मलते ह।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 103
प्रश्न ६ — एता न पदा न लट् -लकारस्य त्रषु पुरुषेषु रूपा ण पठत लखत च
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.6 एता न पदा न लट् -लकारस्य त्रषु पुरुषेषु रूपा ण पठत लखत च — लभते, जायते, भाषते, वद्यते, मोदते, सेवते,
सहते, शोभते, यतते, वधते, मन्यते, द्योतते, रोचते, कम्पते, याचते, सहते, स्पधते, लज्जते, क्षीयते।
पहले नयम — फर ता लका। ये उन्नीस पद आत्मनेपद धातुओं के लट् -लकार (वतमान काल) के प्रथमपुरुष-एकवचन के रूप
ह। लट् -लकार आत्मनेपद के नौ प्रत्यय ये ह —
पथमपुरु षः — ते · इते (एते ) · अन्ते
मध्यमपुरु षः — से · इथे (एथे ) · ध्वे
उत्तमपुरु षः — ए · आवहे · आमहे
दए गए पद म से अ न्तम ‘ते’ हटाइए — जो बचता है वही अङ्ग है (लभते → लभ, वधते → वध, क्षीयते → क्षीय)। उसी अङ्ग म
ऊपर के नौ प्रत्यय जोड़ द जए। नीचे पूरी ता लका है :
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
पदम् धातुः अथः प्रथमपुरुषः मध्यमपुरुषः उत्तमपुरुषः
एक. द्व. बहु. एक. द्व. बहु. एक. द्व. बहु.
लभते √लभ् पाना लभते लभेते लभन्ते लभसे लभेथे लभध्वे लभे लभावहे लभामहे
जायते √जन् उत्पन्न जायते जायेते जायन्ते जायसे जायेथे जायध्वे जाये जायावहे जायामहे
( दवा द, होना
आ.)
भाषते √भाष् बोलना भाषते भाषेते भाषन्ते भाषसे भाषेथे भाषध्वे भाषे भाषावहे भाषामहे
िवद्यते √ वद् होना, िवद्यते िवद्येते िवद्यन्ते वद्यसे वद्येथे वद्यध्वे वद्ये वद्यावहे वद्यामहे
( दवा द, वद्यमान
आ.) रहना
मोदते √मुद ् प्रसन्न मोदते मोदेते मोदन्ते मोदसे मोदे थे मोदध्वे मोदे मोदावहे मोदामहे
होना
सेवते √सेव् सेवा सेवते सेवेते सेवन्ते सेवसे सेवेथे सेवध्वे सेवे सेवावहे सेवामहे
करना
सहते √सह् सहना सहते सहेते सहन्ते सहसे सहेथे सहध्वे सहे सहावहे सहामहे
शोभते √शुभ् शोभा शोभते शोभेते शोभन्ते शोभसे शोभेथे शोभध्वे शोभे शोभावहे शोभामहे
पाना
यतते √यत् प्रयत्न यतते यतेते यतन्ते यतसे यतेथे यतध्वे यते यतावहे यतामहे
करना
वधते √वृध् बढ़ना वधते वधते वधन्ते वधसे वधथे वधध्वे वध वधावहे वधामहे
मन्यते √मन् मानना मन्यते मन्येते मन्यन्ते मन्यसे मन्येथे मन्यध्वे मन्ये मन्यावहे मन्यामहे
( दवा द,
आ.)
द्योतते √द्युत् चमकना द्य ोतते द्य ोतेते द्य ोतन्ते द्योतसे द्योतेथे द्योतध्वे द्योते द्योतावहे द्योतामहे
रोचते √रुच् अच्छा रोचते रोचेते रोचन्ते रोचसे रोचेथे रोचध्वे रोचे रोचावहे रोचामहे
लगना
कम्पते √कम्प् काँपना कम्पते कम्पेते कम्पन्ते कम्पसे कम्पेथे कम्पध्वे कम्पे कम्पावहे कम्पामहे
याचते √याच् माँगना याचते याचेते याचन्ते याचसे याचेथे याचध्वे याचे याचावहे याचामहे
सहते √सह् सहना सहते सहेते सहन्ते सहसे सहेथे सहध्वे सहे सहावहे सहामहे
(पुनरुक्तम्)
स्पधते √स्पध् स्पधा पधते
स् स्पधते पधन्ते
स् स्पधसे स्पधथे स्पधध्वे स्पध स्पधावहे स्पधामहे
करना
लज्जते √लज्ज् लजाना लज्जते लज्जेते लज्जन्ते लज्जसे लज्जेथे लज्जध्वे लज्जे लज्जावहे लज्जामहे
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
क्षीयते √ क्ष क्षीण क्ष ीयते क्ष ीयेते क्ष ीयन्ते क्षीयसे क्षीयेथे क्षीयध्वे क्षीये क्षीयावहे क्षीयामहे
( दवा द, होना
आ.)
ध्यान दे ने योग्य चार बात: (१) जायते, वद्यते, मन्यते, क्षीयते — ये चार दवा दगण के ह, इस लए इनम ‘य’
पहले से जुड़ा है (जन् + य + ते = जायते); उनका अङ्ग ‘जाय्, वद्य्, मन्य्, क्षीय्’ मानकर च लए। (२) वधते म √वृध्
का गुण होकर ‘वध’ बना (ऋ → अर्)। (३) शोभते म √शुभ् का गुण होकर ‘शोभ’ बना (उ → ओ), और मोदते,
द्योतते, रोचते म भी यही गुण हुआ है (मुद ् → मोद, द्युत् → द्योत, रुच् → रोच)। (४) एक बार अङ्ग नकल जाए तो
आगे सब धातुओं म प्रत्यय बलकुल एक-से लगते ह — यही आत्मनेपद क सु वधा है।
पुस्तक क सूची म एक छोट बात: ‘सहते’ इस सूची म दो बार छपा है (सातव और सोलहव स्थान पर) —
इस लए वास्तव म पद उन्नीस ह पर भन्न धातुएँ अठारह ही ह। दुहराव मानकर एक ही बार अभ्यास कर ली जए।
वाक्य बनाकर याद क जए (प रयोजना-काय ३ म यही माँगा गया है): छात्रः वद्यां लभते। बालकाः उद्याने
मोदन्ते। वयं गुरुं सेवामहे। त्वं सत्यं भाषसे। अहं सत्कम ण यते। वृक्षाः वायुना कम्पन्ते। भक्षुकः धनं याचते।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 103
प्रश्न ७ — आत्मनेप दधातूनां लोट् -लकारे त्रषु पुरुषेषु अभ्यासं कुरुत लखत च (वन्द् तथा कृ आदशरूपेण दत्तौ)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.7 आत्मनेप दधातूनां लोट् -लकारे त्रषु पुरुषेषु अभ्यासं कुरुत लखत च — (पुस्तके ‘वन्द्-धातुः, लोट् -लकारः’ तथा
‘कृ-धातुः, लोट् -लकारः’ इ त द्वे आदशता लके दत्ते; अधः रक्तता लकयोः प्रथमपदे ‘१. मोदताम्’ तथा ‘२.
वधताम्’ इ त दत्ते।)
पहले पुस्तक क दोन आदश-ता लकाएँ दे खए — इन्ह के साँचे पर आगे का अभ्यास करना है :
पुरुषः वन्द्-धातुः, लोट् -लकारः कृ-धातुः, लोट् -लकारः
एक. द्व. बहु. एक. द्व. बहु.
पथमपुरुषः वन्दताम् वन्दे ताम् वन्दन्ताम् कुरुताम् कुवाताम् कुवताम्
मध्यमपुरुषः वन्दस्व वन्दे थाम् वन्दध्वम् कुरुष्व कुवाथाम् कुरुध्वम्
उत्तमपुरुषः वन्दै वन्दावहै वन्दामहै करवै करवावहै करवामहै
अब रक्त ता लकाओं क पू त —
√मुद ् (मोदताम्) — लोट् -लकारः, आत्मनेपदम्
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पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमपुरुषः मोदताम् मोदे ताम् मोद न्ताम्
मध्यमपुरुषः मोद स्व मोदे थाम् मोद ध् वम्
उत्तमपुरुषः मोदै मोदावहै मोदामहै
√वृध् (वधताम्) — लोट् -लकारः, आत्मनेपदम्
पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमपुरुषः वध ताम् वध ताम् वध न्ताम्
मध्यमपुरुषः वध स्व वध थाम् वध ध् वम्
उत्तमपुरुषः वध वध वहै वध महै
नयम — लोट् -लकार आत्मनेपद के नौ प्रत्यय: ताम् · एताम् · अन्ताम् / स्व · एथाम् · ध्वम् / ऐ · आवहै · आमहै।
ध्यान द जए, उत्तमपुरुष के तीन रूप ‘ऐ’ पर समाप्त होते ह — वन्दै , वन्दावहै, वन्दामहै; मोदै , मोदावहै, मोदामहै।
यह लोट् -लकार क सबसे बड़ी पहचान है, क्य क लट् म वही रूप ‘ए’ पर समाप्त होते ह (वन्दे , वन्दावहे, वन्दामहे)।
कृ-धातु अलग क्य दखता है: √कृ तना दगण का है, इस लए उसम ‘उ’ वकरण जुड़ता है और अङ्ग ‘कुरु/कुव्’
बनता है; उत्तमपुरुष म ‘करव-’ हो जाता है। इसी लए पुस्तक ने उसे अलग आदश के रूप म दया है — बाक सब
धातुएँ वन्द् के साँचे पर ही चलती ह।
अथ भी पक ड़ए: लोट् -लकार आज्ञा, प्राथना, आशीवाद तथा वनम्र नवेदन — चार म आता है। पाठ म वरुण के
मुख से यही रूप बार-बार नकलते ह — ‘अन्नं सदा ईश्वरबु ा सेवताम्’, ‘तपः कुरुताम्’, ‘इतोऽ प यतताम्’,
‘सवदा ईश्वरं सेवतां मोदतां च’ — यह आदे श नह , पता का स्नेहपूण नदश है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त
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प्रश्न ८ — एता न क्रयापदा न लोट् -लकारे त्रषु पुरुषेषु पठत लखत च
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अभ्यासाद् जायते स द्धः
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सहताम्, यतताम्, याचताम्, स्पधताम्, लज्जताम्, कुरुताम्।
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नयम — लोट् -लकार आत्मनेपद के नौ प्रत्यय: ताम् · एताम् · अन्ताम् / स्व · एथाम् · ध्वम् / ऐ · आवहै · आमहै। दए गए पद म
से ‘ताम्’ हटाइए, बचा हुआ अङ्ग ली जए (लभताम्
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पदम् धातुः अथः प्रथमपुरुषः मध्यमपुरुषः उत्तमपुरुषः
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एक. द्व. बहु. एक. द्व. बहु. एक. द्व. बहु.
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लभताम् √लभ् पाए / लभताम् लभेताम् लभन् ताम् लभस्व लभेथाम् लभध्वम् लभै लभावहै लभामहै
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सेवताम् √सेव् सेवा सेवताम् सेवेताम् सेवन् ताम् सेवस्व सेवेथाम् सेवध्वम् सेवै सेवावहै सेवामहै
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भाषताम् √भाष् बोले भाषताम् भाषेताम् भाष न् भाषस्व भाषेथाम् भाषध्वम् भाषै भाषावहै भाषामहै
िवद्यताम् √ वद् हो / िवद्यताम् िवद्येताम् िवद्यन् ताम् वद्यस्व वद्येथाम् वद्यध्वम् वद्यै वद्यावहै वद्यामहै
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सहताम् सहेताम् सहन् ताम्
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सहताम् √सह् सहे सहस्व सहेथाम् सहध्वम् सहै सहावहै सहामहै
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यतताम् √यत् प्रयत्न यतताम् यतेताम् यतन् ताम् यतस्व यतेथाम् यतध्वम् यतै यतावहै यतामहै
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याचताम् √याच् माँगे याचताम् याचेताम् याचन् ताम् याचस्व याचेथाम् याचध्वम् याचै याचावहै याचामहै
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पध ताम् पध ताम् पध न् ताम्
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स्पधताम् √स्पध् स्पधा स् स् स् स्पधस्व स्पधथाम् स्पधध्वम् स्पध स्पधावहै स्पधामहै
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लज्जताम् √लज्ज् लजाए
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लज्जताम् ज् लज्ज न् ताम् लज्जस्व लज्जेथाम् लज्जध्वम् लज्जै लज्जावहै लज्जामहै
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कु रुताम् √कृ करे कु रुताम् कु व ताम् कु वताम् कुरुष्व कुवाथाम् कुरुध्वम् करवै करवावहै करवामहै
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
* ‘जयताम्’ के वषय म — यह पद शेष दस से भन्न है। पुस्तक म यह ‘जयताम्’ छपा है, जो √ ज (जीतना),
भ्वा दगण, परस्मैपद का लोट् -लकार प्रथमपुरुष- द्ववचन रूप है (जयतु · जयताम् · जयन्तु) — इसी लए ऊपर क
पं क्त म उसके परस्मैपद रूप दए गए ह। कन्तु सूची के बाक सब पद प्रश्न ६ क आत्मनेपद सूची के ही लोट् -रूप
ह (लभते → लभताम्, सेवते → सेवताम्, भाषते → भाषताम्…)। उस क्रम को दे खते हुए यहाँ ‘जायते’ का लोट् -
रूप ‘जायताम्’ अपे क्षत लगता है — उसके रूप ह गे : जायताम् · जायेताम् · जायन्ताम् / जायस्व · जायेथाम् ·
जायध्वम् / जायै · जायावहै · जायामहै। परीक्षा म दोन म से जो पूछा जाए, वही ल खए; और अपनी पुस्तक म
छपा रूप ध्यान से प ढ़ए।
लट् और लोट् का अन्तर एक पं क्त म: लट् बताता है — ‘वह सेवा करता है’ (सेवते); लोट् कहता है — ‘वह
सेवा करे / आप सेवा क जए’ (सेवताम्)। दोन ता लकाएँ साथ रखकर दे खए तो अन्तर केवल प्रत्यय का है :
ते→ताम्, से→स्व, ध्वे→ध्वम्, ए→ऐ। इतना पकड़ ली जए, पूरा लोट् -लकार अपने आप बन जाएगा।
कृ-धातु फर याद र खए: ‘कुरुताम्’ के रूप वन्द् के साँचे पर नह चलते — कुरुताम् · कुवाताम् · कुवताम् / कुरुष्व
· कुवाथाम् · कुरुध्वम् / करवै · करवावहै · करवामहै। ये रूप पुस्तक ने प्रश्न ७ क आदश-ता लका म स्वयं दे दए ह,
इस लए वह से ली जए।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 103–104
प्रश्न ९ — कतृपदानुसारं लोट् -लकारेण क्रयापदं प रवतयत (उदाहरणम् — सः अन्नं सदा ईश्वरबु ा सेवते। → भवान् सदा अन्नम् ईश्वरबु ा
सेवताम्।)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.9 (क) लट् -लकारः — बालकः अन्नस्य नन्दां न कुरुते। → लोट् -लकारः — भवान् ……………
उत्तरम् — भवान् अन्नस्य नन्दां न कुरुताम्।
( हन्द — आप अन्न क नन्दा न क जए।)
नयम पहले: ‘भवान्’ अथ म तो ‘आप’ है, पर संस्कृत म वह प्रथमपुरुष एकवचन ही माना जाता है (‘भवान्
गच्छ त’, ‘भवान् गच्छतु’)। अतः क्रया भी लोट् -लकार, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष, एकवचन चा हए — √कृ का वह
रूप है ‘कुरुताम्’। (यही रूप उदाहरण म भी है — ‘भवान् … सेवताम्।’)
पाठ से जो ड़ए: वरुण ने भी यही कहा था — ‘अतः कदा प अन्नं न नन्द्यात्’ (पृ. ९३)। वहाँ व ध लङ् था, यहाँ
लोट् है; अथ दोन का एक ही — ‘ नन्दा नह करनी चा हए’।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
प्र.9 (ख) लट् -लकारः — मम जीवने यशो वधते। → लोट् -लकारः — तव ……………
उत्तरम् — तव जीवने यशो वधताम्।
( हन्द — तुम्हारे जीवन म यश बढ़े । — यह आशीवाद-वाक्य है।)
कता कौन है — ध्यान द जए: इस वाक्य म कता ‘तव’ नह , ‘यशः’ है; ‘मम/तव’ तो केवल सम्बन्धे षष्ठी है (‘मेरे
जीवन म’, ‘तुम्हारे जीवन म’)। ‘यशः’ नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन है, इस लए क्रया प्रथमपुरुष एकवचन म —
√वृध् का लोट् रूप ‘वधताम्’। यही इस उपभेद क परीक्षा है : कता बदला ही नह , केवल लकार बदला।
भाव: लोट् -लकार केवल आज्ञा नह दे ता, आशीवाद भी दे ता है — ‘तव जीवने यशो वधताम्’, ‘शुभं भूयात्’, ‘ चरं
जीव’। इसी अथ म पाठ का ‘सवदा ईश्वरं सेवतां मोदतां च’ भी प ढ़ए।
प्र.9 (ग) लट् -लकारः — अहं बौ द्धक वकासाय सदा योगासनं कुव। → लोट् -लकारः — त्वं ……………
उत्तरम् — त्वं बौ द्धक वकासाय सदा योगासनं कुरुष्व।
( हन्द — तुम बौ द्धक वकास के लए सदा योगासन करो।)
नयम: कता ‘त्वम्’ है — अथात् मध्यमपुरुष, एकवचन। लोट् -लकार आत्मनेपद म मध्यमपुरुष-एकवचन का प्रत्यय
‘स्व’ है (वन्दस्व, सेवस्व, लभस्व)। √कृ का अङ्ग ‘कुरु’ है, इस लए रूप बनता है ‘कुरुष्व’ — यह रूप पुस्तक ने प्रश्न
७ क आदश-ता लका म स्वयं दया है।
ध्यान द: ‘कुव’ लट् -लकार का उत्तमपुरुष एकवचन है (‘म करता हूँ’)। कता ‘अहम्’ से ‘त्वम्’ हुआ, इस लए पुरुष
भी उत्तम से मध्यम हो गया — क्रया का पुरुष सदा कता के पुरुष के अनुसार बदलता है। यही पूरे प्रश्न ९ क कुंजी
है।
प्र.9 (घ) लट् -लकारः — रमेशः सवदा सत्यं भाषते। → लोट् -लकारः — दनेशः ……………
उत्तरम् — दनेशः सवदा सत्यं भाषताम्।
( हन्द — दनेश सदा सत्य बोले।)
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नयम: ‘ दनेशः’ प्रथमा एकवचन, प्रथमपुरुष का कता है। लोट् -लकार आत्मनेपद प्रथमपुरुष-एकवचन का प्रत्यय
‘ताम्’ है, अङ्ग ‘भाष’ — इस लए ‘भाषताम्’। कता का नाम बदला (रमेश → दनेश) पर पुरुष और वचन वही रहे,
इस लए केवल लकार बदलना है।
‘भाषताम्’ प्रश्न ८ क सूची म भी है — वहाँ इसके नौ रूप लखने को कहा गया है : भाषताम् · भाषेताम् ·
भाषन्ताम् / भाषस्व · भाषेथाम् · भाषध्वम् / भाषै · भाषावहै · भाषामहै।
प्र.9 (ङ) लट् -लकारः — छात्रः लक्ष्य स े कष्टं सहते। → लोट् -लकारः — अहं ……………
उत्तरम् — अहं लक्ष्य स ै कष्टं सहै।
( हन्द — म लक्ष्य क स द्ध के लए कष्ट सहूँ।)
नयम: कता ‘अहम्’ है — उत्तमपुरुष, एकवचन। लोट् -लकार आत्मनेपद म उत्तमपुरुष-एकवचन का प्रत्यय ‘ऐ’ है
(वन्दै , मोदै , लभै), इस लए √सह् का रूप बनता है ‘सहै’। ध्यान र खए — लट् म यह रूप ‘सहे’ होता, लोट् म ‘सहै’;
ए और ऐ का यही एक स्वर-भेद दोन लकार को अलग करता है।
पुस्तक क छपाई पर एक टप्पणी: पुस्तक म ‘लक्ष्य सद्धये’ छपा है। ‘ स द्ध’ स्त्री लङ्ग इकारान्त शब्द है और
उसक चतुथ एकवचन ‘ स ै’ होती है (जैसे मत्यै, बु ै); इस लए शुद्ध रूप ‘लक्ष्य स ै’ है — ‘लक्ष्य क
स द्ध के लए’ (सम्प्रदाने/ताद य चतुथ )। ऊपर उत्तर म शुद्ध रूप ही रखा गया है।
प्र.9 (च) लट् -लकारः — साधवः सवदा रमन्ते। → लोट् -लकारः — भवन्तः ……………
उत्तरम् — भवन्तः सवदा रमन्ताम्।
( हन्द — आप सब सदा प्रसन्न रह / आनन्द ल।)
नयम: ‘भवन्तः’ प्रथमा बहुवचन है और ‘भवत्’ शब्द प्रथमपुरुष का ही होता है। अतः क्रया लोट् -लकार,
आत्मनेपद, प्रथमपुरुष, बहुवचन चा हए; उसका प्रत्यय ‘अन्ताम्’ है — √रम् का अङ्ग ‘रम’, इस लए ‘रमन्ताम्’
(जैसे वन्दन्ताम्, मोदन्ताम्)।
तुलना क जए: लट् म ‘रमन्ते’, लोट् म ‘रमन्ताम्’ — प्रत्यय ‘अन्ते’ से ‘अन्ताम्’ हो गया। स्वाध्याय खण्ड क
वाक्य-ता लका म यही धातु मलती है — ‘बालकः उद्याने रमते / बालकाः उद्याने रमन्ते’ (पृ. १०८)।
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प्र.9 (छ) लट् -लकारः — भवान् योगेन आरोग्यं लभते। → लोट् -लकारः — अहं ……………
उत्तरम् — अहं योगेन आरोग्यं लभै।
( हन्द — म योग से आरोग्य पाऊँ / प्राप्त करूँ।)
नयम: कता ‘अहम्’ = उत्तमपुरुष एकवचन; लोट् आत्मनेपद का वह प्रत्यय ‘ऐ’ है — √लभ् + ऐ = ‘लभै’। ‘योगेन’
म करणे तृतीया है (योग के द्वारा), और ‘आरोग्यम्’ कम होने से द्वतीया म है।
पाठ से जो ड़ए: स्वाध्याय क वाक्य-ता लका म यही वाक्य आया है — ‘योगासनेन मानवः आरोग्यं लभते /
योगासनेन मानवाः आरोग्यं लभन्ते’ (पृ. १०९)। और वरुण का उपदे श भी यही था — ‘प्र त दनं ध्यानं योगासनं च
कतव्यम्।’
प्र.9 (ज) लट् -लकारः — रमा सदा सत्कम ण यतते। → लोट् -लकारः — लता ……………
उत्तरम् — लता सदा सत्कम ण यतताम्।
( हन्द — लता सदा सत्कम म प्रयत्न करे।)
नयम: ‘लता’ स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन है, पर क्रया का रूप लङ्ग से नह बदलता — वह केवल पुरुष तथा वचन
से बदलता है। इस लए प्रथमपुरुष एकवचन का लोट् -रूप ‘यतताम्’ ही आएगा, ठ क वैसे ही जैसे ‘ दनेशः भाषताम्’
म। यह बात वद्याथ अक्सर भूल जाते ह, इस लए इसे यह पकड़ ली जए।
व्याकरण: ‘सत्कम ण’ — कमन् शब्द क सप्तमी एकवचन (अ धकरणे सप्तमी)। ‘यतते’ धातु के साथ ‘म लगना,
के लए प्रयत्न करना’ अथ आता है। वरुण का उपदे श भी यही था — ‘मनः सदा सत्कमणा साधनीयम्।’
प्र.9 (झ) लट् -लकारः — भक्तः ईश्वरं वन्दते। → लोट् -लकारः — त्वं ……………
उत्तरम् — त्वम् ईश्वरं वन्दस्व।
( हन्द — तुम ईश्वर क वन्दना करो।)
नयम: कता ‘त्वम्’ = मध्यमपुरुष एकवचन; लोट् आत्मनेपद का वह प्रत्यय ‘स्व’ है — इस लए ‘वन्दस्व’। यह रूप
पुस्तक क अपनी आदश-ता लका (प्रश्न ७) म ज्य का त्य छपा है, इस लए उत्तर वह से मलाकर दे ख ली जए।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त
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स न्ध तथा वाक्य: लखते समय ‘त्वम् + ईश्वरम्’ म स न्ध करने पर ‘त्वमीश्वरं वन्दस्व’ भी लखा जा सकता है।
‘ईश्वरम्’ कम है, इस लए द्वतीया — «कम ण द्वतीया»। स्वाध्याय क ता लका म इसी धातु का पूeराm
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वाक्य-रूप दया
है — ‘भक्तः.cदे o
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वं वन्दते · भक्तौ दे वं वन्दे ते · भक्ताः दे वं वन्दन्ते’ (पृ. १०८)।
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व्याकरणम् — कतृ-कमवाच्य नयमः — पृष्ठ 104–105
पुस्तकस्य व्याकरणपे टका — नयमः तथा कतृवाच्य-कमवाच्ययोःm
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व्याकरणम् agl
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प्र.1 ‘कतृ-कमवाच्य नयमः’ इ त पे टकायां कः नयमः दत्तः ? उदाहरणेन सह स्पष्टीकुरुत — “कतृवाच्ये कत र प्रथमा
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.c कमपदानुसा रणी भव त।… कमवाच्यप्रयोगे क्रयापदा न आत्मनेपदयुक्aताgन भव न्त।”
वभ क्तः। कम ण द्वतीया वभ क्तः। क्रया कतृपदानुसा रणी भव त।… कमवाच्ये कम ण प्रथमा, कत र तृतीया,
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क्रया
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agउत्तर
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नयमः — पुस्तकस्य शब्दे षु :
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बन्दुः
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कतृवाच्यम्
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कत िकस िवभिक्त में पथमा (कतिर पथमा) ततृ ीया (कतिर ततृ ीया)
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कम िकस िवभिक्त में ि तीया (कम िण ि तीया) पथमा (कम िण पथमा)
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िक्रया िकसके अनुस ार ृ स ािरणी
कतपदानु कम
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agl पधान कौन कत (कतुः पाधान्यम्) कम (कम कारक स्य पाधान्यम्)
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धातु के अनुस ार — पर स्मैपद या आत्मनेपद सदा आत्मनेपदयुक्त
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पद (िक्रया का रूप)
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पुस्तक के अपने उदाहरण —
१. रामः गामं गच्छित। (कत ृवाच्यम्) → रामेण गामः गम्यते । (कमवाच्यम्)
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२. छात्राः िवद्यालयं गच्छिन्त। (कत ृवाच्यम्) → छात्रैः िवद्यालयः गम्यते । (कमवाच्यम्
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वाक्यम् कता कम क्रया कसके अनुसार
रामः ग ामं गच्छित रामः — पथमा ग्रामम् — द्वतीया ‘रामः’ एकवचन → ‘गच्छ त’ एकवचन
रामेण ग ामः गम्यते रामेण — ततृ ीया ग्रामः — प्रथमा ‘ग्रामः’ एकवचन → ‘गम्यते’ एकवचन,
आत्मनेपदयुक्त
छात्राः िवद्यालयं छात्राः — पथमा वद्यालयम् — द्वतीया कता बहुवचन → क्रया भी बहुवचन (गच्छ न्त)
गच्छिन्त बहवु चन
छात्रैः िवद्यालयः गम्यते छात्रैः — ततृ ीया वद्यालयः — प्रथमा कम एकवचन → क्रया भी एकवचन (गम्यते)
बहुवचन एकवचन
सबसे बड़ी बात यही है: चौथी पं क्त ध्यान से दे खए। कता ‘छात्रैः’ बहुवचन है, फर भी क्रया ‘गम्यते’ एकवचन म
है — क्य क कमवाच्य म क्रया कम के पीछे चलती है, कता के पीछे नह । पुस्तक इसी को य कहती है — ‘अत्र
कमपदम् ( वद्यालयः) एकवचने अ स्त, अतः क्रया प एकवचने भव त।’ यह वह एक बन्दु है जस पर परीक्षा म
सबसे अ धक भूल होती है।
पाठ से जो ड़ए: संवाद के आरम्भ म ही कमवाच्य के तीन सुन्दर उदाहरण आए ह — ‘ क तद् ब्रह्म येन सव जग ददं
सञ्चाल्यते?’, ‘त्वया स्वयमेव अन्वेषणं क्रयताम्’, ‘यत्नः अभ्यासश्च क्रयेताम्’। तीन म कता तृतीया म है और
क्रया कम के अनुसार — दूसरे म एकवचन (अन्वेषणम्), तीसरे म द्ववचन (यत्नः + अभ्यासः)। पुस्तक का नयम
पाठ म जी वत रूप म मलता है।
प्र.2 ‘अधो ल खता न वाक्या न उ ैः पठत अवगच्छत च’ — पुस्तके दत्ता न कतृवाच्य-कमवाच्ययोः नव युगला न
व्याख्यात।
उत्तरम् — पुस्तके दत्ता न नव युगला न, प्रत्येकस्य प रवतनस्य कारणेन सह :
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क्रमः कतृवाच्यम् कमवाच्यम् क्या-क्या बदला
१ रामः पाठं पठित। रामेण पाठः पठ ते। रामः → रामेण (तृतीया); पाठम् → पाठः (प्रथमा); पठ त →
पठ्यते (कम एकवचन के अनुसार)
२ छात्राः िवद्यालयं गच्छिन्त। छात्रैः िवद्य ालयः गम्यते। कता बहुवचन तृतीया म; कम एकवचन प्रथमा म — इस लए
क्रया एकवचन
३ बािलकाः गीतं गायिन्त। बािलकािभः गीतं गीयते। बा लका भः तृतीया बहुवचन; ‘गीतम्’ नपुंसक लङ्ग एकवचन
— इस लए ‘गीयते’ एकवचन
४ छात्रः श्लोकान् िलखित। छात्रेण श्लोकाः िल ख्यन्ते। यहाँ उल्टा है — कता एकवचन, पर कम ‘ ोकाः’ बहुवचन,
इस लए क्रया ‘ लख्यन्ते’ बहुवचन
५ माता पुत्र ौ पश्यित। मात्रा पुत्रौ दृ श्येते। कम ‘पुत्रौ’ द्ववचन है, इस लए क्रया भी द्ववचन ‘दृश्येते’;
√दृश् का कमवाच्य ‘दृश्य-’
६ मनः सव िण इिन्द यािण मनसा सव िण इिन्द यािण यह पाठ का ही वाक्य है (पृ. ९५)। कम ‘इ न् या ण’ बहुवचन
सञ्चालयित। स ञ्चाल्यन्ते। → क्रया बहुवचन
७ बह्मज्ञानाय त्वं स्वयमेव बह्मज्ञ ानाय त्वया स्वयमेव पाठ का वाक्य (पृ. ९२)। लोट् -लकार का कमवाच्य — ‘कुरु’
अन्वेषणं कु रु। अन्वेषणं ि यताम्।
क्र → ‘ क्रयताम्’
८ त्वं यत्नम् अभ्यासं च कु रु। त्वया यत्नः, अभ्यास श्च कम दो ह (यत्नः + अभ्यासः) इस लए क्रया द्ववचन —
ि येताम्।
क्र ‘ क्रयेताम्’
९ िशष्यः ग रु
ु ं से वते। िशष्येण गुरुः से व्यते। √सेव् वैसे भी आत्मनेपद है; कमवाच्य म उसका रूप ‘सेव्यते’
बनता है
तीन कदम म कमवाच्य बनाइए: (१) कता को तृतीया म कर द जए (रामः → रामेण, छात्राः → छात्रैः, बा लकाः
→ बा लका भः)। (२) कम को प्रथमा म कर द जए (पाठम् → पाठः, ोकान् → ोकाः)। (३) धातु म य
जोड़कर आत्मनेपद के प्रत्यय लगाइए और वचन कम के अनुसार र खए (पठ् + य + ते = पठ्यते; लख् + य + न्ते =
लख्यन्ते)। पुस्तक स्वयं यही नष्कष लखती है — ‘अत्र सवषु उदाहरणेषु क्रयाप रवतनं कमपदानुसारम् अ स्त।’
पुस्तक क अ न्तम पं क्त भी प ढ़ए: ‘यो नयमः अत्र ( तङन्तस्थले) प्रद शतः स एव नयमः कृत्-प्रत्ययस्थलेषु
(क्त-तव्यत्-अनीयर्-प्रत्ययान्तपदे षु) बोद्धव्यः। केवलं तत्र कमपदगत- लङ्गानुरूपं कृदन्तपदस्य लङ्गं वचनं च भवतः
इ त वशेषः।’ अथात् जो नयम क्रयापद पर लगा, वही ‘कतव्यः/कतव्या/कतव्यम्’ जैसे कृदन्त पद पर भी लगेगा
— बस वहाँ लङ्ग भी कम के अनुसार बदलेगा। यही अगले खण्ड का वषय है।
व्याकरणम् — तव्यत्-अनीयर्-प्रत्यययोः प्रयोगः — पृष्ठ 105–107
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प्रयोगस्थलम् · त्रषु लङ्गे षु प्रयोगः · त्रषु वचनेषु प्रयोगः
व्याकरणम्
प्र.1 तव्यत्-अनीयर्-प्रत्ययौ कदा प्रयुज्येते ? पुस्तके दत्तां ‘तव्यत्-अनीयर्-प्रत्यययोः प्रयोगस्थलम्’ इ त ता लकां
व्याख्यात।
नयमः — पुस्तकस्य शब्दे षु : ‘तव्यत्-अनीयर्-प्रत्ययौ लृट्-लोट् - व ध लङ् लकाराणां वषये योग्याथ च भवतः।’ अथात् जहाँ ‘करना
चा हए / करेगा / करे’ का भाव हो ( व ध लङ् , लोट् तथा लृट् लकार), और जहाँ ‘करने योग्य’ का भाव हो — वहाँ धातु म तव्यत् या
अनीयर् प्रत्यय लगाकर एक ही अथ दया जा सकता है।
अन्नं न पिरहरेत ् / पिरहरत ु / पिरहिरष्यित
= अन्नं न पिरहत व्यम् (पिर + √हृ + तव्यत्) / पिरहरणीयम् (पिर + √हृ + अनीयर्)
योग्याथ — पानीयं जलम् (पीने योग्य = पानी)। कत व्यं / करणीयं = कम (करने योग्य = काम)।
व ध लङ् लकारः / लोट् लकारः / लृट्लकारश्च तव्यत्-प्रत्ययः अनीयर्-प्रत्ययः
अन्नं न पिरहरे त ् / पिरहरतु / पिरहिरष्यित अ ं न पिरहतव्यम्
न्न अ ं न पिरहरणीयम्
न्न
मानवः क्रोधं त्यजेत ् / त्यजतु / त्यक्ष्यित मानवेन ोधः त्यक्तव्यः
क्र मानवेन ोधः त्यजनीयः
क्र
मनः सदा सत्कमणा साध्नुयात् / साध्नोतु / सात्स्यित मनः सदा स त्कम णा साद्धव्यम् मनः सदा स त्कम णा साधनीयम्
सवदा ईश्वरं से वेत / से वताम् / से िवष्यते सवदा ईश्वरः से िवतव्यः सवदा ईश्वरः से वनीयः
पितिदनं योगासनं करोतु / कु य त् / किरष्यित पितिदनं योगासनं कतव्यम् पितिदनं योगासनं करणीयम्
ता लका म दो बात छपी ह — दोन पक ड़ए: (१) बाईं ओर के वाक्य म कता प्रथमा म है (मानवः क्रोधं त्यजेत्),
पर दाईं ओर के दोन स्तम्भ म वही कता तृतीया म चला गया है (मानवेन क्रोधः त्यक्तव्यः) — क्य क तव्यत्-
अनीयर् वाले वाक्य कमवाच्य के ही रूप ह। (२) दाईं ओर कम प्रथमा म आ गया (क्रोधं → क्रोधः) और कृदन्त-पद
उसी के लङ्ग-वचन म है (क्रोधः पुं लङ्ग → त्यक्तव्यः पुं लङ्ग)। यही तो पछले खण्ड का नयम था — अब वह क्रया
से हटकर कृदन्त पर लगा है।
पाठ से जो ड़ए: वरुण के उपदे श के लगभग सारे वाक्य इसी साँचे म ह — ‘कदा प अन्नं न प रहतव्यम्’, ‘प्राणः
सवथा रक्षणीयः’, ‘प्राणायामः कतव्यः’, ‘मनः सदा सत्कमणा साधनीयम्’, ‘आहारशु द्धश्च करणीया’, ‘प्रा णषु
दया कतव्या’, ‘रागः… मोहश्च हातव्याः’। इसी लए यह व्याकरण-खण्ड ठ क इसी पाठ के साथ रखा गया है —
नयम बाहर से नह आया, पाठ से ही नकला है।
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प्र.2 ‘ त्रषु लङ्गे षु तव्यत्-अनीयर्-प्रत्यययोः प्रयोगः’ — इ त ता लकां लखत तथा नयमं स्पष्टीकुरुत।
नयमः — तव्यत् तथा अनीयर् प्रत्ययान्त पद वशेषण होते ह; अतः उनका लङ्ग सदा कमपद के लङ्ग के अनुसार बदलता
है — पुं लङ्ग म ‘-व्यः / -नीयः’, स्त्री लङ्ग म ‘-व्या / -नीया’, नपुंसक लङ्ग म ‘-व्यम् / -नीयम्’।
प्रत्ययः पुं लङ्गम् स्त्री लङ्गम् नपुंसक लङ्गम्
कृ + तव्यत् मया परोपकारः कतव्यः मया पािणषु दया कतव्या मया योगासनं कतव्यम्
पठ् + तव्यत् िशष्येण वेद ः पिठतव्यः िशष्येण गीता पिठतव्या िशष्येण संस्कृ तं पिठतव्यम्
रक्ष् + अनीयर् सवथा धम ः र क्षणीयः मातभृ िू मः र क्षणीया आरोग्यं र क्षणीयम्
त्यज् + तव्यत् त्वया क्रोधः त्यक्तव्यः ईष्य त्यक्तव्या दू िषता ं त्यक्तव्यम्
न्न
कृ + अनीयर् अस्मािभः पितिदनं योगः करणीयः पितिदनं मया ीडा करणीया
क्र अस्मािभः समयेन भोजनं करणीयम्
ध्यान द जए — बदलता क्या है: पाँच पं क्तय म धातु वही है, कता वही (तृतीया म — मया, शष्येण, त्वया,
अस्मा भः), केवल कम बदलते ही प्रत्ययान्त पद का लङ्ग बदल जाता है। ‘दया’ स्त्री लङ्ग है इस लए ‘कतव्या’;
‘योगासनम्’ नपुंसक लङ्ग है इस लए ‘कतव्यम्’; ‘परोपकारः’ पुं लङ्ग है इस लए ‘कतव्यः’। कृदन्त पद क्रया क तरह
दखता है, पर व्यवहार वशेषण जैसा करता है — यही इस ता लका क पूरी सीख है।
पाठ म यही तीन रूप एक ही वाक्य-समूह म मलते ह: ‘प्र त दनं ध्यानं योगासनं च कतव्यम् (नपुं.)। प्रा णषु
दया कतव्या (स्त्री.)। परोपकारः कतव्यः (पुं.)।’ (पृ. ९७)। पुस्तक ने ता लका इसी अंश से बनाई है — इस लए
ता लका याद करने से पहले वह अंश पढ़ ली जए, नयम अपने आप बैठ जाएगा।
प्र.3 ‘ त्रषु वचनेषु तव्यत्-अनीयर्-प्रत्यययोः प्रयोगः’ — इ त ता लकां लखत तथा नयमं स्पष्टीकुरुत।
नयमः — लङ्ग क भाँ त वचन भी कमपद के अनुसार ही बदलता है — कम एकवचन तो कृदन्त एकवचन, कम द्ववचन
तो द्ववचन, कम बहुवचन तो बहुवचन। कता तृतीया म जस वचन का भी हो, उससे कोई अन्तर नह पड़ता।
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एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
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िशष्येण वेद ः पिठतव्यः िशष्येण वेद ौ पिठतव्यौ
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िशष्येण वेद ाः पिठतव्याः
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g l a अस्मािभः वेद ौ पठनीयौ अस्मािभः वेद ाः पठनीयाः
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अस्मािभः वेद ः पठनीयः
त्वया गीतं पिठतव्यम् त्वया गीते पिठतव्ये त्वया गीतािन पिठतव्यािन
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मया उद्याने लता दृ श्यते मया उ द्य ाने लते दृ श्येते मया उ द्य ाने लताः दृ श्यन्ते
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भवताgलोभमोहौ त्यक्तव्यौ
मया क्रोधः त्यक्तव्यः
a त्वया दोषाः त्यक्तव्याः
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दूसरी पं क्त सबसे अ धक सखाती है: ‘अस्मा भः वेदः पठनीयः’ — कता ‘अस्मा भः’ बहुवचन है, फर भी
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‘पठनीयः’ एकवचन म है, क्य क कम ‘वेदः’ एकवचन है। यही बात चौथी पं क्त म भी है — ‘मया उद्याने लताः
g म गनती कम क
दृश्यन्ते’.मc कता ‘मया’ एकवचन, पर क्रया बहुवचन, क्य क ‘लताः’ बहुवचन है। कमवाच्य
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se है, कता क नह — यह वाक्य याद कर ली जए, दोन ता लकाएँ इसी से खुल जाएँगी।
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पाठ से जो ड़ए: ‘रागः, द्वे षः, ईष्या, क्रोधः, लोभः, मोहश्च हातव्याः’ (पृ. ९७) — यहाँ कम छह ह, इस लए कृदन्त
s e m आसना न च करणीया न’ (पृ. ११०) म कम नपुंसक लङ्ग
पद बहुवचन ‘हातव्याः’ म है। और ‘सवदा प्राणायामः,
बहुवचन है, इस लए ‘करणीया न’। नयमlaपाठ म हर जगह चल रहा है।
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com· वाक्येषु न हता न क्रयापदा न · षट् l
स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 108–111
धातुरूप-ता.लकाः a g
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ोकाः तथा उप नषद्वचना न
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agl स्वाध्यायान्मा प्रमदः
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‘आत्मनेप दधातूनां लोट् -लकारे त्रषु पुरुषेषु अभ्यासं कुरुत’ — इ त खण्डे वन्द्-धातोः कृ-धातोश्च याः ता लकाः
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दत्ताः, ताः लखत तथा वाक्यरूपेण अ प प्रयुङ्क्त।
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उत्तरम् — पुस्तके त्रयः कोष्ठकाः दत्ताः; तेषु प्रथमौ द्वौ धातुरूपाणां, तृतीयः तेषामेव वाक्यप्रयोगस्य।
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१. वन्द्-धातुः (लट् -लकारः, आत्मनेपदम्)
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एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
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पथमपुरुषः वन्दते वन्दे ते वन्द न्ते
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मध्यमपुरुषः वन्दसे
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उत्तमपुरुषः
aवन्दे वन्दावहे वन्दामहे
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२. कृ-धातुः (लट् -लकारः, आत्मनेपदम्)
पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमपुरुषः कु रुते कु व ते कु वते
मध्यमपुरुषः कु रुषे कु व थे कु रुध् वे
उत्तमपुरुषः कु व कु वहे कु म हे
३. वाक्यरूपेण प्रयोगः (वन्द्-धातुः)
पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमपुरुषः भक्तः दे वं वन्दते भक्तौ दे वं वन्दे ते भक्ताः दे वं वन्द न्ते
मध्यमपुरुषः त्वं दे वं वन्दसे युवां दे वं वन्दे थे यूयं दे वं वन्द ध् वे
उत्तमपुरुषः अहं दे वं वन्दे आवां दे वं वन्दावहे वयं दे वं वन्दामहे
तीसरी ता लका क्य द गई: केवल रूप रट लेने से वाक्य नह बनते। तीसरी ता लका दखाती है क हर रूप का
अपना कता-सवनाम होता है — प्रथमपुरुष के साथ भक्तः/भक्तौ/भक्ताः, मध्यमपुरुष के साथ त्वम्/युवाम्/यूयम्,
और उत्तमपुरुष के साथ अहम्/आवाम्/वयम्। रूप याद क जए, पर सवनाम के साथ — तभी प रयोजना-काय ३
(‘ वश तवाक्या न रचयत’) सध पाएगा। साथ ही ध्यान द जए क कम ‘दे वम्’ हर वाक्य म द्वतीया एकवचन म ही
रहा — कता बदलने से कम नह बदलता।
पुस्तक क एक असंग त: इस खण्ड का शीषक है ‘आत्मनेप दधातूनां लोट् -लकारे त्रषु पुरुषेषु अभ्यासं कुरुत’,
कन्तु नीचे जो तीन ता लकाएँ छपी ह वे लट् -लकार क ह (वन्दते… कुरुते…), जैसा क ता लका के ऊपर ‘वन्द्-
धातुः (लट् -लकारः)’ लखा भी है। लोट् -लकार क ता लकाएँ अभ्यास के प्रश्न ७ (पृष्ठ १०३) म द गई ह। दोन को
साथ रखकर प ढ़ए — लट् म उत्तमपुरुष ‘-ए’ पर, लोट् म ‘-ऐ’ पर समाप्त होता है।
कृ-धातु क एक बारीक : लट् आत्मनेपद म प्रथमपुरुष बहुवचन ‘कुवते’ है (‘कुवन्ते’ नह ) — √कृ तना दगण का
है, इस लए ‘उ’ का ‘व्’ हो जाता है। यही रूप स्वाध्याय क वाक्य-ता लका म भी है — ‘छात्राः गृहकाय कुवते’ (पृ.
१०९)।
प्र.2 ‘एतेषु वाक्येषु न हता न क्रयापदा न उ ैः पठत’ — पुस्तके दत्ता न अष्ट एकवचन-बहुवचन-युगला न लखत,
तेषु क्रयाप रवतनस्य कारणं च वदत।
उत्तरम् — पुस्तके दत्ता न अष्ट युगला न :
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क्रमः एकवचनरूपा ण बहुवचनरूपा ण धातुः
१ बालकः उद्याने रमते बालकाः उ द्य ाने रम न्ते √रम् (आनन्द लेना)
२ िशष्यः ग रु
ु ं से वते िशष्याः गुरुं से वन्ते √सेव् (सेवा करना)
३ रात्रौ चन्द ः राजते साध पु रुु षाः सवत्र राजन्ते √राज् (शो भत होना)
४ वृक्षः वायुना कम्पते वृक्षाः वायुना क म्पन्ते √कम्प् (काँपना)
५ कण्ठे हारः शोभते वृक्षे पुष्पािण शोभन्ते √शुभ् (शोभा पाना)
६ योगासनेन मानवः आरोग्यं लभते योगासनेन मानवाः आरोग्यं लभन्ते √लभ् (पाना)
७ िभक्षक
ु ः धनं याचते िभक्षक
ु ाः धनं याचन्ते √याच् (माँगना)
८ छात्रः ग ृहकाय ं कु रुते छात्राः गृहकाय ं कु वते √कृ (करना)
क्रया क्य बदली — नयम: « क्रया कतृपदानुसा रणी भव त» — कतृवाच्य म क्रया का वचन कता के वचन के
अनुसार होता है। इसी लए हर पं क्त म कता के एकवचन से बहुवचन होते ही क्रया का प्रत्यय ‘ते’ से ‘न्ते’ हो गया
— रमते→रमन्ते, सेवते→सेवन्ते, कम्पते→कम्पन्ते। ध्यान द जए, कम वैसा का वैसा रहा (गुरुम्, धनम्, गृहकायम्)
— कतृवाच्य म कम से क्रया का कोई सम्बन्ध नह ।
दो पं क्तय म वशेष ध्यान द जए: (१) पं क्त ५ म बाईं ओर कता ‘हारः’ (पुं लङ्ग) और दाईं ओर ‘पुष्पा ण’
(नपुंसक लङ्ग) है — लङ्ग बदलने पर भी क्रया का रूप वही रहता है, केवल वचन से बदलता है। (२) पं क्त ८ म
बहुवचन का रूप ‘कुवन्ते’ नह , ‘कुवते’ है — √कृ तना दगण का होने से यहाँ ‘उ’ का ‘व्’ हो जाता है। यही अपवाद
परीक्षा म पूछा जाता है।
प्र.3 “आहारात् सवभूता न सम्भव न्त महीपते। आहारेण ववधन्ते तेन जीव न्त जन्तवः॥” (महाभारतम्, वनपव
१३१/७) — अस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ हन्द -अथ भावं च लखत।
आहारात् सवभूत ािन सम्भविन्त महीपते ।
आहारेण िववधन्ते ते न जीविन्त जन्तवः॥
(महाभारतम्, वनपव १३१ /७ )
पदच्छे दः — आहारात् + सव-भूता न + सम्भव न्त + महीपते + आहारेण + ववधन्ते + तेन + जीव न्त + जन्तवः।
अन्वयः (पुस्तक का अपना) — हे महीपते! सवभूता न आहारात् सम्भव न्त, आहारेण जन्तवः ववधन्ते, तेन आहारेण जीव न्त च।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्र त AglaSem · NCERT Solutions
पदम् व्याकरणम् शब्दाथः
आहारात् आहार, पञ्चमी एकवचन (अपादाने पञ्चमी) भोजन से , अ सेन्न
सवभूतािन नपुंसक लङ्ग प्रथमा बहुवचन सारे पाणी
सम्भविन्त सम् + √भू, लट् , प्रथमपुरुष बहुवचन उ त्प होते है ं
न्न
महीपते महीप त, सम्बोधन एकवचन (म ाः प तः — षष्ठी-तत्पुरुष) हे राजन्! (पथ्ृ वी के स्वामी)
आहारे ण तृतीया एकवचन (करणे तृतीया) भोजन से , आहार के ारा
िववधन्ते व + √वृध्, लट् , आत्मनेपद, बहुवचन िवशेष रूप से बढ़ ते है ं
जन्तवः जन्तु, पुं लङ्ग प्रथमा बहुवचन जीव, पाणी
हन्द अथ — हे राजन्! सारे प्राणी आहार से ही उत्पन्न होते ह, आहार से ही बढ़ते ह, और उसी आहार से जीते ह।
भावः (पुस्तक का अपना भावाथ): ‘हे राजन्! सव प्रा णनः अन्ना दभोज्यपदाथाद् जायन्ते। प्रा णनः आहारेण एव
शरीरस्य वकासं प्रा ुव न्त। तेन आहारेण एव जीव न्त।’ — ध्यान द जए, ोक अन्न के तीन काम गनाता है :
उत्प त्त (सम्भव न्त), वृ द्ध ( ववधन्ते) तथा जीवन-धारण (जीव न्त)। भृगु ने संवाद म ठ क यही तीन बात कही थ
— ‘अन्नाद् एव प्रा णनः जायन्ते। अन्नेन एव प्रा णनः जीव न्त। अन्नेनैव शरीरं बलं च वधते।’ इसी लए यह ोक ठ क
वह उद्धत कया गया है — तक का शास्त्र-प्रमाण।
पुस्तक का ‘आहारशु द्धः’ खण्ड इसी के साथ प ढ़ए: ‘मान सक-बौ द्धक- वकासाय सवदा सा त्त्वकं हतकारकं
च आहारं सेवताम्। सा त्त्वकम् अन्नं मन स स ावान् गुणांश्च वकासय त। तेन अस्माकं स्मृ तशक्तेः,
आध्या त्मकशक्तेः, अन्नमया दकोषाणां च वकासो भव त।’ और इसके प्रमाण म छान्दोग्योप नषद् (७/२६/२) का
यह वचन दया गया है — ‘आहारशुद्धौ सत्त्वशु द्धः, सत्त्वशुद्धौ ुवा स्मृ तः। स्मृ तलम्भे सवग्र ीनां
वप्रमोक्षः।’ अथात् आहार शुद्ध हो तो अन्तःकरण शुद्ध होता है; अन्तःकरण शुद्ध हो तो स्मृ त अटल होती है; और
अटल स्मृ त मल जाए तो सारी गाँठ (सन्दे ह) खुल जाती ह। इस एक ोक म पूरा पञ्चकोष-क्रम छपा है — अन्न
से आरम्भ, मु क्त पर अन्त।
प्र.4 “यावद् वायुः स्थतो दे हे तावज्जीवनमुच्यते। मरणं तस्य नष्क्रा न्तस्ततो वायुं नरोधयेत्॥” (हठयोगप्रद पका) —
अस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ हन्द -अथ भावं च लखत।
यावद् वायुः िस्थतो दे हे तावज्जीवनमुच् यते ।
मरणं तस्य िनष्क्रािन्तस्ततो वायुं िनरोधयेत ्॥
(हठयोगपदीिपका)
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पदच्छे दः — यावत् + वायुः + स्थतः + दे हे + तावत् + जीवनम् + उच्यते + मरणम् + तस्य + नष्क्रा न्तः + ततः + वायुम् +
नरोधयेत्।
अन्वयः (पुस्तक का अपना) — यावद् दे हे वायुः स्थतः तावत् जीवनम् उच्यते। तस्य नष्क्रा न्तः मरणम्, ततः वायुं नरोधयेत्।
पदम् व्याकरणम् शब्दाथः
यावत् … तावत् नत्यसम्बद्ध अव्यय-युगल जब तक … तब तक
दे हे सप्तमी एकवचन (अ धकरणे सप्तमी) शरीर में
िस्थतः √स्था + क्त, पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन ठहरा हुआ, िटका हुआ
उच्यते √वच्, लट् , कमवाच्य, प्रथमपुरुष एकवचन कहा जाता है
िनष्क्रािन्तः नस् + √क्रम् + क्तन्, स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन बाहर िनकल जाना
िनरोधयेत ् न + √रुध् ( णच्), व ध लङ् , प्रथमपुरुष एकवचन रोकना चािहए (पाणायाम करना चािहए )
हन्द अथ — जब तक वायु (प्राणवायु) शरीर म ठहरी रहती है, तब तक उसे जीवन कहा जाता है। उसका बाहर नकल जाना ही
मृत्यु है; इस लए वायु को (प्राणायाम के द्वारा) रोकना चा हए।
भावः (पुस्तक का अपना भावाथ): ‘यावत् कालपयन्तं प्राणवायुः शरीरे र क्षतो भव त, तावत् कालपयन्तं जीवनं
भव त। वायोः शरीराद् नगमनम् एव मरणम् इ त, अस्मात् हेतोः प्राणवायुं रक्षेत्। प्राणमयकोष वकासाय अस्मा भः
सवदा प्राणायामः, आसना न च करणीया न। शयनं जागरणं च यथासमयं करणीयम्।’ — ोक जीवन और मृत्यु क
सबसे सीधी प रभाषा दे ता है : प्राण भीतर = जीवन; प्राण बाहर = मृत्यु। और उसी से एक व्यावहा रक नष्कष
नकालता है — य द जीवन प्राण पर टका है, तो प्राण क रक्षा ही जीवन क रक्षा है; इसी लए प्राणायाम, आसन
और समय पर सोना-जागना।
स न्ध: ‘तावज्जीवनमुच्यते’ = तावत् + जीवनम् + उच्यते — ‘त्’ के बाद ‘ज्’ आने पर ‘त्’ का ‘ज्’ हो जाता है
(श्चत्व स न्ध)। ‘ नष्क्रा न्तस्ततः’ = नष्क्रा न्तः + ततः ( वसगस न्ध — वसग का ‘स्’)। ‘ स्थतो दे हे’ = स्थतः + दे हे
( वसग का उत्व → ओ)।
जोड़कर दे खए: यह ोक पाठ म भृगु के दूसरे उत्तर ‘प्राणो वै ब्रह्म’ के ठ क बाद उद्धत है (पृ. ९४), और वह
वरुण कहते ह — ‘प्राण वकासाय प्र त दनं प्राणायामः कतव्यः।’ ोक और उपदे श एक ही बात के दो रूप ह।
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“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। बन्धाय वषयासक्तं मुक्त्यै न वषयं स्मृतम्॥” (अमृत बन्दु-उप नषद्
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१/२) — अस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ हन्द -अथ भावं च लखत।
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मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
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बन्धाय िवषयासक्तं मुक्त्यै िनिवषयं स्मृत म्॥
(अमृत िबन्दु-उपिनषद् १ /२ ) a g l
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पदच्छे दः — मनः + एव + मनुष्याणाम् + कारणम् + बन्ध-मोक्षयोः + बन्धाय + वषय-आसक्तम् + मुक्त्यै + न वषयम् + स्मृतम्।
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अन्वयः (पुस्तक का अपना) — मनः एव मनुष्याणां बन्धमोक्षयोः कारणं, वषयासक्तं बन्धाय, न वषयं मुक्त्यै स्मृतम् अ स्त।
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पदम् व्याकरणम् शब्दाथः
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मनुष्याणाम् षष्ठी बहुवचन (सम्बन्धे षष्ठी) मनुष्यों का
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. बन्धन तथा मोक्ष — दोनों का agl
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बन्धमोक्षयोः द्वन्द्व समास (बन्धश्च मोक्षश्च), षष्ठी द्ववचन
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बन्धाय चतुथ एकवचन (ताद यgचतु
a l थ) बन्धन के िलए
िवषयासक्तम् वषयेषु आसक्तम् — सप्तमी-तत्पुरुष, नपुंसक लङ्ग
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िवषयों में आस क्त (मन)
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मुक्त्यै मु क्त, चतुथ एकवचन मुिक्त के िलए
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िनिवषयम् नगताः वषयाः यस्मात् तत् — बहु ी ह िवषयों से रिहत (मन)
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स्म ृतम् √स्मृ + क्त, नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन माना गया है, कहा गया है
हन्द अथ — मनुष्य के बन्धन और मोक्ष — दोन काco m मन ही है। वषय म आसक्त मन बन्धन का कारण माना गया है और glase
m . कारण
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वषय से र हत मन मु क्त का कारण।
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भावः (पुस्तक का अपना भावाथ): ‘मनुष्याणां बन्धस्य मोक्षस्य च कारणं मन एव भव त। य द मनः वषयेषु
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आसक्तं भव त अथात् कामा ददोषयुक्तं भव त त ह बन्धाय कारणं भव त। य द मनः वषयेषु आसक्तं न भव त त ह
m a s emत त ह मान सकशक्तेः,
l एक ही वस्तु को दोन कारण
बन्धाय कारणं न भव त। य द अस्माकं मनः नमलं शान्तं राग-द्वे ष-शोका दर हतं च भव
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cमनोमयकोषस्य च वकासो भव त।’ — ोक क सबसे बड़ी बात यह है कgवह
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बताता है। मन बाँधता भी है और छु ड़ाता भी; ताला और चाबी दोन वही है। इस लए दोष वषय म नह , मन क
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आस क्त म है — यही वरुण का उपदे श भी था : ‘मनः सदा सत्कमणा साधनीयम्, शोका दर हतम् उत्साहयुक्तं शान्तं
च करणीयम्।’
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स न्ध तथा अलङ् कार: ‘मन एव’ = मनः + एव ( वसगलोप)। ‘ वषयासक्तम्’ = वषय + आसक्तम् (द घ स न्ध)।
दूसरी पं क्त म सुन्दर वरोधाभास-सा सन्तुलन है — बन्धाय : मुक्त्यै, वषयासक्तम् : न वषयम् — एक ही पं क्त
के दो पाट, बीच म मन। यही उप नषद् क शैली है।
प्र.6 “मनो ह द्व वधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च। अशुद्धं कामसङ् कल्पं शुद्धं काम वव जतम्॥” (अमृत बन्दु-उप नषद्
१/१) — अस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।
मनो िह ि िवधं पोक्तं शुद्ध ं चाशुद्ध मेव च।
अशुद्ध ं कामसङ् कल्पं शुद्ध ं कामिवविजतम्॥
(अमृत िबन्दु-उपिनषद् १ /१ )
पदच्छे दः — मनः + ह + द्व वधम् + प्रोक्तम् + शुद्धम् + च + अशुद्धम् + एव + च + अशुद्धम् + काम-सङ् कल्पम् + शुद्धम् + काम-
वव जतम्।
अन्वयः — मनः ह द्व वधं प्रोक्तम् — शुद्धम् अशुद्धम् एव च। अशुद्धं (मनः) कामसङ् कल्पम् (भव त), शुद्धं (मनः) काम वव जतम्
(भव त)।
पदम् व्याकरणम् शब्दाथः
ि िवधम् द्वौ वधौ यस्य तत् — बहु ी ह, नपुंसक लङ्ग दो पकार का
पोक्तम् प्र + √वच् + क्त कहा गया है
कामसङ् कल्पम् कामस्य सङ् कल्पः य स्मन् तत् — बहु ी ह िजसमें कामनाओं का संक ल्प भरा हो
कामिवविजतम् कामेन वव जतम् — तृतीया-तत्पुरुष कामनाओं से रिहत
हन्द अथ — मन दो प्रकार का कहा गया है — शुद्ध और अशुद्ध। जो मन कामनाओं के संकल्प से भरा है वह अशुद्ध है, और जो
कामनाओं से र हत है वह शुद्ध है।
भावः: पुस्तक ने पछले ोक के भावाथ म ही इसक भू मका बाँध द है — ‘शास्त्रेषु मनसः द्व वधं रूपं वण्यते —
(१) शुद्धम् (२) अशुद्धम् इ त।’ यह ोक उसी वग करण क कसौट दे ता है, और कसौट बहुत सरल है — ‘काम’
है तो अशुद्ध, ‘काम’ नह तो शुद्ध। ध्यान द जए, ोक मन को त्यागने को नह कहता, माँजने को कहता है —
क्य क वही मन बन्धन का भी कारण है और मोक्ष का भी ( पछला ोक)। इसी लए वरुण का उपदे श भी मन को
मारना नह , ‘सत्कमणा साधनीयम्’ — सत्कम से साधना है।
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स न्ध: ‘चाशुद्धमेव’ = च + अशुद्धम् + एव — पहले द घ स न्ध (अ + अ = आ), फर वसग-र हत स्वरस न्ध। ‘मनो
ह’ = मनः + ह ( वसग का उत्व → ओ)। ध्यान र खए — पुस्तक ने इस ोक का अन्वय तथा भावाथ अलग से
नह दया; ऊपर का अन्वय पछले ोक के भावाथ के आधार पर बनाया गया है।
प्र.7 “मनसः वषयाः — कामः, संकल्पः, व च कत्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृ तः, अधृ तः, ीः, धीः, भीः इत्येतत् सव मन
एव।” (बृहदारण्यकोप नषद् १/५/३) — अस्य वचनस्य अथ भावं च लखत। मनसः दश वषयाः के के ?
उत्तरम् — अस्य वचनस्य अथः — कामः, सङ् कल्पः, सन्दे हः, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैयम्, अधैयम्, लज्जा, बु द्धः, भयम् — एतत्
सव मन एव अ स्त। अथात् एते दश अ प मनसः एव वषयाः, मनसः एव वृत्तयः।
( हन्द — काम, संकल्प, सन्दे ह, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैय, अधैय, लज्जा, बु द्ध और भय — यह सब मन ही है।)
क्रमः वषयः अथः जीवन म कैसे दखता है
१ कामः इच्छा ‘मुझे यह चा हए’ — हर काम का पहला बीज
२ सङ् कल्पः िनश्चय, ठान ले ना ‘म यह करूँगा ही’ — इच्छा का दृढ़ रूप
३ िविचिकत्सा स न्दे ह ‘करूँ या न करूँ’ — दु वधा
४ श्रद्धा िवश्वास , िनष्ठा गुरु, शास्त्र तथा अपने ऊपर भरोसा
५ अश्रद्धा अिवश्वास ‘इससे कुछ नह होगा’ — भरोसे का अभाव
६ ध ृितः धै य क ठनाई म टके रहना
७ अध ृितः अधै य जल्द हार मान लेना
८ ीः ल ज्जा ग़लत काम करते समय भीतर का संकोच
९ धीः बुिद्ध सोच- वचार, नणय
१० भीः भय डर, आशङ् का
भावः — इस सूची क बनावट दे खए: दस म से चार जोड़ म ह — श्रद्धा/अश्रद्धा, धृ त/अधृ त। एक ही मन म
दोन रहते ह, और कौन-सा जीतेगा यह हमारे अभ्यास पर है। यही उप नषद् का सन्दे श है : सुख-दुःख, हम्मत-
कायरता, भरोसा-शक बाहर से नह आते — ‘एतत् सव मन एव’। इस लए बाहर क प र स्थ त बदलने से पहले मन
को सा धए। पाठ म यह वचन ठ क ‘मनो वै ब्रह्म’ वाले उत्तर के बाद रखा गया है (पृ. ९५) और पृष्ठ ९४ के चत्र म ये
दस नाम अङ् कत भी ह।
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स न्ध खो लए: ोकरूप म यह वचन ऐसे छपा है — ‘कामः संकल्पो व च कत्सा श्रद्धाऽश्रद्धा
धृ तरधृ त ध भ रत्येतत् सव मन एव।’ इसे तो ड़ए : धृ तः + अधृ तः + ीः + धीः + भीः + इ त + एतत्। यहाँ
चार बार वसग का ‘र्’ हुआ है और एक बार यण् स न्ध (इ त + एतत् = इत्येतत्)। स न्ध खोले बना यह वाक्य पढ़ा
ही नह जा सकता — इस लए इसे बोलकर अभ्यास क जए।
प्र.8 “यन्मनसा ध्याय त तद् वाचा वद त यद् वाचा वद त तत् कमणा करो त यत् कमणा करो त तद भसम्पद्यते।”
(शतपथब्राह्मणम्) — अस्य वचनस्य पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।
यन्मनसा ध्यायित तद् वाचा वदित
यद् वाचा वदित तत् कमणा करोित
यत् कमणा करोित तदिभसम्पद्यते ।
(शतपथबाह्मणम्)
पदच्छे दः — यत् + मनसा + ध्याय त + तत् + वाचा + वद त + यत् + वाचा + वद त + तत् + कमणा + करो त + यत् + कमणा +
करो त + तत् + अ भसम्पद्यते।
अन्वयः — (मनुष्यः) मनसा यत् ध्याय त तत् वाचा वद त; यत् वाचा वद त तत् कमणा करो त; यत् कमणा करो त तत्
अ भसम्पद्यते।
पदम् व्याकरणम् शब्दाथः
मनसा तृतीया एकवचन (करणे तृतीया) मन से
ध्यायित √ध्यै, लट् , प्रथमपुरुष एकवचन सोचता है, िचन्तन करता है
वाचा वाच्, तृतीया एकवचन वाणी से
कमणा कमन्, तृतीया एकवचन कम से , ि या से
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अिभसम्पद्यते अ भ + सम् + √पद्, लट् , आत्मनेपद पाप्त होता है, िस द्ध हो जाता है
हन्द अथ — मनुष्य मन से जो सोचता है, वही वाणी से कहता है; जो वाणी से कहता है, वही कम से करता है; और जो कम से
करता है, वही उसे प्राप्त हो जाता है।
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भावः: यह वचन एक श्रृंखला बनाता है — वचार → वाणी → कम → प्रा प्त। हर कड़ी पछली कड़ी से नकलती
है, इस लए जो कुछ हम अन्त म मलता है उसका बीज सबसे पहली कड़ी — मन — म पड़ा था। यही कारण है क
यह वचन ‘मनो वै ब्रह्म’ वाले खण्ड के साथ रखा गया है। इसका व्यावहा रक अथ यह है क य द जीवन बदलना है तो
अन्त से नह , आरम्भ से बद लए — पहले सोच बद लए, वाणी और कम अपने आप बदल जाएँगे। भारतीय परम्परा
म इसी को ‘मनसा वाचा कमणा’ क एकता कहते ह।
स न्ध: ‘यन्मनसा’ = यत् + मनसा (त् + म् → न् — अनुना सक स न्ध)। ‘तद भसम्पद्यते’ = तत् + अ भसम्पद्यते
(त् + अ → द्)। ‘यद् वाचा’ = यत् + वाचा (त् + व → द्)। इस वाक्य म यत्-तत् क तीन जो ड़याँ ह — इसे लखते
समय हर जोड़ी को अलग पं क्त म र खए, अथ स्वयं खुल जाएगा।
प्र.9 ‘एता न उप नषद्वचना न उ ैः पठन्तु स्मरन्तु च’ — इ त खण्डे दत्ता न षट् वचना न लखत तथा तेषाम् अथ
स्पष्टीकुरुत। (प रयोजनाकाय अ प ‘पाठे आगतानाम् उप नषद्वचनानाम् आशयं दशसु वाक्येषु प्रकटयत’ इ त
पृष्टम् अ स्त।)
उत्तरम् — पुस्तके षट् उप नषद्वचना न दत्ता न; तेषाम् अथः भावश्च एवम् :
क्रमः उप नषद्वचनम् हन्द अथ कस कोष से
सम्बद्ध
१ अन्नादे व खलु इमािन भूतािन जायन्ते। अन्नेन िनश्चय ही ये सब पाणी अ से ही उ त्प होते है ं और अ
न्न न्न न्न अन्नमयकोषः
जातािन जीविन्त। से ही जीते है।
ं
२ अन्नं िह भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात् सव षधमुच्यते। अ ही पािणयों में ज्येष्ठ (सबसे पहला तथा श्रेष्ठ) है;
न्न अन्नमयकोषः
इसीिलए उसे सव षध — सब रोगों की दवा — कहा
जाता है।
३ अन्नं न िनन्द्यात्। अन्नं बहु कु व त। अ की िनन्दा न करे ; अ को खूब (बहुत मात्रा में)
न्न न्न अन्नमयकोषः
उपजाए।
४ पाणो िह भूतानाम् आयुः। पाणे शरीरं पितिष्ठतम्। पाण ही पािणयों की आयु है; शरीर पाण में िटका है; पाण प्राणमयकोषः
पाणो वै ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च। ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है।
५ कामः संक ल्पो िविचिकत्सा श्रद्धाऽश्रद्धा काम , संक ल्प, स न्दे ह, श्रद्धा, अश्रद्धा, धै य, अधै य, ल ज्जा, मनोमयकोषः
ध िृ तरध ृित ध भ िरत्येतत् सवं मन एव। बुिद्ध तथा भय — यह सब मन ही है।
६ तन्मे मनः िशवसङ् कल्पमस्तु। मेर ा वह मन शुभ संक ल्प वाला हो। मनोमयकोषः
(प्राथना)
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
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छह को एक सूत्र म परोइए: पहले तीन वचन अन्न पर ह — अन्न से उत्प त्त, अन्न क श्रेष्ठता, और अन्न के प्र त
m a s emपाठ के पहले
glक वह वणन नह ,
कतव्य ( नन्दा मत करो, खूब उपजाओ)। चौथा प्राण पर है और अ न्तम दो मन पर। अथात् ये वचन
तीन कोष को.cही o दोहराते ह — अन्न → प्राण → मन। और छठा वचन सबसे सुन्दर है, क्य a
a s eहैm— ‘तन्मे मनः शवसङ् कल्पमस्तु’ (यजुवद के प्र सद्ध ‘ शवसङ् कल्प-सूक्त’ क पं क्त)। पूरा पाठ जस
gl पर पहुँचा था — क सब कुछ मन ही है — वह अन्त म यह प्राथना बन जाती है क वही मन शुभ संकल्प वाला
प्राथना
aबात
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हो।
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दो पद का अथ ध्यान से: (१) ‘ज्येष्ठम्’ के दो अथ यहाँ साथ चलते ह — ‘सबसे पहले उत्पन्न’ तथा ‘सबसे बड़ा’;
सृ ष्ट म अन्न पहले आया, इस लए वही ज्येष्ठ है। (२) ‘सव षधम्’ = सवषाम् औषधम् (सव + औषध, वृ द्ध स न्ध)
co m
— ‘सबक दवा’। भाव यह क उ चत तथा सा त्त्वक अन्न ही सबसे बड़ी औष ध है — यही ‘आहारशुद्धौ सत्त्वशु द्धः’
em.
का व्यावहा रक रूप है।
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m‘अन्नादे व’ = अन्नात् + एव (त् + ए → द्)। ‘सव षधमुच्यते’ = सव षधम् + उच्यते। ‘ शवसङ् कल्पमस्तु’ =
सse
a
gl शवसङ् कल्पम् + अस्तु। ‘तन्मे’ = तत् + मे (त् + म् → न्)।
न्ध:
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m a s
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laष्ठs111
यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् — पृ
ag
सप्त प रयोजनाकाया ण — संगोष्ठी · उप नषद्वचनानाम् आशयः · वाक्यरचना · अन्नरक्षणम् · मनसः कायम् · धातुरूपस्मरणम् ·
co m
कोष वकासचचा
m .
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यस्तु क्रयावान् मनु जः स वद्वान्
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a s em एकां छात्रसंगोष्ठीम् आयोज्य अस्य पाठस्य अस्माकं जीवने क दृशी प्रास ङ्गकता अस्ती त स्व वचारान्
gl
प्र.1
a उपस्थापयत।
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ase
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यह छात्रसंगोष्ठी (seminar) का काय है। वषय है — ‘इस पाठ क हमारे जीवन म क्या प्रास ङ्गकता है?’ उत्तर एक ‘सही वाक्य’
नह है; पर अच्छ संगोष्ठी क एक व ध अवश्य है।
संगोष्ठी कैसे क जए ( व ध) —
co m
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1. कक्षा को पाँच समूह म बाँ टए — एक-एक समूह एक कोष लेगा (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, वज्ञानमय, आनन्दमय)।
omसप्ताह कया जा सके। g l as
.cइसी
2. हर समूह तीन बात तैयार करे : (क) पाठ का सम्ब न्धत वाक्य, (ख) आज के जीवन का एक उदाहरण, (ग) एक ऐसा काम जो
a
em3. हर समूह को तीन मनट मल। एक वद्याथ अध्यक्ष बने और समय देखे; एक ‘लेखकः’ बने जो नष्कष लखे।
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4. अन्त म सब मलकर एक ‘पञ्चकोष-प्र त ा’ बनाएँ और उसे कक्षा क द वार पर लगाएँ।
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. co agl
अच्छे उत्तर म ये बात अवश्य आएँ — हर बात पाठ के कसी वाक्य से जुड़ी हो; उदाहरण अपने जीवन से हो, कताबी न हो; और
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सुझाव करने योग्य हो — ‘म सा त्त्वक भोजन करूँगा’ जैसा नह , ब ल्क ‘म सप्ताह म तीन दन जंक-फ़ूड नह खाऊँगा’ जैसा ठोस।
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कोषः पाठ का सूत्र आज क प्रास ङ्गकता इसी सप्ताह करने योग्य काम
अन्नमयः अन्नं न नन्द्यात्। प्रयत्नेन अन्नं बहु भोजन की बरबादी आज सबसे बड़ ी सम स्या थाली म उतना ही लेना जतना
कुव त। है; साथ ही जंक -फ़ू ड से िकशोरों का स्वास्थ् य खाया जाए; एक सप्ताह ‘शून्य-
िबगड़ रहा है। अपव्यय’ अ भयान
पाणमयः प्राण वकासाय प्र त दनं प्राणायामः दे र रात तक जागना और स् ीन दे खना —
क्र प्र त दन दस मनट प्राणायाम;
कतव्यः। पाणशिक्त का सबसे बड़ ा शत्र।
ु समय पर सोना-जागना
मनोमयः मनः सदा सत्कमणा साधनीयम्। परीक्षा का तनाव, तुल ना, िचड़ िचड़ ापन — प्र त दन पाँच मनट मौन; एक दन
शोका दर हतम्… शान्तं च सब मन के व्यापार है।ं कसी क सहायता
करणीयम्।
िवज्ञानमयः बु द्धरेव सार थरूपेण अस्मान् सूचना बहुत है, िववेक कम — क्या सच है कोई भी सन्दे श आगे भेजने से
कम ण प्रवतय त। और क्या अफ़ वाह, यह बुिद्ध ही तय करती है। पहले उसक जाँच; प्र त दन
स्वाध्याय
आनन्दमयः आनन्दे न र हतं जीवनं मृत्युरूपम्। अङ् क तो बढ़ रहे है,ं पस ता नही ं — क्योंिक
न्न सप्ताह म एक ‘सेवा- दवस’;
प्रा णषु दया कतव्या। आनन्द बाहर खोजा जा रहा है। प क्षय के लए जल-पात्र
आदश उत्तरम् (नमूना वक्तव्य — संगोष्ठी म बोलने योग्य) —
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माननीयाः अध्यापकाः, िपयाः सहपािठनः, सवभ्यः नमस्कारः।
अद्य अहम् ‘अन्नाद् आनन्दं पित’ इित पाठस्य अस्माकं जीवने पासिङ् गकतािवषये िकिञ्चत् वक्त मु ् इच्छािम।
अयं पाठः पञ्चकोषाणां िशक्षां ददाित — अन्नमयः, पाणमयः, मनोमयः, िवज्ञानमयः, आनन्दमयः इित।
अद्यत्वे वयं पायः एकम् एव कोषं पश्यामः — बुिद्धम्। अङ् काः वधन्ते , िकन्त ु आरोग्यं न वधते , पसन्नता च न
वधते ।
पाठः कथयित — ‘अन्नमयकोषस्य िवकासं िवना पाणमयकोषस्य िवकासः नै व भिवतुं शक्नोित ’।
अतः पथमं शरीरम् — साित्त्वकम् आहारं सेवामहै, अन्नं च न िनन्दामहै।
ततः पाणः — पितिदनं पाणायामम् आसनािन च कु महे, यथासमयं शयनं जागरणं च कु महे।
ततः मनः — यतः ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः’, अतः मनः सत्कमणा साधयामः।
ततः बुिद्धः — यतः ‘बुिद्धरेव सारिथरूपेण अस्मान् कमिण पवतयित’, अतः ध्यानं स्वाध्यायं च कु महे।
अन्ते आनन्दः — यतः ‘आनन्दे न रिहतं जीवनं मृत्युरूपम्’, अतः पािणषु दयां परोपकारं च आचरामः।
एतत् एव पाठस्य सन्दे शः — िवकासः क्रमेण भवित, न त ु आकिस्मकः।
अतः वयं पितज्ञां कु मः — वयं पञ्चानाम् अिप कोषाणां िवकासाय पितिदनं यितष्यामहे।
एतावत् एव। धन्यवादः।
( हन्द अनुवाद —) आदरणीय अध्यापकगण, प्रय सहपा ठयो, सबको नमस्कार। आज म ‘अन्नाद् आनन्दं प्र त’ पाठ क हमारे
जीवन म प्रास ङ्गकता पर कुछ कहना चाहता/चाहती हूँ। यह पाठ पाँच कोष क शक्षा दे ता है — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय,
वज्ञानमय और आनन्दमय। आजकल हम प्रायः एक ही कोष दे खते ह — बु द्ध। अंक बढ़ते ह, पर स्वास्थ्य नह बढ़ता और प्रसन्नता
भी नह बढ़ती। पाठ कहता है — ‘अन्नमयकोष के वकास के बना प्राणमयकोष का वकास हो ही नह सकता।’ इस लए पहले
शरीर — सा त्त्वक भोजन ल और अन्न क नन्दा न कर। फर प्राण — प्र त दन प्राणायाम तथा आसन कर, समय पर सोएँ-जाग।
फर मन — क्य क ‘मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है’, इस लए मन को सत्कम से साध। फर बु द्ध — क्य क ‘बु द्ध
ही सार थ बनकर हम कम म लगाती है’, इस लए ध्यान और स्वाध्याय कर। अन्त म आनन्द — क्य क ‘आनन्द से र हत जीवन मृत्यु
के समान है’, इस लए प्रा णय पर दया और परोपकार कर। यही पाठ का सन्दे श है — वकास क्रम से होता है, अचानक नह ।
इस लए हम प्र तज्ञा करते ह क पाँच कोष के वकास के लए प्र त दन प्रयत्न करगे। बस इतना ही। धन्यवाद।
यह वक्तव्य अच्छा क्य है: इसम पाँच कोष पाठ के अपने वाक्य से उठाए गए ह, हर कोष के साथ एक करने
योग्य काम जुड़ा है, और अन्त म एक प्र त ा है — अथात् बात वचार से चलकर कम पर समाप्त होती है। साथ ही
भाषा सरल है : वाक्य छोटे ह, आत्मनेपद क्रयाओं (सेवामहै, कुमहे, य तष्यामहे) का प्रयोग है जो इसी पाठ का
व्याकरण है — इस लए बोलते समय अटकना नह पड़ेगा।
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प्र.2 पाठे आगतानाम् उप नषद्वचनानाम् आशयं दशसु वाक्येषु प्रकटयत।
यहाँ पाठ म आए उप नषद्-वचन तथा ोक का सार ठ क दस संस्कृत वाक्य म दे ना है। नीचे नमूना उत्तर है — प्रत्येक वाक्य
एक वचन का आशय है और वाक्य छोटे रखे गए ह, ता क शुद्ध लखे जा सक।
आदश उत्तरम् (दश वाक्या न) —
१. अन्नाद् एव इमािन सव िण भूत ािन जायन्ते , अन्नेन च जीविन्त।
२. अन्नं भूत ानां ज्येष्ठम् अिस्त, अतः तत् ‘सव षधम्’ इित उच्यते ।
३. अन्नं कदािप न िनन्दनीयम्, पयत्ने न च बहु उत्पादनीयम्।
४. आहारशुद्ध ा सत्त्वशुिद्धः भवित, सत्त्वशुद्ध ा च धु वा स्मृितः जायते ।
५. स्मृते ः लाभे सवषां सन्दे हगन्थीनां िवपमोक्षः भवित।
६. पाणः एव भूत ानाम् आयुः, पाणे च शरीरं पितिष्ठतम्।
७. यावद् वायुः दे हे ितष्ठित तावद् एव जीवनम्; तस्य िनगमनम् एव मरणम्।
८. मनः एव मनुष्याणां बन्धस्य मोक्षस्य च कारणम् अिस्त।
९. कामः, सङ् कल्पः, िविचिकत्सा, श्रद्धा, धृितः, ीः, धीः, भीः — एतत् सव ं मन एव।
१०. यत् मनसा ध्यायित तद् एव वाचा वदित, तद् एव कमणा करोित, तद् एव च पाप्नोित।
( हन्द अनुवाद —) १. ये सारे प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते ह और अन्न से ही जीते ह। २. अन्न प्रा णय म ज्येष्ठ है, इसी लए उसे
‘सव षध’ कहा जाता है। ३. अन्न क कभी नन्दा नह करनी चा हए और प्रयत्नपूवक उसे खूब उपजाना चा हए। ४. आहार क शु द्ध
से अन्तःकरण शुद्ध होता है और अन्तःकरण क शु द्ध से स्मृ त अटल होती है। ५. स्मृ त मल जाने पर सब सन्दे ह-गाँठ खुल जाती ह।
६. प्राण ही प्रा णय क आयु है और शरीर प्राण म टका है। ७. जब तक वायु शरीर म रहती है तभी तक जीवन है; उसका नकल
जाना ही मृत्यु है। ८. मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है। ९. काम, संकल्प, सन्दे ह, श्रद्धा, धैय, लज्जा, बु द्ध, भय —
यह सब मन ही है। १०. मनुष्य मन से जो सोचता है वही वाणी से कहता है, वही कम से करता है और वही उसे प्राप्त होता है।
लखते समय ध्यान र खए: (१) दस वाक्य माँगे गए ह, इस लए गनकर ल खए — न नौ, न ग्यारह। (२) हर वाक्य
म एक ही वचार र खए। (३) कता- क्रया का वचन मलाइए (भूता न जायन्ते — दोन बहुवचन; प्राणः तष्ठ त —
दोन एकवचन)। (४) जहाँ सन्दे ह हो, वाक्य को छोटा कर द जए — अशुद्ध लम्बे वाक्य से शुद्ध छोटा वाक्य
अच्छा है।
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प्र.3 पाठे आगता न क्रयापदा न चत्वा वश तवाक्या न रचयत।
यहाँ पाठ क क्रयाएँ चुनकर बीस अपने वाक्य बनाने ह। सबसे अच्छ व ध यह है क आप आत्मनेपद क्रयाओं को चुन, क्य क
पूरा पाठ और पूरा अभ्यास उन्ह पर टका है — इससे प्रश्न ६, ७, ८ का अभ्यास भी साथ-साथ हो जाएगा।
आदश उत्तरम् ( वश तः वाक्या न) —
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क्रमः क्रयापदम् (पाठात्) वाक्यम् हन्द अथ
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मिय संस्कृ तिवषये िजज्ञ ासा वतते।
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मेरे मन म संस्कृत के वषय म जज्ञासा है।
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३ जीविन्त जन्तवः आहारे ण जीविन्त। जीव आहार से जीते ह।
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४ वधते साित्त्वके न आहारे ण शरीरं वध ते। सा त्त्वक आहार से शरीर बढ़ता है।
िशष्यः श्रद्धg l a
५ से वते
a या गुरुं से वते। शष्य श्रद्धा से गुरु क सेवा करता है।
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६ लभते योगेन मानवः आरोग्यं लभते। योग से मनुष्य आरोग्य पाता है।
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७ भाषते स त्पुरुषः सवदा स त्यं भाषते। सज्जन सदा सत्य बोलता
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e बालकः उ द्य ाने मोदते। बगीचे म प्रसन्न होता है।
agl९ यतते छात्रः ल क्ष्यिस द्ध ै यतते। छात्र लक्ष्य क स द्ध के लए प्रयत्न करता है।
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१० सहते वीरः क ष्टं सहते। वीर कष्ट सहता है।
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िवद्य या मनुष्यः शोभते।
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११ शोभते वद्या से मनुष्य शोभा पाता है।
१२ वन्दते भक्तः पातः ईश्वरं वन्दते। भक्त प्रातःकाल ईश्वर क वन्दना करता है।
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१३ कु रुते छात्रः पितिदनं गृहकाय ं कु रुते। छात्र प्र त दन गृहकाय करता है।
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साराgज्ञान बु द्ध म ही रहता है।
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समगज्ञ ानं बुद्धौ एव िवद्य ते।
agl १५ सञ्चाल्यन्ते सव िण इिन्द यािण मनसा स ञ्चाल्यन्ते। सारी इ न् याँ मन से चलाई जाती ह।
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१६ उच्यते अ ं सव षधम् इित उ च्यते। अन्न को ‘सव षध’ कहा जाता है।
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अस्मािभः पितिदनं योगासनं कतव्यम्।
agपlाणः सवथा रक्षणीयः।
१७ कतव्यम् हम प्र त दन योगासन करना चा हए।
१८ रक्षणीयः प्राण क सब प्रकार से रक्षा करनी चा हए।
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१९ से वताम् भवान् सवदा िहतकारकम् आहारं से वताम्। आप सदा हतकारी आहार ली जए।
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२० भवन्तः बह्मज्ञ ानाय तपः कु रुताम्। आप सब ब्रह्मज्ञान के लए तप क जए।
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ता लका क बनावट पर ध्यान द जए: पहले तेरह वाक्य लट् -लकार कतृवाच्य के ह, फर दो कमवाच्य के
(सञ्चाल्यन्ते, उच्यते), फर दो तव्यत्-अनीयर् के (कतव्यम्, रक्षणीयः), और अ न्तम दो लोट् -लकार के (सेवताम्,
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कुरुताम्)। इस प्रकार बीस वाक्य म पूरे पाठ का व्याकरण समा जाता है — यही ऐसा उत्तर है जो पूरे अंक दलाता
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है, केवल बीस वाक्य गन दे ने वाला नह
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अपने वाक्य बनाते समय: कता और क्रया का वचन अवश्य मलाइए, कम को द्वतीया म र खए, और करण को
तृतीया म। हर वाक्य के आगे कोष्ठक म उसका हन्द अथ लख दे ना अच्छ आदत है — इससे भूल स्वयं पकड़ म आ
जाती है।
प्र.4 अन्नरक्षणाय भवता के उपायाः क्रयन्ते इ त वणयत।
यह व्य क्तगत उत्तर वाला प्रश्न है — ‘आप अन्न क रक्षा के लए कौन-से उपाय करते ह?’ इसका कोई एक ‘पुस्तक-उत्तर’ नह है;
अपने घर, वद्यालय और गाँव/मुहल्ले से जुड़े स े उपाय ल खए। पर उत्तर पाठ से बँधा होना चा हए — वरुण का आदे श ही
इसका आधार है : ‘कदा प अन्नं न नन्द्यात्। कदा प अन्नं न प रहतव्यम्। प्रयत्नेन अन्नं बहु कुव त।’
अच्छे उत्तर म तीन स्तर आने चा हए — (१) व्य क्तगत (म क्या करता हूँ), (२) पा रवा रक/ वद्यालयीय (घर तथा वद्यालय म
क्या होता है), (३) सामा जक (अन्न उपजाने तथा बाँटने का काम)।
क्रमः उपायः (संस्कृतम्) क्या करना है ( हन्द ) पाठ से आधार
१ यावत् आवश्यकं तावद् एव स्थाल्यां थाली में उतना ही ले ता हू ँ िजतना खा सकूँ — जूठन कदा प अन्नं न प रहतव्यम्।
ग ृ ािम। िबलकु ल नही ं छोड़ ता।
२ अन्नस्य िनन्दां कदािप न करोिम। ‘यह स ब्ज़ ी अच्छी नही’ं — ऐसा कहकर खाना छोड़ ता कदा प अन्नं न नन्द्यात्।
नही;ं जो बना है उसका आदर करता हू।
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३ अविशष्टम् अन्नं न त्यजािम, अिप तु बचा हुआ भोजन फें कता नही;ं ठीक से ढककर रखता हू ँ अन्नं ह भूतानां ज्येष्ठम्।
क्षिु धतेभ्यः ददािम। या िकसी भूखे को दे दे ता हू।
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४ ग ृहे लघु-वािटकां रचयािम, शाकािन घर की छत या आँगन में छोटी वािटका बनाकर धिनया, प्रयत्नेन अन्नं बहु कुव त।
च उत्पादयािम। पालक , टमाटर उगाता हू।
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५ धान्यं शुष्के स्वच्छे च पात्रे रक्षािम। अनाज को सूखे, साफ़ और बन्द पात्र में रखता हू ँ तािक अन्नं सदा ईश्वरबु ा
नमी तथा कीड़ ों से न िबगड़ े। सेवताम्।
६ उत्सवेष ु आवश्यकाद् अिधकम् अन्नं िववाह-उ त्सव में अन्दाज़ से अिधक भोजन नही ं बनवाते; अन्नं न नन्द्यात् — अपव्ययः
न पाचयामः। बचे तो अ -बैक
न्न ं को दे ते है।
ं अ प नन्दा एव।
७ िवद्यालये ‘अन्न-अपव्यय-िनवारण’ िवद्य ालय में भोजनावकाश के समय ‘जूठन शून्य’ छात्रसंगोष्ठी (प रयोजना १)
इित िभित्तपत्रं रचयामः। अिभयान तथा िभित्त -पित्रका।
८ साित्त्वकम् आहारं से वे, दू िषतम् अन्नं ताज़ ा तथा साित्त्वक भोजन ले ता हू;ँ बासी या दू िषत अ
न्न सवदा सा त्त्वकं हतकारकं च
च त्यजािम। नही ं खाता। आहारं सेवताम्।
आदश उत्तरम् (नमूना अनुच्छेद) —
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अहम् अन्नरक्षणाय एतान् उपायान् करोिम —
पथमम्, अहं स्थाल्यां यावद् आवश्यकं तावद् एव अन्नं गृ ािम, अविशष्टं च न त्यजािम।
ि तीयम्, अहम् अन्नस्य िनन्दां कदािप न करोिम, यतः ‘अन्नं िह भूत ानां ज्येष्ठम्’।
त ृत ीयम्, गृहस्य वािटकायाम् अहं शाकािन उत्पादयािम, यतः ‘पयत्ने न अन्नं बहु कु व त’ इित उपिनषदः आदे शः।
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ु म्, धान्यं शुष्के पात्रे रक्षािम येन तत् न दू ष्येत ।
पञ्चमम्, िवद्यालये वयं ‘अन्नापव्ययः महान् दोषः’ इित िभित्तपत्रं रचयामः।
एवं वयं सव अन्नं दे वरूपेण पश्येम — एषः एव अस्माकं संक ल्पः।
( हन्द — म अन्न क रक्षा के लए ये उपाय करता हूँ : पहला, थाली म उतना ही लेता हूँ जतना आवश्यक हो और बचा हुआ फकता
नह । दूसरा, अन्न क नन्दा कभी नह करता, क्य क ‘अन्न ही प्रा णय म ज्येष्ठ है’। तीसरा, घर क वा टका म स ब्ज़याँ उगाता हूँ,
क्य क उप नषद् का आदे श है ‘प्रयत्नपूवक अन्न को खूब उपजाओ’। चौथा, अनाज को सूखे पात्र म रखता हूँ ता क वह ख़राब न हो।
पाँचवाँ, वद्यालय म हम ‘अन्न का अपव्यय बड़ा दोष है’ — यह भ त्त-पत्र बनाते ह। इस प्रकार हम सब अन्न को दे वता के रूप म
दे ख — यही हमारा संकल्प है।)
यह उत्तर अच्छा क्य है: हर उपाय के साथ पाठ का एक वाक्य जुड़ा है, इस लए उत्तर व्य क्तगत होते हुए भी पाठ
पर टका है। दूसरे, उपाय क्रम म ह — पहले अपनी थाली, फर घर, फर वद्यालय; छोटे से बड़े क ओर। तीसरे,
अ न्तम वाक्य एक संकल्प है — इसी से उत्तर पूरा माना जाता है।
प्र.5 मनसः काय दशसु वाक्येषु नरूपयत।
यहाँ ‘मन क्या-क्या करता है’ — यह ठ क दस संस्कृत वाक्य म लखना है। सारी सामग्री पाठ के मनोमयकोष वाले खण्ड (पृ.
९५), बृहदारण्यक-वचन तथा अमृत बन्दु के दोन ोक म है।
आदश उत्तरम् (दश वाक्या न) —
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१. मनः एव अस्माकं सवकमणः पवतकम् अिस्त।
२. समस्तािन इिन्द यािण मनसा एव सञ्चाल्यन्ते ।
३. मानवः मनसा एव सव ं काय ं सम्पादयित।
४. मनसः सङ् कल्पाः, भावाः, िवचाराश्च जायन्ते ।
५. मनः एव मनुष्याणां बन्धस्य मोक्षस्य च कारणम्।
६. िवषयासक्तं मनः बन्धाय भवित, िनिवषयं च मुक्त्यै।
७. मनः ि िवधम् अिस्त — शुद्ध म् अशुद्ध ं च।
८. कामः, सङ् कल्पः, िविचिकत्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृितः, अधृितः, ीः, धीः, भीः — एतत् सव ं मन एव।
९. यत् मनसा ध्यायित तद् एव वाचा वदित, तद् एव च कमणा करोित।
१०. अतः मनः सदा सत्कमणा साधनीयम्, शान्तम् उत्साहयुक्तं च करणीयम्।
( हन्द अनुवाद —) १. मन ही हमारे सब कम का प्रवतक है। २. सारी इ न् याँ मन से ही चलाई जाती ह। ३. मनुष्य मन से ही सब
काय पूरा करता है। ४. मन से ही संकल्प, भाव और वचार उत्पन्न होते ह। ५. मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है। ६.
वषय म आसक्त मन बन्धन का कारण बनता है और वषय से र हत मन मु क्त का। ७. मन दो प्रकार का है — शुद्ध और अशुद्ध।
८. काम, संकल्प, सन्दे ह, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैय, अधैय, लज्जा, बु द्ध और भय — यह सब मन ही है। ९. मन से जो सोचता है वही
वाणी से कहता है और वही कम से करता है। १०. इस लए मन को सदा सत्कम से साधना चा हए तथा शान्त और उत्साहयुक्त बनाना
चा हए।
उत्तर क बनावट दे खए: पहले चार वाक्य बताते ह क मन क्या करता है (प्रवतन, सञ्चालन, सम्पादन, उत्पादन);
बीच के चार बताते ह क मन कैसा है (बन्ध-मोक्ष का कारण, दो प्रकार का, दस वषय वाला); नवाँ बताता है मन का
प रणाम (सोच → वाणी → कम); और दसवाँ बताता है हमारा कतव्य। वणन से आरम्भ, कतव्य पर अन्त — यही
अच्छे उत्तर का ढाँचा है।
ध्यान द: वाक्य दस ही होने चा हए — गनकर ल खए। आठवाँ वाक्य लम्बा है, इस लए उसे लखते समय स न्ध
खोलकर ल खए (धृ तः + अधृ तः + ीः + धीः + भीः), जससे वसग क भूल न हो।
प्र.6 केषाञ्चन त्रयाणाम् आत्मनेप दधातूनां लट् -लोट् लकारयोः त्रषु पुरुषेषु रूपा ण स्मरत लखत च।
यहाँ अपनी पसन्द क तीन आत्मनेपद धातुए ँ लेकर उनके लट् तथा लोट् — दोन लकार के नौ-नौ रूप लखने ह। नीचे पाठ क
ही तीन धातुएँ ली गई ह — √सेव्, √लभ्, √वन्द् — क्य क तीन पाठ म आई ह और तीन सरल ह।
१. √सेव् (सेवा करना)
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पुरुषः लट् -लकारः (वतमान) लोट् -लकारः (आ ा/प्राथना)
एक. द्व. बहु. एक. द्व. बहु.
पथमपुरुषः से वते से वेते से वन्ते से वताम् से वेताम् से वन्ताम्
मध्यमपुरुषः सेवसे सेवेथे सेवध्वे सेवस्व सेवेथाम् सेवध्वम्
उत्तमपुरुषः सेवे सेवावहे सेवामहे सेवै सेवावहै सेवामहै
२. √लभ् (पाना)
पुरुषः लट् -लकारः लोट् -लकारः
एक. द्व. बहु. एक. द्व. बहु.
पथमपुरुषः लभते लभेते लभन्ते लभताम् लभेताम् लभन्ताम्
मध्यमपुरुषः लभसे लभेथे लभध्वे लभस्व लभेथाम् लभध्वम्
उत्तमपुरुषः लभे लभावहे लभामहे लभै लभावहै लभामहै
३. √वन्द् (वन्दना करना)
पुरुषः लट् -लकारः लोट् -लकारः
एक. द्व. बहु. एक. द्व. बहु.
पथमपुरुषः वन्दते वन्दे ते वन्द न्ते वन्दताम् वन्दे ताम् वन्द न्ताम्
मध्यमपुरुषः वन्दसे वन्दे थे वन्दध्वे वन्दस्व वन्दे थाम् वन्दध्वम्
उत्तमपुरुषः वन्दे वन्दावहे वन्दामहे वन्दै वन्दावहै वन्दामहै
दोन लकार साथ रखकर दे खए — अन्तर केवल चार जगह है: ते→ताम्, एते→एताम्, अन्ते→अन्ताम्;
से→स्व, एथे→एथाम्, ध्वे→ध्वम्; ए→ऐ, आवहे→आवहै, आमहे→आमहै। अथात् लट् के जो रूप ‘ए’ पर समाप्त
होते ह, लोट् म वही ‘ऐ’ पर समाप्त होते ह; और जो ‘ते/थे/ध्वे’ पर, वे ‘ताम्/थाम्/ध्वम्’ पर। इतना पकड़ ली जए तो
कसी भी आत्मनेपद धातु के अठारह रूप अपने आप बन जाएँगे।
याद रखने क यु क्त: रूप अकेले मत र टए, वाक्य म र टए — ‘ शष्यः गुरुं सेवते’ (लट् ), ‘ शष्यः गुरुं सेवताम्’
(लोट् ); ‘अहं वद्यां लभे’ (लट् ), ‘अहं वद्यां लभै’ (लोट् )। इस तरह पढ़ा हुआ कभी नह भूलता, और प रयोजना ३ के
बीस वाक्य भी साथ-साथ बन जाते ह।
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अस्माकं जीवने प्रत्येकं कोषस्य वकासाय क क कतु शक्यते इत्युप र चचा कुरुत।
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a समूl ह-चचा का काय है — ‘हमारे जीवन म हर कोष के वकास के लए क्या-क्या कया जा सकता है?’ इसका उत्तर एक ‘सही
सूची’ नह है; पर अच्छ चचा क व ध अवश्य है।
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चचा कैसे क जए ( व ध) —
a s em‘लेखकः’ बने जो सुझाव लखता जाए।
gl— वशेषकर यह वाक्य : ‘अन्नमयकोषस्य वकासं वना प्राणमयकोषस्य
1. पाँच समूह बनाइए, हर समूह एक कोष ले। एक वद्याथ
2. पहले ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ खण्ड फर से पaढ़ए
वकासः नैव भ वतुं शक्नो त।’ चचा इसी क्रम से चले।
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3. हर सदस्य एक ऐसा उपाय बताए जो वह स्वयं इसी सप्ताह कर सके — बड़ी बात नह , छोटा और करने योग्य काम।
s e m क वह सचमुच हुई
या नह । om
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4. अन्त म समूह एक ‘पञ्चकोष- दनचया’ बनाए और यह भी लखे क सप्ताह-भर बाद कैसे जाँचा जाएगा
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em म ये बात अवश्य आएँ — हर उपाय पाठ के कसी वाक्य से जुड़ा हो; उपाय क्रम म ह (स्थूल से सूक्ष्म क ओर); और
अच्छेsउत्तर
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a हर उपाय नापा जा सके।
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कोषः प्र त दनं करणीयम् व्यवहार म ( हन्द ) कैसे जाँच
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(संस्कृतम्)
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अन्नमयकोषः साित्त्वकं िहतकारकं च आहारं समय पर तीन बार सन्तु लत भोजन; जूठन सप्ताह म कतने दन थाली
से वामहै। अ ं न िनन्दामहै, न च
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शून्य; दन म आठ गलास जल साफ़ रही — ता लका
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त्यजामः। बनाइए
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पितिदनं पाणायामः आसनािन च
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पाणमयकोषः दस मनट प्राणायाम; तीस मनट खेल; रात न ा के घण्टे तथा प्राणायाम
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करणीयािन। यथासमयं शयनं दस बजे तक सो जाना के दन ग नए
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जागरणं च।
मनोमयकोषः मनः स त्कम णा साधनीयम्, शान्तम् प्र त दन पाँच मनट मौन; सप्ताह म एक बार सप्ताह म कतनी बार क्रोध
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उ त्साहयुक्तं च करणीयम्।
comगनना
कसी क सहायता; क्रोध आने पर दस तक रोक पाए — डायरी
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िवज्ञानमयकोषः
कतव्यः।
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पितिदनं ध् यानं योगासनं स्वाध् यायश्च पढ़ा हुआ अपने शब्द म लखना; कोई भी
सन्दे श आगे भेजने से पहले जाँचना; एक नई
महीने म कतनी पुस्तक/
लेख पढ़े
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पुस्तक हर महीने
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प क्षय के लए जल-पात्र; महीने म एक e
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आनन्दमयकोषः पािणषु दया कतव्या, परोपकारः वा- महीने म कतने सेवा-काय
m . कतव्यः। राग ेषादयः हातव्याः। दवस’; प्र त दन एक कृतज्ञता लखना हुए
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agl आदश उत्तरम् (नमूना — चचा का नष्कष) —
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