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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा9
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 12: प र शष्टम् १ — अन्वयः
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
161 – 166 8 25 हन्द
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 12: प र शष्टम् १ — अन्वयः
यह पृष्ठ शारदा (कक्षा ९) का प र शष्टम् १ — अन्वयः है — यह कोई पाठ नह , प र शष्ट (reference section) है, और पुस्तक इस पर कोई
अभ्यास नह दे ती; पृष्ठ 161 से 166 तक न कोई प्रश्न-संख्या है, न रक्त स्थान, न ‘अभ्यासाद् जायते स द्धः’ जैसा खण्ड — इस लए यहाँ ‘उत्तर कहाँ
ह’ यह प्रश्न ही नह उठता। यह प र शष्ट सखाता है क ोक के बखरे हुए पद को गद्य-क्रम म कैसे सजाया जाए — दो व धयाँ दे ता है,
दण्डान्वय व धः तथा खण्डान्वय व धः, दोन के स्मृ त- ोक, खण्डान्वय के चार सहका र-कारण आकाङ् क्षा, योग्यता, आस त्तः, तात्पयम्, और
दो पूरे सा धत उदाहरण — ‘शास्त्राण्यधीत्या प…’ ोक पर पदच्छे द → दण्डान्वय → ववरण → क्रमशः योजनम्, तथा ‘स ूणकुम्भो न करो त…’
ोक पर शक्षक-छात्र प्रश्नोत्तर ता लका। छात्र इसे कसी भी ोक का अथ नकालने से पहले, तथा परीक्षा म ‘अन्वयं कुरुत’ प्रकार का प्रश्न हल करने
से पहले दे खते ह। नीचे पुस्तक क हर ता लका पूरी द गई है, हर नयम क व्याख्या है, और साथ म स्पष्ट रूप से च ह्नत «अभ्यास के लए (स्वयं
कर)» ब्लॉक भी ह — वे पुस्तक के नह , केवल स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
शारदा (कक्षा 9) 161 – 166
खं ड प्रश्न
8 25
माध्यम
हन्द
अन्वयः — यह प र शष्ट क्या दे ता है — पृष्ठ 161
प र शष्ट का स्वरूप, ‘अन्वय’ क आवश्यकता तथा दो व धय का वभाजन
प र शष्ट-प रचयः
१ प र शष्टम् १ ‘अन्वयः’ म क्या है, और इसम अभ्यास क्य नह है?
सीधा उत्तर — पृष्ठ 161 से 166 तक शारदा केवल यह सखाती है क ोक के पद को गद्य-क्रम म कैसे जमाया जाए। यह पाठ
नह , प र शष्ट है — इसम न कथा है, न क व-प रचय, न ‘अभ्यासाद् जायते स द्धः’ जैसा प्रश्न-खण्ड। जो दो ता लकाएँ यहाँ छपी ह,
वे भी दोन ओर से पूरी भरी हुई ह — प्रश्न भी छपे ह, उत्तर भी। इस लए यहाँ उत्तर लुप्त नह ह, प्रश्न ही नह ह।
पुस्तक स्वयं क्या कहती है — तीन प्रार म्भक प र शष्ट के अन्त म (पृष्ठ 183) पुस्तक लखती है — ‘अ स्मन् प र शष्टत्रये
ोकानाम् अन्वयक्रमाः समासाः प्रयोगाश्च इत्येते वचाराः सामान्यतया प्रद शताः स न्त। छात्राः वस्तृताध्ययनाथम् अन्यान् ग्रन्थान्
प रशीलयेयुः।’ अथात् प र शष्ट केवल सामान्य दशा दखाते ह; वस्तार के लए व्याकरण-ग्रन्थ दे खने चा हए।
छह पृष्ठ म क्या-क्या है —
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः AglaSem · NCERT Solutions
पृष्ठ वषय रूप
161 अन्वय की आवश्यकता · श्लोकान्वयिविध का िवभाजन (द ण्डान्वय / खण्डान्वय) · द ण्डान्वय का स्मृित-श्लोक गद्य + िचत्र-
तथा उसके िनयम रे खािचत्र
162 ‘शास्त्र ाण् यधीत्यािप…’ श्लोक — पद च्छे द ः, द ण् डान्वयः, िववरणम् (अध् याहार ) सािधत उदाहरण
163 उ न्नीस पदों को संख्या दे कर क्रमशः योजनम् · खण्डान्वय के दो स्मृित-श्लोक · आकाङ् क्षा सूची + पद्य + गद्य
164 योग्यता · आसित्तः · तात्पयम् — तीनों उदाहरण-सिहत गद्य
165 पश्न पूछने का क्रम · ‘स म्पूणकु म्भो न करोित…’ श्लोक, पद च्छे द ः तथा खण्डान्वय-तािलका का पहला भाग गद्य + तािलका
166 तािलका का शेष भाग तथा पूरा अन्वयः तािलका
यह प र शष्ट सबसे पहले क्य रखा गया: शारदा के लगभग हर पाठ म ोक ह, और हर पाठ म ‘ ोकस्य अन्वयं
कुरुत / भावं लखत’ जैसा काम आता है। अन्वय कए बना अथ नह नकलता, और अथ के बना भाव नह लखा
जा सकता। इस लए यही कौशल पाँच प र शष्ट म पहला है — समास, वाच्य, शब्दरूप और धातुरूप उसके बाद
आते ह।
२ ‘अन्वय’ क आवश्यकता क्य पड़ती है — ोक म पद का क्रम उलटा-पुलटा क्य होता है?
कारण एक ही है — छन्द। पुस्तक का पहला ही वाक्य यह कहता है :
सामान्यतः श्लोके षु कत ृपदं कमपदं त ृत ीयािदिवभक्त्यन्तं पदं िक्रयापदं िवशेषणािदकं च छन्दसः अनुगण
ु ं पूव परं
भिवत मु हित।
(िहन्दी — साधारणतः श्लोकों में कत , कम, त ृत ीया आिद िवभिक्त वाले पद, िक्रया और िवशेषण आिद छन्द के
अनुसार आगे-पीछे हो जाते है।ं )
गद्य म हम लखते ह — स ूणकुम्भः शब्दं न करो त (कता → कम → क्रया)। पर ोक म वही बात मात्राएँ मलाने के लए ऐसे
छपती है — स ूणकुम्भो न करो त शब्दम्। पद वही ह, क्रम बदल गया है। इसी बदले हुए क्रम को फर से सीधा करना अन्वय है।
पुस्तक आगे कहती है — ‘तेन प ठतारः पदानां मध्ये परस्परं सम्बन्धं (अन्वयं) कल्प यतुं कदा चत् कष्टम् अनुभव न्त। अतः
ोकेषु वद्यमानानां पदानां परस्परं सम्बन्धं सरलरूपेण ज्ञातुं कश्चन क्रमः ज्ञातव्यः। तदनन्तरमेव ोकस्य अथम् अवगन्तुं
शक्यते।’ — अथात् क्रम जान लेने के बाद ही ोक का अथ समझा जा सकता है।
ध्यान द: अन्वय अनुवाद नह है। अन्वय म एक भी शब्द बदलता नह , केवल क्रम बदलता है (और आवश्यकता हो
तो कोष्ठक म एक-दो पद जोड़े जाते ह)। इसी लए अन्वय संस्कृत म ही लखा जाता है, हन्द म नह ।
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३ ोकान्वय व ध के कतने भेद ह — पुस्तक का रेखा चत्र क्या दखाता है?
दो भेद ह। पृष्ठ 161 पर पुस्तक एक रेखा चत्र दे ती है :
श् लोकान्वयिविधः
↙ ↘
१. द ण्डान्वयिविधः २. खण्डान्वयिविधः
और नीचे लखती है — ‘एतयोः वध्योः ज्ञानेन छात्राः ोके वद्यमानानां पदानां सम्बन्धं ज्ञात्वा ोकस्य अथ भावं च अवगन्तुं
शक्नुव न्त।’ अथात् इन दोन व धय को जान लेने से छात्र ोक का अथ भी समझ पाते ह और भाव भी।
तुलना दण्डान्वय व धः खण्डान्वय व धः
नाम का अथ द ण्डवत् (लाठी की तरह सीधा) अन्वयः खण्डशः (टुकड़ े-टुकड़ े) अन्वयः
काय-पणाली पूरा श्लोक एक ही बार में क्रम से िलख दे ना एक-एक पश्न पूछकर एक-एक पद जोड़ ना
िकसके िलए स्वयं िलखते समय, उ त्तर-पुिस्तका में कक्षा में, िशक्षक-छात्र संवाद में
दू स रा नाम — आकाङ् क्षािविधः
पिरणाम तैयार अन्वय ‘अन्ते समग स्य श्लोक स्य अन्वयः स्वयमेव भिवष्यित’
दोन म वरोध नह है: खण्डान्वय अन्वय तक पहुँचने का रास्ता है, दण्डान्वय उस अन्वय को लखने का ढं ग।
परीक्षा म प्रायः दण्डान्वय ही लखा जाता है, पर वहाँ तक पहुँचने के लए मन-ही-मन खण्डान्वय के प्रश्न पूछने पड़ते
ह।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः
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अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट १ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
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स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।
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c का शा ब्दक अथ ल खए तथा बताइए क ोक म उसक आवश्यकता
.शब्द a gक्य पड़ती है।
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se — अनु + अय् (जाना) = पीछे -पीछे चलना, अथात् पद का परस्पर सम्बन्ध जोड़कर उन्ह अथ के क्रम म
1. ‘अन्वय’
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लगाना। ोक म पद का क्रम छन्दसः अनुगुणम् (छन्द के अनुसार) होता है, अथ के अनुसार नह — इस लए
क्रम को सीधा करना पड़ता है।
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2. ‘दण्डान्वयः’ तथा ‘खण्डान्वयः’ — इन नाम क व्युत्प त्त ल खए।
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उत्तर — दण्डवत् अन्वयः = दण्डान्वयः; खण्डशः अन्वयः = खण्डान्वयः। (दोन व्युत्प त्तयाँ पुस्तक ने स्वयं द ह।)
3. सत्यम्/असत्यम् — ‘अन्वय करते समय ोक के शब्द बदल दए जाते ह।’
उत्तर — असत्यम्। केवल क्रम बदलता है; आवश्यकता पड़ने पर अध्याहार से कोष्ठक म पद जोड़ा जा सकता है,
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शब्द बदले नह जाते।
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दण्डान्वय व धः — नयम तथा स्मृ त- ोक — पृष्ठ 161
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‘दण्डवत् अन्वयः दण्डान्वयः’ — पुस्तक का पहला व ध-खण्ड
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दण्डान्वय व धः
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दण्डान्वय कसे कहते ह, और पुस्तक ने उसका नयम कस ोक म दया है?
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प रभाषा — पुस्तक कोष्ठक म स्वयं व्युत्प त्त दे ती है — दण्डान्वयः (दण्डवत् अन्वयः दण्डान्वयः)। दण्ड अथात् लाठ — जैसे
agl लाठ सीधी होती है, वैसे ही इसम पूरे ोक के पद एक ही सीधे क्रम म, आरम्भ से अन्त तक जमा दए जाते ह। बीच म कोई प्रश्न
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नह पूछा जाता।
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नयम- ोक (पृष्ठ 161, लाल अक्षर म छपा) —
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agन्तरम्
आ द्ये िवशेषणं योज्यं िवशेष्यं तदन
वा-णमुल-् ल्यप्-पभृत्येवं पूव ं द ण्डान्वये भवेत ् ॥
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पद-वार अथ —
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पद अथ व्यवहार म
आद्ये िवशेषणं सबसे पहले िवशेषण जोड़ ना चािहए अधः … (पहले )
योज्यम्
िवशेष्यं तदनन्तरम् िवशेष्य उसके बाद … घटः (बाद में) → अध ः घटः
क्त्वा-णमुल ्-ल्यप्- वा (गत्वा), णमुल ् (स्मारं स्मारम्), ल्यप् (आगत्य) आिद
क्त् अधीत्य, कृत्वा, िवहाय
पभिृ त पत्ययान्त अव्यय-कृद न्त
एवं पूव ं दण्डान्वये ये सब द ण्डान्वय में (अपनी मुख्य िक्रया से ) पहले आने चािहए शास्त्रािण अधीत्य अिप मूख ः भविन्त — ‘अधीत्य’
भवेत ् ‘भविन्त’ से पहले
क्त्वा, ल्यप्, णमुल् पहले क्य : ये तीन पूवका लक क्रया बताते ह — जो काम पहले हुआ। ‘पढ़कर भी मूख रह
जाते ह’ म पढ़ना पहले हुआ, मूख रहना बाद म। इस लए भाषा का स्वाभा वक क्रम भी यही है, और नयम भी यही
कहता है। (उपसग-र हत धातु म क्त्वा लगता है — गत्वा, कृत्वा; उपसग-स हत म ल्यप् — आगत्य, अधीत्य,
वहाय; बार-बार होने वाले काम म णमुल् — स्मारं स्मारम्।)
२ दण्डान्वय करने क पूरी व ध क्या है — पुस्तक के गद्य- नयम क्रम से ल खए।
पृष्ठ 161 के गद्य म पुस्तक जो कहती है, वह चरण म यह है :
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१. ‘कत ृपदं कमपदं िक्रयापदं चे ित पाथिमकी वाक्यरचनाशैली वतते ।’ — मूल साँच ा है : कत → कम →
ि या।
क्र
२. ‘अिस्मन् अन्वयक्रमे िवशेषणािन क्रमशः तत्तत्पदस्य पूव ं पयुक्तािन भविन्त।’ — हर िवशेषण अपने िवशेष्य से
ठीक पहले।
३. ‘कत ृपदस्य िवशेषणं कत ृपदात् पूव,ं कमपदस्य िवशेषणं कमपदात् पूवम्।’ — कत का िवशेषण कत से पहले,
कम का िवशेषण कम से पहले।
४. ‘यिद श्लोके षु अव्ययािन कृ दन्तपदािन वा सिन्त तिह तािन के न पदे न सह सम्बद्धािन इित ज्ञात्वा तत्र
पयोक्तव्यािन।’ — अव्यय और कृ दन्त वही ं रिखए िजस पद से वे जुड़े है।
ं
५. ‘त ृत ीयादीिन िवभक्त्यन्तािन पदािन अिप … पूव ं वा परं वा योजनीयािन।’ — त ृत ीया से लेक र सप्तमी तक के
पद, िजस पद से सम्बद्ध हों, उसके आगे या पीछे ।
६. ‘ततः परं सव न्ते ि यापदं िलखेत ्।’ — सबसे अन्त में िक्रयापद।
क्र
७. ‘कदािचत् कत ृपदं िक्रयापदं वा श्लोके षु न दृ श्यते तदा अस्मािभः िविचन्त्य तत् पदं योजनीयम्।’ — कत या
िक्रया न िदखे तो सोचकर स्वयं जोिड़ ए (अध्याहार)।
एक पं क्त म साँचा —
(अध्याहृत पद) → कत का िवशेषण → कत → त ृत ीयािद पद → क्त्वान्त/ल्यबन्त → कम का िवशेषण →
कम → अव्यय (न, अिप, त ,ु नूनम्) → ि या क्र
उसी साँचे पर एक उदाहरण — ोक-पं क्त ‘स ूणकुम्भो न करो त शब्दम्’ → अन्वय स ूणकुम्भः (कता) शब्दं (कम) न
करो त ( नषेध-अव्यय + क्रया)।
छोट -सी सावधानी: ‘न’ को क्रया से अलग मत क जए। ‘न’ जस क्रया का नषेध करता है, उसी के ठ क पहले
रहता है — शब्दं न करो त, न क ‘न शब्दं करो त’।
३ अध्याहार क्या है — ोक म जो पद छपा ही नह , उसे जोड़ना उ चत कैसे?
प रभाषा — ोक म कभी कता या क्रया छपती ही नह , पर उसके बना वाक्य अधूरा रहता है। तब पाठक जो पद स्वयं जोड़ता है,
वह अध्याहार कहलाता है; पुस्तक उस छपे पद को ‘सुप्तं पदम्’ (सोया हुआ पद) कहती है और लखती है — ‘अतः अस्मा भः
सुप्तं पदम् योजनीयम् (अध्याहायम्)।’
पुस्तक का अपना उदाहरण (पृष्ठ 162, ‘ ववरणम्’) —
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ोक म जो छपा है जो ज ासा उठती है अध्याहृत पद
शास्त्रािण अधीत्यािप मूख ः भविन्त ‘शास्त्र ािण अधीत्यािप के मूख ः भविन्त ?’ — कौन? (के चन) — कु छ लोग
यस्तु िक्रयावान् पुरुषस्स िवद्वान् ‘िक्रयापदं िकमिप न पयुक्तम्’ — िक्रया है ही नही ं (भवित)
सुिचिन्ततं चौषधमातुर ाणां… यह वाक्य िपछले वाक्य का दृ ष्टान्त है — जोड़ ने वाला शब्द चािहए (यथा) — जैसे
पुस्तक का तक, उसी के शब्द म — ‘तस्य उत्तरं य द ोके वद्यते त ह तत् पदं पूव स्थापनीयम्। परम् अ स्मन् ोके तु तत् पदं
न प्रयुक्तम्। अतः अस्मा भः सुप्तं पदम् योजनीयम्।’ अथात् — पहले ोक म उत्तर ढूँ ढ़ए; न मले, तभी बाहर से जो ड़ए।
यह मनमानी क्य नह है: तीन बन्धन ह — (क) अध्याहृत पद वही हो सकता है जो व्याकरण से मेल खाए
(‘मूखाः भव न्त’ बहुवचन है, इस लए ‘केचन’ ठ क है, ‘कश्चन’ नह ); (ख) वह अथ क माँग से आया हो, सजावट
के लए नह ; (ग) वह कोष्ठक म लखा जाए, ता क पाठक जान ले क यह ोक का पद नह है। तीन बात पुस्तक
ने अपने उदाहरण म नभाई ह।
अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह — प र शष्ट पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए ह।
1. ‘आद्ये वशेषणं योज्यं वशेष्यं तदनन्तरम्’ — इस नयम से इन जोड़ को सजाइए : (क) घटः, अधः (ख) व ान्,
कुलीनः (ग) जनः, अल्पः।
उत्तर — (क) अधः घटः (ख) कुलीनः व ान् (ग) अल्पः जनः। — तीन म वशेषण पहले, वशेष्य बाद म।
2. ‘बालकः वद्यालयं गत्वा पठ त’ — इसम क्त्वान्त पद कौन-सा है और वह क्रया के पहले क्य है?
उत्तर — क्त्वान्त पद ‘गत्वा’ है। वह पूवका लक क्रया बताता है — जाना पहले हुआ, पढ़ना बाद म — इस लए
नयम के अनुसार वह मुख्य क्रया ‘पठ त’ से पूव रखा जाता है।
3. नम्न वाक्य म कौन-सा पद अध्याहाय है — ‘सत्यं वद, धम चर।’ (कता कौन?)
उत्तर — (त्वम्) — ‘वद’ तथा ‘चर’ मध्यमपुरुष एकवचन लोट् लकार के रूप ह, अतः कता ‘त्वम्’ अध्याहृत है :
(त्वम्) सत्यं वद, (त्वम्) धम चर।
दण्डान्वय — सा धत उदाहरण : ‘शास्त्राण्यधीत्या प…’ — पृष्ठ 162–163
पुस्तक का पहला पूण उदाहरण — पदच्छे दः → दण्डान्वयः → ववरणम् → क्रमशः योजनम्
सा धतम् उदाहरणम्
१ पुस्तक का उदाहरण- ोक तथा उसका पदच्छे द क्या है?
ोक (पृष्ठ 162, जैसा पुस्तक म छपा है) —
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शास्त्राण्यधीत्यािप भविन्त मूख ः यस्तु ि यावान् पुरु षस्स िवद्वान् ।
क्र
सुिचिन्ततं चौषधमातुराणां न नाममात्रेण करोत्यरोगम् ॥
पदच्छे दः (पुस्तक के अपने क्रम म, उ ीस पद) — नीचे क संख्याएँ केवल गनती क ह; अन्वय का क्रम अलग है, वह अगले-
अगले काड म (पृष्ठ 163 क संख्या-सूची म) दया गया है।
गणना पदम् क्या है हन्द अथ
१ शास्त्रािण नपुं., िद्वतीया बहुवचन (कम) शास्त्रों को
२ अधीत्य ल्यबन्त अव्यय (अिध+इ) पढ़ कर
३ अिप अव्यय भी
४ भविन्त भू, लट् , पथमपुरुष बहवु चन होते है ं
५ मूख ः पुं., पथमा बहुवचन मूख
६ यः यद् शब्द, पथमा एकवचन जो
७ तु अव्यय परन्तु / ही
८ िक्रयावान् मतुप-् पत्ययान्त िवशेषण, पथमा एकवचन कमशील, आचरण करने वाला
९ पुरुषः पुं., पथमा एकवचन पुरुष
१० सः तद् शब्द, पथमा एकवचन वह
११ िवद्वान् िवद्वस् शब्द, पथमा एकवचन िवद्वान्
१२ सुिचिन्ततम् ‘औषधम्’ का िवशेषण — नपुं., पथमा एकवचन भली-भाँित सोची-समझी हईु
१३ च अव्यय और
१४ औषधम् नपुं., पथमा एकवचन (कत ) औषिध
१५ आतुराणाम् पुं., षष्ठी बहुवचन रोिगयों को / रोिगयों का
१६ न िनषेध ाथक अव्यय नही ं
१७ नाममात्रेण नपुं., ततृ ीया एकवचन के वल नाम ले ने से
१८ करोित कृ , लट् , पथमपुरुष एकवचन करती है
१९ अरोगम् िवशेषण, िद्वतीया एकवचन नीरोग
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः
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पदच्छे द पहले क्य :
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ोक म स न्ध के कारण कई पद चपके रहते ह — शास्त्रा ण + अधीत्य + अ प =
शास्त्राण्यधीत्या प (यण् तथा द घ स न्ध), च + औषधम् = चौषधम् (वृ द्ध स न्ध), आतुराणाम्e+mन = आतुराणां
न, करो त +.c om = करोत्यरोगम् (यण् स न्ध), यः + तु = यस्तु ( वसग स न्ध)। जबagतकlaयेs खुल नह , यह पता
ही नहse
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अरोगम्
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चलता क ोक म कतने पद ह — और अन्वय पद का ही तो क्रम है।
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पुस्तक क छपाई का एक बन्दु: पहली पं क्त म पुस्तक ‘पुरुषस्स व ान्’ छापती है, अथात् ‘पुरुषः + स’ क
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स न्ध क हुई ( वसग का ‘स्’)। पदच्छे द म वही ‘पुरुषः, सः’ खोलकर दया गया है। इसी पं क्त म ‘मूखाः यः’ बना
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स न्ध के छपा है — अन्य पाठ म ‘मूखा यस्तु’ मलता है। दोन बात एक ही पं क्त म ह, इस लए यह पुस्तक क
मुद्रण-शैली है, कोई नयम-भेद नह ।
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इसी
.co ोक का दण्डान्वय तथा पुस्तक का ‘ ववरणम्’ क्या है? a g
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दण्डान्वयः (पृष्ठ 162, पुस्तक के शब्द म) —
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(के चन ) शा ािण अधी यािप मूख ः भवि
स्त्र त।
त् न्
यः ि यावान् सः पुरु षः तु िवद्वान् (भवित ) ।
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(यथा) सुिचिन्ततम् औषधं नाममात्रेण आतुराणाम् अरोगं न करोित । . co
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कहाँm . a
s e -कहाँ कौन-सा नयम लगा —
a gla
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अन्वय का अंश कौन-सा नयम
mअ याहार — ‘कदािचत् कतपदंृ … न दृ यते तदा … तत् पदं योजनीयम्’
कत नही ं थाc, oअतः l a se
. a g
eतm‘अधी य’ अपनी िक्रया ‘भवि त’ से पूव — ‘ वा-णमुल्- यप्-पभृ येवं पूव’ं
(के चन) … भविन्त ध् श्
a s
शास्त्रािण अधीत्यािप
agl यब
ल् न् त् न् क्त् ल् त्
िक्रयापद सबसे अन्त में — ‘सव न्ते िक्रयापदं िलखेत’्
om
मूख ः भविन्त
का .अcध्याहार
यद् -तद् का िनत्य स म्बन्ध; िक्रया छपी नही ं थी, अतः (भवित)m
se
यः िक्रयावान् सः पुरुषः तु िवद्वान् (भवित)
om औषधम् l a
.सुcिचिन्ततम् िवशेषण पहले , िवशे य बाद में — ‘आ े िवशेषणंaयोg यं िवशे यं तदन तरम्’
m
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ष् द्य ज् ष् न्
agl ततृ ीयान्त पद िक्रया से पहले , कम ‘अरोगम्’ उसके बाद , िनषेध ‘न’ िक्रया से सटा हुआ
c
.
नाममात्रेण … अरोगं न करोित
s e m
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.coभव त यत् “शास्त्रा ण अधीत्या प के मूखाः भव न्त” इ त। तस्य उत्तरं य दagl
ववरणम् — पुस्तक क अपनी व्याख्या (पृष्ठ 162) — ‘अ स्मन् ोके ‘केचन’ इ त शब्दः न प्रयुक्तः, ‘शास्त्रा ण अधीत्या प
मूखाः भव न्त’ इ त वतते। त ह अत्र का चत् m
s।eपरम् अ स्मन् ोके तु तत् पदं न प्रयुक्तम्। अतः अस्मा भः सुप्तं पदम् योजनीयम्
जज्ञासा
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ag
ोके वद्यते त ह तत् पदं पूव स्थापनीयम्
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(अध्याहायम्)। अत्र सुप्तं पदं ‘केचन’ इ त भ वतुमह त। … तथैव “यस्तु क्रयावान् पुरुषस्स व ान्” इत्यत्र क्रयापदं कम प न
प्रयुक्तम्। कन्तु वाक्यस्य पूतये क्रयापदम् आवश्यकम्। अतः अत्रा प सुप्तं क्रयापदं कञ्चन योजनीयम् (अध्याहायम्)। तच्च
‘भव त’ इ त क्रयापदं यो जतम्। अनेन प्रकारेण ‘यथा’ इ त शब्दस्या प अध्याहारः कृतः। तेन ोकस्य पूणः अथः स्पष्टः भव त।’
‘यथा’ क्य जोड़ा गया: तीसरा वाक्य कोई नई बात नह कहता — वह पहली बात का दृष्टान्त है। औष ध का नाम
लेने से रोग नह जाता, वैसे ही शास्त्र का नाम जानने से मूखता नह जाती। ‘यथा’ जोड़ दे ने से यह दृष्टान्त-सम्बन्ध
स्पष्ट हो जाता है — इसी लए पुस्तक कहती है ‘तेन ोकस्य पूणः अथः स्पष्टः भव त’।
३ ‘क्रमशः योजनम्’ क्या है — पद को संख्या दे कर अन्वय कैसे बनाया जाता है?
यह कक्षा म करने क व ध है। पुस्तक पृष्ठ 162 के अन्त म कहती है — ‘अत्र शक्षकः प्रश्नोत्तरमाध्यमेना प अन्वयं कतु शक्नो त।
प्रथमं पदच्छे दं कृत्वा तदनन्तरम् अध्यापकः प्रश्नं कुवन् ोके वद्यमानेभ्यः पदे भ्यः संख्यां प्रददा त। ततः परं छात्राः क्रमशः पदा न
योज यत्वा अन्वयं कतुमह न्त।’ — अथात् शक्षक हर पद पर उसका अन्वय-क्रमांक लख दे ते ह, और छात्र उन्ह संख्याओं के क्रम
से पद जोड़कर अन्वय बना लेते ह।
पुस्तक क संख्या-सूची (पृष्ठ 163) — उ ीस पद, अन्वय के क्रम म —
१. शास्त्रािण २. अधीत्य ३. अिप ४. मूख ः
५. भविन्त ६. यः ७. िक्रयावान् ८. सः
९. पुरुषः १०. तु ११. िवद्वान् १२. सुिचिन्ततं
१३. औषधम् १४. नाममात्रेण १५. च १६. आतुर ाणां
१७. अरोगम् १८. न १९. करोित —
क्रमशः योजनम् (पुस्तक का उत्तर) —
(के चन ) शास्त्रािण अधीत्य अिप मूख ः भविन्त ।
यः ि यावान् सः पुरु षः तु िवद्वान् (भवित ) ।
क्र
सुिचिन्ततम् औषधं नाममात्रेण च आतुराणाम् अरोगं न करोित ।
संख्या दे ने से लाभ क्या: छात्र को पूरा वाक्य एक साथ नह जमाना पड़ता। उसे केवल ‘१ के बाद २, २ के बाद ३’
लखना है — और अन्वय अपने आप बन जाता है। यही कारण है क पुस्तक पहले पदच्छे द कराती है, फर संख्या
दे ती है, फर योजन कराती है : क ठन काम को तीन आसान काम म तोड़ना।
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पुस्तक म एक छोटा-सा अन्तर: पृष्ठ 162 का दण्डान्वयः तीसरे वाक्य म ‘च’ नह रखता पर ‘(यथा)’ जोड़ता है
— ‘(यथा) सु च न्ततम् औषधं नाममात्रेण आतुराणाम् अरोगं न करो त’। पृष्ठ 163 का क्रमशः योजनम् उल्टा करता
है — ‘(यथा)’ छोड़ता है और ‘च’ (संख्या १५) रखता है। दोन शुद्ध ह : पहला अथ क दृ ष्ट से पूरा है, दूसरा संख्या-
सूची का पालन करता है। परीक्षा म कोई भी लख सकते ह, पर एक ही म स्थर र हए।
४ इस ोक का हन्द अथ तथा भाव क्या है?
अन्वयानुसार अथ —
अन्वय हन्द अथ
(के चन) शास्त्रािण अधीत्य अिप मूख ः भविन्त। कु छ लोग शास्त्रों को पढ़ कर भी मूख ही रह जाते है।ं
यः िक्रयावान् सः पुरुषः तु िवद्वान् (भवित)। परन्तु जो पुरुष िक्रयावान् (पढ़ े हएु पर आचरण करने वाला) है, वही िवद्वान् है।
(यथा) सुिचिन्ततम् औषधं नाममात्रेण च आतुर ाणाम् जैसे भली-भाँित सोच-समझकर चुनी हुई औषिध भी के वल नाम ले ने मात्र से रोिगयों
अरोगं न करोित। को नीरोग नही ं करती।
भावः — ज्ञान का मूल्य आचरण से है, केवल पढ़ लेने से नह । जैसे रोगी दवा का नाम रटता रहे और उसे खाए नह तो रोग नह
जाता, वैसे ही जो शास्त्र पढ़कर उसे जीवन म उतारता नह , वह पढ़ा- लखा तो है पर व ान् नह । वद्या का प्रमाण पुस्तक नह ,
व्यवहार है।
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अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह — प र शष्ट पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए ह।
1. नम्न ोक का पदच्छे द तथा दण्डान्वय क जए —
उद्यमेन ह सध्य न्त काया ण न मनोरथैः ।
न ह सुप्तस्य सहस्य प्र वश न्त मुखे मृगाः ॥
पदच्छे दः — उद्यमेन, ह, सध्य न्त, काया ण, न, मनोरथैः, न, ह, सुप्तस्य, सहस्य, प्र वश न्त, मुखे, मृगाः।
दण्डान्वयः — काया ण उद्यमेन ह सध्य न्त, मनोरथैः न ( सध्य न्त)। ह सुप्तस्य सहस्य मुखे मृगाः न प्र वश न्त।
(कता ‘काया ण’ पहले, तृतीयान्त ‘उद्यमेन’ उसके बाद, क्रया अन्त म; दूसरे वाक्य म षष्ठ्यन्त ‘सुप्तस्य सहस्य’
अपने वशेष्य के साथ, अ धकरण ‘मुखे’ क्रया से पहले।)
2. नम्न ोक का दण्डान्वय क जए —
वद्या ददा त वनयं वनयाद् या त पात्रताम् ।
पात्रत्वाद् धनमा ो त धनाद् धम ततः सुखम् ॥
दण्डान्वयः — वद्या वनयं ददा त। वनयात् पात्रतां या त। पात्रत्वात् धनम् आ ो त। धनात् धम (आ ो त)। ततः
सुखम् (आ ो त)।
(अ न्तम दो वाक्य म क्रया छपी नह है — ‘आ ो त’ का अध्याहार करना पड़ा।)
3. ऊपर के दोन उत्तर म जहाँ-जहाँ अध्याहार हुआ है, उन पद को छाँटकर ल खए।
उत्तर — पहले ोक म ( सध्य न्त); दूसरे ोक म (आ ो त) — दो बार।
खण्डान्वय व धः — नयम तथा दो स्मृ त- ोक — पृष्ठ 163
‘खण्डशः अन्वयः खण्डान्वयः’ — प्रश्नोत्तर से अन्वय बनाने क व ध
खण्डान्वय व धः
१ खण्डान्वय कसे कहते ह, और पुस्तक ने उसके नयम कन ोक म दए ह?
प रभाषा — पुस्तक कहती है — ‘खण्डशः अन्वयः खण्डान्वयः इ त। तन्नाम आरम्भे एव ोकस्य पूणभागस्य अन्वयः न क्रयते
अ प तु प्र तपदं परस्परम् अन्वयः क्रयते। तद प प्रश्नोत्तरमाध्यमेन। अन्ते समग्रस्य ोकस्य अन्वयः स्वयमेव भ वष्य त।’ —
अथात् आरम्भ म ही पूरे ोक का अन्वय नह कया जाता; एक-एक पद जोड़ा जाता है, वह भी प्रश्नोत्तर के ारा — और अन्त म
पूरा अन्वय अपने आप बन जाता है।
नयम- ोक (पृष्ठ 163, दो ोक) —
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कत ृ-कम-ि यास्तावच् ्लोके योज्यास्ततः परम् ।
क्र
िकमो रूपं पुरस्कृ त्य त ृत ीयादीिन योजयेत ् ॥
ल् यबन्त ञ् च तुमन्ु त ञ् च क्त्वान्तं कमिवभूिषतम् ।
अन्वयस्थपदानाञ् च यथा िलङ् गिवशेषणे ॥
चार पं क्तय का अथ —
पं क्त अथ व्यवहार
ृ
कत-कम-िक्रयास्तावत् श्लोके पहले श्लोक में कत , कम और िक्रया — ये तीन जोिड़ ए ‘करोित’ → ‘स म्पूणकु म्भः’ →
योज्याः ‘शब्दम्’
ततः परं िकमो रूपं पुर स्कृ त्य उसके बाद ‘िकम्’ शब्द के रूपों (कः, िकम्, के न, कस्मै, कस्मात्, कस्य, ‘कथम् उपैित ?’ → ‘नूनम्’
ततृ ीयादीिन योजयेत ् किस्मन्, कीदृ शः, कथम्…) को आगे रखकर, अथ त् उ न्ही ं पश्नों से ,
ततृ ीया आिद िवभिक्त वाले पद जोिड़ ए
ल्यबन्तञ्च तुम ुन्तञ्च क्त्वान्तं यबन्त (आगत्य), तुमुन्नन्त (गन्तुम्) तथा क्त्वान्त (गत्वा) पदों को उनके
ल् ‘शास्त्र ािण अधीत्य’ — कम
कमिवभूिषतम् कम-सिहत जोिड़ ए ‘शास्त्र ािण’ ल्यबन्त के साथ ही
अन्वयस्थपदानाञ्च यथा अन्वय में रखे पदों का िलङ् ग तथा िवशेषण जैस ा उपयुक्त हो, वैस ा (िवशेष्य ‘अध ः घटः’ — दोनों पुंिलङ् ग ,
िलङ् गिवशेषणे के अनुस ार) रिखए पथमा, एकवचन
‘ कमो रूपं पुरस्कृत्य’ यही व ध का हृदय है: ‘ कमः’ अथात् ‘ कम्’ शब्द का। ‘ कम्’ के रूप ही प्रश्न-शब्द ह —
कः, कम्, केन, कस्मै, कस्मात्, कस्य, क स्मन्, तथा उससे बने क दृशः, कथम्, कदा, कुत्र, कमथम्। हर वभ क्त का
अपना प्रश्न है — और हर प्रश्न ठ क उसी वभ क्त का पद ख च लाता है। इसी लए इस व ध का दूसरा नाम
आकाङ् क्षा व धः है।
२ दण्डान्वय और खण्डान्वय — कब कौन-सा प्रयोग कर?
दोन एक ही मं ज़ल तक ले जाते ह, रास्ता अलग है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः
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बन्दु दण्डान्वय व धः खण्डान्वय व धः
m द डवत् अ वयः as e
व्युत्पित्त
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ण् न् खण्डशः अन्वयः
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g l a पूरे श्लोक का अन्वय एक साथ िलखा जाता है ‘पितपदं पर स्परम् अन्वयः िक्रयते’ — पद -दर -पद
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पिक्रया
माध्यम ले खन पश्नोत्तर संवाद
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पूरा श्लोक
m . एक-एक चरण (पथमचरणे, िद्वतीयचरणे…) ag
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इकाई
आ े िवशेषणं यो यम्… (g l a
िनयम-श्लोक द्य
a एक लोक)
ज् श् कत-ृ कम-िक्रयास्तावत्… (दो श्लोक)
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उपयोग उ त्तर िलखते समय — अिन्तम रूप यही होता है समझते-िसखाते समय — कक्षा में तथा स्वयं सोचते हुए
m .
स पूणकु भो न करोित… (प ृ ठe165–166)
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शास्त्राण्यधीत्यािप… (पष्ृ ठ 162–163)
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पुस्तक का उदाहरण म् म् ष्
m .
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s क दृ ष्ट से: ‘अन्वयं कुरुत’ पूछे जाने पर उत्तर-पु स्तका म दण्डान्वय ही ल खए — एक सीधी पं क्त म,
aपरीक्षा
agl कोष्ठक-स हत। खण्डान्वय क ता लका उत्तर नह , सोचने क सीढ़ है; उसे मन-ही-मन च ढ़ए और अ न्तम पं क्त
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कागज़ पर ल खए।
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a glपुस्तक म नह ह — प र शष्ट पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न
स्वयं जाँच के लए ह।
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1. ‘ कमो रूपं पुरस्कृत्य तृतीयाद न योजयेत्’ — इस पं क्त के अनुसार बताइए क नम्न वभ क्तय के लए कौन-
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सा प्रश्न पूछा जाएगा : (क) तृतीया (ख) चतुथ (ग) पञ्चमी (घ) षष्ठी (ङ) सप्तमी।
c — (क) केन ? (ख) कस्मै ? (ग) कस्मात् ? (घ) कस्य ? (ङ) क स्मन्a?g/ कुत्र ?
.उत्तर
a s em2. ‘बालकः पुस्तकालयं गत्वा पुस्तकं पठ त’ — इस वाक्य म ल्यबन्त/क्त्वान्त पद तथा उसका कम पहचानकर
agl ल खए क नयम- ोक क तीसरी पं क्त यहाँ कैसे लगती है।
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mमुख्य वाक्य : बालकः पुस्तकालयं गत्वा पुस्तकं पठ त। l a
उत्तर — क्त्वान्त पद ‘गत्वा’ है और उसका कम ‘पुस्तकालयम्’ है। ‘क्त्वान्तं कम वभू षतम्’ के अनुसार दोन
साथ रखे जाते ह — पुस्तकालयं गत्वा —.co g
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फर
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धeका दूसरा नाम ______ है, क्य क इसम प्रश्न ______ के अनुसार पूछे जाते
3. रक्तस्थान भ रए — खण्डान्वय व s
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उत्तर — आकाङ् क्षा व धः ; आकाङ् क्षा। (पुस्तक — ‘अतः एषः व धः आकाङ् क्षा व धः इत्य प उच्यते’,
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‘खण्डान्वय वधौ आकाङ् क्षानुगुणं प्रश्नाः भव न्त’।)
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चत्वा र सहका र-कारणा न — आकाङ् क्षा · योग्यता · आस त्तः · तात्पयम् — पृष्ठ 163–164
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‘ ोकस्य अन्वयाथम् अवबोधनाथ च वशेषरूपेण चत्वा र सहका र-कारणा न उक्ता न स न्त’
सहका र-कारणा न
१ आकाङ् क्षा क्या है — और उससे प्रश्न कैसे बनते ह?
प रभाषा (पुस्तक के शब्द म) — ‘अपे क्षत- वषयस्य ाने इच्छा आकाङ् क्षा। पूवपदस्य अ ग्रमपदस्य वा ज्ञाने इच्छा इत्य प
वक्तुं शक्नुमः।’ — जो बात अभी अधूरी है, उसे जानने क इच्छा ही आकाङ् क्षा है। एक पद सुनते ही मन अपने-आप पूछता है —
‘और?’
पुस्तक इसके दो भेद दे ती है —
(क) पूवपदस्य ाने इच्छा — ‘पठ त, लख त, खाद त, ददा त, पश्य त, नय त, भव न्त, कुव न्त, कुरु, स्मर, त्यज, गतम्, प्राप्तम्,
लब्धम्, कृतम्, ज्ञातव्यम्, त्यक्तव्यम्’ — ऐसे क्रयापद ोक म हो सकते ह। ‘त ह अत्र क्रयापदस्य श्रवणानन्तरं का चत् जज्ञासा
(ज्ञातुम् इच्छा) भव त।’ जैसे ‘पठ त’ सुनते ही ये प्रश्न उठते ह :
प्रश्न क्या खोज रहा है वभ क्त / को ट
कः पठित ? कत पथमा
िकं पठित ? कम िद्वतीया
कु त्र पठित ? थान
स् स प्तमी (अिधकरण)
कदा पठित ? समय कालवाचक
कथं पठित ? पकार िक्रयािवशेषण / ततृ ीया
िकमथं पठित ? पयोजन चतुथ / ताद य
िकं िनिमत्तं पठित ? िनिमत्त हेत ु
िकं कृ त्वा पठित ? पूवकािलक िक्रया वान्त / ल्यबन्त
क्त्
(ख) अ मपदस्य ाने इच्छा — ‘ ोके प्रथमान्तं पदं कम् ? तीयान्तं पदं कम् ? तृतीयान्तं पदं कम् ? इत्या दकम् अत्र
उदाहरणं भ वतुमह त।’ — यहाँ प्रश्न वभ क्त के नाम से पूछा जाता है और उत्तर म वह पद ढूँ ढ़ा जाता है।
यह अन्वय म कैसे काम आता है: हर प्रश्न ठ क एक ही तरह का पद ख चता है। ‘कः ?’ प्रथमान्त पद लाएगा,
‘ कम् ?’ तीयान्त, ‘केन ?’ तृतीयान्त। इस लए प्रश्न क सूची पूरी हो जाने का अथ है क ोक का कोई पद छू टा
नह — आकाङ् क्षा ही यह जाँचती है क अन्वय पूरा हुआ या नह ।
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२ योग्यता क्या है — ‘गगने पुष्पं वकस त’ म क्या दोष है?
प रभाषा — ‘पदानां मध्ये परस्पर-सम्बन्धस्य पात्रता एव योग्यता।’ — दो पद म परस्पर जुड़ने क पात्रता होनी चा हए, तभी
अन्वय बनेगा।
पुस्तक का उदाहरण — ‘गगने पुष्पं वकस त। अ स्मन् वाक्ये योग्यतायाः अभावः वतते। गगने पुष्पस्य असम्भवात्।’ —
‘आकाश म फूल खलता है’ — वाक्य व्याकरण से ठ क है (कता ‘पुष्पम्’, अ धकरण ‘गगने’, क्रया ‘ वकस त’), पर आकाश म
फूल होता ही नह , इस लए अथ नह बनता। यहाँ योग्यता का अभाव है।
वाक्य व्याकरण योग्यता नणय
वािटकायां पुष्पं िवकसित शुद्ध है — वािटका में फू ल स म्भव है अन्वय बनेगा
गगने पुष्पं िवकसित शुद्ध नही ं — गगन में पुष्प अस म्भव अन्वय नही ं बनेगा
वि ना िसञ्चित शुद्ध नही ं — आग से सी ंचना अस म्भव अन्वय नही ं बनेगा
जले न िसञ्चित शुद्ध है अन्वय बनेगा
यह अन्वय करते समय क्य याद रख: ोक म एक ही वभ क्त के दो-तीन पद हो सकते ह, और सन्दे ह होता है
क कौन-सा कससे जुड़े। तब नणय योग्यता से होता है — जो जोड़ अथ दे ता है, वही ठ क है। जैसे ‘अधः घटः घोषं
नूनम् उपै त’ म ‘अधः’ को ‘घोषम्’ से नह , ‘घटः’ से जोड़ा जाता है, क्य क अधूरा घड़ा होता है, अधूरा शोर नह ।
काव्य म अपवाद: क व जान-बूझकर ‘गगने पुष्पम्’ जैसा असम्भव प्रयोग कर सकता है — जैसे ‘खपुष्पम्’
(आकाश-कुसुम) असम्भव वस्तु का प्र सद्ध उदाहरण ही है। पर वहाँ वह अलङ् कार होता है, सामान्य अन्वय नह —
और तात्पय से उसका अथ खुलता है।
३ आस त्त (स ध) क्या है — पुस्तक ‘पञ्च नमेष’ क बात क्य करती है?
प रभाषा — ‘पदानां परस्परं सामीप्यम् आस त्तः (स धः)। एकस्य पदस्य कथनानन्तरम् अ ग्रमपदम् अ प अनुक्षणं वदे त्। य द
न वद त त ह आस त्तः न भव त।’ — एक पद बोलने के तुरन्त बाद अगला पद बोला जाए, तभी आस त्त है।
पुस्तक का उदाहरण — ‘सः पुस्तकं पठ त। अत्र एकवारमेव पूण वाक्यं वद त अथवा पठ त त ह पदानां मध्ये सामीप्यं भव त।
तदे व आस त्तः इत्युच्यते। य द ‘सः’ इत्युक्त्वा अ ग्रमं पदं पञ्च नमेषाणामनन्तरम् अथवा कालान्तरे वद त त ह पदानां मध्ये
सामीप्यस्य अभावः भव त। तेन पदानां मध्ये परस्परम् अन्वयः अ प न भव त।’
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सः पुस्तकं पठित। — एक साँस में → आसित्त है → अथ बनता है
सः … (बहुत दे र) … पुस्तकं … (बहुत दे र) … पठित। — आसित्त नही ं → अथ नही ं बनता
‘ नमेष’ का अथ: नमेष = पलक झपकने का समय। ‘पञ्च नमेष’ अथात् पाँच बार पलक झपकने जतना अन्तर
— बहुत थोड़ा-सा समय। पुस्तक का आशय यह है क पद इतने पास-पास बोले जाएँ क सुनने वाले के मन म पहला
पद टका रहे, तभी दूसरे से जुड़ सके। यह भाषा का श्रवण-पक्ष है — संस्कृत मूलतः सुनी-सुनाई जाने वाली भाषा है,
इसी लए इसे अलग कारण माना गया।
लखने म आस त्त: लखते समय यही बात पद के क्रम से नभती है। ‘अधः घटः घोषं नूनम् उपै त’ म ‘अधः’ और
‘घटः’ एक साथ ह — य द उन्ह दूर-दूर लख द (‘अधः घोषं नूनं घटः उपै त’) तो पढ़ने वाला उन्ह जोड़ नह पाएगा।
इसी लए अन्वय म सम्बद्ध पद सटाकर लखे जाते ह।
४ तात्पय क्या है — ‘शतायुभव’ का अथ ‘सौ वष जयो’ क्य नह है?
प रभाषा — ‘शब्द वशेषात् अथ वशेषस्य ाने इच्छा एव तात्पय भव त। शब्दस्य अथः सम्यक् ज्ञातव्यः, अन्यथा शब्दस्य अथः
अनथः भ वतुमह त। तेन अन्वयोऽ प सम्यक् भ वतुं नाह त।’ — शब्द से वक्ता का जो वशेष अ भप्राय है, उसे पकड़ना तात्पय है।
अथ चूका तो अन्वय भी चूक जाएगा।
पुस्तक का उदाहरण — ‘शतायुभव इत्युक्ते शतं वषा ण जीवतु इ त अथः न, अ पतु ‘ चर ीवी भव’ इ त।’ — ‘शतायुभव’
कहने वाला यह नह कह रहा क ‘ठ क सौ वष जयो, इक्यानवेव म नह ’। उसका तात्पय है — ‘द घायु हो’। ‘शत’ यहाँ गनती नह ,
पूणता का प्रतीक है।
प्रयोग शब्दाथ (जो लखा है) तात्पय (जो कहा जा रहा है)
शतायुभव सौ वष की आयु वाला हो िचरञ्जीवी भव — दीघ यु हो
सै न्धवम् आनय ‘सै न्धव’ = घोड़ ा भी, से ंध ा नमक भी भोजन के समय — नमक; यात्रा के समय — घोड़ ा
गङ् गायां घोषः गंगा (जल ) में घोष गंगा के तट पर बस्ती
अन्त म पुस्तक जोड़ती है — ‘खण्डान्वय वधौ आकाङ् क्षानुगुणं प्रश्नाः भव न्त।’ — खण्डान्वय म प्रश्न आकाङ् क्षा के अनुसार
ही बनते ह; शेष तीन कारण (योग्यता, आस त्त, तात्पय) यह तय करते ह क उत्तर ठ क है या नह ।
चार को एक साथ दे खए: आकाङ् क्षा प्रश्न उठाती है (‘कौन ? क्या ?’), योग्यता जाँचती है क उत्तर अथपूण है
या नह , आस त्त जाँचती है क पद पास-पास ह या नह , और तात्पय जाँचता है क अथ वही है जो वक्ता चाहता है।
चार मलकर ही ‘शाब्दबोध’ (वाक्य से अथ का ज्ञान) कराते ह — कसी एक के अभाव म अन्वय अधूरा या गलत
रह जाता है।
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अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह — प र शष्ट पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए ह।
1. नम्न म कौन-सा कारण नह है, बताइए — (क) ‘अ ग्नना सञ्च त’ (ख) ‘दे वदत्तः’ … (दस मनट बाद) …
‘पठ त’ (ग) ‘पठ त’ — केवल इतना कहकर चुप हो जाना।
उत्तर — (क) योग्यता का अभाव (आग से स चना असम्भव) (ख) आस त्त का अभाव (पद म सामीप्य नह ) (ग)
आकाङ् क्षा क पू त नह हुई — ‘कः पठ त ? क पठ त ?’ अनुत्त रत रह गए।
2. ‘चत्वा र सहका र-कारणा न’ संस्कृत म क्रम से ल खए तथा प्रत्येक का एक-एक शब्द म काम बताइए।
उत्तर — आकाङ् क्षा ( जज्ञासा), योग्यता (सम्भावना), आस त्तः (सामीप्य), तात्पयम् (अ भप्राय)।
3. ‘सैन्धवम् आनय’ — यह वाक्य कस कारण का उदाहरण है और क्य ?
उत्तर — तात्पय का। ‘सैन्धव’ के दो अथ ह — घोड़ा तथा सधा नमक। कौन-सा अथ लेना है, यह वक्ता के
अ भप्राय और प्रसंग से ही तय होता है।
आकाङ् क्षा व धः — प्रश्न कस क्रम से पूछे जाएँ — पृष्ठ 165
‘अत्र प्रश्नेषु प्रथमतः क्रयापदे न आकाङ् क्षाप्रश्नः क्रयते’
आकाङ् क्षा व धः
१ खण्डान्वय म प्रश्न कस क्रम से पूछे जाते ह?
सबसे पहला प्रश्न सदा क्रयापद का होता है। पुस्तक कहती है — ‘अतः एषः व धः आकाङ् क्षा व धः इत्य प उच्यते। अत्र प्रश्नेषु
प्रथमतः क्रयापदे न आकाङ् क्षाप्रश्नः क्रयते।’
पुस्तक का छोटा उदाहरण — ‘सा वद्यालयं गच्छ त इ त वाक्ये क्रयापदं कम् इ त प्रश्नः भव त। तस्य उत्तरं ‘गच्छ त’ इ त।
तदनन्तरं क्रयाम् अनुसृत्य कतुः कमणः तृतीया द वभक्त्यन्तानां क्त्वान्तल्यबन्तानाम् अव्ययाद नां च वषये आकाङ् क्षां
कृत्वा प्रश्नाः क्रयन्ते। छात्राः व चन्त्य उत्तरा ण व दष्य न्त।’
क्रम कसके वषय म आकाङ् क्षा प्रश्न ‘सा वद्यालयं गच्छ त’ पर
१ िक्रयापदम् िक्रयापदं िकम् ? गच्छित
२ कत कः / का गच्छित ? सा गच्छित
३ कम िकं / कु त्र गच्छित ? सा िवद्यालयं गच्छित
४ ततृ ीयािद िवभक्त्यन्त पद के न ? कस्मै ? कस्मात् ? कस्य ? किस्मन् ? इस वाक्य में नही ं है
५ वान्त / ल्यबन्त पद
क्त् िकं कृत्वा ? िकं गत्वा ? इस वाक्य में नही ं है
६ अव्यय आिद कथम् ? कदा ? िकमथम् ? इस वाक्य में नही ं है
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः
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प्रश्न कतने बड़े ह — ‘खण्डान्वय वधौ प्रश्नाः सामान्यतया
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पदात्मकाः त्रपदात्मकाः चतुष्पदात्मकाः वा भ वतुमह न्त। तन्नाम
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लघुप्रश्नाः भव न्त।’ — अथात् प्रश्न दो, तीन या चार पद के छोटे -छोटे होने चा हए, जैसे ‘कः उपै त ?’ (दो पद), ‘क दृशः घटः उपै त
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?’ (तीन पद), ‘अधः घटः कम् उपै त ?’ (चार पद)।
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a क्रया मल जाने पर बाक प्रश्न अपने-आप बन जाते ह (‘करो त’ मला तो ‘कः ?’ और ‘ कम् ?’ स्वयं उठगे)। य द
क्रया से ही क्य शुरू कर: संस्कृत वाक्य का केन्द्र क्रया है — कता, कम, करण, सम्प्रदान, सब उसी से जुड़ते ह।
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पहले कता खोज तो पता ही नह चलेगा क उससे क्या पूछना है। इसी लए स्मृ त- ोक भी कहता है — कतृ-कम-
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क्रयाः पहले जोड़ो, ततः परं तृतीया द।
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२ ‘ कम्’ शब्द के कौन-कौन से रूप प्रश्न बनाने म काम आते ह?
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a लेने पर कसी भी
स्मृ त-ोक का आदे श है — ‘ कमो रूपं पुरस्कृत्य तृतीयाद न योजयेत्’। नीचे वही पूरी सूची है, वभ क्त-स हत। यह याद कर
ोक का खण्डान्वय स्वयं कया जा सकता है।
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प्रश्न-पद वभ क्त / कारक
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.coक्या ढूँ ढ़ता है उदाहरण (प र शष्ट के ोक से)
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कः / का / िकम्
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पथमा — कत
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िक्रया करने वाला कः न करोित ? — स म्पूणकु म्भः
िद्वतीया — कम िजस पर िक्रया हो िकं न करोित ? — शब्दम्
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कम् / काम् / िकम्
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ततृ ीया — करण साधन
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के न न करोित ? — mनाममा ेण
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कस्मै चतुथ — स म्पदान िजसके िलए स्मै ददाित
agl कस्मात् / कु तः पञ्चमी — अपादान िजससे अलग होना कस्मात् पतित ?
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षष्ठी — स म्बन्ध
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िकसका के षाम् अरोगं करोित ? — आतुराणाम्
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कस्य / के षाम्
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किस्मन् / कु त्र स प्तमी — अिधकरण कहाँ कु त्र पुष्पं िवकसित ? — गगने
कीदृ शः / कीदृ शी / कीदृ शम्
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िवशेषण कै सा कीदृ शः घटः ? — अधः
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िक्रयािवशेषण िकस पकार .cनूoनम्
कथम् उपैित ? —
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कथम्
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. com कालवाचक कब
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कदा पठित ?
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कदा
ase िकमथम् / िकं िनिमत्तम्
a g l पयोजन िकसिलए िकमथ ं पठित ?
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वान्त / ल्यबन्त पहले क्या करके िकं कृत्वा मूख ः भविन्त ? — शास्त्रािण अधीत्य
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िकं कृ त्वा
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अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह — प र शष्ट पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए ह।
1. ‘बा लका उद्याने पुष्पा ण पश्य त’ — इस वाक्य पर खण्डान्वय के तीन प्रश्न बनाइए तथा उत्तर ल खए।
उत्तर — क्रयापदं कम् ? — पश्य त। का पश्य त ? — बा लका पश्य त। कुत्र क पश्य त ? — बा लका उद्याने
पुष्पा ण पश्य त।
2. ‘छात्रः लेखन्या पत्रं लख त’ — इसम ‘लेखन्या’ पद को ख चने वाला प्रश्न कौन-सा है?
उत्तर — केन लख त ? — ‘लेखनी’ करण है, अतः तृतीया; तृतीया का प्रश्न ‘केन ?’ है।
3. पुस्तक के अनुसार खण्डान्वय के प्रश्न कतने पद के होने चा हए?
उत्तर — ‘ पदात्मकाः त्रपदात्मकाः चतुष्पदात्मकाः वा’ — अथात् दो, तीन या चार पद के लघु प्रश्न।
खण्डान्वय — सा धत उदाहरण : ‘स ण
ू कुम्भो न करो त…’ — पृष्ठ 165–166
पुस्तक क प्रश्नोत्तर-ता लका — शक्षकः प्रश्नान् करो त | छात्राः उत्तरा ण वद न्त
सा धतम् उदाहरणम्
१ पुस्तक का दूसरा उदाहरण- ोक तथा उसका पदच्छे द क्या है?
ोकः (पृष्ठ 165) —
सम्पूणकु म्भो न करोित शब्दमध घटो घोषमुपैित नूनम् ।
िवद्वान् कु लीनो न करोित गवमल्पो जनो जल्पित साट्टहासम् ॥
पदच्छे दः (पुस्तक के शब्द म, अठारह पद) — स ूणकुम्भः, न, करो त, शब्दम्, अधः, घटः, घोषम्, उपै त, नूनम्, व ान्,
कुलीनः, न, करो त, गवम्, अल्पः, जनः, जल्प त, साट्टहासम्।
स न्ध- वच्छे द, जससे पदच्छे द बना —
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ोक म वच्छे द स न्ध
सम्पूणकु म्भो न स म्पूणकु म्भः + न िवसग सिन्ध (उत्व)
शब्दमध घटो शब्दम् + अधः + घटः म्-सिन्ध + िवसग सिन्ध
घोषमुपैित घोषम् + उपैित म्-सिन्ध (उप + एित = उपैित — वृिद्ध सिन्ध)
कु लीनो न कु लीनः + न िवसग सिन्ध
गवमल्पो जनो गवम् + अल्पः + जनः म्-सिन्ध + िवसग सिन्ध
साट्टहासम् स (सह) + अट्टहासम् अट्टहास-सिहत — यहाँ िक्रयािवशेषण
पद के अथ: स ूणकुम्भः = पूरा भरा घड़ा · शब्दम् = आवाज़ · अधः घटः = आधा भरा घड़ा · घोषम् = शोर · उपै त
= प्राप्त होता है, करता है · नूनम् = नश्चय ही · कुलीनः = अच्छे कुल का, सुसंस्कृत · गवम् = घमंड · अल्पः जनः =
ओछा/अल्पज्ञ मनुष्य · जल्प त = बकबक करता है · साट्टहासम् = ठहाके लगाते हुए।
२ पुस्तक क खण्डान्वय-ता लका पूरी द जए — शक्षक क्या पूछते ह और छात्र क्या उत्तर दे ते ह?
पृष्ठ 165–166 क पूरी ता लका नीचे ज्य -क -त्य द गई है। यह प्रश्न-पत्र नह है — दोन स्तम्भ पुस्तक म पहले से भरे हुए छपे ह।
यह कक्षा का एक आदश संवाद है, जसे दे खकर छात्र स्वयं कसी भी ोक पर यही क्रम चला सकते ह।
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क्र.सं. शक्षकः प्रश्नान् करो त। छात्राः उत्तरा ण वद न्त।
१ पथमचरणे िक्रयापदं िकम् ? करोित।
२ कः न करोित ? स म्पूणकु म्भः न करोित।
३ सम्पूणकु म्भः िकं न करोित ? स म्पूणकु म्भः शब्दं न करोित।
४ िद्वतीयचरणे िक्रयापदं िकम् ? उपैित।
५ कः उपैित ? घटः उपैित।
६ कीदृ शः घटः उपैित ? अधः घटः उपैित।
७ अधः घटः िकम् उपैित ? अधः घटः घोषम् उपैित।
८ अधः घटः घोषं कथम् उपैित ? अधः घटः घोषं नूनम् उपैित।
९ ततृ ीयचरणे िक्रयापदं िकम् ? करोित।
१० कः न करोित ? िवद्वान् न करोित।
११ कीदृ शः िवद्वान् न करोित ? कु लीनः िवद्वान् न करोित।
१२ कु लीनः िवद्वान् िकं न करोित ? कु लीनः िवद्वान् गव ं न करोित।
१३ चतुथचरणे िक्रयापदं िकम् ? जल्पित।
१४ कः जल्पित ? जनः जल्पित।
१५ कीदृ शः जनः जल्पित ? अल्पः जनः जल्पित।
१६ अल्पः जनः कथं जल्पित ? अल्पः जनः साट्टहासं जल्पित।
ता लका का साँचा पक ड़ए — हर चरण म वही चार कदम: (क) क्रयापदं कम् ? — क्रया पकड़ो; (ख) कः ?
— कता जोड़ो; (ग) क दृशः ? — कता का वशेषण जोड़ो; (घ) कम् / कथम् ? — कम या क्रया वशेषण जोड़ो।
ध्यान द जए क हर उत्तर म पछला उत्तर भी दुहराया जाता है — इसी लए अ न्तम उत्तर ही उस चरण का पूरा
अन्वय बन जाता है। यही पुस्तक का कथन है — ‘अन्ते समग्रस्य ोकस्य अन्वयः स्वयमेव भ वष्य त’।
पुस्तक क छपाई के तीन बन्दु (जैसा छपा है, वैसा ही बताया जा रहा है): (१) क्र.सं. का स्तम्भ पुस्तक म
खाली छपा है — ऊपर क संख्याएँ पढ़ने क सु वधा के लए यहाँ जोड़ी गई ह; (२) आठव पं क्त का प्रश्न पुस्तक म
प्रश्नवाचक चह्न के स्थान पर पूण वराम के साथ छपा है — ‘अधः घटः घोषं कथम् उपै त।’; (३) अ न्तम पं क्त का
उत्तर पुस्तक म प्रश्नवाचक चह्न के साथ छपा है — ‘अल्पः जनः साट्टहासं जल्प त ?’। दोन मुद्रण-स्खलन ह; ऊपर
क ता लका म चह्न ठ क करके दए गए ह, शब्द वही ह जो पुस्तक म ह।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः AglaSem · NCERT Solutions
३ ता लका से नकला पूरा अन्वय, अथ तथा भाव क्या है?
अन्वयः (पृष्ठ 166, पुस्तक का अ न्तम वाक्य) —
सम्पूणकु म्भः शब्दं न करोित । अधः घटः घोषं नूनम् उपैित ।
कु लीनः िवद्वान् गव ं न करोित । अल्पः जनः साट्टहासं जल्पित ॥
अथ —
अन्वय हन्द अथ
सम्पूणकु म्भः शब्दं न करोित। पूरा भरा हुआ घड़ ा आवाज़ नही ं करता।
अधः घटः घोषं नूनम् उपैित। आधा भरा घड़ ा िनश्चय ही शोर करता है।
कु लीनः िवद्वान् गवं न करोित। कु लीन (सुस ंस्कृत) िवद्वान् घमंड नही ं करता।
अल्पः जनः साट्टहासं जल्पित। ओछा (अल्पज्ञ) मनुष्य ठहाके लगाते हएु बकबक करता रहता है।
भावः — जसम सचमुच गुण है, वह चुप रहता है; जसम थोड़ा-सा है, वही शोर मचाता है। क व ने घड़े का दृष्टान्त दे कर यह बात
कही है — भरा घड़ा छलकता नह । पहली दो पं क्तयाँ दृष्टान्त ह, अगली दो दाष्टा न्तक ( जस पर दृष्टान्त लागू होता है)। यह दृष्टान्त
अलङ् कार का सुन्दर उदाहरण है।
अन्वय कैसे बना, एक दृ ष्ट म: ोक का क्रम था — ‘स ूणकुम्भो न करो त शब्दम्’ ( क्रया बीच म, कम अन्त
म) — क्य क छन्द ऐसा माँगता था। अन्वय ने उसे गद्य-क्रम म लाया — ‘स ूणकुम्भः शब्दं न करो त’ (कता →
कम → क्रया)। इसी प्रकार ‘अध घटो घोषमुपै त नूनम्’ का ‘नूनम्’ क्रया के बाद था, अन्वय म क्रया से पहले आ
गया।
४ यह ता लका अभ्यास नह है तो छात्र इसका उपयोग कैसे कर?
इसे ‘हल’ नह करना, इसक नक़ल पर चलना है। ता लका के दोन स्तम्भ भरे हुए ह, इस लए इसम कुछ लखना शेष नह है।
उपयोग क व ध यह है :
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः
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चरण १ — कोई भी श्लोक लीिजए और पहले उसका पद च्छे द कीिजए।
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comको चार चरणों में बाँिटए।
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चरण २ — श्लोक
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चरणas३ — हर चरण पर बारी-बारी वही चार पश्न पूिछए — िक्रयापदं िकम् ? · कः ? · कीदृ शः ? · िकम् / कथम्
a/gकlे न ?
.c omबढ़ ता जाए।
चरण ४ — हर उत्तर में िपछला उत्तर दुहराइए, तािक वाक्य
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se — चारों िमलकर पूरा अ वय बन जाएँगे।
चरण ५ — हर चरण का अि तम उ र िलख aलीिजए
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उसी व ध से एक और ोक (यहाँ पूरी तरह करके दखाया गया) — ‘काकः कृष्णः पकः कृष्णः को भेदः पककाकयोः।’
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प्रश्नः उत्तरम्
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(अिस्त) — अध् याहायम्।
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पथमचरणे िक्रयापदं िकम् ?
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a कः कृष्णः (अिस्त) ? काकः कृष्णः (अिस्त)।
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m.co िपकः (अिप) कृ णः (अि त)। agl
अन्यः कः कृ ष्णः (अिस्त) ?
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g l a िपककाकयोः कः भेद ः (अिस्त) ?
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तिह कः भेद ः ?
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अन्वयः — काकः कृष्णः (अ स्त), पकः (अ प) कृष्णः (अ स्त)। पककाकयोः कः भेदः (अ स्त) ?
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स्वयं.cजाँच के लए ह। पहले स्वयं ता लका बनाइए, फर उत्तर दे खए।
अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह — प र शष्ट पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
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agl 1. नम्न पं क्त पर खण्डान्वय के प्रश्न-उत्तर बनाइए — ‘बालः चन्द्रं पश्य त।’
उत्तर — क्रयापदं कम् ? — पश्य त। कः पश्य त ? — बालः पश्य त। बालः क पश्य त ? — बालः चन्द्रं
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पश्य त। अन्वयः — बालः चन्द्रं पश्य त।
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2. नम्न ोक का अन्वय क जए —
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अलसस्य कुतो वद्या अ वद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मत्रम् अ मत्रस्य कुतः सुखम् ॥
अन्वयः — अलसस्य वद्या कुतः ? अ वद्यस्य धनं कुतः ? अधनस्य मत्रं कुतः ? अ मत्रस्य सुखं कुतः ?
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(चार चरण म क्रया अध्याहाय है — ‘भव त’। षष्ठ्यन्त पद ‘अलसस्य’ आ द अपने-अपने प्रथमान्त पद से जुड़े
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ह।)
se m 3. नम्न
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ोक का अन्वय क जए —
ag l पुस्तकस्था तु या वद्या परहस्तगतं धनम् ।
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कायकाले समुत्पन्ने न सा वद्या न तद्धनम् ॥
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अन्वयः — या वद्या तु पुस्तकस्था (अ स्त), (यत्) धनं परहस्तगतम् (अ स्त), कायकाले समुत्पन्ने सा वद्या न
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(भव त), तत् धनं न (भव त)।
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(यद्-तद् का सम्बन्ध पक ड़ए; ‘कायकाले समुत्पन्ने’ सप्तमी म भावलक्षण-सप्तमी है — ‘काम आ पड़ने पर’।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः AglaSem · NCERT Solutions
अन्वय करने क पूरी व ध — संक्षप
े , सामान्य भूल तथा स्वयं-अभ्यास
प र शष्ट का सार — परीक्षा म ‘अन्वयं कुरुत’ हल करने क तैयारी
पु न रावृ त्तः
१ कसी भी ोक का अन्वय करने के लए क्रम से क्या-क्या कर?
छह चरण — यही पूरे प र शष्ट का नचोड़ है।
चरण क्या कर पुस्तक का आधार
१ पद च्छे द कीिजए — सिन्ध खोलकर सब पद अलग-अलग िलिखए। दोनों उदाहरणों में सबसे पहले यही है
२ िक्रयापद ढू ँिढ़ ए — िकतने वाक्य है,ं यह िक्रयाओं की िगनती से पता चलता ‘पथमतः िक्रयापदे न आकाङ् क्षापश्नः िक्रयते’
है।
३ हर िक्रया का कत (पथमान्त पद ) और कम (िद्वतीयान्त पद ) जोिड़ ए। ृ
‘कत-कम-िक्रयास्तावत् श्लोके योज्याः’
४ िवशेषण अपने िवशेष्य से ठीक पहले रिखए; िलङ् ग-वचन-िवभिक्त िमलाकर ‘आद्ये िवशेषणं योज्यं िवशेष्यं तदनन्तरम्’ · ‘यथा
जाँिचए। िलङ् गिवशेषणे’
५ ततृ ीयािद पद , क्त्वान्त/ल्यबन्त/तुमुन्नन्त तथा अव्यय अपने-अपने स म्बद्ध पद के ‘िकमो रूपं पुर स्कृ त्य ततृ ीयादीिन योजयेत’् · ‘क्त्वा-
साथ जमाइए; क्त्वान्त आिद िक्रया से पहले । णमुल ्-ल्यप्-पभत्ृ येवं पूवम्’
६ िक्रयापद अन्त में रिखए; कत या िक्रया गायब हो तो अध्याहार करके कोष्ठक ‘सव न्ते िक्रयापदं िलखेत’् · ‘सुप्तं पदम् योजनीयम्’
में जोिड़ ए।
साँच ा — (अध्याहृत पद) · कत का िवशेषण · कत · षष्ठी/सप्तमी पद · त ृत ीया/चत थु /पञ्चमी पद · क्त्वान्त-
ल्यबन्त · कम का िवशेषण · कम · अव्यय (न, अिप, त ,ु िह, नून म्) · िक्र या
जाँच का एक सरल उपाय: अन्वय लख लेने के बाद उसे प ढ़ए और ग नए — क्या ोक का हर पद अन्वय म
एक बार आया? न कोई छू टा, न कोई दुहराया गया? य द हाँ, और वाक्य का अथ बन रहा है, तो अन्वय ठ क है।
अन्वय म पद घटते-बढ़ते नह , केवल जगह बदलते ह — कोष्ठक वाले अध्याहृत पद इसका अपवाद ह।
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२ अन्वय करते समय छात्र कौन-सी भूल सबसे अ धक करते ह?
भूल अशुद्ध शुद्ध नयम
पदच्छे द िकए िबना अन्वय शुरू ‘शास्त्र ाण् यधीत्यािप’ को एक पद मान शास्त्रािण + अधीत्य + पहले सिन्ध-िवच्छे द
कर दे ना ले ना अिप
िक्रया बीच में छोड़ दे ना स म्पूणकु म्भः न करोित शब्दम् स म्पूणकु म्भः शब्दं न सव न्ते िक्रयापदं िलखेत ्
करोित
िवशेषण को िवशेष्य से दू र रखना अधः घोषं नूनं घटः उपैित अधः घटः घोषं नूनम् उपैित आद्ये िवशेषणं योज्यम्
‘न’ को िक्रया से अलग कर न कु लीनः िवद्वान् गव ं करोित कु लीनः िवद्वान् गव ं न िनषेध िक्रया से सटा रहता है
दे ना करोित
क्त्वान्त/ल्यबन्त को िक्रया के मूख ः भविन्त शास्त्रािण अधीत्य शास्त्रािण अधीत्य मूख ः क्त्वा-णमुल ्-ल्यप्-पभत्ृ येवं पूवम्
बाद रखना भविन्त
अध्याहृत पद िबना कोष्ठक के के चन शास्त्रािण अधीत्य… (के चन) शास्त्र ािण जोड़ा हआ
ु पद कोष्ठक में
िलखना अधीत्य…
अन्वय के बदले िहन्दी अथ िलख ‘भरा घड़ ा आवाज़ नही ं करता’ स म्पूणकु म्भः शब्दं न अन्वय संस्कृ त में ही होता है
दे ना करोित
यद् -तद् का जोड़ा तोड़ दे ना िक्रयावान् यः सः िवद्वान् यः िक्रयावान् सः पुरुषः तु ‘यः’ वाला वाक्याश
ं पहले , ‘सः’
िवद्वान् वाला बाद में
एक सुनहरा नयम: अन्वय लखने के बाद उसे ज़ोर से प ढ़ए। य द वह सरल गद्य जैसा सुनाई दे — जैसे कोई
सामान्य संस्कृत वाक्य — तो अन्वय ठ क बना है। य द पढ़ने म अटके, तो कह कोई पद अपनी जगह पर नह है।
३ अभ्यास के लए (स्वयं कर) — कुछ ोक का अन्वय क जए
सूचना — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। शारदा का प र शष्टम् १ केवल व ध सखाता है, कोई अभ्यास नह दे ता। नीचे
के ोक और उनके उत्तर केवल स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले उत्तर ढँ ककर स्वयं अन्वय ल खए, फर
मलाइए।
१. उद्यम का महत्त्व —
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उद्योिगनं पुरुषिसंहमुपैित लक्ष्मीः
दैवेन देयिमित कापुरुषा वदिन्त ।
दैवं िनहत्य कु रु पौरुषमात्मशक्त्या
यत्ने कृते यिद न िसध्यित कोऽत्र दोषः ॥
अन्वयः — लक्ष्मीः उद्यो गनं पुरुष सहम् उपै त। कापुरुषाः ‘दै वेन दे यम्’ इ त वद न्त। दै वं नहत्य आत्मशक्त्या पौरुषं कुरु। यत्ने कृते
य द न सध्य त (त ह) अत्र कः दोषः ?
(कता ‘लक्ष्मीः’ पहले; ल्यबन्त ‘ नहत्य’ अपनी क्रया ‘कुरु’ से पूव; तृतीयान्त ‘आत्मशक्त्या’ क्रया से पहले; ‘यत्ने कृते’ भावलक्षण-
सप्तमी; ‘त ह’ अध्याहाय।)
२. संग त का फल —
सङ् गः सव त्मना त्याज्यः स चेत ् त्यक्तुं न शक्यते ।
स सिद्भः सह कतव्यः सन्तः सङ् गस्य भेषजम् ॥
अन्वयः — सङ्गः सवात्मना त्याज्यः (अ स्त)। सः चेत् त्यक्तुं न शक्यते, (त ह) सः स ः सह कतव्यः। सन्तः सङ्गस्य भेषजम् (स न्त)।
(तीन वाक्य म ‘अ स्त/स न्त’ अध्याहाय; तुमुन्नन्त ‘त्यक्तुम्’ अपनी क्रया ‘शक्यते’ से पहले; तृतीयान्त ‘स ः’ के साथ अव्यय
‘सह’।)
३. वाणी का गुण —
केयूरािण न भूषयिन्त पुरुषं हारा न चन्दोज्ज्वलाः
न स्नानं न िवलेपनं न कु सुमं नालङ् कृता मूधजाः ।
वाण्येका समलङ् करोित पुरुषं या संस्कृता धायते
क्षीयन्ते खलु भूषणािन सततं वाग्भूषणं भूषणम् ॥
अन्वयः — केयूरा ण पुरुषं न भूषय न्त, चन्द्रोज्ज्वलाः हाराः न (भूषय न्त), स्नानं न, वलेपनं न, कुसुमं न, अलङ् कृताः मूधजाः न
(भूषय न्त)। या संस्कृता (वाणी) धायते सा एका वाणी पुरुषं समलङ् करो त। भूषणा न खलु क्षीयन्ते, वाग्भूषणं सततं भूषणम्
(भव त)।
(‘न भूषय न्त’ बार-बार अध्याहाय है; ‘या … सा’ का जोड़ा मलाइए; ‘खलु’ तथा ‘सततम्’ अव्यय अपनी क्रया के पास।)
४. छोटा गद्य-वाक्य (खण्डान्वय क व ध से) — ‘गुरुः शष्याय ज्ञानं ददा त।’
प्रश्नोत्तर — क्रयापदं कम् ? — ददा त। कः ददा त ? — गुरुः ददा त। गुरुः क ददा त ? — गुरुः ज्ञानं ददा त। गुरुः कस्मै ज्ञानं
ददा त ? — गुरुः शष्याय ज्ञानं ददा त। अन्वयः — गुरुः शष्याय ज्ञानं ददा त।
(‘कस्मै ?’ चतुथ का प्रश्न है — सम्प्रदान कारक ‘ शष्याय’ को ख च लाता है।)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः AglaSem · NCERT Solutions
आगे क्या: यही व ध अब शारदा के हर पाठ के ोक पर लगाइए — पाठ २, ३, ६, ७ और ९ के सुभा षत इसी
अभ्यास के लए सबसे अच्छे ह। जब अन्वय स्वयं बनने लगे, तब अथ और भाव लखना अपने-आप सरल हो जाएगा
— पुस्तक का यही वाक्य याद र खए : ‘तदनन्तरमेव ोकस्य अथम् अवगन्तुं शक्यते।’
अध्याय — एक नज़र म
यह क्या है — ‘अन्वयः’ शारदा का पहला प र शष्ट है (पृष्ठ 161–166)। प र शष्ट पाठ नह होता — उसम न कथा है, न
ोक-संग्रह, न प्रश्न-खण्ड। यहाँ केवल यह सखाया गया है क ोक पढ़ने क एक व ध होती है, और वह व ध क्या है।
समस्या क्या है — पुस्तक स्वयं आरम्भ म कहती है — ‘सामान्यतः ोकेषु कतृपदं कमपदं तृतीया द वभक्त्यन्तं पदं क्रयापदं
वशेषणा दकं च छन्दसः अनुगुणं पूवापरं भ वतुमह त।’ अथात् ोक म पद का क्रम अथ के अनुसार नह , छन्द के अनुसार
बनता है — इसी लए पढ़ने वाले को पद का पारस्प रक सम्बन्ध जोड़ने म क ठनाई (कष्टम्) होती है।
समाधान क्या है — ‘अन्वय’ का अथ है पद को गद्य के स्वाभा वक क्रम म सजाना — कता, कम, क्रया। पुस्तक कहती है
क जब तक यह क्रम न बने, तब तक ोक का अथ समझा ही नह जा सकता — ‘तदनन्तरमेव ोकस्य अथमवगन्तुं
शक्यते’।
दो व धयाँ — पुस्तक ोकान्वय व ध के दो भेद दे ती है — १. दण्डान्वय व धः और २. खण्डान्वय व धः। दण्डान्वय म पूरा
ोक एक ही सीधी लक र (दण्ड) क तरह एक बार म क्रम से लखा जाता है; खण्डान्वय म ोक को टु कड़ (खण्ड ) म
बाँटकर प्रश्नोत्तर के ारा एक-एक पद जोड़ा जाता है।
दोन के स्मृ त- ोक — दोन व धय के नयम पुस्तक ने पद्य म दए ह, ता क याद रह जाएँ — दण्डान्वय के लए ‘आद्ये
वशेषणं योज्यं…’ और खण्डान्वय के लए ‘कतृ-कम- क्रयास्तावच्छ्लोके…’ (दो ोक)। ये कण्ठस्थ कर लेने योग्य ह; परीक्षा
म व ध का नाम पूछे जाने पर इन्ह का उद्धरण दया जाता है।
अध्याहार — दण्डान्वय क सबसे उपयोगी बात यह सखाई गई है क ोक म कभी कता या क्रया छपी ही नह होती। तब
पाठक को सुप्तं पदम् ( छपा हुआ पद) स्वयं जोड़ना पड़ता है — इसे अध्याहार कहते ह, और जोड़े गए पद को कोष्ठक म
लखा जाता है, जैसे (केचन), (भव त), (यथा)।
चार सहका र-कारण — खण्डान्वय के लए पुस्तक चार सहायक बात बताती है — आकाङ् क्षा (एक पद सुनकर दूसरे को
जानने क इच्छा), योग्यता (दो पद के जुड़ने क पात्रता — ‘गगने पुष्पं वकस त’ म योग्यता नह ), आस त्तः (पद का
नकट- नकट बोला जाना), और तात्पयम् (वक्ता का अ भप्राय — ‘शतायुभव’ का अथ गनकर सौ वष नह , ‘ चर ीवी
भव’ है)।
दो सा धत उदाहरण — दण्डान्वय ‘शास्त्राण्यधीत्या प भव न्त मूखाः…’ ोक पर चार चरण म दखाया गया है — पदच्छे दः
→ दण्डान्वयः → ववरणम् → पद को संख्या दे कर क्रमशः योजनम्। खण्डान्वय ‘स ूणकुम्भो न करो त शब्दम्…’ ोक पर
एक ता लका से दखाया गया है जसम बाईं ओर शक्षक के प्रश्न और दाईं ओर छात्र के उत्तर दोन पहले से भरे हुए ह।
ता लका को कैसे ल — पृष्ठ 165–166 क वह ता लका प्रश्न-पत्र नह , आदश संवाद (model dialogue) है — कक्षा
म शक्षक इसी क्रम से पूछते ह और छात्र इसी ढं ग से उत्तर दे ते ह। इसे हल नह करना है, इसके साँचे को पकड़ना है : पहले
क्रयापद, फर कता, फर वशेषण, फर कम, फर अव्यय — और अन्त म पूरा अन्वय अपने आप बन जाता है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः
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त्व रत पुनरावृ त्त
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aटप्पणी
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पद उदाहरण
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अन्वयः श्लोक के पदों को गद्य के स्वाभािवक स ूणकुम्भः शब्दं न करो त अथ लखने से पहले का पहला काम
क्रम में सजाना
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पदच्छे दः सिन्ध तोड़कर पदों को अलग-अलग शास्त्राण्यधीत्या प → शास्त्रा ण, अन्वय से भी पहले यही करना पड़ता है
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करना अधीत्य, अ प
दण्डान्वयः
a g (केचन) शास्त्रा ण अधीत्या प मूखाः दण्डवत् अन्वयः दण्डान्वयः
दण्ड (लकीर) की तरह एक ही क्रम
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में पूर ा अन्वय भव न्त
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a s emव धः भी इसी का नाम है
com िकया गया अन्वय agl
खण्डान्वयः खण्ड-खण्ड करके , पश्नोत्तर से कः न करो त ? — स ूणकुम्भः न आकाङ् क्षा
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करो त
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अध्याहारः श्लोक में न छपा, पर अथ के िलए (केचन), (भव त), (यथा) जोड़ा हुआ पद कोष्ठक म लखते ह
आवश्यक पद जोड़ना
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.cभवo न्त ?’ का उत्तर agl
सुप्तं पदम् वह िछपा हुआ पद िजसका अध्याहार ‘शास्त्रा ण अधीत्या प के मूखाः पुस्तक का अपना शब्द (पृष्ठ 162)
करना है
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आकाङ् क्षा a
अपेिक्षत िवषय को जानने की इच्छा ‘पठ त’ सुनकर ‘कः पठ त ?’ ‘ क खण्डान्वय के प्रश्न इसी से बनते ह
पठ त ?’
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योग्यता ‘गगने पुष्पं वकस त’ — यहाँ अथ सम्भव हो, तभी अन्वय सम्भव
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दो पदों के परस्पर जुड़ने की पात्रता
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योग्यता नह
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आस त्तः (स न्न धः) पदों का िबना अन्तराल के , पास-पास ‘सः पुस्तकं पठ त’ एक ही साँस म बीच म पाँच नमेष का अन्तर पड़े तो
a g बोला जाना अन्वय टू ट जाता है
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तात्पयम् शब्द से वक्ता का अभीष्ट अथ ‘शतायुभव’ = ‘ चर ीवी भव’ अथ चूका तो अन्वय भी चूक जाता है
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पकड़ना
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कतृपदम् िक्रया करने वाला पद, पथमा िवभिक्त स ूणकुम्भः, घटः, व ान्, जनः अन्वय म प्रायः सबसे पहले
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कमपदम् िजस पर िक्रया का फल पड़े, िद्वतीया शब्दम्, घोषम्, गवम्, साट्टहासम् कता के बाद, क्रया से पहले
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िवभिक्त में
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करो त, उपै त, जल्प त, भवaन्त
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क्रयापदम् वाक्य की िक्रया दण्डान्वय म सबसे अन्त म — ‘सवान्ते
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क्रयापदं लखेत्’
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वशेषणम् — गण
ु बताने वाला पद और िजसका अधः ( वशेषण) घटः ( वशेष्य) दण्डान्वय म वशेषण पहले, वशेष्य बाद
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वशेष्यम् गण
ु बताया जाए म
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क्त्वान्त · ल्यबन्त ·
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‘त्वा’, ‘य’ और ‘तुम ्’ पत्यय वाले कृत्वा, गत्वा · अधीत्य, आगत्य · स्मृ त- ोक म इन्ह का वशेष उल्लेख
तुमुन्नन्त अव्यय-कृ दन्त
a प ठतुम्, गन्तुम् है
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 12 प र शष्टम् १ — अन्वयः AglaSem · NCERT Solutions
पद अथ उदाहरण टप्पणी
चरणः (पादः) श्लोक का चौथाई भाग ‘प्रथमचरणे क्रयापदं कम् ?’ खण्डान्वय चरण-दर-चरण चलता है
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