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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Parishisht 5 धातुरूपाणि

AglaSem पर कक्षा 9 संस्कृत परिशिष्ट 5 धातुरूपाणि (शारदा) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Sanskrit Appendix 5 (Sharada).
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About NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Parishisht 5 धातुरूपाणि

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NCERT Solutions Class 9 Sanskrit Parishisht 5 धातुरूपाणि – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा9

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 16: प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — शारदा

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

199 – 206 9 32 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 34 pages

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · सं स्कृ त · शारदा

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 16: प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण
यह पृष्ठ शारदा (कक्षा ९) का प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण है — यह कोई पाठ नह , प र शष्ट (reference section) है, और पुस्तक इस पर
कोई अभ्यास नह दे ती; यहाँ केवल क्रयारूप क ता लकाएँ छपी ह, हर ता लका तीन पुरुष × तीन वचन म पूरी भरी हुई, इस लए ‘उत्तर कहाँ ह’
ऐसा प्रश्न ही नह उठता। छपे पृष्ठ 199 से 206 तक पुस्तक पाँच धातुओं के रूप दे ती है — परस्मैपद म पठ् (लट् , लृट्, लङ् , लोट् , व ध लङ् — और
साथ ही उसका णच्-प्रत्ययान्त प्रेरणाथक रूप ‘पाठय त’), आत्मनेपद म वृधु तथा लभ् (दोन पाँच लकार म, बीच म एक ‘वाक्येषु प्रयोगः’
ता लका स हत), और व शष्टधातवः (आत्मनेप दनः) शीषक के नीचे शीङ् तथा भुज् (दोन पाँच लकार म)। कुल अ ाईस ता लकाएँ, छब्बीस भन्न
धातुरूपाव लयाँ। छात्र इसे परीक्षा से पहले लकार दोहराने, अपने लखे रूप क जाँच करने तथा कसी नई धातु का रूप उसी साँचे पर बनाने के लए
काम म लेते ह। नीचे हर ता लका का नयम, पुस्तक क पूरी ता लका और प्रयोग-वाक्य दए गए ह; साथ म स्पष्ट रूप से च ह्नत «अभ्यास के लए
(स्वयं कर)» ब्लॉक भी ह — वे पुस्तक के नह , स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

शारदा (कक्षा 9) 199 – 206

खं ड प्रश्न

9 32

माध्यम

हन्द

धातुरूपा ण — यह प र शष्ट क्या दे ता है — पृष्ठ 199
प र शष्ट का स्वरूप, उसम छपी अ ाईस ता लकाएँ तथा उन्ह पढ़ने क व ध

प र शष्ट-प रचयः

१ प र शष्टम् ५ ‘धातुरूपा ण’ म क्या है, और इसम अभ्यास क्य नह है?

सीधा उत्तर — छपे पृष्ठ 199 से 206 तक शारदा केवल धातुरूप क ता लकाएँ छापती है — पाँच धातुओं के, पाँच लकार म,
तीन पुरुष और तीन वचन स हत। यह पाठ नह , प र शष्ट है; इसम न ोक ह, न कथा, न ‘अभ्यासाद् जायते स द्धः’ जैसा प्रश्न-
खण्ड। हर ता लका पूरी भरी हुई छपी है, इस लए यहाँ हल करने को कुछ बचता ही नह — उत्तर लुप्त नह ह, प्रश्न ही नह ह।
पुस्तक स्वयं क्या कहती है — प र शष्ट ३ के अन्त म (पृष्ठ 183) पुस्तक लखती है — ‘अ स्मन् प र शष्टत्रये … इत्येते वचाराः
सामान्यतया प्रद शताः स न्त। छात्राः वस्तृताध्ययनाथम् अन्यान् ग्रन्थान् प रशीलयेयुः।’ अथात् प र शष्ट केवल संकेत दे ते ह; वस्तार
के लए व्याकरण-ग्रन्थ दे खने चा हए। धातुरूप पर भी यही बात लागू होती है — यहाँ पाँच ही लकार ह, दस नह ।
प र शष्ट म क्या-क्या छपा है —

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

पृष्ठ शीषक धातु तथा ता लकाएँ

199 परस्मैपिदधातूनां लट् -लकारः िणच्-पत्ययान्तानां पठ् — साधारण लट् · ‘पठ् + िणच् = पिठ’ का लट् (पाठयित) · एवमेव-सूची
पयोगः (पेर णाथ)

199– परस्मैपिदधातूनां पञ्चसु लकारे ष ु पयोगाः पठ् — लट् · ल ृट् · लङ् · लोट् · िविधिलङ् (पाँच तािलकाएँ)
200

201– आत्मनेपदीनां धातूनां पञ्चसु लकारे ष ु पयोगाः वृध ु तथा लभ् — पाँच-पाँच लकार (दस तािलकाएँ) + ‘वृध ्’ के रूपों का
203 वाक्येष ु पयोगः + तीन एवमेव-सूिचयाँ

204– िविशष्टधातवः (आत्मनेपिदनः) शीङ् तथा भुज् — पाँच-पाँच लकार (दस तािलकाएँ)
206

पाँच ही लकार क्य : संस्कृत म दस लकार ह, पर वद्यालयीय पाठ्यक्रम म वही पाँच रखे जाते ह जो साधारण
भाषा-व्यवहार चला दे ते ह — वतमान (लट् ), भ वष्य (लृट्), भूत (लङ् ), आज्ञा (लोट् ) और व ध/सम्भावना
( व ध लङ् )। लट् (परोक्ष भूत — बभूव), लुङ् (सामान्य भूत — अभूत्), लृङ् और आशी लङ् उच्चतर कक्षाओं के
लए छोड़ दए गए ह। इसी लए हर शीषक म ‘पञ्चसु लकारेषु’ लखा है।

ता लका कैसे पढ़ — हर ता लका के ऊपर नीली प म धातु और लकार लखा है (जैसे ‘पठ् ’- धातुः, लङ् -लकारः)। बायाँ स्तम्भ
पुरुष का है और तीन स्तम्भ एकवचनम्, वचनम्, बहुवचनम् के। कसी खाने म य द तरछ रेखा से दो रूप छपे ह (जैसे ‘पठतु
/ पठतात्’) तो दोन शुद्ध ह — परीक्षा म कोई एक लखना पयाप्त है। कई ता लकाओं के नीचे नीले अक्षर म ‘एवमेव …’
लखकर वे धातुएँ गनाई गई ह जो उसी साँचे पर चलती ह — वह सूची ता लका जतनी ही काम क है।

सबसे बड़ा भ्रम पहले ही दूर कर ली जए: संस्कृत का प्रथमपुरुष ‘म’ नह , ‘वह/वे’ है (सः पठ त); मध्यमपुरुष
‘तू/तुम’ (त्वं पठ स); और उत्तमपुरुष ‘म/हम’ (अहं पठा म)। अंग्रेज़ी का first person संस्कृत का उत्तमपुरुष है
— ठ क उल्टा। ता लका क पहली पं क्त दे खते ही यह याद कर ली जए, वरना नौ के नौ खाने उलटे बैठ जाएँगे।

२ कसी नई धातु का रूप बनाना हो तो कस ता लका के साँचे पर चल?

व ध तीन चरण क है — (क) दे खए धातु परस्मैपद है या आत्मनेपद , (ख) दे खए वह कस गण क है — भ्वा द (सरल) या
रुधा द/अदा द ( व शष्ट), (ग) फर उसी वग क ता लका का साँचा लगाइए। प र शष्ट क पाँच धातुएँ उदाहरण-मात्र ह; उनके साँचे
पर सैकड़ धातुएँ चलती ह — और पुस्तक ने कई ता लकाओं के नीचे ‘एवमेव …’ लखकर यह सूची स्वयं द है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

नई धातु कस साँचे पर क्य नमूना रूप (लट् प्र.पु.एक.)

गम् (गच्छ् ), िलख्, वद् , नम्, वस् पठ् भ्वािदगण, परस्मैपदी, अङ् ग नही ं बदलता ग च्छित, िलखित, वदित

से व्, मोद् , याच्, शोभ्, वन्द् वृध ु / लभ् भ्वािदगण, आत्मनेपदी से वते, मोदते, याचते

आस् (बैठना), ईश् (स्वामी होना) शीङ् अदािदगण, आ त्मनेपदी, िवकरण-रिहत आ स्ते, ईष्टे

रुध्, िछद् , िभद् , युज् भुज् रुधािदगण — भीतर ‘न्’ (श्नम्) घुस ता है रुन्धे , िछन्ते, िभन्ते

िलख्, खाद् , दृ श,् ु — पेर णा में पाठयित (िणच्) कराने के अथ में िणच् लगता है ले खयित, खादयित, दशयित, ावयित

क्य यह काम करता है: संस्कृत म क्रयारूप धातु- वशेष का नह , गण और पद का होता है। ‘पठ् ’ और ‘गम्’ म
जो साझा है वह भ्वा दगण का वकरण शप् (अ) है — इस लए दोन का व्यवहार एक। जहाँ वकरण बदलता है
(शीङ् म कोई वकरण नह , भुज् म श्नम्) वह रूप अलग दखता है, और वही याद रखने योग्य है। पुस्तक ने इसी
कारण शीङ् और भुज् को ‘ व शष्टधातवः’ कहकर अलग रखा है।

चारों लकार-िच ह्न एक जगह —
लङ् → आगे अ : अपठत्, अवधत, अशेत , अभुङ्क्त

◌ ् यते , भोक◌ ् यते
लृट् → बीच में स्य : पिठष्यित, विधष्यते , लप स् ष्

िविधिलङ् → बीच में ए/ई : पठ◌ ेत ्, वध◌ ेत , शय◌ ीत, भुञ् ज◌ ीत

लोट् → तु/ताम्/तात् तथा उत्तमपुरु ष में आिन /ऐ : पठतु, पठ◌ ािन , वध◌ ै, भुन ज◌ ै

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। पहले स्वयं ल खए, फर उत्तर दे खए।

1. ‘अवधताम्’ म लकार, पुरुष, वचन तथा पद बताइए।
उत्तर — लङ् -लकार (आगे ‘अ’), प्रथमपुरुष, वचन, आत्मनेपद (वृधु धातु)।
2. ‘प ठष्यथ’ और ‘पठे त’ म क्या भेद है?
उत्तर — दोन मध्यमपुरुष बहुवचन ह, पर ‘प ठष्यथ’ लृट् (तुम पढ़ोगे) है और ‘पठे त’ व ध लङ् (तुम्ह पढ़ना
चा हए)। ‘स्य’ बनाम ‘ए’ — यही चह्न लकार बताता है।
3. ‘गच्छ त’ कस ता लका के साँचे पर चलता है, और ‘मोदते’ कस पर?
उत्तर — गच्छ त → पठ् (भ्वा द परस्मैपद); मोदते → वृधु/लभ् (भ्वा द आत्मनेपद)।
4. संस्कृत का ‘प्रथमपुरुष’ हन्द म कौन-सा पुरुष है?
उत्तर — अन्य पुरुष — ‘वह/वे’ (सः, तौ, ते)। हन्द -अंग्रेज़ी का उत्तम पुरुष (म) संस्कृत म उत्तमपुरुष ही है,
पर वह ता लका क अ न्तम पं क्त म आता है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण
a g l AglaSem · NCERT Solutions

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णच्-प्रत्ययान्तानां प्रयोगः (प्रेरणाथ) — ‘पठ् ’ धातुः — पृष्ठ 199
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परस्मैप दधातूनां लट् -लकारः : पठ त के सामने पाठय त
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प्रे र णाथ

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‘पठ् ’ धातुः — लट् -लकारः (साधारण प्रयोग) — पृष्ठ 199
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धातु — पठ् (भ्वा दगण, परस्मैपद , अथ — पढ़ना)। यह पूरे प र शष्ट क आधार-धातु है; पुस्तक इसे पहले साधारण अथ म दे ती है,

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फर उसी के सामने प्रेरणाथक रूप रखकर भेद दखाती है।

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बनने की पoि mया — पठ् + शप् (अ) + ित → पठ + ित = पठित
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l a se‘शप्’ भ्वािदगण का िवकरण है और तीनों पुरुष-वचनों में बना रहता है; इसी कारण पूरी तािलका में ‘पठ’
यहाँ
a g अङ् ग अपिरवितत िदखता है।

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‘पठ् ’- धातुः — पृष्ठ 199
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पुरुषः एकवचनम् ag वचनम् बहुवचनम्

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पथमपुरुषः पठित पठतः पठिन्त

se पठथm
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म ध् यमपुरुषः पठिस पठथः

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त्त मपुरुषः
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पठािम पठावः पठामः

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उत्तमपुरुष म ‘आ’ कहाँ से आया: पठा म, पठावः, पठामः — तीन म द घ ‘आ’ है, जब क शेष छह रूप म ह्रस्व
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a,sलोट्, व ध लङ् — सब जगह दखेगा (प ठष्या म, अपठाम, पठाम)।
‘अ’। कारण यह है क उत्तमपुरुष के प्रत्यय ( म, वस्, मस्) से पहले अतो द घ य ञ से अङ्ग का अ न्तम ‘अ’ द घ

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हो जाता है। यही नयम आगे लृट्, लङ्

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प्रयोग —

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बालकः पुस्तकं पठ त। (प्रथमपुरुष एक. — वह पढ़ता है)
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.co ोकौ पठतः। (प्रथमपुरुष .)
छात्रौ
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se m त्वं क पठ स? (मध्यमपुरुष एक.)
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a यूयं संस्कृतं पठथ। (मध्यमपुरुष बहु.)
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वयं प्र त दनं पठामः। (उत्तमपुरुष बहु.)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

२ ‘पठ् ’ + णच् = प ठ — लट् -लकारः (प्रेरणाथ) — पृष्ठ 199

नयम — जब क्रया कता स्वयं न करके दूसरे से कराता है, तब धातु के आगे णच् प्रत्यय लगता है और अथ ‘पढ़ना’ से बदलकर
‘पढ़ाना’ हो जाता है। पुस्तक ने प म यही सूत्र-रूप म लखा है — ‘पठ् ’ + णच् = प ठ।

रू प कै से बना — पठ् + िणच् (इ) → अ की वृि होकर आ → पािठ
पािठ + शप् (अ) + ित → पाठयित (इ + अ = अय्)

अथ : पठित = पढ़ ता है · पाठयित = पढ़ ाता है / पढ़ ने को पेिरत करता है

‘पठ् ’ + णच् = प ठ — लट् -लकारः — पृष्ठ 199

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः पाठयित पाठयतः पाठयिन्त

म ध् यमपुरुषः पाठयिस पाठयथः पाठयथ

उ त्त मपुरुषः पाठयािम पाठयावः पाठयामः

प्रत्यय वही, अङ्ग बदला: ध्यान द जए — त, तः, अ न्त, स, थः, थ, म, वः, मः — प्रत्यय ठ क वही ह जो
साधारण ‘पठ त’ क ता लका म थे। बदला केवल अङ्ग है : पठ → पाठय। इसी लए णजन्त धातु का रूप याद करना
अलग से काम नह है — अङ्ग बना ली जए, प्रत्यय पहले से आते ह। यही बात लृट्, लङ् , लोट् , व ध लङ् पर भी लागू
होती है (अपाठयत्, पाठ यष्य त, पाठयतु, पाठयेत्)।

वाक्य म प्रेरणा कैसे दखती है — प्रेरणाथक वाक्य म प्रेरक (कराने वाला) प्रथमा म आता है और प्रेय ( जससे कराया जाए)
तीया म :

बालकः पुस्तकं पठ त। → शक्षकः बालकं पुस्तकं पाठय त। ( शक्षक बालक को पढ़ाता है)
शशुः दुग्धं पब त। → माता शशुं दुग्धं पायय त। (माता शशु को दूध पलाती है)
अहं कथां शृणो म। → सः मां कथां ावय त। (वह मुझे कथा सुनाता है)

पुस्तक क ‘एवमेव’ सूची — ता लका के नीचे पुस्तक ये णजन्त रूप गनाती है :

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

णजन्त रूप मूल धातु अथ

ले खयित िलख् िलखवाता है

खादयित खाद् िखलाता है

हासयित हस् हँस ाता है

चालयित चल् चलाता है

स्मारयित स्मृ याद िदलाता है

पाययित पा िपलाता है

ीडयित ीड् िखलाता है (खेल )

नाययित नी ले जवाता है

दशयित दृ श ् िदखाता है

गमयित गम् भेजता है / िबताता है

भोजयित भुज् भोजन कराता है

दापयित दा िदलवाता है

ावयित ु सुनाता है

ापयित ा जतलाता है, सूिचत करता है

गणयित गण् (चुर ािद ) िगनता है

सूची म एक बात ध्यान दे ने क : पुस्तक ने अन्त म गणय त भी रखा है। यह ठ क तो है, पर इसका कारण थोड़ा
अलग है — ‘गण्’ चुरा दगण क धातु है, और चुरा द धातुओं म णच् स्वभाव से ही लगा रहता है (चुरा दभ्यो णच्)।
इस लए ‘गणय त’ का अथ ‘ गनवाता है’ नह , सीधा ‘ गनता है’ होता है — जैसे चोरय त (चुराता है), कथय त
(कहता है), पूजय त (पूजता है)। रूप का साँचा वही ‘अय्’ वाला है, इसी लए वह इसी सूची म रख दया गया है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. ‘पाठयावः’ का पुरुष तथा वचन बताइए और हन्द अथ ल खए।
उत्तर — उत्तमपुरुष, वचन — ‘हम दोन पढ़ाते ह’।
2. ‘छात्रः ोकं पठ त’ को प्रेरणाथक वाक्य म बद लए।
उत्तर — गुरुः छा ं ोकं पाठय त। (प्रेरक प्रथमा म, प्रेय तीया म)
3. ‘दृश्’ तथा ‘श्रु’ के णजन्त रूप ल खए और अथ बताइए।
उत्तर — दशय त = दखाता है; श्रावय त = सुनाता है (दोन म स्वर क वृ द्ध हुई है)।
4. ‘पाठय त’ म णच् लगने पर धातु के स्वर के साथ क्या हुआ?
उत्तर — ‘पठ् ’ के ‘अ’ क वृ द्ध होकर ‘आ’ हो गया — पठ् → पा ठ → पाठय त।

परस्मैप दधातूनां पञ्चसु लकारेषु प्रयोगाः — ‘पठ् ’ धातुः — पृष्ठ 199–200
एक ही परस्मैपद धातु के पाँच लकार : लट् , लृट्, लङ् , लोट् , व ध लङ्

परस्मै प दम्

१ ‘पठ् ’ धातुः, लट् -लकारः — वतमान काल — पृष्ठ 199

अथ — जो काय अभी हो रहा है उसे लट् -लकार कहते ह — ‘पढ़ता है / पढ़ते ह’। पुस्तक इस खण्ड के आरम्भ म वही ता लका
दुबारा दे ती है जो ऊपर णच् वाले खण्ड म आई थी, ता क पाँच लकार एक ही ान पर क्रम से दे खे जा सक।

‘पठ् ’- धातुः, लट् -लकारः — पृष्ठ 199

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः पठित पठतः पठिन्त

म ध् यमपुरुषः पठिस पठथः पठथ

उ त्त मपुरुषः पठािम पठावः पठामः

ये नौ रूप ही पूरी परस्मैपद-कुंजी ह: त · तः · अ न्त / स · थः · थ / म · वः · मः — यही लट् के परस्मैपद प्रत्यय
ह। इन्ह एक बार पक्का कर लेने पर ‘गच्छ त, वद त, लख त, नम त, वस त, हस त, धाव त’ — सब अपने आप बन
जाते ह, क्य क भ्वा दगण म अङ्ग बदलता ही नह ।

प्रयोग — सः पठ त। · तौ पठतः। · ते पठ न्त। · त्वं पठ स। · युवां पठथः। · यूयं पठथ। · अहं पठा म। · आवां पठावः। · वयं पठामः।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

२ ‘पठ् ’ धातुः, लृट्-लकारः — भ वष्यत् काल — पृष्ठ 200

अथ — जो काय आगे होगा उसे लृट्-लकार कहते ह — ‘पढ़े गा / पढ़गे’। पहचान सरल है : बीच म ष्य (स्य) दखाई दे ता है।

बनने की पि या — पठ् + इ (इट् आगम) + स्य + ित → पिठस्यित → पिठ यित ष्

‘इ’ के बाद आने के कारण स् का ष् हो जाता है (षत्व) — इसी से ‘ष्य’ बनता है।

‘पठ् ’- धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 200

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः पिठष्यित पिठष्यतः पिठष्यिन्त

म ध् यमपुरुषः पिठष्यिस पिठष्यथः पिठष्यथ

उ त्त मपुरुषः पिठष्यािम पिठष्यावः पिठष्यामः

प्रत्यय लट् वाले ही ह: प ठष्य- त, प ठष्य-तः, प ठष्य- न्त — अन्त वही त/तः/अ न्त है जो लट् म था। लृट् केवल
अङ्ग के आगे ‘इष्य’ जोड़ता है। इस लए लट् आ जाने पर लृट् अलग से रटना नह पड़ता — बस ‘इष्य’ बीच म
डा लए।

प्रयोग —

ः सः पाठं प ठष्य त। (कल वह पाठ पढ़े गा)
वयं परीक्षायै प ठष्यामः। (हम परीक्षा के लए पढ़गे)
त्वं क प ठष्य स? (तुम क्या पढ़ोगे?)

३ ‘पठ् ’ धातुः, लङ् -लकारः — भूत काल — पृष्ठ 200

अथ — जो काय बीत चुका (अनद्यतन भूत — आज से पहले का) उसे लङ् -लकार कहते ह — ‘पढ़ा / पढ़े ’। पहचान सबसे पक्क
है : रूप के आगे ‘अ’ लगता है, जसे अट् आगम कहते ह।

बनने की पि या — अ + पठ् + शप् (अ) + त् → अपठत्
पत्यय भी बदल जाते है ं — त्, ताम्, अन् / सः, तम्, त / अम्, व, म।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण
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‘पठ् ’- धातुः, लङ् -लकारः — पृष्ठ 200

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पुरुषः
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एकवचनम् वचनम्
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बहुवचनम्

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पथमपुरुषः
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अपठत् अपठताम् अपठन्

म ध् यमपुरुषः अपठः अपठतम् अपठत

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उ त्त मपुरुषः
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अपठम् अपठाम

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दो खाने भूल-योग्य ह: (क) अपठत (मध्यमपुरुष बहुवचन — ‘तुम सबने पढ़ा’) और अपठत् (प्रथमपुरुष

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भूल.cहै।
एकवचन — ‘उसने पढ़ा’) म भेद केवल अ न्तम हलन्त का है; लखते समय हलन्त लगाना अ नवाय है। (ख) अपठः
(मध्यमपुरुष एकवचन) वसगान्त है — ‘तुमने पढ़ा’; इसे प्रथमपुरुष का रूप समझ लेना आम m
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प्रयोग —m
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छात्राः पुस्तका न अपठन्। (उन्ह ने पुस्तक पढ़ )
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त्वं ः कम् अपठः? (तुमने कल क्या पढ़ा?)

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वयं सव म लत्वा अपठाम। (हम सबने मलकर पढ़ा)

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‘पठ् ’ धातुः, लोट् -लकारः — आ ा तथा प्राथना — पृष्ठ 200
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४

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उत्तर .c a g
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se — आज्ञा, प्राथना, अनुम त और आमन्त्रण के लए लोट्-लकार आता है — ‘पढ़ो / पढ़े / म प ँ ’। संस्कृत म यह केवल आदेश
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अथ

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का लकार नह ; ‘कृपया’ के अथ म वनम्र प्राथना भी इसी से होती है।

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‘पठ् ’- धातुः, लोट् -लकारः — पृष्ठ 200

पुरुषः
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एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

mपठन्तु

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पथमपुरुषः पठतु / पठतात् पठताम्

se m पठत
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म ध् यमपुरुषः
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पठ / पठतात् पठतम्

.उत्तमपुरुषः a g
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पठािन पठाव पठाम

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दो-दो रूप क्य छपे ह: ‘पठतु / पठतात्’ और ‘पठ / पठतात्’ — यहाँ दूसरा रूप तातङ् आदे श से बनता है, जो
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लोट् म वकल्प से होता है (तु ोस्तातङ् आ शष्यन्यतरस्याम्)। अथ म सूक्ष्म भेद है — ‘तात्’ वाला रूप आशीवाद-सा
gla
a s emसत्यं वदतात्’), जब क ‘तु/शून्य’ वाला रूप तत्काल का सामान्य आदे श है।
l लखना पयाप्त है।
गम्भीर और ायी आदे श दे ता है (‘सदा

agएक
दोन शुद्ध ह; परीक्षा म कोई

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

मध्यमपुरुष एकवचन म कोई प्रत्यय क्य नह दखता: ‘पठ’ म ऊपर से कुछ जुड़ा हुआ नह लगता। कारण —
लोट् मध्यमपुरुष एकवचन का प्रत्यय ‘ ह’ है, और भ्वा द जैसे अ-कारान्त अङ्ग के बाद वह लुप्त हो जाता है (अतो
हेः)। इसी लए ‘पठ!’ (पढ़ो) बच रहता है, जब क ‘गच्छ!’, ‘वद!’, ‘ लख!’ भी इसी नयम से बने ह।

प्रयोग —

छात्र! त्वं पठ। (छात्र! तुम पढ़ो)
सः शान्त्या पठतु। (वह शा न्त से पढ़े )
अहम् इदान पठा न? (क्या म अब प ँ ?)
यूयं सव पठत। (तुम सब पढ़ो)

५ ‘पठ् ’ धातुः, व ध लङ् -लकारः — ‘चा हए’ तथा स ावना — पृष्ठ 200

अथ — व ध (करना चा हए), नमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, सम्प्रश्न और प्राथना — इन अथ म व ध लङ् आता है। हन्द म
इसका अनुवाद प्रायः ‘पढ़ना चा हए’ या ‘य द पढ़े तो’ होता है। पहचान — बीच म ए दखता है।

बनने की पि या — पठ् + शप् (अ) + यासुट् (ई/या) + त् → पठ + ई + त् → पठे त ् (अ + ई = ए, गुण)

‘पठ् ’- धातुः, व ध लङ् -लकारः — पृष्ठ 200

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः पठे त ् पठे ताम् पठे यःु

म ध् यमपुरुषः पठे ः पठे तम् पठे त

उ त्त मपुरुषः पठे यम् पठे व पठे म

‘पठे त्’ और ‘पठे त’ को कभी मत मलाइए: पठे त् (हलन्त) = प्रथमपुरुष एकवचन — ‘उसे पढ़ना चा हए’। पठे त
( बना हलन्त) = मध्यमपुरुष बहुवचन — ‘तुम सबको पढ़ना चा हए’। ठ क यही जोड़ी लङ् म भी थी (अपठत् /
अपठत)। संस्कृत म हलन्त का चह्न सजावट नह , अथ का भेद है।

सुभा षत का लकार: संस्कृत के अ धकांश नी त-वचन व ध लङ् म ही ह — ‘सत्यं ूयात्’, ‘न ूयात् सत्यम्
अ प्रयम्’, ‘धम चरेत्’, ‘ नत्यं पठे त्’। कारण यह क नी त आज्ञा नह दे ती, व ध बताती है — ‘ऐसा करना चा हए’।
इसी लए व ध लङ् पहचानना ोक समझने क सीधी कुंजी है।

प्रयोग — छात्रः प्र त दनं पठे त्। · यूयं ध्यानेन पठे त। · अहं संस्कृतं पठे यम्। · ते सव पठे युः।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. ‘पठ् ’ धातु का लङ् मध्यमपुरुष एकवचन तथा व ध लङ् मध्यमपुरुष एकवचन ल खए।
उत्तर — अपठः; पठे ः (दोन वसगान्त — यही ध्यान दे ने क बात है)।
2. ‘अपठन्’ और ‘पठन्तु’ म लकार तथा अथ बताइए।
उत्तर — अपठन् = लङ् , प्रथमपुरुष बहुवचन (उन्ह ने पढ़ा); पठन्तु = लोट् , प्रथमपुरुष बहुवचन (वे पढ़)।
3. ‘पठतात्’ कस लकार का रूप है और यह कस आदे श से बना?
उत्तर — लोट् -लकार; तातङ् आदे श से — यह ‘पठतु’ तथा ‘पठ’ दोन का वकल्प-रूप है।
4. ‘वयं संस्कृतं पठामः’ को लृट् तथा व ध लङ् म बद लए।
उत्तर — वयं संस्कृतं प ठष्यामः। (लृट्) · वयं संस्कृतं पठे म। ( व ध लङ् )
5. ‘गम्’ (गच्छ् ) धातु को पठ् के साँचे पर चलाकर लङ् प्रथमपुरुष बहुवचन ल खए।
उत्तर — अगच्छन्।

आत्मनेपद नां धातूनां पञ्चसु लकारेषु प्रयोगाः — लट् -लकारः — पृष्ठ 201
‘वृधु’ तथा ‘लभ्’ का वतमान काल, और ‘वृध्’ के रूप का वाक्येषु प्रयोगः

आत्मने प दम्

१ ‘वृधु’ धातुः, लट् -लकारः — पृष्ठ 201

धातु — वृधु (भ्वा दगण, आत्मनेपद , अथ — बढ़ना, वृ द्ध पाना)। धातुपाठ म इसका नाम ‘वृधु’ है (अ न्तम ‘उ’ इत्-संज्ञक है, जो
आत्मनेपद का संकेत दे ता है); प्रयोग म धातु वृध् ही रहती है। लट् म ऋ का गुण होकर ‘अर्’ बनता है — वृध् → वध।

बनने की पि या — वृध ् + शप् (अ) → गुण से ऋ → अर् → वध
वध + ते = वधते (आत्मने पद का पत्यय ‘ते ’ है, ‘ित’ नही ं)

‘वृधु’- धातुः, लट् -लकारः — पृष्ठ 201

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः वध ते वध ते वध न्ते

म ध् यमपुरुषः वध से वध थे वध ध् वे

उ त्त मपुरुषः वध वध वहे वध महे

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

आत्मनेपद पहचानने क कुंजी: ते · एते · अन्ते / से · एथे · ध्वे / ए · आवहे · आमहे — ये नौ प्रत्यय ही आत्मनेपद
ह। ध्यान द जए, इनम से पाँच म ‘ए’ क ध्व न है और तीन म ‘हे’ — इसी कान से आत्मनेपद पहचाना जाता है।
परस्मैपद ‘पठ त’ के सामने र खए : पठ त ↔ वधते, पठ न्त ↔ वधन्ते, पठामः ↔ वधामहे।

प्रयोग —

वृक्षः वधते। (वृक्ष बढ़ता है)
बालकाः शनैः शनैः वधन्ते। (बालक धीरे-धीरे बढ़ते ह)
त्वं ज्ञानेन वधसे। (तुम ज्ञान से बढ़ते हो)
वयं प रश्रमेण वधामहे। (हम प रश्रम से बढ़ते ह)

फल कता को ही मलता है: ‘वधते’ आत्मनेपद इस लए है क बढ़ने का लाभ बढ़ने वाले को ही होता है, कसी
दूसरे को नह । यही आत्मनेपद क प रभाषा है — आत्मने (अपने लए) पदम्। यही कारण है क लभते (पाता है),
मोदते (आन न्दत होता है), सेवते (सेवा करता है) — सब आत्मनेपद ह।

२ ‘लभ्’ धातुः, लट् -लकारः — पृष्ठ 201

धातु — लभ् (भ्वा दगण, आत्मनेपद , अथ — पाना, प्राप्त करना)। यह वृधु से भी सरल है, क्य क इसम गुण-वृ द्ध कुछ नह होती
— अङ्ग सवत्र लभ ही रहता है। इसी लए पुस्तक ने इसे वृधु के ठ क नीचे रखा है : एक म अङ्ग बदलता है, दूसरे म नह ।

‘लभ्’- धातुः, लट् -लकारः — पृष्ठ 201

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः लभते लभेते लभन्ते

म ध् यमपुरुषः लभसे लभेथे लभध् वे

उ त्त मपुरुषः लभे लभावहे लभामहे

दोन ता लकाएँ अक्षरशः एक साँचे क ह: वधते–लभते, वधते–लभेते, वधन्ते–लभन्ते … नौ के नौ खाने एक ही
प्रत्यय से बने ह। यही इस प र शष्ट क शक्षण-यु क्त है — पहले वह धातु दखाओ जसम अङ्ग बदलता है (वृध् →
वध), फर वह जसम नह बदलता (लभ् → लभ); दोन को साथ रखने पर छात्र समझ जाता है क प्रत्यय र ह,
अङ्ग चर है।

प्रयोग —

प रश्रमी छात्रः सफलतां लभते। (प रश्रमी छात्र सफलता पाता है)
सज्जनाः सवत्र सम्मानं लभन्ते। (सज्जन सवत्र सम्मान पाते ह)
अहं गुरोः आशीवादं लभे। (म गुरु का आशीवाद पाता हूँ)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

यूयं क लभध्वे? (तुम सब क्या पाते हो?)

३ ‘वृध्’ धातोः रूपाणां वाक्येषु प्रयोगः — रूप वाक्य म कैसे बैठते ह — पृष्ठ 201

यह ता लका क्य द गई है — रूप याद कर लेना एक बात है, उसे सही कता के साथ वाक्य म बठाना दूसरी। पुस्तक ने इसी लए
वृध् धातु क एक अलग ता लका द है जसम हर खाने म केवल रूप नह , पूरा वाक्य छपा है — कता स हत। यह पूरे प र शष्ट क
एकमात्र ऐसी ता लका है।

‘वृध्’- धातोः रूपाणां वाक्येषु प्रयोगः — पृष्ठ 201

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः वृक्षः वध ते। वृक्षौ वध ते। वृक्षाः वध न्ते।

म ध् यमपुरुषः त्वं वधसे । युवां वध थे। यूयं वध ध् वे।

उ त्त मपुरुषः अहं वध । आवां वध वहे। वयं वध महे।

ता लका जो सखा रही है वह ‘कतृ- क्रया-अन्वयः’ है: क्रया का पुरुष और वचन कता के पुरुष और वचन से
मलना चा हए — यह संस्कृत का सबसे बु नयाद नयम है। एक वृक्ष हो तो वृक्षः वधते, दो ह तो वृक्षौ वधते, बहुत
ह तो वृक्षाः वधन्ते। ‘वृक्षौ वधते’ या ‘वृक्षाः वधते’ लखना उतनी ही बड़ी भूल है जतनी हन्द म ‘पेड़ बढ़ता ह’।
ध्यान द जए, प्रथमपुरुष म कता शब्द (वृक्षः/वृक्षौ/वृक्षाः) रखना पड़ा, पर मध्यम और उत्तम म सवनाम (त्वम्/
युवाम्/यूयम्, अहम्/आवाम्/वयम्) ही आते ह — क्य क वहाँ कता क्रया से ही स्पष्ट है।

सवनाम क पूरी जोड़ी याद कर ली जए: प्रथमपुरुष — सः · तौ · ते; मध्यमपुरुष — त्वम् · युवाम् · यूयम्;
उत्तमपुरुष — अहम् · आवाम् · वयम्। यही नौ सवनाम नीचे क हर ता लका पर लगाइए और वाक्य बना ली जए —
सः शेते · युवां शयाथे · वयं भुञ्ज्महे।

पुस्तक क ‘एवमेव’ सूची (लट् , आत्मनेपद) — ता लका के नीचे ये रूप गनाए गए ह, जो इसी साँचे पर चलते ह :

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण
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रूप धातु अथ रूप धातु अथ

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भाषते
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भाष् बोलता है एधते एध्
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बढ़ ता है

se m वृत ्
g l a आनिन्दत होता है
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वतते होता है, रहता है मोदते मुद्

कम्पते क म् प् काँपता है वन्दते वन्द् वन्दना करता है

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स्पधते स्पध् स्पध करता है
e m रम् न्न
रमता है, पस होता है

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लभते लभ् पाता है
a शोभते शुभ ् शोभा पाता है

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से वते से व् से वा करता है सहते सह् सहता है

दे खता हैem
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स्पन्दते स्पन्द् स्पिन्दत होता है ईक्षते ईक्ष्

m . a सीखता है
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यतते यत् पयत्न करता है िशक्षते िशक्ष्

aglरोचते रुच् अच्छा लगता है — चेत्यादयः (इत्यािद)

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अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तकm
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म नह ह। प र शष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह। la
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1. ‘वधते’ और ‘वधथे’ म क्या अन्तर है?

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उत्तर — वधते = प्रथमपुरुष वचन (वे दोन बढ़ते ह); वधथे = मध्यमपुरुष वचन (तुम दोन बढ़ते हो)।

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com— लभन्ते। as
2. रक्त ान भ रए — छात्राः ज्ञानं ______ (लभ्, लट् , प्र.पु.बहु.)।

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as e 3. ‘मुद’् तथा ‘रुच्’ धातु के लट् प्रथमपुरुष एकवचन रूप ल खए।
a g l उत्तर — मोदते; रोचते (दोन म गुण हुआ है — उ → ओ)।

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com शुद्ध रूप — वृक्षौ वधते। a
4. ‘वृक्षौ वधते’ म क्या दोष है?

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उत्तर — कता वचन (वृक्षौ) है पर क्रया एकवचन;

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‘वृध’ु तथा ‘लभ्’ — लृट् एवं लङ् -लकारः — पृष्ठ 201–202
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cपoदम्m l
आत्मनेपद का भ वष्यत् और भूत काल, सेट्-अ नट् का भेद स हत

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आत्मने

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१ ‘वृधु’ धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 201
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m . co agl
l a se
g वृध् सेट् धातु है — अथात् ‘स्य’ से पहले इ (इट् आगम) लगता है। इस लए रूप बनता है वध

नयम — लृट् म ‘स्य’ जुड़ता है,a
और
+ इ + ष्य + ते = व धष्यते।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

‘वृधु’- धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 201

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः विध ष्यते विध ष्येते विध ष्यन्ते

म ध् यमपुरुषः विध ष्यसे विध ष्येथे विध ष्यध् वे

उ त्त मपुरुषः विध ष्ये विध ष्यावहे विध ष्यामहे

अन्त वही, बीच नया: व धष्य-ते, व धष्य-एते, व धष्य-न्ते — प्रत्यय ठ क वही आत्मनेपद के नौ ह जो लट् म थे।
लृट् ने केवल ‘इष्य’ बीच म डाला। इस लए आत्मनेपद के नौ प्रत्यय एक बार पक्के होने पर लृट् क ता लका स्वतः
बन जाती है।

प्रयोग — वृक्षः जले सक्ते व धष्यते। · भवतः यशः व धष्यते। · वयं ज्ञानेन व धष्यामहे।

२ ‘लभ्’ धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 202

नयम — लभ् अ नट् धातु है — इसम ‘स्य’ से पहले ‘इ’ नह लगता। इसी लए रूप ‘ल भष्यते’ नह , लप्स्यते बनता है : लभ् + स्य
+ ते → भ् का प् (चत्व, क्य क आगे कठोर स् है) → लप्स्यते।

‘लभ्’- धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 202

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः ल प्स्यते ल प्स्येते ल प्स्यन्ते

म ध् यमपुरुषः ल प्स्यसे ल प्स्येथे ल प्स्यध् वे

उ त्त मपुरुषः ल प्स्ये ल प्स्यावहे ल प्स्यामहे

‘व धष्यते’ बनाम ‘लप्स्यते’ — यही सेट्-अ नट् का भेद है: दोन लृट् ह, दोन आत्मनेपद ह, पर एक म ‘इ’ है
और दूसरे म नह । जन धातुओं म यह ‘इ’ लगता है वे सेट् (स + इट् ) कहलाती ह, जनम नह लगता वे अ नट् । यह
धातु का अपना स्वभाव है, कोई नयम इसे बता नह दे ता — धातुपाठ से जाना जाता है। परीक्षा म यही ान सबसे
अ धक भूल का है : ‘ल भष्यते’ लखना अशुद्ध है।

पुस्तक क ‘एवमेव’ सूची (लृट्) — भा षष्यते · व तष्यते · क म्पष्यते · स्प धष्यते · से वष्यते · स्प न्दष्यते · य तष्यते · रो चष्यते ·
ए धष्यते · मो दष्यते · व न्दष्यते · शो भष्यते · स हष्यते · ई क्षष्यते · रंस्यते · श क्षष्यते — चेत्यादयः।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

सूची म छपा हुआ अपवाद: इस पूरी सूची म एक ही रूप ‘इ’ के बना है — रंस्यते (धातु रम्)। शेष सब सेट् ह,
इस लए ‘इष्यते’ म समाप्त होते ह। रम् अ नट् है, इसी लए रम् + स्य + ते → म् का अनुस्वार → रंस्यते। पुस्तक ने
इसे चुपचाप बीच म रख दया है; ध्यान से दे खने वाला छात्र इसे पकड़ लेगा।

३ ‘वृधु’ धातुः, लङ् -लकारः — पृष्ठ 202

नयम — लङ् म आगे अट् आगम ‘अ’ लगता है और आत्मनेपद के प्रत्यय बदलकर त, इताम्, अन्त / थाः, इथाम्, ध्वम् / इ, व ह,
म ह हो जाते ह। ‘वधते’ का लङ् — अवधत।

‘वृधु’- धातुः, लङ् -लकारः — पृष्ठ 202

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः अवध त अवध ताम् अवध न्त

म ध् यमपुरुषः अवध थाः अवध थाम् अवध ध् वम्

उ त्त मपुरुषः अवध अवध विह अवध मिह

लट् और लङ् क जोड़ी मलाकर दे खए: वधावहे → अवधाव ह, वधामहे → अवधाम ह। आत्मनेपद म भूतकाल
का चह्न दुहरा है — आगे अ और अन्त म हे के ान पर ह। यही जोड़ी लभ्, शीङ् और भुज् म भी दखेगी
(अलभाव ह, अशेव ह, अभुञ्ज्व ह)।

प्रयोग — बालकः शीघ्रम् अवधत। · तस्य क तः अवधत। · वयं तत्र अवधाम ह।

४ ‘लभ्’ धातुः, लङ् -लकारः — पृष्ठ 202

नयम — वही अट् आगम, वही प्रत्यय, अङ्ग अप रव तत लभ — इस लए यह ता लका वृधु क ता लका क हूबहू प्र तच्छाया है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

‘लभ्’- धातुः, लङ् -लकारः — पृष्ठ 202

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः अलभत अलभेताम् अलभन्त

म ध् यमपुरुषः अलभथाः अलभेथाम् अलभध् वम्

उ त्त मपुरुषः अलभे अलभाविह अलभामिह

एक खाना वशेष सावधानी माँगता है: अलभे (उत्तमपुरुष एकवचन — ‘मने पाया’) और लभे (लट् उत्तमपुरुष
एकवचन — ‘म पाता हूँ’) म भेद केवल आगे के ‘अ’ का है। इसी तरह ‘अवध’ और ‘वध’। लखते समय अट् आगम
छोड़ दे ना अथ को वतमान म बदल दे ता है।

पुस्तक क ‘एवमेव’ सूची (लङ् ) — अभाषत · अवतत · अकम्पत · अस्पधत · असेवत · अस्पन्दत · अयतत · अरोचत · ऐधत ·
अमोदत · अवन्दत · अरमत · अशोभत · असहत · ऐक्षत · अ शक्षत — चेत्यादयः।

‘ऐधत’ और ‘ऐक्षत’ म ‘ऐ’ क्य : जन धातुओं का आरम्भ ही स्वर से होता है (एध्, ईक्ष्), उनम अट् आगम का ‘अ’
धातु के स्वर से मलकर वृ द्ध कर दे ता है — अ + ए = ऐ (एध् → ऐधत), अ + ई = ऐ (ईक्ष् → ऐक्षत)। यही नयम
‘इच्छ त → ऐच्छत्’, ‘अह त → आहत्’ म भी लगता है। शेष सब म केवल ‘अ’ जुड़ता है।

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. ‘लभ्’ का लृट् प्रथमपुरुष बहुवचन ल खए और बताइए क उसम ‘इ’ क्य नह है।
उत्तर — लप्स्यन्ते। लभ् अ नट् धातु है, इस लए ‘स्य’ से पहले इट् (इ) नह लगता; भ् का प् चत्व से हुआ।
2. ‘अवधथाम्’ का पुरुष, वचन और हन्द अथ ल खए।
उत्तर — मध्यमपुरुष, वचन — ‘तुम दोन बढ़े ’।
3. ‘एध्’ धातु का लङ् प्रथमपुरुष एकवचन ल खए।
उत्तर — ऐधत (अ + ए = ऐ, वृ द्ध)।
4. ‘व धष्यते’ और ‘अवधत’ म कौन-सा लकार है?
उत्तर — क्रमशः लृट् (‘इष्य’ चह्न) और लङ् (आगे ‘अ’)।
5. ‘रम्’ धातु का लृट् प्रथमपुरुष एकवचन ल खए।
उत्तर — रंस्यते — यह अ नट् है, इस लए ‘र मष्यते’ अशुद्ध होगा।

‘वृध’ु तथा ‘लभ्’ — लोट् एवं व ध लङ् -लकारः — पृष्ठ 203

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

आत्मनेपद क आ ा तथा व ध : वधताम्–वध, लभेत–लभेरन्

आत्मने प दम्

१ ‘वृधु’ धातुः, लोट् -लकारः — पृष्ठ 203

नयम — आत्मनेपद के लोट् प्रत्यय ह — ताम्, इताम्, अन्ताम् / स्व, इथाम्, ध्वम् / ऐ, आवहै, आमहै। ध्यान द जए, उत्तमपुरुष म
ए के ान पर ऐ हो जाता है (वध → वध) — यही लोट् क सबसे स्पष्ट पहचान है।

‘वृधु’- धातुः, लोट् -लकारः — पृष्ठ 203

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः वध ताम् वध ताम् वध न्ताम्

म ध् यमपुरुषः वध स्व वध थाम् वध ध् वम्

उ त्त मपुरुषः वध वध वहै वध महै

‘वधताम्’ दो जगह आया है — घबराइए मत: लोट् क ता लका म वधताम् प्रथमपुरुष वचन है (‘वे दोन बढ़’),
और लङ् क ता लका म अवधताम् प्रथमपुरुष वचन था (‘वे दोन बढ़े ’)। दोन म भेद केवल आगे के ‘अ’ का है।
इसी प्रकार लोट् का वधथाम् (तुम दोन बढ़ो) और लङ् का अवधथाम् (तुम दोन बढ़े ) — अट् आगम ही दोन को
अलग करता है।

प्रयोग — तव यशः वधताम्। (तुम्हारा यश बढ़े ) · त्वं वद्यया वधस्व। (तुम वद्या से बढ़ो) · वयं सव वधामहै। (हम सब बढ़)

आशीवाद का लकार: ‘वधताम्’, ‘जयतु’, ‘भवतु’, ‘शुभं भवतु’ — संस्कृत म शुभकामना प्रायः लोट् से ही द जाती
है। ‘आयुष्मान् भव’, ‘ चरं जीव’, ‘सु खनः सन्तु नरामयाः’ — सब लोट् ह।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण
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‘लभ्’ धातुः, लोट् -लकारः — पृष्ठ 203
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a‘लभ्’- धातुः, लोट् -लकारः — पृष्ठ 203

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पुरुषः एकवचनम् बहुवचनम्

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पथमपुरुषः लभताम् लभेताम्

म ध् यमपुरुषः लभस्व लभध् वम्
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लभेथाम्

लभामहै .c
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उ त्त मपुरुषः लभै लभावहै

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l a se का ‘स्व’ ध्यान से दे खए: परस्मैपद म मध्यमपुरुष एकवचन का प्रत्यय ‘ ह’ था और भ्वा द म लुप्त हो
ag जाता था (पठ!)। आत्मनेपद म उसक जगह स्व आता है और वह कभी लुप्त नह होता — लभस्व, वधस्व, मोदस्व,
‘लभस्व’

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सेवस्व। इस लए ‘लभ!’ लखना अशुद्ध है; शुद्ध है ‘लभस्व!’।
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पुस्तक क ‘एवमेव’ सूची (लोट् ) — भाषताम् · वतताम् · कम्पताम् · स्पधताम् · सेवताम् · स्पन्दताम् · यतताम् · रोचताम् · एधताम्

agl · ईक्षताम् · शक्षताम् — इत्यादयः च।
· मोदताम् · वन्दताम् · रमताम् · शोभताम् · सहताम्
प्रयोग — सः धनं लभताम्। · त्वं यशः लभस्व। · वयं सफलतां लभामहै।

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३ .c‘वृधु’ धातुः, व ध लङ् -लकारः — पृष्ठ 203 a g l
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agl उत्तर
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नयम — आत्मनेपद के व ध लङ् प्रत्यय ह — एत, एयाताम्, एरन् / एथाः, एयाथाम्, एध्वम् / एय, एव ह, एम ह। पहचान वही ‘ए’

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है जो परस्मैपद ‘पठे त्’ म थी; अन्तर केवल आत्मनेपद अन्त का है।

‘वृधु’- धातुः, व ध लङ् -लकारः — पृष्ठ 203 agl

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पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

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पथमपुरुषः वध त वध याताम् वध रन्

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वध ध् वम्
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वध थाः वध याथाम्

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उ त्त मपुरुषः वध य वध विह वध मिह
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

‘वधरन्’ — यही आत्मनेपद व ध लङ् क सबसे पक्क पहचान है: परस्मैपद म प्रथमपुरुष बहुवचन ‘पठे युः’
था; आत्मनेपद म वह वधरन् हो जाता है (‘एरन्’ अन्त)। जहाँ भी वाक्य म ‘-एरन्’ दखे, सम झए व ध लङ् ,
आत्मनेपद, प्रथमपुरुष बहुवचन — जैसे ‘लभेरन्’, ‘मोदे रन्’, ‘भुञ्जीरन्’।

प्रयोग — वृक्षाः जलेन वधरन्। · त्वं स णैः वधथाः। · अहं वद्यया वधय।

४ ‘लभ्’ धातुः, व ध लङ् -लकारः — पृष्ठ 203

‘लभ्’- धातुः, व ध लङ् -लकारः — पृष्ठ 203

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः लभेत लभेयाताम् लभेर न्

म ध् यमपुरुषः लभेथाः लभेयाथाम् लभेध् वम्

उ त्त मपुरुषः लभेय लभेविह लभेम िह

पुस्तक क ‘एवमेव’ सूची ( व ध लङ् ) — भाषेत · वतत · कम्पेत · स्पधत · सेवेत · स्पन्दे त · यतेत · रोचेत · एधेत · मोदे त · वन्दे त
· रमेत · शोभेत · सहेत · ईक्षेत · शक्षेत — चेत्यादयः।

एक जोड़ी जो हर बार भ्रम पैदा करती है: लभेत ( व ध लङ् , प्रथमपुरुष एकवचन — ‘उसे पाना चा हए’) और
लभेते (लट् , प्रथमपुरुष वचन — ‘वे दोन पाते ह’)। अन्तर केवल अ न्तम ‘◌े’ का है। इसी प्रकार वधत ↔ वधते।
पढ़ते समय अ न्तम मात्रा पर उँ गली रखकर दे खए — वह लकार छपा है।

चारों आ मने पद लकार एक पंि त में (पथमपु ष एकवचन ) —
त् क् रु

लट् — लभते (पाता है) · लृट् — लप्स्यते (पाएगा) · लङ् — अलभत (पाया)

लोट् — लभताम् (पाए) · िविधिलङ् — लभे त (पाना चािहए)

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. ‘वधरन्’ तथा ‘वधन्ताम्’ म लकार बताइए।
उत्तर — वधरन् = व ध लङ् (प्र.पु. बहु.); वधन्ताम् = लोट् (प्र.पु. बहु.)।
2. आत्मनेपद म मध्यमपुरुष एकवचन का लोट् प्रत्यय क्या है? एक उदाहरण द जए।
उत्तर — स्व — जैसे लभस्व, वधस्व, सेवस्व, मोदस्व।
3. ‘लभेते’ और ‘लभेत’ म क्या भेद है?
उत्तर — लभेते = लट् , प्रथमपुरुष वचन (वे दोन पाते ह); लभेत = व ध लङ् , प्रथमपुरुष एकवचन (उसे पाना
चा हए)।
4. ‘सेव्’ धातु का व ध लङ् प्रथमपुरुष एकवचन तथा लोट् मध्यमपुरुष एकवचन ल खए।
उत्तर — सेवेत; सेवस्व।
5. ‘तुम्हारा यश बढ़े ’ — संस्कृत म ल खए।
उत्तर — तव यशः वधताम्। (लोट् , प्रथमपुरुष एकवचन)

व शष्टधातवः (आत्मनेप दनः) — ‘शीङ् ’ धातुः — पृष्ठ 204–205
अदा दगण क आत्मनेपद धातु, जसका अङ्ग शे और शय् — दो रूप लेता है

व शष्टधातवः

१ ‘शीङ् ’ धातुः, लट् -लकारः — पृष्ठ 204

धातु — शीङ् (अदा दगण, आत्मनेपद , अथ — सोना, लेटना)। धातुपाठ म नाम ‘शीङ् ’ है; ‘ङ् ’ इत्-संज्ञक है और आत्मनेपद का
संकेत दे ता है। पुस्तक ने इसे ‘ व शष्टधातवः’ शीषक के नीचे इस लए रखा है क यह भ्वा द क तरह सीधी नह चलती — इसम
कोई वकरण नह लगता (अदा दगण म शप् का लोप हो जाता है), और अङ्ग दो रूप लेता है।

दो अङ् ग — शे (गुण-युक्त) : एकवचन तथा बहुवचन के अिधकांश रूपों में — शेते , शेरते , शेषे
शय् (गुण-रिहत, ‘य्’ में बदलकर) : ि वचन में तथा जहाँ आगे स्वर आता है — शयाते , शयाथे
पि या : शी + ते → गुण से ई → ए → शेते ; शी + आते → ई का ‘य्’ → शयाते

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

‘शीङ् ’- धातुः, लट् -लकारः — पृष्ठ 204

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः शेते शयाते शेर ते

म ध् यमपुरुषः शेषे शयाथे शेध् वे

उ त्त मपुरुषः शये शेवहे शेम हे

‘शेरते’ म ‘र’ कहाँ से आया: प्रथमपुरुष बहुवचन का प्रत्यय ‘अन्ते’ है, पर शीङ् म उसका ‘न्’ बदलकर र् हो जाता
है (शीङः सावधातुके गुणः तथा ‘आत्मनेपदे ष्वनतः’ के अनुसार अत् → रत्) — इस लए ‘शेअन्ते’ नह , शेरते बनता
है। यही असाधारण रूप शीङ् क सबसे बड़ी पहचान है; लङ् म यह अशेरत और लोट् म शेरताम् बनकर फर
दखता है। ‘शयन्ते’ लखना अशुद्ध है।

‘शये’ और ‘शेवहे’ — एक ही ता लका म दो अलग अङ्ग: उत्तमपुरुष एकवचन शये है (शी + ए → य् आदे श),
पर वचन-बहुवचन म शेवहे, शेमहे (गुण)। कारण यह क ‘ए’ स्वर से आरम्भ होता है, जब क ‘वहे/महे’ व्यञ्जन
से — स्वर से पहले ‘य्’, व्यञ्जन से पहले गुण।

प्रयोग — बालकः खट् वायां शेते। (बालक खाट पर सोता है) · सहौ गुहायां शयाते। · जनाः न ायां शेरते। · अहं भूमौ शये।

२ ‘शीङ् ’ धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 204

नयम — लृट् म अङ्ग क झंझट समाप्त हो जाती है — श यष्य बनकर सवत्र वही रहता है (शी → गुण से शे → ‘अय्’ → श य +
ष्य)। इसी लए यह ता लका सबसे सरल है।

‘शीङ् ’- धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 204

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः शियष्यते शियष्येते शियष्यन्ते

म ध् यमपुरुषः शियष्यसे शियष्येथे शियष्यध् वे

उ त्त मपुरुषः शियष्ये शियष्यावहे शियष्यामहे

‘शेरते’ यहाँ क्य नह दखता: ‘र्’ वाला वशेष आदे श केवल सावधातुक लकार म होता है — लट् , लङ् , लोट् म।
लृट् और व ध लङ् म अङ्ग के आगे ‘इष्य’ या ‘ई’ आ जाने से प्रत्यय सीधे ‘न्ते’ ही रहता है — श यष्यन्ते, शयीरन्।
इसी लए शीङ् क पाँच ता लकाओं म तीन वशेष ह और दो साधारण।

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प्रयोग — बालकः रात्रौ शीघ्रं श यष्यते। · वयं तत्र श यष्यामहे।

३ ‘शीङ् ’ धातुः, लङ् -लकारः — पृष्ठ 204

‘शीङ् ’- धातुः, लङ् -लकारः — पृष्ठ 204

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः अशेत अशयाताम् अशेर त

म ध् यमपुरुषः अशेथाः अशयाथाम् अशेध् वम्

उ त्त मपुरुषः अशिय अशेविह अशेम िह

दो खाने ध्यान माँगते ह: (क) प्रथमपुरुष बहुवचन अशेरत — यहाँ फर वही ‘र्’ आदे श है (‘अशयन्त’ अशुद्ध)।
(ख) उत्तमपुरुष एकवचन अश य — लङ् आत्मनेपद का उत्तमपुरुष एकवचन प्रत्यय ‘इ’ है और स्वर होने के कारण
अङ्ग ‘शय्’ रूप लेता है : अ + शय् + इ = अश य। ‘अशये’ लखना अशुद्ध है। तुलना क जए — वृधु म अवध◌े था,
पर शीङ् म अशयि◌; भ्वा द अ-कारान्त अङ्ग म ‘अ + इ = ए’ हो जाता है, शीङ् म ऐसा कोई ‘अ’ है ही नह ।

प्रयोग — सः रात्रौ सुखेन अशेत। · ते वृक्षच्छायायाम् अशेरत। · अहं तत्र अश य।

४ ‘शीङ् ’ धातुः, लोट् -लकारः — पृष्ठ 204

‘शीङ् ’- धातुः, लोट् -लकारः — पृष्ठ 204

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः शेताम् शयाताम् शेर ताम्

म ध् यमपुरुषः शेष्व शयाथाम् शेध् वम्

उ त्त मपुरुषः शयै शयावहै शयामहै

‘शेष्व’ म ‘ष’ क्य : आत्मनेपद लोट् का मध्यमपुरुष एकवचन प्रत्यय ‘स्व’ है (लभस्व, वधस्व)। शीङ् म उससे पहले
‘ए’ आता है, और इण्-कु के बाद स् का ष् हो जाता है (षत्व) — इस लए शे + स्व = शेष्व। यही षत्व ‘शेषे’ (लट्
मध्यम एक.) म भी दखता है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण
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उत्तमपुरुष म तीन रूप ‘शय्’ वाले ह: शयै, शयावहै, शयामहै — यहाँ गुण नह हुआ, क्य क लोट् के उत्तमपुरुष
प्रत्यय से पहले ‘आट् ’ नामक ‘आ’ जुड़ जाता है और उससे पहले ई का ‘य्’ हो जाता है। तुलना कem
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जए — लट् म
coण) पर लोट् म शयावहै, शयामहै (य्)।
शेवहे, शेमहे .(गु
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agl— शशुः सुखेन शेताम्। · त्वम् अत्र शेष्व। · अहं क शयै?
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‘शीङ् ’ धातुः, व ध लङ् -लकारः — पृष्ठ 205
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नयम — व ध लङ् म अङ्ग सवत्र शयी रहता है — शी + ई (यासुट्) → य् आदे श + ई = शयी। इस लए यह ता लका बलकुल एक-
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रस है।

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‘शीङ् ’- धातुः, व ध लङ् -लकारः — पृष्ठ 205

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पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

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पथमपुरुषः शयीत शयीयाताम् शयीरन्

म ध् यमपुरुषः शयीथाः agl शयीयाथाम् शयीध् वम्

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उ त्त मपुरुषः शयीय शयीविह शयीमिह

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g है (वध◌ेत, लभ◌ेत), पर
m .c के सामने ‘शयीत’ र खए: भ्वा द आत्मनेपद म व ध लङ् का चह्न एaदखता
aseअदा द शीङ् म वही चह्न ई बनकर आता है (शय◌ीत)। कारण एक ही है — यासुट् का ‘ई’ भ्वा द के अङ्गान्त ‘अ’ से
‘वधत’

agl मलकर ‘ए’ बन जाता है (अ + ई = ए), पर शीङ् म मलने को ‘अ’ है ही नह , इस लए ‘ई’ ज्य -का-त्य रह जाता है।

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आगे भुज् म भी यही ‘ई’ मलेगा — भुञ्ज◌ीत।

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प्रयोग — रोगी शान्त्या शयीत। (रोगी को शा न्त से लेटना चा हए) · ते वृक्षतले शयीरन्। · अहं तत्र न शयीय।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. ‘शीङ् ’ का लट् प्रथमपुरुष बहुवचन ल खए और ‘र्’ का कारण बताइए।
उत्तर — शेरते। आत्मनेपद के ‘अन्ते’ प्रत्यय का ‘न्’ इस धातु म ‘र्’ हो जाता है, इस लए ‘शयन्ते’ नह , शेरते।
2. ‘अश य’ का पुरुष-वचन-लकार बताइए।
उत्तर — उत्तमपुरुष, एकवचन, लङ् -लकार — ‘म सोया’।
3. ‘शेष्व’ म स् का ष् क्य हुआ?
उत्तर — उससे पहले ‘ए’ (इण् वण) है, इस लए षत्व हुआ — शे + स्व = शेष्व।
4. ‘वधत’ के समान शीङ् का व ध लङ् प्रथमपुरुष एकवचन क्या होगा और उसम ‘ए’ के ान पर क्या है?
उत्तर — शयीत — यहाँ ‘ए’ के ान पर ई है, क्य क अङ्ग के अन्त म ‘अ’ नह है।
5. ‘शयाते’ और ‘शयाथे’ का अन्तर बताइए।
उत्तर — शयाते = प्रथमपुरुष वचन (वे दोन सोते ह); शयाथे = मध्यमपुरुष वचन (तुम दोन सोते हो)।

व शष्टधातवः (आत्मनेप दनः) — ‘भुज’् धातुः — पृष्ठ 205–206
रुधा दगण क धातु, जसके भीतर ‘न्’ (श्नम्) घुसकर भुनज्/भुञ्ज् बनाता है

व शष्टधातवः

१ ‘भुज्’ धातुः, लट् -लकारः — पृष्ठ 205

धातु — भुज् (रुधा दगण, अथ — खाना, भोगना)। पुस्तक इसे ‘ व शष्टधातवः (आत्मनेप दनः)’ के नीचे रखती है, क्य क खाने के
अथ म यह आत्मनेपद है — फल खाने वाले को ही मलता है। इसक वशेषता यह है क वकरण बाहर नह , धातु के भीतर लगता
है।

श् नम् िवकरण — रुधािदगण में धात ु के अिन्तम स्वर के बाद न् घुस जाता है :
भुज् → भु + न् + ज् — इससे दो अङ् ग बनते है ं

भुन ज् (बलवत्/strong — जहाँ न् के बाद ‘अ’ आता है)
भु ज् (दुबल/weak — जहाँ न् सीधे ज् से िमलकर ञ् हो जाता है, श्चुत्व से)
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

‘भुज्’- धातुः, लट् -लकारः — पृष्ठ 205

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः भुङ्क्ते भुञ्जाते भुञ्जते

म ध् यमपुरुषः भुङ्क्षे भुञ्जाथे भुङ्ग्ध् वे

उ त्त मपुरुषः भुञ्जे भुञ्ज्वहे भुञ्ज्महे

‘भुङ्क्ते’ कैसे बना — तीन स याँ एक साथ: भुञ्ज् + ते → (क) ज् के आगे कठोर त् है, इस लए ज् का क् हो
जाता है (चोः कुः तथा ख र च); (ख) अब ञ् के आगे क् वग आ गया, इस लए ञ् का ङ् हो जाता है (परसवण) →
भुङ्क्ते। इसी तरह भुञ्ज् + से → भुङ्क्षे और भुञ्ज् + ध्वे → ज् का ग् (जश्त्व) → भुङ्ग्ध्वे। जहाँ आगे स्वर है
वहाँ कुछ नह बदलता — भुञ्जाते, भुञ्जते, भुञ्जे।

भुज् वस्तुतः उभयपद है: ‘खाना, भोगना’ अथ म यह आत्मनेपद (भुङ्क्ते) और ‘रक्षा करना, पालन करना’ अथ
म परस्मैपद (भुन क्त) होती है — भुजोऽनवने सूत्र यही कहता है। पुस्तक ने केवल आत्मनेपद के रूप दए ह,
क्य क पाठ्यक्रम म ‘खाना’ अथ ही आता है। यह पुस्तक क चूक नह , चयन है — पर जानकारी के लए दूसरा पक्ष
भी याद र खए : भुन क्त, भुङ्क्तः, भुञ्ज न्त।

प्रयोग — बालकः फलं भुङ्क्ते। (बालक फल खाता है) · ते ओदनं भुञ्जते। · अहं मष्टान्नं भुञ्जे। · वयं सह भुञ्ज्महे।

२ ‘भुज्’ धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 205

नयम — लृट् म श्नम् नह लगता — वकरण केवल सावधातुक लकार (लट् , लङ् , लोट् , व ध लङ् ) म आता है। यहाँ धातु सीधी
लेकर गुण कया जाता है : भुज् → गुण से भोज् → भोज् + स्य + ते → ज् का क्, फर स् का ष् → भोक्ष्यते। भुज् अ नट् है,
इस लए ‘इ’ नह लगता।

‘भुज्’- धातुः, लृट्-लकारः — पृष्ठ 205

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः भोक्ष्यते भोक्ष्येते भोक्ष्यन्ते

म ध् यमपुरुषः भोक्ष्यसे भोक्ष्येथे भोक्ष्यध् वे

उ त्त मपुरुषः भोक्ष्ये भोक्ष्यावहे भोक्ष्यामहे

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

‘न्’ अचानक गायब क्य : भुङ्क्ते–भुञ्जते म जो ‘न्/ञ्’ था वह श्नम् वकरण का था, और वकरण केवल वह
लगता है जहाँ प्रत्यय सावधातुक हो। लृट् का ‘स्य’ आधधातुक है, इस लए वकरण नह आया और धातु अपने मूल
रूप म लौट आई। यही कारण है क लृट् और व ध लङ् क ता लकाएँ दे खने म एकदम अलग लगती ह — पर
व ध लङ् म ‘न्’ फर आ जाता है (भुञ्जीत), क्य क व ध लङ् सावधातुक है।

प्रयोग — सः सायं भोक्ष्यते। · वयं सव सह भोक्ष्यामहे।

३ ‘भुज्’ धातुः, लङ् -लकारः — पृष्ठ 205

‘भुज्’- धातुः, लङ् -लकारः — पृष्ठ 205

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः अभुङ्क्त अभुञ्जाताम् अभुञ्जत

म ध् यमपुरुषः अभुङ्क्थाः अभुञ्जाथाम् अभुङ्ग्ध् वम्

उ त्त मपुरुषः अभुिञ्ज अभुञ्ज्विह अभुञ्ज्मिह

वही दो अङ्ग, वही स याँ, केवल आगे ‘अ’: लट् क ता लका पर उँ गली रखकर मलाइए — भुङ्क्ते →
अभुङ्क्त, भुञ्जते → अभुञ्जत, भुङ्ग्ध्वे → अभुङ्ग्ध्वम्। जहाँ आगे कठोर व्यञ्जन है वहाँ ‘भुङ्क्’, जहाँ स्वर है
वहाँ ‘भुञ्ज्’। उत्तमपुरुष एकवचन अभु ञ्ज है (शीङ् के ‘अश य’ क तरह — लङ् आत्मनेपद का उत्तमपुरुष
एकवचन प्रत्यय ‘इ’ है)।

प्रयोग — सः ः फलम् अभुङ्क्त। · ते सव अभुञ्जत। · अहं तत्र अभु ञ्ज।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

४ ‘भुज्’ धातुः, लोट् -लकारः — पृष्ठ 206

‘भुज्’- धातुः, लोट् -लकारः — पृष्ठ 206

पुरुषः एकवचनम् वचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः भुङ्क्ताम् भुञ्जाताम् भुञ्जताम्

म ध् यमपुरुषः भुङ्क्ष्व भुञ्जाथाम् भुङ्ग्ध् वम्

उ त्त मपुरुषः भुनजै भुनजावहै भुनजामहै

अ न्तम पं क्त ही इस धातु का सबसे सुन्दर पाठ है: पूरी आत्मनेपद-रूपावली म केवल यही तीन रूप ऐसे ह
जनम ‘भुनज्’ दखता है, ‘भुञ्ज्’ नह — भुनजै, भुनजावहै, भुनजामहै। कारण यह क लोट् के उत्तमपुरुष
प्रत्यय म ‘आट् ’ आगम जुड़ने से वे पत् (और इस लए बलवत्/strong) हो जाते ह, और बलवत् अङ्ग ‘भुनज्’ है।
शेष सब आत्मनेपद प्रत्यय दुबल ह, इसी लए वहाँ ‘भुञ्ज्’ आता है। ठ क यही बात रुध् म भी दखती है — रुणधै,
रुणधावहै, रुणधामहै।

ध्यान द: यहाँ ‘भुञ्जै’ लखना अशुद्ध है। ‘भुनजै’ म न् के बाद ‘अ’ है, इस लए न् का ञ् नह होता; जहाँ न् सीधे ज्
से टकराता है वह ‘ञ्ज’ बनता है। एक ही ता लका म दोन अङ्ग साथ-साथ छपे ह — भुञ्जताम् (दुबल) और
भुनजामहै (बलवत्) — यह दे खकर नयम स्वयं स्पष्ट हो जाता है।

प्रयोग — अ त थः भुङ्क्ताम्। (अ त थ भोजन कर) · त्वं भुङ्क्ष्व। · अहं भुनजै? (क्या म खाऊँ?)

५ ‘भुज्’ धातुः, व ध लङ् -लकारः — पृष्ठ 206

नयम — व ध लङ् सावधातुक है, इस लए श्नम् फर लौट आता है — और चूँ क यासुट् का ‘ई’ स्वर है, अङ्ग दुबल भुञ्ज् रहता है :
भुञ्ज् + ई + त = भुञ्जीत।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण
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‘भुज्’- धातुः, व ध लङ् -लकारः — पृष्ठ 206

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पुरुषः
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एकवचनम् वचनम्
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पथमपुरुषः भुञ्जीत भुञ्जीयाताम् भुञ्जीरन्
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म ध् यमपुरुषः भुञ्जीथाः भुञ्जीयाथाम् भुञ्जीध् वम्

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उ त्त मपुरुषः भुञ्जीय
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यहाँ पूरी ता लका एक-रस क्य है: व ध लङ् के सब प्रत्यय ‘ई’ से आरम्भ होते ह, अथात् सब स्वरा द ह —

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इस लए कह भी कठोर व्यञ्जन से टकराव नह होता और ‘भुङ्क्’ रूप एक बार भी नह आता। नौ के नौ खाने

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‘भुञ्जी-’ से शुरू होते ह। तुलना क जए — शीङ् म भी व ध लङ् इसी तरह एक-रस था (शयी-)।
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l a sजe् के पाँचों लकार एक पंि त में (पथमपु ष एकवचन) —
a g भु क् रु

लट् — भुङ्क्ते (खाता है) · लृट् — भोक्ष्यते (खाएगा) · लङ् — अभुङ्क्त (खाया)
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लोट् — भुङ्क्ताम् (खाए) · िविधिलङ् — भुञ् जीत (खाना चािहए)
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प्रयोग — रोगी लघु भोजनं भुञ्जीत। (रोगी को हल्का भोजन करना चा हए) · अ तथयः सह भुञ्जीरन्। · अहं मतं भुञ्जीय।

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अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
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स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।
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s e m1. ‘भुङ्क्ते’ म ज् का क् और ञ् का ङ् क्य हुआ?
ag la उत्तर — आगे कठोर ‘त्’ होने से ज् का क् (चोः कुः, ख र च), और फर क् वग के कारण ञ् का ङ् (परसवण)।
2. ‘भुनजै’ म ‘भुनज्’ अङ्ग क्य है, ‘भुञ्ज्’ क्य नह ?
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उत्तर — लोट् के उत्तमपुरुष प्रत्यय ‘आट् ’ के कारण पत् (बलवत्) हो जाते ह, और बलवत् अङ्ग भुनज् है। पूरी
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आत्मनेपद-ता लका म केवल ये तीन रूप बलवत् ह।

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3. ‘भोक्ष्यते’ म ‘न्’ क्य नह दखता?
उत्तर — श्नम् वकरण केवल सावधातुक लकार म लगता है; लृट् का ‘स्य’ आधधातुक है, इस लए वकरण नह
आया।
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4. ‘भुञ्जीरन्’ का लकार, पुरुष तथा वचन बताइए।
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.c5. ‘रुध्’ धातु को भुज् के साँचे पर चलाकर लट् प्रथमपुरुष एकवचन तथाaलोट्
उत्तर — व ध लङ् , प्रथमपुरुष, बहुवचन — ‘उन्ह खाना चा हए’।

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उत्तमपुरुष एकवचन ल खए।

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उत्तर — रु े; रुणधै।

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6. ‘भुज्’ कस अथ म परस्मैपद होती है और तब उसका लट् प्रथमपुरुष एकवचन क्या होगा?
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उत्तर — ‘रक्षा/पालन करना’ अथ म — तब भुन क्त। पुस्तक ने केवल आत्मनेपद (खाना अथ) के रूप दए ह।
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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

पूरे प र शष्ट का सार — तङ् -प्रत्यय क एक ही सारणी — पृष्ठ 199–206
अ ाईस ता लकाओं म जो साझा है, वह एक जगह

पु न रावृ त्तः

१ पाँच लकार के परस्मैपद तथा आत्मनेपद प्रत्यय एक साथ कैसे याद कर?

सीधा उत्तर — प र शष्ट क अ ाईस ता लकाओं म जो कुछ बदलता है वह अङ्ग है; प्रत्यय केवल दस समूह के ह — पाँच लकार ×
दो पद। इन्ह एक बार दे ख लेने पर हर ता लका अपने आप पढ़ जाने लगती है।

ध्यान द — नीचे क यह सारणी पुस्तक म छपी हुई नह है। यह ऊपर द गई पुस्तक क अपनी ता लकाओं से
नकाली गई है, ता क सब कुछ एक दृ ष्ट म आ जाए। पुस्तक स्वयं केवल पूरे रूप दे ती है, प्रत्यय अलग से नह
गनाती।

लकारः पदम् प्रथमपुरुषः (एक./ ./बहु.) मध्यमपुरुषः उत्तमपुरुषः

लट् परस्मैपद ित · तः · अिन्त िस · थः · थ िम · वः · मः

लट् आत्मनेपद ते · एते · अन्ते से · एथे · ध् वे ए · आवहे · आमहे

ल ृट् परस्मैपद स्यित · स्यतः · स्यिन्त स्यिस · स्यथः · स्यथ स्यािम · स्यावः · स्यामः

ल ृट् आत्मनेपद स्यते · स्येते · स्यन्ते स्यसे · स्येथे · स्यध्वे स्ये · स्यावहे · स्यामहे

लङ् परस्मैपद त् · ताम् · अन् स् (→ िवसग ) · तम् · त अम् · व · म

लङ् आत्मनेपद त · एताम् · अन्त थाः · एथाम् · ध् वम् इ/ए · आविह · आमिह

लोट् परस्मैपद तु/तात् · ताम् · अन्तु — /तात् · तम् · त आिन · आव · आम

लोट् आत्मनेपद ताम् · एताम् · अन्ताम् स्व · एथाम् · ध्वम् ऐ · आवहै · आमहै

िविधिलङ् परस्मैपद एत् · एताम् · एयुः एः · एतम् · एत एयम् · एव · एम

िविधिलङ् आत्मनेपद एत · एयाताम् · एरन् एथाः · एयाथाम् · ए ध् वम् एय · एविह · एमिह

दो जगह ‘एक से अ धक रूप’ क्य लखे ह: (क) लङ् आत्मनेपद उत्तमपुरुष एकवचन म प्रत्यय ‘इ’ है, पर भ्वा द
जैसे अ-कारान्त अङ्ग म वह अङ्ग के ‘अ’ से मलकर ‘ए’ बन जाता है — इसी लए अवध, अलभे पर अश य,
अभु ञ्ज। (ख) लोट् परस्मैपद म ‘तु/तात्’ तथा मध्यमपुरुष एकवचन म ‘शून्य/तात्’ — दोन वकल्प शुद्ध ह। शेष
सब खाने एक ही रूप के ह।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

अङ् ग बनाम प यय — एक उदाहरण से पूरी बात —
त्

पत्यय अन्ते (लट् , आत्मने पद, पथमपुरु ष बहुवचन) सब जगह वही है, अङ् ग बदलता है :

वध् + अन्ते = वधन्ते · लभ् + अन्ते = लभ न्ते · शी + अन्ते = शेरते (न् → र्) · भुञ् ज् + अन्ते = भुञ् जते (अ

लुप्त)

२ पाँच धातुओं के मुख्य रूप एक ही सारणी म — तुरन्त दोहराने के लए

ध्यान द — यह सारणी भी पुस्तक म छपी हुई नह है। इसके सब रूप ऊपर द गई पुस्तक क ता लकाओं से ही
लए गए ह; यहाँ केवल एक साथ रख दए गए ह ता क परीक्षा से पहले पाँच मनट म पूरा प र शष्ट दोहराया जा सके।

धातुः (अथ) पदम् लट् लृट् लङ् लोट् व ध लङ्

पठ् (पढ़ ना) परस्मैपद पठित पिठष्यित अपठत् पठतु पठे त ्

पिठ (िणच् — पढ़ ाना) परस्मैपद पाठयित — — — —

वृध ु (बढ़ ना) आत्मनेपद वध ते विध ष्यते अवध त वध ताम् वध त

लभ् (पाना) आत्मनेपद लभते ल प्स्यते अलभत लभताम् लभेत

शीङ् (सोना) आत्मनेपद शेते शियष्यते अशेत शेताम् शयीत

भुज् (खाना) आत्मनेपद भुङ्क्ते भोक्ष्यते अभुङ्क्त भुङ्क्ताम् भुञ्जीत

ऊपर क पं क्त म ‘—’ क्य है — पुस्तक ने णच्-प्रत्ययान्त रूप केवल लट् -लकार म दए ह (पाठय त आ द), शेष लकार म
नह । शीषक भी यही कहता है — ‘परस्मैप दधातूनां लट् -लकारः णच्-प्रत्ययान्तानां प्रयोगः’। य द आवश्यकता पड़े तो वे अङ्ग
‘पाठय’ पर पठ् का ही साँचा लगाकर बन जाते ह — पाठ यष्य त, अपाठयत्, पाठयतु, पाठयेत्।

प र शष्ट क सबसे बड़ी सीख: पाँच धातुएँ चुनने म पुस्तक ने बहुत सोच-समझकर काम कया है — पठ् से
परस्मैपद का सरल साँचा, वृधु से आत्मनेपद जहाँ अङ्ग म गुण होता है, लभ् से आत्मनेपद जहाँ अङ्ग बलकुल नह
बदलता, शीङ् से वह धातु जसम वकरण ही नह लगता, और भुज् से वह जसम वकरण धातु के भीतर घुसता है।
पाँच धातुओं म संस्कृत क्रया-रचना के लगभग सभी प्रकार आ गए। इसी लए इन्ह भर याद कर लेना दजन अन्य
धातुओं क कुंजी दे दे ता है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास के लए (स्वयं कर) — ये प्रश्न पुस्तक म नह ह। प र शष्ट ५ पर शारदा कोई अभ्यास नह दे ती; ये केवल
स्वयं जाँच के लए यहाँ जोड़े गए ह।

1. नीचे दए रूप का लकार, पुरुष तथा वचन बताइए — (क) अपठाम (ख) लप्स्यध्वे (ग) शेरताम् (घ) भुञ्जीथाः।
उत्तर — (क) लङ् , उत्तमपुरुष, बहुवचन (ख) लृट्, मध्यमपुरुष, बहुवचन (ग) लोट् , प्रथमपुरुष, बहुवचन (घ)
व ध लङ् , मध्यमपुरुष, एकवचन।
2. इनम से कौन-सा रूप आत्मनेपद का नह है — वधसे, पठथः, लभेरन्, शेध्वम्?
उत्तर — पठथः — यह परस्मैपद (लट् , मध्यमपुरुष वचन) है।
3. ‘वह पढ़े गा’, ‘वे दोन बढ़े ’, ‘तुम खाओ’ — तीन वाक्य संस्कृत म ल खए।
उत्तर — सः प ठष्य त। · तौ अवधताम्। · त्वं भुङ्क्ष्व।
4. पाँच लकार के नाम क्रम से ल खए और प्रत्येक का एक-एक चह्न बताइए।
उत्तर — लट् ( त/ते) · लृट् (स्य) · लङ् (आगे अ) · लोट् (तु/ताम्/आ न/ऐ) · व ध लङ् (ए/ई)।
5. ‘शयीत’ और ‘भुञ्जीत’ म ‘ई’ क्य है जब क ‘वधत’ म ‘ए’?
उत्तर — व ध लङ् का चह्न मूलतः ‘ई’ (यासुट्) है। भ्वा द अङ्ग के अन्त म ‘अ’ होने से अ + ई = ए बन जाता है
(वधत), पर शीङ् तथा भुज् के अङ्ग म वह ‘अ’ है ही नह , इस लए ‘ई’ ज्य -का-त्य रह जाता है।

अध्याय — एक नज़र म
यह क्या है — ‘धातुरूपा ण’ शारदा का पाँचवाँ और अ न्तम प र शष्ट है (छपे पृष्ठ 199–206)। प र शष्ट पाठ नह होता —
इसम न ोक ह, न कथा, न अभ्यासाद् जायते स द्धः जैसा प्रश्न-खण्ड। यहाँ केवल तङन्त ( क्रया) रूप क ता लकाएँ
ह, जन्ह दे खकर छात्र अपना लखा हुआ रूप मलाता है।
पाँच लकार, पाँच धातु — पुस्तक जन पाँच लकार को लेती है वे ह लट् (वतमान), लृट् (भ वष्यत्), लङ् (भूत —
अनद्यतन), लोट् (आज्ञा/प्राथना) और व ध लङ् (चा हए/य द — व ध, नमन्त्रण, सम्भावना)। लट् , लुङ्, लृङ्, आशी लङ्
यहाँ नह ह। धातुएँ पाँच ह — पठ् (परस्मैपद ), वृधु और लभ् (आत्मनेपद ), तथा शीङ् और भुज् ( व शष्ट आत्मनेपद )।
पुस्तक का क्रम — पहले पृष्ठ 199 पर णच्-प्रत्ययान्त (प्रेरणाथक) प्रयोग — ‘पठ त’ के सामने ‘पाठय त’ रखकर दखाया
गया है क प्रेरणा के अथ म रूप कैसे बदलता है। फर परस्मैप दधातूनां पञ्चसु लकारेषु प्रयोगाः (पृष्ठ 199–200) म पठ् के
पाँच लकार। फर आत्मनेपद नां धातूनां पञ्चसु लकारेषु प्रयोगाः (पृष्ठ 201–203) म वृधु और लभ् के पाँच-पाँच लकार।
अन्त म व शष्टधातवः (आत्मनेप दनः) (पृष्ठ 204–206) म शीङ् और भुज्।
णच् = प्रेरणा — धातु के आगे णच् प्रत्यय लगने पर अथ ‘स्वयं करना’ से बदलकर ‘दूसरे से कराना’ हो जाता है — बालकः
पठ त (बालक पढ़ता है) पर शक्षकः बालकं पाठय त ( शक्षक बालक को पढ़ाता है)। रूप बनाते समय धातु के स्वर क वृ द्ध
होती है और ‘अय्’ जुड़ता है : पठ् → पा ठ → पाठय त। इसी से ‘लेखय त, खादय त, दशय त, श्रावय त, ज्ञापय त’ जैसे रूप
बनते ह, जनक सूची पुस्तक ने ता लका के नीचे द है।
तीन पुरुष, तीन वचन — हर ता लका म नौ खाने ह। प्रथमपुरुष = वह/वे (सः, तौ, ते), मध्यमपुरुष = तू/तुम (त्वम्, युवाम्,
यूयम्), उत्तमपुरुष = म/हम (अहम्, आवाम्, वयम्)। ध्यान रहे — संस्कृत का ‘प्रथमपुरुष’ हन्द -अंग्रेज़ी के third person
के बराबर है, first person के नह ; यही सबसे आम भ्रम है।
परस्मैपद और आत्मनेपद — जन धातुओं का फल कता से भन्न कसी और को मलता है वे परस्मैपद (पठ त, गच्छ त),
और जनका फल कता को ही मलता है वे आत्मनेपद (वधते, लभते, शेते, भुङ्क्ते)। पहचान प्रत्यय से होती है : परस्मैपद म
त, तः, अ न्त…; आत्मनेपद म ते, एते, अन्ते…। पुस्तक ने दोन को अलग-अलग शीषक म रखा है, इस लए यह भेद ता लका
दे खते ही स्पष्ट हो जाता है।

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‘ व शष्ट’ धातु क्य अलग — पृष्ठ 204 के शीषक व शष्टधातवः (आत्मनेप दनः) के नीचे शीङ् और भुज् इस लए रखे गए
ह क इनका अङ्ग स्वयं बदलता है — शीङ् म गुण होकर शे और बना गुण शय् (शेते पर शयाते), तथा भुज् म श्नम् का न्
घुसकर भुनज्/भुञ्ज् (भुन क्त-भुङ्क्ते, भुञ्जते)। भ्वा द पठ् , वृधु, लभ् क तरह इनका रूप सीधा नह चलता, इसी लए
‘ व शष्ट’।
लकार पहचानने क चाबी — लङ् के हर रूप के आगे अ (अट् आगम) लगता है — अपठत्, अवधत, अशेत, अभुङ्क्त।
लृट् म स्य दखता है — प ठष्य त, व धष्यते, भोक्ष्यते। व ध लङ् म ए/ई — पठे त्, वधत, शयीत, भुञ्जीत। लोट् म तु/ताम्/
तात् तथा उत्तमपुरुष म आ न/ऐ — पठतु, पठा न, वध, भुनजै। ये चार संकेत याद कर लेने पर लकार पहचानने म भूल नह
होती।
इसका उपयोग कैसे कर — रटने के बजाय पहले यह दे खए क धातु परस्मैपद है या आत्मनेपद , फर उसे नीचे क कसी
ता लका के साँचे से मलाइए — ‘ लख्, गच्छ् , वद्, नम्’ को पठ् से; ‘सेव्, मोद्, याच्, रम्’ को वृधु/लभ् से; ‘आस्’ को शीङ्
से; ‘रुध्, छद्, भद्’ को भुज् से। एक साँचा सीखकर दजन धातुएँ बन जाती ह — और पुस्तक ने हर ता लका के नीचे
‘एवमेव …’ लखकर ठ क यही सूची स्वयं द है।

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कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 16 प र शष्टम् ५ — धातुरूपा ण
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त्व रत पुनरावृ त्त
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पद उदाहरण टप्पणी

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धातुः ि या का मूल रूप, िजससे सब ि यापद बनते पठ् , वृधु, लभ्, शीङ् , भुज् ता लका के शीषक म यही रूप छपा है
है ं

. cपठom ag
em
तङन्तम् ितङ् पत्यय लगने पर बना ि यापद त, वधते, भुङ्क्ते सुबन्त = नाम-पद, तङन्त = क्रया-पद

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लकारः
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काल तथा अथ बताने वाला दस पत्यय-समूहों में
से एक
लट् , लृट्, लङ् , लोट् ,
व ध लङ्
प र शष्ट म केवल ये पाँच ह

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लट् -लकारः वतमान काल पठ त = पढ़ता है ‘ल’ + ‘ट् ’; ट् इत् है

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लृट्-लकारः
.co भिवष्यत् काल — ‘स्य’ िचह्न
प ठष्य त = पढ़े गा
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व धष्यते, लप्स्यते, भोक्ष्यते

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लङ् -लकारः अनद्यतन भूत काल — आगे ‘अ’ (अट् आगम) अपठत् = पढ़ा अवधत, अशेत, अभुङ्क्त

s
लोट् -लकारः पठतु = पढ़े /पढ़ो पठा न, वध, भुनजै
a
आ ा, पाथना, अनुम ित
m
m .co पठे त् = पढ़ना चा हए agl
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व ध लङ् - चािहए, यिद, सम्भावना, िविध वधत, शयीत, भुञ्जीत

agl
लकारः

पुरुषः पथम (वह), मध्यम (तू), उत्तम (मैं) पठ त · पठ स · पठा म संस्कृत का प्रथमपुरुष = अंग्रेज़ी third
person
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पठ त · पठतः · पठ न्त
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वचनम् एक, दो, बहुत संस्कृत म वचन अ नवाय है

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परस्मैपदम् िजसका फल कत से िभन्न को िमले पठ त, गच्छ त, लख त प्रत्यय — त, तः, अ न्त…

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आत्मनेपदम् िजसका फल कत को ही िमले वधते, लभते, शेते प्रत्यय — ते, एते, अन्ते…

पेर णा (कराना) का अथ दे ने वाला पत्यय om पठ् + णच् = प ठ → l a se
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णच्-प्रत्ययः पृष्ठ 199 क पहली ता लका इसी क है

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प्रेरणाथः agl
‘करना’ के स्थान पर ‘कराना’ अथ पाठय त = पढ़ाता है प्रेरक कता प्रथमा म, प्रेय तीया म

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अट् आगमः लङ् में धातु के आगे जुड़ने वाला ‘अ’ अ + पठत् = अपठत् यही लङ् क सबसे पक्क पहचान है

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se आशीवाद-सा गम्भीर स्वर देता है
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तातङ् आदे शः लोट् में ‘तु/िह’ के स्थान पर िवकल्प से ‘तात्’ पठतु / पठतात्; पठ /

m
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पठतात्

agl c
.
श्नम् वकरणः रुधािदगण में धातु के भीतर घुस ने वाला ‘न्’ भुज् → भुनज् / भुञ्ज् इसी से भुन क्त–भुङ्क्ते–भुञ्जते बनते ह

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.co agl
सेट्–अ नट् ल ृट् आिद में ‘इ’ आगम लगे या न लगे व धष्यते (सेट्), लप्स्यते इसी से व धष्यते पर लप्स्यते बनता है

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(अ नट् )

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages35
Updated19 Sep 2026