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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Parishisht 3 वाच्यम्

AglaSem पर कक्षा 9 संस्कृत परिशिष्ट 3 वाच्यम् (शारदा) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Appendix 3 (Sharada).
NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Parishisht 3 वाच्यम् - Page 1 of 37

About NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Parishisht 3 वाच्यम्

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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Parishisht 3 वाच्यम् – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा9

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 14: प र शष्टम् ३ — वाच्यम्

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

177 – 183 10 36 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 36 pages

Page 2

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 14: प र शष्टम् ३ — वाच्यम्
यह पृष्ठ शारदा (कक्षा ९) का प र शष्टम् ३ — वाच्यम् है — यह कोई पाठ नह , प र शष्ट (reference section) है, और पुस्तक इस पर कोई
अभ्यास नह दे ती; पृष्ठ 177 से 183 तक न कोई प्रश्न-संख्या है, न रक्त स्थान, न ‘अभ्यासाद् जायते स द्धः’ जैसा कोई खण्ड — हर ता लका दोन
ओर (कत र तथा कम ण/भावे) पूरी भरी हुई छपी है, इस लए यहाँ ‘उत्तर कहाँ ह’ यह प्रश्न ही नह उठता। यह प र शष्ट वाच्य अथात् प्रयोग सखाता है
— कत र प्रयोगः (कतृवाच्यम्), कम ण प्रयोगः (कमवाच्यम्) तथा भावे प्रयोगः (भाववाच्यम्); तीन म कता और कम कस वभ क्त म जाते ह,
क्रयापद कसका अनुसरण करता है, कत र प्रयोग क पुरुषव्यवस्था, कमवाच्य का ‘यक्’ (य) प्रत्यय तथा आत्मनेपद, और वतमानकाल · भूतकाल
(क्तवतु ↔ क्त) · व ध लङ् (तव्यत् · अनीयर्) तथा अकमक धातुओं के भावे प्रयोग क पूरी वाक्य-प रवतन ता लकाएँ। छात्र इसे परीक्षा से पहले
वाच्य दोहराने, ‘वाच्यप रवतनं कुरुत’ प्रकार के प्रश्न हल करने तथा अपना बनाया हुआ रूप जाँचने के लए काम म लेते ह। नीचे हर खण्ड का नयम,
पुस्तक क पूरी ता लका और उदाहरण का व ेषण दया गया है; साथ म स्पष्ट रूप से च ह्नत «अभ्यास के लए (स्वयं कर)» ब्लॉक भी ह — वे
पुस्तक के नह , केवल स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

शारदा (कक्षा 9) 177 – 183

खं ड प्रश्न

10 36

माध्यम

हन्द

वाच्यम् — यह प र शष्ट क्या दे ता है, और वाच्य के तीन भेद — पृष्ठ 177
‘वाच्यम् (प्रयोगः)’ — कत र प्रयोगः · कम ण प्रयोगः · भावे प्रयोगः

प र शष्ट-प रचयः

१ प र शष्टम् ३ ‘वाच्यम्’ म क्या-क्या है, और इसम अभ्यास क्य नह है?

यह प र शष्ट है, पाठ नह । शारदा के ग्यारह पाठ के बाद पाँच प र शष्ट छपे ह; यह उनम तीसरा है — पृष्ठ 177 से 183 तक, कुल
सात पृष्ठ। इसम न ोक है, न गद्यांश, न अभ्यासाद् जायते स द्धः जैसा कोई प्रश्न-खण्ड। जो भी ता लका छपी है वह दोन ओर
पूरी भरी हुई है — बाईं ओर कत र प्रयोग का वाक्य और दाईं ओर उसी का कम ण या भावे रूप। इस लए यहाँ ‘प्रश्न’ और ‘उत्तर’
का सम्बन्ध ही नह बनता; यह पूरा खण्ड पढ़ने और मलाने के लए है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

पुस्तक का पृष्ठ- म — क्र
पृष्ठ 177 — वाच्य का भे द -वृक्ष तथा कत ृवाच् यम् के तीन िनयम और उदाहरण

पृष्ठ 178 — कतिर पयोग की पुरु षव्यवस्था (मध्यम · उत्तम · पथम) तथा कमवाच् यम् के िनयम
पृष्ठ 179 — ‘यक् ’ पत्यय, आत्मने पद, तथा कतिर↔कमिण िक्रयारूपों की तीन बड़ ी तािलकाएँ

पृष्ठ 180 — वत मानकाल की दस-वाक्य पिरवतन-तािलका तथा भूत काल का िनयम

पृष्ठ 181 — भूत काल (क्तवतु ↔ क्त ) की शेष पंिक्तयाँ, त व्यत्-अनीयर् तािलका, भाववाच्य का पिरचय

पृष्ठ 182 — लट् -लकार में भावे पयोग की बारह-वाक्य तािलका तथा बीस अकमक धात ु

पृष्ठ 183 — भूत काल तथा िविधिलङ् की भावे तािलकाएँ, और अन्त में लाल रंग की समापन-िटप्पणी

अभ्यास क्य नह है: पुस्तक स्वयं पृष्ठ 183 पर कोष्ठक म लखती है — «अ स्मन् प र शष्टत्रये ोकानाम्
अन्वयक्रमाः समासाः प्रयोगाश्च इत्येते वचाराः सामान्यतया प्रद शताः स न्त। छात्राः वस्तृताध्ययनाथम् अन्यान्
ग्रन्थान् प रशीलयेयुः।» अथात् ये तीन प र शष्ट (अन्वयः, समासः, वाच्यम्) वषय को सामान्य रूप से दखाने भर
के लए ह, गहराई से पढ़ने के लए छात्र दूसरे ग्रन्थ दे ख। जहाँ पुस्तक स्वयं ‘केवल दखाया है’ कह रही हो, वहाँ
अभ्यास दे ने का प्रश्न ही नह ।

ध्यान द: इस पृष्ठ पर नीचे कुछ जगह «अभ्यास के लए (स्वयं कर)» नाम से प्रश्न दए गए ह। वे पुस्तक के नह ह
— केवल इस लए जोड़े गए ह क ता लका पढ़ लेने के बाद आप स्वयं जाँच सक। हर बार उन पर यह चेतावनी दुबारा
लखी गई है।

२ वाच्य (प्रयोग) कसे कहते ह — पुस्तक का भेद-वृक्ष क्या दखाता है?

एक ही बात तीन ढं ग से कही जा सकती है — ‘बालक ोक पढ़ता है’, ‘बालक ारा ोक पढ़ा जाता है’, ‘बालक ारा हँसा
जाता है’। इन तीन म क्रया कसके अनुसार चल रही है — यही वाच्य है, जसे संस्कृत व्याकरण म प्रयोगः भी कहते ह। पुस्तक पृष्ठ
177 के आरम्भ म ही यह वृक्ष बनाकर तीन भेद दखाती है और फर लखती है — «एता न कतृवाच्यं, कमवाच्यं, भाववाच्यं च
इत्य प कथ्यन्ते।» अथात् ‘प्रयोग’ और ‘वाच्य’ — दोन नाम एक ही वस्तु के ह।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

वाच्यम् (पयोगः)

कतिर पयोगः कमिण पयोगः भावे पयोगः
(कतृवाच्यम्) (कमवाच्यम्) (भाववाच्यम्)

पृष्ठ 177 पर छपा वाच्य (प्रयोग) का भेद-वृक्ष — तीन भेद और उनके दूसरे नाम।

तीन म अन्तर एक वाक्य म: जहाँ कता प्रधान हो वह कत र, जहाँ कम प्रधान हो वह कम ण, और जहाँ न कता
प्रधान हो न कम — केवल क्रया का भाव ही बचे — वह भावे प्रयोग है। ‘प्रधान’ क कसौट पुस्तक स्वयं दे ती है :
क्रयापद जसका अनुसरण करे वही प्रधान है। कत र म « क्रयापदं कतृपदम् अनुसर त», कम ण म « क्रयापदं
कमपदम् अनुसर त»।

हन्द से तुलना: हन्द का कतृवाच्य ‘राम पुस्तक पढ़ता है’, कमवाच्य ‘राम के ारा पुस्तक पढ़ जाती है’,
भाववाच्य ‘राम से चला नह जाता’। संस्कृत म यही तीन क्रमशः कत र, कम ण और भावे प्रयोग ह — अन्तर केवल
यह है क संस्कृत म कता क तृतीया वभ क्त ही ‘के ारा’ का काम कर दे ती है, अलग शब्द नह लगाना पड़ता।

३ तीन प्रयोग म कता, कम और क्रयापद का क्या होता है — एक तुलनात्मक ता लका द जए।

पूरा प र शष्ट इसी एक ता लका का वस्तार है। पुस्तक ने ये नयम पृष्ठ 177, 178 और 181 पर अलग-अलग बुलेट- बन्दुओं म
दए ह; उन्ह एक साथ रख दे ने पर वाच्य का पूरा ढाँचा एक दृ ष्ट म आ जाता है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम्
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बन्दु कत र प्रयोगः (कतृवाच्यम्) कम ण प्रयोगः भावे प्रयोगः

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(कमवाच्यम्) (भाववाच्यम्

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क्.त में
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कत िकस िवभि पथमा — बालकः ृ ीया — बालके न
तत ततीया — बालके न

aकमglिकस िवभिक्त में िद्वतीया — श्लोकम् पथमा — श्लोकः कम होता ही नही ं

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ि यापद िकसका अनुसरण
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क्र कत का कम का िकसी का नही ं

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करे
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ि या का पद
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अनुस ार )
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पर स्मैपद या आ त्मनेपद (धातु के सदा आ त्मनेपद सदा आ त्मनेपद

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‘य’ (यक् ) पत्यय

seसदा पथमपुरुष एकवचन
नही ं लगता लगता है — पठ् + य + ते लगता है — हस् + य + ते

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ि या का पु.रुcषo-वचन l a
क्र

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कत के अनुस ार कम के अनुस ार
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as धातुओं में
glिकन
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सकम क तथा अकम क — दोनों के वल सकम क के वल अकम क

पुस्तक का उदाहरण
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बालकः श्लोकं पठित। बालके न श्लोकः पठ ते। तैः हस्यते।

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as कसका अनुसरण करे’ वाली। कत र म कम का वचन बदल द जए,
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क्रया नह बदलेगी (बालः फलं खादaत → बालः फला न खाद त)। कम ण म कम का वचन बद लए, क्रया तुरन्त
सबसे उपयोगी पं क्त कौन-सी है: ‘ क्रयापद

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बदल जाएगी (बालकेन ोकः पठ्यते → बालकेन ोकाः पठ्यन्ते)। यही एक जाँच बता दे ती है क वाक्य कस
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प्रयोग म है।

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m धातु, तीन नह — दो प्रयोग: कसी भी धातु के तीन प्रयोग नह होते। सकमक धातु (पठ् , लख्, दृश्) के a g
a s eएक
agl कत र + कम ण; अकमक धातु (हस्, क्र ड् , शी) के कत र + भावे। पुस्तक पृष्ठ 181 पर यही कहती है —
«अकमकधातूनां प्रयोगे कमपदस्य अभावात् कत र प्रयोगः भावे प्रयोगश्च भवतः। कम ण प्रयोगः तु न भव त।»
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aे तीन नयम — पृष्ठ 177
कतृवाच्यम् — कत र प्रयोगः क
‘कत र प्रयोगे कतृवाचकं पदं प्रथमा वभक्तौ भव त। … क्रयापदं कतृपदानुगुणं भव त।’
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कतृ वाच्यम्

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कत र प्रयोग के वे तीन नयम कौन-से ह जो पुस्तक पृष्ठ 177 पर दे ती है?
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पुस्तक तीन बुलेट- बन्दुओं म पूरा कतृवाच्य कह दे ती है। ये तीन वाक्य ज्य -के-त्य नीचे ह, साथ म हन्द अथ और यह भी क
हर नयम व्यवहार म क्या करता है।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

पुस्तक का नयम (संस्कृत) हन्द अथ व्यवहार म इसका मतलब

ृ
कतिर पयोगे कतवाचकं पदं कतिर पयोग में कत का बोध कराने वाला बालक◌ः, सुनीत◌ा, आरक्षक◌ाः — कता पर कोई
‘पथमािवभक्तौ’ भवित। पद पथमा िवभिक्त में होता है। ‘ ारा’ नह , सीधा प्रथमा।

कमवाचकं पदं ‘िद्वतीयािवभक्तौ’ कम का बोध कराने वाला पद िद्वतीया ोकम्, क वत◌ाम्, चोर◌ान् — ‘कम ण तीया’ का
भवित। िवभिक्त में होता है। सीधा प्रयोग।

ृ
िक्रयापदं कतपदानु
गणु ं भवित। िक्रयापद कत के अनुरूप होता है। कता का पुरुष तथा वचन जो हो, क्रया भी उसी पुरुष-
वचन म — पठ त / पठतः / पठ न्त।

पुस्तक का िववेच न — «त ाम कत ृपदं यद्वचनयुक्तं भवित िक्रयापदमिप तद्वचनयुक्तमेव भवित।»

अथ त् — कत िजस वचन में हो, िक्रया भी उसी वचन में होती है।
कत एकवचन → िक्रया एकवचन · कत िद्ववचन → िक्रया िद्ववचन · कत बहुवचन → िक्रया बहुवचन

«कमपदे न सह तस्य कोऽिप सम्बन्धः न भवित।» — कम से िक्रया का कोई सम्बन्ध नही ं।

‘कता प्रधान है’ का यही अथ है: जस पद के बदलने पर क्रया बदल जाए, वही प्रधान है। कत र प्रयोग म क्रया
केवल कता के साथ बदलती है, कम के साथ नह — इसी लए पुस्तक पृष्ठ 178 के आरम्भ म नष्कष दे ती है : «अतः
अत्र कता प्रधानः भव त। क्रयापदं कतृपदम् अनुसर त।»

२ पुस्तक के ‘बालः चत्रं पश्य त’ और ‘बालः फलं खाद त’ वाले उदाहरण क्या सद्ध करते ह?

ये दो पं क्तयाँ एक छोटा-सा प्रयोग (experiment) ह — पहली पं क्त म केवल कता का वचन बदला गया है, दूसरी म केवल
कम का। दोन का प रणाम दे खए।

क : कता का वचन बदला — क्रया भी बदली

वचन कता (प्रथमा) कम ( तीया) क्रयापद

एकवचनम् बालः चत्रम् पश्यित

िद्ववचनम् बालौ चत्रम् पश्यतः

बहुवचनम् बालाः चत्रम् पश्यिन्त

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

ख : कम का वचन बदला — क्रया नह बदली

वचन कता (प्रथमा) कम ( तीया) क्रयापद

एकवचनम् बालः फलम् खादित

िद्ववचनम् बालः फले खादित

बहुवचनम् बालः फलािन खादित

पुस्तक की अपनी पंिक्तयाँ —

यथा — बालः िचत्रं पश्यित। बालौ िचत्रं पश्यतः। बालाः िचत्रं पश्यिन्त।

बालः फलं खादित। बालः फले खादित। बालः फलािन खादित।

«अत्र सामान्यतया पिरशीलयामः चे त ् ‘बालः’ कत , ‘फलं’ कम, ‘खादित ’ िक्रयापदम् अिस्त।»

नष्कष जो पुस्तक नकालती है: «उप र वद्यमानेषु वाक्येषु यत्र कतुः वचनप रवतनम् अभवत् तत्र क्रयापदस्या प
वचनप रवतनम् अभवत्। कमपदस्य वचनप रवतनेन क्रयापदस्य वचनप रवतनं न अभवत्।» — जहाँ कता का वचन
बदला वहाँ क्रया का भी बदला; कम का वचन बदलने से क्रया नह बदली। इसी से सद्ध होता है क कत र प्रयोग म
कता प्रधान है।

परीक्षा म इसका उपयोग: य द पूछा जाए ‘अ स्मन् वाक्ये कः प्रयोगः?’ तो कम का वचन मन-ही-मन बदलकर
दे खए। क्रया वैसी ही रही — कत र प्रयोग। क्रया भी बदल गई — कम ण प्रयोग। यह जाँच दस सेकंड म उत्तर दे
दे ती है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

३ अभ्यास के लए (स्वयं कर) — कतृवाच्य

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।

1. ‘छात्रा ग्रन्थं पठ त।’ — इसे वचन तथा बहुवचन म बद लए।
उत्तर — छात्रे ग्रन्थं पठतः। छात्राः ग्रन्थं पठ न्त। (केवल कता तथा क्रया बदले, कम ‘ग्रन्थम्’ वैसा ही रहा।)
2. ‘सै नकः शत्रुं जय त।’ — कम को बहुवचन क जए। क्रया बदलेगी या नह ?
उत्तर — सै नकः शत्रून् जय त। क्रया नह बदलेगी, क्य क कत र प्रयोग म क्रयापद कता का अनुसरण करता
है, कम का नह ।
3. इन वाक्य म कता, कम और क्रयापद अलग-अलग बताइए — ‘वानराः वृक्षान् आरोह न्त।’
उत्तर — कता — वानराः (प्रथमा बहुवचन), कम — वृक्षान् ( तीया बहुवचन), क्रयापद — आरोह न्त
(प्रथमपुरुष बहुवचन)।
4. ‘बा लका पुष्पा ण चनो त।’ म क्रयापद एकवचन म क्य है जब क ‘पुष्पा ण’ बहुवचन है?
उत्तर — क्य क क्रया कता ‘बा लका’ (एकवचन) का अनुसरण करती है; ‘पुष्पा ण’ कम है और कम से क्रया
का कोई सम्बन्ध नह — «कमपदे न सह तस्य कोऽ प सम्बन्धः न भव त।»

कत र प्रयोगे पुरुषव्यवस्था — मध्यम · उत्तम · प्रथम पुरुष — पृष्ठ 178
‘कत र प्रयोगे पुरुषव्यवस्था — प्रथमपुरुषः मध्यमपुरुषः उत्तमपुरुषः च।’

पु रु षव्यवस्था

१ मध्यमपुरुष तथा उत्तमपुरुष का नयम क्या है — पुस्तक के रंगीन उदाहरण स हत बताइए।

पुस्तक कता के सवनाम से पुरुष तय करती है, क्रया से नह । पृष्ठ 178 पर पहले मध्यमपुरुष, फर उत्तमपुरुष, अन्त म
प्रथमपुरुष — तीन के नयम और ‘यथा’ के उदाहरण छपे ह, जनम कता और क्रया दोन नीले रंग म उभारे गए ह ता क जोड़ी
दखाई दे ।

मध्यमपुरु षः — «कत ृपदं यिद ‘त्वं/युवा/ं यूयं’ भवित तिह िक्रयापदं सवदा मध्यमपुरु षस्य एकवचने /िद्ववचने /

बहुवचने भवित।»
उत्तमपुरु षः — «कत ृपदं यिद ‘अहम्/आवां/वयं’ भवित तिह िक्रयापदं सवदा उत्तमपुरु षस्य एकवचने /िद्ववचने /

बहुवचने भवित।»

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

मध्यमपुरुषः त्वं श्लोकं पठिस। युवां श्लोकं पठथः। यूयं श्लोकं पठथ।

उ त्तमपुरुषः अहं श्लोकं पठािम। आवां श्लोकं पठावः। वयं श्लोकं पठामः।

ध्यान रखने योग्य बात: कम ‘ ोकम्’ तीन पं क्तय म ज्य -का-त्य है — बदल केवल कता और क्रया रहे ह।
यही पछले खण्ड का नयम है : क्रयापद कता का अनुसरण करता है। दूसरी बात — मध्यमपुरुष के प्रत्यय स · थः
· थ ह और उत्तमपुरुष के म · वः · मः; इन्ह छह अक्षर से पुरुष पहचाना जा सकता है, चाहे धातु कोई भी हो।

अनुवाद म सावधानी: हन्द ‘तुम पढ़ते हो’ का संस्कृत ‘त्वं पठ स’ है, ‘पठ त’ नह । और ‘हम दोन पढ़ते ह’ के
लए संस्कृत म अलग वचन है — आवां पठावः। हन्द म वचन नह होता, इसी लए यही खाना सबसे अ धक
छू टता है।

२ प्रथमपुरुष का नयम क्या है — पुस्तक क बारह-वाक्य वाली ता लका पूरी द जए।

प्रथमपुरुष क प रभाषा पुस्तक ‘शेष सब’ के रूप म दे ती है — जो कता न मध्यमपुरुष का हो, न उत्तमपुरुष का, वह प्रथमपुरुष
का है। «कतृपदं य द ‘त्वं/युवा/यूयम् अथवा अहम्/आवां/वयम् एतेभ्यः भन्नं भव त त ह क्रयापदं सवदा प्रथमपुरुषस्य एकवचने/
वचने/बहुवचने भव त।»
इसका अथ है — सः, सा, तौ, ते, ताः जैसे सवनाम और युवकः, बा लका, रामः, नद्यः जैसी सब संज्ञाएँ प्रथमपुरुष म ही आती ह।
पुस्तक ने इसी को दखाने के लए चार पं क्तय × तीन वचन क यह ता लका छापी है, जसम पुं लङ्ग-स्त्री लङ्ग सवनाम और पुं लङ्ग-
स्त्री लङ्ग संज्ञा — चार प्रकार आ जाते ह।

प्रकार एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

सवनाम (पुंिलङ् ग) सः श्लोकं पठित। तौ श्लोकं पठतः। ते श्लोकं पठिन्त।

सवनाम (स्त्रीिलङ् ग) सा श्लोकं पठित। ते श्लोकं पठतः। ताः श्लोकं पठिन्त।

संज्ञा (पुंिलङ् ग) युवकः श्लोकं पठित। युवकौ श्लोकं पठतः। युवकाः श्लोकं पठिन्त।

संज्ञा (स्त्रीिलङ् ग) बािलका श्लोकं पठित। बािलके श्लोकं पठतः। बािलकाः श्लोकं पठिन्त।

ता लका यह भी सखाती है: चार पं क्तय म क्रयापद एक ही ह — पठ त · पठतः · पठ न्त। कता पुं लङ्ग हो या
स्त्री लङ्ग, सवनाम हो या संज्ञा — क्रया पर लङ्ग का कोई असर नह पड़ता, केवल वचन का पड़ता है। संस्कृत क
क्रया लङ्ग नह दे खती; यही हन्द से बड़ा भेद है ( हन्द म ‘पढ़ता है / पढ़ती है’ म लङ्ग दखता है)।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम्
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नाम का भ्रम मटाइए: संस्कृत का प्रथमपुरुष वही है जसे अंग्रेज़ी व्याकरण third person कहता है, और
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m a s em पूछे जाने पर
संस्कृत का उत्तमपुरुष अंग्रेज़ी का first person। क्रम उलटा है। परीक्षा म ‘ क्रयापदस्य पुरुषं लखत’
o अ धक अंक कटवाता है।
यही उलटफेर.cसबसे
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aपुgस्lतक क छपाई म एक चूक: प्रथमपुरुष के नयम-वाक्य म पुस्तक ‘त्वं/युवा/यूयम्’ छापती है, जब क ऊपर

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मध्यमपुरुष के नयम म उसी सवनाम का शुद्ध रूप ‘युवां’ (युवाम्) दया है। ‘युवा’ का अथ तो ‘जवान’ होता है; यहाँ

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अ भप्रेत युवाम् (तुम दोन ) ही है। साथ ही यहाँ खुला उद्धरण- चह्न (‘) बन्द नह कया गया है। हमने पुस्तक जैसा है
वैसा ही उद्धत कया है — पढ़ते समय ‘युवाम्’ सम झए।
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अभ्यास के लए (स्वयं कर) — पुरुष तथा वचन

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अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
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स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।
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1. उ चत क्रयापद चु नए — ‘यूयं ग्रामं ______ (गच्छथ / गच्छ न्त / गच्छामः)।’
उत्तर — गच्छथ। कता ‘यूयम्’ है, अतः क्रया मध्यमपुरुष बहुवचन म।
2. ‘आवां पाठं स्मरावः।’ — इसका पुरुष तथा वचन बताइए।
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उत्तर — उत्तमपुरुष, वचन। कता ‘आवाम्’ (हम दोन ) उत्तमपुरुष वचन है।
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3. ‘नद्यः सागरं गच्छ न्त।’ — यह कस पुरुष का वाक्य है और क्य ?

s e m उत्तर — प्रथमपुरुष। ‘नद्यः’ न मध्यमपुरुष का सवनाम है, न उत्तमपुरुष का — अतः पुस्तक के नयमानुसार शेष
agla सब प्रथमपुरुष म जाते ह।
4. ‘बा लके ोकं पठतः।’ म ‘पठतः’ एकवचन क्य नह है?
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उत्तर — ‘बा लके’ स्त्री लङ्ग वचन (दो बा लकाएँ) है, अतः क्रया भी प्रथमपुरुष वचन ‘पठतः’ हुई। यहाँ
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‘बा लके’ को सम्बोधन एकवचन समझ लेना आम भूल है।

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5. ‘त्वं गीतं गाय स’ को उत्तमपुरुष बहुवचन म बद लए।
उत्तर — वयं गीतं गायामः। (कता त्वम् → वयम्, क्रया गाय स → गायामः; कम ‘गीतम्’ अप रव तत।)

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कमवाच्यम् / कम ण प्रयोगः — नयम तथा ‘यक्’ प्रत्यय — पृष्ठ 178–179
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

‘कम ण प्रयोगे कतृपदं तृतीया वभक्तौ भव त। कमपदं प्रथमा वभक्तौ भव त। क्रयापदं कमपदम् अनुसर त।’

कमवाच्यम्

१ कम ण प्रयोग के नयम क्या ह — पुस्तक का पूरा ववेचन द जए।

कमवाच्य कतृवाच्य का ठ क उलटा है — जो प्रथमा म था वह तृतीया म चला जाता है, जो तीया म था वह प्रथमा म आ जाता
है, और क्रया अपना स्वामी बदल लेती है। पुस्तक पृष्ठ 178 के अन्त म तीन बुलेट- बन्दुओं म यही कहती है।

पुस्तक का नयम (संस्कृत) हन्द अथ उदाहरण

ृ ततृ ीयािवभक्तौ भवित।
कमिण पयोगे कतपदं ृ ीया िवभिक्त में होता है।
कम िण पयोग में कत तत बालक◌ेन, तय◌ा, मत्र◌ैः

कमपदं पथमािवभक्तौ भवित। कम पथमा िवभिक्त में होता है। ोक◌ः, क वत◌ा, चोर◌ाः

िक्रयापदं कमपदम् अनुस रित। िक्रयापद कम के अनुस ार चलता है। ोकः पठ्यते / ोकाः पठ्यन्ते

पुस्तक का िववेच न — «त ाम कमपदम् एकवचने भवित चे त ् िक्रयापदमिप एकवचने भवित। कमपदं िद्ववचने

चे त ् िक्रयापदमिप िद्ववचने भवित।

अत्र कतुः सम्बन्धः ि क्र यापदे न सह न भवित। कमपदस्य सम्बन्धः िक्र यापदे न सह भवित।»
अथ त् — यहाँ िक्रया का नाता कत से टू टकर कम से जुड़ जाता है; इसीिलए कमिण पयोग में कम पधान है।

कता तृतीया म ही क्य : कमवाच्य म कता वाक्य का मुख्य पद नह रह जाता; वह केवल साधन क तरह बचता है
— ‘बालक के ारा’। संस्कृत म साधन तृतीया वभ क्त से कहा जाता है, इसी लए कता तृतीया म जाता है। व्याकरण
म इसे अनुक्त कता कहते ह — जो क्रया ारा सीधे नह कहा गया।

एक झटपट जाँच: य द वाक्य म कोई पद तृतीया म हो (‐एन, ‐आ, ‐ऐः, ‐आ भः) और क्रया ‘ते / एते / अन्ते’ पर
समाप्त हो रही हो, तो प्रायः वह कम ण या भावे प्रयोग है। फर दे खए — प्रथमा म कोई कम दख रहा है तो कम ण,
नह दख रहा तो भावे।

२ कमवाच्य क क्रया कैसे बनती है — ‘यक्’ प्रत्यय तथा आत्मनेपद का नयम क्या है?

दो काम करने ह — धातु म ‘य’ जो ड़ए, और उस पर आत्मनेपद क वभ क्त लगाइए। पुस्तक का नयम है — «कम ण
प्रयोगे धातुभ्यः ‘यक्’ (य) प्रत्ययः वधीयते। ततः आत्मनेपदप्रत्ययः भव त।» तथा «कम ण प्रयोगे क्रयापदा न आत्मनेप दरूपा ण
भव न्त। वतमानकाले आख्यातप्रत्ययः ‘ त’ प्रत्ययस्य स्थाने ‘ते’ प्रत्ययः एव भव त।»

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

पुस्तक के अपने उदाहरण —

गम् + य + ते = गम्यते

पठ् + य + ते = पठ ते
िलख् + य + ते = िलख्यते

(‘यक् ’ में ‘क् ’ इत्संज्ञक है — वह लगता नही ं, के वल य जुड़ता है।)

वचन कत र (परस्मैपद) कम ण (आत्मनेपद) क्या बदला

एकवचनम् पठित पठ ते त → ते, बीच म ‘य’

िद्ववचनम् पठतः पठ ेते तः → एते

बहुवचनम् पठिन्त पठ न्ते अ न्त → अन्ते

‘य’ जुड़ने पर धातु म जो हलचल होती है: कई धातुओं म ‘य’ लगते ही स्वर बदल जाता है — यही ता लकाओं का
असली पाठ है। सम्प्रसारण — वद् → उद्यते, वच् → उच्यते। द घ — पा → पीयते, दा → द यते, नी → नीयते, गै
→ गीयते, श्रु → श्रूयते। वशेष आदे श — दृश् → दृश्यते पर ‘पश्य त’ का कम ण भी दृश्यते ही होगा, क्य क मूल
धातु दृश् है, पश् नह ।

Tip: कमवाच्य क क्रया धातु क मूल गण- वशेषता भुला दे ती है। ‘करो त’ (तना द), ‘शृणो त’ (स्वा द), ‘प्रा ो त’
(स्वा द) — तीन का कम ण रूप बना गण- वकरण के सीधे धातु + य + ते बनता है : क्रयते, ूयते, प्राप्यते।
इसी लए कमवाच्य याद करना कतृवाच्य से प्रायः आसान होता है।

३ पुस्तक क पहली कत र↔कम ण क्रयारूप-ता लका (पृष्ठ 179) पूरी द जए।

पृष्ठ 179 पर तीन ता लकाएँ ह; यह पहली है। इसम बारह जोड़े ह — नत्य व्यवहार म आने वाली सामान्य धातुए।ँ पुस्तक ने इन्ह
दो-दो स्तम्भ म छापा है; नीचे वही क्रम रखा गया है।

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ता लका १ — वतमानकाले कत र तथा कम ण क्रयापदा न (पृष्ठ 179)

कत र कम ण कत र कम ण

पठित पठ ते िपबित पीयते

िलखित िल ख्यते ददाित दीयते

खादित खाद्य ते नयित नीयते

गच्छित ग म् यते करोित िक्रयते

त्यजित त्यज्यते ृ ोित
शण ूयते

पच्ृ छित पच्ृ ते गायित गीयते

इन बारह म क्या-क्या सीखने योग्य है:

सीधे जुड़ने वाले — पठ् , लख्, खाद्, त्यज्, प्रच्छ् : धातु + य + ते। कोई प रवतन नह ।
मूल धातु लौट आती है — गच्छ त का कम ण गम्यते है, ‘गच्छ्यते’ नह ; क्य क धातु गम् है और ‘गच्छ् ’
केवल भ्वा द गण का वकरण-रूप है। यही सबसे बड़ी पहचान है क कमवाच्य म गण- वकरण हट जाता है।
द घ हो जाने वाले — पा → पीयते, दा → द यते, नी → नीयते, श्रु → ूयते, गै → गीयते। एकाच् (एक
स्वर वाली) धातुओं म यह नयम लगभग सदा चलता है।
वशेष — कृ → क्रयते (ऋ का ‘ र’)। इसे रटना ही पड़ता है, पर यह सबसे अ धक पूछा जाने वाला रूप है।

प्रयोग करके दे खए: छात्रः प्रश्नं पृच्छ त → छात्रेण प्रश्नः पृच्छ्यते। जनाः गीतं गाय न्त → जनैः गीतं गीयते। माता
दुग्धं ददा त → मात्रा दुग्धं द यते।

४ पुस्तक क दूसरी क्रयारूप-ता लका (पृष्ठ 179) पूरी द जए।

दूसरी ता लका क ठन धातुओं क है — जनम ‘य’ लगते ही स्वर या व्यञ्जन बदल जाता है, और जनम कुछ धातुएँ कत र म भी
आत्मनेपद ह।

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ता लका २ — पृष्ठ 179

कत र कम ण कत र कम ण

जानाित ज्ञ ायते आरोहित आ रुह्यते

स्मरित स्मयते पश्यित दृ श्यते

वदित/विक्त उ द्य ते/उ च्यते परीक्षते परीक्ष्यते

िक्षपित िक्षप्यते से वते से व्यते

पाप्नोित पाप्यते वन्दते वन्द्य ते

पणमित पणम् यते क्रीडित क्र ीड ते

इनमें से चार रूप बनते कै से है ं —

ज्ञा + य + ते → ज्ञायते (जानाित का ‘ना’ िवकरण हटा, मूल धात ु ज्ञा बची)

वद् + य + ते → उद्यते · वच् + य + ते → उच्यते (सम्पसारण — ‘व’ का ‘उ’)

दृ श् + य + ते → दृ श्यते (‘पश्यित’ का मूल धात ु दृ श् है, अतः कमिण में दृ श् ही लौटता है)

आ + रुह् + य + ते → आ रुह्यते (‘आरोहित’ में गुण होकर ‘ओ’ था, कमिण में मूल ‘रुह्’ लौट आया)

परीक्षते · सेवते · वन्दते — ये पहले से ‘ते’ म क्य ह: ये तीन कत र प्रयोग म भी आत्मनेपद धातुएँ ह, इस लए
कत र म भी अन्त ‘ते’ ही है। पर इनका कम ण रूप फर भी अलग है, क्य क उसम ‘य’ जुड़ता है — सेवते (वह
सेवा करता है) पर सेव्यते (उसक सेवा क जाती है)। ‘य’ का होना या न होना ही यहाँ वाच्य का एकमात्र चह्न है —
इसे ध्यान से दे खए।

एक बात जो खटकती है: इस ता लका म क्र ड त → क्र ड्यते दया गया है, जब क पृष्ठ 182 पर पुस्तक स्वयं
क्र ड त को अकमक धातुओं क सूची म रखती है और उसका भावे रूप ‘क्र ड्यते’ बनाती है। दोन बात साथ तभी
चल सकती ह जब क्र ड् को सकमक मानकर (जैसे ‘द्यूतं क्र ड त’) कम ण बनाया जाए। पुस्तक ने जैसा छापा है वैसा
ही ऊपर दया गया है; व्यवहार म क्र ड् को अकमक मानकर भावे प्रयोग करना ही सुर क्षत है।

५ पुस्तक क तीसरी क्रयारूप-ता लका (पृष्ठ 179) पूरी द जए — ये सब ‘अय’ वाली धातुए ँ क्य ह?

तीसरी ता लका पूरी क पूरी णजन्त/चुरा द धातुओं क है — जनका कत र रूप ‘‐अय त’ म समाप्त होता है। इनका कम ण
बनाने का नयम एक ही है : ‐अय त हटाइए, ‐यते लगाइए।

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ता लका ३ — पृष्ठ 179

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कत र कम ण कत र कम

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पक्षालयित पक्षाल्यते गणयित ग ण् यते

िचन्तयित िचन्त्यते रचयित र च्यते

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पालयित पाल्यते ताड ते

सूचयित सूच्यते
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पूजयित पूज्यते पाठयित पाठ ते

पूeज्m

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बोधयित बोध् यते पूजयित यते

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ag एक ही िनयम, बारह रूप —
पक्षालयित → पक्षाल् + य + ते = पक्षाल्यते
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िचन्त यित → िचन्त् + य + ते = िच न्त्यते
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ताडयित → ताड् + य + ते = ताड तेgla
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अथ त् — कतिर का ‘अयित’ कािटए, बचे हुए अंश पर सीधे ‘यते ’ जोिड़ ए।
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पाठय त और पठ त म अन्तर पक ड़ए: पठ त = वह पढ़ता है (कम ण — पठ्यते); पाठय त = वह पढ़ाता है,
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s m दूसरे से पढ़वाता है (कम ण — पाठ्यते)। ‘पाठय त’ णजन्त (प्रेरणाथक) रूप है। इसी तरह बोधय त =
eअथात्
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gl समझाता है (कम ण — बोध्यते)। एक मात्रा के फेर से अथ बदल जाता है।
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coमmपूजय त → पूज्यते दो बार छपा है — बाएँ स्तम्भ क पाँचव g l a
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emरूप दोन जगह शुद्ध है, बस एक जोड़ा दुहरा गया है; अथात् ता लका म
पुस्तक क छपाई म एक दोहराव: इस ता लका
पं क्त म और दाएँ स्तम्भ क छठ पं क्तsम।
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aglही ह। ऊपर पुस्तक जैसा है वैसा ही रखा गया है।
बारह खाने ह पर भन्न धातुएँ ग्यारह

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६ अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ‘यक्’ प्रत्यय तथा कम ण क्रयारूप

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. कम ण रूप बनाइए — भव त · नम त · हर त · वह त।
उत्तर — भूयते · नम्यते · ह्रयते · उह्यते। (हृ म ‘ऋ → र’, वह् म सम्प्रसारण ‘व → उ’।)
2. ‘गच्छ त’ का कम ण ‘गच्छ्यते’ क्य नह होता?
उत्तर — क्य क धातु गम् है; ‘गच्छ् ’ भ्वा द गण का वकरण-रूप है जो केवल कत र म आता है। कम ण म
वकरण हट जाता है, इस लए गम् + य + ते = गम्यते।
3. ‘ शक्षकः छात्रान् पाठय त।’ का कमवाच्य ल खए।
उत्तर — शक्षकेण छात्राः पाठ्यन्ते। (कता तृतीया म, कम ‘छात्राः’ प्रथमा बहुवचन म, अतः क्रया भी बहुवचन
‘पाठ्यन्ते’।)
4. ‘पठ्यते’ के वचन तथा बहुवचन रूप ल खए।
उत्तर — पठ्येते ( वचन), पठ्यन्ते (बहुवचन)। ये आत्मनेपद के प्रत्यय ह।
5. ‘सा गीतं गाय त’ को कमवाच्य म बद लए और बताइए क क्रया एकवचन म क्य रही।
उत्तर — तया गीतं गीयते। क्रया अब कम ‘गीतम्’ (एकवचन) का अनुसरण करती है, कता ‘तया’ का नह —
« क्रयापदं कमपदम् अनुसर त।»

वतमानकाले कत र तथा कम ण — दस वाक्य क ता लका — पृष्ठ 180
‘अधः वतमानकाले कत र कम ण च क तचन वाक्या न प्रदत्ता न स न्त।’

वाच्यप रवतनम्

१ पुस्तक क वतमानकाल वाली दस-वाक्य ता लका पूरी द जए (पृष्ठ 180)।

यह प र शष्ट क सबसे उपयोगी ता लका है — दस वाक्य, दोन वाच्य म, तीन पुरुष और तीन वचन मलाकर। पुस्तक इसे
‘अधः वतमानकाले कत र कम ण च क तचन वाक्या न प्रदत्ता न स न्त।’ शीषक से दे ती है।

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क्र.सं. कत र प्रयोगः / कतृवाच्यम् कम ण प्रयोगः / कमवाच्यम्

१. बालकः ोकं पठ त। बालके न श्लोकः पठ ते।

२. सा क वतां लख त। तया किवता िल ख्यते।

३. सुनीता फला न खाद त। सुनीतया फलािन खाद्यन्ते।

४. शक्षकः ग्रन्थालयं गच्छ त। िशक्षके ण ग न्थालयः ग म् यते।

५. सः दुगुणान् त्यज त। ु त्यज्यन्ते।
तेन दुग णाः

६. अहम् इक्षुरसं पबा म। मया इक्षरु सः पीयते।

७. सञ्जयः लेखनीः ददा त। स ञ्जयेन ले खन्यः दीयन्ते।

८. आरक्षकाः चोरान् नय न्त। आर क्षकै ः चोराः नीयन्ते।

९. राधा पूजां करो त। राधया पूजा िक्रयते।

१०. मत्रा ण चल त्रं पश्य न्त। िम त्र ैः चलिच्चत्र ं दृ श्यते।

पंिक्त ६ को धीरे-धीरे दे िखए —

कतिर : अहम् (पथमा) इक्षुरसम् (िद्वतीया) िपबािम (उत्तमपुरु ष एकवचन)

कत पथमा → त ृत ीया : अहम् → मया

कम िद्वतीया → पथमा : इक्षुरसम् → इक्षरु सः

िक्रया अब कम (एकवचन) के अनुसार, तथा सदा पथमपुरु ष में : िपबािम → पीयते
कमिण : मया इक्षुरसः पीयते ।

पं क्त ६ सबसे अ धक सखाती है: कत र म क्रया उत्तमपुरुष ‘ पबा म’ थी, पर कम ण म प्रथमपुरुष ‘पीयते’ हो
गई। कारण यह है क अब क्रया कम ‘इक्षुरसः’ का अनुसरण करती है, और ‘इक्षुरसः’ प्रथमपुरुष का पद है।
कमवाच्य म क्रया मध्यम या उत्तमपुरुष म तभी जाएगी जब कम स्वयं ‘त्वाम्/माम्’ जैसा पद हो — जैसे ‘सः मां
पश्य त’ → ‘तेन अहं दृश्ये’।

पं क्त ३ और ७ म वचन दे खए: ‘फला न’ तथा ‘लेखन्यः’ बहुवचन ह, इस लए क्रया भी बहुवचन म गई —
खाद्यन्ते, द यन्ते। पर पं क्त १० म कता ‘ मत्रा ण’ बहुवचन होते हुए भी कम ‘चल त्रम्’ एकवचन है, अतः क्रया
एकवचन म ही रही — दृश्यते। यही ‘ क्रयापदं कमपदम् अनुसर त’ का जी वत प्रमाण है।

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२ वाच्य-प रवतन क चरणबद्ध व ध क्या है, और क्या ये नयम सब काल म लगते ह?

हाँ, लगते ह। पुस्तक पृष्ठ 180 पर स्पष्ट कहती है — «कत र प्रयोगस्य कम ण प्रयोगस्य पूव क्ताः नयमाः वतमाना दषु सवषु
कालेषु अन्वयं प्रा ुव न्त। क्रयापदानां रूपा ण तत्तत्काले (लकारानुगुणम्) भव न्त।» अथात् वभ क्त का नयम हर लकार म वही
रहता है; बदलती केवल क्रया क शक्ल है।

वाच् य-पिरवत न के चार चरण —

चरण १ — कत पहचािनए, उसे पथमा से त ृत ीया में कीिजए। (बालकः → बालके न)

चरण २ — कम पहचािनए, उसे िद्वतीया से पथमा में कीिजए। (श्लोकम् → श्लोकः)

चरण ३ — धात ु में ‘य’ जोड़ कर आत्मने पद का पत्यय लगाइए। (पठ् + य + ते )

चरण ४ — िक्रया का वचन कम के अनुसार िमलाइए, पुरु ष सामान्यतः पथमपुरु ष। (श्लोकः → पठ ते , श्लोकाः

→ पठ न्ते )

उत्तर — बालके न श्लोकः पठ ते ।

काल / लकार कत र कम ण टप्पणी

वतमान (लट् ) बालकः ोकं पठ त। बालके न श्लोकः पठ ते। त → ते

भूत (लङ् ) बालकः ोकम् अपठत्। बालके न श्लोकः अपठ त। त् → त, आ द म ‘अ’

भिवष्यत् (ल ृट्) बालकः ोकं प ठष्य त। बालके न श्लोकः पिठष्यते। ष्य त → ष्यते

आज्ञा (लोट् ) बालकः ोकं पठतु। बालके न श्लोकः पठ ताम्। तु → ताम्

िविध (िविधिलङ् ) बालकः ोकं पठे त्। बालके न श्लोकः पठ ेत। एत् → एत

पुस्तक भूतकाल के लए लकार क्य नह , कृदन्त क्य चुनती है: पृष्ठ 180 पर लखा है — «भूतकाले लङ् -लृट्-
आद नां लकाराणां प्रयोगः भव त। तथैव कृदन्तेषु भूतकाले कत र ‘क्तवतु’ प्रत्ययस्य कम ण ‘क्त’ प्रत्ययान्तस्य च
प्रयोगः भव त।» दोन चलते ह, पर संस्कृत सा हत्य और परीक्षा — दोन म भूतकाल के लए कृदन्त (प ठतवान् /
प ठतः) अ धक प्रच लत है, इस लए पुस्तक उसी क ता लका दे ती है। ऊपर क ता लका म लङ् का रूप तुलना के
लए दया गया है।

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३ अभ्यास के लए (स्वयं कर) — वतमानकाल का वाच्य-प रवतन

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. कमवाच्य बनाइए — ‘छात्राः पाठं स्मर न्त।’
उत्तर — छात्रैः पाठः स्मयते। (कम ‘पाठः’ एकवचन है, अतः क्रया भी एकवचन।)
2. कमवाच्य बनाइए — ‘माता ओदनं पच त।’
उत्तर — मात्रा ओदनः पच्यते।
3. कतृवाच्य बनाइए — ‘तेन पुस्तका न क्र यन्ते।’
उत्तर — सः पुस्तका न क्र णा त। (तृतीया ‘तेन’ → प्रथमा ‘सः’; प्रथमा ‘पुस्तका न’ → तीया ‘पुस्तका न’ —
नपुंसक म रूप एक-सा रहता है; क्रया अब कता के अनुसार एकवचन।)
4. कमवाच्य बनाइए — ‘वयं संस्कृतं पठामः।’
उत्तर — अस्मा भः संस्कृतं पठ्यते। (‘वयम्’ का तृतीया बहुवचन ‘अस्मा भः’ है; कम ‘संस्कृतम्’ नपुंसक
एकवचन, अतः क्रया एकवचन प्रथमपुरुष।)
5. नीचे के वाक्य म भूल खो जए — ‘बालकेन ोकाः पठ्यते।’
उत्तर — क्रया गलत है। कम ‘ ोकाः’ बहुवचन है, अतः क्रया भी बहुवचन होगी — बालकेन ोकाः
पठ्यन्ते।
6. ‘सः मां पश्य त’ का कमवाच्य ल खए।
उत्तर — तेन अहं दृश्ये। (यहाँ कम ‘माम्’ था, जो प्रथमा म ‘अहम्’ हो गया; अतः क्रया उत्तमपुरुष एकवचन
‘दृश्ये’ म गई — यही वह वरल स्थ त है जसम कमवाच्य क क्रया प्रथमपुरुष म नह रहती।)

भूतकाले ‘क्तवतु’ तथा ‘क्त’ प्रत्यय का प्रयोग — पृष्ठ 180–181
‘भूतकाले कत र ‘क्तवतु’ प्रत्ययस्य कम ण ‘क्त’ प्रत्ययस्य च प्रयोगाः’

क्तवतु ↔ क्त

१ भूतकाल म कतृवाच्य और कमवाच्य कैसे बनते ह — पुस्तक का नयम क्या है?

भूतकाल म पुस्तक क्रया के स्थान पर कृदन्त लाती है। कतृवाच्य म क्तवतु प्रत्यय (‐तवान्/‐तवती/‐तवन्तः) और कमवाच्य म
क्त प्रत्यय (‐तः/‐ता/‐तम्)। दोन वशेषण क तरह चलते ह, इस लए इनका लङ्ग-वचन कसी-न- कसी पद से मलाना पड़ता है —
और यही सबसे महत्त्वपूण नयम है।

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पुस्तक का िनयम (पृष्ठ 180) —
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«तथै व कृ दन्ते ष ु भूत काले कतिर ‘क्तवतु’ पत्ययस्य कमिण ‘क्त ’ पत्ययान्तस्य च पयोगः भवित।»
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«िवशेषतः भूत काले कमिण क्त-पत्ययस्य पयोगे कमपद स्य िलङ् गं वचनं च स्पष्टं जानीयात्। यतः कमपदं
aयिस्मन् िलङ् गे, यिस्मन् वचने च भवित तिस्म ेव िलङ् गे, तिस्म ेव वचने च िक्र यापदं भवित।»

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बन्दु कत र — क्तवतु कम ण — क्त

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‐तवत् (तवान् · तवती · तवन्तः) ‐त (तः · ता · तम् · ताः · तािन)

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िकससे िलङ् ग-वचन िमले ग ा कत से कम से

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कत की िवभिक्त पथमा तत

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उदाहरण सा किवतां िलिखतवती। तया किवता िलिखता।
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‘ ल खतवती’ म ‘ती’ क्य और ‘ ल खता’ म ‘ता’ क्य : दोन जगह अन्त स्त्री लङ्ग का है, पर कारण अलग है।
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कत र ‘सा … ल खतवती’ म स्त्री लङ्ग इस लए है क कता ‘सा’ स्त्री लङ्ग है। कम ण ‘तया क वता ल खता’ म

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स्त्री लङ्ग इस लए है क कम ‘क वता’ स्त्री लङ्ग है — कता ‘तया’ का यहाँ कोई असर नह । इसी अन्तर को पुस्तक

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‘स्पष्टं जानीयात्’ कहकर रेखां कत करती है।

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agl २ भूतकाल क वह दस-वाक्य ता लका पूरी द जए (पृष्ठ 180–181)।
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यह ऊपर वाली वतमानकाल क ता लका के ठ क वही दस वाक्य ह, भूतकाल म। पुस्तक ने इसे पृष्ठ 180 पर आरम्भ कया
और पृष्ठ 181 पर पूरा कया, ता क दोन काल क तुलना सीधे हो सके।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

क्र.सं. कत र प्रयोगः / कतृवाच्यम् (क्तवतु) कम ण प्रयोगः / कमवाच्यम् (क्त)

१. बालकः ोकं प ठतवान्। बालके न श्लोकः पिठतः।

२. सा क वतां ल खतवती। तया किवता िलिखता।

३. सुनीता फला न खा दतवती। सुनीतया फलािन खािदतािन।

४. शक्षकः ग्रन्थालयं गतवान्। िशक्षके ण ग न्थालयः गतः।

५. सः दुगुणान् त्यक्तवान्। ु त्यक्ताः।
तेन दुग णाः

६. अहम् इक्षुरसं पीतवान् / पीतवती। मया इक्षरु सः पीतः।

७. सञ्जयः लेखनीः दत्तवान्। स ञ्जयेन ले खन्यः द त्त ाः।

८. आरक्षकाः चोरान् नीतवन्तः। आर क्षकै ः चोराः नीताः।

९. राधा पूजां कृतवती। राधया पूजा कृ ता।

१०. मत्रा ण चल त्रं दृष्टवन्तः। िम त्र ैः चलिच्चत्र ं दृ ष्टम्।

पं क्त ६ पर रु कए — पुस्तक ने कत र म दो रूप दए ह : पीतवान् / पीतवती। कारण यह है क कता ‘अहम्’ है,
और ‘अहम्’ पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी। कतृवाच्य का कृदन्त कता का लङ्ग लेता है, इस लए दोन रूप
सम्भव ह। पर कमवाच्य म केवल एक ही रूप है — पीतः — क्य क वहाँ लङ्ग कम ‘इक्षुरसः’ (पुं लङ्ग) से तय होता
है, बोलने वाले से नह ।

कुछ रूप जो बनाने पड़ते ह, याद नह होते: गम् → गतः (ग मतः नह ), त्यज् → त्यक्तः, दा → दत्तः, नी →
नीतः, कृ → कृतः, दृश् → दृष्टः, पा → पीतः। इन्ह से क्तवतु भी बनता है — केवल ‘वत्’ जोड़ द जए : गतवान्,
त्यक्तवान्, दत्तवान्, नीतवान्, कृतवान्, दृष्टवान्, पीतवान्।

पुस्तक क छपाई म एक चूक: पं क्त १० म कता ‘ मत्रा ण’ नपुंसक लङ्ग बहुवचन है, अतः कतृवाच्य का कृदन्त
भी नपुंसक बहुवचन ‘दृष्टव न्त’ होना चा हए; पुस्तक म ‘दृष्टवन्तः’ (पुं लङ्ग बहुवचन) छपा है। ऊपर पुस्तक जैसा है
वैसा ही रखा गया है। ध्यान रहे — कम ण वाला रूप ‘दृष्टम्’ बलकुल शुद्ध है, क्य क वहाँ लङ्ग कम ‘चल त्रम्’
(नपुंसक एकवचन) से आया है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

३ अभ्यास के लए (स्वयं कर) — भूतकाल म वाच्य-प रवतन

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. कमवाच्य बनाइए — ‘रमा पत्रं ल खतवती।’
उत्तर — रमया पत्रं ल खतम्। (कम ‘पत्रम्’ नपुंसक एकवचन है, अतः क्त-रूप भी नपुंसक एकवचन
‘ ल खतम्’।)
2. कमवाच्य बनाइए — ‘बालकाः कथाः श्रुतवन्तः।’
उत्तर — बालकैः कथाः श्रुताः। (‘कथाः’ स्त्री लङ्ग बहुवचन, अतः ‘श्रुताः’।)
3. कतृवाच्य बनाइए — ‘तेन ग्रन्थः प ठतः।’
उत्तर — सः ग्रन्थं प ठतवान्।
4. भूल सुधा रए — ‘सीतया पुष्पा ण दृष्टः।’
उत्तर — ‘पुष्पा ण’ नपुंसक बहुवचन है, अतः शुद्ध रूप — सीतया पुष्पा ण दृष्टा न।
5. ‘पीतवान्’ और ‘पीतः’ म मूल अन्तर एक वाक्य म बताइए।
उत्तर — ‘पीतवान्’ कतृवाच्य का कृदन्त है और कता का लङ्ग-वचन लेता है; ‘पीतः’ कमवाच्य का कृदन्त है और
कम का लङ्ग-वचन लेता है।

व ध लङ् -लकारः तथा ‘तव्यत्’-‘अनीयर्’ प्रत्यय — पृष्ठ 181
‘ व ध लङ् -लकारस्य अथषु एव कृदन्तेषु कम ण ‘तव्यत्’ ‘अनीयर्’ इत्येतयोः प्रयोगः भव त।’

तव्यत् · अनीयर्

१ व ध लङ् म कमवाच्य कैसे बनता है — ‘तव्यत्’ और ‘अनीयर्’ का नयम क्या है?

व ध लङ् वह लकार है जो ‘चा हए’ का अथ दे ता है — ‘महेशः आपणं गच्छे त्’ = महेश को दुकान जाना चा हए। इसका
कमवाच्य दो तरह से बन सकता है : या तो व ध लङ् का ही कम ण रूप (गम्येत), या — जो अ धक प्रच लत है — कृदन्त प्रत्यय
तव्यत् और अनीयर्।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

पुस्तक का िनयम (पृष्ठ 181) —

«िविधिलङ् -लकारस्य कतिर कमिण च पयोगाः भविन्त। िविधिलङ् -लकारस्य अथषु एव कृ दन्ते ष ु कमिण ‘त व्यत्’

‘अनीयर्’ इत्येत योः पयोगः भवित। अत्रािप ‘तव्यत्’ ‘अनीयर्’ पत्ययौ कमपद स्य िलङ् गं वचनं च अन स
ु त्ृ य

भवतः।»

गम् + तव्यत् = गन्त व्यः · गम् + अनीयर् = गमनीयः

(‘त्’ तथा ‘र्’ इत्संज्ञक है ं — जुड़ता के वल त व्य और अनीय है।)

दोन प्रत्यय एक ही अथ दे ते ह: ‘गन्तव्यः’ और ‘गमनीयः’ — दोन का अथ ‘जाना चा हए / जाने योग्य’ है।
इसी लए पुस्तक हर पं क्त म दोन रूप तरछ रेखा से अलग करके दे ती है। परीक्षा म कसी एक को लख दे ना
पयाप्त है, पर दोन जानना अच्छा रहता है, क्य क प्रश्न कभी-कभी ‘अनीयर्-प्रत्ययान्तं पदं लखत’ के रूप म आता
है।

लङ्ग-वचन का नयम वही है: ये कृदन्त भी वशेषण ह और कम के लङ्ग-वचन पर चलते ह — आपणः गन्तव्य◌ः
(पुं. एक.), मधुरं खा दतव्यम् (नपुं. एक.), वृक्षाः द्रष्टव्य◌ाः (पुं. बहु.), भगव ता प ठतव्य◌ा (स्त्री. एक.)। कता
तृतीया म ही रहता है और उसका कोई असर नह पड़ता।

२ पुस्तक क ‘तव्यत्’-‘अनीयर्’ ता लका पूरी द जए (पृष्ठ 181)।

पाँच वाक्य, पाँच अलग-अलग लङ्ग-वचन — पुस्तक ने जान-बूझकर ऐसे उदाहरण चुने ह जनम कम कभी पुं लङ्ग एकवचन,
कभी नपुंसक, कभी पुं लङ्ग बहुवचन और कभी स्त्री लङ्ग है, ता क प्रत्यय का बदलना दख जाए।

क्र.सं. कत र प्रयोगः / कतृवाच्यम् कम ण प्रयोगः / कमवाच्यम्

१. महेशः आपणं गच्छे त्। महेशेन आपणः ग न्तव्यः / गमनीयः

२. ताः मधुरं खादे युः। तािभः मध रु ं खािदतव्यम् / खादनीयम्

३. बा लका वृक्षान् पश्येत्। बािलकया वृक्षाः द ष्टव्याः / दशनीयाः

४. छात्राः स्वाध्यायं कुयुः। छात्र ैः स्वाध् यायः कतव्यः / करणीयः

५. सः भगव तां पठे त्। तेन भगवद्ग ीता पिठतव्या / पठनीया

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

पंिक्त ३ को खोलकर दे िखए —

कत : बािलका (पथमा) → बािलकया (त ृत ीया)

कम : वृक्षान् (िद्वतीया बहुवचन) → वृक्षाः (पथमा बहुवचन)

िक्रया : पश्येत ् → दृ श् + तव्यत् = द ष्ट व्याः / दृ श् + अनीयर् = दशनीयाः

पत्यय पुंिलङ् ग बहुवचन में गया, क्योंिक कम ‘वृक्षाः’ पुंिलङ् ग बहुवचन है।

‘द्रष्टव्यः’ और ‘दशनीयः’ दोन दृश् से कैसे: तव्यत् लगने पर धातु म वृ द्ध तथा स न्ध होकर दृश् → द्रष्टव्य बनता
है; अनीयर् लगने पर गुण होकर दृश् → दशनीय। इसी तरह कृ → कतव्यः (वृ द्ध) तथा करणीयः (गुण)। रूप
अलग दखते ह पर धातु एक ही है।

रोज़ क भाषा म यही प्रत्यय: ‘पठनीय’, ‘दशनीय’, ‘करणीय’, ‘वन्दनीय’, ‘माननीय’, ‘आदरणीय’ — हन्द म
हम अनीयर्-प्रत्ययान्त शब्द रोज़ बोलते ह। ‘कतव्य’, ‘गन्तव्य’, ‘वक्तव्य’, ‘मन्तव्य’ — ये तव्यत् वाले ह। अथ दोन
का एक ही है : ‘जो कया जाना चा हए’।

३ अभ्यास के लए (स्वयं कर) — तव्यत् तथा अनीयर्

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. दोन प्रत्यय से रूप बनाइए — श्रु · वद् · पूज्।
उत्तर — श्रोतव्यः / श्रवणीयः; वक्तव्यः / वचनीयः; पू जतव्यः / पूजनीयः।
2. कमवाच्य बनाइए — ‘बालकाः सत्यं वदे युः।’
उत्तर — बालकैः सत्यं वक्तव्यम् / वचनीयम्। (कम ‘सत्यम्’ नपुंसक एकवचन, अतः प्रत्यय भी नपुंसक
एकवचन।)
3. कमवाच्य बनाइए — ‘सा कथाः लखेत्।’
उत्तर — तया कथाः ले खतव्याः / लेखनीयाः।
4. भूल सुधा रए — ‘छात्रैः पाठाः प ठतव्यम्।’
उत्तर — कम ‘पाठाः’ पुं लङ्ग बहुवचन है, अतः शुद्ध रूप — छात्रैः पाठाः प ठतव्याः।
5. ‘तेन जलं पातव्यम्’ का कतृवाच्य ल खए।
उत्तर — सः जलं पबेत्।

भाववाच्यम् / भावे प्रयोगः — अकमक धातुओं का प्रयोग — पृष्ठ 181–182

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम्
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‘भावप्रधानः प्रयोगः भावे प्रयोगः। ये अकमकधातवः स न्त तेषां कत र प्रयोगाः भावे प्रयोगाश्च भव न्त।’
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भाववाच्यम्

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a s emप्रयोग कसे कहते ह, और अकमक धातु क्या होती है — पुस्तक का पूरा ववेचन द जए।
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भावे
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जहाँ न कता प्रधान हो, न कम — केवल क्रया का भावm .
s e बचे — वह भावे प्रयोग है। पुस्तक पृष्ठ 181 पर लाल शीषक ‘भावे
a ही अनुच्छेद म देती है।
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प्रयोगः / भाववाच्यम्’ के नीचे इसक पूरी प रभाषा एक

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पुस्तक का अन च्ु छे द —

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«भावपधानः पयोगः भावे पयोगः। ये अकमकधातवः सिन्त ते षां कतिर पयोगाः भावे पयोगाश्च भविन्त।
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अकमm a g
.c नाम येषां धातूनां पयोगे कमपदस्य पसिक्तः न भवित ते धातवः अकमकधातवः
s e कधातवः भविन्त।

a glaअत एव अकमकधातूनां पयोगे कमपदस्य अभावात् कतिर पयोगः भावे पयोगश्च भवतः। कमिण पयोगः त ु न
भवित।»
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धातु का
प्रकार
अथ
a g उदाहरण कौन-कौन से
प्रयोग

सकमकः धातुः
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जसके साथ ‘क्या?’ पूछा जा सके, अथात् कम पठित (क्या पढ़ ता है? — श्लोकम्)

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सम्भव हो

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अकम जसके साथ ‘क्या?’ पूछा ही न जा सके हसित (क्या हँस ता है? — कोई उ त्त र कतिर + भावे

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नही)ं

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पहचानने क सरल कसौट : क्रया के साथ ‘क्या?’ लगाकर पू छए। ‘वह पढ़ता है — क्या पढ़ता है?’ उत्तर मलता
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है, अतः पठ् सकमक। ‘वह हँसता है — क्या हँसता है?’ उत्तर नह बनता, अतः हस् अकमक। कम ही नह तो कम

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को प्रधान बनाने वाला कमवाच्य कैसे बने — इसी लए अकमक धातु का कम ण प्रयोग असम्भव है।

हन्द म भी यही होता है: ‘मुझसे चला नह जाता’, ‘ब
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ारा खेला गया’, ‘उनसे हँसा नह गया’ — इन वाक्य
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म कोई कम नह है, केवल क्रया का भाव है। यही हन्द का भाववाच्य है और संस्कृe
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का भावे प्रयोग।

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भावे प्रयोग म क्रयापद का रूप कैसा होता है — तीन नयम बताइए।
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२

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g क तरह है, पर उसका पुरुष-वचन सदा एक ही रहता है। पुस्तक तीन बन्दुओं म
भावे प्रयोग क क्रया बनती तोaकमवाच्य
यह कहती है — दो पृष्ठ 181 के अन्त म, एक पृष्ठ 182 के आरम्भ म।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

पुस्तक का नयम हन्द अथ उदाहरण

भावे पयोगे िक्रयापदानां रूपािण कमिण पयोगरूपवत् भविन्त। भावे पयोग में िक्रया के रूप कम िण पयोग जैसे ही बनते हस् + यक् + ते =
है।
ं हस्यते

भावे पयोगे िक्रयापदं सवदा पथमपुरुषस्य एकवचने एव भवित। भावे पयोग में िक्रया सदा पथमपुरुष एकवचन में ही तैः हस्यते
रहती है। (‘हस्यन्ते’ कभी
नह )

कृ दन्तेष ु यदा भावे पयोगः िक्रयते तदा क्त-तव्यत्-अनीयर्- कृ द न्त में भावे पयोग हो तो क्त, तव्यत् तथा अनीयर् के तैः ह सतम् ·
पत्ययान्तािन रूपािण सवदा नपुंस किलङ् गे पथमािवभक्तेः रूप सदा नपुंस किलङ् ग , पथमा, एकवचन में ही रहते नतकैः न ततव्यम्
एकवचने एव भविन्त। है।
ं

पुस्तक का अपना उदाहरण — हस् + यक् + ते = हस्यते ।

कमिण से भे द के वल इतना : वहाँ िक्रया कम के अनुसार बदलती थी, यहाँ बदलने के िलए कम है ही नही ं,

इसिलए िक्रया जमी हुई रहती है — पथमपुरु ष, एकवचन।

‘एकवचन म ही क्य ’ का तक: संस्कृत म क्रया का वचन उसी पद से आता है जसका वह अनुसरण करती है।
भावे प्रयोग म क्रया न कता का अनुसरण करती है (वह तृतीया म है) और न कम का (वह है ही नह )। जब अनुसरण
करने के लए कोई पद ही नह बचा, तो क्रया अपना तटस्थ रूप — प्रथमपुरुष एकवचन — ले लेती है। इसी कारण
कृदन्त भी तटस्थ लङ्ग यानी नपुंसक लङ्ग एकवचन म जाता है।

Check it yourself: ‘बालाः क्र ड न्त’ (बहुवचन) का भावे रूप ‘बालैः क्र ड्यते’ है — क्रया एकवचन म।
‘नतकाः नृत्य न्त’ का ‘नतकैः नृत्यते’ — फर एकवचन। कता चाहे जतने ह , क्रया एक ही रहेगी। यह पहचान
परीक्षा म भावे प्रयोग को तुरंत पकड़वा दे ती है।

३ लट् -लकार (वतमानकाल) म भावे प्रयोग क बारह-वाक्य ता लका पूरी द जए (पृष्ठ 182)।

बारह वाक्य, बारह अलग-अलग अकमक धातुए ँ — पुस्तक ने पृष्ठ 182 पर नीले शीषक ‘लट् -लकारे (वतमानकाले) भावे प्रयोगः’
के नीचे यह ता लका द है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

क्र.सं. कत र प्रयोगः / कतृवाच्यम् भावे प्रयोगः / भाववाच्यम्

१. ते हस न्त। तैः हस्यते।

२. बालाः उद्याने क्र ड न्त। बालै ः उ द्य ाने िक्रड ते।

३. फला न भूमौ पत न्त। फलै ः भूम ौ पत्यते।

४. वाहना न माग तष्ठ न्त। वाहनैः माग स्थीयते।

५. सा उ त्तष्ठ त। तया उ त्थीयते।

६. वृद्धः आसने उप वश त। वृ ेन आसने उपिवश्यते।

७. नतकाः नृत्य न्त। नतकै ः नत्ृ यते।

८. बा लकाः प्रयतन्ते। बािलकािभः पयत्यते।

९. शुनकः धाव त। शुनके न धाव्यते।

१०. वृक्षः वधते। वृक्षेण वृध् यते।

११. शशुः शेते। िशशुना शय्यते।

१२. रुग्णः कासते। रुग्णेन कास्यते।

चार किठन रूप कै से बने —

ितष्ठित का धात ु स्था → स्था + य + ते , ‘आ’ का ‘ई’ = स्थीयते

उित्तष्ठित = उद् + स्था → उद् + स्थ् + ई + यते = उत्थीयते

वधते का धात ु वृध ् → वृध ् + य + ते = वृध्यते (कतिर ‘वधते ’ में गुण था, यहाँ मूल ‘वृ’ लौट आया)

शेते का धात ु शी → शी + य + ते , ‘ई’ का ‘अय्’ = शय्यते

पं क्त १, ३, ७, १० को साथ दे खए: कता क्रमशः ‘ते’ (बहुवचन), ‘फलैः’ (बहुवचन), ‘नतकैः’ (बहुवचन),
‘वृक्षेण’ (एकवचन) है — पर क्रया चार म एकवचन ही है : हस्यते, पत्यते, नृत्यते, वृध्यते। यही ‘सवदा प्रथमपुरुषस्य
एकवचने एव’ नयम का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

पुस्तक क छपाई म एक चूक: पं क्त २ म भावे रूप ‘ क्रड्यते’ छपा है (ह्रस्व ‘इ’ के साथ)। शुद्ध रूप ‘क्र ड्यते’ है
— द घ ‘ई’ के साथ — और पुस्तक स्वयं पृष्ठ 179 क ता लका म ‘क्र ड्यते’ ही छापती है। ऊपर पुस्तक जैसा है
वैसा ही रखा गया है; लखते समय क्र ड्यते ही ल खए।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

पं क्त ८ पर ध्यान: ‘बा लकाः प्रयतन्ते’ म धातु ‘प्र + यत्’ है, जो कत र म भी आत्मनेपद है। इसका भावे रूप
‘प्रयत्यते’ बना — यहाँ भी ‘य’ जुड़ा है, इसी से कत र ‘प्रयतन्ते’ और भावे ‘प्रयत्यते’ का भेद पहचा नए।

४ पुस्तक कौन-सी अकमक धातुए ँ सूची म दे ती है (पृष्ठ 182)?

पृष्ठ 182 के अन्त म ‘अध्ययनाय अकमकधातूनां का नचन क्रयापदा न अत्र प्रदत्ता न स न्त।’ कहकर पुस्तक बीस
क्रयापद दो ता लकाओं म दे ती है। ध्यान द जए — हर ता लका क पहली पं क्त परस्मैपद क्रयाओं क है और दूसरी पं क्त
आत्मनेपद क्रयाओं क ।

ता लका १ — पृष्ठ 182

क्र ीडित भषित स्फु रित रोिदित भवित

शोभते मोदते वतते क म् पते स्पध ते

ता लका २ — पृष्ठ 182

िवकसित उपिवशित िवश्विसित नश्यित गजित

ल ज्जते प्लवते स्पन्दते वध ते त्वरते

क्रयापदम् हन्द अथ भावे रूप क्रयापदम् हन्द अथ भावे रूप

क्रीडित खेलता है क्र ीड ते िवकसित खलता है िवक स्यते

भषित भ कता है भष्यते उपिवशित बैठता है उपिवश्यते

स्फु रित फड़कता है, चमकता है स्फु यते िवश्विसित व ास करता है िवश्वस्यते

रोिदित रोता है रुद्य ते नश्यित नष्ट होता है नश्यते

भवित होता है भूयते गजित गरजता है ग ज्यते

शोभते शोभा पाता है शुभ्यते लज्जते लजाता है ल ज्ज्यते

मोदते प्रसन्न होता है मुद्य ते प्लवते तैरता है प्लूयते

वतते होता है, वद्यमान रहता है वृत्यते स्पन्दते स्प न्दत होता है स्पन्द्य ते

कम्पते काँपता है क म्प्यते वधते बढ़ता है वृध् यते

स्पधते स्पधा करता है स्पध् यते त्वरते जल्द करता है त्वयते

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

यह सूची क्य द गई है: क्य क भावे प्रयोग का पहला और सबसे बड़ा प्रश्न यही होता है — ‘यह धातु अकमक है
या नह ?’ य द अकमक है तो भावे बनेगा, कम ण नह । पुस्तक ये बीस क्रयापद इसी लए ‘अध्ययनाय’ (पढ़ने के
लए) दे ती है — इन्ह दे खकर छात्र दूसरी धातुओं का भी अनुमान लगा सके।

ऊपर क तीसरी ता लका के भावे रूप पुस्तक म नह ह — पुस्तक केवल क्रयापद दे ती है। उनके अथ और भावे
रूप यहाँ नयम लगाकर जोड़े गए ह, ता क सूची काम क बन जाए। पुस्तक क अपनी सूची वही है जो ऊपर क दो
ता लकाओं म है।

५ अभ्यास के लए (स्वयं कर) — भावे प्रयोग

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. भावे प्रयोग बनाइए — ‘ शशवः रोद न्त।’
उत्तर — शशु भः रुद्यते। (कता तृतीया बहुवचन म, क्रया फर भी एकवचन।)
2. भावे प्रयोग बनाइए — ‘ सहः गज त।’
उत्तर — सहेन गज्यते।
3. ‘बालकेन पठ्यते’ और ‘बालकेन हस्यते’ — दोन म क्या भेद है?
उत्तर — पहला कम ण प्रयोग है (पठ् सकमक है, वाक्य म कम छपा है — ‘पुस्तकं पठ्यते’ पूरा रूप); दूसरा
भावे प्रयोग है (हस् अकमक है, कम हो ही नह सकता)। रूप एक जैसा दखता है, भेद धातु के सकमक/
अकमक होने का है।
4. भूल सुधा रए — ‘बालकैः क्र ड्यन्ते।’
उत्तर — भावे प्रयोग म क्रया सदा एकवचन रहती है, अतः — बालकैः क्र ड्यते।
5. कतृवाच्य बनाइए — ‘तया नृत्यते।’
उत्तर — सा नृत्य त।
6. ‘मया गम्यते’ का अथ हन्द म ल खए और बताइए क यह कम ण है या भावे।
उत्तर — ‘मुझसे जाया जाता है / म जाता ँ।’ गम् धातु प्रायः अकमक है, अतः जब कोई कम न हो तो यह भावे
प्रयोग है; पर ‘मया ग्रामः गम्यते’ म कम ‘ग्रामः’ आ जाने से वही कम ण बन जाता है — जैसा पुस्तक ने पृष्ठ
180 क पं क्त ४ म कया है।

भूतकाल तथा व ध लङ् म भावे प्रयोग — दो अ न्तम ता लकाएँ — पृष्ठ 183

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम्
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‘भूतकाले कत र क्तवतुप्रत्ययान्ताः प्रयोगाः, भावे क्तप्रत्ययान्ताः प्रयोगाश्च’ · ‘कत र व ध लङ् -लकारस्य भावे ‘तव्यत्-अनीयर्’ प्रत्ययान्तयोः च

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प्रयोगाः’

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भावे कृ दन्तः

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a१ भूतकाल म भावे प्रयोग क ता लका पूरी द जए (पृष्ठ 183)।

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यहाँ कतृवाच्य म ‘क्तवतु’ है और भाववाच्य म ‘क्त’ — बलकुल कमवाच्य क तरह; अन्तर केवल यह क क्त-रूप अब कम से
नह , कसी से भी मेल नह खाता — वह सदा नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन म जमा रहता है।

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क्र.सं. कत र प्रयोगः / कतृवाच्यम् (क्तवतु) भावे प्रयोगः / भाववाच्यम् (क्त)

mते ह सतवन्तः। as e
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१. तैः हिसतम्।

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a g २. बालाः उद्याने क्र डतवन्तः। बालै ः उ द्य ाने क्रीिडतम्।

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फला न भूमौ प ततव न्त।
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३. फलै ः भूम ौ पिततम्।

m .co agl
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४. वाहना न माग स्थतव न्त। वाहनैः माग िस्थतम्।

५. सा उ तवती। agl तया उित्थतम्।

६. शशुः श यतवान्। िशशुना शियतम्।
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m अन्त दखते ह — ह सतवन्तः (पुं. बहु.), प ततव न्त (नपुं. बहु.), उ
बायाँ स्तम्भ बदलता है, दायाँ नह : कतृवाच्य म कृदन्त कता के लङ्ग-वचन पर चलता है, इस लए वहाँ चार अलग-

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तवती (स्त्री. एक.), श यतवान् (पुं.
a एक.)। पर भाववाच्य म सब कुछ एक ही रूप म — ‐तम्। यही ‘सवदा नपुंसक लङ्गे प्रथमा वभक्तेः एकवचने एव’
नयम है।
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क्तवतु क चार शक्ल एक साथ: पुa
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s एकवचन ‐तवान् · पुं लङ्ग बहुवचन ‐तवन्तः · स्त्री लङ्ग एकवचन ‐तवती ·
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नपुंसक लङ्ग बहुवचन ‐तव न्त। a
ं लङ्ग
पं क्त ३ और ४ म ‘फला न’ तथा ‘वाहना न’ नपुंसक ह, इसी लए वहाँ ‘प ततव न्त’

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और ‘ स्थतव न्त’ छपा है — इसे पृष्ठ 180 क ता लका क पं क्त १० से मलाकर दे खए, वहाँ यही मेल छू ट गया है।
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व ध लङ् म भावे प्रयोग क ता लका पूरी द जए (पृष्ठ 183)।

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प र शष्ट क अ न्तम ता लका। कतृवाच्य म व ध लङ् का क्रयापद, और भाववाच्य म ‘तव्यत्’ तथा ‘अनीयर्’ — दोन
नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन म।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

क्र.सं. कत र प्रयोगः / कतृवाच्यम् भावे प्रयोगः / भाववाच्यम्

१. नतकाः नृत्येयुः। नतकै ः निततव्यम् / नतनीयम्

२. बा लकाः प्रयतेयुः। बािलकािभः पयिततव्यम् / पयतनीयम्।

३. शुनकः धावेत्। शुनके न धािवतव्यम् / धावनीयम्।

४. वृक्षः वधत। वृक्षेण विध तव्यम् / वध नीयम्।

५. वृद्धः आसने उप वशेत्। वृ ेन आसने उपवेष्टव्यम् / उपवेशनीयम्।

६. रुग्णः कासेत। रुग्णेन कािसतव्यम् / कासनीयम्।

दायाँ स्त म्भ एक ही साँचे का है —

हर रूप का अन्त ‐त व्यम् या ‐अनीयम् है — अथ त् नपुंसकिलङ् ग, पथमा, एकवचन।

ु ना कीिजए कमवाच्य से (पृष्ठ 181) : वहाँ ‘आपणः गन्त व्यः’, ‘वृक्षाः द ष्ट व्याः’, ‘भगवद् गीता पिठत व्या’ — रूप
तल

कम के अनुसार बदलते थे ।

यहाँ बदलने के िलए कम ही नही ं, इसिलए सब कु छ ‐म् पर आकर रुक जाता है।

पं क्त ४ और ६ म कतृवाच्य क क्रया ‘त्’ पर क्य नह है: ‘वधत’ तथा ‘कासेत’ — इनम अ न्तम ‘त्’ नह है,
क्य क वृध् और कास् आत्मनेपद धातुएँ ह और आत्मनेपद म व ध लङ् का प्रथमपुरुष एकवचन ‘‐एत’ होता है
(‐एत् नह )। तुलना क जए परस्मैपद ‘धावेत्’, ‘उप वशेत्’, ‘गच्छे त्’ से, जनम ‘त्’ है।

‘उपवेष्टव्यम्’ कैसे बना: उप + वश् + तव्यत् → वश् का ‘श्’ ‘ष्’ म और ‘त्’ ‘ट् ’ म बदलकर = उपवेष्टव्यम्।
अनीयर् म यह प रवतन नह होता, वहाँ गुण होकर = उपवेशनीयम्। यही जोड़ा पृष्ठ 182 क पं क्त ६ के
‘उप वश्यते’ के साथ मलाकर याद क जए।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

३ अभ्यास के लए (स्वयं कर) — कृदन्त म भावे प्रयोग

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. भावे प्रयोग बनाइए — ‘छात्राः ह सतवन्तः।’
उत्तर — छात्रैः ह सतम्।
2. भावे प्रयोग बनाइए — ‘बा लका उप वष्टवती।’
उत्तर — बा लकया उप वष्टम्।
3. ‘तया गतम्’ का कतृवाच्य ल खए।
उत्तर — सा गतवती।
4. भूल सुधा रए — ‘बालकैः क्र डताः।’
उत्तर — भावे प्रयोग म क्त-रूप सदा नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन म रहता है, अतः — बालकैः क्र डतम्।
5. तव्यत् तथा अनीयर् से भावे रूप बनाइए — हस् · शी · नृत्।
उत्तर — ह सतव्यम् / हसनीयम्; श यतव्यम् / शयनीयम्; न ततव्यम् / नतनीयम्।
6. ‘मया स्थातव्यम्’ और ‘मया ग्रामः गन्तव्यः’ — दोन म प्रत्यय का अन्त अलग क्य है?
उत्तर — पहला भावे प्रयोग है (स्था अकमक, कम नह ), इस लए ‘‐तव्यम्’ नपुंसक एकवचन म जमा है। दूसरा
कम ण प्रयोग है, जसम कम ‘ग्रामः’ पुं लङ्ग एकवचन है, इस लए प्रत्यय भी ‘गन्तव्यः’ हो गया।

पूरे प र शष्ट का सार तथा पुस्तक क समापन- टप्पणी — पृष्ठ 183
«अ स्मन् प र शष्टत्रये … छात्राः वस्तृताध्ययनाथम् अन्यान् ग्र ान् प रशीलयेयुः।»

पु न रावृ त्तः

१ तीन वाच्य एक दृ ष्ट म — सब काल और कृदन्त क तुलनात्मक ता लका द जए।

एक ही वचार को तीन वाच्य म दे खए — पहले सकमक धातु (पठ् ) से कत र और कम ण, फर अकमक धातु (हस्) से कत र
और भावे। यह ता लका पूरे प र शष्ट का नचोड़ है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

रूप-प्रकार कत र (सकमक) कम ण कत र भावे
(अकमक)

वतमान (लट् ) बालकः ोकं पठ त। बालके न श्लोकः पठ ते। बालकः हस त। बालके न हस्यते।

भूत (कृद न्त) बालकः ोकं बालके न श्लोकः पिठतः। बालकः बालके न हिसतम्।
प ठतवान्। ह सतवान्।

िविध (िलङ् ) बालकः ोकं पठे त्। बालके न श्लोकः पिठतव्यः / बालकः हसेत्। बालके न हिसतव्यम् / हसनीयम्
पठनीयः

कत की िवभिक्त पथमा ृ ीया
तत पथमा ृ ीया
तत

कम की िवभिक्त िद्वतीया पथमा कम है ही नही ं

ि या िकसके
क्र कत के कम के कत के िकसी के नही ं — सदा प.पु.
अनुसार एकवचन

कृद न्त का िलङ् ग- कत जैस ा कम जैस ा कत जैस ा सदा नपुंस क , पथमा, एकवचन
वचन

पूरे प र शष्ट का एक-पं क्त सार: « जसका पद प्रथमा म है, क्रया उसी का अनुसरण करती है — और य द प्रथमा
म कोई है ही नह , तो क्रया एकवचन म जम जाती है।» इस एक वाक्य से तीन वाच्य क क्रया का रूप नकाला जा
सकता है।

२ वाच्य पहचानने और बदलने म छात्र कौन-सी भूल सबसे अ धक करते ह?

ये छह भूल अ धकांश अंक कटवाती ह। हर एक के साथ सही रूप और उसका कारण दया गया है।

अशुद्ध शुद्ध कारण

बालके न श्लोकाः पठ ते। बालके न श्लोकाः पठ न्ते। कम बहुवचन है, अतः क्रया भी बहुवचन — « क्रयापदं कमपदम् अनुसर त।»

बालकै ः हस्यन्ते। बालकै ः हस्यते। भावे प्रयोग म क्रया सदा एकवचन।

बालके न ग न्थः गच् ते। बालके न ग न्थालयः ग म् यते। कम ण म गण- वकरण ‘गच्छ् ’ हट जाता है, मूल धातु ‘गम्’ लौटती है।

तया किवता िलिखतः। तया किवता िलिखता। क्त-प्रत्यय कम ‘क वता’ (स्त्री लङ्ग) का लङ्ग लेता है, कता का नह ।

बालकः श्लोकः पठ ते। बालके न श्लोकः पठ ते। कम ण म कता तृतीया म जाता है, प्रथमा म नह रहता।

छात्रैः पाठाः पिठतव्यम्। छात्र ैः पाठाः पिठतव्याः। तव्यत् भी कम के लङ्ग-वचन पर चलता है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

Check it yourself — तीन सेकंड क जाँच: वाक्य म दे खए क (क) कोई पद तृतीया म है क्या, (ख) क्रया
‘ते/एते/अन्ते’ पर समाप्त हो रही है क्या, (ग) प्रथमा म कोई कम है क्या। तीन का उत्तर हाँ → कम ण। (क) और
(ख) हाँ पर (ग) नह → भावे। तृतीया नह , कता प्रथमा म → कत र।

३ पृष्ठ 183 के अन्त म लाल रंग म छपी टप्पणी क्या कहती है, और वह क्य महत्त्वपूण है?

यह पूरे प र शष्ट-खण्ड क समापन- टप्पणी है — यह केवल ‘वाच्यम्’ पर नह , तीन प र शष्ट (प र शष्टम् १ अन्वयः, प र शष्टम्
२ समासः, प र शष्टम् ३ वाच्यम्) पर एक साथ लागू होती है। पुस्तक इसे कोष्ठक म, लाल रंग म, पृष्ठ 183 के अन्त म छापती है।

पुस्तक का मूल पाठ —

«(अिस्मन् पिरिशष्ट त्रये श्लोकानाम् अन्वयक्रमाः समासाः पयोगाश्च इत्येते िवचाराः सामान्यतया पदिशताः सिन्त।
छात्राः िवस्त ृत ाध्ययनाथ म् अन्यान् गन्थान् पिरशीलयेयःु ।)»

पद अथ

अिस्मन् पिरिशष्टत्रये इन तीन पिरिशष्टों में

श्लोकानाम् अन्वयक्रमाः श्लोकों के अन्वय-क्रम (पिरिशष्ट १)

समासाः समास (पिरिशष्ट २)

पयोगाः च तथा पयोग अथ त् वाच्य (पिरिशष्ट ३)

इत्येते िवचाराः सामान्यतया पदिशताः सिन्त — ये िवषय सामान्य रूप से (संक्षेप में) िदखाए भर गए है ं

छात्राः िवस्ततृ ाध्ययनाथम् अन्यान् ग न्थान् पिरशीलयेयःु ृ अध् ययन के िलए अन्य ग न्थों का पिरशीलन करे ं
छात्र िवस्तत

हन्द अनुवाद — «इन तीन प र शष्ट म ोक के अन्वय-क्रम, समास तथा प्रयोग (वाच्य) — ये वषय सामान्य रूप से ही दखाए
गए ह। छात्र वस्तृत अध्ययन के लए अन्य ग्रन्थ का प रशीलन कर।»

यह टप्पणी क्या तय कर दे ती है: तीन बात। एक — ये प र शष्ट पाठ नह , सन्दभ-सामग्री ह; इसी लए इनम कोई
अभ्यास नह दया गया। दो — यहाँ जो दया है वह स ूण नह है; ‘सामान्यतया प्रद शताः’ का सीधा अथ है
‘केवल नमूने के तौर पर’। जैसे वाच्य म लोट् , लृट् और लङ् लकार के कम ण रूप यहाँ नह दए गए। तीन — पुस्तक
स्वयं आगे पढ़ने को कहती है; ‘प रशीलयेयुः’ व ध लङ् का रूप है, अथात् यह सलाह है, आदे श नह ।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम्
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व्याकरण-दृ ष्ट से टप्पणी: ‘प र शष्टत्रये’
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गु समास (प र शष्टानां त्रयम्) का सप्तमी एकवचन है।
m युः’ प र +
‘ वस्तृताध्ययनाथम्’ म ‘अथम्’ के कारण चतुथ का भाव है — वस्तृत अध्ययन के लए। और ‘पeरशीलये
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शील् धातु का.cवo ध लङ् प्रथमपुरुष बहुवचन है — ठ क वही लकार जसका वाच्य-प रवतन
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४ अभ्यास के लए (स्वयं कर) — म त पुनरावृ त्त

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अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ३ पर शारदा कोई अभ्यासm .
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s m का नाम बताइए — (क) ‘मया पत्रं लख्यते।’ (ख) ‘तैः हस्यते।’ (ग) ‘सः पत्रं लख त।’
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a उत्तर — (क) कम ण प्रयोग (कम ‘पत्रम्’ प्रथमा म है)। (ख) भावे प्रयोग (कोई कम नह , हस् अकमक)। (ग)
कत र प्रयोग (कता प्रथमा म, कम तीया म)।
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2. ‘अध्यापकः छात्रान् पाठय त।’ के कमवाच्य तथा भूतकाल के कतृवाच्य — दोन रूप ल खए।
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उत्तर — कमवाच्य — अध्यापकेन छात्राः पाठ्यन्ते। भूतकाल कतृवाच्य — अध्यापकः छात्रान् पा ठतवान्।
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3. एक ही वाक्य को तीन काल के कमवाच्य म ल खए — ‘सा कथां लख त।’

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उत्तर — वतमान — तया कथा लख्यते। भूत (क्त) — तया कथा ल खता। व ध (तव्यत्/अनीयर्) — तया

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कथा ले खतव्या / लेखनीया।

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4. बताइए क इनम से कन धातुओं का कम ण प्रयोग नह हो सकता — पठ् · हस् · लख् · शी · दृश् · कास्।
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m भावे। पठ् , लख् तथा दृश् सकमक ह। ag नह होता, केवल कत र और
c — हस्, शी तथा कास् — ये तीन अकमक ह, अतः इनका कम ण प्रयोग
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ag 5. ‘वृद्धेन आसने उप वश्यते’ तथा ‘वृद्धेन आसने उपवेष्टव्यम्’ — दोन म काल/अथ का क्या भेद है?

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coपरmबैठना चा हए’। l a
उत्तर — पहला लट् -लकार का भावे प्रयोग है — ‘वृद्ध आसन पर बैठता है’। दूसरा व ध लङ् के अथ म तव्यत्-
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प्रत्ययान्त भावे प्रयोग है — ‘वृद्ध को आसन
6. नम्न ल खत म भूल खोजकर सुधaा sरए
उत्तर — कम ‘चल त्रम्’ a g l — ‘ मत्रैः चल त्रं दृश्यन्ते।’
नपुंसक एकवचन है, अतः क्रया भी एकवचन होगी — मत्रैः चल त्रं दृश्यते।

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(यही पुस्तक ने पृष्ठ 180 क पं क्त १० म छापा है।)

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7. ‘ शशुः शेते’ का भावे प्रयोग तीन रूप म ल खए — वतमान, भूत तथा व ध।

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उत्तर — वतमान — शशुना शय्यते। भूत — शशुना श यतम्। व ध — शशुना श यतव्यम् / शयनीयम्।
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अध्याय — एक नज़र म
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agका तीसरा प र शष्ट है (पृष्ठ 177–183)। प र शष्ट पाठ नह होता — उसम न
यह क्या है — ‘वाच्यम्’ शारदा ोक होते ह, न
कथा, न प्रश्न-खण्ड। यहाँ केवल नयम और भरी हुई ता लकाएँ ह, जन्ह दे खकर छात्र अपना बनाया हुआ वाक्य मलाता है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

पृष्ठ 183 के अन्त म पुस्तक स्वयं लाल रंग म लखती है क इन तीन प र शष्ट म वचार ‘सामान्यतया प्रद शताः’ ह।
वाच्य का अथ — वाक्य म क्रया कसके अनुसार चलती है — कता के, कम के, या केवल भाव ( क्रया-मात्र) के — यही
वाच्य या प्रयोग है। पुस्तक पहले ही पृष्ठ पर वृक्ष बनाकर तीन भेद दखाती है : कत र प्रयोगः · कम ण प्रयोगः · भावे
प्रयोगः, और कहती है — ‘एता न कतृवाच्यं, कमवाच्यं, भाववाच्यं च इत्य प कथ्यन्ते।’
तीन नयम-जोड़े — पूरा प र शष्ट वस्तुतः तीन जोड़ी नयम पर टका है। कत र — कता प्रथमा म, कम तीया म, क्रया
कता के अनुसार। कम ण — कता तृतीया म, कम प्रथमा म, क्रया कम के अनुसार। भावे — कता तृतीया म, कम होता ही
नह , क्रया सदा प्रथमपुरुष एकवचन म। यही तीन पं क्तयाँ याद कर लेने पर बाक सब ता लकाएँ केवल अभ्यास ह।
कत र प्रयोग क पुरुषव्यवस्था — पृष्ठ 178 पर पुस्तक रंग से दखाती है क कता ‘त्वम्/युवाम्/यूयम्’ हो तो क्रया
मध्यमपुरुष म, ‘अहम्/आवाम्/वयम्’ हो तो उत्तमपुरुष म, और इनसे भन्न कुछ भी हो (सः, सा, युवकः, बा लका, नामवाचक
संज्ञा) तो प्रथमपुरुष म जाती है। संस्कृत म ‘प्रथमपुरुष’ वही है जसे अंग्रेज़ी म third person कहते ह — यह भेद परीक्षा म
बार-बार भूला जाता है।
कमवाच्य कैसे बनता है — पृष्ठ 178–179 पर नयम है — ‘कम ण प्रयोगे धातुभ्यः यक् (य) प्रत्ययः वधीयते। ततः
आत्मनेपदप्रत्ययः भव त।’ अथात् धातु म य जो ड़ए और उस पर आत्मनेपद क वभ क्त लगाइए : गम् + य + ते = गम्यते,
पठ् + य + ते = पठ्यते, लख् + य + ते = लख्यते। वतमानकाल म परस्मैपद का ‘ त’ हटकर ‘ते’ आ जाता है — यही सबसे
छोट पहचान है।
भूतकाल और व ध लङ् म कृदन्त — भूतकाल म पुस्तक लकार के बदले कृदन्त पसंद करती है : कत र म क्तवतु
(प ठतवान्, ल खतवती, गतवान्) और कम ण म क्त (प ठतः, ल खता, गतः)। व ध लङ् (‘चा हए’ वाले अथ) म कम ण हेतु
तव्यत् और अनीयर् — गन्तव्यः/गमनीयः, कतव्यः/करणीयः। दोन ही जगह प्रत्यय कमपद के लङ्ग-वचन का अनुसरण
करते ह, कता का नह ।
भाववाच्य केवल अकमक धातुओं का — पृष्ठ 181–182 पर पुस्तक स्पष्ट कहती है — जन धातुओं म कम क सम्भावना
ही नह (हस्, क्र ड् , पत्, स्था, धाव्, शी, कास्…) वे अकमक ह; उनका कम ण प्रयोग होता ही नह , कत र और भावे — दो ही
होते ह। भावे म क्रया सदा प्रथमपुरुष एकवचन म रहती है और कृदन्त सदा नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन म : तैः हस्यते,
तैः ह सतम्, नतकैः न ततव्यम्।
पुस्तक का क्रम — पृष्ठ 177 भेद-वृक्ष तथा कतृवाच्य; पृष्ठ 178 पुरुषव्यवस्था तथा कमवाच्य के नयम; पृष्ठ 179 यक्-प्रत्यय
तथा छत्तीस जोड़ क तीन क्रयारूप-ता लकाएँ; पृष्ठ 180 वतमानकाल क दस-वाक्य ता लका तथा भूतकाल का आरम्भ; पृष्ठ
181 भूतकाल क शेष पं क्तयाँ, तव्यत्-अनीयर् ता लका तथा भाववाच्य का प रचय; पृष्ठ 182 लट् -लकार क बारह-वाक्य
भावे ता लका तथा बीस अकमक धातु; पृष्ठ 183 भूतकाल तथा व ध लङ् क भावे ता लकाएँ और लाल रंग क समापन-
टप्पणी।
इसका उपयोग कैसे कर — ता लकाएँ रटने के बजाय एक ही वाक्य को तीन प्रयोग म लखकर दे खए — ‘बालकः ोकं
पठ त’ → ‘बालकेन ोकः पठ्यते’; ‘बालकः हस त’ → ‘बालकेन हस्यते’। पहले कता क वभ क्त बद लए, फर कम क ,
अन्त म क्रया का रूप — इसी क्रम म। नीचे हर खण्ड के अन्त म इसी व ध का स्वयं-अभ्यास उत्तर स हत दया गया है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 14 प र शष्टम् ३ — वाच्यम् AglaSem · NCERT Solutions

त्व रत पुनरावृ त्त

पद अथ उदाहरण टप्पणी

वाच्यम् / प्रयोगः वाक्य में िक्रया िकसके अनुस ार चले कत र · कम ण · भावे पृष्ठ 177 का भेद-वृक्ष यही तीन भेद दखाता
— यही व्यवस्था है

कत र प्रयोगः / कत पधान; िक्रया कत का अनुस रण बालकः ोकं पठ त। कता प्रथमा म, कम तीया म
कतृवाच्यम् करती है

कम ण प्रयोगः / कम पधान; िक्रया कम का अनुस रण बालकेन ोकः पठ्यते। कता तृतीया म, कम प्रथमा म
कमवाच्यम् करती है

भावे प्रयोगः / भाव (िक्रया-मात्र) पधान; कम होता ही तैः हस्यते। क्रया सदा प्रथमपुरुष एकवचन
भाववाच्यम् नही ं

कता जो िक्रया करे बालकः, सुनीता, आरक्षकाः कत र म प्रथमा, कम ण तथा भावे म तृतीया

कम िजस पर िक्रया का फल पड़े ोकम्, क वताम्, फला न कत र म तीया, कम ण म प्रथमा

यक् (य) प्रत्ययः कमवाच्य तथा भाववाच्य बनाने वाला गम् + य + ते = गम्यते ‘क्’ इत्संज्ञक है, केवल ‘य’ जुड़ता है
पत्यय

आत्मनेपदम् ‘ते, एते, अन्ते’ वाली पत्यय- ेणी पठ्यते, लख्यते, द यते कम ण तथा भावे म धातु सदा आत्मनेपद हो
जाती है

सकमकः धातुः िजसका कम हो सकता है पठ् , लख्, खाद्, दृश् इन्ह के तीन नह , दो — कत र तथा कम ण
— प्रयोग होते ह

अकमकः धातुः िजसमें कम की पसिक्त ही न हो हस्, क्र ड् , पत्, स्था, शी इनका कत र तथा भावे — केवल दो प्रयोग

क्तवतु प्रत्ययः ृ
भूतकाल का कतवाच्य कृ दन्त प ठतवान्, ल खतवती, कता के लङ्ग-वचन के अनुसार चलता है
गतवान्

क्त प्रत्ययः भूतकाल का कमवाच्य/भाववाच्य कृ दन्त प ठतः, ल खता, कमपद के लङ्ग-वचन के अनुसार चलता है
खा दता न

तव्यत् प्रत्ययः ‘करना चािहए’ अथ का कमवाच्य गन्तव्यः, कतव्यः, प ठतव्या व ध लङ् के अथ म प्रयुक्त
कृ दन्त

अनीयर् प्रत्ययः तव्यत् का ही समानाथ दू स रा पत्यय गमनीयः, करणीयः, ‘र्’ इत्संज्ञक; केवल ‘अनीय’ जुड़ता है
पठनीया

पुरुषव्यवस्था िक्रया का पुरुष कत के अनुस ार तय त्वं पठ स · अहं पठा म · संस्कृत का ‘प्रथमपुरुष’ = अंग्रेज़ी का third
होना सः पठ त person

कत र तृतीया कमवाच्य/भाववाच्य में कत की िवभिक्त बालकेन, तया, मत्रैः इसे ‘अनुक्त कता’ भी कहते ह

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages37
Updated19 Sep 2026