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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 10: णमो अ रहन्ताणम्
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
127 – 144 14 62 हन्द
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम् AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 10: णमो अ रहन्ताणम्
णमो अ रहन्ताणम् शारदा (कक्षा ९) का दशमः पाठः है। यह गद्य वधा का पाठ है — जैनपरम्परा के प्रथम तीथङ् कर ऋषभदे व (आ दनाथ) क
कथा : राजा ना भ तथा रानी मरुदे वी का पुत्र, प्रजा को कृ ष-वस्त्र-पात्र-गृह नमाण आ द जीवनकौशल सखाने वाला राजा, व नता-नगर का नमाता,
और अन्ततः नतक क आक स्मक मृत्यु दे खकर सब कुछ त्यागकर वन जाने वाला महामु न, जसे प्रयागराज म अक्षयवट के नीचे केवलज्ञान प्राप्त
हुआ। पाठ का शीषक णमोकार (नवकार) महामन्त्र क पहली पं क्त है — और यह पं क्त संस्कृत नह , प्राकृत (अधमागधी) है। इसी लए पुस्तक
इसी पाठ म अत्र इदम् अवधेयम् के नीचे प्राकृतभाषा का प रचय तथा संस्कृत-वाक्यानां प्राकृतानुवादः क छह-वाक्य वाली ता लका दे ती है। साथ
म सव शब्दे न भासते (४२ शब्द क शब्दाथ-ता लका, जसका ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भ खाली है), स्वाध्यायान्मा प्रमदः (चौबीस तीथङ् कर
तथा बारह तीथस्थान क सूची) तथा यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् (चार क्रयाकलाप) ह। अभ्यास अभ्यासाद् जायते स द्धः शीषक के नीचे
पाँच प्रश्न म है — एकपदे न उत्तरम्, पूणवाक्येन उत्तरा ण, समस्तपदा न, वाक्यप रवतनम् (कमवाच्य → कतृवाच्य) तथा स न्धः।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
शारदा (कक्षा 9) 127 – 144
खं ड प्रश्न
14 62
माध्यम
हन्द
पाठः — कथाभागः (१) : ना भः, ऋषभः तथा राज्यभारः — पृष्ठ 127–129
गद्यांशाः १–३ तथा प्रथमः ोकः — अन्वयः, शब्दाथः, हन्द अथः, भावः
पाठ-प रचयः
प्र.1 पाठस्य प्रथमस्य गद्यांशस्य आशयं लखत — “आसीत् युगानाम् आरम्भे प्रजानां प्रयः ना भनामकः कश्चन
महाराजः। सः राजनीतौ युद्धतन्त्रे प्रशासना दषु च समथः। तस्य पत्नी मरुदे वी बु द्धमती करुणाशा लनी च। तयोः
एव प्रयपुत्रः ऋषभः। ऋषभः सवगुणसम्प ः, अधीत वद्यः, राजनी तज्ञश्च आसीत्। यौवनेन वलसन्तं तं राजकुमारं
वीक्ष्य ना भः तस्मै राज्यभारं समप यतुम् अ चन्तयत्।”
आशयः — युगानाम् आरम्भे ना भः नाम कश्चन महाराजः आसीत्, यः प्रजानां प्रयः, राजनीतौ युद्धतन्त्रे प्रशासने च समथः
च आसीत्। तस्य पत्नी मरुदे वी बु द्धमती करुणाशा लनी च आसीत्। तयोः प्रयः पुत्रः ऋषभः सवगुणसम्प ः, वद्यायाम्
अधीतः, राजनी तज्ञः च आसीत्। यौवनेन शोभमानं तं राजकुमारं दृष्ट् वा ना भः तस्मै राज्यभारं दातुं च न्ततवान्।
( हन्द — युग के आरम्भ म ना भ नाम का एक महाराज था, जो प्रजा को प्रय था तथा राजनी त, युद्धतन्त्र और प्रशासन आ द म
समथ था। उसक पत्नी मरुदे वी बु द्धमती और करुणामयी थी। उन्ह दोन का प्रय पुत्र था ऋषभ — सब गुण से युक्त, पढ़ा- लखा
और राजनी त का जानकार। यौवन से शो भत उस राजकुमार को दे खकर ना भ ने सोचा क उसे राज्य का भार स प दया जाए।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम् AglaSem · NCERT Solutions
पदम् व्याकरण-रूपः अथः
युग ानाम् आरम्भे ष.ब.व. + स.ए.व. युगों के आर म्भ में — कथा को अत्यन्त पाचीन काल में रखने वाला वाक्यांश
नािभनामकः बहुव्री ह, पुं.प्र.ए.व. नािभः नाम यस्य सः — नािभ नाम वाला
करुणाशािलनी स्त्री.प्र.ए.व. दयायुक्ता — दयालु (पुस्तक का शब्दाथ)
अधीतिवद्यः बहुव्री ह, पुं.प्र.ए.व. अधीता िवद्य ा येन सः — िजसने िवद्य ा पढ़ ली, पढ़ ा-िलखा
िवलसन्तम् शतृ-कृदन्त, पुं. .ए.व. शोभमानम् — शोभा पाते हुए (को)
वीक्ष्य ल्यबन्त ( व + √ईक्ष् + ल्यप्) दृ ष्ट् वा — दे खकर
समपियतुम ् तुमुन्नन्त दातुम ् — सौंपने के िलए
अिचन्तयत् √ चन्त्, लङ् , प्र.पु.ए.व. िचिन्ततवान् — िवचार िकया (पुस्तक का शब्दाथ)
यह गद्यांश पाठ क भू मका कैसे बनाता है: तीन बात यह तय हो जाती ह और पूरी कथा उन्ह पर चलती है। (१)
वंश — ना भ तथा मरुदे वी का पुत्र ऋषभ; (२) पात्रता — ऋषभ केवल राजपुत्र नह , ‘सवगुणसम्पन्नः, अधीत वद्यः,
राजनी तज्ञश्च’ है, अथात् राज्य उसे जन्म के कारण नह , योग्यता के कारण मलने वाला है; (३) माँ का गुण —
मरुदे वी ‘बु द्धमती करुणाशा लनी’ है, और आगे ऋषभ का शासन भी इन्ह दो गुण — बु द्ध तथा करुणा — का
मेल दखाएगा। इसी लए लेखक ने रानी के लए ये दो ही वशेषण चुने।
ध्यान द: ‘राजनी तज्ञश्च’ = राजनी तज्ञः + च — वसगस न्ध (अः + च → अश्च, श्चत्व)। ‘तयोः’ वचन षष्ठी है —
‘उन दोन का’, अथात् माता- पता दोन का; यहाँ सम्बन्धे षष्ठी है।
प्र.2 “अथैकदा समाजे दु भक्षादयः समस्याः समुद्भवन्…” इ त द्वतीयस्य गद्यांशस्य आशयं लखत, ऋषभस्य समस्या-
व ेषणं च स्पष्टीकुरुत।
आशयः — एकदा समाजे दु भक्षादयः समस्याः उत्प ाः, जनेषु च परस्परं वद्वे षादयः भावनाः प्रादुभूताः। तदा ना भः ‘अयं
कालः ऋषभस्य राजनीतेः परीक्षाथ सुयोग्यः’ इ त मन्यमानः तस्मै राज्यं सम पतवान्। ऋषभः यदा राजा अभवत्, तदा सः
आदौ ‘जनानां समस्याः काः, दु भक्षस्य कारणं कम्, जनेषु कुतः परस्परं वद्वे षः, समस्यानां समाधानोपायाः के’ —
इत्या दषु वषयेषु चन्तनं कृतवान्। तेन का चत् स्पष्टकल्पना प्राप्ता — जनानाम् आलस्यं, कृ षकाय न्यूनता, प्रजासु
उत्पादनक्षमतायाः अभावः च — एताः एव मूलसमस्याः स न्त इ त।
( हन्द — एक बार समाज म अकाल आ द समस्याएँ उठ खड़ी हुईं और लोग म परस्पर े ष आ द भावनाएँ जाग उठ । तब ना भ ने
सोचा क ‘यह समय ऋषभ क राजनी त क परीक्षा के लए सबसे उपयुक्त है’ और उसे राज्य स प दया। ऋषभ ने राजा बनते ही
सबसे पहले यह वचार कया क लोग क समस्याएँ क्या ह, अकाल का कारण क्या है, लोग म परस्पर े ष क्य है और समाधान के
उपाय क्या ह। इस चन्तन से उसे एक स्पष्ट धारणा मली — लोग का आलस्य, खेती म कमी और प्रजा म उत्पादन-क्षमता का
अभाव — यही मूल समस्याएँ ह।)
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ऋषभ का समस्या- व ेषण चार चरण म —
चरणः पाठस्य वाक्यांशः क्या हो रहा है
१. लक्षण जनानां समस्याः काः पहले यह दे खा िक िदखाई क्या दे रहा है — भूख, अभाव, झगड़ ा
२. कारण दुिभक्षस्य कारणं िकम् िफर पूछा — अकाल हुआ क्यों? ल क्षण पर नही ं रुके
३. सामा जक प रणाम जनेष ु कु तः परस्परं िवद्वेषः यह भी दे खा िक अभाव आपस के द्वेष में कै से बदल जाता है
४. उपाय समाधानोपायाः के अन्त में हल पूछा — और तभी ‘स्पष्टक ल्पना’ िमली
इस अंश का सन्दे श: ऋषभ ने अन्न बाँटकर तुरन्त वाहवाही नह लूट । उसने पहले कारण खोजा और पाया क जड़
बाहर नह , भीतर है — आलस्यम्, कृ षकाय न्यूनता, उत्पादनक्षमतायाः अभावः। अकाल केवल वषा क कमी नह
था, काम क कमी था। यही कारण है क आगे उसका उपाय भी अन्न-दान नह , कौशल-प्र शक्षण है। पाठ यहाँ एक
स्थायी बात सखाता है — जो शासक लक्षण का इलाज करता है वह बार-बार वही संकट झेलता है; जो कारण का
इलाज करता है वह संकट को समाप्त कर दे ता है।
व्याकरण-सङ् केत: ‘अथैकदा’ = अथ + एकदा (वृ द्ध स न्ध — अ + ए → ऐ)। ‘समुद्भवन्’, ‘आ वरभवन्’ —
दोन लङ् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन (भूतकाल)। ‘चेत्येतादृश्यः’ = च + इ त + एतादृश्यः — यही स न्ध अभ्यास
के प्रश्न ५ (ख) तथा (ङ) म पूछ गई है। ‘मन्यमानः’ शानच्-कृदन्त है — ‘मानता हुआ’।
प्र.3 ऋषभः प्रजाः केषु जीवनकौशलेषु प्र श क्षतवान्, तस्य च कः प रणामः अभवत् — तृतीयस्य गद्यांशस्य आधारेण
लखत।
ऋषभः मूलसमस्यानां प रष्काराय जनानां सुखमयजीवनाय च व वधाः योजनाः र चतवान्, वशेषरूपेण च एता न
जीवनकौशला न प्र श क्षतवान् — कृ षकायम्, व वधपदाथः भोजन नमाणम्, तन्तु भः वस्त्र नमाणम्, गवाम् अश्वाद नां
पशूनां पालनम्, काष्ठैः धातु भः शला भः च गृहोपयो गनां वस्तूनां नमाणम्, पात्र नमाणम्, गृह नमाणम्, नगर नमाणम्
इत्याद न च।
( हन्द — ऋषभ ने मूल समस्याओं के समाधान के लए और लोग के सुखमय जीवन के लए अनेक योजनाएँ बनाईं, और वशेष
रूप से इन जीवन-कौशल का प्र शक्षण दया — खेती, अनेक पदाथ से भोजन बनाना, धाग से कपड़ा बुनना, गाय-घोड़े आ द
पशुओं का पालन, लकड़ी-धातु-पत्थर से घर क उपयोगी वस्तुएँ बनाना, बतन बनाना, घर बनाना और नगर बसाना।)
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कौशलम् (पाठस्य शब्दै ः) कस सामग्री से कौन-सी आवश्यकता पूरी हुई
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कृ िषकायम्
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भू मः, बीजम्
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अन्न — दुिभक्ष की जड़ पर सीधा पहार
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g l a अन्नम्, शाकाः, पदाथाः पका हुआ , िविवध भोजन
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िविवधपदाथः भोजनिनम णम्
तन्तुिभः वस्त्रिनम णम् तन्तवः (धागे) वस्त्र
. comदू ध, खेती में सहायता, यातायात ag
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गवाम् अश्वादीनां पशूनां पालनम् पशवः
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ग ृहोपयोिगनां वस्तूनां िनम णम्
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काष्ठैः, धातु भः, शला भः औज़ार तथा घर की वस्तुए ँ
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पात्रिनम णम् मृ त्तका, धातुः बतन — भोजन पकाने-रखने के िलए
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mइसी का फल है
आ य तथा बसावट — आगे ‘िविनता’eनगर
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ग ृहिनम णम्, नगरिनम णम् शलाः, काष्ठम् श्र
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l जनाः स्वयमेव गृहाणां, व वधभोज्यपदाथानां, नत्योपयो गवस्तूनां च नमाणं कतुम् आरब्धवन्तः। कृ षकाया ण अ प प्रचुरतया
प रणामः — तेन क्रमशः जनाः स क्रयाः अभवन्, जीवनपद्ध त च प रव ततवन्तः। क्रमशः जनानाम् आ थक स्थ तः अ प सुदृढा
agजाता।
आरब्धा न। तेन जनानां समस्याः स्वयमेव प रहृताः, राज्यं पुनः सु भक्षं च अभवत्।
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( हन्द — इससे धीरे-धीरे लोग स क्रय हो गए और उन्ह ने अपनी जीवन-पद्ध त बदल ली। क्रमशः उनक आ थक स्थ त भी मज़बूत
हो गई। लोग स्वयं ही घर का, तरह-तरह के खाद्य पदाथmका और नत्य उपयोग क वस्तुओं का नमाण करने लगे। खेती भी बड़े
l a seआप दूर हो गईं और राज्य फर से सु भक्ष हो गया।)
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पैमाने पर होने लगी। इससे लोग क समस्याएँ अपने
‘स्वयमेव’ शब्द ही इस अंश क कुंजी है: पाठ दो बार यह शब्द रखता है — ‘जनाः स्वयमेव … नमाणं कतुम्
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आरब्धवन्तः’ और ‘समस्याः स्वयमेव प रहृताः’। अथात् राजा ने समस्या हल नह क , उसने लोग को समस्या हल
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करने योग्य बना दया। यही ‘प्र श क्षतवान्’ क्रया का पूरा अथ है — दान नह , दक्षता। इसी लए फल स्थायी हुआ
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mहै, नयम है «कतृकरणयोस्तृतीया»। ‘गवाम्’ = गो शब्द का षष्ठी glase
करणे तृतीया: ‘तन्तु भः वस्त्र नमाणम्’, ‘काष्ठैः धातु भः शला भः … नमाणम्’, ‘ व वधपदाथः भोजन नमाणम्’ —
इन सब म साधन (करण) के लए तृतीया वभcक्तo
बहुवचन (अ नय मत रूप — गौः, गावौ,se m.… गवाम्)। a
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गावः
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पाठे उद्धतस्य प्रथमस्य ोकस्य पदच्छे दम्, अन्वयम्, शब्दाथम्, हन्द -अथ भावं च लखत — “प्रजासुखे सुखं
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राज्ञः प्रजानां च हते हतम्। नात्म प्रयं हतं राज्ञः प्रजानां तु प्रयं हतम्॥”
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पजासुखे सुखं रा ः पजानां च िहते िहतम्।
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नात्मिपयं िहतं रा ः पजानां त ु िपयं िहतम्॥
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पदच्छे दः — प्रजा-सुखे + सुखम् + राज्ञः + प्रजानाम् + च + हते + हतम् । न + आत्म- प्रयम् + हतम् + राज्ञः + प्रजानाम् + तु +
प्रयम् + हतम् ।
अन्वयः — राज्ञः सुखं प्रजासुखे (अ स्त), प्रजानां हते च (राज्ञः) हतम् (अ स्त)। राज्ञः आत्म प्रयं हतं न (भव त), प्रजानां प्रयं तु
(राज्ञः) हतम् (भव त)।
पदम् व्याकरण-रूपः शब्दाथः
पजासुखे ष.तत्पुरुषः, नपुं.स.ए.व. पजायाः सुखे — पजा के सुख में
रा ः राजन्, पुं.ष.ए.व. राजा का
िहते नपुं.स.ए.व. भलाई में, क ल्याण में
आत्मिपयम् ष.तत्पुरुषः, नपुं.प्र.ए.व. आ त्मनः िपयम् — जो स्वयं को िपय लगे
िपयम् नपुं.प्र.ए.व. जो अच्छा लगे (रुिचकर )
िहतम् नपुं.प्र.ए.व. जो लाभकारी हो (क ल्याणकर )
तु अव्ययम् िक न्तु, ही (भेद िदखाने वाला अव्यय)
हन्द अथ — राजा का सुख प्रजा के सुख म है, और प्रजा के हत म ही राजा का हत है। जो राजा को स्वयं प्रय लगे, वह उसका
हत नह है; प्रजा को जो प्रय है, वही राजा का हत है।
भावः — ोक ‘ प्रय’ और ‘ हत’ का भेद खोलता है। प्रयम् वह है जो अच्छा लगे; हतम् वह है जो अच्छा करे।
साधारण मनुष्य के लए ये दोन अलग-अलग हो सकते ह, कन्तु राजा के लए ोक एक कड़ी शत रखता है —
राजा का हत उसक अपनी रु च म नह , प्रजा क रु च म है। इसी लए पाठ ने यह ोक ठ क उसी स्थान पर रखा है
जहाँ ऋषभ का शासन सफल होता है : उसने वही कया जो प्रजा के लए आवश्यक था, न क वह जो राजा को
सुखकर लगता। यह ोक कौ टल्य के अथशास्त्र का प्र सद्ध वचन है और भारतीय राजधम का सार माना जाता है।
छन्दः तथा स न्ध: ोक अनुष्टुप् छन्द म है — चार चरण, प्रत्येक म आठ अक्षर। ‘नात्म प्रयम्’ = न + आत्म प्रयम्
(द घ स न्ध — अ + आ → आ)। ‘प्रजानाम्’ म सम्बन्धे षष्ठी तथा ‘प्रजासुखे’, ‘ हते’ म अ धकरणे सप्तमी है —
‘ कसम’ का उत्तर दे ने वाली वभ क्त।
पाठः — कथाभागः (२) : व नतानगरम्, सन्त तः तथा वैराग्यम् — पृष्ठ 130–131
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गद्यांशाः ४–५ तथा द्वतीयः ोकः — ऋषभदे व-नामकरणम्, ब्राह्मी ल पः, नतक्याः घटना
पाठ-प रचयः
प्र.1 ऋषभः ‘राजा ऋषभदे वः’ इ त कथं ख्यातः ? तस्य सन्त त वषये ब्राह्मी ल प वषये च पाठः कम् आह ?
ऋषभः जनानां जीवने शा न्त सुरक्षां न्या यकव्यवस्थां च पुनः सुदृढां कृतवान्। ऋषभस्य दक्षशासनेन कौशलेन च ‘ व नता’
नाम्नः नगरस्य नमाणम् अभवत्। समाजस्य उत्कषण सः जनानां मनस्सु सुप्र त ष्ठतं स्थानं प्राप्तवान्। अतः तं प्रजाः प्रेम्णा
‘राजा ऋषभदे वः’ इ त कथय न्त स्म।
( हन्द — ऋषभ ने लोग के जीवन म शा न्त, सुरक्षा और न्याय-व्यवस्था को फर से मज़बूत कया। उसके कुशल शासन और
कौशल से ‘ व नता’ नाम के नगर का नमाण हुआ। समाज के उत्कष के कारण उसने लोग के मन म अच्छ तरह जमा हुआ स्थान पा
लया। इसी लए प्रजा उसे प्रेम से ‘राजा ऋषभदे व’ कहती थी।)
वषयः पाठस्य कथनम् हन्द
नगरिनम णम् ऋषभस्य दक्षशासनेन कौशलेन च व नतानाम्नः नगरस्य ‘िविनता’ नगर बसा — यही आगे भरत को िदया गया
नमाणम् अभवत्
नामकरणम् तं प्रजाः प्रेम्णा राजा ऋषभदे वः इ त कथय न्त स्म पजा ने पेम से ‘ऋषभदे व’ कहा — नाम राजा ने नही ं रखा,
पजा ने िदया
पुत्र ाः शते पुत्रेषु वशेषरूपेण भरतः बाहुब लः च अत्यन्तं सौ पुत्रों में भरत तथा बाहुबिल िवशेष पिस द्ध
सु वख्यातौ
पुत्र्यौ ब्राह्मी सुन्दरी चे त े कन्ये अ प ग णता दषु शास्त्रेषु प्रवीणे बाह्मी तथा सुन्दरी — दोनों गिणत आिद शास्त्रों में पवीण और
प्र सद्धे च आस्ताम् पिस द्ध
बाह्मीिलिपः जैनसम्प्रदायानुगुणं ‘ब्राह्मी लप्याः’ वकासः ब्राह्मी ारैव कृता जैन पर म्परा के अनुस ार बाह्मी िलिप का िवकास बाह्मी के
इ त श्रूयते; तस्यामेव लप्यां शलालेखाः उपलभ्यन्ते द्वारा ही हुआ , ऐसा सुना जाता है; उसी िलिप में िशलाले ख
िमलते है ं
ध्यान दे ने योग्य दो बात: (१) पाठ ब्राह्मी ल प के वषय म ‘जैनसम्प्रदायानुगुणं … इ त श्रूयते’ कहता है — अथात्
यह जैन परम्परा क मान्यता है, ऐसा पाठ स्वयं स्पष्ट करता है। उत्तर लखते समय यही सावधानी रखनी चा हए :
‘जैनपरम्परायाः अनुसारं’ जोड़कर ल खए। (२) पु त्रय के लए ‘ग णता दषु शास्त्रेषु प्रवीणे’ कहा गया है — प्राचीन
कथा म भी कन्याओं क शास्त्रीय वद्वत्ता का उल्लेख है, केवल गुण-सौन्दय का नह । यह पाठ का एक सुन्दर संकेत
है।
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व्याकरण-सङ् केत: ‘सु वख्यातौ’, ‘प्रवीणे’, ‘प्र सद्धे ’, ‘आस्ताम्’ — सब द्ववचन के रूप ह, क्य क दो-दो
व्य क्तय क बात है (भरत-बाहुब ल; ब्राह्मी-सुन्दरी)। ‘आस्ताम्’ = अस् धातु, लङ् , प्रथमपुरुष वचन। ‘प्रेम्णा’ =
प्रेमन् शब्द का तृतीया एकवचन (भावे तृतीया — ‘प्रेम से’)। ‘ब्राह्मी ारैव’ = ब्राह्मी ारा + एव, यही स न्ध अभ्यास के
प्रश्न ५ (च) म पूछ गई है। पुस्तक म छपा एक वसंगत रूप: ‘ वकासः … कृता’ म कता ‘ वकासः’ पु ल्लङ्ग है,
अतः शुद्ध रूप कृतः होना चा हए (अथवा वाक्य ‘ब्राह्मी लपेः रचना … कृता’ रूप म)। परीक्षा म पाठ का वाक्य ज्य
का त्य उद्धत क जए, कन्तु अपने वाक्य म ‘कृतः’ ल खए।
प्र.2 पाठे उद्धतस्य द्वतीयस्य ोकस्य पदच्छे दम्, अन्वयम्, शब्दाथम्, हन्द -अथ भावं च लखत — “दै वाधीनं
जगत्सव जन्मकमशुभावहम्। संयोगश्च वयोगश्च न च दै वात्परं बलम्॥”
दै वाधीनं जगत्सव ं जन्मकमशुभ ावहम्।
संयोगश्च िवयोगश्च न च दै वात्परं बलम्॥
पदच्छे दः — दै व-अधीनम् + जगत् + सवम् + जन्म-कम-शुभ-आवहम् । संयोगः + च + वयोगः + च + न + च + दै वात् + परम् +
बलम् ।
अन्वयः — जन्मकमशुभावहं सव जगत् दै वाधीनम् (अ स्त)। संयोगः च वयोगः च (दै वाधीनौ स्तः)। दै वात् परं बलं न च (अ स्त)।
पदम् व्याकरण-रूपः शब्दाथः
दै वाधीनम् ष.तत्पुरुषः, नपुं.प्र.ए.व. दै वस्य अधीनम् — भाग्य के अधीन (पुस्तक का शब्दाथ)
जगत्सवम् नपुं.प्र.ए.व. सव ं जगत् — सारा संस ार
जन्मकमशुभावहम् बहुव्री ह/कमधारय, जन्मनः कम णः च शुभम् आवहित यत् — जन्म तथा कम के अनुस ार शुभ (फल ) लाने
नपुं.प्र.ए.व. वाला
संयोगः पुं.प्र.ए.व. मेल नम् — िमलना (पुस्तक का शब्दाथ)
िवयोगः पुं.प्र.ए.व. पथृ क्करणम् — िबछु ड़ना (पुस्तक का शब्दाथ)
दै वात् परम् पं.ए.व. + अव्ययम् दै व से बढ़ कर , दै व से ऊपर
बलम् नपुं.प्र.ए.व. शिक्त, साम थ् य
हन्द अथ — जन्म तथा कम के अनुसार शुभ फल दे ने वाला यह सारा संसार दै व ( नय त) के अधीन है। मलना और बछु ड़ना —
दोन दै व के ही अधीन ह; दै व से बढ़कर कोई बल नह है।
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भावः तथा प्रसंग — पाठ इस ोक को ठ क उस मोड़ पर रखता है जहाँ कहता है — ‘परं को वा जाना त
व ध ल खतम्। ऋषभदे वस्या प जीवने का चत् तादृशी घटना संवृत्ता यया तस्य जीवनमेव प रव ततम्।’ अथात्
जसके पास सब कुछ था — राज्य, सन्तान, यश, समृ द्ध — उसके जीवन म भी एक ऐसी घटना आ गई जसने सब
बदल दया। ोक का काम यहाँ भाग्यवाद फैलाना नह , ब ल्क यह दखाना है क मनुष्य के हाथ म उद्यम है,
प रणाम पूरा-का-पूरा नह । ठ क इसी कारण अगले ही पृष्ठ पर नतक क आक स्मक मृत्यु ऋषभदे व के मन को
झकझोर दे ती है और वे ‘इह संसारे कम प शाश्वतं ना स्त’ इस नष्कष पर पहुँचते ह।
दो पाठान्तर-सम्भव अथ: ‘जन्मकमशुभावहम्’ को दो प्रकार से पढ़ा जा सकता है — (क) बहुव्री ह : जो संसार
जन्म तथा कम के अनुसार शुभ-अशुभ फल लाता है; (ख) कमधारय-भाव : जन्म तथा कम का शुभ फल लाने वाला।
दोन म तात्पय एक ही है — फल जन्म तथा कम से बँधा है और वह क्रम दै वाधीन है। स न्ध: ‘संयोगश्च’, ‘ वयोगश्च’
= संयोगः + च, वयोगः + च ( वसगस न्ध — अः + च → अश्च); ‘दै वात्परम्’ = दै वात् + परम्; ‘दै वाधीनम्’ = दै व +
अधीनम् (द घ स न्ध)। छन्दः — अनुष्टुप्।
प्र.3 ऋषभदे वस्य जीवनं प रवतयन्ती घटना का आसीत् ? तस्याः अनन्तरं सः क कम् अकरोत् ?
एकदा ऋषभदे वः राजप्रासादे नृत्यकलाप्रदशनम् आयो जतवान्। तत्र आगता का चत् नतक नृत्यकलां प्रदशयन्ती सहसा
भूमौ प तत्वा मृता। अनया घटनया ऋषभदे वस्य मनः सहसा वक्षुब्धम् अभवत् — इयम् एव तस्य जीवनप रव तनी घटना
आसीत्।
( हन्द — एक बार ऋषभदे व ने राजमहल म नृत्यकला का प्रदशन आयो जत कया। वहाँ आई हुई कोई नतक नृत्य दखाते- दखाते
अचानक ज़मीन पर गरकर मर गई। इस घटना से ऋषभदे व का मन सहसा वच लत हो गया — यही उनके जीवन को बदल दे ने
वाली घटना थी।)
तस्य मन स उत्प ाः प्रश्नाः — ‘कथं का चत् आरोग्यवती स्त्री सहसा मरणं प्राप्तवती ? क नाम जीवनम् ? कथं जीवनीयम् ?’
इत्यादयः अनेके प्रश्नाः तस्य बुद्धौ आ वरभवन्। ‘इह संसारे कम प शाश्वतं ना स्त, इदं सुखं स्था य ना स्त’ इ त व चन्त्य स्थरसुखस्य
प्राप्त्यथ सः सवम् अ प प रत्यज्य भक्षुरूपेण प्र स्थतवान्।
( हन्द — ‘एक स्वस्थ स्त्री अचानक मृत्यु को कैसे प्राप्त हो गई? जीवन क्या है? कैसे जीना चा हए?’ — ऐसे अनेक प्रश्न उनक बु द्ध
म उठे । ‘इस संसार म कुछ भी शाश्वत नह है, यह सुख स्थायी नह है’ — यह सोचकर स्थर सुख क प्रा प्त के लए उन्ह ने सब कुछ
छोड़कर भक्षु के रूप म प्रस्थान कया।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम्
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क्रमः कायम् (पाठस्य शब्दै ः) हन्द
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स्वस्य िवशालं सामाज्यं स्वपुत्र ेष ु िवभक्तवान्
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अपना िवशाल साम ाज्य पुत्रों में बाँट िदया
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e‘िविनता’
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gl a िविनता राज्य भरत को िदया
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३ तक्षिशलां बाहुबलये च समप्य तक्षिशला बाहुबिल को दी
. comजीवन का परम स य खोजने के िलए महामुिन बनकर िनकल पड़ े ag
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४ जीवनस्य परमसत्यम् अन्वेष्टुं पिस्थतोऽयं महामुिनः
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५ तम् अनेके जनाः िशष्यरूपेण अनुस ृतवन्तः
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वनों में मौन रहकर िनर न्तर ध् यान तथा अध् ययन करते रहे
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६ अरण्येष ु मौनेन ध्यानं िनरन्तरम् अध्ययनं च करोित स्म
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यह घटना ही क्य चुनी गई: नतक का मरण कोई युद्ध या षड्यन्त्र नह था — वह सबसे सुन्दर, सबसे जीवन्त
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gl समाप्त हो सकती है, तो ‘स्थायी सुख’ कस चीज़ म खोजा जाए? ध्यान द जए, ऋषभदे व ने भोग नह छोड़ा क्य क
क्षण के ठ क बीच हुआ। इसी वरोध ने प्रश्न को तीखा बना दया : य द नृत्य करती हुई स्वस्थ स्त्री एक क्षण म
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भोग बुरा था; उन्ह ने इस लए छोड़ा क्य क वह अस्थायी था — पाठ के अपने शब्द ह ‘ स्थरसुखस्य प्राप्त्यथम्’। यह
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त्याग नराशा से नह , खोज से जन्मा है।
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व्याकरण-सङ् केत: ‘प्रदशयन्ती’ — शतृ/शानच् स्त्री लङ्ग कृदन्त, ‘ दखाती हुई’। ‘प रत्यज्य’, ‘ व चन्त्य’, ‘समप्य’
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— तीन ल्यबन्त (उपसग के साथ क्त्वा प्रत्यय ‘ल्यप्’ बन जाता है : प र + √त्यज् + ल्यप्)। ‘भरताय’, ‘बाहुबलये’
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— सम्प्रदाने चतुथ ( जसे दया जाए)। ‘प्र स्थतोऽयम्’ = प्र स्थतः + अयम् — यही स न्ध अभ्यास के प्रश्न ५ (छ) म
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पूछ गई है। ‘करो त स्म’ — लट् + ‘स्म’ मलकर भूतकाल का अथ दे ते ह।
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पाठः — कथाभागः (३) : भक्षाटनम्, इक्षुरसः तथा केवलज्ञानम् — पृष्ठ 132–133
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गद्यांशाः ६–७ — चतुःशत दनोपवासः, अक्षयतृतीया, व षतप-पारणा-महोत्सवः, चतु वधः सङ् घः
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पाठ-प रचयः
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प्र.1 ऋषभदे वः कमथ भक्षाथ प्र स्थतः ? प्रजाः भक्षायां क दत्तवत्यः, तस्य च कः प रणामः अभवत् ?
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emअनुया यनः वृक्षेभ्यः फला न शाका न वा चत्वा जीवनं यापय न्त स्म। कदा चत् तेषाम् एतादृशं व्यवहारं दृष्ट् वा
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agl ‘जैनसन्न्या सनः वृक्षेभ्यः फला न शाका न वा न चनुयुः’ इ त बोधनाथ ऋषभदे वः स्वयं भक्षाथ प्र स्थतः।
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( हन्द — उनके अनुयायी पेड़ से फल या शाक तोड़कर जीवन चला रहे थे। कभी उनका ऐसा व्यवहार दे खकर, ‘जैन सन्न्यासी पेड़
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से फल या शाक न तोड़’ — यह समझाने के लए ऋषभदे व स्वयं भक्षा के लए नकल पड़े।)
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परं तत्रत्याः जनाः तेषां प्रयं महाराजं दृष्ट्e
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gl दे यः’ इ त न केना प च न्ततम्। फलतः ऋषभदे वस्य दने दने सकष्टम् उपवासः
ा ‘ भक्षायां क दातव्यम्’ इ त सम् ान्ताः सन्तः तस्मै आभरणा न अनघवस्तू न च
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यच्छ न्त स्म। परं ‘ भक्षायां भोजनपदाथः
करणीयः आप ततम्। कदा चत् ऋषभदे वः भोज्यपदाथानाम् अभावे चतुःशतं दना न नैरन्तयण उपवासं कृतवान्।
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( हन्द — कन्तु वहाँ के लोग अपने प्रय महाराज को दे खकर ‘ भक्षा म क्या द’ इस बात पर ककतव्य वमूढ़ होकर उन्ह आभूषण
तथा अनमोल वस्तुएँ दे ने लगे। पर ‘ भक्षा म तो भोजन दे ना चा हए’ — यह कसी ने सोचा ही नह । फलस्वरूप ऋषभदे व को दन-
प्र त दन कष्टपूवक उपवास करना पड़ा। एक बार तो भोज्य पदाथ के अभाव म उन्ह ने लगातार चार सौ दन उपवास कया।)
प्रश्नः पाठस्य उत्तरम् हन्द
िभक्षाथं कु तः अनुया यनः वृक्षेभ्यः फला न न चनुयुः इ त बोधनाथम् िशष्यों को यह िसखाने के िलए िक वृक्ष से स्वयं फल न तोड़ ें
पिस्थतः ? — स्वयं आचरण करके
पजाः िकं दत्तवत्यः आभरणा न अनघवस्तू न च आभूषण तथा अनमोल वस्तुए ँ
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िकं न दत्तम् ? भोजनपदाथः भोजन — जो िभक्षा में दे ना चािहए था
पिरणामः कः ? दने दने सकष्टम् उपवासः; कदा चत् चतुःशतं दना न रोज़ क ष्टपूण उपवास ; एक बार लगातार चार सौ िदन का
नैरन्तयण उपवासः उपवास
यहाँ एक सूक्ष्म बात है: प्रजा ने अनादर नह कया — उलटे अ त आदर कया, और वही भूल बन गई। वे ‘राजा’
को दे ख रहे थे, ‘ भक्षु’ को नह ; इस लए उन्ह ने वही दया जो राजा को शोभा दे ता है — आभूषण और अनघ वस्तुए।ँ
पाठ का शब्द ‘सम्भ्रान्ताः’ ( ककतव्यमूढाः) यही मनोदशा पकड़ता है। इससे दो बात सीखने योग्य ह — (१) दान वही
साथक है जो लेने वाले क आवश्यकता के अनुसार हो, दे ने वाले क श्रद्धा के अनुसार नह ; (२) ऋषभदे व ने न तो
माँगा, न शकायत क — उन्ह ने उपवास स्वीकार कर लया। शष्य को नयम सखाने के लए वे स्वयं पहले उसे
जए — यही ‘बोधनाथ स्वयं प्र स्थतः’ का अथ है।
व्याकरण-सङ् केत: ‘ चनुयुः’ = √ च ( चनो त), व ध लङ् लकार, प्र.पु.ब.व. — ‘तोड़/चुन’; नषेध के साथ ‘न
चनुयुः’ = ‘न तोड़’। ‘यच्छ न्त स्म’ = √दा (यच्छ त) + स्म — भूतकाल का अथ। ‘करणीयः’, ‘दातव्यम्’, ‘दे यः’ —
तीन कृत्य प्रत्यय (अनीयर्, तव्यत्, यत्) ह, जो ‘करना चा हए/दे ना चा हए’ का भाव दे ते ह। ‘चतुःशतम्’ = चार सौ
( वसगान्त ‘चतुः’ + शतम्)।
प्र.2 ऋषभदे वस्य द घका लकः उपवासः कथं समाप्तः ? ‘व षतप-पारणा-महोत्सवः’ इ त कः उत्सवः, सः कुत्र कथं च
आचयते ?
एकदा पयटनावसरे सः ह स्तनापुरस्य समीपे स्थतस्य इक्षुक्षेत्रस्य पाश्वमागात् गच्छ त स्म। तच्च इक्षुक्षेत्रं तस्यैव प्रपौत्रस्य
श्रेयांसस्य आसीत्। सः श्रेयांसः प्र पतामहाय पानाथम् इक्षुरसं दत्तवान्। अनेन ऋषभदे वस्य द घका लकः उपवासः समाप्तः।
तच्च वैशाखमासस्य अक्षयतृतीया- दनम् आसीत्।
( हन्द — एक बार भ्रमण के अवसर पर वे ह स्तनापुर के पास स्थत एक गन्ने के खेत के बगल के रास्ते से जा रहे थे। वह गन्ने का
खेत उन्ह के प्रपौत्र श्रेयांस का था। श्रेयांस ने अपने प्र पतामह को पीने के लए गन्ने का रस दया। इसी से ऋषभदे व का द घकालीन
उपवास समाप्त हुआ। और वह दन वैशाख मास क अक्षयतृतीया का दन था।)
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अतः जैनसम्प्रदाये ‘व षतप-पारणा-महोत्सवः’ अधुना प गुजराते पद लप्तपुरम् (पालीताणा), उत्तरप्रदे शे ह स्तनापुरं
चेत्या दषु प वत्रतीथषु आचयते। अत्र त्रयोदशमासानां वैक ल्पक दनेषु उपवासं कुव न्त। अन्ते अक्षयतृतीया दने इक्षुरसेन
उपवासस्य समापनं कुव न्त।
( हन्द — इसी लए जैन सम्प्रदाय म ‘व षतप-पारणा-महोत्सव’ आज भी गुजरात के पद लप्तपुर — पालीताणा — तथा उत्तर प्रदे श
के ह स्तनापुर आ द प वत्र तीथ म मनाया जाता है। इसम तेरह महीन तक एक दन छोड़कर एक दन उपवास कया जाता है और
अन्त म अक्षयतृतीया के दन गन्ने के रस से उपवास का समापन (पारणा) कया जाता है।)
पदम् अथः क्य महत्त्वपूण
इक्षक्ष
ु ेत्र म् इक्षोः (मधुदण्डस्य) क्षेत्रम् — गन्ने का खेत पुस्तक की शब्दाथ-तािलका में यही िवगह िदया है (षष्ठी-तत्पुरुष)
पपौत्रः / पिपतामहः पुत्रस्य पुत्रस्य पुत्रः / पतुः पतुः पता श्र ेयांस ऋषभदे व के पपौत्र थे — इसीिलए ऋषभदे व उनके ‘पिपतामह’
पारणा उपवासस्य समापनम् वत तोड़ ने की ि या — ‘विषतप की पारणा’ इसी िदन होती है
वैक िल्पकिदनेष ु एकान्तर दनेषु एक िदन उपवास , एक िदन आहार — तेर ह मास तक
कथा और उत्सव का जोड़: ध्यान द जए क उत्सव म जो-जो होता है, वह कथा के हर ववरण से मेल खाता है —
तेरह मास का तप (क्य क ऋषभदे व का उपवास बहुत लम्बा था), पारणा इक्षुरस से (क्य क श्रेयांस ने गन्ने का रस
ही दया था), और अक्षयतृतीया के दन (क्य क वही दन था)। स्थान भी वही चुना गया — ह स्तनापुर, जहाँ यह
घटना घट । इस तरह एक परम्परा अपनी मूल कथा को हर वष दोहराकर स्मृ त को जी वत रखती है। यह प्रश्न
अभ्यास के प्रश्न २ (घ) म सीधे पूछा गया है।
ध्यान द: ‘तस्यैव’ = तस्य + एव (वृ द्ध स न्ध नह , यण्/द घ नह — यह ‘अ + ए → ऐ’ वृ द्ध स न्ध है : तस्य + एव
→ तस्यैव)। ‘पानाथम्’, ‘पयटनावसरे’ — समासबहुल शैली के उदाहरण। पुस्तक म यह उत्सव-नाम कह -कह
‘वषपपपारणामहोत्सवः’ जैसा अशुद्ध रूप म स्कैन होता है; शुद्ध रूप व षतप-पारणा-महोत्सवः है, जैसा मु द्रत पृष्ठ
पर दखता है।
प्र.3 ऋषभदे वः कदा कुत्र च केवलज्ञानं प्राप्तवान् ? ‘आ दनाथः’ इ त नाम कथं प्र सद्धम् ? जनानां मागदशनाथ सः कं
क्रमं र चतवान् ?
एवं द घका लकोपवासेन, नरन्तराध्ययनेन कठोरतपसा च ऋषभदे वः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तथौ प्रयागराजे
अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।
( हन्द — इस प्रकार द घकालीन उपवास से, नरन्तर अध्ययन से और कठोर तप से ऋषभदे व ने फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष क
एकादशी त थ को प्रयागराज म अक्षयवट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त कया।)
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प्रश्नः उत्तरम् (पाठस्य शब्दै ः) हन्द
कदा ? फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तथौ फाल्गुन मास , कृ ष्ण पक्ष, एकादशी ितिथ
कु त्र ? प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः पयागराज में, अक्षयवट वृक्ष के नीचे
िकम् ? केवलज्ञानम् (कैवल्यस्य ज्ञानम्) के वल ान — पूण, िनरपेक्ष ान
के न साधनेन ? द घका लकोपवासेन, नरन्तराध्ययनेन, कठोरतपसा च ल म्बे उपवास , िनर न्तर अध् ययन तथा कठोर तप से
‘आ दनाथः’ इ त नाम — अयमेव जैनसम्प्रदाये आ दमः तीथङ् करः, अतः ‘प्रभुः नाथः’ इत्यतः ‘आ दनाथः’ इ त ख्यातः। ( हन्द
— यही जैन सम्प्रदाय के प्रथम तीथकर ह, और ‘प्रभु-नाथ’ होने के कारण ‘आ दनाथ’ नाम से प्र सद्ध हुए। ‘आ द’ = प्रथम, ‘नाथ’ =
स्वामी — अथात् ‘पहले स्वामी’।)
चतु वधः सङ् घः — ऋषभदे वः जनानां मागदशनाथ भक्षुः, भक्षुणी, श्रावकः, श्रा वका — चे त क्रमं र चतवान्। स एव क्रमः
‘जैनसङ् घः’ इ त प्र सद्धः वतते।
अङ्गम् कः / का हन्द
िभक्षःु गृहत्यागी सन्न्यासी साध ु (मुिन)
िभक्षण
ु ी गृहत्या गनी सन्न्या सनी साध् वी
श्रावकः गृहस्थः उपासकः गृहस्थ अनुयायी (पुरुष)
श्रािवका गृहस्था उपा सका गृहस्थ अनुयाियनी (स्त्री)
इस ‘क्रम’ क बनावट पर ध्यान द जए: संघ म केवल त्यागी ही नह , गृहस्थ भी ह; और दोन वग म स्त्री तथा
पुरुष दोन ह। अथात् माग कसी एक वग के लए बन्द नह रखा गया — जो सब छोड़ सकता है वह भक्षु बने, जो
घर म रहकर चलना चाहे वह श्रावक बने। इसी लए पाठ ने इसे ‘जनानां मागदशनाथ क्रमः’ कहा है — यह एक
व्यवस्था है, जससे हर स्थ त का व्य क्त अपने योग्य स्थान पाए। अभ्यास का प्रश्न २ (च) यही पूछता है।
व्याकरण-सङ् केत: ‘द घका लकोपवासेन’ = द घका लक + उपवासेन (गुण स न्ध — अ + उ → ओ)।
‘ नरन्तराध्ययनेन’ = नरन्तर + अध्ययनेन (द घ स न्ध)। ‘एकादश्याम्’, ‘ तथौ’ — अ धकरणे सप्तमी (‘कब’ का
उत्तर)। ‘अक्षयवटवृक्षस्य अधः’ म ‘अधः’ अव्यय है, उसके योग म षष्ठी आती है।
णमोकारमहामन्त्रः — प्राकृतमूलम्, संस्कृतच्छाया तथा ध्व न- नयमाः — पृष्ठ 134
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पाठस्य शीषक-मन्त्रः — पदच्छे दः, संस्कृतच्छाया, अथः, प्राकृत-संस्कृत-सम्बन्धः, पञ्चपरमे ष्ठनः, जैनमतस्य सद्धान्ताः
पाठस्य के न्द्र बन्दुः
प्र.1 पाठे दत्तस्य णमोकार (नवकार) महामन्त्रस्य मूलपाठं लखत, तस्य संस्कृतच्छायाम्, पदशः अथम्, हन्द -अथ भावं
च स्पष्टीकुरुत — “णमो अ रहन्ताणं, णमो सद्धाणं, णमो आय रयाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं”
“णमो अिरहन्ताणं,
णमो िसद्धाणं,
णमो आयिरयाणं,
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्वसाहूणं”
सवप्रथमं एकं महत्त्वपूण तथ्यम् — पुस्तकम् एव कथय त ‘तेषां परमो मन्त्रः नवकारमन्त्रः इ त प्र सद्धः यच्च प्राकृतभाषायां वतते’।
अतः अयं मन्त्रः संस्कृतभाषायां ना स्त, प्राकृतभाषायाम् (अधमागधीभाषायाम्) अ स्त। ( हन्द — यह मन्त्र संस्कृत म नह ,
प्राकृत — अधमागधी म है; पुस्तक स्वयं यह कहती है। इसी लए इसम ‘न’ के स्थान पर ‘ण’, ‘लोके’ के स्थान पर ‘लोए’ और
‘सवसाधूनाम्’ के स्थान पर ‘सव्वसाहूणं’ दखाई दे ता है।)
पदच्छे दः — णमो + अ रहन्ताणं । णमो + सद्धाणं । णमो + आय रयाणं । णमो + उवज्झायाणं । णमो + लोए + सव्वसाहूणं ।
संस्कृतच्छाया (पुस्तकस्य अपनी छाया) — पुस्तकं स्वयम् एव अस्य अथ संस्कृतेन एवं ददा त — “नमा म अ रहन्तॄन्, नमा म
सद्धान्, नमा म आचायान्, नमा म उपाध्यायान्, नमा म लोके सवसाधून् इ त।”
शब्दशः संस्कृतच्छाया (व्याकरणानुसारम्) — नमः अहद्भ्यः (अ रहन्तेभ्यः) । नमः सद्धे भ्यः । नमः आचायभ्यः । नमः
उपाध्यायेभ्यः । नमः लोके सवसाधुभ्यः ।
प्राकृत- संस्कृत-रूपम् अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ
पदम्
णमो नमः प्रणामः नम स्कार हो
अिरहन्ताणं अहताम् / जतशत्रूणाम् (पुस्तकस्य अिरहन्तों को — िजन्होंने भीतर के शत्र ु (राग, द्वेष, मोह)
अ रहन्तानाम् शब्दाथः) जीत िलए
िसद्धाणं सद्धानाम् मुक्तात्मनाम् िस द्धों को — जो पूणता को पाप्त हो चुके
आयिरयाणं आचायाणाम् धमाचायाणाम् आचाय ं को — जो संघ का नेतत्ृ व करते है ं
उवज्झायाणं उपाध्यायानाम् अध्यापकानाम् उपाध् यायों को — जो शास्त्र पढ़ ाते है ं
लोए लोके जग त लोक में, संस ार में
सव्वसाहूणं सवसाधूनाम् सवषां साधूनाम् सब साध ओ
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम्
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हन्द अथ — अ रहन्त को नमस्कार, सद्ध को नमस्कार, आचाय को नमस्कार, उपाध्याय को नमस्कार, और लोक के सभी
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साधुओं को नमस्कार।
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भावः — इस मन्त्र क सबसे बड़ी वशेषता यह है क इसम कसी व्य क्त का नाम नह है। यह न ऋषभदे व को
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aपूgणl हो गया ( सद्ध), जो माग दखाता है (आचाय), जो पढ़ाता है (उपाध्याय), और जो साधना कर रहा है (साधु)।
नमस्कार करता है, न महावीर को — यह गुण को नमस्कार करता है : जसने भीतरी शत्रु जीत लए (अ रहन्त), जो
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इसी लए पुस्तक कहती है — ‘वसुधैवकुटु म्बकम् इत्यस्य अनुरूपेण वश्वशान्त्यै को टशैः जनैः गीयमानः परमो मन्त्रः
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अयं णमोकारमन्त्रः’, अथात् वसुधैव कुटु म्बकम् क भावना के अनुरूप वश्वशा न्त के लए करोड़ लोग ारा गाया
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जाने वाला परम मन्त्र। पाँच पद का क्रम भी सोचा हुआ है — ऊपर से नीचे नह , ब ल्क स द्ध से साधना तक,
ता क साधक स्वयं को उसी श्रेणी क अ न्तम कड़ी म दे ख सके।
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दो व्याकरण- टप्प णयाँ: (१) संस्कृत म ‘नमः’ के योग म चतुथ वभ क्त आती है — नयमm
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laहै। पुस्तक ने सरलता के
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«नमःस्व स्तस्वाहास्वधालं वषड्योगाच्च» — इसी लए शुद्ध संस्कृत छाया ‘नमः अहद्भ्g
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यः’
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gl म)। (२) प्राकृत का ‘-आणं’ अन्त षष्ठी/चतुथ बहुवचन है; पुस्तक क शब्दाथ-ता लका भी ‘अ रहन्ताणम्
‘नमा म + तीया’ (नमा म अ रहन्तॄन्) रूप चुना है, जो भी प्रयुक्त होता है (√नम् धातु के साथ कम तीया
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(पुं.ष.ब.व.) = जतशत्रूणाम्’ ही लखती है। वतनी-सङ् केत: पाठ के भीतर मन्त्र म अन्त्य अनुस्वार है —
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‘अ रहन्ताणं’; कन्तु पाठ का शीषक संस्कृतीकृत रूप म ‘णमो अ रहन्ताणम्’ छपा है। दोन एक ही पद ह।
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मन्त्रस्य प्राकृत-पदा न संस्कृत-पदे भ्यः कथं जाता न ? ध्व नप रवतनस्य नयमान् उदाहरणस हतं लखत।
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मूल बात पहले: प्राकृत संस्कृत का ‘ बगड़ा हुआ रूप’ नह है — वह उसी धारा का सरल, बोलचाल वाला प्रवाह है, जैसा पुस्तक
agl स्वयं कहती है : ‘संस्कृतं य द ोत स्वनी नद , त ह प्राकृतं तस्या एव सरलः प्रवाहः अ स्त’। बोलचाल म जीभ क ठन ध्व नय को
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सरल कर दे ती है, और यह सरलीकरण नयमबद्ध होता है — मनमाना नह । नीचे पहले नयम, फर उसी नयम से मन्त्र का हर पद।
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प्राकृत के मुख्य ध्व न- नयम (संस्कृत → प्राकृत) —
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम् AglaSem · NCERT Solutions
क्र. नयम उदाहरण
१ दो स्वरों के बीच का क् , ग्, च्, ज्, त्, द् , प्, य्, व् पायः लुप्त हो जाता लोके → लोए · बालकः → बालओ · खादािम → खािम · िपबित
है → िपवइ
२ दो स्वरों के बीच का महापाण ख्, घ्, थ्, ध्, फ् , भ् → ह् साध ु → साहु · मुखम् → मुहं · मेघ ः → मेहो
३ संयक्ु त व्यंजन नही ं िटकते — या तो समीकरण होकर िद्वत्व बनता है, सव → स व्व · िवद्य ालय → िवज्जालय · िम त्रम् → िम त्त ं ·
या स्वरभिक्त से वे अलग हो जाते है ं अिस्त → अित्थ · आचाय → आयिरय
४ ‘र्’ िकसी व्यंजन से पहले हो तो लुप्त हो जाता है और आगे वाला सव → स व्व · कम → क म्म · धम → ध म्म
व्यंजन दुग नु ा हो जाता है
५ ‘न्’ पायः ण् हो जाता है (जैन पाकृ त की पहचान) नमः → णमो · िस द्धानाम् → िस द्धाणं · फलािन → फलािण
६ तीनों ऊष्म वण श्, ष्, स् िमलकर एक स् रह जाते है ं एषः → एसो · पुरुषः → पुिरसो
७ ऋ, ऐ, औ स्वर नही ं रहते — उनके स्थान पर अ/इ/उ अथवा ए/ओ ऋषभः → उसहो · अहत् → अिरहन्त
आते है ं
८ शब्द के अन्त में के वल अनुस्वार बचता है, शेष व्यंजन िगर जाते है ं िम त्रम् → िम त्त ं · -आनाम् → -आणं
अब इन्ह नयम से मन्त्र का प्रत्येक पद —
प्राकृत- संस्कृत-रूपम् कौन-कौन-सा नयम लगा
पदम्
णमो नमः िनयम ५ — शब्दार म्भ का न् → ण्; और ‘नमः’ का सिन्धज रूप ‘नमो’ ज्यों का त्यों बना रहा
अिरहन्ताणं अहताम् िनयम ७ — ‘अर्’ में स्वरभिक्त से ‘अिर ’; िनयम ५ + ८ — षष्ठी बहुवचन -आनाम् → -आणं (न् →
(अ रहन्तानाम्) ण्, अन्त्य म् → अनुस्वार )
िसद्धाणं सद्धानाम् िनयम ५ + ८ — -आनाम् → -आणं। ‘िस द्ध’ में द्ध पहले से ही सवण-िद्वत्व है, अतः वह अपिरवितत
रहा
आयिरयाणं आचायाणाम् िनयम १ — स्वरों के बीच का च् िघसकर य् हो गया (आचा → आया); िनयम ३ — संयक्ु त ‘य’
स्वरभिक्त से ‘िरय’ बना; िनयम ५ + ८ — -आणं
उवज्झायाणं उपाध्यायानाम् िनयम १ — प् → व् (उपा → उव); िनयम ३ — संयक्ु त ‘ध् य’ का समीकरण होकर ज्झ बना (अध् या
→ ज्झा); िनयम ५ + ८ — -आणं
लोए लोके िनयम १ — दो स्वरों के बीच का क् पूर ा लुप्त (लो-के → लो-ए ); स प्तमी एकवचन का ‘-ए ’ बना रहा
सव्वसाहूणं सवसाधूनाम् िनयम ४ — सव → स व्व (र् लुप्त, व् दुगनु ा); िनयम २ — साध ु → साहु (ध् → ह्); िनयम ५ + ८
— -ऊनाम् → -ऊणं
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम् AglaSem · NCERT Solutions
एक नयम पूरा खोलकर दे खए — ‘लोके → लोए’: संस्कृत म ‘लो-के’ के बीच म क् है। बोलते समय दो स्वर के
बीच का व्यंजन सबसे कमज़ोर होता है, क्य क जीभ को वहाँ रुकना पड़ता है। पहले वह क् घसकर ‘ग’ जैसा मृदु
हुआ, फर पूरा गर गया — बचे केवल दो स्वर : लो + ए = लोए। यही प्र क्रया हन्द तक चली आई है — संस्कृत
‘लोक’ से प्राकृत ‘लोअ’ और आगे ‘लोग’; संस्कृत ‘कम’ से प्राकृत ‘कम्म’ और हन्द ‘काम’; संस्कृत ‘सव’ से
प्राकृत ‘सव्व’ और हन्द ‘सब’। इस लए प्राकृत पढ़ना संस्कृत और अपनी आज क भाषा के बीच का लुप्त पुल
दे ख लेना है।
अधमागधी क्य कहलाती है: पुस्तक कहती है ‘जैनागमाः अधमागधीभाषायां ल खताः’। ‘अध-मागधी’ का अथ है
‘आधी मागधी’ — इसम मागधी प्राकृत के कुछ लक्षण ह (जैसे पु ल्लङ्ग प्रथमा एकवचन म ‘-ए’ रूप भी मलता है),
कन्तु मागधी के दो प्र सद्ध लक्षण — र् → ल् तथा स् → श् (जैसे शुद्ध मागधी म ‘पुरुषः’ → ‘पु लशे’) — इसम
नह मलते। इसी लए हमारे मन्त्र म ‘अ रहन्त’ का र् ज्य का त्य है और ‘सव्वसाहूणं’ का स् भी ‘स’ ही रहा — य द
यह शुद्ध मागधी होती तो ‘अ लहन्त’ और ‘शव्वशाहूणं’ मलता। यही अन्तर पहचानना कक्षा ९ के स्तर क असली
परख है।
प्र.3 ‘पञ्चपरमे ष्ठनः’ के ? ‘नवकारमहामन्त्र दवसः’ इ त कः दवसः, सः कदा कथं च आचयते ? — पाठस्य आधारेण
लखत।
एषः मन्त्रः पञ्चपरमे ष्ठभ्यः — अ रहन्तारः, सद्धाः, आचायाः, उपाध्यायाः, सव साधवः च — प्रणामं समपय त। (पुस्तकस्य
शब्दाः)
( हन्द — यह मन्त्र पाँच परमे ष्ठय को — अ रहन्त, सद्ध, आचाय, उपाध्याय तथा सभी साधु — प्रणाम अ पत करता है।)
क्र. परमेष्ठी पुस्तक/परम्परा के अनुसार कौन मन्त्र क पं क्त
१ अिरहन्तारः िजतशत्रवः — िजन्होंने भीतरी शत्र ु जीत िलए णमो अ रहन्ताणं
२ िसद्धाः जो पूणता (िसिद्ध) को पाप्त हो चुके णमो सद्धाणं
३ आचाय ः धम संघ का मागदशन करने वाले णमो आय रयाणं
४ उपाध्यायाः शास्त्र पढ़ ाने वाले णमो उवज्झायाणं
५ सव साधवः लोक के सब साध ु — जो साधना-पथ पर है ं णमो लोए सव्वसाहूणं
नवकारमहामन्त्र दवसः — पुस्तकं कथय त — ‘प्र तवषम् अप्रैल-मासस्य नवमे दनाङ् के जैनजनाः सामू हकरूपेण अस्य मन्त्रस्य
जपा दकं कृत्वा उत्सवम् आचर न्त। अतः अस्य दवसस्य ‘नवकारमहामन्त्र दवसः’ इ त ख्या तः वतते।’
( हन्द — हर वष 9 अप्रैल को जैन लोग सामू हक रूप से इस मन्त्र का जप आ द करके उत्सव मनाते ह; इसी लए इस दन को
‘नवकार महामन्त्र दवस’ कहा जाता है। यही प्रश्न ‘यस्तु क्रयावान् मनुजः स व ान्’ के तीसरे क्रयाकलाप म कक्षा के सामने बोलने
के लए दया गया है।)
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‘परमेष्ठी’ शब्द को खो लए: परमे + स्थी = ‘जो परम (सव च्च) स्थान पर स्थत है’। ध्यान द जए क यह सूची पद
क सूची नह , अवस्था क सूची है — इनम से चार तो अभी भी साधना कर रहे मनुष्य ह (आचाय, उपाध्याय, साधु
और अ रहन्त)। इसी लए मन्त्र म कोई नाम नह आता : जो भी उस अवस्था तक पहुँचे, नमस्कार उसी को है। पुस्तक
इसी कारण इसे ‘सवषां जैनानां परमपावनः मन्त्रः’ कहती है।
प्र.4 जैनमतस्य प्रमुखान् सद्धान्तान्, त्री ण रत्ना न, पञ्चमहाव्रता न च पाठस्य आधारेण लखत।
जैनमतस्य प्रमुखाः सद्धान्ताः (पुस्तकस्य शब्दै ः) —
सद्धान्तः पुस्तकस्य व्याख्या हन्द
अिहंस ा परमो मनसा, वाचा, कमणा च अ हसापालनम् अिहंस ा ही सबसे बड़ ा धम है — मन से , वाणी से और कम से अिहंस ा का
धमः पालन
अनेक ान्तवादः सत्यस्य अनेके पक्षाः भव न्त स त्य के अनेक पक्ष होते है ं — कोई एक दृ िष्ट पूर ा स त्य नही ं
स्याद्वादः प्रत्येकं वचनं सापेक्षं ‘स्या द त’ रूपेण हर कथन सापेक्ष है, उसे ‘स्यात्’ (िकसी अपेक्षा से ) लगाकर गहण करना
ग्राह्यम् चािहए
अपिरग हः आवश्यकात् अ धकं संग्रहः न करणीयः आवश्यकता से अिधक संगह नही ं करना चािहए
त्री ण रत्ना न — एतेषां दशनानां मध्ये सम्यग्दशनम्, सम्यग्ज्ञानम्, सम्यक्च रत्रम् इ त त्री ण रत्ना न उच्यन्ते।
रत्नम् अथः हन्द
सम्यग्दशनम् सम्यक् दृ ष्टः, यथाथश्रद्धा सही दृ िष्ट — वस्तु को जैस ी है वैस ा दे खना
सम्यग् ानम् यथाथ ज्ञानम् सही ान
सम्यक्चिरत्रम् यथाथम् आचरणम् सही आचरण
पञ्चमहाव्रता न — तथा च प्रा णमात्र हताय सत्यम्, अ हसा, अस्तेयम्, अप रग्रहः, ब्रह्मचय च आच रतुं कल्याणकरम् इ त
नगद्यते।
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महाव्रतम् अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ
सत्यम् यथाथवचनम् सच बोलना
अिहंस ा प्रा णनां पीडनस्य वजनम् िकसी पाणी को मन-वचन-कम से न सताना
अस्तेयम् न स्तेयम् — अदत्तस्य अग्रहणम् चोरी न करना — िबना दी हुई वस्तु न ले ना
अपिरग हः आवश्यकात् अ धकं संग्रहस्य वजनम् आवश्यकता से अिधक संगह न करना
बह्मचयम् इ न्द्रयसंयमः संयम का पालन
अनेकान्तवाद और स्याद्वाद का अन्तर: दोन जुड़े हुए ह पर एक नह । अनेकान्तवाद वस्तु के वषय म कहता है
— सत्य के अनेक पक्ष ह। स्याद्वाद उसे बोलने का ढं ग बताता है — इस लए हर कथन ‘स्यात्’ ( कसी अपेक्षा से)
जोड़कर कहो। जैसे — ‘स्यात् घटः अ स्त’ अथात् ‘एक दृ ष्ट से घड़ा है’। इसका व्यावहा रक फल यह है क ववाद
घटता है : म जो दे ख रहा हूँ वह सत्य का एक पक्ष है, दूसरे का दे खा हुआ भी एक पक्ष हो सकता है। कक्षा म, घर म
और समाज म यह बहुत काम क दृ ष्ट है। ध्यान र खए — ये सब पुस्तक ारा दए गए जैनदशन के सद्धान्त ह;
उत्तर लखते समय ‘जैनमतस्य सद्धान्ताः’ कहकर ही ल खए, जैसा पाठ करता है।
व्याकरण-सङ् केत: ‘अस्तेयम्’ = न + स्तेयम् (नञ्-तत्पुरुष) — ‘स्तेय’ का अथ चोरी। ‘अप रग्रहः’ भी नञ्-
तत्पुरुष है, पुस्तक क शब्दाथ-ता लका म यही समास-नाम दया गया है। ‘सम्यग्दशनम्’ = सम्यक् + दशनम् (क् + द
→ ग्, व्यञ्जनस न्ध / जश्त्व)। ‘मनसा, वाचा, कमणा’ — तीन तृतीया एकवचन (करण), अथात् ‘मन से, वाणी
से, कम से’।
सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 135–138
द्वचत्वा रशत् शब्दानां ता लका तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त रक्तस्तम्भस्य पू तः
कायकलापः
प्र.1 ‘सव शब्दे न भासते’ इ त ता लकायाः अ न्तमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अथ लखत’ — रक्तः अ स्त। पाठे
प्रयुक्तानां सवषां शब्दानाम् अथान् ज्ञात्वा तं स्तम्भं पूरयत।
पुस्तक म यह अ न्तम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — वद्याथ को हर शब्द का अथ अपनी मातृभाषा म लखना है।
नीचे पूरी ता लका द गई है और वह स्तम्भ हन्द (हमारी माध्यम-भाषा) म भर दया गया है। जनक मातृभाषा मराठ , बाङ् ग्ला,
गुजराती, त मऴ, तेलुगु, कन्नड, ओ ड़आ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अथ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रख।
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as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम्
a g l AglaSem · NCERT Solutions
शब्दः अथः हन्द ENGLISH
. c om
मातृभाषया अथम्
s e mहुआ — हन्द )
m la
(संस्कृतम्) (भरा
. c o ag
s em
अिचन्तयत् (√िचन्त्+लङ् ,
a
च न्ततवान् वचार कया Considered सोचा, मन में िवचार िकया
agl
प.पु.ए.व.)
अधीतिवद्यः (बहुवीिह, अधीता वद्या येन पढ़ा- लखा Learned िजसने िवद्य ा पढ़ ली हो,
co m
. ag
पुं.प.ए.व.) िवद्वान्
e m
अनघवस्तूिन (कमधारय, अनघा ण वस्तू न
g l as
अनमोल वस्तुएँ Precious items बहमु ूल्य चीज़ें, िजनका
नपुं.प.ब.व.) a मोल न आँक ा जा सके
अनुयाियनः (पुं.प.ब.व.) अनुगा मनः अनुयायी Followers
co m
पीछे -पीछे चलने वाले ,
e m.
िशष्य
m l as
m .co
अनेक ान्तवादः (पुं.प.ए.व.) सत्यस्य बहुपक्षवादः अनेकान्तवाद Doctrine of
a g यह मत िक स त्य के
l a se multiplicity of view अनेक पक्ष होते है ं
a g points
mन
Non-possession ज़रूरत से ज्य़ ादा
a s
agl
अपिरग हः (नञ्-तत्पुरुषः, न प रग्रहः आवश्यकता से
अ धकo
. c जोड़ कर न रखना
sem
प.ए.व.) ग्रहण
a
करना
अिरहन्ताणम् (पुं.ष.ब.व.) जतशत्रूणाम् agl अ रहन्त का Conquerors of उनका िजन्होंने भीतरी
enemies (Arihantas) शत्र ु (राग-द्वेष) जीत िलए
. coशुmआत में, सबसे पहले
m
ase
आरम्भे (पुं.स.ए.व.) आदौ आरम्भ म At the beginning
m
रु
m . co agl
ase
आलस्यम् (नपुं.प.ए.व.) प्रमादः आलस्य Laziness सुस्ती, काम से जी चुर ाना
agl इक्षक्ष
ु ेत्र म् (षष्ठी-तत्पुरुषः, इक्षोः (मधुदण्डस्य) गन्ने का खेत Sugarcane field ईख का खेत
नपुं.प.ए.व.) क्षेत्रम्
se m
om क क्षमता
cउत्पादन g l a
m . a
e
उत्पादनक्षमता (स्त्री.प.ए.व.) उत्पादनस्य क्षमता Productivity पैद ा करने की शिक्त,
s
gla
उपज दे ने का साम थ् य
उपवासः (पुं.प.ए.व.)
a
नराहारव्रतम् उपवास Fasting िबना भोजन के रहने का
comकड़ ी तप या से
वत
m .
a se
com
With severe
l
कठोरतपसा (कमधारय, कठोरेण तपसा कठोर तप से स्
. a
penance
g
m
पुं.त.ृ ए.व.)
e
as करुणाशािलनी
agl
दयायुक्ता दयालु Compassionate दया से भरी हुई,
(स्त्री.प.ए.व.) क रुणामयी
.c
s e m
m a
.co agl
के वल ानम् (नपुं.प./ कैवल्यस्य ज्ञानम् केवलज्ञान Absolute knowledge पूण, िनरपेक्ष ान —
िद्व.ए.व.)
se m िजसके आगे कु छ जानना
g l a शेष न रहे
a
co m
m .
m as e
.co
a g l Page 19 of 57
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तीथङ् करः (पुं.प.ए.व.) धममागप्रदशकः तीथकर Tirthankara धम का माग िदखाने
वाला, तीथ (घाट) बनाने
वाला
दुिभक्षम् (अव्ययीभावः, भक्षायाः अभावः अकाल Famine अन्न का अभाव, सूखा-
नपुं.प.ए.व.) अकाल
दै वाधीनम् (षष्ठी-तत्पुरुषः, दै वस्य अधीनम् भाग्य के अधीन Dependent on fate िनयित के वश में, भाग्य पर
नपुं.प./िद्व.ए.व.) िनभर
नवकारमन्त्रः (पुं.प.ए.व.) जैनप्राथनामन्त्रः नवकार मंत्र Navkar mantra जैन पर म्परा का मूल
पाथना-म न्त्र (णमोकार
म न्त्र)
िनत्योपयोिगवस्तूनाम् प्र त दनोपयो गनां नत्य उपयोग क Daily essentials रोज़ काम आने वाली
(नपुं.ष.ब.व.) वस्तूनाम् वस्तुओं के चीज़ों का
िनराहारम् (पुं./नपुं.प./ भोजनर हतम् नराहार Without food िबना खाए , भोजन-रिहत
िद्व.ए.व.)
न्याियकव्यवस्था न्यायसंब न्धनी न्याय व्यवस्था Judicial system याय करने का पबन्ध ,
न्
(स्त्री.प.ए.व.) व्यवस्था अदालती व्यवस्था
पिरत्यज्य (कृ दन्त, त्यक्त्वा त्यागकर Abandoning छोड़ कर , पूर ी तरह त्याग
पिर+√त्यज्+ल्यप्) दे क र
पिरष्काराय (पुं.च.ए.व.) नवारणाय समाधान के लए For rectification सुध ार के िलए , दू र करने
के िलए
पिरहृताः (पुं.प.ब.व.) नवा रताः नवारण कया Solved दू र कर दी गईं, हल हो गईं
पजानाम् (स्त्री.ष.ब.व.) जनानाम् प्रजाओं का Of citizens पजा का, नागिरकों का
पशासनािदषु (नपुं.स.ब.व.) शासन क्रयासु प्रशासन आ द म In administration राज-काज चलाने के
etc. कामों में
बाह्मीिलिपः — मध्यपदलोपी ब्राह्मीनाम्नी ल पः ब्राह्मी ल प Brahmi script बाह्मी नाम की िलिप —
(कमधारयः, स्त्री.प.ए.व.) भारत की पाचीनतम
िलिपयों में से एक
िभक्षाथम् (नपुं.िद्व.ए.व.) याच्ञायै भक्षा के लए For alms भीख माँगने के िलए ,
िभक्षाटन हेत ु
युद्धतन्त्रे (नपुं.स.ए.व.) संग्रामशास्त्रे युद्ध-तंत्र म In war-strategy युद्ध की रणनीित में
राजनीतौ (स्त्री.स.ए.व.) राजधम राजनी त म In politics शासन-नीित में, राजधम में
िवद्वेषः (पु.ं प.ए.व.) वैरम् ेष Hatred आपसी बैर , दुश्मनी
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िविधिलिखतम् (ततृ ीया- व धना ल खतम् नय त- नधा रत Predestined भाग्य का िलखा हुआ ,
तत्पुरुषः, नपुं.प./िद्व.ए.व.) पहले से तय
िवयोगः (पुं.प.ए.व.) पृथक्करणम् वयोग Separation िबछोह, अलग हो जाना
िवक्षब्ु धम् (नपुं.प./िद्व.ए.व.) उ ग्नम् वच लत Agitated बेचैन, िहल गया हुआ
शाश्वतम् (नपुं.प./िद्व.ए.व.) नत्यम् शाश्वत Eternal सदा रहने वाला, अमर
िशलाले खाः (पुं.प.ब.व.) शलासु ल खताः शला-लेख Inscriptions पत्थरों पर खुदे हुए ले ख
लेखाः
सङ् घः (पुं.प.ए.व.) समूहः संघ Community समुद ाय, संगिठत समूह
समाधानोपायाः (पुं.प.ब.व.) नवारणमागाः समाधान के उपाय Solutions हल करने के रास्ते
सम्भान्ताः (पुं.प.ब.व.) ककतव्यमूढाः वस्मय के साथ Perplexed िकं कतव्यिवमूढ़ — यह न
सूझना िक क्या करे ं
संयोगः (पुं.प.ए.व.) मेलनम् संयोग Union िमलन, साथ आ जाना
सुपितिष्ठतम् (नपुं.प./ दृढरूपेण स्था पतम् अच्छ तरह Well established मज़बूती से जमा हआ
ु
िद्व.ए.व.) स्था पत
नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं म) — मराठ : उपवासः = ‘उपास’, व े षः = ‘ े ष / वैर’, शलालेखाः =
‘ शलालेख’, आलस्यम् = ‘आळस’। गुजराती: इक्षुक्षेत्रम् = ‘शेरडी नुं खेतर’, अनघवस्तू न = ‘अमूल्य वस्तुओ’।
बाङ् ग्ला: सङ् घः = ‘संघ’, दु भक्षम् = ‘दु भक्ष’, शाश्वतम् = ‘ चरन्तन’। त मऴ: केवलज्ञानम् = ‘मुळ अ ऱवु’, अ हसा
= ‘अ हसै’। ध्यान र खए क अपनी भाषा म लखते समय अथ वही रहे जो संस्कृत स्तम्भ म दया गया है।
ता लका पर एक नज़र डा लए और दे खए वह क्या सखा रही है: ४२ म से लगभग आधे शब्द समास ह और
ता लका ने कोष्ठक म उनका प्रकार भी दे रखा है — कमधारय (अनघवस्तू न, कठोरतपसा), षष्ठी-तत्पुरुष (इक्षुक्षेत्रम्,
दै वाधीनम्), तृतीया-तत्पुरुष ( व ध ल खतम्), नञ्-तत्पुरुष (अप रग्रहः), अव्ययीभाव (दु भक्षम्), बहुव्री ह
(अधीत वद्यः) तथा मध्यपदलोपी कमधारय (ब्राह्मी ल पः)। अथात् यह केवल अथ-सूची नह , अभ्यास के प्रश्न ३ क
तैयारी है। शब्दाथ रटने के बजाय हर शब्द का वग्रह बोलकर दे खए — तब समास अपने आप याद रह जाएगा।
प्र.2 शब्दाथ-ता लकायां कोष्ठके ये सङ् केताः दत्ताः — यथा ‘(नपुं.प्र./ द्व.ए.व.)’, ‘(पुं.ष.ब.व.)’, ‘(कृदन्त,
प र+√त्यज्+ल्यप्)’ — तेषाम् अथ स्पष्टीकुरुत। एतैः सङ् केतैः कः लाभः ?
ये कोष्ठक-सङ् केत शब्द का ‘पता’ बताते ह — अथात् वह शब्द कस लङ्ग, कस वभ क्त और कस वचन म पाठ म आया है।
इन्ह पढ़ना आना चा हए, तभी शब्दाथ का पूरा उपयोग होता है।
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सङ् केतः पूण रूप अथ ता लका का उदाहरण
पुं. / स्त्री. / नपुं. पुं लङ्गम् / स्त्री लङ्गम् / िलङ् ग करुणाशा लनी (स्त्री.), आलस्यम्
नपुंसक लङ्गम् (नपुं.)
प. / िद्व. / त.ृ / च. / प्रथमा, तीया, तृतीया, चतुथ , िवभिक्त प रष्काराय (च.ए.व. — ‘के लए’),
पं. / ष. / स. पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी राजनीतौ (स.ए.व. — ‘म’)
ए.व. / िद्व.व. / ब.व. एकवचनम् / वचनम् / वचन अनुया यनः (ब.व. — अनेक),
बहुवचनम् उपवासः (ए.व.)
प.पु. प्रथमपुरुषः ि या का पुरुष अ चन्तयत् (√ चन्त् + लङ् ,
प्र.पु.ए.व.)
लङ् लङ् लकारः अनद्य तन भूतकाल अ चन्तयत् = ‘उसने वचार कया’
√ धातुः ि या का मूल √ चन्त्, √त्यज्
ल्यप् क्त्वा-प्रत्ययस्य आदे शः उपसग हो तो ‘क्त्वा’ के स्थान पर प र + √त्यज् + ल्यप् = प रत्यज्य
(उपसगयुक्ते) ‘ल्यप्’
प./िद्व. प्रथमा अथवा तीया नपुंस किलङ् ग में दोनों रूप समान केवलज्ञानम्, शाश्वतम्, वक्षुब्धम्
होते है,ं अतः दोनों िलखे जाते है ं
इन सङ् केत का असली लाभ: संस्कृत म उत्तर उसी वभ क्त म दे ना पड़ता है जस वभ क्त म प्रश्न पूछा गया है।
ता लका पहले ही बता दे ती है क ‘प रष्काराय’ चतुथ है (‘ कसके लए?’ का उत्तर), ‘राजनीतौ’ सप्तमी है
(‘ कसम?’ का उत्तर) और ‘प्रजानाम्’ षष्ठी है (‘ कसका?’ का उत्तर)। इसी लए अभ्यास के प्रश्न १ म ‘कस्यां
लप्याम्’ पूछने पर उत्तर ब्राह्मी लप्याम् (सप्तमी) आएगा, ‘कस्मै’ पूछने पर भरताय (चतुथ ) और ‘ क राज्यम्’ पूछने
पर तक्ष शलाम् ( तीया)। प्रश्न का वभ क्त-रूप ही उत्तर का वभ क्त-रूप तय करता है — यह नयम याद रख
ली जए, आधा अभ्यास इसी से सध जाता है।
ध्यान द: ‘नपुं.प्र./ .ए.व.’ ऐसा दो-म-से-एक वाला सङ् केत इस लए दया जाता है क्य क नपुंसक लङ्ग म प्रथमा
तथा द्वतीया के रूप सदा समान होते ह (फलम् — प्रथमा भी, तीया भी)। कस वभ क्त म है, यह वाक्य म
क्रया दे खकर तय होता है — ‘केवलज्ञानं प्राप्तवान्’ म यह कम है, अतः तीया।
अत्र इदम् अवधेयम् — प्राकृतभाषा — पृष्ठ 138
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प्राकृतभाषाणां प रचयः, तासां सा हत्यम्, संस्कृतेन सह सम्बन्धः
अत्र इदम् अवधे य म्
प्र.1 ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ इ त शीषकाधः दत्तस्य ‘प्राकृतभाषा’ इ त गद्यांशस्य आशयं लखत।
पुस्तकस्य शब्दाः — “भारते भाषासम्पदा अतीव समृद्धा अ स्त। क स्म श्चत् कालघट्टे अनेकाः प्राकृतभाषाः सामान्यजनानां
संवादोपयो गन्यः आसन्।”
आशयः — भारतस्य भाषासम्पत् अतीव समृद्धा अ स्त। क स्म श्चत् कालखण्डे अनेकाः प्राकृतभाषाः सामान्यजनानां
परस्परसंवादाय उपयो गन्यः आसन्। जैनागमाः अधमागधीभाषायां ल खताः। महारा ीप्राकृते महाक वः हालः
‘गाथासप्तशती’ इ त सुप्र सद्धं काव्यं ल खतवान्। शौरसेनीप्राकृते बहवः नाट्यग्र ाः र चताः स न्त। अनेन ज्ञायते यत्
प्राकृतभाषा न केवलं संवादोपयो गनी, अ पतु उच्चको टसा हत्यस्य वा हनी आसीत्।
( हन्द — भारत म भाषाओं क सम्प त्त अत्यन्त समृद्ध है। कसी कालखण्ड म अनेक प्राकृत भाषाएँ साधारण लोग क बोलचाल के
काम आती थ । जैन आगम अधमागधी म लखे गए। महाराष्ट्री प्राकृत म महाक व हाल ने ‘गाथासप्तशती’ नाम का सुप्र सद्ध काव्य
लखा। शौरसेनी प्राकृत म अनेक नाट्यग्रन्थ रचे गए। इससे जाना जाता है क प्राकृत भाषा केवल बातचीत के काम क नह थी,
ब ल्क उच्च को ट के सा हत्य क वा हका भी थी।)
तथ्यम् पाठस्य वाक्यम् हन्द
पाकृ त िकसकी भाषा सामान्यजनानां संवादोपयो गन्यः आसन् आम लोगों की बोलचाल की भाषाएँ
थी
जैनागम िकसमें जैनागमाः अधमागधीभाषायां ल खताः जैन आगम अध मागधी में िलखे गए
गाथासप्तशती महाराष्ट्रीप्राकृते महाक वः हालः … ल खतवान् महारा ी पाकृ त में महाकिव हाल की रचना
नाट ग न्थ शौरसेनीप्राकृते बहवः नाट्यग्रन्थाः र चताः शौरसे नी पाकृ त में अनेक नाटक -गन्थ
िनष्कष न केवलं संवादोपयो गनी अ पतु उच्चको टसा हत्यस्य वा हनी के वल बोलचाल नही,ं ऊँचे दज के सािहत्य की
आसीत् वाहक भी
यह अंश इसी पाठ म क्य है: पाठ का शीषक ही प्राकृत का वाक्य है — ‘णमो अ रहन्ताणं’। य द वद्याथ को यह
न बताया जाए क प्राकृत क्या है, तो शीषक ही अबूझ रह जाएगा। इसी लए पुस्तक ने ठ क शब्दाथ-ता लका के बाद
यह टप्पणी रखी। और ध्यान द जए — पुस्तक प्राकृत को छोट भाषा नह कहती; वह जोर दे कर कहती है ‘न
केवलं संवादोपयो गनी अ पतु उच्चको टसा हत्यस्य वा हनी’। भाषा का बड़ा-छोटा होना उसके बोलने वाल क
सामा जक स्थ त से नह , उसम रचे गए सा हत्य से तय होता है — यही इस वाक्य का सन्दे श है।
‘आगम’ शब्द: जैन परम्परा म मूल शास्त्र को ‘आगम’ कहते ह (आ + √गम् — ‘जो परम्परा से चला आया’)।
पुस्तक कहती है क वे अधमागधी म ह — इसी लए णमोकार मन्त्र भी उसी भाषा म है। ‘कालघ े ’ = कालखण्डे,
‘ कसी कालखण्ड म’ — ‘घट्ट’ का अथ है खण्ड/पड़ाव।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम्
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पाठे क त प्राकृतभाषाः उ ल्ल खताः ? तासां नामा न लखत तथा च प्रत्येकस्याः वषये यत् पाठे उक्तं तत् लखत।
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प्र.2
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a l प्राकृतभाषाः नामतः उ ल्ल खताः, अन्ते ‘इत्यादयः’ इ त पदे न सू चतं यत् एताः एव न, अपराः अ प स न्त।
पाठेgसप्त
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क्र. प्राकृतभाषा पाठ म इसके वषय म क्या कहा गया
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के वल नाम िदया गया है। (‘आष’ = ऋिषयों की — सबसे पुर ानी पाकृ त, िजसे अध मागधी से जोड़ ा जाता है)
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१ आषपाकृ तम्
२ मागधीपाकृ तम्
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के वल नाम। (मगध की भाषा; ‘अध मागधी’ नाम इसी से बना है — ‘आधी मागधी’)
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३ शौरसे नीपाकृ तम् शौरसे नीपाकृ ते बहवः नाट गन्थाः रिचताः सिन्त — इसमें अनेक नाटक -गन्थ रचे गए (शूर से न = मथुर ा का क्षेत्र)
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emपैशािचपाकृतम्
४ महारा ीपाकृ तम् महाकिवः हालः ‘गाथास प्तशती’ इित सुपिस द्धं काव्यं िलिखतवान् — इसमें महाकिव हाल ने गाथास प्तशती िलखी
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a gl ५ के वल नाम िदया गया है
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के वल नाम िदया गया है
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६ चूिलकापाकृ तम्
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अपभंशपाक तम् ‘इ यादयः’ के साथ अि तम नाम — पाकृ त की सबसे बाद की अव था
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त् न् स्
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तथा — जैनागमाः अधमागधी भाषायां लaखताः — इ त अष्टमी भाषा नामतः पाठे आगता, यद्य प सा सूचीमध्ये न ग णता।
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इस सूची को क्रम म दे खए: यह केवल नाम क सूची नह , भारतीय भाषा-इ तहास का एक पूरा सोपान है। सबसे
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.cश से आगे आज क भाषाएँ — हन्द , मराठ , गुजराती, बाङ् ग्ला, पंजाबीaआg द। इसी लए सूची म
ऊपर संस्कृत; उससे नकली अनेक प्राकृत (मागधी, शौरसेनी, महाराष्ट्री …); उनक अ न्तम अवस्था अप ंश; और
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ase‘अपभ्रंशप्राकृतम्’ अन्त म रखा गया है — वही आज क भाषाओं क माँ है। इस दृ ष्ट से दे खए तो ‘णमो’ का ‘ण’
अपभ्रं
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और हन्द के ‘काम’ (कम → कम्म → काम) म एक ही यात्रा दख जाएगी।
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प्र.3 “एवं संस्कृतं य द
a ोत स्वनी नद , त ह प्राकृतं तस्या एव सरलः प्रवाहः अ स्त। उभयोमध्ये अ व च्छ ः सम्बन्धः
अ स्त।” — अस्य वाक्यस्य आशयं भावं च स्पष्टीकुरुत।
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emअ स्त। उभयोः मध्ये अ व च्छ ः — कदा प न व च्छ ः — सम्बन्धः अ स्त।
आशयः — य द संस्कृतं वेगवती ोत स्वनी नद अ स्त, त ह प्राकृतं तस्याः एव सरलः, मन्दः, सुखेन प्रवहमाणः प्रवाहः
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agl ( हन्द — य द संस्कृत एक बहती हुई नद है, तो प्राकृत उसी नद का सरल प्रवाह है। दोन के बीच का सम्बन्ध कभी टूटा नह है —
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वह अ व च्छन्न है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम् AglaSem · NCERT Solutions
उपमा का अंश कसके लए क्या कहना चाहता है
ोतिस्वनी नदी संस्कृतम् मूल ोत, िजससे जल िनकलता है — व्याकरण से बँध ी, पिर ष्कृ त भाषा
सरलः पवाहः प्राकृतम् उसी जल का सहज बहाव — बोलने में आसान, जन-जन तक पहच
ु ँ ी भाषा
अिविच्छन्नः सम्बन्धः उभयोः दोनों अलग निदयाँ नही,ं एक ही जलधारा के दो रूप
भावः — उपमा इतनी सट क क्य है: नद और उसका प्रवाह दो वस्तुए ँ नह ह — जल एक ही है, बस कह वह
पहाड़ म तेज़ और सँकरा है, कह मैदान म धीमा और चौड़ा। ठ क वैसे ही संस्कृत और प्राकृत दो अलग भाषाएँ नह ,
एक ही भा षक धारा क दो अवस्थाएँ ह। ‘सव’ का ‘सव्व’, ‘लोके’ का ‘लोए’, ‘साधु’ का ‘साहु’ — इन्ह दे खकर
तुरन्त समझ आता है क शब्द वही है, केवल बहाव सरल हो गया है। और उपमा का अ न्तम शब्द ‘अ व च्छ ः’
सबसे महत्त्वपूण है : प्राकृत संस्कृत से टू टकर नह बनी, वह उसी से लगातार बहती रही — और आज भी बह रही है,
क्य क हमारी हन्द उसी प्रवाह का अगला मोड़ है।
व्याकरण-सङ् केत: ‘ ोत स्वनी’ = ोतस् + वनी — ‘ जसम धारा हो’, नद का पयाय। ‘उभयोमध्ये’ = उभयोः +
मध्ये ( वसगस न्ध — अः के स्थान पर र्, फर र् + म्)। ‘अ व च्छन्नः’ = न व च्छन्नः (नञ्-तत्पुरुष) — ‘जो टू टा
हुआ न हो’। ‘तस्या एव’ = तस्याः + एव ( वसगलोप)।
संस्कृत-वाक्यानां प्राकृतानुवादः — पृष्ठ 139
षड् वाक्या न — संस्कृतम् / प्राकृतम्, तथा तेभ्यः नष्प ाः नयमाः
अत्र इदम् अवधे य म्
प्र.1 पुस्तके दत्ता न षड् संस्कृत-वाक्या न तेषां च प्राकृत-अनुवादान् लखत, प्र तवाक्यं पदशः व ेषणं च कुरुत।
पुस्तक क मूल ता लका (ज्य क त्य ) —
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क्र. संस्कृतम् प्राकृतम्
(१) अहं िवद्यालयं गच्छािम। अहं िवज्जालयं गच्छािम / गच्छिम / गच्छे िम / गच्छं।
(२) सः जलं िपबित। सो जलं िपवइ।
(३) बालकः पद्यं पठित। बालओ पोत्थं पढइ / पढए / पढिद / पढदे ।
(४) भवान् कु त्र गच्छित। भवतो क त्थ गच्छउ।
(५) अहं फलािन खादािम। अहं फलाइं / फलािण खािम।
(६) एतत् मम िमत्रम् अिस्त। एसो मम / म ज्झ िम त्त ो / िम त्त ं अित्थ।
अब पद-दर-पद —
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संस्कृत- प्राकृत-पदम् क्या बदला और क्य
पदम्
िवद्यालयम् िवज्जालयं संयुक्त द्य टक नह सका — समीकरण होकर ज्ज बना ( वद्या → वज्जा)। अन्त्य म् → अनुस्वार।
गच्छािम गच्छािम / गच्छिम / उत्तमपुरुष एकवचन के प्राकृत म अनेक वकल्प — ‐आ म, ‐अ म, ‐ए म तथा केवल ‐ं। बोलचाल
गच्छे िम / गच्छं क भाषा म एक ही रूप नह जमता, इसी लए वकल्प रहते ह।
सः सो पु ल्लङ्ग प्रथमा एकवचन का ‐अः प्राकृत म सदा ‐ओ हो जाता है।
िपबित िपवइ दो स्वर के बीच का ब् → व् (लघूकरण); और ‐ त का त् लुप्त होकर ‐इ बचा। यही प्राकृत का
प्र सद्ध ‘‐इ’ अन्त है।
बालकः बालओ दो स्वर के बीच का क् लुप्त (बालक → बाल-अ), और ‐अः → ‐ओ। यही नयम ‘लोके → लोए’
म भी लगा था।
पुस्तकम् पोत्थं पुस्तकम् → पोत्थ‐ : संयुक्त स्त → त्थ, और ‐क‐ लुप्त। (पुस्तक क संस्कृत-पं क्त पर नीचे
टप्पणी दे खए।)
पठित पढइ / पढए / पढिद / दो स्वर के बीच का ठ् → ढ् (महाप्राण का घोषीकरण)। अन्त म चार वकल्प — ‐इ तथा ‐ए
पढदे (अधमागधी/महाराष्ट्री), ‐ द तथा ‐दे (शौरसेनी)। अथात् एक ही क्रया अलग-अलग प्राकृत म
अलग दखती है।
कु त्र क त्थ संयुक्त त्र → त्थ; और उ → अ (कुत्र → कत्थ)।
फलािन फलाइं / फलािण दो रूप — या तो न् लुप्त होकर ‐आइं, या न् → ण् होकर ‐आ ण। नपुंसक बहुवचन के ये दोन
रूप प्राकृत म चलते ह।
खादािम खािम दो स्वर के बीच का द् पूरा लुप्त (खाद → खा)।
एतत् / एषः एसो ष् → स् (तीन ऊष्म वण प्राकृत म एक ‘स’ हो जाते ह); ‐अः → ‐ओ।
मम / मह्यम् मम / म ज्झ ‘मम’ ज्य का त्य भी चला, और ‘मह्यम्’ से मज्झ बना (ह्य → ज्झ, वही समीकरण जो ‘उपाध्याय
→ उवज्झाय’ म था)।
िमत्रम् िम त्त ं / िम त्त ो संयुक्त त्र → त्त। नपुंसक रख तो ‘ मत्तं’, पु ल्लङ्ग कर तो ‘ मत्तो’ — प्राकृत म यह शब्द दोन लङ्ग
म चलता है।
अिस्त अित्थ संयुक्त स्त → त्थ ( स बलट अपनी महाप्राणता आगे वाले वण को दे दे ता है), और ‐ त → ‐ थ।
छठे वाक्य पर वशेष ध्यान: संस्कृत म ‘एतत् मम मत्रम् अ स्त’ — दोन पद नपुंसक लङ्ग ह। प्राकृत म पुस्तक ने
‘एसो … मत्तो’ भी दया है, जो पु ल्लङ्ग है। यह भूल नह — प्राकृत म नपुंसक लङ्ग धीरे-धीरे घटता गया और बहुत-
से नपुंसक शब्द पु ल्लङ्ग म चले गए। इसी लए वही वाक्य दो रूप म मलता है — ‘एसो … मत्तो अ त्थ’ (पु ल्लङ्ग)
तथा ‘एअं … मत्तं अ त्थ’ (नपुंसक)। यही प्रवृ त्त आगे बढ़कर हन्द तक पहुँची — इसी लए हन्द म नपुंसक लङ्ग
बचा ही नह , केवल पु ल्लङ्ग और स्त्री लङ्ग रह गए। एक छोट -सी ता लका भाषा-इ तहास का इतना बड़ा मोड़ दखा
दे ती है।
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पुस्तक क एक वसंग त (ध्यान से प ढ़ए): तीसरे वाक्य म संस्कृत पं क्त है ‘बालकः पद्यं पठ त’ और प्राकृत
पं क्त है ‘बालओ पोत्थं पढइ’। कन्तु ‘पोत्थ’ का मूल पुस्तक है, ‘पद्य’ नह — ‘पद्य’ से प्राकृत म ‘पज्जं’ बनता (द्य
→ ज्ज, जैसे वद्या → वज्जा)। अतः या तो संस्कृत पं क्त ‘बालकः पुस्तकं पठ त’ होनी चा हए, या प्राकृत पं क्त
‘बालओ पज्जं पढइ’। परीक्षा म पुस्तक क पं क्त ज्य क त्य ल खए, कन्तु यह अन्तर जान ली जए — इसी से
पता चलता है क आपने नयम समझा है, केवल जोड़ी याद नह क । इसी प्रकार चौथे वाक्य का ‘गच्छउ’ रूप भी
ध्यान दे ने योग्य है : प्रथमपुरुष एकवचन का सामान्य प्राकृत रूप ‘गच्छइ’ होता है (जैसे ‘ पवइ’, ‘पढइ’); ‘‐उ’ वाला
अन्त अपभ्रंश क ओर झुकता है।
प्र.2 उपयुक्तानां वाक्यानां तथा णमोकारमन्त्रस्य आधारेण संस्कृत-प्राकृत-सम्बन्धस्य नयमानां सङ् क्षप्ता सारणी
रचयत, नूतना न उदाहरणा न च योजयत।
नयम-सारणी (संस्कृत → प्राकृत) — पाठ के अपने उदाहरण स हत
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम्
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क्र. नयम पाठ का उदाहरण
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एक और उदाहरण
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(अभ्यास
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a द्e, प्, य्, व् — लुप्त या दुबल
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१ दो स्वरों के बीच का क् , ग्, च्, ज्, त्, लोके → लोए · बालकः → बालओ · खादािम → खािम · नगरम् → णअरं · लता →
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िपबित → िपवइ · आचाय → आयिरय · उपाध् याय → लआ · कपोतः → कवोओ
उवज्झाय
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२ दो स्वरों के बीच का महापाण ख्, घ्, साधूनाम् → साहूणं मुखम् → मुहं · मेघः → मेहो
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थ्, ध्, फ् , भ् → ह् · कथा → कहा
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३ संयक्ु त व्यंजन का समीकरण — aिवglा → िव जा · िम म् → िम ं · अि त → अि थ ·
द्य ज् त्र त्त स् त् कम → कम्म · धम → धम्म
· शब्दः → स ो
िद्वत्व बन जाता है कु त्र → क त्थ · अध् याय → ज्झाय · म ह्यम् → म ज्झ
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सूयः → सुज्जो · अथः →
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४ व्यंजन से पहले का र् लुप्त, आगे सवसाधूनाम् → स व्वसाहूणं
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वाला व्यंजन दुग नु ा
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a s emकिठन संयक्ु त कभी स्वरभिक्त से
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५ आचाय णाम् → आयिरयाणं (य → िरय) स्नेहः → सणेहो · रत्नम् →
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खुल भी जाता है रयणं
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नमः → णमो · ‐आनाम् → ‐आणं · फलािन → फलािण नरः → णरो · ज्ञानम् →
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६ न् → ण्
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aएषःs→ एसो
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७ श्, ष्, स् — तीनों िमलकर एक स् पुरुषः → पु रसो · शतम् →
सयं
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८ ऋ, ऐ, औ नही ं रहते; उनके स्थान पर अहत् → अिरहन्त ऋषभः → उसहो · कृतम् →
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अ/इ/उ या ए/ओ कयं
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९ .c शब्दान्त में के वल अनुस्वार बचता है िम म् → िम ं · िव ालयम् → िव जालयं a g l
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त्र त्त द्य ज् फलम् → फलं · गृहम् →
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घरं
१० रूप-पत्यय भी सरल होते है ं — ‐अः सः → सो · पठित → पढइ · िस द्धानाम् → िस द्धाणं गजः → गओ · वद त →
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→ ‐ओ, ‐ित → ‐इ, ‐आनाम् →
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वयइ
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‐आणं
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इन दस नयम म एक ही प्रवृ त्त है — कम मेहनत म बोलना। ध्यान द जए, हर नयम जीभ का काम घटाता है :
संयुक्त व्यंजन बोलने म क ठन ह, इस लए वे दुगुने सरल वण बन गए (कम → कम्म); स्वर के बीच रुकना क ठन है,
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इस लए बीच का व्यंजन गर गया (लोके → लोए); महाप्राण कण्ठ से ज़ोर माँगते ह, इस लए वे केवल ‘ह’ रह गए
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(मुख → मुह)। भाषा-प रवतन मनमाना नह होता — वह इसी श्रम-लाघव के नयम से चलता है। और यही प्र क्रया
a s em प्राकृत पर रुक नह : ‘कम्म’ आगे चलकर हन्द का ‘काम’ बना, ‘मुह’ से ‘मुँह’, ‘घरं’ से ‘घर’, ‘सव्व’ से ‘सब’।
agl अथात् आप जब हन्द बोलते ह, तब भी उसी नद का पानी बह रहा होता है जसे पुस्तक ने ‘ ोत स्वनी’ कहा।
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स्वयं करके दे खए (अभ्यास): इन नयम से नम्न संस्कृत शब्द के प्राकृत रूप बनाइए और फर मलाइए — धमः
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(→ धम्मो), ज्ञानम् (→ णाणं), राजाem
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gl — यही उत्तर का असली अंश है, केवल रूप नह ।
(→ राया), वचनम् (→ वयणं), सत्यम् (→ सच्चं), भगवान् (→ भयवं)।
नयम बताइए क कौन-सा aलगा
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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 139
प्रश्न १ — एकपदे न उत्तरं लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.1 (क) ऋषभेण न मतस्य नगरस्य नाम कम् ?
व नता। ( हन्द — व नता।)
पाठस्य प्रमाणम् — ‘एवम् ऋषभस्य दक्षशासनेन कौशलेन च व नतानाम्नः नगरस्य नमाणम् अभवत्।’ (पृ. 130)
एकपद-उत्तर क शत: प्रश्न ‘नाम कम्’ पूछता है, अतः उत्तर केवल नाम होगा — ‘ व नता’। पूरा वाक्य लखने क
आवश्यकता नह । य द पूरा वाक्य माँगा जाता तो — ‘ऋषभेण न मतस्य नगरस्य नाम व नता आसीत्।’ यही नगर
आगे भरत को दया गया — ‘ व नता राज्यं भरताय … समप्य’।
प्र.1 (ख) ऋषभस्य प्र सद्धे द्वे कन्ये के ?
ब्राह्मी सुन्दरी च। ( हन्द — ब्राह्मी तथा सुन्दरी।)
पाठस्य प्रमाणम् — ‘तथैव ऋषभस्य पुत्रीषु ब्राह्मी सुन्दरी चे त द्वे कन्ये अ प ग णता दषु शास्त्रेषु प्रवीणे प्र सद्धे च आस्ताम्।’ (पृ.
130)
व्याकरण-सङ् केत: प्रश्न म ‘ े कन्ये के’ — यह द्ववचन का प्रश्नरूप है ( कम् शब्द, स्त्री लङ्ग, प्रथमा वचन =
के)। अतः उत्तर भी वचन म ही — ‘ब्राह्मी सुन्दरी च’। पाठ ने उन्ह ‘ग णता दषु शास्त्रेषु प्रवीणे’ कहा है, अथात् वे
ग णत आ द शास्त्र म नपुण थ ।
प्र.1 (ग) कस्यां लप्यां नैका न शास्त्रा ण ल पबद्धा न ?
ब्राह्मी लप्याम् (ब्राह्म्याम्)। ( हन्द — ब्राह्मी ल प म।)
पाठस्य प्रमाणम् — ‘जैनसम्प्रदायानुगुणं ब्राह्मी लप्याः वकासः ब्राह्मी ारैव कृता इ त श्रूयते। तस्यामेव लप्यां शलालेखाः
उपलभ्यन्ते।’ (पृ. 130)
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उत्तर सप्तमी म ही क्य : प्रश्न ‘कस्याम्’ से आरम्भ होता है — यह सप्तमी वभ क्त, स्त्री लङ्ग, एकवचन है।
नयम है «अ धकरणे सप्तमी» — आधार बताने वाला पद सप्तमी म आता है। अतः उत्तर भी सप्तमी म —
‘ब्राह्मी लप्याम्’, न क ‘ब्राह्मी ल पः’। यही बात प्रश्न २ के अन्य भाग म भी लागू होती है। (‘नैका न’ = न + एका न
— ‘एक नह , अनेक’।)
प्र.1 (घ) व नता नामकं राज्यं ऋषभः कस्मै सम पतवान् ?
भरताय। ( हन्द — भरत को।)
पाठस्य प्रमाणम् — ‘ वशेषतया व नता राज्यं भरताय तक्ष शलां बाहुबलये च समप्य जीवनस्य परमसत्यम् अन्वेष्टुं प्र स्थतोऽयं
महामु नः।’ (पृ. 131)
कारक- नयम: प्रश्न ‘कस्मै’ है — चतुथ एकवचन। नयम है «कमणा यम भप्रै त स सम्प्रदानम्» तथा «सम्प्रदाने
चतुथ » — जसे कोई वस्तु द जाए, वह चतुथ म आता है। अतः उत्तर ‘भरताय’ (न क ‘भरतः’ या ‘भरतम्’)। इसी
नयम से ‘बाहुबलये’ भी चतुथ म है।
प्र.1 (ङ) ऋषभः बाहुब लने क राज्यं प्रदत्तवान् ?
तक्ष शलाम्। ( हन्द — तक्ष शला।)
पाठस्य प्रमाणम् — ‘ व नता राज्यं भरताय तक्ष शलां बाहुबलये च समप्य …।’ (पृ. 131)
कारक- नयम: यहाँ प्रश्न ‘ कम् राज्यम्’ है, अथात् कम पूछा जा रहा है — ‘क्या दया?’। नयम है «कम ण
तीया», अतः उत्तर तीया वभ क्त म — ‘तक्ष शलाम्’। ध्यान द जए, इसी वाक्य म ‘बाहुबलये’ चतुथ ( जसे
दया) और ‘तक्ष शलाम्’ तीया (जो दया) है — एक ही वाक्य म दोन कारक साथ दखते ह।
प्र.1 (च) प्रजाः भक्षायां का न वस्तू न यच्छ न्त स्म ?
आभरणा न अनघवस्तू न च। ( हन्द — आभूषण तथा अनमोल वस्तुए।ँ )
पाठस्य प्रमाणम् — ‘परं तत्रत्याः जनाः तेषां प्रयं महाराजं दृष्ट् वा भक्षायां क दातव्य म त सम्भ्रान्ताः सन्तः तस्मै आभरणा न
अनघवस्तू न च यच्छ न्त स्म।’ (पृ. 132)
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इस उत्तर क चुभन: प्रजा ने जो दया वह मूल्यवान् था, कन्तु अनुपयोगी था — भक्षु को आभूषण नह , भोजन
चा हए। पाठ अगला वाक्य ही यह जोड़ता है — ‘परं भक्षायां भोजनपदाथः दे यः इ त न केना प च न्ततम्।’ यही
कारण है क ऋषभदे व को दन- दन उपवास करना पड़ा और एक बार चार सौ दन का नरन्तर उपवास हुआ।
(‘यच्छ न्त स्म’ = √दा धातु का ‘यच्छ’ रूप + स्म = ‘दे ते थे’।)
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 139
प्रश्न २ — पूणवाक्येन प्रश्नानाम् उत्तरा ण लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.2 (क) दे शे काः समस्याः स न्त इ त ऋषभदे वस्य कल्पना प्राप्ता ?
जनानाम् आलस्यम्, कृ षकाय न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः च — एताः एव दे शस्य मूलसमस्याः स न्त इ त
ऋषभदे वस्य स्पष्टा कल्पना प्राप्ता।
( हन्द — लोग का आलस्य, खेती म कमी और प्रजा म उत्पादन-क्षमता का अभाव — यही दे श क मूल समस्याएँ ह, ऐसी स्पष्ट
धारणा ऋषभदे व को प्राप्त हुई।)
पाठस्य प्रमाणम् — ‘तेन का चत् स्पष्टकल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यं, कृ षकाय न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः
अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः स न्त इ त।’ (पृ. 128)
ध्यान दे ने योग्य बात: ऋषभदे व ने दु भक्ष को समस्या नह , समस्या का लक्षण माना। असली जड़ तीन थ और
तीन मनुष्य के अपने व्यवहार म थ — आलस्य, खेती क उपेक्षा और उत्पादन-क्षमता का अभाव। इसी लए आगे
उन्ह ने अन्न नह बाँटा, कौशल सखाया। उत्तर लखते समय तीन समस्याएँ गनाना आवश्यक है — एक भी छू ट तो
उत्तर अधूरा है।
प्र.2 (ख) महाराजः केषु कायषु प्रजाः प्र श क्षतवान् ?
महाराजः ऋषभदे वः कृ षकाय, व वधपदाथः भोजन नमाणे, तन्तु भः वस्त्र नमाणे, गवाम् अश्वाद नां पशूनां पालने, काष्ठैः
धातु भः शला भः च गृहोपयो गनां वस्तूनां नमाणे, पात्र नमाणे, गृह नमाणे नगर नमाणे च — एतेषु जीवनकौशलेषु प्रजाः
प्र श क्षतवान्।
( हन्द — महाराज ऋषभदे व ने प्रजा को खेती, तरह-तरह के पदाथ से भोजन बनाना, धाग से वस्त्र बनाना, गाय-घोड़े आ द पशुओं
का पालन, लकड़ी-धातु-पत्थर से घर क उपयोगी वस्तुएँ बनाना, बतन बनाना, घर बनाना और नगर बसाना — इन जीवन-कौशल म
प्र श क्षत कया।)
पाठस्य प्रमाणम् — ‘ वशेषरूपेण कृ षकाय, व वधपदाथः भोजन नमाणं, तन्तु भः वस्त्र नमाणं, गवाम् अश्वाद नां पशूनां पालनं
चेत्याद न जीवनकौशला न प्र श क्षतवान्। काष्ठैः धातु भः शला भः च गृहोपयो गनां वस्तूनां नमाणं, पात्र नमाणं, गृह नमाणं,
नगर नमाणा दकं च प्र श क्षतवान्।’ (पृ. 128–129)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम् AglaSem · NCERT Solutions
व्याकरण-सङ् केत: प्रश्न ‘केषु कायषु’ — सप्तमी बहुवचन। अतः उत्तर के सब पद भी सप्तमी बहुवचन/एकवचन म
र खए — ‘कृ षकाय, भोजन नमाणे, वस्त्र नमाणे …’। य द पाठ के वाक्य को ज्य का त्य उतारगे तो वे तीया
(कृ षकाय, वस्त्र नमाणं) म मलगे, क्य क वहाँ वे ‘प्र श क्षतवान्’ के कम ह। प्रश्न के अनुसार वभ क्त बदलना ही
पूणवाक्य-उत्तर क कसौट है।
प्र.2 (ग) ऋषभदे वस्य जीवनप रव तनी घटना का आसीत् ?
राजप्रासादे आयो जते नृत्यकलाप्रदशने का चत् नतक नृत्यकलां प्रदशयन्ती सहसा भूमौ प तत्वा मृता — इयम् एव
ऋषभदे वस्य जीवनप रव तनी घटना आसीत्।
( हन्द — राजमहल म आयो जत नृत्यकला-प्रदशन म कोई नतक नृत्य दखाते- दखाते अचानक भू म पर गरकर मर गई — यही
ऋषभदे व के जीवन को बदल दे ने वाली घटना थी।)
पाठस्य प्रमाणम् — ‘एकदा ऋषभदे वः राजप्रासादे नृत्यकलाप्रदशनम् आयो जतवान्। तत्र आगता का चत् नतक नृत्यकलां
प्रदशयन्ती सहसा भूमौ प तत्वा मृता। अनया घटनया ऋषभदे वस्य मनः सहसा वक्षुब्धम् अभवत्।’ (पृ. 131)
उत्तर म यह जोड़ना उत्तम रहेगा: केवल घटना बताकर रु कए मत — उसका प रणाम भी एक वाक्य म जो ड़ए :
‘अनया घटनया तस्य मनः वक्षुब्धम् अभवत्, “इह संसारे कम प शाश्वतं ना स्त” इ त व चन्त्य सः सव प रत्यज्य
भक्षुरूपेण प्र स्थतवान्।’ इससे उत्तर पूरा हो जाता है — घटना, प्रभाव और नणय, तीन ।
प्र.2 (घ) ऋषभदे वस्य द घका लकस्य उपवासस्य समा प्तः कथम् अभवत् ?
एकदा पयटनावसरे ऋषभदे वः ह स्तनापुरस्य समीपे स्थतस्य इक्षुक्षेत्रस्य पाश्वमागात् गच्छ त स्म। तत् इक्षुक्षेत्रं तस्यैव
प्रपौत्रस्य श्रेयांसस्य आसीत्। सः श्रेयांसः प्र पतामहाय पानाथम् इक्षुरसं दत्तवान्। अनेन इक्षुरसेन ऋषभदे वस्य द घका लकः
उपवासः समाप्तः अभवत्।
( हन्द — एक बार भ्रमण के समय ऋषभदे व ह स्तनापुर के पास स्थत गन्ने के खेत के बगल के माग से जा रहे थे। वह खेत उन्ह के
प्रपौत्र श्रेयांस का था। श्रेयांस ने अपने प्र पतामह को पीने के लए गन्ने का रस दया। इसी गन्ने के रस से ऋषभदे व का द घकालीन
उपवास समाप्त हुआ।)
अ धकं ज्ञातव्यम् — तत् दनं वैशाखमासस्य अक्षयतृतीया आसीत्। अतः जैनसम्प्रदाये ‘व षतप-पारणा-महोत्सवः’ अधुना प
गुजराते पद लप्तपुरम् (पालीताणा), उत्तरप्रदे शे ह स्तनापुरम् इत्या दषु प वत्रतीथषु आचयते।
ध्यान द: प्रश्न ‘कथम्’ पूछता है — अथात् ‘ कस प्रकार’। इस लए उत्तर म क्रया-क्रम आना चा हए : कहाँ जा रहे
थे → कसका खेत था → कसने क्या दया → उससे क्या हुआ। केवल ‘इक्षुरसेन’ लख दे ना अधूरा उत्तर है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम्
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ऋषभदे वः कदा कुत्र च केवलज्ञानं प्राप्तवान् ?
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प्र.2 (ङ)
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agl वः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।
ऋषभदे
( हन्द — ऋषभदे व ने फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष क एकादशी त थ को प्रयागराज म अक्षयवट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त
कया।)
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पाठस्य प्रमाणम् — ‘एवं द घका लकोपवासेन नरन्तराध्ययनेemन कठोरतपसा च ऋषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां
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तथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।’ (पृ. 133)
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प्रश्न म दो प्रश्न छपे ह: ‘कदा’ (कब) तथा ‘कुत्र’ (कहाँ)। इस लए उत्तर म दोन होने चा हए — समय (फाल्गुन
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कृष्ण एकादशी) और स्थान (प्रयागराज, अक्षयवट के नीचे)। साथ म साधन भी जोड़ द तो उत्तर और पूण होगा :
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‘द घका लकोपवासेन नरन्तराध्ययनेन कठोरतपसा च’ — केवलज्ञान अचानक नह मला, तप से मला।
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जनानां मागदशनाथ कं क्रमं र चतवान् ?
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प्र.2 (च)
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ऋषभदे वः जनानां मागदशनाथ भक्षुः, भक्षुणी, श्रावकः, श्रा वका चे त चतु वधं क्रमं र चतवान्। स एव क्रमः ‘जैनसङ् घः’
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इ त प्र सद्धः वतते।
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( हन्द — ऋषभदे व ने लोग के मागदशन के लए भक्षु, भक्षुणी, श्रावक और श्रा वका — यह चार प्रकार का क्रम बनाया। वही क्रम
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‘जैनसंघ’ नाम से प्र सद्ध है।)
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पाठस्य प्रमाणम् — ‘ऋषभदे वः जनानां मागदशनाथ भक्षुः भक्षुणी श्रावकः श्रा वका चे त क्रमं र चतवान्। स एव क्रमः
a gl नसङ् घः इ त प्र सद्धः वतते।’ (पृ. 133)
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उत्तर म ‘जैनसङ् घः’ अवश्य ल खए — पाठ का अगला वाक्य यही जोड़ता है, और प्रश्न ‘कं क्रमम्’ का पूरा उत्तर
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तभी बनता है। शब्दाथ-ता लका म ‘सङ् घः = समूहः’ (Community) दया है।
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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 140
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प्रश्न ३ — समस्तपदा न लखत ( वग्रहवाक्यम् → समस्तपदम्)
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अभ्यासाद् जायते स द्धः
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वग्रहवाक्यम् — महान् च असौ राजा च । समस्तपदम् लखत।
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प्र.3 (क)
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महाराजः। ( हन्द — महाराज।)a
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समासस्य नाम — कमधारयः ( वशेषण- वशेष्यभावः, तत्पुरुषस्य एकः भेदः)।
यह कमधारय ही क्य : कमधारय क पहचान यह है क दोन पद एक ही व्य क्त/वस्तु के लए आते ह और एक
ही वभ क्त म रहते ह — यहाँ ‘महान्’ ( वशेषण) तथा ‘राजा’ ( वशेष्य) दोन उसी एक राजा के लए ह। वग्रह म
आया ‘च … च’ तथा ‘असौ’ भी इसी क पहचान है। समास बनते समय ‘महत्’ का ‘महा’ आदे श होता है (महत् +
राजन् → महाराजः) — यही नयम ‘महाक वः’, ‘महाजनः’, ‘महाराष्ट्रम्’ म भी लगता है।
पाठ म कहाँ: ‘एतादृशस्य महाराजस्य पुत्राः अ प शौयण पराक्रमेण बु द्धबलेन च वश्वप्र सद्धाः आसन्।’ (पृ. 130);
तथा प्रश्न ४ (क) म ‘महाराजेन राज्यं सम पतम्’।
प्र.3 (ख) वग्रहवाक्यम् — प्रजानां सुखम् । समस्तपदम् लखत।
प्रजासुखम्। ( हन्द — प्रजा का सुख।)
समासस्य नाम — षष्ठी-तत्पुरुषः।
पहचान का सूत्र: वग्रह म जो वभ क्त दखे, तत्पुरुष का नाम उसी वभ क्त पर पड़ता है। यहाँ ‘प्रजानाम्’ षष्ठी म
है, अतः यह षष्ठी-तत्पुरुष है। समास बनते समय पूवपद क वभ क्त लुप्त हो जाती है — प्रजानाम् + सुखम् →
प्रजासुखम्। इसी सूत्र से आगे (घ) ‘भोजनस्य नमाणम्’ भी षष्ठी-तत्पुरुष है और (छ) ‘ व धना ल खतम्’ तृतीया-
तत्पुरुष।
पाठ म कहाँ: ोक — ‘प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हते हतम्।’ (पृ. 129)
प्र.3 (ग) वग्रहवाक्यम् — मूलाः समस्याः । समस्तपदम् लखत।
मूलसमस्याः। ( हन्द — मूल समस्याएँ।)
समासस्य नाम — कमधारयः ( वशेषण पूवपद)।
क्य कमधारय, तत्पुरुष नह : ‘मूलाः’ तथा ‘समस्याः’ दोन प्रथमा बहुवचन म ह और दोन एक ही वस्तु —
समस्याओं — के लए ह। जहाँ पूवपद वशेषण हो और दोन क वभ क्त समान हो, वहाँ कमधारय होता है। य द
वग्रह ‘मूलस्य समस्याः’ होता, तब वह षष्ठी-तत्पुरुष कहलाता। वग्रह क वभ क्त दे खकर ही नाम तय क जए।
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पाठ म कहाँ: ‘… चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः स न्त इ त। अतः सः मूलसमस्यानां प रष्काराय … योजनाः
र चतवान्।’ (पृ. 128)
प्र.3 (घ) वग्रहवाक्यम् — भोजनस्य नमाणम् । समस्तपदम् लखत।
भोजन नमाणम्। ( हन्द — भोजन बनाना।)
समासस्य नाम — षष्ठी-तत्पुरुषः।
पाठ म कहाँ: ‘ वशेषरूपेण कृ षकाय, व वधपदाथः भोजन नमाणं, तन्तु भः वस्त्र नमाणं …।’ (पृ. 128)
इसी ढाँचे के और शब्द पाठ म ह: वस्त्र नमाणम् (वस्त्रस्य नमाणम्), पात्र नमाणम् (पात्रस्य नमाणम्),
गृह नमाणम् (गृहस्य नमाणम्), नगर नमाणम् (नगरस्य नमाणम्) — सब षष्ठी-तत्पुरुष। एक ढाँचा पकड़ लेने पर
पाँच शब्द अपने आप खुल जाते ह; यही समास पढ़ने का सही तरीका है।
प्र.3 (ङ) वग्रहवाक्यम् — आ थक स्थ तः । समस्तपदम् लखत।
आ थक स्थ तः। ( हन्द — आ थक स्थ त।)
समासस्य नाम — कमधारयः ( वशेषण पूवपद)।
‘आ थक ’ का ‘आ थक’ क्य हो गया — यह प्रश्न का असली मम है: वग्रह म वशेषण स्त्री लङ्ग है (आ थक◌ी
स्थ तः), क्य क ‘ स्थ त’ स्त्री लङ्ग है। कन्तु समास बनते समय कमधारय म पुंवद्भाव हो जाता है — अथात् स्त्री लङ्ग
वशेषण अपना पु ल्लङ्ग रूप ले लेता है। इसी लए ‘आ थक ’ → ‘आ थक’ और समस्तपद बना आ थक स्थ तः।
यही कारण है क पाठ भी ‘आ थक स्थ तः’ ही लखता है, ‘आ थक स्थ तः’ नह ।
पाठ म कहाँ: ‘क्रमशः जनानाम् आ थक स्थ तः अ प सुदृढा जाता।’ (पृ. 129)
प्र.3 (च) वग्रहवाक्यम् — प्राप्तः आनन्दः येन सः । समस्तपदम् लखत।
प्राप्तानन्दः। ( हन्द — जसे आनन्द प्राप्त हो गया हो, वह।)
समासस्य नाम — बहुव्री हः।
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बहुव्री ह क अचूक पहचान: वग्रह म ‘येन सः’, ‘यस्य सः’, ‘य स्मन् सः’ जैसा सम्बन्धवाचक पद आ जाए — तो
समास बहुव्री ह है। कारण यह है क बहुव्री ह म अथ कसी तीसरे का होता है, दोन पद म से कसी का नह । यहाँ
न ‘प्राप्त’ का अथ मुख्य है, न ‘आनन्द’ का — मुख्य है वह व्य क्त जसे आनन्द प्राप्त हुआ, अथात् ऋषभदे व। इसी
ता लका म एक और बहुव्री ह है — ‘अधीत वद्यः’ (अधीता वद्या येन सः)।
पाठ म कहाँ: ‘एवं सव न्मुखसमृ ा ऋषभदे वः जीवने प्राप्तानन्दः परमसुखी च आसीत्।’ (पृ. 130)
प्र.3 (छ) वग्रहवाक्यम् — व धना ल खतम् । समस्तपदम् लखत।
व ध ल खतम्। ( हन्द — भाग्य का लखा हुआ।)
समासस्य नाम — तृतीया-तत्पुरुषः।
नाम वभ क्त से तय होता है: वग्रह म ‘ व धना’ तृतीया वभ क्त म है (‘ व ध के ारा’), इस लए समास तृतीया-
तत्पुरुष कहलाया। इस समास म उत्तरपद प्रायः कृदन्त होता है — ल खतम्, कृतम्, युक्तम्, पी डतम्। जैसे —
‘ह रणा त्रातः = ह रत्रातः’, ‘शङ् कुलया खण्डः = शङ् कुलाखण्डः’। पुस्तक क शब्दाथ-ता लका भी यही नाम दे ती है
— ‘ व ध ल खतम् (तृतीया-तत्पुरुषः)’।
पाठ म कहाँ: ‘परं को वा जाना त व ध ल खतम्।’ (पृ. 130) — अथात् ‘पर भाग्य का लखा कौन जानता है!’
प्र.3 (ज) वग्रहवाक्यम् — गृहं गृहं प्र त । समस्तपदम् लखत।
प्र तगृहम्। ( हन्द — घर-घर, प्रत्येक घर म।)
समासस्य नाम — अव्ययीभावः (वीप्सायाम् — पुनरावृ त्त के अथ म)।
अव्ययीभाव क्य और कैसे: जस समास का पूवपद अव्यय हो और पूरा समास ही अव्यय बन जाए, वह
अव्ययीभाव है। यहाँ पूवपद ‘प्र त’ अव्यय है। और अथ है वीप्सा — अथात् ‘बार-बार, हर एक’। इसी लए वग्रह म
‘गृहं गृहम्’ दो बार आया है। समस्तपद सदा नपुंसक लङ्ग, एकवचन, तीया रूप म रहता है — ‘प्र तगृहम्’। इसी
प्रकार — ‘ दनं दनं प्र त = प्र त दनम्’, ‘वष वष प्र त = प्र तवषम्’ (यह शब्द भी पाठ म है — ‘प्र तवषम् अप्रैल-
मासस्य नवमे दनाङ् के …’)।
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पाठ म कहाँ: ‘ग्रामेषु प्र तगृहं गत्वा भक्षां प्राप्य जीवनं नवतय न्त स्म।’ तथा ‘मौनेन प्र तगृहं भक्षायाचनम्
आरब्धवान्।’ (पृ. 132)
प्र.3 (झ) वग्रहवाक्यम् — ब्राह्मीनामा ल पः । समस्तपदम् लखत।
ब्राह्मी ल पः। ( हन्द — ब्राह्मी नाम क ल प।)
समासस्य नाम — मध्यमपदलोपी कमधारयः (पुस्तक क शब्दाथ-ता लका म यही नाम दया है — ‘ब्राह्मी ल पः मध्यपदलोपी
(कमधारयः)’)।
‘मध्यमपदलोपी’ का अथ: इस समास म वग्रह का बीच वाला पद समास बनते समय गर जाता है। यहाँ वग्रह है
‘ब्राह्मी नामा ल पः’ (ब्राह्मीनाम्नी ल पः) — कन्तु समस्तपद म ‘नामा/नाम्नी’ बचा ही नह , केवल ‘ब्राह्मी + ल पः’
रह गया। ऐसे और उदाहरण — ‘शाक प्रयः पा थवः = शाकपा थवः’, ‘गुड म श्रतः धानः = गुडधानाः’। यही इस
समास का लक्षण है और इसी लए इसका नाम ही ‘मध्यमपदलोपी’ पड़ा।
पाठ म कहाँ: ‘जैनसम्प्रदायानुगुणं ब्राह्मी लप्याः वकासः ब्राह्मी ारैव कृता इ त श्रूयते।’ (पृ. 130)
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 140
प्रश्न ४ — वाक्या न उदाहरणानुसारं प रवतयत (कमवाच्यम् → कतृवाच्यम्)। यथा — जनैः स्वयमेव नमाणकायम् आरब्धम्। → जनाः स्वयमेव
नमाणकायम् आरब्धवन्तः।
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.4 ( नयमः) उदाहरणम् — “जनैः स्वयमेव नमाणकायम् आरब्धम्। → जनाः स्वयमेव नमाणकायम् आरब्धवन्तः।”
अत्र कः प रवतनस्य नयमः ? प्रथमं नयमं लखत, ततः वाक्या न प रवतयत।
नयमः — कमवाच्यात् कतृवाच्ये प रवतनम्। पुस्तक का उदाहरण-वाक्य कमवाच्य म है और उत्तर-वाक्य कतृवाच्य म। तीन
बात एक साथ बदलती ह :
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क्या कमवाच्ये कतृवाच्ये उदाहरण
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कत की
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तृतीया (जनैः) पथमा (जनाः) जनैः → जनाः
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िवभिक्त
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aकम की प्रथमा ( नमाणकायम्) िद्वतीया (िनम णकायम्) नपुंसक म दोन रूप समान दखते ह, कन्तु स्त्री/पुं. म
िवभिक्त बदलाव स्पष्ट होगा — योजना → योजनाम्
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ि या का क्त (आरब्धम्) — कम
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तवतु (आर ब्धवन्तः) — कृतः → कृतवान् · प रव तता → प रव ततवन्तः ag
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पत्यय के अनुसार कत के अनुस ार
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पहचान का सूत्र एक ही है — क्रया कसके साथ मलेगी: कमवाच्य म क्रया (क्त-प्रत्यय वाला वशेषण) कम के
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लङ्ग-वचन से मलती है — ‘योजना कृता’ (योजना स्त्री लङ्ग, अतः ‘कृता’)। कतृवाच्य म वही क्रया (क्तवतु-प्रत्यय
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c बदलते समय सबसे पहले यह दे खए क नया कता कौन है और उसका l a
gलङ्ग-वचन क्या है — प्रत्यय
.वाक्य
वाली) कता के लङ्ग-वचन से मलती है — ‘ऋषभः योजनां कृतवान्’ (ऋषभ पु ल्लङ्ग एकवचन, अतः ‘कृतवान्’)।
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se आप तय हो जाएगा। क्तवतु के रूप: पुं. एकवचन — कृतवान्; बहुवचन — कृतवन्तः; स्त्री. — कृतवती।
इस लए
aअपने
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सावधानी: ‘स्वयमेव’ जैसे अव्यय ज्य के त्य रहते ह, बदलते नह । और वशेषण जस पद का है, उसी के साथ
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वभ क्त बदलेगा — जैसे ‘द घका लकः उपवासः’ (प्रथमा) कतृवाच्य म ‘द घका लकम् उपवासम्’ ( तीया) हो
जाएगा।
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महाराजेन राज्यं सम पतम्।
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प्र.4 (क)
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agl उत्तर
महाराजः राज्यं सम पतवान्। ( हन्द — महाराज ने राज्य स प दया।)
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पदम् कमवाच्ये कतृवाच्ये कारणम्
कत महाराजेन (तृ.ए.व.) aglमहाराजः (प.ए.व.) कतृवाच्ये «कत र प्रथमा»
«कम ण
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कम राज्यम् (प्र.ए.व.) राज्यम् (िद्व.ए .व.) तीया» — नपुंसक होने से रूप वही दखता है
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ि या सम पतम् (क्त) समिपतवान् (क्तवतु) अब क्रया कता ‘महाराजः’ (पुं.ए.व.) के अनुसार
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ag पाठ से मेल: ‘तदा ना भः … तस्मै राज्यं सम पतवान्।’ (पृ. 127) — पाठ म यह क्रया ठ क इसी कतृवाच्य रूप म
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आई है।
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प्र.4 (ख) केना प तत् न च न्ततम्।
कोऽ प तत् न च न्ततवान्। ( हन्द — कसी ने भी वह नह सोचा।)
पदम् कमवाच्ये कतृवाच्ये कारणम्
कत केना प ( कम् + अ प, तृ.ए.व.) कोऽिप (कः + अिप, प.ए .व.) प्रथमा म ‘कः’, और ‘कः + अ प’ क वसगस न्ध से ‘कोऽ प’
कम तत् (प्र.ए.व.) तत् (िद्व.ए .व.) नपुंसक लङ्ग म प्रथमा- तीया के रूप समान
ि या च न्ततम् (क्त) िचिन्ततवान् (क्तवतु) कता ‘कोऽ प’ पुं.ए.व. है
स न्ध पर ध्यान द जए: ‘कः + अ प’ म वसग के आगे ‘अ’ है, अतः वसगस न्ध से ‘कोऽ प’ बनेगा (अः + अ →
ओ + ऽ)। यही स न्ध अभ्यास के प्रश्न ५ (छ) ‘प्र स्थतः + अयम् → प्र स्थतोऽयम्’ म भी पूछ गई है। ‘न’ अव्यय ज्य
का त्य रहता है।
पाठ से मेल: ‘परं भक्षायां भोजनपदाथः दे यः इ त न केना प च न्ततम्।’ (पृ. 132)
प्र.4 (ग) ऋषभदे वेन द घका लकः उपवासः कृतः।
ऋषभदे वः द घका लकम् उपवासं कृतवान्। ( हन्द — ऋषभदे व ने द घकालीन उपवास कया।)
पदम् कमवाच्ये कतृवाच्ये कारणम्
कत ऋषभदे वेन (तृ.ए.व.) ऋषभदे वः (प.ए .व.) कत र प्रथमा
कम उपवासः (प्र.ए.व.) उपवासम् (िद्व.ए .व.) कम ण तीया — यहाँ रूप स्पष्ट बदलता है
िवशेषणम् द घका लकः दीघ कािलकम् वशेषण अपने वशेष्य के साथ वभ क्त बदलता है
ि या कृतः (क्त, कम के अनुसार) कृ तवान् (क्तवतु, कत के अनुस ार ) ऋषभदे वः पुं.ए.व.
यह वाक्य सबसे अच्छा उदाहरण है क्य क इसम तीन प रवतन आँख से दख जाते ह — कता ‘ऋषभदे वेन’ से
‘ऋषभदे वः’, कम ‘उपवासः’ से ‘उपवासम्’, और वशेषण ‘द घका लकः’ से ‘द घका लकम्’। ऊपर (क) और (ख)
म कम नपुंसक था, इस लए रूप वही दख रहा था; यहाँ पु ल्लङ्ग होने से भेद प्रकट है।
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पाठ से मेल: ‘कदा चत् ऋषभदे वः भोज्यपदाथानाम् अभावे चतुःशतं दना न नैरन्तयण उपवासं कृतवान्।’ (पृ.
132) — पाठ स्वयं कतृवाच्य रूप दे ता है।
प्र.4 (घ) जनैः जीवनपद्ध तः प रव तता।
जनाः जीवनपद्ध त प रव ततवन्तः। ( हन्द — लोग ने अपनी जीवन-पद्ध त बदल ली।)
पदम् कमवाच्ये कतृवाच्ये कारणम्
कत जनैः (तृ.ब.व.) जनाः (प.ब.व.) कत र प्रथमा — यहाँ बहुवचन
है
कम जीवनपद्ध तः (स्त्री.प्र.ए.व.) जीवनपद्धितम् (स्त्री.िद्व.ए .व.) कम ण तीया
ि या प रव तता (क्त, स्त्री लङ्ग — कम के पिरविततवन्तः (क्तवतु, पुं.ब.व. — कत के कता ‘जनाः’ पु ल्लङ्ग बहुवचन
अनुसार) अनुस ार ) है
यहाँ क्रया का लङ्ग भी बदल गया — क्य : कमवाच्य म क्रया कम ‘जीवनपद्ध तः’ (स्त्री लङ्ग) के साथ मली थी,
इस लए ‘प रव तत◌ा’। कतृवाच्य म वह कता ‘जनाः’ (पु ल्लङ्ग बहुवचन) के साथ मलेगी, इस लए ‘प रव ततवन्तः’।
क्रया कसके साथ मलती है — यही दोन वाच्य का असली अन्तर है, वभ क्त तो उसी का प रणाम है।
पाठ से मेल: ‘तेन क्रमशः जनाः स क्रयाः अभवन् जीवनपद्ध त च प रव ततवन्तः।’ (पृ. 129)
प्र.4 (ङ) ऋषभेण योजना कृता।
ऋषभः योजनां कृतवान्। ( हन्द — ऋषभ ने योजना बनाई।)
पदम् कमवाच्ये कतृवाच्ये कारणम्
कत ऋषभेण (तृ.ए.व.) ऋषभः (प.ए .व.) कत र प्रथमा
कम योजना (स्त्री.प्र.ए.व.) योजनाम् (स्त्री.िद्व.ए .व.) कम ण तीया
ि या कृता (क्त, स्त्री लङ्ग) कृ तवान् (क्तवतु, पुं.ए .व.) कता ‘ऋषभः’ के अनुसार
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम् AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से मेल तथा बहुवचन-रूप: पाठ म यही बात बहुवचन म आई है — ‘अतः सः मूलसमस्यानां प रष्काराय
जनानां सुखमय-जीवनाय च व वधाः योजनाः र चतवान्।’ (पृ. 128)। य द प्रश्न म कता स्त्री लङ्ग होता (यथा —
‘मरुदे व्या योजना कृता’), तो उत्तर होता ‘मरुदे वी योजनां कृतवती’ — क्तवतु का स्त्री लङ्ग रूप ‘कृतवती’ है। यह
भेद परीक्षा म बहुधा पूछा जाता है।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 141
प्रश्न ५ — स न्ध कुरुत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.5 (क) इ त + अतः
इत्यतः। ( हन्द — ‘इस लए’, ‘इस कारण से’।)
सन्धेः नाम — यण् स न्धः (स्वरस न्धः)।
इित + अतः
इ + अ → य् + अ
इत् यतः
नयम पहले, प्रयोग बाद म: यण् स न्ध का सूत्र है «इको यण च» — इक् (इ, उ, ऋ, ऌ) के बाद य द असवण स्वर
(अच्) आए, तो इक् के स्थान पर यण् (य्, व्, र्, ल्) हो जाता है। यहाँ ‘इ त’ का अ न्तम इ है और आगे अ है —
दोन असवण ह, अतः इ → य् हुआ और बना ‘इत्यतः’। इसी नयम के और उदाहरण — प्र त + एकम् = प्रत्येकम्,
अ त + अन्तम् = अत्यन्तम्, मधु + अ रः = मध्व रः।
पाठ म कहाँ: ‘… प्रभुः नाथः इत्यतः “आ दनाथः” इ त ख्यातः।’ (पृ. 133)
प्र.5 (ख) च+इत
चे त। ( हन्द — ‘और ऐसा’, ‘तथा यह’।)
सन्धेः नाम — गुण स न्धः (स्वरस न्धः)।
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च + इित
अ+इ→ए
चे ित
नयम: गुण स न्ध का सूत्र है «आ णः» — अ अथवा आ के बाद य द इ/ई आए तो दोन मलकर ए, उ/ऊ आए तो
ओ, और ऋ आए तो अर् हो जाता है। यहाँ ‘च’ का अ तथा ‘इ त’ का इ मलकर ए बने — ‘चे त’। इसी नयम से
— दे व + इन्द्रः = दे वेन्द्रः, सूय + उदयः = सूय दयः, महा + ऋ षः = मह षः।
पाठ म कहाँ: ‘ब्राह्मी सुन्दरी चे त े कन्ये’ (पृ. 130); ‘ भक्षुः भक्षुणी श्रावकः श्रा वका चे त क्रमं र चतवान्’ (पृ.
133)। पाठ म एक स्थान पर तहरा जोड़ भी है — ‘च + इ त + एतादृश्यः = चेत्येतादृश्यः’ (पृ. 128), जहाँ पहले
गुण स न्ध, फर यण् स न्ध लगी।
प्र.5 (ग) दे वस्य + अ प
दे वस्या प। ( हन्द — ‘दे व का भी’।)
सन्धेः नाम — द घ स न्धः (स्वरस न्धः)।
दे वस्य + अिप
अ+अ→आ
दे वस्यािप
नयम: द घ स न्ध का सूत्र है «अकः सवण द घः» — य द दो सवण (एक ही स्थान से बोले जाने वाले) स्वर मल,
तो दोन के स्थान पर उनका द घ रूप हो जाता है। यहाँ ‘दे वस्य’ का अ न्तम अ तथा ‘अ प’ का आ द अ — दोन
सवण ह, अतः मलकर आ बने। इसी नयम से — वद्या + आलयः = वद्यालयः, मु न + इन्द्रः = मुनीन्द्रः, भानु +
उदयः = भानूदयः।
पाठ म कहाँ: ‘ऋषभदे वस्या प जीवने का चत् तादृशी घटना संवृत्ता …’ (पृ. 130)
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
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तथा + एव
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प्र.5 (घ)
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aव।l( हन्द — ‘उसी प्रकार’, ‘वैसे ही’।)
तथैg
सन्धेः नाम — वृ द्ध स न्धः (स्वरस न्धः)।
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em . ag
तथा + एव
g l as
आ+ए→ऐ a
तथै व
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se m.
o m l a
m .वृcद्ध स न्ध का सूत्र है «वृ द्धरे च» — अ अथवा आ के बाद य द एच् (ए, ऐ,agओ, औ) आए, तो दोन के
se पर वृ द्ध होती है : अ/आ + ए/ऐ → ऐ, तथा अ/आ + ओ/औ → औ। यहाँ ‘तथा’ का आ तथा ‘एव’ का ए
नयम:
g l a
a
स्थान
मलकर ऐ बने। इसी नयम से — एक + एकम् = एकैकम्, महा + औषधम् = महौषधम्, तव + एव = तवैव।
om a s
पाठ म कहाँ: ‘तथैव ऋषभस्य पुत्रीषु ब्राह्मी सुeन्m
. c agl
a s दरी चे त े कन्ये …’ (पृ. 130)। इसी नयम का एक और रूप पाठ
a l तथा ‘तस्य + एव = तस्यैव’ (पृ. 133)।
म — ‘अथ + एकदा = अथैकदा’ (पृ.g127)
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m .
m as e
.co g l
इ त + एतादृशाः
a
प्र.5 (ङ)
a s em
agl उत्तर
इत्येतादृशाः। ( हन्द — ‘इस प्रकार के’, ‘ऐसे-ऐसे’।)
se m
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. a
सन्धेः नाम — यण् स न्धः (स्वरस न्धः)।
m
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इित + एतादृ शाः agl
इ + ए → य् + ए
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इत् येत ादृ शाः
m as e
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g l a
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नयम: वही «इको यण च» — ‘इ त’ का अ न्तम इ तथा आगे असवण स्वर ए, अतः इ → य्। यहाँ एक बात ध्यान
.c
m
से दे खए : (क) म ‘इ त + अतः’ था और यहाँ ‘इ त + एतादृशाः’ — आगे वाला स्वर बदल गया, पर नयम वही
m a s e
co agl
रहा, क्य क यण् स न्ध केवल यह दे खती है क पहला स्वर इक् हो और दूसरा उससे असवण अच् हो। स न्ध याद
m .
ase
करने का यही सही तरीका है — जोड़ी नह , नयम याद क जए।
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m .
m ase
.co
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पाठ म कहाँ: पाठ म यह स्त्री लङ्ग बहुवचन रूप म तहरे जोड़ के साथ आया है — ‘… प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः
अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः स न्त इ त।’ (पृ. 128) = च + इ त + एतादृश्यः।
प्र.5 (च) ब्राह्मीद्वारा + एव
ब्राह्मीद्वारैव। ( हन्द — ‘ब्राह्मी के ारा ही’।)
सन्धेः नाम — वृ द्ध स न्धः (स्वरस न्धः)।
बाह्मीद्वारा + एव
आ+ए→ऐ
बाह्मीद्वारैव
नयम: «वृ द्धरे च» — ‘ ारा’ का अ न्तम आ तथा ‘एव’ का ए मलकर ऐ बने। यह (घ) ‘तथा + एव → तथैव’ के
ठ क समान है, केवल पूवपद बड़ा है। समास-युक्त लम्बे शब्द दे खकर घबराइए मत — स न्ध सदा अ न्तम ध्व न
और अगली आ द ध्व न के बीच होती है, बीच का ढे र सारा शब्द उससे अछू ता रहता है।
पाठ म कहाँ: ‘जैनसम्प्रदायानुगुणं ब्राह्मी लप्याः वकासः ब्राह्मीद्वारैव कृता इ त श्रूयते।’ (पृ. 130)
प्र.5 (छ) प्र स्थतः + अयम्
प्र स्थतोऽयम्। ( हन्द — ‘यह प्रस्थान कया हुआ (महामु न)’।)
सन्धेः नाम — वसगस न्धः (कुछ ग्रन्थ म इसे ‘गुणस न्ध-स हत वसगस न्ध’ भी कहते ह)।
पिस्थतः + अयम्
अ + िवसग (◌ः) + अ
अः → ओ, तथा आगे वाला अ → अवगह (ऽ)
पिस्थतोऽयम्
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नयम दो चरण म: (१) य द वसग से पहले अ हो और वसग के बाद भी अ हो, तो ‘अः’ के स्थान पर ओ हो जाता
है। (२) उसके बाद वाला ‘अ’ लुप्त हो जाता है और उसके स्थान पर अवग्रह- चह्न (ऽ) लगाया जाता है — यह चह्न
बताता है क यहाँ एक ‘अ’ था। इसी लए ‘प्र स्थतोऽयम्’ लखा जाता है, ‘प्र स्थतोयम्’ नह । इसी नयम से — कः +
अ प = कोऽ प, रामः + अवदत् = रामोऽवदत्, सः + अ प = सोऽ प।
पाठ म कहाँ: ‘… जीवनस्य परमसत्यम् अन्वेष्टुं प्र स्थतोऽयं महामु नः।’ (पृ. 131)
स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 141–144
१. जैनधमस्य चतु वश तः तीथङ् कराः · २. जैनधमस्य प्रमुखतीथस्थाना न
स्वाध्यायान्मा प्रमदः
प्र.1 जैनधमस्य चतु वशतेः तीथङ् कराणां नामा न क्रमेण लखत। पुस्तकं प्रथमस्य चतु वशस्य च तीथङ् करस्य वषये
क कम् आह ?
पुस्तक ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ के अन्तगत चौबीस तीथङ् कर के चत्र तथा नाम क्रम से दे ती है। पूरी सूची —
क्र. तीथङ् करः क्र. तीथङ् करः
(१) ऋषभदे वः (आिदनाथः) (१३) िवमलनाथः
(२) अिजतनाथः (१४) अनन्तनाथः
(३) सम्भवनाथः (१५) धमनाथः
(४) अिभनन्दनाथः (१६) शािन्तनाथः
(५) सुम ितनाथः (१७) कु न्थुनाथः
(६) पद्मपभुः (१८) अरनाथः
(७) सुपाश्वनाथः (१९) मिल्लनाथः
(८) चन्द पभुः (२०) मुिनसुवतः
(९) पुष्पदन्तः (सुिविधनाथः) (२१) नािमनाथः
(१०) शीतलनाथः (२२) नेिमनाथः (अिरष्टनेिमः)
(११) श्रेयांस नाथः (२३) पाश्वनाथः
(१२) वासुपूज्यः (२४) महावीरः (वधमानः)
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पुस्तक क अपनी टप्प णयाँ (केवल दो तीथङ् कर पर) —
तीथङ् करः पुस्तकस्य वाक्या न हन्द
(१) ऋषभदे वः पथमः तीथङ् करः, ‘आिदनाथः’ इित पिस द्धः। आ द्य ः प्रथम तीथकर, ‘आ दनाथ’ नाम से प्र सद्ध। सबसे पहले
(आिदनाथः) धम पदे शकः; कृ िषः, िलिपः, कला, व्यवसायः च जगित धम का उपदे श दे ने वाले; उन्ह से जगत् म खेती, ल प,
आर ब्धाः। कला तथा व्यवसाय आरम्भ हुए।
(२४) महावीरः चतुिवश ं ः तीथङ् करः, जैनधम स्य परमो महापुरुषः। वैशाली- चौबीसव तीथकर, जैन धम के परम महापुरुष। वैशाली के
(वधमानः) कु ण् डगामे जातः। ‘पञ्चमहावतानां’ पचारकः। अिहंस ा, कुण्डग्राम म जन्मे। ‘पञ्चमहाव्रत ’ के प्रचारक। उन्ह ने
अपिरगह, संयम स्य महत्त्वं लोकाय उपिद ष्टवान्। लोक को अ हसा, अप रग्रह तथा संयम का महत्त्व बताया।
पुस्तक क टप्पणी और पाठ क कथा एक ही बात कहती ह: ‘स्वाध्याय’ म ऋषभदे व के लए लखा है —
‘कृ षः, ल पः, कला, व्यवसायः च जग त आरब्धाः’। अब मुख्य पाठ को याद क जए — उन्ह ने कृ षकाय,
वस्त्र नमाण, पात्र नमाण, गृह-नगर- नमाण सखाया (कृ ष, कला, व्यवसाय) और उनक पुत्री ब्राह्मी से ल प का
वकास हुआ ( ल प)। अथात् यह टप्पणी कोई नई सूचना नह , पूरे पाठ का एक पं क्त म सार है। इसी लए वे
‘आ दनाथ’ ह — ‘आ द’ अथात् ‘सबसे पहले’।
चत्र म छपा एक सङ् केत: पुस्तक के हर तीथङ् कर- चत्र म आसन के नीचे एक छोटा-सा चह्न बना है — इसे
परम्परा म ‘लाञ्छन’ कहते ह और इसी से मू त पहचानी जाती है। जैसे — ऋषभदे व के नीचे वृषभ (बैल —
इसी लए ‘ऋषभ’ नाम), अ जतनाथ के नीचे गज, सम्भवनाथ के नीचे अश्व, पद्मप्रभु के नीचे कमल, सुपाश्वनाथ के
नीचे स्व स्तक, चन्द्रप्रभु के नीचे चन्द्र, शा न्तनाथ के नीचे मृग, ने मनाथ के नीचे शङ् ख, पाश्वनाथ के नीचे सप तथा
महावीर के नीचे सह। पुस्तक ये नाम नह लखती — चत्र दे खकर स्वयं मलाइए, यही ‘स्वाध्याय’ है। वतनी-
सङ् केत: पुस्तक (२१) पर ‘ना मनाथः’ छापती है; अन्य ग्रन्थ म यह नाम प्रायः ‘न मनाथः’ मलता है — उत्तर म
पुस्तक का ही रूप ल खए।
प्र.2 जैनधमस्य द्वादश प्रमुखतीथस्थाना न तेषां च राज्या न लखत। एतेषु का न स्थाना न पाठे अ प आगता न ?
पुस्तक बारह प्रमुख तीथस्थान गनाती है —
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क्र. तीथस्थानम् राज्यम् / स्थ तः
(१) सम्मेतिशखरम् पारसनाथ पवतः, झारखण् डः
(२) श्रवणबेल गोळः कन टकम्
(३) पावापुर ी िबहारः
(४) रै वतकः (िगरनारः) पवतः गुजरातः
(५) शत्र ञ्ु जयपवतः पदिल प्तपुर म् — पालीताणा, गुजरातः
(६) राजग ृहम् िबहारः
(७) अयोध्या उ त्त रपदे शः
(८) काशी (वाराणसी) उ त्त रपदे शः
(९) चम्पापुर म् भागलपुर , िबहारः
(१०) हिस्तनापुर म् उ त्त रपदे शः
(११) िमिथला िबहारः
(१२) द्वािरका गुजरातः
पाठे अ प आगता न स्थाना न —
स्थानम् पाठे कुत्र
हिस्तनापुर म् (उत्तरपदे शः) ‘एकदा पयटनावसरे सः हिस्तनापुर स्य समीपे िस्थतस्य इक्षक्ष
ु ेत्रस्य पाश्वमाग त् गच्छित स्म ’ — यही ं श्रेयांस ने
इक्षरु स िदया (प.ृ 133); और यही ं ‘विषतप-पारणा-महोत्सवः’ मनाया जाता है
पदिलप्तपुर म् — पालीताणा ‘अतः जैनस म्पदाये विषतप-पारणा-महोत्सवः अध नु ािप गुजराते पदिल प्तपुर म् (पालीताणा) … आचयते’ (प.ृ 133) —
(ग ज
ु रातः) यही सूची का (५) शत्रञ्ु जयपवत है
सूची को मान चत्र पर रखकर दे खए — तब वह याद रह जाएगी: बारह म से पाँच बहार-झारखण्ड म ह
(सम्मेत शखर, पावापुरी, राजगृह, चम्पापुर, म थला), तीन उत्तर प्रदे श म (अयोध्या, काशी, ह स्तनापुर), तीन
गुजरात म ( गरनार, शत्रुञ्जय, ा रका) और एक कनाटक म (श्रवणबेलगोल)। अथात् ये तीथ पूव, उत्तर, प श्चम
और द क्षण — चार दशाओं म फैले ह। यही बताता है क यह परम्परा कसी एक क्षेत्र तक सी मत नह रही।
‘अयोध्या’ को ऋषभदे व क जन्मभू म तथा ‘पावापुरी’ को महावीर के नवाण-स्थल के रूप म जाना जाता है, अथात्
सूची का पहला और अ न्तम तीथङ् कर दोन इसी सूची से जुड़े ह।
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as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम्
a g l AglaSem · NCERT Solutions
.
उच्चारण-सङ् केत: ‘श्रवणबेलगोळः’ म ‘ळ’ कन्नड-मराठ का मूधन्य ल है — जैसा पुस्तक म छपा है वैसा ही
com
mतइत
ल खए। ‘पद लप्तपुरम्’ पालीताणा का संस्कृत नाम है; ‘रैवतकः’ गरनार का। ‘शत्रुञ्जयः’ = शत्रुeं जय
s
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o — ‘जो शत्रु को जीते’।
(उपपद-तत्पु.रुcष) gl a
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‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ इ त शीषकस्य अथः कः ? अ स्मन् पाठे एतत् कमथ दत्तम् ?
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प्र.3
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अथः — ‘स्वाध्यायात् मा प्रमदः’ — स्वाध्याये प्रमादं मा कुरु, अथात् स्वयम् अध्ययनं कतु कदा प आलस्यं मा कुरु।
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( हन्द — ‘स्वाध्याय म प्रमाद मत कर’ — अथात् स्वयं पढ़ने-सीखने म कभी आलस्य मत करो।)
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.co व्याकरण a g l
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पदम् अथः
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a glस्वाध्यायात् पुं.पञ्चमी ए.व. स् वाध् याय से (‘मा’ के योग में पञ्चमी) — स्व + अध् यायः = अपना अध् ययन
om
मत (यह ‘लुङ्’ अथवा ‘लोट् ’ के साथ आता है और ‘अ’ आगम नही ं लगने दे ता)
a s
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मा नषेधाथकम् अव्ययम्
m .cपमाद
a se
पमदः √मद् (प्र + मद्), लुङ्, मध्यमपुरुष ए.व. मत कर , असावधान मत हो
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यह वाक्य कहाँ से आया और यहाँ क्य है: यह तै त्तरीयोप नषद् क प्र सद्ध ‘ शक्षावल्ली’ का वचन है —
. com
‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ (स्वाध्याय म प्रमाद मत करो), जो द क्षान्त-उपदे श का अंग है। पुस्तक ने इसे उस खण्ड का
m
शीषक बनाया है जसम पूछा कुछ नह जाता, केवल सामग्री द जाती है — यहाँ चौबीस
a s emतीथङ् कर के नाम और
. o
cतीथस्थान। । lपरीक्षा के लए पढ़ना ‘अध्ययन’
सन्दे श स्पष्ट है : जो प्रश्न म नह पूछा गया, वह भी पढ़ने योग्य हैg
em
बारह
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g l as है; बना पूछे पढ़ना ‘स्वाध्याय’ है — और यही वह पढ़ाई है जो जीवन भर साथ रहती है।
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.
m144 a
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यस्तु क्रयावान् मनुजः स वद्वान् — पृष्ठ
agl
चत्वारः क्रयाकलापाः — भोजनपद्ध तः, पञ्चमहाव्रता न, णमोकारमहामन्त्र- दवसः, व्रत वषये भाषणम्
यस्तु क्रयावान् मनु जः स वद्वान्
co m
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.co g l
प्र.1 जैनसम्प्रदायानुसारं भोजनपद्ध त लखत। ( क खाद न्त ? क स्मन् समये खाद न्त ?)
em a
a s
agl उत्तर
.c
यह अन्वेषण-काय है — पुस्तक इसका उत्तर स्वयं नह दे ती, वह आपसे पता लगाने को कहती है। सही तरीका यह है : (१) अपने
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. co agl
कसी जैन मत्र, सहपाठ अथवा उनके प रवार से पू छए; (२) वद्यालय-पुस्तकालय अथवा कसी वश्वसनीय पुस्तक से मलाइए;
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as
(३) फर पाठ के अ हसा तथा अप रग्रह सद्धान्त से जोड़कर ल खए क ऐसा क्य कया जाता है। और एक बात अवश्य ध्यान
a g l
र खए — परम्पराओं म भेद होता है ( दगम्बर तथा श्वेताम्बर म, गृहस्थ तथा मु न म), इस लए ‘सब जैन ऐसा ही करते ह’ कहने के
बजाय ‘जैनपरम्परायाम् एतादृशी पद्ध तः प्रायः पाल्यते’ ल खए।
co m
m .
m as e
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आदश उत्तरम् (नमूना उत्तर — संस्कृतम्) —
जै न सम्पदाये भोजनिवषये अिहंसा एव मूलं तत्त्वम्।
िकं खादिन्त ?
जै न जनाः शाकाहारम् एव सेवन्ते । मांसम्, मत्स्यम्, अण्डं च ते न खादिन्त।
बहवः जनाः कन्दमूलािन अिप वजयिन्त, यतः ते ष ु सूक्ष्मजीवाः अिधकाः भविन्त इित परम्परायां मन्यते ।
मधु अिप पायः वजयिन्त, यतः तस्य गहणे मधुमिक्षकाणां िहंसा भवित।
जलं वस्त्रेण गालियत्वा एव िपबिन्त, येन सूक्ष्मजीवाः न पीड ेरन्।
भोजनं सरलं, अल्पं, संयमपूवकं च भवित — इदम् एव ‘अपिरगहस्य’ आचरणम्।
किस्मन् समये खादिन्त ?
सूय स्तात् पूवम् एव भोजनं कु विन्त। रात्रौ भोजनं पायः न कु विन्त।
अस्य कारणद्वयम् — (क) रात्रौ सूक्ष्मजीवाः अन्ने पितत ुं शक्नुविन्त, अतः अिहंसा भङ् गा भवेत ्;
(ख) सूय स्तात् पूव ं कृ तं भोजनं सुखेन पच्यते , आरोग्याय च िहतकरम्।
एतत् वतं ‘राित्रभोजनत्यागः’ इित कथ्यते ।
पविदने ष ु उपवासः, एकाशनम् (एकवारं भोजनम्) इत्यादीिन वतािन अिप आचरिन्त।
( हन्द अनुवाद —) जैन सम्प्रदाय म भोजन के वषय म मूल तत्त्व अ हसा ही है। क्या खाते ह — जैन लोग शाकाहार ही लेते ह;
मांस, मछली और अण्डा नह खाते। बहुत-से लोग कन्दमूल (ज़मीन के नीचे उगने वाली वस्तुए)ँ भी छोड़ दे ते ह, क्य क परम्परा म
माना जाता है क उनम सूक्ष्म जीव अ धक होते ह। शहद भी प्रायः व जत है, क्य क उसे लेने म मधुम क्खय क हसा होती है। पानी
कपड़े से छानकर ही पीते ह, जससे सूक्ष्म जीव को कष्ट न हो। भोजन सरल, कम और संयमपूवक होता है — यही ‘अप रग्रह’ का
आचरण है। कस समय खाते ह — सूयास्त से पहले ही भोजन कर लेते ह, रात म प्रायः भोजन नह करते। इसके दो कारण ह :
(क) रात म सूक्ष्म जीव भोजन म गर सकते ह, जससे अ हसा भंग होगी; (ख) सूयास्त से पहले कया गया भोजन आसानी से पचता
है और स्वास्थ्य के लए हतकर है। इस व्रत को ‘रा त्रभोजन-त्याग’ कहते ह। पव के दन म उपवास तथा एकाशन ( दन म एक बार
भोजन) जैसे व्रत भी कए जाते ह।
उत्तर को पाठ से जो ड़ए — यही उसे उत्तम बनाएगा: पाठ म ऋषभदे व अपने शष्य को यही सखाने नकले थे
क ‘जैनसन्न्या सनः वृक्षेभ्यः फला न शाका न वा न चनुयुः’ — अथात् साधु स्वयं तोड़कर न खाए, भक्षा से
जीवन चलाए। और उन्ह ने उपवास को शकायत के बना स्वीकार कया, यहाँ तक क चार सौ दन तक। अतः जैन
भोजनपद्ध त का मूल पाठ म ही रखा है — भोजन केवल पेट भरने का साधन नह , अ हसा का अभ्यास है। उत्तर म
यह वाक्य अवश्य जो ड़ए।
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प्र.2 पञ्चमहाव्रता न लखत।
पञ्चमहाव्रता न — सत्यम्, अ हसा, अस्तेयम्, अप रग्रहः, ब्रह्मचय च। (पुस्तक के अपने शब्द, पृ. 134)
पाठस्य वाक्यम् — ‘तथा च प्रा णमात्र हताय पञ्चमहाव्रता न — सत्यम्, अ हसा, अस्तेयम्, अप रग्रहः, ब्रह्मचय च आच रतुं
कल्याणकरम् इ त नगद्यते।’
क्र. महाव्रतम् अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ दै नक जीवन म उदाहरण
१ सत्यम् यथाथवचनम् सच बोलना भूल हो जाए तो उसे छपाने के बजाय
स्वीकार कर लेना
२ अिहंस ा मनसा वाचा कमणा च मन, वचन तथा कम से िकसी कसी सहपाठ का उपहास न करना — वाणी
प्रा णनां न पीडनम् को न सताना क हसा भी हसा है
३ अस्तेयम् अदत्तस्य अग्रहणम् चोरी न करना — िबना दी हुई कसी क पुस्तक बना पूछे न उठाना
वस्तु न ले ना
४ अपिरग हः आवश्यकात् अ धकं संग्रहः न आवश्यकता से अिधक संगह न जतनी आवश्यकता हो उतना ही लेना, बचा
करणीयः करना हुआ बाँट दे ना
५ बह्मचयम् इ न्द्रयसंयमः संयम का पालन अपनी इच्छाओं पर नयन्त्रण रखना, अध्ययन
म मन लगाना
पाठ इन्ह ‘प्रा णमात्र हताय’ कहता है — अथात् ये व्रत केवल व्रती के अपने कल्याण के लए नह , समस्त प्रा णय
के हत के लए ह। ध्यान द जए, पाँच व्रत नषेधात्मक दखते ह (न बोलना झूठ, न सताना, न लेना, न जोड़ना, न
भोगना) — कन्तु उनका फल वधायक है : वश्वास, सुरक्षा, ईमानदारी, संतोष और आत्मबल। पुस्तक के अनुसार
इन्ह का प्रचार चौबीसव तीथङ् कर महावीर ने कया — ‘पञ्चमहाव्रतानां प्रचारकः’ (पृ. 143)।
तुलना (याद रखने म सहायक): पाठ म तीन सू चयाँ आती ह, उन्ह अलग-अलग पहचा नए — (१) सद्धान्ताः :
अ हसा, अनेकान्तवाद, स्या ाद, अप रग्रह; (२) त्री ण रत्ना न : सम्यग्दशन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्च रत्र; (३)
पञ्चमहाव्रता न : सत्य, अ हसा, अस्तेय, अप रग्रह, ब्रह्मचय। परीक्षा म इन्ह आपस म न मलाइए।
प्र.3 णमोकारमहामन्त्र- दवसस्य वषये क जान न्त इत्युप र कक्षायां वदत।
यह कक्षा-भाषण का काय है। अच्छे भाषण म चार बात आनी चा हए — (१) दवस कब है, (२) मन्त्र क्या है और कस भाषा म है,
(३) उसका अथ, (४) उससे क्या सन्दे श मलता है। नीचे दो-ढाई मनट का नमूना भाषण दया है; इसे कण्ठस्थ करके, धीरे और स्पष्ट
बो लए।
आदश उत्तरम् (नमूना भाषणम्) —
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम् AglaSem · NCERT Solutions
॥ णमोकारमहामन्त्रिदवसः ॥
माननीयाः अध्यापकाः, िपयाः सहपािठनः, सवभ्यः नमस्कारः।
अद्य अहं ‘णमोकारमहामन्त्रिदवसस्य’ िवषये िकिञ्चत् वक्त मु ् इच्छािम।
अस्माकं पाठ पुस्तकं ‘शारदा’ कथयित — पितवषम् अपैल-मासस्य नवमे िदनाङ् के
जै न जनाः सामूिहकरूपेण अस्य मन्त्रस्य जपािदकं कृ त्वा उत्सवम् आचरिन्त।
अतः अस्य िदवसस्य ‘णमोकारमहामन्त्रिदवसः’ इित ख्याितः वतते ।
अयं मन्त्रः संस्कृ तभाषायां नािस्त — सः पाकृ तभाषायां वतते , इित पुस्तकम् एव वदित।
मन्त्रः एवम् अिस्त —
‘णमो अिरहन्ताणं, णमो िसद्धाणं, णमो आयिरयाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।’
अस्य अथः — नमािम अिरहन्त ॄन ्, नमािम िसद्धान्, नमािम आचाय न्,
नमािम उपाध्यायान्, नमािम लोके सवसाधून ् इित।
एषः मन्त्रः पञ्चपरमेिष्ठभ्यः पणामं समपयित।
अस्य मन्त्रस्य महत्तमा िवशेषता का ?
अिस्मन् मन्त्रे कस्यािप व्यक्ते ः नाम नािस्त — गुणेभ्यः एव नमस्कारः अिस्त।
यः रागद्वेषौ िजतवान्, यः िसिद्धं पाप्तवान्, यः माग ं दशयित,
यः पाठयित, यः च साधनां करोित — ते भ्यः सवभ्यः अयं पणामः।
अतः एव पुस्तकं वदित — ‘वसुधैवकु टु म्बकम्’ इत्यस्य अनुरूपेण
िवश्वशान्त्यै कोिटशः जनाः इमं मन्त्रं गायिन्त।
एतावत् एव। धन्यवादः।
( हन्द अनुवाद —) आदरणीय अध्यापकगण, प्रय सहपा ठयो, सबको नमस्कार। आज म ‘णमोकार महामन्त्र दवस’ के वषय म
कुछ कहना चाहता/चाहती हूँ। हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शारदा’ कहती है क हर वष 9 अप्रैल को जैन लोग सामू हक रूप से इस मन्त्र
का जप आ द करके उत्सव मनाते ह; इसी लए इस दन को ‘णमोकार महामन्त्र दवस’ कहा जाता है। यह मन्त्र संस्कृत म नह ,
प्राकृत भाषा म है — यह पुस्तक स्वयं कहती है। मन्त्र इस प्रकार है — ‘णमो अ रहन्ताणं, णमो सद्धाणं, णमो आय रयाणं, णमो
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम् AglaSem · NCERT Solutions
उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।’ इसका अथ है — अ रहन्त को नमस्कार, सद्ध को नमस्कार, आचाय को नमस्कार,
उपाध्याय को नमस्कार और लोक के सब साधुओं को नमस्कार। यह मन्त्र पाँच परमे ष्ठय को प्रणाम करता है। इसक सबसे बड़ी
वशेषता क्या है? इसम कसी व्य क्त का नाम नह है — नमस्कार गुण को है : जसने राग- े ष जीत लए, जसने स द्ध पा ली, जो
माग दखाता है, जो पढ़ाता है और जो साधना कर रहा है — उन सबको यह प्रणाम है। इसी लए पुस्तक कहती है क ‘वसुधैव
कुटु म्बकम्’ क भावना के अनुरूप वश्वशा न्त के लए करोड़ लोग इस मन्त्र को गाते ह। बस इतना ही। धन्यवाद।
बोलते समय तीन बात: (१) मन्त्र क पं क्तयाँ धीरे और स्पष्ट बो लए — ‘ण’ और ‘न’ का भेद सुनाई दे ना चा हए।
(२) यह कसी सम्प्रदाय क श्रद्धा का वषय है, अतः आदरपूवक बो लए और वही क हए जो पुस्तक कहती है। (३)
अन्त म एक वाक्य अपनी ओर से जो ड़ए — ‘भाषा बदल गई, भाव नह बदला’ — इससे भाषण पूरा लगेगा।
प्र.4 पञ्चमहाव्रतेषु कस्या प एकस्य व्रतस्य वषये सहपा ठनां पुरतः आगत्य वदत।
यह लघु-भाषण का काय है। पाँच म से कोई एक व्रत चु नए। अच्छा भाषण चार चरण म चलता है — (१) व्रत का नाम तथा अथ,
(२) पाठ से उसका प्रमाण, (३) वद्यालय-जीवन का एक ठोस उदाहरण, (४) एक वाक्य का संकल्प। नीचे अ हसा पर नमूना भाषण
दया है; इसी ढाँचे पर आप ‘सत्य’, ‘अस्तेय’, ‘अप रग्रह’ अथवा ‘ब्रह्मचय’ पर बोल सकते ह।
आदश उत्तरम् (नमूना भाषणम् — ‘अ हसा’) —
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॥ अिहंसा परमो धमः ॥
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माननीयाः अध्यापकाः, िपयाः सहपािठनः, नमस्कारः।
aअद्य अहं पञ्चमहावते ष ु पथमस्य — अिहंसावतस्य — िवषये वदािम।
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अिहंसा इित कः अथः ? न िहंसा इित अिहंसा — कस्यािप पािणनः पीडनं न करणीयम्।
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अस्माकं पाठः वदित — ‘अिहंसा परमो धमः मनसा, वाचा, कमणा च अिहंसापालनम्’।
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अतः अिहंसा ित्रिवधा — मनसा अिहंसा, वाचा अिहंसा, कमणा अिहंसा च।
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कमणा अिहंसा सुगमा — वयं कमिप न ताडयामः।
a gl वाचा अिहंसा किठनतरा — कटु वचनम् अिप िहंसा एव।
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मनसा अिहंसा किठनतमा — मनिस द्वेषः अिप िहंसायाः बीजम्।
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aglशक्यः।
अस्माकं िवद्यालये अिप अस्य अभ्यासः
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यदा कश्चन सहपाठी परीक्षायाम् अल्पान् अङ् कान् पाप्नोित, तदा तस्य उपहासः न करणीयः — इयम् अिहंसा।
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यदा कश्चन मन्दं पठित, तदा तस्य सहायता करणीया — इयम् अिप अिहंसा।
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यदा वयं ु द्धाः भवामः, तदा क्षणं तूष्णी ं स्थातव्यम् — इयम् एव मनसा अिहंसा।
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पाठे ऋषभदे वः स्वयम् एतत् आचिरतवान् —
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सः िशष्यान् अबोधयत् यत् वृक्षेभ्यः स्वयं फलािनco नm g l a
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िकन्त ु सः तान् के वलं न उपिदष्टवान्l — िभक्षाथ ं पिस्थतः।
यः स्वयम् आचरित , त स्य एव उपदे शः फलित।
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अतः अहं पित ां करोिम — अद्य पभ ृित अहं वाचा अिप कञ्चन न पीडियष्यािम।
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se m धन्यवादः।
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( हन्द अनुवाद —) आदरणीय अध्यापकगण, प्रय सहपा ठयो, नमस्कार। आज म पाँच महाव्रत म से पहले — अ हसा व्रत —
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के वषय म बोलूँगा/बोलूँगी। अ हसा का अथ क्या है? ‘ हसा न हो’ — यही अ हसा है, अथात् कसी भी प्राणी को कष्ट नह दे ना
s e mधम है — मन से, वाणी से और कम से अ हसा का पालन।’ अतः अ हसा तीन प्रकार
क है। कम से अ हसा सरल है — हमlaकसी को मारते नह । वाणी से अ हसा क ठन है — कड़वा वचन भी हसा ही है। मन से
चा हए। हमारा पाठ कहता है — ‘अ हसा परम
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अ हसा सबसे क ठन है — मन म रखा े ष भी हसा का बीज है। इसका अभ्यास हमारे वद्यालय म भी सम्भव है : जब कोई
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सहपाठ परीक्षा म कम अंक लाए, तब उसका उपहास न करना — यही अ हसा है; जब कोई धीरे पढ़ता हो, तब उसक सहायता
करना — यह भी अ हसा है; जब हम क्रो धत ह , तब एक क्षण चुप रह जाना — यही मन से अ हसा है। पाठ म ऋषभदे व ने स्वयं
यही कया — उन्ह ने शष्य को समझाया क वृक्ष से स्वयं फल न तोड़, कन्तु केवल उपदे श नह दया, स्वयं भक्षा के लए नकल
पड़े। जो स्वयं आचरण करता है, उसी का उपदे श फलता है। इस लए म प्र तज्ञा करता/करती हूँ — आज से म वाणी से भी कसी
को कष्ट नह दूँ गा/दूँ गी। धन्यवाद।
यह भाषण अच्छा क्य माना जाएगा: (१) प रभाषा पहले वाक्य म आ गई; (२) प्रमाण पाठ का अपना वाक्य है,
बाहर से लाया हुआ नह ; (३) वभाजन स्पष्ट है — मन, वाणी, कम — और तीन को क ठनाई के क्रम म रखा गया
है, इस लए बात याद रह जाती है; (४) उदाहरण सुनने वाल के अपने जीवन से ह, इस लए वे जुड़ते ह; (५) कथा से
जोड़ — ऋषभदे व का उदाहरण भाषण को पाठ से बाँध दे ता है; (६) अन्त म एक छोटा-सा, सचमुच नभाने योग्य
संकल्प है, कोई बड़ी घोषणा नह । अन्य व्रत चुन तो यही छह चरण दोहराइए — जैसे ‘अप रग्रह’ पर बोलते समय
उदाहरण द जए क आवश्यकता से अ धक का पयाँ-वस्तुएँ जमा न कर और अ त रक्त पुस्तक कसी को दे द।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ-प रचय — यह गद्यकथा है, कोई काव्य नह । कथा का नायक है ऋषभ — राजा ना भ तथा रानी मरुदे वी का पुत्र, जो
आगे चलकर प्रजा के प्रेम से ‘राजा ऋषभदे वः’ कहलाया और जैनपरम्परा म प्रथम (आ द) तीथङ् कर माना जाता है। पाठ
उसक दो अवस्थाएँ दखाता है — पहले एक कुशल, प्रजावत्सल राजा, फर सब त्यागकर सत्य खोजने नकला महामु न।
कथावस्तु (राजा-भाग) — समाज म दु भक्ष तथा परस्पर व े ष उठे । ना भ ने सोचा क ऋषभ क राजनी त क परीक्षा का
यही उपयुक्त काल है और उसे राज्य स प दया। ऋषभ ने पहले कारण खोजा — जनता का आलस्य, कृ ष म कमी,
उत्पादनक्षमता का अभाव। फर उपाय कया — कृ षकाय, व वध पदाथ से भोजन नमाण, तन्तुओं से वस्त्र नमाण, गाय-घोड़े
आ द पशुओं का पालन, काष्ठ-धातु- शला से गृहोपयोगी वस्तुओं का नमाण, पात्र नमाण, गृह नमाण तथा नगर नमाण — इन
सब जीवनकौशल का प्र शक्षण। प रणाम — जनता स क्रय हुई, आ थक स्थ त सुदृढ़ हुई, राज्य पुनः सु भक्ष हो गया। पाठ
यहाँ कौ टलीय सुभा षत उद्धत करता है — ‘प्रजासुखे सुखं राज्ञः’।
कथावस्तु (वैराग्य-भाग) — ऋषभदे व ने व नता नगर बसाया, सा ाज्य फैलाया; सौ पुत्र म भरत तथा बाहुब ल और दो
पु त्रय म ब्राह्मी तथा सुन्दरी वख्यात हुईं। कन्तु एक दन राजप्रासाद म नृत्य करती हुई नतक अचानक गरकर मर गई। ‘इह
संसारे कम प शाश्वतं ना स्त’ — यह सोचकर ऋषभदे व ने भरत को व नता और बाहुब ल को तक्ष शला दे कर सब त्याग दया
और भक्षुरूप म नकल पड़े। यहाँ पाठ दूसरा सुभा षत दे ता है — ‘दै वाधीनं जगत्सवम्’।
उपवास, इक्षुरस तथा केवलज्ञान — प्रजा को यह पता ही नह था क भक्षा म भोजन दे ना चा हए — वे अपने प्रय महाराज
को दे खकर आभरण तथा अनघ वस्तुएँ दे ने लगे। इस लए ऋषभदे व को दन- दन उपवास करना पड़ा; एक बार तो भोज्यपदाथ
के अभाव म चार सौ दन नरन्तर उपवास हुआ। ह स्तनापुर के पास इक्षुक्षेत्र के माग से जाते हुए उन्ह उनके प्रपौत्र श्रेयांस ने
इक्षुरस पलाया — वह दन वैशाख क अक्षयतृतीया था। इसी से जैनपरम्परा म ‘व षतप-पारणा-महोत्सव’ आज भी
पालीताणा तथा ह स्तनापुर आ द तीथ म मनाया जाता है। आगे फाल्गुन कृष्ण एकादशी को प्रयागराज म अक्षयवट के नीचे
उन्ह केवलज्ञान मला और उन्ह ने भक्षु- भक्षुणी-श्रावक-श्रा वका का चतु वध सङ् घ बनाया।
पाठ का शीषक क्य प्राकृत म है — ‘णमो अ रहन्ताणं’ णमोकार (नवकार) महामन्त्र क पहली पं क्त है और यह मन्त्र
प्राकृत भाषा म है — पुस्तक स्वयं कहती है ‘यच्च प्राकृतभाषायां वतते’। संस्कृत म यही ‘नमः अहद्भ्यः’ है। इसी लए ‘न’ के
स्थान पर ‘ण’, ‘अहत्’ के स्थान पर ‘अ रहन्त’, ‘लोके’ के स्थान पर ‘लोए’ और ‘सवसाधूनाम्’ के स्थान पर ‘सव्वसाहूणं’
दखता है। इस पाठ का असली भा षक उ े श्य यही है — वद्याथ संस्कृत और प्राकृत के सम्बन्ध को पहचाने।
प्राकृत का प रचय (अत्र इदम् अवधेयम्) — पुस्तक सात प्राकृत भाषाएँ गनाती है — आषप्राकृत, मागधी, शौरसेनी,
महाराष्ट्री, पैशाची, चू लका तथा अपभ्रंश। जैनागम अधमागधी म लखे गए; महाराष्ट्री प्राकृत म महाक व हाल ने
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गाथासप्तशती लखी; शौरसेनी म अनेक नाट्यग्रन्थ रचे गए। नष्कष पुस्तक के अपने शब्द म — प्राकृत केवल बोलचाल क
भाषा नह , ‘उच्चको टसा हत्यस्य वा हनी’ थी। और सुन्दर उपमा — संस्कृत य द ोत स्वनी नद है, तो प्राकृत उसी का सरल
प्रवाह है।
भा षक वशेषताएँ — पाठ क संस्कृत सरल कथात्मक गद्य है, जसम क्तवतु-प्रयोग (कृतवान्, सम पतवान्, प्र श क्षतवान्,
र चतवान्, प्राप्तवान्) बार-बार आता है — इसी कारण अभ्यास का प्रश्न ४ कमवाच्य को कतृवाच्य म बदलवाता है। साथ ही
‘स्म’ के साथ लट् (कथय न्त स्म, यच्छ न्त स्म, करो त स्म) भूतकाल का अथ दे ता है, और लम्बे समास (जीवनप रव तनी,
नत्योपयो गवस्तूनाम्, द घका लकोपवासेन) पाठ को कसाव दे ते ह।
व्याकर णक बदु — अभ्यास चार कौशल जाँचता है : (१) समास — कमधारय (महाराजः, मूलसमस्याः), षष्ठी-तत्पुरुष
(प्रजासुखम्, भोजन नमाणम्), तृतीया-तत्पुरुष ( व ध ल खतम्), बहुव्री ह (प्राप्तानन्दः), अव्ययीभाव (प्र तगृहम्) तथा
मध्यमपदलोपी कमधारय (ब्राह्मी ल पः); (२) वाच्यप रवतन — कमवाच्य (तृतीया + क्त) से कतृवाच्य (प्रथमा + क्तवतु); (३)
स न्ध — यण्, गुण, द घ, वृ द्ध तथा वसगस न्ध; (४) कारक — सम्प्रदाने चतुथ (भरताय), कम ण तीया (तक्ष शलाम्),
अ धकरणे सप्तमी (ब्राह्मी लप्याम्)।
अभ्यास क्या माँगता है — ‘अभ्यासाद् जायते स द्धः’ के नीचे पाँच प्रश्न ह — एकपदे न उत्तर (६), पूणवाक्येन उत्तर (६),
समस्तपद- नमाण (९), वाक्यप रवतन (५) तथा स न्ध (७)। ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ म चौबीस तीथङ् कर क नामावली तथा
बारह प्रमुख तीथस्थान क सूची है, और ‘यस्तु क्रयावान् मनुजः स व ान्’ म चार क्रयाकलाप — जैन भोजनपद्ध त लखना,
पञ्चमहाव्रत लखना, णमोकारमहामन्त्र- दवस पर कक्षा म बोलना तथा कसी एक महाव्रत पर सहपा ठय के सामने भाषण
दे ना।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 10 णमो अ रहन्ताणम् AglaSem · NCERT Solutions
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ पाठ का वाक्य / प्रसंग
अ रहन्ताणम् (पुं.ष.ब.व.) िजतशत्रूणाम् अ रहन्त का ( जन्ह ने भीतरी ‘णमो अ रहन्ताणं’ — णमोकारमहामन्त्रस्य प्रथमा
शत्रु जीत लए) पङ् क्तः (पृ. 134)
अनेकान्तवादः (पुं.प्र.ए.व.) सत्यस्य बहुपक्षवादः अनेकान्तवाद — सत्य के अनेक जैनमतस्य प्रमुखाः सद्धान्ताः — … अनेकान्तवादः
पक्ष होते ह (पृ. 134)
अप रग्रहः (नञ्-तत्पुरुषः) न पिरग हः आवश्यकता से अ धक संग्रह न अप रग्रहः (आवश्यकात् अ धकं संग्रहः न करणीयः)
करना (पृ. 134)
आलस्यम् (नपुं.प्र.ए.व.) पमादः आलस्य जनानाम् आलस्यं, कृ षकाय न्यूनता … मूलसमस्याः
स न्त (पृ. 128)
इक्षुक्षेत्रम् (षष्ठी-तत्पुरुषः) इक्षोः (मध दु ण्डस्य) गन्ने का खेत ह स्तनापुरस्य समीपे स्थतस्य इक्षुक्षेत्रस्य पाश्वमागात्
क्षेत्र म् गच्छ त स्म (पृ. 133)
उपवासः (पुं.प्र.ए.व.) िनराहारवतम् उपवास चतुःशतं दना न नैरन्तयण उपवासं कृतवान् (पृ.
132)
केवलज्ञानम् (नपुं.प्र.ए.व.) कै वल्यस्य ानम् केवलज्ञान — पूण, नरपेक्ष ज्ञान प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं
प्राप्तवान् (पृ. 133)
तीथङ् करः (पुं.प्र.ए.व.) धममागपदशकः तीथकर — धम का माग दखाने अयमेव जैनसम्प्रदाये आ दमः तीथङ् करः (पृ. 133)
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दु भक्षम् (अव्ययीभावः) िभक्षायाः अभावः अकाल अथैकदा समाजे दु भक्षादयः समस्याः समुद्भवन् (पृ.
127)
दै वाधीनम् (षष्ठी-तत्पुरुषः) दै वस्य अधीनम् भाग्य के अधीन दै वाधीनं जगत्सव जन्मकमशुभावहम् (पृ. 130)
नवकारमन्त्रः (पुं.प्र.ए.व.) जैनपाथनामन्त्रः नवकार (णमोकार) मन्त्र तेषां परमो मन्त्रः नवकारमन्त्रः इ त प्र सद्धः (पृ.
134)
ब्राह्मी ल पः (मध्यमपदलोपी बाह्मीनाम्नी िलिपः ब्राह्मी नाम क ल प ‘ब्राह्मी लप्याः’ वकासः ब्राह्मी ारैव कृता इ त श्रूयते
कमधारयः) (पृ. 130)
वक्षुब्धम् (नपुं.प्र.ए.व.) उिद्वग्नम् वच लत, बेचैन अनया घटनया ऋषभदे वस्य मनः सहसा वक्षुब्धम्
अभवत् (पृ. 131)
शाश्वतम् (नपुं.प्र.ए.व.) िनत्यम् शाश्वत, सदा रहने वाला इह संसारे कम प शाश्वतं ना स्त (पृ. 131)
सङ् घः (पुं.प्र.ए.व.) समूहः संघ स एव क्रमः जैनसङ् घः इ त प्र सद्धः वतते (पृ. 133)
सम्भ्रान्ताः (पुं.प्र.ब.व.) िकं कतव्यमूढाः ककतव्य वमूढ़, हैरान भक्षायां क दातव्य म त सम्भ्रान्ताः सन्तः (पृ. 132)
सुप्र त ष्ठतम् (नपुं.प्र.ए.व.) दृ ढरूपेण स्थािपतम् अच्छ तरह जमा हुआ जनानां मनस्सु सुप्र त ष्ठतं स्थानं प्राप्तवान् (पृ. 130)
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