Page 1
F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा9
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 15: प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
184 – 198 9 32 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 44 pages
Page 2
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 15: प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
यह पृष्ठ शारदा (कक्षा ९) का प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण है — यह कोई पाठ नह , प र शष्ट (reference section) है, और पुस्तक इस पर
कोई अभ्यास नह दे ती; यहाँ केवल शब्दरूप क ता लकाएँ छपी ह, दोन ओर पूरी भरी हुई, इस लए ‘उत्तर कहाँ ह’ ऐसा प्रश्न ही नह उठता। पृष्ठ
184 से 198 तक पुस्तक अ ाईस व्यञ्जनान्त (हलन्त) शब्द के पूरे रूप दे ती है — पुं लङ्ग म ब्रह्मन्, गु णन्, प थन्, वद्वस्, चन्द्रमस्, वेधस्, पुंस्,
सुहृद्, व णज्, भषज्; स्त्री लङ्ग म वाच्, त्वच्, स्रज्, रुज्, स रत्, वद्युत्, दव्, दश्; नपुंसक लङ्ग म जगत्, नामन्, कमन्, चमन्, मनस्, तपस्, पयस्,
शरस्, छन्दस्, चक्षुष् — और अन्त म सुप्-प्रत्यय क ता लका। छात्र इसे परीक्षा से पहले रूपावली दोहराने, अपने लखे रूप क जाँच करने तथा
कसी नए हलन्त शब्द का रूप अनुमान से बनाने के लए काम म लेते ह। नीचे हर शब्द का नयम, उसक पहचान, पुस्तक क पूरी ता लका और
प्रयोग-वाक्य दए गए ह; साथ म स्पष्ट रूप से च ह्नत «अभ्यास के लए (स्वयं कर)» ब्लॉक भी ह — वे पुस्तक के नह , स्वयं जाँच के लए यहाँ
जोड़े गए ह।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
शारदा (कक्षा 9) 184 – 198
खं ड प्रश्न
9 32
माध्यम
हन्द
शब्दरूपा ण — यह प र शष्ट क्या दे ता है — पृष्ठ 184
प र शष्ट का स्वरूप, उसम छपे 28 शब्द तथा ता लका पढ़ने क व ध
प र शष्ट-प रचयः
१ प र शष्टम् ४ ‘शब्दरूपा ण’ म क्या है, और इसम अभ्यास क्य नह है?
सीधा उत्तर — पृष्ठ 184 से 198 तक शारदा केवल शब्दरूप क ता लकाएँ छापती है — अ ाईस व्यञ्जनान्त (हलन्त) शब्द के
पूरे रूप और अन्त म सुप्-प्रत्यय क ता लका। यह पाठ नह , प र शष्ट है; इसम न ोक ह, न कथा, न ‘अभ्यासाद् जायते स द्धः’
जैसा प्रश्न-खण्ड। हर ता लका दोन ओर से पूरी भरी हुई छपी है, इस लए यहाँ हल करने को कुछ बचता ही नह — उत्तर लुप्त नह
ह, प्रश्न ही नह ह।
पुस्तक स्वयं क्या कहती है — पछले प र शष्ट के अन्त म (पृष्ठ 183) पुस्तक लखती है — ‘अ स्मन् प र शष्टत्रये … इत्येते वचाराः
सामान्यतया प्रद शताः स न्त। छात्राः वस्तृताध्ययनाथम् अन्यान् ग्रन्थान् प रशीलयेयुः।’ अथात् प र शष्ट केवल संकेत दे ते ह, वस्तार
के लए व्याकरण-ग्रन्थ दे खने चा हए।
प र शष्ट म क्या-क्या छपा है —
Page 1 of 44
Page 3
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
पृष्ठ लङ्ग शब्दाः (कारान्त-स हत)
184–185 पुंिलङ् गम् बह्मन् · ग िु णन् · पिथन् (सब ‘न्’ कारान्त)
185–187 पुंिलङ् गम् िवद्वस ् · चन्द मस् · वेध स् · पुंस ् (सब ‘स्’ कारान्त)
187–188 पुंिलङ् गम् सुहृ द् (‘द् ’) · विणज् · िभषज् (‘ज्’)
189–190 स्त्रीिलङ् गम् वाच् · त्वच् (‘च्’) · स्रज् · रुज् (‘ज्’)
191–192 स्त्रीिलङ् गम् सिरत् · िव तु ् (‘त्’) · िदव् (‘व्’) · िदश् (‘श्’)
193–194 नपुंस किलङ् गम् जगत् (‘त्’) · नामन् · कम न् · चम न् (‘न्’)
195–197 नपुंस किलङ् गम् मनस् · तपस् · पयस् · िशरस् · छन्दस् (‘स्’) · च षु ् (‘ष्’)
198 तीनों िलङ् ग सुप-् पत्ययाः — िवभिक्त के मूल इक्कीस पत्यय
यहाँ केवल हलन्त शब्द क्य : अजन्त (स्वरान्त) शब्द — बालक, लता, मु न, नद , साधु, धेनु, पतृ, फल — कक्षा
६, ७ और ८ म पढ़े जा चुके ह। उनका साँचा सरल है। क ठनाई व्यञ्जनान्त शब्द म आती है, क्य क उनम अङ्ग
स्वयं बदलता है (ब्रह्मन् → ब्रह्मा / ब्रह्माण् / ब्रह्मण् / ब्रह्म) और पदान्त व्यञ्जन भी बदलता है (वाच् → वाग् /
वाक्)। इसी लए कक्षा ९ का प र शष्ट पूरा-का-पूरा इन्ह को दे ता है।
ता लका कैसे पढ़ — हर ता लका म बायाँ स्तम्भ वभ क्त का है और तीन स्तम्भ एकवचन, द्ववचन, बहुवचन के। सात
वभ क्तय के बाद आठव पं क्त सम्बोधनम् क है। एक खाने म य द अल्प वराम से दो रूप छपे ह (जैसे ‘वाग्, वाक्’ या ‘मनःसु,
मनस्सु’) तो दोन शुद्ध ह — परीक्षा म कोई एक लखना पयाप्त है।
एक सूत्र जो पूरा प र शष्ट खोल दे ता है: हलन्त शब्द का अङ्ग तीन रूप लेता है — बलवत् (प्रथमा तीन वचन +
द्वतीया एक./ द्व.), मध्यम (भ्याम्, भस्, भ्यस्, सु से पहले) और दुबल (शेष स्वरा द प्रत्यय से पहले)। नीचे हर
ता लका के ऊपर यही तीन अङ्ग अलग से दए गए ह — उन्ह दे ख लेने के बाद चौबीस खाने अपने आप बन जाते ह।
२ कसी नए हलन्त शब्द का रूप बनाना हो तो कस ता लका के साँचे पर चल?
व ध तीन चरण क है — (क) शब्द का अ न्तम वण दे खए, (ख) उसका लङ्ग दे खए, (ग) उसी कारान्त- लङ्ग वाली ता लका का
साँचा लगाइए। प र शष्ट म जो अ ाईस शब्द छपे ह, वे उदाहरण-मात्र ह; उनके साँचे पर सैकड़ शब्द चलते ह।
Page 2 of 44
Page 4
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
नया शब्द कस साँचे पर क्य नमूना रूप
आत्मन् (पुं.) बह्मन् ‘न्’ कारान्त पुंिलङ् ग , अन् वाला आ त्म ा, आ त्म ानौ, आ त्म ानः
राजन् (पुं.) बह्मन् वही साँचा; दुबल अङ् ग रा ् राजा, राजानौ, रा ः
धिनन्, बिलन् (पुं.) ग िु णन् ‘इन्’ पत्ययान्त धनी, धिननौ, धिननः
िवपद् , आपद् (स्त्री.) सिरत् पदान्त द् /त् वाला स्त्र ीिलङ् ग िवपद् /िवपत्, िवपदौ, िवपदः
मरुत् (पु.ं ) िव तु ् (िलङ् ग -भेद सिहत) ‘त्’ कारान्त म रुत्, म रुतौ, म रुतः
यशस्, वयस्, वचस् (नपुं.) तपस् / मनस् ‘अस्’ अन्त वाला नपुंस क यशः, यशसी, यशांिस
धनुष,् हिवष् (नपुं.) च षु ् ‘उस्/इस्’ अन्त वाला नपुंस क धनुः, धनुषी, धनूंिष
वमन्, चमन्, जन्मन् (नपुं.) कम न् ‘मन्’ अन्त वाला नपुंस क वम , वम णी, वम िण
क्य यह काम करता है: संस्कृत म रूप शब्द- वशेष का नह , अङ्ग-वग का होता है। ‘ब्रह्मन्’ और ‘आत्मन्’ म जो
साझा है वह अ न्तम ‘अन्’ है — इस लए दोन का व्यवहार एक। जहाँ धातु- नष्पन्न वशेषता हो (जैसे राजन् का
दुबल अङ्ग ‘राज्ञ्’, प थन् का ‘पथ्’) वह भेद पड़ता है, और वही याद रखने योग्य है।
अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।
1. ‘आत्मन्’ शब्द का तृतीया एकवचन तथा सप्तमी बहुवचन ल खए।
उत्तर — आत्मना; आत्मसु (ब्रह्मन् के साँचे पर — दुबल अङ्ग आत्मन्/आत्मन्, मध्यम आत्म-)।
2. ‘यशस्’ (नपुं.) का प्रथमा बहुवचन क्या होगा?
उत्तर — यशां स (तपस् → तपां स के समान — नुम् आगम तथा द घ)।
3. ‘ वपद्’ (स्त्री.) का प्रथमा एकवचन दोन रूप म ल खए।
उत्तर — वपद्, वपत् (जश्त्व से द्, चत्व से त्)।
4. नीचे दए शब्द को उनके साँचे से मलाइए — (क) ध नन् (ख) वचस् (ग) मरुत् (घ) राजन्।
उत्तर — (क) गु णन् (ख) मनस्/तपस् (ग) वद्युत् — ‘त्’ कारान्त साँचा (घ) ब्रह्मन्।
सुप-् प्रत्ययाः — वभ क्त के मूल प्रत्यय — पृष्ठ 198
Page 3 of 44
Page 5
as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
a g l AglaSem · NCERT Solutions
पुस्तक क अ न्तम ता लका : वे इक्क स प्रत्यय जनसे हर शब्दरूप बनता है
co m
em.
m as
सु प् - प्रत्ययाः
.co a g l
a s eपm
gl
‘सु ्’ कसे कहते ह और पुस्तक क यह अ न्तम ता लका क्या बताती है?
a
१
o m
c ag
सीधा उत्तर — प्रा तप दक (मूल शब्द) के आगे लगकर उसेm .
s e वाक्य-योग्य पद बनाने वाले इक्क स प्रत्यय के समूह को सुप् कहते ह।
नाम इसी से बना है — पहला प्रत्यय सु, अ न्तम सुपl्;a‘सु’ से ‘प्’ तक = सुप्। जस शब्द म ये लगते ह वह सुबन्त कहलाता है। सात
वभ क्तयाँ × तीन वचन = इक्क स प्रत्यय। a
g
co m
m.
सुप्-प्रत्ययाः (पुं लङ्गे स्त्री लङ्गे नपुंसक लङ्गे च) — पृष्ठ 198
m a e
sबहुवचनम्
.co ag l
m
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम्
l a se
a g पथमा सु औ जस्
a s
com
िद्वतीया अम् औट् शस्
m . agl
ase
तत टा भ्याम् िभस्
चतुथ ङे agl भ्याम् भ्यस्
भ्याम्
co
भ्यस् m
.
पञ्चमी ङिस
se आम्m
m l a
.co ag
षष्ठी ङस् ओस्
a s eसm
g l
प्तमी िङ ओस् सुप ्
a
se m
m
जस् का स् इत् है, ङे का ङ् , ङ स/ङस् का ङ् ., cटाo का ट् , औट् का ट् । इसी लए ता लका म ‘जस्’ लखा है पर
ये अक्षर वैसे-के-वैसे क्य नह दखते: इनम कुछ वण केवल संकेत (इत्) ह और लगते ही लुप्त हो जाते ह —
g l a
m a
a ’ eलखा है पर दखता है ‘बालकाय’। संस्कृत-व्याकरण म यह संकेत- व ध
s
agभीl पता चल जाए क प्रत्यय कस प्रकार का व्यवहार करेगा।
बालक म दखता है ‘बालकाः’, और ‘ङे
इस लए है क एक ही चह्न से यह
co m
दो व्यावहा रक बात —
m .
o m l a se
.cप्रथमा के ‘सु, औ, जस्’ से ही बनता है, केवल एकवचन म वशेष रूप हो जाताaहैg(हे ब्रह्मन्, हे वद्वन्, हे वेधः)। शब्दरूप-
सम्बोधन क अलग पं क्त नह है। ता लका म सात ही पं क्तयाँ ह, क्य क सम्बोधन क अपनी वभ क्त नह होती — वह
se m
g l a
a
ता लकाओं म पुस्तक ने उसे आठव पं क्त म सु वधा के लए जोड़ा है।
.c
m
प्रत्यय तीन लङ्ग म एक ही ह। ता लका का शीषक ही यह कहता है — ‘पुं लङ्गे स्त्री लङ्गे नपुंसक लङ्गे च’। रूप म जो भेद
m a s e
co agl
दखता है (बालकाः / लताः / फला न) वह प्रत्यय के भेद से नह , अङ्ग पर होने वाले आदे श से आता है।
m .
ase
a g l
com
m .
m ase
.co
a g l Page 4 of 44
Page 6
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
बनने की पि या एक उदाहरण से —
वाच् + िभस ् (त ृत ीया बहुवचन) → वाच् का पदान्त च् → ग् (जश्त्व) → वािग् भः
ु बहुवचन) → स् → र् (रुत्व) → उ (उत्व) → अ + उ = ओ (गुण) → मनोभ्यः
मनस् + भ्यस ् (चत थ
जगत् + जस ् (पथमा बहुवचन, नपुंसक) → नुम् आगम + दीघ → जगिन्त
अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।
1. तृतीया द्ववचन तथा षष्ठी बहुवचन के सुप्-प्रत्यय ल खए।
उत्तर — भ्याम्; आम्।
2. ‘सुप्’ नाम कैसे बना?
उत्तर — आ द प्रत्यय सु तथा अ न्तम प्रत्यय सुप् — इन दोन को जोड़कर पूरे समूह का नाम ‘सुप्’ पड़ा।
3. ‘ङे ’ प्रत्यय म इत् संज्ञक वण कौन-सा है और शेष क्या बचता है?
उत्तर — ङ् इत् है, शेष ‘ए’ बचता है — बालक + ङे → बालकाय (यहाँ ‘आय’ आदे श), ब्रह्मन् + ङे → ब्रह्मणे।
4. सुप् क ता लका म सम्बोधन क पं क्त क्य नह है?
उत्तर — सम्बोधन क स्वतन्त्र वभ क्त नह होती; वह प्रथमा के प्रत्यय से ही बनता है, केवल एकवचन म वशेष
रूप होता है।
‘न्’ कारान्तः पुं लङ्गः — ब्रह्मन्, गु णन्, प थन् — पृष्ठ 184–185
पुं लङ्गशब्दाः खण्ड के पहले तीन शब्द
पुं लङ्गशब्दाः
१ ‘ब्रह्मन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः पुं लङ्गः (पृष्ठ 184)
अथ — ब्रह्मा, सृ ष्टकता; प्रा तप दक ब्रह्मन् (न्-कारान्त, पुं लङ्ग)। इसी साँचे पर आत्मन्, राजन्, अध्वन्, यजमान् जैसे ‘अन्’-अन्त
पुं लङ्ग शब्द चलते ह।
बलवत् (strong) अङ् ग — बह्माण् : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — बह्म : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — बह्मण् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
Page 5 of 44
Page 7
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
पहचान — तीन अङ्ग म भेद केवल इतना है : बलवत् म ‘आ’ द घ रहता है (ब्रह्म◌ाण्), मध्यम म न् पूरा गर जाता है (ब्रह्म +
भ्याम्), दुबल म ‘अ’ लुप्त होकर ण् बचता है (ब्रह्मण् + आ = ब्रह्मणा)। न् का ण् णत्व से होता है, क्य क उससे पहले ‘र्’ है —
रषाभ्यां नो णः।
‘न्’ कारान्तः पुं लङ्गः ‘ब्रह्मन्’ शब्दः — पृष्ठ 184
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा बह्मा बह्माणौ बह्माणः
िद्वतीया बह्माणम् बह्माणौ बह्मणः
तत बह्मणा बह्मभ्याम् बह्मिभः
चतुथ बह्मणे बह्मभ्याम् बह्मभ्यः
पञ्चमी बह्मणः बह्मभ्याम् बह्मभ्यः
षष्ठी बह्मणः बह्मणोः बह्मणाम्
स प्तमी बह्मिण बह्मणोः बह्मसु
स म् बोधनम् हे बह्मन् हे बह्माणौ हे बह्माणः
तीन खाने वशेष ध्यान माँगते ह: (क) प्रथमा एकवचन ब्रह्मा — सु प्रत्यय लुप्त, अ न्तम न् का लोप, और उससे
पहले का ‘अ’ द घ हो जाता है। (ख) द्वतीया बहुवचन ब्रह्मणः — यह से दुबल अङ्ग शुरू होता है, इस लए यह
द्वतीया एकवचन ‘ब्रह्माणम्’ से बलकुल अलग दखता है। (ग) सम्बोधन एकवचन हे ब्रह्मन् — यहाँ न् बना रहता
है और ‘आ’ नह होता; यही प्रथमा ‘ब्रह्मा’ से इसका भेद है।
ब्रह्मा जगतः स्रष्टा अ स्त। (प्रथमा एक. — कत र प्रथमा)
जनाः ब्रह्माणम् नम न्त। ( द्वतीया एक. — कम ण द्वतीया)
ब्रह्मणा सृ ष्टः र चता। (तृतीया एक. — कत र तृतीया, कमवाच्य म)
ब्रह्मणः वरदानम् अलभत। (षष्ठी एक. — सम्ब े षष्ठी)
हे ब्रह्मन्! प्रसीद। (सम्बोधन एक.)
यही साँचा, दूसरा शब्द: आत्मन् → आत्मा, आत्मानौ, आत्मानः; आत्मना, आत्मभ्याम्, आत्म भः; आत्म न,
आत्मसु। राजन् → राजा, राजानौ, राजानः; पर दुबल अङ्ग ‘राज्ञ्’ है — राज्ञा, राज्ञः, रा ज्ञ, राजसु। भेद केवल दुबल
अङ्ग का है, ढाँचा वही।
Page 6 of 44
Page 8
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
२ ‘गु णन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः पुं लङ्गः (पृष्ठ 184)
अथ — गुणवान्, गुणी पुरुष; प्रा तप दक गु णन् = गुण + इन् (मतुबथ य ‘इन्’ प्रत्यय)। इसी साँचे पर ध नन्, ब लन्, मन स्वन्,
तप स्वन्, ज्ञा नन्, द ण्डन् — सारे ‘इन्’-प्रत्ययान्त पुं लङ्ग शब्द चलते ह। हन्द के ‘गुणी, धनी, ज्ञानी’ यह से आए ह।
बलवत् (strong) अङ् ग — गुिणन् (दीघ ई सिहत प.एक. गुणी) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — गुिण : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — गुिणन् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — यह ब्रह्मन् से सरल है, क्य क इसम बलवत् और दुबल अङ्ग एक ही ह — गु णन्। केवल दो बात याद रखनी ह : (क)
प्रथमा एकवचन म न् गरकर ‘इ’ द घ हो जाता है — गुणी; (ख) व्यञ्जना द प्रत्यय (भ्याम्, भस्, भ्यस्, सु) से पहले न् गर जाता है
— गु णभ्याम्, गु ण भः, गु णषु।
‘न्’ कारान्तः पुं लङ्गः ‘गु णन्’ शब्दः — पृष्ठ 184
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा गण
ु ी ग िु णनौ ग िु णनः
िद्वतीया ग िु णनम् ग िु णनौ ग िु णनः
तत ग िु णना ग िु णभ्याम् ग िु णिभः
चतुथ ग िु णने ग िु णभ्याम् ग िु णभ्यः
पञ्चमी ग िु णनः ग िु णभ्याम् ग िु णभ्यः
षष्ठी ग िु णनः ग िु णनोः ग िु णनाम्
स प्तमी ग िु णिन ग िु णनोः ग िु णषु
स म् बोधनम् हे ग िु णन् हे ग िु णनौ हे ग िु णनः
प्रथमा और द्वतीया बहुवचन एक जैसे क्य : दोन म ‘गु णनः’ है। इसम कोई भूल नह — ‘इन्’-अन्त शब्द म
जस् (प्र.बहु.) और शस् ( द्व.बहु.) दोन के बाद अङ्ग दुबल ही रहता है, इस लए रूप समान हो जाता है। वाक्य म
कौन-सी वभ क्त है, यह क्रया से तय होता है : ‘गु णनः पूज्यन्ते’ (प्रथमा) पर ‘गु णनः पूजयामः’ ( द्वतीया)।
गुणी जनः सवत्र पूज्यते। (प्रथमा एक.)
वयं गु णनम् सत्क रष्यामः। ( द्वतीया एक.)
गु णना सह मैत्री शुभा। (तृतीया एक. — सहयोगे तृतीया)
Page 7 of 44
Page 9
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
गु णषु ईष्या न कतव्या। (सप्तमी बहु. — न् का लोप दे खए)
हे गु णन्! त्वं धन्यः। (सम्बोधन एक.)
ध्यान द: सप्तमी बहुवचन गु णषु है, ‘गु णनसु’ नह । ‘सु’ भी व्यञ्जना द प्रत्यय है, इस लए उससे पहले न् गरता है;
फर ‘इ’ के कारण षत्व होकर सु → षु हो जाता है।
३ ‘प थन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः पुं लङ्गः (पृष्ठ 185)
अथ — माग, रास्ता; प्रा तप दक प थन् (पुं लङ्ग)। यह प र शष्ट के सबसे अ नय मत (irregular) शब्द म है, इस लए इसे साँचे
से नह , रूप से याद करना पड़ता है। इसी वग म म थन् तथा ऋभु क्षन् आते ह।
बलवत् (strong) अङ् ग — पन्थान् (प.एक. में पन्थाः) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — पिथ : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — पथ् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — तीन अङ्ग तीन भन्न दखते ह — प ान् (बलवत्), प थ (मध्यम, व्यञ्जना द प्रत्यय से पहले), पथ् (दुबल)। इस लए
एक ही ता लका म ‘पन्थाः’, ‘प थभ्याम्’ और ‘पथा’ — तीन दखते ह। प्रथमा एकवचन म प ाः वसगान्त है, यह वशेष रूप है।
‘न्’ कारान्तः पुं लङ्गः ‘प थन्’ शब्दः — पृष्ठ 185
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा पन्थाः पन्थानौ पन्थानः
िद्वतीया पन्थानम् पन्थानौ पथः
तत पथा पिथभ्याम् पिथिभः
चतुथ पथे पिथभ्याम् पिथभ्यः
पञ्चमी पथः पिथभ्याम् पिथभ्यः
षष्ठी पथः पथोः पथाम्
स प्तमी पिथ पथोः पिथषु
स म् बोधनम् हे पन्थाः हे पन्थानौ हे पन्थानः
Page 8 of 44
Page 10
as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
a g l AglaSem · NCERT Solutions
द्वतीया एकवचन और बहुवचन का बड़ा अन्तर: द्वतीया एकवचन प
. com
ानम् (बलवत् अङ्ग) है, पर द्वतीया
m a s em ष्ट से सबसे
l एक./ द्व.) वहाँ
बहुवचन पथः (दुबल अङ्ग) — दोन दे खने म बलकुल असम्बद्ध लगते ह। यही इस शब्द क परीक्षा-दृ
. coहै। इसे इस तरह याद क जए : जहाँ तक ‘बल’ चलता है (प्रथमा तीन a+ gद्वतीया
m
,eउसके बाद सवत्र पथ्, और व्यञ्जना द प्रत्यय से पहले प थ।
भूल-योग्य जोड़ी
a s
agl
प ान्
m
. co ag
e m
अयं प ाः ग्रामं नय त। (प्रथमा एक.)
सः द घ प ानम् अगच्छत्। ( द्वतीया एक.)
g l as
a
पथा गच्छन् बालकः गीतम् अगायत्। (तृतीया एक. — माग के अथ म तृतीया)
m
प थ वृक्षाः स न्त। (सप्तमी एक. — अ धकरणे सप्तमी)
co
m.
ग्रामस्य प थषु द पाः ज्वल न्त। (सप्तमी बहु.)
o m l a se
g म) बना है, और ‘प थक’
.c ‘प थ’ रूप से ही सुभा षत का प्र सद्ध ‘सत्प थ’ (सत् + प थ = सन्माग
a
m
se शब्द भी इसी मूल से है। ‘पन्थाः’ से हन्द का ‘पन्थ’ बना।
शब्द-सम्बन्ध:
g l a
a
(यात्री)
om a s
. c agl
अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं m
s e ल खए, फर उत्तर दे खए।
la बहुवचन ल खए।
agसप्तमी
1. ‘ब्रह्मन्’ का द्वतीया बहुवचन तथा
उत्तर — ब्रह्मणः; ब्रह्मसु।
com
2. ‘गु णन्’ का चतुथ एकवचन तथा षष्ठी बहुवचन ल खए।
m .
o m
उत्तर — गु णने; गु णनाम्।
l a se
c थन्’ का द्वतीया एकवचन और द्वतीया बहुवचन दोन लखकर बताइएaकg वे इतने भन्न क्य ह।
3..‘प
m
se उत्तर — पन्थानम्; पथः। एकवचन म बलवत् अङ्ग ‘पन्थान्’ चलता है, बहुवचन म दुबल अङ्ग ‘पथ्’।
a
agl 4. रक्त ान भ रए — हे ______ ! त्वं मे मागदशकः अ स। (गु णन्, सम्बोधन एकवचन)
se m
coतृmतीया बहुवचन तथा सप्तमी एकवचन ल खए। l a
उत्तर — हे गु णन्।
. a g
em
5. ‘आत्मन्’ शब्द को ब्रह्मन् के साँचे पर चलाकर
a s
agl
उत्तर — आत्म भः; आत्म न।
co m
m .
m se a
co agl
‘स्’ कारान्तः पुं लङ्गः — वद्वस्, चन्द्रमस्, पुस
ं ,् वेधस् — पृष्ठ 185–187
m .
ase
a g l
.c
s e m
m a
e m . co agl
g l as
a
com
m .
m ase
.co
a g l Page 9 of 44
Page 11
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
पुं लङ्गशब्दाः खण्ड के चार ‘स्’-अन्त शब्द
पुं लङ्गशब्दाः
१ ‘ वद्वस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः पुं लङ्गः (पृष्ठ 185)
अथ — वद्वान्, ज्ञानी; प्रा तप दक वद्वस् (वस्तुतः वद् धातु से ‘क्वसु’ प्रत्यय द्वारा नष्पन्न — वद्वं स्)। इसी वग म ससृवस्,
त वस् आ द क्वसु-प्रत्ययान्त शब्द आते ह। ‘ वद्वान्’ शब्द वशेषण भी है, इस लए यह वाक्य म संज्ञा के साथ भी लगता है —
‘ वद्वान् जनः’।
बलवत् (strong) अङ् ग — िवद्वांस ् : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — िवद्वद् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — िवदुष ् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — तीन अङ्ग दे खने म बहुत अलग ह और यही इस शब्द क क ठनाई है — वद्वांस् (अनुस्वार स हत), वद्वद् (व्यञ्जना द
प्रत्यय से पहले), वदुष् (शेष सब जगह)। ‘ वदुष्’ म ‘व’ का ‘उ’ हो जाता है (सम्प्रसारण) और स् का ष् (षत्व) — इसी लए वदुषा,
वदुषे, वदु ष।
‘स्’ कारान्तः पुं लङ्गः ‘ वद्वस्’ शब्दः — पृष्ठ 185
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा िवद्वान् िवद्वांस ौ िवद्वांस ः
िद्वतीया िवद्वांस म् िवद्वांस ौ िवदुषः
तत िवदुषा िवद्वद् भ्याम् िवद्विद् भः
चतुथ िवदुषे िवद्वद् भ्याम् िवद्वद् भ्यः
पञ्चमी िवदुषः िवद्वद् भ्याम् िवद्वद् भ्यः
षष्ठी िवदुषः िवदुषोः िवदुषाम्
स प्तमी िवदुिष िवदुषोः िवद्वत्स ु
स म् बोधनम् हे िवद्वन ् हे िवद्वास
ं ौ हे िवद्वास
ं ः
तीन खाने जन पर परीक्षा म प्रश्न बनता है: (क) प्रथमा एकवचन वद्वान् — अनुस्वार नह , अनुना सक न् है;
(ख) सम्बोधन एकवचन हे वद्वन् — यहाँ ‘आ’ ह्रस्व होकर ‘अ’ हो जाता है, इस लए ‘हे वद्वान्’ लखना अशुद्ध
है; (ग) सप्तमी बहुवचन वद्वत्सु — ‘ वद्वद्’ का द् ‘सु’ से पहले चत्व द्वारा त् हो जाता है।
Page 10 of 44
Page 12
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
वद्वान् सवत्र पूज्यते। (प्रथमा एक. — प्र सद्ध सुभा षत-पं क्त)
वदुषः वचनं ोतव्यम्। (षष्ठी एक. — सम्ब े षष्ठी)
वदुषा सह ववादः न कायः। (तृतीया एक.)
वद्व ः शास्त्रं र चतम्। (तृतीया बहु. — कमवाच्ये कत र तृतीया)
हे वद्वन्! माग दशय। (सम्बोधन एक.)
समास म यही अङ्ग दखता है: वद्वद्जन, वद्वत्सभा, वद्वत्ता — सब मध्यम अङ्ग ‘ वद्वद्/ वद्वत्’ से बने ह; और
‘ वदुषी’ ( वद्वान् स्त्री) दुबल अङ्ग ‘ वदुष्’ से।
२ ‘चन्द्रमस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः पुं लङ्गः (पृष्ठ 186)
अथ — चन्द्रमा, चाँद; प्रा तप दक चन्द्रमस् (पुं लङ्ग, ‘अस्’-अन्त)। ध्यान रहे क चन्द्र (अ-कारान्त) और चन्द्रमस् (स्-कारान्त) दो
अलग शब्द ह — रूप भी अलग चलते ह।
बलवत् (strong) अङ् ग — चन्द मास् (प.एक. में दीघ) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — चन्द मो : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — चन्द मस् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — ‘अस्’-अन्त पुं लङ्ग का साँचा तीन बात से पहचाना जाता है : (क) प्रथमा एकवचन म ‘अ’ द घ होकर स् वसग बन
जाता है — चन्द्रमाः; (ख) भ्याम्, भस्, भ्यस् से पहले ‘अस्’ का ओ हो जाता है — चन्द्रमोभ्याम्, चन्द्रमो भः; (ग) शेष सवत्र
‘चन्द्रमस्’ ज्य -का-त्य — चन्द्रमसा, चन्द्रमसे, चन्द्रम स।
Page 11 of 44
Page 13
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
‘स्’ कारान्तः पुं लङ्गः ‘चन्द्रमस्’ शब्दः — पृष्ठ 186
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा चन्द माः चन्द मसौ चन्द मसः
िद्वतीया चन्द मसम् चन्द मसौ चन्द मसः
तत चन्द मसा चन्द मोभ्याम् चन्द मोिभः
चतुथ चन्द मसे चन्द मोभ्याम् चन्द मोभ्यः
पञ्चमी चन्द मसः चन्द मोभ्याम् चन्द मोभ्यः
षष्ठी चन्द मसः चन्द मसोः चन्द मसाम्
स प्तमी चन्द मिस चन्द मसोः चन्द म स्सु
स म् बोधनम् हे चन्द मः हे चन्द मसौ हे चन्द मसः
‘ओ ’ कहाँ से आया — चन्द मस् + िभस् → स् का रुत्व (स् → र्) → चन्द मर् + िभस् → र् का उत्व (र् → उ)
→ चन्द म + उ + िभः → ग ुण (अ + उ = ओ) → च न्द मोिभः
यही पि या मनस् → मनोिभः, तपस् → तपोभ्यः, यशस् → यशोिभः में चलती है।
सम्बोधन एकवचन ‘हे चन्द्रमः’ क्य : सम्बोधन म अङ्ग ह्रस्व रह जाता है — द घ ‘आ’ नह होता — और अ न्तम
स् वसग बन जाता है। इस लए प्रथमा ‘चन्द्रमाः’ पर सम्बोधन ‘हे चन्द्रमः’। यही भेद वेधस् म भी है (वेधाः / हे वेधः)।
चन्द्रमाः रात्रौ प्रकाशते। (प्रथमा एक.)
कवयः चन्द्रमसम् वणय न्त। ( द्वतीया एक.)
चन्द्रमसा सह ताराः शोभन्ते। (तृतीया एक.)
चन्द्रमसः का न्तः शीतला। (षष्ठी एक.)
पुस्तक के पाठ से मलान: यहाँ सप्तमी बहुवचन म पुस्तक केवल चन्द्रमस्सु छापती है, जब क वेधस्, मनस्, तपस्,
पयस्, शरस्, छन्दस् म वह वसग वाला और स् वाला — दोन रूप दे ती है (वेधःसु, वेधस्सु)। नयम क दृ ष्ट से
चन्द्रमस् म भी दोन रूप — चन्द्रमःसु तथा चन्द्रमस्सु — शुद्ध ह; पुस्तक ने संक्षेप म एक ही छापा है। परीक्षा म
पुस्तक का छपा रूप लखना सुर क्षत है।
Page 12 of 44
Page 14
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
३ ‘पुंस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः पुं लङ्गः (पृष्ठ 186)
अथ — पुरुष, नर; प्रा तप दक पुंस् (पुं लङ्ग)। यह भी अ नय मत शब्द है और इसी से ‘पुं लङ्ग’, ‘पुंस्त्व’, ‘पुंसवन’ शब्द बने ह।
बलवत् (strong) अङ् ग — पुमांस ् : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — पुं / पुम् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — पुंस ् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — बलवत् अङ्ग म पुमांस् (म् आ जाता है), दुबल म पुंस्, और व्यञ्जना द प्रत्यय से पहले दो वकल्प — पुंभ्याम् तथा
पुम्भ्याम्, पुं भः तथा पु म्भः। अनुस्वार और म् — दोन लखे जा सकते ह, इसी लए पुस्तक हर ऐसे खाने म दो रूप छापती है।
‘स्’ कारान्तः पुं लङ्गः ‘पुंस्’ शब्दः — पृष्ठ 186
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा पुम ान् पुम ास
ं ौ पुम ास
ं ः
िद्वतीया पुम ांस म् पुम ांस ौ पुंस ः
तत पुंस ा पुंभ्याम्, पुम्भ्याम् पुंिभः, पुिम्भः
चतुथ पुंसे पुंभ्याम्, पुम्भ्याम् पुंभ्यः, पुम्भ्यः
पञ्चमी पुंस ः पुंभ्याम्, पुम्भ्याम् पुंभ्यः, पुम्भ्यः
षष्ठी पुंस ः पुंस ोः पुंस ाम्
स प्तमी पुंिस पुंस ोः पुंस ु
स म् बोधनम् हे पुम न् हे पुम ांस ौ हे पुम ांस ः
प्रथमा ‘पुमान्’ और सम्बोधन ‘हे पुमन्’: जैसे वद्वान् / हे वद्वन् म, वैसे ही यहाँ भी सम्बोधन म द घ ‘आ’ ह्रस्व हो
जाता है। और द्वतीया बहुवचन ‘पुंसः’ — यह बल समाप्त होकर दुबल अङ्ग आरम्भ होता है, इस लए द्वतीया
एकवचन ‘पुमांसम्’ से यह बलकुल अलग दखता है।
पुमान् स्त्री च समानौ स्तः। (प्रथमा एक.)
राजा पुंसः रक्ष त। ( द्वतीया बहु.)
पुंसा कृतं कम फल त। (तृतीया एक.)
पुंसाम् मध्ये सः ेष्ठः। (षष्ठी बहु.)
Page 13 of 44
Page 15
as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
a g l AglaSem · NCERT Solutions
co m
m.
व्याकरण-सम्बन्ध: ‘पुं लङ्ग’ शब्द ही ‘पुंस् + लङ्ग’ है — अथात् ‘पुरुष का चह्न’। इसी तरह ‘पुंस्को कल’ (नर
m as e
l
कोयल) म भी यही शब्द है।
m .co a g
l a se
a g
४ ‘वेधस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः पुं लङ्गः (पृष्ठ 187)
com
m . ag
l a se
agतप दक वेधस् (‘अस्’-अन्त पुं लङ्ग)। यह ठ क वही साँचा है जो चन्द्रमस् का है —
अथ — वधाता, सृ ष्टकता (ब्रह्मा का पयाय); प्रा
इसी लए पुस्तक ने दोन को पास-पास रखा है।
co m
e m.
m l as
.co
बलवत् (strong) अङ् ग — वेधास् (प.एक. में दीघ) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
a g
a s em
मध्यम अङ् ग — वेधो : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
a gl दुबल (weak) अङ् ग — वेधस् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
m a s
m.co
पहचान — प्रथमा एकवचन वेधाः (द घ + वसग), मध्यम अङ्ग म वेधो- (वेधोभ्याम्, वेधो भः, वेधोभ्यः), शेष सवत्र वेधस्। सम्बोधन
agl
म ह्रस्व — हे वेधः।
l a se
a g
‘स्’ कारान्तः पुं लङ्गः ‘वेधस्’ शब्दः — पृष्ठ 187
co m
m .
se
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा.co
m l a
ag वेधसः
sem
वेध ाः वेध सौ
a िद्वतीया
agl वेध सम् वेध सौ वेध सः
se m
com a
वेध ोभ्याम्
l
तत वेध सा वेध ोिभः
. a g
m
ase
वेध ोभ्याम् वेध ोभ्यः
agl
चतुथ वेध से
पञ्चमी वेध सः वेध ोभ्याम् वेध ोभ्यः
co m
.
षष्ठी वेध सः वेध सोः वेध साम्
m
e वेधःसु, वेधस्सु
m l as
.co a g
स प्तमी वेध िस वेध सोः
a s em सम्बोधनम्
gl
हे वेध ः हे वेध सौ हे वेध सः
a c
m .
m a s e
co agl
सप्तमी बहुवचन म दो रूप क्य : वेधस् + सु म स् के आगे स् आ जाता है। पहला स् या तो वसग बन जाता है
m .
as e
(वेधःसु) या ज्य -का-त्य रह जाता है (वेधस्सु) — दोन शुद्ध ह, इसी लए पुस्तक दोन छापती है। यही वकल्प
a g l
मनस्, तपस्, पयस्, शरस्, छन्दस् म भी दखेगा।
co m
m .
m ase
.co
a g l Page 14 of 44
Page 16
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
वेधाः जगत् सृज त। (प्रथमा एक.)
वेधसा न मतम् इदं वश्वम्। (तृतीया एक.)
वेधसे नमः। (चतुथ एक. — नमः के योग म चतुथ )
हे वेधः! रक्ष माम्। (सम्बोधन एक.)
ध्यान द: ‘नमः’, ‘स्वाहा’, ‘स्व स्त’, ‘अलम्’ के योग म चतुथ आती है — इस लए ‘वेधसे नमः’ शुद्ध है, ‘वेधसः
नमः’ नह ।
अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।
1. ‘ वद्वस्’ का सम्बोधन एकवचन तथा सप्तमी बहुवचन ल खए।
उत्तर — हे वद्वन्; वद्वत्सु।
2. ‘चन्द्रमस्’ का तृतीया बहुवचन बनाकर उसक प्र या एक पं क्त म ल खए।
उत्तर — चन्द्रमो भः — स् का रुत्व, र् का उत्व, फर अ + उ = ओ (गुण)।
3. ‘वेधस्’ क चतुथ बहुवचन ल खए तथा बताइए क प्रथमा और सम्बोधन एकवचन म क्या भेद है।
उत्तर — वेधोभ्यः। प्रथमा म द घ — वेधाः; सम्बोधन म ह्रस्व — हे वेधः।
4. ‘पुंस्’ के तृतीया द्ववचन के दोन शुद्ध रूप ल खए।
उत्तर — पुंभ्याम्, पुम्भ्याम्।
5. रक्त ान भ रए — ______ वचनं सवः आदरणीयम्। ( वद्वस्, षष्ठी एकवचन)
उत्तर — वदुषः।
‘द्’ तथा ‘ज्’ कारान्तः पुं लङ्गः — सुहृद्, व णज्, भषज् — पृष्ठ 187–188
पदान्त-प रवतन (जश्त्व–चत्व) दखाने वाले तीन शब्द
पुं लङ्गशब्दाः
१ ‘सुहृद्’ शब्दः — ‘द्’ कारान्तः पुं लङ्गः (पृष्ठ 187)
अथ — मत्र, हतैषी; व्युत्प त्त सु + हृद् = ‘ जसका हृदय अच्छा है’ (बहुव्री ह समास)। प्रा तप दक सुहृद्। इसी साँचे पर हृद्, वपद्,
आपद्, सम्पद्, शरद् जैसे द्-अन्त शब्द चलते ह ( लङ्ग भन्न हो सकता है)।
Page 15 of 44
Page 17
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
बलवत् (strong) अङ् ग — सुहृद् (कोई िवशेष वृिद्ध नही ं) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — सुहृद् / सुहृत् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — सुहृद् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — इसका अङ्ग सवत्र सुहृद् ही रहता है — कोई बलवत्/दुबल भेद नह । बदलता केवल पदान्त द् है : वाक्य म अकेला
पड़ने पर सुहृद् (जश्त्व) या सुहृत् (चत्व), और ‘सु’ से पहले कठोर होकर सुहृत्सु।
‘द्’ कारान्तः पुं लङ्गः ‘सुहृद्’ शब्दः — पृष्ठ 187
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा सुहृ द् , सुहृ त् सुहृ दौ सुहृ दः
िद्वतीया सुहृ दम् सुहृ दौ सुहृ दः
तत सुहृ दा सुहृ द् भ्याम् सुहृ िद् भः
चतुथ सुहृ दे सुहृ द् भ्याम् सुहृ द् भ्यः
पञ्चमी सुहृ दः सुहृ द् भ्याम् सुहृ द् भ्यः
षष्ठी सुहृ दः सुहृ दोः सुहृ दाम्
स प्तमी सुहृ िद सुहृ दोः सुहृ त्स ु
स म् बोधनम् हे सुहृ द् , हे सुहृ त् हे सुहृ दौ हे सुहृ दः
प्रथमा एकवचन म दो रूप क्य छपे ह: ‘सु’ प्रत्यय लुप्त होने पर द् पद के अन्त म आ जाता है। पदान्त म झलां
जशोऽन्ते से वह मृदु द् रहता है (सुहृद्), और ख र च के अनुसार अगले कठोर वण या वराम के आगे त् हो जाता है
(सुहृत्)। दोन शुद्ध ह; इसी लए ता लका म प्रथमा तथा सम्बोधन एकवचन म दो-दो रूप ह।
सुहृद् आपत्काले परीक्ष्यते। (प्रथमा एक.)
अहं सुहृदम् स्मरा म। ( द्वतीया एक.)
सुहृदा सह वातालापः सुखदः। (तृतीया एक.)
सुहृद्भ्यः पत्रा ण प्रे षता न। (चतुथ बहु.)
सुहृत्सु वश्वासः ापनीयः। (सप्तमी बहु.)
यही साँचा, दूसरा शब्द: शरद् (स्त्री.) → शरद्/शरत्, शरदौ, शरदः; शरद्भ्याम्, शर ः, शरत्सु। सम्पद् (स्त्री.) →
सम्पद्/सम्पत्, सम्पदौ, सम्पदः।
Page 16 of 44
Page 18
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
२ ‘व णज्’ शब्दः — ‘ज्’ कारान्तः पुं लङ्गः (पृष्ठ 188)
अथ — व्यापारी, ब नया; प्रा तप दक व णज् (पुं लङ्ग)। हन्द का ‘ब नया’ तथा ‘वा णज्य’ शब्द इसी से ह।
बलवत् (strong) अङ् ग — विणज् (अपिरवितत) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — विणग् / विणक् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — विणज् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — अङ्ग सवत्र व णज्; केवल पदान्त ज् बदलता है — अकेले म व णग् (जश्त्व) या व णक् (चत्व), भ्याम्/ भस्/भ्यस् से
पहले व णग्-, और ‘सु’ से पहले व णक्षु।
‘ज्’ कारान्तः पुं लङ्गः ‘व णज्’ शब्दः — पृष्ठ 188
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा विणग्, विणक् विणजौ विणजः
िद्वतीया विणजम् विणजौ विणजः
तत विणजा विणग्भ्याम् विणिग्भः
चतुथ विणजे विणग्भ्याम् विणग्भ्यः
पञ्चमी विणजः विणग्भ्याम् विणग्भ्यः
षष्ठी विणजः विणजोः विणजाम्
स प्तमी विणिज विणजोः विण ु
स म् बोधनम् हे विणग्, हे विणक् हे विणजौ हे विणजः
‘विण ’ु कै से बना — विणज् + सु → ज् का पदान्त में क् (च त्व) → विणक् + सु → क् (कवग) के बाद स् का ष्
(षत्व) → विण ।
ु
यही पि या िभषज् → िभष ,ु वाच् → वा ,ु िदश् → िद ,ु स्रज् → स्र ु में चलती है।
व णक् आपणे वस्तू न व णा त। (प्रथमा एक.)
ग्रामीणाः व णजम् पश्य न्त। ( द्वतीया एक.)
व ण ग्भः सह व्यापारः वधते। (तृतीया बहु.)
Page 17 of 44
Page 19
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
व णक्षु सत्य नष्ठा आवश्यक । (सप्तमी बहु.)
ध्यान द: ‘व णक्’ और ‘व णग्’ दोन प्रथमा एकवचन ह। वाक्य म अगला वण मृदु हो तो प्रायः ‘व णग्’ लखा जाता
है (व णग् गच्छ त), कठोर हो या वराम हो तो ‘व णक्’ (व णक् चल त। व णक्।)।
३ ‘ भषज्’ शब्दः — ‘ज्’ कारान्तः पुं लङ्गः (पृष्ठ 188)
अथ — वैद्य, च कत्सक; प्रा तप दक भषज् (पुं लङ्ग)। आयुवद म ‘ भषक्’ शब्द च कत्सक के लए प्र सद्ध है — ‘ भषक्
च कत्सां करो त’।
बलवत् (strong) अङ् ग — िभषज् (अपिरवितत) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — िभषग् / िभषक् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — िभषज् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — बलकुल व णज् जैसा — अङ्ग र भषज्, पदान्त म भषग्/ भषक्, व्यञ्जना द प्रत्यय से पहले भषग्-, सप्तमी
बहुवचन भषक्षु। दो शब्द साथ रखने का पुस्तक का उ े श्य यही दखाना है क एक साँचा कई शब्द पर चलता है।
‘ज्’ कारान्तः पुं लङ्गः ‘ भषज्’ शब्दः — पृष्ठ 188
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा िभषग्, िभषक् िभषजौ िभषजः
िद्वतीया िभषजम् िभषजौ िभषजः
तत िभषजा िभषग्भ्याम् िभषिग्भः
चतुथ िभषजे िभषग्भ्याम् िभषग्भ्यः
पञ्चमी िभषजः िभषग्भ्याम् िभषग्भ्यः
षष्ठी िभषजः िभषजोः िभषजाम्
स प्तमी िभषिज िभषजोः िभष ु
स म् बोधनम् हे िभषग्, हे िभषक् हे िभषजौ हे िभषजः
Page 18 of 44
Page 20
as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
a g l AglaSem · NCERT Solutions
व णज् और भषज् म कोई भेद क्य नह : क्य क रूप शब्द के अथ से नह , उसके अ न्तम वण तथा लङ्ग से
. com
m a s em का अंश
o है। यही बात स्रज् और रुज् (स्त्री लङ्ग) क जोड़ी पर भी लागू है। agl
बनते ह। दोन ‘ज्’-कारान्त पुं लङ्ग ह, इस लए चौबीस खाने एक ही ढाँचे पर बनते ह — केवल आरम्भ
. cबदलता
em
(व ण-/ भष-)
a s
agl—
प्रयोग
co m
भषक् रो गणं च कत्स त। (प्रथमा एक.)
भषजा औषधं दत्तम्। (तृतीया एक.)
em . ag
भषजे धनं द यते। (चतुथ एक.)
g l as
ग्रामे भषजः अल्पाः स न्त। (प्रथमा बहु.) a
co m
m.
अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
m as e
.co g l
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।
mहृद्’ का प्रथमा एकवचन दोन रूप म तथा सप्तमी बहुवचन ल खए।
1.e‘सु a
a s
a gl उत्तर — सुहृद्, सुहृत्; सुहृत्सु।
2. ‘व णज्’ का सप्तमी बहुवचन बनाकर दो-चरण म उसक स द्ध ल खए।
om a s
. c agl
उत्तर — व णक्षु — (१) पदान्त ज् → क् (चत्व), (२) क् के बाद स् → ष् (षत्व)।
s e m ल खए।
उत्तर — भषग्भ्याम्; भषजाम्। gla
3. ‘ भषज्’ का तृतीया द्ववचन तथा षष्ठी बहुवचन
a
4. ‘शरद्’ शब्द को सुहृद् के साँचे पर चलाकर तृतीया बहुवचन तथा सप्तमी बहुवचन ल खए।
co m
.
उत्तर — शर ः; शरत्सु।
e m
m as
5. बताइए — ‘व णग्भ्याम्’ म ज् का ग् क्य हुआ?
.co a
उत्तर — भ् मृदु व्यञ्जन है, इस लए उससे पहले पदान्त ज् का जश्त्व होकर ग् हो गया।g l
se m
g l a
a
se m
mवाच्, त्वच्, स्रज्, रुज् — पृष्ठ 189–190
स्त्री लङ्गरूपा ण — ‘च्’ तथा ‘ज्’ कारान्तः o—
c g l a
m . a
a s e
agl
स्त्री लङ्गरूपा ण खण्ड का आरम्भ (पृष्ठ 189)
स्त्री लङ्गरूपा ण
co m
m .
e
‘वाच्’ शब्दः — ‘च्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः (पृष्ठ 189)
as
१
m l
.co a g
a s emउत्तर
agl अथ — वाणी, वचन, बोली; प्रा तप दक वाच् (स्त्री लङ्ग)। यही शब्द ‘वाक्’ के रूप म सवत्र प्र सद्ध है — वाक्श क्त, वाग्देवी,
.c
वाक्पटु , वाग्मी। इसी से गायत्री क दे वी ‘वाग्दे वी’ (सरस्वती) का नाम है।
s e m
m a
e m . co agl
g l as
a
co m
m .
m ase
.co
a g l Page 19 of 44
Page 21
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
बलवत् (strong) अङ् ग — वाच् (अपिरवितत) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — वाग् / वाक् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — वाच् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — स्त्री लङ्ग हलन्त शब्द म बलवत्-दुबल का भेद नह होता; अङ्ग सवत्र वाच् रहता है। बदलता केवल पदान्त च् है —
अकेले म वाग्/वाक्, व्यञ्जना द प्रत्यय से पहले वाग्-, तथा ‘सु’ से पहले वाक्षु।
‘च्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः ‘वाच्’ शब्दः — पृष्ठ 189
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा वाग्, वाक् वाचौ वाचः
िद्वतीया वाचम् वाचौ वाचः
तत वाचा वाग्भ्याम् वािग्भः
चतुथ वाचे वाग्भ्याम् वाग्भ्यः
पञ्चमी वाचः वाग्भ्याम् वाग्भ्यः
षष्ठी वाचः वाचोः वाचाम्
स प्तमी वािच वाचोः वा ु
स म् बोधनम् हे वाग्, हे वाक् हे वाचौ हे वाचः
च् का ग्/क् क्य हो जाता है: संस्कृत म च्, छ् , ज्, झ् पद के अन्त म टक नह सकते — चोः कुः से वे कवग (क्,
ग्) म बदल जाते ह। फर मृदु प रवेश म जश्त्व से ग् और कठोर प रवेश या वराम म चत्व से क्। इसी लए ‘वाचौ’
(स्वर से पहले च् बचा) पर ‘वा ग्भः’ और ‘वाक्षु’।
सत्या वाक् सवदा शोभते। (प्रथमा एक.)
मधुरां वाचम् वदे त्। ( द्वतीया एक.)
वाचा मनसा कमणा च शु द्धः। (तृतीया एक. — प्र सद्ध वाक्यांश)
वा ग्भः जनाः प्रसन्नाः भव न्त। (तृतीया बहु.)
वाक्षु संयमः आवश्यकः। (सप्तमी बहु.)
समास म पहचा नए: वाग्दे वी, वाग्दान, वाग्युद्ध (मृदु के आगे ग्); वाक्पटु , वाक्चातुय, वाक्श क्त (कठोर के आगे
क्)। एक ही शब्द, दो रूप — केवल अगले वण के कारण।
Page 20 of 44
Page 22
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
२ ‘त्वच्’ शब्दः — ‘च्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः (पृष्ठ 189)
अथ — त्वचा, चमड़ी, छाल; प्रा तप दक त्वच् (स्त्री लङ्ग)। हन्द का ‘त्वचा’ इसी से है।
बलवत् (strong) अङ् ग — त्वच् (अपिरवितत) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — त्वग् / त्वक् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — त्वच् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — पूरा साँचा वाच् जैसा — अङ्ग त्वच्, पदान्त म त्वग्/त्वक्, मध्यम अङ्ग त्वग्-, सप्तमी बहुवचन त्वक्षु। पुस्तक वाच् और
त्वच् को एक ही पृष्ठ पर रखकर यही जोड़ी दखाती है।
‘च्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः ‘त्वच्’ शब्दः — पृष्ठ 189
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा त्वग्, त्वक् त्वचौ त्वचः
िद्वतीया त्वचम् त्वचौ त्वचः
तत त्वचा त्वग्भ्याम् त्विग्भः
चतुथ त्वचे त्वग्भ्याम् त्वग्भ्यः
पञ्चमी त्वचः त्वग्भ्याम् त्वग्भ्यः
षष्ठी त्वचः त्वचोः त्वचाम्
स प्तमी त्विच त्वचोः त्व ु
स म् बोधनम् हे त्वग्, हे त्वक् हे त्वचौ हे त्वचः
तृतीया एकवचन ‘त्वचा’ का धोखा: दे खने म यह हन्द के ‘त्वचा’ जैसा लगता है, पर संस्कृत म यह तृतीया
एकवचन है (‘त्वचा’ = त्वचा से)। प्रथमा एकवचन तो त्वग्/त्वक् है। हन्द म जो नामवाचक रूप ‘त्वचा’ चल पड़ा
है, वह वास्तव म इसी तृतीया-रूप या ‘त्वचा’ नामक अकारान्त-स्त्री लङ्ग परवत रूप से आया है — संस्कृत-वाक्य म
उसे प्रथमा मानकर लखना अशुद्ध होगा।
वृक्षस्य त्वक् क ठना भव त। (प्रथमा एक.)
सूयरश्मयः त्वचम् तापय न्त। ( द्वतीया एक.)
त्वचा स्पश जानीमः। (तृतीया एक. — करणे तृतीया)
Page 21 of 44
Page 23
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
त्वग्भ्याम् रक्षा भव त। (तृतीया द्व.)
३ ‘स्रज्’ शब्दः — ‘ज्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः (पृष्ठ 190)
अथ — माला, पुष्पमाला; प्रा तप दक स्रज् (स्त्री लङ्ग)। काव्य म ‘स्रग्धरा’ छन्द का नाम इसी से है — ‘जो माला धारण करे’।
बलवत् (strong) अङ् ग — स्रज् (अपिरवितत) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — स्रग् / स्रक् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — स्रज् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — ज्-कारान्त स्त्री लङ्ग का वही साँचा जो पुं लङ्ग म व णज्/ भषज् का था — अङ्ग स्रज्, पदान्त म स्रग्/स्रक्, मध्यम अङ्ग
स्रग्-, सप्तमी बहुवचन स्रक्षु। लङ्ग बदलने पर भी हलन्त शब्द के रूप नह बदलते — यह इस प र शष्ट का महत्त्वपूण पाठ है।
‘ज्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः ‘स्रज्’ शब्दः — पृष्ठ 190
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा स्रग्, स्रक् स्रजौ स्रजः
िद्वतीया स्रजम् स्रजौ स्रजः
तत स्रजा स्रग्भ्याम् स्रिग्भः
चतुथ स्रजे स्रग्भ्याम् स्रग्भ्यः
पञ्चमी स्रजः स्रग्भ्याम् स्रग्भ्यः
षष्ठी स्रजः स्रजोः स्रजाम्
स प्तमी स्रिज स्रजोः स्र ु
स म् बोधनम् हे स्रग्, हे स्रक् हे स्रजौ हे स्रजः
पुं लङ्ग व णज् और स्त्री लङ्ग स्रज् — रूप एक-से क्य : हलन्त (व्यञ्जनान्त) शब्द म सुप्-प्रत्यय तीन लङ्ग म
एक ही लगते ह और अङ्ग-प रवतन भी अ न्तम व्यञ्जन से तय होता है, लङ्ग से नह । इस लए ‘व णजः’ और ‘स्रजः’
का ढाँचा समान है। लङ्ग का भेद केवल वशेषण तथा सवनाम म दखता है — ‘सा स्रक् सुन्दरी’ पर ‘सः व णक्
चतुरः’।
स्रक् दे वस्य कण्ठे शोभते। (प्रथमा एक.)
Page 22 of 44
Page 24
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
बा लका स्रजम् रचय त। ( द्वतीया एक.)
स्रजा अलङ् कृतः वग्रहः। (तृतीया एक.)
स्र ग्भः मण्डपः शो भतः। (तृतीया बहु.)
४ ‘रुज्’ शब्दः — ‘ज्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः (पृष्ठ 190)
अथ — रोग, पीड़ा, व्या ध; प्रा तप दक रुज् (स्त्री लङ्ग), ‘रुज्’ धातु (तोड़ना, पीड़ा दे ना) से। ‘रुजा’, ‘ वरुज’ शब्द इसी प रवार के
ह।
बलवत् (strong) अङ् ग — रुज् (अपिरवितत) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — रुग् / रुक् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — रुज् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — स्रज् का जुड़वाँ साँचा — रुग्/रुक्, रुग्भ्याम्, रुक्षु। पुस्तक ने दोन को एक ही पृष्ठ पर रखकर यह अभ्यास कराया है
क साँचा पहचानकर रूप स्वयं बनाया जा सके।
‘ज्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः ‘रुज्’ शब्दः — पृष्ठ 190
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा रुग्, रुक् रुजौ रुजः
िद्वतीया रुजम् रुजौ रुजः
तत रुजा रुग्भ्याम् रुिग्भः
चतुथ रुजे रुग्भ्याम् रुग्भ्यः
पञ्चमी रुजः रुग्भ्याम् रुग्भ्यः
षष्ठी रुजः रुजोः रुजाम्
स प्तमी रुिज रुजोः रु ु
स म् बोधनम् हे रुग्, हे रुक् हे रुजौ हे रुजः
अथ क सावधानी: ‘रुज्’ स्त्री लङ्ग है, इस लए वशेषण भी स्त्री लङ्ग म आएगा — ‘तीव्रा रुक्’ (तीव्र रोग), ‘तीव्रः
रुक्’ नह । परीक्षा म लङ्ग-सम्ब ी यही चूक सबसे अ धक होती है।
Page 23 of 44
Page 25
as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
a g l AglaSem · NCERT Solutions
तीव्रा रुक् तं बाधते। (प्रथमा एक.)
co m
e m.
as
औषधं रुजम् नाशय त। ( द्वतीया एक.)
m l
.co a g
रुजा पी डतः बालकः रो द त। (तृतीया एक.)
se m
a
रुग्भ्यः रक्षतु भषक्। (पञ्चमी बहु. — अपादाने पञ्चमी)
g l
aअभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
com ag
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।
.
a s emल खए।
agl
1. ‘वाच्’ का तृतीया एकवचन तथा सप्तमी बहुवचन
उत्तर — वाचा; वाक्षु।
2. ‘त्वच्’ का प्रथमा एकवचन दोन रूप म ल खए।
co m
m.
उत्तर — त्वग्, त्वक्।
as e
om
3. ‘स्रज्’ तथा ‘रुज्’ के चतुथ बहुवचन ल खए।
उत्तर.c—
a g l
m
स्रग्भ्यः; रुग्भ्यः।
as e
agl
4. बताइए — ‘वाचौ’ म च् क्य बचा रह गया, जब क ‘वा ग्भः’ म वह ग् हो गया?
उत्तर — ‘औ’ स्वर है और अङ्ग-प्रत्यय के बीच पद-स नह होती, इस लए च् बना रहा; ‘ भस्’ व्यञ्जना द है,
m a s
वहाँ पदान्त च् → ग् (चोः कुः + जश्त्व)।
5. रक्त
m.co
ान भ रए — क वः मधुरया ______ काव्यं पठ त। (वाच्, तृतीया एकवचन)
agl
उत्तर — वाचा।
l a se
a g
. com
m
स्त्री लङ्गरूपा ण — ‘त्’, ‘व्’ तथा ‘श्’ कारान्तः — स रत्, व त
a em— पृष्ठ 191–192
ु ,् दव्, sदश्
. coके शेष चार शब्द a gl
em
स्त्री लङ्ग खण्ड
a s
agl
स्त्री लङ्गरूपा ण
se m
com g l a
. a
‘स रत्’ शब्दः — ‘त्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः (पृष्ठ 191)
m
१
ase
उत्तर agl
m
अथ — नद , स रता; व्युत्प त्त सृ (बहना) धातु से — ‘जो बहती रहे’। प्रा तप दक स रत् (स्त्री लङ्ग)। इसी साँचे पर वपद्, आपद्,
सम्पद्, शरद्, प रषद् जैसे त्/द्-अन्त स्त्री लङ्ग शब्द चलते ह।
. co
se m
o m l a
g एकवचन-िद्ववचन
c (strong) अङ् ग — सिरत् (अपिरवितत) : पथमा तीनों वचन +aिद्वतीया
m .बलवत्
l a se
ag मध्यम अङ् ग — सिरद् / सिरत् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
.c
s e m
m a
दुबल (weak) अङ् ग — सिरत् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
m . co agl
l a se
-g
पहचान — अङ्ग सवत्र स रत्। पदान्त त् मृदु प रवेश म द् हो जाता है — इसी लए प्रथमा एकवचन म दो रूप (स रद्, स रत्) और
भ्याम्/ भस्/भ्यस् से पहले स रद्a (स रद्भ्याम्, स र ः)। ‘सु’ कठोर है, इस लए वहाँ त् ही रहता है — स रत्सु।
com
m .
m ase
.co
a g l Page 24 of 44
Page 26
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
‘त्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः ‘स रत्’ शब्दः — पृष्ठ 191
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा सिरद् , सिरत् सिरतौ सिरतः
िद्वतीया सिरतम् सिरतौ सिरतः
तत सिरता सिरद् भ्याम् सिरिद् भः
चतुथ सिरते सिरद् भ्याम् सिरद् भ्यः
पञ्चमी सिरतः सिरद् भ्याम् सिरद् भ्यः
षष्ठी सिरतः सिरतोः सिरताम्
स प्तमी सिरित सिरतोः सिर त्स ु
स म् बोधनम् हे सिरद् , हे सिरत् हे सिरतौ हे सिरतः
‘स र ः’ पर ‘स रत्सु’ क्य : दोन जगह प्रत्यय व्यञ्जना द है, पर भ् मृदु (घोष) है और स् कठोर (अघोष)। मृदु के
आगे जश्त्व से त् → द् (स र ः), कठोर के आगे चत्व से त् ज्य -का-त्य (स रत्सु)। यही जोड़ा वद्युत् म भी है —
वद्यु ः पर वद्युत्सु।
स रत् पवतात् प्रवह त। (प्रथमा एक.)
जनाः स रतम् पूजय न्त। ( द्वतीया एक.)
स रता क्षेत्रा ण सच्यन्ते। (तृतीया एक.)
सर ः दे शः समृद्धः। (तृतीया बहु.)
स रत्सु गङ्गा प वत्रतमा। (सप्तमी बहु. — नधारणे सप्तमी)
२ ‘ व ुत्’ शब्दः — ‘त्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः (पृष्ठ 191)
अथ — बजली, वद्युत्; व्युत्प त्त व + ुत् (चमकना) — ‘जो वशेष रूप से चमके’। प्रा तप दक व ुत् (स्त्री लङ्ग)। इसी वग म
मरुत् (पुं लङ्ग) भी उसी साँचे पर चलता है।
बलवत् (strong) अङ् ग — िव त
ु ् (अपिरवितत) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — िव दु ् / िव त
ु ् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — िव त
ु ् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
Page 25 of 44
Page 27
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
पहचान — स रत् का जुड़वाँ — प्रथमा एकवचन व ुद,् व ुत्; मध्यम अङ्ग व ुद-् ( वद्युदभ्् याम्, वद्यु ः, वद्युदभ्् यः); सप्तमी
बहुवचन व ुत्सु।
‘त्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः ‘ व ुत्’ शब्दः — पृष्ठ 191
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा िव दु ् , िव तु ् िव तु ौ िव तु ः
िद्वतीया िव तु म् िव तु ौ िव तु ः
तत िव तु ा िव दु ् भ्याम् िव िु द् भः
चतुथ िव तु े िव दु ् भ्याम् िव दु ् भ्यः
पञ्चमी िव तु ः िव दु ् भ्याम् िव दु ् भ्यः
षष्ठी िव तु ः िव तु ोः िव तु ाम्
स प्तमी िव िु त िव तु ोः िव त्ु स ु
स म् बोधनम् हे िव दु ् , हे िव तु ् हे िव तु ौ हे िव तु ः
लङ्ग-सावधानी: ‘ वद्युत्’ स्त्री लङ्ग है — ‘चञ्चला वद्युत्’, ‘ वद्युत् चमक त’ — इस लए इसके वशेषण भी
स्त्री लङ्ग म आएँगे। इसके वपरीत ‘मरुत्’ (वायु) पुं लङ्ग है, यद्य प उसके रूप ठ क इसी साँचे पर चलते ह।
मेघेषु व ुत् चमक त। (प्रथमा एक.)
क वः व ुतम् उपमानं करो त। ( द्वतीया एक.)
व ुता यन्त्रा ण चल न्त। (तृतीया एक. — करणे तृतीया)
व ुत्सु महती श क्तः न हता। (सप्तमी बहु.)
३ ‘ दव्’ शब्दः — ‘व्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः (पृष्ठ 192)
अथ — आकाश, स्वग, द्युलोक; प्रा तप दक दव् (स्त्री लङ्ग)। यह भी अ नय मत शब्द है और वेद म अत्यन्त प्र सद्ध — ‘द्यौः
शा न्तः अन्त रक्षं शा न्तः’ (शा न्तपाठ)।
Page 26 of 44
Page 28
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
बलवत् (strong) अङ् ग — ौ (प.एक. में ौः) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — ु : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — िदव् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — यहाँ दो अङ्ग साफ़ दखते ह — स्वरा द प्रत्यय से पहले दव् ( दवौ, दवः, दवा, द व) और व्यञ्जना द प्रत्यय से पहले
ु (द्युभ्याम्, द्यु भः, द्युभ्यः, द्युषु)। प्रथमा एकवचन ौः वशेष रूप है — इसे अलग से याद करना पड़ता है।
‘व्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः ‘ दव्’ शब्दः — पृष्ठ 192
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा ौः िदवौ िदवः
िद्वतीया िदवम् िदवौ िदवः
तत िदवा भ्ु याम् िु भः
चतुथ िदवे भ्ु याम् भ्ु यः
पञ्चमी िदवः भ्ु याम् भ्ु यः
षष्ठी िदवः िदवोः िदवाम्
स प्तमी िदिव िदवोः षु ु
स म् बोधनम् हे ौः हे िदवौ हे िदवः
‘ दव्’ का ‘ ु’ कैसे बनता है: जब आगे व्यञ्जन आता है तो ‘इ’ का ‘य्’ म प रवतन होकर द् + य् + उ = ु बन
जाता है। इसी से ‘द्युलोक’, ‘द्यु त’ (चमक), ‘द्यौः’ जैसे शब्द बने ह। ध्यान द जए क सप्तमी बहुवचन ुषु है — ‘उ’
के बाद स् का षत्व होकर षु।
ौः नीला दृश्यते। (प्रथमा एक.)
प क्षणः दवम् उ ीयन्ते। ( द्वतीया एक.)
द व ताराः द प्यन्ते। (सप्तमी एक. — अ धकरणे सप्तमी)
ु भः पृ थवी संयुक्ता। (तृतीया बहु.)
प्र सद्ध प्रयोग: ‘ द व’ (आकाश म) और ‘भु व’ (पृथ्वी पर) — यह जोड़ी सुभा षत म बार-बार आती है : ‘न द व
न भु व …’। ‘ दवा’ ( दन म) भी इसी शब्द का तृतीया-रूप है, जो अव्यय क तरह प्रयुक्त होता है।
Page 27 of 44
Page 29
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
४ ‘ दश्’ शब्दः — ‘श्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः (पृष्ठ 192)
अथ — दशा; प्रा तप दक दश् (स्त्री लङ्ग), ‘ दश्’ धातु ( दखाना, संकेत करना) से। ‘ दक्’ रूप से बने शब्द अत्यन्त प्र सद्ध ह —
दग्गज, दक्सूचक, दग्दशन, दगम्बर।
बलवत् (strong) अङ् ग — िदश् (अपिरवितत) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — िदग् / िदक् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — िदश् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — श् भी पद के अन्त म नह टकता — वह कवग म बदलकर ग् या क् हो जाता है। इस लए प्रथमा एकवचन दग्, दक्;
मध्यम अङ्ग दग्- ( दग्भ्याम्, द ग्भः); सप्तमी बहुवचन दक्षु। स्वरा द प्रत्यय से पहले श् बना रहता है — दशौ, दशः, दशा, द श।
‘श्’ कारान्तः स्त्री लङ्गः ‘ दश्’ शब्दः — पृष्ठ 192
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा िदग्, िदक् िदशौ िदशः
िद्वतीया िदशम् िदशौ िदशः
तत िदशा िद ग्भ्याम् िदिग्भः
चतुथ िदशे िद ग्भ्याम् िद ग्भ्यः
पञ्चमी िदशः िद ग्भ्याम् िद ग्भ्यः
षष्ठी िदशः िदशोः िदशाम्
स प्तमी िदिश िदशोः िद ु
स म् बोधनम् हे िदग्, हे िदक् हे िदशौ हे िदशः
‘िद ’ु की िसिद्ध — िदश् + सु → पदान्त श् → क् (वश्च ािद -सत्र
ू तथ ा च त् व) → िदक् + सु → क् के बाद स्
→ ष् (षत्व) → िद ।
ु
इसी से ‘दश िद ’ु (दसों िदशाओं में) जै सा पिसद्ध पयोग बनता है।
पूवा दक् सूय दयस्य दक् अ स्त। (प्रथमा एक.)
सः दशम् पश्य त। ( द्वतीया एक.)
Page 28 of 44
Page 30
as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
a g l AglaSem · NCERT Solutions
दशा ज्ञातया मागः सुलभः। (तृतीया एक.)
co m
em.
as
दक्षु क तः प्रसृता। (सप्तमी बहु.)
m l
.co a g
हे दक्! (सम्बोधन एक. — काव्य म)
a s em
gl के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
aअभ्यास
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।
. com
1. ‘स रत्’ का तृतीया बहुवचन तथा सप्तमी बहुवचन ल खए और भेद का कारण बताइए।
ag
उत्तर — स र ः; स रत्सु। भ् मृदु है (जश्त्व →em
a s
gl ल खए।
द्), स् कठोर है (चत्व → त्)।
2. ‘ वद्युत्’ का चतुथ द्ववचन तथा षष्ठीaबहुवचन
उत्तर — वद्युदभ्् याम्; वद्युताम्।
co m
m.
3. ‘ दव्’ के वे चार रूप ल खए जनम ‘द्यु’ अङ्ग दखता है।
m
उत्तर — द्युभ्याम्, द्यु भः, द्युभ्यः, द्युषु।
as e
4. ‘ दश्.c’ o a g l
m — दक्षु — (१) पदान्त श् → क्, (२) क् के बाद स् → ष् (षत्व)।
eउत्तर
का सप्तमी बहुवचन बनाकर दो चरण म स द्ध ल खए।
a s
a gl 5. रक्त ान भ रए — ______ जलं पब न्त ग्रामवा सनः। (स रत्, षष्ठी एकवचन)
उत्तर — स रतः (स रतः जलम् = नद का जल)।
m a s
m.co agl
l a se
a g
नपुस
ं क लङ्गरूपा ण — ‘त्’ तथा ‘न्’ कारान्तः — जगत्, नामन्, कमन्, चमन् — पृष्ठ 193–194
co m
नपुंसक लङ्गरूपा ण खण्ड का आरम्भ (पृष्ठ 193)
m .
m as e
.co
नपुं स क लङ्गरूपा ण
a g l
a s em
agl १ नपुंसक लङ्ग क तीन पहचान — ता लका दे खने से पहले
se m
com g l a
m . a
ase
agl
नपुंसक लङ्ग क ता लकाएँ पुं लङ्ग-स्त्री लङ्ग से तीन ही बात म भन्न होती ह। ये तीन बात जान लेने पर आगे क दस ता लकाएँ बहुत
सरल हो जाती ह।
co m
.
पहचान नयम उदाहरण
m
se जगत् / जगत्, कम / कम, मनः / मनः
m l a
.co ag
१. पथमा = िद्वतीया तीनों वचनों में पथमा और िद्वतीया के रूप सवथा समान रहते है ं
a s em २. िद्ववचन में ‘ई’
gl
िद्ववचन में ‘औ ’ के स्थान पर ‘ई’ (शी आदे श) आता है
a
जगती, कम णी, मनसी, च षु ी
.c
३. बहुवचन में नुम ् + बहुवचन में ‘नुम ्’ आगम जुड़ता है और उससे पहले का स्वर दीघ हो जगिन्त, नामािन, कम िण, मनांिस ,
s e m
m a
.co agl
दीघ जाता है च ूंिष
se m
g l a
a
co m
m .
m as e
.co
a g l Page 29 of 44
Page 31
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
‘मनां स’ और ‘जग न्त’ म एक ही नयम कैसे: दोन म नुम् जुड़ा है। ‘जगत्’ म वह पूरा न् बनकर दखता है (जग
+ न् + त), और ‘मनस्’ म अनुस्वार बनकर (मन + ◌ां + स), क्य क उसके आगे स् है — अनुस्वार-स से न् →
◌ं हो गया। ‘कमा ण’ म न् का णत्व होकर ण् हो गया, क्य क उससे पहले र् है।
वाक्य म उपयोग: चूँ क प्रथमा और द्वतीया एक जैसी ह, वाक्य म कता-कम का नणय क्रया तथा अथ से करना
पड़ता है — ‘कम फल त’ (कम फलता है — प्रथमा) पर ‘कम करो त’ (कम करता है — द्वतीया)।
२ ‘जगत्’ शब्दः — ‘त्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् (पृष्ठ 193)
अथ — संसार, वश्व; व्युत्प त्त गम् धातु से — ‘जो चलता रहे’। प्रा तप दक जगत् (नपुंसक लङ्ग)। ‘जगन्नाथ’, ‘जगद श’, ‘जग रु’
शब्द इसी से बने ह।
बलवत् (strong) अङ् ग — जगन्त् (बहुवचन में नुम् — जगिन्त) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-
िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — जगद् / जगत् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — जगत् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — प्रथमा- द्वतीया एकवचन म दो रूप — जगद्, जगत् (जश्त्व/चत्व); द्ववचन जगती; बहुवचन जग न्त (नुम्)। मध्यम
अङ्ग जगद्- (जगद्भ्याम्, जग ः, जगद्भ्यः), कन्तु ‘सु’ से पहले जगत्सु।
‘त्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् ‘जगत्’ शब्दः — पृष्ठ 193
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा जगद् , जगत् जगती जगिन्त
िद्वतीया जगद् , जगत् जगती जगिन्त
तत जगता जगद् भ्याम् जगिद् भः
चतुथ जगते जगद् भ्याम् जगद् भ्यः
पञ्चमी जगतः जगद् भ्याम् जगद् भ्यः
षष्ठी जगतः जगतोः जगताम्
स प्तमी जगित जगतोः जग त्स ु
स म् बोधनम् हे जगद् , हे जगत् हे जगती हे जगिन्त
Page 30 of 44
Page 32
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
‘जग न्त’ म न् कहाँ से आया: नपुंसक बहुवचन म ‘जस्/शस्’ के ान पर ‘ श’ आदे श होता है और अङ्ग को नुम्
आगम मलता है — जगत् + नुम् + इ → जग + न् + त → जग न्त। ‘त्’ के पहले न् आने से ‘ न्त’ बना। यही नुम्
नामन् → नामा न, कमन् → कमा ण म भी दखता है।
जगत् प रवतनशीलम् अ स्त। (प्रथमा एक.)
ईश्वरः जगत् रक्ष त। ( द्वतीया एक. — रूप वही, अथ कम का)
जगता सह वयं सम्बद्धाः। (तृतीया एक.)
जगतः कल्याणं भवतु। (षष्ठी एक.)
जगत्सु शा न्तः प्रसरतु। (सप्तमी बहु.)
समास म दोन रूप: जग रु, जगद श, जगद्ब ु (मृदु के आगे द्); जग त्पता, जगत्कता, जगत्त्रय (कठोर के आगे
त्)।
३ ‘नामन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् (पृष्ठ 193)
अथ — नाम, संज्ञा; प्रा तप दक नामन् (नपुंसक लङ्ग)। हन्द का ‘नाम’ तथा अंग्रेज़ी का name — दोन इसी भारोपीय मूल के ह।
बलवत् (strong) अङ् ग — नामन् (बहुवचन में दीघ + नुम् — नामािन) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया
एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — नाम : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — नाम्न् / नामन् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — प्रथमा- द्वतीया एकवचन म न् गरकर केवल नाम बचता है। दुबल अङ्ग म ‘अ’ लुप्त होकर नाम्न् बनता है — नाम्ना,
नाम्ने, नाम्नः, नाम्नाम्। व्यञ्जना द प्रत्यय से पहले नाम- (नामभ्याम्, नाम भः, नामसु)।
Page 31 of 44
Page 33
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
‘न्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् ‘नामन्’ शब्दः — पृष्ठ 193
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा नाम नाम्नी, नामनी नामािन
िद्वतीया नाम नाम्नी, नामनी नामािन
तत नाम्ना नाम भ्याम् नामिभः
चतुथ नाम्ने नाम भ्याम् नाम भ्यः
पञ्चमी नाम्नः नाम भ्याम् नाम भ्यः
षष्ठी नाम्नः नाम्नोः नाम्नाम्
स प्तमी नािम्न, नामिन नाम्नोः नामसु
स म् बोधनम् हे नामन्, हे नाम हे नाम्नी, हे नामनी हे नामािन
दो-दो रूप क्य छपे ह: द्ववचन म नाम्नी तथा नामनी — दोन शुद्ध ह; अ न्तम ‘अ’ का लोप ऐ च्छक है। इसी
प्रकार सप्तमी एकवचन म ना म्न और नाम न दोन चलते ह। ध्यान द जए क कमन्/चमन् म पुस्तक ऐसा वकल्प
नह दे ती — वहाँ केवल कमणी, कम ण छपा है, क्य क उनम र् के कारण णत्व हो जाता है और परम्परा म वही रूप
प्रच लत है।
तस्य नाम रामः अ स्त। (प्रथमा एक.)
नाम्ना सः प्र सद्धः। (तृतीया एक. — ‘नाम से’)
ग्रामस्य नाम्नः इ तहासः रोचकः। (षष्ठी एक.)
पुस्तके बहू न नामा न ल खता न। ( द्वतीया बहु.)
हे नामन्! (सम्बोधन एक. — काव्य म)
४ ‘कमन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् (पृष्ठ 194)
अथ — कम, काय, कृत्य; प्रा तप दक कमन् (नपुंसक लङ्ग), कृ धातु से ‘म नन्’ प्रत्यय द्वारा नष्पन्न। गीता का प्र सद्ध वाक्य
‘कमण्येवा धकारस्ते’ इसी शब्द का सप्तमी एकवचन (कम ण) है।
Page 32 of 44
Page 34
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
बलवत् (strong) अङ् ग — कमन् (बहवु चन में दीघ + नुम् — कम िण) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया
एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — कम : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — कमण् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
पहचान — प्रथमा- द्वतीया एकवचन कम; द्ववचन कमणी; बहुवचन कमा ण। दुबल अङ्ग म न् का ण् हो जाता है — कमणा,
कमणे, कमणः, कम ण, कमणोः, कमणाम्। यह णत्व र् के कारण है (रषाभ्यां नो णः)।
‘न्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् ‘कमन्’ शब्दः — पृष्ठ 194
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा कम कम णी कम िण
िद्वतीया कम कम णी कम िण
तत कम णा कम भ्याम् कम िभः
चतुथ कम णे कम भ्याम् कम भ्यः
पञ्चमी कम णः कम भ्याम् कम भ्यः
षष्ठी कम णः कम णोः कम णाम्
स प्तमी कम िण कम णोः कम सु
स म् बोधनम् हे कम न्, हे कम हे कम णी हे कम िण
सप्तमी एकवचन ‘कम ण’ का महत्त्व: यही वह रूप है जो व्याकरण म सवत्र दखता है — ‘कम ण द्वतीया’ (कम
म द्वतीया वभ क्त), ‘कम ण वाच्य’ (passive voice), ‘कमण्येवा धकारस्ते’। ध्यान द जए क यह प्रथमा
बहुवचन ‘कमा ण’ से भन्न है — एक म ‘ ण’ ह्रस्व है, दूसरे म ‘मा ण’ म द घ आ। दोन को मलाना सबसे सामान्य
भूल है।
कम फलं ददा त। (प्रथमा एक.)
कमणा जायते महान्। (तृतीया एक. — प्र सद्ध सू क्त)
कमणे सम पतः जीवनम्। (चतुथ एक.)
शुभा न कमा ण कुरुत। ( द्वतीया बहु.)
कमसु कौशलं योगः। (सप्तमी बहु. — ‘योगः कमसु कौशलम्’, गीता)
Page 33 of 44
Page 35
as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
a g l AglaSem · NCERT Solutions
co m
m.
‘चमन्’ शब्दः — ‘न्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् (पृष्ठ 194)
e
५
m l as
.co a g
a
s em
a l चमड़ा, खाल; प्रा तप दक चमन् (नपुंसक लङ्ग)। हन्द का ‘चमड़ा’, ‘चमकार’ इसी से ह।
अथg—
co m
. ag
बलवत् (strong) अङ् ग — चमन् (बहुवचन में दीघ + नुम् — चम िण) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया एकवचन-
e m
िद्ववचन
g l as
a
मध्यम अङ् ग — चम : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
co m
m.
दुबल (weak) अङ् ग — चमण् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
o m l a se
g , चम भः, चमसु)। पुस्तक ने
c का ठ क जुड़वाँ — चम, चमणी, चमा ण; दुबल अङ्ग चमण्; मध्यम चम-a(चमभ्याम्
पहचान — .कमन्
m
e चमन् को एक ही पृष्ठ पर रखकर यह जँचवाया है क साँचा पहचान म आ गया या नह ।
कमन्sऔर
l a
ag
s
‘न्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् ‘चमन्’ शब्दः — पृष्ठ 194
m a
m .co agl
ase
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा चम agl चम णी चम िण
co m
.
िद्वतीया चम चम णी चम िण
m
e चमिभः
m l as
.co
चम भ्याम्
g
तत चम णा
eचतुmथ a
a s चम भ्याम् चम भ्यः
gl
चम णे
a चम भ्याम् चम भ्यः
se m
पञ्चमी चम णः
com g l a
m. a
षष्ठी चम णः चम णोः चम णाम्
ase
agl
स प्तमी चम िण चम णोः चम सु
m
स म् बोधनम् हे चम न्, हे चम हे चम णी हे चम िण
. co
em
m l as
.co a g
यही साँचा, और शब्द: वमन् (कवच) → वम, वमणी, वमा ण; जन्मन् → जन्म, जन्मनी, जन्मा न; वेश्मन् (घर) →
a s em वेश्म, वेश्मनी, वेश्मा न। जनम र् या ष् पहले हो उन्ह म न् का ण् होता है (वमणा, चमणा), शेष म न् ही रहता है
agl (जन्मना)।
.c
s e m
m a
.co agl
गजस्य चम ूलम् अ स्त। (प्रथमा एक.)m
l
चमणा पादत्राणा न नम यन्ते।g(तृ aीयाseएक.)
a त
चमणः मूल्यम् अ धकम्। (षष्ठी एक.)
co m
m .
m ase
.co
a g l Page 34 of 44
Page 36
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
शल्पी चमा ण संस्करो त। ( द्वतीया बहु.)
अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।
1. ‘जगत्’ का प्रथमा बहुवचन तथा तृतीया बहुवचन ल खए।
उत्तर — जग न्त; जग ः।
2. ‘कमन्’ के सप्तमी एकवचन तथा प्रथमा बहुवचन म क्या अन्तर है?
उत्तर — सप्तमी एकवचन कम ण (ह्रस्व), प्रथमा बहुवचन कमा ण (द घ आ तथा नुम्)।
3. ‘नामन्’ के प्रथमा द्ववचन के दोन शुद्ध रूप ल खए।
उत्तर — नाम्नी, नामनी।
4. ‘चमन्’ का चतुथ एकवचन तथा सप्तमी बहुवचन ल खए।
उत्तर — चमणे; चमसु।
5. ‘वमन्’ शब्द को चमन् के साँचे पर चलाकर तृतीया एकवचन तथा प्रथमा बहुवचन ल खए।
उत्तर — वमणा; वमा ण।
6. नपुंसक लङ्ग क तीन पहचान एक-एक वाक्य म ल खए।
उत्तर — (१) प्रथमा तथा द्वतीया के रूप समान; (२) द्ववचन म ‘ई’; (३) बहुवचन म नुम् आगम तथा पूव स्वर
का द घ।
नपुस
ं क लङ्गरूपा ण — ‘स्’ तथा ‘ष्’ कारान्तः — मनस्, तपस्, पयस्, शरस्, छन्दस्, चक्षुष् — पृष्ठ
195–197
प र शष्ट क अ न्तम छह शब्दरूप-ता लकाएँ
नपुं स क लङ्गरूपा ण
१ ‘मनस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् (पृष्ठ 195)
अथ — मन, चत्त; प्रा तप दक मनस् (नपुंसक लङ्ग)। यह ‘अस्’-अन्त नपुंसक शब्द का आदश साँचा है — तपस्, पयस्, शरस्,
छन्दस्, यशस्, वचस्, तेजस्, ओजस्, वयस्, नभस्, अम्बरस् — सब इसी पर चलते ह। इसी लए पुस्तक ने इसे नपुंसक ‘स्’ खण्ड म
सबसे पहले रखा है।
बलवत् (strong) अङ् ग — मनास् (बहुवचन में मनांिस — दीघ + नुम्) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया
एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — मनो : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — मनस् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
Page 35 of 44
Page 37
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
पहचान — तीन बात ही याद रखनी ह :
(१ ) पथमा-िद्वतीया एकवचन में स् → िवसग : मनः
(२ ) भ्याम्, िभस्, भ्यस् से पहले ‘अस्’ → ओ : मनोभ्याम्, मनोिभः, मनोभ्यः
(३ ) बहुवचन में नुम् + दीघ : मनांिस · शेष सवत्र ‘मनस्’ ज्यों-का-त्यों : मनसा, मनसे, मनसः, मनिस
‘स्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् ‘मनस्’ शब्दः — पृष्ठ 195
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा मनः मनसी मनांिस
िद्वतीया मनः मनसी मनािं स
तत मनसा मनोभ्याम् मनोिभः
चतुथ मनसे मनोभ्याम् मनोभ्यः
पञ्चमी मनसः मनोभ्याम् मनोभ्यः
षष्ठी मनसः मनसोः मनसाम्
स प्तमी मनिस मनसोः मनःसु, मनस्सु
स म् बोधनम् हे मनः हे मनसी हे मनांिस
सप्तमी बहुवचन म दो रूप: मनस् + सु म दो स् आमने-सामने आ जाते ह। पहला स् वसग बन सकता है (मनःसु)
या ज्य -का-त्य रह सकता है (मनस्सु) — दोन शुद्ध ह, और पुस्तक दोन छापती है। तपस्, पयस्, शरस्, छन्दस् म
भी यही वकल्प मलेगा।
मनः चञ्चलम् अ स्त। (प्रथमा एक. — गीता का प्र सद्ध कथन)
मनसा ध्यायेत्। (तृतीया एक. — करणे तृतीया)
मनसः शा न्तः सुखस्य मूलम्। (षष्ठी एक.)
तेषां मनां स प्रसन्ना न। (प्रथमा बहु.)
मनःसु स ावः वसतु। (सप्तमी बहु.)
‘ओ’ वाला अङ्ग समास म: मनोरथ, मनोहर, मनोबल, मनो वज्ञान — सब ‘मनस् + …’ ह, जहाँ स् का ओ हो
गया। इसी तरह तपोवन, पयोधर, यशोगान, तेजोमय, शरोम ण। समास पहचानते ही मूल शब्द ‘अस्’-अन्त है, यह
अपने-आप पता चल जाता है।
Page 36 of 44
Page 38
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
२ ‘तपस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् (पृष्ठ 195)
अथ — तप, तपस्या, साधना; प्रा तप दक तपस् (नपुंसक लङ्ग), तप् धातु से। ‘तपस्वी’, ‘तपोवन’, ‘तपोबल’ इसी से बने ह।
पहचान — मनस् का ठ क जुड़वाँ : तपः (प्र./ द्व. एक.), तपसी ( द्व.), तपां स (बहु.), मध्यम अङ्ग तपो- (तपोभ्याम्, तपो भः,
तपोभ्यः), सप्तमी बहुवचन तपःसु, तपस्सु।
‘स्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् ‘तपस्’ शब्दः — पृष्ठ 195
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा तपः तपसी तपांिस
िद्वतीया तपः तपसी तपांिस
तत तपसा तपोभ्याम् तपोिभः
चतुथ तपसे तपोभ्याम् तपोभ्यः
पञ्चमी तपसः तपोभ्याम् तपोभ्यः
षष्ठी तपसः तपसोः तपसाम्
स प्तमी तपिस तपसोः तपःसु, तपस्सु
स म् बोधनम् हे तपः हे तपसी हे तपांिस
‘तपः’ और ‘तपसी’ म स् कहाँ गया: प्रथमा एकवचन म ‘सु’ लुप्त होने पर पदान्त स् वसग बन जाता है — तपस्
→ तपः। कन्तु द्ववचन म आगे ‘ई’ स्वर है, इस लए स् पद के अन्त म नह पड़ता और बचा रह जाता है — तपसी।
यही कारण है क तपसा, तपसे, तप स म भी स् दखता है।
तपः सव सद्ध नां मूलम्। (प्रथमा एक.)
ऋ षः तपसा स द्धम् अलभत। (तृतीया एक.)
तपसे वनं गतः। (चतुथ एक. — तादथ्य चतुथ )
तेषां तपां स महा न्त। (प्रथमा बहु.)
Page 37 of 44
Page 39
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
३ ‘पयस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् (पृष्ठ 196)
अथ — दूध; जल भी। प्रा तप दक पयस् (नपुंसक लङ्ग)। ‘पयोधर’ (बादल), ‘पयो ध’ (समुद्र), ‘क्षीर-नीर’ के ान पर ‘पयः’ —
काव्य म बहुप्रयुक्त।
पहचान — वही ‘अस्’ साँचा : पयः, पयसी, पयां स; मध्यम अङ्ग पयो-; सप्तमी बहुवचन पयःसु, पयस्सु।
‘स्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् ‘पयस्’ शब्दः — पृष्ठ 196
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा पयः पयसी पयांिस
िद्वतीया पयः पयसी पयांिस
तत पयसा पयोभ्याम् पयोिभः
चतुथ पयसे पयोभ्याम् पयोभ्यः
पञ्चमी पयसः पयोभ्याम् पयोभ्यः
षष्ठी पयसः पयसोः पयसाम्
स प्तमी पयिस पयसोः पयःसु, पयस्सु
स म् बोधनम् हे पयः हे पयसी हे पयांिस
अथ क दो धाराएँ: ‘पयः’ का अथ दूध भी है और जल भी — सन्दभ से तय होता है। ‘पयोधर’ = जल धारण करने
वाला (बादल); ‘पयःपानम्’ = दुग्धपान। परीक्षा म अनुवाद करते समय वाक्य का सन्दभ दे खकर अथ चु नए।
धेनुः पयः ददा त। ( द्वतीया एक. — कम)
शशुः पयसा पुष्य त। (तृतीया एक.)
पयसः वणः श्वेतः। (षष्ठी एक.)
घटे षु पयां स स न्त। (प्रथमा बहु.)
४ ‘ शरस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् (पृष्ठ 196)
अथ — सर, मस्तक; प्रा तप दक शरस् (नपुंसक लङ्ग)। ‘ शरोम ण’, ‘ शरोधाय’, ‘ शरोवेदना’ इसी से।
पहचान — शरः, शरसी, शरां स; मध्यम अङ्ग शरो- ( शरोभ्याम्, शरो भः, शरोभ्यः); सप्तमी बहुवचन शरःसु, शरस्सु।
Page 38 of 44
Page 40
as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
a g l AglaSem · NCERT Solutions
co m
m.
‘स्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् ‘ शरस्’ शब्दः — पृष्ठ 196
m as e
वभ क्तः
.co
एकवचनम् द्ववचनम्
a g l
बहुवचनम्
se m
g l a
a
पथमा िशरः िशरसी िशरांिस
िद्वतीया िशरः िशरसी िशरािं स
. coिशरोmभ्याम् ag
e m
as
तत िशरसा िशरोिभः
चतुथ िशरसे
a g l िशरोभ्याम् िशरोभ्यः
िशरोभ्याम् िशरोभ्यः
m
.co
पञ्चमी िशरसः
se m
com l a
षष्ठी िशरसः िशरसोः िशरसाम्
m . ag
ase
िशरःसु, िशर स्सु
aglसम्बोधनम्
स प्तमी िशरिस िशरसोः
हे िशरः हे िशरसी हे िशरांिस
m a s
‘ शरसा’ का वशेष प्रयोग: तृतीया एकवचन ‘m
e
. c o agl
s
शरसा’ ‘ सर से’ के अथ म आता है और आदर-सूचक वाक्य म
a gla( सर पर धारण करता हूँ), ‘ शरसा प्रणमा म’। यह करणे तृतीया का
जमकर प्रयुक्त होता है — ‘ शरसा वहा म’
उत्तम उदाहरण है।
co m
m .
e
m l as
.co
शरः उन्नतं धारय। ( द्वतीया एक.)
a g
a s em
gl शर स मुकुटः शोभते। (सप्तमी एक.)
गुरुम् शरसा प्रणमा म। (तृतीया एक.)
a
वीराणां शरां स उन्नता न। (प्रथमा बहु.)
se m
com g l a
m . a
ase
५ agl
‘छन्दस्’ शब्दः — ‘स्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् (पृष्ठ 197)
co m
m .
as e
com शब्द इसी से बने ह। g l
अथ — छन्द (पद्य का माप); वेद भी। प्रा तप दक छन्दस् (नपुंसक लङ्ग)। ‘छन्दःशास्त्र’ वेदाङ्ग म से एक है, और ‘छन्दोबद्ध’,
. a
sem
‘छन्दोमय’
a
agl
पहचान — छन्दः, छन्दसी, छन्दां स; मध्यम अङ्ग छन्दो- (छन्दोभ्याम्, छन्दो भः, छन्दोभ्यः); सप्तमी बहुवचन छन्दःसु, छन्दस्सु।
.c
s e m
m a
e m . co agl
g l as
a
co m
m .
m ase
.co
a g l Page 39 of 44
Page 41
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
‘स्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् ‘छन्दस्’ शब्दः — पृष्ठ 197
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा छन्दः छन्दसी छन्दांिस
िद्वतीया छन्दः छन्दसी छन्दािं स
तत छन्दसा छन्दोभ्याम् छन्दोिभः
चतुथ छन्दसे छन्दोभ्याम् छन्दोभ्यः
पञ्चमी छन्दसः छन्दोभ्याम् छन्दोभ्यः
षष्ठी छन्दसः छन्दसोः छन्दसाम्
स प्तमी छन्दिस छन्दसोः छन्दःसु, छन्द स्सु
स म् बोधनम् हे छन्दः हे छन्दसी हे छन्दांिस
पाठ से जो ड़ए: कक्षा ९ म ही आपने अनुष्टुप्, इन्द्रव ा, उपजा त आ द छन्द के नाम सुने ह। वे सब ‘छन्दां स’ ह।
वेद के लए भी ‘छन्दः’ शब्द आता है — ‘छन्दो भः स्तुतः दे वः’ अथात् वेदमन्त्र से स्तुत।
अनुष्टुप् प्र सद्धं छन्दः अ स्त। (प्रथमा एक.)
क वः छन्दसा काव्यं रचय त। (तृतीया एक.)
छन्दसः ज्ञानं काव्याथ आवश्यकम्। (षष्ठी एक.)
संस्कृतकाव्ये बहू न छन्दां स प्रयुक्ता न। (प्रथमा बहु.)
६ ‘चक्षुष्’ शब्दः — ‘ष्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् (पृष्ठ 197)
अथ — आँख, नेत्र; प्रा तप दक पुस्तक म चक्षुष् लखा है (मूल चक्षुस् — ‘उस्’-अन्त, जसका स् उकार के बाद षत्व से ष् हो
जाता है)। इसी साँचे पर धनुष् (धनुस्), ह वष् (ह वस्), आयुष् (आयुस्), ज्यो तष् (ज्यो तस्) चलते ह।
बलवत् (strong) अङ् ग — च ंषू ् (बहुवचन में च ंिू ष — दीघ ऊ + नुम्) : पथमा तीनों वचन + िद्वतीया
एकवचन-िद्ववचन
मध्यम अङ् ग — च रु ् : भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु (व्यञ्जनािद पत्यय) से पहले
दुबल (weak) अङ् ग — च षु ् : शेष सब स्वरािद पत्ययों से पहले
Page 40 of 44
Page 42
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
पहचान — तीन वशेषताएँ जो इसे ‘मनस्’ से अलग करती ह :
(१ ) पथमा एकवचन में िवसग तो बनता है, पर स्वर ‘उ’ है : च ःु (मनः के ‘अ’ के स्थान पर)
(२ ) मध्यम अङ् ग में ‘ओ’ नही ं, ‘उर्’ बनता है : च भ्ु य म्, च ुिभ ः , च भ्ु यः — क्योंिक उ के बाद रुत्व का र् गुण
नही ं करता, वैसा ही रह जाता है
(३ ) बहुवचन में ‘उ’ दीघ होकर ऊ : च ंिू ष (मनांिस के समान न्, पर स्वर ऊ)
‘ष्’ कारान्तः नपुंसक लङ्गम् ‘चक्षुष्’ शब्दः — पृष्ठ 197
वभ क्तः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्
पथमा च ःु च षु ी च ूंिष
िद्वतीया च ःु च षु ी च ूंिष
तत च षु ा च भ्ु य म् च िु भः
चतुथ च षु े च भ्ु य म् च भ्ु यः
पञ्चमी च षु ः च भ्ु य म् च भ्ु यः
षष्ठी च षु ः च षु ोः च षु ाम्
स प्तमी च िु ष च षु ोः च ःु षु, च ष्ु ष ु
स म् बोधनम् हे च ःु हे च षु ी हे च ूंिष
स् का ष् क्य : ‘इण्कोः’ नयम से — इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ तथा कवग के बाद आने वाला स् प्रायः ष् हो जाता है।
‘चक्षुस्’ म उ के बाद स् है, इस लए चक्षुष् — और इसी से चक्षुषा, चक्षुषी, चक्षुषः बनते ह। पुस्तक ने ता लका का
शीषक भी इसी बदले हुए रूप ‘चक्षुष्’ से दया है; मूल प्रा तप दक तो चक्षुस् ही है। सप्तमी बहुवचन म दोन रूप
छपे ह — चक्षुःषु तथा चक्षुष्षु।
चक्षुः ज्ञानस्य द्वारम्। (प्रथमा एक.)
चक्षुषा रूपं पश्यामः। (तृतीया एक. — करणे तृतीया)
तस्य चक्षुषी नमले स्तः। (प्रथमा द्व. — दो आँख के लए द्ववचन)
सवषां चक्षूं ष तत्र लग्ना न। (प्रथमा बहु.)
चक्षुभ्याम् जगत् पश्यामः। (तृतीया द्व.)
यही साँचा, और शब्द: धनुष् → धनुः, धनुषी, धनूं ष; धनुषा, धनुभ्याम्, धनु भः, धनुःषु/धनुष्षु। आयुष् → आयुः,
आयुषी, आयूं ष। ह वष् → ह वः, ह वषी, हव ष (यहाँ इ के कारण ‘इर्’ — ह व भः)।
Page 41 of 44
Page 43
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ४ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।
1. ‘मनस्’ का तृतीया बहुवचन तथा सप्तमी बहुवचन (दोन रूप) ल खए।
उत्तर — मनो भः; मनःसु, मनस्सु।
2. ‘तपस्’ का प्रथमा बहुवचन तथा चतुथ द्ववचन ल खए।
उत्तर — तपां स; तपोभ्याम्।
3. ‘चक्षुष्’ का तृतीया द्ववचन ‘मनस्’ के तृतीया द्ववचन से कस बात म भन्न है?
उत्तर — मनस् म ‘ओ’ बनता है — मनोभ्याम्; चक्षुष् म ‘उर्’ — चक्षुभ्याम्, क्य क उकार के बाद रुत्व का र्
गुण नह करता।
4. ‘ शरस्’ का सप्तमी एकवचन तथा ‘छन्दस्’ का प्रथमा बहुवचन ल खए।
उत्तर — शर स; छन्दां स।
5. ‘धनुष्’ शब्द को चक्षुष् के साँचे पर चलाकर प्रथमा बहुवचन तथा तृतीया बहुवचन ल खए।
उत्तर — धनूं ष; धनु भः।
6. बताइए — ‘मनोरथ’, ‘तपोवन’, ‘ शरोम ण’ म ‘ओ’ कहाँ से आया?
उत्तर — अस्-अन्त शब्द के स् का रुत्व (स् → र्), फर उत्व (र् → उ), फर अ + उ = ओ (गुण)।
7. ‘पयस्’ का षष्ठी बहुवचन तथा ‘मनस्’ का पञ्चमी बहुवचन ल खए।
उत्तर — पयसाम्; मनोभ्यः।
अध्याय — एक नज़र म
यह क्या है — ‘शब्दरूपा ण’ शारदा का चौथा प र शष्ट है (पृष्ठ 184–198)। प र शष्ट पाठ नह होता — उसम न ोक होते
ह, न कथा, न अभ्यासाद् जायते स द्धः जैसा प्रश्न-खण्ड। यहाँ केवल सुबन्त रूप क ता लकाएँ ह, जन्ह दे खकर छात्र
अपना लखा हुआ रूप मलाता है।
केवल हलन्त शब्द — बड़ी बात यह है क यह प र शष्ट अजन्त (स्वरान्त) शब्द जैसे बालक, लता, मु न, साधु, पतृ नह
दे ता। वे कक्षा ६–८ म आ चुके ह। यहाँ केवल व्यञ्जनान्त/हलन्त शब्द ह — न्, स्, द्, ज्, च्, त्, व्, श्, ष् म समाप्त होने
वाले — क्य क इन्ह म वद्याथ सबसे अ धक भूल करता है।
पुस्तक का क्रम — पहले पुं लङ्गशब्दाः (पृष्ठ 184–188, दस शब्द), फर स्त्री लङ्गरूपा ण (पृष्ठ 189–192, आठ शब्द),
फर नपुंसक लङ्गरूपा ण (पृष्ठ 193–197, दस शब्द), और अन्त म पृष्ठ 198 पर सुप्-प्रत्ययाः क ता लका। हर ता लका म
सात वभ क्तयाँ तथा सम्बोधन × तीन वचन — कुल चौबीस खाने।
तीन अङ्ग का सद्धान्त — हलन्त शब्द का रूप याद करने का सूत्र यह है क उसका अङ्ग तीन तरह का होता है — बलवत्
(प्रथमा के तीन वचन तथा द्वतीया के एकवचन- द्ववचन म, जैसे ब्रह्माण्, वद्वांस्, पुमांस्), मध्यम (भ्याम्, भस्, भ्यस्, सु से
पहले, जैसे ब्रह्म-, वद्वद्-, जगद्-) और दुबल (शेष स्वरा द प्रत्यय से पहले, जैसे ब्रह्मण्, वदुष्, जगत्-)। यही एक वचार
अ ाईस म से चौबीस ता लकाओं को समझा दे ता है।
पदान्त-प रवतन — जहाँ शब्द वाक्य म अकेला पड़ता है (प्रथमा एकवचन, सम्बोधन) वहाँ अ न्तम व्यञ्जन जश्त्व/चत्व से
बदलता है — वाच् → वाग्/वाक्, सुहृद् → सुहृद्/सुहृत्, दश् → दग्/ दक्, स्रज् → स्रग्/स्रक्। इसी लए ता लका म वहाँ दो-
दो रूप छपे ह; दोन शुद्ध ह।
Page 42 of 44
Page 44
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions
सप्तमी बहुवचन क चतुराई — ‘सु’ प्रत्यय जोड़ते समय अ न्तम व्यञ्जन कठोर हो जाता है और स् प्रायः ष् बन जाता है :
वाच् + सु = वाक्षु, दश् + सु = दक्षु, स रत् + सु = स रत्सु, वद्वस् + सु = वद्वत्सु। अस्-अन्त शब्द म वसग वाला और स्
वाला — दोन रूप चलते ह : मनःसु / मनस्सु।
अस्-अन्त शब्द का ओ — मनस्, तपस्, पयस्, शरस्, छन्दस्, चन्द्रमस्, वेधस् जैसे शब्द म भ्याम्, भस्, भ्यस् से पहले
‘अस्’ का ‘ओ’ हो जाता है (रुत्व-उत्व-गुण) — मनो भः, तपोभ्यः, शरोभ्याम्, चन्द्रमो भः। यही नयम ‘मनोरथ’, ‘तपोवन’,
‘पयोधर’ जैसे समस्तपद म भी दखता है।
नपुंसक लङ्ग क पहचान — नपुंसक म प्रथमा और द्वतीया के रूप सदा समान रहते ह, द्ववचन म ‘ई’ (जगती, कमणी,
मनसी) और बहुवचन म नुम् आगम + द घ (जग न्त, कमा ण, मनां स, चक्षूं ष)। यह पहचान परीक्षा म लङ्ग बताने के काम
आती है।
इसका उपयोग कैसे कर — रूप रटने के बजाय पहले शब्द का अ न्तम वण दे खए, फर उसका लङ्ग, फर उसे नीचे क
कसी ता लका के साँचे से मलाइए — जैसे ‘शरद्’ को स रत् से, ‘मरुत्’ को वद्युत् से, ‘यशस्’ को तपस् से, ‘आत्मन्’ को
ब्रह्मन् से, ‘वेधस्’ को चन्द्रमस् से। एक साँचा सीखकर दस शब्द बन जाते ह।
Page 43 of 44
Page 45
as e
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 15 प र शष्टम् ४ — शब्दरूपा ण
a g l AglaSem · NCERT Solutions
co m
m.
त्व रत पुनरावृ त्त
a s e
om
.cअथ a g l
m
ase
पद उदाहरण टप्पणी
agl
सुबन्त सुप ् पत्यय लगने पर बना पद; वाक्य में पयोग- बालकः, ब्रह्मणा, वा च केवल प्रा तप दक (ब्रह्मन्, वाच्) वाक्य म
नह आ सकता
योग्य शब्द
. om, वाच्, मनस्
cब्रह्मन् ag
e m
प्रा तप दक अथवान् मूल शब्द, पत्यय लगने से पहले का रूप ता लका के शीषक म यही रूप छपा है
g l as
वभ क्तः सात कारक-सूचक पत्यय-समूह (पथमा से
सप्तमी)
a कत र प्रथमा, कम ण
द्वतीया
पुस्तक सम्बोधन को आठव पं क्त म अलग
रखती है
co m
m.
वचनम् संख्या — एक, दो, बहुत एकवचनम्, द्ववचनम्, संस्कृत म द्ववचन अ नवाय है, हन्द म नह
as e
com l
बहुवचनम्
. a g
m
ase
सुप्-प्रत्ययाः सु, औ, जस्… से ले क र सुप ् तक इक्कीस सु + ब्रह्मन् → ब्रह्मा पृष्ठ 198 क अ न्तम ता लका इन्ह क है
agl
पत्यय
a s
हलन्त/ वाच्, सुहृद्, मनस् यह पूरा प र शष्ट इन्ह शब्द का है
m
िजसका अिन्तम वण व्यञ्जन हो
.co agl
व्यञ्जनान्त
se m
बलवत् अङ्गम्
g l
ु /वृिद्ध/नुम ् वाला) अङ् ग a ब्रह्माण्, वद्वांस्, पुमांस् प्रथमा तीन वचन + द्वतीया एक./ द्व.
a
लम्बा (ग ण
मध्यमम् अङ्गम् व्यञ्जनािद पत्यय (भ्याम्, िभस्, भ्यस्, सु) से ब्रह्म-, वद्वद्-, जगद्- यह जश्त्व दखता है
co m
.
पहले का अङ् ग
e m
m l as
.co g
दुबलम् अङ्गम् स्वरािद पत्ययों से पहले का छोटा अङ् ग ब्रह्मण्, वदुष्, पथ् द्वतीया बहुवचन से आगे प्रायः यही
m a
l a se
जश्त्वम् पदान्त कठोर व्यञ्जन का म ृद ु (ततृ ीय) वण हो वाच् → वाग्, सुहृद् म द् झलां जशोऽन्ते
ag जाना
se m
com सुहृत् l a
चत्वम् पदान्त व्यञ्जन का कठोर (पथम) वण हो जाना वाच् → वाक्, सुहृद् → ख र च — इसी से दो-दो रूप छपते ह
. a g
a s em
agl
णत्वम् र्/ष् के बाद न् का ण् हो जाना ब्रह्मणा, कम ण, चमा ण रषाभ्यां नो णः
m
नुम् आगमः नपुंस क बहवु चन तथा कु छ रूपों में जुड़ने वाला जग न्त, नामा न, मनां स नपुंसकस्य झलचः
न्/ ◌ं
. co
m
seतपोवन, पयोधर म भी यही
m l a
.co ag
रुत्वम्-उत्वम् अस् के स् का र् और िफर उ होकर ‘ओ’ बनना मनस् + भस् → मनो भः
s m
eषत्वम्
gl a वाच् + सु → वाक्षु, दक्षु सप्तमी बहुवचन म सवा धक दखता है
a
इण्/कु के बाद स् का ष् होना
.c
s e m
m a
e m . co agl
g l as
a
co m
m .
m as e
.co
a g l Page 44 of 44