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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा9
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 11: जनन — जीवन क नरंतरता
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — अन्वेषण
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
208 – 227 25 66 हन्द
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · वज्ञान · अन्वे ष ण
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 11: जनन — जीवन क नरंतरता
प्रत्येक जीव क मृत्यु होती है, फर भी जीवन रुकता नह — क्य क हर जीव मरने से पहले अपने जैसे नए जीव उत्पन्न कर दे ता है। यह अध्याय इसी
एक वचार को दो भन्न माग से आगे बढ़ाता है — अल गक जनन, जो समसूत्री वभाजन पर चलता है और यथाथ प्र तयाँ बनाता है, तथा ल गक
जनन, जो अधसूत्री वभाजन और नषेचन पर चलता है और ऐसी संत त बनाता है जो जनक जैसी तो होती है पर उनके समरूप कभी नह होती।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
अन्वेषण (कक्षा 9) 208 – 227
खं ड प्रश्न
25 66
माध्यम
हन्द
चतन क जए — पृष्ठ 208
अध्याय का आरंभ
चतन क जए
प्र.1 एक कृषक फसल उत्पादन के लए अल गक या ल गक जनन व धय का चयन कस आधार पर करता है?
जब पौधा कसी चुने हुए जनक क यथाथ प्र त होना चा हए तब कृषक अल गक (का यक) व ध चुनता है, और जब उसे
ऐसा बीज चा हए जो सरलता से सं चत हो, सस्ते म ले जाया जा सके और लक्षण के नए संयोजन ले आए तब वह ल गक
(बीज) व ध चुनता है।
कृषक को चा हए… चुनी गई व ध फसल कारण
हर पौधा एक ही उत्तम काियक — कतन, गन्ने क कतन, आलू के कंद, केवल समसूत्री वभाजन होता है, अतः सारी
जनक के समरूप कलम बाँधना, परतन, केले के पादपक, कलमी आम संत त क्लोन होती है — वही मठास, वही
ऊतक संवधन और गुलाब, अदरक आकार, वही पकने का समय
ऐसी फसल िजसमें के वल काियक केला, बीजर हत अंगूर, गन्ना कोई दूसरा माग है ही नह — इन्ह बीज से
उपयोगी बीज बनते ही नही ं उगाया ही नह जा सकता
शीघ फसल काियक गन्ना, आलू कतन या कंद म पहले से पवसं धयाँ और
सं चत भोजन होता है, अतः बीज-अंकुरण
और नवो द क अवस्थाएँ छू ट जाती ह
सस्ता, संचय योग्य, ले लै ंिगक — बीज गे ँ, चावल, मक्का, सरस , बीज छोटे और सूखे होते ह; प्रत्येक बीज म
जाने में सरल रोपण-द व्य दाल लक्षण का नया संयोजन होता है, अतः श्रेष्ठ
और नई िकस्में पौध का चयन संभव है
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ऐसा क्य होता है: दोन माग म अंतर एक ही चरण का है। का यक प्रवधन म नया पौधा जनक क को शकाओं से
समसूत्री वभाजन ारा बनता है, अतः गुणसूत्र समूह बना कसी फेरबदल के प्र त ल पत होता है और संत त क्लोन
होती है। बीज बनने म जनक पहले अधसूत्री वभाजन ारा युग्मक बनाता है (गुणसूत्र के जोड़े स्वतंत्र रूप से पृथक
होते ह) और फर दो युग्मक यु ग्मत होते ह। यही फेरबदल कृषक को तब चा हए जब वह नई कस्म वक सत कर
रहा हो, और यही उसे तब नह चा हए जब वह पहले से सद्ध कस्म का प्रवधन कर रहा हो।
संकेत: क्लोन क यह सु वधा मुफ्त नह है। क्लोन के खेत म कोई आनुवं शक व भन्नता नह होती, अतः जो रोग
एक पौधे पर आक्रमण कर सकता है वह हर पौधे पर कर सकता है। इसी लए अध्याय वषाणु-मुक्त ऊतक संव धत
केले के पादपक क बात करता है और इसी लए समझदार कृषक एक से अ धक कस्म रखता है।
प्र.2 आपके वचार से अ धकांश ज टल संरचना वाले जंतु और पुष्पीपादप ल गक जनन क्य करते ह जब क यीस्ट
और हाइ ा जैसे अनेक सरल जीव मुख्यतः अल गक जनन करते ह?
ल गक जनन व भन्नता खरीदता है और अल गक जनन ग त। ज टल जीव के लए व भन्नता अ धक आवश्यक है, सरल
जीव के लए ग त।
ज टल जीव ल गक जनन क्य करते ह। आम का वृक्ष या हाथी वष जी वत रहता है, अपेक्षाकृत कम संत त उत्पन्न करता है और
बदलते हुए प रवेश का सामना करता है — नए पीड़क, नए रोग, बदलती वषा। ल गक जनन प्रत्येक संत त को लक्षण का नया
संयोजन दे ता है, अतः कसी न कसी संत त म वह संयोजन आ ही जाता है जो नई प र स्थ त सह ले।
n गुणसूत्र जोड़ ों से बनने वाले युग् मकों के पकार = 2n
मनुष्य में n = 23 → 223 = 8,388,608 पकार के युग् मक
युग् मनज के संयोजन = 223 × 223 = 246 ≈ 7.0 × 1013
लगभग सत्तर लाख करोड़ संभावनाएँ — और यह गणना उस अ त रक्त मश्रण के बना है जसका संकेत अध्याय दे ता है। यही
कारण है क एक ही माता- पता के दो बच्चे भी एक जैसे नह होते।
सरल जीव अल गक जनन क्य करते ह। गम शकरा वलयन म तैरता एक यीस्ट को शका या तालाब का हाइ ा छोटा है,
अल्पजीवी है और भोजन के बीच म ही बैठा है। वहाँ महत्त्व इस बात का है क भोजन समाप्त होने से पहले स्थान भर लया जाए।
मुकुलन म न साथी चा हए, न युग्मक, न दो को शकाओं का मलन — एक को शका बस समसूत्री वभाजन ारा वभा जत हो जाती
है। यीस्ट क को शका एक-दो घंटे म ही मुकुल नकाल दे ती है, अतः जब तक प र स्थ तयाँ अनुकूल ह तब तक जीव संख्या तीव्रता से
बढ़ती जाती है।
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ऐसा क्य होता है: साथी खोजने और युग्मक बनाने म समय और ऊजा लगती है, और कसी एक संत त तक जनक
के आधे ही जीन पहुँचते ह। अल गक जनन यह सब बचा लेता है। क मत यह है क सारी संत त समरूप होती है,
अतः एक प्र तकूल प रवतन पूरी जीव संख्या को प्रभा वत करता है। द घजीवी और धीमी ग त से जनन करने वाला
जीव यह जो खम नह उठा सकता; तीव्र ग त वाला उठा सकता है, क्य क उसक इतनी पी ढ़याँ बीतती ह क वह
अगले अनुकूल स्थान तक पहुँच ही जाएगा।
क्या आप जानते ह? यीस्ट और हाइ ा केवल अल गक नह ह। भोजन कम होने पर या जल ठं डा होने पर दोन
ल गक जनन पर आ जाते ह — ठ क उसी समय जब व भन्नता क क मत चुकाना साथक हो जाता है।
क्रयाकलाप 11.1 — पृष्ठ 209 – 210
आइए, अन्वेषण कर — 11.1.1 पौध का का यक प्रवधन कृ ष म कस प्रकार उपयोगी है?
क्रयाकलाप 11.1
प्र.1 खेत म कतन (Cutting) व ध का अवलोकन करते समय नम्न ल खत बदुओं पर ध्यान द जए। (i) क्या
माली, वैज्ञा नक अथवा बागवानी वशेषज्ञ कसी पौधे क अत्य धक बढ़ हुई शाखाओं को उसके वधनकाल के
अंत म काटते ह? ( व भन्न पौध के वधन-काल अलग होते ह।) (ii) इन्ह नए पौधे उगाने के उ े श्य से कसी पौधे
क कतन तैयार करते हुए दे खए। कतन क औसत लंबाई ल खए। (iii) कतन पर पवसं धय और पव क
संख्या ग नए।
(i) हाँ। माली अत्य धक बढ़ हुई शाखाओं क कटाई-छँ टाई वधनकाल के अंत म ही करते ह और उसी कट सामग्री से कतन तैयार
करते ह।
(ii) और (iii) — जो आप वास्तव म माप वही ल खए। प्ररोह क एक प्रारू पक कतन लगभग 15 – 20 cm लंबी होती है और
उस पर 3 – 5 पवसं धयाँ होती ह, अथात उनके बीच 2 – 4 पव।
पौधा वधनकाल कब समाप्त होता है कतन क लंबाई (CM) पवसं धयाँ पव
मनीप्लांट गम स्थान म वषभर 15 3 2
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ु ाब शीत ऋतु क पुष्पन-अव ध के बाद 20 4 3
गन्ना (से ट) कटाई के समय 30 3 2
वधनकाल के अंत म ही क्य : तब तक प्ररोह का बढ़ना पूरा हो चुका होता है और उसम भोजन सं चत हो चुका
होता है, और उसक क लकाएँ प रपक्व तो ह पर अभी प्रसुप्त ह। ऐसी कतन म जड़ बनने तक जी वत रहने का
पयाप्त भंडार होता है और वह उस भंडार को पहले नई प त्तयाँ बनाने म नह गँवाती। बीच वधनकाल म ली गई कतन
कोमल और जलयुक्त होती है और जड़ बनने से पहले ही मुरझा जाती है।
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पवसं धयाँ क्य गनी जाती ह: पवसं ध वह स्थान है जहाँ पत्ती और कक्षस्थ क लका जुड़ी होती है, और तने पर
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l पौधा नह बन सकती
केवल यही स्थान है जहाँ नई जड़ और नए प्ररोह बना सकने वाला ऊतक उप स्थत होता है। दो पवसं
पव म यह नह.coहोता। अतः जस कतन पर एक भी पवसं ध न हो वह चाहे कतनी भी लंबीgहो,
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तय करती है लंबाई नह , पवसं धय क संख्या।
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संकेत: कतन प्रातःकाल एकत्र क जए ( क्रयाकलाप का चरण 2)। उस समय दन भर के वाष्पोत्सजन से पहले तने
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म जल सबसे अ धक होता है, अतः कतन अ धकतम जल-भंडार के साथ आरंभ करती है।
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कतन को उनक लंबाई के लगभग आधे भाग तक खाद मली म
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क सतह से लगभग 45°– 60° के कोण पर
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अंत वष्ट क जए ( चत्र 11.2)। इनम नय मत रूप से पानी द जए और य द कोई प रवतन
उनकाoअवलोकन
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ितरछा कटा िसरा
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पवस ंिध
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चत्र 11.2, पृष्ठ 209 — पुनः च त्रत रेखा चत्र: खाद मली म म तरछा गड़ा हुआm .
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com gla दखाया गया है।
तने का कतन, जसक लगभग
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आधी लंबाई सतह के नीचे है। म को काटकर दबा हुआ भाग
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के ऊपर वाली पवसं धय से नए प्ररोह फूटतेgla
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लगभग दो से तीन सप्ताह म दबी हुई पवसं धय से जड़ नकलती ह और म
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ह। म म खाद इस लए मलाई जाती है क वह नमी रोके रखती है और म को इतना पोला रखती है क कोमल जड़ उसम बढ़
सक।
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कतन को सीधा गाड़ने के बजाय तरछा क्य लगाया जाता है: तरछ लगी कतन उतनी ही गहराई म तने का
अ धक लंबा भाग म के भीतर रखती है, अतः अ धक पवसं धयाँ नम म के संपक म रहती ह। य द कतन को
सतह से θ कोण पर गहराई h तक गाड़ा जाए तो दबी हुई लंबाई होगी
L = h ÷ sin θ
θ = 45° पर: L = h ÷ 0.707 = 1.41 h
θ = 60° पर: L = h ÷ 0.866 = 1.15 h
सीधा गाड़ ने पर (θ = 90°): L = h ÷ 1 = h
अथात 45° पर लगाने से उतनी ही गहराई म सीधा गाड़ने क तुलना म लगभग 40 प्र तशत अ धक तना म म रहता है — जड़
बनने वाले क्षेत्र म अ धक पवसं धयाँ, और वे पवसं धयाँ ठं डी अधोमृदा म जाने के बजाय म क गम, नम ऊपरी परत म ही रहती
ह।
नचली प त्तयाँ क्य हटाई जाती ह (चरण 3): प त्तयाँ वाष्पोत्सजन ारा जल खोती ह। जड़ बनने तक कतन के
पास उस जल को पूरा करने का कोई साधन नह होता, अतः उस पर लगी हर पत्ती एक रसाव है। नचली प त्तयाँ
हटाने से यह हा न घट जाती है; ऊपर क कुछ प त्तयाँ इस लए छोड़ी जाती ह क प्रकाश सं ेषण से जड़ क वृ द्ध
के लए शकरा मलती रहे। म म दबी प त्तयाँ सड़कर कवक को भी नमंत्रण दे त ।
स्वयं जाँ चए: मनीप्लांट क समान लंबाई वाली दो कतन लगाइए — एक पर सारी प त्तयाँ रहने द जए और दूसरी
पर केवल ऊपर क दो। दूसरी प्रायः पहले जड़ पकड़ती है — अथात इस अवस्था म सी मत करने वाला कारक
प त्तय क संख्या नह , जल क हा न है।
प्र.3 पौधे को नय मत रूप से जल द जए और पौधा ‘A’ के साथ-साथ पौधा ‘B’ क वृ द्ध का अवलोकन क जए।
[कलम बाँधना]
दो-तीन सप्ताह म कलम जुड़ जाती है और पौधा B के टु कड़े पर लगी क लकाएँ फूट पड़ती ह। इसके बाद प्ररोह, प त्तयाँ
और पुष्प सब पौधा B क कस्म के होते ह, जब क कलम के जोड़ से नीचे का पूरा भाग पौधा A ही रहता है। य द पौधा B
पीले गुलाब का था तो अब जंगली गुलाब क जड़ प्रणाली पर पीले गुलाब खलगे।
यह काय क्य करता है: पौधा B का टु कड़ा (सायन) एक का यक भाग है, अतः वह समसूत्री वभाजन से बढ़ता है
और पौधा B के प्रत्येक लक्षण को यथावत बनाए रखता है। उसक अपनी जड़ नह होत , इस लए उसे पौधा A
(मूलवृंत) से इस प्रकार जोड़ना पड़ता है क जल और ख नज ऊपर उसम जा सक और शकरा नीचे आ सके। यह
तभी होता है जब दोन टु कड़ का एधा (कै म्बयम) — छाल के ठ क नीचे क पतली वभाजनशील परत — आपस म
स्पश करे। दोन एधाओं से नई को शकाएँ बनकर मलती ह, कैलस बनाती ह और फर दारु तथा फ्लोएम जोड़ दे ती
ह, जससे दोन तने एक ही प रवहन तंत्र बन जाते ह।
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पौधा A क अन्य शाखाएँ क्य काट जाती ह (चरण 4): मूलवृंत पर छू ट हुई शाखा जड़ से आने वाले जल और भोजन के लए
स्पधा करती है, और पहले से स्था पत होने के कारण जीत जाती है। उन शाखाओं को हटा दे ने से पूरी आपू त सायन को मलती है।
जोड़ को क्य ढका जाता है (चरण 4): ताजा कटाव एक खुला घाव है। कपड़ा या रै पग फल्म उसे सूखने से बचाती है, कैलस
बनने तक दोन टु कड़ को दबाकर जोड़े रखती है, और घाव भरने तक क ट तथा कवक-बीजाणुओं को भीतर नह जाने दे ती।
संकेत: कलमी पौधा आनुवं शक रूप से दो पौधे ह जो एक होकर जी रहे ह। य द कभी कलम के जोड़ से नीचे कोई
प्ररोह फूटे तो वह जंगली मूलवृंत का है और उस पर मूलवृंत के ही पुष्प आएँगे, आपक चुनी कस्म के नह — उसे
दखते ही काट द जए।
प्र.4 इसम नय मत रूप से पानी द जए और म म दबी टहनी पर नई प त्तय क वृ द्ध को दे खए। 10 – 15 दन के
प ात म म दबी टहनी वाले भाग म जड़ वक सत हो जाएँगी। [परतन]
दबी हुई टहनी पर नई प त्तयाँ नकलती रहती ह और 10 – 15 दन के प ात दबे हुए भाग से जड़ बन जाती ह। जड़ जम
जाने पर टहनी को जनक पौधे से काट दया जाता है और वह एक स्वतंत्र पौधा बन जाती है — जनक वृक्ष का क्लोन।
परतन कतन से अ धक वश्वसनीय क्य है: कतन अलग होते ही अकेली पड़ जाती है — बना जड़ के उसे जल
खोजना पड़ता है। परतन वाली टहनी पूरे समय जनक से जुड़ी रहती है, अतः जनक क जड़ से जल और ख नज
तथा जनक क प त्तय से शकरा उसे मलती रहती है। वह मुरझा ही नह सकती। इसी लए जड़ बनने से पहले ही उस
पर नई प त्तयाँ नकलती रहती ह।
जड़ ठ क दबे हुए मोड़ पर ही क्य बनती ह: वहाँ दो बात एक साथ मलती ह। म अंधकार और स्थर नमी दे ती
है, जो जड़ के प्रारं भक बदुओं के बाहर नकलने के लए आवश्यक है। और मोड़ के कारण फ्लोएम म नीचे जाती
शकरा वहाँ धीमी पड़ जाती है, अतः तने के उस भाग म भोजन एकत्र हो जाता है जो जड़ बनाने म काम आता है।
जड़ वास्तव म वह दबी पवसं धय से नकलती ह।
यह भी क जए: न बू, अमरूद, चमेली, बोगनवे लया और अनार म परतन सरलता से हो जाता है। कोई पतली
लचीली टहनी चु नए, जस भाग को दबाना है वहाँ क थोड़ी छाल खुरच द जए (इससे शकरा का प्रवाह और धीमा
होता है), उसे म म दबाकर खूँट से रोक द जए और पानी दे ते र हए — और पंद्रह दन धैय र खए।
क्रयाकलाप 11.2 — पृष्ठ 211
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आइए, अन्वेषण कर — 11.1 अल गक जनन
क्रयाकलाप 11.2
प्र.1 क्या आपको चत्र 11.6 म दशाए अनुसार यीस्ट क जनक को शकाओं से नकलते हुए छोटे गोलाकार मुकुल
दखाई दे ते ह?
चत्र 11.6 — ‘यीस्ट म मुकुल’, पृष्ठ 211 — सूक्ष्मदश चत्र का पुनः च त्रत रेखा चत्र: संयुक्त सूक्ष्मदश से मश्रण क
एक बूँद म दखाई दे ती यीस्ट को शकाएँ।
हाँ। संयुक्त सूक्ष्मदश से अंडाकार यीस्ट को शकाएँ दखाई दे ती ह और उनम से अनेक के एक सरे पर एक छोटा गोल उभार जुड़ा
होता है — यही मुकुल है। कभी-कभी मुकुल पर भी मुकुल होता है, अतः दो, तीन या चार को शकाओं क छोट ंखलाएँ भी दखती
ह।
पयुक्त शक रा िवलयन = 10 mL में 1 g
= 100 mL में 10 g = 10% (w/v)
ली गई 20 mL में शक रा = (1 g ÷ 10 mL) × 20 mL = 2 g
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इस व्यवस्था म एक-दो घंटे म ही मुकुल क्य दखने लगते ह: यीस्ट को श्वसन के लए क्रयाधार, ऊष्मा और
समय चा हए। परखनली म दो ग्राम शकरा उस चुटक भर यीस्ट के उपयोग से कह अ धक है, अतः ऊजा सी मत
करने वाला कारक नह है। ऊष्मा श्वसन और को शका वभाजन चलाने वाले एंजाइम क ग त बढ़ा दे ती है। रुई क
डाट काबन डाइऑक्साइड को नकलने दे ती है पर अन्य सूक्ष्मजीव को भीतर नह आने दे ती, और परखनली को बना
छे ड़े रखने से को शकाएँ बना टू टे बैठ जाती ह और बढ़ती रहती ह।
संकेत: कवर स्लप के नीचे बूँद के कनारे पर दे खए, जहाँ को शकाएँ एक ही परत म फैली होती ह। बीच के भीड़ भरे
भाग म को शकाएँ एक-दूसरे पर पड़ी होती ह और मुकुल आसानी से छू ट जाते ह।
प्र.2 क्या इन लक्षण से यीस्ट के गु णत होने के संकेत मलते ह?
हाँ — यीस्ट संख्या म बढ़ रहा है और प्रत्येक मुकुल जनक को शका क आनुवं शक प्र त ल प है। परंतु ध्यान द जए क वह
कस प्रकार बढ़ रहा है — जनक दो बराबर भाग म नह बँटता। वह अपनी भ त्त पर कसी एक बदु से एक छोटा मुकुल नकालता
है।
क्रम इस प्रकार है —
1. जनक को शका का डीएनए प्र त ल पत होता है और उसका कद्रक समसूत्री वभाजन से वभा जत होता है।
2. को शका भ त्त पर एक छोटा उभार बनता है।
3. दोन समरूप कद्रक म से एक कुछ को शकाद्रव्य के साथ उस उभार म चला जाता है।
4. गदन पर भ त्त बन जाती है और मुकुल अलग हो जाता है। फर वह पूरे आकार तक बढ़कर स्वयं मुकुलन करने लगता है।
प्र तयाँ समरूप क्य होती ह: समसूत्री वभाजन प्रत्येक गुणसूत्र क एक बार प्र त ल प बनाता है और फर दोन
प्र तय को अलग-अलग कर दे ता है, अतः प्रत्येक संत त कद्रक को जनक जतने ही गुणसूत्र वही सूचना लए हुए
मलते ह। न अधसूत्री वभाजन है, न दूसरा जनक, अतः न कुछ फेरबदल होता है और न कुछ नया जुड़ता है।
इसी लए संत त क्लोन होती है।
संकेत: ‘ गु णत होना’ शब्द आनुवं शक प रणाम के लए ठ क है, आकृ त के लए नह । अमीबा लगभग बराबर दो
को शकाओं म बँटता है ( वखंडन); यीस्ट म बड़ी जनक को शका पर एक छोटा मुकुल बनता है (मुकुलन)। दोन
अल गक ह, दोन म समसूत्री वभाजन है, पर को शकाद्रव्य का बँटवारा एक म बराबर है और दूसरे म असमान।
प्र.3 ये अवलोकन यीस्ट म जनन को समझने म आपक कस प्रकार से सहायता करते ह?
ये आपके अपने सूक्ष्मदश के नीचे सीधे दखा दे ते ह क यीस्ट मुकुलन ारा अल गक जनन करता है — एक ही जनक से,
बना युग्मक के, बना साथी के, और बहुत तेजी से।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता
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एक जनक। हर मुकुल एक ही को शका से जुड़ा है। कह दो को शकाएँ यु ग्मत होती नह दख , अतः न युग्मक है और न
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नषेचन।
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आनुवं शक रूप से समरूप संत त। मुकुल जनक के ही पदाथ से समसूत्री वभाजन ारा बना है, अतः परखनली क सारी
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e के स क्रय होने के 1 – 2 घंटे म ही मुकुल दखने लगते ह। चूँ क हर नई को शका स्वयं मुकुलन कर सकती है,
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जीव संख्या क्लोन
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agइस लए जब तक शकरा और ऊष्मा ह तब तक को शकाओं क संख्या बहुत तेजी से चढ़ती है।
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प र स्थ तय का महत्त्व। जब तक परखनली गम नह हुई और शकरा उपलब्ध नह थी तब तक कुछ नह हुआ — अल गक
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जनन अनुकूल प रवेश म ही सबसे तेज होता है, ठ क जैसा अध्याय कहता है।
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ag है: यही मुकुलन आटे को फुलाता है और इडली-डोसा के घोल म शकरा
यह प्रयोगशाला के बाहर क्य काम आता
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का कण्वन करता है। श्वसन करती और बढ़ती यीस्ट से नकली काबन डाइऑक्साइड आटे म फँसकर उसे फुला दे ती
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है। गम रसोई म घोल जल्द फूलता है — उसी कारण से जस कारण आपक परखनली को गम रखना पड़ा।
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agl प्रश्न — पृष्ठ 211
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11.1 अल गक जनन
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प्र.1 क्या जीव म अल गक जनन क अन्य व धयाँ भी होती ह?
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हाँ। मुकुलन उनम से केवल एक है। इन सभी म मूल बात एक ही है — एक जनक और समसूत्री वभाजन — और अंतर
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केवल इतना है क जनक का शरीर कस प्रकार बाँटा जाता है।
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क्या होता है इस अध्याय म उ ल्ल खत जीव
जनक को शका लगभग बराबर दो संत त को शकाओं म बँट जाती है जीवाणु, अमीबा
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मुकु लन एक स्थान पर उभार बनता है, बढ़ता है और अलग हो जाता है यीस्ट, हाइडा
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थैली या पु टका पर लाख हल्के बीजाणु बनकर वायु म मुक्त होते ह राइजोपस, ऐस्पिजलस तथा अन्य कवक
पुराने पौधे के तने, पत्ती या भू मगत भाग से नया पौधा बनता है
comप्लांट, गन्ना, बायोिफलम
आलू, अदरक, मनी
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काियक पवधन
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m होता। गुणसूत्र क संख्या न कभी आधी होती है और न पुनः पूरी — वह हर वभाजन म वैसी ही बनी रहती है,
इन सबको अल गक क्य कहते ह: इनम से कसी म भी युग्मक नह बनता और दो को शकाओं का युग्मन नह
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क्य क समसूत्री वभाजन प्रत्येक संत त को शका को जनक जैसा ही समूह दे ता है। इसी लए हर उत्पाद क्लोन होता
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 आपने पढ़ा है क खाद्य पदाथ, जैसे — फल, सूक्ष्मजीव (कवक) ारा सड़ा दए जाते ह। ये सूक्ष्मजीव कहाँ पाए
जाते ह?
लगभग सब जगह — जहाँ भी नमी, ऊष्मा और कोई काब नक पदाथ हो। अध्याय स्वयं इनम से कई स्थान क ओर संकेत
करता है।
वायु म। बीजाणु वायु-धाराओं पर तैरते रहते ह। क्रयाकलाप 11.3 म आपक ब्रेड पर फफूँद इसी ोत से आई।
खुले रखे पके भोजन पर। गम मौसम म रसोई क स्लैब पर एक दन छोड़ दे ना पयाप्त है — गंध आने लगती है और रोएँदार
धब्बे दखने लगते ह।
नम द वार पर। वषा ऋतु म दखने वाले काले धब्बे कवक क कॉलो नयाँ ही ह।
म और खाद के ढे र म। वहाँ कवक सूखे पत्ते, पुआल और गोबर का अपघटन करते ह — खाद इसी प्रकार बनती है।
सड़े फल और स ब्जय पर, पुराने चमड़े और नम कपड़ पर, तथा हमारी त्वचा पर और आँत के भीतर भी।
ये इतनी जगह क्य मलते ह: बीजाणु हल्का और प्रायः एकको शक य होता है, अतः मंद वायु-धारा भी उसे उठा ले
जाती है। एक ही फफूँद कॉलोनी से लाख बीजाणु मुक्त होते ह, इस लए कसी भी बसे हुए स्थान क वायु म कुछ न
कुछ बीजाणु सदै व रहते ह। यात्रा के दौरान उन्ह स क्रय रहने क आवश्यकता भी नह — बीजाणु सूखा और प्रसुप्त
पड़ा प्रतीक्षा कर सकता है और तभी अंकु रत होता है जब वह कसी नम और पोषक स्थान पर उतरे।
प्र.3 ये सूक्ष्मजीव कहाँ से आते ह?
अन्य जी वत सूक्ष्मजीव से — उन बीजाणुओं और को शकाओं से जो पहले से ही वायु, धूल, जल या सतह पर उप स्थत
थे। ये नज व भोजन से स्वयं कभी उत्पन्न नह होते।
हम इसके प्र त न त क्य ह: लंबे समय तक लोग स्वतः जनन म वश्वास करते थे — क माँस से क ड़े और ब्रेड
से फफूँद अपने आप उत्पन्न हो जाती है। लुई पाश्चर ने प्रयोग ारा यह प्रश्न सुलझा दया। उन्ह ने दखाया क य द
वायु के सूक्ष्मजीव को दूर रखा जाए तो पोषक शोरबा अ न श्चत काल तक स्वच्छ बना रहता है और जैसे ही उन्ह
प्रवेश दया जाता है वह तुरंत धुँधला पड़ जाता है। अथात नव जीवन सदै व पहले से वद्यमान जीवन से ही उत्पन्न होता
है। इसी से उनका रोग का रोगाणु सद्धांत आया — क वशेष रोग वशेष सूक्ष्मजीव से होते ह — और को शका
सद्धांत को पु ष्ट मली क सभी को शकाएँ पहले से वद्यमान को शकाओं से ही बनती ह।
दै नक जीवन म इसका प रणाम: य द सूक्ष्मजीव सदै व बाहर से आते ह तो उन्ह बाहर रोकना या पहले से उप स्थत को नष्ट करना
भोजन को सुर क्षत रखेगा और संक्रमण रोकेगा। इसी लए हम जल उबालते ह, प्रेशर कुकर म पकाते ह और शल्य उपकरण का
नजम करण करते ह, और इसी लए च कत्सालय म नजम कृत प पर आग्रह कया जाता है।
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संकेत: ध्यान द जए क क्रयाकलाप 11.3 इसी वचार पर कतनी सावधानी से बना है। रुई और टशू पेपर को
पहले से उबाले गए जल से नम कया जाता है, अतः उस जल म कोई जी वत सूक्ष्मजीव नह होता। इसके बाद ब्रेड
पर जो भी फफूँद उगेगी वह केवल वायु से ही आ सकती है — यह क्रयाकलाप आपका अपना छोटा-सा पाश्चर प्रयोग
है।
क्रयाकलाप 11.3 — पृष्ठ 211 – 212
आइए, प्रयोग कर — 11.1 अल गक जनन
क्रयाकलाप 11.3
प्र.1 तीन दन के प ात आवधक लस का प्रयोग करके ेड अथवा रोट क सतह का ध्यानपूवक अवलोकन क जए।
क्या आपको इस पर कवक (फफूँद) क वृ द्ध दखाई दे ती है?
हाँ। तीसरे दन तक सतह पर रुई जैसे सफेद या धूसर तंतु दखते ह और उन पर छोटे -छोटे गहरे रंग के पन- सर — राइजोपस म
काले, ऐस्प जलस म हरे-काले। दन बीतने के साथ धब्बा फैलता और गहराता जाता है।
नमीयुक्त कक्ष इसी प्रकार क्य बनाया जाता है: कवक के बीजाणुओं को तीन चीज एक साथ चा हए और यह
कक्ष तीन दे ता है।
नमी — गीली रुई और टशू पेपर से। सूखा बीजाणु अंकु रत नह हो सकता; इसी लए ब्रेड सूखने लगे तो जल
क कुछ बूँद डालनी होती ह।
ऊष्मा, 25 – 35 °C — वह ताप जस पर कवक के एंजाइम सबसे तेज काम करते ह। इससे नीचे बीजाणु धीरे
अंकु रत होते ह या होते ही नह , और इसी लए हम वकारीय भोजन का प्रशीतन करते ह।
पोषक तत्व — ब्रेड या रोट का मंड, जसे कवक तंतु पचाकर अवशो षत करते ह।
कक्ष को अँधेरे म और सीधी धूप से दूर इस लए रखा जाता है क धूप ब्रेड को सुखा दे ती है और उसम उप स्थत
पराबगनी व करण बीजाणुओं को क्ष त पहुँचाता है।
स्वयं जाँ चए: ठ क वैसा ही एक और नमीयुक्त कक्ष बनाकर प्रशी तत्र म रख द जए। तीन दन बाद उस पर फफूँद
नाममात्र क होगी जब क गम वाला ढका हुआ होगा। वही ब्रेड, वही जल, वायु म वही बीजाणु — केवल ताप भन्न है,
अतः अंतर ताप के कारण ही है। यह अकेली तुलना एक उ चत परीक्षण है।
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प्र.2 फफूँद को सूक्ष्मदश से दे खए और अपने अवलोकन के आधार पर उसका चत्र बनाइए। आपने जो चत्र बनाया
है उसक तुलना चत्र 11.8 से क जए और अपने अवलोकन को अपने सहपा ठय के साथ साझा क जए।
कोश बीजाणु
कवक तंत ु
(क) राइजोपस (ख) ऐस्पिजलस
चत्र 11.8 — ‘कवक’, पृष्ठ 212 — पुनः च त्रत रेखा चत्र: (क) राइजोपस, जस पर पुस्तक के अनुसार कोश, बीजाणु
और कवक तंतु अं कत ह; (ख) ऐस्प जलस, जसक लंबी प य के सरे गहरे गोलाकार होते ह।
कॉटन ब्लू से अ भरं जत करने के बाद सूक्ष्मदश म शा खत, धागे जैसे तंतुओं क एक चटाई दखती है जससे सीधी
डं डयाँ उठती ह और प्रत्येक डंडी के सरे पर गहरे रंग के बीजाणुओं से भरी एक गोल संरचना होती है। जो आपने बनाया है
उसे चत्र 11.8 से मलाइए।
लक्षण राइजोपस — चत्र 11.8 (क) ऐस्प जलस — चत्र 11.8 (ख)
काय ब्रेड पर फैले रंगहीन शा खत कवक तंतुओं का शा खत कवक तंतुओं का जाल
जाल
बीजाणध
ु र सीधी डंडी के िसरे पर एक बंद गोल थैल ी लंबी डंडी के िसरे पर एक फू ली हुई पुिटका, िजससे बीजाणुओं की
संर चना (बीजाणुध ानी) शंखृ लाएँ िनकलती है ं
बीजाण ु थैली के भीतर भरे छोटे गोल बीजाणु; थैली पु टका के बाहर ंखलाओं म लगे छोटे गोल बीजाणु
फटने पर मुक्त
धब्बे का रंग रुई जैसी सफेद चटाई पर काले पन- सर चूण जैसा, हरा-काला या पीला-हरा
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थैली (बीजाणुधानी) बीजाणुओ ं
भीतर बीजाणु ृ ला
की शंख
पुिटका
डंडी
कवक तंत ु
(क) राइजोपस (ख) ऐस्पिजलस
चत्र 11.8 के दोन कवक साथ-साथ। दोन अपने बीजाणुओं को सतह से ऊपर रखते ह, पर राइजोपस उन्ह बंद थैली म रखता है और
ऐस्प जलस फूली हुई पु टका पर खुली ंखलाओं म।
कॉटन ब्लू क्य डाला जाता है: कवक तंतु लगभग रंगहीन होते ह और उजले क्षेत्र म लगभग अदृश्य रहते ह। कॉटन
ब्लू एक अ भरंजक है जो कवक भ त्त के काइ टन से बँधकर उसे गहरा नीला कर दे ता है, जससे तंतुओं और
बीजाणुओं क रूपरेखा स्पष्ट उभर आती है।
बीजाणु-थै लयाँ डं डय पर ऊपर क्य उठ होती ह: ब्रेड पर पड़ा बीजाणु कह नह जाएगा। सतह से 1 – 2 mm
ऊपर उठा होने पर वह चलती वायु म होता है, अतः थैली फटते ही बीजाणु उड़ जाते ह — और ठ क इसी प्रकार यह
फफूँद आरंभ म आपक ब्रेड तक पहुँची थी।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 212
11.1 अल गक जनन
प्र.1 क्या आपको थैली नुमा गोलाकार सरे वाली धागे जैसी संरचनाएँ दखती ह? क्या आप थैली के अंदर छोट -छोट
गोलाकार संरचनाएँ (बीजाणु) भी दे ख पाते ह?
दोन का उत्तर हाँ है। धागे जैसी संरचनाएँ कवक तंतु ह, सीधे तंतु के सरे पर लगी गोल थैली बीजाणुधानी है और उसम भरी छोट
गोल रचनाएँ बीजाणु ह।
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संरचना कैसी दखती है क्या करती है
m l a sउत्eपाद अवशोिषत करते है ं
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कवक तंत ु ब्रेड पर और उसके भीतर फैले बेड पर एंजाइम ािवत करते है,ं मंड को पचाते है ं और
se m — कवक इसी पकार भोजन ले ता है
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aसीधी डंडी चटाई से ऊपर उठा हुआ एक तंतु थैल ी को सतह से ऊपर उठाकर चलती वायु में ले जाती है
बीजाणुओm
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ं को तैयार होने तक घे रे और सुरिक्षत रखती है
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थैल ी गोल, गहरे रंग क , पन के सर
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(बीजाणध
ु ानी) जतनी
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बीजाण ु
को शका
ag पकीणन और जनन — पत्येक अंकुिरत होकर पूरी नई फफूँ द बन सकता है
छोट गोल रचनाएँ, प्रायः एक-एक
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यह अल गक जनन क्य है: बीजाणु अकेली जनक फफूँद से समसूत्री वभाजन ारा बनताeहैm
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gत्रl समूह होता है। एक जनक,
। वह युग्मक नह है,
कसी से.c युoग्मत नह होता, और उससे उगने वाली फफूँद म ठ क जनक जैसा ही गुणसू
emत्री वभाजन, समरूप संत त — यही अल गक जनन क प रभाषा है। a
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समसू
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comेड ताजी थी तब उस पर फफूँद नह थी।
आपके ेड के टु कड़े पर फफूँद कहाँ से आई?.जब agl
प्र.2
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कमरे क वायु म पहले से तैर रहे बीजाणुओं से। वे नम ेड पर आ बैठे, वहाँ उन्ह ऊष्मा और पोषक तत्व मले और वे
s e mअतः वायु ही एकमात्र संभव
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अंकु रत हो गए। डब्बे म ब्रेड, रुई, टशू और उबाले हुए जल के अ त रक्त कुछ भी नह डाला गया —
ोत है। om
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agl एक फफूँद कॉलोनी से बीजाणु ≈ लाखों
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पत्येक बीजाणु: पायः एककोिशकीय और हल्का
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→ साधारण वायु-धाराएँ ही उसे दू र-दू र तक ले जाती है ं
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वे पहले अदृश्य थे और फर अचानक स्पष्ट क्य हो गए: एक बीजाणु कुछ माइक्रोमीटर का होता है, आँख के
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लए बहुत छोटा। सूखा रहने तक वह प्रसुप्त पड़ा रहता है। जैसे ही वह कसी नम और पोषक स्थान पर उतरता है,
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.cदखता है वह एक बीजाणु नह , उससे बनी लाख को शकाओं क कॉलोनीaहैg— इसी लए वृ द्ध ‘अचानक’ प्रतीत
वह अंकु रत होकर एक तंतु नकालता है और वह तंतु बार-बार शा खत होता जाता है। तीन दन बाद जो आपको
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होती है।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता AglaSem · NCERT Solutions
क्या आप जानते ह? यही सड़े फल पर और खाद के ढे र म होता है, जैसा अध्याय बताता है। और यह मला-जुला
वरदान है — कवक हमारा भोजन खराब करते ह, पर बीजाणुओं पर आधा रत यही तीव्र वृ द्ध उन्ह काब नक
अप शष्ट और प्रदूषक का नम्नीकरण करने, औद्यो गक अप शष्ट से भारी धातुएँ हटाने और पे न स लन तथा
एमॉ क्स स लन जैसे प्र तजै वक दे ने योग्य बनाती है।
वज्ञान एवं समाज — पृष्ठ 212
कवक और समाज
वज्ञान एवं समाज
प्र.1 क्या आप कसी ऐसे कवक के वषय म जानते ह जो प्ला स्टक को नम्नीकृत कर सकता है?
हाँ — ऐसे कई कवक ज्ञात ह। इनम सबसे अ धक अध्ययन कए गए ह —
ऐस्प जलस ू बज सस — चत्र 11.8 वाले ऐस्प जलस का ही नकट संबंधी, जो 2017 म इस्लामाबाद के एक कूड़े के ढे र
से पृथक कया गया। यह पॉ लएस्टर पॉ लयूरेथेन पर उगता है और उसे कुछ ही सप्ताह म तोड़ दे ता है।
पेस्टे लो शयो प्सस माइक्रोस्पोरा — अमेजन के वषा वन म मला। यह पॉ लयूरेथेन को अपने एकमात्र भोजन के रूप म ले
सकता है, और आश्चय यह क ऑक्सीजन के बना भी — जो क कसी लड फल के भीतर क स्थ त है।
ऐस्प जलस फ्लेवस तथा कई पे न स लयम जा तयाँ — ये पॉ लथीन फल्म पर आक्रमण करती ह, यद्य प धीरे-धीरे।
कोई कवक ऐसा कर ही कैसे सकता है: कवक अपने शरीर के बाहर एंजाइम ा वत करके भोजन लेता है और
बनने वाले छोटे अणुओं को अवशो षत कर लेता है — ठ क वही जो कवक तंतुओं ने आपक ब्रेड के मंड के साथ
कया था। पॉ लयूरेथेन और पॉ लएस्टर जैसे प्ला स्टक लंबी ंखलाएँ ह जो एस्टर और यूरेथेन बंध से जुड़ी होती ह,
और रासाय नक दृ ष्ट से ये बंध प्राकृ तक बहुलक के बंध से बहुत भन्न नह ह। कवक के एंजाइम (एस्टरेज,
क्यू टनेज, लैकेज) इन बंध को काट दे ते ह और ंखला इतने छोटे टु कड़ म बँट जाती है क तंतु उन्ह भीतर ले सक।
प्ला स्टक सचमुच कवक का भोजन बन जाता है।
संकेत: इसे प्ला स्टक क समस्या का समाधान मत मा नए। यह कुछ प्ला स्टक पर काम करता है, सब पर नह ;
धीमा है; और नयं त्रत ऊष्मा तथा नमी चाहता है। प्ला स्टक का उपयोग घटाना, पुनः उपयोग करना और उसे अलग
करके एकत्र करना आज भी इस आशा से कह अ धक प्रभावी है क कोई कवक उसे खा लेगा।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 213
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11.2.1 ल गक जनन म अधसूत्री वभाजन कस प्रकार व भन्नताएँ उत्पन्न करता है?
प्र.1 युग्मक लक्षण के कतने संयोजन को वहन कर सकते ह?
बहुत बड़ी संख्या म — क्य क अधसूत्री वभाजन म प्रत्येक गुणसूत्र जोड़ा हर दूसरे जोड़े से स्वतंत्र रूप से पृथक होता है।
य द n जोड़े ह तो भन्न युग्मक क संख्या 2n होगी।
युग् मकों के पकार = 2n, जहाँ n = गुणसूत्र जोड़ ों की संख्या
n = 3 (िक्रयाकलाप 11.4) → 23 = 8
n = 23 (मानव) → 223 = 8,388,608 ≈ 84 लाख पकार के युग् मक
संभ व युग् मनज = 223 × 223 = 246 = 70,368,744,177,664 ≈ 7.0 × 1013
2 क घात क्य आती ह: एक बार म एक जोड़ा ली जए। युग्मक को उस जोड़े का या तो माता से आया गुणसूत्र
मलेगा या पता से आया — दो वकल्प। अगला जोड़ा इससे बलकुल स्वतंत्र रूप से तय होता है और दो वकल्प
और दे ता है, और इसी प्रकार आगे। तीन स्वतंत्र दो- वकल्प वाले चयन 2 × 2 × 2 = 8 प रणाम दे ते ह; तेईस चयन
223। और चूँ क युग्मनज म प्रत्येक जनक से एक युग्मक आता है, इस लए संख्याएँ फर गुणा हो जाती ह।
संकेत: ध्यान द जए क इसके लए कसी असामान्य घटना क आवश्यकता नह है — न कोई क्ष त, न कोई
दुघटना। सामान्य रूप से चलता हुआ अधसूत्री वभाजन ही यह सु न श्चत कर दे ता है क आपके दो युग्मक एक जैसे
होने क संभावना नगण्य है। इसी लए व भन्नता ल गक जनन क अंत न हत वशेषता है, कोई वरली घटना नह ।
क्रयाकलाप 11.4 — पृष्ठ 213
आइए, अन्वेषण कर — 11.2.1 ल गक जनन म अधसूत्री वभाजन कस प्रकार व भन्नताएँ उत्पन्न करता है?
क्रयाकलाप 11.4
प्र.1 मात्र इन तीन जोड़ी लक्षण से आप कतने संयोजन बना सकते ह?
आठ। तीन जोड़ म से एक-एक मनका नकाला जाता है और प्रत्येक जोड़ा दो वकल्प दे ता है।
संयोजन = 2 × 2 × 2 = 23 = 8
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क्र.सं. जोड़ी 1 (हरा) — बाल का रंग जोड़ी 2 (नीला) — बाल का प्रकार जोड़ी 3 (लाल) — आँख का रंग
1 हल्का हरा — सुनहरा हल्का नीला — सीधे हल्का लाल — भूरी
2 हल्का हरा — सुनहरा हल्का नीला — सीधे गहरा लाल — काली
3 हल्का हरा — सुनहरा गहरा नीला — घुँघराले हल्का लाल — भूरी
4 हल्का हरा — सुनहरा गहरा नीला — घुँघराले गहरा लाल — काली
5 गहरा हरा — काले हल्का नीला — सीधे हल्का लाल — भूरी
6 गहरा हरा — काले हल्का नीला — सीधे गहरा लाल — काली
7 गहरा हरा — काले गहरा नीला — घुँघराले हल्का लाल — भूरी
8 गहरा हरा — काले गहरा नीला — घुँघराले गहरा लाल — काली
सूची का संयोजन 1 वही है जो चत्र 11.9 म बना है — सुनहरे और सीधे बाल के साथ भूरी आँख।
मनके अधसूत्री वभाजन का सही नदश क्य ह: तीन जोड़े तीन भन्न गुणसूत्र पर ह, और अधसूत्री वभाजन म
जब गुणसूत्र जोड़े पं क्तबद्ध होते ह तो एक जोड़े का जस ओर होना अगले जोड़े क दशा को प्रभा वत नह करता।
प्रत्येक जोड़े से यादृ च्छक और स्वतंत्र रूप से एक मनका नकालना ठ क यही है। जोड़ का यह स्वतंत्र पृथक्करण ही
वह बात है जो अध्याय इन शब्द म कहता है — ‘प्रत्येक युग्मक के गुणसूत्र अलग हो जाते ह जससे प्रत्येक युग्मक
को प्रत्येक जोड़े से केवल एक गुणसूत्र प्राप्त होता है’।
प्र.2 कल्पना क जए क गुणसूत्र के 23 जोड़ के साथ कतने संयोजन संभव ह गे जनम से प्रत्येक अनेक लक्षण क
आनुवं शक जानकारी वहन करता है।
223 = 8,388,608 — अथात एक ही व्य क्त से लगभग 84 लाख भन्न युग्मक। और यह केवल एक जनक क गणना है।
माता से युग् मक = 223 = 8,388,608
िपता से युग् मक = 223 = 8,388,608
युग् मनज = 223 × 223 = 246
= 70,368,744,177,664 ≈ 7.0 × 1013 संयोजन
लगभग सत्तर लाख करोड़ — पृथ्वी क पूरी मानव जनसंख्या का लगभग दस हजार गुना। एक ही माता- पता के दो बच्च (समरूप
जुड़वाँ को छोड़कर) को गुणसूत्र का एक ही संयोजन मलने क प्रा यकता लगभग 1 म 7 × 1013 है।
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जा त के लए इसका महत्त्व: इनम से प्रत्येक संयोजन थोड़ा भन्न व्य क्त है। प र स्थ तयाँ बदलने पर इनम से कुछ
व्य क्त संयोगवश बेहतर सामना कर लेते ह — अध्याय के दो उदाहरण यही ह: कुछ लोग अ धक ऊँचाई पर
ऑक्सीजन के कम स्तर को सह लेते ह और कुछ वयस्क होकर भी दूध पचा लेते ह। व भन्नता प्र त ल प बनाने क
कोई त्रु ट नह है; वह वह कच्चा माल है जससे जा त प रवतन का सामना करती है और लंबे काल म जैव वकास
इसी से चलता है।
संकेत: वास्त वक संख्या इससे भी बड़ी है। अध्याय का यह नदश केवल पूरे गुणसूत्र के स्वतंत्र पृथक्करण को
गनता है। पृथक होने से पहले गुणसूत्र अपने सहभागी से टु कड़ का आदान-प्रदान भी करते ह, अतः वास्तव म भन्न
युग्मक क संख्या 223 से कह आगे है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 214
11.2.2 पुष्पी पादप म ल गक जनन
प्र.1 पुष्प भी पादप के स दय म वृ द्ध करते ह क्य क वे रंगीन और/अथवा सुगं धत होते ह। पुष्प क ये वशेषताएँ
जनन के लए कस प्रकार उपयोगी ह?
रंग और सुगंध सजावट नह , वज्ञापन ह। ये उन जंतुओं को बुलाते ह जो परागकण एक पुष्प से दूसरे तक ले जाते ह, और
उस ढु लाई के बना परागकण वह पड़ा रह जाता जहाँ बना था।
रंग दूर से दखाई दे ता है और मधुमक्खी, ततली या शकरखोरा को बता दे ता है क यहाँ भोजन है।
सुगंध वहाँ काम करती है जहाँ रंग नह कर सकता — रात म और घनी प त्तय के भीतर। गंध के अणु वायु के साथ चलते ह
और पतंगा उन्ह कई मीटर दूर से भी पहचान लेता है।
मकरंद दल के आधार पर पुरस्कार है। क ट मकरंद के लए आता है और शरीर पर परागकण चपकाकर जाता है।
पौधे को वाहक के लए क मत क्य चुकानी पड़ती है: पौधा स्थर है। उसके नर युग्मक परागकोश म रखे
परागकण के भीतर ह और मादा युग्मक अंडाशय के बीजांड म, प्रायः कसी दूसरे पौधे पर। परागकण को कोई न
कोई हलाकर ले जाएगा ही। या तो वायु यह काम नःशुल्क करे — और तब पौधे को प्र त पुष्प पाँच से दस लाख
परागकण बनाने पड़ते ह क्य क वायु क ढु लाई इतनी अपव्ययी है — या कोई जंतु यह काम सट कता से करे और
पौधा उसे मकरंद म भुगतान करे। रंग और सुगंध उसी सट कता क क मत ह।
संकेत: यह तक उलट दशा म भी चलता है। गे ँ, मक्का और चावल के पुष्प छोटे , हरे और गंधहीन होते ह —
क्य क उनका परागण वायु से होता है, अतः दल और मकरंद पर खच करने से उन्ह कुछ नह मलता।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता
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कुछ पादप पर पुष्प और उनक क लय का अन्वेषण क जए। अपने अवलोकन को अपनी नोटबुक म ल खए।
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क्या आप को दोन म पतले, चपटे , हरे आवरण और रंगीन प्रवध दखाई दे ते ह?
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हाँ — दोन कली म भी ह और खले पुष्प म भी, पर उनक व्यवस्था अलग होती है।
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भाग कली म
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पतला, चपटा, हरा आवरण —
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सबसे बाहर, बाक सब पर कसकर लपटा हुआ दलों के नीचे फै ला हुआ, िफर भी सबसे
बाहरी चक्र
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पूरी तरह फै ले औरcपoदिश
रंग ीन पवध — दल बाह्यदल के नीचे मुड़े और छपे हुए; प्रायः रंग क एक
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झलक भर दखती है
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l a seक्रम कभी क्य नह बदलता: पुष्प चक्र के एक समुच्चय के रूप म बनता है, एक के भीतर दूसरा — सबसे
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बाहर बाह्यदल, फर दल, फर पुंकेसर और बीच म स्त्रीकेसर। कली वही पुष्प है, बस चक्र के फैलने से पहले। अतः
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बाहर हरा आवरण और उसके नीचे छपा रंग — यही आपको हर उस कली म मलेगा जसे आप खोलगे।
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यह भी क जए: एक ही गुड़हल या गुg लlाब के पौधे पर व भन्न आयु क क लयाँ खोलकर एक पं क्त म र खए। दन
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क प्रतीक्षा कए बना ही आपको पुष्प के खलने का चरणबद्ध चत्र मल जाएगा।
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g े अन्य भाग क रक्षा करते ह?
प्र.3 .cक्या आप सोचते ह क बाह्यदल, कली अवस्था म तथा पुष्प के खलने परaउनक
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हाँ। बाह्यदल सबसे बाहरी चक्र ह और कली अवस्था म वे दल , पुंकेसर और स्त्रीकेसर को पूरी तरह घेरे रहते ह।
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सूखने से बचाव — भीतर के कोमल भाग तैयार होने तक धूप और वायु से सुर क्षत रहते ह।
वषा से बचाव — जल परागकोश के भीतर परागकण को झड़ने से पहले ही नष्ट कर दे ता।
क ट से बचाव — कली खुली होती तो कुतरने वाले क ट वक सत होते बीजांड तक पहुँच जाते।
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पुष्प के खलने के बाद भी अ धकांश पुष्प म बाह्यदल गरते नह । वे दल के नीचे बने रहते ह और पूरे पुष्प को वृंत पर थामे रखते ह,
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अथात नीचे से सहारा दे ते ह।
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sem बाह्यदल हरे और दल हरे क्य नह : बाह्यदल म पणह रत होता है और वे कुछ प्रकाश सं ेषण भी करते ह, जो
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ऐसे रक्षात्मक आवरण के लए उपयोगी है जसे दृढ़ और आत्म नभर होना है। दल म इसके स्थान पर दूसरे वणक
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होते ह, जनसे वे परागणका रय को दखते ह पर भोजन नह बना सकते। रंग का यह अंतर सीधे काय के अंतर से
नकलता है।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता AglaSem · NCERT Solutions
क्या आप जानते ह? टमाटर या बगन पर आज भी बाह्यदल हरी ‘टोपी’ के रूप म लगे दखते ह। फल पका हुआ
अंडाशय है, और कली क रक्षा करने वाले वही बाह्यदल अब भी उसके आधार पर जुड़े हुए ह।
प्र.4 क्या सभी पुष्प म ये दोन भाग होते ह? पुष्प के अन्य भाग कौन-कौन से ह?
नह , सभी पुष्प म दोन नह होते। एक संपूण पुष्प म चार भाग होते ह — बाह्यदल, दल, पुंकेसर और स्त्रीकेसर — पर अनेक
पुष्प म इनम से एक या अ धक अनुप स्थत होते ह।
गे ँ, मक्का और चावल जैसी घास म आकषक दल होते ही नह ; वायु-परा गत होने के कारण उनसे उन्ह कोई लाभ न मलता।
कुछ पुष्प म बाह्यदल और दल यु ग्मत होते ह, या एक जैसे दखते ह और अलग पहचाने नह जाते।
पपीते म नर पुष्प एक पेड़ पर और मादा पुष्प दूसरे पेड़ पर लगते ह — नर पुष्प म स्त्रीकेसर नह होता और मादा पुष्प म
पुंकेसर नह ।
अन्य दो भाग जननीय ह —
भाग उपभाग काय
पुंके सर — नर तंतु और परागकोश परागकोश परागकण बनाता है, िजनमें नर युग्मक होते है ं
भाग
स्त्रीकेसर — मादा व तकाग्र, व तका और वितकाग परागकण गहण करता है; वितका अंडाशय तक जाने वाली नली है; अंडाशय में
भाग अंडाशय बीजाडं होते है,ं पत्येक में एक अंडकोिशका
दल
परागकोश वितकाग
वितका
तंत ु
अंडाशय
बीजाड
ं
बाह्यदल
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता AglaSem · NCERT Solutions
चत्र 11.10 और चत्र 11.11 के अनुसार संपूण पुष्प के चार चक्र — सबसे बाहर बाह्यदल, फर दल, फर पुंकेसर (तंतु + परागकोश) और
बीच म स्त्रीकेसर (व तकाग्र, व तका, बीजांडयुक्त अंडाशय)।
क्रयाकलाप 11.5 — पृष्ठ 214 – 215
आइए, अन्वेषण कर — 11.2.2 पुष्पी पादप म ल गक जनन
क्रयाकलाप 11.5
प्र.1 आपने जो व भन्न पुष्प एक त्रत कए ह इनके व वध भाग क उप स्थ त को ता लका 11.1 म ल खए।
ता लका 11.1 — पुष्प के भाग के अध्ययन के लए अवलोकन ता लका
क्र.सं. पुष्प के व भन्न पुष्प म पुष्पीय भाग क अन्य पुष्पीय भाग के काय का
भाग उप स्थ त वशेषता(एँ) अनुमान लगाइए
क ख ग घ
1. बाह्यदल हाँ
2. दल हाँ
3. पुंकेसर नही ं
4. स्त्रीकेसर हाँ
बाहर से भीतर क ओर, एक-एक चक्र लेकर च लए और प्रत्येक भाग के आगे हाँ या नह ल खए। पुस्तक ने स्तंभ ‘क’ पहले
ही भर दया है — बाह्यदल हाँ, दल हाँ, पुंकेसर नह , स्त्रीकेसर हाँ — जससे तुरंत पता चलता है क पुष्प ‘क’ एक मादा
(स्त्रीकेसरी) पुष्प है, जैसे पपीते या क का मादा पुष्प।
क्र.सं. पुष्प के क (जैसा छपा है — मादा ख— ग— घ — मक्का का नर
भाग पुष्प) गुड़हल सरस पुष्प
1. बाह्यदल हाँ हाँ हाँ नह
2. दल हाँ हाँ हाँ नह
3. पुंकेसर नही ं हाँ हाँ हाँ
4. स्त्रीकेसर हाँ हाँ हाँ नह
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता AglaSem · NCERT Solutions
कसी पुष्प म कोई चक्र अनुप स्थत क्य हो सकता है: चार चक्र स्वतंत्र रूप से वक सत होते ह, अतः पौधा
कसी एक को छोड़ सकता है। जहाँ नर और मादा भाग अलग-अलग पुष्प म होते ह — जैसे मक्का, पपीता और
क म — वहाँ स्व-परागण असंभव या क ठन हो जाता है और पौधा पर-परागण क ओर, अथात अ धक व भन्नता
क ओर, धकेल दया जाता है। और जहाँ दल अनुप स्थत ह, जैसे घास म, वहाँ इसका कारण यह है क पुष्प वायु-
परा गत है और उसे दल क आवश्यकता ही नह ।
संकेत: ‘अन्य वशेषता(एँ)’ वाला स्तंभ भी अवश्य भ रए — व तकाग्र चप चपा है या पंखनुमा? दल जुड़कर नली
बने ह? परागकोश चू णल है? यही ववरण आपको अभ्यास प्रश्न 11 म परागण के माध्यम का अनुमान लगाने योग्य
बनाएँगे।
प्र.2 दृश्यमान वशेषताओं के आधार पर पुष्प के प्रत्येक भाग के काय का व ेषण क जए।
पुष्प के हर भाग क दखने वाली वशेषता उसके काय क ओर संकेत करती है। संरचना प ढ़ए, काय अपने आप नकलेगा।
भाग जो दखाई दे ता है जो काय नकाला जा सकता है
बाह्यदल हरा, पतला, चपटा, दृढ़; सबसे बाहर; कली को कली की रक्षा; हरा होने के कारण कु छ पकाश संश्ले षण भी
लपेटे हुए
दल रंगीन, बड़ा, प्रायः सुगं धत, आधार पर मकरंद परागणकािरयों को आकिषत करना और मकरंद से पुरस्कृत
करना
पुंके सर — तंत ु पतली डंडी जो परागकोश को बाहर और ऊपर परागकोश को वहाँ रखना जहाँ आने वाला कीट या वायु उस तक
थामे रखती है पहचु ँ े
पुंके सर — फूला हुआ, चू णल, पीला; चूण अंगुली पर लग परागकण बनाना, िजनमें नर युग्मक होते है ं
परागकोश जाता है
स्त्रीके सर — सबसे ऊपर; सपाट, चप चपा और/अथवा परागकण पकड़ ना और थामे रखना; िचपिचपाहट से परागकण
वितकाग पंखनुमा िटका रहता है
स्त्रीके सर — व तकाग्र को अंडाशय से जोड़ने वाली लंबी पतली वह माग िजससे होकर पराग निलका बीजाडं तक बढ़ ती है
वितका नली
स्त्रीके सर — फूला हुआ नचला भाग; काटने पर भीतर छोटे बीजाडं ों को रखना, िजनमें अंडकोिशकाएँ है;ं बाद में फल बनना
अंडाशय सफेद बीजांड
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता AglaSem · NCERT Solutions
व तकाग्र लंबी व तका के शीष पर क्य बैठा होता है: इसके दो कारण एक साथ ह। पुष्प से ऊपर उठा होने के
कारण आते हुए क ट या वायु के झ के से सबसे पहले उसी का स्पश होता है, अतः वह परागकण को कुशलता से
रोक लेता है। और व तका क लंबाई एक परीक्षा का काम करती है — केवल सही जा त का परागकण ही पूरी
व तका पार करके नीचे तक न लका बढ़ा पाता है, अतः अनुपयुक्त परागकण बीजांड तक कभी नह पहुँचता।
प्र.3 अंडाशय (स्त्रीकेसर) के फूले हुए नचले भाग क एक अनुप्रस्थ और एक अनुदैध्य काट का टए और वच्छे दन
सूक्ष्मदश से उसका अवलोकन क जए। सूक्ष्मदश ारा आप जन संरचनाओं को दे खते ह, उनका चत्र बनाइए।
दोन काट एक ही वस्तु को दो दशाओं से दखाती ह — एक खोखला कक्ष जसक भीतरी भ त्त से छोटे -छोटे सफेद
बीजांड छोट डं डय ारा जुड़े होते ह।
अनुदैध्य काट (L.S.) — व तकाग्र से नीचे अंडाशय तक का टए। दोन ओर अंडाशय भ त्त दखती है और भीतर बीजांड क
एक पं क्त खड़ी होती है, प्रत्येक अपनी छोट डंडी पर। गुड़हल या मटर म बीजांड एक के ऊपर एक पं क्तबद्ध रहते ह।
अनुप्रस्थ काट (T.S.) — अंडाशय को आर-पार का टए। अंडाशय का अनुप्रस्थ प रच्छे द दखता है जो पट ारा कक्ष म बँटा
होता है और प्रत्येक कक्ष म बीजांड होते ह। टमाटर के अंडाशय म दो से चार कक्ष दखते ह; सरस म दो; मटर क फली म एक।
अब उसी पौधे का फल भी क्य काटना चा हए: फल पका हुआ अंडाशय ही है और बीज पके हुए बीजांड। अतः
टमाटर के फल म जतने कक्ष ह और बीज जस प्रकार जुड़े ह, ठ क उतने ही कक्ष और वैसा ही जुड़ाव टमाटर के
अंडाशय म भी है — बस आकार बड़ा है। दोन क तुलना करना, जैसा अध्याय का प रयोजना काय कहता है, इसका
सीधा प्रमाण है क अंडाशय फल बनता है और बीजांड बीज।
संकेत: छोटे पुष्प का अंडाशय कुछ ही मलीमीटर का होता है। नया ब्लेड ली जए, आरी क तरह चलाने के बजाय
एक ही झटके म का टए, और दे खने से पहले काट पर जल क एक बूँद डाल द जए। फट -सूखी काट म कुछ दखाई
नह दे ता।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 215
11.2.2 पुष्पी पादप म ल गक जनन
प्र.1 क्या आप पुष्प के सबसे आकषक भाग — रंगीन दल के काय का अनुमान लगा सकते ह?
दल परागणकारी को आक षत करते ह। वे पुष्प को दूर से दखाई दे ने योग्य बनाते ह, और अनेक पुष्प म गंध ग्रं थयाँ भी उन्ह पर
होती ह और मकरंद उन्ह के आधार पर।
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पौधा दल पर इतना क्य खच करता है: पौधा चल नह सकता, अतः उसके परागकण को कसी दूसरे पुष्प के
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व तकाग्र तक पहुँचाया ही जाना है। वायु यह करेगी, पर अपव्ययी ढं ग से — वायु-परा गत घास कोe50
s m – 200 बीज
पाने के लए .प्रco
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glही प्रकार के पुष्प से
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emके दूसरे पुष्प पर उड़ता है, अतः उसके शरीर पर लगे परागकण के काम क जगह पहुँचने क संभावना
त पुष्प पाँच से दस लाख परागकण छोड़ने पड़ते ह। इसके वपरीत क ट एक
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gl होती है। क ट-परा गत सूरजमुखी को केवल 20,000 – 40,000 परागकण से 800 – 1,000 बीज मल
उसी प्रकार
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जाते ह। यही सट कता दल खरीदते ह।
दल और भी काम करते ह — वे क ट के लए उतरने का मंeचm
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agl तथा व तकाग्र क ओर ले जाते ह, और कुछ पौध म रात को बंद होकर भीतरी
बनाते ह, अनेक पर मकरंद- नदशक रेखाएँ या धब्बे होते ह जो
आगंतुक को मकरंद क ओर और साथ ही परागकोश
भाग क रक्षा करते ह।
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क्या आप जानते ह? मधुम क्खयाँ पराबगनी प्रकाश दे ख सकती ह, हम नह । अनेक पुष्प जो m .
ह, उन पर o s e हम सादे पीले दखते
a को दखाई दे ते ह।
mद के चार ओर पराबगनी म स्पष्ट नशाने जैसे चह्न बने होते ह जो मधुgमlक्खी
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प्र.2 आपने सीखा है क फल के नमाण के लए पुंकेसर से व तकाग्र तक परागकण का स्थानांतरण आवश्यक है।
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आप इसक जाँच कस प्रकार कर सकते ह?
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उत्तर a g
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ऐसे प्रयोग ारा जो परागकण को, या उसे ले जाने वाले आगंतुक को, हटा दे और फर दे खे क फल बनते ह या नह —
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ठ क वही जो क्रयाकलाप 11.6 मटर के पौधे पर करता है।
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इस अ भकल्प म तीन चाल ह —
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la 2. मलमल क थैली से ढ कए, जससे बाहर से भी परागकण न आ सके। पॉ लथीन के स्थान पर मलमल इस लए, क वायु और
1. पुंकेसर हटाइए ( वपुंसन) कुछ पुष्प से, जससे वह पुष्प अपना परागकण दे ही न सके।
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प्रकाश तो भीतर जाते रह — अन्यथा आप परागण क नह , दम घुटने क जाँच कर रहे होते।
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3. नयंत्रण र खए — एक पुष्प जसके पुंकेसर स हत उसे थैली से ढका गया हो और एक पुष्प जो पूरी तरह खुला छोड़ा गया हो।
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इनके बना आप यह बता ही नह सकते थे क फल न बनना परागकण क कमी से हुआ या थैली से।
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एक बार म केवल एक ही बात क्य बदली जाती है: उ चत परीक्षण के लए शेष सभी प र स्थ तयाँ — वही पौधा,
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पुष्प क वही अवस्था, वही जल, वही धूप, गनने का वही दन — सभी व धय म समान होनी चा हए। तभी फल-
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नमाण म आया अंतर केवल उसी एक कारक के कारण हो सकता है जसे आपने बदला था, अथात परागकण क
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उपलब्धता। यही तक अभ्यास प्रश्न 10 और 12 म फर आएगा।
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क्रयाकलाप 11.6 — पृष्ठ 215 – 216
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आइए, जाँच कर — 11.2.2 पुष्पी पादप म ल गक जनन
क्रयाकलाप 11.6
प्र.1 इनम से कन व धय म आप पाते ह क पुष्प फल म प रव तत हो गए ह?
एक को छोड़कर सभी व धय म फल बनते ह — केवल उस कली म नह जसके पुंकेसर हटाकर उसे थैली से ढक दया
गया था।
वध क्या परागकण व तकाग्र तक पहुँच सका? फल नमाण (हाँ/नह )
पुष्प की कली (थैल ी में, पुंके सर सिहत) हाँ — बंद कली के भीतर उसी का परागकण हाँ
पुंके सर िनकाली गई पुष्प कली (थैल ी में) नह — भीतर परागकण है ही नह और बाहर से आ नह सकता नही ं
पुंके सर िनकाला गया पुष्प (थैल ी में) हाँ — कली अवस्था म ही वह स्व-परा गत हो चुका था हाँ
पुष्प (थैल ी में, पुंके सर सिहत) हाँ — उसी का परागकण हाँ
पुष्प (थैल ी के िबना) हाँ — उसका अपना परागकण, और आगंतुक भी आ सकते थे हाँ
खुले पुष्प से पुंकेसर हटाना दे र से क्य होता है: मटर म दल मलकर एक बंद नौतल (क ल) बनाते ह और
परागकोश अपने परागकण सीधे व तकाग्र पर तभी झाड़ दे ते ह जब पुष्प अभी कली ही होता है। पुष्प के खलने तक
उसका परागण हो चुका होता है। इसी लए तीसरी व ध म भी फली बन जाती है। केवल कम वक सत कली म,
परागकोश खुलने से पहले, पुंकेसर हटाना सचमुच परागकण छ न लेता है — और केवल उसी व ध म फल नह
बनता। प रणाम का यह प्र तरूप संयोग नह है; यह इस बात क सीधी पहचान है क मटर का पुष्प स्व-परागण कैसे
करता है।
संकेत: इसी लए पादप प्रजनक नयं त्रत संकरण करते समय पुष्प का वपुंसन कली अवस्था म करते ह। पुष्प के
खलने क प्रतीक्षा क तो पौधा यह काम स्वयं कर चुका होगा।
प्र.2 इस क्रयाकलाप से हम क्या नष्कष नकाल सकते ह?
यही क फल बनने से पहले परागकोश से व तकाग्र तक परागकण का स्थानांतरण — परागण — आवश्यक है। परागकण
हटा द जए तो फल नह बनता; रहने द जए तो थैली म हो या खुला, फल बन जाता है।
उसी ता लका से दो और नष्कष नकलते ह —
थैली स्वयं फल बनने से नह रोकती। पुंकेसर स हत थैली म बँधे पुष्प म भी उतना ही अच्छा फल बना जतना खुले पुष्प म,
अतः वपुं सत कली म वफलता का कारण मलमल क थैली नह थी।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता AglaSem · NCERT Solutions
मटर सामान्यतः स्व-परा गत होता है और स्व-परागण कली अवस्था म ही हो जाता है। वपुं सत खुले पुष्प म फली बनने
का और कोई स्पष्टीकरण नह है।
केवल परागण पूरी कहानी क्य नह है: परागण तो केवल परागकण को व तकाग्र तक पहुँचाता है। फल वास्तव म
उसके बाद क घटनाओं से आरंभ होता है — परागकण अंकु रत होता है, व तका से होते हुए नीचे पराग न लका
बढ़ाता है, और नर युग्मक बीजांड म अंडको शका से यु ग्मत होता है। यही युग्मन नषेचन है। तभी अंडाशय बढ़कर
फल बनने लगता है और बीजांड बीज। परागण आवश्यक पहला चरण है, पूरी प्र क्रया नह ।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 216
11.2.3 पुष्प म परागण क प्र क्रया कस प्रकार होती है?
प्र.1 फल और बीज के नमाण के लए परागकण का व तकाग्र तक स्थानांतरण महत्त्वपूण है। प्रकृ त ने पौध को
परागण के लए व भन्न यु क्तयाँ प्रदान क ह। आपके वचार से य द परागण नह हो तो क्या होगा?
फल तक पहुँचने वाली पूरी ंखला अपनी पहली ही कड़ी पर रुक जाएगी। इसे क्रम से दे खए —
वितकाग पर परागकण नही ं → वितका में पराग निलका नही ं
→ नर युग् मक बीजांड तक कभी नही ं पहुँच ता
→ िनषेच न नही ं → युग् मनज नही ं → भू ण नही ं
→ बीजांड बीज नही ं बनते
→ अंडाशय बढ़ ता नही ं → फल नही ं
अपरा गत पुष्प बस मुरझाकर पौधे से गर जाता है।
एक पुष्प से आगे इसका अथ —
फसल के लए — न अनाज, न दाल, न फल। पौधा स्वस्थ दखे और खूब फूले, फर भी उपज शून्य।
अगली ऋतु के लए — बीज ही नह , अतः बोने को कुछ नह ।
उन सबके लए जो वे बीज और फल खाते ह — पक्षी, जंतु और मनुष्य वह भोजन खो दे ते ह।
जा त के लए — ल गक जनन से कोई नया जीव नह , अतः लक्षण के नए संयोजन नह और व भन्नता नह । जो पौधा
का यक रूप से फैल सकता है वह बचा रहेगा, पर केवल क्लोन के रूप म।
यह काल्प नक नह , वास्त वक समस्या क्य है: अभ्यास प्रश्न 12 ठ क यही घ टत होते हुए बताता है — नचले
हमालयी क्षेत्र म सेब क उपज इस लए घट रही है क प्राकृ तक परागणका रय क जनसंख्या गर गई है। पुष्प
खलते तो ह, पर उनम से बहुत कम परा गत होते ह, अतः बहुत कम म फल लगते ह। मधुमक्खी क कालोनी लाकर
यह टू ट कड़ी फर से जोड़ द जाती है।
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पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 217
11.2.4 परागण क यु क्तयाँ और जननीय सफलता
प्र.1 बीज नमाण के संबंध म वायु ारा परागण और क ट ारा परागण जैसी सामान्य प्राकृ तक यु क्तय क
अनुमा नत सफलता दर क्या है?
य द सफलता को ‘प्र त परागकण बने बीज’ से माप तो वायु-परागण क सफलता लगभग 6,000 परागकण म एक बार
होती है और क ट-परागण क लगभग 33 म एक बार — अथात प्र त परागकण क ट-परागण लगभग 180 गुना अ धक
कुशल है। ये आँकड़े सीधे ता लका 11.3 से नकलते ह।
सफलता दर = िनिमत बीज ÷ मुक्त परागकण
वायु (मक्का, गेहूँ): मध्य मान → परागकण = (5,00,000 + 10,00,000) ÷ 2 = 7,50,000; बीज = (50 +
200) ÷ 2 = 125
सफलता दर = 125 ÷ 7,50,000 = 1.7 × 10−4 = 0.017%, अथ त लगभग 6,000 परागकणों पर 1 बीज
कीट (सूरजमुखी): मध्य मान → परागकण = (20,000 + 40,000) ÷ 2 = 30,000; बीज = (800 + 1,000) ÷
2 = 900
सफलता दर = 900 ÷ 30,000 = 3.0 × 10−2 = 3.0%, अथ त लगभग 33 परागकणों पर 1 बीज
कु शलताओं का अनुपात = 3.0% ÷ 0.017% ≈ 180 गुन ा
वायु इतनी अपव्ययी क्य है: वायु को नह पता क वह कहाँ जा रही है। गे ँ के परागकोश से नकला परागकण
वह जाता है जहाँ हवा चलती है; उसके अपनी ही जा त के व तकाग्र पर उतरने क संभावना नगण्य है। इसके
वपरीत क ट एक ही प्रकार के पुष्प के बाद उसी प्रकार के दूसरे पुष्प पर जाता है, क्य क उसने सीख लया है क
मकरंद वह है — अतः उसके शरीर से लगा परागकण लगभग सही पते पर पहुँचता है। दल , सुगंध और मकरंद पर
खच करके पौधा यही सट कता खरीदता है।
क्रयाकलाप 11.7 — पृष्ठ 217
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता AglaSem · NCERT Solutions
आइए, पता लगाएँ — 11.2.4 परागण क यु क्तयाँ और जननीय सफलता
क्रयाकलाप 11.7
प्र.1 दोन यु क्तय क तुलना और व ेषण नम्न ल खत आधार पर क जए (ता लका 11.3) — • परागकण और
बीज का अनुपात • परागण और बीज नमाण क क्षमता
ता लका 11.3 — परागकण उत्पादन और बीज नमाण के आँकड़े
परागण यु क्त प्र त पुष्प मुक्त होने वाले परागकण क न मत बीज क अनुमा नत
अनुमा नत संख्या औसत संख्या
वायु-परािगत घास (जैसे — 5,00,000 – 10,00,000 50 – 200
म क्का, गेहू)ँ
कीट-परािगत पौधे (जैसे — 20,000 – 40,000 800 – 1,000
सूर जमुखी)
वायु-परा गत घास प्रत्येक बीज के लए लगभग 6,000 परागकण बनाती है; क ट-परा गत सूरजमुखी केवल 33। प्र त
परागकण क ट-परागण कह अ धक कुशल है, पर प्र त परागकण वायु-परागण कह अ धक सस्ता है।
परागण यु क्त प्र त पुष्प न मत परागकण : बीज अनुपात का 1,00,000
परागकण बीज (मध्य मान) प रसर परागकण पर बीज
वायु-परािगत घास 5,00,000 – 50 – 200 7,50,000 : 125 = 2,500 : 1 से लगभग 17
(मक्का, गेहू)ँ 10,00,000 6,000 : 1 20,000 : 1
कीट-परािगत पौधे 20,000 – 800 – 30,000 : 900 = 33 20 : 1 से 50 : 1 लगभग 3,000
(सूर जमुखी) 40,000 1,000 :1
वायु के िलए सव त्तम िस्थित = 5,00,000 ÷ 200 = 2,500 : 1 िनकृ ष्टतम = 10,00,000 ÷ 50 = 20,000 :
1
कीट के िलए सव त्तम = 20,000 ÷ 1,000 = 20 : 1 िनकृ ष्टतम = 40,000 ÷ 800 = 50 : 1
कु शलता का अनुपात = 6,000 ÷ 33 ≈ 180
तुलना का पाठ —
परागकण और बीज का अनुपात। वायु-परागण को प्रत्येक बीज के लए लगभग 180 गुना अ धक परागकण चा हए। वायु
क सव त्तम स्थ त (2,500 : 1) भी क ट क नकृष्टतम स्थ त (50 : 1) से पचास गुना खराब है।
परागण क क्षमता। वायु के लए बहुत कम — अ धकांश परागकण म , जल, प त्तय या गलत जा त पर गरते ह। क ट के
लए अ धक, क्य क परागणकारी एक ही प्रकार के पुष्प से उसी प्रकार के दूसरे पुष्प पर जाता है।
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता
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बीज नमाण क क्षमता। क ट-परा गत सूरजमुखी के एक ही पुष्पक्रम से 800 – 1,000 बीज बनते ह जब क घास से 50 –
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200, अतः वह अपने बीजांड का कह बड़ा भाग बीज म बदल पाता है।
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संरचनाएँ यु क्तय से क्य मेल खाती ह: वायु-परा गत घास के परागकण छोटे , हल्के, चकने और सूखे होते ह
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ताlक वे हवा म टके रह, और उसका व तकाग्र लंबा तथा पंखनुमा होता है जो वायुधारा के आर-पार जाल क तरह
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aकाम करता है। क ट-परा गत पुष्प के परागकण बड़े, चप चपे या काँटेदार होते ह जो शरीर से चपक जाएँ, और
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उसका छोटा चप चपा व तकाग्र केवल उतना ही रोके जतना क ट लाता है। हर अ भकल्प ठ क वही है जो उसक
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ढु लाई व्यवस्था माँगती है।
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प्र.2 स्पष्ट क जए क पुष्प ारा बहुत बड़ी संख्या म परागकण को उत्पन्न करना अब भी एक प्रभावी परागण यु क्त
क्य है।
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a क्य क पौधे के लए महत्त्व एक परागकण क सफलता दर का नह , अंत म बने बीज क संख्या का है — और अत्यंत
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छोट प्रा यकता को बहुत बड़ी संख्या से गुणा करने पर भी उपयोगी प रणाम मल जाता है।
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अपेिक्षत बीज = N × p (N = मुक्त परागकण, p = एक परागकण के अपनी जाित के वितकाग तक पहुँच ने की
पाियकता)
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गेहूँ के पुष्प के िलए: N = 7,50,000, p ≈ 1.7 × 10−4
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N × p = 7,50,000 × 1.7 × 10−4 ≈ 125 बीज
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agl पौधा p नह बढ़ा सकता क्य क वह वायु क दशा तय नह कर सकता। अतः वह N बढ़ा देता है। चार और कारण इस सौदे को
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समझदारी भरा बना दे ते ह —
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परागकण बनाना सस्ता है। वह सूक्ष्म, सूखा और हल्का होता है। दल, गंध ग्रं थयाँ और मकरंद प्र त पुष्प कुछ लाख परागकण
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से कह अ धक महँगे पड़ते ह — अतः घास परागकण पर खच करती है और सूरजमुखी व ापन पर, और दोन को बीज मल
जाते ह।
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कसी दूसरी जा त क आवश्यकता नह । वायु सब जगह और हर समय चलती है। क ट-परा गत पौधा तब वफल हो जाता है
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जब उसके परागणकारी लुप्त हो जाएँ — ठ क अभ्यास प्रश्न 12 वाले सेब के उद्यान क समस्या — जब क वायु-परा गत पौधे
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का वाहक कभी नह छू टता।
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.cपरागकण को अपनी जा त के व तकाग्र तक बहुत दूर जाना ही नह पड़ता। घनेaखेgत म p का प्रभावी मान अकेले खड़े पौधे क
इन पौध क खेती का ढं ग संभावना सुधार दे ता है। गे ँ, मक्का और चावल एक ही जा त के घने खेत म खड़े होते ह, अतः
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तुलना म कह बेहतर होता है।
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व तकाग्र पकड़ने के लए बना है। लंबा, पंखनुमा व तकाग्र चलती वायु के सामने बड़ा क्षेत्रफल प्रस्तुत करता है, जससे पकड़
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क प्रा यकता बना कसी को आक षत कए ही बढ़ जाती है।
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यहाँ ‘कुशल’ और ‘प्रभावी’ एक शब्द क्य नह ह: कुशलता पूछती है क खच क प्र त इकाई कतना मला;
प्रभा वता पूछती है क काम हुआ या नह । वायु-परागण प्र त परागकण अकुशल है और फर भी पूणतः प्रभावी है,
क्य क परागकण इतने सस्ते ह क कम प्रा यकता क भरपाई के लए आवश्यक संख्या म बनाए जा सकते ह। संसार
के अ धकांश लोग को भोजन दे ने वाली तीन फसल — गे ँ, मक्का और चावल — इसी यु क्त का उपयोग करती
ह।
सो चए और बताइए — पृष्ठ 217
11.2.5 नषेचन एवं बीज नमाण
सो चए और बताइए
प्र.1 गुड़हल (Hibiscus or China-rose) के एक पौधे म परागकण के व तकाग्र पर पहुँचने के प ात पराग न लका
व तका से होते हुए आगे बढ़ती है। इसके प ात कौन-सी प्र क्रया होने वाली है?
नषेचन। पराग न लका बीजांड क ओर बढ़ रही है, और जैसे ही उसके भीतर का नर युग्मक अंडको शका से यु ग्मत होगा, नषेचन
हो जाएगा और युग्मनज बन जाएगा।
परागण → वितकाग पर परागकण का अंकु रण → वितका से नीचे पराग निलका की वृिद्ध
→ निलका अंडाशय में पवेश करके बीजांड तक पहुँच ती है
→ नर युग् मक का अंडकोिशका से युग् मन = िनषेच न
→ युग् मनज → भू ण; बीजाड
ं → बीज; अंडाशय → फल
न लका क आवश्यकता ही क्य पड़ती है: नर युग्मक क कोई पूँछ नह होती और वह तैर नह सकता, जब क
अंडको शका अंडाशय क तली म बीजांड के भीतर बंद है — व तकाग्र से कई मलीमीटर नीचे। परागकण इसका
समाधान एक न लका उगाकर करता है, जो उसका ही जी वत वस्तार है और व तका के ऊतक से होती हुई नीचे
बढ़कर युग्मक को ठ क बीजांड तक पहुँचा दे ती है। पौधे म नर युग्मक यात्रा नह करता; न लका उसे ले जाती है।
संकेत: दोन शब्द अलग र खए। परागण केवल परागकोश से व तकाग्र तक परागकण का स्थानांतरण है। नषेचन
दो युग्मक का युग्मन है। परागण होकर भी नषेचन न हो, यह संभव है — जैसे तब जब परागकण गलत जा त का हो
और उस व तका म न लका न उगा सके।
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प्र.2 नीचे दए गए मदार (Calotropis) के बीज और डडे लयन के बीज के चत्र ( चत्र 11.16) दे खए। क्या आप
अनुमान लगा सकते ह क ये बीज कस प्रकार के बीज-प्रक णन के लए अनुकू लत ह?
(क) मदार के बीज (ख) डेड
ं ेिलयन के बीज
चत्र 11.16, पृष्ठ 217 — पुनः च त्रत रेखा चत्र: (क) फट हुई फली से नकलते मदार (Calotropis) के बीज, और
(ख) डंठल पर लगा डडे लयन का बीज-गुच्छ।
दोन वायु ारा प्रक णन के लए अनुकू लत ह। दे खए क चत्र 11.16 वास्तव म क्या दखाता है।
(क) मदार के बीज — चपटे भूरे बीज, प्रत्येक के एक सरे पर लंबे, महीन, रेशमी सफेद रोम का घना गुच्छा।
(ख) डडे लयन के बीज — पूरा गोलाकार सफेद सर; प्रत्येक बीज एक डंडी के नीचे लटका है जसका ऊपरी सरा पंखनुमा
रोम के छल्ले म खुलता है, मानो छोटा-सा पैराशूट हो। चत्र म कुछ बीज छू टकर उड़ते हुए भी दख रहे ह।
रोम बीज को यात्रा करने योग्य क्य बना दे ते ह: गरता हुआ बीज तब तक तेज होता जाता है जब तक वायु का
ऊपर क ओर लगने वाला घषण बल उसके भार के बराबर न हो जाए। उस स्थर चाल पर —
भार = घषण बल → mg = ½ ρ Cd A vt2
अतः vt = √(2mg ÷ ρ Cd A) → vt ∝ √(m / A)
रोम क्षेत्रफल A बहुत बढ़ा दे ते ह और द्रव्यमान m लगभग कुछ नह बढ़ाते। अतः सीमांत चाल vt तेजी से घट जाती है — डडे लयन
का बीज गरने के बजाय कुछ सट मीटर प्र त सेकंड क चाल से तैरता उतरता है। सेकंड के अंश के बजाय मनट तक हवा म रहने के
कारण मंद हवा भी उसे सैकड़ मीटर दूर ले जाती है।
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स्वयं जाँ चए: डडे लयन या मदार का एक बीज रोम स हत और दूसरा रोम तोड़कर एक ही ऊँचाई से गराइए।
रोमर हत बीज हर बार पहले नीचे पहुँचेगा — द्रव्यमान लगभग वही रहा, अतः अंतर क्षेत्रफल से ही आया।
क्या आप जानते ह? प्रक णन इस लए महत्त्वपूण है क जनक के ठ क नीचे अंकु रत होने वाला बीज प्रकाश, जल
और ख नज के लए जनक से ही स्पधा करेगा। वायु ारा प्रक णन, तथा जल और जंतुओं ारा प्रक णन, वे उपाय ह
जनसे पौधा अपनी संत त को ऐसी भू म पर भेजता है जस पर वह पहले से नह है।
प्र.3 एक कृषक मक्का क दो कस्म को एक-दूसरे के पास बोता है परंतु दे खता है क बीज तभी बनते ह जब एक
कस्म का परागकण दूसरी कस्म के व तकाग्र तक पहुँचता है। यह कस प्रकार का परागण है?
पर-परागण। परागकण एक पौधे के पुष्प के परागकोश से दूसरे पौधे के पुष्प के व तकाग्र तक जा रहा है, और वह भी उसी प्रकार के
पौधे का — यही अध्याय म द गई पर-परागण क प रभाषा है।
स्व-परागण — वही पुष्प या वही पौधा पर-परागण — दो िभन्न पौधे
एक पौधा िकस्म 1 िकस्म 2
परागकण दो पौधों के बीच जाता है
चत्र 11.13 के अनुसार स्व-परागण और पर-परागण। कृषक के खेत म परागकण को एक कस्म छोड़कर दूसरी कस्म के व तकाग्र पर
उतरना पड़ता है, अतः केवल दाईं ओर वाला माग ही बीज दे ता है।
बीज केवल इसी दशा म क्य बनते ह: कृषक का अवलोकन कहता है क उसी कस्म के व तकाग्र पर उतरा
परागकण कुछ नह बनाता। यह स्व-अयोग्यता (self-incompatibility) है — पौधा अपने ही परागकण को
पहचान लेता है और उसे व तका म न लका नह उगाने दे ता। केवल आनुवं शक रूप से भन्न पौधे का परागकण
स्वीकार होता है। प्रकृ त इस यु क्त का व्यापक उपयोग पर-परागण को बाध्य करने के लए करती है, क्य क पर-
परागण दो जनक के लक्षण मलाता है और इस प्रकार व भन्नता बनाता रहता है।
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संकेत: मक्का वैसे भी प्राकृ तक रूप से पर-परा गत है। उसके नर पुष्प पौधे के शीष पर लगे मंजरी (टै सल) म होते ह
और मादा पुष्प नीचे भु े म, जनक लंबी रेशमी व तकाएँ बाहर लटकती ह। मंजरी से झड़ा परागकण वायु से उड़ता है
और उसका बड़ा भाग पड़ोसी पौध क रेशमी व तकाओं पर उतरता है — इसी लए पास-पास बोई गई कृषक क
दोन कस्म एक-दूसरे का परागण कर दे ती ह।
सो चए और बताइए — पृष्ठ 218
11.3 जंतुओं म ल गक जनन
सो चए और बताइए
प्र.4 बाह्य नषेचन करने वाले जंतु सामान्यतः आंत रक नषेचन करने वाले जंतुओं क तुलना म अ धक अंडे क्य दे ते
ह?
क्य क बाह्य नषेचन म कसी एक अंडे के नषे चत होकर बड़े हो जाने क संभावना बहुत कम है, अतः अंड क संख्या
इतनी बड़ी होनी चा हए क उस कमी क भरपाई हो सके।
जीिवत बचने वाली अपेिक्षत संत ित = N × p
N = िदए गए अंडे, p = िकसी एक अंडे के िनषेिचत और जीिवत रहने की पाियकता
बाह्य (मेंढक): N = एक बार में 5,000 – 50,000, उत्तरजीिवता कम
आं त िरक (पक्षी): N = एक बार में 1 – 15, उत्तरजीिवता मध्यम से उच् च (तािलका 11.4)
बाह्य नषेचन म p को तीन अलग-अलग हा नयाँ नीचे ख च दे ती ह —
युग्मक खुले जल म मुक्त होते ह। नर से नकलते ही शुक्राणु तनु हो जाते ह और जल-धाराएँ शुक्राणुओं तथा अंड को एक-
दूसरे से दूर बहा ले जाती ह। अनेक अंड तक कोई शुक्राणु पहुँचता ही नह ।
अंडे असुर क्षत पड़े रहते ह। जैसा अध्याय कहता है, कई अंडे जल-धाराओं ारा नष्ट हो जाते ह अथवा अन्य जंतुओं ारा खा
लए जाते ह। उन्ह कोई आश्रय नह मलता।
संत त अकेली होती है। न कोई कवच, न गभाशय, न रखवाली करता जनक; ु टन के क्षण से ही लावा को अपना भोजन
स्वयं खोजना पड़ता है।
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माँ हर अंडे को अ धक क्य नह दे सकती: बजट न श्चत है। अध्याय इसे स्पष्ट कहता है — माँ का शरीर इतने
m a s emएक लावा बन
l शष्ट को खाकर बढ़े
अंड के लए पयाप्त मात्रा म पीतक नह दे सकता। अतः यु क्त यह है क पीतक उतना ही हो जससे
सके, जो ु .c o होकर बाहर नकले और फर सड़े खाद्य पदाथ तथा खाद जैसे काब नकagअप
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तe म रूपांत रत होकर वयस्क बने — जैसा चत्र 11.17 क ततली म और मढक म होता है। आंत रक
टत
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agनषेl चन इस चयन को उलट दे ता है: अंडे बहुत कम, पर प्रत्येक म या तो पयाप्त पीतक (सरीसृप और पक्षी म) या माँ
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के शरीर से सीधी आपू त (स्तनधारी म), जससे भली प्रकार वक सत बच्चा बने।
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संकेत: इसे एक ही रा श खच करने के दो ढं ग मा नए। बाह्य नषेचन करने वाले उसे अनेक सस्ते अंड पर लगाते ह;
आंत रक नषेचन करने वाले थोड़े महँगे अंड पर। कोई श्रेष्ठ नह है — प्रत्येक अपने पयावास के अनुकूल है।
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जंतुओं म कस नषेचन व ध म युग्मक अ धक सुर क्षत रहते ह?
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प्र.5
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a उत्तर
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आंत रक नषेचन म। युग्मक मादा के शरीर के भीतर मलते ह, जहाँ वे उन सभी संकट से बचे रहते ह जो खुले जल म उन्ह नष्ट कर
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दे ते ह।
युग्मक पर संकट बाह्य नषेचन ag
l a आंत रक नषेचन
m में पहचु ँ ाए जाते है ं
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नही ं — शुक्राणु सीधे मादा जनन माग
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बह जाना अ धक — धाराएँ शुक्राणु और अंडे को एक-दूसरे से
दूर ले जाती ह
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cओु oं काm l a
नही ं — शुaक्रgाणु सँकरे माग में सांद बने रहते है ं
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seतनुmकरण
शुक्राण बहुत अ धक — शुक्राणु जल के बड़े आयतन म फैल
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जाते ह
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बहुत कम — भूण माँ के भीतर या कवच के भीतर रहता है
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खा िलया जाना अ धक — अंडे और लावा अनेक जंतुओं का भोजन
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नही ं — शरीर द व गम और नम रहते है,ं अतः जंत ु स्थल पर
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सूखना और ताप- जल म समस्या नह , पर जंतु जल तक ही सी मत रह
पिरवतन जाता है रह सकता है
कु छ ही — िछपकली 2 – 20, पक्षी 1 – 15
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आवश्यक अंडों की हजार (ता लका 11.4)
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संख्या
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m .cयह सुरक्षा आगे सब कुछ क्य बदल दे ती है: नषेचन लगभग न श्चत होनेagके कारण जंतु को हजार अंडे बनाने क
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ag आवश्यकता नह रहती। इससे मुक्त होकर वह प्रत्येक अंडे म बड़ा नवेश कर सकता है — सरीसृप और प क्षय म
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बड़ा पीतक और कवच, या स्तनधा रय म गभाशय के भीतर वकास। इसी लए ता लका 11.4 म उत्तरजी वता का
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स्तंभ मछली और मढक के ‘कम’ से बढ़कर छपकली म ‘मध्यम’ और पक्षी म ‘मध्यम से उच्च’ हो जाता है।
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आंत रक नषेचन ने ही कशेरु कय को जल छोड़ दे ने योग्य भी बनाया: मढक को जनन के लए तालाब लौटना पड़ता
है, छपकली को नह ।
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जज्ञासा-सूत्र — पृष्ठ 221
11.5.6 य द अंडाणु नषे चत न हो तो क्या होता है?
जज्ञासा-सू त्र
प्र.1 शशु का जै वक लग नधारण कस प्रकार होता है? अब तक आपने सीखा है क प्रत्येक व्य क्त म दो लग
गुणसूत्र होते ह। मादाओं म XX और नर म XY गुणसूत्र होते ह। माँ सदै व शशु को X गुणसूत्र प्रदान करती है और
पता X (मादा — XX) अथवा Y (नर — XY) गुणसूत्र प्रदान करता है। उपयुक्त जानकारी से क्या आप अनुमान
लगा सकते ह क शशु के लग का नधारण कौन करता है?
पता — अ धक ठ क कह तो यह क उसके दो प्रकार के शुक्राणुओं म से कौन-सा शुक्राणु अंडाणु को नषे चत करता है।
माँ का इस पर कोई प्रभाव नह होता।
माँ XX है → अधसूत्री िवभाजन से बने सभी अंडाणुओ ं में X
िपता XY है → अधसूत्री िवभाजन से दो पकार के शुक्र ाणु: आधे में X, आधे में Y
शुक्राणु म X शुक्राणु म Y
अंडाण ु में X XX → बािलका XY → बालक
चूँ क दोन प्रकार के शुक्राणु बराबर संख्या म बनते ह, इस लए हर बार अपे क्षत संभावना 50% बा लका और 50% बालक होती
है — और हर बार का नषेचन पछले से स्वतंत्र होता है, ठ क जैसे सक्के का नया उछाल।
माँ यह क्य तय नह कर सकती: उसके पास दे ने के लए Y गुणसूत्र है ही नह । वह जो भी अंडाणु बनाती है उसम
X ही होता है, क्य क XX को शका म अधसूत्री वभाजन प्रत्येक युग्मक म X ही रख सकता है। अतः शशु का लग
पूणतः इस बात से तय होता है क कौन-सा शुक्राणु पहले पहुँचा — और यह संयोग क बात है, कसी क इच्छा,
आहार या प्रयास क नह ।
यह क्य महत्त्वपूण है: अनेक प रवार म आज भी शशु के लग के लए स्त्री को दोषी ठहराया जाता है। यह
मान्यता जै वक दृ ष्ट से सवथा गलत है। इसी वषय पर अध्याय का आगे का अनुभाग भी साथ म पढ़ने योग्य है —
कसी वशेष लग क वरीयता से प्रे रत स्वयं चय नत गभपात समाज के लगानुपात को बगाड़ दे ता है, इसी लए
भारत म प्रसव-पूव लग का पता लगाना कानूनी रूप से पूणतः प्र तबं धत है।
सो चए और बताइए — पृष्ठ 222
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11.5.7 गभावस्था और प्रसव
सो चए और बताइए
प्र.6 र व अचानक दे खता है क उसक लंबाई तीव्रता से बढ़ रही है, उसके कंधे चौड़े हो रहे ह और आवाज म प रवतन
हो रहा है। सो चए क वह जीवन क कस अवस्था म प्रवेश कर रहा है?
र व यौवनारंभ म प्रवेश कर रहा है — कशोरावस्था क वह अवस्था जसम शरीर जनन के योग्य हो जाता है। उसने जो तीन
प रवतन दे खे ह वे इसी के प्रारू पक लक्षण ह।
र व क्या दे खता भीतर क्या हो रहा है
है
लंबाई में तीव वृिद्ध वृिद्ध की तीव अवस्था — हाम न के पभाव में लंबी अिस्थयाँ तेजी से लंबी होती है ं
कं धों का चौड़ा कं धे की अिस्थयों और पेिशयों का िवकास, जो अध्याय के अनुसार वृषण के हाम न ारा लड़ कों में लाए जाने वाले शारीिरक
होना पिरवतनों में से एक है
आवाज में पिरवतन कं ठ (स्वरयंत्र) बड़ ा होता है और स्वर-रज्जु लंबे तथा मोटे हो जाते है,ं अतः आवाज का तारत्व नीचे उतर आता है
आवाज सीधे भारी होने के बजाय ‘फटती’ क्य है: स्वर-र ु कुछ महीन म लंबे तो हो जाते ह, पर उनका तनाव
नयं त्रत करने वाली पे शय को नई लंबाई के साथ काम करना फर से सीखने म समय लगता है। उस अव ध म
तारत्व पुराने ऊँचे और नए नीचे स्वर के बीच अ नय मत रूप से फसलता रहता है। वृ द्ध पूरी होने और नयंत्रण फर
से सध जाने पर यह रुक जाता है।
यह सब चला क्या रहा है: अब वृषण एक हाम न बनाते ह — ऐसा रसायन जो शरीर के अन्य भाग के काय को
नयं त्रत करता है। अध्याय कहता है क यह शुक्राणु उत्पादन को नयं त्रत करता है और यौवनारंभ म लड़क म
दखाई दे ने वाले शारी रक प रवतन का कारण भी बनता है। अथात जो संकेत शुक्राणु नमाण आरंभ करता है वही
लंबाई, कंधे और आवाज भी ला रहा है।
संकेत: अध्याय एक और बात सावधानी से जोड़ता है जो र व को सुननी चा हए। ल गक प रपक्वता और भावनात्मक
प रपक्वता एक नह ह। शरीर क्रमशः जनन के योग्य हो जाता है, पर भावनाओं पर नयंत्रण रखने, स्पष्ट रूप से
संवाद करने और सु वचा रत नणय लेने म अ धक समय लगता है।
प्र.7 रीना का मा सक धम प्रत्येक 28व दन पर होता है। उसका पछला मा सक धम 5 माच को हुआ था। उसका
अगला मा सक धम कस दन होने क सबसे अ धक संभावना है?
2 अप्रैल को।
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चक्र का िदन 1 = 5 माच
अगला मािसक धम अगले चक्र के िदन 1 पर = 5 माच + 28 िदन
5 तारीख के बाद माच में शेष िदन = 31 − 5 = 26
28 − 26 = 2 → िगनती अपैल में 2 िदन आगे जाती है
अगला मािसक धम = 2 अपैल
= 18 माच
अंडोत्सग, िदन 14
िदन 1–5 िदन 6–14 पुनिनम ण िदन 15–28 आस्तर स्थूिलत
5 माच 2 अपैल
रीना का 28 दन का चक्र कैलडर पर। दन 1 रक्त ाव का पहला दन है, अतः अगला मा सक धम अगले चक्र के दन 1 पर, ठ क 28 दन
बाद, आरंभ होता है।
गनती रक्त ाव के पहले दन से क्य आरंभ होती है: चक्र एक मा सक धम के दन 1 से अगले के दन 1 तक
गना जाता है, रक्त ाव समाप्त होने के दन से नह । अतः 28 दन 5 माच म जोड़े जाते ह और अगला दन 1 आता
है 2 अप्रैल।
संकेत: इस प्रश्न म ‘सबसे अ धक संभावना’ शब्द वास्तव म महत्त्वपूण ह। अध्याय कहता है क चक्र सामान्यतः
प्रत्येक 21 – 35 दन म दोहराया जाता है, और एक ही व्य क्त म भी यह बीमारी, तनाव, यात्रा और भार-प रवतन
के साथ बदलता है। 2 अप्रैल सव त्तम अनुमान है, गारंट नह — यही बात अभ्यास प्रश्न 13 म फर आती है।
प्र.8 एक मानव युग्मनज अभी बना है। इसम कतने गुणसूत्र ह?
46 — दोन युग्मक के यु ग्मत होते ही मानव क पूरी संख्या पुनः स्था पत हो जाती है।
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शुक्र ाणु (अगुिणत) = 23 गुणसूत्र
अंडाणु (अगुिणत) = 23 गुणसूत्र
युग् मनज = 23 + 23 = 46 गुणसूत्र = 23 जोड़ े
अधसूत्री िवभाजन संख्या आधी करता है
23
46 23 जोड़ े —
46
पत्येक जोड़ े का
काय कोिशका 23 एक-एक जनक से
िनषेचन
युग्मनज
शुक्राणु / अंडाणु
अधसूत्री वभाजन गुणसूत्र क संख्या आधी करता है और नषेचन उसे पुनः पूरा कर दे ता है। इसी लए संख्या दोगुनी होने के बजाय पीढ़ -
दर-पीढ़ 46 ही बनी रहती है।
पहले आधा करना क्य आवश्यक है: य द प्रत्येक युग्मक म पूरे 46 गुणसूत्र होते तो युग्मनज म 92 होते, अगली
पीढ़ म 184, और इसी प्रकार आगे। अधसूत्री वभाजन प्रत्येक जोड़े के सदस्य को अलग करके यह रोक दे ता है,
जससे युग्मक को प्रत्येक जोड़े से केवल एक गुणसूत्र मलता है। अध्याय प रणाम ठ क इन्ह शब्द म कहता है —
मनुष्य क को शकाओं म 46 गुणसूत्र होते ह कतु शुक्राणु और अंडाणु म केवल 23, ता क युग्मन होने पर युग्मनज
म जनक जतने ही गुणसूत्र ह ।
संकेत: युग्मनज के 46 गुणसूत्र य ही कोई 46 नह ह। वे 23 मलान वाले जोड़े ह — प्रत्येक जोड़े का एक सदस्य
पता से और दूसरा माता से। यही जोड़ीदारी क्रयाकलाप 11.4 म गनी गई व भन्नता का पूरा आधार है।
सो चए और बताइए — पृष्ठ 223
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कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता
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11.5.10 अवां छत गभावस्था और संक्रमण को कस प्रकार रोका जा सकता है?
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सो चए और बताइए
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a s emक्रया के समय यौन संच रत संक्रमण के प्रसार को कम करने के लए कन सुरक्षात्मक साधन का उपयोग
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यौन
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प्र.9
कया जा सकता है?
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अवरोधक साधन — कंडोम और यो न आवरण। गभ नरोधक व धय म केवल यही ऐसी ह जो यौन संचा रत संक्रमण से भी
बचाव करती ह। a
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अवरोध संक्रमण रोक दे ता है और गोली क्य नह : सुजाक, स फ लस, हप ज, जन नक मस्से और एच.आई.वी.
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के कारक जीव शरीर द्रव म रहते ह और नकट शारी रक संपक के समय एक व्य क्त से दूसरे म जाते ह। कंडोम
c के बीच एक भौ तक परत है, अतः वे द्रव आदान-प्रदान नह होते औरagजीव के लए कोई माग नह
दोन व्य.क्तय
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se गोली एक व्य क्त के शरीर के भीतर हाम न का स्तर बदलती है; द्रव के आदान-प्रदान पर उसका कोई प्रभाव
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बचता।
a नह , अतः वह संचरण रोक ही नह सकती।
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अध्याय संबं धत संक्रमण के नाम भी दे ता है — सुजाक, हप ज, स फ लस, जन नक मस्से और एच.आई.वी. ( जससे अंततः
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एड् स हो सकता है)। वह यह भी कहता है क इनम से कुछ का उपचार अभी उपलब्ध नह है — और यही कारण है क यहाँ उपचार
से कह अ धक महत्त्व रोकथाम का है।
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संकेत: अवरोध जो खम बहुत घटा दे ता है, शून्य नह करता। कुछ संक्रमण उस त्वचा से भी फैल सकते ह जो ढक
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नह है। पूरा उत्तर यह है — अवरोधक साधन का उपयोग क जए, असुर क्षत संपक से ब चए, m और त नक भी संदेह
हो तो o m च कत्सक से म लए, क्य क कई यौन संचा रत संक्रमण शीघ्र उपचारgसेlaठ क हो जाते ह और दे र होने
cशीघ्र
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m कह क ठन हो जाते ह। a
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य द कोई दं प त्त (युगल) मुँह से ली जाने.cवाली गभ नरोधक गो लय का उपयोग करता है कतु कंडोम का नह तो ag l a
कौन-से जो खम बने रहते ह औरsक्य em?
प्र.10
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यौन संचा रत हर संक्रमण का जो खम पूरी तरह बना रहता है। गोली गभावस्था से बचाती है, संक्रमण से नह ।
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केवल गोली से कारण
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agl बहतु हद तक गोली हाम न का स्तर बदलकर अंडाणु के मोचन को प्रभा वत करती है —
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गभ वस्था
रुक जाती है
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अंडाणु ही मुक्त न हो तो नषेचन हो ही नह सकता
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तिनक भी .नही agl
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सुजाक, िसिफिलस, हप ज, जनिनक ये संपक के समय शरीर द्रव से जाते ह। गोली शरीर के हाम न तंत्र पर काम
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मस्से , एच.आई.वी. घटते करती है और दोन व्य क्तय के बीच कुछ भी नह रखती
दुष्पभाव
a रहते है ं अध्याय बताता है क हाम न वाली गो लय के कुछ दुष्प्रभाव हो सकते ह
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यह अंतर स्पष्ट रखना क्य आवश्यक है: गभ नरोधक क परख एक ही बात से होती है — क्या वह शुक्राणु को
अंडाणु से मलने से रोकता है। ऐसा करने के तीन भन्न ढं ग ह: अवरोध (कंडोम, यो न आवरण) जो शुक्राणु को
भौ तक रूप से रोकता है; हाम न वाली व ध (गोली) जो अंडाणु का मोचन रोकती है; और यु क्त या शल्य व ध
(कॉपर-T, अथवा शुक्रवा हनी या डबवा हनी का अवरोध)। इनम से केवल पहली ही संक्रमण का माग भी रोकती है,
क्य क केवल वही बीच म कुछ रखकर काम करती है।
संकेत: इसी लए स्वास्थ्य कायकता सलाह दे ते ह क जब गभावस्था और संक्रमण दोन से बचाव चा हए तब कसी
अन्य व ध के साथ-साथ कंडोम का भी उपयोग कया जाए। अध्याय म व णत भारत क आशा कायकता ठ क इन्ह
वकल्प पर परामश दे ती ह।
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11.5.10 अवां छत गभावस्था और संक्रमण को कस प्रकार रोका जा सकता है?
सो चए और बताइए
प्र.11 अनेक जंतुओं म ब े जन्म के तुरंत बाद चल सकते ह अथवा भोजन खोज सकते ह इसके वपरीत मानव शशु
लंबे समय तक पूणतः दूसर पर नभर रहते ह। एक जा त के रूप म मनुष्य म इसके क्या लाभ और हा नयाँ हो
सकती ह?
यह लंबी नभरता वह क मत है जो मनुष्य एक बड़े और धीरे-धीरे बनने वाले म स्तष्क के लए चुकाता है — और इससे
संभव होने वाली सीख ही इस जा त क सफलता का कारण है।
लाभ हा नयाँ
मिस्तष्क जन्म के बाद भी बढ़ ता और जुड़ता रह सकता है, अतः उसे जनन माग से िशशु वष ं तक असहाय रहता है और उसे िनरंतर दे खभाल
िसर िनकलने से पहले पूर ा बन जाने की आवश्यकता नही ं तथा सुरक्षा चािहए
लंबा बचपन लंबी सीख की अविध है — भाषा, औजारों का उपयोग, कौशल, रीित- जनकों और पिरवार पर भोजन, समय और ऊज का भारी
िरवाज और मूल्य के वल वंशानुग त नही ं, िसखाकर आगे बढ़ ते है ं व्यय
स्तनपान पूण पोषण दे ता है और अनेक रोगों से बचाता है, जैस ा अध्याय कहता है जीवन भर में संतित कम; अगले िशशु में वष ं का िवलंब
दे खभाल की आवश्यकता से सुदृ ढ़ पािरवािरक और सामािजक बंध न बनते है,ं और जनक बीमार पड़ जाएँ या पिरवार को सहारा न िमले तो
दादा-दादी तथा समुद ाय भी पालन-पोषण में जुड़ते है ं िशशु का जीवन सीधे संकट में आ जाता है
नए स्थान या नई समस्या के अनुस ार व्यवहार एक ही पीढ़ ी में बदला जा सकता है, जनसंख्या धीरे बढ़ ती है, अतः िकसी आपदा से उबरने में
वंशानुग त पिरवतन की पतीक्षा िकए िबना लंबा समय लगता है
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यह वही संतुलन है जो पूरे अध्याय म दखता है: ता लका 11.4 दखाती है क जंतु कम नवेश के साथ अ धक
संत त और भारी नवेश के साथ कम संत त के बीच चयन करते ह। मढक 5,000 – 50,000 अंडे दे कर छोड़ दे ता है;
पक्षी 1 – 15 दे कर उन्ह खलाता है। मनुष्य उसी रेखा के दूसरे छोर पर है — प्रायः एक बार म एक शशु, अनेक वष
तक दे खभाल, और उसी अनुपात म उच्च उत्तरजी वता। मानव शशु क असहायता अ भकल्प क त्रु ट नह है;
अत्यंत भारी नवेश क यु क्त ऐसी ही दखती है।
संकेत: घोड़े का बच्चा जन्म के एक घंटे म चलने लगता है क्य क जो बच्चा दौड़ न सके वह खा लया जाएगा। मानव
शशु एक वष तक नह चलता क्य क उस वष उसक रक्षा वयस्क करते ह। दोन प्र तरूप अपनी-अपनी जा त के
जीवन-ढं ग के अनुकूल ह और एक-दूसरे के लए काम नह करगे।
अभ्यास प्रश्न — पृष्ठ 225 – 226
अध्याय के अंत के प्रश्न
अभ्यास प्रश्न
प्र.1 एक पुष्प के परागकोश को प रपक्व होने से पूव ही हटा दया जाता है। इसके प ात उसी प्रजा त के दूसरे पौधे के
परागकण उसके व तकाग्र पर छड़के जाते ह और बीज बनते ह। यहाँ कौन-सी प्र क्रया सु न त होती है? (i) स्व-
परागण (ii) पर-परागण (iii) नषेचन (iv) ऊतक संवधन
(ii) पर-परागण।
क्य : इस उपचार के दोन चरण ठ क वही दो काम करते ह जो पर-परागण क गारंट के लए आवश्यक ह।
प रपक्व होने से पहले परागकोश हटा दे ना पुष्प का अपना परागकण झड़ने से पहले ही हटा दे ता है — अतः
अब स्व-परागण असंभव है।
उसी प्रजा त के दूसरे पौधे का परागकण व तकाग्र पर छड़कना अध्याय क पर-परागण क प रभाषा को
अक्षरशः पूरा करता है — एक पौधे के पुष्प के परागकोश से उसी प्रकार के दूसरे पौधे के पुष्प के व तकाग्र पर
परागकण का स्थानांतरण।
(iii) आकषक गलत वकल्प क्य है: नषेचन तो न श्चत रूप से हुआ — बीज बने ह और बना नषेचन के बीज
बन ही नह सकते। परंतु नषेचन वह नह है जसे प्रयोगकता ने सु न श्चत कया; परागकण पहुँच जाने के बाद वह
अपने आप हुआ। उपचार ने अ भकल्प से जो सु न श्चत कया वह यह है क परागकण कसी दूसरे पौधे से ही आए।
(i) इस लए नह क परागकोश हटा दए गए, और (iv) असंबद्ध है — ऊतक संवधन अल गक प्रवधन क व ध है
जसम परागकण होता ही नह ।
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संकेत: इस प्र क्रया का एक नाम है — कृ त्रम संकरण। अध्याय पृष्ठ 217 के ‘ व ान एवं समाज’ बॉक्स म इसका
वणन करता है: पुष्प से पुंकेसर हटाना, स्व-परागण रोकने के लए थैली लगाना, और वां छत लक्षण वाले परागकण
का हाथ से स्थानांतरण। पादप प्रजनक इसी से नई उच्च उत्पादक और रोग-प्र तरोधी कस्म बनाते ह।
प्र.2 पौध म ल गक जनन के नम्न ल खत चरण को सही क्रम म व्यव स्थत क जए — (i) व तकाग्र पर पराग का
अंकुरण (ii) नषेचन (iii) परागण (iv) युग्मनज का नमाण
(iii) परागण → (i) व तकाग्र पर पराग का अंकुरण → (ii) नषेचन → (iv) युग्मनज का नमाण।
परागकोश → वितकाग बीजाड
ं मे ं युग्मकों का युग्मन
(i)
(iii) (ii) (iv)
पराग निलका
परागण िनषेचन युग्मनज
वितका मे ं नीचे
िफर: युग्मनज → भूण | बीजाड
ं → बीज | अंडाशय → फल
यह क्रम भौ तक अ नवायता से तय है — हर चरण वही प र स्थ त बनाता है जो अगले को चा हए।
कोई और क्रम संभव क्य नह :
परागकण को व तकाग्र पर पहुँचे बना वहाँ अंकु रत होने का प्रश्न ही नह — अतः (iii) पहले, (i) बाद म।
जब तक न लका व तका से नीचे न बढ़ जाए, नर युग्मक बीजांड तक नह पहुँच सकता — अतः (i) पहले, (ii)
बाद म।
युग्मनज उसी युग्मन का प रणाम है। युग्मन से पहले उसका अ स्तत्व हो ही नह सकता — अतः (ii) पहले, (iv)
बाद म।
संकेत: (ii) और (iv) लगभग एक ही क्षण ह, इसी लए यही जोड़ी उलझाती है। नषेचन घटना है — दो युग्मक का
युग्मन। युग्मनज उस घटना का प रणाम है। कारण को प रणाम से पहले लखा जाएगा।
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प्र.3 नीचे दए गए अ भकथन एवं कारण को प ढ़ए और उनके संबंध म आगे दए गए वकल्प म से सही वकल्प का
चयन क जए। अ भकथन — नषेचन के प ात न मत युग्मनज तत्काल गभाशय भ त्त से जुड़ जाता है। कारण
— गभाशय क भ त्त सदै व युग्मनज को ग्रहण करने के लए तैयार रहती है। (i) अ भकथन और कारण दोन
सत्य ह और कारण, अ भकथन क सही व्याख्या है। (ii) अ भकथन और कारण दोन सत्य ह कतु कारण,
अ भकथन क सही व्याख्या नह है। (iii) अ भकथन सत्य है, कतु कारण असत्य है। (iv) अ भकथन असत्य है,
कतु कारण सत्य है।
(iv) अ भकथन असत्य है, कतु कारण सत्य है।
अ भकथन असत्य क्य है। युग्मनज तत्काल नह जुड़ता। नषेचन डबवा हनी म होता है, गभाशय म नह । अध्याय स्पष्ट कहता है
— गभाशय क ओर जाते हुए युग्मनज म अनेक समसूत्री वभाजन होते ह और तभी वह गभाशय के आंत रक आस्तर म अंतर पत
होता है। नषेचन और अंतर पण के बीच कई दन बीतते ह, और जो अंतर पत होता है वह अब एकको शक य युग्मनज नह ,
को शकाओं का एक गोला होता है।
िडंबवािहनी में िनषेच न → यात्रा के दौरान बार-बार समसूत्री िवभाजन
→ िवभािजत िपंड गभ शय तक पहँच
ु ता है
→ स्थूिलत आं त िरक आस्तर में अंत र पण = गभ वस्था का आरंभ
कारण सत्य क्य माना जाता है। गभाशय युग्मनज के आने क प्रतीक्षा करके तैयार नह होता — वह हर चक्र म पहले ही तैयार हो
जाता है। अध्याय के अनुसार अंडोत्सग से पूव ही गभाशय तैयार होने लगता है और आंत रक आस्तर स्थू लत हो जाता है, और
अंडोत्सग के बाद वह और अ धक मोटा तथा रक्त वा हकाओं से समृद्ध हो जाता है। अथात हर माह आस्तर तैयार कया जाता है,
चाहे युग्मनज बने या न बने।
फर भी कारण अ भकथन क व्याख्या क्य नह है: पूरी तरह तैयार आस्तर भी जुड़ाव को जल्द नह करा
सकता, क्य क युग्मनज अभी गभाशय म पहुँचा ही नह है। वलंब डबवा हनी क यात्रा से तय होता है, आस्तर क
तैयारी से नह । अतः कारण स्वयं म सत्य होते हुए भी अ भकथन का कारण नह है — और यहाँ तो अ भकथन ही
असत्य है।
शब्द पर एक टप्पणी: कारण म आया ‘सदै व’ शब्द ध्यान माँगता है। आस्तर हर चक्र म तैयार कया जाता है —
इसी अथ म कारण सत्य है। वह अक्षरशः हर समय उप स्थत नह रहता — रजोधम के दन ( दन 1 – 5) म तो वही
आस्तर नस्ता रत हो रहा होता है और दन 6 – 14 म पुनः बनता है। कारण को ‘हर चक्र म भ त्त पहले से तैयार कर
ली जाती है’ के अथ म प ढ़ए, तब वकल्प (iv) सही चयन है।
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अल गक जनन से उत्पन्न संत तयाँ आनुवं शक रूप से जनक के समान क्य होती ह?
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प्र.4
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l जनक केवल एक है और को शका वभाजन भी केवल एक ही प्रकार का है — समसूत्री वभाजन, जो गुणसूत्र
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समूह क यथावत प्र त ल प बनाता है, न उसे आधा करता है और न उसम फेरबदल करता है।
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जनक कोिशका (गुणसूत्र संख्या 2n)
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g एक पितिलिप
↓ डीएनए का पितकरण: पत्येक गुणसूत्रaकी
↓ समसूत्री िवभाजन : पत्येक गुणसूत्र की दोनों पितयाँ अलग-अलग संत ित कोिशकाओं में
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दो संत ित कोिशकाएँ, पत्येक में 2n गुणसूत्र, वही सूच ना िलए हएु
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जो तीन बात अंतर पैदा कर सकती थ वे तीन अनुप स्थत ह —
a अधसूत्री वभाजन नह , अतः गुणसूत्र जोड़े कभी स्वतंत्र रूप से पृथक नह होते और युग्मक बनते ही नह — क्रयाकलाप
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coनहm आता। agl
11.4 वाला 2n फेरबदल होता ही नह ।
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दूसरा जनक नह , अतः कह और से कोई गुणसूत्र कभी
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नषेचन नह , अतः दो भन्न समूह कभी मलते नह ।
प रणाम है समान आनुवं शक सूचना वाले जीव का समूह — जन्ह अध्याय क्लोन कहता है। यह मुकुलन करती यीस्ट को शका,
हाइ ा के मुकुल, राइजोपस के बीजाणु, आलू के कंद और कलमी गुलाब सब पर समान रूप से लागू होता है।
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‘समरूप’ पूणतः नरपेक्ष क्य नह है: डीएनए का प्र तकरण अत्यंत प रशुद्ध है पर पूण नह । कभी-कभार कोई
s e mत ल प-त्रु ट — उत्प रवतन — आ जाती है और उस संत त को शका तथा उसके सारे वंशज म चली जाती है।
la पूणतः अल गक वंश के लए व भन्नता का यही एकमात्र ोत है, और वह ल गक जनन के फेरबदल क तुलना म
प्र
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बहुत धीमा और वरल है। यही अंतर क्लोनी फसल को संवेदनशील बना दे ता है, जैसा प्रश्न 7 म दे खगे।
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गभावस्था के दौरान मा सक धम क्य रुक जाता है? स्पष्ट क जए।
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क.cतो पूरी आवश्यकता है, अतः वह नस्ता रत होने के बजाय बनाए रखा जाता
क्य क रजोधम उस गभाशय आस्तर का नस्तारण है जसक अब आवश्यकता नह रही — और गभावस्था म उस आस्तर
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दोन स्थ तय क तुलना क जए —
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अवस्था नषेचन न होने पर गभावस्था म
अंडाण ु लगभग एक दन जीवनक्षम रहकर नष्ट हो जाता है शुक्राणु से युिग्मत — युग्मनज बन जाता है
गभ शय मोटा और रक्त वा हकाओं से समृद्ध, पर पोषण दे ने मोटा और रक्त वािहकाओं से समृद्ध, और उसमें भूण अंतर िपत है
आस्तर को कुछ नह
आगे क्या होता आस्तर कु छ रक्त के साथ िनस्तािरत हो जाता है — आस्तर बनाए रखा जाता है और भूण के पोषण के िलए और अिधक
है रजोधम स्थूिलत होता है
अंडोत्सग अगले चक्र म फर होता है पूरी गभ वस्था के िलए रुक जाता है — नया अंडाणु मुक्त नही ं होता
शरीर को यह अंतर पता कैसे चलता है: ूण के अंतर पत होते ही वह और उसके चार ओर बनने वाले ऊतक माँ
के रक्त म हाम न छोड़ने लगते ह। हाम न, जैसा अध्याय प रभा षत करता है, ऐसे रसायन ह जो शरीर के अन्य भाग
के व भन्न काय को नयं त्रत करते ह। ये वशेष हाम न एक साथ दो काम करते ह — गभाशय आस्तर को टू टने दे ने
के बजाय बनाए रखते ह, और अंडाशय को दूसरा अंडाणु मुक्त करने से रोकते ह। अतः चक्र के दोन भाग, अंडोत्सग
और नस्तारण, एक साथ बंद हो जाते ह और पूरे नौ माह बंद ही रहते ह।
संकेत: इसी लए मा सक धम का न होना प्रायः गभावस्था का पहला संकेत होता है। यह संयोग नह , आस्तर के
बनाए रखे जाने का सीधा प रणाम है। प्रसव के कुछ समय बाद चक्र फर आरंभ होता है, और स्तनपान कराने वाली
माताओं म प्रायः कुछ दे र से।
प्र.6 दन के समय खलने वाले पुष्प क तुलना म रात म खलने वाले पुष्प सफेद या हल्के रंग के क्य होते ह?
क्य क उनके परागणकारी रात म उड़ते ह, और अंधकार म केवल सफेद सतह ही दखाई दे पाती है। चटक ले रंग का दल
वहाँ अदृश्य रहता।
अंधकार म सफेद क्य काम करता है और रंग क्य नह : रंगीन दल इस लए रंगीन दखता है क उसका वणक
अ धकांश तरंगदै य को अवशो षत कर लेता है और केवल एक सँकरी प पराव तत करता है। दन के प्रकाश म यह
ठ क है — पराव तत प तब भी चमक ली रहती है। रात म प्रकाश वैसे ही बहुत कम होता है, अतः अ धकांश
अवशो षत हो जाने के बाद पतंगे क आँख तक लगभग कुछ नह लौटता। सफेद दल म ऐसा वणक नह होता और
वह उपलब्ध थोड़े-से प्रकाश का लगभग पूरा पराव तत कर दे ता है, अतः गहरी प त्तय के सामने वह एक उजला धब्बा
बनकर उभर आता है। चाँदनी म प्रायः सफेद पुष्प पूरे पौधे क सबसे चमक ली वस्तु होता है।
आँख भी सहायता क्य नह कर पाती: मंद प्रकाश म हमारी और क ट दोन क आँख मुख्यतः चमक के प्र त
अनु क्रया करती ह, रंग के प्र त नह । अतः जो पतंगा दन म रंग पहचान सकता है वह भी रात म वस्तुतः वपयास
(contrast) ही दे ख रहा होता है। और वपयास ही वह वस्तु है जसे सफेद दल अ धकतम कर दे ता है।
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रंग के स्थान पर रात म खलने वाले पुष्प क्या अपनाते ह। वे सुगंध पर खच करते ह। रात क रानी, हर सगार (पा रजात), चमेली
और ब्रह्मकमल सूयास्त के बाद तीव्र सुगंध छोड़ते ह। गंध के अणु वायु के साथ चलते ह और पूण अंधकार म भी उनका पीछा कया
जा सकता है, अतः दूर से बुलाने का काम दृ ष्ट के स्थान पर गंध करती है और अं तम पहुँच के लए हल्के रंग का दल काम आता है।
ऐसे अनेक पुष्प भरपूर मकरंद भी बनाते ह, क्य क रात म उड़ने वाले पतंगे और चमगादड़ बड़े होते ह और उन्ह अच्छा पुरस्कार
चा हए।
क्या आप जानते ह? संकेत केवल रंग का नह , समय का भी है। रात क रानी अपनी सुगंध अंधेरा होने के बाद ही
छोड़ती है और प्रातः बंद कर दे ती है — जो आगंतुक उड़ ही नह रहे उनके लए व ापन करने का कोई अथ नह ।
प्र.7 ल गक रूप से उत्पन्न पौध क तुलना म का यक रूप से प्रव धत पौधे रोग के प्र त अ धक संवेदनशील क्य होते
ह?
क्य क वे क्लोन ह। खेत के हर पौधे म समान आनुवं शक सूचना है, अतः जो रोगजनक एक पौधे को हरा सकता है वह
सबको हरा सकता है।
दो अलग-अलग कारण ह, और दोन महत्त्वपूण ह —
1. सहारा लेने योग्य कोई आनुवं शक व भन्नता नह । का यक प्रवधन एक ही जनक से समसूत्री वभाजन ारा होता है, अतः न
कोई फेरबदल है और न दूसरा जनक। य द जनक म कसी कवक के प्र त प्र तरोध का जीन नह है तो उसके कसी भी क्लोन म
नह होगा। खेत म घुसा रोग बना एक भी ऐसे पौधे से टकराए, जो उसे रोक सके, पूरे खेत म फैल जाता है।
2. रोग स्वयं रोपण-द्रव्य के भीतर यात्रा करता है। कतन, कंद, प्रकंद या कलम जी वत तने का एक टु कड़ा है और जनक के
भीतर जो भी वषाणु, जीवाणु और कवक थे उन्ह सीधे नए पौधे म ले जाता है। बीज प्रायः ऐसा नह करता — ूण बीजांड के
भीतर नए सरे से बनता है और तुलनात्मक रूप से स्वच्छ होता है। अतः क्लोनी प्रवधन केवल पौधे का नह , उसके संक्रमण का
भी प्रवधन कर दे ता है।
ल गक जनन जीव संख्या क रक्षा कैसे करता है: ल गक रूप से उत्पन्न फसल क संत त एक-दूसरे से भन्न होती
है, क्य क अधसूत्री वभाजन और नषेचन प्रत्येक बीज को लक्षण का नया संयोजन दे ते ह। रोग आने पर कुछ पौध
म संयोगवश ऐसा संयोजन होता है जो उसका प्र तरोध कर लेता है। वे जी वत रहकर बीज बनाते ह, अतः फसल को
क्ष त तो होती है पर वह नष्ट नह होती, और अगली पीढ़ म प्र तरोधी लक्षण अ धक सामान्य हो जाता है। क्लोनी खेत
म इस तंत्र के पास काम करने को कुछ है ही नह ।
क्या आप जानते ह? यह केवल सैद्धां तक चता नह है। कभी वश्व क मुख्य व्यापा रक कस्म रहा ग्रॉ मशेल केला
क्लोनी रूप से ही प्रव धत होता था और पनामा रोग से समाप्त हो गया। उसक जगह लेने वाला कैव डश भी क्लोन
ही है और अब उसी कवक के नए प्रभेद के आक्रमण म है। इसी चक्र को तोड़ने के लए अध्याय म दया प्ररोह शीष से
बने वषाणु-मुक्त ऊतक संव धत केले के पादपक का उदाहरण महत्त्वपूण है — शीषस्थ वभज्योतक प्रायः वषाणु
से मुक्त होता है, अतः क्लोन कम-से-कम स्वच्छ आरंभ तो करते ह।
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प्र.8 य द कसी प्रकार के पौधे म सभी पुष्प केवल स्व-परागण करने म सक्षम ह तो आगे आने वाली अनेक पी ढ़य म
आनुवं शक व वधता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? स्पष्ट क जए।
आनुवं शक व वधता तेजी से घटे गी और कुछ ही पी ढ़य म जीव संख्या लगभग एकरूप हो जाएगी।
क्य : स्व-परागण म दोन युग्मक एक ही पौधे से आते ह, अतः कसी जीन जोड़े का मलान अपनी ही प्र तय से ही
हो सकता है। जो जोड़ा म श्रत था (एक रूप एक जनक से, दूसरा दूसरे से) उसके अगली पीढ़ म म श्रत बने रहने
क संभावना आधी है और मलान वाला जोड़ा बन जाने क संभावना भी आधी — और एक बार मलान वाला बन
जाने पर वह स्व-परागण से फर कभी म श्रत नह हो सकता।
n पीढ़ ी स्व-परागण के बाद शेष िमि त जीन जोड़ ों का अंश = (½)n
1 पीढ़ ी बाद = 50%
3 पीढ़ ी बाद = (½)3 = 12.5%
5 पीढ़ ी बाद = (½)5 = 1/32 = 3.1%
10 पीढ़ ी बाद = (½)10 ≈ 0.1%
अथात लगभग पाँच से दस पी ढ़य म पौधे लगभग पूणतः एकरूप हो जाते ह — जसे प्रजनक शुद्ध वंशक्रम कहते ह।
इस हा न के प रणाम —
छपे हुए हा नकारक लक्षण प्रकट हो जाते ह। जीन का जो हा नकारक रूप जोड़े के म श्रत रहते ढका हुआ था वह जोड़े के
मलान वाला होते ही दखने लगता है। पौधे दुबल, छोटे और कम उवर हो जाते ह — यह अंतःप्रजनन अवनयन है।
नए संयोजन नह बनते। पौधे के भीतर क्रयाकलाप 11.4 वाला फेरबदल तो होता रहता है, पर दोन युग्मक एक ही पौधे से
आने के कारण मलाने को कोई नई सामग्री ही नह होती। जीव संख्या नवीनता बनाना बंद कर दे ती है।
अनुकूलन क क्षमता समाप्त। नया पीड़क, नया रोग या वषा म प रवतन आने पर कोई ऐसा भन्न पौधा नह होता जो
संयोगवश उसे सह ले। एक ही महामारी पूरी जीव संख्या ले जा सकती है, ठ क प्रश्न 7 वाली क्लोनी फसल क तरह।
संकेत: एकरूपता सदै व हा न नह है, इसी लए कुछ फसल इसे जान-बूझकर अपनाती ह। गे ँ, चावल और मटर
मुख्यतः स्व-परा गत ह: खेत का हर पौधा साथ-साथ पकता है और एक-सी उपज दे ता है, और कसी परागणकारी
क आवश्यकता ही नह , अतः बीज बनना सु न श्चत रहता है। प्रजनक तो बलपूवक स्व-परागण भी कराते ह — पहले
शुद्ध वंशक्रम स्थर करने के लए, और फर दो ऐसे वंशक्रम को मलाकर ओजस्वी संकर बनाने के लए।
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प्र.9 एक कृषक बड़ी संख्या म आनुवं शक रूप से एक जैसे पौधे शीघ्रता से उगाना चाहता है। इसके लए उपयुक्त
जनन व धय का सुझाव द जए और समझाइए क वे प्रभावी क्य ह?
उसे का यक प्रवधन अपनाना चा हए — सबसे बढ़कर प्ररोह शीष से ऊतक संवधन, और फसल के अनुसार कतन, कलम
बाँधना या परतन। ये सभी अल गक ह, अतः सभी क्लोन दे ते ह।
वध कसके लए इस कृषक के लए क्य उपयुक्त
सव त्तम
ऊतक संवध न परोह शीष केला, गन्ना, ऊतक के एक छोटे टुकड़ े से हजारों समरूप पादपक, िनजिमत पोषक माध्यम में, िकसी
(शीषस्थ िवभज्योतक) से आ कड, आलू भी ऋतु में और छोटे स्थान में; शीषस्थ िवभज्योतक पायः िवषाणु-मुक्त होता है, अतः
पादपक स्वस्थ िमलते है ं
कतन गन्ना, मनीप्लांट, सबसे सरल और सस्ती; 3 – 5 पवसंिधयों वाली कतन दो-तीन सप्ताह में जड़ पकड़
गुलाब, गुड़हल ले ती है
कलम बाँध ना आम, नीबू वग, चुनी हुई िकस्म के परोह को दृ ढ़ और रोग-पितरोधी जड़ पणाली के साथ जोड़ दे ती है
गुलाब, सेब
परतन न बू, अमरूद, अत्यंत िवश्वसनीय, क्योंिक जड़ ें बनने तक टहनी जनक से जुड़ी रहती है और मुरझा नही ं
चमेली, अनार सकती
ये व धयाँ उसक आवश्यकता के लए प्रभावी क्य ह:
आनुवं शक रूप से समरूप — एक जनक से केवल समसूत्री वभाजन होता है, अतः हर पौधे म ठ क जनक
के लक्षण होते ह: वही उपज, वही आकार, वही मठास, वही पकने का समय। पूरा बाग एक ही पौधे क तरह
व्यवहार करता है, जससे छड़काव, कटाई और वपणन कह सरल हो जाते ह।
शीघ्रता — पौधा पुष्पन, परागण, बीज बनने, बीज क प्रसु प्त और अंकुरण — सब छोड़ दे ता है। कतन म पहले
से पवसं धयाँ और सं चत भोजन होते ह और वह तुरंत बढ़ने लगती है, अतः फसल बीज से उगाई गई फसल से
महीन या वष पहले तैयार हो जाती है।
बड़ी संख्या — वशेषकर ऊतक संवधन एक प्ररोह शीष से हजार पादपक बना दे ता है। अध्याय का अपना
उदाहरण केले क खेती का है, जहाँ व्यापक स्तर पर बने स्वस्थ पादपक ने कायपद्ध त म क्रां त ला द है और
उच्च उपज सु न श्चत क है।
कुछ फसल के लए एकमात्र वकल्प — केला, बीजर हत अंगूर और गन्ना उपयोगी बीज बनाते ही नह , अतः
इन्ह और कसी प्रकार उगाया ही नह जा सकता।
कृषक को द जाने वाली चेतावनी: एकरूपता एक जो खम भी है। क्लोन के खेत म ऐसा कोई पौधा नह होता जो
कसी नए रोग का प्र तरोध कर सके। उसे सलाह द जए क एक से अ धक कस्म लगाए, प्रमा णत वषाणु-मुक्त
रोपण-द्रव्य खरीदे और फसल चक्र अपनाए।
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as e
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
. com
पm
सुरेश परागकण के अंकुरण का अध्ययन करने के लए व भन्न शकरा सांद्रता (0%, 2.5%, 5%, 7.5%, 10%)
म परागकण लेकर स्लाइड तैयार करता है। (i) इस व्यवस्थापन के उपयोग से कन व भन्न e
प्र.10
m a s
gl चा हए?
coजा सकती है? (ii) इस व्यवस्थापन म कौन-से मानदं ड को समान रखा aजाना
रकल्पनाओं क
.
em
जाँच क
l a s
ag
co m
(i) इस व्यवस्थापन से जाँची जा सकने वाली प रकल्पनाएँ। प्रत्येक ऐसा कथन होनी चा हए जसे प्रयोग गलत सद्ध कर सके।
em . ag
as
1. परागकण को अंकुरण के लए बाहरी शकरा क आवश्यकता होती है। अनुमान: 0% (केवल जल) पर अंकुरण नाममात्र
या शून्य, अ धक सांद्रताओं पर अंकुरण।
a g l
2. अंकु रत होने वाले परागकण का प्र तशत शकरा क सांद्रता पर नभर करता है। अनुमान: अंकु रत कण क गनती
m
स्लाइड-दर-स्लाइड बदलेगी।
co
se m.
3. पराग न लका क लंबाई शकरा क सांद्रता पर नभर करती है। अनुमान: कुछ स्लाइड पर न लकाएँ मापने योग्य रूप से
o
लंबी ह गी।
m l a
gसांद्रता के सापेक्ष अंकुरण का
m .cइष्टतम सांद्रता होती है और उसके दोन ओर अंकुरण घट जाता है। अनुमान:
a
se ख चढ़े गा, शखर बनाएगा और फर उतरेगा।
4. कोई एक
g l aआले
a
m a s
agl
‘ जतनी अ धक शकरा उतनी अ धक वृ द्ध’ के बजाय इष्टतम क अपेक्षा क्य : शकरा एक साथ दो भू मकाएँ
m .co
नभाती है। वह श्वसन का क्रयाधार है जो पराग न लका बनाने क ऊजा दे ती है, अतः बहुत कम होने पर परागकण
l a se
g
भूखा रह जाता है। और वह परासरणी कारक भी है। केवल जल म बाहर का वलयन परागकण के भीतरी द्रव से
a
अ धक तनु होता है, अतः जल भीतर दौड़ता है और परागकण फट सकता है। बहुत सांद्र वलयन म उलटा होता है —
जल परागकण से बाहर खच जाता है, वह सकुड़ जाता है और अंकुरण रुक जाता है। इन दोन के बीच कह वह
co m
सांद्रता है जो परागकण को भोजन भी दे और उसका जल-संतुलन भी बनाए रखे, और शखर वह बनता है।
m .
m as e
.co a g l
em
(ii) समान रखे जाने वाले मानदं ड — जस एक कारक क जाँच हो रही है उसके अ त रक्त सब कुछ।
a s
a gl चर का प्रकार यहाँ क्या है
se m
स्वतंत्र चर शकरा सादं ता: 0%, 2.5%, 5%, 7.5%,m10%
co g l a
m . a
ase
(के वल यही
gl
बदला जाता है)
आि त चर (जो
a
अंकुिरत परागकणों का पितशत; पराग निलका की लंबाई
com
मापा जाता है)
वही पादप जाित और यथासंभव वही पुष्प; समान आयु और ताजगी के परागकण; पितem
.
omरखे a s स्लाइड लगभग समान संख्या में कण;
g;lवही आदता; वही पकाश; िगनने से पहले वही
िनयंित्रत चर
. c पतीक्षा समय; सूक्ष्मदश का वही आवधन; ‘अंकुिरत’ की वही पिरभाषा (a
समान आयतन और आकार की बूदँ ; वही स्लाइड और कवरिस्लप; वही ताप
m जाएँ)
(समान
ase जैसे, निलका कम-से -कम परागकण की चौड़ ाई
a g l िजतनी लंबी); िगनने वाला वही व्यिक्त
.c
s e m
. c om
संकेत: 0% वाली स्लाइड व्यथ नह है — वही नयंत्रण है। उसके बना सुरेश यह दावा ही नह कर सकता था क
a g la
s e mकरने को कुछ होता ही नह । साथ ही उसे प्रत्येक स्लाइड पर कई क्षेत्र गनकर
a
अंकुरण शकरा से हुआ, क्य क तुलना
agत्रl ामक हो सकता है।
औसत लेना चा हए; एक ही क्षे
co m
m .
m as e
.co
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प्र.11 नीचे दए गए चत्र को दे खए और दए गए संकेत के आधार पर पता लगाइए क इन पुष्प म कस प्रकार का
परागण हुआ होगा — टमाटर: पुंकेसर व तकाग्र को ढक लेते ह। गे ँ: पुष्प परागण के प ात खुलते ह। पपीता:
नर और मादा पुष्प प्रायः अलग-अलग पपीते के पेड़ पर होते ह।
टमाटर गे ँ पपीता
प्रश्न 11, पृष्ठ 226 — प्रश्न के साथ छपे तीन चत्र के पुनः च त्रत रेखा चत्र: खला हुआ टमाटर का पुष्प तथा वही पुष्प
पाश्व दृश्य म; गे ँ क स्पाइकलेट; और पपीते के पुष्प — शा खत लटकते गुच्छे पर लगे छोटे पुष्प तथा तने से सटे बड़े
पुष्प। प्रत्येक चत्र के नीचे छपा संकेत ऊपर प्रश्न म दया है।
टमाटर और गे ँ म स्व-परागण होता है; पपीते म पर-परागण होना ही पड़ता है। हर संकेत अकेले ही प्रश्न का उत्तर तय कर दे ता
है।
पुष्प दया गया संकेत परागण का संकेत से यह क्य तय होता है
प्रकार
टमाटर पुंकेसर व तकाग्र को स्व-परागण परागकोश व तका के चार ओर एक सटा हुआ शंकु बना लेते ह, अतः फटने
ढक लेते ह पर परागकण सीधे उसी पुष्प के व तकाग्र पर गरता है। बाहर का परागकण
इस शंकु को सरलता से पार नह कर सकता
गेहू ँ पुष्प परागण के स्व-परागण (थोड़ ा य द पुष्प के खुलने तक परागण हो ही चुका है तो वह बंद पुष्प के भीतर ही
पश्चात खुलते ह वायु-पर-परागण हुआ होगा — और भीतर उसका अपना परागकण ही उप स्थत था
संभव)
पपीता नर और मादा पुष्प पर-परागण मादा पुष्प म पुंकेसर होते ही नह , अतः उसका अपना परागकण है ही नह ।
प्रायः अलग-अलग परागकण को नर पेड़ से मादा पेड़ तक क ट (मुख्यतः पतंग ) और वायु ारा
पेड़ पर लाया जाना ही पड़ेगा
यही तक क्रयाकलाप 11.6 के मटर म फर क्य दखता है: मटर भी बंद कली के भीतर ही स्व-परागण कर लेता
है, इसी लए पहले से खले मटर के पुष्प से पुंकेसर हटाने पर भी फली बन गई। गे ँ भी ऐसा ही करता है। जब भी
पुस्तक कहे क पुष्प ‘परागण के पश्चात खुलता है’, तो उसे स्व-परागण क गारंट सम झए।
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संकेत: गे ँ के पुष्प एक बार खुल जाने पर कुछ परागकण वायु म नकलता है और पड़ोसी पौधे पर उतर सकता है,
अतः थोड़ा-बहुत पर-परागण भी होता है — गे ँ एक घास है और अध्याय घास को वायु-परा गत पौध म गनता है।
और टमाटर उगाने वाला जानता है क पुष्प को कं पत करती मधुमक्खी परागकोश शंकु से कह अ धक परागकण
झाड़ दे ती है, इसी लए ग्रीनहाउस म स्व-परा गत फसल के लए भी मधुम क्खयाँ रखी जाती ह।
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प्र.12 उत्तरी भारत के नचले हमालयी क्षेत्र म सेब एक महत्त्वपूण नकद फसल है जो कृषक क आजी वका म
महत्त्वपूण योगदान करती है। जलवायु प रवतन और प्राकृ तक परागणका रय क जनसंख्या म अत्य धक
गरावट के कारण सेब क उपज नरंतर घट रही है। एक शोधकता कृषक समूह ने दो अलग-अलग स्थान स्थान
‘क’ और स्थान ‘ख’ पर परीक्षणाथ सेब के दो उद्यान लगाए। स्थान ‘क’ के उद्यान म इन्ह ने सेब के पुष्प का
परागण प्राकृ तक परागणका रय ारा होने दया। स्थान ‘ख’ के उद्यान म इन्ह ने मधुमक्खी पालन क म श्रत
कृ ष तकनीक अपनाई। सेब के उत्पादन के साथ-साथ कृषक ने शहद का भी उत्पादन कया। सेब क उपज को
चत्र 11.24 म दशाया गया है। इसे फल लगने (फलधारी शाखाओं क कुल संख्या के सापेक्ष फल क संख्या)
तथा फल गरने ( वक सत हो रहे फल का समयपूव गर जाना) के आधार पर सेब के उद्यान के दो प्रकार के
प्रायो गक स्थल के संदभ म दशाया गया है। (i) शोधकता-कृषक समूह ने इस शोध काय के लए कन
प रकल्पनाओं पर वचार कया होगा? (ii) प्रयोग म कौन-कौन से व भन्न मानदं ड ह? (iii) सेब क अ धक
उपज के संदभ म परीक्षणाथ लगाए गए दो उद्यान ‘क’ और ‘ख’ के आँकड़ क तुलना और व ेषण क जए।
(iv) अपने व ेषण के आधार पर इन आँकड़ से आपने क्या नष्कष नकाला?
40
40
35
35
30
26
25
तश तिप
20
15
10 8
5
0
फल लगना फल िगरना
प ाकृितक परागण (क)
मध ुमक्खी की कालोनी के साथ (ख)
चत्र 11.24, पृष्ठ 226 — छपे हुए आलेख के अनुसार पुनः बनाया गया।
(i) प रकल्पनाएँ। प्रत्येक कारण और प्रभाव के वषय म जाँची जा सकने वाली कथन है।
1. सेब क उपज म गरावट का मुख्य कारण परागणका रय क कमी है, केवल जलवायु प रवतन नह ।
2. उद्यान म मधुमक्खी क प्रबं धत कालोनी रखने से फल लगना बढ़े गा, क्य क अ धक पुष्प का परागण होगा।
3. भली प्रकार परा गत पुष्प से भली प्रकार नषे चत, अ धक बीजयुक्त फल बनते ह जन्ह वृक्ष थामे रखता है — अतः फल
गरना घटे गा।
4. मधुमक्खी पालन वाली म श्रत कृ ष से कुल आय बढ़े गी, क्य क कृषक बड़ी सेब क फसल के साथ शहद भी लेगा।
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(ii) मानदं ड।
प्रकार इस प्रयोग म
स्वतंत्र चर परागण की िविध — के वल पाकृितक परागणकारी (स्थान ‘क’) बनाम मधुमक्खी कालोनी जोड़ ी गई (स्थान ‘ख’)
आि त चर फल लगने का पितशत और फल िगरने का पितशत
िनयंित्रत चर (समान से ब की िकस्म; वृक्षों की आयु, आकार और संख्या; िगनी गई फलधारी शाखाओं की संख्या; मृद ा और ऊँ चाई; िसंचाई,
रखे जाने चािहए) खाद और छँटाई; पीड़ कनाशी का उपयोग और उसका समय; ऋतु; िगनने की ितिथ और िविध
(iii) आँकड़ क तुलना। मु द्रत पृष्ठ पर चत्र 11.24 पढ़ने पर —
40
40
35
30 26
पितशत
20
10 8
0
फल लगना फल िगरना
पाकृितक परागण (क) मध ुमक्खी कालोनी के साथ (ख)
चत्र 11.24 अक्ष-नाम स हत पुनः बनाया गया। ध्यान द जए: हद संस्करण म x-अक्ष पर ‘फल लगना’ और ‘फल गरना’ नाम तथा मूल-
बदु पर 0 छपे ह, जब क अंग्रेज़ी संस्करण म ये दोन नाम और 0 छपे ही नह ह। दं ड के मान दोन संस्करण म समान ह।
माप स्थान ‘क’ — प्राकृ तक स्थान ‘ख’ — मधुमक्खी कालोनी प रवतन
परागण के साथ
फल लगना 26% 40% +14 पितशत िबंद ु, अथ त 54%
सापेक्ष वृिद्ध
फल िगरना 35% 8% −27 पितशत िबंद ु, अथ त 77%
सापेक्ष कमी
वास्तव में िटके 16.9% 36.8% लगभग 2.2 गुना अिधक
फल
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as e
कक्षा 9 व ान अध्याय 11 जनन — जीवन क नरंतरता
a g l AglaSem · NCERT Solutions
co m
e m.
फल लगने में वृिद्ध = 40% − 26% = 14 पितशत िबंद ु
m l as
.co
सापेक्ष वृिद्ध = (14 ÷ 26) × 100 = 53.8% ≈ 54%
m a g
l a se
g
aफल िगरने में कमी = 35% − 8% = 27 पितशत िबंदु
co m
. ag
सापेक्ष कमी = (27 ÷ 35) × 100 = 77.1% ≈ 77%
em
g l as
िटके फल = फल लगना × (100 − फल िगरना) ÷ 100 a
co m
m.
स्थान ‘क’ = 26 × (100 − 35) ÷ 100 = 26 × 0.65 = 16.9%
m as e
.co l
स्थान ‘ख’ = 40 × (100 − 8) ÷ 100 = 40 × 0.92 = 36.8%
a g
se m
अनुपात = 36.8 ÷ 16.9 = 2.2 गुन ा
g l a
a
(iv) नष्कष। मधुमक्खी क कालोनी रखने से फसल दोन चरण पर सुधरती है — अ धक पुष्प म फल लगते ह और उनम से कह
om क सीमा क समस्या है और उसे दूर कया जा सकता है। अतः a s
. cपरागण agl
अ धक फल पकने तक टके रहते ह — अतः स्थान ‘ख’ क अं तम उपज स्थान ‘क’ से कुछ अ धक दोगुनी है। इससे प रकल्पना 1
em
ब sउत्पादक के लए व्यावहा रक और कम लागत वाला उपाय है, और वह दुगुना
से 3 तक क पु ष्ट होती है: सेब क उपज म गरावट मुख्यतः
मधुमक्खी पालन वाली म श्रत कृ ष हमालयी सेa
लाभ दे ता है क्य क शहद भी मलता है। a
gl
co m
m .
se
अ धक परागण से फल गरना भी क्य घटता है, केवल फल लगना ही नह : सेब का फल तभी सामान्य रूप से
o m l a
g ारा भरपूर परागण प्र त पुष्प
.cफल बनता है और वृक्ष ऐसे फल को छोटा रहते ही गरा दे ता है। मधुम क्खय
वक सत होता है जब उसके पयाप्त बीजांड नषे चत हुए ह । जस पुष्प को कुछ ही परागकण मले उससे कम बीज
m a
aseअ धक बीजांड को नषे चत करता है, अतः बनने वाले फल अ धक बीजयुक्त होते ह और टके रहते ह। चत्र 11.24
वाला
agl के दोन दं ड वस्तुतः एक ही कारण के दो दृश्य ह।
se m
com g l a
m . a
ase
संकेत — अ भकल्प क एक कमी जसका नाम लेना चा हए: दोन उद्यान दो भन्न स्थान पर ह, अतः मृदा,
a gl
ऊँचाई, मौसम और आसपास क वनस्प त वास्तव म नयं त्रत नह ह। अंतर का कुछ भाग मधुम क्खय के बजाय
स्थान के कारण भी हो सकता है। अ धक सुदृढ़ अ भकल्प वह होता जसम यह तुलना कई यु ग्मत स्थान पर दोहराई
co
जाती, या एक ही उद्यान के आधे भाग म मधुमक्खी कालोनी रखी जाती और आधा भाग बना उपचार के छोड़ा
m
m .
as e
जाता।
m l
m .co a g
l a se
ag एक वद्याथ का दावा है क ‘मानव म अंडोत्सग सदै व मा सक धम के 14व दन होता है।’ कथन क
.c
m
प्र.13
m
ववेचनात्मक रूप से जाँच क जए और बताइए क दावा सही है या नह । अपने उत्तर के लए कम-से-कम दो
a s e
. co agl
कारण द जए।
e m
g l as
उत्तर a
m
यह दावा सही नह है। 28 दन के चक्र के लए 14वाँ दन एक उ चत औसत है, पर ‘सदै व’ शब्द इस कथन को गलत बना दे ता है।
. co
e m
m l as
.co a g
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कारण 1 — चक्र क लंबाई ही व्य क्त-दर-व्य क्त बदलती है। अध्याय बताता है क चक्र सामान्यतः प्रत्येक 21 – 35 दन म
दोहराया जाता है। 14वाँ दन केवल 28 दन के चक्र का मध्य बदु है। कह अ धक स्थर रहने वाली बात यह है क अंडोत्सग और
अगले मा सक धम के बीच लगभग 14 दन का अंतर होता है। उसी से पीछे गनने पर —
अंडोत्सग का िदन ≈ च क्र की लंबाई − 14 िदन
21 िदन का चक्र: 21 − 14 = िदन 7
28 िदन का चक्र: 28 − 14 = िदन 14
35 िदन का चक्र: 35 − 14 = िदन 21
िदन 7
21 िदन 14 िदन
िदन 14
28 िदन 14 िदन
िदन 21
35 िदन 14 िदन
िदन 1 = मािसक धम का पहला िदन। अंडोत्सग के बाद का अंतराल लगभग 14 िदन
रहता है, पहले का नही ं।
अंडोत्सग अगले मा सक धम के सापेक्ष स्थर है, पछले के सापेक्ष नह — इसी लए उसका दन चक्र क लंबाई के साथ खसक जाता है।
कारण 2 — एक ही व्य क्त म भी चक्र स्थर नह रहता। उसक लंबाई माह-दर-माह बीमारी, तनाव, यात्रा, भार म प रवतन,
अ धक शारी रक प रश्रम, थायरॉइड क गड़बड़ी, पी.सी.ओ.एस. और स्तनपान के साथ बदलती है। चक्र आरंभ होने के (अध्याय के
अनुसार 10 – 14 वष क आयु म) पहले एक-दो वष प्रायः अ नय मत रहते ह और लगभग 50 वष क आयु म रजो नवृ त्त से पहले
के वष भी। कुछ चक्र म अंडाणु मुक्त होता ही नह ।
दावे को सही ढं ग से कैसे कहा जाए: ‘एक प्रारू पक 28 दन के चक्र म अंडोत्सग लगभग 14व दन होता है।’
अध्याय का अपना चत्र 11.21 सावधानी से स्वयं को 28 दन क अव ध वाले एक प्रारू पक रजोधम के प्रमुख चरण
कहता है — अथात एक प्र त न ध स्थ त, कोई नयम नह ।
संकेत: यह केवल शब्द क बारीक नह है। कैलडर से ‘सुर क्षत अव ध’ नकालना यही मानकर चलता है क
अंडोत्सग कसी न श्चत दन होता है, और यह मान्यता गलत होने के ही कारण ऐसी गणना गभ रोकने क
अ वश्वसनीय व ध है।
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प रयोजना काय — पृष्ठ 227
प रयोजना काय
प रयोजना काय
प्र.1 भारत सरकार ारा संचा लत ‘बीज ग्राम योजना’ के वषय म प ढ़ए। दे शी बीज का संरक्षण क्य महत्त्वपूण है?
योजना क्या है। बीज ग्राम योजना के अंतगत एक गाँव चुना जाता है और उसके कृषक के समूह को आधार अथवा प्रमा णत बीज
अनुदा नत दर पर दया जाता है, साथ ही बीज उत्पादन, सफाई, उपचार, भंडारण और परीक्षण का प्र शक्षण भी। फर वह गाँव
अपना गुणवत्तापूण बीज स्वयं तैयार करता है और आसपास के गाँव को दे ता है, जससे अच्छा बीज कृषक को स्थानीय स्तर पर
और सस्ते म मल जाता है और हर ऋतु म दूर से खरीदना नह पड़ता।
दे शी बीज का संरक्षण क्य आवश्यक है —
वे स्थान के अनुकूल पहले से ढले हुए ह। उसी मृदा, वषा और ताप म पी ढ़य तक हुए चयन ने उन्ह स्थानीय प र स्थ तय और
स्थानीय पीड़क के अनुकूल बना दया है — प्रायः कसी नई कस्म से कम जल और कम उवरक म।
वे उपयोगी जीन का भंडार ह। जो रोग भ वष्य म गंभीर बनेगा उसका प्र तरोध आज केवल कसी पुरानी स्थानीय कस्म म हो
सकता है। वह कस्म खो गई तो जीन भी उसी के साथ खो जाएगा और उसे लौटाया नह जा सकता।
कृषक उन्ह बचाकर फर बो सकता है। दे शी कस्म शुद्ध रूप से पीढ़ आगे बढ़ाती ह, अतः उपज का एक भाग अगले वष का
बीज बन जाता है। संकर बीज ऐसा नह करता और हर ऋतु म नया खरीदना पड़ता है।
व वधता एक बीमा है। य द पूरा क्षेत्र एक ही कस्म बोए और वह कस्म वफल हो जाए तो पूरा क्षेत्र वफल हो जाता है —
प्रश्न 7 का पाठ बीज पर लागू।
वे स्वाद, पोषण और संस्कृ त बचाते ह। स्थानीय धान, बाजरा और दाल ऐसे पाक-गुण और पोषण-मान लए होती ह जो
एकरूप व्यापा रक कस्म म प्रायः नह मलते।
नमूना उत्तर (आपक रपोट के लए 2 – 3 वाक्य): “बीज ग्राम योजना कृषक को अपने ही गाँव म गुणवत्तापूण
बीज उत्पन्न और सं चत करने का प्र शक्षण दे ती है, जससे अच्छा बीज स्थानीय स्तर पर कम मूल्य म उपलब्ध हो
जाता है। दे शी बीज का संरक्षण इस लए आवश्यक है क वे हमारी अपनी मृदा और जलवायु के अनुकूल ह, उन्ह
प्र तवष बचाकर फर बोया जा सकता है, और उनम ऐसे प्र तरोध जीन ह जनक हम भ वष्य म आवश्यकता पड़
सकती है। उन्ह खो दे ने पर हम कुछ ही एकरूप कस्म पर नभर रह जाएँगे और तब एक ही नया रोग पूरी फसल को
प्रभा वत कर सकता है।”
अच्छा काय कैसे कर: पास के बीज कद्र, कृ ष व ान कद्र या ऐसे कृषक के पास जाइए जो अपना बीज स्वयं
बचाता है। पू छए क उनके दादा-परदादा कौन-सी कस्म उगाते थे और उनम से कौन-सी आज भी बोई जाती ह।
बीज के चत्र ली जए और उन पर नाम ल खए।
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प्र.2 आई.वी.एफ. के वषय अथात इसके उपयोग और क मय पर एक रपोट तैयार क जए। अपनी कक्षा म इस पर
चचा क जए।
आई.वी.एफ. क्या है। पात्रे नषेचन (in-vitro fertilisation) म अंडाणु और शुक्राणु को मादा के शरीर के बाहर, सामान्यतः
प्रयोगशाला के एक संवधन पात्र म, यु ग्मत कराया जाता है। नषे चत अंडे को कुछ दन वभा जत होने दया जाता है और फर उसे
गभाशय म रो पत कर दया जाता है, जहाँ गभावस्था सामान्य रूप से आगे बढ़ती है। इस व ध से जन्मे शशु को प्रायः ‘टे स्ट ूब
बेबी’ कहा जाता है, यद्य प युग्मन वास्तव म परखनली म नह , संवधन पात्र म होता है।
इस कहानी म भारत का स्थान। वष 1978 म कोलकाता के सुभाष मुखोपाध्याय ने प्रायो गक आई.वी.एफ. काय के माध्यम से
भारत क प्रथम टे स्ट ूब बेबी, कनु प्रया अग्रवाल (उपनाम ‘दुगा’) के जन्म म अग्रणी भू मका नभाई। इसी अध्याय म आपको पी.
माहेश्वरी भी मलते ह, ‘भारतीय ूण व ान के जनक’, जन्ह ने परखनली म अंडाणु और नर युग्मक का सफलतापूवक युग्मन
कराके पुष्पी पादप म पात्रे नषेचन क तकनीक वक सत क और नए संकर पौधे तैयार कए।
उपयोग क मयाँ
िजन दंपित्तयों में िडंबवािहनी अवरुद्ध हो और शुक्राण ु तथा अंडाण ु महँगी — पायः साधारण पिरवार की पहचु ँ से बाहर, और कई पयास
स्वाभािवक रूप से न िमल पाएँ, उनकी सहायता करने पड़ सकते है ं
शुक्राणओ
ु ं की संख्या या गितशीलता कम होने पर सहायक शारीिरक रूप से कष्टसाध्य — हाम न के इंजेक्शन, बार-बार जाँच और
छोटी पिक्रयाएँ
अंडाण ु िनयिमत रूप से मुक्त न होने पर सहायक भावनात्मक रूप से तनावपूण, िवशेषकर जब कोई पयास िवफल हो
कीमोथेरै पी जैसे उपचार से पूव पजनन-क्षमता सुर िक्षत रखने में सफलता की गारंटी नही;ं पित पयास संभावना स्त्री की आयु बढ़ ने के
सहायक साथ स्पष्ट रूप से घटती है
कु छ गंभीर आनुवंिशक िवकारों को अगली पीढ़ ी में जाने से रोकने में जुड़वाँ या तीन िशशुओं की संभावना अिधक, अतः समय-पूव और कम
सहायक भार वाले िशशुओं का जोिखम
पारंिभक मानव िवकास की हमारी समझ को आगे बढ़ ाया है शेष भूणों का क्या िकया जाए, यह पश्न उठता है; और िलंग चयन के
िलए दुरुपयोग संभव है, जो भारत में अवैध है
रपोट का ढाँचा: (1) आई.वी.एफ. क्या है, तीन वाक्य म; (2) चरण — हाम न उपचार से लेकर अंडाणु संग्रह, पात्र
म नषेचन और रोपण तक; (3) ऊपर जैसी उपयोग बनाम क मयाँ क ता लका; (4) भारतीय कहानी — सुभाष
मुखोपाध्याय, 1978, और उनके काय को जीवनकाल म मान्यता क्य नह मली; (5) कानून — भारत म प्रसव-पूव
लग का पता लगाना प्र तबं धत है और लगानुपात के लए यह क्य महत्त्वपूण है; (6) आपका अपना नष्कष।
कक्षा-चचा के लए: आरंभ करने का एक अच्छा प्रश्न है — क्या इतनी महँगी तकनीक सरकारी च कत्सालय म
उपलब्ध होनी चा हए? नणय से पहले कक्षा से दोन पक्ष म तक कहलवाइए।
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प्र.3 फसल युक्त खेत का सवक्षण क जए। कृषक से उनके खेत म उगाई जाने वाली फसल और कृ ष पशुओं के
वषय म नम्न ल खत बदुओं के आधार पर वातालाप क जए। (i) वे कन फसल को का यक प्रवधन के माध्यम
से उगाते ह? (ii) वे बीज का उपयोग करके कौन-सी फसल उगाते ह? (iii) वे कन बीज का उपयोग करते ह —
दे शी कस्म या संकर कस्म? ऐसा क्य है? वे अपने खेत म संकर कस्म कस प्रकार वक सत करते ह? (iv)
कृषक ारा अपनी खेती म उपयोग कए जाने वाले पशुओं क दे शी नस्ल और संकर नस्ल क सूची बनाइए
और बताइए क वे एक-दूसरे से कस प्रकार भन्न ह? (v) कक्षा म चचा क जए क कृ ष म अल गक और ल गक
जनन व धयाँ कस प्रकार उपयोगी ह? इस वषय पर एक रपोट बनाइए।
सवक्षण कैसे कर। पाँच प्रश्न पहले से तैयार कर ली जए, तीन-चार खेत पर जाइए ता क उत्तर क तुलना हो सके, बात वह लख
ली जए — याद के भरोसे मत र हए, अनुम त लेकर फसल और पशुओं के चत्र ली जए, और कृषक को धन्यवाद द जए। लखने
से पहले सारी बात ता लका म सजा ली जए।
बदु क्या दे खना है प्रायः मलने वाले उत्तर
(i) काियक वे फसल जो बीज से नह , गन्ना (कतन), आलू (कं द ), अदरक और हल्दी (पकं द ), के ला (सकर या ऊतक संविधत
पवधन पौधे के कसी भाग से पादपक), आम और नीबू वग (कलम), गुल ाब और गुड़हल (कतन)
लगाई जाती ह
(ii) बीज वे फसल जो हर ऋतु बीज गेहू,ँ चावल , मक्का, सरसों, चना, अरहर, मूँगफली, अिधकांश सिब्जयाँ
वाली फसले ं से बोई जाती ह
(iii) दे शी या कौन-सा और क्य अिधक उपज और रोग-पितरोध के िलए संकर, पर हर वष नया खरीदना पड़ ता है; स्वाद ,
संक र बीज भंडारण, कम लागत और अपना बीज बचा सकने के कारण दे शी
(iv) पशुओ ं दे शी बनाम संकर दे शी — साहीवाल , िगर, थारपारकर गाय, मुर भैसं ; संकर — होल्सटीन फ ीिजयन और जस
की नस्ले ं संकर। दे शी नस्ले ं गम और रोग सह ले ती है ं और कम दे खभाल माँगती है;ं संकर अिधक दू ध
दे ती है ं पर उ न्हे ं बेहतर चारा, आवास और पशु-िचिकत्सा चािहए
(iii) पर — संकर कैसे बनाया जाता है। अ धकांश कृषक संकर बीज बनाते नह , खरीदते ह, अतः उन्ह (और अपनी रपोट म)
यह समझाना उपयोगी है क वह बनता कैसे है: एक जनक वंशक्रम के पुष्प से प रपक्व होने से पहले पुंकेसर हटा दए जाते ह, पुष्प
को थैली से ढक दया जाता है ता क बाहर का परागकण न आए, और फर चुने हुए दूसरे जनक का परागकण हाथ से स्थानांत रत
कया जाता है। यही अध्याय म व णत कृ त्रम संकरण है और यही अभ्यास प्रश्न 1 क स्थ त है।
(v) के लए नमूना नष्कष: “अल गक व धयाँ वहाँ काम आती ह जहाँ कृषक को पहले से चुनी हुई कस्म के
अनेक समरूप पौधे चा हए — गन्ना, आलू, केला, आम। ये शीघ्र ह, कस्म को यथावत रखती ह, और केले तथा गन्ने
के लए तो यही एकमात्र उपाय है। ल गक व धयाँ वहाँ काम आती ह जहाँ बीज चा हए — गे ँ, चावल, दाल —
क्य क बीज सरलता से सं चत और प रव हत होता है और दो जनक के संकरण से अ धक उपज तथा बेहतर रोग-
प्र तरोध वाली नई कस्म बनती ह। कृषक दोन का उपयोग करता है: जो सद्ध हो चुका है उसे बढ़ाने के लए
अल गक जनन, और जो नया चा हए उसे बनाने के लए ल गक जनन।”
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em पर चचा
प्र.4 अपने वद्यालय के पास के फसल युक्त खेत का अन्वेषण क जए और अनाज तथा सब्जी क फसल के व भन्न
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o व भन्न फसल के परागणकारी (ii) परागणका रय क घटती जीव संaख्gयाl के कारण और उनके
पौध ारा अपनाई जाने वाली परागण यु क्तय का पता लगाइए। कृषक से नम्न ल खत बदुओं
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em अपने वद्यालय के उद्यान म आने वाले परागणका रय का अवलोकन क जए। इनक क्रयाओं को
क जए।
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gl दे खए और ल खए। प्रत्येक वद्याथ कम-से-कम पाँच भन्न प्रकार के परागणका रय और जन पौध पर वे
समाधान।
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परागण के लए जाते ह, उनके चत्र ली जए। इस वषय पर आँकड़े संक लत क जए एवं अपने काय को प्रद शत
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क जए तथा चचा क जए क व भन्न पौध म परागण कस प्रकार होता है।
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अवलोकन कैसे कर। परागणकारी प्रायः प्रातः 8 से 11 बजे के बीच सबसे अ धक स क्रय रहते ह। कोई एक पु ष्पत पौधा चु नए,
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लगभग एक मीटर दूर स्थर बै ठए और दस मनट उसे दे खए। ल खए — कौन आया, कब आया, कतनी दे र रुका और पुष्प के
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कस भाग को छु आ। फर कसी दूसरे पौधे पर दोहराइए। क ट का पीछा या पकड़ मत क जए — उनके चत्र ली जए।
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फसलm .co a gदेlख सकते ह
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/ पौधा परागण परागणकारी या माध्यम जो संकेत आप
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गेहू,ँ चावल, मक्का कोई नह — वायु-धाराएँ छोटे हरे पुष्प, गंधहीन, भारी मात्रा म सूखा चू णल
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परागकण, लंबा पंखनुमा व तकाग्र
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a म क्खयाँ
सरसों, सूर जमुखी, मधुम क्खयाँ, भँवरे, तत लयाँ, चटक ले दल, सुगंध, मकरंद, चप चपा या काँटेदार
क ,ू खीरा परागकण
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टमाटर, बैगं न, िमच, पुष्प के अपने परागकोश व तकाग्र के चार ओर परागकोश, अथवा पुष्प खुलने से
मटर, गेहू ँ
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पहले ही परागण पूरा
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पपीता,.cकुo
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नर और मादाgपुष्प अलग-अलग पौध पर
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छ क वू ग य पतंगे, क ट, वायु
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(अिनवायतः)
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पक्षी
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कोरल टी, ग ड
ु ़ हल बबूना (इं डयन व्हाइट-आई), बड़े, मजबूत, चटक ले पुष्प जनम भरपूर मकरंद
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शकरखोरा
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वैिलसनेिरया, हाइिडला जल-धाराएँ जलीय पौधे; परागकण जल क सतह पर बहता है
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(ii) परागणकारी क्य घट रहे ह और क्या कया जा सकता है।
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