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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 9: कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः
सनातनः
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
112 – 126 19 72 हन्द
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 9: कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः
सनातनः
कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः शारदा (कक्षा ९) का नवमः पाठः है। यह रूपक (नाटक) वधा का पाठ है — महामहोपाध्याय वद्वान् एन्.
रङ्गनाथशमा र चत लघुरूपक एकचक्रम् के तृतीय तथा चतुथ अङ् क से उद्धत अंश, जसका कथावस्तु महाभारत का प्र सद्ध बकासुरवध है। पाठ म
तीन ोक ह तथा शेष सारा भाग गद्य-संवाद है। पाठ के साथ पुस्तक सव शब्दे न भासते (शब्दाथ-ता लका, जसका अ न्तम ‘मातृभाषया अथ
लखत’ स्तम्भ खाली है), अत्र इदम् अवधेयम् ( ोकानां भावाथः), स्वाध्यायान्मा प्रमदः (क व-प रचय तथा अमरकोष के तीन ोकांश) तथा यस्तु
क्रयावान् मनुजः स वद्वान् (तीन क्रयात्मक काय) दे ती है। अभ्यास अभ्यासाद् जायते स द्धः शीषक के नीचे दस प्रश्न म है — एकपदे न उत्तरम्,
पूणवाक्येन उत्तरम्, ‘केन कं प्र त उक्तम्’, स न्ध वच्छे दः स न्धनामस हतः, पयायवा चमेलनम्, वपरीताथकशब्दाः, मञ्जूषातः वशेषणपदचयनम्,
समस्तपद नमाणम्, वाक्यानां भावैः सह सम्मेलनम् तथा वाच्यप रवतनम्।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
शारदा (कक्षा 9) 112 – 126
खं ड प्रश्न
19 72
माध्यम
हन्द
पाठ-प रचयः तथा पूवकथा — पृष्ठ 112
रूपकस्य प्रस्तावना तथा ‘अङ् कद्वयस्य पूवकथाप्रसङ्गः’
पाठ-प रचयः
प्र.1 पाठस्य आरम्भे यः प्रस्तावना-गद्यांशः दत्तः, तस्य आशयं लखत — “रामायणं महाभारतं चे त द्वौ प्र सद्धौ
इ तहास-ग्र ौ। महाभारतम् अवलम्ब्य बहवो ग्र ाः वर चताः। तेषु महामहोपाध्यायेन श्रीरङ्गनाथशमणा वर चतम्
एकचक्रम् इ त लघुरूपकम् अन्यतमम्। महाभारते प्र तपा दतः बकासुरवधः अस्य कथावस्तु। अयं पाठ्य-भागः
एकचक्रम् इ त रूपकस्य तृतीय-चतुथाङ् काभ्याम् उद्धतः।”
अस्य गद्यांशस्य आशयः — रामायणं महाभारतं च — एतौ द्वौ भारतस्य प्र सद्धौ इ तहासग्र ौ स्तः। महाभारतम्
आधारीकृत्य बहवः ग्र ाः र चताः। तेषु महामहोपाध्यायेन श्रीरङ्गनाथशमणा वर चतम् ‘एकचक्रम्’ इ त लघुरूपकम्
अन्यतमम् अ स्त। महाभारते व णतः बकासुरवधः एव अस्य रूपकस्य कथावस्तु। अयं पाठ्यभागः तस्य एव रूपकस्य
तृतीयचतुथाङ् काभ्यां गृहीतः।
( हन्द — रामायण और महाभारत — ये दो भारत के प्र सद्ध इ तहास-ग्रन्थ ह। महाभारत को आधार बनाकर बहुत-से ग्रन्थ रचे गए।
उनम महामहोपाध्याय श्री रङ्गनाथशमा द्वारा र चत ‘एकचक्रम्’ नामक लघुरूपक भी एक है। महाभारत म व णत बकासुर-वध ही इस
रूपक क कथावस्तु है। यह पाठ्यभाग उसी रूपक के तीसरे और चौथे अङ् क से लया गया है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः AglaSem · NCERT Solutions
पदम् / वाक्यांशः क्या बताता है
इितहास-ग न्थौ रामायण तथा महाभारत को भारतीय पर म् परा ‘इितहास ’ कहती है — अथ त् ‘इित ह आस ’ = ‘ऐसा ही हुआ था’। ये
काव्य भी है ं और वृत्त ान्त भी।
महाभारतम् अवलम्ब्य ‘अवल म्ब्य’ = सहारा ले क र। कािलदास से ले क र आज तक असंख्य किवयों ने महाभारत की कथाओं पर नाटक
और काव्य िलखे है।
ं
लघुरूपकम् रूपक = नाटक। ‘लघुरूपक ’ अथ त् छोटा नाटक , िजसमें अङ् क कम होते है।
ं इसी से यह िस द्ध होता है िक यह
पाठ ग द्य नही,ं नाट -संवाद है।
कथावस्तु नाटक की मूल कथा। यहाँ वह है — बकासुर का वध।
ततृ ीय-चतुथ ङ् काभ्याम् ‘अङ् काभ्याम्’ पञ्चमी िद्ववचन (अपादाने पञ्चमी) — दो अङ् कों से उ द्धतृ । अतः पाठ में दो दृ श्य है ं : घर का दृ श्य
उद्धृतः तथा वन का दृ श्य।
यह भू मका क्य आवश्यक है: बना इसे पढ़े वद्याथ को लगेगा क पाठ महाभारत से सीधे लया गया है। वास्तव
म यह बीसव शताब्द के एक संस्कृत वद्वान् क मौ लक नाट्य-रचना है, जसका कथाबीज महाभारत से लया गया
है। इसी से पता चलता है क संस्कृत आज भी जी वत रचनाशील भाषा है — क व रङ्गनाथशमा का दे हावसान २०१४
म हुआ, जैसा पुस्तक स्वयं पृष्ठ १२६ पर बताती है।
व्याकरण-सङ् केत: ‘चे त’ = च + इ त (गुण स न्ध? नह — यहाँ ‘च’ के अकार तथा ‘इ त’ के इकार से गुण स न्ध
होकर ‘ए’ बना : अ + इ = ए)। ‘ वर चताः’, ‘प्र तपा दतः’, ‘उद्धतः’ — तीन क्त प्रत्ययान्त कमवाच्य रूप ह, जो
कम के लङ्ग-वचन का अनुसरण करते ह (ग्रन्थाः वर चताः, वधः प्र तपा दतः, भागः उद्धतः)।
प्र.2 ‘अङ् कद्वयस्य पूवकथाप्रसङ्गः’ इ त खण्डे का कथा व णता ? सङ् क्षेपेण लखत।
उत्तरम् — पाण्डवाः एकचक्रनगरे कस्य चत् ाह्मणस्य गृहे प्रच्छन्नाः नवस न्त स्म। एकदा गृहस्वा मनः गृहे रोदनध्व न श्रुत्वा
कुन्ती तत्र गत्वा रोदनकारणं पृष्टवती। शोकाकुलेन प रवारेण सा ज्ञा पता यत् नगरस्य ना तदूरे तेन बकनाम्ना असुरेण
सह स न्ध नयमानुसारं प्र त दनम् एकः नगरवासी स्वेच्छया तस्य भक्ष्यं भव त, त स्मन् दने पयायेण तस्य एव
ाह्मणप रवारस्य ब लदानस्य वारः आसीत्। तेषां दुः त ज्ञात्वा ‘स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषया म’ इ त कुन्ती
प्र तज्ञां कृतवती। एतत् ज्ञात्वा ‘ ाह्मणेन कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारकालः स न्न हतः’ इ त भावयन् भीमः
मृष्टान्नभाण्डस हतः बकासुरस्य समीपं गन्तुम् उद्युक्तः अभवत्।
( हन्द — पाण्डव एकचक्रा नगरी म कसी ाह्मण के घर छपकर रहते थे। एक दन घर के स्वामी के घर म रोने क आवाज़ सुनकर
कुन्ती वहाँ गई और रोने का कारण पूछा। शोक से व्याकुल प रवार ने बताया क नगर से थोड़ी दूर रहने वाले बक नामक असुर के
साथ स न्ध क शत के अनुसार प्र त दन एक नगरवासी अपनी इच्छा से उसका भोजन बनता है, और उस दन बारी से उसी ाह्मण-
प रवार के ब लदान का दन था। उनक दुदशा जानकर कुन्ती ने प्र तज्ञा क क ‘अपने पुत्र म से एक को म बकासुर के पास
भेजूँगी।’ यह जानकर भीम ने सोचा क ाह्मण ने जो उपकार कया है उसके प्रत्युपकार का समय आ गया है, और वह स्वा दष्ट
भोजन से भरे बतन स हत बकासुर के पास जाने को तैयार हो गया।)
कथा-क्रमः —
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क्रमः घटना (संस्कृतम्) हन्द म
१ पाण्डवाः एकचक्रनगरे बाह्मणस्य ग ृहे िनवसिन्त। लाक्षाग ृह से बचे पाण् डव एकचक्रा नगरी में बाह्मण के घर िछपकर
रहते है।
ं
२ कु न्ती रोदनध्विनं श्रुत्वा रोदनकारणं पच्ृ छित। कु न्ती रोने की आवाज़ सुनकर कारण पूछती है।
३ सिन्धिनयमानुस ारं पितिदनं किश्चत् नगरवासी असुर स्य भक्ष्यं सिन्ध की शत — हर िदन एक नगरवासी बक का भोजन बनेग ा।
भवेत।
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४ ति ने पय येण तस्यैव बाह्मणपिरवारस्य वारः आसीत्। उस िदन बारी उसी बाह्मण-पिरवार की थी।
५ कु न्ती ‘स्वपुत्र ेष ु एकं पेषयािम’ इित पितज्ञां कृ तवती। कु न्ती ने अपना एक पुत्र भेजने का वचन िदया।
६ भीमः पत्युपकारकालः सिन्निहतः इित भावयन् गन्तुम ् उद्य क्ु तः। भीम ने इसे पत्युपकार का अवसर माना और जाने को तैयार हो
गया।
यह पूवकथा पाठ क कुंजी है: पूरे पाठ का नै तक तक इसी म छपा है। ाह्मण ने वष तक भक्षा दे कर पाण्डव
का पालन कया — यही ‘कृतम्’ ( कया गया उपकार) है। अब उसका बदला चुकाने का अवसर आया — यही
‘प्र तकृतम्’ है। पाठ के ोक ‘कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः’ का पूरा अथ इसी पृष्ठभू म से खुलता है।
इसी लए पुस्तक ने यह खण्ड संवाद से पहले रखा है।
ध्यान द: ‘एकचक्रा’ नगरी का नाम ही नाटक का नाम बना — एकचक्रम्। ‘पयायेण’ का अथ है ‘बारी-बारी से’ —
यही शब्द आगे संवाद म भी आता है (‘पयायक्रमेण तस्मै ब लमाहर न्त पौराः’, ‘श्वः प्रभाते भवत्यस्य वप्रस्य पयायः’,
‘पयायप ततं प्र तवे शनो ाह्मणस्य’)। एक ही शब्द को तीन रूप म पहचानना इस पाठ का अच्छा अभ्यास है।
नाट्यांशः १ — कुन्ती-भीमसंवादः — पृष्ठ 112–114
(ततः प्र वश त कुन्ती भीमसेनेन सह) — प्र तज्ञायाः नवेदनम्, भीमस्य सङ् कल्पः
नाट्यां शः
प्र.1 ‘(ततः प्र वश त कुन्ती भीमसेनेन सह) कुन्ती — पुत्र ! क ञ्चत् प्र तश्रुतं मया प्र तवे शने ाह्मणाय। भीमः —
सम्यगनु ष्ठतम्। आ तथेयः कल तत्र भवान् उपकता वस त प्रदानेन। कुन्ती — आकणय, अस्य एकचक्रस्य
पुरस्यादूरव त न पवते वस त बकनामा दै त्यः। भीमः — श्रुतं तस्य दुरात्मनो वृत्तम्। पयायक्रमेण तस्मै ब लमाहर न्त
पौराः।’ — अस्य संवादस्य आशयं सप्रसङ्गं लखत।
आशयः — कुन्ती भीमम् आह — ‘पुत्र ! मया प्र तवे शने ाह्मणाय क ञ्चत् प्र तश्रुतम् (वचनं दत्तम्)।’ भीमः उत्तर त —
‘सम्यक् एव अनु ष्ठतं भवत्या। सः प्र तवेशी अ त थसेवापरायणः; अन्नप्रदानेन सः अस्माकम् उपकता एव।’ कुन्ती कथय त
— ‘शृणु, अस्य एकचक्रनगरस्य समीप े पवते बकः नाम दै त्यः वस त।’ भीमः वद त — ‘तस्य दुरात्मनः वृत्तान्तः मया
श्रुतः। नगरवा सनः बारीवारेण तस्मै ब ल प्रयच्छ न्त।’
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः
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( हन्द — कुन्ती भीम से कहती है — ‘बेटा! मने पड़ोसी ाह्मण को कुछ वचन दया है।’ भीम उत्तर दे ता है — ‘आपने ठ क ही
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कया। वह पड़ोसी अ त थ-सेवा करने वाला है; अन्न दे कर वही हमारा उपकार करने वाला है।’ कुन्ती कहती है — ‘सुनो, इस
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बारी से उसे ब ल .देcते ह।’)
एकचक्रा नगर के पास ही पवत पर बक नाम का दै त्य रहता है।’ भीम कहता है — ‘उस दुष्ट का वृत्तान्त मने सुना है। नगरवासी बारी-
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aपदम् शब्दाथः व्याकरण-सङ् केतः
com प्र त + √श्रु + क्त — भावे प्रयोगः, अतः कता ‘मया’ तृतीयायाम्
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पितश्रुतम् पितज्ञ ातम् — वचन िदया गया
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पितवेिशने िनकटग ृहवािसने — पड़ोसी के िलए सम्प्रदाने चतुथ (‘ ाह्मणाय’ अ प चतुथ्याम्)
सम्यगनुिष्ठतम् स म् यक् + अनुिष्ठतम् — ठीक ही िकया गया व्यञ्जनस न्धः (क् + अ → ग्)
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आितथेयः अितथौ साध ःु , अितिथसे वाकारकः — अितिथ-से वक
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अ त थ + ढञ् → आ तथेय (‘अ त थ के प्र त अच्छा’)
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m शणृ ु — सुनो l a
em ag मध्यमपुरुष एकवचन
आ + कण + णच्, लोट् लकार,
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aglपुरस्यादू रवितिन पुर य अदू रे वतमाने — नगर से थोड़ी दू र ि थत
स् स् द घस न्धः (पुरस्य + अदूरव त न); अ धकरणे सप्तमी
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दुर ात्मनो वृत्त म् दुष्टस्य आचरणम् — दुष्ट का वृत्त ान्त दुरात्मनः + वृत्तम् — वसगस न्धः (अः + व् → ओ)
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पय यक्रमेण वारंवारे ण — बारी-बारी से तृतीया (प्रकारे / इत्थम्भूते तृतीया)
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संवाद-कौशल दे खए: कुन्ती सीधे यह नह कहती क ‘मने तुम्ह भेजने का वचन दे दया है’। वह पहले ‘ क ञ्चत्
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प्र तश्रुतम्’ कहकर बात छे ड़ती है, फर बक का प रचय दे ती है — अथात् धीरे-धीरे बात को उस बन्दु तक ले जाती है
mष्ठतम्’ कहकर माता को आश्वस्त कर दे ता है क वचन दे ना ठ क ही हुआ।glas e
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जहाँ पुत्र स्वयं समझ जाए। यही नाट्यकार का कौशल है। और भीम भी उतना ही सजग है — वह तुरन्त
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‘सम्यगनु
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भाव का बीज यह है: ‘उपकता वस त प्रदानेन’ — ाह्मण अन्नदान करके हमारा उपकार करता हुआ रहता है।
यही ‘कृतम्’ है, जसका ‘प्र तकृतम्’ आगे
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ोक म माँगा जाएगा। पूरा पाठ इसी एक वाक्य पर खड़ा है।
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‘कुन्ती — श्वः प्रभाते भवत्यस्य वप्रस्य पयायः। भीमः — बाढम्। कुन्ती — न चैतावत्। मानुषभोजी स राक्षसः
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श्रूयते। भोज्यसमाहारे मानुषोऽ प तस्मै प्रेष यतव्यः। तस्माद् बालकस्य पता तपस्वी शोच त। भीमः —
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व दतमव शष्टम्। मत्पुत्रेषु कोऽ प प्रेष यष्यत इ त भवत्या प्र तश्रुतम्। कुन्ती — (मौनमवलम्बते )’ — अस्य आशयं
.co लखत तथा ‘मौनमवलम्बते’ इ त नेपथ्य नदशस्य महत्त्वं स्पष्टयत। agl
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agl उत्तर
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आशयः — कुन्ती वद त — ‘श्वः प्रातः अस्य ाह्मणस्य पयायः (वारः) भव त।’ भीमः ‘बाढम्’ (आम्) इ त सम्म त
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प्रकटय त। कुन्ती पुनः वद त — ‘एतावत् एव न; सः राक्षसः मानुषभोजी इ त श्रूयते। भोज्यसमूहेन सह एकः मनुष्यः अ प
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s e m तपस्वी पता शोच त।’ भीमः वद त — ‘अव शष्टं मया व दतम् — ‘मम
aप्र तश्रुतम्।’ तदा कुन्ती मौनम् अवलम्बते।
तस्मै प्रेषणीयः भव त। अत एव तस्य बालकस्य
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पुत्रेषु क श्चत् प्रेष यष्यते’ इ त भवत्या
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( हन्द — कुन्ती कहती है — ‘कल सवेरे इस ाह्मण क बारी है।’ भीम ‘ठ क है’ कहकर सहम त दे ता है। कुन्ती फर कहती है —
‘बस इतना ही नह ; वह राक्षस मनुष्य-भक्षी सुना जाता है। भोजन के ढे र के साथ एक मनुष्य भी उसे भेजना पड़ता है। इसी लए उस
बालक का तपस्वी पता शोक कर रहा है।’ भीम कहता है — ‘शेष बात म समझ गया — “मेरे पुत्र म से कोई भेजा जाएगा” — यह
आपने वचन दे दया है।’ तब कुन्ती चुप रह जाती है।)
पदम् अथः तथा व्याकरणम्
श्वः आगािमिन िदने — कल (अव्यय)
पय यः वारः, क्रमः — बारी (पुं.प.ए .व.)
बाढम् नूनम्, आम् — ‘हाँ, िनश्चय ही’ (अव्यय)
न चैतावत् न च एतावत् — ‘के वल इतना ही नही’ं । च + एतावत् = चैतावत् (वृिद्धसिन्धः, अ + ए = ऐ )
मानुषभोजी मानुषान् भुङ्क्ते इित — मनुष्यों को खाने वाला (उपपदतत्पुरुषः, िणिन पत्ययः)
भोज्यसमाहारे भोज्यानां समाहारः, तिस्मन् — भोजन के समूह के साथ
पेषियतव्यः पेषणीयः — भेजा जाना चािहए (√इष् िणच् + तव्यत्, िविध -कृ त्य)
िविदतमविशष्टम् िविदतम् + अविशष्टम् — ‘शेष बात जान ली’ (व्यञ् जनसिन्धः, म् + अ)
‘मौनमवलम्बते’ का महत्त्व: यही इस दृश्य क सबसे सशक्त पं क्त है — और उसम एक भी शब्द नह है। कुन्ती ने
कभी स्पष्ट रूप से नह कहा क ‘मने भीम को भेजने का वचन दया’। भीम स्वयं समझ जाता है और स्वयं कह दे ता
है। तब कुन्ती मौन हो जाती है — यह मौन ही उसक स्वीकृ त है, और साथ ही एक माता क उस पीड़ा का चह्न है
जसे शब्द म नह कहा जा सकता। नाटक म ऐसे नेपथ्य- नदश (stage direction) पात्र के भीतर का भाव
दखाने का साधन होते ह।
ध्यान द: ‘तपस्वी’ शब्द यहाँ दो अथ एक साथ दे ता है — (१) तपस्या करने वाला ाह्मण, (२) बेचारा, दयनीय।
संस्कृत म ‘तपस्वी’ का यह दूसरा अथ नाटक म बहुत आता है। दोन अथ यहाँ ठ क बैठते ह, इसी लए शब्द का
चुनाव सुन्दर है।
प्र.3 ‘भीमः — मातः ! नास्त्यत्र कमप्यनुशो चतव्यम्। क्ष त्रयाण्या यदु चतं तदनु ष्ठतम्। युक्तोऽयं प्र तश्रवः। श्रो त्रयोऽयं
प्र तवेशी प्रत्युपकारमह त। पश्य — भैक्षप्रदानेन चरं परैरुपकृता वयम्। कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः॥
अहमेव बकासुरम भग मष्या म।’ — भीमस्य एतस्य कथनस्य आशयं लखत। अस्मात् भीमस्य क दृशं च रत्रं
प्रकट भव त ?
आशयः — भीमः मातरं सान्त्वय त — ‘मातः ! अत्र कम प अनुशोचनीयं ना स्त। क्ष त्रयस्य पत्न्या यत् उ चतम् आसीत्
तदे व अनु ष्ठतम्। अयं प्र तश्रवः (वचनम्) युक्तः एव। अयं वेदाध्यायी प्र तवेशी प्रत्युपकारम् अह त। पश्य — भक्षादानेन
चरकालं यावत् वयम् अन्यैः उपकृताः; अतः कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारः भवतु — एष एव सनातनः धमः। अहम् एव
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बकासुरस्य समीपं ग मष्या म।’
( हन्द — भीम माता को धीरज बँधाता है — ‘माँ! इसम शोक करने योग्य कुछ भी नह है। एक क्षत्राणी को जो करना उ चत था,
वही आपने कया। यह वचन उ चत ही है। यह वेदपाठ पड़ोसी प्रत्युपकार का अ धकारी है। दे खए — भक्षा दे कर दूसर ने बहुत
समय तक हम पर उपकार कया है; अतः कए हुए उपकार का बदला चुकाया जाए — यही सनातन धम है। म ही बकासुर के पास
जाऊँगा।’)
भीम का च रत्र —
गुणः पाठ का प्रमाण क्या सद्ध होता है
कृ तज्ञता भैक्षप्रदानेन चरं परैरुपकृता वयम् जो अन्न वष ं खाया, उसे वह ऋण मानता है — भूल ा नही ं है।
मातभृ िक्तः क्ष त्रयाण्या यदु चतं तदनु ष्ठतम् माता के िनणय पर पश्न नही ं उठाता, उलटे उसे उिचत िस द्ध करता है।
धै यम् / िनभयता अहमेव बकासुरम भग मष्या म ‘कोई जाए ’ नही ं कहता — ‘मैं ही जाऊँगा’ कहता है। ‘एव’ शब्द ही िनणय है।
धमबोधः श्रो त्रयोऽयं प्र तवेशी प्रत्युपकारमह त पात्र -अपात्र का िववेक — जो श्रोित्र य है, वह पत्युपकार का अिधकारी है।
माता को सान्त्वना नास्त्यत्र कमप्यनुशो चतव्यम् स्वयं म ृत्यु के मुख जा रहा है, िफर भी पहले माता का शोक दू र करता है।
तक का क्रम दे खए: भीम भावुक होकर नह , तक से बोलता है — (१) शोक का कोई कारण नह , (२) आपने
क्षत्राणी के योग्य ही कया, (३) वचन उ चत है, (४) यह पड़ोसी प्रत्युपकार के योग्य पात्र है, (५) और अन्त म
सद्धान्त-वाक्य — ‘कृतं प्र तकृतं भूयात्’। पहले कारण, फर सद्धान्त, फर नणय — यही सुव्यव स्थत भाषण क
व ध है, और परीक्षा म उत्तर लखने क भी।
व्याकरण: ‘नास्त्यत्र’ = न + अ स्त + अत्र (न + अ स्त → ना स्त, द घस न्धः; अ स्त + अत्र → अस्त्यत्र, यण्
स न्धः)। ‘क्ष त्रयाण्या’ — क्ष त्रयस्य पत्नी = क्ष त्रयाणी (ङ ष् + आनुक्), तृतीया एकवचन ‘क्ष त्रयाण्या’; यहाँ कत र
तृतीया है क्य क ‘अनु ष्ठतम्’ क्तप्रत्ययान्त कमवाच्य/भाववाच्य रूप है। ‘युक्तोऽयम्’ = युक्तः + अयम्
( वसगस न्धः)।
प्र.4 ‘कुन्ती — वत्स भीम ! अनुरूपम भ हतं भरतवंशप्रद पेन मम पुत्रेण। भक्ष्यभोज्या दकं मृष्टान्नं शकटपूरं पूर यत्वा
प्रेषणीयं भव त राक्षसाय। तदे तत् स ी क्रयता म त प्रेर यष्या म ाह्मणकुटु म्बम्। भीमः — अहो ! प्रयं मे।
स ी क्रयताम्। अपर मदं प्रयमनु ष्ठतं मे भवत्या। प्रभूतमुपाह रष्यते भोजनम्।’ — अस्य आशयं लखत।
‘भरतवंशप्रद पः’ इ त पदस्य औ चत्यं च स्पष्टयत।
आशयः — कुन्ती वद त — ‘वत्स भीम ! भरतवंशस्य द पेन मम पुत्रेण अनुरूपम् एव उक्तम्। भक्ष्य-भोज्य-आ दकं
स्वा दष्टम् अन्नं शकटं पूर यत्वा राक्षसाय प्रेषणीयं भव त। ‘तत् एतत् स ी क्रयताम्’ इ त अहं ाह्मणकुटु म्बं प्रेर यष्या म।’
भीमः प्रहृष्टः वद त — ‘अहो ! एतत् म ं प्रयम्। स ी क्रयताम्। भवत्या इदम् अपरम् अ प प्रयं कृतम् — प्रभूतं भोजनं
मया उपाह रष्यते (भक्ष यष्यते)।’
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( हन्द — कुन्ती कहती है — ‘बेटा भीम! भरतवंश के द पक मेरे पुत्र ने अपने योग्य ही कहा है। खाने-पीने क सामग्री तथा स्वा दष्ट
भोजन गाड़ी भरकर राक्षस के पास भेजना पड़ता है। “वह सब तैयार कया जाए” — ऐसा कहकर म ाह्मण-प रवार को प्रे रत
करूँगी।’ भीम प्रसन्न होकर कहता है — ‘वाह! यह तो मुझे प्रय है। तैयार कया जाए। आपने यह दूसरा प्रय काम भी कर दया —
इतना सारा भोजन म चट कर जाऊँगा।’)
पदम् अथः तथा व्याकरणम्
अनुरूपमिभिहतम् अनुरूपम् + अिभिहतम् — ‘योग्य ही कहा गया’। अिभ + √धा + क्त = अिभिहतम्
भरतवंशपदीपेन ृ ीया)
भरतवंशस्य पदीपः, तेन — भरतवंश के दीपक ने (कतिर तत
शकटपूर म् शकटं पूर यित इित — गाड़ी भर (उपपदसमासः)
सज्जीिक्रयताम् स ज्जं िक्रयताम् — तैयार िकया जाए (कम वाच्य, लोट् लकार , िच्व-पत्ययः)
पभूतम् अिधकम्, िवपुल म् — बहुत सारा
उपाहिरष्यते उप + आ + √हृ , ल ृट् लकार , कम वाच्यम् — ‘लाया/खाया जाएगा’
‘भरतवंशप्रद पः’ क्य उपयुक्त है: कुन्ती भीम को केवल ‘पुत्र’ नह , वंश का द पक कहती है। इसम तीन बात
एक साथ ह — (१) द पक स्वयं जलकर दूसर को प्रकाश दे ता है; भीम भी अपना जीवन दाँव पर लगाकर ाह्मण-
प रवार को बचाने जा रहा है। (२) द पक वंश क क त का प्रतीक है — भीम का यह कम भरतवंश का यश
बढ़ाएगा। (३) यह रूपक अलङ् कार है — भीम पर द पक का आरोप। ध्यान द जए, यही पद अभ्यास के प्रश्न १
(च) म पूछा गया है।
हास्य क छाया: इतने गम्भीर क्षण म भी भीम का अ न्तम वाक्य ‘प्रभूतमुपाह रष्यते भोजनम्’ मुस्कान ले आता है
— वह मृत्यु के मुख जा रहा है, पर उसे भोजन क प्रसन्नता है! यही वीर और हास्य का मेल इस रूपक क वशेषता
है, और अगले दृश्य म नकुल-सहदे व इसी को और बढ़ाते ह।
पाठस्य त्रयः ोकाः — पृष्ठ 114, 116, 117
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः AglaSem · NCERT Solutions
पदच्छे दः · अन्वयः · शब्दाथः · हन्द अथः · भावः
ोकाः
प्र.1 प्रथमस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “भैक्षप्रदानेन चरं परैरुपकृता वयम्। कृतं प्र तकृतं
भूयादे ष धमः सनातनः॥”
भै क्षपदाने न िचरं परैरु पकृ ता वयम्।
कृ तं पितकृ तं भूयादे ष धमः सनातनः॥
पदच्छे दः — भैक्ष-प्रदानेन + चरम् + परैः + उपकृताः + वयम् + कृतम् + प्र तकृतम् + भूयात् + एषः + धमः + सनातनः।
अन्वयः — वयं चरं परैः भैक्षप्रदानेन उपकृताः (स्मः)। (अतः) कृतं प्र तकृतं भूयात्। एषः सनातनः धमः (अ स्त)।
पदम् शब्दाथः
भैक्षपदानेन ृ ीया)
िभक्षायाः पदानेन — िभक्षा दे ने से (करणे तत
िचरम् दीघ कालं यावत् — बहुत समय तक (अव्ययम्)
परै ः ृ ीया)
अन्यैः जनैः — दू स रों के द्वारा (कतिर तत
उपकृ ताः उपकारं पाप्ताः — उपकृ त, िजन पर उपकार िकया गया
कृ तम् यः उपकारः कृ तः — िकया हुआ उपकार
पितकृ तम् पत्युपकृ तम् — बदले में िकया गया उपकार
भूयात् भवेत ् — हो जाए (√भू, आशीिल ङ् लकार , पथमपुरुष एकवचन)
सनातनः शाश्वतः, िनत्यः — सदा से चला आ रहा, शाश्वत
हन्द अथ — दूसर ने भक्षा दे कर बहुत समय तक हम पर उपकार कया है। (अतः) कए हुए उपकार का बदला अवश्य चुकाया
जाए — यही सनातन धम है।
भावः (पुस्तक का अपना भावाथ १): “वयं नाग रकैः बहुकालं भक्षा-प्रदानेन पो षताः। उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं
भवेत् इ त एषः शाश्वतः धमः।” — यही ोक पूरे पाठ का शीषक- ोक है; पाठ का नाम इसी दूसरी पं क्त से बना
है। भीम यहाँ कोई भावुक बात नह कह रहा, वह एक नै तक नयम बता रहा है : जस समाज ने हम पाला, संकट म
उसक रक्षा करना हमारा ऋण चुकाना है। ध्यान द जए, वह ‘मेरा उपकार’ नह , ‘वयम्’ (हम सब) कहता है —
पाँच भाई और माता, सब उस ऋण म ह; पर चुकाने वह अकेला जाता है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः
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स न्ध-सङ् केत (यही पाठ का शीषक भी है): भूयादे ष = भूयात् + एषः — त् के बाद स्वर आने पर त् का द् हो
m a s em बनता है
glरुपकृता = परैः +
जाता है (व्यञ्जनस न्धः — जश्त्वम्); फर ‘एषः + धमः’ म ‘एषः’ का वसग लुप्त होकर ‘एष धमः’
o इसी लए शीषक म ‘भूयादे ष धमः’ छपा है, ‘भूयात् एषः धमः’ नह ।aपरै
cोपः)।
(एतत्तदोः सु.ल
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उपकृताः ( वसग का ‘र्’) तथा उपकृताः + वयम् → उपकृता वयम् (आः + व् → आ, वसगलोपः)।
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Did you know? ‘भूयात्’ आशी लङ् लकार का रूप है, जो आशीवाद तथा शुभकामना म आता है — जैसे
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‘ चरञ्जीवी भूयात्’, ‘कल्याणं भूयात्’। यहाँ भीम कह रहा है ‘ऐसा हो’ — यह आदे श नह , कामना और संकल्प है,
इसी लए वाक्य म उपदे श का बल है, कठोरता नह ।
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m a s em सहजौ मम। बकं
द्वतीयस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “इमौ ह पीवरौ बाहू सहायौ
co यष्या म सहः क्षुद्रमृगं यथा॥” gl
प्र.2
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वध्वंस
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इमौ िह पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम।
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बकं िवध्वंसियष्यािम िसंहः क्षुद मृगं यथा॥
ag
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पदच्छे दः — इमौ + ह + पीवरौ + बाहू + सहायौ + सहजौ + मम + बकम् + वध्वंस यष्या म + सहः + क्षुद्रमृगम् + यथा।
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m) बकं वध्वंस यष्या म।
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अन्वयः — मम इमौ पीवरौ बाहू ह सहजौ सहायौ (स्तः)। यथा सहः क्षुद्रमृगं ( वध्वंसय त), (तथा अहं
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पदम् शब्दाथः
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इमौ एतौ द्वौ — ये दोनों (इदम् शब्द , पुं.प.िद्व.व.)
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पीवरौ स्थूल ौ
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, पुष्टौ — मोटे, बिल ष्ठ (िद्ववचन)
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भुजौ — दोनों भुजa
बाहू
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सहजौ सह जातौ, जन्मना सह वतमानौ — जन्म से साथ रहने वाले
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सहायौ साहाय्यकत रौ — सहायक
coसmियष्यािम l a
िवनाशिय यािम — न ट कर दू ँग ा (िव + √ वंस ् + िणच्, ल ृट्, उ मपुgष एकवचन)
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ष् ष् ध् त्त रु
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agl क्षदु म ृग म् ु ः म ृग ः
क्ष द , तम् — तुच्छ पशु को (कम धारयः, िद्वतीया)
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यथा इव, जैसे — उपमावाचक अव्ययम्
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वैसे ही म बक को नष्ट कर दूँ गा। agl
हन्द अथ — मेरी ये दोन पुष्ट भुजाएँ ही मेरे जन्म से साथ रहने वाले सहायक ह। जैसे सह कसी तुच्छ पशु को नष्ट कर दे ता है,
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भावः (पुस्तक का भावाथ २): “एतौ ह, पुष्टौ, भुजौ, मम सहजातौ उपकारकौ। सहः तुच्छं वन्यप्रा णन मव, अहं,
बकनामानम् असुरं वनाश यष्या म।” — यह ोक अजुन के प्रस्ताव ‘धनुधरोऽहमनुग मष्या म’ का उत्तर है। भीम
वनम्रता से कहता है क मुझे कसी बाहरी सहायक क आवश्यकता नह — मेरे अपने दो हाथ ही मेरे साथी ह।
‘सहजौ’ शब्द बहुत सुन्दर है : भाई भी ‘सहज’ कहलाते ह, पर भीम कहता है क मेरी भुजाएँ ही मेरे सच्चे ‘सहज’ ह
— जो जन्म से साथ ह और अन्त तक साथ रहगे।
अलङ् कारः: ‘ सहः क्षुद्रमृगं यथा’ म उपमा अलङ् कार है — उपमेय भीम, उपमान सह, साधारण धम ‘ वध्वंसनम्’,
वाचक शब्द ‘यथा’। साथ ही यह उपमा बक का अपमान भी है : भीम उसे ‘राक्षस’ नह , ‘क्षुद्रमृग’ (मामूली जानवर)
कहता है। यही आत्म वश्वास आगे तीसरे ोक म और खुलकर आता है।
व्याकरण: इस ोक म द्ववचन का अच्छा अभ्यास है — इमौ, पीवरौ, बाहू, सहायौ, सहजौ — पाँच पद पुं लङ्ग
प्रथमा द्ववचन म ह, क्य क भुजाएँ दो ह। संस्कृत म द्ववचन एक अलग वचन है, हन्द क तरह उसे बहुवचन म नह
मलाया जाता।
प्र.3 तृतीयस्य ोकस्य पदच्छे दम् अन्वयं शब्दाथ भावं च लखत — “र क्षता साधुलोकानां व रष्ठो बाहुशा लनाम्।
नषूदको ह डम्बस्य मृत्युश्चा स्म भवादृशाम्॥”
रिक्षता साधुलोकानां विरष्ठो बाहश
ु ािलनाम्।
िनषूद को िहिडम्बस्य मृत्युश्चािस्म भवादृ शाम्॥
पदच्छे दः — र क्षता + साधुलोकानाम् + व रष्ठः + बाहुशा लनाम् + नषूदकः + ह डम्बस्य + मृत्युः + च + अ स्म + भवादृशाम्।
अन्वयः — (अहं) साधुलोकानां र क्षता, बाहुशा लनां व रष्ठः, ह डम्बस्य नषूदकः, भवादृशां मृत्युः च अ स्म।
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पदम् शब्दाथः
रिक्षता ृ ्, पुं.प.ए .व.)
र क्षकः, पालकः — र क्षा करने वाला (√र क्ष् + तच
साध ल
ु ोकानाम् स ज्जनानां जनानाम् — स ज्जनों का (स म् बन्धे षष्ठी बहुवचनम्)
विरष्ठः श्रेष्ठतमः — सबसे श्रेष्ठ (वर + इष्ठन्, अितशयाथकम्)
बाहश
ु ािलनाम् ु ले न शोभमानानाम् — बलशािलयों में (िनध रणे षष्ठी)
बाहब
िनषूद कः िवनाशकः, हन्ता — मारने वाला
िहिडम्बस्य िहिडम् ब नामक स्य राक्षस स्य — िहिडम् ब का (कम िण षष्ठी)
भवादृ शाम् भवान् इव येषां रूपम्, तेषाम् — आप जैस ों के िलए
म ृत्युः मरणम्, यमः — म ृत्यु, काल
हन्द अथ — (म) सज्जन क रक्षा करने वाला हूँ, बलशा लय म सबसे श्रेष्ठ हूँ, ह डम्ब का वध करने वाला हूँ, और तुम्हारे जैस के
लए साक्षात् मृत्यु हूँ।
भावः: यह भीम का आत्मप रचय- ोक है, जो नाटक म ‘आत्मप रचय’ नामक परम्परा का पालन करता है —
योद्धा युद्ध से पहले अपना प रचय दे ता है। इसक रचना बहुत कसी हुई है : पहले क्या करता हूँ (साधुओं क रक्षा),
फर क्या हूँ (बलशा लय म श्रेष्ठ), फर क्या कर चुका हूँ ( ह डम्ब का वध) और अन्त म तुम्हारे लए क्या हूँ
(मृत्यु)। ध्यान द जए — पहली ही बात ‘रक्षा’ है, ‘वध’ नह ; क्य क पाठ का सद्धान्त यही है — ‘नररक्षणं नाम
भू मपालानां क्ष त्रयाणां धमः’। वध उस रक्षा का साधन है, लक्ष्य नह ।
स न्ध तथा सन्दभ: व रष्ठो बाहुशा लनाम् = व रष्ठः + बाहुशा लनाम् ( वसगस न्धः, अः + ब् → ओ)। मृत्युश्चा स्म
= मृत्युः + च + अ स्म — वसग के बाद ‘च्’ आने पर वसग ‘श्’ हो जाता है ( वसगस न्धः — श्चत्वम्), फर च +
अ स्म = चा स्म (द घस न्धः)। ह डम्ब वह राक्षस था जसका वध भीम ने वन म कया था और जसक बहन
ह डम्बा से ववाह करके घटोत्कच का जन्म हुआ — यही बात अगले संवाद म बक स्वयं कहता है : ‘मम मत्रस्य
ह डम्बस्य हन्ता कौन्तेयो भवान्?’
ध्यान द: इस तीसरे ोक का भावाथ पुस्तक के ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ खण्ड म नह दया गया — वहाँ केवल दो
ोक के भावाथ ह। इस लए इसका अथ स्वयं नकालना पड़ता है; ऊपर क ता लका उसी काम के लए है।
नाट्यांशः २ — यु ध ष्ठराद नां प्रवेशः — पृष्ठ 115
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(ततः प्र वश न्त यु ध ष्ठरादयः) — हास्यम्, आप त्तः, भीमस्य धम नणयः
नाट्यां शः
प्र.1 ‘यु ध ष्ठरः — ( वलोक्य) अये ! हषण उत्फुल्लाक्ष इव वत्सो भीमः। भीमः — प्रभूतमुप तं मे भोजनम्। अजुनः
— ाने खलु प्रहषः औद रकस्य। नकुलः — ओष्ठौ ु रतः इवाग्रजस्य। भीमः — पश्यत, बाहू अ प ु रतः।
सहदे वः — अ प हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ? भीमः — तद प भ वष्य त। न केवलं भोजनमुप तम्। आयोधनम प।’ —
अस्य आशयं लखत तथा अत्र वद्यमानं हास्यं स्पष्टयत।
आशयः — यु ध ष्ठरः भीमं दृष्ट् वा वद त — ‘अरे ! वत्सः भीमः हषण वक सतनयनः इव दृश्यते।’ भीमः वद त — ‘मम
भोजनं प्रभूतम् उप तम् अ स्त।’ अजुनः प रहस त — ‘औद रकस्य (भोजन प्रयस्य) एतादृशः हषः उ चतः एव।’ नकुलः
वद त — ‘अग्रजस्य ओष्ठौ ु रतः इव।’ भीमः वद त — ‘पश्यत, बाहू अ प ु रतः।’ सहदे वः पृच्छ त — ‘ क हस्तद्वयेन
भोक्ष्यसे ?’ भीमः वद त — ‘तद प भ वष्य त। न केवलं भोजनम् उप तम्, अ प तु युद्धम् अ प।’
( हन्द — यु ध ष्ठर भीम को दे खकर कहते ह — ‘अरे! बेटा भीम तो हष से खली हुई आँख वाला दख रहा है।’ भीम कहता है —
‘मेरा भोजन बहुत सारा आ लगा है।’ अजुन हँसी करता है — ‘पेटू का ऐसा हष उ चत ही है।’ नकुल कहता है — ‘बड़े भैया के तो
ह ठ फड़क रहे ह।’ भीम कहता है — ‘दे खो, भुजाएँ भी फड़क रही ह।’ सहदे व पूछता है — ‘क्या दोन हाथ से खाओगे?’ भीम
कहता है — ‘वह भी होगा। केवल भोजन ही नह आया, युद्ध भी आया है।’)
पदम् अथः तथा व्याकरणम्
िवलोक्य दृ ष्ट् वा — दे खकर (ल्यप् पत्ययः); यह नेपथ् य-िनद श है
उत्फु ल्लाक्षः उ त्फु ल्ले अिक्षणी यस्य सः — िखली हई
ु आँखों वाला (बहव
ु ीिह समासः)
स्थाने युक्तम्, उिचतम् — ‘ठीक ही है’ (अव्ययवत् पयुक्तम्)
औदिरकस्य भोजनिपयस्य — पेटू का (उदर + ठक् /इक् पत्ययः)
स्फु रतः क म् पेते — फड़कते है ं (√स्फु र्, लट् , पथमपुरुष िद्ववचन — क्योंिक ओ ष्ठ/बाहु दो है)ं
इवाग जस्य इव + अग जस्य — बड़े भाई के (दीघ सिन्धः)
भोक्ष्यसे भक्षियष्यिस — खाओगे (√भुज्, ल ृट्, म ध् यमपुरुष एकवचन, आ त्मनेपदम्)
आयोधनम् युद्धम् — लड़ाई (अमरकोष भी यही पय य दे ता है)
यहाँ हास्य कैसे बनता है: हास्य अ तशयो क्त तथा शब्द के दो अथ से बनता है। नकुल कहता है ‘ह ठ फड़क रहे
ह’ — यह भोजन के लोभ का चह्न है। भीम उसी बात को उठाकर कहता है ‘बाहू अ प ु रतः’ — भुजा का
फड़कना युद्ध का शकुन है। इस प्रकार भीम भाइय के प रहास को स्वीकार भी करता है और उसी शब्द को घुमाकर
युद्ध क सूचना भी दे दे ता है। सहदे व का ‘अ प हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे?’ चरम हास्य है, और भीम का ‘तद प भ वष्य त’
उससे भी बड़ा। तुरन्त बाद ‘आयोधनम प’ कहते ही हास्य टू टता है और नाटक गम्भीर हो जाता है — यही नाट्यकार
क कुशलता है।
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ध्यान द: ‘आयोधनम्’ यहाँ पहली बार आता है और यही शब्द अभ्यास के प्रश्न ५ (पयायवा च-मेलन) म ‘युद्धम्’ के
साथ जोड़ना है; पृष्ठ १२६ के अमरकोष-अंश म भी उसका प्रमाण दया है — ‘युद्धमायोधनं जन्यं प्रधनं प्र वदारणम्’।
प्र.2 ‘यु ध ष्ठरः — अम्ब ! क मदानीमुप क्षप्तम् ? कुन्ती — पुत्रकाः ! बकासुरस्य भोजनप रकल्पनं जानीथ पौराणाम्।
त ददान पयायप ततं प्र तवे शनो ाह्मणस्य। यु ध ष्ठरः — ततस्ततः। कुन्ती — स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं
प रदे वयते। यु ध ष्ठरः — ज्ञातमव शष्टं मातः ! न खलु भवत्या अध्यव सतं समथये। यस्य वीरस्य भुजबलमा श्रत्य
वयं सुखं शेमहे, यच्च चन्तयन् दुय धनो नद्रां न लभते, तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ् क ल्पतम् ?’ — अस्य
आशयं लखत। यु ध ष्ठरस्य आपत्तेः कारणं च स्पष्टयत।
आशयः — यु ध ष्ठरः पृच्छ त — ‘माता ! इदान कम् उक्तम् ( क प्रसङ्गः उप ा पतः) ?’ कुन्ती वद त — ‘पुत्राः !
नगरवा सनां कृते बकासुरस्य भोजनव्यव ां यूयं जानीथ। इदान सा बारी प्र तवे शनः ाह्मणस्य आगता।’ यु ध ष्ठरः वद त
— ‘ततः ? ततः ?’ कुन्ती वद त — ‘सः एकपुत्रः तपस्वी अ तशयेन वलप त।’ यु ध ष्ठरः वद त — ‘मातः ! अव शष्टं मया
ज्ञातम्। कन्तु भवत्या यत् न श्चतं तत् अहं न समथये। यस्य वीरस्य भुजबलम् आ श्रत्य वयं नभयाः सुखेन शयामहे, यं च
चन्तयन् दुय धनः नद्रां न लभते — तस्य एव भीमस्य प्रेषणं भवत्या कथं सङ् क ल्पतम् ?’
( हन्द — यु ध ष्ठर पूछते ह — ‘माँ! अभी क्या बात छे ड़ी गई है?’ कुन्ती कहती है — ‘बेटो! नगरवा सय के लए बकासुर क
भोजन-व्यवस्था तो तुम जानते ही हो। अब वह बारी पड़ोसी ाह्मण क आ गई है।’ यु ध ष्ठर कहते ह — ‘ फर? फर क्या हुआ?’
कुन्ती कहती है — ‘वह इकलौते पुत्र वाला बेचारा ाह्मण बहुत वलाप कर रहा है।’ यु ध ष्ठर कहते ह — ‘माँ! शेष बात म समझ
गया। पर आपने जो नश्चय कया, उसका म समथन नह करता। जस वीर के भुजबल के सहारे हम न श्चन्त होकर सुख से सोते ह,
और जसका ध्यान करते-करते दुय धन को न द नह आती — उसी भीम को भेजने का संकल्प आपने कैसे कर लया?’)
यु ध ष्ठर क आप त्त के दो कारण —
क्रमः कारणम् (संस्कृतम्) हन्द म
१ यस्य वीरस्य भुजबलम् आिश्रत्य वयं सुखं भीम ही पाँचों भाइयों और माता की र क्षा का आधार है — वही न रहा तो शेष सब असुर िक्षत
शेम हे हो जाएँग े।
२ यं िचन्तयन् दुय धनः िनद ां न लभते शत्र ु भी िजससे डरता है, वही हमारी सबसे बड़ी शिक्त है — ऐसी शिक्त को संक ट में
डालना बुिद्धमानी नही ं।
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पदम् अथः तथा व्याकरणम्
mसूिचतम्, प तािवतम् — छे ड़ी गई बात (उप + √ि प् + त) as e
उपिक्षप्तम्
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स् क्ष क्
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पय यपिततम् पय येण पिततम् — बारी से आ पड़ा
ततस्ततः ततः + ततः — ‘िफर ? िफर ?’ (उ त्सुक ता की आवृित्त )
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खल्वेक पुत्र ः खलु + एकपुत्र ः (ग ण
ु सिन्धः) — िनश्चय ही िजसका एक ही पुत्र है
िवलपित — िवलाप करता है (g l a
पिरदे वयते
a पिर + √िदव् + िणच्, आ मनेपदम्) त्
अध्यविसतम् िनिश्चतम् — जो िनश्चय िकया गया (अिध + अव + √सो + क्त)
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शेम हे स्विपमः — हम सोते है ं (√शी, लट् , उ त्त मपुरुष बहुवचन, आ त्मनेपदम्)
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सङ् किल्पतम् िनिश्चतम् — संक ल्प िकया गया (सम् + √कॢ प् + क्त; सम् + किल्पतम् — परसवणसिन्धः)
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यु ध ष्ठर का च रत्र यह खुलता है: वे माता का वरोध नह करते, असहम त जताते ह — ‘न खलु … समथये’
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अथात् ‘म इसका समथन नह करता’। यह भाषा बहुत नपी-तुली है। साथ ही वे भीम क प्रशंसा उसी वाक्य म कर
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a l प्रश्न ३ का आधार भी बनता है।
दे ते ह। बड़े भाई क चन्ता, धमराज का ववेक और शब्द का संयम — तीन एक ही वाक्य म ह। ध्यान द जए, यही
वाक्य अभ्यास के प्रश्न १ (ख) तथा (घ)gऔर
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‘यस्य … यच्च … तस्य’ क रचना: यह संस्कृत का यत्-तत् सम्बन्ध है। पहले ‘यस्य’ और ‘यत्’ से दो वशेषण-
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वभ.cक्त और ‘तत्’ क वभ क्त एक-सी हो — यहाँ दोन षष्ठी म ह।
वाक्य आते ह, फर ‘तस्य भीमस्य’ म मुख्य बात कही जाती है। ऐसा वाक्य बनाते समय ध्यान र खए क ‘यत्’ क
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‘भीमः — धम वजानता भवता धमसङ् ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः। न ह मातुराज्ञा प्रत्यादे शमह त। यु ध ष्ठरः — वत्स भीमसेन
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! बलवान् मानुषभोजी स राक्षसः इ त श्रूयते। भीमः — ततः कम् ? राक्षसध्वंसी भीमः स्मयते। अलं वशङ् कया।
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ह नष्या म तं दुरात्मानम्। अजुनः — धनुधरोऽहमनुग मष्या म। भीमः — मा मैवम्। न ह खरदं ष्ट्रो मृगा धपः
सहायमपेक्षते।’ — अस्य आशयं लखत। ‘न ह मातुराज्ञा प्रत्यादे शमह त’ इ त वाक्यस्य महत्त्वं च लखत।
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आशयः — भीमः वद त — ‘धम जानता भवता अत्र धमस्य सङ् ग्रहः (धमरा शः) द्रष्टव्यः। मातुः आज्ञा कदा प अवज्ञां न
s e mअह त।’ यु ध ष्ठरः वद त — ‘वत्स भीमसेन ! सः राक्षसः बलवान् मनुष्यभक्षकः च इ त श्रूयते।’ भीमः वद त — ‘ततः कम्
agla ? भीमः तु राक्षसानां ध्वंसकः इ त स्मयते। शङ् कया अलम्। अहं तं दुरात्मानं ह नष्या म।’ अजुनः वद त — ‘अहं धनुधरः तव
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अनुगमनं क रष्या म।’ भीमः वद त — ‘मा, एवं मा भवतु। तीक्ष्णदं ष्ट्रः मृगराजः ( सहः) सहायम् अपेक्षां न करो त।’
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( हन्द — भीम कहता है — ‘धम को जानने वाले आपको यहाँ धम का संग्रह दे खना चा हए। माता क आज्ञा कभी अवज्ञा के योग्य
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नह होती।’ यु ध ष्ठर कहते ह — ‘बेटा भीमसेन! वह राक्षस बलवान् और मनुष्यभक्षी सुना जाता है।’ भीम कहता है — ‘तो क्या
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हुआ? भीम तो राक्षस का नाश करने वाला माना जाता है। शङ् का मत क जए। म उस दुष्ट को मार डालूँगा।’ अजुन कहता है — ‘म
धनुधर आपके साथ चलूँगा।’ भीम कहता है — ‘नह , ऐसा नह । तीखी दाढ़ वाला मृगराज सहायक क अपेक्षा नह करता।’)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः AglaSem · NCERT Solutions
पदम् अथः तथा व्याकरणम्
िवजानता जानता — जानने वाले के द्वारा (िव + √ज्ञ ा, शत-ृ पत्ययान्तस्य तत
ृ ीया)
धमसङ् ग हः धम णां सङ् ग हः — धम ं का समुच्चय (षष्ठी-तत्पुरुषः)
पत्यादे शम् अवज्ञ ाम्, उ ल्लङ् घनम् — अवज्ञ ा को
अहित योग्यः भवित — योग्य होता है (√अह्, लट् )
राक्षसध्वंस ी राक्षसान् ध् वंस यित इित — राक्षसों का नाश करने वाला (िणिन-पत्ययः)
अलं िवशङ् कया ृ ीया)
शङ् कां मा कु रु — ‘शङ् का मत कीिजए ’ (अलम् के योग में तत
मा मैवम् मा + मा + एवम् — ‘नही,ं ऐसा नही’ं (िनषेध ाथकम्)
खरदं ः खराः (तीक्ष्णाः) दं ाः यस्य सः — तीखी दाढ़ ों वाला (बहव
ु ीिहः)
म ृग ािधपः म ृग ाणाम् अिधपः — िसंह (षष्ठी-तत्पुरुषः)
‘न ह मातुराज्ञा प्रत्यादे शमह त’ का महत्त्व: यही वाक्य पूरे ववाद को समाप्त कर दे ता है, और यही पाठ का दूसरा
सूत्र-वाक्य है। भीम कहता है क प्रश्न ‘म जाऊँ या न जाऊँ’ का नह है — माता ने वचन दे दया है, अतः वचार का
वषय ही समाप्त। साथ ही वह यु ध ष्ठर को उन्ह के क्षेत्र म उत्तर दे ता है — ‘धम वजानता भवता’ अथात् ‘आप तो
धम जानते ह, फर यहाँ धम का संग्रह दे खए’। यहाँ दो धम एक साथ सधते ह — प्रत्युपकार का धम और मातृ-
आज्ञापालन का धम; इसी लए भीम इसे ‘धमसङ् ग्रह’ (धम का ढे र) कहता है।
अलङ् कार: ‘न ह खरदं ो मृगा धपः सहायमपेक्षते’ म अप्रस्तुतप्रशंसा है — कहा सह के वषय म जा रहा है, अथ
भीम के वषय म नकलता है। यह अजुन को ठु कराना नह , वनम्र आत्म वश्वास है — और इसी बात को अगला
ोक ‘इमौ ह पीवरौ बाहू…’ खोलकर कहता है।
नाट्यांशः ३ — भीम-बकसंवादः तथा बकवधः — पृष्ठ 116–117
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(ततः प्र वश त भक्ष्य-भोज्या दक-भाण्ड-पू रत-शकटे न सह) — धम ववादः तथा मल्लयुद्धम्
नाट्यां शः
प्र.1 ‘बकः — मानुषापसद, प रवेषय मे भोजनम्। भीमः — सव प रवे षतं मद य-जठर ाय भगवते हुताशनाय। त्वां
धमदूषणं हन्तुम् आगतोऽहम्। बकः — कथं, कः खलु अधमः मया से वतः ? (सहासमुदरं प रमृजन्) भीमः —
नरभक्षणम्। बकः — नरभक्षणं नाम मांसा शनां राक्षसानां धमः। भीमः — नररक्षणं नाम भू मपालानां क्ष त्रयाणां
धमः। बकः — क्ष त्रयोऽ स ? भीमः — बाढम्, क्ष त्रयोऽ स्म।’ — अस्य आशयं लखत तथा अत्र वद्यमानं
धम ववादं स्पष्टयत।
आशयः — बकः आ दश त — ‘हे नकृष्ट मानव ! म ं भोजनं प रवेषय।’ भीमः वद त — ‘सव भोजनं मम उदरे ताय
भगवते अग्नये प रवे षतम् (अहं स्वयम् एव खा दतवान्)। त्वां धमस्य दूषकं हन्तुम् अहम् आगतः।’ बकः उदरं मृजन् सहासं
पृच्छ त — ‘कथम् ? मया कः अधमः आच रतः ?’ भीमः वद त — ‘नरभक्षणम्।’ बकः वद त — ‘नरभक्षणं तु
मांसभक्षकाणां राक्षसानां धमः अ स्त।’ भीमः वद त — ‘त ह नररक्षणं तु पृ थवीपालानां क्ष त्रयाणां धमः अ स्त।’ बकः
पृच्छ त — ‘ क त्वं क्ष त्रयः अ स ?’ भीमः वद त — ‘ नश्चयेन, अहं क्ष त्रयः अ स्म।’
( हन्द — बक आदे श दे ता है — ‘हे नीच मनुष्य! मुझे भोजन परोस।’ भीम कहता है — ‘सारा भोजन मेरे पेट म बैठे भगवान्
अ ग्नदे व को परोस दया गया है। तुझ धम को दू षत करने वाले को मारने म आया हूँ।’ बक पेट सहलाता हुआ हँसकर पूछता है —
‘क्य ? मने कौन-सा अधम कया है?’ भीम कहता है — ‘नरभक्षण।’ बक कहता है — ‘नरभक्षण तो मांसभक्षी राक्षस का धम है।’
भीम कहता है — ‘तो नररक्षण भू मपालक क्ष त्रय का धम है।’ बक पूछता है — ‘क्या तू क्ष त्रय है?’ भीम कहता है — ‘ नश्चय ही,
म क्ष त्रय हूँ।’)
धम ववादः — दोन के तक आमने-सामने
पक्षः वाक्यम् तकः दोषः / गुणः
बकः नरभक्षणं नाम मांसा शनां ‘मेर ी जाित का स्वभाव ही यही यह स्वभाव को धम कह दे ना है। पर जो कम दूसरे का प्राण
राक्षसानां धमः। है, अतः यह मेर ा धम है। ’ लेता है, वह स्वभाव हो सकता है, धम नह ।
भीमः नररक्षणं नाम भू मपालानां ‘तेर ा धम मान भी लूँ, तो मेर ा भीम बहस म नह उलझता; वह बक के ही वाक्य-साँचे म उत्तर
क्ष त्रयाणां धमः। धम उसे रोकना है। ’ दे ता है — ‘नर-भक्षण’ के सामने ‘नर-रक्षण’ रख दे ता है।
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पदम् अथः तथा व्याकरणम्
मानुषापसद मानुषेष ु अपसद — मनुष्यों में नीच (स प्तमी-तत्पुरुषः, स म् बोधनम्)
पिरवेषय स्थापय , पिरवेषणं कु रु — परोस (पिर + √िवष् + िणच्, लोट् , म ध् यमपुरुष एकवचन)
जठरस्थाय हुताशनाय जठरे ितष्ठित इित, तस्मै हुताशनाय — पेट में िवद्य मान अिग्न के िलए (स म् पदाने चतुथ )
धमदू षणम् धम ं दू षयित इित, तम् — धम को दू िषत करने वाले को
सहासमुद रं पिरम ृजन् हास्येन सह उदरं माजयन् — हँस ते हुए पेट सहलाता हुआ (नेपथ् यिनद शः)
मांस ािशनाम् मांस म् अश्निन्त इित, तेषाम् — मांस खाने वालों का
भूिमपालानाम् भूिमं पालयिन्त इित, तेषाम् — पथ्ृ वी की र क्षा करने वालों का
यह संवाद क्य सुन्दर है: भीम का पहला ही वाक्य दो काम एक साथ करता है — वह बताता है क भोजन वह
स्वयं खा चुका है (‘मेरे पेट के अ ग्नदे व को परोस दया’) और साथ ही यह भी क अब वह सेवक नह , वधकता
है। ‘जठरस्थाय भगवते हुताशनाय’ म रूपक अलङ् कार है — पेट क जठरा ग्न पर यज्ञ के अ ग्नदे व का आरोप। इस
एक वाक्य म उपहास, सूचना और चुनौती — तीन ह।
ध्यान द: यह पूरा संवाद ही पाठ का नै तक केन्द्र है। नाटककार बक को मूख नह दखाता — वह भी तक दे ता है।
पर भीम का उत्तर श्रेष्ठ है, क्य क उसका धम दूसर क रक्षा पर टका है और बक का ‘धम’ दूसर के नाश पर। जो
धम दूसरे के प्राण क क मत पर चले, वह धम नह — यही पाठ का सन्दे श है।
प्र.2 ‘बकः — अहह ! मम मत्रस्य ह डम्बस्य हन्ता कौन्तेयो भवान् ? भीमसेनः — कामम् ! कौन्तेयोऽ स्म भीमसेनः।
बकः — इदम स्त मे भागधेयम्। चरा न्वष्टो मृगः स्वयमुत्प ततो व्याघ्रगह्वरम्। ाघनीयोऽ स मे रपुः। भीमसेनः —
इदं मे स्वस्त्ययनं यन्मां ाघनीयं रपुं मन्यसे। अनुवतस्व ते मत्रं ह डम्बम्। बकः — वाचाट ! क्ष त्रय डम्भ, गृहाण
शस्त्रम्। शातया म ते दपम्। भीमसेनः — अलं शस्त्रग्रहण वडम्बनेन, त्वन्मस्तका भदुरोऽ स्त ममैष मु ष्टः। (उभौ
प्रहरतः। मल्लयुद्धं प्रवतते। हतः पत त बकः।)’ — अस्य आशयं लखत तथा ‘ चरा न्वष्टो मृगः स्वयमुत्प ततो
व्याघ्रगह्वरम्’ इ त उक्तेः भावं स्पष्टयत।
आशयः — बकः वस्मयेन वद त — ‘अरे ! भवान् मम मत्रस्य ह डम्बस्य हन्ता कुन्तीपुत्रः कम् ?’ भीमसेनः वद त —
‘ नश्चयेन ! अहं कौन्तेयः भीमसेनः अ स्म।’ बकः वद त — ‘इदं मम भाग्यम्। चरात् अ न्वष्टः मृगः स्वयम् एव व्याघ्रस्य गुहां
प्र वष्टः। त्वं मम प्रशंसनीयः शत्रुः अ स।’ भीमसेनः वद त — ‘इदं मम मङ्गलम् एव यत् त्वं मां ाघनीयं शत्रुं मन्यसे। गच्छ,
स्व मत्रं ह डम्बम् अनुसर (तस्य एव माग गच्छ)।’ बकः क्रुद्धः वद त — ‘हे वाचाल ! हे क्ष त्रयबालक ! शस्त्रं गृहाण। अहं
तव दप नाशया म।’ भीमसेनः वद त — ‘शस्त्रग्रहणस्य वडम्बनया अलम्; तव मस्तकस्य अ ी न भेत्तुं मम एषः मु ष्टः एव
पयाप्तः।’ ततः उभौ प्रहरतः, मल्लयुद्धं प्रवतते, हतः बकः पत त।
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( हन्द — बक च ककर कहता है — ‘अरे! आप मेरे मत्र ह डम्ब को मारने वाले कुन्तीपुत्र ह?’ भीमसेन कहते ह — ‘ नश्चय ही! म
कुन्तीपुत्र भीमसेन हूँ।’ बक कहता है — ‘यह तो मेरा सौभाग्य है। बहुत दन से खोजा जाने वाला मृग स्वयं ही बाघ क गुफा म आ
गरा। तू मेरा प्रशंसा के योग्य शत्रु है।’ भीमसेन कहते ह — ‘यह मेरा मङ्गल ही है क तू मुझे प्रशंसनीय शत्रु मानता है। जा, अपने मत्र
ह डम्ब के पीछे चला जा।’ बक क्रुद्ध होकर कहता है — ‘अरे बकवाद ! अरे क्ष त्रय के बच्चे! शस्त्र उठा। म तेरा घमण्ड चूर करता
हूँ।’ भीमसेन कहते ह — ‘शस्त्र उठाने के नाटक क आवश्यकता नह ; तेरे सर क ह याँ तोड़ने के लए मेरी यह मु ही काफ़ है।’
फर दोन प्रहार करते ह, मल्लयुद्ध होता है और बक मारा जाकर गर पड़ता है।)
पदम् अथः तथा व्याकरणम्
कामम् िनश्चयेन, आम् — ‘हाँ, अवश्य’ (अव्ययम्)
भागधे यम् भाग्यम् — भाग्य, सौभाग्य
िचरािन्वष्टः िचरात् अिन्वष्टः — बहुत समय से खोजा हुआ
व्याघ गह्वरम् व्याघ स्य ग ह्व रम् — बाघ की ग फ
ु ा (िद्वतीया — गित का ल क्ष्य)
श्लाघनीयः पशंस नीयः — पशंस ा के योग्य (√श्लाघ् + अनीयर्)
स्वस्त्ययनम् मङ् गलम्, क ल्याणम् — शुभ, मङ् गल
अनुवतस्व अनुस र — पीछे -पीछे चला जा (अनु + √वृत,् लोट् , आ त्मनेपदम्)
क्षित्रयिडम्भ क्ष ित्र यस्य िड म् भः (बालकः) — क्षित्र य के बच्चे! (ितर स्कारसूचकं स म्बोधनम्)
शातयािम नाशयािम , तनूक रोिम — चूर करता हू ँ
त्वन्मस्तकािस्थिभदुर ः तव म स्तक स्य अस्थीिन िभनित्त इित — तेरे िसर की हि याँ तोड़ने वाला
‘ चरा न्वष्टो मृगः स्वयमुत्प ततो व्याघ्रगह्वरम्’ का भाव: यह लोको क्त जैसी उपमा है — ‘ जस हरन को
शकारी बहुत दन से खोज रहा था, वही स्वयं आकर बाघ क गुफ़ा म कूद पड़ा।’ बक अपने को व्याघ्र और भीम को
मृग मान रहा है। यही उसक सबसे बड़ी भूल है, क्य क भीम स्वयं को पहले ही ‘ सह’ कह चुका है (‘ सहः क्षुद्रमृगं
यथा’)। इस प्रकार नाटककार ने दो उपमाओं को आमने-सामने रखकर दप और आत्म वश्वास का अन्तर दखा दया
है — और अन्त म सही कौन था, यह ‘हतः पत त बकः’ बता दे ता है।
संवाद क मा मक व्यङ् ग्यो क्त: ‘अनुवतस्व ते मत्रं ह डम्बम्’ — ऊपर से यह ‘अपने मत्र के पीछे चले जाओ’
है, भीतर से इसका अथ है ‘जहाँ ह डम्ब गया, वह तुम भी जाओ — अथात् मृत्यु को प्राप्त हो’। ऐसे दो-अथ वाक्य
को व्याजो क्त कहते ह, और नाटक म यही सबसे तीखा प्रहार होता है — शस्त्र से पहले शब्द चलता है।
नाट्य- वधान: ‘उभौ प्रहरतः। मल्लयुद्धं प्रवतते। हतः पत त बकः।’ — तीन छोटे वाक्य म पूरा युद्ध समाप्त। संस्कृत
नाटक म वध प्रायः रंगमञ्च पर वस्तार से नह दखाया जाता; इसी संयम को नाट्यशास्त्रीय औ चत्य कहते ह।
ध्यान द जए — भीम शस्त्र नह उठाता, केवल मु ष्ट से लड़ता है, इसी लए इसे ‘मल्लयुद्धम्’ कहा गया।
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सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 118–120
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शब्दाथ-ता लका तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त रक्तस्तम्भस्य पू तः
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कायकलापः
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‘सव शब्दे न भासते’ इ त ता लकायाः अ न्तमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अथ लखत’ — रक्तः अ स्त। पाठे
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प्र.1
प्रयुक्तानां शब्दानाम् अथान् ज्ञात्वा तं स्तम्भं पूरयत।
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पुस्तक म यह अ न्तम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — वद्याथ को हर शब्द का अथ अपनी मातृभाषा म लखना है।
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नीचे पूरी ता लका द है और वह स्तम्भ हन्द (हमारी माध्यम-भाषा) म भर दया गया है। जनक मातृभाषा मराठ , बाङ् ग्ला,
गुजराती, त मऴ, तेलुगु, कन्नड, ओ ड़आ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अथ के आधार पर अपनीm
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भाषा का शब्द रख।
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शब्दः अथः हन्द ENGLISH मातृभाषया अथम्
(भरा हुआ —
हन्द )
अिभिहतम् (अिभ + √धा उक्तम् उक्त Said कहा गया, कहा हुआ
+ क्त, नपुं.प.ए.व.)
आकणय (आ + कण + शृणु सुनो Listen सुनो, ध् यान से सुनो
िणच् लोट् , म.पु.ए.व.)
आितथेयः (पुं.प.ए.व.) अ तथौ साधुः, अ त थ क सेवा Host मेहमान की से वा करने
अ त थसेवाकारकः करने वाला वाला, मेज़बान
आयोधनम् (नपुं.िद्व.ए.व.) युद्धम् युद्ध Battle लड़ाई, संग ाम
उत्फु ल्लाक्षः (बहुबीिह, उत्फुल्ले अ क्षणी यस्य वक सतनयन One with wide- िखली हुई/चौड़ी आँखों
पुं.प.ए.व.) सः, वक सतनयनः open eyes वाला
औदिरकः (उदर + इक् , भोजन प्रयः केवल पेट भरने One who just eats पेटू, खाने का शौकीन
पुं.प.ए.व.) वाला continuously
कामम् (अव्ययम्) नश्चयेन न श्चत ही Certainly हाँ, अवश्य, बेशक
जठरस्थाय (पुं.च.ए.व.) जठरे तष्ठ त इ त, तस्मै पेट म वद्यमान के For what is inside पेट के भीतर बैठे हुए के
लए the stomach िलए
िनषूद कः (पुं.प.ए.व.) वनाशकः वनाशक Destroyer नाश करने वाला,
संहारक
क्षदु म ृग म् (पुं.िद्व.ए.व.) क्षुद्रः मृगः तम् छोटे पशु को Small animal मामूल ी/तुच्छ जानवर को
क्षित्रयाण्या (स्त्री.त.ृ ए.व.) क्ष त्रयस्य पत्नी, तया क्ष त्रय क पत्नी By the wife of क्षत्र ाणी ने / क्षित्र य की
से Kshatriya पत्नी के द्वारा
पिरदे वयते (पिर + √िदव् वलप त वलाप करता है Laments रो-रोकर दुख पकट
+ िणच्, आ.प.प.पु.ए.व.) करता है
पिरवेषय (पिर + √िवष् + स्थापय तुम परोसो (You) Serve परोसो, थाली में रखो
लोट् , म.पु.ए.व.)
पीवरौ (पु.ं प.िद्व.व.) स्थूलौ (दो) स्थूल (Two) Stout दोनों मोटी/पुष्ट (भुजाएँ)
पौराः (पु.ं प.ब.व.) नाग रकाः नाग रक Citizens नगर के लोग , नगरवासी
पितवेशी (पुं.प.ए.व.) नकट गृहवासी पड़ोसी Neighbour पास के घर में रहने
वाला, पड़ोसी
पितश्रुतम् (पित + √श्रु + प्र तज्ञातम् प्र तज्ञात Promised वचन िदया गया, वादा
क्त, पुं.िद्व.ए.व.) िकया गया
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पभूतम् (पुं.िद्व.ए.व.) अ धकम् अ धक Abundant बहुत सारा, पचरु
पितश्रवः (पुं.प.ए.व.) प्र तज्ञा वचन Promise वचन, ज़बान, पितज्ञ ा
पत्यादे शम् (पुं.िद्व.ए.व.) अनुल्लङ् घनम् अवज्ञा Disobedience अवज्ञ ा, कही हुई बात को
टालना
बाढम् (अव्ययम् नूनम् न श्चत Certainly हाँ, ठीक है, िनश्चय ही
पुं.िद्व.ए.व.)
मल्लयुद्धम् (पुं.िद्व.ए.व.) मल्लानां युद्धम् पहलवान का Wrestling कु श्ती, िबना शस्त्र का
युद्ध दंग ल
मानुषापसद (सप्तमी- मानुषेषु अपसद हे ! नकृष्ट मानव O’ Human of low अरे नीच आदमी! अरे
तत्पुरुषः, पुं.सं.ए.व.) cadre अधम मनुष्य!
म ृष्टान्नम् (कमधारय) मृष्टम् अन्नम् स्वा दष्ट भोजन Tasty Food स्वािद ष्ट खाना , बिढ़ या
पकवान
वाचाट (पुं.सं.ए.व.) प्रलापक हे ! ड ग मारने O’ Boastful अरे बकवादी! अरे
वाले बड़बोले !
िवपस्य (पुं.ष.ए.व.) ाह्मणस्य ाह्मण का Of Brahmana बाह्मण का, िवप का
िवशङ् कया (स्त्री.त.ृ ए.व.) वशेषसंशयेन व शष्ट संशय से By the doubt िवशेष स न्दे ह से ,
आशङ् का से
व्याघ गह्वरम् (पुं.िद्व.ए.व.) व्याघ्रस्य गह्वरम् बाघ का नवास Tiger-Cave ु ा/माँद
बाघ की ग फ
स्थान
श्रोित्रयः (पुं.प.ए.व.) श्रोत्रम् अधीते इ त जसने वेद पढ़ा हो One who has read वेद पढ़ ा हआ
ु िवद्वान्
the Vedas बाह्मण
हिनष्यािम (√हन् + ल ृट्, वधं क रष्या म मार दूँ गा Will kill मैं मार डालूँग ा
उ.पु.ए.व.)
हुताशनाय (पुं.च.ए.व.) हुतम् अशनम् यस्य, तस्मै अ ग्न को For the Fire अिग्नदे व के िलए
नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं म) — मराठ : पौराः = ‘नाग रक’, प्र तवेशी = ‘शेजारी’, मृष्टान्नम् = ‘च वष्ट
अन्न’, मल्लयुद्धम् = ‘कुस्ती’। बाङ् ग्ला: प्र तवेशी = ‘प्र तबेशी’, आयोधनम् = ‘युद्ध’, हुताशनः = ‘आगुन’। गुजराती:
पीवरौ = ‘जाडा/पुष्ट’, वशङ् कया = ‘शंकाथी’। त मऴ: पौराः = ‘नगर मक्कळ् ’, हुताशनः = ‘तीयवन्/अ ग्न’।
अपनी भाषा म लखते समय ध्यान र खए क अथ वही रहे जो संस्कृत तथा हन्द स्तम्भ म दया है।
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इस ता लका को पढ़ने का ढं ग: केवल अथ रट लेना पयाप्त नह । कोष्ठक म दया गया व्याकरण-प रचय ही असली
सामग्री है — ‘आकणय (आ + कण + णच् लोट् )’ बताता है क यह आज्ञा है; ‘क्ष त्रयाण्या (स्त्री.तृ.ए.व.)’ बताता है
क आगे क्रया कमवाच्य होगी; ‘उत्फुल्लाक्षः (बहु ी ह)’ बताता है क यह वशेषण है, संज्ञा नह । इसी प रचय के
सहारे अभ्यास के प्रश्न ४, ७, ८ तथा १० हल हो जाते ह।
पुस्तक म छपी कुछ बात, जन पर ध्यान द: (१) ‘प्रत्यादे शम्’ का संस्कृत अथ ‘अनुल्लङ् घनम्’ छपा है, जब क
हन्द ‘अवज्ञा’ तथा अंग्रेज़ी ‘Disobedience’ है — शुद्ध पयाय ‘उल्लङ् घनम्’ अथवा ‘अवज्ञा’ ही बनता है। (२)
‘बाढम्’ के आगे ‘अव्ययम्’ भी लखा है और ‘पुं. द्व.ए.व.’ भी — अव्यय का लङ्ग- वभ क्त नह होता, अतः केवल
‘अव्ययम्’ ठ क है। (३) ‘प्रभूतम्’, ‘मल्लयुद्धम्’, ‘व्याघ्रगह्वरम्’ तथा ‘प्र तश्रुतम्’ वस्तुतः नपुंसक लङ्ग ह (पुं. नह ),
और पाठ म ‘प्रभूतम्’ तथा ‘प्र तश्रुतम्’ प्रथमा म ह। परीक्षा म पाठ का प्रयोग ही प्रमाण मा नए।
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 120
ोकानां भावाथः — पुस्तकेन प्रदत्तः
भावाथः
प्र.1 ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ इ त खण्डे प्रदत्तं प्रथम ोकस्य भावाथ लखत तथा तं स्पष्टयत — “वयं नाग रकैः बहुकालं
भक्षा-प्रदानेन पो षताः। उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत् इ त एषः शाश्वतः धमः।”
भावाथः (पुस्तक का) — “वयं नाग रकैः बहुकालं भक्षा-प्रदानेन पो षताः। उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत् इ त एषः शाश्वतः
धमः।”
( हन्द — नगरवा सय ने भक्षा दे कर बहुत समय तक हमारा पालन कया है। उनका कया हुआ यह उपकार बदले म चुकाया जाए
— यही शाश्वत धम है।)
यह भावाथ कस ोक का है — ‘भैक्षप्रदानेन चरं परैरुपकृता वयम्। कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः॥’ (पृष्ठ ११४, भीम का
कथन)।
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ोक का भावाथ का पद क्या स्पष्ट हुआ
पद
परै ः नागिरकै ः ‘परैः’ (दूसर के द्वारा) अस्पष्ट था; भावाथ बताता है क वे ‘दूसरे’ एकचक्रा के नगरवासी ह
— वशेषतः वह ाह्मण-प रवार।
िचरम् बहुक ालम् यह उपकार एक दन का नह , लम्बे समय का है — इसी लए ऋण भी बड़ा है।
उपकृ ताः पोिषताः ‘उपकृत’ का ठोस रूप — पाला-पोसा गया। भक्षा का अन्न ही पाण्डव का जीवन था।
कृ तं पितकृ तं उपकृ तमेतत् पत्युपकृ तं वही बात सरल शब्द म — कया हुआ उपकार लौटाया जाए।
भूयात् भवेत ्
सनातनः धमः शाश्वतः धम ः ‘सनातन’ = ‘शाश्वत’ — जो युग बदलने पर भी न बदले, ऐसा नत्य नयम।
भावाथ पढ़ने से क्या लाभ: यह पुस्तक का अपना स्पष्टीकरण है, इस लए परीक्षा म इसी को प्रमाण मानकर उत्तर
ल खए। ध्यान द जए क भावाथ म ‘ भक्षा-प्रदानेन पो षताः’ शब्द जोड़कर बात और गहरी कर द गई है —
ाह्मण ने केवल उपकार नह कया, उसने पाण्डव का पालन कया। जसने पाला हो, उसके प्र त ऋण चुकाना
केवल शष्टाचार नह , धम है।
ध्यान द: पुस्तक म ‘भवेत् इ त एष: शाश्वतः धमः’ इस प्रकार छपा है, जहाँ ‘एषः’ के बाद अ त रक्त स्थान है। शुद्ध
पाठ है — ‘भवेत् इ त एषः शाश्वतः धमः।’ स न्ध करके — ‘भवे दत्येष शाश्वतो धमः।’
प्र.2 द्वतीय ोकस्य भावाथ लखत तथा तं स्पष्टयत — “एतौ ह, पुष्टौ, भुजौ, मम सहजातौ उपकारकौ। सहः तुच्छं
वन्यप्रा णन मव, अहं, बकनामानम् असुरं वनाश यष्या म।”
भावाथः (पुस्तक का) — “एतौ ह, पुष्टौ, भुजौ, मम सहजातौ उपकारकौ। सहः तुच्छं वन्यप्रा णन मव, अहं, बकनामानम्
असुरं वनाश यष्या म।”
( हन्द — ये दोन पुष्ट भुजाएँ ही मेरे साथ जन्मे हुए उपकारक — सहायक — ह। जैसे सह कसी तुच्छ वन्य प्राणी को नष्ट कर दे ता
है, वैसे ही म बक नामक असुर को नष्ट कर दूँ गा।)
यह भावाथ कस ोक का है — ‘इमौ ह पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम। बकं वध्वंस यष्या म सहः क्षुद्रमृगं यथा॥’ (पृष्ठ ११६,
भीम का कथन)।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः
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ोक का पद भावाथ का पद क्या स्पष्ट हुआ
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पीवरौ
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पु टौ
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‘पीवर’ का अथ यहाँ ‘मोटा’ नह , ब लष्ठ/पुष्ट है — यह भावाथ ही स्पष्ट करता है।
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‘सहज’ = ‘सह जातौ’ अथात् साथ ही जन्मे हुए — भुजाएँ ही भीम के जन्म सद्ध साथी ह।
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सहजौ सहजातौ
सहायौ उपकारकौ ये केवल अङ्ग नह , उपकार करने वाले साथी ह — इसी लए अजुन क सहायता अनावश्यक है।
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क्षदु म ृग म्
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बक भीम क दृ ष्ट म राक्षस नह , केवल एक तुच्छ जंगली जानवर है। ag
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तुच्छं वन्यपािणनम्
िवध्वंस ियष्यािम िवनाशियष्यािम
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क्रया का सीधा पयाय — ‘नष्ट कर दूँ गा’।
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दोन भावाथ का सम्बन्ध: पहला भावाथ बताता है क्य जाना है (कृतज्ञता का धम), दूसरा बताता है कैसे जाना है
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(अपने बल पर, बना सहायक के)। इस प्रकार दोन
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ोक मलकर भीम के च रत्र के दो पक्ष seदखाते ह — धम नष्ठा
m .c कोई भी वीर केवल बलवान् होने से महान् नह होता; वह तभी महान्agहोता है जब उसका बल कसी
seक सेवा म लगे।
तथा आत्मबल।
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धम
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ध्यान दे ने योग्य बात: पुस्तक ने ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ म केवल दो ोक का भावाथ दया है। तीसरे ोक ‘र क्षता
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साधुलोकानां…’ का भावाथ यहाँ नह है — उसकाm अथ वद्याथ को स्वयं नकालना है (इसी पृष्ठ-समूह के ‘ ोकाः’
खण्ड म वह ऊपर दया गया है)। साथ हीla
a g भावाथ म जो अल्प वराम (‘एतौ ह, पुष्टौ, भुजौ, मम …’) छपे ह, वे मुद्रण
क वशेषता ह; अथ पर उनका कोई प्रभाव नह पड़ता।
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m स द्धः — पृष्ठ 121 as e
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अभ्यासाद्
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प्रश्न १ — अधः प्रदत्तप्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखत
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अभ्यासाद् जायते स द्धः
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प्र.1 (क) भीमस्य जननी का ?
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उत्तरम् — कुन्ती। ( हन्द — भीम क माता कुन्ती ह।)
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s e m पाठ का आधार — ‘तत्र गता पाण्डवानां माता कुन्ती रोदनकारणं पच्छित।’ (पष्ठ ११२) ृ ृ
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पश्न ‘का’ = स्त्रीिलङ् ग · पथमा · एकवचन
अतः उत्तर भी उसी रूप में — कु न्ती s e m
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः AglaSem · NCERT Solutions
नयम — कत र प्रथमा: ‘जननी’ यहाँ कता है, इस लए वह प्रथमा वभ क्त म है; प्रश्नवाचक ‘का’ भी प्रथमा म है।
एकपदे न उत्तर दे ते समय भी प्रश्न क वभ क्त ही उत्तर क वभ क्त तय करती है — इस लए ‘कुन्त्याः’ या ‘कुन्तीम्’
लखना अशुद्ध होगा।
जोड़कर दे खए: पाठ म भीम कुन्ती को ‘मातः!’ कहकर पुकारता है और कुन्ती उसे ‘पुत्र!’, ‘वत्स भीम!’ कहती है;
यु ध ष्ठर उन्ह ‘अम्ब!’ कहते ह। ‘अम्ब’ का पयाय ‘जननी’ ही है — यही अभ्यास के प्रश्न ५ (घ) म पूछा गया है।
प्र.1 (ख) कुन्त्या न श्चतं कः न समथय त ?
उत्तरम् — यु ध ष्ठरः। ( हन्द — कुन्ती के नश्चय का समथन यु ध ष्ठर नह करते।)
पाठ की पंिक्त — ‘न खलु भवत्या अध्यविसतं समथ ये।’ (युिधिष्ठरः, पृष्ठ ११५)
‘अध्यविसतम्’ = िनिश्चतम् · ‘समथये’ = मै ं समथन करता हूँ (उत्तमपुरु ष)
वक्ता युिधिष्ठरः → उत्तर युिधिष्ठरः (कतिर पथमा)
क्य यु ध ष्ठर ही: उनका कारण भी उसी वाक्य म है — ‘यस्य वीरस्य भुजबलमा श्रत्य वयं सुखं शेमहे … तस्य
भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ् क ल्पतम्?’ अथात् जसके बल पर हम न श्चन्त ह, उसी को संकट म क्य भेजा
जाए। ध्यान द जए — यह वरोध नह , असहम त है; भीम उसका उत्तर ‘न ह मातुराज्ञा प्रत्यादे शमह त’ कहकर
दे ता है।
ध्यान द: ‘कुन्त्या’ म कत र तृतीया है, क्य क ‘ न श्चतम्’ क्तप्रत्ययान्त कमवाच्य रूप है। ‘कुन्ती’ ईकारान्त स्त्री लङ्ग
है, अतः तृतीया एकवचन ‘कुन्त्या’ बनता है (नद → नद्या इव)।
प्र.1 (ग) पाण्डवानाम् उपकता कः ?
उत्तरम् — ाह्मणः (प्र तवेशी वप्रः)। ( हन्द — पाण्डव का उपकार करने वाला वह पड़ोसी ाह्मण है।)
पाठ की पंिक्त — ‘आितथे यः िकल तत्र भवान् उपकत वसित पदाने न ।’ (भीमः, पृष्ठ ११२)
‘पदाने न ’ = अन्नदान से (करणे त ृत ीया)
वह कौन है ? — पितवेशी बाह्मणः → उत्तर बाह्मणः
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यही उत्तर पूरे पाठ क जड़ है: ाह्मण ने भक्षा दे कर पाण्डव को पाला — इसी ‘कृत’ उपकार का ‘प्र तकार’ करने
भीम बकासुर के पास जाता है। इसी लए भावाथ भी कहता है — ‘वयं नाग रकैः बहुकालं भक्षा-प्रदानेन पो षताः।’
य द यह उपकार न होता, तो पूरा नाटक ही न होता।
शब्द-रचना: ‘उपकता’ = उप + √कृ + तृच् प्रत्यय — ‘उपकार करने वाला’। इसी प्रत्यय से पाठ म ‘र क्षता’ (रक्षा
करने वाला) तथा ‘हन्ता’ (मारने वाला) भी बने ह। तृच्-प्रत्ययान्त शब्द का प्रथमा एकवचन ‘-ता’ पर समाप्त होता है
(कता, दाता, नेता क तरह)।
प्र.1 (घ) कं चन्तयन् दुय धनः नद्रां न लभते ?
उत्तरम् — भीमम्। ( हन्द — भीम का ध्यान करते हुए दुय धन को न द नह आती।)
पाठ की पंिक्त — ‘यच्च िचन्तयन् दुय धनो िनद ां न लभते , त स्य भीमस्य पेषणं…’ (पृष्ठ ११५)
पश्न ‘कम्’ = पुंिलङ् ग · िद्वतीया · एकवचन
‘िचन्तयन्’ (√िचन्त् का कम) → कमिण िद्वतीया → भीमम्
वभ क्त क सावधानी: प्रश्न ‘कम्’ है, ‘कः’ नह — इस लए उत्तर द्वतीया म चा हए, ‘भीमः’ नह ‘भीमम्’। नयम
है ‘कम ण द्वतीया’ — जसका चन्तन कया जा रहा है, वही कम है। ध्यान द जए, पाठ म यही बात ‘यत् … तस्य’
के रूप म है, पर प्रश्न ने उसे ‘कम्’ बनाकर पूछा है, अतः रूप बदलेगा।
‘ चन्तयन्’ क्या है: यह √ चन्त् ( णच्) + शतृ प्रत्यय है, अथात् ‘ चन्तन करता हुआ’। शतृ-प्रत्ययान्त पद अपने कता
(यहाँ ‘दुय धनः’) के लङ्ग-वचन- वभ क्त का अनुसरण करते ह — इसी लए ‘ चन्तयन्’ पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन म है।
इसी प्रकार पाठ म ‘भावयन्’ तथा ‘प रमृजन्’ भी आए ह।
प्र.1 (ङ) पाण्डवाः कुत्र नवस न्त स्म ?
उत्तरम् — एकचक्रनगरे ( ाह्मणस्य गृहे)। ( हन्द — पाण्डव एकचक्रा नगरी म एक ाह्मण के घर रहते थे।)
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पाठ की पंिक्त — ‘पाण्डवाः एकच क्र नगरे कस्यिचत् बाह्मणस्य गृहे िनवसिन्त।’ (पृष्ठ ११२)
पश्न ‘कु त्र’ = कहाँ ? → उत्तर अिधकरण (सप्तमी) में
अतः — एकचक्रनगरे / बाह्मणस्य गृहे
नयम — अ धकरणे सप्तमी: जहाँ क्रया घ टत हो, वह अ धकरण कहलाता है और उसम सप्तमी वभ क्त आती
है। ‘कुत्र’ का उत्तर सदा सप्तमी म या स्थानवाचक अव्यय म होता है — ‘एकचक्रनगरम्’ ( द्वतीया) लखना अशुद्ध
है।
‘ नवस न्त स्म’ का अथ भूतकाल है: लट् लकार (वतमान) के साथ ‘स्म’ अव्यय लगते ही अथ भूतकाल का हो
जाता है — ‘रहते थे’। संस्कृत म कथा-वणन के लए यह प्रयोग बहुत होता है (‘पठ त स्म’ = पढ़ता था)। इसी लए
प्रश्न म भी ‘ नवस न्त स्म’ लखा है।
प्र.1 (च) भरतवंशप्रद पः कः ?
उत्तरम् — भीमः (भीमसेनः)। ( हन्द — भरतवंश का द पक भीम है।)
पाठ की पंिक्त — ‘वत्स भीम ! अनुरूपमिभिहतं भरतवंशपदीपेन मम पुत्रेण।’ (कु न्ती, पृष्ठ ११४)
वहाँ पद त ृत ीया में है (भरतवंशपदीपेन )
पश्न ‘कः’ = पथमा · एकवचन → उत्तर भीमः
यह पद कसने, कब कहा: जब भीम ने ‘अहमेव बकासुरम भग मष्या म’ कहकर स्वयं जाने का नश्चय कया, तब
कुन्ती ने प्रसन्न होकर उसे ‘भरतवंशप्रद प’ कहा। द पक अपने को जलाकर दूसर को उजाला दे ता है — भीम भी
अपने प्राण दाँव पर लगाकर एक प रवार को बचाने जा रहा है। इसी रूपक अलङ् कार के कारण यह वशेषण अत्यन्त
साथक है।
समास: भरतवंशप्रद पः = भरतवंशस्य प्रद पः — षष्ठी-तत्पुरुष समास। ऐसे ही पाठ के अन्य तत्पुरुष ह —
मृगा धपः (मृगाणाम् अ धपः), धमसङ् ग्रहः (धमाणां सङ् ग्रहः), व्याघ्रगह्वरम् (व्याघ्रस्य गह्वरम्)।
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प्र.1 (छ) कः भृशं प रदे वयते ?
उत्तरम् — तपस्वी ( ाह्मणः / एकपुत्रः वप्रः)। ( हन्द — वह इकलौते पुत्र वाला बेचारा ाह्मण बहुत वलाप कर रहा है।)
पाठ की पंिक्त — ‘स खल्वेक पुत्रस्त पस्वी भ ृशं पिरदे वयते ।’ (कु न्ती, पृष्ठ ११५)
सिन्धिवच्छे द ः — सः + खलु + एकपुत्रः + तपस्वी
‘कः’ = पथमा एकवचन → उत्तर तपस्वी (नकारान्त पुंिलङ् ग, पथमा एकवचन)
‘तपस्वी’ का दोहरा अथ: यह शब्द यहाँ (१) तपस्या करने वाला ाह्मण और (२) बेचारा, दयनीय — दोन अथ
दे ता है। संस्कृत नाटक म दूसरा अथ बहुत चलता है, और यहाँ वही अ धक मा मक है : जसका एक ही पुत्र है, उसी
क ब ल क बारी आ गई — इससे बड़ा दुभाग्य क्या होगा! ‘भृशम्’ (अत्यन्त) शब्द उसी पीड़ा क तीव्रता बताता है।
व्याकरण: ‘प रदे वयते’ = प र + √ दव् + णच्, लट् लकार, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष एकवचन — ‘ वलाप करता है’।
पहले भी पाठ म इसी अथ म ‘शोच त’ आया है (‘तस्माद् बालकस्य पता तपस्वी शोच त’) — दोन वाक्य एक ही
व्य क्त के वषय म ह।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 121
प्रश्न २ — पूणवाक्येन उत्तरं लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.2 (क) “भैक्षप्रदानेन……..” इ त ोकानुसारं सनातनः धमः कः ?
उत्तरम् — कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारः एव सनातनः धमः अ स्त। अथात् — ‘कृतं प्र तकृतं भूयात्’ इ त एव सनातनः
धमः। ( हन्द — कए हुए उपकार का बदला चुकाना ही सनातन धम है।)
श्लोक — भै क्षपदाने न िचरं परैरु पकृ ता वयम्।
कृ तं पितकृ तं भूयादे ष धमः सनातनः॥
‘कृ तम्’ = िकया हुआ उपकार · ‘पितकृ तम्’ = बदले में िकया गया उपकार
‘भूयात्’ = हो जाए (आशीिलङ् लकार)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः
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पुस्तक का समथन: ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का भावाथ १ यही कहता है — ‘उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत् इ त एषः
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शाश्वतः धमः।’ अथात् दूसर ने जो उपकार कया, उसे लौटाना ही शाश्वत नयम है। ध्यान र खए — यह ‘बदला’
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(प्र तशोध) नह
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aपूgणl वाक्य कैसे बनाएँ: प्रश्न म ‘सनातनः धमः कः?’ है, अतः उत्तर म भी ‘… एव सनातनः धमः अ स्त’ र खए।
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प्रश्नवाचक ‘कः’ के स्थान पर उत्तर-पद बैठाइए और अन्त म क्रया ‘अ स्त’ जोड़ द जए — यही ‘पूणवाक्येन उत्तरम्’
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क सीधी व ध है।
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प्र.2 (ख) बकनामा दै त्यः कुत्र वस त ?
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a स्थत पवत पर रहता है।)
उत्तरम् — बकनामा दै त्यः एकचक्रस्य पुरस्य अदूरव त न पवते वस त। ( हन्द — बक नामक दै त्य एकचक्रा नगर से थोड़ी ही दूर
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mपुरस्यादू रवितिन पवते वसित बकनामा दै त्यः।’ (कुन्ती, पृष्ठ agl
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पाठ की पंिक्त — ‘आकणय, अस्य एकचक्रस्य
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सिन्धिवच्छे द ः — पुरस्य + अदू रवितिन (दीघ सिन्धः)
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‘कु त्र’ का उत्तर → अिधकरणे सप्तमी : पवते
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त न’ शब्द क्य महत्त्वपूण है: यह केवल स्थान नह बताता, भय क नकटता भी बताता है — राक्षस दूर
नह , पास ही रहता है, इसी लए नगर उसक शत मानने को ववश है। पूवकथा म भी यही शब्द ‘ना तदूर स्थतेन
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बकनाम्ना असुरेण’ के रूप म आया है। यही पद अभ्यास के प्रश्न ८ (च) म समस्तपद बनाने के लए दया गया है।
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‘बकनामा’ क्या है: बकः नाम यस्य सः = बकनामा — यह बहु ी ह समास है, नकारान्त पुं लङ्ग (नामन् शब्द),
प्रथमा एकवचन। इसी प्रकार पाठ म ‘बकनामानम् असुरम्’ ( द्वतीया) भावाथ म आया है।
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उत्तरम् — कुन्ती प्र तश्रुतवती यत् स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेष यष्य त। ( हन्द — कुन्ती ने वचन दया क वह अपने
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पुत्र म से एक को बकासुर के पास भेजेगी।)
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पूवकथा — ‘स्वपुत्रेष ु एकं बकासुरस्य समीपं पेषयािम इित कु न्ती पितज्ञां कृ तवती।’ (पृष्ठ ११२)
संवाद — ‘मत्पुत्रेष ु कोऽिप पेषियष्यत इित भवत्या पितश्रुत म्।’ (भीमः, पृष्ठ ११३)
दोनों स्थान एक ही बात कहते है ं
यही वचन पूरे नाटक का कारण है: ध्यान द जए क कुन्ती ने ‘भीम को भेजूँगी’ नह कहा — उसने ‘पुत्र म से
एक को’ कहा। पर भीम स्वयं आगे आ जाता है, और जब वह कहता है ‘मत्पुत्रेषु कोऽ प प्रेष यष्यते इ त भवत्या
प्र तश्रुतम्’, तब कुन्ती मौन रह जाती है — वह मौन ही स्वीकृ त है। पात्र-चयन कुन्ती ने नह , भीम ने स्वयं कया।
व्याकरण: ‘प्र तश्रुतवती’ = प्र त + √श्रु + क्तवतु प्रत्यय, स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन — यह कतृवाच्य भूतका लक
रूप है। इसी का कमवाच्य रूप है ‘भवत्या प्र तश्रुतम्’ (क्त प्रत्यय + कता तृतीया म)। यही जोड़ी अभ्यास के प्रश्न १०
(वाच्यप रवतन) का ‘यथा’ बनी है।
प्र.2 (घ) भीमस्य अग्रजः कः ?
उत्तरम् — भीमस्य अग्रजः यु ध ष्ठरः अ स्त। ( हन्द — भीम के बड़े भाई यु ध ष्ठर ह।)
पाठ की पंिक्त — ‘ओष्ठौ स्फु रतः इवागजस्य।’ (नकु लः, पृष्ठ ११५)
यहाँ ‘अगजस्य’ का अथ है ‘बड़ े भाई (भीम) का’ — नकु ल की दृ िष्ट से
िकन्त ु पश्न पूछता है ‘भीमस्य अगजः कः?’ → पाण्डवों में भीम से बड़ े के वल युिधिष्ठर है ं
सावधान — यहाँ एक जाल है: पाठ म ‘अग्रजस्य’ शब्द भीम के लए आया है (क्य क नकुल भीम से छोटा है)।
पर प्रश्न ‘भीम का अग्रज’ पूछ रहा है, अतः उत्तर यु ध ष्ठर है। पाण्डव का क्रम है — यु ध ष्ठर, भीम, अजुन, नकुल,
सहदे व। इसी लए भीम का एकमात्र अग्रज यु ध ष्ठर ही है, और वही पाठ म ‘वत्स भीमसेन!’ कहकर उसे सम्बो धत
करते ह।
शब्द-रचना: अग्रजः = अग्रे जायते इ त (पहले जन्मा) — उपपद तत्पुरुष। इसका वलोम है अनुजः (अनु जायते
इ त = बाद म जन्मा), जो अभ्यास के प्रश्न ६ (ख) का उत्तर है।
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प्र.2 (ङ) का प्रत्यादे शं न अह त ?
उत्तरम् — मातुः आज्ञा प्रत्यादे शं न अह त। ( हन्द — माता क आज्ञा अवज्ञा के योग्य नह होती।)
पाठ की पंिक्त — ‘न िह मात रु ाज्ञा पत्यादे शमहित ।’ (भीमः, पृष्ठ ११५)
सिन्धिवच्छे द ः — मात ःु + आज्ञा = मात रु ाज्ञा (िवसगसिन्धः — िवसग का ‘र्’)
पश्न ‘का’ = स्त्रीिलङ् ग पथमा → उत्तर ‘आज्ञा’ (स्त्रीिलङ् ग पथमा)
यह वाक्य पाठ का दूसरा सूत्र-वाक्य है: यु ध ष्ठर का सारा तक ‘भीम को मत भे जए’ पर टका था; भीम एक ही
वाक्य म उसे समाप्त कर दे ता है — माता वचन दे चुक ह, अब वचार का प्रश्न ही नह । पहला सूत्र था ‘कृतं प्र तकृतं
भूयात्’ (कृतज्ञता), दूसरा यह (मातृ-आज्ञापालन)। दोन मलकर वह ‘धमसङ् ग्रह’ बनते ह जसक ओर भीम ने इसी
वाक्य से पहले संकेत कया — ‘धम वजानता भवता धमसङ् ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः।’
व्याकरण: ‘अह त’ के योग म कम द्वतीया म आता है — ‘प्रत्यादे शम् अह त’ (कम ण द्वतीया)। पाठ म यही रचना
दो बार है — ‘प्रत्युपकारमह त’ तथा ‘प्रत्यादे शमह त’। ‘ ह’ अव्यय यहाँ कारण/ नश्चय बताता है — ‘क्य क नश्चय
ही…’।
प्र.2 (च) पौराः बकासुराय कथं ब लम् आहर न्त ?
उत्तरम् — पौराः पयायक्रमेण बकासुराय ब लम् आहर न्त। ( हन्द — नगरवासी बारी-बारी से बकासुर के लए ब ल ले जाते ह।)
पाठ की पंिक्त — ‘पय यक्र मेण त स्मै बिलमाहरिन्त पौराः।’ (भीमः, पृष्ठ ११२)
पश्न ‘कथम्’ = िकस पकार ? → उत्तर रीित /पकार बताने वाले पद से
‘पय यक्रमेण’ — त ृत ीया िवभिक्त (पकारे त ृत ीया)
‘पयायक्रमेण’ ही क्य : ‘कथम्’ का उत्तर सदा क्रया- वशेषण या तृतीया- वभक्त्यन्त पद म आता है, संज्ञा म नह ।
स न्ध क शत यही थी — ‘प्र त दनं क श्चत् नगरवासी स्वेच्छया असुरस्य भक्ष्यं भवेत्’, अथात् हर दन एक व्य क्त,
बारी-बारी से। इसी लए ाह्मण-प रवार क बारी को पाठ ‘पयायप ततम्’ भी कहता है।
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एक शब्द, तीन रूप: यह पाठ ‘पयाय’ शब्द को तीन रूप म दखाता है — पयायक्रमेण (बारी-बारी से), पयायः
(‘श्वः प्रभाते भवत्यस्य वप्रस्य पयायः’ = बारी), तथा पयायप ततम् (बारी से आ पड़ा)। तीन का मूल अथ एक ही है
— क्रम, बारी।
प्र.2 (छ) क्ष त्रयाणां धमः कः ?
उत्तरम् — नररक्षणं नाम भू मपालानां क्ष त्रयाणां धमः अ स्त। ( हन्द — मनुष्य क रक्षा करना ही पृथ्वी का पालन करने वाले
क्ष त्रय का धम है।)
पाठ की पंिक्त — ‘नररक्षणं नाम भूिमपालानां क्षित्रयाणां धमः।’ (भीमः, पृष्ठ ११६)
यह वाक्य बक के कथन का सीधा उत्तर है —
बकः : ‘नरभक्षणं नाम मांसािशनां राक्षसानां धमः।’
वक्ता वाक्यम् धम का आधार
बकः नरभक्षणं नाम मांस ािशनां राक्षसानां धम ः। अपनी जा त का स्वभाव
भीमः नरर क्षणं नाम भूिमपालानां क्षित्र याणां धम ः। दूसर क रक्षा का कतव्य
उत्तर दे ने क कला दे खए: भीम बक के वाक्य का साँचा वही रखता है और केवल एक शब्द बदल दे ता है —
‘भक्षण’ के स्थान पर ‘रक्षण’। इससे दो लाभ होते ह : उत्तर याद रखने म सरल हो जाता है, और यह भी सद्ध हो
जाता है क दोन के ‘धम’ आमने-सामने खड़े ह। जस धम से दूसरे का प्राण जाए वह धम नह ; जससे दूसरे का
प्राण बचे, वही धम है — यही पाठ का नष्कष है।
समास: ‘नररक्षणम्’ = नराणां रक्षणम् (षष्ठी-तत्पुरुषः); ‘भू मपालाः’ = भू म पालय न्त इ त (उपपद-तत्पुरुषः)।
‘नाम’ यहाँ अव्यय है, जसका अथ है ‘तो’, ‘ नश्चय ही’ — नाम नह ।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 121–122
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः AglaSem · NCERT Solutions
प्रश्न ३ — अधस्तात् दत्ता न वाक्या न केन कं प्र त उक्ता न इ त न दशत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.3 अधस्तात् दत्ता न वाक्या न केन कं प्र त उक्ता न इ त न दशत — यथा : ‘तस्माद् बालकस्य पता तपस्वी शोच त’
— कुन्त्या, भीमम्। (१) न ह मातुराज्ञा प्रत्यादे शमह त (२) न ह खरदं ष्ट्रो मृगा धपः सहायमपेक्षते (३) क्ष त्रयाण्या
यदु चतं तदनु ष्ठतम् (४) अ प हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे (५) तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ् क ल्पतम् ? (६)
नरभक्षणं नाम मांसा शनां राक्षसानां धमः
पूणा ता लका —
क्र.सं. वाक्या न केन / कं / कां प्र त प्रसङ्गः (पृष्ठम्)
कया
यथा तस्माद् बालकस्य िपता तपस्वी शोचित कु न्त्या भीमम् बक क शत बताते हुए (११३)
१. न िह मातुर ाज्ञा पत्यादे शमहित भीमेन युिधिष्ठरम् यु ध ष्ठर क असहम त का उत्तर (११५)
२. न िह खरदं ो म ृग ािधपः सहायमपेक्षते भीमेन अजुनम् अजुन के साथ चलने के प्रस्ताव पर
(११५)
३. क्षित्रयाण्या यदुिचतं तदनुिष्ठतम् भीमेन कु न्तीम् माता को सान्त्वना दे ते हुए (११४)
(मातरम्)
४. अिप हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे सहदे वेन भीमम् भीम क भूख पर प रहास (११५)
५. तस्य भीमस्य पेषणं कथं नु त्वया युिधिष्ठरे ण कु न्तीम् माता के नश्चय पर आप त्त (११५)
सङ् किल्पतम् ? (मातरम्)
६. नरभक्षणं नाम मास
ं ािशनां राक्षसानां धमः बके न भीमम् धम- ववाद म अपना पक्ष (११६)
उत्तर कैसे खोज — दो कसौ टयाँ: पहली — क्रयारूप: जस वाक्य म ‘भोक्ष्यसे’, ‘त्वया’, ‘ते’ जैसे मध्यमपुरुष
के पद ह , वह कसी उप स्थत व्य क्त से कहा गया है, और वही ‘कं प्र त’ का उत्तर है। जैसे ‘त्वया सङ् क ल्पतम्’ —
‘त्वया’ कुन्ती के लए है, अतः उत्तर ‘कुन्तीम् प्र त’। दूसरी — वषय: जस बात का वरोध या समथन कया जा रहा
है, वह कसने कही थी — वही श्रोता है। ‘मातुराज्ञा प्रत्यादे शमह त’ का वरोध यु ध ष्ठर क आप त्त से है, अतः श्रोता
यु ध ष्ठर।
वभ क्त क सावधानी: ‘केन’ का उत्तर तृतीया म दे ना है (भीमेन, सहदे वेन, यु ध ष्ठरेण, बकेन) क्य क क्रया
‘उक्तम्’ कमवाच्य है और कत र तृतीया लगती है। स्त्री-पात्र के लए स्तम्भ ‘कया’ है — ‘कुन्त्या’। ‘कं प्र त’ का उत्तर
द्वतीया म दे ना है, क्य क ‘प्र त’ के योग म द्वतीया आती है — भीमम्, यु ध ष्ठरम्, अजुनम्; स्त्री-पात्र के लए ‘कां
प्र त’ → ‘कुन्तीम्’।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः
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ध्यान द (३) क बारीक : ‘क्ष त्रयाण्या यदु चतं तदनु ष्ठतम्’ — यहाँ ‘क्ष त्रयाण्या’ स्वयं कुन्ती है (क्ष त्रय पाण्डु क
m a s em ‘कुन्त्या,
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पत्नी)। भीम माता से ही उसक प्रशंसा कर रहा है, इस लए वक्ता भीम और श्रोता कुन्ती। इसे उलटकर
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भीमम्’ लखना
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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 122–123
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प्रश्न ४ — रेखाङ् कतपदे षु स न्ध वभज्य स न्धनाम लखत (यथाm
a s e — न चैतावत् : च + एतावत्, वृ द्ध-स न्धः)
अभ्यासाद् जायते स द्धः agl
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सम्यगनु ष्ठतम्।
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प्र.4 (क)
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l — सम्यक् + अनु ष्ठतम् ( व्यञ्जन-स न्धः — जश्त्व-स न्धः )। ( हन्द — ‘भली-भाँ त कया गया’।)
a gउत्तरम्
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सम्यक् + अनुिष्ठतम् → सम्यगनुिष्ठतम्
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िनयम — झलां जशोऽ न्ते : पद के अन्त में आया वग का पथम वण (क् , च्, ट् , त्, प्) स्वर या घोष वण के आने
पर उसी वग के त ृत ीय वण (ग्, ज्, ड् , द् , ब्) में बदल जाता है।
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यहाँ — क् + अ → ग्
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s m नयम कहाँ-कहाँ लगेगा: इसी पाठ के प्रश्न ४ (च) म ‘यत् + उ चतम् = यदु चतम्’ (त् → द्) तथा ोक के
eयही
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gl ‘भूयात् + एषः = भूयादे ष’ (त् → द्) म भी यही जश्त्व-स न्ध है। एक बार नयम पकड़ लेने पर तीन उत्तर अपने
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आप नकल आते ह।
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ध्यान द: कुछ पुस्तक इसे केवल ‘व्यञ्जन-स न्ध’ लखती ह, कुछ ‘जश्त्व-स न्ध’। दोन शुद्ध ह — जश्त्व
व्यञ्जनस न्ध का ही एक भेद है। परीक्षा म ‘व्यञ्जन-स न्धः (जश्त्वम्)’ लख दे ना सबसे सुर क्षत है।
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m पुरस्यादूरव त न पवते वस त बकनामा दै त्यः। as e
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प्र.4 (ख)
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उत्तरम् — पुरस्य + अदूरव त न ( द घ-स न्धः )। ( हन्द — ‘नगर से थोड़ी दूर स्थत’।)
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पुरस्य + अदू रवितिन → पुरस्य ◌ ादू रवितिन
िनयम — अकः सवण दीघः : सवण स्वर आपस में िमलकर दीघ हो जाते है।
ं
यहाँ — अ + अ = आ
स न्ध तोड़ने क यु क्त: जहाँ ‘आ’ दखे और उसके दोन ओर अथ पूरा न बन रहा हो, वहाँ पहले ‘अ + अ’ या ‘अ
+ आ’ का प्रयास क जए। यहाँ ‘पुरस्यादूर…’ म य द ‘आ’ को न तोड़ तो ‘पुरस्यादूर’ का कोई अथ नह बनता; तोड़ते
ही ‘पुरस्य’ (नगर का) + ‘अदूरव त न’ (पास स्थत) — दोन साथक हो जाते ह।
जोड़कर दे खए: ‘अदूरव त न’ ही अभ्यास के प्रश्न ८ (च) का उत्तर है — ‘न दूरे वतते’ का समस्तपद ‘अदूरव त’
(सप्तमी म ‘अदूरव त न’)।
प्र.4 (ग) श्रुतं तस्य दुरात्मनो वृत्तम्।
उत्तरम् — दुरात्मनः + वृत्तम् ( वसग-स न्धः )। ( हन्द — ‘उस दुष्ट का वृत्तान्त’।)
दुरात्मनः + वृत्तम् → दुरात्मन ◌ ो वृत्तम्
िनयम — अकारपूव िवसग के बाद घोष व्यञ् जन (यहाँ ‘व्’) आने पर िवसग सिहत अकार ‘ओ’ हो जाता है।
अः + व् → ओ
यही सबसे अ धक आने वाली वसगस न्ध है: इसी नयम से पाठ म ‘व रष्ठः + बाहुशा लनाम् = व रष्ठो
बाहुशा लनाम्’, ‘मानुषभोजी सः राक्षसः’ आ द बनते ह। पहचान का सूत्र यह है — जहाँ बीच म अकेला ‘ओ’ पड़ा हो
और अगला शब्द घोष व्यञ्जन से आरम्भ हो, वहाँ प्रायः वसग छपा है।
शब्द-रचना: ‘दुरात्मनः’ = दुष्टः आत्मा यस्य सः = दुरात्मा (बहुव्री ह), उसक षष्ठी एकवचन ‘दुरात्मनः’। ‘दुर्’ उपसग
के बाद स्वर आने पर ‘दुर्’ का ‘र्’ बना रहता है — दुर् + आत्मा = दुरात्मा।
प्र.4 (घ) भोज्यसमाहारे मानुषोऽ प तस्मै प्रेष यतव्यः।
उत्तरम् — मानुषः + अ प ( वसग-स न्धः )। ( हन्द — ‘एक मनुष्य भी’।)
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मानुषः + अिप → मानुष ◌ ोऽिप
िनयम — अकारपूव िवसग के बाद अ आने पर िवसग सिहत अकार ‘ओ’ हो जाता है और आगे वाला ‘अ’ लुप्त
होकर उसके स्थान पर अवगह (ऽ ) लगता है।
अः + अ → ओ + ऽ
अवग्रह क्य लगाया जाता है: ‘ऽ’ चह्न बताता है क यहाँ एक ‘अ’ था जो स न्ध म लुप्त हो गया। इससे पढ़ने वाले
को स न्ध तोड़ने म सहायता मलती है। इसी नयम से पाठ म ‘आगतोऽहम्’, ‘युक्तोऽयम्’, ‘श्रो त्रयोऽयम्’,
‘क्ष त्रयोऽ स्म’, ‘धनुधरोऽहम्’, ‘ ाघनीयोऽ स’, ‘कौन्तेयोऽ स्म’ — सब बने ह। जहाँ ‘ऽ’ दखे, वहाँ आगे का अक्षर
सदा ‘अ’ ही होगा।
अगला प्रश्न भी यही है: प्रश्न ४ (झ) ‘धमसङ् ग्रहोऽत्र’ भी ठ क इसी नयम पर है — धमसङ् ग्रहः + अत्र।
प्र.4 (ङ) मातः ! नास्त्यत्र कमप्यनुशो चतव्यम्।
उत्तरम् — ना स्त + अत्र ( यण्-स न्धः )। [भीतर एक और स न्ध छपी है — न + अ स्त = ना स्त ( द घ-स न्धः )।] ( हन्द
— ‘यहाँ कुछ भी नह है’।)
पूरा िवच्छे द — न + अिस्त + अत्र
चरण १ : न + अिस्त → नािस्त ( अ + अ = आ, दीघ-सिन्धः )
चरण २ : नािस्त + अत्र → नास्त्यत्र ( इ + अ = य्, यण्-सिन्धः )
िनयम — इको यणिच : इ/उ/ऋ/ऌ के बाद असवण स्वर आने पर क्रमशः य्/व्/र्/ल् हो जाते है।
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रेखाङ् कत पद के लए मुख्य उत्तर कौन-सा है: पुस्तक ने केवल ‘नास्त्यत्र’ को रेखाङ् कत कया है और एक ही
जोड़ी का स्थान दया है, अतः वहाँ ल खए — ना स्त + अत्र (यण्-स न्धः)। भीतर क दूसरी स न्ध (न + अ स्त)
को कोष्ठक म जोड़ दे ने से उत्तर और पूरा हो जाता है।
यही नयम आगे भी: इसी वाक्य का ‘ कमप्यनुशो चतव्यम्’ भी दो स न्धय से बना है — कम् + अ प = कम प
(व्यञ्जनस न्ध), फर कम प + अनुशो चतव्यम् = कमप्यनुशो चतव्यम् (इ + अ = य्, यण्-स न्ध)। इसे स्वयं
तोड़कर अभ्यास क जए।
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प्र.4 (च) क्ष त्रयाण्या यदु चतं तदनु ष्ठतम्।
उत्तरम् — यत् + उ चतम् ( व्यञ्जन-स न्धः — जश्त्व-स न्धः )। ( हन्द — ‘जो उ चत था’।)
यत् + उिचतम् → यदुिचतम्
िनयम — झलां जशोऽ न्ते : पदान्त ‘त्’ के बाद स्वर आने पर ‘त्’ का ‘द् ’ हो जाता है।
त् + उ → द्
उसी वाक्य म दूसरी बार: इसी वाक्य का अगला पद ‘तदनु ष्ठतम्’ भी ठ क यही स न्ध है — तत् + अनु ष्ठतम् =
तदनु ष्ठतम्। संस्कृत म ‘यत्…तत्’ क जोड़ी बहुत आती है, और स्वर आने पर दोन का ‘त्’ ‘द्’ हो जाता है — यत् +
अ प = यद प, तत् + अ प = तद प (यह भी पाठ म है)।
पहचान क यु क्त: य द कसी पद के बीच अचानक ‘द’ दखे और उससे पहले का अंश ‘य’/‘त’/‘सम्य’ जैसा हो,
तो वहाँ प्रायः पदान्त ‘त्’ या ‘क्’ छपा है — यही जश्त्व-स न्ध का चह्न है।
प्र.4 (छ) स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं प रदे वयते।
उत्तरम् — पुत्रः + तपस्वी ( वसग-स न्धः )। ( हन्द — ‘इकलौते पुत्र वाला तपस्वी ( ाह्मण)’।)
एकपुत्रः + तपस्वी → एकपुत्रस्त पस्वी
िनयम — िवसग के बाद खर् वण में से ‘त्’ अथवा ‘थ्’ आने पर िवसग का ‘स्’ हो जाता है (िवसजनीयस्य सः)।
अः + त → अस्त
यह नयम कन वण के आगे लगता है: वसग के बाद जब त्, थ् आएँ तो ‘स्’; जब च्, छ् आएँ तो ‘श्’ (जैसे
इसी पाठ का ‘मृत्युश्चा स्म’ = मृत्युः + च); और जब ट् , ठ् आएँ तो ‘ष्’। तीन एक ही सूत्र के भेद ह — वसग अपने
बाद वाले वण के अनुरूप ऊष्म वण बन जाता है।
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पूरे वाक्य क स न्धयाँ: ‘स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी’ = सः + खलु + एकपुत्रः + तपस्वी — (१) ‘सः’ का वसग व्यञ्जन
से पहले लुप्त होकर ‘स’ बना (एतत्तदोः सुलोपः), (२) खलु + एकपुत्रः = खल्वेकपुत्रः (उ + ए = व्, यण्-स न्धः),
(३) एकपुत्रः + तपस्वी = एकपुत्रस्तपस्वी ( वसगस न्ध)। एक ही वाक्यांश म तीन स न्धयाँ — इसी लए यह अच्छा
अभ्यास है।
प्र.4 (ज) कथं नु त्वया सङ् क ल्पतम्।
उत्तरम् — सम् + क ल्पतम् ( व्यञ्जन-स न्धः — परसवण/अनुस्वार-स न्धः )। ( हन्द — ‘संकल्प कया गया’।)
सम् + किल्पतम् → सङ् किल्पतम्
िनयम — मोऽन स्ु वारः तथा अन स्ु वारस्य यिय परसवणः : पदान्त ‘म्’ के बाद व्यञ्जन आने पर वह पहले अनुस्वार
बनता है, िफर उस व्यञ्जन के वग का पञ्चम वण हो जाता है।
यहाँ अगला वण ‘क् ’ (कवग) है → ‘म्’ → ङ्
इसी नयम से पाठ के तीन और शब्द बने ह: सम् + ग्रहः = सङ् ग्रहः (धमसङ् ग्रहः), सम् + क ल्पतम् =
सङ् क ल्पतम्, तथा सम् + चतम् = स ञ्चतम् प्रकार के शब्द। सूत्र सरल है — म् के बाद जस वग का व्यञ्जन हो,
म् उसी वग का पञ्चम वण बन जाता है : क-वग → ङ् , च-वग → ञ्, ट-वग → ण्, त-वग → न्, प-वग → म्।
लखने क छू ट: ‘सङ् क ल्पतम्’ को ‘संक ल्पतम्’ भी लखा जाता है — अनुस्वार और परसवण दोन रूप शुद्ध ह।
पुस्तक ने परसवण रूप छापा है, इस लए उत्तर म भी वही रखना अच्छा है।
प्र.4 (झ) धमसङ् ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः।
उत्तरम् — धमसङ् ग्रहः + अत्र ( वसग-स न्धः )। ( हन्द — ‘यहाँ धम का संग्रह’।)
धमसङ् गहः + अत्र → धमसङ् गह ◌ ोऽत्र
िनयम — अकारपूव िवसग + अ → ‘ओ’ तथा आगे का ‘अ’ लुप्त, स्थान पर अवगह (ऽ )।
अः + अ → ओ + ऽ
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प्रश्न ४ (घ) से तुलना क जए: वहाँ ‘मानुषः + अ प = मानुषोऽ प’ था, यहाँ ‘धमसङ् ग्रहः + अत्र = धमसङ् ग्रहोऽत्र’
— नयम बल्कुल वही। परीक्षा म ऐसी दोहराई गई स न्धयाँ मुफ़्त के अंक ह, बशत नयम एक बारem
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ठ क से समझ
लया हो। .co
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aglसमास भी दे ख ली जए: ‘धमसङ् ग्रहः’ = धमाणां सङ् ग्रहः — षष्ठी-तत्पुरुष समास। यही अभ्यास के प्रश्न ८ (ख)
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का उत्तर है। भीम इसे इस लए कहता है क यहाँ एक साथ दो धम सध रहे ह — प्रत्युपकार तथा मातृ-आज्ञापालन।
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मानुषभोजी स राक्षस इ त श्रूयते।
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प्र.4 (ञ)
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.c + इ त ( वसग-स न्धः — वसगलोपः )। [साथ ही — सः + राक्षसः =aसg राक्षसः ( एतत्तदोः सुलोपः )।]
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se— ‘वह राक्षस — ऐसा सुना जाता है’।)
उत्तरम् — राक्षसः
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राक्षसः + इित → राक्षस इित
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िनयम — अकारपूव िवसग के बाद अ से िभ न्न स्वर (यहाँ ‘इ’) आने पर िवसग का लोप हो जाता है और दोनों शब्द
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अलग-अलग ही िलखे जाते है।
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अः + इ → अ + इ (िवसग लुप्त, कोई जोड़ नही ं)
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.cका ‘स’ क्य हुआ: ‘सः’ तथा ‘एषः’ — इन दोन का वसग व्यञ्जन से aपहले g लुप्त हो जाता है (सूत्र —
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aseएतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे ह ल)। इसी लए ‘सः राक्षसः’ → ‘स राक्षसः’ तथा ‘एषः धमः’ → ‘एष धमः’ बनता
‘सः’
agl है। यही कारण है क पाठ का शीषक ‘कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः’ है, ‘भूयात् एषः धमः’ नह ।
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ध्यान द: पृष्ठ ११५ पर वाक्य ‘मानुषभोजी स राक्षसः इ त श्रूयते’ इस रूप म ( वसग स हत) छपा है, जब क अभ्यास
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म वही वाक्य स न्ध करके ‘स राक्षस इ त’ दया गया है। दोन शुद्ध ह — पहला व च्छन्न रूप, दूसरा स न्धयुक्त रूप।
अभ्यास का प्रश्न स न्धयुक्त रूप को ही तोड़ने को कहता है।
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. com जायते स द्धः — पृष्ठ 123 a g l
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प्रश्न ५ — पयायवा च-पदानां मेलनं कुरुत (यथा — पता : जनकः)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.5 पयायवा च-पदानां मेलनं कुरुत — (क) आयोधनम् (ख) वप्रः (ग) असुरः (घ) अम्ब (ङ) हुताशनः ॥ १. ाह्मणः
२. जननी ३. अ ग्नः ४. दै त्यः ५. युद्धम्
शुद्धं मेलनम् — (क)–५, (ख)–१, (ग)–४, (घ)–२, (ङ)–३।
क्रमः ‘क’ ‘ख’ पाठ का प्रयोग मेल का कारण / प्रमाण
स्तम्भः स्तम्भः
(क) आयोधनम् ५. युद्धम् न केवलं भोजनमुप स्थतम्। अमरकोष स्वयं प्रमाण दे ता है — ‘युद्धमायोधनं जन्यं
आयोधनम प। (११५) प्रधनं प्र वदारणम्’ (पृष्ठ १२६)
(ख) िवपः १. बाह्मणः श्वः प्रभाते भवत्यस्य वप्रस्य पयायः। शब्दाथ-ता लका ही कहती है — ‘ वप्रस्य = ाह्मणस्य’
(११३) (पृष्ठ १२०)
(ग) असुर ः ४. दै त्यः बकनामा दै त्यः … बकासुरस्य अमरकोष — ‘असुरा दै त्य-दै तेयदनुजेन्द्रा रदानवाः’
समीपम् (११२) (पृष्ठ १२६)
(घ) अम्ब २. जननी अम्ब ! क मदानीमुप क्षप्तम् ? ‘अम्ब’ माता का सम्बोधन है; ‘जननी’ = जन्म दे ने वाली
(११५) = माता
(ङ) हत
ु ाशनः ३. अिग्नः मद य-जठरस्थाय भगवते शब्दाथ-ता लका — ‘हुताशनाय = हुतम् अशनं यस्य,
हुताशनाय (११६) तस्मै; अथ — अ ग्न को’
मेलन जाँचने क दो कसौ टयाँ: पहली — शब्द-रचना: ‘हुताशनः’ = हुतम् (यज्ञ म डाली आहु त) अशनम्
(भोजन) यस्य सः — जसका भोजन ही आहु त है, वह अ ग्न ही हो सकता है। ‘जननी’ = जनय त इ त — जो जन्म
दे । ऐसे ही ‘आयोधनम्’ = आ + √युध् + ल्युट् — जसम युद्ध कया जाए। दूसरी — पुस्तक का अपना प्रमाण:
इस पाठ म पुस्तक ने पृष्ठ १२६ पर अमरकोष के तीन ोकांश जान-बूझकर दए ह, जनम ‘असुर’ तथा ‘आयोधन’
के पयाय गनाए गए ह — यह प्रश्न सीधे उसी सामग्री से जुड़ा है।
अ त रक्त पयाय (परीक्षा के लए): युद्धम् = आयोधनम्, जन्यम्, प्रधनम्, प्र वदारणम्, समरः, रणः, सङ् ग्रामः।
ाह्मणः = वप्रः, द्वजः, श्रो त्रयः, भूदेवः। असुरः = दै त्यः, दानवः, राक्षसः, नशाचरः। अ ग्नः = हुताशनः, पावकः,
व ह्नः, अनलः, कृशानुः। माता = जननी, अम्बा, प्रसूः, जन यत्री।
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प्रश्न ६ — अधो ल खतानां पदानां वपरीताथक-शब्दान् लखत (यथा — पीवरः : कृशः)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.6 (क) उपकृतः
उत्तरम् — अपकृतः। ( हन्द — ‘उपकृत’ = जस पर उपकार कया गया; इसका वलोम ‘अपकृत’ = जसका अपकार/अ हत
कया गया।)
उप + √कृ + क्त = उपकृ तः — भला िकया हआ
ु
अप + √कृ + क्त = अपकृ तः — बुरा िकया हुआ
भे द के वल उपसग का है — ‘उप’ (पास, अनुकू ल) बनाम ‘अप’ (दू र, पितकू ल)
उपसग से वलोम बनाने का नयम: संस्कृत म बहुत-से वलोम केवल उपसग बदलकर बनते ह — उपकारः/
अपकारः, उत्थानम्/अवसानम्, प्रवेशः/ नगमः, आगमनम्/गमनम्। इसी लए वलोम पूछे जाने पर पहले दे खए क
शब्द म कोई उपसग तो नह है; य द है, तो प्रायः उसी का उलटा उपसग उत्तर दे दे ता है।
पाठ से जो ड़ए: ोक म ‘परैरुपकृता वयम्’ आया है — दूसर ने हम पर उपकार कया। य द वहाँ ‘अपकृताः’
होता, तो अथ उलट जाता — दूसर ने हमारा अ हत कया। इसी एक उपसग पर पूरे नाटक का धम टका है।
प्र.6 (ख) अग्रजस्य
उत्तरम् — अनुजस्य (अवरजस्य)। ( हन्द — ‘अग्रज’ = बड़ा भाई; वलोम ‘अनुज’ = छोटा भाई।)
अगे जायते इित = अगजः — जो पहले जन्मा (बड़ ा भाई)
अनु जायते इित = अनुजः — जो बाद में जन्मा (छोटा भाई)
पश्न में पद षष्ठी में है (अगजस्य), अतः उत्तर भी षष्ठी में — अन ज
ु स्य
वभ क्त मलाना क्य आवश्यक है: वलोम पूछते समय भी उत्तर उसी वभ क्त-वचन म दे ना चा हए जसम प्रश्न
है। यहाँ ‘अग्रजस्य’ षष्ठी एकवचन है, इस लए ‘अनुजः’ लखना अधूरा उत्तर होगा — ठ क उत्तर अनुजस्य है। यही
सावधानी प्रश्न ६ (ख) को (क), (ग), (घ) से अलग बनाती है।
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पाठ से जो ड़ए: ‘ओष्ठौ ु रतः इवाग्रजस्य’ — यह नकुल कहता है, और उसका ‘अग्रज’ भीम है। पाण्डव का क्रम
— यु ध ष्ठर, भीम, अजुन, नकुल, सहदे व — याद र खए, तभी ‘ कसका अग्रज कौन’ स्पष्ट होगा।
प्र.6 (ग) उ चतम्
उत्तरम् — अनु चतम्। ( हन्द — ‘उ चत’ = ठ क, योग्य; वलोम ‘अनु चत’ = अनुपयुक्त, अयोग्य।)
उिचतम् + नञ् (न) = अन् + उिचतम् = अनुिचतम्
िनयम — ‘नञ्’ समास में स्वरािद शब्द से पहले ‘न’ का ‘अन्’ तथा व्यञ्जनािद शब्द से पहले ‘अ’ होता है।
उदाहरण — अन् + उिचतम् = अनुिचतम्; अ + धमः = अधमः
यही नयम पाठ म भी काम आया है: बक पूछता है — ‘कः खलु अधमः मया से वतः?’ यहाँ ‘अधमः’ = न धमः
(नञ् तत्पुरुष, ‘धम’ व्यञ्जना द है इस लए केवल ‘अ’)। इसी प्रकार ‘अनुशो चतव्यम्’ म भी नञ् है (न +
उपसगयुक्त पद)। एक ही नयम, अनेक शब्द — यही व्याकरण पढ़ने का लाभ है।
पाठ से जो ड़ए: ‘क्ष त्रयाण्या यदु चतं तदनु ष्ठतम्’ — भीम कहता है क माता ने वही कया जो उ चत था। य द वह
‘अनु चतम्’ मानता, तो पूरा नाटक ही न होता।
प्र.6 (घ) हषः
उत्तरम् — वषादः (शोकः / दुःखम्)। ( हन्द — ‘हष’ = प्रसन्नता; वलोम ‘ वषाद/शोक’ = खन्नता, दुःख।)
हषः = आनन्दः, पसन्नता
िवपरीतम् — िवषादः, शोकः, दुःखम्, खेद ः — सब स्वीकाय
पश्न का पद पथमा एकवचन में है → उत्तर भी पथमा एकवचन में
पाठ म दोन भाव आमने-सामने ह: एक ओर यु ध ष्ठर कहते ह ‘हषण उत्फुल्लाक्ष इव वत्सो भीमः’ — भीम
आन न्दत है; दूसरी ओर कुन्ती कहती है ‘तस्माद् बालकस्य पता तपस्वी शोच त’ तथा ‘स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं
प रदे वयते’ — ाह्मण शोकमग्न है। यही वरोध नाटक म करुण और वीर रस को साथ-साथ चलाता है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः AglaSem · NCERT Solutions
जोड़कर दे खए: अभ्यास के प्रश्न ९ म ‘प्रभूतमुप स्थतं मे भोजनम्’ का भाव ‘हषः’ बताया गया है (यथा), और ‘स
खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं प रदे वयते’ का भाव ‘ग्ला नः’ — अथात् वही हष- वषाद क जोड़ी वहाँ भी है।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 124
प्रश्न ७ — मञ्जूषातः समु चतं वशेषणपदं चत्वा लखत (मञ्जूषा : क्ष त्रयाणी, शकटपूरं, प्र तवेशी, खरदं ष्ट्रः, जठर ः, कौन्तेयः, पीवरौ · यथा
— पीवरौ बाहू)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.7 (क) …………………… मृष्टान्नम्।
उत्तरम् — शकटपूरं मृष्टान्नम्। ( हन्द — गाड़ी भर स्वा दष्ट भोजन।)
पाठ की पंिक्त — ‘भक्ष्यभोज्यािदकं मृष्टान्नं शकटपूरं पूरियत्वा पेषणीयं भवित राक्षसाय।’ (कु न्ती, पृष्ठ ११४)
िवशेष्य ‘मृष्टान्नम्’ — नपुंसकिलङ् ग · पथमा · एकवचन
अतः िवशेषण भी वही रूप — शकटपूरम्
वशेषण का नयम: ‘ वशेषणं वशेष्य नघ्नम्’ — वशेषण सदा अपने वशेष्य के लङ्ग, वचन तथा वभ क्त का
अनुसरण करता है। मञ्जूषा के सात पद म से केवल ‘शकटपूरम्’ ही नपुंसक लङ्ग एकवचन म है और अथ क दृ ष्ट
से भी भोजन के साथ ही जुड़ता है। शेष पद या तो पुं लङ्ग ह (प्र तवेशी, खरदं ः, जठरस्थः, कौन्तेयः), या स्त्री लङ्ग
(क्ष त्रयाणी), या द्ववचन (पीवरौ)।
शब्द-रचना: ‘शकटपूरम्’ = शकटं पूरय त इ त — गाड़ी को भर दे ने वाला (उपपद-तत्पुरुष)। ‘मृष्टान्नम्’ = मृष्टम्
अन्नम् (कमधारय) — यही अभ्यास के प्रश्न ८ का ‘यथा’ भी है।
प्र.7 (ख) …………………… ाह्मणः।
उत्तरम् — प्र तवेशी ाह्मणः। ( हन्द — पड़ोसी ाह्मण।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्र तकृतं भूयादे ष धमः सनातनः
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पाठ की पंिक्त — ‘तिददानी ं पय यपिततं पितवेिशनो बाह्मणस्य।’ (कु न्ती, पृष्ठ ११५)
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तथा — ‘श्रोित्रयोऽयं पितवेशी पत्युपकारमहित।’ (भीमः, पृष्ठ ११४)
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िवशेष्य ‘बाह्मणः’ — पुंिलङ् ग · पथमा · एकवचन → िवशेषण पितवेशी (नकारान्त पुंिलङ् ग, पथमा एकवचन)
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अथ भी नयम भी: पाठ म यही जोड़ी दो बार आई है, इस लए उत्तर पर सन्दे ह नह । व्याकरण क दृ ष्ट से भी
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‘प्र तवेशी’ (प्र तवे शन् शब्द) पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन emका रूप है, ठ क ‘ ाह्मणः’ क तरह। शब्दाथ-ता लका इसका
अथ दे ती है — ‘प्र तवेशी = नकट गृहवासीg=l पड़ोसी’।
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ध्यान द: पाठ म यह पद तीन वभ क्तय म मलता है — प्र तवे शने (चतुथ : ‘प्र तवे शने ाह्मणाय’), प्र तवेशी
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मoढलता गया है। l
(प्रथमा), प्र तवे शनः (षष्ठी : ‘प्र तवे शनो ाह्मणस्य’)। तीन जगह वशेष्य ‘ ाह्मण’ ही है और वशेषण उसी क
वभ क्त.c a g
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प्र.7 (ग) …………………… मृगा धपः।
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उत्तरम् — खरदं ष्ट्रः मृगा धपः। ( हन्द — तीखी दाढ़ वाला मृगराज ( सह)।)
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पाठ की पंिक्त — ‘न िह खरदं ो मृगािधपः सहायमपेक्षते ।’ (भीमः, पृष्ठ ११५)
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सिन्धिवच्छे द ः — खरदं ः + मृगािधपः (िवसगसिन्धः, अः + म् → ओ)
ag l दोनों पुंिलङ् ग · पथमा · एकवचन
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समास पहचा नए: ‘खरदं ः’ = खराः दं ष्ट्राः यस्य सः — जसक दाढ़ तीखी ह , वह — यह बहुव्री ह समास है,
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इसी लए यह वशेषण क तरह चलता है और उसे कोई वशेष्य चा हए। ‘मृगा धपः’ = मृगाणाम् अ धपः (षष्ठी-
तत्पुरुष) — यह संज्ञा है। इस लए ‘खरदं ः’ वशेषण और ‘मृगा धपः’ वशेष्य — यही जोड़ी बनेगी।
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omख भीम के लए है (अप्रस्तुतप्रशंसा), और अगला
भाव: यह वाक्य अजुन के प्रस्ताव का उत्तर है — ‘ सह को सहायक क आवश्यकता नह होती।’ यहाँ सह का
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m है। aं gयथा’ इसी बात को खोलकर कह दे ता
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ोक ‘ सहः क्षुद्रमृग
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प्र.7 (घ) …………………… भीमः।
उत्तरम् — कौन्तेयः भीमः। ( हन्द — कुन्तीपुत्र भीम।)
पाठ की पंिक्त — ‘मम िमत्रस्य िहिडम्बस्य हन्ता कौन्ते यो भवान् ?’ (बकः) तथा ‘कौन्ते योऽिस्म भीमसेन ः।’
(भीमसेन ः, पृष्ठ ११७)
कु न्त्याः अपत्यं पुमान् = कौन्ते यः (कु न्ती + ढक् पत्ययः)
पुंिलङ् ग · पथमा · एकवचन — ठीक ‘भीमः’ की तरह
यह पद क्य महत्त्वपूण है: ‘कौन्तेय’ अपत्यवाचक (मातृनामा श्रत) पद है — कुन्ती का पुत्र। नाटक के चरम क्षण
म बक इसी शब्द से च कता है, क्य क कौन्तेय का अथ है ‘वही, जसने मेरे मत्र ह डम्ब को मारा’। भीम भी उत्तर म
इसी शब्द को दोहराता है — ‘कौन्तेयोऽ स्म भीमसेनः’। एक ही शब्द से प रचय, चुनौती और पूवकथा — तीन जुड़
जाते ह।
ऐसे और पद: कुन्ती → कौन्तेयः, राधा → राधेयः, गङ्गा → गाङ्गे यः, पृथा → पाथः। ये सब त द्धत प्रत्यय से बने
अपत्यवाचक शब्द ह और महाभारत म बहुत आते ह।
प्र.7 (ङ) …………………… कुन्ती।
उत्तरम् — क्ष त्रयाणी कुन्ती। ( हन्द — क्षत्राणी कुन्ती।)
पाठ की पंिक्त — ‘क्षित्रयाण्या यदुिचतं तदनुिष्ठतम्।’ (भीमः, पृष्ठ ११४)
वहाँ पद त ृत ीया में है (क्षित्रयाण्या); यहाँ िवशेष्य ‘कु न्ती’ पथमा एकवचन में है
अतः िवशेषण भी पथमा एकवचन में — क्षित्रयाणी
लङ्ग ही नणायक है: मञ्जूषा के सात पद म केवल ‘क्ष त्रयाणी’ स्त्री लङ्ग है, और वशेष्य ‘कुन्ती’ भी स्त्री लङ्ग है
— इस लए मेल तुरन्त बन जाता है। यही ‘ वशेषणं वशेष्य नघ्नम्’ नयम का सबसे सरल प्रयोग है : पहले वशेष्य
का लङ्ग दे खए, फर उसी लङ्ग का वशेषण उठाइए।
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शब्द-रचना: क्ष त्रयस्य पत्नी = क्ष त्रयाणी (क्ष त्रय + ङ ष् + आनुक् आगम)। इसी प्रकार — आचायस्य पत्नी =
आचायानी, इन्द्रस्य पत्नी = इन्द्राणी, मातुलस्य पत्नी = मातुलानी। भीम इस शब्द से माता को याद दलाता है क
उन्ह ने केवल एक माता क तरह नह , एक क्षत्राणी क तरह नणय लया है — इसी लए वह नणय उ चत है।
प्र.7 (च) …………………… हुताशनः।
उत्तरम् — जठर ः हुताशनः। ( हन्द — पेट म वद्यमान अ ग्न (जठरा ग्न)।)
ु ाशनाय।’ (भीमः, पृष्ठ ११६)
पाठ की पंिक्त — ‘सव ं पिरवेिषतं मदीय-जठरस्थाय भगवते हत
वहाँ दोनों पद चतुथ में है ं (जठरस्थाय … हुत ाशनाय)
यहाँ िवशेष्य ‘हुत ाशनः’ पथमा में है → िवशेषण भी पथमा में — जठरस्थः
दो पद क समान वभ क्त ही मेल का प्रमाण है: पाठ म ‘जठरस्थाय … हुताशनाय’ दोन चतुथ एकवचन म
साथ-साथ चलते ह — यही सद्ध करता है क वे वशेषण- वशेष्य ह। प्रश्न म वभ क्त बदल गई है, इस लए उत्तर क
वभ क्त भी बदलेगी। पाठ का पद ज्य का त्य उठाकर लख दे ना यहाँ अशुद्ध होगा — ‘जठरस्थाय’ नह ,
‘जठरस्थः’ चा हए।
अलङ् कार: ‘जठरस्थः हुताशनः’ म रूपक है — पेट क पाचन-अ ग्न (जठरा ग्न) पर यज्ञ के अ ग्नदे व का आरोप।
भीम मज़ाक म कहता है क सारा भोजन उसने ‘अपने पेट म बैठे अ ग्नदे व को आहु त के रूप म’ दे दया — अथात्
स्वयं खा गया। एक ही वाक्य म हास्य भी और चुनौती भी।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 124
प्रश्न ८ — समस्तपदा न लखत (यथा — मृष्टम् अन्नम् : मृष्टान्नम्)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.8 (क) वीरस्य भुजयोः बलम् आ श्रत्य वयं सुखं शेमहे।
उत्तरम् — भुजबलम्। ( हन्द — भुजाओं का बल, बाहुबल।)
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िवगहः — भुजयोः बलम्
समस्तपदम् — भुजबलम्
समासः — षष्ठी-त त्पुरु षः (‘भुजयोः’ षष्ठी िद्ववचन का लोप होकर पूवपद ‘भुज’ शेष रहा)
षष्ठी-तत्पुरुष ही क्य : वग्रह-वाक्य म जो वभ क्त है, समास का नाम उसी से पड़ता है। यहाँ ‘भुजयोः’ षष्ठी म है,
अतः यह षष्ठी-तत्पुरुष है। ध्यान द जए — समास बनते ही द्ववचन का चह्न लुप्त हो जाता है, पर अथ म दोन
भुजाएँ ही रहती ह। पाठ म यह पद ‘भुजबलमा श्रत्य’ के रूप म आया है (भुजबलम् + आ श्रत्य)।
पाठ से जो ड़ए: यही ‘भुजबल’ भीम क पहचान है — यु ध ष्ठर कहते ह ‘यस्य वीरस्य भुजबलमा श्रत्य वयं सुखं
शेमहे’, और भीम स्वयं ोक म कहता है ‘इमौ ह पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम’। दोन वाक्य एक ही बात कहते ह।
प्र.8 (ख) भवता धमाणां सङ् ग्रहः द्रष्टव्यः।
उत्तरम् — धमसङ् ग्रहः। ( हन्द — धम का समुच्चय।)
िवगहः — धम णां सङ् गहः
समस्तपदम् — धमसङ् गहः
समासः — षष्ठी-त त्पुरु षः (षष्ठी बहुवचन ‘धम णाम्’ का लोप)
भीम इसे ‘सङ् ग्रह’ क्य कहता है: यहाँ एक साथ अनेक धम सध रहे ह — (१) उपकार का प्रत्युपकार, (२) माता
क आज्ञा का पालन, (३) नबल क रक्षा, (४) क्ष त्रय का कतव्य। इस लए भीम कहता है ‘धम वजानता भवता
धमसङ् ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः’ — ‘आप धम जानते ह, तो दे खए, यहाँ तो धम का ढे र लगा है।’ एक शब्द से पूरा तक खड़ा
हो जाता है।
स न्ध भी दे खए: पाठ म यह ‘धमसङ् ग्रहोऽत्र’ रूप म है = धमसङ् ग्रहः + अत्र ( वसगस न्धः) — यही अभ्यास के
प्रश्न ४ (झ) का उत्तर है। ‘सङ् ग्रहः’ स्वयं सम् + ग्रहः से बना है (परसवण-स न्ध)।
प्र.8 (ग) न ह मातुः आज्ञा प्रत्यादे शमह त।
उत्तरम् — मातुराज्ञा (मातृ-आज्ञा)। ( हन्द — माता क आज्ञा।)
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िवगहः — मात ःु आज्ञा
समस्तपदम् — मातुराज्ञा
समासः — षष्ठी-त त्पुरु षः
सिन्धः — मात ःु + आज्ञा → मात रु ाज्ञा (िवसगसिन्धः — िवसग का ‘र्’, क्योंिक आगे स्वर है)
यहाँ दो बात एक साथ सधती ह: पहले समास बनता है (मातुः आज्ञा → मातृ + आज्ञा) और फर स न्ध होकर
‘मातुराज्ञा’ रूप बनता है। ऐसे प्रश्न म उत्तर वही रूप ल खए जो पाठ म छपा है — ‘मातुराज्ञा’। ‘मातृ’ ऋकारान्त
स्त्री लङ्ग शब्द है, इसक षष्ठी एकवचन ‘मातुः’ होती है ( पतृ → पतुः क तरह)।
वाक्य का महत्त्व: ‘न ह मातुराज्ञा प्रत्यादे शमह त’ पाठ का सूत्र-वाक्य है और अभ्यास के प्रश्न २ (ङ) तथा प्रश्न ३
(१) — दोन म आता है। एक ही वाक्य तीन प्रश्न का उत्तर दे ता है।
प्र.8 (घ) धनुः धर त इ त अहम् अनुग मष्या म।
उत्तरम् — धनुधरः। ( हन्द — धनुष धारण करने वाला, धनुधर।)
िवगहः — धनुः धरित इित
समस्तपदम् — धनुधरः
समासः — उपपद -त त्पुरु षः (कम ‘धनुः’ + धात ु ‘√धृ’ से बना कृ दन्त पद)
सिन्धः — धनुः + धरः → धनुधरः (िवसग का ‘र्’)
उपपद-तत्पुरुष क्या है: जब समास के उत्तरपद म धातु से बना कृदन्त हो और पूवपद उसका कम हो, तब वह
उपपद-तत्पुरुष कहलाता है। इसी प्रकार पाठ के अन्य पद — मानुषभोजी (मानुषान् भुङ्क्ते इ त), राक्षसध्वंसी
(राक्षसान् ध्वंसय त इ त), भू मपालाः (भू म पालय न्त इ त), शकटपूरम् (शकटं पूरय त इ त)। ‘इ त’ शब्द वग्रह म
दखे तो प्रायः उपपद-तत्पुरुष ही होता है।
पाठ का प्रसङ्ग: यह अजुन का वाक्य है — ‘धनुधरोऽहमनुग मष्या म’ = धनुधरः + अहम् + अनुग मष्या म। अथात्
‘धनुधर म तुम्हारे साथ चलूँगा।’ इसी का उत्तर भीम ‘मा मैवम्’ कहकर दे ता है।
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न ह खरदं ष्ट्रः मृगाणाम् अ धपः सहायमपेक्षते।
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agl — मृगा धपः। ( हन्द — मृग का स्वामी, अथात् सह।)
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समस्तपदम् — मृगािधपः
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समासः — षष्ठी-त त्पुरु षः
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सिन्धः — मृग + अिधपः → मृगािधपः (दीघ-सिन्धः, अ + अ = आ)
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a s eाmधप’ का अथ ‘ हरन’ नह : ‘मृग’ का सामान्य अथ पशु/ हरन है, पर ‘मृग का अ धप त’ का अथ सह होता
‘मृग
a gl है — जैसे ‘मृगेन्द्र’, ‘मृगराज’। इसी लए भीम कहता है — ‘तीखी दाढ़ वाला सह सहायक नह ढूँ ढ़ता’। य द इसे
‘ हरन’ समझ लया जाए तो पूरा वाक्य नरथक हो जाएगा — यही इस प्रश्न क परीक्षा है।
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जोड़कर दे खए: यही ‘मृग’ शब्द पाठ म तीन जगह और आया है — ‘ सहः क्षुद्रमृगं यथा’ ( ोक २, वहाँ अथ
‘तुच्छ पशु’), ‘ चरा न्वष्टो मृगः स्वयमुaत्g
प ततो व्याघ्रगह्वरम्’ (बक का कथन, वहाँ अथ ‘ शकार’), तथा यहाँ
‘मृगा धपः’ (अथ ‘ सह’)। एक ही शब्द, तीन अथ — प्रसङ्ग ही अथ तय करता है।
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उत्तरम् — अदूरव त (पाठ म सप्तमी रूप — अदूरव त न)। ( हन्द — दूर न स्थत, अथात् पास ही स्थत।)
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िवगहः — न दू रे वतते इित agl
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समस्तपदम् — अदू रवित → पवतस्य िवशेषणरूपेण सप्तम्याम् — अदू रवित िन
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m a s emजुड़कर उपपद-रचना
समासः — नञ्-त त्पुरु षः (न दू रम् = अदू रम्) तथा उसके बाद ‘वित’ (√वृत ् + िणिन)
. co — नञ् समास में व्यञ्जनािद पद से पहले ‘न’ का ‘अ’ हो जाता हैa:gनl + दू रम् = अदू रम्
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पाठ का प्रयोग: पृष्ठ ११२ पर कुन्ती कहती है — ‘अस्य एकचक्रस्य पुरस्यादूरव त न पवते वस त बकनामा दै त्यः।’
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अभ्यास ने उसी वाक्य को खोलकर ‘न दूरे वतते’ कर दया है और समस्तपद बनाने को कहा है। पूवकथा म इसी अथ
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का दूसरा पद भी है — ‘ना तदूर eतेm
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न बकनाम्ना असुरेण’ (न + अ त + दूर स्थतेन)।
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भाव: ‘अदूरव त’ केवल दूरी नह बताता, भय क नकटता बताता है — राक्षस पास ही है, इसी लए नगर उसक
शत मानने को ववश है। यही एक शब्द पूरे नगर क दुदशा का कारण स्पष्ट कर दे ता है।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 125
प्रश्न ९ — अधो ल खतवाक्यानाम् उ चतभावैः सह सम्मेलनं कुरुत (यथा — प्रभूतमुप तं मे भोजनम् : हषः)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.9 अधो ल खतवाक्यानाम् उ चतभावैः सह सम्मेलनं कुरुत — (क) धनुधरोऽहमनुग मष्या म। (ख) भीमस्य प्रेषणं
कथं नु त्वया सङ् क ल्पतम् ? (ग) अ प हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ? (घ) ह नष्या म तं दुरात्मानम्। (ङ) स
खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं प रदे वयते। (च) मानुषापसद, प रवेषय मे भोजनम्। ॥ १. हासः २. नराशा ३. ग्ला नः ४.
अ धकारः ५. ओजः ६. धैयम्
शुद्धं सम्मेलनम् — (क)–६, (ख)–२, (ग)–१, (घ)–५, (ङ)–३, (च)–४।
क्रमः वाक्यम् वक्ता भावः क्य यही भाव
यथा पभूतमुपिस्थतं मे भोजनम्। भीमः हषः इतना सारा भोजन दे खकर भीम प्रसन्न है — शुद्ध आनन्द का
भाव।
(क) धनुध रोऽहमनुग िमष्यािम। अजुनः ६. धै यम् राक्षस के सामने भाई के साथ जाने का प्रस्ताव — यह भय का
नह , साहस और रता का वचन है।
(ख) भीमस्य पेषणं कथं नु त्वया यु ध ष्ठरः २. िनराशा ‘कथं नु’ म हताशा है — जस भाई के बल पर सब टका है,
सङ् किल्पतम् ? उसी को भेजा जा रहा है; बड़े भाई का मन बैठ गया है।
(ग) अिप हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ? सहदे वः १. हासः ‘क्या दोन हाथ से खाओगे?’ — यह छोटे भाई का प रहास
है, गम्भीर प्रश्न नह ।
(घ) हिनष्यािम तं दुर ात्मानम्। भीमः ५. ओजः ‘म उस दुष्ट को मार डालूँगा’ — यह पराक्रम और तेज का
उ ोष है; ‘ओजः’ का अथ ही है तेज, बल।
(ङ) ृ ं
स खल्वेक पुत्र स्तपस्वी भश कुन्ती ३. ग्लािनः इकलौते पुत्र वाले ाह्मण का वलाप सुनकर मन का भारीपन
पिरदे वयते। तथा खन्नता — यही ‘ग्ला न’ है।
(च) मानुषापसद, पिरवेषय मे बकः ४. ‘हे नीच मनुष्य, मुझे भोजन परोस’ — यह आदे श है, प्राथना
भोजनम्। अिधकारः नह ; बक अपने को स्वामी मानकर अ धकार जता रहा है।
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भाव कैसे पहचान — तीन सङ् केत: (१) क्रया का लकार: लोट् लकार (प रवेषय, गृहाण) प्रायः आदे श/अ धकार
बताता है; लृट् लकार (ह नष्या म, अनुग मष्या म) संकल्प बताता है। (२) प्रश्नवाचक शब्द: ‘कथं नु’, ‘ कमथम्’ म
प्रायः वस्मय या हताशा रहती है; ‘अ प … ?’ म कभी-कभी प रहास। (३) सम्बोधन: ‘मानुषापसद’, ‘वाचाट’,
‘क्ष त्रय डम्भ’ जैसे तरस्कारसूचक सम्बोधन दप और अ धकार का चह्न ह।
भाव के अथ: हासः = हँसी, प रहास; नराशा = आशा का टू टना, हताशा; ग्ला नः = मन का भारीपन, खन्नता;
अ धकारः = स्वा मत्व का भाव, आदे श दे ने क मुद्रा; ओजः = तेज, पराक्रम; धैयम् = स्थरता, साहस।
ध्यान द: ‘ओजः’ तथा ‘धैयम्’ को मलाइए मत। ओज म शत्रु को मारने क घोषणा है (भीम), जब क धैय म साथ
खड़े रहने क स्थरता है (अजुन)। य द (क) और (घ) को उलट द, तो भाव तो चलेगा, पर भीम क चुनौती म जो तेज
है वह ‘धैय’ शब्द से पूरा नह होता — इस लए यही मेल शुद्ध है।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 125
प्रश्न १० — वाच्यप रवतनं कुरुत (यथा — भवत्या प्र तश्रुतम् : भवती प्र तश्रुतवती।)
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.10 (क) क्ष त्रयाण्या अनु ष्ठतम्।
उत्तरम् — क्ष त्रयाणी अनु ष्ठतवती। ( हन्द — क्षत्राणी ने कया।)
दत्तं वाक्यम् (कमवाच्यम्/भाववाच्यम्) — क्षित्रयाण्या अनुिष्ठतम्।
पिरविततं वाक्यम् (कत ृवाच्यम्) — क्षित्रयाणी अनुिष्ठतवती।
िनयम — कत त ृत ीया से पथमा में आएगा (क्षित्रयाण्या → क्षित्रयाणी), और क्त पत्यय के स्थान पर क्तवतु पत्यय
लगेगा (अनुिष्ठतम् → अनुिष्ठतवती), जो कत के िलङ् ग-वचन का अनुसरण करेगा।
नयम को सूत्र-रूप म याद र खए: ‘भवत्या प्र तश्रुतम् → भवती प्र तश्रुतवती’ — यही ‘यथा’ पूरे प्रश्न क कुंजी है।
तीन काम करने ह : (१) कता क तृतीया हटाकर प्रथमा, (२) क्त के स्थान पर क्तवतु, (३) कता के लङ्ग-वचन के
अनुसार रूप — स्त्री लङ्ग म ‘-वती’, पुं लङ्ग म ‘-वान्’। यहाँ कता ‘क्ष त्रयाणी’ स्त्री लङ्ग एकवचन है, अतः
‘अनु ष्ठतवती’।
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पाठ का प्रसङ्ग: ‘क्ष त्रयाण्या यदु चतं तदनु ष्ठतम्’ — भीम माता से कहता है। कतृवाच्य म यह होगा — ‘क्ष त्रयाणी
यदु चतं तत् अनु ष्ठतवती।’ अथ वही रहता है, केवल बल बदल जाता है : कमवाच्य म कम पर बल, कतृवाच्य म कता
पर।
प्र.10 (ख) भवत्या स ी क्रयताम्।
उत्तरम् — भवती स ीकरोतु। ( हन्द — आप तैयार क जए।)
दत्तं वाक्यम् (कमवाच्यम्) — भवत्या सज्जीिक्रयताम्। (‘आपके द्वारा तै यार िकया जाए’)
पिरविततं वाक्यम् (कत ृवाच्यम्) — भवती सज्जीकरोतु।
िनयम — यहाँ िक्रया लोट् लकार में है, अतः क्तवत ु नही ं लगेगा; कमवाच्य लोट् (िक्रयताम्) के स्थान पर
कत ृवाच्य लोट् (करोत )ु आएगा, और कत त ृत ीया से पथमा में जाएगा।
यह वाक्य शेष से भन्न क्य है: प्रश्न के अन्य वाक्य म क्तप्रत्ययान्त भूतका लक रूप ह (अनु ष्ठतम्, उप क्षप्तम्,
सङ् क ल्पतम्), पर यहाँ आज्ञाथक रूप है — ‘ क्रयताम्’। इस लए यहाँ ‘सज्जीकृतवती’ लखना अशुद्ध होगा;
लकार वही रहना चा हए, केवल वाच्य बदलना है। यही परीक्षा म सबसे अ धक होने वाली भूल है।
‘स ी क्रयताम्’ क रचना: ‘सज्ज’ (तैयार) + च्व प्रत्यय + √कृ = सज्जीकरो त (‘जो तैयार नह था उसे तैयार
करना’)। च्व लगते ही अ न्तम स्वर द घ ‘ई’ हो जाता है — शुक्ल + च्व + √भू = शुक्लीभव त। इसका कमवाच्य
लोट् रूप ‘सज्जी क्रयताम्’ है।
प्र.10 (ग) भवत्या उप क्षप्तम्।
उत्तरम् — भवती उप क्षप्तवती। ( हन्द — आपने (यह बात) छे ड़ी।)
दत्तं वाक्यम् — भवत्या उपिक्षप्तम्।
पिरविततं वाक्यम् — भवती उपिक्षप्तवती।
कत — भवत्या (त ृ.ए.व., स्त्री.) → भवती (प.ए.व.)
िक्रया — उपिक्षप्तम् (क्त) → उपिक्षप्तवती (क्तवत ,ु स्त्रीिलङ् ग)
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‘उप क्षप्तम्’ का अथ: उप + √ क्षप् + क्त — ‘संकेत रूप म कही गई बात’, ‘छे ड़ी गई बात’। यु ध ष्ठर पूछते ह
‘अम्ब ! क मदानीमुप क्षप्तम्?’ अथात् ‘माँ! अभी यह कौन-सी बात छे ड़ी गई?’ ध्यान द जए — जब मूल क्रया म
उपसग हो, तो क्तवतु बनाते समय उपसग यथावत् रहता है, केवल प्रत्यय बदलता है।
‘भवती’ तथा ‘भवान्’: स्त्री के लए ‘भवती’ (तृतीया — भवत्या), पुरुष के लए ‘भवान्’ (तृतीया — भवता)। इस
अभ्यास म (क), (ख), (ग) स्त्री-कता वाले ह (कुन्ती), और (ङ) पुरुष-कता वाला (यु ध ष्ठर) — इसी से उत्तर का रूप
तय होता है।
प्र.10 (घ) त्वया सङ् क ल्पतम्।
उत्तरम् — त्वं सङ् क ल्पतवती। (पुं लङ्गे — त्वं सङ् क ल्पतवान्।) ( हन्द — तुमने संकल्प कया।)
दत्तं वाक्यम् — त्वया सङ् किल्पतम्।
पिरविततं वाक्यम् — त्वं सङ् किल्पतवती।
कत — त्वया (त ृ.ए.व.) → त्वम् (प.ए.व.)
िक्रया — सङ् किल्पतम् (क्त) → सङ् किल्पतवती / सङ् किल्पतवान्
यहाँ ‘वती’ ही क्य : ‘युष्मद्’ (त्वम्) शब्द का रूप स्त्री-पुरुष दोन के लए एक-सा होता है, अतः लङ्ग का नणय
सन्दभ से करना पड़ता है। पाठ म यह वाक्य यु ध ष्ठर कुन्ती से कहते ह — ‘तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया
सङ् क ल्पतम्?’ अतः कता स्त्री लङ्ग (कुन्ती) है और उत्तर ‘सङ् क ल्पतवती’ बनेगा। य द सन्दभ न दे खा जाए तो
‘सङ् क ल्पतवान्’ भी व्याकरण क दृ ष्ट से शुद्ध है — इसी लए दोन दए ह।
स न्ध याद रहे: ‘सङ् क ल्पतम्’ = सम् + क ल्पतम् (परसवण-स न्ध) — यही अभ्यास के प्रश्न ४ (ज) का उत्तर है।
प्र.10 (ङ) भवता धमसङ् ग्रहः द्रष्टव्यः।
उत्तरम् — भवान् धमसङ् ग्रहं पश्येत् (द्रष्टु म् अह त)। ( हन्द — आपको धम का संग्रह दे खना चा हए।)
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दत्तं वाक्यम् (कमवाच्यम्) — भवता धमसङ् गहः द ष्टव्यः।
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पिरविततं वाक्यम् (कत ृवाच्यम्) — भवान् धमसङ् गहं पश्येत ्।
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तीन पिरवत न — (१) कत : भवता (त ृत ीया) → भवान् (पथमा); (२) कम : धमसङ् गहः (पथमा) →
aधमसङ् गहम् (िद्वतीया); (३) िक्रया : दष्टव्यः (तव्यत्, कृत्य-पत्ययः) → पश्येत् (िविधिलङ् लकार)।
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g व ध लङ् लकार से बनता है, क्य क व ध लङ् भी ‘चा हए’ का ही
कृत्य-प्रत्यय का वाच्यप रवतन: ‘तव्यत्’, ‘अनीयर्’ तथा ‘यत्’ — ये कृत्य प्रत्यय सदा कमवाच्य म आते ह और
‘चा हए’ का अथ दे ते ह। इनका कतृवाच्यaरूप
अथ दे ता है। इसी लए ‘द्रष्टव्यः’ का ‘पश्येत्’ बनेगा, ‘दृष्टवान्’ नह — ‘दृष्टवान्’ का अथ ‘दे खा’ हो जाएगा, जो मूल
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अथ बदल दे ता है।
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पाठ का प्रसङ्ग: भीम यु ध ष्ठर से कहता है — ‘धम वजानता भवता धमसङ् ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः।’ कतृवाच्य म — ‘धम
a gl वजानन् भवान् अत्र धमसङ् ग्रहं पश्येत्।’ ध्यान द जए, ‘ वजानता’ (तृतीया) भी बदलकर ‘ वजानन्’ (प्रथमा) हो
गया, क्य क वशेषण कता का अनुसरण करता है।
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प्र.10 (च) ag
पौरजनैः मानुषः प्रेष यतव्यः।
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उत्तरम् — पौरजनाः मानुषं प्रेषयेयुः। ( हन्द — नगरवा सय को एक मनुष्य भेजना चा हए।)
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agl दत्तं वाक्यम् (कमवाच्यम्) — पौरजनै ः मानुषः पेषियतव्यः।
पिरविततं वाक्यम् (कत ृवाच्यम्) — पौरजनाः मानुषं पेषयेयःु ।
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तीन पिरवत न — (१) कत : पौरजनै ः (त ृत ीया बहुवचन ) → पौरजनाः (पथमा बहुवचन); (२) कम : मानुषः → a
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मानुषम् (िद्वतीया); (३) िक्रया : पेषियतव्यः (कृ त्य) → पेषयेयःु (िविधिलङ् , पथमपुरु ष बहुवचन )।
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वचन मलाना मत भू लए: कता ‘पौरजनैः’ बहुवचन म है, अतः कतृवाच्य क क्रया भी बहुवचन म होगी —
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ag का मूल भेद है।
.cएकवचन), पर कतृवाच्य म वह कता के अनुसार चलती है — यही दोन वाच्य
‘प्रेषयेत्’ नह , ‘प्रेषयेयुः’। कमवाच्य म क्रया कम के अनुसार चलती है (‘मानुषः’ एकवचन → ‘प्रेष यतव्यः’
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पाठ का आधार: यह वाक्य कुन्ती के कथन से बना है — ‘भोज्यसमाहारे मानुषोऽ प तस्मै प्रेष यतव्यः।’ (पृष्ठ ११३)
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अथात् भोजन के साथ एक मनुष्य भी भेजना पड़ता है — यही बक के साथ हुई स न्ध क शत थी।
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प्र.10 ( टप्पणी) प्रश्न १० के दोन स्तम्भ के शीषक ‘कतृवाच्यम्’ तथा ‘कमवाच्यम्’ ह। ‘यथा’ के अनुसार कौन-सा
स्तम्भ कस वाच्य का है — इसे स्पष्ट क जए।
उत्तरम् — पुस्तक म दए गए ‘यथा’ के अनुसार दोन शीषक वस्तुतः उलटे छपे ह। जो वाक्य ‘कतृवाच्यम्’ स्तम्भ म दए
गए ह वे कमवाच्य/भाववाच्य के ह, और जो उत्तर ‘कमवाच्यम्’ स्तम्भ म भरना है वह कतृवाच्य का है।
पुस्तक का स्तम्भ- वहाँ जो वाक्य वह वास्तव म कस पहचान
शीषक है वाच्य का है
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कतवाच्यम् भवत्या कम वाच्यम् / भाववाच्यम् कता तृतीया म (भवत्या) तथा क्रया क्त प्रत्ययान्त —
प्र तश्रुतम्। यही कमवाच्य का लक्षण है।
कमवाच्यम् भवती ृ च्यम्
कतवा कता प्रथमा म (भवती) तथा क्रया क्तवतु प्रत्ययान्त —
प्र तश्रुतवती। यही कतृवाच्य का लक्षण है।
तो उत्तर कस दशा म लख: ‘यथा’ ही अ न्तम प्रमाण है। पुस्तक जो नमूना दे ती है, अभ्यास उसी दशा म करना है
— अथात् दए हुए कमवाच्य वाक्य को कतृवाच्य म बदलना है। ऊपर के छह उत्तर इसी क्रम म दए गए ह।
शीषक क अदला-बदली मुद्रण क चूक है; उससे उत्तर नह बदलता।
दोन वाच्य का सूत्र (याद रखने योग्य):
कतृवाच्यम् — कता प्रथमा म · कम द्वतीया म · क्रया कता के पुरुष-वचन के अनुसार। (उदा० — रामः ग्रन्थं
पठ त।)
कमवाच्यम् — कता तृतीया म · कम प्रथमा म · क्रया कम के पुरुष-वचन के अनुसार, आत्मनेपद । (उदा० —
रामेण ग्रन्थः पठ्यते।)
भाववाच्यम् — अकमक धातु म; कता तृतीया म, क्रया सदा प्रथमपुरुष एकवचन। (उदा० — मया हस्यते।)
स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 126
क वकालकृतीनां वचारः — वद्वान् एन्. रङ्गनाथशमा · तथा अमरकोषात् त्रयः अंशाः
स्वाध्यायान्मा प्रमदः
प्र.1 अस्य रूपकस्य रच यतुः प रचयं लखत। तस्य काः कृतयः प्र सद्धाः स न्त ? का न च उपाधी न तेन प्राप्ता न ?
उत्तरम् — अस्य ‘एकचक्रम्’ इ त रूपकस्य रच यता वद्वान् एन्. रङ्गनाथशमा अ स्त। तस्य जननं ७.४.१९२६ तमे वष
कणाटकराज्यस्य शवमोग्गमण्डलस्य नडळल्ली ग्रामे अभवत्, दे हत्यागः च २०१४ तमे वष। सः ‘महामहोपाध्यायः’,
‘ वद्यावा र धः’, ‘व्याकरणशास्त्रप्रवीणः’ इ त उपा ध भः भू षतः, राष्ट्रप्रश स्तभाक् राज्यप्रश स्तभाक् च आसीत्। अयम्
आचायः स्वर चतग्र ान्, अनू दतग्र ान्, व्याख्यानग्र ान् च इ त परश्शतान् लेखान् ग्र ान् च अ लखत्। संस्कृतभाषया
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बाहुब ल वजयम्, एकचक्रम्, कुसुमाञ्ज लः, श्रीशङ् करच रतामृतम् इत्यादयः तस्य कृतयः प्र सद्धाः। सः व्याकरणशास्त्रे,
अलङ् कारशास्त्रे, अद्वै तवेदान्ते च नष्णातः आसीत्, बेङ्गलूरु े चामराजेन्द्र-संस्कृत-महा वद्यालये व्याकरणप्राध्यापकः सन्
चरं सुरभारत्याः सेवाम् अकरोत्।
( हन्द — इस ‘एकचक्रम्’ रूपक के रच यता वद्वान् एन्. रङ्गनाथशमा ह। उनका जन्म ७.४.१९२६ को कणाटक राज्य के शवमोग्गा
ज़ले के नडळल्ली ग्राम म हुआ और दे हावसान २०१४ म। उन्ह ‘महामहोपाध्याय’, ‘ वद्यावा र ध’ तथा ‘व्याकरणशास्त्रप्रवीण’
उपा धयाँ मल ; वे रा ीय तथा राज्य — दोन प्रश स्तय के भागी रहे। उन्ह ने अपने रचे हुए, अनू दत तथा व्याख्या-ग्रन्थ मलाकर
सैकड़ लेख और ग्रन्थ लखे। संस्कृत म बाहुब ल वजयम्, एकचक्रम्, कुसुमाञ्ज लः, श्रीशङ् करच रतामृतम् आ द उनक प्र सद्ध
कृ तयाँ ह। वे व्याकरण, अलङ् कारशास्त्र तथा अद्वै त वेदान्त म नष्णात थे और बेङ्गलूरु के चामराजेन्द्र संस्कृत महा वद्यालय म
व्याकरण के प्राध्यापक रहकर बहुत समय तक संस्कृत भाषा क सेवा करते रहे।)
ववरणम् पुस्तक म दया गया तथ्य
किवः िवद्वान् एन्. रङ् गनाथशम
जननम् ७.४.१९२६
दे हत्यागः २०१४
जन्मस्थानम् नडळ ल्ली ग ामः, िशवमोग्गम ण् डलम्, कण टकराज्यम्
उपाधयः महामहोपाध् यायः · िवद्य ावािरिधः · व्याकरणशास्त्र पवीणः; रा पशिस्तभाक् तथा राज्यपशिस्तभाक्
कृ तयः बाहुबिलिवजयम् · एकचक्रम् · कु सुम ाञ् जिलः · श्रीशङ् करचिरताम ृतम् — तथा पर श्शत (सौ से अिधक ) ले ख एवं ग न्थ
िवशेषज्ञता व्याकरणशास्त्र म् · अलङ् कारशास्त्र म् · अद्वैतवेद ान्तः
से वा चामराजेन्द -संस्कृ त-महािवद्य ालयः, बेङ्गलूरु — व्याकरणपाध् यापकः
जालपुटम् https://vidwannrs.in/
क व का प रचय रूपक को कैसे समझाता है: जो आचाय व्याकरण तथा अलङ् कारशास्त्र — दोन म नष्णात हो,
उसी क भाषा ऐसी हो सकती है — छोटे -छोटे शुद्ध वाक्य, पर भीतर उपमा और रूपक भरे हुए (‘ सहः क्षुद्रमृगं
यथा’, ‘जठरस्थाय हुताशनाय’, ‘ चरा न्वष्टो मृगः … व्याघ्रगह्वरम्’)। और जो जीवन भर संस्कृत पढ़ाता रहा हो, वही
जानता है क वद्याथ के लए नाटक कतना छोटा और सजीव होना चा हए — इसी लए यह ‘लघुरूपक’ है। ध्यान
द जए, क व का दे हावसान २०१४ म हुआ — अथात् यह रचना हमारे ही समय क संस्कृत है, प्राचीन नह ।
शब्दाथ: महामहोपाध्यायः = संस्कृत वद्वान को द जाने वाली सव च्च परम्परागत उपा ध; वद्यावा र धः = ‘ वद्या
का समुद्र’ (डॉक्टरेट के समकक्ष उपा ध); प्रश स्तभाक् = प्रश स्त (पुरस्कार/सम्मान) का भागी; परश्शतान् = सौ से
भी अ धक; सुरभारती = दे ववाणी, अथात् संस्कृत भाषा।
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प्र.2 ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ खण्डे अमरकोषात् त्रयः अंशाः प्रदत्ताः — “१. असुरः — असुरा दै त्य-
दै तेयदनुजेन्द्रा रदानवाः। २. आयोधनम् — युद्धमायोधनं जन्यं प्रधनं प्र वदारणम्। ३. तनयः — आत्मजस्तनयः
सूनुः स्त्रयः पुत्र स्त्रयां त्वमी।” — एतेषाम् अथ लखत। पाठे न सह एतेषां सम्बन्धं च दशयत।
उत्तरम् — एते त्रयः अंशाः अमर सह वर चतात् ‘अमरकोषात्’ (नाम लङ्गानुशासनात्) गृहीताः। एतेषु पाठे प्रयुक्तानां त्रयाणां
शब्दानां पयायाः दत्ताः।
१. असुरः
असुरा दै त्य-दै ते यदनुजेन्द ािरदानवाः।
पदच्छे दः — असुराः + दै त्याः + दै तेयाः + दनुजाः + इन्द्रारयः + दानवाः।
अथः — ‘असुर’ के पयाय ह — दै त्य, दै तेय, दनुज, इन्द्रा र तथा दानव। (दै त्यः = दतेः अपत्यम्; दै तेयः = वही, दूसरे प्रत्यय से;
दनुजः = दनोः जातः, दनु से उत्पन्न; इन्द्रा रः = इन्द्रस्य अ रः, इन्द्र का शत्रु; दानवः = दनु का वंशज।)
पाठ से सम्बन्ध: यह सीधे अभ्यास के प्रश्न ५ (ग) का प्रमाण है — ‘असुरः = दै त्यः’। पाठ म दोन शब्द आए ह —
‘वस त बकनामा दै त्यः’ (पृष्ठ ११२) तथा ‘बकनामानम् असुरं वनाश यष्या म’ (भावाथ २)।
२. आयोधनम्
युद्ध मायोधनं जन्यं पधनं पिवदारणम्।
पदच्छे दः — युद्धम् + आयोधनम् + जन्यम् + प्रधनम् + प्र वदारणम्।
अथः — ‘युद्ध’ के पयाय ह — आयोधन, जन्य, प्रधन तथा प्र वदारण। (आयोधनम् = आ + √युध् + ल्युट्, जहाँ लड़ा जाए;
प्र वदारणम् = जसम शत्रु का वदारण हो।)
पाठ से सम्बन्ध: यह अभ्यास के प्रश्न ५ (क) का प्रमाण है — ‘आयोधनम् = युद्धम्’। पाठ म भीम कहता है — ‘न
केवलं भोजनमुप स्थतम्। आयोधनम प।’ और यु ध ष्ठर पूछते ह — ‘आयोधन म त। केन?’
३. तनयः
आत्मजस्तनयः सून ःु िस्त्रयः पुत्रिस्त्रयां त्वमी।
पदच्छे दः — आत्मजः + तनयः + सूनुः + स्त्रयः + पुत्रः + स्त्रयाम् + तु + अमी।
अथः — ‘पुत्र’ के पयाय ह — आत्मज, तनय, सूनु तथा पुत्र; और स्त्री लङ्ग म यही शब्द (आत्मजा, तनया, सूनुः, पुत्री) पुत्री के अथ
म आते ह। ‘ स्त्रयां तु अमी’ अथात् ‘स्त्री लङ्ग म तो ये ही रूप’ — यही अमरकोष क वशेष शैली है।
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पाठ से सम्बन्ध: पाठ म ‘पुत्र’ शब्द बार-बार आता है — ‘पुत्र ! क ञ्चत् प्र तश्रुतम्’, ‘मत्पुत्रेषु कोऽ प प्रेष यष्यते’,
‘भरतवंशप्रद पेन मम पुत्रेण’, ‘स खल्वेकपुत्रः तपस्वी’। अमरकोष इन सबके पयाय दे कर वद्याथ का शब्दभण्डार
बढ़ाता है।
‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ का अथ तथा प्रयोजन: यह तै त्तरीय उप नषद् के प्र सद्ध वाक्य ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ (=
स्वाध्याय म प्रमाद मत करो) से लया गया शीषक है। इस खण्ड का उ े श्य पाठ से आगे बढ़कर स्वयं पढ़ना है —
इसी लए यहाँ क व का प रचय भी है, उनका जालपुट (website) भी, और अमरकोष के तीन अंश भी। अमरकोष
संस्कृत का सबसे प्र सद्ध पयायवाची कोश है, जसे अमर सह ने रचा; उसका असली नाम ‘नाम लङ्गानुशासनम्’ है
और वह पद्य म है, ता क कण्ठस्थ कया जा सके। यही कारण है क पयायवाची शब्द पढ़ते समय अमरकोष का
ोक ही प्रमाण माना जाता है।
यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् — पृष्ठ 126
१. रूपकस्य अ भनयः · २. पात्राणां नामा न तथा टप्पणी · ३. ग्र ालये महाभारतपात्राणां वषये आलोचना
यस्तु क्रयावान् मनु जः स वद्वान्
प्र.1 अस्य रूपकस्य अ भनय-अंशान् ज्ञात्वा स्वशालायाम् अ भनयं कुरुत।
यह क्रयात्मक (अ भनय) काय है — पूरे पाठ को कक्षा या वद्यालय के मंच पर नाटक के रूप म खेलना है। इसका उत्तर कॉपी म
नह , मंच पर दया जाता है। नीचे वह व ध द है जससे अ भनय शुद्ध और प्रभावी बने।
पात्र- वभाजन (कुल ७ पात्र) —
पात्रम् स्वभावः स्वरः तथा मुद्रा
कु न्ती धीर , वचन की पक्की, भीतर से व्यिथत स्वर शान्त और धीमा; ‘मौनमवलम्बते’ पर पूरी तरह चुप — केवल दृ ष्ट
माता नीचे
भीमः बलशाली, िवनोदिपय, िनभय स्वर ऊँचा और खुला; ोक बोलते समय भुजाओं क मुद्रा
युिधिष्ठरः ग म् भीर , िववेक ी, िचिन्तत अग ज स्वर सन्तु लत; ‘कथं नु त्वया सङ् क ल्पतम्?’ पर स्वर म पीड़ा
अजुनः उ त्साही, साथ खड़ा रहने वाला ‘धनुधरोऽहमनुग मष्या म’ पर आगे बढ़कर दृढ़ स्वर
नकु लः / पिरहासिपय छोटे भाई हल्का, चंचल स्वर; मुस्कान के साथ संवाद
सहदे वः
बकः दपयुक्त, क्रू र , पर तक करने वाला भारी, गूँजता स्वर; ‘मानुषापसद’ पर तरस्कार क मुद्रा
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1. दो दृश्य बनाइए: पहला ाह्मण के घर का (पृष्ठ ११२–११५), दूसरा वन म शकट के पास का (पृष्ठ ११६–११७)। बीच म एक
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छोटा वराम या पदा-प रवतन र खए।
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.c, करके दखाना है। एक वद्याथ ‘सूत्रधार’ बनकर केवल आरम्भ का प रचय पढ़ेa।g
2. नेपथ्य- नदश बोले नह जाते, कए जाते ह: ‘( वलोक्य)’, ‘(मौनमवलम्बते)’, ‘(सहासमुदरं प रमृजन्)’, ‘(उभौ प्रहरतः)’ —
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ोकs पर वशेष ध्यान: तीन
इन्ह पढ़ना नह
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agप्र तकृतं भूयादेष धमः सनातनः’ पर सबसे अ धक बल द जए, क्य क वही पाठ का नाम है।
ोक सामान्य संवाद से भन्न, थोड़ा धीमा और लयबद्ध बो लए — यही उन्ह उभारेगा। ‘कृतं
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4. उच्चारण क सावधानी: संयुक्ताक्षर न नग लए — प्रत्युपकारमह त, धमसङ् ग्रहोऽत्र, त्वन्मस्तका भदुरः,
शस्त्रग्रहण वडम्बनेन, मृत्युश्चा स्म। हलन्त ‘म्’ को पूरा बो.c
em बक के लए एक गदा जैसा दण्ड। भारी सज्जा क आवश्यकता नह
लए।
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5. सामग्री (सरल): एक टोकरी या ठे ला (शकट), कुछsबतन,
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— स्पष्ट संवाद ही सव त्तम सज्जा है। agl
6. मल्लयुद्ध का दृश्य: वास्त वक प्रहार कदा प न क जए। दोन पात्र दूर-दूर खड़े होकर मुद्रा बनाएँ, प्रकाश मन्द हो और बक धीरे-
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धीरे गर जाए। सुरक्षा सबसे पहले।
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अ भनय.cसे क्या सीखते ह: संस्कृत सुनकर समझने क क्षमता कक्षा म पढ़ने से नह g
m a , बोलने से आती है। जब
se ‘बाढम्’, ‘ततस्ततः’, ‘अलं वशङ् कया’, ‘मा मैवम्’ जैसे छोटे संवाद बार-बार बोलता है, तब ये पद उसके
aवद्याथ
agl अपने हो जाते ह। साथ ही नाटक भाव सखाता है — अभ्यास का प्रश्न ९ (हास्य, नराशा, ग्ला न, अ धकार, ओज,
s
धैय) मंच पर स्वयं ही समझ म आ जाता है।
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Try This: अ भनय के बाद कक्षा म एक छोट चचा क जए — ‘य द भीम न होता तो क्या होता?’ और ‘क्या बक
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का तक कह भी ठ क था?’ इससे पाठ का धम- ववाद और गहरा समझ म आएगा।
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अ स्मन् रूपके वद्यमानानां पात्राणां नामा न व लख्य तेषां वषये टप्पण लखत।
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प्र.2
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उत्तरम् — अ स्मन् पाठ्यभागे सप्त पात्रा ण स न्त — कुन्ती, भीमः (भीमसेनः), यु ध ष्ठरः, अजुनः, नकुलः, सहदे वः, बकः
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च। तेषु पञ्च पाण्डवाः, एका माता, एकः च राक्षसः।
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