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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 11: वण ारण- श ा २
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
145 – 160 15 66 हन्द
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 11: वण च्चारण- शक्षा २
वण च्चारण- शक्षा २ शारदा (कक्षा ९) का एकादशः पाठः तथा पुस्तक का अ न्तम पाठ है। यह कोई कथा या ोक नह , शक्षा (वेदाङ्ग) का
व्यावहा रक पाठ है — और सीधे कक्षा ८ (द पकम्) के ‘वण च्चारण- शक्षा १’ का अगला भाग। वहाँ वण-उत्प त्त के तीन तत्त्व म से दो पढ़े जा चुके थे
— स्थानम् (षट् स्थाना न) तथा करणम् (षट् करणा न); तीसरा तत्त्व आभ्यन्तर-प्रयत्नः ‘अ ग्रमायां कक्षायाम्’ के लए छोड़ा गया था। वही यह पाठ है।
इसम पञ्च वधः आभ्यन्तर-प्रयत्नः — स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, ईषद्- ववृत, ववृत तथा संवृत — चत्र स हत समझाया गया है; फर वणमाला को प्रयत्न
के अनुसार बाँटा गया है, स्वर बनाम व्यञ्जन, समानाक्षर बनाम सन्ध्यक्षर तथा व्यञ्जन के चार भेद क तुलना-सार णयाँ द गई ह, और छह
स्थान के वण अलग-अलग सार णय म मुख- चत्र के साथ दखाए गए ह। पाठ के साथ सव शब्दे न भासते (पा रभा षक शब्दाथ-ता लका),
स्वाध्यायान्मा प्रमदः (पा णनीय- शक्षा के ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न-प्रकरणम्’ के नौ सूत्र) तथा अभ्यासाद् जायते स द्धः के छह प्रश्न — एकपदे न उत्तरम्,
पूणवाक्येन उत्तरा ण, मेलनम्, आम्/न-कथनम्, रेखाङ् कतपदाधारेण प्रश्न नमाणम् तथा वणसमुच्चय-चयनम् — क्रमशः हल कए गए ह। हर उत्तर
पहले संस्कृत म, फर कोष्ठक म हन्द अथ के साथ।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
शारदा (कक्षा 9) 145 – 160
खं ड प्रश्न
15 66
माध्यम
हन्द
पाठः — पूवस्याः कक्षायाः स्मरणम् : त्री ण तत्त्वा न, षट् स्थाना न, षट् करणा न — पृष्ठ 145
पाठस्य प्रारम्भः — कक्षा ८ के ‘वण च्चारण- शक्षा १’ से जोड़ तथा इस पाठ का वषय
पाठः
प्र.1 आस्यस्य अभ्यन्तरे वणानाम् उत्पत्त्यथ क त तत्त्वा न आवश्यका न भव न्त ? ता न का न च ?
उत्तरम् — आस्यस्य अभ्यन्तरे वणानाम् उत्पत्त्यथ त्री ण तत्त्वा न आवश्यका न भव न्त — (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग)
आभ्यन्तर-प्रयत्नः च।
( हन्द — मुँह के भीतर वण उत्पन्न होने के लए तीन तत्त्व आवश्यक होते ह — (क) स्थान, (ख) करण तथा (ग) आभ्यन्तर-
प्रयत्न।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
क्रमः तत्त्वम् क्या है कहाँ पढ़ा गया
(क) स्थानम् आस्य का वह स्थल जहाँ वायु वण-रूप में पकट होती है — षट् कक्षा ८ — द पकम्, ‘वण च्चारण- शक्षा
स्थानािन १’
(ख) करणम् आस्य का वह भाग जो उस स्थान को छू ता है या उसके पास कक्षा ८ — द पकम्, ‘वण च्चारण- शक्षा
जाता है — षट् करणािन १’
(ग) आभ्यन्तर- करण उस स्थान तक िकतने बल से , िकतने पास तक जाता है यही पाठ — कक्षा ९, शारदा,
पयत्नः — पञ्च पयत्नाः ‘वण च्चारण- शक्षा २’
पुस्तक का अपना वाक्य: ‘तत्रैव आस्यस्य अभ्यन्तरे वणानाम् उत्पत्त्यथ त्री ण तत्त्वा न आवश्यका न भव न्त — (क)
स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः च इत्य प वयम् अवलो कतवन्तः।’ ध्यान द जए — तीन तत्त्व एक
साथ काम करते ह। केवल स्थान बता दे ने से वण नह बनता; यह भी बताना पड़ता है क उस स्थान पर कौन-सा अङ्ग
गया और कैसे गया। ‘क’ और ‘ह’ दोन का स्थान कण्ठ है, दोन का करण भी कण्ठ ही है — फर भी दोन अलग
सुनाई दे ते ह, क्य क उनका प्रयत्न अलग है (क म स्पृष्ट, ह म ईषद्- ववृत)। यही इस पाठ का पूरा तक है।
व्याकरण: ‘त्री ण तत्त्वा न’ — ‘तत्त्वम्’ नपुंसक लङ्ग है, अतः संख्यावाची ‘ त्र’ का नपुंसक बहुवचन रूप त्री ण बना।
पु ल्लङ्ग म यही ‘त्रयः’ (त्रयः उपभेदाः) और स्त्री लङ्ग म ‘ त ः’ होता। अभ्यास १ (क) का उत्तर इसी रूप म दे ना है
— ‘त्री ण’, ‘त्रयः’ नह ।
प्र.2 आस्ये क त स्थाना न, क त करणा न च स न्त ? ता न नामतः लखत। (पृष्ठ १४५ के ‘षट् स्थाना न — षट्
करणा न’ चत्र के आधार पर)
उत्तरम् — आस्ये षट् स्थाना न (कण्ठः, तालु, मूधा, दन्तः, ओष्ठः, ना सका) तथा षट् करणा न (कण्ठः, ज ा-मध्यः, ज ा-
उपाग्रः, ज ा-अग्रः, ओष्ठः, ना सका) स न्त।
( हन्द — मुँह म छह स्थान और छह करण ह। दोन क गनती छह-छह है, पर नाम एक जैसे नह ।)
क्रमः स्थानम् तत्रत्यं करणम् करण कस प्रकार का वहाँ बनने वाले वण
१ कण्ठः कण्ठः स्वस्थानं करणम् अ आ अ३ · ए ऐ ओ औ (अंश) · क् ख् ग् घ् ङ् · ह् · वसगः
२ तालु िज ा-मध्यः ज ा करणम् इ ई इ३ · ए ऐ (अंश) · च् छ् ज् झ् ञ् · य् · श्
३ मूध िज ा-उपागः ज ा करणम् ऋ ॠ ऋ३ · ट् ठ् ड् ढ् ण् · र् · ष्
४ दन्तः िज ा-अगः ज ा करणम् ऌ ऌ३ · त् थ् द् ध् न् · ल् व् · स्
५ ओष्ठः ओष्ठः स्वस्थानं करणम् उ ऊ उ३ · ओ औ (अंश) · प् फ् ब् भ् म् · व्
६ नािसका नािसका स्वस्थानं करणम् ङ् ञ् ण् न् म् · अनुस्वारः
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
दो नयम, जो कक्षा ८ म सद्ध हो चुके ह: (१) तालु, मूधा तथा दन्तः — इन तीन स्थान का करण ज ा है,
केवल जीभ का भाग बदलता है (मध्य → उपाग्र → अग्र)। (२) कण्ठः, ओष्ठः तथा ना सका — इन तीन म जीभ
काम नह करती, इस लए ‘स्वस्थानम् एव करणम्’ — उसी स्थान का एक भाग दूसरे भाग से मलता है। पा णनीय-
शक्षा का सूत्र यही कहता है — ‘शेषाः — स्वस्थानकरणाः।’
स्वयं पर खए: ‘च’ बो लए — जीभ का बीच तालु से लगेगा। ‘ट’ बो लए — जीभ ज़रा मुड़कर उपाग्र से मूधा को
छु एगी। ‘त’ बो लए — जीभ क नोक दाँत पर आएगी। तीन म करण एक ही अङ्ग ( ज ा) है, पर भाग तीन अलग-
अलग।
प्र.3 ‘अ स्मन् पाठे — (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः — इत्यस्य वषये वस्तरेण अवग ामः।’ — अस्य वाक्यस्य कः आशयः
? अयं पाठः ‘वण च्चारण- शक्षा २’ इ त कमथ कथ्यते ?
उत्तरम् — अस्य वाक्यस्य आशयः अ स्त — पूवस्यां कक्षायां (क) स्थानस्य (ख) करणस्य च वषये वस्तरेण ातम्
आसीत्; अधुना अ स्मन् पाठे तृतीयस्य तत्त्वस्य — (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य — वषये वस्तरेण ास्यामः। यतः अयं पाठः
पूव-पाठस्य उत्तराधः अ स्त, अतः अस्य नाम ‘वण च्चारण- शक्षा २’ इ त।
( हन्द — पछली कक्षा म तीन तत्त्व म से दो — स्थान और करण — पढ़े जा चुके ह; इस पाठ म तीसरा तत्त्व आभ्यन्तर-प्रयत्न
वस्तार से पढ़ा जाएगा। यह पाठ पछले पाठ का दूसरा भाग है, इस लए इसका नाम ‘वण च्चारण- शक्षा २’ है।)
कक्षा / पाठ क्या पढ़ाया गया क्या छोड़ा गया
पुस्तक
कक्षा ८ — वण च्चारण- वाग्-उत्पि -पि या (नािभपदे शः → उरः → कण्ठ-िबलः → आस्यम्), आभ्यन्तर-प्रयत्नः —
दीपकम् शक्षा १ स्थानम् तथा करणम्, षट् स्थानािन–षट् करणािन, मुर ली-दृ ष्टान्तः, पािणनीय- ‘अ ग्रमायां कक्षायां
िशक्षा का करण-पकरणम् ास्यामः’
कक्षा ९ — वण च्चारण- आभ्यन्तर-पयत्नः — पञ्चिवधः; पयत्नानुसारं वणमाला; स्वर-व्यञ्जन, बाह्य-प्रयत्नः — केवल
शारदा शक्षा २ समानाक्षर-सन्ध्यक्षर तथा व्यञ्जनों के चार भेदों की तुल ना; षट् सु स्थानेष ु नाम आया, ववेचन नह
वण-सारण्यः; पािणनीय-िशक्षा का आभ्यन्तर-पयत्न-पकरणम्
क्रम शास्त्र का ही क्रम है: पा णनीय- शक्षा म भी यही क्रम है — पहले स्थान-प्रकरणम् (कक्षा ६), फर करण-
प्रकरणम् (कक्षा ८), फर आभ्यन्तर-प्रयत्न-प्रकरणम् (कक्षा ९)। पाठ्यपुस्तक ने वेदाङ्ग ‘ शक्षा’ के इसी सल सले
को तीन कक्षाओं म बाँटकर पढ़ाया है। इस लए इस पाठ को पढ़ने से पहले कक्षा ८ का षट् स्थान–षट् करण चक्र एक
बार दोहरा लेना सबसे अ तैयारी है।
ध्यान द: पाठ ‘तीन तत्त्व’ क बात करता है, पर आगे स्वाध्याय-खण्ड म पता चलता है क ‘प्रयत्न’ स्वयं दो प्रकार
का है — आभ्यन्तर तथा बाह्य। यह पाठ केवल आभ्यन्तर तक सी मत है — पुस्तक का अ न्तम सूत्र ही कहता है
‘इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः’ (यहाँ तक आभ्यन्तर-प्रयत्न क चचा हुई)।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २
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(ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः — पृष्ठ 146–148
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प रभाषा तथा पञ्च वधाः आभ्यन्तर-प्रयत्नाः — स्पृष्टः, ईषत्-स्पृष्टः, ईषद्- ववृतः, ववृतः, संवृतः
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पाठः
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‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ कः उच्यते ? सः क त वधः भव त ?
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प्र.1
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उत्तरम् (पुस्तकस्य प रभाषा) — आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृश त, स्थानस्य समीपं वा या त, सः प्रयत्नः
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‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ इ त उच्यते। आभ्यन्तर-प्रयत्नः पञ्च वधः भव त।
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( हन्द — मुँह के भीतर करण जस प्रयत्न (बल) से स्थान को छू ता है अथवा स्थान के समीप जाता है, वही प्रयत्न ‘आभ्यन्तर-
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प्रयत्न’ कहलाता है। यह पाँच प्रकार का होता है।)
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m .cतीन टुकड़ म तो ड़ए — a
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प रभाषा को
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ag आस्यस्य अभ्यन्तरे — यह प्रयत्न मुँह के भीतर होता है। इसी लए इसका नाम ‘आभ्यन्तर’ है; जो प्रयत्न बाहर श्वास, नाद, घोष
आ द के रूप म दखता है वह ‘बाह्य’ कहलाता है।
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यही दो सम्भावनाएँ आगे पाँच प्रयत्न म बँट जाती ह। .c agl
करणं … स्थानं स्पृश त, स्थानस्य समीपं वा या त — दो ही सम्भावनाएँ ह : या तो करण स्थान को छू ले, या पास तक जाए।
a s emम छु आ या कतने पास गया। मात्रा बदलते ही वण बदल जाता है।
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येन प्रयत्नेन — पूछा यह जा रहा है क कस मात्रा
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क्रमः आभ्यन्तर- करण क्या करता है उससे बनने वाले वण
प्रयत्नः
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.co स्पष्ृ ट-पयत्नः थानं ‘स्पष्ट-रूपेण स्पशृ ित’ — पूरी तरह छू ता है
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१ स् स्पश-व्यञ्जना न (क् … म् — २५)
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agl ईषत्-स्पष्ृ ट-पयत्नः स्
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थानं ‘स्वल्पम् एव स्पशृ ित’ — बहुत थोड़ ा छू ता अन्तःस्थ-व्यञ्जना न (य् र् ल् व् — ४)
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छू ता नहीं, ‘बहु समीपं याित’m
o — बीच में ‘लघुः
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३ ईषद् -िववृत-पयत्नः ऊष्म-व्यञ्जना न (श् ष् स् ह् — ४) तथा अयोगवाहौ
िववरः’ रहता है em
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(अनुस्वार- वसग — २)
४ िववृत-पयत्नः g l
छू ताaनहीं, ‘िकिञ्चत् समीपं याित’ — बीच में अ-कारं वहाय अन्ये सव स्वराः (२१)
‘स् फु टः िववरः’ रहता है
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कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये ‘संकोचः’ भवित — m .
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५ संवृत-पयत्नः केवलम् अ-कारः (ह्रस्वः — ०१)
m कण्ठ िसकु ड़ जाता है
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ag पाँच को एक रेखा पर र खए: स्थान और करण के बीच क दूरी घटती-बढ़ती जाती है — पूरा स्पश → थोड़ा स्पश
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→ बहुत छोटा अन्तराल → स्पष्ट अन्तराल। यह एक सीढ़ है, चार अलग-अलग खाने नह । पाँचवाँ (संवृत) इस
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सीढ़ से बाहर का अपवाद है — उसम दूरी बढ़ती नह , कण्ठ स्वयं सकुड़ जाता है।
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हाथ से जाँ चए: क् — प् — ट् बो लए, दोन अङ्ग पूरी तरह मलते ह (स्पृष्ट)। अब य् — व् बो लए, स्पश होता तो है
पर ढ ला (ईषत्-स्पृष्ट)। अब श् — स् — ह् बोलकर हथेली मुँह के आगे र खए — वायु लगातार बहती मलेगी,
क्य क रास्ता कह बन्द ही नह हुआ (ईषद्- ववृत)। और आ — ई — ऊ बो लए — मुँह पूरा खुला ( ववृत)।
प्र.2 ‘स्पृष्ट-प्रयत्नः’ कदा भव त ? तेन के वणाः उत्पद्यन्ते ? (पृष्ठ १४६)
उत्तरम् — करणं यदा स्थानं ‘स्पष्ट-रूपेण स्पृश त’, तदा करणस्य ‘स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भव त। करणस्य स्पृष्ट-प्रयत्नेन → स्थाने
स्पश-व्यञ्जना न उत्पद्यन्ते।
( हन्द — करण जब स्थान को पूरी तरह, स्पष्ट रूप से छू लेता है, तब करण का ‘स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है। इसी प्रयत्न से उस स्थान
पर स्पश-व्यञ्जन उत्पन्न होते ह।)
वण-वगः स्थानम् करणम् वणाः जस शब्द म सु नए
कण्ठ ाः कण्ठः कण्ठः (स्वस्थानम्) क् ख् ग् घ् ङ् कमलम्, खगः, गजः, घटः, वाङ् मयम्
तालव्याः तालु िज ा-मध्यः च् छ् ज् झ् ञ् चन्द्रः, छत्रम्, जलम्, झङ् कारः, याञ्चा
मूध न्याः मूधा िज ा-उपागः ट् ठ् ड् ढ् ण् टङ् कः, ठक्कुरः, डमरुः, मूढ◌ः, गुण◌ः
दन्त्याः दन्तः िज ा-अगः त् थ् द् ध् न् तरुः, रथ◌ः, दन्तः, धनम्, नद
ओष्ठ ाः ओष्ठः ओष्ठः (स्वस्थानम्) प् फ् ब् भ् म् प◌ुष्पम्, फलम्, ब◌ालकः, भ◌ानुः, म◌ाता
‘स्पश’ नाम ही प रभाषा है: पच्चीस वग य व्यञ्जन को ‘स्पशाः’ इसी लए कहा जाता है क इनम करण स्थान को
सचमुच छू लेता है और वायु का माग क्षण भर के लए पूरा बन्द हो जाता है। यही कारण है क इन्ह लम्बा ख चकर
नह बोला जा सकता — ‘स्’ को आप ख च सकते ह, ‘क्’ को नह । पुस्तक ने उदाहरण के लए हर बार मूधन्य वण
चुने ह, क्य क जीभ के मुड़ने से चत्र म अन्तर सबसे स्पष्ट दखता है।
ध्यान द: पाँचवाँ वण (ङ् ञ् ण् न् म्) दो स्थान वाला है — वह अपने वग के स्थान का भी है और ना सका का भी,
क्य क उसम वायु नाक से नकलती है। पृष्ठ १५७ क सारणी म ये पाँच वण ना सक्य पं क्त म फर से आते ह।
प्र.3 ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ कदा भव त ? तेन के वणाः जायन्ते ? (पृष्ठ १४६)
उत्तरम् — करणं यदा स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृश त’, तदा करणस्य ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भव त। करणस्य ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नेन
→ स्थाने अन्तःस्थ-व्यञ्जना न जायन्ते।
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( हन्द — करण जब स्थान को बहुत थोड़ा ही छू ता है, तब करण का ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है। इसी से उस स्थान पर अन्तःस्थ
व्यञ्जन उत्पन्न होते ह।)
अन्तःस्थ-वणः स्थानम् करणम् तत्सदृशः स्वरः जस शब्द म सु नए
य् तालु िज ा-मध्यः इ यमुना, य ः
र् मूधा िज ा-उपागः ऋ र वः, र◌ामः
ल् दन्तः िज ा-अगः ऌ लता, ल◌ोकः
व् दन्तः + ओष्ठः िज ा-अगः + अधरोष्ठः उ वनम्, वि◌द्या
‘अन्तःस्थ’ नाम क्य : ये चार वण स्वर और व्यञ्जन के बीच म खड़े ह — इसी लए ‘अन्तःस्थाः’, और इसी लए
पुस्तक इन्ह ‘अध-स्वराः’ भी कहती है। स्पश वण जतना बन्द होना इनम नह है, स्वर जतना खुलापन भी नह ।
ध्यान द जए — य् : इ, र् : ऋ, ल् : ऌ, व् : उ — हर अन्तःस्थ वण के ठ क सामने एक स्वर खड़ा है और दोन का
स्थान एक ही है। स न्ध का नयम ‘इको यण च’ (इ→य्, उ→व्, ऋ→र्, ऌ→ल्) इसी ध्व न-सम्बन्ध पर टका है।
व् क वशेषता: ‘व्’ अकेला ऐसा व्यञ्जन है जो पृष्ठ १५७ क सारणी म दो पं क्तय म आता है — दन्त्य म भी
और ओष्ठ्य म भी। इसी लए इसे दन्त्योष्ठ्यः ( -स्थानी) कहते ह : जीभ क नोक दाँत के पास और नीचे का ह ठ
ऊपर के दाँत के पास — दोन एक साथ।
प्र.4 ‘ईषद्- ववृत-प्रयत्नः’ कदा भव त ? तेन के वणाः जायन्ते ? (पृष्ठ १४७)
उत्तरम् — करणं यदा स्थानं न स्पृश त, परन्तु स्थानस्य बहु समीपं या त, तदा उभयोः स्थान-करणयोः मध्ये ‘लघुः ववरः’ इव
स्वल्पः अन्तरालः जायते — तदा करणस्य ‘ईषद्- ववृत-प्रयत्नः’ भव त। करणस्य ईषद्- ववृत-प्रयत्नेन → स्थाने ऊष्म-
व्यञ्जना न जायन्ते, तथा च → स्थाने अयोगवाहौ — अनुस्वार- वसग अ प जायेते।
( हन्द — करण जब स्थान को छू ता नह , पर उसके बहुत पास चला जाता है और दोन के बीच एक छोटा-सा छे द जैसा अन्तराल
रह जाता है, तब ‘ईषद्- ववृत-प्रयत्न’ होता है। इसी से ऊष्म व्यञ्जन तथा अयोगवाह — अनुस्वार और वसग — बनते ह।)
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वणः भेदः स्थानम् करणम् जस शब्द म सु नए
श् ऊष्मा तालु िज ा-मध्यः शि◌वः, श◌ा न्तः
ष् ऊष्मा मूधा िज ा-उपागः षट् , भाष◌ा
स् ऊष्मा दन्तः िज ा-अगः सत्यम्, सरः
ह् ऊष्मा कण्ठः कण्ठः (स्वस्थानम्) ह◌ंसः, ह रः
अं (अनुस्वारः) अयोगवाहः ना सका नािसका (स्वस्थानम्) अ◌ंशः, स◌ंस्कृतम्
अः (िवसगः) अयोगवाहः कण्ठः कण्ठः (स्वस्थानम्) राम◌ः, बालक◌ः
‘ऊष्मा’ का अथ ‘गरमी’ है: इन चार वण म माग कह बन्द नह होता, इस लए वायु लगातार रगड़ खाती हुई
नकलती है और उसम एक ऊष्मा जैसी सरसराहट पैदा होती है — इसी लए नाम ‘ऊष्माणः’। यही कारण है क श्,
ष्, स्, ह् को आप जतनी दे र चाह ख च सकते ह, जब क क्, ट् , प् को नह । ‘लघुः ववरः’ ही इनका पूरा रहस्य है —
रास्ता ज़रा-सा खुला रहता है, इस लए ध्व न चलती रहती है।
अयोगवाह क्य साथ आए: अनुस्वार और वसग भी बना रुकावट के, केवल संकरे रास्ते से नकलने वाली ध्व नयाँ
ह — इस लए इनका प्रयत्न भी वही ‘ईषद्- ववृत’ है। ‘अयोगवाह’ का अथ ही है — ‘अयोगे (वणमाला के कसी वग
म योग न होने पर भी) वाहः (जो अथ को ढोता है)’। ये न पूरे स्वर ह, न पूरे व्यञ्जन, फर भी इनके बना संस्कृत
लखी ही नह जा सकती।
प्र.5 ‘ ववृत-प्रयत्नः’ कदा भव त ? तेन के वणाः उच्चायन्ते ? ‘लघुः ववरः’ तथा ‘ ु टः ववरः’ इत्यनयोः का भन्नता ?
(पृष्ठ १४७)
उत्तरम् — करणं यदा स्थानं न स्पृश त, अ पतु स्थानस्य क ञ्चत् समीपं या त, तदा उभयोः स्थान-करणयोः मध्ये ‘ ु टः
ववरः’ इव अन्तरालः जायते — तदा करणस्य ‘ ववृत-प्रयत्नः’ भव त। करणस्य ववृत-प्रयत्नेन → स्थाने (अ-कारं वहाय
अन्ये सव) स्वराः उच्चायन्ते।
( हन्द — करण जब स्थान को छू ता नह , केवल कुछ ही पास तक जाता है और दोन के बीच एक स्पष्ट खुला अन्तराल बन जाता
है, तब ‘ ववृत-प्रयत्न’ होता है। इससे ह्रस्व ‘अ’ को छोड़कर शेष सभी स्वर बोले जाते ह।)
‘लघुः ववरः’ तथा ‘ ु टः ववरः’ — भेदः —
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तुलना- बन्दुः ईषद्- ववृत-प्रयत्नः ववृत-प्रयत्नः
करणं िकयत् समीपं याित स् थानस्य बहु समीपम् थानस्य िकिञ्चत् समीपम्
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अन्तरालः कीदृ शः ‘ लघुः िववरः’ इव स्वल्पः अन्तरालः ‘स् फु टः िववरः’ इव अन्तरालः
वायोः गितः संकरे माग घषणेन (सरसराहट के साथ) खुले माग िनब धम्
उत्पद्यमानाः वण ः ऊष्माणः (श् ष् स् ह्) तथा अयोगवाहौ (अं अः) अ-कारं िवहाय सव स्वराः (२१)
ववृत-प्रयत्न से बोले जाने वाले २१ स्वर —
भेदः स्थानम् स्वराः
समानाक्षरािण कण्ठ्याः आ, अ३
समानाक्षरािण तालव्याः इ, ई, इ३
समानाक्षरािण मूधन्याः ऋ, ॠ, ऋ३
समानाक्षरािण दन्त्याः ऌ, ऌ३
समानाक्षरािण ओष्ठ्याः उ, ऊ, उ३
सन्ध्यक्षरािण कण्ठ-तालव्याः ए, ए३, ऐ, ऐ३
सन्ध्यक्षरािण कण्ठ-ओष्ठ्याः ओ, ओ३, औ, औ३
गनती मलाइए: २ + ३ + ३ + २ + ३ = १३ समानाक्षर (ह्रस्व अ को छोड़कर) और ८ सन्ध्यक्षर — कुल २१ स्वर
ववृत-प्रयत्न वाले। इनम ह्रस्व ‘अ’ जोड़ द जए तो कुल स्वर २२ हो जाते ह। पृष्ठ १५२ क सारणी यही कहती है —
‘स्वराः (२१) – ववृत-प्रयत्नः; अ-कारः (०१) – संवृत-प्रयत्नः’। (यहाँ केवल शुद्ध अथात् नरनुना सक स्वर गने गए
ह, अनुना सक स्वर नह — यह बात पुस्तक स्वयं तारां कत टप्पणी म कहती है।)
पाठ का पे टका-वाक्य (पृष्ठ १४७): ‘कण्ठ्य-तालव्य-मूधन्य-दन्त्य-ओष्ठ्येषु पञ्च-प्रकारेषु वणषु — स्थान-
करणयोः मध्ये उपयुक्ताः चतु वधाः आभ्यन्तर-प्रयत्नाः दृश्यन्ते।’ अथात् ऊपर के चार प्रयत्न पाँच प्रकार के
वण म दखाई दे ते ह; पाँचवाँ (संवृत) केवल कण्ठ म और केवल एक ही वण के लए है — यही अगले प्रश्न का वषय
है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २
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‘संवृत-प्रयत्नः’ कस्य वणस्य उच्चारणे भव त ? सः कुत्र भव त ? ‘अ-कारः व शष्टः स्वरः’ इ त कमथम् उच्यते ?
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प्र.6
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(पृष्ठ १४८–१४९)
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उत्तरम् — वशेषरूपेण ‘अ-कारस्य’ (ह्रस्वस्य) उच्चारणे ‘संवृत-प्रयत्नः’ भव त। सः केवलं कण्ठ-स्थाने एव भव त, तद प
co m
केवलम् अ-कारस्य उच्चारणाथम् एव। अतः स्वरेषु ‘अ-कारः’ क श्चद् व शष्टः स्वरः अ स्त।
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( हन्द — वशेष रूप से ह्रस्व ‘अ’ के उच्चारण म ‘संवृत-प्रयत्न’ होता है। यह केवल कण्ठ स्थान म होता है, और वह भी केवल ‘अ’ ag
के लए। इसी लए स्वर म ‘अ’ एक व शष्ट स्वर है।)
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तक क पूरी ंखला (पुस्तक के क्रम से) — a
1. ‘अ-वण’ के तीन उपभेद ह — अ-कारः (ह्रस्वः), आ-कारः (द घः), अ३-कारः (प्लुतः)।
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2. ये तीन ‘स्वराः’ भी ह और ‘कण्ठ्य-वणाः’ भी। कण्ठ्य वण म स्वस्थानम् एव करणं भव त — अथात् कण्ठ्य वण का स्थान
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भी कण्ठ (कण्ठस्य पृष्ठ-भागः) और करण भी कण्ठ (कण्ठस्य अग्र-भागः)।
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3. इनम से केवल आ-कार (द घ) तथा अ३-कार (प्लुत) के उच्चारण म कण्ठ के भीतर स्थान और करण के बीच ‘ ु टः ववरः’
l ा अन्तराल बनता है — अतः अन्य स्वर क तरह इन दोन का प्रयत्न भी पूववत् ववृत ही है।
ag4. परन्तु अ-कार (ह्रस्व) म ऐसा नह होता। यहाँ कण्ठ म स्थान-करण के बीच ‘संकोचः’ हो जाता है — ‘कण्ठः संकु चतः संक णः
जै स
om ।’ a s
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वा भव त’। कण्ठ का यही संकोच अथवा संक णता ‘संवृतम्’ कहलाती है।
5. अतः ‘कण्ठे करणस्य संवृत-प्रयत्नेन → स्थाने अ-कारः.cउच्चायते
a s em
अ-वणस्य उपभेदः मात्रा agl स्थानम् करणम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः
संवृतo-पm
यत्नः — अपवादः
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अ (ह्रस्वः) एकमात्रः कण्ठः (पृष्ठ-भागः) कण्ठः (अग्र-भागः)
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se िववृत-पयत्नः
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आ (दीघः) मात्रः कण्ठः (पृष्ठ-भागः) कण्ठः (अग्र-भागः)
a s eअ३m(प्लुतः) िववृत-पयत्नः
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त्रमात्रः कण्ठः (पृष्ठ-भागः) कण्ठः (अग्र-भागः)
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स्वयं बोलकर दे खए: ‘आ’ लम्बा बो लए — कण्ठ और मुँह दोन चौड़े खुलते ह। अब झटके से ‘अ’ बो लए — मुँह
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m .cहै। दोन का स्थान एक (कण्ठ) है, दोन का करण भी एक है — फर ag
se अलग है। यही एक उदाहरण पूरे पाठ को सद्ध कर दे ता है क स्थान और
उतना नह खुलता, गला ज़रा-सा सकुड़ा रहता
भी दोन अलग सुनाई दे ते ह, क्य क a
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ag — क्य आवश्यक है।
प्रयत्न
करण के बाद तीसरा तत्त्व — प्रयत्न
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पुस्तक का पे टका-वाक्य (पृष्ठ १४९): ‘केवलं कण्ठ-स्थाने एव संवृत-प्रयत्नः भवmत, तद प केवलम् अ-
o m उच्चारणाथम् एव।’ — दो बार ‘केवलम्’ आया है, इस लए दो बन्धनlयाद a seर खए : (१) केवल कण्ठ म,
g
.c(२) केवल ह्रस्व अ के लए। अभ्यास १ (च) ‘संवृत-प्रयत्नः कुत्र भव त ?’aका
कारस्य
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उत्तर इसी वाक्य से नकलता है।
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प्र.7 पञ्चानाम् आभ्यन्तर-प्रयत्नानां सारण रचयत — प्रयत्नः, करणस्य क्रया, उत्पद्यमानाः वणाः, तेषां सङ् ख्या च।
उत्तरम् — पञ्च वधानाम् आभ्यन्तर-प्रयत्नानां पूणा सारणी —
क्रमः आभ्यन्तर- पुस्तकस्य वाक्यम् (करणस्य उत्पद्यमानाः वणाः सङ् ख्या उदाहरणम्
प्रयत्नः क्रया)
१ स्पष्ृ ट-पयत्नः करणं स्थानं ‘स्पष्ट-रूपेण स्पृश त’ पश-व्यञ्जनािन
स् २५ क् च् ट् त् प्
(वग याः)
२ ईषत्-स्पष्ृ ट- करणं स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृश त’ अन्तःस्थ-व्यञ्जनािन ०४ य् र् ल् व्
पयत्नः (अध -स्वराः)
३ ईषद् -िववृत- करणं न स्पृश त, ‘बहु समीपं या त’ ऊष्म-व्यञ्जनािन + ०४ + ०२ श् ष् स् ह् · अं अः
पयत्नः — ‘लघुः ववरः’ अयोगवाहौ
४ िववृत-पयत्नः करणं न स्पृश त, ‘ क ञ्चत् समीपं अ-कारं िवहाय अन्ये सव २१ आइईउऊऋएऐ
या त’ — ‘ ु टः ववरः’ स्वराः ओऔ…
५ संवृत-पयत्नः कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये के वलम् अ-कारः (ह्रस्वः) ०१ अ
‘संकोचः’ भव त
सारणी को उलटकर भी प ढ़ए — प्रश्न प्रायः दूसरी दशा से पूछा जाता है : ‘इस वण का प्रयत्न कौन-सा ?’ तब
यह क्रम काम आएगा — वग का वण → स्पृष्ट; य र ल व → ईषत्-स्पृष्ट; श ष स ह तथा अं अः → ईषद्- ववृत; कोई
भी स्वर → ववृत; केवल ह्रस्व अ → संवृत। अभ्यास का प्रश्न ३ (मेलनम्) ठ क इसी उलट दशा से पूछा गया है।
तीन प्रयत्न व्यञ्जन के, दो स्वर के: ध्यान द जए — पहले तीन प्रयत्न केवल व्यञ्जन बनाते ह और अ न्तम दो
केवल स्वर। इसी लए पृष्ठ १५२ क सारणी म स्वर के खाने म ‘ ववृत, संवृत’ और व्यञ्जन के खाने म ‘स्पृष्ट, ईषत्-
स्पृष्ट, ईषद्- ववृत’ लखे ह। यह एक वाक्य म पूरा वग करण याद कर लेने का सूत्र है।
अङ्गली-मुरली-दृष्टान्तः तथा पाठस्य उपसंहारः — पृष्ठ 149
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स्थान–करण–प्रयत्न का बाँसुरी-दृष्टान्त तथा ‘इस ान से क्या मलता है’
पाठः
प्र.1 पृष्ठ १४९ के चत्र म मुरली (वंशी) तथा अङ्ग लय का दृष्टान्त कस प्रकार स्थान, करण तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न को
समझाता है ?
उत्तरम् — पुस्तकस्य दृष्टान्तः त्र भः वाक्यैः पूणः भव त —
चत्रे यत् दृश्यते पुस्तकस्य वाक्यम् उच्चारणे हन्द म
तत्तुल्यम्
अङ् ग िु लिच्छद ािण अङ् गिु लिच्छदािण → स्थानािन इव स्थानम् छे द स्थर ह, अपनी जगह से हलते नह —
(बाँस ुर ी के छे द ) जैसे कण्ठ, तालु, मूधा, दन्त, ओष्ठ, ना सका
अङ् ग ल
ु यः (उँ ग िलयाँ) अङ् गलु यः → करणािन इव करणम् उँ ग लयाँ हलती ह और छे द तक जाती ह —
जैसे ज ा, ओष्ठ आ द
अङ् ग ल
ु े ः िछद ं पित दबावः अङ् गलु े ः — अङ् गिु लिच्छदं पित यः आभ्यन्तर- उँ गली छे द को पूरा ढाँपे, आधा ढाँपे या ज़रा
पयत्नः, सः → आभ्यन्तर-पयत्नः इव प्रयत्नः ऊपर रहे — यही ‘ कतना’ ही प्रयत्न है
दृष्टान्त इतना अ ा क्य है: बाँसुरी म छे द वही रहते ह और उँ ग लयाँ वही रहती ह — फर भी अनेक स्वर
नकलते ह। बदलता क्या है ? केवल उँ गली और छे द का सम्बन्ध — पूरी तरह बन्द, आधा बन्द, या खुला। मुँह के
भीतर भी छह स्थान और छह करण ही ह, पर उनसे पचास से भी अ धक वण नकल आते ह (२२ स्वर + ३५
व्यञ्जन), क्य क हर बार प्रयत्न बदल जाता है। कक्षा ८ म यही दृष्टान्त केवल स्थान और करण तक था; इस पाठ ने
उसम तीसरा — और सबसे नणायक — तत्त्व जोड़ दया।
करके दे खए: बाँसुरी न हो तो एक खाली बोतल ली जए। मुँह पूरा ढककर फूँ कए — कोई ध्व न नह (यह ‘स्पृष्ट’
जैसा बन्द है)। मुँह के ठ क ऊपर तरछे फूँ कए — गूँज उठे गी (यह ‘ईषद्- ववृत’ जैसा है)। बहुत दूर से फूँ कए —
केवल हवा क आवाज़ (‘ ववृत’)। तीन म ह ठ और बोतल वही ह, केवल प्रयत्न बदला।
प्र.2 ‘आस्ये वद्यमानानाम् एतेषां स्थान–करण–आभ्यन्तर-प्रयत्नानां सम्यक्- ानेन, तथा पुनःपुनः अभ्यासेन च वयं क
कतु प्रभवामः ?’ — पाठस्य उपसंहार-वाक्यानां आशयं लखत।
उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — आस्ये वद्यमानानाम् एतेषां स्थान–करण–आभ्यन्तर-प्रयत्नानां सम्यक्- ानेन, तथा पुनःपुनः
अभ्यासेन च वयं प्रत्येक-वणस्य एवञ्च सवषां शब्दानां सुस्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कतु प्रभवामः।
( हन्द — मुँह के भीतर वद्यमान इन स्थान, करण तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न के सम्यक् ान से और बार-बार के अभ्यास से ही हम
प्रत्येक वण का तथा सभी शब्द का सुस्पष्ट और शुद्ध उच्चारण कर पाते ह।)
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उपसंहार म पुस्तक तीन लाभ गनाती है —
1. शुद्ध उच्चारण — हर वण का और हर शब्द का ‘सुस्पष्टं शुद्धं च’ उच्चारण सम्भव होता है।
2. स्वर-व्यञ्जन का भेद — ‘एवमेव वणमालायां स्वर-व्यञ्जनयोः मध्ये का भन्नता ? इत्य प यथावत् अवबोधामः।’ अथात् अब
हम ठ क-ठ क समझ पाते ह क स्वर और व्यञ्जन म अन्तर क्या है।
3. व्यञ्जन के भीतर का भेद — ‘पुनश्च, व्यञ्जनानां मध्ये अ प — स्पशाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहौ चे त ये भेदाः
स न्त; तेषाम् अ प परस्पर- भन्नतां यथो चतम् अवग ामः।’
ध्यान द जए — ‘ ानेन’ अकेला नह , ‘अभ्यासेन च’ भी: पुस्तक दोन को एक साथ रखती है। केवल सारणी
याद कर लेने से उच्चारण शुद्ध नह होता; बोल-बोलकर जीभ को वह स्थ त सखानी पड़ती है। इसी लए अभ्यास-
खण्ड का नाम भी ‘अभ्यासाद् जायते स द्धः’ है — स द्ध अभ्यास से ही आती है। यही इस पाठ के तीन खण्ड
को जोड़ने वाला सूत्र है।
यही उपसंहार आगे के पन्न क भू मका है: वाक्य म जो दो प्रश्न उठाए गए — ‘स्वर और व्यञ्जन म क्या अन्तर ?’
तथा ‘व्यञ्जन के चार भेद म क्या अन्तर ?’ — उन्ह के उत्तर पृष्ठ १५२ क तीन तुलना-सार णय म दए गए ह।
पाठ प्रश्न पहले उठाता है, उत्तर तीन पन्ने बाद दे ता है।
प्र.3 ‘वणमालायां स्वर-व्यञ्जनयोः मध्ये का भन्नता ?’ — आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य आधारेण संक्षेपेण उत्तरं लखत।
उत्तरम् — स्वराणाम् उच्चारणे करणं स्थानं न स्पृश त ( ववृत-प्रयत्नः, अ-कारे संवृत-प्रयत्नः); व्यञ्जनानाम् उच्चारणे तु
करणं स्थानं स्पृश त अथवा तस्य अतीव समीपं या त (स्पृष्ट-, ईषत्-स्पृष्ट-, ईषद्- ववृत-प्रयत्नाः)। इयम् एव मूला भन्नता।
( हन्द — स्वर के उच्चारण म करण स्थान को छू ता ही नह — माग खुला रहता है; व्यञ्जन के उच्चारण म करण स्थान को छू ता है
या उसके बहुत पास चला जाता है — माग रुकता या सँकरा हो जाता है। यही मूल अन्तर है।)
बन्दुः स्वरः व्यञ्जनम्
करणस्य ि या स्थानं न स्पशृ ित थानं स्पशृ ित, अथवा अतीव समीपं याित
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आभ्यन्तर-पयत्नः िववृतः (२१), संवृतः (अ — ०१) प ृ टः २५), ईषत्-स्पष्ृ टः (०४), ईषद् -िववृतः (०४ + ०२)
स् ष् (
स्वातन्त्र्यम् स्वतन्त्रः वणः — उच्चारणाथम् अन्य-वणः न आवश्यकः परतन्त्रः वणः — उच्चारणाथम् आधार-स्वरः आवश्यकः
मात्रा एकमात्रः / ि मात्रः / ित्रमात्रः वा अधमात्रः िनत्यम्
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दोन कसौ टयाँ एक ही तथ्य के दो चेहरे ह: स्वर म माग खुला रहता है, इसी लए उसे जतना चाह ख चा जा
सकता है — और इसी लए उसक मात्रा एक, दो या तीन हो सकती है। व्यञ्जन म माग रुक या सकुड़ जाता है,
इसी लए वह अकेला टक ही नह सकता — उसे सहारे के लए स्वर चा हए (क् + अ = क), और इसी लए उसक
मात्रा सदा आधी मानी जाती है। प्रयत्न से मात्रा नकलती है और मात्रा से स्वातन्त्र्य — यही पृष्ठ १५२ क पहली
सारणी का तक है।
वणमाला — आभ्यन्तर-प्रयत्नानुसारं वण- वभाजनम् — पृष्ठ 150
पत्र- चत्रे प्रद शता स ूणा वणमाला — स्वराः (समानाक्षरा ण, सन्ध्यक्षरा ण) तथा व्यञ्जना न (स्पशाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहौ)
पाठः
प्र.1 पृष्ठ १५० क ‘वणमाला’ को उसी रूप म सारणी-रूप म ल खए — वण का भेद, उनके वण तथा उनका
आभ्यन्तर-प्रयत्न।
उत्तरम् — पुस्तकस्य ‘वणमाला’-पत्रस्य पूणा सारणी —
(१) स्वराः
भेदः वणाः आभ्यन्तर-प्रयत्नः सङ् ख्या
समानाक्षरािण — अ-कारः अ संवृत-प्रयत्नः ०१
समानाक्षरािण — शेषािण —· आ · अ३ · इ · ई · इ३ · उ · ऊ · उ३ · ऋ · ॠ · ऋ३ · ऌ · ऌ३ ववृत-प्रयत्नः १३
सन्ध्यक्षरािण ए · ए३ · ऐ · ऐ३ · ओ · ओ३ · औ · औ३ ववृत-प्रयत्नः ०८
(२) व्यञ्जना न
भेदः वणाः आभ्यन्तर-प्रयत्नः सङ् ख्या
स्पश ः (वग याः) कखगघङ·चछजझञ·टठडढण·तथद धन·पफ बभम स्पृष्ट-प्रयत्नः २५
अन्तःस्थाः (अध-स्वराः) य·र·ल·व ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः ०४
ऊष्माणः श·ष·स·ह ईषद्- ववृत-प्रयत्नः ०४
अयोगवाहौ — अनुस्वारः अं ईषद्- ववृत-प्रयत्नः ०१
अयोगवाहौ — िवसगः अः ईषद्- ववृत-प्रयत्नः ०१
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चत्र म एक ‘—’ क्य छपा है: समानाक्षर क दूसरी पं क्त ‘— आ अ३ इ ई इ३ …’ इस प्रकार आरम्भ होती है।
m a s emअलग प्रयत्न-
gl‘ऌ३’ है, ‘ॡ’ नह —
वहाँ जो रक्त- चह्न (—) है, वह ह्रस्व ‘अ’ का खाली छोड़ा हुआ खाना है — क्य क ‘अ’ को उसक
o के लए ऊपर अकेला रख दया गया है। इसी तरह ‘ऌ’ के आगे केवल
ेणी (संवृत).cदखाने
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क्य कse
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पुस्तक स्वयं कहती है ‘ऌ-वणस्य द घा न स न्त’।
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एक पन्ने म पूरा पाठ: यह पत्र- चत्र इस पाठ का सबसे उपयोगी पृष्ठ है — बाय ओर वण के भेद, बीच म स्वयं
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वण, और दाय ओर उनका आभ्यन्तर-प्रयत्न। परीक्षा से पहले केवल यही एक पन्ना दोहरा लेना पयाप्त है; शेष सब
इसी का वस्तार है।
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m a s em न उच्चायन्ते ?
वणमालायां शुद्ध-स्वराणां सङ् ख्या का ? तेषु क त स्वराः ववृत-प्रयत्नेन, क त च संवृत-प्रयत्ने
co दशयत। gl
प्र.2
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गणनया
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agउत्तर
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उत्तरम् — शुद्ध-स्वराणां ( नरनुना सकानां स्वराणां) सङ् ख्या २२ अ स्त। तेषु २१ स्वराः ववृत-प्रयत्नेन तथा ०१ (केवलः
m .co agl
ह्रस्वः अ-कारः) संवृत-प्रयत्नेन उच्चायते।
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( हन्द — शुद्ध स्वर बाईस ह; उनम इक्क स ववृत-प्रयत्न से और केवल एक — ह्रस्व ‘अ’ — संवृत-प्रयत्न से बोला जाता है।)
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समानाक्षरािण — कण्ठ ािन : अ, आ, अ३ = ३
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समानाक्षरािण — तालव्यािन : इ, ई, इ३ = ३
. com — मूधन्यािन : ऋ, ॠ, ऋ३ = ३ a g l
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समानाक्षरािण
aseसमानाक्षरािण — दन्त्यािन : ऌ, ऌ३ = २ (‘ऌ-वणस्य दीघ न सिन्त’)
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समानाक्षरािण — ओष्ठ ािन : उ, ऊ, उ३ = ३
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समानाक्षरािण योगः = ३ + ३ + ३ + २ + ३ .=co१४m g l a
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सन्ध्यक्षरािण : ए, ए३, ऐ, ऐ३, ओ, ओ३, औ, औ३ = ८
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सवom as e
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स्वराः = १४ + ८ = २२
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se ते ष ु संवत-पयत्नः → केवलः ह्रस्वः ‘अ’ = ०१
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अतः िववृत -पयत्नः → २२ − १ = २१
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पुस्तक क सारणी से मलान: पृष्ठ १५२ क पहली सारणी म ठ क यही लखा है — ‘स्वराः (२१) – ववृत-प्रयत्नः ·
अ-कारः (०१) – संवृत-प्रयत्नः’। और नीचे तारां कत टप्पणी स्पष्ट करती है — ‘अत्र केवलं शुद्ध-स्वराः (अथात्
नरनुना सकाः स्वराः) एव गण्यन्ते, न तु अनुना सक-स्वराः।’ अथात् य द अनुना सक स्वर (आँ, ईं आ द) भी
गने जाएँ तो संख्या दुगुनी हो जाएगी; पाठ उन्ह नह गनता।
प्लुत क्या है: ‘अ३’, ‘इ३’, ‘ए३’ म जो ‘३’ लखा है वह प्लुत का चह्न है — तीन मात्रा तक ख चा गया स्वर, जो
प्रायः दूर से पुकारने म आता है (जैसे ‘हे राम३’)। ह्रस्व एक मात्रा, द घ दो मात्रा और प्लुत तीन मात्रा का होता है —
इसी लए पृष्ठ १५२ क सारणी स्वर को ‘एकमात्रः / मात्रः / त्रमात्रः वा’ कहती है।
आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थाना न, षट् करणा न, पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः च — पृष्ठ 151
पाठ का समग्र चक्र- चत्र — एक ही चत्र म स्थान, करण, वण तथा प्रयत्न
पाठः
प्र.1 पृष्ठ १५१ का चक्र- चत्र क्या दखाता है ? उसे शब्द म समझाइए तथा उसका पूरा ववरण सारणी म ल खए।
उत्तरम् — इदं चक्रं त्री ण अ प तत्त्वा न एक स्मन् एव चत्रे दशय त — ऊध्वभागे ‘षट् स्थाना न’, अधोभागे ‘षट् करणा न’,
द क्षणभागे ‘पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः’, वामभागे च ‘वणाः’ (स्वराः-व्यञ्जना न) इ त।
चत्र को पढ़ने का ढं ग — बीच म मुख का चत्र है। उसके चार ओर इन्द्रधनुष जैसे छह वृत्त-खण्ड ह। बाहर से भीतर क ओर
जाइए —
सबसे बाहर क चाप पर छह स्थान लखे ह — कण्ठः (१), तालु (२), मूधा (३), दन्तः (४), ओष्ठः (५), ना सका (६) — और
उनसे बने वण-वग के नाम — कण्ठ्याः, तालव्याः, मूधन्याः, दन्त्याः, ओष्ठ्याः, ना सक्याः।
भीतर क छह प याँ वण के छह भेद ह — समानाक्षरा ण, सन्ध्यक्षरा ण (ये दोन ‘स्वराः’), तथा स्पशाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः,
अयोगवाहौ (ये चार ‘व्यञ्जना न’)।
दाय ओर क पाँच प याँ पाँच आभ्यन्तर-प्रयत्न ह — संवृत (१), ववृत (२), स्पृष्ट (३), ईषत्-स्पृष्ट (४), ईषद्- ववृत (५)।
नीचे क अलग चाप पर छह करण ह — कण्ठः (१), ज ा-मध्यः (२), ज ा-उपाग्रः (३), ज ा-अग्रः (४), ओष्ठः (५),
ना सका (६); बीच म ‘ ज ा — करणम्’ तथा ‘स्वस्थानं — करणम्’ लखा है।
चक्र का पूरा ववरण सारणी-रूप म —
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स्थानम् करणम् समानाक्षर- सन्ध्यक्षर- स्पशाः अन्तःस्थाः ऊष्माणः अयोगवाहौ
स्वराः स्वराः
कण्ठः कण्ठः अ (संवृतः) · आ ए ए३ · ऐ ऐ३ · ओ कखग — ह अः
(स्वस्थानम्) · अ३ ओ३ · औ औ३ घ·ङ
तालु ज ा-मध्यः इ · ई · इ३ ए ए३ · ऐ ऐ३ चछज य श —
झ·ञ
मूध ज ा-उपाग्रः ऋ · ॠ · ऋ३ — टठडढ र ष —
·ण
दन्तः ज ा-अग्रः ऌ · ऌ३ — तथदध ल·व स —
·न
ओष्ठः ओष्ठः उ · ऊ · उ३ ओ ओ३ · औ औ३ पफब व — —
(स्वस्थानम्) भ·म
नािसका ना सका — — ङञण — — अं
(स्वस्थानम्) नम
दो वण दो पं क्तय म क्य दखते ह: (१) सन्ध्यक्षर ए, ऐ, ओ, औ द्व-स्थानी ह — ए और ऐ कण्ठ्य भी ह और
तालव्य भी (कण्ठतालव्यौ); ओ और औ कण्ठ्य भी ह और ओष्ठ्य भी (कण्ठौष्ठ्यौ)। इसी लए वे दोन पं क्तय म
लखे ह। (२) व् दन्त्य भी है और ओष्ठ्य भी — दन्त्योष्ठ्यः। (३) पाँचव वण (ङ ञ ण न म) अपने वग क पं क्त म
भी ह और ना सक्य पं क्त म भी, क्य क उनम वायु नाक से भी नकलती है।
यही चक्र कक्षा ८ म भी था: तब उसम केवल स्थान और करण क चाप थ । इस कक्षा के चक्र म तीसरी चाप —
पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः — जुड़ गई है। दोन चत्र को साथ रखकर दे खए, तो दो कक्षाओं का पूरा पाठ्यक्रम एक
नज़र म दख जाएगा।
प्र.2 चक्रे ‘षट् करणा न’ इ त चापे का न षट् करणा न क्रमेण ल खता न स न्त ? ‘ ज ा — करणम्’ तथा ‘स्वस्थानं
— करणम्’ इ त द्वयोः कः भेदः ?
उत्तरम् — षट् करणा न क्रमेण एता न स न्त — (१) कण्ठः, (२) ज ा-मध्यः, (३) ज ा-उपाग्रः, (४) ज ा-अग्रः, (५)
ओष्ठः, (६) ना सका।
‘ ज ा — करणम्’ तथा ‘स्वस्थानं — करणम्’ इत्यनयोः भेदः —
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
करण-प्रकारः क स्मन् स्थाने करणम् क्या होता है
िज ा — करणम् तालु, मूध , दन्तः ज ा-मध्यः, ज ा-उपाग्रः, जीभ हलकर दूसरे अङ्ग (स्थान) तक जाती है
ज ा-अग्रः
स्वस्थानं — कण्ठः, ओष्ठः, कण्ठः, ओष्ठः, ना सका (स्वयम् जीभ काम नह करती; उसी स्थान का एक भाग दूसरे
करणम् नािसका एव) भाग से मलता है
कण्ठ का उदाहरण सबसे साफ़ है: पुस्तक स्वयं पृष्ठ १४८ पर लखती है — ‘कण्ठ्य-वणानां → स्थानम् अ प
कण्ठः (कण्ठस्य पृष्ठ-भागः), करणम् अ प कण्ठः (कण्ठस्य अग्र-भागः)।’ अथात् स्थान = पृष्ठ-भाग (जो स्थर है),
करण = अग्र-भाग (जो हलता है)। यही नयम ओष्ठ म (उत्तरोष्ठ स्थान, अधरोष्ठ करण) और ना सका म लागू होता है।
पा णनीय- शक्षा इसी को एक सूत्र म कह दे ती है — ‘शेषाः — स्वस्थानकरणाः’।
याद रखने का सूत्र: जो हलता है वह करण, जो स्थर रहता है वह स्थान। ‘प’ बो लए — नीचे का ह ठ ऊपर
उठकर ऊपर के ह ठ से लगता है; इस लए अधरोष्ठ करण है और उत्तरोष्ठ स्थान।
वणानां भेद-उपभेदानां परस्पर- भन्नताः — पृष्ठ 152
तीन तुलना-सार णयाँ — वणानां द्वौ मुख्य-भेदौ · स्वराणां द्वौ भेदौ · व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः
पाठः
प्र.1 ‘वणानां द्वौ मुख्य-भेदौ’ इ त सारणीम् आधृत्य स्वरस्य व्यञ्जनस्य च मध्ये त ः भन्नताः लखत।
उत्तरम् — पुस्तकस्य सारणी अनुसारं स्वर-व्यञ्जनयोः त ः भन्नताः —
क्रमः स्वरः व्यञ्जनम्
१. स्वतन्त्र ः वणः परतन्त्रः वणः
उच्चारणाथम् अन्य-वणः न आवश्यकः उच्चारणाथम् आधार-स्वरः आवश्यकः
२. एकमात्र ः / ि मात्र ः / ित्र मात्र ः वा अधमात्रः िनत्यम्
३. स्वराः (२१) – िववृत-पयत्नः पश ः (२५) – स्पष्ृ ट-पयत्नः
स्
अ-कारः (०१) – संवृत-पयत्नः अन्तःस्थाः (०४) – ईषत्-स्पष्ृ ट-पयत्नः
ऊष्माणः (०४) तथा अयोगवाहौ (०२) – ईषद् -िववृत-पयत्नः
( हन्द सारांश —) (१) स्वर स्वतन्त्र है, उसे बोलने के लए कसी और वण क ज़रूरत नह ; व्यञ्जन परतन्त्र है, उसे सहारे के
लए आधार-स्वर चा हए। (२) स्वर एक, दो या तीन मात्रा का हो सकता है; व्यञ्जन सदा आधी मात्रा का ही होता है। (३) स्वर का
प्रयत्न ववृत (या ‘अ’ म संवृत) है; व्यञ्जन का प्रयत्न स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट अथवा ईषद्- ववृत है।
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तीन भन्नताएँ एक-दूसरे से नकली ह: मूल म प्रयत्न है (पं क्त ३)। स्वर म माग खुला रहता है, इस लए ध्व न
चलती रह सकती है — इसी लए स्वर को ख चकर एक, दो या तीन मात्रा का बनाया जा सकता है (पं क्त २)। और
जो ध्व न अपने बल पर टक सकती है, उसे कसी सहारे क आवश्यकता नह — इसी लए वह स्वतन्त्र है (पं क्त
१)। व्यञ्जन म माग रुकता है, इस लए ध्व न टकती नह , इस लए वह आधी मात्रा का रह जाता है और उसे स्वर का
सहारा चा हए। सारणी को ऊपर से नीचे नह , नीचे से ऊपर प ढ़ए — तक तभी खुलता है।
लखकर दे खए: ‘क्’ अकेला लखना पड़े तो हलन्त लगाना पड़ता है — क्य क वह अकेला बोला ही नह जा
सकता। ‘क् + अ = क’ होते ही वह पूरा अक्षर बन जाता है। इसी से ‘अधमात्रः नत्यम्’ क बात सद्ध होती है —
और इसी से यह भी समझ आता है क दे वनागरी म हर व्यञ्जन म ‘अ’ छपा क्य माना जाता है।
प्र.2 ‘स्वराणां द्वौ भेदौ’ इ त सारणीम् आधृत्य समानाक्षर-स्वरस्य सन्ध्यक्षर-स्वरस्य च मध्ये भन्नतां लखत। ‘एक-
स्थानी’ तथा ‘ द्व-स्थानी’ इत्यनयोः कः अथः ?
उत्तरम् — पुस्तकस्य सारणी अनुसारं —
क्रमः समानाक्षर-स्वरः सन्ध्यक्षर-स्वरः
१. एक -स्थानी ि -स्थानी
२. ह्रस्वः उपभेद ः भवित वः उपभेदः न भवित
ह्र स्
ह्रस्वः एव पथमः उपभेद ः दीघः एव पथमः उपभेदः
अत्र, ह्रस्व-दीघ-प्लुताः — त्र यः उपभेद ाः अत्र, दीघ-प्लुतौ — ौ उपभेदौ
(‘ऌ-वणस्य दीघ न सिन्त’)
‘एक-स्थानी’ तथा ‘ द्व-स्थानी’ —
एक-स्थानी = यस्य वणस्य एकम् एव उच्चारण-स्थानं भव त। यथा — इ, ई (केवलं तालु); उ, ऊ (केवलम् ओष्ठः); ऋ, ॠ
(केवलं मूधा)।
द्व-स्थानी = यस्य वणस्य द्वे उच्चारण-स्थाने भवतः। यथा — ए, ऐ (कण्ठः + तालु = कण्ठतालव्यौ); ओ, औ (कण्ठः + ओष्ठः
= कण्ठौष्ठ्यौ)।
सन्ध्यक्षरम् द्वे स्थाने स -रूपेण अतः ह्रस्वः क्य नह
ए, ए३ कण्ठः + तालु अ + इ = ए (गुणः) दो स्वर के मलने से बना है, इस लए वह जन्म से ही द घ है
ऐ, ऐ३ कण्ठः + तालु अ + ए / आ + ऐ = ऐ (वृ द्धः) वही कारण
ओ, ओ३ कण्ठः + ओष्ठः अ + उ = ओ (गुणः) वही कारण
औ, औ३ कण्ठः + ओष्ठः अ + ओ / आ + औ = औ (वृ द्धः) वही कारण
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
नाम ही उत्तर दे दे ता है: ‘सन्ध्यक्षर’ का अथ है — स
. com
से बना अक्षर। अ + इ मलकर ए बना, अ + उ मलकर
mही नह सकती
ओ बना। दो स्वर मले ह, इस लए दो स्थान भी काम करते ह और इसी लए वह ध्व न छोट (ह्रस्व)eहो
s
m a
gl ही एक समान रूप है,
coद घ होती है। दूसरी ओर ‘समानाक्षर’ का अथ है — वह अक्षर जसका aअपना
m .
कसीsमेeल से नह बना; इसी लए उसम ह्रस्व, द घ, प्लुत — तीन उपभेद मलते ह।
— वह पैदा ही
a
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ag
अपवाद याद र खए: ‘ऌ’ समानाक्षर तो है, पर उसका द घ रूप संस्कृत म प्रयुक्त नह होता — ‘ऌ-वणस्य द घा
m .
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न स न्त’। इसी लए वणमाला-पत्र म ‘ऌ ऌ३’ ही छपा है, बीच म ‘ॡ’ नह । अभ्यास ५ (घ) ‘ह्रस्वस्य उपभेदाः न
भव न्त’ इसी सारणी क दूसरी पं क्त से जुड़ा है।
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. c om
m a s em भन्नतां लखत।
‘व्यञ्जनानां चत्वारः भेदाः’ इ त सारणीम् आधृत्य स्पश-अन्तःस्थ-ऊष्म-अयोगवाह-व्यञ्जनानां
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प्र.3
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agउत्तरम्
— पुस्तकस्य सारणी अनुसारं —
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se
क्रमः स्पश-व्यञ्जनम् अन्तःस्थ-व्यञ्जनम् ऊष्म-व्यञ्जनम् अयोगवाह-व्यञ्जनम्
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१. साधारण-व्यञ्जनम्
a
आधार-स्वरः — पश्चात् पूव ं वा, उभयत्र संभवित
िविशष्ट-व्यञ्जनम्
आधार-स्वरः — िनत्यं पूवमेव
m
ईषत्-स्पष्ृ ट-पयत्नः ईषद् -िववृत-पयत्नः .cृतo-पयत्नः
ईषद् -िवव
em
२. स्पष्ृ ट-पयत्नः
m a s
( हन्द .—)
a glआगे भी लग सकता है और पीछे भी
co स्पश, अन्तःस्थ तथा ऊष्म — ये तीन साधारण व्यञ्जन ह; इनका आधार-स्वर
a s em
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(क + अ = क, अ + क् = अक्)। अयोगवाह (अनुस्वार, वसग) व शष्ट व्यञ्जन ह; इनका आधार-स्वर सदा पहले ही आता है (अं,
ag अः — कभी ‘◌ंअ’ नह )।
se m
com g l a
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यही अन्तर ‘अयोगवाह’ नाम का कारण है: अनुस्वार और वसग वणमाला के कसी वग म ‘योग’ (मेल) नह
m
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रखते — न स्पश ह, न अन्तःस्थ, न ऊष्म — फर भी अथ को ‘वहन’ करते ह। इसी लए ‘अ-योग-वाहौ’। लखकर
agl
दे खए — ‘रामः’ म वसग ‘म’ के बाद है, पर उसका सहारा-स्वर उसके पहले वाला ‘अ’ ही है। ‘संस्कृतम्’ म
अनुस्वार का सहारा भी उसके पहले वाला ‘स’ का ‘अ’ है। अन्य व्यञ्जन क तरह इन्ह आगे स्वर लगाकर पूरा अक्षर
co m
.
नह बनाया जा सकता।
se m
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.cप्रयत्न क दृ ष्ट से तीन ही े णयाँ: ध्यान द जए — सारणी म चार भेद aह,gपर प्रयत्न केवल तीन — क्य क ऊष्म
m और अयोगवाह दोन का प्रयत्न एक ही है (ईषद्- ववृत)। पृष्ठ १५२ क पहली सारणी म इन दोन को एक ही कोष्ठक
l a se
ag म जोड़कर दखाया गया है।
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प्र.4 ‘अत्र केवलं शुद्ध-स्वराः (अथात् नरनुना सकाः स्वराः) एव गण्यन्ते, न तु अनुना सक-स्वराः।’ — अस्याः
तारां कत- टप्पण्याः कः आशयः ?
उत्तरम् — अस्याः टप्पण्याः आशयः अ स्त — यत्र-यत्र स्वराणां सङ् ख्या (२२ इ त, अथवा २१ + ०१ इ त) गण्यते, तत्र
केवलाः शुद्धाः अथात् नरनुना सकाः स्वराः एव गण्यन्ते; अनुना सकाः स्वराः पृथक् न गण्यन्ते।
( हन्द — जहाँ भी स्वर क संख्या गनी गई है, वहाँ केवल शुद्ध यानी नरनुना सक स्वर गने गए ह; अनुना सक स्वर अलग से नह
गने गए।)
प्रकारः अथः उदाहरणम् गणनायाम्
शु ः / िनरनुनािसकः यस्य उच्चारणे वायुः के वलं मुखात् िनगच्छित अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, गण्यते — कुल
स्वरः औ २२
अनुनािसकः स्वरः यस्य उच्चारणे वायुः मुखात् नािसकायाः च — उभाभ्यां अँ, आँ, इँ, इ … (चन्द्र बन्दु- न गण्यते
िनगच्छित युक्ताः)
यह टप्पणी क्य आवश्यक थी: संस्कृत म प्रत्येक स्वर के दो रूप सम्भव ह — नरनुना सक और अनुना सक। य द
दोन गने जाएँ तो स्वर क संख्या दुगुनी हो जाती और सारणी का ‘२१ + ०१’ गलत लगने लगता। इसी लए पुस्तक
ने पन्ने के नीचे तारां कत टप्पणी दे कर गनती का आधार स्पष्ट कर दया — गनती का नयम पहले बता दे ना ही
अ सारणी का लक्षण है।
ध्यान द: ‘अनुना सक स्वर’ और ‘अनुस्वार’ दो अलग चीज़ ह। अनुना सक स्वयं स्वर है जो नाक से भी बोला जाए
(चन्द्र बन्दु — अँ); अनुस्वार एक अलग वण है जो अयोगवाह म गना जाता है ( बन्दु — अं) और जसका स्थान-
करण दोन ना सका ह। दोन को मलाइए मत।
सव शब्दे न भासते — पृष्ठ 153
पाठ क पा रभा षक शब्दावली — शब्दः · अथः (संस्कृतम्) · हन्द · English
सव शब्दे न भासते
प्र.1 ‘सव शब्दे न भासते’ इ त ता लकायां प्रदत्तानां त्रयोदश-पा रभा षक-शब्दानाम् अथान् लखत तथा प्रत्येकं शब्दं
पाठे कुत्र प्रयुक्तः इ त अ प दशयत।
यह ता लका इस पाठ क पूरी पा रभा षक शब्दावली एक ही पन्ने पर रख दे ती है। पुस्तक इसे चार स्तम्भ म दे ती है — शब्दः ·
अथः (संस्कृतम्) · हन्द · English। नीचे वही चार स्तम्भ ज्य के त्य दए ह और साथ म एक पाँचवाँ स्तम्भ जोड़ा गया है —
वह शब्द पाठ म कहाँ आया।
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH पाठे प्रयोगः
पयत्नः उच्चारणे प्रयुज्यमानं उच्चारण में पयुक्त ‘Effort’ in Speech ‘सः प्रयत्नः —
बलम् ‘बल ’ अथवा ‘दबाव’ आभ्यन्तर-प्रयत्नः इ त
उच्यते’ (पृ. १४६)
अभ्यन्तरे अन्तः अन्दर Inside ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे
करणं…’ (पृ. १४६)
आभ्यन्तरम् अन्तः स्थतम् अन्दर िस्थत Internal ‘आभ्यन्तरो बाह्यश्च’
(पृ. १५८)
आभ्यन्तर- अन्तःप्रयत्नः / आस्यस्य मस्तक के अन्दर, ‘Internal-Effort’ in पाठस्य मुख्यः वषयः
पयत्नः अभ्यन्तरे करणस्य करण का — स्थान Articulation (exerted by the (पृ. १४६–१४९)
स्थानं प्र त प्रयुक्तं बलम् के पित पयुक्त ‘बल ’ ‘Tool’ – towards the ‘Place’,
अथवा ‘दबाव’ inside the Head)
स्पष्ृ टः स्पशः कृतः पश िकया हआ
स् ु Touched ‘स्पृष्ट-प्रयत्नः’ →
स्पश-व्यञ्जना न (पृ.
१४६)
ईषत् अल्पम् थोड़ ा Slightly / Little ‘ईषत्-स्पृष्ट’ तथा
‘ईषद्- ववृत’ —
उभयत्र (पृ. १४६–१४७)
ईषत्-स्पष्ृ टः अल्पं स्पशः कृतः थोड़ ा स्पश िकया हुआ Slightly Touched ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ →
अन्तःस्थ-व्यञ्जना न
(पृ. १४६)
िववृतः उ ा टतः खुल ा हआ
ु Opened ‘ ववृत-प्रयत्नः’ →
स्वराः (पृ. १४७)
िववरः छद्रः / अन्तरालः अन्तराल Opening / Gap ‘लघुः ववरः’ तथा
‘ ु टः ववरः’ (पृ.
१४७)
ईषद् -िववृतः अल्पम् उ ा टतः थोड़ ा खुल ा हुआ Slightly Opened ‘ईषद्- ववृत-प्रयत्नः’
→ ऊष्माणः,
अयोगवाहौ (पृ. १४७)
संवृतः अ वस्तृतः िसकु ड़ ा हआु Constrained / Contracted ‘संवृत-प्रयत्नः’ →
केवलम् अ-कारः (पृ.
१४८)
संक ोचः संकोचनम् िसकु ड़ ना Compress ‘कण्ठे स्थान-करणयोः
मध्ये संकोचः भव त’
(पृ. १४८)
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संकु िचतः संक णः / संकोचं कृतः िसकु ड़ ा गया Constricted / Narrow ‘कण्ठः संकु चतः
संक णः वा भव त’ (पृ.
१४८)
शब्दावली स्वयं एक सीढ़ है: तीन जो ड़याँ ध्यान से दे खए — स्पृष्टः ↔ ईषत्-स्पृष्टः (छु आ ↔ ज़रा छु आ), ववृतः
↔ ईषद्- ववृतः (खुला ↔ ज़रा खुला), और संवृतः ↔ ववृतः ( सकुड़ा ↔ खुला)। ‘ईषत्’ का अथ ही ‘थोड़ा’ है,
इस लए ‘ईषत्’ जुड़ते ही मात्रा आधी रह जाती है। जसे ये तीन जो ड़याँ आ गईं, उसे पाँच प्रयत्न आ गए — शेष
केवल उन्ह वण से जोड़ना है।
स पर ध्यान: ‘ईषत् + स्पृष्टः’ म ‘त्’ ज्य का त्य रहा — ईषत्-स्पृष्टः; कन्तु ‘ईषत् + ववृतः’ म ‘त्’ का ‘द्’ हो
गया — ईषद्- ववृतः। कारण जश्त्व स है : वग के प्रथम वण (त्) के बाद मृदु ध्व न (व्) आने पर वह उसी वग
के तृतीय वण (द्) म बदल जाता है। यही नयम ‘तत् + अ प = तद प’ म भी काम करता है।
स्थानानुसारं वणाः — स्वराः तथा व्यञ्जना न — पृष्ठ 154–157
षट् सु स्थानेषु उत्पद्यमानाः वणाः, तेषां करणम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः च — मुख- चत्रैः सह चतुषु पृष्ठेषु
पाठः
प्र.1 ‘कण्ठ्याः वणाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वणाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लखत। (पृष्ठ १५४, १५५)
उत्तरम् — कण्ठ्यानां वणानां स्थानम् — कण्ठः (कण्ठस्य पृष्ठ-भागः) तथा करणम् अ प कण्ठः (कण्ठस्य अग्र-भागः) —
अथात् अत्र ‘स्वस्थानम् एव करणम्’।
वण-भेदः वणाः आभ्यन्तर-प्रयत्नः उदाहरण-शब्दः
अ-स्वरः अ संवृत-प्रयत्नः अश्वः, अयम्
शेष-समानाक्षरािण आ · अ३ ववृत-प्रयत्नः आकाशः · ‘हे राम३’ (प्लुतः)
सन्ध्यक्षरािण ए ए३ · ऐ ऐ३ · ओ ओ३ · औ औ३ ववृत-प्रयत्नः एकः · ऐक्यम् · ओष्ठः · औषधम्
स्पश ः कखगघ·ङ स्पृष्ट-प्रयत्नः कमलम्, खगः, गजः, घटः, वाङ् मयम्
अन्तःस्थाः — — कण्ठ-स्थाने कोऽ प अन्तःस्थ-वणः ना स्त
ऊष्माणः ह ईषद्- ववृत-प्रयत्नः ह◌ंसः, ह रः
अयोगवाहौ अः (िवसगः) ईषद्- ववृत-प्रयत्नः राम◌ः, बालक◌ः
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चत्र क्या दखाता है: पुस्तक कण्ठ्य वण के लए दो आव धत चत्र दे ती है। पहले चत्र म (‘अ’ के लए) कण्ठ के
भीतर दोन भाग पास-पास दखाए गए ह और बीच म लहरदार रेखाएँ ह — यही संकोच है। दूसरे चत्र म (आ, ए,
ऐ, ओ, औ के लए) वही कण्ठ खुला दखाया गया है — यही ‘ ु टः ववरः’ है। एक ही स्थान, एक ही करण —
केवल खुलाव अलग, इस लए वण अलग।
कण्ठ्य वण क वशेषता: यही एक ऐसा स्थान है जहाँ पाँच म से चार प्रयत्न मल जाते ह — संवृत (अ), ववृत
(आ, ए…), स्पृष्ट (क-वग) और ईषद्- ववृत (ह, वसग)। केवल ईषत्-स्पृष्ट यहाँ नह मलता, क्य क कोई कण्ठ्य
अन्तःस्थ वण है ही नह ।
प्र.2 ‘तालव्याः वणाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वणाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लखत। (पृष्ठ १५४, १५५)
उत्तरम् — तालव्यानां वणानां स्थानम् — तालु तथा करणम् — ज ा ( वशेषतः ज ा-मध्यः)।
वण-भेदः वणाः आभ्यन्तर-प्रयत्नः उदाहरण-शब्दः
अ-स्वरः — — अ-वणः कण्ठ्यः एव, न तालव्यः
शेष-समानाक्षरािण इ · ई · इ३ ववृत-प्रयत्नः इन्द्रः · ईशः
सन्ध्यक्षरािण ए ए३ · ऐ ऐ३ ववृत-प्रयत्नः एकः · ऐश्वयम् (कण्ठतालव्यौ)
स्पश ः चछजझ·ञ स्पृष्ट-प्रयत्नः चन्द्रः, छत्रम्, जलम्, झङ् कारः, याञ्चा
अन्तःस्थाः य ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः यमुना, य ः
ऊष्माणः श ईषद्- ववृत-प्रयत्नः शि◌वः, श◌ा न्तः
अयोगवाहौ — — तालु-स्थाने अयोगवाहः ना स्त
इ · य् · श् — एक ही प रवार: तीन का स्थान तालु और करण ज ा-मध्य है; अन्तर केवल प्रयत्न का है — इ
( ववृत) → य् (ईषत्-स्पृष्ट) → श् (ईषद्- ववृत)। ‘इ’ को धीरे-धीरे सँकरा करते जाइए तो पहले ‘य्’ जैसा और फर
‘श्’ जैसा सुनाई दे ने लगेगा। स न्ध का नयम ‘इ + अ = य’ (इको यण च) इसी सम्बन्ध क व्याकर णक स्वीकृ त है।
ए और ऐ यहाँ भी क्य : क्य क ये द्व-स्थानी ह — कण्ठ भी और तालु भी। इस लए पृष्ठ १५४ क सारणी म ये
कण्ठ्य पं क्त म भी ह और तालव्य पं क्त म भी। इन्ह ‘कण्ठतालव्यौ’ कहा जाता है।
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m.
‘मूधन्याः वणाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वणाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लखत। (पृष्ठ १५४, १५५)
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agl — मूधन्यानां वणानां स्थानम् — मूधा तथा करणम् — ज ा ( वशेषतः ज ा-उपाग्रः)।
उत्तरम्
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वण-भेदः वणाः आभ्यन्तर-प्रयत्नः उदाहरण-शब्दः
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अ-स्वरः — —
शेष-समानाक्षरािण ऋ · ॠ · ऋ३ ववृत-प्रयत्नः ऋ षः, ऋतुः
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सन्ध्यक्षरािण — — कोऽ प सन्ध्यक्षरः मूधन्यः ना स्त
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.co टठडढ·ण
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स्पश ः स्पृष्ट-प्रयत्नः टङ् कः, ठक्कुरः, डमरुः, मूढ◌ः, गुण◌ः
l a se
a g अन्तःस्थाः र ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः र वः, र◌ामः
ष
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ऊष्माणः ईषद्- ववृत-प्रयत्नः षट् , भाष◌ा
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अयोगवाहौ — —
agl
पुस्तक ने सारे उदाहरण- चत्र मूधन्य वण के ही क्य दए: पृष्ठ १४६–१४७ पर चार प्रयत्न के नीचे हर बार
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‘उदाहरणम् — मूधन्याः वणाः’ लखा है। कारण सीधा है — मूधन्य वण म जीभ पीछे क ओर मुड़कर ऊपर
जाती है, इस लए स्पश, अल्प-स्पश, छोटा अन्तराल और बड़ा अन्तराल — चार अवस्थाएँmचत्र म सबसे स्पष्ट
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sआस-पास
दखतीoह।
. c a
ऋ · र् · ष् · ट् — चार को क्रम से बो लए, जीभ क नोक एक ही जगहg lके रहेगी, केवल
m पास आना-दूर जाना बदलेगा।
seउसका
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coमूmधा है; अन्तर केवल प्रयत्न का — ऋ म ववृत, र् म ईषत्-स्पृष्ट। l a
ऋ क एक और खूबी: ‘ऋ’ स्वर है, पर उसका सम्बन्धी व्यञ्जन ‘र्’ है — इसी लए ‘ पतृ + आदे शः = पत्रादे शः’ म
. a g
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ऋ का र् हो जाता है (यण् स न्ध)। दोन का स्थान
a s
agl
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प्र.4 ‘दन्त्याः वणाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वणाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लखत। (पृष्ठ १५६, १५७)
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.co a g
emउत्तरम् — दन्त्यानां वणानां स्थानम् — दन्तः तथा करणम् — ज ा ( वशेषतः ज ा-अग्रः)।
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e m . co agl
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वण-भेदः वणाः आभ्यन्तर-प्रयत्नः उदाहरण-शब्दः
अ-स्वरः — — —
शेष-समानाक्षरािण ऌ · ऌ३ ववृत-प्रयत्नः ऌकारः (‘ऌ-वणस्य द घा न स न्त’)
सन्ध्यक्षरािण — — कोऽ प सन्ध्यक्षरः दन्त्यः ना स्त
स्पश ः तथदध·न स्पृष्ट-प्रयत्नः तरुः, रथ◌ः, दन्तः, धनम्, नद
अन्तःस्थाः ल·व ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः लता, वनम्
ऊष्माणः स ईषद्- ववृत-प्रयत्नः सत्यम्, सरः
अयोगवाहौ — — —
‘व’ दन्त्य पं क्त म क्य है: पृष्ठ १५७ क सारणी म ‘व’ दन्त्य पं क्त म भी है और ओष्ठ्य पं क्त म भी। कारण यह
क ‘व’ बोलते समय ज ा-अग्र दाँत के पास जाता है और साथ ही अधरोष्ठ ऊपर के दाँत के पास आता है —
दोन एक साथ। इसी लए ‘व’ को दन्त्योष्ठ्यः कहते ह और वह अकेला द्व-स्थानी व्यञ्जन है।
त-वग और ट-वग का अन्तर: ‘त’ म जीभ क नोक दाँत के मूल पर लगती है; ‘ट’ म जीभ मुड़कर उपाग्र से मूधा
को छू ती है। हन्द बोलने वाले प्रायः ‘त’ को दन्त्य ही बोलते ह, पर अंग्रेज़ी का ‘t’ मूधन्य के पास पड़ता है — इसी
कारण अंग्रेज़ी-अभ्यस्त वद्याथ संस्कृत के ‘त’ को अशुद्ध बोल जाते ह। इसी अशु द्ध से बचाना इस पाठ का उ े श्य
है।
प्र.5 ‘ओष्ठ्याः वणाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वणाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लखत। (पृष्ठ १५६, १५७)
उत्तरम् — ओष्ठ्यानां वणानां स्थानम् — ओष्ठः तथा करणम् अ प ओष्ठः — अत्र अ प ‘स्वस्थानम् एव करणम्’ (उत्तरोष्ठः
स्थानम्, अधरोष्ठः करणम्)।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
वण-भेदः वणाः आभ्यन्तर-प्रयत्नः उदाहरण-शब्दः
अ-स्वरः — — —
शेष-समानाक्षरािण उ · ऊ · उ३ ववृत-प्रयत्नः उदयः · ऊजा
सन्ध्यक्षरािण ओ ओ३ · औ औ३ ववृत-प्रयत्नः ओदनम् · औषधम् (कण्ठौष्ठ्यौ)
स्पश ः पफ बभ·म स्पृष्ट-प्रयत्नः प◌ुष्पम्, फलम्, ब◌ालकः, भ◌ानुः, म◌ाता
अन्तःस्थाः व ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः वि◌द्या, व◌ायुः
ऊष्माणः — — ओष्ठ-स्थाने ऊष्म-वणः ना स्त
अयोगवाहौ — — —
दपण के सामने पर खए: ओष्ठ्य ही एकमात्र ऐसा वग है जसे आप आँख से दे ख सकते ह। ‘प’ बो लए — दोन
ह ठ पूरी तरह मलते ह (स्पृष्ट)। ‘व’ बो लए — नीचे का ह ठ ऊपर के दाँत को हल्के से छू ता है (ईषत्-स्पृष्ट)। ‘उ’
बो लए — ह ठ गोल होकर आगे बढ़ते ह पर मलते नह ( ववृत)। एक ही स्थान पर तीन प्रयत्न — पूरा पाठ आईने
म दख जाएगा।
ओ और औ यहाँ क्य : क्य क ये कण्ठौष्ठ्य ह — इनका एक स्थान कण्ठ है और दूसरा ओष्ठ। ‘ओ’ = अ (कण्ठ्य)
+ उ (ओष्ठ्य) क स न्ध से बना है, इसी लए दोन स्थान इसम बने रहते ह।
प्र.6 ‘ना सक्याः वणाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वणाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लखत। (पृष्ठ १५६, १५७)
उत्तरम् — ना सक्यानां वणानां स्थानम् — ना सका तथा करणम् अ प ना सका — अत्र अ प ‘स्वस्थानम् एव करणम्’।
वण-भेदः वणाः आभ्यन्तर-प्रयत्नः उदाहरण-शब्दः
स्वराः (अ-स्वरः, समानाक्षरािण, सन्ध्यक्षरािण) — — कोऽ प शुद्धः स्वरः ना सक्यः न गण्यते
स्पश ः (पञ्चमाः वण ः) ङ·ञ·ण·न·म स्पृष्ट-प्रयत्नः वाङ् मयम्, याञ्चा, गुण◌ः, नद , म◌ाता
अन्तःस्थाः — — —
ऊष्माणः — — —
अयोगवाहौ अं (अनुस्वारः) ईषद्- ववृत-प्रयत्नः स◌ंस्कृतम्, अ◌ंशः
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पाँचव वण दो जगह क्य गने जाते ह: ङ, ञ, ण, न, म — ये अपने-अपने वग के भी ह (कण्ठ्य, तालव्य, मूधन्य,
दन्त्य, ओष्ठ्य) और ना सक्य भी। कारण यह क इनका उच्चारण करते समय मुख म तो अपने वग का स्पश होता ही
है, साथ ही वायु नाक से भी नकलती है। इसी लए इन्ह ‘अनुना सक व्यञ्जन’ कहते ह। नाक बन्द करके ‘म’ बोलने
क को शश क जए — ‘ब’ जैसा सुनाई दे गा; यही प्रमाण है।
ना सक्य पं क्त म स्वर क्य नह : क्य क पाठ केवल शुद्ध ( नरनुना सक) स्वर गनता है — यह बात पृष्ठ १५२
क तारां कत टप्पणी म कही जा चुक है। अनुना सक स्वर (अँ, आँ) होते तो ह, पर इस गणना म शा मल नह ।
प्र.7 पृष्ठ १५४–१५७ क चार सार णय का सार एक ही सारणी म ल खए — क स्मन् स्थाने क त वणाः, तेषां करणं
प्रयत्नाः च।
उत्तरम् — षट् सु स्थानेषु समग्रं वण- वभाजनम् —
स्थानम् करणम् स्वराः ( ववृतः / संवृतः) स्पशाः अन्तःस्थाः ऊष्माणः + अयोगवाहौ
(स्पृष्टः) (ईषत्-स्पृष्टः) (ईषद्- ववृतः)
कण्ठः कण्ठः — अ (संवृतः) · आ अ३ · ए ए३ कखगघङ — ह · अः
स्वस्थानम् ऐ ऐ३ ओ ओ३ औ औ३
तालु ज ा-मध्यः इ ई इ३ · ए ए३ ऐ ऐ३ चछजझ य श
ञ
मूध ज ा-उपाग्रः ऋ ॠ ऋ३ टठडढण र ष
दन्तः ज ा-अग्रः ऌ ऌ३ तथदधन ल·व स
ओष्ठः ओष्ठः — उ ऊ उ३ · ओ ओ३ औ औ३ पफबभम व —
स्वस्थानम्
नािसका ना सका — — ङञणनम — अं
स्वस्थानम्
द्व-स्थानी वणाः (जो दो पं क्तय म आते ह) —
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वणाः द्वे स्थाने सं ा
ए·ऐ कण्ठः + तालु कण्ठतालव्यौ
ओ·औ कण्ठः + ओष्ठः कण्ठौष्ठ्यौ
व दन्तः + ओष्ठः दन्त्योष्ठ्यः
ङ·ञ·ण·न·म स् ववगस्य स्थानम् + नािसका अनुना सकाः (पञ्चमाः वणाः)
सारणी को दो दशाओं म प ढ़ए: पं क्त-वार पढ़ने पर पता चलता है क एक ही स्थान से कतने भन्न वण
नकलते ह — केवल प्रयत्न बदलने से। स्तम्भ-वार पढ़ने पर पता चलता है क एक ही प्रयत्न छह स्थान पर लगकर
छह अलग वण बना दे ता है। स्थान × प्रयत्न = वण — यही पूरे पाठ का सूत्र है, और अभ्यास का प्रश्न ६
(वणसमुच्चय) सीधे इसी सारणी से हल हो जाता है।
एक पं क्त खाली क्य दखती है: हर खाना भरा हुआ नह है — कण्ठ म कोई अन्तःस्थ नह , मूधा-दन्त-ओष्ठ म
कोई सन्ध्यक्षर नह , ओष्ठ म कोई ऊष्म नह । ये खाली खाने भूल नह , तथ्य ह : संस्कृत क वणमाला म उन जगह
पर कोई वण बना ही नह । पुस्तक ने भी वहाँ ‘—’ चह्न ही छापा है।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः — पृष्ठ 158
तत्र पा णनीय- शक्षा-सूत्रा ण — आभ्यन्तर-प्रयत्न-प्रकरणम् (नव सूत्रा ण तथा तेषाम् अथाः)
स्वाध्यायान्मा प्रमदः
प्र.1 ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न-प्रकरणम्’ इ त सूत्र-समूहः अत्र कमथ द यते ? पूवकक्षयोः ‘स्थान-प्रकरणेन’ ‘करण-प्रकरणेन’
च सह अस्य कः सम्ब ः ? नव सूत्रा ण क्रमेण लखत।
उत्तरम् — यत् पाठे चत्रैः पे टका भः च बो धतम्, तदे व अत्र पा णनीय- शक्षायाः मूल-सूत्र-रूपेण द यते, येन छात्रः
प रभाषां शास्त्र-वाक्यं च संयोज्य पश्येत्। षष्ठ-कक्षायां ‘स्थान-प्रकरणम्’, अष्टम-कक्षायां ‘करण-प्रकरणम्’ प ठतम्;
अधुना नवम-कक्षायाम् ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न-प्रकरणम्’।
पा णनीय- शक्षा के तीन प्रकरण, तीन कक्षाएँ —
प्रकरणम् कक्षा / पुस्तक क्या बताता है
स्थान-पकरणम् कक्षा ६ कौन-सा वण मुँह के कस स्थान से नकलता है
करण-पकरणम् कक्षा ८ — दीपकम् उस स्थान को कौन-सा करण छू ता है ( ज ा-मध्य/उपाग्र/अग्र, स्वस्थान)
आभ्यन्तर-पयत्न-पकरणम् कक्षा ९ — शारदा (यही पाठ) करण उस स्थान तक कस प्रयत्न से जाता है
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २
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नव सूत्रा ण क्रमेण —
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१. पयत्नोऽिप ि िवधः।
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२. आभ्यन्तरो बाह्यश्च।
a३. स्वस्थाने आभ्यन्तरस्तावत्।
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४. स्पृष्ट–करणाः – स्पश ः।
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५. ईषत्-स्पृष्ट–करणा – अन्तस्थाः।
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६. ईषद् -िववृत –करणा – ऊष्माणः।
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७. िववृत –करणाः – स्वराः।
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८. संवृत स्त्वकारः।
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९. इत्येषोऽन्तःपयत्नः।
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सूत्र-शैली क खूबी: नौ सूत्र म पूरा प्रकरण समा गया है। पहले दो सूत्र वभाजन करते ह (प्रयत्न दो प्रकार का),
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तीसरा वषय-प्रवेश कराता है (अभी आभ्यन्तर क बात), बीच के पाँच सूत्र नयम दे ते ह (कौन-सा प्रयत्न कौन-से
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वण बनाता है), और अ न्तम सूत्र उपसंहार करता है। आरम्भ-सूचक और समापन-सूचक सूत्र — यही शास्त्र-ग्र
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क पहचान है; कक्षा ८ म ‘करणम् अ प’ और ‘इत्येतत् करणम्’ ठ क यही काम कर रहे थे।
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ध्यान द जए — नयम-सूत्र म उलटा क्रम है: पाठ म क्रम था ‘प्रयत्न → कौन-से वण’;mसूत्र म क्रम है ‘कौन-से
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करण oवाले → वे ही वण’ (स्पृष्ट-करणाः = स्पशाः)। अथात् सूत्र वण क प रभाषाla
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हीsप्रयत्न से कर दे ते ह —
m .c वे ह जनका करण स्पृष्ट हो’। इसी लए ये सूत्र केवल वणन नह , प रभाषाagह।
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प्र.2 सूत्रम् — ‘प्रयत्नोऽ प द्व वधः।’ अस्य अथः
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अथः (पुस्तकानुसारम्) — (वण च्चारणाथ) ‘प्रयत्नः’ द्वप्रकारकः भव त। (वण च्चारण के लए कया जाने वाला ‘प्रयत्न’ दो
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प्रकार का होता है।)
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a s em ‘अ प’ क्य : ‘अ प’ का अथ है ‘भी’। स्थान भी अनेक थे, करण भी अनेक थे — अब कहा जा रहा है क प्रयत्न भी
agl एक ही प्रकार का नह । यह सूत्र नए प्रकरण का द्वार खोलता है, ठ क वैसे ही जैसे कक्षा ८ म ‘करणम् अ प।’ ने
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खोला था।
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स : ‘प्रयत्नः + अ प’ म वसग के पहले ‘अ’ और बाद म भी ‘अ’ है, अतः वसग-स (पूवरूप) से
‘प्रयत्नोऽ प’ बना — वसग का ‘ओ’ हुआ और आगे का ‘अ’ लुप्त होकर अवग्रह (ऽ) से दखाया गया। यही नयम
‘इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः’ म भी लगा है।
प्र.3 सूत्रम् — ‘आभ्यन्तरो बाह्यश्च।’ अस्य अथः कः ? ‘बाह्य-प्रयत्नः’ इ त कम् ?
अथः (पुस्तकानुसारम्) — ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ ‘बाह्य-प्रयत्नः’ च इ त (एतौ द्वौ प्रकारौ भवतः)। (प्रयत्न के दो प्रकार ह —
आभ्यन्तर-प्रयत्न तथा बाह्य-प्रयत्न।)
प्रयत्न-प्रकारः कुत्र भव त अ स्मन् पाठे
आभ्यन्तर-पयत्नः आस्यस्य अभ्यन्तरे — करणस्य स्थानं पित गितः वस्तरेण च चतः — पञ्च वधः
बाह्य-पयत्नः आस्यात् बिहः — वायोः िनगमने, नादे , घोषे च यः पयत्नः केवलं नाम उक्तम्, ववेचनं न कृतम्
पाठ यह रुक जाता है — और यह जान-बूझकर है: पाठ का अ न्तम सूत्र ही कहता है ‘इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः’ —
यहाँ तक केवल आभ्यन्तर-प्रयत्न क चचा हुई। बाह्य-प्रयत्न ( जसम अल्पप्राण-महाप्राण, घोष-अघोष, संवार- ववार
जैसे भेद आते ह) आगे के अध्ययन के लए छोड़ दया गया है। ठ क वैसे ही जैसे कक्षा ८ ने आभ्यन्तर-प्रयत्न को इस
कक्षा के लए छोड़ा था।
स : ‘बाह्यः + च’ म वसग के बाद ‘च्’ आने पर वसग ‘श्’ हो गया — वसग-स (श्चत्व) — अतः ‘बाह्यश्च’।
यही नयम ‘रामः + च = रामश्च’ म भी है।
प्र.4 सूत्रम् — ‘स्वस्थाने आभ्यन्तरस्तावत्।’ अस्य अथः कः ?
अथः (पुस्तकानुसारम्) — वणस्य स्वक यं स्थानं प्र त (करणस्य) यः प्रयत्नः, सः → ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ भव त; तद् अधुना
जानीमः।
( हन्द — वण के अपने स्थान क ओर करण का जो प्रयत्न होता है, वही ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ है — अब हम उसे जानते ह।)
यह सूत्र वही प रभाषा है जो पृष्ठ १४६ पर द गई थी: ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृश त,
स्थानस्य समीपं वा या त…’। सूत्र इसे चार शब्द म कह दे ता है — स्वस्थाने (अपने स्थान क ओर), आभ्यन्तरः
(यही आभ्यन्तर है), तावत् ( फ़लहाल, पहले)। ‘तावत्’ शब्द वशेष है — इसका अथ है ‘पहले यह, फर आगे और’।
अथात् सूत्रकार स्वयं संकेत दे रहा है क बाह्य-प्रयत्न बाद म आएगा।
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स : ‘आभ्यन्तरः + तावत्’ म वसग के बाद ‘त्’ (खर्) आने पर वसग ‘स्’ हो गया — वसग-स (सत्व) —
अतः ‘आभ्यन्तरस्तावत्’।
प्र.5 सूत्रम् — ‘स्पृष्ट–करणाः – स्पशाः।’ अस्य अथः कः ?
अथः (पुस्तकानुसारम्) — स्पशानां वणानाम् उच्चारणे, करणं → ‘स्पृष्ट-प्रयत्नेन’ स्थानं (स्पष्टरूपेण) स्पृश त।
( हन्द — स्पश वण के उच्चारण म करण ‘स्पृष्ट-प्रयत्न’ से स्थान को स्पष्ट रूप से छू ता है।)
वे वण — क ख ग घ ङ · च छ ज झ ञ · ट ठ ड ढ ण · त थ द ध न · प फ ब भ म — कुल २५।
सूत्र वस्तुतः प रभाषा है: इसका शब्दशः अथ है — ‘ जनके करण स्पृष्ट ह , वे स्पश कहलाते ह’। अथात् ‘स्पश’
नाम कोई मनमानी सं ा नह ; वह उनके उच्चारण-प्रयत्न से ही नकला है। नाम म ही प रभाषा छपी है — यही
पा णनीय शैली क सुन्दरता है।
व्याकरण: ‘स्पृष्ट-करणाः’ बहु ी ह समास है — ‘स्पृष्टं करणं येषां ते’ ( जनका करण स्पृष्ट हो, वे)। ‘स्पशाः’ प्रथमा
बहुवचन म वधेय है। बहु ी ह इसी लए, क्य क समस्त पद स्वयं करण क नह , वण क बात कर रहा है।
प्र.6 सूत्रम् — ‘ईषत्-स्पृष्ट–करणा – अन्तस्थाः।’ अस्य अथः कः ?
अथः (पुस्तकानुसारम्) — अन्तःस्थानां वणानाम् उच्चारणे, करणम् → ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नेन’ स्थानं (स्वल्पं) स्पृश त।
( हन्द — अन्तःस्थ वण के उच्चारण म करण ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ से स्थान को थोड़ा-सा ही छू ता है।)
वे वण — य · र · ल · व — कुल ४।
‘ईषत्’ ही पूरा अन्तर है: पछले सूत्र और इस सूत्र म केवल एक शब्द का अन्तर है — ‘ईषत्’। स्पश म करण पूरा
छू ता है, अन्तःस्थ म ज़रा-सा। इसी ‘ज़रा-सा’ के कारण वायु का माग पूरी तरह बन्द नह होता और ये वण स्वर के
नज़द क पहुँच जाते ह — इसी लए पुस्तक इन्ह ‘अध-स्वराः’ भी कहती है। ‘य’ को ख चकर बो लए, वह ‘ई’ म बदल
जाएगा; ‘व’ को ख चए, वह ‘ऊ’ म।
ध्यान द: सूत्र म ‘अन्तस्थाः’ छपा है, पाठ म ‘अन्तःस्थाः’ — दोन एक ही शब्द के दो प्रच लत रूप ह (अन्तः + स्थ =
बीच म स्थत)। ‘करणा’ रूप म भी सूत्र-शैली क सं क्षप्तता है; पूरा रूप ‘करणाः’ होगा।
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प्र.7 सूत्रम् — ‘ईषद्- ववृत–करणा – ऊष्माणः।’ अस्य अथः कः ?
अथः (पुस्तकानुसारम्) — ऊष्मणां वणानाम् उच्चारणे, करणम् → ‘ईषद्- ववृत-प्रयत्नेन’ स्थानं प्र त (समीपं) या त।
( हन्द — ऊष्म वण के उच्चारण म करण ‘ईषद्- ववृत-प्रयत्न’ से स्थान के समीप तक जाता है — छू ता नह ।)
वे वण — श · ष · स · ह — कुल ४; तथा इन्ह के साथ अयोगवाहौ (अं, अः) भी इसी प्रयत्न से बनते ह।
यह ‘स्पश’ से ‘ग त’ क ओर मोड़ है: पहले दो सूत्र म क्रया थी ‘स्पृश त’ (छू ता है); इस सूत्र से क्रया बदलकर
‘या त’ (जाता है) हो जाती है। यही व्याकर णक संकेत है क यहाँ से स्पश समाप्त और अन्तराल आरम्भ। ‘स्’
बोलकर हथेली मुँह के आगे र खए — वायु लगातार बहती मलेगी, क्य क रास्ता कह बन्द ही नह हुआ।
स : ‘ईषत् + ववृत’ म ‘त्’ के बाद मृदु ‘व्’ आने से ‘त्’ का ‘द्’ हुआ — जश्त्व स — अतः ‘ईषद्- ववृत’।
कन्तु ‘ईषत् + स्पृष्ट’ म आगे ‘स्’ (कठोर) है, इस लए वहाँ ‘त्’ ज्य का त्य रहा।
प्र.8 सूत्रम् — ‘ ववृत–करणाः – स्वराः।’ अस्य अथः कः ?
अथः (पुस्तकानुसारम्) — स्वराणां वणानाम् उच्चारणे, करणं → ‘ ववृत-प्रयत्नेन’ स्थानं प्र त ( क ञ्चत्-दूर-पयन्तं) या त।
( हन्द — स्वर के उच्चारण म करण ‘ ववृत-प्रयत्न’ से स्थान क ओर कुछ ही दूर तक जाता है — माग स्पष्ट खुला रहता है।)
यही सूत्र ‘स्वर’ क सबसे छोट प रभाषा है: ‘ जनका करण ववृत हो, वे स्वर’। यह से पृष्ठ १५२ क पहली
सारणी क सारी बात नकलती ह — माग खुला है, इस लए ध्व न टकती है; ध्व न टकती है, इस लए एक-दो-तीन
मात्रा सम्भव है; और इस लए स्वर स्वतन्त्र है। इस एक सूत्र से पूरी सारणी नकाली जा सकती है।
ध्यान द — ‘ क ञ्चत्-दूर-पयन्तम्’: पछले सूत्र म करण ‘समीपं’ जाता था, इस सूत्र म ‘ क ञ्चत्-दूर-पयन्तम्’।
अथात् स्वर म अन्तराल अ धक है — यही ‘लघुः ववरः’ और ‘ ु टः ववरः’ का अन्तर है, जो पृष्ठ १४७ पर वस्तार
से बताया गया था।
प्र.9 सूत्रम् — ‘संवृतस्त्वकारः।’ अस्य अथः कः ? अत्र ‘तु’ शब्दस्य कः प्रयोजनम् ?
अथः (पुस्तकानुसारम्) — [संवृतः तु अकारः] अ-कारस्य (ह्रस्वस्य) वणस्य उच्चारणे तु (अपवादरूपेण), (करणं) →
‘संवृत-प्रयत्नेन’ स्थानं प्र त संकु चतः भव त।
( हन्द — कन्तु ह्रस्व ‘अ’ के उच्चारण म — अपवाद के रूप म — करण ‘संवृत-प्रयत्न’ से स्थान क ओर सकुड़ जाता है।)
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‘तु’ ही इस सूत्र क जान है: ‘तु’ का अथ है ‘ कन्तु, पर’। पछला सूत्र कह चुका था ‘ ववृत-करणाः – स्वराः’ —
सब स्वर ववृत। तुरन्त यह सूत्र आकर कहता है ‘संवृतः तु अकारः’ — पर ‘अ’ संवृत है। शास्त्र म जहाँ ‘तु’ आता
है, वहाँ समझ ली जए क पछले नयम का अपवाद कहा जा रहा है। एक अक्षर के इस छोटे -से शब्द ने पूरे नयम म
छे द बना दया — और वही छे द इस पाठ क सबसे बड़ी सीख है।
स : ‘संवृतः + तु + अकारः’ → वसग के बाद ‘त्’ आने से वसग ‘स्’ हुआ (सत्व), और ‘तु + अकारः’ म उ + अ
= व (यण् स ) — अतः बना ‘संवृतस्त्वकारः’। पुस्तक ने कोष्ठक म व े द दे कर यही स्पष्ट कया है।
प्र.10 सूत्रम् — ‘इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः।’ अस्य अथः कः ?
अथः (पुस्तकानुसारम्) — अत्र पयन्तम् एषः उच्चारणस्य ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ च चतः। (यहाँ तक उच्चारण के ‘आभ्यन्तर-
प्रयत्न’ क चचा हुई।)
यह उपसंहार-सूत्र है: जैसे ‘प्रयत्नोऽ प वधः।’ ने प्रकरण खोला था, वैसे ही यह सूत्र उसे बन्द करता है। ध्यान
द जए — सूत्र म ‘अन्तःप्रयत्नः’ शब्द है, ‘प्रयत्नः’ नह । अथात् सूत्रकार स्वयं बता रहा है क केवल भीतरी प्रयत्न
पूरा हुआ; बाह्य-प्रयत्न अभी शेष है। कक्षा ८ का समापन-सूत्र भी ऐसा ही था — ‘इत्येतत् करणम्।’
पुस्तक का समापन: यह शारदा (कक्षा ९) के अ न्तम पाठ का अ न्तम शास्त्र-वाक्य है। तीन कक्षाओं म स्थान, करण
तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न — तीन तत्त्व पूरे हो गए। जो सीखा, उसे केवल याद मत र खए — रोज़ थोड़ी दे र संस्कृत ऊँचे
स्वर म प ढ़ए, क्य क ‘अभ्यासाद् जायते स द्धः’।
स : ‘इ त + एषः + अन्तःप्रयत्नः’ → इ त + एषः म इ + ए = ‘य्’ (यण् स न्ध) से ‘इत्येषः’, फर ‘एषः + अन्तः’ म
वसग-स न्ध (पूवरूप) से ‘एषोऽन्तः’ — अतः ‘इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः’।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 159
प्रश्नः १ — अधो ल खतप्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.1 (क) वणानाम् उत्पत्त्यथ क त आवश्यका न तत्त्वा न भव न्त ?
उत्तरम् — त्री ण। (तीन।)
पूणवाक्येन — वणानाम् उत्पत्त्यथ त्री ण आवश्यका न तत्त्वा न भव न्त — (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः च।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २
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आधार (पृष्ठ १४५): ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे वणानाम् उत्पत्त्यथ त्री ण तत्त्वा न आवश्यका न भव न्त — (क) स्थानम्,
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(ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः च।’
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aयाgl‘ त ः’ (स्त्री लङ्ग) नह । एकपदे न उत्तर म भी वशेष्य के लङ्ग के अनुसार ही रूप चुनना पड़ता है।
रूप क सावधानी: ‘तत्त्वम्’ नपुंसक लङ्ग है, अतः ‘ त्र’ का नपुंसक बहुवचन रूप त्री ण लगेगा — ‘त्रयः’ (पु ल्लङ्ग)
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प्र.1 (ख) क त स्थाना न स न्त ? a
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उत्तरम् — षट् । (छह।)
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पूणवाक्येन — आस्ये षट् स्थाना न स न्त — कण्ठः, तालु, मूधा, दन्तः, ओष्ठः, ना सका च।
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आधार (पृष्ठ १४५): ‘तत्र (क) षट् स्थाना न; (ख) षट् करणा न इ त उभयोः वषये वयं पूवस्यां कक्षायाम् एव
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वस्तरेण ातवन्तः।’ चत्र म छह स्थान क्रम-संख्या के साथ अं कत ह — १ कण्ठः, २ तालु, ३ मूधा, ४ दन्तः, ५
ओष्ठः, ६ ना सका।
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करण भी छह ही: संख्या दोन क छह है, पर नाम अलग — करण ह कण्ठः, ज ा-मध्यः, ज ा-उपाग्रः, ज ा-
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अग्रः, ओष्ठः तथा ना सका। प्रश्न ‘स्थाना न’ का है, इस लए उत्तर म स्थान ही गनाइए।
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a gl प्र.1 (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः क त वधः ?
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उत्तरम् — पञ्च वधः। (पाँच प्रकार का।)
agl
पूणवाक्येन — आभ्यन्तर-प्रयत्नः पञ्च वधः भव त — स्पृष्ट-प्रयत्नः, ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः, ईषद्- ववृत-प्रयत्नः, ववृत-प्रयत्नः,
संवृत-प्रयत्नः च।
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आधार (पृष्ठ १४६): ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः पञ्च वधः भव त —’ इसके ठ क बाद पुस्तकmने (१) से (५) तक क्रम से
o m l a se
.c
पाँ च गनाए ह।
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agl c
व्याकरण: ‘क त वधः ?’ पूछे जाने पर उत्तर भी ‘- वधः’ म ही दे ना चा हए — पञ्च वधः, केवल ‘पञ्च’ नह ।
m .
m a s e
co agl
‘प्रयत्नः’ पु ल्लङ्ग है, इस लए वशेषण भी पु ल्लङ्ग प्रथमा एकवचन म — ‘पञ्च वधः’।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
प्र.1 (घ) करणं यदा स्थानं स्पष्टरूपेण स्पृश त, तदा करणस्य कः प्रयत्नः भव त ?
उत्तरम् — स्पृष्ट-प्रयत्नः। (स्पृष्ट-प्रयत्न।)
पूणवाक्येन — करणं यदा स्थानं स्पष्टरूपेण स्पृश त, तदा करणस्य स्पृष्ट-प्रयत्नः भव त; तेन च स्थाने स्पश-व्यञ्जना न उत्पद्यन्ते।
आधार (पृष्ठ १४६): ‘करणं यदा स्थानं स्पष्ट-रूपेण स्पृश त, तदा करणस्य स्पृष्ट-प्रयत्नः भव त। करणस्य स्पृष्ट-
प्रयत्नेन → स्थाने स्पश-व्यञ्जना न उत्पद्यन्ते।’ प्रश्न का वाक्य पुस्तक का ही वाक्य है — इस लए उत्तर सीधे उसी
वाक्य के उत्तराध से मलता है।
भ्रम से ब चए: य द प्रश्न म ‘स्वल्पम् एव स्पृश त’ होता तो उत्तर ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ होता। यहाँ ‘स्पष्टरूपेण’ शब्द
है — यही नणायक है।
प्र.1 (ङ) अवणस्य क त उपभेदाः स न्त ?
उत्तरम् — त्रयः। (तीन।)
पूणवाक्येन — अ-वणस्य त्रयः उपभेदाः स न्त — अ-कारः (ह्रस्वः), आ-कारः (द घः), अ३-कारः (प्लुतः) इ त।
उपभेदः नाम मात्रा आभ्यन्तर-प्रयत्नः
अ वः
ह्र स् एकमात्रः संवृतः
आ दीघः मात्रः ववृतः
अ३ लुतः
प् त्रमात्रः ववृतः
आधार (पृष्ठ १४८): ‘अ-वणस्य त्रयः उपभेदाः वयं पूव दृष्टवन्तः — अ-कारः (ह्रस्वः), आ-कारः (द घः), अ३-कारः
(प्लुतः) इ त।’ पृष्ठ १५२ क सारणी भी यही कहती है — समानाक्षर स्वर म ‘ह्रस्व-द घ-प्लुताः — त्रयः उपभेदाः’।
रूप क सावधानी: ‘उपभेदः’ पु ल्लङ्ग है, अतः यहाँ त्रयः (पु ल्लङ्ग बहुवचन) आएगा — प्रश्न १ (क) के ‘त्री ण’ से
यह भन्न है, क्य क वहाँ वशेष्य ‘तत्त्वा न’ नपुंसक लङ्ग था। एक ही संख्या, दो अलग रूप — यही इस अभ्यास क
असली परीक्षा है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
प्र.1 (च) संवृत-प्रयत्नः कुत्र भव त ?
उत्तरम् — कण्ठे (कण्ठ-स्थाने)। (कण्ठ म।)
पूणवाक्येन — संवृत-प्रयत्नः केवलं कण्ठ-स्थाने एव भव त, तद प केवलम् अ-कारस्य (ह्रस्वस्य) उच्चारणाथम् एव।
आधार (पृष्ठ १४९ क पे टका): ‘केवलं कण्ठ-स्थाने एव संवृत-प्रयत्नः भव त, तद प केवलम् अ-कारस्य
उच्चारणाथम् एव।’ ध्यान द जए, वाक्य म दो बार ‘केवलम्’ आया है — इस लए उत्तर म दोन सीमाएँ बताना अ ा
उत्तर है : (१) केवल कण्ठ म, (२) केवल ह्रस्व ‘अ’ के लए।
‘कुत्र’ का उत्तर सप्तमी म: ‘कुत्र ?’ अथात् ‘कहाँ ?’ — इसका उत्तर अ धकरण कारक म, अथात् सप्तमी
वभ क्त म दे ना चा हए — ‘कण्ठे ’ अथवा ‘कण्ठ-स्थाने’। ‘कण्ठः’ (प्रथमा) लखना अशुद्ध होगा।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 159
प्रश्नः २ — अधो ल खतप्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.2 (क) आभ्यन्तर-प्रयत्नः कः उच्यते ?
उत्तरम् — आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृश त, स्थानस्य समीपं वा या त, सः प्रयत्नः ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’
इ त उच्यते।
( हन्द — मुँह के भीतर करण जस प्रयत्न से स्थान को छू ता है अथवा स्थान के समीप जाता है, वही प्रयत्न ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’
कहलाता है।)
यह पुस्तक क अपनी प रभाषा है (पृष्ठ १४६): उत्तर म तीन बात अवश्य आनी चा हए — (१) आस्यस्य
अभ्यन्तरे (मुँह के भीतर), (२) करणं स्थानं स्पृश त वा समीपं या त (करण क क्रया), (३) सः प्रयत्नः (वही
प्रयत्न है)। तीन म से कोई एक छू ट जाए तो प रभाषा अधूरी रह जाती है — जैसे ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे’ छू ट जाए तो
बाह्य-प्रयत्न भी इसी म आ जाएगा।
सूत्र-रूप भी जोड़ सकते ह: पा णनीय- शक्षा का सूत्र यही कहता है — ‘स्वस्थाने आभ्यन्तरस्तावत्।’ अथात् वण
के अपने स्थान क ओर करण का जो प्रयत्न हो, वही आभ्यन्तर है। उत्तर के अन्त म यह सूत्र जोड़ दे ना उत्तर को और
पक्का कर दे ता है।
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प्र.2 (ख) ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः कदा भव त ?
उत्तरम् — करणं यदा स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृश त’, तदा करणस्य ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भव त। करणस्य ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नेन
स्थाने अन्तःस्थ-व्यञ्जना न (य्, र्, ल्, व्) जायन्ते।
( हन्द — करण जब स्थान को बहुत थोड़ा ही छू ता है, तब ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है; इसी से अन्तःस्थ व्यञ्जन — य, र, ल, व —
बनते ह।)
‘कदा’ का उत्तर ‘यदा… तदा…’ से द जए: प्रश्न ‘कब ?’ पूछता है, इस लए उत्तर का ढाँचा ‘यदा … तदा …’ होना
चा हए — यही पुस्तक क भी शैली है। केवल ‘अन्तःस्थ वण म होता है’ कह दे ना उत्तर नह , क्य क प्रश्न प र स्थ त
पूछ रहा है, वण-सूची नह । सूची उत्तर के दूसरे भाग म जो ड़ए।
‘ईषत्’ शब्द पर ध्यान: ‘ईषत्’ का अथ ही है ‘थोड़ा’। इसी लए ‘ईषत्-स्पृष्ट’ = थोड़ा छु आ हुआ, और ‘ईषद्- ववृत’
= थोड़ा खुला हुआ। एक ही उपसग दो अलग प्रयत्न म लगा है — भ्रम से बचने के लए दूसरे शब्द (स्पृष्ट या ववृत)
पर ध्यान द जए।
प्र.2 (ग) करणस्य ववृत-प्रयत्नेन के स्वराः उच्चायन्ते ?
उत्तरम् — करणस्य ववृत-प्रयत्नेन स्थाने (अ-कारं वहाय) अन्ये सव स्वराः उच्चायन्ते। ते एक वश तः (२१) स्वराः स न्त।
( हन्द — करण के ववृत-प्रयत्न से ह्रस्व ‘अ’ को छोड़कर शेष सभी स्वर — कुल इक्क स — बोले जाते ह।)
भेदः ववृत-प्रयत्नेन उच्चायमाणाः स्वराः सङ् ख्या
समानाक्षरािण आ · अ३ · इ · ई · इ३ · उ · ऊ · उ३ · ऋ · ॠ · ऋ३ · ऌ · ऌ३ १३
सन्ध्यक्षरािण ए · ए३ · ऐ · ऐ३ · ओ · ओ३ · औ · औ३ ०८
योगः अ-कारं िवहाय सव स्वराः २१
आधार (पृष्ठ १४७): ‘करणस्य ववृत-प्रयत्नेन → स्थाने (अ-कारं वहाय अन्ये सव) स्वराः उच्चायन्ते।’ और पृष्ठ १५२
क सारणी संख्या भी दे दे ती है — ‘स्वराः (२१) – ववृत-प्रयत्नः’। ध्यान द जए — ‘अ-कारं वहाय’ का अथ है
केवल ह्रस्व अ; आ और अ३ तो ववृत ही ह।
‘ वहाय’ का प्रयोग: ‘ वहाय’ ( व + √हा + ल्यप्) एक पूवका लक क्रया (ल्यबन्त) है, जसका अथ है ‘छोड़कर’।
यह तीया वभ क्त के साथ आती है — इसी लए ‘अ-कारम्’ ( तीया) लखा गया है, ‘अ-कारः’ नह ।
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प्र.2 (घ) आभ्यन्तर-प्रयत्नाः कुत्र दृश्यन्ते ?
उत्तरम् — कण्ठ्य-तालव्य-मूधन्य-दन्त्य-ओष्ठ्येषु पञ्च-प्रकारेषु वणषु — स्थान-करणयोः मध्ये — उपयुक्ताः चतु वधाः
आभ्यन्तर-प्रयत्नाः दृश्यन्ते। पञ्चमः (संवृत-प्रयत्नः) तु केवलं कण्ठ-स्थाने एव दृश्यते।
( हन्द — कण्ठ्य, तालव्य, मूधन्य, दन्त्य तथा ओष्ठ्य — इन पाँच प्रकार के वण म स्थान और करण के बीच उपयुक्त चार
आभ्यन्तर-प्रयत्न दखाई दे ते ह; पाँचवाँ — संवृत — केवल कण्ठ म दखता है।)
आधार (पृष्ठ १४७ क पे टका): ‘कण्ठ्य-तालव्य-मूधन्य-दन्त्य-ओष्ठ्येषु पञ्च-प्रकारेषु वणषु — स्थान-करणयोः
मध्ये उपयुक्ताः चतु वधाः आभ्यन्तर-प्रयत्नाः दृश्यन्ते।’ ध्यान द जए, पुस्तक ने यहाँ ‘चतु वधाः’ लखा है,
‘पञ्च वधाः’ नह — क्य क यह वाक्य पाँचव प्रयत्न (संवृत) के वणन से पहले आता है। इसी लए पूरा उत्तर दे ने के
लए संवृत क सीमा भी अलग से जोड़नी चा हए।
‘कुत्र’ का उत्तर सप्तमी म: ‘वणषु’, ‘मध्ये’, ‘कण्ठ-स्थाने’ — तीन सप्तमी वभ क्त म ह, क्य क प्रश्न अ धकरण
(कहाँ) पूछ रहा है।
प्र.2 (ङ) आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु व शष्टः स्वरः कः अ स्त ?
उत्तरम् — आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु ‘अ-कारः’ (ह्रस्वः) व शष्टः स्वरः अ स्त; यतः अन्येषां सवषां स्वराणाम् उच्चारणे ववृत-
प्रयत्नः भव त, कन्तु केवलम् अस्य उच्चारणे कण्ठे संकोचः, अथात् ‘संवृत-प्रयत्नः’ भव त।
( हन्द — आभ्यन्तर-प्रयत्न क दृ ष्ट से स्वर म ह्रस्व ‘अ’ व शष्ट स्वर है; क्य क शेष सभी स्वर म ववृत-प्रयत्न होता है, पर केवल
इसी म कण्ठ सकुड़ता है — संवृत-प्रयत्न होता है।)
आधार (पृष्ठ १४८): ‘स्वरेषु अ-कारः क श्चद् व शष्टः स्वरः अ स्त।’ और आगे — ‘परन्तु, अ-कारस्य (ह्रस्वस्य)
उच्चारणे तु तथा न भव त। अत्र तु कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये संकोचः भव त।’ पा णनीय- शक्षा भी इसी को
अपवाद-सूत्र म बाँधती है — ‘संवृतस्त्वकारः’ — जहाँ ‘तु’ शब्द ही अपवाद का सूचक है।
उत्तर म ‘यतः’ अवश्य जो ड़ए: प्रश्न केवल ‘कौन-सा स्वर’ नह पूछ रहा, ‘ व शष्ट स्वर कौन-सा’ पूछ रहा है —
अथात् वशेषता भी बतानी है। इस लए ‘अ-कारः’ कहकर रुक जाना अधूरा उत्तर है; ‘यतः तस्य उच्चारणे संवृत-
प्रयत्नः भव त’ जोड़ने पर ही उत्तर पूरा होता है।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 159
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २
a g l AglaSem · NCERT Solutions
प्रश्नः ३ — अधो ल खतानां वणानां क-स्तम्भेन सह मेलनं कुरुत
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अभ्यासाद् जायते स द्धः
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a s emल खतानां वणानां क-स्तम्भेन सह मेलनं कुरुत — क-स्तम्भः : (क) ववृत-प्रयत्नः (ख) स्पृष्ट-प्रयत्नः (ग)
gl
अधो
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प्र.3
ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नः (घ) ईष त्ववृत-प्रयत्नः (ङ) संवृत-प्रयत्नः ॥ ख-स्तम्भः : (१) व् (२) श् (३) ऋ (४) अ (५) ध्
co m
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शुद्धं मेलनम् — (क)–३, (ख)–५, (ग)–१, (घ)–२, (ङ)–४।
g l as
a
स्थानम् · करणम्
m
क्रमः क-स्तम्भः ख-स्तम्भः वणस्य भेदः मेल का कारण
co
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(प्रयत्नः) (वणः)
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३ऋ
agहै और ‘अ’ नह है, इस लए ववृत
(क) िववृत-पयत्नः ( ) स्वरः (समानाक्षरम्) मूधा · ज ा-उपाग्रः ‘ ववृत-करणाः – स्वराः’ — ऋ स्वर
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l a
g (ख)
a स्पष्ृ ट-पयत्नः ५ ध्
( ) स्पश-व्यञ्जनम् (त- दन्तः · ज ा-अग्रः ‘स्पृष्ट-करणाः – स्पशाः’ — ध् वग य
s
वगस्य चतुथः) (स्पश) व्यञ्जन है
m a
१ व्
m .co agl
se
(ग) ईषत्स्पष्ृ ट- ( ) अन्तःस्थ-व्यञ्जनम् दन्तः + ओष्ठः · ‘ईषत्-स्पृष्ट-करणा – अन्तस्थाः’ —
पयत्नः
g l a ज ा-अग्रः + व् य र ल व म से एक है
a अधरोष्ठः
(घ) ईषित्ववृत- २ श्
( ) ऊष्म-व्यञ्जनम् तालु · ज ा-मध्यः
co m
‘ईषद्- ववृत-करणा – ऊष्माणः’ —
m .
s‘संeवृतस्त्वकारः’ — संवृत केवल
पयत्नः श् श ष स ह म से एक है
m l a
.co संवृत-पयत्नः ४अ
ag
em
(ङ) ( ) स्वरः (ह्रस्वः अ-कारः) कण्ठः · कण्ठः
l a s (स्वस्थानम्) ह्रस्व ‘अ’ के लए ही है
ag
se m
com श् = ऊष्म। दूसरा चरण — हर भेद के सामने उसका a
मेलन को दो चरण म हल क जए: पहला चरण — ख-स्तम्भ के हर वण को उसके भेद म र खए : ऋ = स्वर, अ
. a g l
mजाता है। पहले वण को उसक ेणी म र खए, फर ेणी को उसके
= स्वर (और वह भी ह्रस्व अ), ध् = स्पश, व् = अन्तःस्थ,
प्रयत्न लख द जए, जो सारणी से सीधेseमल
प्रयत्न से जो ड़ए — जोड़ी अपनेaआप
a
gl बन जाती है।
co m
m .
e
सबसे आसान कड़ी पहले पक ड़ए: ‘अ’ को दे खते ही ‘संवृत’ तय है, क्य क संवृत-प्रयत्न इस पूरी वणमाला म
m l as
.cमoस्वर केवल दो ही ह। शेष तीन व्यञ्जन-जो ड़याँ फर सीधी ह। g
केवल एक ही वण के लए है। वह जोड़ी बन जाने पर ‘ऋ’ के लए ‘ ववृत’ अपने आप बचता है — क्य क ख-स्तम्भ
m a
l a se
ag
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अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 160 com a
e m. agl
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प्रश्नः ४ — अधो ल खतानां वाक्यानाम् उत्तरा ण आम्/न इ त सन्दभानुसारं लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.4 (क) ‘ई’ वणः सन्ध्यक्षरम् अ स्त। (आम् / न)
उत्तरम् — न। (नह ।)
शुद्धं वाक्यम् — ‘ई’ वणः समानाक्षरम् अ स्त, न तु सन्ध्यक्षरम्। (‘ई’ समानाक्षर स्वर है, सन्ध्यक्षर नह ।)
बन्दुः ‘ई’ के वषय म
भेद ः समानाक्षर-स्वरः
स्थानम् · करणम् तालु · िज ा-मध्यः — अतः एक-स्थानी
उपभेद ाः इ (ह्रस्वः), ई (दीघः), इ३ (प्लुतः) — त्रयः
आभ्यन्तर-पयत्नः िववृत-पयत्नः
कसौट — स्थान ग नए: सन्ध्यक्षर वे ह जो दो स्वर क स से बने ह और जनके दो स्थान ह — केवल ए,
ऐ, ओ, औ। ‘ई’ का स्थान एक ही है (तालु), और उसका अपना ह्रस्व रूप ‘इ’ भी है — जसका ह्रस्व रूप हो, वह
सन्ध्यक्षर हो ही नह सकता (पृष्ठ १५२ : ‘सन्ध्यक्षर-स्वरे ह्रस्वः उपभेदः न भव त’)। दोन कसौ टय पर ‘ई’ समानाक्षर
ही सद्ध होता है।
प्र.4 (ख) ‘ऐ’ वणः सन्ध्यक्षरम् अ स्त। (आम् / न)
उत्तरम् — आम्। (हाँ।)
पूणवाक्येन — ‘ऐ’ वणः सन्ध्यक्षरम् अ स्त; सः द्व-स्थानी (कण्ठतालव्यः) अ स्त, तस्य ह्रस्वः उपभेदः न भव त, द घ-प्लुतौ — ौ
एव उपभेदौ भवतः।
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बन्दुः ‘ऐ’ के वषय म
भेद ः सन्ध्यक्षर-स्वरः
स्थानम् · करणम् कण्ठः + तालु — अतः ि -स्थानी (कण्ठताल व्यः)
उपभेद ाः ऐ (दीघः), ऐ३ (प्लुतः) — ौ; ह्रस्वः नािस्त
आभ्यन्तर-पयत्नः िववृत-पयत्नः
सिन्ध-रूपेण अ / आ + ए / ऐ = ऐ (वृि -सिन्धः) — यथा : तव + ऐक्यम् = तवैक्यम्
नाम ही प्रमाण है: ‘सन्ध्यक्षर’ = स न्ध से बना अक्षर। ‘ऐ’ दो स्वर के मेल से बना है, इस लए उसम दोन स्थान बचे
रहते ह — कण्ठ भी और तालु भी। पृष्ठ १५४ क सारणी म इसी लए ‘ऐ ऐ३’ कण्ठ्य पं क्त म भी है और तालव्य
पं क्त म भी।
प्र.4 (ग) ‘झ’ वणः सपशः अ स्त। (आम् / न)
उत्तरम् — आम्। (हाँ — ‘झ’ स्पश-व्यञ्जन है।)
पूणवाक्येन — ‘झ’ वणः स्पशः (स्पश-व्यञ्जनम्) अ स्त; सः च-वगस्य चतुथः वणः, तालव्यः, तस्य आभ्यन्तर-प्रयत्नः स्पृष्ट-
प्रयत्नः अ स्त।
बन्दुः ‘झ’ के वषय म
भेद ः पश-व्यञ्जनम् (वग यम्) — च-वगस्य चतुथः
स्
स्थानम् · करणम् तालु · िज ा-मध्यः
आभ्यन्तर-पयत्नः प ृ ट पयत्नः — करणं स्थानं स्पष्टरूपेण स्पशृ ित
स् ष् -
उदाहरण-शब्दः झङ् कारः, झिटित
कसौट : पाँच वग के पच्चीस वण — क से म तक — सब ‘स्पशाः’ ह, क्य क इनम करण स्थान को पूरी तरह छू
लेता है। ‘झ’ च-वग म है, इस लए वह स्पश ही है। सूत्र भी यही कहता है — ‘स्पृष्ट-करणाः – स्पशाः।’
पुस्तक क छपाई पर ध्यान: इस पं क्त म पुस्तक म ‘सपशः’ छपा है, जब क पूरे पाठ म और पृष्ठ १५२ क सारणी
म शब्द ‘स्पशः’ ही है। यह स्पष्ट रूप से मुद्रण क भूल है — उत्तर लखते समय शुद्ध रूप स्पशः ही ल खए।
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प्र.4 (घ) ‘र’ वणः स्पशषु प रगण्यते। (आम् / न)
उत्तरम् — न। (नह ।)
शुद्धं वाक्यम् — ‘र’ वणः स्पशषु न प रगण्यते; सः अन्तःस्थेषु प रगण्यते। तस्य आभ्यन्तर-प्रयत्नः ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः अ स्त। (‘र’
स्पश वण म नह , अन्तःस्थ वण म गना जाता है।)
बन्दुः ‘र’ के वषय म
भेद ः अन्तःस्थ-व्यञ्जनम् (अध-स्वरः) — य र ल व मध्ये ि तीयः
स्थानम् · करणम् मूध · िज ा-उपागः
आभ्यन्तर-पयत्नः ईषत्-स्पष्ृ ट-पयत्नः — करणं स्थानं स्वल्पम् एव स्पशृ ित
तत्सदृ शः स्वरः ऋ (मूधन्यः) — अतः यण् सिन्ध में ऋ का र् होता है
भ्रम कहाँ होता है: ‘र’ बोलते समय जीभ मूधा को छू ती तो है, इस लए लगता है क यह स्पश वण होगा। पर स्पश म
स्पश पूरा होता है और वायु का माग क्षण भर बन्द हो जाता है; ‘र’ म स्पश बहुत हल्का है और वायु बहती रहती है।
इसी लए वह अन्तःस्थ है, स्पश नह । परीक्षा यह है — ‘ट’ को ख चकर नह बोल सकते, ‘र’ को ख चकर बोल सकते
ह।
प्र.4 (ङ) ‘य, र, ल, व’ वणाः ऊष्माणः स न्त। (आम् / न)
उत्तरम् — न। (नह ।)
शुद्धं वाक्यम् — ‘य, र, ल, व’ वणाः अन्तःस्थाः (अध-स्वराः) स न्त, न तु ऊष्माणः। ऊष्माणः तु ‘श, ष, स, ह’ इ त चत्वारः वणाः
स न्त।
भेदः वणाः आभ्यन्तर-प्रयत्नः करणस्य क्रया
अन्तःस्थाः (अध-स्वराः) य·र·ल·व ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः स्थानं स्वल्पं स्पृश त
ऊष्माणः श·ष·स·ह ईषद्- ववृत-प्रयत्नः स्थानं न स्पृश त, बहु समीपं या त
नणायक अन्तर — स्पश होता है या नह : अन्तःस्थ वण म करण स्थान को छू ता तो है, भले थोड़ा; ऊष्म वण म
करण स्थान को छू ता ही नह , केवल पास जाता है और बीच म ‘लघुः ववरः’ रह जाता है। इसी छोटे -से छे द से वायु
रगड़ खाकर नकलती है और सरसराहट (ऊष्मा) पैदा होती है — यही ‘ऊष्माणः’ नाम का कारण है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
दोन क संख्या चार-चार: संख्या समान होने से भ्रम बढ़ जाता है। याद रखने का सूत्र — ‘य र ल व’ अन्तःस्थ
(स्वर के नज़द क), ‘श ष स ह’ ऊष्म (हवा के नज़द क)। कान से भी जाँच ली जए — श, ष, स, ह म साफ़
‘सरसराहट’ सुनाई दे ती है, य, र, ल, व म नह ।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 160
प्रश्नः ५ — रेखाङ् कतपदा न आधृत्य प्रश्न नमाणं कुरुत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.5 (क) स्वराः स्वतन्त्रवणाः स न्त। (रेखाङ् कतम् — स्वराः)
प्रश्नः — के स्वतन्त्रवणाः स न्त ?
( हन्द — कौन स्वतन्त्र वण ह ? — उत्तर : स्वर।)
रेखाङ् कतं पदम् लङ्गम् · वभ क्तः · वचनम् प्रश्नवाचकं पदम् कारणम्
स्वराः पुिल्लङ् गम् · पथमा · बहुवचनम् के ‘ कम्’ शब्दस्य पु ल्लङ्ग-प्रथमा-बहुवचनम् ‘के’ भव त
प्रश्न नमाण का पहला नयम: जो पद रेखां कत है, उसे हटाकर उसक जगह उसी लङ्ग, उसी वभ क्त तथा उसी
वचन का प्रश्नवाचक शब्द र खए; शेष वाक्य ज्य का त्य रहने द जए। ‘स्वराः’ पु ल्लङ्ग प्रथमा बहुवचन है, इस लए
‘ कम्’ का वही रूप — के — आएगा। ‘कः’ (एकवचन) या ‘का न’ (नपुंसक लङ्ग) लखना अशुद्ध होगा।
‘ कम्’ शब्द के तीन लङ्ग म प्रथमा: पु ल्लङ्ग — कः · कौ · के; स्त्री लङ्ग — का · के · काः; नपुंसक लङ्ग — कम्
· के · का न। यही ता लका प्रश्न ५ के (क) और (ख) दोन का आधार है।
प्र.5 (ख) व्यञ्जना न अधमा त्रका ण भव न्त। (रेखाङ् कतम् — व्यञ्जना न)
प्रश्नः — का न अधमा त्रका ण भव न्त ?
( हन्द — कौन आधी मात्रा वाले होते ह ? — उत्तर : व्यञ्जन।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २
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रेखाङ् कतं लङ्गम् · वभ क्तः · वचनम् प्रश्नवाचकं कारणम्
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पदम् पदम्
.co नपुंसकिलङ् गम् · पथमा · g l
‘ कम्’ शब्दस्य नपुंसaक लङ्ग-प्रथमा-बहुवचनम् ‘का न’
m
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व्यञ्जनािन का न
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बहुवचनम् भव त
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(क) और (ख) क तुलना क जए: दोन वाक्य म रेखां कत पद कता है और दोन बहुवचन ह — फर भी
.
प्रश्नवाचक अलग ह। कारण केवल लङ्ग है : ‘स्वरः’ पुmल्लङ्ग है (→ के), ‘व्यञ्जनम्’ नपुंसक लङ्ग है (→ का न)। यही
इस अभ्यास क असली परीक्षा है — वभ क्तlaऔर seवचन दे ख लेना काफ़ नह , लङ्ग भी दे खना पड़ता है।
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वाक्य का अथ भी सम झए: ‘अधमा त्रका ण’ = आधी मात्रा वाले। पृष्ठ १५२ क सारणी कहती है — व्यञ्जनम्
m a s emको अकेला बोलने
‘अधमात्रः नत्यम्’; स्वर तो ‘एकमात्रः / मात्रः / त्रमात्रः वा’ हो सकता है। इसी लए व्यञ्जन
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के लए आधार-स्वर चा हए।
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प्र.5 (ग) स्वराणां द्वौ भेदौ भवतः। (रेखाङ् कतम् — द्वौ)
se m
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प्रश्नः — स्वराणां क त भेदाः भव न्त ?
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( हन्द — स्वर के कतने भेद होते ह ? — उत्तर : दो — समानाक्षर तथा सन्ध्यक्षर।)
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रेखाङ् कतं पदस्य प्रकारः प्रश्नवाचकं
a g कारणम्
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पदम् पदम्
ag संख्यावाचकं िवशेषणम् (पुिल्लङ् ग-पथमा-
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ौ कत संख्या पूछने के लए सदा अव्यय ‘क त’
ि वचनम्)
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आता है
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s त’: ‘ ौ’ संख्या बता रहा है, इस लए उसक जगह क त आएगा। ‘क त’
g l a‘क
a से नह बदलता। परन्तु ‘क त’ के साथ क्रया बहुवचन म आती है, इस लए
संख्यावाची पद का प्रश्नवाचक सदा
अव्यय है — उसका रूप लङ्ग-वचन
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‘भवतः’ ( वचन) को बदलकर ‘भव न्त’ (बहुवचन) करना पड़ता है, और ‘भेदौ’ को ‘भेदाः’। यही इस उपभाग क
m .
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बारीक है।
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m दूसरा स्वीकाय रूप: य द वाक्य का ढाँचा ज्य का त्य रखना हो तो ‘स्वराणां क त भेदौ भवतः ?’ भी लखा जाता
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है, पर प्रच लत तथा अ धक शुद्ध रूप ‘क त भेदाः भव न्त ?’ ही है — क्य क ‘क त’ पूछते समय उत्तर क संख्या
m .
अ ात होती है, इस लए बहुवचन ही उ चत है। यही रूप ५ (ङ) म भी लगेगा।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
प्र.5 (घ) ह्रस्वस्य उपभेदाः न भव न्त। (रेखाङ् कतम् — ह्रस्वस्य)
प्रश्नः — कस्य उपभेदाः न भव न्त ?
( हन्द — कसके उपभेद नह होते ? — उत्तर : ह्रस्व के।)
रेखाङ् कतं पदम् लङ्गम् · वभ क्तः · वचनम् प्रश्नवाचकं पदम् कारणम्
ह्रस्वस्य पुिल्लङ् गम् · षष्ठी · एकवचनम् कस्य ‘ कम्’ शब्दस्य पु ल्लङ्ग-षष्ठी-एकवचनम् ‘कस्य’ भव त
वभ क्त नह बदलती: रेखां कत पद षष्ठी म है (सम्बन्धे षष्ठी — ‘ह्रस्व के’ उपभेद), इस लए प्रश्नवाचक भी षष्ठी म
ही आएगा — ‘कस्य’। ‘कः’ (प्रथमा) लख दे ना सबसे आम भूल है। नयम एक ही है : जो वभ क्त रेखां कत पद
क , वही प्रश्नवाचक क ।
वाक्य का अथ: ‘ह्रस्व’ स्वयं एक उपभेद है (ह्रस्व-द घ-प्लुत म पहला), इस लए उसके भीतर और उपभेद नह होते।
पृष्ठ १५२ क सारणी म यही तथ्य दूसरी दशा से कहा गया है — सन्ध्यक्षर स्वर म ‘ह्रस्वः उपभेदः न भव त’।
प्र.5 (ङ) व्यञ्जनानां चत्वारो भेदाः भव न्त। (रेखाङ् कतम् — चत्वारो)
प्रश्नः — व्यञ्जनानां क त भेदाः भव न्त ?
( हन्द — व्यञ्जन के कतने भेद होते ह ? — उत्तर : चार — स्पश, अन्तःस्थ, ऊष्म तथा अयोगवाह।)
रेखाङ् कतं पदम् पदस्य प्रकारः प्रश्नवाचकं पदम् कारणम्
चत्वारः (चत्वारो) संख्यावाचकं िवशेषणम् (पुिल्लङ् ग-पथमा-बहवु चनम्) कत संख्या पूछने के लए अव्यय ‘क त’
यहाँ क्रया बदलनी नह पड़ती: (ग) म ‘भवतः’ को ‘भव न्त’ करना पड़ा था, क्य क वहाँ वचन था। यहाँ वाक्य
पहले से ही बहुवचन म है (‘भेदाः भव न्त’), इस लए केवल ‘चत्वारो’ क जगह ‘क त’ रख दे ना पयाप्त है — शेष
वाक्य ज्य का त्य ।
‘चत्वारो’ क्य छपा है: मूल रूप ‘चत्वारः’ है। आगे ‘भ’ (मृदु व्यञ्जन) आने से वसग का ‘उ’ होकर ‘ओ’ बन गया
— वसग-स (उत्व) — अतः ‘चत्वारो भेदाः’। यही नयम ‘रामः + भव त = रामो भव त’ म है।
अभ्यासाद् जायते स द्धः — पृष्ठ 160
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
प्रश्नः ६ — वणसमुच्चयं पाठात् चत्वा लखत
अभ्यासाद् जायते स द्धः
प्र.6 (क) एकस्था न-वणाः — (वणाः लखत)
उत्तरम् — एकस्था न-वणाः अथात् समानाक्षर-स्वराः — अ · आ · अ३ · इ · ई · इ३ · उ · ऊ · उ३ · ऋ · ॠ · ऋ३ · ऌ · ऌ३
(चतुदश)।
( हन्द — जनका उच्चारण-स्थान केवल एक हो, वे ‘एकस्थानी’ ह — ये समानाक्षर स्वर ह, कुल चौदह।)
स्थानम् एकस्था न-वणाः (समानाक्षरा ण) सङ् ख्या
कण्ठ ाः अ · आ · अ३ ३
तालव्याः इ · ई · इ३ ३
मूध न्याः ऋ · ॠ · ऋ३ ३
दन्त्याः ऌ · ऌ३ (‘ऌ-वणस्य दीघ न सिन्त’) २
ओष्ठ ाः उ · ऊ · उ३ ३
आधार (पृष्ठ १५२): ‘स्वराणां ौ भेदौ’ सारणी क पहली पं क्त है — समानाक्षर-स्वरः : एक-स्थानी · सन्ध्यक्षर-
स्वरः : -स्थानी। अतः ‘एकस्था न-वणाः’ का उत्तर समानाक्षर स्वर ही ह। स्थान एक ही रहने के कारण इनका ह्रस्व
रूप भी सम्भव है — इसी लए इनम ह्रस्व, द घ तथा प्लुत — तीन उपभेद मलते ह।
व्यञ्जन के वषय म: व्यञ्जन म भी एक को छोड़कर सब एकस्थानी ही ह; केवल ‘व्’ -स्थानी (दन्त्योष्ठ्यः) है
— पृष्ठ १५७ क सारणी म वह दन्त्य पं क्त म भी है और ओष्ठ्य पं क्त म भी। प्रश्न ६ क सारणी स्वर पर के न्द्रत है,
इस लए मुख्य उत्तर समानाक्षर स्वर ही द जए; ‘व्’ क बात टप्पणी के रूप म जोड़ी जा सकती है।
प्र.6 (ख) स्पश-व्यञ्जना न — (वणाः लखत)
उत्तरम् — क ख ग घ ङ · च छ ज झ ञ · ट ठ ड ढ ण · त थ द ध न · प फ ब भ म — पञ्च वश तः (२५) स्पश-
व्यञ्जना न।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
वगः वणाः स्थानम् करणम्
क-वगः कखगघङ कण्ठः कण्ठः (स्वस्थानम्)
च-वगः चछजझञ तालु ज ा-मध्यः
ट-वगः टठडढण मूधा ज ा-उपाग्रः
त-वगः तथदधन दन्तः ज ा-अग्रः
प-वगः पफ बभम ओष्ठः ओष्ठः (स्वस्थानम्)
इनका प्रयत्न एक ही है — स्पृष्ट: पाँच वग के पच्चीस वण म करण स्थान को स्पष्ट-रूपेण छू ता है, इस लए इन्ह
‘स्पशाः’ कहते ह; पुस्तक इन्ह ‘वग याः’ भी कहती है, क्य क ये पाँच-पाँच के वग म बँटे ह। सूत्र — ‘स्पृष्ट-करणाः –
स्पशाः।’
पाँचवाँ वण दो जगह: ङ, ञ, ण, न, म अपने वग के भी ह और ना सक्य भी, क्य क इनम वायु नाक से भी
नकलती है। पृष्ठ १५७ क सारणी म ये पाँच ना सक्य पं क्त म फर से आते ह।
प्र.6 (ग) अयोगवाह-व्यञ्जना न — (वणाः लखत)
उत्तरम् — अं (अनुस्वारः) तथा अः ( वसगः) — द्वे (२) अयोगवाह-व्यञ्जने।
वणः नाम स्थानम् करणम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः उदाहरणम्
अं अनुस्वारः ना सका ना सका (स्वस्थानम्) ईषद्- ववृत-प्रयत्नः स◌ंस्कृतम्, अ◌ंशः
अः िवसगः कण्ठः कण्ठः (स्वस्थानम्) ईषद्- ववृत-प्रयत्नः राम◌ः, बालक◌ः
‘अयोगवाह’ नाम का अथ: ‘अयोगे वाहौ’ — जो वणमाला के कसी वग म योग (मेल) नह रखते, फर भी अथ
को वहन करते ह। ये न स्पश ह, न अन्तःस्थ, न ऊष्म — फर भी संस्कृत इनके बना लखी नह जा सकती। पृष्ठ
१५२ क तीसरी सारणी इन्ह ‘ व शष्ट-व्यञ्जनम्’ कहती है, क्य क इनका आधार-स्वर सदा पहले ही आता है —
कभी बाद म नह ।
ध्यान द: ‘अं’ और ‘अः’ म जो ‘अ’ लखा है वह इनका अपना अंग नह , केवल आधार-स्वर है — जसके सहारे
इन्ह बोला जा सके। इसी लए वणमाला-पत्र म ये अलग खाने म, स्पश-अन्तःस्थ-ऊष्म से नीचे रखे गए ह।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
प्र.6 (घ) ऊष्म-व्यञ्जना न — (वणाः लखत)
उत्तरम् — श · ष · स · ह — चत्वा र (४) ऊष्म-व्यञ्जना न।
वणः स्थानम् करणम् तत्सदृशः अन्तःस्थः उदाहरणम्
श तालु ज ा-मध्यः य शि◌वः, श◌ा न्तः
ष मूध ज ा-उपाग्रः र षट् , भाष◌ा
स दन्तः ज ा-अग्रः ल सत्यम्, सरः
ह कण्ठः कण्ठः (स्वस्थानम्) — ह◌ंसः, ह रः
चार का प्रयत्न एक ही — ईषद्- ववृत: इनम करण स्थान को छू ता नह , केवल बहुत पास जाता है और बीच म
‘लघुः ववरः’ रह जाता है। उसी संकरे रास्ते से वायु रगड़ खाकर नकलती है और ऊष्मा जैसी सरसराहट पैदा होती है
— इसी लए नाम ‘ऊष्माणः’। यही कारण है क इन चार को जतनी दे र चाह ख चा जा सकता है।
स्थान का क्रम याद र खए: श (तालु) → ष (मूधा) → स (दन्त) → ह (कण्ठ)। पहले तीन एक ही क्रम म आगे
बढ़ते ह (तालु → मूधा → दन्त), और ‘ह’ सबसे पीछे — कण्ठ म — अकेला खड़ा है। इसी कारण ‘ह’ को कभी-
कभी शेष तीन से अलग गना जाता है।
प्र.6 (ङ) द्वस्था न-वणाः — (वणाः लखत)
उत्तरम् — द्वस्था न-वणाः अथात् सन्ध्यक्षर-स्वराः — ए · ए३ · ऐ · ऐ३ · ओ · ओ३ · औ · औ३ (अष्ट)। व्यञ्जनेषु तु केवलः
‘व्’ एव द्वस्थानी (दन्त्योष्ठ्यः) अ स्त।
वणाः द्वे स्थाने सं ा स -रूपेण
ए · ए३ कण्ठः + तालु कण्ठतालव्यः अ + इ = ए (गुण-स न्धः)
ऐ · ऐ३ कण्ठः + तालु कण्ठतालव्यः अ + ए / आ + ऐ = ऐ (वृ द्ध-स न्धः)
ओ · ओ३ कण्ठः + ओष्ठः कण्ठौष्ठ्यः अ + उ = ओ (गुण-स न्धः)
औ · औ३ कण्ठः + ओष्ठः कण्ठौष्ठ्यः अ + ओ / आ + औ = औ (वृ द्ध-स न्धः)
व् दन्तः + ओष्ठः दन्त्योष्ठ्यः (अन्तःस्थ-व्यञ्जनम्, स न्धजन्यं न)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २
a g l AglaSem · NCERT Solutions
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दो स्थान क्य : ‘ए’ मूलतः अ (कण्ठ्य) और इ (तालव्य) के मेल से बना है, इस लए दोन स्थान उसम बने रहते ह;
m a s emपं क्त म भी ह
l का होता है —
‘ओ’ अ (कण्ठ्य) और उ (ओष्ठ्य) से बना है। इसी लए पृष्ठ १५४–१५६ क सार णय म ए-ऐ कण्ठ्य
और तालव्य .मco
भी; ओ-औ कण्ठ्य म भी ह और ओष्ठ्य म भी। जो स न्ध से बना है, वह दोgस्थान
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और इसी लए उसका ह्रस्व रूप नह होता।
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‘व्’ को मत भू लए: व्यञ्जन म यह अकेला -स्थानी वण है — बोलते समय ज ा-अग्र दाँत के पास और
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अधरोष्ठ ऊपर के दाँत के पास, दोन एक साथ। पृष्ठ १५७ क सारणी म यह दन्त्य पं क्त म भी है और ओष्ठ्य पं क्त
म भी — यही उसका प्रमाण है।
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aयह em— एक नज़र म
अध्याय
a g l पाठ कहाँ से शुरू होता है — पाठ का पहला ही वाक्य पछली कक्षा क ओर इशारा करता है : ‘पूवस्यां कक्षायां मनुष्येषु
s
वाग्-उत्प त्त-प्र क्रया कथं भवती त वयं सामान्यतः दृष्टवन्तः।’ वहाँ यह भी दे खा था क आस्य के भीतर वण बनने के लए तीन
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तत्त्व चा हए — (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः। पहले दो तत्त्व कक्षा ८ म वस्तार से पढ़े जा चुके; इस पाठ
s e m इत्यस्य वषये वस्तरेण अवग ामः।’ इसी लए यह ‘ शक्षा २’ है।
का वाक्य है — ‘अ स्मन् पाठे (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः
आभ्यन्तर-प्रयत्न क्या है — पुस्तक क पla
ag
रभाषा है — ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृश त, स्थानस्य समीपं
वा या त, सः प्रयत्नः ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ इ त उच्यते।’ अथात् करण (जो अङ्ग हलता है) स्थान (जो अङ्ग स्थर है) तक कतने
co m
ज़ोर से, कतने पास तक जाता है — यही प्रयत्न है। ‘आभ्यन्तर’ इस लए क यह सारा प्रयत्न मुँह के भीतर होता है।
m .
se
पाँच प्रयत्न, पाँच प रणाम — (१) स्पृष्ट — करण स्थान को पूरी तरह छू ले → स्पश-व्यञ्जन (क् से म् तक २५)। (२)
o m l a
.c रहे → ऊष्म-व्यञ्जन (श् ष् स् ह्) तथा अयोगवाहौ (अनुस्वार, वसग)। (४)agववृत — छु ए नह , केवल कुछ पास
ईषत्-स्पृष्ट — बहुत थोड़ा छु ए → अन्तःस्थ (य् र् ल् व्)। (३) ईषद्- ववृत — छु ए नह , बहुत पास जाए, बीच म ‘लघुः
m
se जाए, बीच म ‘ ु टः ववरः’ रहे → स्वर (अ को छोड़कर सब)। (५) संवृत — कण्ठ सकुड़ जाए → केवल ह्रस्व अ।
ववरः’
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agl पूरे पाठ क सबसे बड़ी बात — ‘अ’ का अपवाद — ‘अ-वण’ के तीन उपभेद ह : अ (ह्रस्व), आ (द घ), अ३ (प्लुत)। इनम
se m
‘संकोचः’ हो जाता है। इसी संकोच का नाम संवृतम्oहैm a
आ तथा अ३ का उच्चारण दूसरे स्वर जैसा ही — ववृत — है, पर ह्रस्व अ बोलते समय कण्ठ म स्थान और करण के बीच
.c यही कारण है क अ को ‘ व शष्टः स्वरः’ कहा गया है। a g l
m
। इसी लए पुस्तक कहती है — ‘केवलं कण्ठ-स्थाने एव संवृत-प्रयत्नः
l a se
भव त, तद प केवलम् अ-कारस्य उच्चारणाथम् एव।’
अङ्गली और मुरली का दृष्टान्त —gकक्षा ८ म बाँसुरी से स्थान और करण समझाए गए थे; यह पाठ उसी चत्र म तीसरा तत्त्व
a
जोड़ दे ता है — अङ्ग ल द्रा ण → स्थाना न इव, अङ्गलयः → करणा न इव, और अङ्ग ल का छद्र क ओर लगाया
co m
.
गया दबाव → आभ्यन्तर-प्रयत्नः इव। उँ गली छद्र को पूरी तरह ढाँपे, आधा ढाँपे या ज़रा ऊपर रहे — स्वर बदल जाता है;
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मुँह के भीतर भी ठ क यही होता है।
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वणमाला अब प्रयत्न के अनुसार प ढ़ए — पृष्ठ १५० का ‘वणमाला’ पत्र वण को नए ढं ग से बाँटता है — स्वराः :
a s em समानाक्षरा ण (अ आ अ३ इ ई इ३ उ ऊ उ३ ऋ ॠ ऋ३ ऌ ऌ३) तथा सन्ध्यक्षरा ण (ए ए३ ऐ ऐ३ ओ ओ३ औ औ३);
agl व्यञ्जना न : स्पशाः (वग याः), अन्तःस्थाः (अध-स्वराः), ऊष्माणः तथा अयोगवाहौ। इनके सामने सीधे प्रयत्न लखा है —
.c
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यही इस पाठ क ‘एक पन्ने क पुनरावृ त्त’ है।
m a s e
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तुलना-सार णयाँ (पृष्ठ १५२) — पाठ तीन जो ड़य क भन्नता एक साथ रखता है : स्वर बनाम व्यञ्जन (स्वतन्त्र/परतन्त्र,
m .
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एक- - त्रमात्र/अधमात्र, ववृत-संवृत/स्पृष्ट-ईषत्स्पृष्ट-ईष वृत), समानाक्षर बनाम सन्ध्यक्षर (एक-स्थानी/ -स्थानी, ह्रस्व-
l a
g इन्ह सार णय से नकले ह।
द घ-प्लुत/केवल द घ-प्लुत), तथा व्यञ्जन के चार भेद (साधारण/ व शष्ट, आधार-स्वर पहले या बाद/ नत्यं पहले ही)।
अभ्यास के प्रश्न ४, ५ और ६aसीधे
co m
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 11 वण च्चारण- शक्षा २ AglaSem · NCERT Solutions
व्याकर णक अभ्यास — अभ्यास म तीन कौशल जाँचे जाते ह — (१) संख्यावाची उत्तर (त्री ण, षट् , पञ्च वधः, त्रयः) जो
लङ्ग-वचन के अनुसार बदलते ह; (२) प्रश्न नमाण — रेखाङ् कत पद के अनुसार सही प्रश्नवाचक चुनना (के, का न, क त,
कस्य); (३) वग करण — कसी वण को उसके भेद म रखना। तीन के लए नयम पहले याद क जए, फर लागू क जए।
पा णनीय- शक्षा से जोड़ — ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ म वही सारी बात मूल सूत्र म आ जाती ह — ‘प्रयत्नोऽ प वधः’,
‘आभ्यन्तरो बाह्यश्च’, ‘स्पृष्ट-करणाः – स्पशाः’, ‘ईषत्-स्पृष्ट-करणा – अन्तस्थाः’, ‘ईषद्- ववृत-करणा – ऊष्माणः’, ‘ ववृत-
करणाः – स्वराः’, ‘संवृतस्त्वकारः’। यह पहली बार बाह्य-प्रयत्न का नाम आता है — पर उसका वस्तार आगे के अध्ययन के
लए छोड़ दया गया है।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ पाठ म कहाँ / कस काम का
प्रयत्नः उच्चारणे पयुज्यमानं बलम् उच्चारण म लगाया गया ‘बल’ अथवा पूरे पाठ का मूल शब्द (पृ. १४६)
‘दबाव’
अभ्यन्तरे अन्तः अन्दर ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं…’ (पृ.
१४६)
आभ्यन्तरम् अन्तःिस्थतम् अन्दर स्थत ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ पद का पूवाश
आभ्यन्तर- अन्तःपयत्नः / आस्यस्य अभ्यन्तरे करणस्य मुँह के भीतर करण का स्थान क ओर पाठ का वषय ही (पृ. १४६)
प्रयत्नः स्थानं पित पयुक्तं बलम् लगाया गया ‘बल’
स्पृष्टः स्पशः कृ तः स्पश कया हुआ स्पृष्ट-प्रयत्नः → स्पश-व्यञ्जना न
ईषत् अल्पम् थोड़ा ईषत्-स्पृष्ट तथा ईषद्- ववृत — दोन
म
ईषत्-स्पृष्टः अल्पं स्पशः कृ तः थोड़ा स्पश कया हुआ ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः → अन्तःस्थ-
व्यञ्जना न
ववृतः उद् घ ािटतः खुला हुआ ववृत-प्रयत्नः → स्वराः
ववरः िछद ः / अन्तरालः अन्तराल, छे द ‘लघुः ववरः’ (ईषद्- ववृत) तथा
‘ ु टः ववरः’ ( ववृत)
ईषद्- ववृतः अल्पम् उद् घ ािटतः थोड़ा खुला हुआ ईषद्- ववृत-प्रयत्नः → ऊष्माणः,
अयोगवाहौ
संवृतः अिवस्ततृ ः सकुड़ा हुआ संवृत-प्रयत्नः → केवलम् अ-कारः
संकोचः संक ोचनम् सकुड़ना ‘कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये संकोचः
भव त’ (पृ. १४८)
संकु चतः संक ीणः / संक ोचं कृ तः सकुड़ा गया ‘कण्ठः संकु चतः संक णः वा भव त’
(पृ. १४८)
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