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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा9
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 3: याशील ऊतक
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — अन्वेषण
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
28 – 47 20 52 हन्द
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · व ान · अन्वे ष ण
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 3: क्रयाशील ऊतक
एक नषे चत को शका बार-बार वभा जत होकर त्वचा, अ स्थ, पेशी, तं त्रका, जाइलम और फ्लोएम बन जाती है। क्रयाशील ऊतक अध्याय यही
कहानी बताता है — समान को शकाएँ समूह बनाकर वशेषीकृत कैसे होती ह, पादप और जंतु ऊतक के माग अलग-अलग क्य हुए, और पे शयाँ,
अ स्थयाँ तथा सं धयाँ मलकर शरीर को ग त कैसे दे ती ह।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
अन्वेषण (कक्षा 9) 28 – 47
खं ड प्रश्न
20 52
माध्यम
हन्द
चतन क जए — पृष्ठ 28
अध्याय आरंभ
चतन क जए
प्र.1 जैव प्रक्रम और मानव कल्याण को समझने के लए को शकाओं और ऊतक का अध्ययन कस प्रकार से
महत्त्वपूण है?
क्य क प्रत्येक जैव प्रक्रम अंततः को शका के भीतर ही होता है, और कसी बड़े शरीर क कोई एक को शका सभी प्रक्रम एक साथ
नह कर सकती।
अमीबा जैसे एकको शक य जीव म एक ही को शका पोषण, श्वसन, उत्सजन और ग त — सब कुछ करती है। बहुको शक य शरीर म
यह संभव नह , अतः समान को शकाएँ ऊतक बनाकर एक ही काय सँभाल लेती ह। ऊतक का अध्ययन हम बताता है क प्रत्येक
जैव प्रक्रम कहाँ होता है और उस काय के लए वही संरचना क्य उपयुक्त है —
पेशीय ऊतक → ग त, क्य क इसक को शकाएँ लंबे तंतु ह जो संकु चत हो सकते ह।
तं त्रका ऊतक → नयंत्रण और समन्वय, क्य क न्यूरॉन का लंबा तं त्रकाक्ष संदेश को दूर तक ले जाता है।
जाइलम → जल प रवहन, क्य क इसक को शकाएँ मृत और खोखली न लकाएँ ह जनम प्रवाह रोकने वाली कोई भ त्त नह ।
फ्लोएम → भोजन प रवहन, क्य क इसक चालनी न लकाएँ सजीव ह और सहचर को शकाएँ उनम शकरा का भारण-अभारण
करती ह।
मानव कल्याण से संबंध: ऊतक क सामान्य संरचना ात हो तो यह भी पता चलता है क उसम वकार आने पर
क्या होगा और उसे कैसे ठ क कया जाए। अ स्थ म ा क मूल (stem) को शकाएँ ल्यूके मया और थैलेसी मया के
रो गय म प्रत्यारो पत क जाती ह। पादप ऊतक संवधन, जसका आरंभ 1958 म एफ.सी. स्ट वड ारा गाजर क
एक फ्लोएम को शका से पूण पादप उगाने से हुआ, आज रोगमुक्त पौध और उन्नत फसल दे ता है। सप्रा गुहा मुखज
और एस.सी. माहेश्वरी ने परागकोष संवधन से पूण पादप वक सत कया, जो आज भी फसल सुधार म उपयोगी है।
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संकेत: पदानुक्रम एक पं क्त म याद र खए — को शका → ऊतक → अंग → अंग तंत्र → जीव। प्रत्येक स्तर
इस लए बना है क श्रम वभाजन और सूक्ष्म हो सके।
प्र.2 पादप और जंतुओं के ऊतक कस प्रकार भन्न ह और क्य ?
अंतर इस लए है क पादप और जंतुओं क जीवन-शैली भन्न है — पादप एक स्थान पर स्थर रहते ह और अपना भोजन स्वयं बनाते
ह, जब क जंतु ग तशील ह और भोजन बाहर से ग्रहण करते ह।
बदु पादप ऊतक जंतु ऊतक
अवलंब को शका भ त्त दृढ़ता दे ती है; दृढ़ोतक और ल ग्नन काष्ठीय को शका भ त्त नह , अतः को शकाएँ सरलता से आकार
ढाँचा बनाते ह। पादप को मृत ऊतक सीधा खड़ा रखता है। बदलती ह। अवलंब सजीव अ स्थ और उपा स्थ से मलता है।
वृि वृ द्ध केवल वभज्योतक तक सी मत और आजीवन चलती वृ द्ध पूरे शरीर म फैली होती है और प्रायः प रपक्वता पर रुक
है। वृक्ष प्र तवष प र ध बढ़ाता है। जाती है।
पोषण प्रकाश-सं ेषण करने वाले ऊतक — भोजन भीतर ही बनता पाचन और अवशोषण के ऊतक (आँत क उपकला) —
है। भोजन बाहर से लया जाता है।
पिरवहन जाइलम और फ्लोएम — स्थर न लकाएँ; जाइलम मृत होता रक्त — एक तरल संयोजी ऊतक, जसे हृदय पेशी पंप करती
है। है।
ऊज - अनेक सहायक को शकाएँ मृत ह, अतः उनके अनुरक्षण पर लगभग सभी को शकाएँ सजीव ह और उन्ह नरंतर आपू त
व्यय कोई व्यय नह । चा हए।
ऐसा क्य होता है: जंतु को मुड़ना, दौड़ना और आकार बदलना होता है, अतः वह प्रत्येक को शका के चार ओर दृढ़
भ त्त नह रख सकता; इसके बदले वह सजीव कंकाल और नरंतर भोजन-आपू त क क मत चुकाता है। पादप को
ग त नह करनी, अतः वह अवलंब के लए सस्ती, मृत, ल ग्ननयुक्त को शकाएँ लगा दे ता है और आजीवन अपने
अग्रभाग से बढ़ता रहता है।
प्र.3 बहुको शक य जीव म संगठन के व भन्न स्तर पर श्रम वभाजन कस प्रकार उनक संरचना और काय से
संबं धत है?
प्रत्येक स्तर क संरचना उसी एक काय के अनुसार ढली होती है जो उस स्तर को करना है — और प्रत्येक ऊपरी स्तर इस लए बनता
है क वह उन काय को जोड़ सके जन्ह नचला स्तर अकेले नह जोड़ सकता।
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स्तर संरचना जो प्रकाय संभव होता है
कोिशका न्यूरॉन एक लंबे तं त्रकाक्ष के रूप म खचा होता है संकेत को दूर तक पहुँचाना
ऊतक अनेक पेशी तंतु समांतर रूप से पूल म बँधे उनके छोटे -छोटे खचाव जुड़कर बड़ा बल बनाते ह
अंग हृदय — हृदय पेशी + उपकला + संयोजी ऊतक + तं त्रकाएँ जीवनपयत लयबद्ध रूप से रक्त पंप करना
अंग तंत्र पेशी-कंकाल तंत्र — अ स्थयाँ, पे शयाँ, कंडराएँ, स्नायु, उपा स्थ, सं धयाँ मुद्रा, चलन और कोमल अंग क सुरक्षा
जीव तं त्रका नयंत्रण म काय करते सभी तंत्र एक पूण, सम न्वत जीवन
यही तक पादप म भी चलता है — बाह्यत्वचीय को शकाएँ चपट और मोमी ह (सुरक्षा), मृदूतक को शकाएँ पतली भ त्त वाली और
अवकाशयुक्त ह (भंडारण और गैस वसरण), जाइलम वा हकाएँ खोखली न लकाएँ ह (संवहन) — और ये मलकर त्वचीय, भरण
तथा संवहन ऊतक तंत्र बनाती ह।
श्रम वभाजन से कायक्षमता क्य बढ़ती है: जो को शका केवल एक काय करती है, वह पूरी तरह उसी काय के
लए बनाई जा सकती है। केवल भोजन भंडारण करने वाली मृदूतक को शका को मोट भ त्त क आवश्यकता नह ;
केवल दृढ़ता दे ने वाली दृढ़ोतक को शका को तो सजीव रहने क भी आवश्यकता नह । वशेषीकरण उन समझौत को
समाप्त कर दे ता है जो अमीबा जैसी सवकाय को शका को करने पड़ते ह।
क्रयाकलाप 3.1 — आइए, प्रयोग अ भक ल्पत कर — पृष्ठ 29
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3.2.1 शीषस्थ वभज्योतक — पौधे लंबाई म कस प्रकार वृ द्ध करते ह?
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क्रयाकलाप
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s m 3.1 म आपके ारा अ भले खत कए गए आँकड़ म आपने क्या अवलोकन कया? क्या आपके
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अवलोकन चत्र 3.2 म प्रस्तुत ग्राफ य नरूपण के समान ह? इससे आप क्या नष्कष नकालते ह?
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ता लका 3.1 — प्रायो गक आँकड़े — शल्क कंद के आधार से नकली जड़ क लंबाई (cm)।
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प्रायो गक जार दन 1
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चत्र 3.2, पृष्ठ 30 — प्याज क जड़ म वृ द्ध; यह आलेख क्रयाकलाप 3.1 के साथ मु द्रत है।
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agl जार ‘क’ क जड़ प्र त दन लंबी होती जाती ह; जार ‘ख’ क जड़ उसी दर से बढ़ती ह जब तक उनके मूलाग्र काटे नह जाते, और
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उसके पश्चात वृ द्ध पूणतः रुक जाती है।
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पुस्तक के चत्र 3.2 म अं कत पा ांक (शल्क कंद के आधार से जड़ क लंबाई, cm म) —
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दन 1 2 3 4 5 6 7
जार ‘क’ (अकटी) 0.25 0.8 1.8 2.9 3.8 4.9 5.8
जार ‘ख’ (मूल ाग कटा) 0.25 0.7 1.6 2.6 → 1.6 1.6 1.6 1.6
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जड़ की लंबाई (cm)
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2 जार ‘ख’ — मूलाग कटने पर विृ रुकी
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िदन
प्याज क जड़ म वृ द्ध, चत्र 3.2 के पा ांक से बनाया गया आलेख। बदुयुक्त ऊध्वाधर रेखा वह 1 cm है जो काटकर हटाया गया।
अब वृ द्ध क दर प रक लत क जए —
वृि दर = (लंबाई में पिरवतन) ÷ (िलया गया समय)
जार ‘क’, िदन 1 → िदन 7 = (5.8 cm − 0.25 cm) ÷ 6 िदन = 5.55 cm ÷ 6 िदन ≈ 0.93 cm िद न ⁻¹
जार ‘ख’, काटने से पूव (िदन 1 → िदन 4) = (2.6 cm − 0.25 cm) ÷ 3 िदन = 2.35 cm ÷ 3 िदन ≈ 0.78
cm िद न ⁻¹
काटकर हटाई गई लंबाई = 2.6 cm − 1.6 cm = 1.0 cm (चरण 5 के 1 सेट
ं ीमीटर के अनुरूप)
जार ‘ख’, काटने के पश्चात (िदन 4 → िदन 7) = (1.6 cm − 1.6 cm) ÷ 3 िदन = 0 cm िद न ⁻¹
नष्कष: जड़ केवल अपने मूलाग्र से वृ द्ध करती है। मूलाग्र हटा दया जाए तो शेष जड़ के सजीव और स्वस्थ रहने पर भी लंबाई
बढ़ना पूणतः रुक जाता है।
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ऐसा क्य होता है: मूलाग्र म मूल शीषस्थ वभज्योतक होता है — छोट को शकाएँ, पतली भ त्त, सघन
को शकाद्रव्य, बड़ा कद्रक और रसधानी अनुप स्थत — जो नरंतर वभा जत होती रहती ह। अध्याय 2 म आपने इन्ह
को शकाओं म समसूत्री वभाजन दे खा था। मूलाग्र काटने से एकमात्र वभाजनशील भाग हट जाता है; पीछे बची
को शकाएँ वभे दत होकर स्थायी ऊतक बन चुक ह और वभा जत नह हो सकत । प्ररोह के अग्रभाग म भी यही
वभज्योतक होता है, इस लए पौधा ऊँचाई भी अपने अग्रभाग से ही बढ़ाता है।
स्वयं जाँ चए: जार ‘क’ नयंत्रण (control) है। जल, प्रकाश, कंद — सब समान रखे गए ह और केवल जार ‘ख’
म मूलाग्र काटा गया है। इसी कारण आप वश्वासपूवक कह सकते ह क अंतर का कारण केवल मूलाग्र ही है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 30
3.2.2 पा वभज्योतक — पौधे प र ध म कस प्रकार वृ द्ध करते ह?
प्र.1 प र ध म यह वृ द्ध कस कारण होती है?
तने के भीतर एक वलय के रूप म व्यव स्थत स क्रय रूप से वभा जत होने वाली को शकाओं के कारण — अथात पाश्व वभज्योतक
के कारण।
ये को शकाएँ तने क लंबाई के अनु दश एक बेलन के रूप म फैली होती ह। वभाजन के समय ये नई को शकाएँ संकद्र रूप से
भीतर और बाहर दोन ओर जोड़ती ह, अतः तना भीतर से मोटा होता जाता है और उसका गोल आकार भी बना रहता है।
यह वलय के रूप म क्य दखता है: अनुकूल वष म (पयाप्त जल, उपयुक्त ताप) वभज्योतक तेजी से वभा जत
होता है और प्र तकूल वष म धीरे। तीव्र वृ द्ध से बड़ी, पतली भ त्त वाली को शकाओं क चौड़ी प बनती है; मंद
वृ द्ध से छोट , मोट भ त्त वाली को शकाओं क संकरी प । एक चौड़ी + एक संकरी प = एक वा षक वृ द्ध
वलय ( चत्र 3.4)। वलय गनकर वृक्ष क आयु ात होती है और उनक चौड़ाई उस जलवायु का अ भलेख है जसम
वृक्ष बढ़ा।
क्या आप जानते ह? इसी कारण बीजपत्री तने प्र तवष मोटे होते ह, कतु घास या ताड़ का तना नह — उनम
पाश्व वभज्योतक होता ही नह ।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 31
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3.2.3 अंतवशी वभज्योतक; वभज्योतक ऊतक क वशेषताएँ
प्र.1 य द कसी युवा तने का अग्रभाग काट दया जाए तो आपके वचार से पौधे क वृ द्ध पर क्या प्रभाव होगा?
तना लंबाई म बढ़ना बंद कर दे ता है, कतु पौधे क वृ द्ध रुकती नह — तने क पवसं धय से नई शाखाएँ नकल आती ह ( चत्र
3.5)।
इसे दो अलग वभज्योतक पर पड़ने वाले अलग-अलग प्रभाव के रूप म सम झए —
प्ररोह शीषस्थ वभज्योतक अग्रभाग पर होता है। उसे काट दे ने पर ऊपर नई को शकाएँ जोड़ने वाला कुछ बचता ही नह , अतः
ऊँचाई बढ़ना रुक जाता है।
अंतवशी वभज्योतक, जो पव के आधार पर या पवसं ध के ठ क ऊपर स्थत होता है, अछू ता रहता है। वह वभा जत होता
रहता है, अतः पवसं धय क कक्षस्थ क लकाएँ नई शाखाओं के रूप म फूट पड़ती ह।
माली इसी का उपयोग करते ह: बाड़ क छँ टाई करने पर प्रत्येक कटे प्ररोह का अग्रभाग हट जाता है और एक लंबी
शाखा के स्थान पर कई पाश्व शाखाएँ नकल आती ह। पास-पास नकली अनेक शाखाएँ ही बाड़ को घना रूप दे ती
ह। घास भी कटाई या चराई के बाद इसी प्रकार पुनः उग आती है ( चत्र 3.6) — उसका अंतवशी वभज्योतक नीचे
पव पर, चरने वाले जंतु के मुँह क पहुँच से नीचे रहता है, अतः पत्ती आधार से पुनः बढ़ जाती है।
यह क जए: घर म तुलसी या ध नए के पौधे का बढ़ता हुआ अग्रभाग तोड़ द जए और एक सप्ताह तक दे खए।
पौधा छोटा कतु अ धक शाखाओं और अ धक प त्तय वाला हो जाएगा — यही छँ टाई क व ध है।
प्र.2 आपके वचार से वभज्योतक ऊतक क को शकाओं म रसधा नयाँ क्य नह होत ?
क्य क बड़ी रसधानी उस स्थान और उन संसाधन को घेर लेती जो तीव्रता से वभा जत होती को शका को वभाजन के लए चा हए।
बड़ी कद्र य रसधानी अ धकतर जल है; वह को शकाद्रव्य को भ त्त से सट पतली परत म दबा दे ती है। वभज्योतक को शका
इसके वपरीत अपना को शकाद्रव्य सघन और को शकांग से भरा रखती है — राइबोसोम, माइटोकॉ या, अंतद्रव्यी
जा लका — क्य क उसे लगातार नए प्रोट न, नई झ ल्लयाँ और नई को शका भ त्त बनानी होती है।
वभाजन म ऊजा लगती है। ऊजा दे ने वाले माइटोकॉ या को को शकाद्रव्य म स्थान चा हए, न क रसधानी ारा कनारे धकेला
जाना।
रसधानी को शका को बड़ा बना दे ती है। वभज्योतक को शकाएँ छोट रहती ह, जससे को शकाद्रव्य क तुलना म कद्रक बड़ा
रहता है और बार-बार होने वाले वभाजन को सरलता से नयं त्रत कर पाता है।
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ऐसा क्य होता है: रसधानी भंडारण और अवलंब क संरचना है — वह उस स्थायी को शका म उपयोगी है जो
वभाजन समाप्त कर चुक है और अब भोजन सं चत करती है या त बनाए रखती है। इसी लए रसधा नयाँ बाद
म प्रकट होती ह, जब वभज्योतक को शका वभे दत होकर मृदूतक बनती है। रसधानी-र हत होना कोई संयोग नह ;
यह उसी समूह का अंग है जसम पतली भ त्त, सघन को शकाद्रव्य, बड़ा कद्रक और अंतःको शक य अवकाश का
अभाव स म्म लत ह — और यह पूरा समूह नरंतर, तीव्र वभाजन के लए ही बना है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 32
3.2.4 स्थायी ऊतक; सुरक्षात्मक और सहायक ऊतक
प्र.1 आपने क्या अवलोकन कया है? क्या सभी को शकाएँ आकार और आमाप म समान ह? आप व भन्न प्रकार के
कतने ऊतक पहचान सकते ह? उनम आप क्या अंतर दे खते ह? व भन्न प्रकार क को शकाओं और ऊतक क
उप स्थ त का क्या कारण हो सकता है?
नह — सूरजमुखी के तने क अनुप्रस्थ काट ( चत्र 3.7) म को शकाएँ स्पष्टतः एक जैसी नह ह, और बाहर से भीतर क ओर एक
न श्चत क्रम म अनेक भन्न ऊतक पहचाने जा सकते ह।
बाहर से भीतर को शकाएँ कैसी दखती ह प्रकाय
उपत्वचा + बाह्यत्वचा (बाह्यत्वचीय रोम सिहत) मोमी परत के नीचे चपट , आयताकार, संहत को शकाओं सुरक्षा; जल-हा न नयंत्रण
क एक परत
श्ले षोतक सजीव को शकाएँ, कोने स्थू लत त्वचा के ठ क नीचे लचीला
अवलंब
म ृदू तक / भरण ऊतक बड़ी, पतली भ त्त वाली, वरल, अवकाशयुक्त भंडारण, प्रकाश-सं ेषण,
भराव
दृ ढ़ोतक छोट को शकाएँ, अत्यंत मोट ल ग्ननयुक्त भ त्त; कठोर यां त्रक दृढ़ता
अ धकतर मृत
संवहन बंडल — बाहर फ्लोएम, बीच में पाश्व फ्लोएम — सजीव चालनी न लकाएँ; जाइलम — चौड़ी, भोजन प रवहन, प र ध
िवभज्योतक, भीतर जाइलम मोट भ त्त वाली मृत न लकाएँ वृ द्ध, जल प रवहन
कारण: एक ही आकार क को शका पाँच अलग काय नह कर सकती। जल का संवहन करने वाली को शका को खोखला और मृत
होना पड़ेगा; भोजन सं चत करने वाली को सजीव और वस्तृत; दृढ़ता दे ने वाली को मोट भ त्त वाला। इस लए तना अनेक
वशेषीकृत ऊतक से बनता है, जनम से प्रत्येक का आकार उसके काय के अनुरूप है — यही श्रम वभाजन है।
संकेत: स्थायी ऊतक दो प्रकार के होते ह — सरल (एक ही प्रकार क को शकाएँ: मृदूतक, ेषोतक, दृढ़ोतक) और
ज टल (एक से अ धक प्रकार क को शकाएँ मलकर काय करती ह: जाइलम, फ्लोएम)।
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बलकृत क्ष त, जल क हा न, हा नकारक सूक्ष्मजीव और चरम पयावरणीय प र स्थ तय से पादप क सुरक्षा
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कौन करता है?
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बाह्यत्वचा — चपट , आयताकार, संहत को शकाओं क वह एकल सबसे बाहरी परत जो पादप काया के सभी भाग को ढके रहती है
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— तथा उस पर बछ क्यू टन क मोमी उपत्वचा।
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बाह्यत्वचा उससे कैसे नपटती है
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को शकाएँ बना अवकाश के संहत ह और उपत्वचा एक दृढ़ बाहरी परत बनाती है
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जल की हािन क्यू टन मोमी और जल-अपारगम्य है; शुष्क पयावास म उपत्वचा और भी मोट बनती है
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सूक्ष्म जीव और परजीवी अवकाशर हत अखंड परत प्रवेश का माग नह दे ती; उपत्वचा आक्रमण रोकती है
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a g चरम पिरिस्थितयाँ बाह्यत्वचीय रोम वायु क एक स्थर परत रोककर तापन और शुष्कन कम करते ह
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बाह्यत्वचा केवल एक अवरोध नह — वह दो अ नवाय काय के लए रूपांत रत भी होती है —
जड़ म बाह्यत्वचीय को शकाएँ मूलरोम के रूप म m . c
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क्षेत्रफल बहुत बढ़ा दे ती ह।
पत्ती म बाह्यत्वचा म रंध्र होते ह, जनसे गैसीय व नमय होता है और वाष्पोत्सजन के रूप म जलवाष्प नकलती है।
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वाष्पोत्सजन केवल हा न नह है: पत्ती से जल के वाष्पन से जाइलम म वाष्पोत्सजन अ भकष उत्पन्न होता है,
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और यही अ भकष जल को ऊँचे वृक्ष के शीष तक उठाता है। वाष्पोत्सजन पादप शरीर से अप शष्ट पदाथ के
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नष्कासन म भी सहायक है।
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पादप सीधे कैसे रहते ह? एक नई टहनी क्य मुड़ जाती है, कतु एक सूखी टहनी क्य टू ट जाती है? बीज के
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आवरण कठोर क्य होते ह और जलीय पौधे कैसे तैरते ह?
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इन चार प्रश्न का उत्तर तीन सरल स्थायी ऊतक — मृदूतक, ेषोतक और दृढ़ोतक — तथा इस बात म है क इनम से कौन-सा
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कहाँ उप स्थत है।
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अवलोकन उत्तरदायी ऊतक संरचनात्मक कारण
पादप सीधा खड़ा दृढ़ोतक (कोमल शाक य पौध ल ग्नन भ त्त को दृढ़ बनाता है, अतः तना अपने ही भार से झुकता नह
रहता है म त मृदूतक भी)
नई टहनी मुड़ जाती है ेषोतक सजीव को शकाएँ जनके कोने पे क्टन से स्थू लत ह — पे क्टन रबर क तरह
लचीलापन दे ता है, अतः भ त्त झुककर पुनः सीधी हो जाती है
सूखी टहनी टू ट जाती दृढ़ोतक को शकाएँ मृत और ल ग्ननयुक्त ह; जल न रहने पर लचीलापन शून्य हो जाता
है है, अतः भ त्त झुकने के बजाय चटक जाती है
बीजों के आवरण दृढ़ोतक मृत, मोट ल ग्ननयुक्त भ त्त वाली को शकाओं क परत — वही ऊतक जो
कठोर होते है ं ना रयल के रेशे और अखरोट के छलके म है
जलीय पौधे तैर ते है ं वशेषीकृत मृदूतक वरल को शकाओं के बीच बड़ी वायु गु हकाएँ पादप का औसत घनत्व जल से
कम कर दे ती ह
झुकने और टू टने का अंतर क्य महत्त्वपूण है: आँधी म युवा तने को वरू पत होकर पुनः पूव स्थ त म आना है —
यह काय ेषोतक का है, जो दृढ़ कतु लचीला है। पुराने तने को वरू पत होना ही नह चा हए — यह काय दृढ़ोतक
का है, जो दृढ़ कतु भंगुर है। पादप दोन का उपयोग करता है, भन्न स्थान पर और भन्न आयु म।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 33
(iii) संवहन ऊतक — ज टल स्थायी ऊतक
प्र.1 ऊँचे वृक्ष क प त्तय म जल कस प्रकार पहुँचता है? प त्तय म तैयार भोजन पादप के अन्य भाग तक कस
प्रकार पहुँचता है?
जल जाइलम से ऊपर जाता है; भोजन प त्तय से फ्लोएम ारा बाहर जाता है। दोन ज टल स्थायी ऊतक ह, अथात एक से अ धक
प्रकार क को शकाओं से बने ह।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
जाइलम फ्लोएम
कोिशकाएँ वा ह नकाएँ, वा हकाएँ, जाइलम तंतु, जाइलम मृदूतक चालनी न लकाएँ, सहचर को शकाएँ, फ्लोएम मृदूतक,
फ्लोएम तंतु
सजीव या म ृत अ धकांशतः मृत और दृढ़ोतक य; जाइलम मृदूतक एकमात्र अ धकांशतः सजीव
सजीव घटक
क्या ले जाता जल और ख नज, जड़ → पादप के अन्य भाग भोजन, प त्तयाँ → पादप के अन्य भाग
है
अन्य काय पादप को दृढ़ता दे ता है फ्लोएम मृदूतक भोजन, राल, टै नन और रबड़क्षीर
संग्रहीत करता है
जल का ऊपर जाना। वा ह नकाएँ और वा हकाएँ न लकाकार तथा मोट भ त्त वाली ह और मृत होने के कारण भीतर से खोखली ह
— जड़ से पत्ती तक एक अखंड नली। पत्ती के रंध्र से जल वा ष्पत होता है (वाष्पोत्सजन); इससे जाइलम म जल के सतत स्तंभ पर
खचाव पड़ता है और पूरा स्तंभ ऊपर क ओर खच आता है। मोट ल ग्ननयुक्त भ त्त इस खचाव म नली को पचकने नह दे ती।
भोजन का बाहर जाना। चालनी न लका को शकाएँ लंबी और न लकाकार ह तथा छ द्रत भ त्तय ारा एक सरे से दूसरे सरे
तक जुड़ी ह, अतः एक क सामग्री अगली म बह जाती है। प्रत्येक चालनी न लका का नयमन एक सहचर को शका करती है — यह
वशेषीकृत मृदूतक को शका है जसका मुख्य काय चालनी न लकाओं म शकरा के भारण और अभारण का अनुवीक्षण करना है।
दृढ़ोतक य फ्लोएम तंतु इन कोमल न लकाओं को सहारा दे ते ह।
जाइलम मृत रह सकता है, फ्लोएम नह — क्य : जल ऊतक के बाहर उत्पन्न खचाव से चलता है, अतः जाइलम
को केवल एक खुली और दृढ़ नली होना है, उसम कसी सजीव तंत्र क आवश्यकता नह । भोजन को पत्ती म स क्रय
रूप से भरना और जड़ या फल म उतारना पड़ता है, और इसम ऊजा व्यय होती है। ऊजा केवल सजीव को शका ही
व्यय कर सकती है, इस लए फ्लोएम सजीव रहता है।
सो चए और बताइए — पृष्ठ 33
सरल स्थायी ऊतक
सो चए और बताइए
प्र.1 आपने दे खा होगा क ना रयल के रेशे के तंतु कठोर और भंगुर होते ह जब क ध नए के पणवृंत नरम और लचीले
होते ह। कारण जानने का प्रयास क जए।
दोन म ऊतक भन्न है — ना रयल का रेशा दृढ़ोतक है, जब क ध नए का पणवृंत ेषोतक (और मृदूतक) है।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
ना रयल के रेशे का तंतु ध नए का पणवृंत
ऊतक दृढ़ोतक ेषोतक + मृदूतक
िभि समान रूप से मोट , ल ग्नन का भारी नक्षेपण पतली, केवल कोन पर पे क्टन से स्थू लत
सजीव? प रपक्वता पर अ धकांशतः मृत सजीव, को शकाद्रव्य और रसधानी स हत
व्यवहार कठोर, सुदृढ़, भंगुर — खचाव सहता है कतु अ धक मोड़ने पर टू ट जाता नरम, लचीला — मुड़ता है और पुनः सीधा हो जाता
है है
रसायन ही स्पश तय करता है: ल ग्नन एक दृढ़, जल-अपारगम्य बहुलक है जो भ त्त के सेल्युलोस तंतुओं को
अपने स्थान पर जड़ दे ता है। एक बार नक्षे पत हो जाने पर भ त्त खच नह सकती, को शका मर जाती है और तंतु
कठोर तथा भंगुर हो जाता है। इसके वपरीत पे क्टन मृदु और जेल जैसा है — पुस्तक उसक तुलना रबर से करती है
— अतः ेषोतक क भ त्त वरू पत होकर पुनः पूवरूप म आ जाती है। ल ग्नन का नक्षेप क जए तो कॉयर क
चटाई मलेगी; पे क्टन का क जए तो हवा म झूमने वाला पणवृंत।
क्या आप जानते ह? इसी कारण कॉयर से रस्सी, चटाई और ग े बनाए जाते ह — वह मृत, ल ग्ननयुक्त, सड़न-
रोधी है और अपना आकार बनाए रखता है; जब क ध नए का डंठल तोड़ने के कुछ ही घंट म मुरझा जाता है, क्य क
उसका अवलंब सजीव, त को शकाओं पर नभर था।
सो चए और बताइए — पृष्ठ 34
बाह्यत्वचा, जाइलम और रंध्र
सो चए और बताइए
प्र.2 आपके वचार म मरुस्थल म रहने वाले पादप क बाह्यत्वचा क बाहरी भ त्त क मोट उपत्वचा (cuticle)
मरुस्थलीय पादप के लए लाभदायक एवं जलमग्न पादप के लए हा नकारक क्य है?
क्य क उपत्वचा जल और गैस — दोन क ग त रोकती है। मरुस्थलीय पादप को यह रोक चा हए, जब क जलमग्न पादप के लए
यही रोक घातक है।
मरुस्थल म। वहाँ जल ही सी मत कारक है। मोट मोमी उपत्वचा —
बाह्यत्वचा क सतह से वाष्पन घटा दे ती है, अतः वाष्पोत्सजन लगभग पूरी तरह रंध्र तक सी मत रह जाता है, जन्ह पादप बंद
कर सकता है;
कुछ सूय-प्रकाश पराव तत करके तापन कम करती है;
उड़ती बालू से होने वाले घषण और परजी वय से रक्षा करती है।
जल के भीतर। वहाँ जल क कमी है ही नह , अतः बचाने को कुछ नह — और उपत्वचा अब केवल हा न करती है —
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जलमग्न पादप जल, ख नज तथा घुली CO₂ और O₂ को अपनी पूरी सतह से सीधे अवशो षत करता है, क्य क जड़ से पत्ती
तक क धारा चलाने वाला वाष्पोत्सजन अ भकष वहाँ है ही नह । जल-अपारगम्य उपत्वचा इस पूरे अवशोषी क्षेत्र को बंद कर
दे ती।
गैस जल म वायु क तुलना म हजार गुना धीमे वस रत होती ह, अतः पादप पहले ही CO₂ और O₂ क कमी म है। एक और
वसरण-अवरोध उसे और भूखा कर दे ता।
ऐसा क्य होता है: कोई संरचना स्वयं म अ या बुरी नह होती — वह कसी वशेष पयावरण के लए अ
होती है। उपत्वचा पादप से सतही गैस- व नमय और जल- व नमय छ नकर बदले म जल-संरक्षण दे ती है। मरुस्थल म
यह सौदा लाभ का है; जल के भीतर पादप क मत चुकाता है और पाता कुछ नह । इसी लए जलमग्न प त्तय म
उपत्वचा अत्यंत पतली या अनुप स्थत होती है और प्रायः रंध्र भी नह होते।
प्र.3 पादप क जड़ ारा जल अवशो षत होने पर तो इसे जाइलम के माध्यम से गुरुत्वाकषण के वपरीत ग त करनी
होती है। जाइलम क ‘मृत’ को शकाएँ ऊपरी प त्तय क सजीव को शकाओं के साथ मलकर जल को ग तमान
रखने के लए कस प्रकार काय करती ह?
मृत को शकाएँ नली दे ती ह; पत्ती क सजीव को शकाएँ खचाव दे ती ह। इनम से एक भी न हो तो जल नह चढ़े गा।
रंधों से
प ी (सजीव कोिशकाएँ) जलवाष्प बाहर
= वाष्पोत्सजन
जाइलम — मृत,
खोखली, िलिग्ननयुक्त
निलकाएँ; न अनुपस्थ
जल का सतत िभि , न कोिशकाद व्य
स्तंभ ऊपर
िखंचता है
मूलरोम
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सजीव पत्ती ख चती है; मृत जाइलम वह नली है जो इस खचाव को जड़ तक पहुँचाती है।
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क्रम से —
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1. पत्ती म सजीव मध्योतक को शकाएँ रंध्र से जलवाष्प खोती ह — वाष्पोत्सजन।
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2. जल खोने पर ये को शकाएँ नकटतम जाइलम वा हका से जल ख चती ह।
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3. जल के अणु परस्पर चपके रहते ह (संसंजन), अतः जाइलम म जल का स्तंभ टू टता नह । ऊपर से ख चने पर पूरा स्तंभ खच
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आता है।
a s eचmरत होता है, जहाँ मूलरोम से जल भीतर आकर उसक पू त कर देता
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4. यही तनाव — वाष्पोत्सजन अ भकष — जड़ तक सं
है।
नली का मृत होना क्य आवश्यक है: प रपक्वता पर वा ह नकाएँ और वा हकाएँ अपना को शकाद्रव्य तथा सरे क भ त्तयाँ खो
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दे ती ह, अतः वा हका एक सतत खुली नली बन जाती है जसम प्रवाह रोकने वाला कुछ नह । उनक भ त्त मोट और ल ग्ननयुक्त
होना भी अ नवाय है — तनाव म जल का स्तंभ नली को भीतर क ओर पचकाना चाहता है, और इसे कe
s mदृढ़ ल ग्ननयुक्त भ त्त
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ही रोक सकती o
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agl मुख्य वचार: जल उठाने क ऊजा पादप से आती ही नह — वह सूय से आती है, जो पत्ती पर जल को वा ष्पत
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करता है। पादप केवल एक दृढ़, अखंड नली और शीष पर एक आद्र सतह उपलब्ध कराता है। इसी लए बना कसी
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पंप के जल द सय मीटर ऊँचे वृक्ष के शीष तक चढ़ जाता है।
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य द तने या प त्तय क बाह्यत्वचा म रंध्र न ह तो आपके वचार म क्या होगा?
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प्र.4
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a s emस्वयं को बंद कर लेता — गैसीय व नमय लगभग रुक जाता, वाष्पोत्सजन बंद हो जाता और उसके साथ वह अ भकष भी
gl समाप्त हो जाता जो जल और ख नज को प त्तय तक पहुँचाता है।
पादप
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प्रक्रम रंध्र न होने पर क्या बगड़े गा
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प रणाम
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पकाश-संश्ले षण
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मोमी उपत्वचा से CO₂ भीतर नह आ सकती भोजन- नमाण तीव्रता से घटे गा; पादप भूखा रहेगा
श्वसन
a
O₂ भीतर नह आ सकती, CO₂ बाहर नह जा सकती को शकाएँ कुशलतापूवक ऊजा मुक्त नह कर पाएँगी
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वाष्पोत्सजन जलवाष्प बाहर नह नकलेगी
m .
वाष्पोत्सजन अ भकष नह बनेगा — जाइलम का स्तंभ ऊपर
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नह खचेगा
.खिनज आपूित a g
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जड़ से पत्ती तक जल क धारा नह चलेगी उसम घुले ख नज प त्तय तक कभी नह पहुँचगे
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पत्ती क सतह से वाष्पीय शीतलन नह होगा धूप म प त्तयाँ अत्य धक गम ह गी और एंजाइम क्ष तग्रस्त
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ताप
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ह गे
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अपिशष्ट जो अप शष्ट वाष्पोत्स जत जल के साथ नकलते ह, वे पादप काया म अप शष्ट सं चत ह गे
िनष्कासन रुक जाएँगे
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जल खोने पर भी पादप रंध्र क्य रखता है: रंध्र एक नयं त्रत छद्र है। पादप को जो भी मलता है — CO₂ का
प्रवेश, शीतलन, वाष्पोत्सजन अ भकष — वह सब इसी छद्र के खुले होने पर नभर है, और खोया हुआ प्रत्येक ग्राम
जल उसक क मत है। पादप रंध्र को खोलकर-बंद करके इस संतुलन को साधता है, जो रंध्र न रखने से कह बेहतर
है। रंध्रहीन पादप उस घर क तरह है जसम न दरवाजा है न खड़क — न कुछ भीतर आता है, न बाहर जाता है,
और कुछ भी काय नह करता।
क्या आप जानते ह? कुछ मरुस्थलीय पादप इसके नकट पहुँच जाते ह — वे दनभर रंध्र बंद रखते ह और केवल
रात म खोलते ह, जब वायु ठं डी और आद्र होती है, ता क ग्रहण क गई CO₂ के बदले न्यूनतम जल खोना पड़े।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 34
3.3 जंतु ऊतक
प्र.1 अब सो चए कौन-सा ऊतक आपको क्रया करने म सहायता करता है? कौन-सा ऊतक आपको ऊष्णता और
शीतलता का बोध करने म सक्षम बनाता है? कौन-से ऊतक ारा ऑक्सीजन रक्त म प्र वष्ट होती है? कौन-से
ऊतक ारा शरीर एक साथ जुड़ा रहता है जस कारण त्वचा उससे अलग नह हो पाती?
चार अलग प्रश्न, चार अलग जंतु ऊतक — और हर बार उत्तर उस ऊतक क संरचना म ही छपा है।
क्रया ऊतक वह संरचना क्य उपयुक्त है
मु ी बंद कीिजए और पेशीय लंबे बेलनाकार पेशी तंतु समांतर पड़े ह और संकु चत हो सकते ह; कंकाल पेशी कंडरा ारा अ स्थ
खोिलए ऊतक से जुड़ी है, अतः उसका खचाव सं ध पर ग त बन जाता है
गम या ठं डी वस्तु को तंित्र का त्वचा के ग्राही संकेत न्यूरॉन को दे ते ह; द्रु मकाएँ उसे ग्रहण करती ह और लंबा तं त्रकाक्ष कुछ
स्पश कीिजए ऊतक मलीसेकंड म म स्तष्क तक पहुँचा दे ता है
गहरी श्वास लीिजए उपकला फेफड़े और रक्त वा हका का आस्तर पतली, चपट को शकाओं क एकल परत है, अतः O₂ के
ऊतक वसरण का माग न्यूनतम रह जाता है
त्वचा शरीर से जुड़ी संयोजी आधात्री म धँसी को शकाएँ त्वचा को नीचे के ऊतक से बाँधती ह; इसी प रवार के ऊतक पेशी को
रहती है ऊतक अ स्थ से (कंडरा) और अ स्थ को अ स्थ से (स्नायु) जोड़ते ह
आँख झपकाने म तो चार एक साथ काम करते ह — तं त्रका ऊतक संकेत दे ता है, पेशीय ऊतक पलक हलाता है, उपकला उसे
ढकती है और संयोजी ऊतक सब कुछ यथास्थान बाँधे रखता है।
जंतुओं को चार प्रकार क्य चा हए: जंतु शरीर को सतह ढकनी ह, भाग को जोड़ना है, ग त करनी है और समन्वय
करना है। कोई एक ऊतक-अ भकल्प ये चार नह कर सकता, इसी लए जंतु ऊतक ठ क इन्ह चार वग म आते ह
— उपकला, संयोजी, पेशीय और तं त्रका।
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क्रयाकलाप 3.2 — आइए, अ धक वस्तार से समझ — पृष्ठ 36
3.3.2 हमारे शरीर के व भन्न भाग कस प्रकार परस्पर जुड़े होते ह?
क्रयाकलाप
प्र.1 ता लका 3.3 के पहले स्तंभ म दए गए दै नक अनुभव का स्मरण क जए। अपने अवलोकन और प्रश्न अपनी
नोट-बुक म ल खए। अपने अवलोकन क ता लका 3.3 म दए गए अवलोकन से तुलना क जए।
ता लका 3.3 — आपके दै नक जीवन के अनुभव, अवलोकन और प्रश्न
अनुभव अवलोकन प्रश्न
जब आपकी त्वचा थोड़ ी- कटे हुए स्थान से लाल रक्त नकलता है। कुछ समय रक्त का थक्का (स्कंदन) बनने
सी कट गई हो। पश्चात थक्का बन जाता है। का क्या कारण है?
जब आपको त्वचा में वह क्षेत्र लाल हो जाता है और संभवतः सूजन भी हो
संक्रमण हुआ हो। जाती है। आपको ज्वर भी हो सकता है।
जब आप व्यायाम करते है ं आप तेजी से ास लेते ह और आपका चेहरा लाल भी
या दौड़ ते है।ं हो सकता है।
पूरी क गई ता लका 3.3 — पुस्तक ारा दए गए अवलोकन और वे प्रश्न जो प्रत्येक अवलोकन से उठने चा हए।
अनुभव अवलोकन उठने वाला प्रश्न
जब आपकी त्वचा थोड़ी- कटे हुए स्थान से लाल रक्त नकलता है। कुछ समय र क्त का थक्का (स्कं दन) बनने का क्या कारण है?
सी कट गई हो पश्चात थक्का बन जाता है।
जब आपको त्वचा में वह क्षेत्र लाल हो जाता है और संभवतः सूजन भी हो क्र
सं िमत क्षेत्र लाल और सूजा हुआ क्यों िदखता है —
संक्रमण हुआ हो जाती है। आपको ज्वर भी हो सकता है। वहाँ कौन-सी र क्त कोिशकाएँ एक त्र होती है?ं
जब आप व्यायाम करते आप तेजी से श्वास लेते ह और आपका चेहरा लाल भी व्यायाम के समय शरीर को अिधक ऑक्सीजन क्यों
है ं या दौड़ते है ं हो सकता है। चािहए और र क्त उसे तेजी से कै से पहच
ु ँ ाता है?
तीन अनुभव एक ही ऊतक क ओर संकेत करते ह — रक्त, एक संयोजी ऊतक जसम को शकाएँ प्लाज्मा नामक तरल आधात्री म
तैरती ह।
घटक रक्त म भाग काय
प्लाज्मा कु ल आयतन का 55 तरल आधात्री — को शकाओं, पोषक तत्व , हाम न और अप शष्ट का
पितशत वहन
िनिमत तत्व — RBC, WBC, कु ल आयतन का 45 ऑक्सीजन प रवहन, रक्षा, स्कंदन
िबंबाण ु पितशत
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लगभग 5 L रक्त वाले वयस्क के िलए —
प्लाज्मा का आयतन = 5 L का 55% = (55 ÷ 100) × 5 L = 2.75 L
िनिमत तत्वों का आयतन = 5 L का 45% = (45 ÷ 100) × 5 L = 2.25 L
रक्त संयोजी ऊतक क्य है: संयोजी ऊतक क पहचान उसक आधात्री से होती है — नज व आधार पदाथ म
बखरी को शकाएँ। अ स्थ म यह आधात्री कै ल्सयम और फॉ ोरस यौ गक के नक्षेपण के कारण कठोर और दृढ़
है; रक्त म वह जलीय और जेली जैसी है। अ भकल्प एक ही, संगतता बल्कुल भन्न — और इसी लए काय भी
बल्कुल भन्न।
प्र.2 रक्त का थक्का (स्कंदन) बनने का क्या कारण है?
बबाणु (platelets) — न मत तत्व म सबसे छोटे — चोट के स्थान पर एकत्र होकर वह थक्का बनाते ह जो घाव को बंद कर दे ता
है।
कटने पर क्रम से यह होता है —
1. रक्त वा हका क भ त्त फट जाती है और रक्त बाहर नकलता है।
2. बबाणु चोट के स्थान पर पहुँचकर फटे कनार से और परस्पर चपक जाते ह तथा एक अस्थायी अवरोध बना दे ते ह।
3. वे स्कंदन क रासाय नक अ भ क्रयाएँ आरंभ करते ह जनसे घाव पर तंतुओं का एक जाल बछ जाता है।
4. रक्त को शकाएँ इस जाल म फँस जाती ह; यह पड कठोर हो जाता है और रक्तस्राव रुक जाता है।
अन्य अवलोकन भी इसी तक पर चलते ह:
रक्त का लाल रंग — हीमोग्लो बन, जो लाल रक्त को शकाओं म पाया जाने वाला लौह-समृद्ध प्रोट न है। लाल
रक्त को शकाएँ लगभग 4 महीने जी वत रहती ह और नय मत रूप से प्र तस्था पत होती रहती ह।
संक्र मत भाग क ला लमा, सूजन और मवाद — श्वेत रक्त को शकाएँ संक्र मत क्षेत्र म एकत्र होकर
सूक्ष्मजीव से लड़ती ह, जससे शोथ और मवाद बनता है।
दौड़ते समय तीव्र ास और लाल चेहरा — माँसपे शय को अ धक ऑक्सीजन चा हए, अतः श्वास क ग त
बढ़ती है और रक्त प्रवाह भी; त्वचा के पास अ धक रक्त आने से चेहरा लाल दखता है।
क्या आप जानते ह? लगभग 4 महीने का अथ है लगभग 120 दन क सेवा, जसके बाद RBC वघ टत होकर नई
को शका से बदल द जाती है — इसी लए स्वस्थ वयस्क के लए रक्तदान सुर क्षत है।
क्रयाकलाप 3.3 — आइए, करके दे ख — पृष्ठ 37
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संयोजी ऊतक
क्रयाकलाप
प्र.1 ता लका 3.4 म द गई क्रयाएँ क जए। अपने अनुभव ल खए और उनक तुलना ता लका 3.4 म दए गए
अनुभव से क जए। संयोजी ऊतक के काय का अध्ययन क जए एवं उनक पहचान क जए ( चत्र 3.12)।
ता लका 3.4 — संयोजी ऊतक
क्रया अनुभव प्रकाय पहचाना गया
संयोजी ऊतक
धीरे से अपनी कोहनी का स्पश कीिजए। एक कठोर और दृढ़ संरचना
अपना कान दबाइए और मोिड़ ए अथवा अपनी एक नरम और लचीली संरचना जो
नाक को धीरे से दबाइए और रुिकए। पुनः आकार प्राप्त कर लेती है।
अपनी अगबाहु का स्पश कीिजए और अँगिु लयाँ अँगु लय के दूर होने पर भी अग्रबाहु
िहलाइए। म ग त का अनुभव होता है।
कु स पर बैठें और अपना पैर उतना ऊपर सं ध एक सीमा से आगे जाने क
उठाइए िजतना आपके घुटने के िलए संभव हो। अनुम त नह दे ती।
ला मा वेत र त कोिशका
श् क्
प्
(कु ल आयतन का
ज्
ज कु ाि थ (हंसली)
त्र स्
55 पितशत )
िबंबाणु कंडरा
िनिमत त व
त्
(कु ल आयतन का
45 पितशत ) उपाि थ स्
लाल र त कोिशका
क्
दीघ ि थस्
स् नायु
जानुफलक
(क ) रक्त के घटक (ख) अिस्थयों के उदाहरण (ग ) िकसी संिध पर ऊतकों का िवन्यास
चत्र 3.12, पृष्ठ 36 — पुस्तक के चत्र का पुनः बनाया गया रेखा चत्र: (क) रक्त के घटक, (ख) अ स्थय के उदाहरण,
(ग) कसी सं ध पर ऊतक का वन्यास।
पूरी क गई ता लका 3.4। प्रत्येक क्रया आपको अपनी ही त्वचा के नीचे एक संयोजी ऊतक का अनुभव कराती है।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक
a g l AglaSem · NCERT Solutions
क्रया अनुभव प्रकाय
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पहचाना गया
e mसंयोजी ऊतक
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. सुदृढ़ता, अवलंब और सुरक्षा देaती है
कीिजएas
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धीरे से अपनी कोहनी का स्पश एक कठोर और दृढ़ संरचना अिस्थ
agl
अपना कान दबाइए और मोिड़ए अथवा एक नरम और लचीली लचीलापन दे ती है और अ स्थय के सर उपािस्थ
co m बनाती है
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अपनी नाक को धीरे से दबाइए और संरचना जो पुनः आकार प्राप्त को आघात-अवशोषण के लए ग दार
रुिकए कर लेती है
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अपनी अग बाहु का स्पश कीिजए और agे दूर होने पर भी
अँगु लय क
अग्रबाहु म ग त का अनुभव
माँसपेशी को अ स्थ से जोड़ती है और
इस प्रकार ग त को संभव करती है
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अँग िु लयाँ िहलाइए
होता है
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om आपके घुटने के l as स्नायु
कु स पर बैिठए और अपना पैर उतना सं ध एक सीमा से आगे जाने अ स्थ को अ स्थ से जोड़ता है, स्थरता
ऊपर उठाइएcिजतना
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संm
क अनुम त नह दे ती दे ता है, ग त सी मत करता है और
िलए e
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भव हो वस्थापन रोकता है
प रणाम का अथ। कोहनी और कान के बीच जो अंतर आप अनुभव करते ह, वह वस्तुतः आधात्री का अंतर है —
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m .co agl
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अिस्थ की आधात्री — दृ ढ़, कै िल्सयम और फॉस्फोरस यौिगकों से युक्त → कठोर, सुदृ ढ़, सुरक्षात्मक
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उपािस्थ की आधात्री — मृद ु, जेली जै सी → लचीली, पुन ः आकार लेने वाली, आघात-अवशोषक
. c om
अँगुली हलाने पर अग्रबाहु म ग त क्य अनुभव होती है: अँगु लय को चलाने वाली पेem
m a s शयाँ हाथ म ह ही नह —
. co म स्थत ह और लंबी कंडराओं के माध्यम से, जो कलाई के ऊपर सेaगुgजlरती ह, अँगु लय क अ स्थय
m काय करती ह। कंडरा सुदृढ़, रस्सी जैसा संयोजी ऊतक है — अग्रबाहु क पेशी संकु चत होते ही वह बल अँगुली
वे अग्रबाहु
seपर
a तक पहुँचा दे ती है। भारी पेशी को अग्रबाहु म रखने से हाथ पतला और सूक्ष्म काय के योग्य बना रहता है।
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m .cसं ध के आर-पार अ स्थ को अ स्थ से जोड़ते ह। वे सुदृढ़ ह और a
se सामान्य प रसर दे कर वह थाम लेते ह — जससे अ स्थयाँ अपने स्थान से
घुटना एक सीमा पर क्य रुक जाता है: स्नायु
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बहुत कम खचते ह, अतः सं ध को उसका
हट नह पात ( वस्थापन नह होता)।
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संकेत: इसे ऐसे याद र खए — कंडरा = पेशी से अ स्थ, स्नायु = अ स्थ से अ स्थ। m.c
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ag पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 37
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3.3.3 क्या हम अपने शरीर म ग त को नयं त्रत कर सकते ह?
प्र.1 क्या शरीर म अनै क ग तयाँ भी होती ह?
हाँ, और बहुत सारी। आँत म भोजन क ग त और हृदय का स्पंदन बना कसी सचेत नयंत्रण के होते रहते ह।
कंकाल पेशी चकनी पेशी हृदय पेशी
िनयंत्र ण ऐ क अनै क अनै क
कोिशका का लंबी, बेलनाकार, अशा खत तकुरूप बेलनाकार और शा खत
आकार
कें द क अनेक (बहुकद्रक ) एक एक
धािरयाँ रे खत — स्पष्ट हल्क और गहरी प याँ अनुप स्थत हल्क धा रयाँ
कहाँ कंकाल से जुड़ी आमाशय, आँत तथा अन्य केवल हृदय म
अंग म
काय दौड़ना, लखना, वस्तुएँ उठाना — प्रबल और तीव्र, पाचन जैसी धीमी, सतत जीवनपयत अथक,
कतु शीघ्र थक जाती है ग तयाँ लयबद्ध स्पंदन
हृदय कभी थकता क्य नह : हृदय पेशी क को शकाएँ शा खत ह और सरे से सरे तक जुड़ी ह, अतः संकुचन क
तरंग पूरे हृदय म एक इकाई क भाँ त फैलती है। इनम माइटोकॉ या क संख्या बहुत अ धक होती है और रक्त क
आपू त प्रचुर, अतः ATP उतनी ही तेजी से बनता है जतनी तेजी से खच होता है और ऑक्सीजन-ऋण बनता ही
नह । इसके वपरीत कंकाल पेशी अपनी ऑक्सीजन आपू त से आगे नकल सकती है — इसी लए दौड़ने के बाद
टाँग म पीड़ा होती है, हृदय म नह ।
संकेत: पे शयाँ कभी स्वयं काय नह करत । ऐ क हो या अनै क, प्रत्येक पेशी तं त्रका ऊतक से अनुदेश लेती
है — व्यायाम के समय म स्तष्क ही हृदय को तेजी से धड़कने का संकेत दे ता है ता क शरीर क बढ़ हुई ऑक्सीजन
आवश्यकता पूरी हो सके।
क्रयाकलाप 3.4 — आइए, जाँच कर — पृष्ठ 39
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
3.4 पेशी-कंकाल तंत्र
क्रयाकलाप
प्र.1 हमारे शरीर के कुल भार का कतना प्र तशत अ स्थय और पे शय से बना है?
वयस्क शरीर के कुल भार का लगभग 12 – 15 प्र तशत अ स्थय से आता है; मांसपेशी वयस्क पुरुष म लगभग 40 – 50 प्र तशत
और वयस्क म हलाओं म लगभग 30 – 40 प्र तशत होती है। अथात आपके भार का आधे से भी अ धक भाग पेशी-कंकाल तंत्र का
है।
उदाहरण-गणना — 50 kg भार वाले वद्याथ के लए (चरण 1 म तुला पर लया गया अपना पा ांक प्रयोग क जए) —
िकसी भाग का भार = कु ल शरीर भार × (पितशत ÷ 100)
अिस्थ (12 – 15%): न्यून तम = 50 kg × 12/100 = 6.0 kg
अिधकतम = 50 kg × 15/100 = 7.5 kg
मांसपेशी, वयस्क पुरु ष (40 – 50%) = 50 kg × 40/100 से 50 kg × 50/100 = 20 kg से 25 kg
मांसपेशी, वयस्क मिहला (30 – 40%) = 50 kg × 30/100 से 50 kg × 40/100 = 15 kg से 20 kg
अिस्थ + मांसपेशी (पुरु ष आँक ड़ ों से) = 6.0 kg + 20 kg = 26 kg से 7.5 kg + 25 kg = 32.5 kg
कु ल भार का अंश = 26 ÷ 50 = 0.52 से 32.5 ÷ 50 = 0.65, अथ त कु ल भार का 52% – 65%
स्वयं जाँ चए: कक्षा का औसत नकालने के लए सभी वद्या थय के अनुमा नत अ स्थ-भार जोड़कर वद्या थय क
संख्या से भाग द जए —
कक्षा का औसत अ स्थ भार = (सभी वद्या थय के अ स्थ भार का योग, kg म) ÷ ( वद्या थय क संख्या)। मांसपेशी
के लए भी यही क जए।
उत्तर एक संख्या नह , एक प रसर क्य है: ये प्र तशत जनसंख्या के औसत ह। आपका अपना मान आयु, लग,
शारी रक संरचना और नृजातीयता पर नभर करता है, अतः ईमानदार उत्तर एक अंतराल है, एक आँकड़ा नह ।
इसी लए चरण 2 म कहा गया है क भारतीय शरीर के प्रकार के लए मान ात क जए, कह और का मान नह ।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 चचा क जए क अ स्थ और मांसपेशी द्रव्यमान व भन्न व्य क्तय म अलग-अलग क्य होते ह और वे शरीर के
कुल भार म कस प्रकार योगदान करते ह?
वे भन्न क्य होते ह। अ स्थ और मांसपेशी सजीव ऊतक ह जनका नमाण और वघटन नरंतर चलता रहता है, और यह संतुलन
व्य क्त पर नभर करता है —
आयु — अ स्थ द्रव्यमान बाल्यावस्था और कशोरावस्था म बढ़ता है, प्रारं भक वयस्कता म शखर पर होता है और बाद म धीरे-
धीरे घटता है।
लग — वयस्क पुरुष म औसतन अ धक मांसपेशी (40 – 50%) होती है, वयस्क म हलाओं म कम (30 – 40%)।
शारी रक स क्रयता — पे शयाँ और अ स्थयाँ भार के प्र त अनु क्रया करती ह। प्र त दन कब ी खेलने वाला या भार उठाने वाला
कसान दनभर बैठे रहने वाले व्य क्त क तुलना म सघन अ स्थ और बड़ी पेशी बनाता है।
पोषण — पेशी बनाने के लए प्रोट न तथा अ स्थ क आधात्री के लए कै ल्सयम, फॉ ोरस और वटा मन D आवश्यक ह।
अपयाप्त आहार दोन घटा दे ता है।
शारी रक आमाप और संघटन — लंबे और भारी ढाँचे म कंकाल भी बड़ा होता है; समान भार पर भी अ धक वसा वाले व्य क्त
म मांसपेशी का प्र तशत कम रहता है।
स्वास्थ्य — रोग, लंबी अचलता और हाम न संबंधी प रवतन दोन को घटाते ह।
कुल भार म योगदान। अ स्थ इस लए भारी है क उसक आधात्री कै ल्सयम और फॉ ोरस यौ गक से भरी है; मांसपेशी इस लए
भारी है क वह शरीर का सबसे बड़ा एकल ऊतक है। दोन जोड़ने पर —
अिस्थ (12 – 15%) + मांसपेशी (30 – 50%) = कु ल शरीर भार का लगभग 42% से 65%
शेष भाग वसा, त्वचा, रक्त, अंग और शरीर द व है।
ं
यह क्य महत्त्वपूण है: भार म प रवतन और स्वास्थ्य म प रवतन एक बात नह ह। समान भार वाले दो वद्या थय म
पेशी और अ स्थ क मात्रा बहुत भन्न हो सकती है। नय मत व्यायाम, सही मुद्रा, उ चत पोषण और योग पेशी तथा
अ स्थ का अंश बढ़ाते ह — जससे अ स्थयाँ सुदृढ़, सं धयाँ लचीली और शरीर दुनम्यता से सुर क्षत रहता है — भले
ही तुला का पा ांक लगभग वही रहे।
क्रयाकलाप 3.5 — आइए, अवलोकन कर — पृष्ठ 39
3.4.1 पेशी-कंकाल तंत्र क क्रयाशीलता
क्रयाकलाप
प्र.1 अपने शरीर के व भन्न भाग को हलाइए और अवलोकन क जए क वे कौन-कौन-सी ग त कर सकते ह।
पूरी क गई ता लका 3.5। पुस्तक कोहनी क पं क्त (नह , नह , हाँ) आदश के रूप म दे ती है; शेष पं क्तयाँ वहाँ उप स्थत सं ध के
प्रकार से नकलती ह।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
शरीर का पूरा आं शक झुकाव/ अन्य ग त सं ध
भाग घुमाव घुमाव मुड़ना
कोहनी नह नह हाँ केवल एक तल म मुड़ना और सीधा कोर
होना
कं धा हाँ हाँ हाँ अग्र, पश्च, पाश्व और गोलाकार ग त कंदुक-ख ल्लका
घुटना नह नह हाँ केवल मुड़ना और सीधा होना; कोर
जानुफलक सं ध क रक्षा करता है
गदन नह हाँ हाँ दाएँ-बाएँ घूमना (‘नह ’ क मुद्रा), धुराग्र
ऊपर-नीचे हलाना
अँग िु लयाँ नह नह हाँ प्रत्येक पोर पर मुड़ना; अँगूठे का आधार कोर
घूम भी सकता है
पैर की नह नह हाँ ऊपर-नीचे मुड़ना (यही ग त एड़ी के कोर
अँग िु लयाँ ऊपर कंडरा म अनुभव होती है)
कलाई नह हाँ हाँ ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ और थोड़ी अनेक छोट अ स्थय के
गोलाकार ग त बीच सप सं ध
सब भाग के उत्तर समान क्य नह ह: कोई भाग कौन-सी ग त कर सकता है, यह सं ध पर अ स्थय के सर के
आकार से तय होता है। उथले ग े म बैठा गोलाकार शीष (कंधा) हर दशा म घूम सकता है। वक्र खाँचे म टका बेलन
(कोहनी, घुटना) केवल एक तल म — दरवाजे के कब्जे क तरह। छल्ले म घूमती खूँट (गदन) केवल घूम सकती है।
कनारे से कनारे जुड़ी अ स्थयाँ (खोपड़ी) हल ही नह सकत । यहाँ भी संरचना ही प्रकाय तय करती है, ठ क वैसे ही
जैसे कसी ऊतक म।
संकेत: सं ध स्वयं कुछ हला नह सकती। पे शयाँ कंडराओं ारा अ स्थय को ख चती ह; सं ध केवल यह तय करती
है क वह खचाव अ स्थ को कस दशा म ले जाने दया जाएगा।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 39
3.4.1 पेशी-कंकाल तंत्र क क्रयाशीलता
प्र.1 आपने अवश्य दे खा होगा क हमारे शरीर के कुछ भाग सरलता से कई दशाओं म ग त कर सकते ह जब क अन्य
केवल एक दशा म ही ग त करते ह। ऐसा क्य होता है?
क्य क भन्न स्थान पर सं ध का प्रकार भन्न है, और सं ध दो या अ धक अ स्थय के बीच का वह जोड़ है जो एक वशेष प्रकार से
आका रत होता है।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक
a g l AglaSem · NCERT Solutions
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सं ध अ स्थयाँ कैसे बैठती ह संभव ग त उदाहरण
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कं दुक -
.cबैoठता है
एक अ स्थ का गोलाकार शीष दूसरी के उथले ग े म
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अग्र, पश्च, पाश्व और गोलाकार
l ं धा, कूल्हा
खिल्लका
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aकोर अ स्थय के सरे ऐसे आका रत क वे केवल एक तल एक ही दशा म मुड़ना और कोहनी, घुटना (जानुफलक
म झूल, दरवाजे के कब्जे क तरह सीधा होना से सुर क्षत)
co m घूणन — दाएँ-बाएँ, दरवाजे
ध रु ाग
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एक अ स्थ दूसरी ारा बने छल्ले के भीतर घूमती है मेरुदं ड पर खोपड़ी (गदन) ag
g l as के हडल क तरह
अचल
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चपट अ स्थयाँ कनारे से कनारे जुड़ी कोई नह खोपड़ी क अ स्थयाँ
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शरीर हर जगह कंदुक-ख ल्लका सं ध क्य नह रखता: ग त क स्वतंत्रता स्थरता क क e
s mपर मलती है। कंधा
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ने lको पूरे शरीर का भार उठाना
मत
हर दशा.cमoघूम सकता है और वही सं ध सबसे सरलता से वस्था पत भी होती है। घुटg
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gl a अतः वह एक ही तल म ग त करने और शेष हर दशा को अस्वीकार करने के लए बना है — स्नायु यही सु न श्चत
a करते ह। और जहाँ कोई ग त होनी ही नह चा हए, जैसे म स्तष्क के चार ओर, वहाँ सं धयाँ अचल ह, ता क दौड़ते-
s
कूदते समय भी खोपड़ी एक दृढ़ सुरक्षा-कवच बनी रहे।
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l a se
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अतः अ स्थय क ग त वस्तुतः कस कारण होती है?
प्र.2
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पे शय के कारण — वे संकु चत होकर कंडराओं ारा अ स्थय को ख चती ह। सं धयाँ ग त क अनुम त भर दे ती ह, उसे उत्पन्न नह
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gl घटनाओं का क्रम —
सकत ।
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coहैm l a
1. तं त्रका तंत्र पेशी को आवेग भेजता है। (पेशी-कंकाल तंत्र तं त्रका तंत्र के नयंत्रण म काय करता है।)
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se प अथात कंडरा उस खचाव को अ स्थ तक पहुँचाती है।
2. पेशी संकु चत होती है — छोट और मोट हो जाती ।
l a
धgही उस घूणन क दशा और सीमा तय करती है।
3. पेशी को अ स्थ से जोड़ने वाली सुदृढ़, लचीली
4. अ स्थ सं ध पर घूमती है, और संa
m
5. अ स्थ को अ स्थ से जोड़ने वाले स्नायु ग त को सुर क्षत सीमा से आगे नह जाने दे ते; अ स्थय के सर क उपा स्थ संपक को
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ग दार बनाती है।
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g उत्पन्न करती है। अतः कसी सं ध
.cपेशी केवल ख च सकती है, धकेल नह — क्य : पेशी बल केवल छोट aहोकर
se m को एक ओर मोड़कर वापस सीधा करने के लए शरीर को अ स्थ के दोन ओर पे शयाँ चा हए, जो बारी-बारी से खच
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— एक संकु चत हो तो दूसरी श थल। इसी लए पे शयाँ प्रायः सं ध के आर-पार युग्म म व्यव स्थत होती ह।
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सो चए और बताइए — पृष्ठ g40
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3.5 सं धय के प्रकार
सो चए और बताइए
प्र.5 नीचे दया गया चत्र ( चत्र 3.17) दे खए। भारत के शास्त्रीय और लोक नृत्य क व भन्न मुद्राओं का ध्यानपूवक
अवलोकन क जए। क्या आप पहचान सकते ह क इन मुद्राओं म कौन-सी सं धयाँ स म्म लत ह? साथ ही प्रत्येक
सं ध से कस प्रकार क ग त संभव होती है?
1 2 3 4 5 6 7 8 9
चत्र 3.17, पृष्ठ 40 — पुस्तक म द गई नौ नृत्य मुद्राओं का पुनः बनाया गया रेखा चत्र; मूल चत्र शास्त्रीय और लोक
नतक का रंगीन चत्रांकन है।
चत्र 3.17 म शरीर क लगभग हर सं ध कह -न-कह दखाई दे ती है। प्रत्येक नतक क्या कर रहा है, यह दे खए और सं ध को उसक
ग त से पहचा नए, मुद्रा के नाम से नह ।
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मुद्राओं म जो दखता है स म्म लत सं ध प्रकार संभव ग त
भुजाएँ िसर के ऊपर उठी हुई, बगल में कंधा कं दुक - पूरी भुजा क अग्र, पश्च, पाश्व और गोलाकार
फै ली हईु , गोलाकार घूम ती हईु खिल्लका गत
एक टाँग बगल में उठी और बाहर फै ली कूल्हा कं दुक - जंघा क सभी दशाओं म मुक्त ग त
हईु (पहली और दू स री मुद ा में) खिल्लका
कं धे के पास मुद ा बनाने के िलए तीवता से कोहनी कोर अग्रबाहु का एक ही तल म मुड़ना और सीधा
मुड़ी कोहनी होना
गहरी अरै म ंडी मुद ा, मुड़े घुटने पर शरीर घुटना कोर टाँग का मुड़ना और सीधा होना; जानुफलक
का भार सं ध क रक्षा करता है
पंजों के बल खड़े होना, अँग िु लयाँ नीचे की टखना और पैर क कोर पैर क ऊपर-नीचे ग त; एड़ी क कंडरा वह
ओर, एड़ी का थाप दे ना अँगु लय क सं धयाँ खचाव पहुँचाती है
िसर का दाएँ-बाएँ घूम ना, शास्त्रीय ग ीवा- मेरुदं ड पर खोपड़ी ध रु ाग सर का घूणन, दरवाजे के हडल क तरह
भेद
अँग िु लयों की सूक्ष्म हस्त-मुद ाएँ अँगु लय क सं धयाँ कोर प्रत्येक पोर का मुड़ना; पे शयाँ अग्रबाहु म ह
और लंबी कंडराओं से ख चती ह
पत्येक छलाँग में भी खोपड़ी अपना आकार खोपड़ी क अ स्थयाँ अचल कोई ग त नह — म स्तष्क, आँख और कान
बनाए रखती है सुर क्षत रहते ह
शास्त्रीय नृत्य इतना अ ा उदाहरण क्य है: नृत्य क मुद्रा सं ध को उसके प रसर क चरम सीमा पर रोकती है,
अतः सं ध के आकार से लगी सीमा स्पष्ट दखाई दे ने लगती है। भुजा सीधी सर के ऊपर उठ सकती है — कंदुक-
ख ल्लका सं ध इसक अनुम त दे ती है। घुटना कतनी भी मुद्रा म पीछे क ओर नह मुड़ सकता — कोर सं ध इसका
नषेध करती है। और यह सब तभी संभव है जब पे शयाँ कंडराओं ारा अ स्थय को ख च और स्नायु अ स्थय को
उनके स्थान पर बाँधे रख।
यह क जए: इनम से कसी एक मुद्रा म खड़े होकर, बना हले, उन सं धय क सूची बनाइए जन्ह आपने मोड़ रखा
है। फर वही मुद्रा घुटने बल्कुल सीधे रखकर बनाने का प्रयास क जए — आप संतुलन नह बना पाएँगे, क्य क
टखने और घुटने के छोटे -छोटे समायोजन ही आपको सीधा खड़ा रखते ह।
वै ा नक क भाँ त सो चए — पृष्ठ 42
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एक को शका से पूण जीव तक — पूणशक्तता
वै ा नक क भाँ त सो चए
प्र.(क) गाजर क फ्लोएम को शकाओं क वशेषताओं के संबंध म आप क्या नष्कष नकालते ह?
यह क गाजर क प रपक्व फ्लोएम को शका पूणशक्त (totipotent) है — यद्य प वह भोजन का संवहन करने वाली को शका के
रूप म वभे दत हो चुक है, फर भी उसम पूरा पादप बनाने का समग्र नदश-समूह सुर क्षत है और उसे पुनः प्रयोग म लाया जा
सकता है।
स्ट वड का 1958 का प्रयोग यह तीन चरण म दखाता है —
पिरपक्व फ्लोएम कोिशका → िनिवभे द न (िवभाजन की क्षमता पुन ः पाप्त)
→ िवभािजत होकर अिवशेषीकृ त कोिशकाओं का अिवभे िदत िपंड
→ प ुनःिवभे द न से जड़ , परोह और अंत तः पूण गाजर का पादप
अतः वशेषताएँ ये ह — को शका सजीव है (मृत जाइलम को शका यह कभी नह कर सकती), उसम पूण कद्रक और समग्र
आनुवं शक सूचना सुर क्षत है, और उसक वभे दत अवस्था उपयुक्त पोषक तत्व , हाम न तथा प र स्थ तय म उत्क्रमणीय है।
यह इतना आश्चयजनक क्य था: तब तक वभेदन को एकतरफा माग माना जाता था — एक बार को शका
फ्लोएम को शका बन गई तो कहानी वह समाप्त। स्ट वड ने दखाया क पादप म यह माग दोन ओर चलता है।
गाजर क एक को शका वही कर सकती है जो युग्मनज करता है — वभा जत और वभे दत होकर एक पूण जीव
बन जाना।
प्र.(ख) तीन म से कन संयोजन म आपको सबसे अ धक और सबसे कम जैव मात्रा (biomass) प्राप्त होगी? इस
अवलोकन के संभा वत कारण क्या हो सकते ह?
सबसे अ धक जैव मात्रा: संयोजन 2 — प्रकाश उप स्थत, वायु उप स्थत, तरल माध्यम + पोषक तत्व (20% वृ द्ध)।
सबसे कम जैव मात्रा: संयोजन 1 और 3, जनम ताजा भार आरं भक भार से भी कम हो गया।
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# प्रकाश वायु माध्यम ताजा भार म कसक कमी थी
प रवतन
1 ✓ ✗ ठोस + पोषक कम हुआ वायु नह — श्वसन के लए ऑक्सीजन नह ; ठोस माध्यम पोषक
तत्व तत्व से संपक भी सी मत करता है
2 ✓ ✓ तरल + पोषक 20% वृि हुई कसी क नह — तीन कारक उप स्थत
तत्व
3 ✗ ✓ तरल + पोषक कम हआ
ु प्रकाश नह
तत्व
ध्यान द जए: हद संस्करण क ता लका 3.6 क तीसरी पं क्त म प्रकाश और वायु दोन पर ✓ छपा है, जब क
अंग्रेज़ी संस्करण (Exploration, पृष्ठ 42) म वहाँ प्रकाश पर ✗ और वायु पर ✓ है। तक भी यही कहता है — य द
पं क्त 2 और पं क्त 3 क प र स्थ तयाँ बल्कुल समान होत तो प रणाम भन्न नह हो सकते थे। अतः तीसरी पं क्त
प्रकाश अनुप स्थत, वायु उप स्थत ही मानी जानी चा हए।
अब वृ द्ध को संख्या म र खए। संवधन 2-mg के टु कड़ से आरंभ कया गया था ( चत्र 3.19) —
ताजा भार में वृि = आरंिभक भार × (पितशत वृि ÷ 100)
= 2 mg × (20 ÷ 100) = 0.4 mg
अंितम ताजा भार = 2 mg + 0.4 mg = 2.4 mg
संयोजन 1 और 3 में पिरवतन ऋणात्मक है, अतः अंितम भार 2 mg से कम रहा।
कारण। केवल संयोजन 2 म को शकाओं को सब कुछ एक साथ मला —
वायु ऑक्सीजन दे ती है, जो ऑक्सी-श्वसन के लए आवश्यक है। वायु के बना (संयोजन 1) को शकाएँ वभाजन के लए
पयाप्त ऊजा मुक्त नह कर पात और अपना ही सं चत भोजन खच करती ह — अतः ताजा भार घट जाता है।
प्रकाश प्रकाश-सं ेषण के लए तथा वृ द्ध और ह रतीकरण के संकेत के रूप म आवश्यक है। प्रकाश के बना (संयोजन 3)
को शकाएँ श्वसन तो करती रहती ह कतु बनाती कुछ नह , अतः सं चत पदाथ पुनः समाप्त हो जाता है।
तरल माध्यम प्रत्येक को शका को चार ओर से पोषक तत्व से घेर दे ता है और उसे हलाया भी जा सकता है — इसी हलाने से
एकल को शकाएँ अलग होकर नलंबन म आती ह। ठोस माध्यम ऊतक के केवल एक तल को स्पश करता है।
भार केवल रुकता क्य नह , घटता क्य है: सजीव को शका को श्वसन तो करना ही है, चाहे वह बढ़ रही हो या
नह । य द वह भोजन न ले सके और न बना सके, तो वह अपने ही सं चत पदाथ का ऑक्सीकरण करती है और
संवधन का ताजा भार आरं भक भार से भी नीचे चला जाता है।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक
a g l AglaSem · NCERT Solutions
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क्या गाजर क को शकाओं के स्थान पर जंतु को शकाओं को संव धत करने पर समान प रणाम प्राप्त ह गे?
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प्र.(ग)
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a l तु को शकाओं का संवधन कया जा सकता है, कतु कोई वभे दत जंतु को शका उस प्रकार पूण जंतु नह बनाती जस
। जं
प्रकार गाजर क फ्लोएम को शका पूण पादप बना दे ती है।
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गाजर (पादप) को शकाएँ जंतु को शकाएँ
बनी रहती है — नg l a
पिरपक्व कोिशका की
सकती है
a वभे दत और पुनः वभे दत हो वभेदन के बाद लगभग सभी काय को शकाओं म
समाप्त हो जाती है
पूणशक्तता
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संवधन में क्या बनता है को शकाओं का अ वभे दत पड, जो आगे जड़, प्रायः एक ही प्रकार क को शकाओं क चादर —
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प्ररोह और पूण पादप बनाता है ऊतक, जीव नह
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कोिशका िभि उप स्थत; पड को बँधा और आका रत रखने म अनुप स्थत; को शकाएँ आसंजन और पड़ोसी
a g सहायक को शकाओं के संकेत पर नभर
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अनेक पकार बना सकने लगभग कोई भी सजीव मृदूतक या फ्लोएम केवल वशेष मूल (stem) को शकाएँ, जैसे
वाली कोिशकाएँ को शका
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यह अंतर क्य है: जंतु क शरीर-योजना प रवधन के आरंभ म ही नधा रत हो जाती है और उसक को शकाएँ
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स्थायी रूप से एक ही नय त चुन लेती ह; वे अपनी सट क स्थ त, रक्त आपू त और आस-पास के ऊतक से मलने
. co
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वाले संकेत पर भी नभर ह, जन्ह संवधन-पात्र म दोहराया नह जा सकता। पादप एक स्थान पर स्थर है, अतः उसे
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om बनाए रखता है। l
अपना कोई भी खोया भाग पुनः बनाने म सक्षम रहना है — इसी लए वह यह लचीलापन साधारण काय को शकाओं
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म भी
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क्या आप जानते ह? जंतुओं क मूल को शकाएँ इसका अपवाद ह। अ स्थ म ा क मूल को शकाएँ आज भी
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वभा जत होकर नई रक्त को शकाएँ बना सकती ह, इसी लए उन्ह स्वस्थ व्य क्त से लेकर ल्यूके मया या थैलेसी मया
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के रो गय म प्रत्यारो पत कया जाता है।
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उपयुक्त अध्ययन के कन्ह दो व्यावसा यक अनुप्रयोग के वषय म सो चए और बताइए।
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प्र.(घ)
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दो स्पष्ट अनुप्रयोग —
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1. सूक्ष्मप्रवधन — समरूप, रोगमुक्त पौध का बड़े पैमाने पर उत्पादन। कसी एक उत्तम पादप के कुछ ग्राम ऊतक से छोट -
s e m
om a
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सी प्रयोगशाला म हजार पादपक उगाए जा सकते ह, वष के कसी भी समय, और वे सभी जनक पादप के आनुवं शक रूप से
s e mकड क रोपण सामग्री व्यावसा यक रूप से इसी व ध से बनाई जाती है।
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समरूप होते ह। केला, गन्ना, आलू और ऑ
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
2. पादप रसायन का औद्यो गक उत्पादन। संव धत को शकाओं को बड़े पात्र म उगाकर मूल्यवान पादप रसायन
(phytochemical) — औष धयाँ, वणक, सुगंध — बनाए जा सकते ह, बना पूरे पादप उगाए और नष्ट कए, और बना ऋतु
पर नभर हुए।
दो और जानने योग्य —
आनुवं शक अ भयां त्रक ारा फसल सुधार। वै ा नक ने अध्ययन कया क करीट प टका रोग उत्पन्न करने वाला जीवाणु
एग्रोबैक्ट रयम ू मफे शयंस अपनी आनुवं शक सामग्री पादप को शकाओं म कस प्रकार स्थानांत रत करता है। इसी ान और
ऊतक संवधन के मेल से आज फसल म वां छत जीन प्र वष्ट कराकर उन्नत और रोग-प्र तरोधी कस्म बनाई जाती ह।
परागकोष संवधन से अगु णत पादप — सप्रा गुहा मुखज और एस.सी. माहेश्वरी क काय- दशा, जो नई कस्म के प्रजनन
को तेज कर दे ती है।
इन सबक कुंजी पूणशक्तता ही क्य है: इनम से प्रत्येक अनुप्रयोग एक ही तथ्य पर टका है — क प रपक्व
पादप को शका को पुनः पूण पादप बनने के लए प्रे रत कया जा सकता है। इसके बना संव धत को शका से केवल
उसी प्रकार क और को शकाएँ ही मलत ।
अभ्यास प्रश्न — पृष्ठ 44
अध्याय के अंत के प्रश्न
अभ्यास प्रश्न
प्र.1 वभज्योतक ऊतक बार-बार वभा जत होते ह। इनक को शकाओं क कौन-सी वशेषताएँ इनके लए ऐसा
करना संभव बनाती ह? (i) इनम सुरक्षा के लए मोट भ त्तयाँ होती ह। (ii) इनम पोषक तत्व को संग्र हत करने
वाली बड़ी रसधा नयाँ होती ह। (iii) इनम पतली भ त्तयाँ, सघन को शकाद्रव्य और बड़ा और स्पष्ट कद्रक होता है।
(iv) वे कायात्मक रूप से वभे दत को शकाएँ ह।
(iii) इनम पतली भ त्तयाँ, सघन को शकाद्रव्य और बड़ा और स्पष्ट कद्रक होता है।
यही समुच्चय सही क्य है: इसक प्रत्येक वशेषता सीधे वभाजन के काम आती है —
पतली भ त्त — भ त्त खच सकती है और पुत्री को शकाओं के बीच नई भ त्त शीघ्र बन सकती है। मोट
ल ग्ननयुक्त भ त्त म यह असंभव होता।
अनेक को शकांग से युक्त सघन को शकाद्रव्य — प्रोट न बनाने के लए राइबोसोम, ऊजा के लए
माइटोकॉ या, नई झल्ली और भ त्त-सामग्री के लए ER और गॉल्जीकाय।
बड़ा और सुस्पष्ट कद्रक — प्रत्येक वभाजन से पूव DNA क प्र तकृ त बनानी होती है, और छोट को शका म
बड़ा कद्रक उसे कुशलता से नयं त्रत कर पाता है।
इनके साथ जो ड़ए — रसधा नयाँ अनुप स्थत और को शकाएँ कम या बना अंतःको शक य अवकाश के
संहत।
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शेष वकल्प क्य गलत ह: (i) मोट भ त्त दृढ़ोतक क है, जो मृत है और वभा जत नह हो सकता। (ii) बड़ी रसधानी प रपक्व
मृदूतक का लक्षण है; वह को शकाद्रव्य को कनारे धकेल दे ती। (iv) जो को शका वभे दत हो चुक है, वह वभाजन क क्षमता खो
चुक है — वभेदन का अथ ही यही है।
प्र.2 य द कोई पादप प त्तय से जड़ तक भोजन प रवहन करने म असमथ है तो ऐसा कस ऊतक क असामान्य
प्रणाली के कारण होता है? (i) जाइलम (ii) फ्लोएम (iii) बाह्यत्वचा (iv) दृढ़ोतक
(ii) फ्लोएम।
भोजन प त्तय म बनता है और उसे नीचे जड़ तक जाना होता है, जो स्वयं प्रकाश-सं ेषण नह कर सकत । यह काय फ्लोएम क
चालनी न लकाओं का है, जनम शकरा का भारण और अभारण सहचर को शकाएँ कराती ह।
शेष क्य नह : जाइलम जल और ख नज को जड़ से ऊपर ले जाता है, भोजन को नीचे नह । बाह्यत्वचा एक
सुरक्षात्मक आवरण है। दृढ़ोतक मृत, मोट भ त्त वाला सहायक ऊतक है और कसी वस्तु का संवहन नह करता।
संकेत: दशा याद र खए — जाइलम: जड़ → पत्ती, जल। फ्लोएम: पत्ती → सवत्र, भोजन। इसी समुच्चय का
प्रश्न 8 (छाल उखड़ा वृक्ष) यही वचार बाहर से दखाता है।
प्र.3 जंतुओं के आंत रक अंग को आस्त रत करने वाले उपकला ऊतक प्रायः केवल एक या कुछ को शकाओं क
मोटाई के क्य होते ह? (i) भोजन को प्रभावी रूप से संग्रहीत करने के लए (ii) अ धकतम दृढ़ता प्रदान करने के
लए (iii) उनसे होकर पदाथ के त्व रत आदान-प्रदान के लए (iv) घषण कम करने के लए
(iii) उनसे होकर पदाथ के त्व रत आदान-प्रदान के लए।
पतला होना इतना महत्त्वपूण क्य है: पदाथ उपकला को वसरण ारा पार करते ह, और दूरी बढ़ने पर वसरण
क दर घटती है। पतली, चपट को शकाओं क एकल परत सबसे छोटा माग दे ती है, अतः फेफड़ क वायु से
ऑक्सीजन लगभग तत्काल रक्त तक पहुँच जाती है और पचा हुआ भोजन आँत के आस्तर को शीघ्र पार कर जाता
है। ता लका 3.2 यही संबंध स्पष्ट करती है — रक्त वा हकाओं और फेफड़ क व नमय उपकला पतली, चपट
को शकाओं क एकल परत है।
शेष क्य गलत ह: भोजन का संग्रह उपकला का काय नह है। जहाँ दृढ़ता चा हए वहाँ उपकला पतली होती ही नह — त्वचा, मुँह
और ग्रासनली म को शकाओं क अनेक परत होती ह (ता लका 3.2), और ठ क इसी लए वहाँ व नमय नह हो सकता। घषण कम
करने का काय ेष्म जैसे स्राव से होता है, पतले होने से नह ।
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प्र.4 आप चत्र म दखाए गए अनुसार दो प्रकार से कूद सकते ह ( चत्र 3.21) — टाँग सीधी रखकर कूदना — घुटन
और टखन को सीधा र खए। सामान्य रूप से कूदना — घुटन और टखन को स्वाभा वक रूप से मो ड़ए। दोन
बार कूदने म आपके टखने, घुटने और कूल्हे क स्थ त कस प्रकार भन्न थ ?
(क) (ख)
चत्र 3.21, पृष्ठ 44 — पुस्तक म दशाई गई दोन प्रारं भक स्थ तय का पुनः बनाया गया रेखा चत्र।
सामान्य कूद म तीन सं धयाँ उछलने से पहले गहराई तक मुड़ती ह और उतरते समय फर मुड़ती ह; टाँग सीधी रखकर कूदने म वे
लगभग जकड़ी रहती ह, आप बहुत कम ऊँचा कूदते ह और उतरते समय झटका लगता है।
सं ध टाँग सीधी रखकर कूदना सामान्य रूप से कूदना
टखना जकड़ा हुआ; लगभग कोई मोड़ नह , केवल मुड़ता है और फर बलपूवक सीधा होकर पैर को भू म पर दबाता है
अँगु लय का हल्का धक्का
घुटना सीधा जकड़ा हुआ; कोर सं ध का उपयोग होता ही गहराई तक मुड़कर बैठक क स्थ त बनाता है, फर तेजी से सीधा होकर
नह शरीर को ऊपर उछालता है
कू ा सीधा रहता है, धड़ लगभग ऊध्वाधर शरीर नीचे जाते समय आगे झुकता है और ऊपर उठते समय फैल जाता
है
पिरणाम कम ऊँचाई, कठोर ल डग, टाँग और मेरुदं ड म अ धक ऊँचाई, कोमल और नयं त्रत ल डग
झटका
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मोड़ने से इतना अंतर क्य पड़ता है: पेशी बल केवल छोट होते समय उत्पन्न करती है। पहले बैठक बनाने से जंघा
और पडली क पे शयाँ खच जाती ह, अतः प्रत्येक को ख चने के लए अ धक दूरी मलती है और वह शरीर पर
अ धक काय कर पाती है। कूल्हा, फर घुटना, फर टखना — तीन सं धयाँ क्रम से काय करके अपने धक्के जोड़ दे ती
ह। उतरते समय यही सं धयाँ मुड़कर आघात को अ धक समय म फैला दे ती ह, और अ स्थय के सर क उपा स्थ
आघात सोख लेती है। सं धयाँ जकड़ी ह तो पूरा आघात क्षण भर म अ स्थय से होता हुआ सीधे मेरुदं ड तक पहुँच
जाता है — इसी लए ल डग कष्टप्रद लगती है।
स्वयं जाँ चए: इसी लए खलाड़ी को घुटने मोड़कर कोमलता से उतरना सखाया जाता है, और यही बैठक कब ी,
खो-खो तथा शास्त्रीय नृत्य क अरैमंडी मुद्रा म भी दखाई दे ती है।
प्र.5 जब आप अपने घुटने और टखने मोड़ते ह तो कस प्रकार क सं ध का उपयोग होता है? (i) कंदुक ख ल्लका (ii)
कोर (iii) धुराग्र
(ii) कोर।
घुटना और टखना दोन केवल एक ही दशा म मुड़ते और सीधे होते ह, ठ क वैसे जैसे दरवाजा अपने कब्जे पर। घुटने पर
जानुफलक नामक एक छोट अ स्थ सं ध के आगे रहकर उसक रक्षा करती है।
कोर सं ध ही क्य , कंदुक-ख ल्लका क्य नह : घुटने और टखने को पूरे शरीर का भार उठाना पड़ता है और प्रत्येक
ल डग पर बड़ा बल उनसे होकर ऊपर जाता है। कोर सं ध केवल एक तल म ग त दे ती है और शेष सभी दशाओं को
अस्वीकार कर दे ती है — भार के नीचे टाँग को स्थर रखने के लए यही आवश्यक है। कंदुक-ख ल्लका सं ध, जैसे
कंधा, ग त क स्वतंत्रता स्थरता क क मत पर दे ती है — भुजा के लए उपयोगी, टाँग के लए संकटपूण।
(iii) धुराग्र गलत है — धुराग्र सं ध घूणन दे ती है, जैसे ‘नह ’ कहते समय सर हलाना।
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नम्न ल खत म से प्रत्येक स्थ त (I, II, III और IV) के लए नीचे दए गए सही वकल्प का चयन क जए — (i)
अ भकथन और कारण दोन सत्य ह और कारण, अ भकथन क सही व्याख्या करता है। (ii)em
प्र.6
m a s
l सत्य है, कतु
co सत्य ह कतु कारण, अ भकथन क सही व्याख्या नह करता है। (iii)aअgभकथन
अ भकथन और
कारण .दोन
a s emअसत्य है। (iv) अ भकथन असत्य है, कतु कारण सत्य है। I अ भकथन — उपकला फेफड़ म गैस
gl व नमय के लए अ धक उपयुक्त है। कारण — इसम लंबी को शकाओं क अनेक परत होती ह जो वसरण क
कारण
a
ग त को धीमा कर दे ती ह। II अ भकथन — हृद पेशी बना थके नरंतर संकुचन कर सकती है। कारण — हृद
o m
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पेशी को शकाओं म अ धक संख्या म माइटोकॉ या और प्रचुर मात्रा म रक्त क आपू त होती है। III अ भकथन
s e m ह और सं ध क ग त को संभव बनाती ह। कारण — कंडराएँ
— कंडराएँ एक अ स्थ को दूसरी अ स्थ से जोड़ती
सुदृढ़ संयोजी ऊतक से बनी होती ह जोlपेaशी से अ स्थ तक बल का संचरण करती ह। IV अ भकथन — कोर
agहै। कारण — अ स्थय के सरे सभी दशाओं म सप ग त करने हेतु
सं ध म ग त मुख्यतः एक तल म होती
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आका रत होते ह।
co
e m.
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eतm a
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gl
स्थ अ भकथन कारण उत्तर
a
s
I सत्य असत्य (iii)
m a
m .coसत्य और सही व्याख्या agl
ase
II सत्य (i)
III असत्य
agl सत्य (iv)
m
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IV सत्य असत्य (iii)
m a s em
o के अनुसार व नमय करने वाली उपकला पतली, चपट को शकाओं क aएकल gl परत है, जससे वसरण का माग
I — (iii)। अ भकथन सही है: फेफड़ का आस्तर गैस व नमय के लए अत्यंत उपयुक्त है। कतु कारण सत्य के ठ क वपरीत है।
ता लका.c3.2
m
aन्यूseनतम रहता है। लंबी को शकाओं क अनेक परत तो वसरण को धीमा करगी, अतः वह व्यवस्था वहाँ मलती है जहाँ सुरक्षा चा हए
agl — त्वचा, मुँह, ग्रासनली।
se m
m a
II — (i)। हृद पेशी वास्तव म जीवनपयत बना थके लयबद्ध रूप से काय करती है, और दया गया कारण ठ क वही है। थकान तब
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आती है जब पेशी ATP को बनने से अ धक तेजी से खच करे । माइटोकॉ या क अ धक सं ख्या का अथ है ऑक्सी-श्वसन से ATP
l a se और ग्लूकोस नरंतर पहुँचाती रहती है और अप शष्ट हटाती रहती है। इस
का उच्च उत्पादन; प्रचुर रक्त आपू त उन्ह ऑक्सीजन
प्रकार आपू त माँग के बराबर बनी रहतीg
a है और ऑक्सीजन-ऋण बनता ही नह ।
III — (iv)। अ भकथन असत्य है: अ स्थ को अ स्थ से स्नायु जोड़ते ह। कंडराएँ पेशी को अ स्थ से जोड़ती ह। कारण अपने आप
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म सही कथन है — कंडराएँ सुदृढ़ संयोजी ऊतक ह और संकु चत होती पेशी का बल अ स्थ तक पहुँचाती ह।
m कारण असत्य है; सभी दशाओं
IV — (iii)। अ भकथन सत्य है: कोर सं ध एक ही तल म ग त करती है, जैसे कोहनी और घुटeना।
s
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l नह । वस्तुतः यह कारण अ भकथन का
co ग त के लए आका रत सरे कंदुक-ख ल्लका सं ध का वणन करते ह, कोर संaधgका
.
semखंडन करता है।
म सप
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agl c
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अ भकथन-कारण प्रश्न के लए संकेत: पहले अ भकथन और कारण को अलग-अलग पर खए, तत्पश्चात पू छए
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क कारण अ भकथन क व्याख्या करता है या नह । स्थ त III म कारण सत्य है और अ भकथन असत्य — दोन को
agl
a s emछू ट जाता है।
साथ पढ़ने पर यह संयोजन सरलता से
agl
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प्र.7 ता लका 3.7 म दए गए आँकड़ का उपयोग करके X-अक्ष पर वृक्ष क आयु (वष म) और Y-अक्ष पर समय के
साथ वृक्ष का व्यास (cm म) तथा न मत वा षक वलय क संख्या के मध्य एक ग्राफ बनाइए। (i) समय के साथ
तने के व्यास के संदभ म ग्राफ का व ेषण क जए और अपने नष्कष साझा क जए। (ii) सागवान के वृक्ष के
व्यास और न मत वा षक वलय के बीच क्या संबंध है? (iii) तने क प र ध म वृ द्ध के लए कौन-सा वशेषीकृत
ऊतक उत्तरदायी है और यह कहाँ स्थत होता है?
ता लका 3.7 — सागवान के वृक्ष क आयु और तदनुरूप तने के व्यास म वृ द्ध तथा वा षक वलय क संख्या से
संबं धत आँकड़े
क्र.सं. सागवान के वृक्ष क आयु वृक्ष का आवक्ष व्यास DBH न मत वा षक वलय क
(वष) (CM) संख्या
1. 5 4 5
2. 10 8 10
3. 20 24 20
4. 25 28 25
5. 30 32 30
6. 40 40 40
X-अक्ष पर आयु ली जए और आवक्ष व्यास (DBH, cm) तथा वा षक वलय क संख्या — दोन एक ही Y-अक्ष पर, क्य क दोन
4 से 40 तक जाते ह।
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DBH (cm) / वलयों की संख्या
30 तीव विृ ,
10–20 वष
20
व्यास (cm)
10 वािषक वलय
0
0 10 20 30 40
ृ की आयु (वष)
सागवान के वक्ष
दोन वक्र आयु के साथ बढ़ते ह। वलय क रेखा पूणतः सीधी है (प्र तवष एक वलय), जब क व्यास क रेखा म 10 से 20 वष के बीच एक
तीव्र खंड है।
(i) समय के साथ व्यास। व्यास पूरे समय बढ़ता रहता है — वृक्ष कभी मोटा होना बंद नह करता। कतु दर प्रत्येक वष समान नह
है —
व्यास वृि की दर = (DBH में पिरवतन) ÷ (आयु में पिरवतन)
5 → 10 वष: (8 − 4) cm ÷ (10 − 5) वष = 4 cm ÷ 5 वष = 0.8 cm वष⁻¹
10 → 20 वष: (24 − 8) cm ÷ 10 वष = 16 cm ÷ 10 वष = 1.6 cm वष⁻¹
20 → 25 वष: (28 − 24) cm ÷ 5 वष = 0.8 cm वष⁻¹
25 → 30 वष: (32 − 28) cm ÷ 5 वष = 0.8 cm वष⁻¹
30 → 40 वष: (40 − 32) cm ÷ 10 वष = 8 cm ÷ 10 वष = 0.8 cm वष⁻¹
पूरे अिभलेख का औसत = (40 − 4) cm ÷ (40 − 5) वष = 36 ÷ 35 ≈ 1.03 cm वष⁻¹
नष्कष: युवा वृक्ष (10 – 20 वष) ने प र ध म कसी भी अन्य अवस्था से दुगुनी तेजी से वृ द्ध क — 0.8 cm वष⁻¹ क तुलना म
1.6 cm वष⁻¹। वह दशक स्पष्टतः अनुकूल प र स्थ तय का रहा और पाश्व वभज्योतक तब सवा धक स क्रय था। 20 वष के पश्चात
दर पुनः स्थर 0.8 cm वष⁻¹ पर आ जाती है।
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(ii) व्यास और वा षक वलय का संबंध। वलय और आयु म ठ क एक-से-एक संबंध है — 5 वष/5 वलय, 20 वष/20 वलय,
40 वष/40 वलय — क्य क प्रत्येक वष एक वलय बनता है। अतः व्यास वलय क संख्या के साथ बढ़ता है, कतु ठ क
समानुपात म नह —
पित वलय जुड़ा व्यास = DBH ÷ वलयों की संख्या
5 वलय पर: 4 ÷ 5 = 0.80 cm पित वलय 20 वलय पर: 24 ÷ 20 = 1.20 cm पित वलय
25 वलय पर: 28 ÷ 25 = 1.12 cm पित वलय 40 वलय पर: 40 ÷ 40 = 1.00 cm पित वलय
40 वष पर एक वलय की औसत ित्रज्यीय चौड़ ाई = (40 ÷ 2) cm ÷ 40 वलय = 20 ÷ 40 = 0.5 cm = 5 mm
अतः संबंध यह है: वलय अ धक → व्यास अ धक, और वलय क संख्या ही आयु बताती है। चौड़े वलय अनुकूल वष दशाते ह
और संकरे वलय प्र तकूल वष — इसी लए प्र त वलय व्यास का मान स्थर नह रहता।
(iii) ऊतक। पाश्व वभज्योतक। यह तने के भीतर, उसक प र ध के अनु दश एक वलय के रूप म व्यव स्थत स क्रय रूप से
वभा जत होने वाली को शकाओं के रूप म स्थत होता है। इसक को शकाएँ वभा जत होकर संकद्र रूप से भीतर और बाहर
दोन ओर नई को शकाएँ जोड़ती ह, जससे तने का व्यास बढ़ता है और प्र तवष एक वा षक वलय बनता है।
क्या आप जानते ह? प्रत्येक वलय एक वष क प र स्थ तय का अ भलेख है, अतः वै ा नक पुरानी लकड़ी को
डायरी क तरह पढ़ते ह — वलय क चौड़ाई उन्ह उन सूख और अ वषा वाले वष क जानकारी दे ती है जनका
कोई मौसम-अ भलेख उपलब्ध नह है।
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प्र.8 एक वन म दे खा गया क एक हाथी ने अपनी भोजन क आवश्यकता पूरी करने के लए एक वृक्ष क छाल को बुरी
तरह उखाड़ दया क्य क छाल पोषक तत्व का एक समृद्ध ोत होती है ( चत्र 3.22)। अपने अ धगम के आधार
पर नम्न ल खत प्रश्न के उत्तर द जए — (i) छाल उखड़ने से वृक्ष का/के कौन-सा/से काय बा धत होता/होते है/
ह? (ii) छाल उखड़ने के बाद भी वृक्ष के तने को और क्ष त होने पर पादप का कौन-सा ऊतक प्रभा वत होगा?
(iii) य द छाल के नीचे के ऊतक गंभीर रूप से क्ष तग्रस्त हो जाएँ तो वृक्ष का कौन-सा काय बा धत होगा? (iv)
उपयुक्त प्रश्न के उत्तर दे ने के लए आप क्या पूवानुमान लगाते ह? य द आपके पूवानुमान म प रवतन हो तो उत्तर
म क्या अंतर आएगा?
वक्ष
ृ का तना
उखाड़ी गई छाल
हाथी
चत्र 3.22, पृष्ठ 45 — छाया चत्र का पुनः बनाया गया रेखा चत्र: एक हाथी वृक्ष के तने से छाल उखाड़ता हुआ।
बाहर से भीतर क ओर च लए। छाल सबसे बाहरी सुरक्षात्मक परत है; उसके ठ क नीचे फ्लोएम और पाश्व वभज्योतक ह; सबसे
भीतर जाइलम।
(i) छाल उखड़ने से बा धत होने वाले काय।
सुरक्षा समाप्त हो जाती है। छाल मृत, संहत रूप से व्यव स्थत काग को शकाओं क बनी है जनम ऐसा पदाथ होता है जो उन्ह
जल और गैस के लए अपारगम्य बनाता है। छाल हटते ही तना जल-हा न, कवक, जीवाणु, क ट और यां त्रक क्ष त के लए खुल
जाता है।
भोजन का प रवहन बा धत होता है। फ्लोएम छाल के ठ क नीचे होता है, अतः प्रायः वह छाल के साथ ही उखड़ जाता है।
तब प त्तय म बनी शकरा जड़ तक नह पहुँच पाती।
उस स्थान पर प र ध क वृ द्ध रुक जाती है, क्य क पाश्व वभज्योतक भी फ्लोएम के ठ क भीतर होने के कारण क्ष तग्रस्त हो
जाता है।
(ii) तने को और क्ष त होने पर प्रभा वत ऊतक। और भीतर जाने पर पहले पा वभज्योतक (काग एधा तथा संवहन बंडल का
एधा) और फर जाइलम नष्ट होगा। जाइलम क क्ष त सबसे गंभीर है, क्य क जाइलम तने को यां त्रक दृढ़ता भी दे ता है।
(iii) छाल के नीचे के ऊतक गंभीर रूप से क्ष तग्रस्त होने पर। जड़ से प त्तय तक जल और ख नज का ऊध्व प रवहन
बा धत होगा, क्य क यही जाइलम का काय है — और उसके साथ वृक्ष क यां त्रक दृढ़ता भी, अतः तना आँधी म टू ट सकता है। य द
फ्लोएम पूरे घेरे म कट जाए तो जड़ को भोजन मलना बंद हो जाता है, वे भूखी रहकर जल और ख नज अवशो षत करना बंद कर
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
दे ती ह, और प त्तयाँ अछू ती होने पर भी अंततः पूरा वृक्ष मर जाता है।
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em.
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(iv) पूवानुमान और उनके बदलने पर उत्तर म अंतर।
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लगाया गया पूवानुमान य द पूवानुमान बदल जाए तो…
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g पूरे तने के चारों ओर उखाड़ी गई है
aछाल य द केवल एक ओर का टु कड़ा उखड़ा हो तो दूसरी ओर का फ्लोएम भोजन नीचे पहुँचाता रहेगा
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और वृक्ष प्रायः जी वत रहकर घाव भर लेगा
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क्षित फ्लोएम और एधा तक पहच
ु ँ ी है, के वल य द केवल बाहरी मृत काग खुरचा गया हो तो वृक्ष सुरक्षा तो खोएगा कतु भोजन का प रवहन
बाहरी म ृत काग तक नही ं
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चलता रहेगा और काग एधा से नया काग बन जाएगा
वृक्ष ि बीजपत्री है िजसमें ि तीयक वृि और ताड़ या बाँस जैसे एकबीजपत्री म काग एधा और छाल के नीचे फ्लोएम का वलय होता ही नह ,
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सतत छाल होती है अतः वही चोट बल्कुल भन्न प्रभाव डालेगी
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.co मुरझा जाएँगी — जड़ क भुखमरी से मृत्यु क तुलना म g
जाइलम अभी सुर िक्षत है य द जाइलम भी कट जाए तो प त्तय को जल मलना बंद हो जाएगा और वे कुछ ही दन म
em a कह शीघ्र
a s
glघाव में पुनः संक्रमण नही ं होगा और ऋतु
a अनुकूल है य द खुली लकड़ी म कवक प्रवेश कर जाएँ तो सड़न फैलेगी और आं शक रूप से छाल उखड़ा
वृक्ष भी मर सकता है
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em
.co agl
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प रवहन क दशा ही सब कुछ तय करती है: फ्लोएम भोजन को प त्तय से जड़ क ओर नीचे ले जाता है, अतः
aहै,lप त्तय को नह । जाइलम जल को ऊपर ले जाता है, अतः उसक क्ष त
पूरे घेरे क क्ष त जड़ को भूखा करती g
पहले प त्तय को मारती है। कौन-सा ऊतक कटा है, यही बताता है क वृक्ष का कौन-सा सरा पहले मरेगा।
co m
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g म लचीला होकर मुड़ जाता है कतु
प्र.9 .cआम्रपाली ने दे खा क आम के एक नवो द्भद पौधे का तना मानसून क हवाओं
a
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aglas टूटता नह । इस लचीलेपन के लए कौन-सा ऊतक उत्तरदायी है? य द वद्यमान ऊतक को दृढ़ोतक से प्र तस्था पत
कर दया जाए तो क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका पूवानुमान लगाइए और व्याख्या क जए।
se m
com g l a
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इस लचीलेपन के लए ेषोतक उत्तरदायीaहैs
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ेषोतक सजीव को शकाओं से बनाaहै जनक भ त्त कोन पर पे क्टन के नक्षेपण से असमान रूप से स्थू लत होती है — पुस्तक
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पे क्टन क तुलना रबर से करती है। कोन क अ त रक्त सामग्री दृढ़ता दे ती है, जब क बीच के पतले भाग भ त्त को वरू पत होने
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दे ते ह। इसी लए तना हवा म झुक जाता है और झ का बीतते ही पुनः सीधा हो जाता है।
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य द इसे दृढ़ोतक से प्र तस्था पत कर दया जाए —
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
ेषोतक (वास्त वक) दृढ़ोतक (काल्प नक)
िभि पतली, कोन पर पे क्टन से स्थू लत समान रूप से मोट , ल ग्नन से कठोर
कोिशकाएँ सजीव, तने के साथ बढ़ सकती ह अ धकतर मृत, द घ कृत नह हो सकत
हवा में झुकता है और पूव स्थ त म लौट आता है दृढ़ रहता है और सीमा पार होते ही टू ट जाता है
वृि पर पभाव युवा तने के साथ-साथ बढ़ता है मृत, ल ग्ननयुक्त आवरण युवा तने के द घ करण को रोक दे गा
पूवानुमान: शांत वायु म पौधा बहुत कड़ा खड़ा रहेगा, कतु मानसून के पहले प्रबल झ के म तना चटक जाएगा या पूरी तरह टू ट
जाएगा — ठ क वैसे जैसे सूखी टहनी टू टती है और नई टहनी मुड़ जाती है। उसक ऊँचाई क वृ द्ध भी रुक जाएगी, क्य क
ल ग्ननयुक्त भ त्त तने के द घ करण के साथ खच नह सकती।
युवा तने म ेषोतक और पुराने तने म दृढ़ोतक क्य : युवा तना अभी बढ़ रहा है और पतला है, अतः उसे ऐसा
अवलंब चा हए जो लचीला हो और उसके साथ बढ़े । पुराना तना द घ करण पूरा कर चुका है और उसे बड़ा भार
उठाना है, अतः वह दृढ़, मृत, ल ग्ननयुक्त ऊतक वहन कर सकता है। आवश्यकता बदलने पर पादप अपना सहायक
ऊतक भी बदल लेता है — संरचना यहाँ भी प्रकाय के अनुसार ही है।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
प्र.10 सोहन ने गन्ने के पुनरुद्भवन के लए एक प्रयोग अ भक ल्पत कया जसम उसने गन्ना उगाने के लए कलम
(cutting) का उपयोग कया। उसने दो प्रकार क कलम, प्रकार ‘क’ और प्रकार ‘ख’ ( चत्र 3.23) का उपयोग
कया। कुछ सप्ताह बाद, प्रकार ‘ख’ क कलम म अंकुर दखाई दए और वे गन्ने के पादप म वक सत हो गए
जब क प्रकार ‘क’ क कलम म अंकुरण नह हुआ। (i) प्रकार ‘ख’ क कलम ने गन्ने के रूप म क्य वृ द्ध क
कतु प्रकार ‘क’ ने क्य नह क ? (ii) प्रकार ‘ख’ म प्रकार ‘क’ क तुलना म क्या अंतर था? (iii) इस प रवतन
के प्रभाव का नधारण करने के लए कौन-सा प्रेक्षण अथवा मापन कया गया? (iv) उ चत तुलना सु न श्चत
करने के लए दोन प्रकार क कलम म कौन-से मानदं ड समान रखने चा हए?
(क) (ख)
चत्र 3.23, पृष्ठ 46 — पुस्तक म दए गए दोन गन्ना कलम के छाया चत्र का पुनः बनाया गया रेखा चत्र।
चत्र 3.23 को ध्यान से दे खए। कलम (क) दो पवसं धय के बीच से लया गया चकना पव है। कलम (ख) म पवसं ध है — उस
पर उभरा हुआ वलय, एक क लका और जड़ के आरं भक चह्न स्पष्ट दखाई दे ते ह।
(i) ‘ख’ म वृ द्ध हुई और ‘क’ म नह — क्य । अंकुरण के लए ऐसी को शकाएँ चा हए जो अब भी वभा जत हो सक। पवसं ध
पर क लका (सुप्त प्ररोह शीषस्थ वभज्योतक) और उसके ठ क ऊपर पव के आधार पर अंतवशी वभज्योतक होता है। कलम
‘ख’ म ये उप स्थत ह, अतः वह नया प्ररोह और जड़ बना सक । कलम ‘क’ पूणतः स्थायी ऊतक — मृदूतक, दृढ़ोतक, जाइलम और
फ्लोएम — से बना है, जनक हर को शका वभाजन क क्षमता खो चुक है। वह कुछ समय जी वत रह सकती है, कतु उसम कोई
वृ द्ध- बदु न होने से अंकुरण कभी नह होगा।
(ii) अंतर। ‘ख’ म क लका स हत पवसं ध (और उसका वभज्योतक ऊतक) उप स्थत थी; ‘क’ बना पवसं ध और बना क लका
का पव मात्र था।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
(iii) क्या प्रेक्षण या मापन कया गया। अंकुर नकला या नह , और नकला तो कतना। व्यवहार म आप ये अ भले खत करगे —
कुल रोपी गई कलम म से कतनी म अंकुरण हुआ (अंकुरण प्र तशत);
पहला अंकुर दखाई दे ने म कतने दन लगे;
नए प्ररोह क लंबाई cm म, न श्चत अंतराल पर मापी गई;
बनी जड़ क संख्या और उनक लंबाई cm म।
अंकु रण पितशत = (अंकु िरत कलमों की संख्या ÷ कु ल रोपी गई कलमों की संख्या) × 100
उदाहरण: यिद 20 में से 18 ‘ख’ पकार की कलमों में अंकु रण हुआ , तो = (18 ÷ 20) × 100 = 90%
यिद 20 में से 0 ‘क’ पकार की कलमों में अंकु रण हआ
ु , तो = 0%
(iv) समान रखे जाने वाले मानदं ड, ता क अंतर केवल पवसं ध क उप स्थ त का रह जाए —
गन्ने क एक ही कस्म, एक ही जनक पादप से ली गई कलम;
प्रत्येक कलम क समान लंबाई, समान मोटाई और समान आयु;
समान मृदा, समान आमाप के गमले, समान गहराई और दशा म रोपण;
समान मात्रा और समान आवृ त्त क सचाई;
समान ताप, सूय-प्रकाश और आद्रता — दोन को साथ-साथ रो पए;
दोन प्रकार क कलम क समान संख्या, ता क प्र तशत तुलनीय रह, तथा प्रेक्षण क समान त थयाँ।
नष्पक्ष परीक्षण के लए यह सब क्य आवश्यक है: प्रयोग का दावा है क अंकुरण का कारण पवसं ध है। यह
दावा तभी टकेगा जब दोन समूह म केवल पवसं ध ही भन्न हो। य द ‘ख’ क कलम मोट भी होत या उन्ह अ धक
जल भी मलता, तो यह कहना असंभव होता क प रणाम कस कारक से आया। शेष सब कुछ स्थर रखना ही एक
चर को स्वतंत्र रूप से परखने योग्य बनाता है।
क्या आप जानते ह? गन्ना, आलू और शकरकंद — तीन का व्यावसा यक प्रवधन ठ क इसी व ध से, क लकायुक्त
तने के टु कड़ से कया जाता है, क्य क यह बीज से तेज है और जनक के समरूप पादप दे ता है।
प्र.11 कक्षा म चचा के समय रोहन कहता है— “ऊतक समान को शकाओं का एक समूह है जो समान काय करता है”
कतु राजीव इसका प्र तवाद करते हुए कहता है— “यह सरल ऊतक क स्थ त म सत्य है कतु ज टल ऊतक
क स्थ त म थोड़ा भन्न है।” कक्षा म हुई चचा के संदभ म अपना स्पष्टीकरण द जए।
राजीव सही है, और रोहन के कथन म केवल एक शब्द बदलने क आवश्यकता है। ऊतक को शकाओं का वह समूह है जो एक
सामान्य प्रकाय के लए मलकर काय करता है — यह आवश्यक नह क वे सभी एक ही प्रकार क को शकाएँ ह ।
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सरल स्थायी ऊतक ज टल स्थायी ऊतक
कोिशका के केवल एक प्रकार एक से अ धक प्रकार
पकार
उदाहरण मृदूतक, ेषोतक, दृढ़ोतक जाइलम, फ्लोएम
काय का प्रत्येक को शका वही काय करती है — सभी मृदूतक को शकाएँ एक ही काय के अलग-अलग भाग अलग-अलग
बँटवारा भोजन सं चत करती ह को शकाएँ करती ह
जाइलम को ली जए। इसम चार प्रकार क को शकाएँ ह और उ े श्य केवल एक — जल को ऊपर ले जाना —
वा ह नकाएँ और वा हकाएँ — न लकाकार, मोट भ त्त वाली और मृत; यही न लयाँ ह।
जाइलम तंतु — दृढ़ोतक य; यां त्रक दृढ़ता दे ते ह।
जाइलम मृदूतक — एकमात्र सजीव घटक; भोजन सं चत करता है।
फ्लोएम को ली जए। फर चार प्रकार क को शकाएँ, उ े श्य एक — भोजन का प रवहन —
चालनी न लकाएँ — लंबी, न लकाकार, छ द्रत भ त्तय से जुड़ी; माग स्वयं।
सहचर को शकाएँ — वशेषीकृत मृदूतक को शकाएँ, जो चालनी न लका का नयमन करती ह और शकरा के भारण-अभारण
का अनुवीक्षण करती ह।
फ्लोएम मृदूतक — भोजन, राल, टै नन और रबड़क्षीर संग्रहीत करता है।
फ्लोएम तंतु — दृढ़ोतक य; कोमल चालनी न लकाओं को सहारा दे ते ह।
एक बेहतर प रभाषा, जो दोन स्थ तय को समेट ले: ऊतक को शकाओं का वह समूह है जो एक साथ संग ठत होकर एक व शष्ट
प्रकाय के लए एक इकाई क भाँ त काय करता है — सरल ऊतक म संरचना म समान, ज टल ऊतक म अनेक प्रकार क ।
ज टल ऊतक क्य बने: संवहन एक नह , अनेक काय का जोड़ है — एक खुला माग, उसे पचकने से बचाने वाली
दृढ़ता, भंडारण, और प्रवेश- नगम का नयमन। कोई एक को शका एक साथ खोखली-मृत भी हो और सजीव-
नयामक भी — यह असंभव है। इसी लए पादप अनेक प्रकार क को शकाओं को एक ही ऊतक म संग ठत कर दे ता
है। यही वचार जंतुओं म भी है — रक्त एक संयोजी ऊतक है जो RBC, WBC, बबाणु और प्लाज्मा से बना है और
सभी मलकर प रवहन तथा रक्षा करते ह।
प्र.12 ना रयल के कठोर और रेशेदार तंतुओं का उपयोग चटाई बनाने के लए कया जाता है। कौन-से ऊतक म यह
दृढ़ता प्रदान करने के लए उपयुक्त संरचनात्मक वशेषताएँ होती ह? स्पष्ट क जए क सजीव मृदूतक से इस
उ े श्य क पू त क्य नह हो सकती है।
दृढ़ोतक। ना रयल के रेशे का तंतु दृढ़ोतक है, और उसक प्रत्येक वशेषता दृढ़ता क ही वशेषता है।
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दृढ़ोतक क वशेषता चटाई को क्या दे ती है
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समान रूप से मोटी, िल िग्नन से भारी िनक्षेिपत िभि दृढ़ता, तथा ख चे या कुचले जाने का प्र तरोध
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g l a ऐसे तंतु जन्ह बटकर मजबूत सूत बनाया और बुना जा सके
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लंबी, पतली, नुक ीली कोिशकाएँ िसरे से िसरे तक सटी
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पिरपक्वता पर अिधकांश कोिशकाएँ म ृत खोने के लए जल है ही नह , अतः सूखने पर भी तंतु आकार और दृढ़ता बनाए
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रखता है
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िलिग्नन जल-पितरोधी है
ag चटाई धुलाई, गीले फश और वषा म शीघ्र सड़ती नह
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सजीव मृदूतक से यह काय क्य नह हो सकता:
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gl रेशेदार नह , स्पंजी और
मृदूतक को शकाओं क भ त्त पतली होती है — खचाव सहने के लए सामग्री ही नह है। वे सरलता
वे वरल.c o से व्यव स्थत होती ह और उनम अंतःको शक य अवकाश होते ह, अतःaऊतक
semहोता है।
रूप
aकोमल
agl वे सजीव और जल से भरी होती ह। उनक कठोरता त से आती है, भ त्त से नह । सूखते ही वे पचककर सकुड़ जाती ह
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— मृदूतक से बनी चटाई उसी दन ढ ली पड़ जाती।
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सजीव होने के कारण उन्ह भोजन और जल क आपू त भी चा हए, और पादप से अलग होते ही वे सड़ने लगत और सूक्ष्मजीव
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का आक्रमण झेलत ।
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मुख्य अंतर: मृदूतक तभी तक दृढ़ है जब तक वह सजीव और जल से भरा है; दृढ़ोतक इस लए दृढ़ है क्य क उसक
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भ त्त मोट और ल ग्ननयुक्त है, और को शका के मरने के बाद भी वह दृढ़ बना रहता है। पादप से बाहर टकने वाली
कसी भी वस्तु के लए — कॉयर क रस्सी, जूट, अखरोट का छलका, बीजावरण — मृत,mल ग्ननयुक्त ऊतक ही
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चा हए।
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वभा अपनी सहेली नेहा से कहती है— “ वभज्योतक को शकाएँ केवल जड़ और प्ररोह के अग्रभाग (शीष) पर
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स्थत होती ह।” आप इस कथन के वषय म क्या सोचते ह? य द कथन असत्य है तो ने हा वभा से कौन-सा प्रश्न
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l a se त समझ सके?
पूछ सकती है जससे वह इसे भली-भाँ
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emह।
कथन असत्य है। शीषस्थ वभज्योतक तीन प्रकार म से केवल एक है। वभज्योतक को शकाएँ तने क प र ध के अनु दश (पाश्व
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वभज्योतक) तथा पवसं धय और पव के आधार पर (अंतवशी वभज्योतक) भी उप स्थत होती
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परोह शीषस्थ िवभज्योतक
— लंबाई मे ं वृि
पवसंिधयों पर
पाश्व अंतवशी िवभज्योतक
िवभज्योतक — पुनःवृि
— पिरिध
मूल शीषस्थ िवभज्योतक
तीन प्रकार के वभज्योतक, तीन भन्न काय — लंबाई, प र ध और पुनःवृ द्ध।
नेहा जो प्रश्न पूछ सकती है — प्रत्येक ऐसा तथ्य सामने रखता है जसक व्याख्या वभा का कथन नह कर सकता —
1. “य द वभज्योतक केवल शीष पर है, तो वृक्ष का तना प्र तवष मोटा क्य होता जाता है, और जन वा षक वलय को
गनकर हम उसक आयु नकालते ह, वे कससे बनते ह?”
2. “लॉन काटने पर घास क हर पत्ती का अग्रभाग हट जाता है। तो घास पुनः क्य उग आती है?”
3. “बाड़ क छँ टाई के बाद अ धक शाखाएँ नकल आती ह और वह घनी हो जाती है। जब अग्रभाग हट चुका है तो उन नई
शाखाओं क को शकाएँ कहाँ से आ रही ह?”
4. “हमारे क्रयाकलाप 3.1 म मूलाग्र काटने पर जड़ लंबी होना रुक गई, फर भी प्याज का कंद जी वत और स क्रय रहा। तब कह
और कौन-सी वभाजनशील को शकाएँ उप स्थत थ ?”
इनम से कोई भी एक प्रश्न सही नष्कष तक पहुँचा दे गा: शीषस्थ वभज्योतक अग्रभाग पर लंबाई बढ़ाता है, पा वभज्योतक तने
के अनु दश प र ध बढ़ाता है, और पवसं धय पर स्थत अंतवशी वभज्योतक घास तथा बाड़ को कटने के बाद पुनरुद्भवन म
सहायता करता है।
संकेत: अ ा प्र त-प्रश्न केवल “तुम गलत हो” नह कहता। वह एक ऐसा दै नक अवलोकन सामने रखता है जसक
व्याख्या गलत वचार नह कर सकता, और सामने वाले को स्वयं नष्कष नकालने दे ता है।
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प्र.14 एक पादप को शका और एक जंतु को शका का आमाप समान है। (i) कस को शका म रसधानी अपेक्षाकृत
बड़ी होगी? कारण बताइए। (ii) उपरोक्त प्रश्न का उत्तर दे ने के लए आप क्या पूवानुमान लगाते ह?
(i) पादप को शका म। प रपक्व पादप को शका म एक बड़ी कद्र य रसधानी होती है जो को शका के अ धकांश आयतन को घेर
सकती है और को शकाद्रव्य तथा कद्रक को भ त्त से सट पतली परत म दबा दे ती है। जंतु को शका म या तो रसधानी होती ही नह ,
या केवल कुछ बहुत छोट रसधा नयाँ होती ह।
कारण —
त और अवलंब। पादप को शका म दृढ़ को शका भ त्त होती है। रसधानी म जल भरने पर को शकाद्रव्य उस भ त्त से दब
जाता है और को शका कठोर हो जाती है — यही त कोमल शाक य पौधे को सीधा खड़ा रखती है। जंतु को शका म भ त्त
नह , अतः बड़ी जलपूण रसधानी उसे फोड़ दे गी या उसका आकार बगाड़ दे गी।
भंडारण। पादप अपना भोजन स्वयं बनाता है और जल, भोजन, वणक तथा अप शष्ट रसधानी म सं चत करता है। जंतु
आवश्यकतानुसार भोजन ग्रहण करता है और अप शष्ट रक्त तथा उत्सज अंग से बाहर करता है, अतः उसे बड़े भंडार-कोष क
आवश्यकता नह ।
सस्ती वृ द्ध। पादप को शका मुख्यतः रसधानी म जल भरकर बढ़ती है, नया को शकाद्रव्य बनाकर नह — यह वृ द्ध का अत्यंत
मतव्ययी तरीका है।
लचीलापन। जंतु को शका को ग त, वभाजन और पड़ोसी को शकाओं के बीच से नकलने के लए आकार बदलना पड़ता है;
बड़ी रसधानी उसे कड़ा बना दे ती।
(ii) लगाए गए पूवानुमान —
दोन को शकाएँ प रपक्व और वभे दत ह, वभाजनशील नह — वभज्योतक पादप को शका म तो रसधानी होती ही नह ,
अतः वैसी स्थ त म उत्तर बदल सकता है।
पादप को शका एक सामान्य सजीव मृदूतक जैसी को शका है, जाइलम वा हका या दृढ़ोतक तंतु जैसी मृत को शका नह ।
जंतु को शका एक साधारण काय को शका है — वसा को शका या बड़ी रसधानी वाली स्रावी को शका जैसी वशेषीकृत नह ।
पादप को शका त है (जल से भरी); मुरझाई को शका म रसधानी सकुड़ी होती है।
“समान आमाप” का अथ समान कुल को शका आयतन है, अतः हम वास्तव म उस आयतन म रसधानी के अंश क ही तुलना
कर रहे ह।
पूवानुमान बताना क्य आवश्यक है: “पादप को शका” उत्तर केवल सामान्य, प रपक्व स्थ त म सत्य है।
पूवानुमान को नाम दे ना यह स्पष्ट कर दे ता है क उत्तर कब सत्य नह रहेगा — और यही एक वै ा नक उत्तर को रटे
हुए उत्तर से अलग करता है।
प्र.15 एक पाठ्यपुस्तक म यह कहा गया है, “प्रत्येक पादप ऊतक केवल एक व शष्ट काय करता है।” इस कथन क
सत्यता क ववेचनात्मक जाँच करने के लए आप कौन-से प्रश्न पूछगे? इन प्रश्न के उत्तर खोजने के लए आप
कन ऊतक के उदाहरण लगे?
यह कथन एक अ त-सरलीकरण है। वशेषीकरण के कारण एक काय प्रमुख अवश्य हो जाता है, कतु अ धकांश पादप ऊतक एक
से अ धक काय करते ह।
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पूछने योग्य प्रश्न —
1. क्या इस अध्याय म कसी ऊतक के लए एक से अ धक प्रकाय गनाए गए ह?
2. क्या वही ऊतक भन्न अंग म या भन्न पादप म भन्न व्यवहार करता है?
3. क्या पादप क आयु या दशा के साथ ऊतक का काय बदलता है?
4. क्या एक ही काय एक से अ धक ऊतक कर सकते ह — अथात ऊतक और प्रकाय का संबंध वास्तव म एक-से-एक है भी?
5. य द कोई ऊतक सचमुच केवल एक ही काय करता, तो उसक क्ष त पर क्या दखना चा हए? क्या पादप केवल वही एक क्षमता
खोता है?
उत्तर दे ने वाले उदाहरण —
ऊतक वास्तव म जो काय करता है यह क्या दशाता है
म ृदू तक भोजन का भंडारण; ह रत भाग म प्रकाश-सं ेषण; वायु गु हकाएँ एक ऊतक, कम-से-कम चार काय — और
बनाकर जलीय पादप को तैराना; भराव ऊतक कौन-सा करेगा, यह उसके स्थान पर नभर है
बाह्यत्वचा सुरक्षा; उपत्वचा ारा जल-हा न नयंत्रण; मूलरोम के रूप म जल वही ऊतक एक अंग म अवरोध है और दूसरे
और ख नज का अवशोषण; रंध्र ारा गैसीय व नमय और अंग म अवशोषी सतह
वाष्पोत्सजन
जाइलम जल और ख नज का प रवहन; साथ ही पादप को दृढ़ता दे ना; पुस्तक स्वयं एक ही वाक्य म जाइलम के दो
जाइलम मृदूतक भोजन सं चत करता है प्रकाय बताती है
फ्लोएम भोजन का प रवहन; फ्लोएम मृदूतक भोजन, राल, टै नन और ज टल ऊतक अनेक काय को अपनी व भन्न
रबड़क्षीर संग्रहीत करता है; फ्लोएम तंतु दृढ़ता दे ते ह को शकाओं म बाँट दे ता है
पाश्व प र ध बढ़ाता है; काग एधा को भी जन्म दे ता है, जससे सुरक्षात्मक एक वभाजनशील ऊतक सुरक्षात्मक ऊतक भी
िवभज्योतक छाल बनती है उत्पन्न करता है
श्ले षोतक और दोन यां त्रक अवलंब दे ते ह — एक लचीलेपन के साथ, दूसरा दृढ़ता दो भन्न ऊतक एक ही प्रकाय म भागीदार ह,
दृ ढ़ोतक के साथ अतः संबंध दोन ओर से एक-से-एक नह
नष्कष। अ धक उ चत कथन होगा: प्रत्येक पादप ऊतक एक मुख्य काय के लए वशेषीकृत होता है, कतु अनेक ऊतक अ त रक्त
काय भी करते ह, और एक ही काय म एक से अ धक ऊतक भागीदार हो सकते ह। और सबसे गहरा प्र त-उदाहरण स्वयं पूणशक्तता
है — गाजर क प रपक्व फ्लोएम को शका, जसका “एकमात्र काय” भोजन का प रवहन है, पूरा पादप पुनरुद्भत कर सकती है।
संकेत: व ान के कसी भी व्यापक कथन को परखने के लए उससे बहस मत क जए — एक स्पष्ट प्र त-उदाहरण
खो जए। यहाँ अकेला मृदूतक ही इस कथन को असत्य सद्ध करने के लए पयाप्त है।
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प रयोजना
प रयोजना काय
प्र.1 कसी च कत्सक के पास जाइए और पता क जए क स्नायु वदारण (ligament rupture), उपा स्थ वदारण
(cartilage rupture) और अ स्थ भंग (fracture of bone) म क्या होता है। हम अपनी जीवनशैली म
प रवतन करके और पोषण संतुलन बनाकर इस जो खम को कैसे कम कर सकते ह?
कैसे क जए: ल खत प्रश्न क सूची साथ ले जाइए, च कत्सक के उत्तर अपने शब्द म नोट क जए, और कशोर म सामान्यतः
दखने वाली एक-एक चोट का उदाहरण पू छए। स म्म लत ऊतक, लक्षण, सामान्य उपचार और स्वस्थ होने म लगने वाला समय
अ भले खत क जए।
नमूना उत्तर:
चोट स म्म लत ऊतक क्या होता है उपचार धीमा या तेज क्य
स्नायु स्नायु — अ स्थ से अ स्थ सुदृढ़ प फट जाती है, सं ध अपनी स्थरता स्नायु म रक्त क आपू त अल्प होती है,
िवदारण खो दे ती है और सुर क्षत सीमा से आगे चली अतः उपचार धीमा; अ धक फटने पर
जाती है; पीड़ा, सूजन और सं ध के लड़खड़ाने शल्य क्रया आवश्यक हो सकती है
का अनुभव
उपािस्थ उपा स्थ — अ स्थय के मृदु जेली जैसी आधात्री वाली ग फट जाती उपा स्थ म अपनी रक्त आपू त लगभग
िवदारण सर और कशेरुकाओं के है; अ स्थय के सरे परस्पर रगड़ते ह, ग त म नह होती, अतः उपचार बहुत धीमा और
बीच क ग पीड़ा और जकड़न होती है क्ष त प्रायः स्थायी
अिस्थ भंग अ स्थ — कै ल्सयम और अ स्थ चटक या टू ट जाती है; तीव्र पीड़ा, सूजन अ स्थ म रक्त क प्रचुर आपू त होती है,
फॉ ोरस यौ गक से और भार सहने म असमथता अतः जोड़ने के बाद वह अपेक्षाकृत अ
युक्त दृढ़ आधात्री तरह जुड़ जाती है — प्रायः 6 से 8 सप्ताह
म
जो खम कम करने के उपाय —
पोषण — अ स्थ क आधात्री के लए कै ल्सयम और फॉ ोरस (दूध, दही, रागी, तल, हरी पत्तेदार स ब्जयाँ), उस कै ल्सयम
के अवशोषण के लए धूप से वटा मन D, तथा पेशी एवं कंडरा-स्नायु के संयोजी ऊतक के लए प्रोट न।
नय मत व्यायाम — भार पड़ने पर अ स्थ अ धक आधात्री बनाती है, और सं ध के चार ओर क सुदृढ़ पे शयाँ स्नायुओं का
भार घटा दे ती ह।
खेल से पहले वाम-अप और खचाव; अ धकांश स्नायु वदारण ठं डी अवस्था म अचानक मुड़ने से होते ह।
बैठने, पढ़ने और भार उठाने म सही मुद्रा; भार सदै व घुटने मोड़कर उठाइए, कमर झुकाकर नह ।
योग — शोध दशाते ह क योग लचीलेपन, मुद्रा और श्वसन म सुधार करता है, तनाव कम करता है और जीवनशैली संबंधी रोग
को रोकने म सहायक है। प्रत्येक वष 21 जून को अंतरा ीय योग दवस मनाया जाता है।
उपयुक्त जूते, सुर क्षत खेल-मैदान और क ठन अभ्यास के बीच पयाप्त वश्राम।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक
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नम्न ल खत क्रयाकलाप को क जए — (i) अपने पैर को फश पर सपाट रखकर बै ठए। (ii) अपनी हाथ क
अँगु लय को टखने के पीछे एड़ी के ठ क ऊपर र खए ( चत्र 3.24)। (iii) अपने पैर क अँगeु लय
प्र.2
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. o कंडरा म ग त का अनुभव करगे। कंडराएँ बहुत अ धक खचाव सहनaकरने
cआप gl के लए बनी होती ह।
emशरीर म व भन्न सं धय के आस-पास स्थत अन्य कंडराओं का पता लगाइए।
करने पर
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चत्र 3.24, पृष्ठ 47 — पुनः बनाया गया रेखा चत्र: अँगु लयाँ टखने के पीछे , एड़ी के ठ क ऊपर रखी हुई।
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उत्तर .c a
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आप क्या अनुभव करगे: एड़ी के ठ क ऊपर त्वचा के नीचे एक मोट , कड़ी रस्सी-जैसी संरचना, जो पैर क अँगु लयाँ नीचे करने पर
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तन जाती है और सरक जाती है तथा अँगु लयाँ ऊपर उठाने पर ढ ली पड़ जाती है। यही वह कंडरा है जो आपक पडली क पेशी को
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एड़ी क अ स्थ से जोड़ती है।
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अपने शरीर म ढूँ ढ़ जा सकने वाली अन्य कंडराएँ —
कहाँ दबाइए aक्याglक जए कंडरा कसे जोड़ती है
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टखने के पीछे , एड़ी के ऊपर पैर क अँगु लयाँ नीचे-ऊपर क जए पडली क पेशी → एड़ी क अ स्थ
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अग्रबाहु क पे शयाँ → अँगु लय क अ स्थयाँ
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कलाई के िपछले भाग पर अँगु लयाँ सीधी क जए और मो ड़ए
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प्र तरोध के वरुद्ध कोहनी मो ड़ए शर पेशी → अग्रबाहु क अ स्थ
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जानुफ लक के ठीक नीचे बैठे-बैठे घुटना सीधा क जए जंघा क पेशी → पडली क अ स्थ
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घुटने के पीछे , दोनों ओर
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घुटना मो ड़ए
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कंडराएँ इतना बड़ा बल क्य सह लेती ह: कंडरा सघन संयोजी ऊतक है जसके सारे तंतु एक ही दशा म — ठ क
खचाव क दशा म — व्यव स्थत होते ह। बल क दशा म पं क्तबद्ध तंतु भार को समान रूप से बाँट लेते ह, और
रस्सी को मजबूत बनाने क व ध भी यही है। एड़ी क कंडरा को तो दौड़ते या कूदते समय हर बार आपके शरीर के
भार से कई गुना बल सहना पड़ता है, इसी लए वह शरीर क सबसे मोट कंडरा है।
स्वयं जाँ चए: ध्यान द जए क अँगु लय को चलाने वाली पेशी हाथ म नह , अग्रबाहु म है। भारी पेशी को दूर
रखकर उसका खचाव लंबी कंडराओं से पहुँचाना ही हाथ को इतना पतला बनाता है क वह सूक्ष्म काय कर सके —
लखना, वाद्य बजाना, नृत्य क हस्त-मुद्रा बनाना।
प्र.3 कसी भी शारी रक अभ्यास, जैसे — योग, कब ी आ द जससे आप प र चत ह , पर वचार क जए। यह अ स्थ
और माँसपेशी के स्वास्थ्य म कस प्रकार सहायक है?
कैसे उत्तर द जए: कोई एक अभ्यास चु नए जसे आप वास्तव म करते ह, उसम शरीर क्या करता है यह बताइए, और फर प्रत्येक
ग त को इस अध्याय के कसी ऊतक — अ स्थ, पेशी, कंडरा, स्नायु, उपा स्थ — से जो ड़ए।
नमूना उत्तर — कब ी। कब ी क एक रेड म तेज दौड़, अचानक रुकना, नीची बैठक, मुड़कर बचना और पकड़-छु ड़ाना — सब
स म्म लत है।
अ स्थ। दौड़ने और कूदने से टाँग क अ स्थय पर बार-बार भार पड़ता है। भार पड़ने पर अ स्थ अपनी कै ल्सयम-फॉ ोरस
युक्त आधात्री और अ धक नक्षे पत करती है, अतः अ स्थयाँ सघन और सुदृढ़ हो जाती ह।
पेशी। बार-बार होने वाला प्रबल संकुचन कंकाल पेशी के तंतुओं को मोटा करता है, अतः खलाड़ी अ धक बल उत्पन्न करता है
और दे र से थकता है।
सं धयाँ और स्नायु। नरंतर दशा-प रवतन घुटने और टखने के स्नायुओं तथा आस-पास क पे शय को सं ध थामे रखने का
अभ्यास कराता है, और यही मोच से सबसे अ सुरक्षा है।
उपा स्थ। ग त से सं ध के चार ओर का द्रव संच रत होता रहता है और उपा स्थ को पोषण मलता रहता है — उसक अपनी
रक्त आपू त तो होती ही नह ।
हृदय और फेफड़े। हृदय पेशी अ धक काय करती है और श्वास क दर बढ़ती है, जससे प्रत्येक ऊतक तक ऑक्सीजन क
आपू त सुधरती है।
नमूना उत्तर — योग। प्राचीन भारतीय ग्रंथ म व णत योग के अंतगत शारी रक आसन, श्वास और ध्यान स म्म लत ह। कसी आसन
को रोके रखने म पेशी बना ग त के संकु चत रहती है, जससे सहनश क्त बढ़ती है; खचाव धीरे-धीरे सं ध का प रसर बढ़ाते ह; भार-
वहन करने वाले आसन भुजाओं और मेरुदं ड क अ स्थय पर भार डालते ह; और श्वास-अभ्यास पसली पजर के प्रसार को सुधारते
ह, जो पस लय को उरो स्थ से जोड़ने वाली लचीली उपा स्थ के कारण ही संभव है। शोध दशाते ह क योग लचीलेपन, मुद्रा और
श्वसन म सुधार करता है, तनाव कम करता है और जीवनशैली संबंधी रोग को रोकने म सहायक है।
संकेत: आप जो भी अभ्यास चुन, उत्तर इस रूप म ल खए — “यह ग त → यह ऊतक → यह प रवतन”। यही
कसी वणन को वै ा नक व्याख्या बना दे ता है।
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प्र.4 कसी बागवानी क व ध, जैसे — छँ टाई, रोपण, सचाई या फसल चक्रण पर वचार क जए। प्रत्येक व ध
वभज्योतक , संवहन ऊतक या सहायक ऊतक जैसे पादप ऊतक के सुचारू रूप से काय करने म कस प्रकार
सहायक है?
प्रत्येक बागवानी व ध कसी न कसी वशेष ऊतक पर काय करती है। व ध को ऊतक से जोड़ते ही कारण स्पष्ट हो जाता है।
वध जस ऊतक पर कैसे सहायक है
काय करती है
छँटाई / बाड़ की शीषस्थ और अंतवशी प्ररोह का अग्रभाग हटने से शीषस्थ वभज्योतक नकल जाता है, अतः पवसं धय क
कटाई वभज्योतक क लकाएँ मुक्त होकर अनेक पाश्व शाखाएँ बनाती ह — पौधा घना होता है और अ धक
फूल दे ता है
तने की कलम पवसं ध का वभज्योतक केवल वही कलम पुनरुद्भवन करती है जसम क लकायुक्त पवसं ध हो — ठ क वही
ले ना प रणाम जो प्रश्न 10 म गन्ने के साथ मला
रोपण और स्कंध और कलम-भाग दोन कट सतह इस प्रकार मलाई जाती ह क उनक एधा परत स्पश कर; वभाजनशील
किलकायन का पाश्व वभज्योतक को शकाएँ जुड़ जाती ह और जाइलम तथा फ्लोएम सतत हो जाते ह, अतः जल और
(ग ािफ्टंग ) (एधा) भोजन जोड़ के आर-पार बहने लगते ह
िसंचाई जाइलम, मूलरोम और मृदा नम रहती है, अतः मूलरोम जल अवशो षत कर पाते ह; जाइलम म जल का अखंड
मृदूतक स्तंभ और मृदूतक क त बनी रहती है, जो कोमल तने को सीधा रखती है। अ धक
सचाई इसके वपरीत मृदा से वायु नकालकर जड़ का दम घ ट दे ती है
पलवार (मिल्चंग ) मूलरोम और बाह्यत्वचा मृदा से वाष्पन धीमा करती है, अतः अवशोषण नबाध चलता रहता है और पादप को रंध्र
बंद करने पर ववश नह होना पड़ता
फसल चक्रण सभी ऊतक — ख नज नाइ ोजन और अन्य ख नज पुनः लौटाते ह, जन्ह जाइलम को ऊपर पहुँचाना होता है।
और खाद दे ना आपू त के माध्यम से नाइ ोजन के बना पादप नई वभज्योतक को शकाओं के लए प्रोट न नह बना सकता;
कै ल्सयम के बना को शका भ त्त नह बना सकता
युवा पौधे को ेषोतक और दृढ़ोतक जब तक पौधे के अपने सहायक ऊतक वक सत हो रहे ह, तब तक सहारा उसे तेज हवा
सहारा दे ना म टू टने से बचाता है
सामान्य सूत्र: बागवानी वस्तुतः व्यावहा रक पादप शरीर-रचना है। इनम से प्रत्येक व ध या तो कसी वभज्योतक
क रक्षा करती है, या कसी संवहन ऊतक को अखंड और आपू तयुक्त रखती है, या कसी सहायक ऊतक का भार
घटाती है।
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प्र.5 प्रकृ त भ्रमण को एक शोध प रयोजना के रूप म रूपांत रत क जए। (i) व भन्न प्रकार क प त्तय का अवलोकन
क जए और मरुस्थल, अत्यंत नम या जलीय पयावास जैसे व भन्न वातावरण के लए उनके अनुकूलन का
अध्ययन क जए। (ii) व भन्न प्रकार के पादप क प त्तय के संबंध म उनके ान के लए समुदाय के कसी व रष्ठ
संसाधक से परामश क जए — जैसे जो प त्तयाँ लंबे समय तक ताजा रहती ह, जल का प्र तकषण करती ह या
क ट को दूर भगाती ह, उनके पारंप रक उपयोग , जैसे — पत्तल बनाना, ठं डी प (शीतलक) बनाना या क ट
प्र तकष के रूप म उपयोग इत्या द के वषय म पता लगाइए।
प रयोजना के रूप म कैसे क जए: अपने आस-पास भन्न- भन्न स्थ तय म उगे 8 – 10 पादप चु नए। प्रत्येक के लए पयावास
ल खए और पत्ती क मोटाई, स्पश, चमक (मोमीपन), रो मलता तथा यह क वह पतली और तैरती है या मोट और गूदेदार — सब
अ भले खत क जए। प्रत्येक क एक पत्ती दबाकर सुर क्षत र खए। तत्पश्चात कसी व रष्ठ व्य क्त से बातचीत क जए और अ भलेख
क जए क वह पत्ती पारंप रक रूप से कस काम आती है और क्य ।
नमूना उत्तर — भाग (i):
पयावास उदाहरण क्या दखाई दे ता है ऊतक-स्तरीय कारण
मरुस्थल / आक, नागफनी, मोट , गूदेदार अथवा काँट म प रव तत बाह्यत्वचा पर बहुत मोट उपत्वचा वाष्पन घटाती है;
शुष्क खेजड़ी, घृतकुमारी प त्तयाँ; चमक ली मोमी सतह; प्रायः गूदेदार पत्ती म जल सं चत करने वाला मृदूतक भरा
रोमयुक्त; रंध्र कम और ग म धँसे रहता है; रोम स्थर वायु रोककर जल-हा न धीमी करते
ह
अत्यंत नम / अरबी (कचालू), बड़ी, चौड़ी, पतली और कोमल प त्तयाँ पतली उपत्वचा और अनेक रंध्र तीव्र वाष्पोत्सजन दे ते
छायादार केला, फन ह; बड़ी सतह छत्र के नीचे उपलब्ध अल्प प्रकाश को
ग्रहण करती है
जलीय — कमल, जलकुंभी पत्ती जल पर तैरती है, ऊपरी सतह रंध्र केवल ऊपरी सतह पर; बड़ी वायु गु हकाओं वाला
तैर ती मोमी और जल-प्र तकष , वृंत स्पंजी वशेषीकृत मृदूतक उत्प्लावन दे ता है — पुस्तक तैरने
और हल्का क व्याख्या इसी प्रकार करती है
जलीय — हाइ ला, पतली, फ ते जैसी या बारीक उपत्वचा लगभग नह और प्रायः रंध्र भी नह , क्य क
जलमग्न वै लसने रया वभा जत प त्तयाँ; कोई मोमी चमक गैस और ख नज पूरी सतह से सीधे अवशो षत होते ह
नह (दे खए सो चए और बताइए प्र.2)
लवणीय / मग्रोव मोट , च मल, प्रायः चमकदार प त्तयाँ चार ओर जल होने पर भी मोट उपत्वचा जल-हा न
तटीय रोकती है, क्य क वह जल लवणीय है और उसका
अवशोषण क ठन है
नमूना उत्तर — भाग (ii), पारंप रक उपयोग: केले और पलाश क प त्तय से पत्तल बनाए जाते ह, क्य क वे बड़ी, जल-प्र तरोधी
ह और गम भोजन परोसने पर फटती नह ; केले क प त्तयाँ कई दन ताजा भी रहती ह। ज्वर म शीतलक प के लए केले और पान
क प त्तयाँ प्रयुक्त होती ह। संग्रहीत अनाज और वस्त्र म क ट भगाने के लए नीम और तुलसी क प त्तयाँ रखी जाती ह। त्वचा-
संक्रमण पर हल्द और नीम क प त्तयाँ लगाई जाती ह। अपने व रष्ठ से पू छए क वही पत्ती क्य — उत्तर प्रायः मोमी उपत्वचा, पत्ती
के आमाप और दृढ़ता, अथवा उसके मृदूतक म सं चत कसी रसायन म मलेगा।
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संकेत: स्थानीय नाम, य द मल सके तो वानस्प तक नाम, पयावास और उपयोग — सब अ भले खत क जए और
दबाई हुई पत्ती संलग्न क जए। इससे एक भ्रमण एक प्रले खत क्षेत्र-अध्ययन बन जाता है।
प्र.6 दे शभर म व भन्न आ दवासी जनजातीय समुदाय के व भन्न नृत्य रूप का अध्ययन क जए। प्रत्येक वद्याथ
कम-से-कम पाँच मुद्राएँ सीख और उनका अनुभव ली जए। इन मुद्राओं को प्रस्तुत करने म स म्म लत सं ध क
ग तय का अवलोकन क जए और तत्पश्चात सं ध क ग तय क अवधारणा पर एक नृत्य या नाटक तैयार
क जए। इसे वद्यालय के वा षकोत्सव म प्रस्तुत क जए ता क व भन्न कक्षाओं के छात्र इससे सीख सक।
कैसे तैयार क जए: कक्षा को समूह म बाँ टए, प्रत्येक समूह एक नृत्य रूप ले। पाँच मुद्राएँ सी खए, फर प्रत्येक मुद्रा के लए
ल खए क उसम कौन-सी सं धयाँ ग त करती ह और प्रत्येक कस प्रकार क सं ध है। उसी ता लका को प्रस्तु त क पटकथा बना
ली जए।
नमूना उत्तर — आरंभ करने योग्य ग त- व ेषण:
नृत्य व शष्ट मुद्रा स क्रय सं धयाँ सं ध का प्रकार
िबहू (असम) कमर से तेज झुकाव के साथ कूल्हे कूल्हा, कशेरुक दं ड कंदुक-ख ल्लका; कशेरुकाओं के बीच क
का शीघ्र संचालन उपा स्थ च क्रकाएँ झुकाव और मरोड़ दे ती ह
घूम र (राजस्थान) सर के ऊपर भुजाएँ घुमाते हुए कंधा, टखना, गदन कंदुक-ख ल्लका; कोर; धुराग्र
नरंतर चक्कर
संथाल / झूम र भुजाएँ जोड़कर पं क्त म बगल क कूल्हा, घुटना, कंधा कंदुक-ख ल्लका और कोर
(झारखंड) ओर कदम और शरीर का झूलना
भांग ड़ा (पंजाब) भुजाएँ ऊपर उछालते हुए ऊँची कूल्हा, घुटना, टखना, कंदुक-ख ल्लका; कोर — प्रश्न 4 वाली बैठक
छलाँग कंधा और धक्का
चेर ॉ / बाँस नत्ृ य ताल पर टकराते बाँस के बीच से टखना, घुटना, पैर क कोर — तीव्र, सट क, एक तल म
(िमजोरम) कदम अंदर-बाहर रखना अँगु लय क सं धयाँ
प्रस्तु त क एक व्यावहा रक पटकथा —
1. एक स्थर दृश्य से आरंभ; सूत्रधार चार प्रकार क सं धयाँ बताता है।
2. चार छोटे एकल — कंधे का झूला (कंदुक-ख ल्लका), कोहनी-घुटने का क्रम (कोर), सर घुमाने का क्रम (धुराग्र), और एक
वद्याथ सर पर हाथ रखकर बल्कुल स्थर (खोपड़ी क अचल सं धयाँ)।
3. सामू हक भाग, जसम प्रत्येक लोक नृत्य प्रस्तुत हो और साथ म तख्ती पर उसम प्रयुक्त सं धयाँ लखी ह ।
4. अंत म एक लघु दृश्य — पे शयाँ ख चती ह, कंडराएँ बल पहुँचाती ह, स्नायु अ स्थय को थामते ह और म स्तष्क संकेत भेजता है
— जसम वद्याथ प्रत्येक ऊतक क भू मका नभाएँ।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक
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संकेत: प्रत्येक तख्ती पर एक ही पं क्त र खए, हद और अंग्रेज़ी दोन म, ता क दशक म बैठे हर कक्षा के वद्याथ
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नृत्य दे खते हुए व ान भी समझ सक।
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खोज जारी है… — पृष्ठ 47
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खोज जारी है
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प्र.1 क्या पादप क भाँ त जंतु को शका से एक पूण जंतु प्राप्त करना संभव होगा? य द हाँ, तो इस वकास के क्या
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लाभ और चुनौ तयाँ ह गी?
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a को शका से पूरा गाजर का पादप बन जाता है।
आं शक रूप से हाँ — कतु कसी साधारण वभे दत काय को शका से उतनी सरलता से नह , जतनी सरलता से गाजर क फ्लोएम
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अभी क्या संभव है। जंतु क प्रत्येक को शका म समग्र आनुवं शक सूचना उसी प्रकार सुर क्षत है जैसे पादप को शका म। दो माग
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वद्यमान ह —
मूल (stem) को शकाएँ। अ स्थ म g a
l सी को शकाएँ आज भी वभा जत होकर अनेक प्रकार क को शकाएँ बना सकती
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ह। इसी कारण अ स्थ म ा प्रत्यारोपण ल्यूके मया और थैलेसी मया म काय करता है — प्रत्यारो पत मूल को शकाएँ रोगी का
रक्त पुनः बना दे ती ह।
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कद्रक का स्थानांतरण। य द कसी काय को शका का कद्रक ऐसी अंड को शका म रख दया जाए जसका अपना कद्रक हटा
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दया गया हो, तो अंड को शका का को शकाद्रव्य उस कद्रक को पुनः इस प्रकार क्रमबद्ध कर दे ता है क वह युग्मनज क भाँ त
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व्यवहार करने लगे। उससे एक पूण जंतु वक सत हो सकता है।
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agl लाभ, य द यह वश्वसनीय रूप से संभव हो जाए —
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क्ष तग्रस्त ऊतक और अंग उगाकर बदले जा सकगे — हृदयाघात के बाद हृद पेशी, घसी सं ध क उपा स्थ, जलने के बाद त्वचा।
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em वाले पशुधन का गुणन संभव होगा।
रोगी क अपनी को शकाओं से उगाया अंग शरीर ारा अस्वीकृत नह कया जाएगा।
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l पर संव धत मानव ऊतक पर कया जा सकेगा।
संकटग्रस्त जा तय का संरक्षण और उच्च उत्पादकता
नई औष धय का परीक्षण जंतुओंaकg े स्थान
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चुनौ तयाँ —
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जै वक। वभे दत जंतु को शकाएँ अपनी पूणशक्तता खो चुक ह; उन्ह पुनः क्रमबद्ध करना पड़ता है और यह प्र क्रया अकुशल है
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ag कसर का रूप ले सकता है।
.cआपू त पर नभर रहती है, जन्ह पात्र म दोहराया नह जा सकता। अ नयं त्रत वभाजन
तथा प्रायः वफल होती है। जंतु को शका म को शका भ त्त नह होती और वह पड़ोसी को शकाओं के सट क संकेत तथा रक्त
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व्यावहा रक। जंतु शरीर पादप क तुलना म कह अ धक ज टल है — अनेक अंग तंत्र को सही क्रम म वक सत होकर सही ढं ग
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से जुड़ना होता है।
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नै तक और सामा जक। सहम त, इस प्रकार उत्पन्न जंतुओं का कल्याण, व्यय, और ऐसे उपचार तक कसे पहुँच मलेगी —
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इन सब पर गंभीर प्रश्न उठते ह।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
पादप के लए यह सरल और जंतुओं के लए क ठन क्य है: पादप एक स्थान पर स्थर है और क्ष त से भाग
नह सकता, अतः वह आजीवन साधारण को शकाओं से भी अपना कोई भी भाग पुनः बनाने क क्षमता बनाए रखता
है। जंतु संकट से हटकर दूर जा सकता है, अतः वह इसके बदले आरंभ म ही नधा रत शरीर-योजना म नवेश करता
है। पूणशक्तता वही मूल्य है जो जंतु अपने सु न श्चत, अत्यंत संग ठत शरीर के बदले चुकाते ह — और उसे उलट
पाना ही वह सीमांत है जसक ओर यह प्रश्न आपको ले जा रहा है।
अध्याय — एक नज़र म
ऊतक समान संरचना वाली को शकाओं का वह समूह है जो एक व शष्ट प्रकाय के लए मलकर काय करता है। को शका →
ऊतक → अंग → अंग तंत्र → जीव। यही श्रम वभाजन बड़े शरीर क कायक्षमता बढ़ाता है।
पादप ऊतक या तो वभज्योतक होते ह (जो वभा जत होते रहते ह) या स्थायी (जो वभे दत हो चुके ह)। शीषस्थ
वभज्योतक लंबाई बढ़ाता है, पाश्व वभज्योतक प र ध बढ़ाता है और अंतवशी वभज्योतक काटने या चरने के बाद पुनःवृ द्ध
कराता है।
स्थायी ऊतक सरल (मृदूतक, ेषोतक, दृढ़ोतक — एक ही प्रकार क को शकाएँ) या ज टल (जाइलम और फ्लोएम —
अनेक प्रकार क को शकाएँ मलकर) होते ह। उपत्वचा, मूलरोम और रंध्र वाली बाह्यत्वचा सुरक्षात्मक ऊतक है।
पादप ऊतक तीन ऊतक तंत्र म संग ठत होते ह — त्वचीय, भरण और संवहन ऊतक तंत्र।
जंतु ऊतक मुख्यतः चार प्रकार के ह — उपकला, संयोजी, पेशीय और तं त्रका — और प्रत्येक म संरचना अपने प्रकाय के
अनुरूप ही होती है।
पेशी-कंकाल तंत्र ग त उत्पन्न करता है — पेशी संकु चत होती है, कंडरा उस बल को अ स्थ तक पहुँचाती है, स्नायु अ स्थ को
अ स्थ से बाँधे रखता है और सं ध का प्रकार (कंदुक-ख ल्लका, कोर, धुराग्र, अचल) तय करता है क कतनी ग त संभव है। यह
पूरा तंत्र तं त्रका तंत्र के नयंत्रण म काय करता है।
कुछ प रपक्व पादप को शकाएँ पूणशक्त होती ह — वे न वभे दत होकर, वभा जत होकर और पुनः वभे दत होकर एक पूण
पादप बना सकती ह। पादप ऊतक संवधन का यही आधार है।
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त्व रत पुनरावृ त्त
ऊतक वग मुख्य संरचनात्मक वशेष ता मु ख्य प्रकाय
वभज्योतक ऊतक पादप — छोट को शकाएँ, पतली भ त्त, सघन नरंतर को शका वभाजन — लंबाई म,
(शीषस्थ, पाश्व, िवभाजनशील को शकाद्रव्य, बड़ा सुस्पष्ट कद्रक, रसधा नयाँ प र ध म तथा काटने के बाद पुनःवृ द्ध
अंतवशी) अनुप स्थत, अंतःको शक य अवकाश नह
बाह्यत्वचा पादप — सरल चपट , आयताकार, संहत को शकाओं क एकल क्ष त, जल-हा न और सूक्ष्मजीव से सुरक्षा;
स्थायी परत; ऊपर क्यू टन क मोमी उपत्वचा मूलरोम जल अवशोषण करते ह; रंध्र गैसीय
(सुर क्षात्मक) व नमय और वाष्पोत्सजन कराते ह
मृदूतक पादप — सरल सजीव को शकाएँ, पतली भ त्त, वरल व्यवस्था, भोजन भंडारण; ह रत भाग म प्रकाश-
स्थायी अंतःको शक य अवकाश सं ेषण; वायु गु हकाएँ बनाकर जलीय
पादप को तैराना
ेषोतक पादप — सरल सजीव को शकाएँ, कोने पे क्टन से असमान रूप से लचीलेपन के साथ अवलंब — तने और
स्थायी स्थू लत प्रतान बना टू टे झुक जाते ह
दृढ़ोतक पादप — सरल ल ग्नन के नक्षेपण से मोट भ त्त; अ धकांश कठोरता और दृढ़ता — ना रयल का रेशा,
स्थायी को शकाएँ मृत अखरोट का छलका, बीजावरण, पण
शराएँ
जाइलम पादप — जिटल वा ह नकाएँ, वा हकाएँ और तंतु (मोट भ त्त वाले, जड़ से जल और ख नज का ऊपर क
स्थायी दृढ़ोतक य, मृत) + जाइलम मृदूतक (एकमात्र ओर प रवहन; पादप को दृढ़ता भी
सजीव घटक)
फ्लोएम पादप — जिटल छ द्रत भ त्तय से जुड़ी चालनी न लकाएँ, सहचर प त्तय से पादप के अन्य सभी भाग तक
स्थायी को शकाएँ, फ्लोएम मृदूतक, फ्लोएम तंतु; भोजन का प रवहन
अ धकांशतः सजीव
उपकला ऊतक जंत ु अत्यंत कम अंतराल वाली संहत को शकाएँ; चपट , आवरण और आस्तर — व नमय, सुरक्षा,
घनाकार, स्तंभाकार या पक्ष्माभयुक्त स्रवण, संवेदन, अवशोषण
रक्त जंत ु — संयोजी जलीय, जेली जैसी आधात्री (प्लाज्मा, कुल आयतन पोषक तत्व , गैस और हाम न का
का 55%) म तैरती को शकाएँ — RBC, WBC, प रवहन; रक्त का थक्का बनना; रक्षा
बबाणु
अ स्थ, उपा स्थ, जंत ु — संयोजी आधात्री म को शकाएँ — अ स्थ म कै ल्सयम- अ स्थ — दृढ़ता और सुरक्षा; उपा स्थ —
कंडरा, स्नायु फॉ ोरस युक्त दृढ़ आधात्री, उपा स्थ म मृदु जेली लचीलापन और आघात-अवशोषण; कंडरा
जैसी — पेशी से अ स्थ; स्नायु — अ स्थ से
अ स्थ
पेशीय ऊतक जंत ु कंकाल — लंबी, बेलनाकार, अशा खत, ऐ क ग त (कंकाल), धीमी अनै क
बहुकद्रक , रे खत; चकनी — तकुरूप, एकल ग त ( चकनी), अथक लयबद्ध स्पंदन
कद्रक, अरे खत; हृदय — शा खत, एकल कद्रक, (हृदय)
हल्क धा रयाँ
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कक्षा 9 व ान अध्याय 3 क्रयाशील ऊतक AglaSem · NCERT Solutions
ऊतक वग मुख्य संरचनात्मक वशेष ता मु ख्य प्रकाय
तं त्रका ऊतक जंत ु न्यूरॉन — कद्रक युक्त को शका-काय, द्रु मकाएँ, संदेश का ग्रहण, संसाधन और प्रेषण;
लंबा तं त्रकाक्ष और एक्सॉन ट मनल नयंत्रण एवं समन्वय
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