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NCERT Solutions Class 9 Science Chapter 12 जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

AglaSem पर कक्षा 9 विज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण (अन्वेषण) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Science Chapter 12 Patterns in Life Diversity and Classification (Exploration), Hindi Medium.
NCERT Solutions Class 9 Science Chapter 12 जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण - Page 1 of 81

About NCERT Solutions Class 9 Science Chapter 12 जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण

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NCERT Solutions Class 9 Science Chapter 12 जीवजगत का स्वरूप — विविधता एवं वर्गीकरण – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा9

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 12: जीवजगत का स्वरूप —
व वधता एवं वग करण

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — अन्वेषण

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

228 – 251 25 76 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 80 pages

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · व ान · अन्वे ष ण

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 12: जीवजगत का स्वरूप —
व वधता एवं वग करण
पृथ्वी पर जीव क संख्या करोड़ म है, इस लए उनका अध्ययन तभी संभव है जब उन्ह व्यव स्थत कया जाए। यह अध्याय दखाता है क अरस्तू के
पयावास आधा रत समूहन से चलकर वैज्ञा नक व्हटे कर क पाँच जगत प्रणाली तक कैसे पहुँचे — को शका प्रकार, को शका संरचना, संगठन का
स्तर, पोषण क व ध और पा र स्थ तक य भू मका के आधार पर। फर पादप जगत को थैलोफाइटा से एं जयोस्पम तक और जंतु जगत को पोरीफेरा से
कशेरुक तक क्रम म रखा गया है, और अंत म नाम पद्ध त तथा जैव व वधता पर मंडराते खतरे क चचा है।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

अन्वेषण (कक्षा 9) 228 – 251

खं ड प्रश्न

25 76

माध्यम

हन्द

चतन क जए — पृष्ठ 228
अध्याय का आरंभ

चतन क जए

प्र.1 जैव व वधता से आपका क्या अ भप्राय है?

जैव व वधता का अथ है पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीव क असीम व वधता — नग्न आँख से दखाई न दे ने वाले सूक्ष्मदश य
जीव से लेकर वशाल वृक्ष तक, चमकदार जैली फश से लेकर आकाश म ऊँची उड़ान भरते गरुड़ तक; जीवन असंख्य रूप और
पयावास म पाया जाता है।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

यह क्य महत्त्वपूण है: जैव व वधता केवल नाम क सूची नह है, यह वह तंत्र है जो पृथ्वी को चलाए रखता है।
अध्याय चार ऐसे काय बताता है जो भन्न- भन्न जीव समूह करते ह और इनम से हर एक वह कड़ी है जस पर शेष
जीवन टका है।

महासागर के सूक्ष्मदश य शैवाल अ धकांश ऑक्सीजन नमुक्त करते ह जसे हम श्वास ारा ग्रहण करते ह।
कवक और जीवाणु गरी प त्तय को अपघ टत करते ह और अप शष्ट को खाद म बदलकर मृदा को उवर बनाते
ह।
पक्षी, मधुम क्खयाँ और चमगादड़ पुष्प का परागण करते ह जससे बीज और फल बनते ह।
पादप सूय के प्रकाश को अवशो षत करके वह भोजन बनाते ह जो पृथ्वी के लगभग प्रत्येक जीव को जीवन दे ता
है।

इनम से कोई एक कड़ी हटा द जए तो शेष कमज़ोर पड़ जाती ह। इसी लए अध्याय कहता है क यह अंतसबंध
पा र स्थ तक तंत्र को बनाए रखता है और पृथ्वी को सजीव के लए अनुकूल बनाता है।

ध्यान द जए: जैव व वधता एक से अ धक स्तर पर मापी जाती है — जा तय क व वधता, एक ही जा त के
भीतर क व वधता ( कसान ारा सहेजी गई धान क व भन्न कस्म), और पयावास तथा पा रतंत्र क व वधता
(मग्रोव, मरुस्थल, प्रवाल भ त्त)। इन तीन ही दृ ष्टय से भारत वश्व के सबसे समृद्ध दे श म गना जाता है।

प्र.2 व वधता को समझने के लए जीव का समूहन कस प्रकार हमारी सहायता करता है?

समूहन एक अव्यव स्थत सूची को खोजने योग्य ढाँचे म बदल दे ता है — और चूँ क समूहन समान वशेषताओं के आधार पर
होता है, इस लए यह ढाँचा स्वयं यह सूचना रखता है क जीव आपस म कस प्रकार संबं धत ह।

यह कैसे काय करता है: अध्याय का अपना उदाहरण पुस्तकालय का है। कल्पना क जए क हजार पुस्तक तल पर
बखरी ह और आपको ऑन द ओ र जन ऑफ स्पीशीज चा हए। वषय, लेखक और अनुभाग के बना आपको हर
पुस्तक दे खनी पड़ेगी। करोड़ जीव के साथ भी यही समस्या है। समान गुण के आधार पर छाँटने से एक साथ तीन
काम होते ह —

सूचना सं क्षप्त हो जाती है। जैसे ही आप जान गए क कोई जंतु आ पोड है, आपको यह भी पता चल गया
क उसका शरीर खंडयुक्त है, उसम सं धत उपांग ह और ब हःकंकाल है — हर क ट, केकड़े और मकड़ी के लए
ये तथ्य अलग से याद नह करने पड़ते।
पूवानुमान संभव होता है। य द कसी नए जीव क को शका भ त्त काइ टन क है और वह अवशोषण से
पोषण लेता है, तो उसे फंजाई म रखकर आप शेष कवक य लक्षण क अपेक्षा कर सकते ह।
संबंध दखते ह। समान वशेषताएँ समान पूवज क ओर संकेत करती ह, इस लए ये समूह मनमाने डब्बे नह
ब ल्क जीवन के वास्त वक इ तहास के चह्न ह।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

करके दे खए: अपने आस-पास के दस जंतुओं को पहले पयावास के आधार पर समू हत क जए, फर उन्ह दस को
खान-पान के आधार पर। सू चयाँ बदल जाएँगी। कस समूहन ने आपको यह अ धक बताया क जंतु कस प्रकार बने
ह? यही तुलना क्रयाकलाप 12.1 करवाता है।

प्र.3 पादप और जंतुओं को कस आधार पर वग कृत कया जाता है?

दोन का वग करण उन वशेषताओं पर होता है जो समान पूवज से मली ह — वैज्ञा नक पहले व्यापक और सरलता से दखाई दे ने
वाली वशेषताएँ दे खते ह, फर सूक्ष्म वशेषताएँ। अध्याय सात प्रकार के प्रमाण गनाता है।

मानदं ड कसक तुलना होती है

बाह्य िवशेषताएँ आकार, आमाप और शारी रक संगठन

पोषण की िविध स्वपोषी अथवा वषमपोषी

आंतिरक संर चनाएँ कंकाल पैटन, अंग क उप स्थ त अथवा अनुप स्थ त, ऊतक के प्रकार

कोिशका संर चना एकको शक य या बहुको शक य; सुकद्रक या पूवकद्रक ; को शका भ त्त उप स्थत या अनुप स्थत

पािरिस्थितकीय भूिमका उत्पादक, उपभोक्ता अथवा अपघटक

जनन अल गक और/अथवा ल गक व धयाँ

आनुवंिशक समानता वंशागत गुण क समानताएँ, जनका अध्ययन डीएनए से कया जाता है

दोन जगत के भीतर पुस्तक एक-एक नणायक लक्षण लगाती है —

प्लांट को पाँच वग म इस आधार पर बाँटा गया है क पादप काया जल से कतनी दूर आ चुक है — थैलस (थैलोफाइटा),
मूलाभास कतु संवहनी ऊतक नह ( ायोफाइटा), वास्त वक जड़-तना-पत्ती के साथ जाइलम-फ्लोएम (टे रडोफाइटा), अनावृत
बीज ( जम्नोस्पम), फल म बंद बीज (एं जयोस्पम)।
ए नमे लया को पहले पृष्ठरज्जु पर बाँटा जाता है — अकशेरुक म यह नह होती, कॉडट म जीवन म कम-से-कम एक बार होती
है — और फर संगठन के स्तर, सम म त, दे हगुहा, खंडीभवन और कंकाल पर।

संकेत: अच्छा वग करण लक्षण वह है जो सरलता से बदलता न हो और वंशागत हो। पयावास खराब लक्षण है —
व्हेल, मछली और झ गा तीन जल म रहते ह परंतु इनक शरीर रचना पूणतः भन्न है।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण
a g l AglaSem · NCERT Solutions

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वग करण कृ ष क समस्याओं को दूर करने म कस प्रकार सहायक है?
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क्य gकl कसान क समस्याएँ — पीड़क, रोग, कमज़ोर मृदा, सूखा, परागण — सब व शष्ट जीव से जुड़ी समस्याएँ ह, और जस
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जीव क सही पहचान न हो उसका प्रबंधन नह कया जा सकता।

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व्यवहार म यह कैसे काम आता है:

मत्र और शत्रु म अंतर। अध्याय इसी g l a
a प्रश्न से आरंभ होता है — कुछ क ट फसल क रक्षा करते ह जब क कुछ
उन्ह क्ष त पहुँचाते ह। इंद्रगोप (लेडीबड) भृंग और पत्ती खाने वाला भृंग दोन आ पोडा ह, परंतु वंश स्तर तक
क सही पहचान ही तय करती है क कसे बचाना है और कसे नयं त्रत करना है।
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सही कस्म का चयन। सहस्र वष से कृषक उपयोगी वशेषताओं वाली कस्म संर क्षत करते
a s emआए ह — सूखा
. a gl कौन-सी कस्म म कौन-सा
coता, पीड़क प्र तरोधकता और न्यून पोषक तत्व वाली मृदा म उगने क क्षमता।
eगुmण है, यह जानना वग करण का ही काय है, और इसी लए व वधता से फसल के नष्ट होने का जो खम कम
स हष्णु

g l as होता है और खाद्य सुरक्षा सुदृढ़ होती है।
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उपयोगी सूक्ष्मजीव का उपयोग। राइजो बयम (मोनेरा) दलहन क मूल ग्रं थकाओं म नाइ ोजन स्थरीकरण
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करता है; लैक्टोबै सलस खाद्य पदाथ म उपयोगी है। कवक अपघटक ह जो मृदा म ख नज मुक्त करते ह। इन

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glम क्खयाँ और चमगादड़ परागण करते ह। फल और बीज बनना इन्ह पर
सबका सु नयो जत उपयोग तभी संभव है जब इनक पहचान और नामकरण हो चुका हो।
परागणकताओं क रक्षा। पक्षी,aमधु
नभर है, अतः यह जानना क कस फसल का परागण कौन करता है, कसान को बताता है क कब और क्या

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छड़काव नह करना है।

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m आप जानते ह? यही तक उल्ट दशा म भी लागू होता है। मशरूम क खेती अब आजी वका का आशाजनक a g
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agl साधन बन रही है, परंतु वन से मशरूम सुर क्षत रूप से वही समुदाय एकत्र कर सकते ह जन्ह भरोसेमंद ज्ञान है क
कौन-से जंगली मशरूम खाद्य ह और कौन-से वषैले — यह लोक व गक ठ क वही काय कर रही है जो वैज्ञा नक
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वग करण करता है।
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क्रयाकलाप 12.1 — पृष्ठ 230 – 231
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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

आइए, तुलना और वग करण कर — 12.3 जीव का वग करण कैसे कर?

क्रयाकलाप 12.1

प्र.1 चत्र 12.2 कसी पा रतंत्र म जंतुओं क व वधता को दशा रहा है। चत्र का सावधानीपूवक अवलोकन क जए।
क्या आप अनुमान लगा सकते ह क इस चत्र म जीव को कस प्रकार समू हत कया गया है?

िद न — पकािशत भाग रात — अंधकारमय भाग

ि व ता न तथ ा खुल ा आका श ि व ता न तथ ा खुल ा आका श

गरुड़ िततली व्याध पतंग चमगादड़ उ ल्लू

तने तथ ा शा खा ए ँ तने तथ ा शा खा ए ँ

मोर लंगूर लाॅ यन टे ल्ड मकाक अजगर लोिरस

व न भूि म व न भूि म

ते ंदुआ चीतल बाघ
साही कस्तूरी िबलाव

जुगनू
भालू िगलहरी

जलधा रा तथ ा ि कना रे जलधा रा तथ ा ि कना रे

छोटे पक्षी खरगोश मेंढक मगर

चत्र 12.2, पृष्ठ 230 — पाठ्यपुस्तक के चत्र “एक पा रतंत्र का दन और रात का दृश्य” का पुनःआरे खत रेखा चत्र।
वन का एक ही भाग दो बार दखाया गया है — बाईं ओर प्रका शत ( दन का) भाग और दाईं ओर वही स्थान रात म;
बीच म बड़ा तना। प्रत्येक जंतु वन के उसी स्तर म बनाया गया है जसम मूल चत्र उसे दशाता है।

चत्र बीच से समय के आधार पर बँटा है, जंतु के प्रकार के आधार पर नह । बायाँ आधा भाग वही वन दन के प्रकाश म है और
दायाँ आधा भाग वही वन रात म। अथात चत्रकार ने जंतुओं को इस आधार पर समू हत कया है क वे कब स क्रय होते ह — दन म
स क्रय ( दवाचर) प्रका शत ओर, रात म स क्रय ( नशाचर) अँधेरी ओर।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

यह कैसे पहचान: ऐसे जंतु ढूँ ढ़ए जो स्पष्ट रूप से कसी एक के लए बने ह ।

प्रका शत ओर — मोर, उड़ता हुआ गरुड़, चीतल, तदुआ, बाघ, भालू, लंगूर, लाॅयन टे ल्ड मकाक, ततली, व्याध
पतंग, छोटे पक्षी और जल के कनारे खरगोश। ये सब दन के प्रकाश म दे खकर शकार करते या भोजन खोजते
ह।
अँधेरी ओर — चमगादड़, शाखा पर बैठा उल्लू, टहनी पर लपटा अजगर, बड़ी आँख वाला लो रस, साही,
कस्तूरी बलाव ( सवेट), जल म मगर, और जुगनू। बड़ी आँख, तीव्र श्रवण और चमकते संकेत — ये सब रात के
उपकरण ह।

पयावास भी इन्ह ऊपर-नीचे बाँटता है — वतान, तना, वन भू म, जल — परंतु शीषक जस समूहन का नाम लेता है
वह दन-रात वाला है: एक पा रतंत्र का दन और रात का दृश्य।

स्वयं जाँ चए: वही वन दो बार दखाया गया है, अतः जो जंतु दोन ओर मले वह दन और रात दोन समय स क्रय
है। अगले प्रश्न का भाग (iii) यही पूछता है।

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प्र.2 दए गए चत्र म आप कौन-कौन से जंतुओं को पहचान सकते ह?

िद न — पकािशत भाग रात — अंधकारमय भाग

ि व ता न तथ ा खुल ा आका श ि व ता न तथ ा खुल ा आका श

गरुड़ िततली व्याध पतंग चमगादड़ उ ल्लू

तने तथ ा शा खा ए ँ तने तथ ा शा खा ए ँ

मोर लंगूर लाॅ यन टे ल्ड मकाक अजगर लोिरस

व न भूि म व न भूि म

ते ंदुआ चीतल बाघ
साही कस्तूरी िबलाव

जुगनू
भालू िगलहरी

जलधा रा तथ ा ि कना रे जलधा रा तथ ा ि कना रे

छोटे पक्षी खरगोश मेंढक मगर

चत्र 12.2, पृष्ठ 230 — पाठ्यपुस्तक के चत्र “एक पा रतंत्र का दन और रात का दृश्य” का पुनःआरे खत रेखा चत्र।
वन का एक ही भाग दो बार दखाया गया है — बाईं ओर प्रका शत ( दन का) भाग और दाईं ओर वही स्थान रात म;
बीच म बड़ा तना। प्रत्येक जंतु वन के उसी स्तर म बनाया गया है जसम मूल चत्र उसे दशाता है।

चत्र 12.2 को पूरे आकार म दे खने पर नम्न ल खत जंतु दखाई दे ते ह —

समूह चत्र 12.2 के जंतु

स्तनधारी बाघ , तेदं ुआ , भालू, चीतल , लंग ूर , लाॅयन टेल्ड मकाक , लोिरस , साही, क स्तूर ी िबलाव, चमगादड़, खरगोश

पक्षी मोर , ग रुड़, उ ल्लू, छोटे पक्षी

सरीस ृप शाखा पर अजगर , जल में मगर

उभयचर जल के िकनारे मेंढक

कीट व अन्य आथ पोड िततिलयाँ, व्याध पतंग , जुग नू

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ध्यान द जए: आपक सूची थोड़ी भन्न हो सकती है — चत्र पढ़ा जाता है, मापा नह जाता। महत्त्वपूण यह है क
आप वही लख जो वास्तव म दे ख रहे ह, ठ क वैसे ही जैसे कोई क्षेत्र-जीव वज्ञानी सवक्षण दज करता है। ऊपर क
ता लका म जो नह है और आपको दखे, उसे भी जो ड़ए।

प्र.3 वे कस स्थान पर पाए जाते ह?

प्रत्येक जंतु वन क उसी परत म बनाया गया है जसका वह वास्तव म उपयोग करता है, और वह परत स्वयं इस बात का संकेत है
क उसका शरीर कैसा बना है।

कहाँ वहाँ दखने वाले जंतु स्थान के अनुकूल वशेषता

हवा में ऊँचा उड़ता हुआ गरुड़, चमगादड़ पंख; पक्षी में खोखली हि याँ, चमगादड़ में िझल्लीदार
पंख

पथ्ृ वी के िनकट उड़ता तत लयाँ, व्याध पतंग, जुगनू, छोटे पक्षी छोटा हल्का शरीर ; जुग नू स्वयं पकाश उ त्पन्न करता है
हआ
ु

वृक्ष / शाखाओं पर लंगूर, लाॅयन टे ल्ड मकाक, लो रस, उल्लू, अजगर, पकड़ने वाले हाथ-पैर , नखर , संतल
ु न के िलए लंबी पूँछ
छोटे पक्षी

वन भूिम पर बाघ, तदुआ, भालू, चीतल, साही, कस्तूरी बलाव, चलने-दौड़ने के िलए मजबूत पाद ; र क्षा के िलए काँटे या
खरगोश, मोर छ ावरण

जल में या जल के मगर, मढक धारारे िखत शरीर और जालयुक्त पाद ; मेंढक की नम
िनकट त्वचा

यह दज क्य कर: "कहाँ रहता है" वही मानदं ड है जसका उपयोग अरस्तू ने चौथी शताब्द सामान्य संवत् पूव म
कया था। इसे दे खना सरल है, परंतु अनुभाग 12.5 म आप दे खगे क यह क्य असफल रहा — चमगादड़ और गरुड़
दोन उड़ते ह, फर भी चमगादड़ स्तनधारी है जो अपने शशुओं को दूध पलाता है।

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चत्र म कौन-कौन से जंतु स क्रय दख रहे ह? (i) दन के समय (ii) रात के समय (iii) दन और रात दोन समय
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l a se — पकािशत भाग रात — अंधकारमय भाग

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तने तथ ा शा खा ए ँ तने तथ ा शा खा ए ँ

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साही कस्तूरी िबलाव

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वन का एक ही भाग दो बार दखाया गया है — बाईं ओर प्रका शत ( दन का) भाग और m
चत्र 12.2, पृष्ठ 230 — पाठ्यपुस्तक के चत्र “एक पा रतंत्र का दन और रात का दृश्य” का पुनःआरे खत रेखा चत्र।

m a s e दाईं ओर वही स्थान रात म;
. co a gl चत्र उसे दशाता है।
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बीच म बड़ा तना। प्रत्ये क जं त ु वन के उसी स्तर म बनाया गया है जसम मू ल

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कब स क्रय चत्र 12.2 के जंतु

(i) िदन के समय (िदवाचर) मोर , ग रुड़, चीतल , लंग ूर , लाॅयन टेल्ड मकाक , िततली, व्याध पतंग , छोटे पक्षी, भालू

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(ii) रात के समय (िनशाचर) उ ल्लू, चमगादड़, लोिरस , साही, क स्तूर ी िबलाव, जुग नू, अजगर
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(iii) िदन और रात दोनों बाघ , तेदं ुआ , मेंढक , मगर — ये िचत्र के दोनों भागों में िदखाई दे ते है ं और िशकार उपल ब्ध होने पर कभी भी सिक्रय

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हो जाते है ं

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ऐसा क्य होता है: रात म स क्रय होना केवल आदत नह , संरचनाओं का समुच्चय है। उल्लू क आँख बहुत बड़ी
और आगे क ओर होती ह तथा कण छद्र असम मत रूप से लगे होते ह, जससे वह केवल ध्व न से चूहे क स्थ त
पहचान लेता है। चमगादड़ प्र तध्व न का उपयोग करता है। लो रस क आँख मंद प्रकाश के लए वशाल ह। जुगनू
स्वयं प्रकाश उत्पन्न करके संकेत दे ता है, जो अँधेरे म ही उपयोगी है। दन को इस प्रकार बाँट लेने से प्र तस्पधा भी
घटती है — रात का शकारी और दन का शकारी एक ही वन म रह सकते ह और एक ही शकार पर बहुत कम
टकराते ह।

स्वयं जाँ चए: य द कसी जंतु के वषय म संदेह हो तो ता लका 12.1 म अनुमान लगाने के स्थान पर "अ न त"
ल खए। ईमानदार रक्त स्थान गढ़े हुए आँकड़े से बेहतर है।

प्र.5 अपने अवलोकन को ता लका 12.1 म ल खए।
ता लका 12.1 — आँकड़ को अ भले खत करने के लए अवलोकन ता लका

जीव आप इसे कहाँ दे खते ह? (हवा म यह कब स क्रय दखाई दखाई दे ने वाली
( चत्र बनाइए ऊँचा उड़ता हुआ/पृथ्वी के नकट दे ता है? दन म/रात कोई अन्य
अथवा नाम उड़ता हुआ/वृक्ष पर/जल म/वन म/अ न त वशेषता(एँ)
ल खए) भू म पर)

उल्लू वृक्ष रात पंख

ता लका 12.1 म प्रत्येक जीव के लए एक पं क्त भ रए। नीचे चत्र 12.2 के जंतुओं से भरी हुई नमूना ता लका द गई है (पुस्तक क
अपनी उल्लू वाली पं क्त पहली पं क्त के रूप म रखी गई है)।

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जीव आप इसे कहाँ दे खते यह कब स क्रय दखाई दे ता दखाई दे ने वाली अन्य वशेषता(एँ)
ह? है?

उल्लू वृक्ष रात पंख

गरुड़ हवा म ऊँचा उड़ता हुआ दन चौड़े पंख, मुड़ी हुई चोंच, तीखे नखर

बाघ वन भू म दन और रात धारीदार रोम , ग े द ार पंजे, लंबे रदनक

चीतल वन भू म, जल के नकट दन खुर , सी ंग , िचत्त ीदार शरीर

चमगादड़ हवा म ऊँचा उड़ता हुआ रात अंग िु लयों के बीच िझल्ली, बड़े कान

अजगर वृक्ष क शाखा रात लंबा पादरिहत शरीर , शुष्क शल्क

मगर जल दन और रात कवचयुक्त त्वचा, लंबा थूथन, िसर के ऊपर आँखें

साही वन भू म रात लंबे नुक ीले काँटे

िततली पृथ्वी के नकट उड़ती हुई दन शल्कयुक्त पंखों के दो जोड़े, संिधत पाद , कुं डिलत
शुंिडका

जुग नू पृथ्वी के नकट उड़ता हुआ रात चमकता उदर , संिधत पाद

संकेत: दखाई दे ने वाली वशेषता को संरचना के रूप म ल खए ("पंख क झल्ली", "काँटे", "खुर"), व्यवहार के
रूप म नह ("उड़ता है", "दौड़ता है")। वग करण संरचनाओं पर बनता है; व्यवहार उन्ह से नकलता है।

प्र.6 अब इन्ह जीव को एक से अ धक प्रकार से समू हत करने का प्रयास क जए। प्रत्येक बार समूह बनाते समय
अलग-अलग मानदं ड का प्रयोग क जए (ता लका 12.2)।
ता लका 12.2 — जीव का समूहन

समूहन इस समूह म कौन-कौन से जीव आपने कौन-सी वशेषता या प्र तरूप (पैटन) के आधार
मानदं ड आते ह? पर नणय लया?

मांसाहारी गरुड़, बाघ, तदुआ खान-पान क आदत

नीचे उन्ह दस जंतुओं पर चार अलग-अलग मानदं ड लगाए गए ह। ध्यान द जए क हर बार समूह के सदस्य बदल जाते ह।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

समूहन मानदं ड इस समूह म कौन-कौन से जीव आते ह? आपने कौन-सी वशेषता या प्र तरूप के आधार
पर नणय लया?

मांस ाहारी गरुड़, बाघ, तदुआ खान-पान की आदते ं

शाकाहारी चीतल, खरगोश, लंगूर, ततली खान-पान — पीसने वाले दाँत, या मकरंद के िलए शुंिडका

उड़ सकने वाले गरुड़, उल्लू, चमगादड़, ततली, व्याध पतंग, जुगनू पंखों की उपिस्थित — परंत ु तीन िबल्कु ल िभन्न पकार के

शरीर पर पर गरुड़, उल्लू, मोर दे हावरण
(feathers)

शरीर पर रोम / बाल बाघ, तदुआ, चीतल, चमगादड़, लंगूर, साही, दे हावरण; ये सभी िशशुओ ं को दू ध भी िपलाते है ं
कस्तूरी बलाव, खरगोश

संिधत पाद और ततली, व्याध पतंग, जुगनू आंतिरक और बाह्य संर चना (आथ पोडा)
बिहःकं काल

िनशाचर उल्लू, चमगादड़, साही, कस्तूरी बलाव, लो रस, सिक्रयता का समय
जुगनू

ऐसा क्य होता है — और यह महत्त्वपूण क्य है: आपके चुने हुए मानदं ड के आधार पर एक ही जीव अलग-अलग
समूह म चला जाता है। चमगादड़ "उड़ सकने वाले" म गरुड़ के साथ है, परंतु "रोमयुक्त और शशुओं को दूध
पलाने वाले" म बाघ के साथ। इन दोन म से केवल एक ही समूहन यह दशाता है क जंतु कस प्रकार बने और
कससे उत्पन्न हुए ह। यही वह समस्या है जो अध्याय को आगे ले जाती है — वैज्ञा नक को मौ लक मानदं ड चुनने
पड़ते ह (को शका प्रकार, संगठन का स्तर, पृष्ठरज्जु क उप स्थ त), न क केवल सु वधाजनक मानदं ड जैसे पयावास
या उड़ने क क्षमता।

सो चए और बताइए — पृष्ठ 231
12.3.1 सजीव को वग कृत करने हेतु मानदं ड

सो चए और बताइए

प्र.1 य द अनेक जीव समान वशेषताओं को साझा करते ह तो क्या उनके वंशक्रम भी समान हो सकते ह?

हाँ — यही मानक नष्कष है, बशत साझा वशेषता कोई गहरी संरचनात्मक वशेषता हो, न क एक जैसी समस्या का एक
जैसा समाधान मात्र। जैसा अध्याय कहता है, जीव क समान वशेषताएँ दशाती ह क वे एक ही पूवज से वक सत हुए ह।

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यह नष्कष क्य ठ क है: वंशागत वशेषताएँ डीएनए के माध्यम से आगे बढ़ती ह। य द दो जीव म एक ज टल
संरचना एक ही ढं ग से, एक ही भाग से बनी हो, तो सबसे सरल स्पष्टीकरण यही है क दोन ने वह संरचना ऐसे पूवज
से पाई है जसम वह पहले से थी — न क यह क इतनी ज टल संरचना संयोग से दो बार बन गई। चमगादड़, व्हेल
और मनुष्य के अग्रपाद म एक ही क्रम म एक ही अ स्थयाँ होती ह — यह समान पूवज का प्रबल प्रमाण है।

परंतु सावधान — समानता भ्रम म डाल सकती है। शाक, डॉ ल्फन और स्क्वड तीन धारारे खत ह, परंतु शाक
मछली है, डॉ ल्फन स्तनधारी और स्क्वड मोलस्क। इनक शरीर आकृ त जल के प्र त साझा अनु क्रया है, साझा
पूवज नह । क ट का पंख (ब हःकंकाल क तह) और पक्षी का पंख (परयुक्त अग्रपाद) भी इसी प्रकार असंबद्ध ह।
अतः नयम यह है — साझा संरचना जतनी गहरी और वस्तृत होगी, समान पूवज का प्रमाण उतना ही प्रबल होगा;
और सबसे प्रबल प्रमाण वह है जसे अध्याय अंत म गनाता है, डीएनए क समानता, जसके कारण आगे चलकर
तीन डोमेन पद्ध त प्रस्ता वत हुई।

क्रयाकलाप 12.2 — पृष्ठ 232
आइए, एक केस स्टडी को पढ़ — 12.4 वग करण क आवश्यकता

क्रयाकलाप 12.2

प्र.1 वन म जा तयाँ कस प्रकार वत रत ह? कौन-से पादप और जंतु नकट रूप से संबं धत ह?

जा तयाँ वन म समान रूप से नह फैली होत — प्रत्येक वह मलती है जहाँ उसक व शष्ट आवश्यकताएँ पूरी होती ह।
इस लए वन एक समान वृक्ष का ढे र नह , ब ल्क छोटे -छोटे व शष्ट क्षेत्र क पच्चीकारी है।

पक्के के आँकड़े क्या दखाते ह: धनेश क चार जा तयाँ एक ही वन के अलग-अलग भाग म पाई जाती ह, और
केस स्टडी दो कारक बताती है जो यह तय करते ह — वृक्ष का आकार और फल क उपलब्धता। ये वशाल पक्षी
घ सला केवल पुराने वशाल वृक्ष के कोटर म बनाते ह और वशेष प्रकार के फल ही खाते ह। जहाँ पयाप्त बड़ा वृक्ष
और उपयुक्त फल दे ने वाले वृक्ष साथ-साथ ह , वह वह धनेश मलेगा; अन्यत्र नह ।

पक्के के उदाहरण म नकट रूप से संबं धत पादप और जंतु —

पुराने वशाल वृक्ष ↔ धनेश। वृक्ष घ सले का कोटर दे ता है; उपयुक्त आकार का कोटर न हो तो पक्षी जनन ही नह कर
सकता।
फलदार वृक्ष ↔ धनेश। वृक्ष भोजन दे ता है; धनेश फल नगलकर बीज को मूल वृक्ष से दूर गरा दे ता है, अथात बीज प्रक णन
करता है। यह संबंध दोन ओर से चलता है — इसी लए धनेश को "वन का कृषक" कहा जाता है।
बाघ ↔ हरण ↔ घास और झा ड़याँ। अभयारण्य क संपूण आहार श्रृंखला आधार पर स्थत पादप पर टक है।

संकेत: जो संबंध दोन ओर से चलता है — जसम दोन साथी एक-दूसरे के लए आवश्यक ह — वही सबसे प्रबल
होता है। उसे एक सरे से तो ड़ए तो दोन सरे टू ट जाते ह; प्रश्न (iii) यही नकालने को कहता है।

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धनेश प क्षय क इन चार जा तय के वग करण से जैव व वधता को समझने म कस प्रकार सहायता प्राप्त होती
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प्र.2

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है?

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क्य क जब तक ये चार अलग-अलग न पहचानी जाएँ, पूरा प्र तरूप अदृश्य रहता है। य द वैज्ञा नक केवल "धनेश" लखे, तो

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पक्के म एक ही पक्षी सवत्र मलता प्रतीत होगा। जैसे ही चार जा तयाँ अलग क जाती ह, वही वन चार भन्न प क्षय का घर

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नकलता है, जनम से हर एक वन के अपने भाग म, अलग वृक्ष और अलग फल के साथ रहता है।
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वग करण से यहाँ क्या मलता है: a
नाम गणना म बदल जाता है। "पक्के म लगभग 300 पक्षी जा तयाँ, जब क संपूण भारत म लगभग 1300"
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— यह समृ द्ध का माप है, और यह तभी संभव है जब इनम से हर पक्षी को अलग पहचानकर नाम दया गया
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हो।

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सट क प्रश्न पूछे जा सकते ह। केस स्टडी स्वयं गनाती है — वन म जा तयाँ कस प्रकार वत रत ह, कौन-से
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l पादप और जंतु नकट रूप से संबं धत ह। बना छाँटे ढे र से ये प्रश्न पूछे ही नह जा सकते।
ag पता चलता है क जा तयाँ वन को कैसे बाँटती ह। चार नकट संबंधी प क्षय का साथ रहना बताता है क वे

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comको एक साथ आश्रय दे पाता है। agl
आमने-सामने प्र तस्पधा नह कर रहे; हर एक ने कुछ भन्न वृक्ष और फल चुन लए ह। संसाधन का यही बँटवारा
उन तंत्र म से एक है जनसे एक वन इतनी जा.तय
a s em एक नारा है; "इस घाट म इन जा तय के पुराने कोटरयुक्त
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संरक्षण व शष्ट हो जाता है। "धनेश बचाइए"
वशाल वृक्ष बचाइए, क्य क लाल गदन वाला धनेश केवल वह घ सला बनाता है" एक काय है।

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.cवैo ा नक इतनी सारी जा तय का पता कस प्रकार लगाते ह? a g l
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प्र.3

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स्मृ त के स्थान पर एक प्रणाली का उपयोग करके — वही तीन साधन जो यह अध्याय आगे वक सत करता है।
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1. पदानुक्रम। प्रत्येक जा त जगत → संघ → वग → गण → कुल → वंश → जा त के अंतगत रखी जाती है। डाक-पते क भाँ त
यह सात चरण म करोड़ से घटाकर कुछ तक ले आता है। पक्के के चार धनेश एक ही कुल म आते ह, अतः कुल के वषय म
जो भी सत्य है वह चार के लए पहले से ज्ञात है।
2. व शष्ट दो भाग वाला नाम।
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नाम पद्ध त प्रत्येक जा त को एक ही लै टन नाम दे ती है जो संपूण वश्व म प्रयुक्त होता है, अतः

m a s emपु ल, टाइगर और तीग्रे का भ्रम
अरुणाचल प्रदे श का वैज्ञा नक और ांस का वैज्ञा नक एक ही जंतु क बात करते ह — बाघ,

.cनहo रहता। agl
m3. पहचान कुं जयाँ और अ भलेख। क्षेत्र-पु स्तकाएँ, संग्रहालय के प्र तदश, छाया चत्र, ध्व न-अ भलेख और अब डीएनए बारकोड
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— इनसे कसी नए प्राप्त जीव का मलान पहले से ज्ञात जा तय से कया जाता है। जो मलान न करे, वही नई जा त का

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संभा वत उम्मीदवार है।

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क्या आप जानते ह? केरल के बगनी मढक ना सकाबै े कस सह्याद्र सस का वणन वष 2003 म ही हुआ — यह वष
के अ धकांश समय भू मगत रहता है और केवल मानसून म प्रजनन के लए बाहर आता है। इसका अ स्तत्व केवल
इस लए छू टा रहा क्य क उसे सही समय पर सही स्थान पर कसी ने खोजा नह था।

प्र.4 चार प्रकार के ये धनेश पक्षी कुछ मामल म समान दखते ह। वे ऐसी कौन-सी वशेषताएँ ह जो वै ा नक को उन्ह
एक दूसरे से वभे दत करने म सहायता कर सकती ह?

चार बड़े फलभक्षी पक्षी ह और इनक शरीर रचना एक जैसी है, अतः इन्ह सामान्य रूप-रंग से नह ब ल्क सूक्ष्म और पुनरावतनीय
लक्षण से अलग करना पड़ता है।

शरस्त्राण (कास्क) और च च। च च के ऊपर का स ग जैसा उभार जा तय म आकार, आकृ त और रंग म भन्न होता है —
धनेश म यही सवा धक उपयोगी लक्षण है।
पंख का रंग और प्र तरूप। लाल गदन वाले धनेश क ला लमायुक्त गदन; श्वेत-श्याम धनेश का काला-सफेद शरीर; महाधनेश
क पीली च च और गदन; मोरछली धनेश क गलथैली और धा रयाँ।
शरीर का आमाप। महाधनेश चार म सबसे बड़ा है; श्वेत-श्याम धनेश सबसे छोटा।
बोली। प्रत्येक जा त क अपनी तेज़ आवाज़ होती है, जससे वह दखने से पहले ही पहचानी जाती है।
पा र स्थ तक य लक्षण। कौन-से फल खाता है, कस प्रकार के वृक्ष और कस आकार के कोटर म घ सला बनाता है, वन के
कस भाग म रहता है — केस स्टडी के अनुसार ये जा तय म भन्न ह।
आनुवं शक समानता। जहाँ रूप से संदेह बना रहे, वहाँ डीएनए तुलना नणय कर दे ती है।

केवल रूप-रंग पयाप्त क्य नह : अनेक प क्षय म नर और मादा भन्न दखते ह, और शशु पक्षी दोन से भन्न। जो
लक्षण लग, आयु या ऋतु के साथ बदल जाए वह खराब लक्षण है। कास्क क आकृ त, बोली और डीएनए स्थर रहते
ह, इस लए व गक वद् इन्ह पर भरोसा करते ह।

प्र.5 य द वन से पुराने वशाल वृक्ष समाप्त हो जाएँ तो क्या होगा?

धनेश का जनन रुक जाएगा, और उसका प्रभाव फर पूरे वन म फैलता चला जाएगा। केस स्टडी स्पष्ट कहती है क ये वशाल
पक्षी घ सला केवल पुराने वशाल वृक्ष के कोटर म बनाते ह।

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प रणाम क ंखला, चरण दर चरण:

1. कोटर नह → घ सला नह । धनेश स्वयं कोटर नह खोद सकता; उसे बना-बनाया कोटर चा हए। बड़ा कोटर
बनने म दशक लगते ह। पुराने वृक्ष हटते ही अंडे दे ने का स्थान समाप्त।
2. घ सला नह → चूजे नह । वयस्क पक्षी वष जी वत रह सकते ह, इस लए वन म धनेश दखते तो रहगे —
परंतु जनसंख्या अपनी पू त करना बंद कर दे गी।
3. धनेश नह → बीज प्रक णन नह । धनेश फल पूरा नगलते ह और बीज मूल वृक्ष से दूर गराते ह। इनके बना
अनेक बड़े फल वाले वनवृक्ष के बीज मूल वृक्ष के नीचे ही गरगे, जहाँ भीड़ भी है और उन्ह खाने वाले भी।
4. प्रक णन नह → नए वृक्ष कम। दशक म वे वृक्ष जा तयाँ घटगी जो धनेश पर नभर थ — और अंततः वही
वृक्ष भी, जो आगे चलकर अगली पीढ़ के घ सला-वृक्ष बनते।
5. कोटर उपयोग करने वाले अन्य जीव भी प्रभा वत। उल्लू, तोते, गलह रयाँ, चमगादड़ और अनेक क ट इन्ह
कोटर का उपयोग करते ह। पुराने वृक्ष हटते ही इन सबका आश्रय एक साथ छन जाता है।

इसका स्वरूप दे खए: क्ष त वलं बत और स्वयं को बढ़ाने वाली है। वृक्ष कटने के दन कुछ नह मरता — और यही
बात ऐसी क्ष त को दखने म क ठन और लौटाने म असंभव बना दे ती है।

संकेत: धनेश जैसी जा त, जसके हटने से पूरा वन बदल जाए, और पुराने कोटरयुक्त वृक्ष जैसा संसाधन, जस पर
अनेक जा तयाँ नभर ह — इन्ह के कारण संरक्षण केवल जंतुओं का नह , पयावास क संरचना का कया जाता है।

क्रयाकलाप 12.3 — पृष्ठ 234

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आइए, अध्ययन कर — 12.6 पाँच जगत वग करण

क्रयाकलाप 12.3

प्र.1 संकल्पना मान चत्र ( चत्र 12.5) का अध्ययन क जए।

सजीवों का वग करण
कोिशका का पकार
आद्य कें दक िझ ल्ली आबद्ध कें दक
पूवकें द की (िझ ल्ली रिहत ) स ुकें द की

मोनेरा संगठन का स्तर
बै टीिरया, आिकया,
( क्
साइनोबैक्टीिरया) एककोिशकीय बहुक ोिशकीय

(अमीबा, पैरामीिशयम,
पोिटस्टा
क्लैमाइडोमोनास, यूग् लीना)
कोिशका िभित्त उपिस्थत
(
अथवा अनुपिस्थत )
कोिशका संरचना

कोिशका िभित्त सिहत कोिशका िभित्त रिहत

पोषण िविध

काइिटन पोषण िविध सेल्य ुलोस िवषम पोषी

पािरिस्थितक भूिमका उपभो क्ता
भोजन के िलए अ न् य पर िनभ र)
(
िवषम पोषी स्वपोषी
अपघटक त्
उ पाद क

भोजन के िलए अ न् य पर िनभ र)
( (पकाश संश्लेषण की पिक्र या) एिनमेिलया

ची ंटी , सप , मेंढक ,
प क्ष ी , िब ल्ली , मानव
कवक प्लांटी

मशरू म, यी स् ट, ऐस् पिजलस मॉस, घास, फन,
चीड़ , ग ुलाब

चत्र 12.5, पृष्ठ 234 — पाँच जगत वग करण (संकल्पना मान चत्र पुनःआरे खत; पुस्तक म प्रत्येक जगत के साथ छपे
छाया चत्र के स्थान पर यहाँ उदाहरण के नाम दए गए ह)।

चत्र 12.5 वस्तुतः एक नणय वृक्ष है। आप ऊपर से कसी भी जीव के साथ आरंभ क जए और प्रत्येक वभाजन पर एक प्रश्न का
उत्तर द जए; अ धक-से-अ धक चार प्रश्न के बाद आप पाँच जगत म से कसी एक म पहुँच जाएँगे।

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कोई भी सजीव

1. कोिशका का पकार?

पूवकेंदकी — सुकेंदकी —
आद्य केंद क िझल्ली आबद्ध केंद क

2. संगठन का स्तर?

मोनेरा
एककोिशकीय बहुकोिशकीय
बैक्टीिरया, आिकया,
साइनोबैक्टीिरया 3. कोिशका िभित्त?

पोिटस्टा
अमीबा, पैरामीिशयम, िभित्त सिहत िभित्त रिहत
क्लैमाइडोमोनास, यूग्लीना
4. पोषण की िविध?

फं जाई प्लाट
ं ी एिनमेिलया
काइिटन िभित्त; िवषमपोषी सेल्यल
ु ोस िभित्त; स्वपोषी िवषमपोषी उपभोक्ता
अपघटक उत्पादक

चत्र 12.5 को नणय वृक्ष के रूप म दे खए — चार प्रश्न कसी भी जीव को पाँच जगत म से एक म रख दे ते ह।

मान चत्र ध्यान से प ढ़ए — दो बात आसानी से छू ट जाती ह। प्रो टस्टा म को शका भ त्त हो भी सकती है और
नह भी (हो तो सेल्युलोस क ), इसी लए मान चत्र प्रो टस्टा का नणय संगठन के स्तर से करता है, भ त्त से नह ।
और फंजाई तथा प्लांट अं तम वभाजन पर ही अलग होते ह — भ त्त कस पदाथ क है और जीव कस प्रकार
पोषण लेता है — फंजाई म काइ टन तथा अवशोषण, प्लांट म सेल्युलोस तथा प्रकाश सं ेषण।

प्र.2 ऐसे मानदं ड क सूची बनाइए जो पाँच जगत वग करण का आधार ह।

चत्र 12.5 को ऊपर से नीचे पढ़ने पर संकल्पना मान चत्र पाँच मानदं ड पर चलता है —

1. को शका का प्रकार — पूवकद्रक (आद्य कद्रक, झल्ली र हत) अथवा सुकद्रक ( झल्ली आबद्ध कद्रक)।
2. संगठन का स्तर — एकको शक य अथवा बहुको शक य।
3. को शका संरचना — को शका भ त्त उप स्थत अथवा अनुप स्थत, और उप स्थत हो तो काइ टन क या सेल्युलोस क ।
4. पोषण क व ध — स्वपोषी (प्रकाश सं ेषण से स्वयं भोजन बनाना) अथवा वषमपोषी (भोजन के लए अन्य पर नभर)।
5. पा र स्थ तक य भू मका — उत्पादक, उपभोक्ता अथवा अपघटक।

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ये पाँच ही क्य : इनम से हर एक या तो को शका का गुण है या जीव के जीने के मूल ढं ग का — अतः प र स्थ तयाँ

m a s em 12.1 म
gl जीव को खाना आरंभ
इन्ह बदल नह सकत । इसक तुलना पयावास या उड़ने क क्षमता से क जए, जसके कारण क्रयाकलाप
. coके साथ चला जाता था। जीवाणु कद्रक प्राप्त नह कर सकता और पादपaअन्य
m — इससे गहरे वभाजन उपलब्ध ही नह ह।
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चमगादड़ गरुड़

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प्र.3 संकल्पना मान चत्र का अध्ययन करने के प ात आपके ारा तैयार कए गए मानदं ड और नम्न ल खत मानदं ड

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क तुलना क जए — को शका प्रकार— पूवकद्रक अथवा सुकद्रक ; को शका संरचना— को शका भ त्त
उप स्थत अथवा अनुप स्थत; संगठन का स्तर— एकको शक य अथवा बहुको शक य; पोषण क व ध— स्वपोषी

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चीड़ , ग ुलाब

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चत्र 12.5, पृष्ठ 234 — पाँच जगत वग करण (संकल्पना मान चत्र पुनःआरे खत; पुस्तक म प्रत्येक जगत के साथ छपे
छाया चत्र के स्थान पर यहाँ उदाहरण के नाम दए गए ह)।
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दए गए चार मानदं ड संकल्पना मान चत्र म उसी क्रम म उप स्थत ह जस क्रम म मान चत्र उन्ह लगाता है। मेरी सूची म जो

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एक अ त रक्त था वह है पा र स्थ तक य भू मका (उत्पादक / उपभोक्ता / अपघटक), जसे चत्र 12.5 अं तम वभाजन पर

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पोषण क व ध के साथ छापता है।

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दया गया चत्र 12.5 म यह कहाँ लगता यह कसे अलग करता है
मानदं ड है

कोिशका पकार सबसे ऊपर, पहला वभाजन मोनेर ा (पूवकें द की) को शेष चारों जगतों (सुकें द की) से

संग ठन का स्तर दूसरा वभाजन, सुकद्रक शाखा पर पोिटस्टा (एककोिशकीय) को फं जाई, प्लांटी, एिनमेिलया (बहुक ोिशकीय) से

कोिशका संर चना तीसरा वभाजन फं जाई और प्लांटी (िभित्त सिहत) को एिनमेिलया (िभित्त रिहत) से

पोषण की िविध चौथा वभाजन फं जाई (िवषमपोषी, काइिटन िभित्त ) को प्लाट
ं ी (स्वपोषी, से ल्युल ोस िभित्त )
से

इस क्रम को बदला क्य नह जा सकता: मानदं ड सबसे मौ लक से सबसे कम मौ लक क ओर लगाए जाते ह।
कद्रक का होना या न होना को शकाओं के बीच का सबसे बड़ा अंतर है, इस लए वह पहले वभा जत करता है।
पोषण अंत म इस लए लगता है क्य क वह सबसे नकट क जोड़ी को अलग करता है — और वहाँ भी उसे भ त्त के
पदाथ के साथ ही लगाना पड़ता है, क्य क मशरूम और मॉस दोन को शका भ त्त युक्त बहुको शक य सुकद्रक ह,
और केवल "काइ टन + अवशोषण बनाम सेल्युलोस + प्रकाश सं ेषण" ही उन्ह अलग करता है।

स्वयं जाँ चए: यीस्ट को इस मान चत्र से गुजा रए। सुकद्रक → एकको शक य → तो उसे प्रो टस्टा म जाना चा हए।
परंतु उसक को शका भ त्त काइ टन क होने के कारण पुस्तक उसे फंजाई म रखती है। यही एक अपवाद याद
दलाता है क नणय वृक्ष एक सारांश है, नयम नह ।

क्रयाकलाप 12.4 — पृष्ठ 235
आइए, अन्वेषण कर — 12.6.1 जगत मोनेरा

क्रयाकलाप 12.4

प्र.1 वद्यालय क प्रयोगशाला म उपलब्ध जीवाणु और नील-ह रत शैवाल क स्थायी स्लाइड का सूक्ष्मदश ारा
अवलोकन क जए।

स्लाइड को मंच पर र खए, पहले नम्न श क्त (10×) पर पदाथ खो जए, फर उच्च श क्त (45×) पर और य द आपके सूक्ष्मदश म
हो तो तेल- नमज्जन लस (100×) पर लाइए — जीवाणु केवल कुछ माइक्रोमीटर के होते ह और नम्न श क्त पर धुँधले ही रहते ह।
आपको क्या दखना चा हए —

जीवाणु — अत्यंत छोटे , अ भरं जत बदु, दं ड या स पल। इनके भीतर कुछ भी स्पष्ट नह दखता: न कद्रक, न ह रतलवक, न
कोई को शकांग। प्रायः ये ंखलाओं या गुच्छ म मलते ह।
नील-ह रत शैवाल — स्पष्ट रूप से बड़े, नीले-हरे, प्रायः को शकाओं के सरे से सरे तक जुड़े अशा खत तंतुओं के रूप म (जैसे
नॉस्टॉक, ऑ सलेटो रया)। रंग पूरी को शका म फैला होता है, ह रतलवक म बंद नह ।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

संकेत: सूक्ष्म समायोजन का उपयोग केवल उच्च श क्त पर क जए और डाया ाम से प्रकाश घटाइए —
अन भरं जत पूवकद्रक जीव लगभग पारदश होते ह और तीव्र प्रकाश क अपेक्षा मंद, वभेदयुक्त प्रकाश म कह
अ धक सरलता से दखते ह।

प्र.2 उनक तुलना चत्र 12.6 से क जए।

चत्र 12.6, पृष्ठ 235 — मोनेरा जगत के सदस्य, पुनःआरे खत। पुस्तक म चार आकृ तयाँ बना नाम के छपी ह — अंगूर
के गुच्छे जैसी गोल को शकाएँ, अल्प वराम जैसी को शकाएँ, छड़ाकार को शकाएँ तथा स पलाकार को शकाएँ।

चत्र 12.6 मोनेरा जगत के सदस्य दखाता है। अपनी स्लाइड को चत्र से बदुवार मलाइए।

वशेषता जीवाणु नील-ह रत शैवाल (साइनोबैक्ट रया)

कोिशका का पकार पूवकद्रक — झल्ली आबद्ध कद्रक नह पूवकें द की — िझल्ली आबद्ध कें द क नही ं

संग ठन का स्तर एकको शक य एककोिशकीय, पायः तंतओ
ु ं या िनवहों में

सूक्ष्म दश में आमाप बहुत छोटे बदु, दं ड, स पल ृ ला
स्पष्टतः बड़े; कोिशकाओं की शंख

रंग केवल वही जो अ भरंजक से आया पाकृ ितक रूप से नीला-हरा

पोषण अ धकांशतः वषमपोषी; कुछ स्वपोषी स्वपोषी (पकाश संश्ले षण) — और अपघटक भी

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दखने म भन्न होकर भी दोन एक ही जगत म क्य : जगत का नणय चत्र 12.5 के पहले वभाजन पर होता है
— को शका का प्रकार। दोन म से कसी म वास्त वक कद्रक नह है, अतः रंग, आकृ त या पोषण चाहे जो हो, दोन
मोनेरा ह। इसक तुलना अमीबा से क जए, जो एकको शक य तो है परंतु उसम वास्त वक कद्रक है, इस लए वह
प्रो टस्टा म जाता है।

प्र.3 आपने क्या अवलोकन कया?

दोन एकको शक य पूवकद्रक जीव ह — न वास्त वक कद्रक, न झल्ली आबद्ध को शकांग — इसी लए दोन को मोनेरा
जगत के अंतगत रखा गया है। इसके आगे दोन आमाप, रंग और पोषण क व ध म भन्न ह।

पूवकद्रक होने का प रणाम: भीतर कोई कक्ष न होने के कारण जीवाणु को शका का सारा काय एक ही स्थान म
होता है। इसका डीएनए को शकाद्रव्य म स्वतंत्र पड़ा रहता है। इससे को शका छोट और सरल रहती है, और तेज़ भी
— जीवाणु बीस मनट म वभा जत हो सकता है, इसी लए जीवाणु नई प र स्थ तय म इतनी शीघ्रता से फैल जाते
ह।

ये जीव कहाँ रहते ह और क्या करते ह — अध्याय के अनुसार:

जीवाणु सवत्र पाए जाते ह — मृदा, जल, वायु, उष्ण स्रोत तथा अन्य चरम प र स्थ तयाँ जहाँ अ धकांश जीव का जी वत रहना
संभव नह , यहाँ तक क मानव शरीर के भीतर भी।
ये रोमंथी जीव क आहार नली म पाए जाते ह और इन जंतुओं के गोबर से बायोगैस उत्पादन के लए उत्तरदायी ह।
कुछ हा नकारक रोगजनक होते ह और रोग उत्पन्न करते ह, परंतु अनेक लाभदायक ह — लैक्टोबै सलस और राइजो बयम।
नील-ह रत शैवाल स्वपोषी और अपघटक होते ह; पोषक चक्रण के अ त रक्त कुछ जीवाणु तेल, क टनाशक, वा हत मल
इत्या द प्रदूषक को भी वघ टत कर दे ते ह।

क्या आप जानते ह? साइनोबैक्ट रया उन प्रारं भक जीव म थे जन्ह ने प्रकाश सं ेषण से ऑक्सीजन उत्पन्न क ।
लगभग 2.5 अरब वष पूव यह ऑक्सीजन वायुमंडल म सं चत हुई जससे पृथ्वी अन्य प्रकार के जीव के लए
उपयुक्त बन गई। प्राचीन साइनोबैक्ट रया के जीवाश्म स् ोमेटोलाइट् स नामक रचनाओं म मलते ह, और ये
राजस्थान तथा मध्य प्रदे श म पाए गए ह — पृथ्वी पर जीवन के कुछ प्राचीनतम प्रमाण।

क्रयाकलाप 12.5 — पृष्ठ 235 – 236

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आइए, कर के दे ख — 12.6.2 जगत प्रो टस्टा

क्रयाकलाप 12.5

प्र.1 घास फाण्ट (सूखी घास का घोल) बनाने के लए नम्न ल खत चरण का पालन क जए — 1. उद्यान क घास
कटने के प ात उसके छोटे प्र तदश इक ा क जए, अथवा भूसा या चारा ली जए। 2. एक छोट काँच क बोतल
ली जए और उसका एक-चौथाई भाग घास, भूसे या चारे से भ रए। 3. बोतल को रुद्ध जल या तालाब के जल से
भ रए और उसम एक त्रत पादप सामग्री मला द जए। 4. बोतल को मलमल के कपड़े से ढककर धागे से बाँध
द जए। 5. बोतल को बना छे ड़े एक सप्ताह तक एक तरफ रख द जए। 6. मलमल के कपड़े को हटाकर बोतल
का मुँह बस इतना खो लए क उसम बदुपाती (dropper) डाला जा सके, और बदुपाती क सहायता से
सावधानीपूवक जल क एक बूँद ली जए। 7. जल क इस बूँद को एक स्वच्छ स्लाइड पर र खए और सूक्ष्मदश क
सहायता से उसका अवलोकन क जए।

सात चरण का ठ क-ठ क पालन क जए। महत्त्वपूण यह समझना है क हर चरण क्य है — यह क्रयाकलाप गंदे जल का जार
नह , एक छोटा सु नयो जत प्रयोग है।

चरण यह कस लए है

घास, भूस ा या चारा म ृत काबिनक पदाथ दे ता है — वह भोजन िजस पर पहले जीवाण ु बढ़ े ंग े

रुद्ध जल या तालाब का जल आरंिभक पोिटस्ट दे ता है; स्वच्छ नल के जल से लगभग कु छ नही ं िमले ग ा

मलमल का कपड़ा, बाँध कर वायु (ऑ क्सीजन) भीतर आने दे ता है परंत ु कीट और धूल रोकता है

एक सप्ताह िबना छे ड़े जनसंख्या बढ़ ने का समय। सड़ती घास पर पहले जीवाण ु बढ़ ते है,ं िफर उ न्हे ं खाने वाले पोिटस्ट

स्वच्छ स्लाइड पर एक बूदँ पतली परत — मोटा जल फोकस नही ं होता और जीव दृ िष्ट-तल से बाहर तैर जाते है ं

सावधानी — पुस्तक का सुरक्षा नदश मा नए। घास के घोल से दुगध आ सकती है। लैब कोट, मास्क और दस्ताने
पह नए, और सूखी घास के घोल को ऑटोक्लेव करने के प ात ही फ कए। ऑटोक्लेव करने से उसम उप स्थत सभी
जीव नष्ट हो जाते ह।

संकेत: बूँद सतह के पास से और तैरती झाग के कनारे से ली जए, बीच के स्वच्छ भाग से नह — प्रो टस्ट वह सघन
होते ह। हवा के बुलबुले से बचने के लए कवर स्लप को तरछा करके र खए।

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क्या आपने सूक्ष्मदश ारा जल क बूँद का अवलोकन करने पर उसम चलते हुए जीव दे खे ह? क्या आप इन्ह चत्र
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प्र.2

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12.7 से तुलना करके पहचान सकते ह?

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अमीबा पैरामीिशयम ग्

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चत्र 12.7, पृष्ठ 235 — सामान्य प्रो टस्ट के सूक्ष्मदश चत्र, पुनःआरे खत — अमीबा (कूटपाद, कोई न त आकार

se m नेत्र बदु, ह रतलवक)।
नह ), पैरामी शयम (चप्पल जैसा, चार ओर पक्ष्माभ, मुख खाँच) तथा यूग्लीना (तकु रूप, एक लंबा कशाभ, लाल

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हाँ — बूँद ग त से भरी होती है, और वही ग त पहचान का पहला संकेत है। चत्र 12.7 तीन सबसे सामान्य प्रो टस्ट दखाता है

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— अमीबा, पैरामी शयम और यूग्लीना। तीन क ग त क व ध बल्कुल भन्न है।
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agl जीव कैसा दखता है कैसे चलता है कैसे पोषण लेता है

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com कू टपाद िनकालकर धीरे -धीरे g l a
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अमीबा कोई न त आकार नह ; क णकामय पड वषमपोषी — भोजन कण को घेर

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जसम कद्रक दखता है बहता है लेता है

पैर ामीिशयम agl
चप्पल जैसा, न त आकार, पूरे शरीर पर पक्ष्म ाभों की ताड़न से तेज़, वषमपोषी — जीवाणुओं को मुख
महीन रोम चक्राकार गित खाँच म बुहारता है

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e वषमपोषी
तकु के आकार का, हरा, लाल नेत्र बदु स हत एक लंबे कशाभ से आगे बढ़ ता प्रकाश म स्वपोषी; अंधकार म

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यूग्लीना

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ag ये सब एक ही जगत म क्य : इनम से प्रत्येक एक अकेली सुकद्रक को शका है — एक को शका जसम वास्त वक
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कद्रक है, और जो जल या नम स्थान म रहती है। आकृ त, ग त और यहाँ तक क पोषण म भी ये अत्यंत भन्न ह, और
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यही कारण है क प्रो टस्टा इतना म श्रत जगत है — इसक प रभाषा को शका प्रकार और संगठन के स्तर से बनी है,

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जीवन शैली से नह ।

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ध्यान द जए: यूग्लीना सबसे असु वधाजनक उदाहरण है — पादप क भाँ त हरा और प्रकाश सं ेषी, फर भी जंतु
क भाँ त तैरने और खाने म सक्षम। ऐसे ही जीव ने पुरानी जगत प्रणाली को तोड़ा और हेकल को वष 1866 म
प्रो टस्टा जोड़ने पर ववश कया।

सो चए और बताइए — पृष्ठ 236
12.6.2 जगत प्रो टस्टा

सो चए और बताइए

प्र.2 एक को शक य जीव अपने सभी जैव-प्रक्रम कस प्रकार करते ह जब क हमारे जैसे बहुको शक य जीव म समान
काय करने के लए अरब को शकाओं क आवश्यकता होती है?

क्य क एक अकेली को शका इतनी छोट होती है क उसे अंग क आवश्यकता ही नह पड़ती — वह सब कुछ अपनी
सतह से वसरण ारा और भीतर के को शकांग को लघु अंग क भाँ त उपयोग करके कर लेती है। हमारी अरब को शकाएँ
ये काय करने के लए नह , ब ल्क इस लए चा हए क्य क हम बड़े ह।

तंत्र — पृष्ठीय क्षेत्रफल और आयतन का अनुपात। हर को शका ऑक्सीजन, भोजन और अप शष्ट का आदान-
प्रदान अपनी सतह से करती है, परंतु इनका उपयोग पूरे आयतन म होता है। शरीर बड़ा होने पर आयतन, पृष्ठीय
क्षेत्रफल क तुलना म कह तेज़ी से बढ़ता है, अतः सतह भीतरी भाग को पू त दे ने के लए बहुत छोट पड़ जाती है।

ित्रज्या r के गोले के िलए —

पृष्ठीय क्षेत्रफल = 4πr2 आयतन = (4/3)πr3

पृष्ठीय क्षेत्रफल / आयतन = 3 / r

ु ा करने पर पित इकाई आयतन पृष्ठीय क्षेत्रफल
अथ त r दुगन आधा रह जाता है।
अमीबा मलीमीटर के कुछ सौव भाग जतना है, अतः उसका यह अनुपात बहुत बड़ा है। सतह से भीतर वस रत होती
ऑक्सीजन उसके हर भाग तक क्षण भर म पहुँच जाती है। मनुष्य लगभग 1.7 m ऊँचा है — इतनी दूरी वसरण से
तय करने म ऑक्सीजन को वष लगगे, इस लए हम फेफड़े, रु धर, हृदय और वा हकाएँ रखनी ही पड़ती ह।

एक को शका के भीतर काय कौन करता है:

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जैव प्रक्रम प्रो टस्ट म (एक को शका) हमम (अंग तंत्र)

भोजन ग हण कूटपाद घेर लेते ह, या पक्ष्माभ मुख खाँच म बुहार दे ते ह मुख, आमाशय, आँत

पाचन एंजाइम युक्त खाद्य धानी पाचक ग ंिथयाँ और आहार नाल

गैस ों का आदान-पदान सीधे को शका झल्ली से फे फड़े और रुिधर

अितिरक्त जल का िनष्कासन संकुचनशील धानी बाहर पंप कर दे ती है वृक्क

गित कूटपाद, पक्ष्माभ या कशाभ पेिशयाँ और कं काल

ऊज मुिक्त माइटोकॉ या माइटोकॉिन्डया — हमारी हर कोिशका में भी

नष्कष: बहुको शकता को शका क क्षमता म सुधार नह है — यह बड़े होने क क मत है। जीव जैसे ही वसरण क
पहुँच से बड़ा होता है, उसे काय को वशेषीकृत को शकाओं, ऊतक और अंग म बाँटना ही पड़ता है। यही कहानी
इस अध्याय म जंतु जगत भी सुनाता है — स्पंज (को शक य स्तर) से लेकर अंग तंत्र तक।

व ान एवं समाज — पृष्ठ 237
लाइकेन — वायु गुणवत्ता के जैव सूचक, 12.6.4 जगत प्लांट

व ान एवं समाज

प्र.1 क्या आपने वृक्ष के तन , नम द वार अथवा पत्थर पर सफेद हरे धब्बे दे खे ह? आप इस वषय म क्या सोचते ह?
गाँव म जाकर कसी वयोवृद्ध व्य क्त से इन धब्ब के वषय म बात क जए।

ये धब्बे लाइकेन ह — और गाँव का वयोवृद्ध व्य क्त तथा शोधकता, दोन इन्ह एक ही अथ म पढ़ते ह: स्वच्छ वायु का सूचक।

लाइकेन वस्तुतः है क्या: यह एक जीव नह , दो जीव ह जो सहजीवी (पारस्प रक) संबंध म रहते ह — एक
भागीदार स्वपोषी शैवाल है और दूसरा वषमपोषी कवक। कवक सुरक्षा दे ता है और जल रोके रखता है; शैवाल
प्रकाश सं ेषण करके भोजन प्रदान करता है। इनम से कोई भी अकेले नंगे पत्थर या सूखे तने पर नह रह सकता।

ये प्रदूषण मापक क्य बनते ह: लाइकेन म न जड़ होती ह न मोमी उपत्वचा। वह जल और ख नज सीधे वायु से
अपनी पूरी सतह ारा लेता है। वायु म जो कुछ है वह भी साथ ही भीतर चला जाता है — सल्फर डाइऑक्साइड और
अन्य प्रदूषक स हत — जन्ह लाइकेन न रोक सकता है न बाहर नकाल सकता है। अतः वायु म जो है वह उसम
सं चत होता जाता है। लाइकेन वायु प्रदूषक के अनुसार अपना रंग प रव तत करते ह, और उसी रंग से शोधकता
वायु म प्रदूषक क सांद्रता का पता लगाते ह। इसी लए ये वायु क गुणवत्ता के मापन के लए प्राकृ तक जैव सूचक
ह।

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वयोवृद्ध व्य क्त संभवतः आपको क्या बताएँगे (यह भाग आपको स्वयं करना है — नीचे वे बात ह जो ऐसी बातचीत म प्रायः
मलती ह) —

ये धब्बे बताते ह क यहाँ क वायु स्वच्छ है; जहाँ धुआँ या कारखाना हो वहाँ ये मट जाते ह।
कुछ प्रकार, जन्ह पत्थर के फूल कहा जाता है, वन्य उत्पाद के रूप म एकत्र कए जाते ह और मसाले के रूप म उपयोग होते
ह।
कुछ औष धय म उपयोग कए जाते ह।
प्राचीनकाल से कुछ का उपयोग रंजक बनाने म होता है, जनसे ऊन और रेशम के कपड़ को मैरून, बगनी या गहरा लाल-बगनी
रंग दया जाता है।

सावधानी — और वग करण क्य आवश्यक है: कुछ लाइकेन वषैले होते ह। इनक सही पहचान कोई शैक्ष णक
अभ्यास नह है; यही तय करती है क एकत्र कया गया लाइकेन भोजन म जाएगा या रंजक के बतन म। इसी लए
बॉक्स के अंत म कहा गया है क सुर क्षत और उ चत उपयोग के लए इनक सही पहचान और वग करण महत्त्वपूण
है।

अपनी कॉपी के लए नमूना उत्तर: "मने अपने गाँव के श्री राम सह जी से बात क । उन्ह ने कुएँ के पास नीम के तने
पर धूसर-हरे धब्बे दखाकर बताया क ये वह उगते ह जहाँ हवा अच्छ हो; उन्ह याद है क ईंट-भ ा शुरू होने के बाद
सड़क कनारे के पेड़ से ये गायब हो गए। उनका प रवार पहाड़ी से एक पत्तीदार कस्म लाता है जसे पत्थर के फूल
कहते ह और मसाले म डालते ह। उन्ह ने चेताया क पत्थर पर दखने वाला हर धब्बा एक ही चीज़ नह होता और सब
खाने योग्य नह होते।"

क्रयाकलाप 12.6 — पृष्ठ 238
आइए, अन्वेषण कर — ायोफाइटा, 12.6.4 जगत प्लांट

क्रयाकलाप 12.6

प्र.1 हड लस (आवधक लस) क सहायता से कुछ ायोफाइट का अवलोकन क जए। इन्ह एक वॉच ग्लास म एकत्र
क जए।

ायोफाइट नम, छायादार सतह पर हरे कालीन के रूप म ढूँ ढ़ए — पुराने भवन क द वार, नम च ान, वृक्ष का आधार, या वषा
के बाद म क सतह। भोथरे चाकू से छोटा-सा टु कड़ा उठाइए, उसे नम रखते हुए वॉच ग्लास म डा लए।
हड लस से क्या दखता है —

पूरा पौधा बहुत छोटा है — प्रायः केवल 1 से 3 cm ऊँचा।
आधार पर महीन धागे जैसी रचनाएँ ह जो इसे सतह से जोड़े रखती ह। ये मूलाभास (राइजॉइड) ह — जड़ जैसी, परंतु
वास्त वक जड़ नह ।
मॉस म इनके ऊपर एक पतला तने जैसा अक्ष होता है जस पर बहुत छोट पत्ती जैसी संरचनाएँ स पल क्रम म लगी रहती ह।
माक शया ( लवरवट) म ऐसा अक्ष होता ही नह — इसक काया म पर पड़ा चपटा हरा फ ता होती है।
कालीन से उठते महीन डंठल और उनके सरे पर संपुट भी दख सकते ह — यही बीजाणु बनाने वाला भाग है।

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सावधानी: केवल छोटा टु कड़ा ली जए और कालीन को बचाए र खए। मॉस क चादर दोबारा उगने म पूरी ऋतु ले
सकती है।

प्र.2 इन पर जल क एक बूँद डा लए और उसे वच्छे दन सूक्ष्मदश ारा दे खए। वच्छे दन सूक्ष्मदश हमारे लए सजीव
प्र तदश के आव धत बब को दे खना संभव बनाता है।

जल क बूँद दो काम करती है: प्र तदश को जी वत रखती है, और अत्यंत पतली पत्ती जैसी संरचनाओं को पारदश बना दे ती है ता क
उनसे प्रकाश पार हो सके।
वच्छे दन सूक्ष्मदश से क्या दखना चा हए —

"पत्ती" प्रायः एक ही को शका मोट होती है, अतः बना कसी अ भरंजन या काट के आप अलग-अलग को शकाएँ और उनके
भीतर के हरे ह रतलवक दे ख सकते ह।
इसम न मध्य शरा है, न शराओं का जाल।
मूलाभास सरल धागे ह, शा खत अवशोषी जड़ नह ।
जल सोखते ही पूरा पौधा फैलकर खड़ा हो सकता है — सूखा मॉस मनट म जी उठता है।

संकेत: वच्छे दन सूक्ष्मदश आवधन कम दे ता है परंतु पूरे सजीव प्र तदश का सीधा, त्र वम बब दे ता है। यहाँ यही
उपयुक्त उपकरण है — संयुक्त सूक्ष्मदश के लए पौधे क पतली काट बनानी पड़ती और वह उसे मार दे ती।

प्र.3 आपके आस-पास सामान्यतः दखाई दे ने वाली प त्तय से ये कस प्रकार भन्न ह?

ायोफाइट क "पत्ती" वास्तव म पत्ती है ही नह । यह एक चपट , प्रायः एक को शका मोट हरी परत है जसम न शराएँ ह, न
मध्य शरा, न वृंत, न मोमी उपत्वचा। नीम या आम क सामान्य पत्ती अनेक को शकाएँ मोट होती है, उसम मध्य शरा और शा खत
शरा-जाल होता है, वृंत होता है, तथा रं स हत मोमी उपत्वचा होती है।

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वशेषता ायोफाइट (मॉस) पुष्पी पादप क पत्ती

m प्रायः एक को शका मोट as e
मोटाई
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अनेक कोिशका स्तर — बाह्यत्वचा, म ध् योतक , बाह्यत्वचा

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g l a अनुप स्थत — न जाइलम, न फ्लोएम
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िशराएँ म ध् य िशरा और शािखत िशरा-जाल िजनमें जाइलम -फ्लोएम

उपत्वचा अनुप स्थत या अत्यंत पतली रंध ों सिहत मोमी उपत्वचा

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जुड़ाव सीधे तने जैसे अक्ष से

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जल की आपूित पूरी सतह से सीधे अवशोषण
a जड़ों से जाइलम ारा

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पूरे पौधे का आमाप कुछ सट मीटर दिसयों मीटर तक

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ऐसा क्य होता है: ये सारे अंतर एक ही तथ्य से नकलते ह — ायोफाइट म संवहनी ऊतक नह होते। जल ऊपर
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a s emके लए जाइलम नह और भोजन बाँटने के लए फ्लोएम नह , अतः हर को शका को जल सीधे प रवेश से लेना
gl पड़ता है — इस लए काया को पतला, नीचा और सदा नम रहना पड़ता है। एक को शका मोट होना ही इसे संभव
उठाने

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बनाता है। उपत्वचा उसी अवशोषण को रोक दे ती जस पर पौधा टका है, इस लए वह भी नह है। और जाइलम न
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होने से कुछ कठोर भी नह जो ऊँची काया को सँभाल सके — यही असली कारण है क मॉस कभी वृक्ष नह बनते।

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तो ये जी वत कैसे रहते ह? ायोफाइट को जनन के लए जल क आवश्यकता होती है, क्य क नर जनन

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को शकाओं को तैरकर मादा को शकाओं तक पहुँचना पड़ता है। इसी लए इन्ह पादप जगत का उभयचर कहा जाता

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है — ये स्थल पर रहते ह पर जल को अभी छोड़ नह पाए।

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a l प्रश्न — पृष्ठ 238
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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

टे रडोफाइटा — 12.6.4 जगत प्लांट

प्र.1 चत्र 12.11 (क) को दे खए। थैलोफाइट और ायोफाइट क तुलना म इन पौध क संरचना म क्या प रवतन
दखाई दे ते ह?

अभी कुं डिलत
नयी पत्ती

वास्तिवक पित्तयाँ — अनेक
पणकों वाला पण

वास्तिवक तना (पकं द )

मृद ा

वास्तिवक जड़ े ं

चत्र 12.11 (क), पृष्ठ 238 — पाठ्यपुस्तक म दए फन के छाया चत्र का पुनःआरे खत रेखा चत्र। थैलोफाइट या
ायोफाइट के वपरीत फन म वास्त वक जड़, वास्त वक तना तथा वास्त वक प त्तयाँ होती ह; नयी प त्तयाँ अभी
कुंड लत ह।

चत्र 12.11 (क) के फन म पादप जगत म पहली बार वास्त वक जड़, वास्त वक तना और वास्त वक प त्तयाँ ह। थैलोफाइट
म इनम से कुछ नह था — केवल थैलस, एक अ वभे दत काया। ायोफाइट म मूलाभास और मात्र तने जैसी तथा पत्ती जैसी
संरचनाएँ थ । फन म असली अंग ह।

थैलोफाइटा ायोफाइटा टे रडोफाइटा

काया थैलस — अ वभे दत भाग म थोड़ा वभेदन वास्तिवक जड़, तना और पित्त याँ

िस्थरीकरण कुछ नह / आसंजक मूलाभास अवशोषण करने वाली वास्तिवक जड़

संवहनी ऊतक अनुप स्थत अनुप स्थत जाइलम और फ्लोएम उपिस्थत

संभव ऊँचाई बहुत छोट , जल का सहारा कुछ सट मीटर मीटर तक — वृक्ष फन भी होते है ं

जनन के िलए जल आवश्यक आवश्यक अब भी आवश्यक

बीज नह नह नही ं

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यह प रवतन इतना बड़ा क्य है: वास्त वक जड़ वाला पौधा अपनी काया से भी अ धक गहराई से जल ख च
सकता है, और कठोर तने वाला पौधा अपनी प त्तयाँ पड़ो सय से ऊपर रख सकता है। जल को ऊपर ले जाने वाली
न लका प्रणाली के बना इनम से कुछ भी संभव नह । अतः आकृ त म दखता प रवतन — ऊँचा, सीधा, वभा जत
पौधा — वास्तव म एक छपे प रवतन का बाहरी चह्न है: संवहनी ऊतक का आगमन।

प्र.2 आपको क्या लगता है क इन पौध के सभी भाग म जल और भोजन कस प्रकार पहुँचता है?

जड़ से लेकर पत्ती के सरे तक फैले वशेष प रवहन ऊतक से — जाइलम जल को ऊपर ले जाता है और फ्लोएम भोजन
को। अध्याय जस "संभा वत स्पष्टीकरण" क बात करता है, वह यही है और यही सही है।

ऐसा कोई ऊतक चा हए ही क्य : मॉस म हर को शका बाहर से मलीमीटर के अंश जतनी दूर है, इस लए जल
वसरण से पहुँच जाता है। फन का पण मृदा से 30 cm या अ धक ऊपर खड़ा हो सकता है। इतनी दूरी पर वसरण
नराशाजनक रूप से धीमा है — वही पृष्ठीय-क्षेत्रफल बनाम आयतन क समस्या जो जंतुओं को रु धर वा हकाएँ
बनाने पर ववश करती है। अतः ऊँचा बढ़ने वाले पौधे को न लकाएँ बनानी ही पड़ती ह।

दोन ऊतक क्या करते ह —

जाइलम — सरे से सरे तक जुड़ी खोखली, मृत, मोट भ त्त वाली न लकाएँ। यह जड़ से जल और घुले ख नज को ऊपर ले
जाता है, और इसक ल ग्ननयुक्त भ त्तयाँ तने को कठोरता भी दे ती ह, जससे पौधा सीधा खड़ा रह पाता है।
फ्लोएम — जी वत न लकाएँ जो प त्तय म बना भोजन शेष सभी भाग तक ले जाती ह, नीचे जड़ तक भी, जो स्वयं प्रकाश
सं ेषण नह कर सकत ।

जोड़कर दे खए: फन क यह समस्या ठ क वही है जो इस अध्याय म आगे जंतु जगत बार-बार झेलता है। स्पंज
छद्र से जल बहाकर हर को शका तक पहुँच बनाता है; बड़ा जंतु उसके बदले प रसंचरण तंत्र बनाता है। प रवहन
ऊतक उसी समाधान का पादप रूप है।

प्र.3 आप इस स्पष्टीकरण क जाँच कस प्रकार कर सकते ह?

फन के तने क पतली अनुप्रस्थ काट बनाकर सूक्ष्मदश से दे खए। य द स्पष्टीकरण सही है तो कट सतह पर न लकाएँ दखनी
चा हए; य द फन म प रवहन ऊतक न होता तो काट एकसमान दखती।
वध—

1. ताजा फन का तना (प्रकंद या पण का डंठल) लेकर तीखे ब्लेड से बहुत पतली अनुप्रस्थ काट ली जए — इतनी पतली क प्रकाश
पार हो सके।
2. स्लाइड पर जल क बूँद म रखकर कवर स्लप लगाइए और संयुक्त सूक्ष्मदश क पहले नम्न, फर उच्च श क्त पर दे खए।
वद्यालय प्रयोगशाला म उपलब्ध फन के तने क अनुप्रस्थ काट क स्थायी स्लाइड से भी काम चलेगा।

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3. मोट भ त्त वाली न लकाओं के गुच्छे खो जए।

क्या मलता है: चत्र 12.11 (ख) प रणाम दखाता है — अनुप्रस्थ काट म संवहनी ऊतक, जाइलम और फ्लोएम दखाई दे ते ह,
जो क्रमशः जल और भोजन को संपूण पौधे तक पहुँचाते ह। पूवानुमान सत्या पत हो गया।

यह जाँच क्य कहलाती है: स्पष्टीकरण ने एक ऐसी संरचना के वषय म व शष्ट, परखने योग्य दावा कया था जसे
अभी दे खा नह गया था। काट दे खने पर यह दावा गलत भी सद्ध हो सकता था — एक जैसी को शकाओं का
समरूप ढे र दखता तो स्पष्टीकरण असत्य होता। यही इसे केवल प्रदशन नह , जाँच बनाता है। पहले पूवानुमान, फर
अवलोकन — यही व ध अध्याय क्रयाकलाप 12.7 म फर अपनाता है।

क्रयाकलाप 12.7 — पृष्ठ 238

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आइए, तुलना कर — टे रडोफाइटा, 12.6.4 जगत प्लांट

क्रयाकलाप 12.7

प्र.1 सूरजमुखी के तने क अनुप्रस्थ काट का स्मरण क जए जसका अध्ययन आपने अध्याय 3 म कया है ( चत्र
3.7)।

बाह्यत्वचीय रोम

बाह्यत्वचा
श्लेषोतक
उपत्वचा

क तऊ कयाहस
मृदूत क

दृढ़ोतक

सूरजमुखी (हेिलऐन् थस एनुअस) फ्लोएम

पाश्व िवभ ज्योतक

जाइलम

भरण ऊतक

तने की अनुपस्थ काट

चत्र 3.7, अध्याय 3 का पृष्ठ 32 — सूरजमुखी के तने क आंत रक संरचना, पुनःआरे खत। अनुप्रस्थ काट का एक खंड
आव धत करके दखाया गया है तथा नीचे पूरी अनुप्रस्थ काट, जसम संवहन पूल बड़े म ा के चार ओर एक वलय म
व्यव स्थत ह।

सूरजमुखी एक बीजपत्री एं जयोस्पम है — इस अध्याय का सबसे उन्नत पादप समूह। अध्याय 3 के अनुसार उसके तने क
अनुप्रस्थ काट इस प्रकार व्यव स्थत होती है —

सबसे बाहर उपत्वचा स हत बाह्यत्वचा।
उसके नीचे वल्कुट का क्षेत्र।
संवहन पूल एक वलय म, समान दूरी पर, प्रत्येक पूल म जाइलम भीतर क ओर और फ्लोएम बाहर क ओर।
प्रत्येक पूल म जाइलम और फ्लोएम के बीच एधा (क बयम) क प — वभा जत होती को शकाओं का स्तर।
बीच म बड़ा म ा।

संकेत: दो बात मन म बैठा ली जए — पूल का वलय म होना, और एधा का उप स्थत होना। तुलना का सारा बदु
अब इन्ह दो पर टकेगा।

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फन (टे रडोफाइट) के तने क अनुप्रस्थ काट ( चत्र 12.11) क तुलना अध्याय 3 म पढ़े गए सूरजमुखी के तने क
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प्र.2

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अनुप्रस्थ काट ( चत्र 3.7) से क जए।

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एक संकेंद ी संवहन पूल

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जाइलम

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a s em अंतस्त्वचा (बंड ल आच्छद )

ag l तने का भरण मृदू तक

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चत्र 12.11 (ख), पृष्ठ 238 — फन के तने क अनुप्रस्थ काट, पुस्तक के सूक्ष्मदश चत्र से पुनःआरे खत। जाइलम कद्र

s e m गहरी अंतस्त्वचा पूरे पूल को घेरती है — एक ही संकद्र संवहन पूल, एधा
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म है, फ्लोएम उसे चार ओर से घेरे हुए है तथा

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(क बयम) अनुप स्थत।

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बाह्यत्वचीय रोम

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तने की अनुपस्थ काट

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चत्र 3.7, अध्याय 3 का पृष्ठ 32 — सूरजमुखी के तने क आंत रक संरचना, पुनःआरे खत। अनुप्रस्थ काट का एक खंड

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agl व्यव स्थत ह।

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वशेषता फन का तना (टे रडोफाइटा, चत्र 12.11 सूरजमुखी का तना (एं जयोस्पम, चत्र 3.7)
ख)

जाइलम और फ्लोएम उप स्थत उपिस्थत

संवहनी ऊतक का बखरे हुए पूल / कद्र य समूह, नय मत वलय नह म ज्जा के चारों ओर िनयिमत वलय में पूल
िवन्यास

एधा (कैं िबयम) अनुप स्थत उपिस्थत, जाइलम और फ्लोएम के बीच

मोटाई में वृिद्ध अत्यंत सी मत — नया संवहनी ऊतक नह जुड़ संभव — एधा िनरंतर नया जाइलम -फ्लोएम बनाती रहती
सकता है

जाइलम में वािहकाएँ अ धकांशतः केवल वा ह नकाएँ वािहकाएँ उपिस्थत — चौड़ी, तेज़ जल संवहन

मज्जा छोटा या स्पष्ट रूप से अलग नह बड़ा और सुस्पष्ट

मज्जा

फन — िबखरे पूल, सूरजमुखी — वलय मे ं
एधा अनुपिस्थत पूल, एधा सिहत
वही ऊतक, भन्न व्यवस्था: फन के पूल बखरे और संख्या म न त ह; सूरजमुखी के पूल वलय म ह और एधा से नए जुड़ते रहते ह।

प्र.3 फन के तने और उच्चतर पादप के तने के संवहनी ऊतक म आपको क्या अंतर दखाई दे ते ह? अपने अवलोकन
ल खए और कक्षा म उन्ह साझा कर उन पर चचा क जए।

दोन म जाइलम और फ्लोएम ह — अंतर इस बात का है क ऊतक कस प्रकार व्यव स्थत है और क्या वह आगे बनता रह
सकता है।

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लखने योग्य अवलोकन —

1. फन का संवहनी ऊतक अ धक सरल और कम व्यव स्थत है: मज्जा के चार ओर नय मत वलय के स्थान पर आधारी ऊतक
म बखरे पूल।
2. फन के जाइलम म मुख्यतः वा ह नकाएँ होती ह जो सँकरी ह; उच्चतर पादप म चौड़ी वा हकाएँ भी होती ह, अतः जल तेज़ी से
और अ धक मात्रा म चलता है।
3. फन म एधा नह होती। उच्चतर पादप के हर पूल म जाइलम और फ्लोएम के बीच एधा होती है।

एधा ही सबसे महत्त्वपूण अंतर क्य है: एधा के बना फन को जीवन भर उतना ही संवहनी ऊतक मलता है
जतना आरंभ म बना। पौधा बढ़ता है तो वही न त न लकाएँ लगातार बड़ी होती काया को सँभालती ह — इस लए
फन शीघ्र ही ऊँचाई और मोटाई क सीमा पर पहुँच जाता है। एधा होने पर सूरजमुखी या वृक्ष हर ऋतु भीतर क ओर
नया जाइलम और बाहर क ओर नया फ्लोएम बनाता रहता है। न लका प्रणाली पौधे के साथ बढ़ती है। इसी लए
स्थल के सबसे वशाल जीव बीजी पादप ह, फन नह — और काष्ठ के अ स्तत्व का शारी रक कारण भी यही है।

कक्षा म चचा का बदु: फन ने प रवहन क समस्या हल कर ली है, परंतु मोटाई म वृ द्ध क नह ; और स्थल पर
जनन क समस्या भी नह — उसे नषेचन के लए अब भी जल चा हए और वह बीज नह बनाता। इस अध्याय का
हर पादप समूह पछले समूह क समस्या हल करता है और अपनी एक नई समस्या छोड़ जाता है।

सो चए और बताइए — पृष्ठ 238
जम्नोस्पम — 12.6.4 जगत प्लांट

सो चए और बताइए

प्र.3 पादप क ऐसी कौन-सी वशेषताएँ ह जो जल पर पादप क नभरता को कम करती ह परंतु इसके प ात भी नम
प र स्थ तय क आवश्यकता बनी रहती है?

जो वशेषताएँ जल पर नभरता घटाती ह वे प रवहन और अवलंब क समस्या हल करती ह; और जो वशेषताएँ पौधे को नमी से
बाँधे रखती ह वे जनन से जुड़ी ह। टे रडोफाइट वह समूह है जहाँ ये दोन वपरीत दशाओं म ख चते ह।

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वशेषता यह कस बंधन से मुक्त करती है यह क्या हल नह करती

वास्तिवक जड़ काया से भी गहरे जल तक पहुँच; स्थरीकरण —

जाइलम और ऊँची काया तक जल और भोजन पहुँचाना, —
फ्लोएम तने को कठोरता दे ना

पत्ती पर उपत्वचा शुष्क वायु म जल क हा न —

चल नर युग्मक — नर कोिशका को अंडाण ु तक तैर कर जाना पड़ता है, अतः िनषेचन के
िलए जल की परत अिनवाय है

बीज का अभाव — बीजाण ु में न संिचत भोजन है न र क्षक आवरण, इसिलए वह वही ं अंकु िरत
हो सकता है जहाँ पहले से नमी हो

यह वभाजन क्य है: का यक जीवन और जनन दो अलग समस्याएँ ह। फन क जड़ और संवहनी ऊतक उसे खुले
जल से दूर उगने और एक मीटर ऊँचा खड़ा होने दे ते ह। परंतु नषेचन के क्षण म नर को शका को अपने बल पर मादा
को शका तक जाना पड़ता है, और वह केवल तैर सकती है। प रवहन हल कर ली जए तो आप स्थल पर रह सकते ह;
परंतु जब तक नषेचन हल न हो, आप सूखे स्थल पर जनन नह कर सकते। ठ क यही काम जम्नोस्पम आगे करते ह
— इसी लए अध्याय ने उनका शीषक "जलर हत जनन" रखा है।

ायोफाइट इसी प्र तरूप म एक सीढ़ नीचे बैठते ह। इनम मूलाभास और थोड़ी वभे दत काया है, अतः इन्ह ने
जल छोड़ दया; परंतु संवहनी ऊतक न होने और नर युग्मक के तैरने के कारण इन्ह जीने और जनन दोन के लए
नमी चा हए। इसी लए नाम पड़ा — पादप जगत का उभयचर।

प्र.4 ऊँचे पादप को वशेष प रवहन ऊतक क आवश्यकता क्य होती है?

क्य क लंबी दूरी पर वसरण अत्यंत धीमा है, और ऊँची काया को सँभालने के लए कुछ कठोर भी चा हए। प रवहन ऊतक
दोन आवश्यकताएँ एक साथ पूरी करता है।

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दूरी क समस्या। वसरण मलीमीटर के अंश पर अच्छा काम करता है और मीटर पर नराशाजनक — लगा समय
दूरी के वग के अनुपात म बढ़ता है। कुछ सट मीटर के मॉस म सतह से सोखा जल हर को शका तक पहुँच जाता है।
फन, चीड़ या गुलमोहर म प त्तयाँ मृदा से मीटर ऊपर और जड़ नकटतम पत्ती से मीटर नीचे हो सकती ह। कोई भी
सरा दूसरे को वसरण से पू त नह दे सकता।

जड़ े ं जल सोखती है ं — परंत ु पकाश संश्लेषण नही ं कर सकती ं।

पित्तयाँ भोजन बनाती है ं — परंत ु मृद ा तक नही ं पहँच
ु सकती ं।
जाइलम: जल + खिनज, जड़ → पित्तयाँ।

फ् लोएम: भोजन, पित्तयाँ → शेष सभी भाग, जड़ ों सिहत।

दोनों के िबना ऊँ चे पौधे का एक िसरा भूखा रहेगा और दू सरा सूख जाएगा।

अवलंब क समस्या। जाइलम केवल न लका नह है। इसक को शकाओं क भ त्तयाँ मोट और ल ग्नन से कठोर
होती ह और प रपक्व होने पर ये मर जाती ह, पीछे खोखली दृढ़ न लयाँ छोड़कर। गुच्छ म ये मचान क भाँ त काम
करती ह — जो ऊतक जल ले जाता है वही पौधे को खड़ा भी रखता है। छोटे पौधे को को शकाओं का त दाब
सँभाल लेता है; ऊँचे को नह । इसी लए कोई भी असंवहनी पादप ऊँचा नह होता, और इसी लए काष्ठ (जो मुख्यतः
पुराना जाइलम है) के कारण वृक्ष संभव हुए।

ऊँचाई क क मत क्य चुकाई जाती है: प्रकाश के लए। ऊँचा पौधा सूय का प्रकाश अपने पड़ो सय से पहले रोक
लेता है। इस अनुभाग क हर संरचना — जड़, जाइलम, ल ग्नन, एधा — प त्तय को प्र तस्पधा से ऊपर पहुँचाने क
क मत का हस्सा है।

प्र.5 पादप कहाँ और कैसे जी वत रहगे इसे बीज और फल कस प्रकार प्रभा वत करते ह?

बीज पौधे को जनन के लए जल क आवश्यकता से मुक्त करता है; और फल उसक संत त को वह उगने क ववशता से
मुक्त करता है जहाँ जनक खड़ा है। इन्ह दो संरचनाओं से समझ आता है क एं जयोस्पम पृथ्वी का सवा धक व वधता वाला
पादप समूह क्य है।
बीज क्या करता है

यह वकासशील भ्रूण क रक्षा कठोर आवरण म करता है, जससे नया पौधा सूखा, ठं ड और समय झेल सके — वह प्रसुप्त
पड़ा रहकर अनुकूल प र स्थ त क प्रतीक्षा कर सकता है।
इसम भोजन सं चत रहता है, अतः अपनी प त्तयाँ खुलने तक अंकुर को पोषण मलता है। बीजाणु म न आवरण होता है न
भोजन, इसी लए फन का बीजाणु केवल पहले से नम और छायादार स्थान पर ही अंकु रत हो सकता है।

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जम्नोस्पम और एं जयोस्पम म नषेचन के लए जल क आवश्यकता नह होती — परागकण नर युग्मक को बीजांड तक
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पहुँचा दे ता है, अतः शुक्राणु को कभी तैरना नह पड़ता। यही एकमात्र प रवतन पादप को शुष्क क्षेत्र म जनन करने योग्य बनाता

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है।

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फल क्या करता है
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a यह पकते हुए बीज को घेरता और सुर क्षत रखता है।
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यह बीज को नए स्थान तक फैलाने म सहायक होता है — क ट या प क्षय , जंतुओं, वायु या जल ारा। जनक के नीचे

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अंकु रत बीज को प्रकाश, जल और ख नज के लए जनक से ही प्र तस्पधा करनी पड़ती है; प्रक णत बीज को नह ।
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यह पादप के नवास म कैसे दखता हैa:gl
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जम्नोस्पम — चीड़ और साइकैड — ठं डे और शुष्क क्षेत्र के लए सुअनुकू लत ह। इनक सुई या शल्क जैसी
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प त्तयाँ जल क हा न कम करती ह और बीज शंकुओं पर अनावृत रहते ह। जल के बना नषेचन ही इन्ह वहाँ

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g बढ़ाते ह, और फल भी जो
रहने योग्य बनाता है।

m .c म पुष्प भी ह जो परागणकताओं को आक षत करके जनन क दक्षता a
aseबीज को दूर ले जाते ह। इन्ह वशेषताओं से एं जयोस्पम मरुस्थल से वषावन और अलवणीय जल तक व वध
एं जयोस्पम

agl पयावरण म नवास कर पाते ह, और पृथ्वी का सवा धक व वधता वाला पादप समूह बनते ह।

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क्या आप जानते ह? "एं जयोस्पम" म एं जय न का अथ है पात्र और स्पम स का अथ बीज — अथात "पात्र म बंद
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बीज", यानी फल। जम्नोस का अथ है अनावृत: जम्नोस्पम का बीज शंकु पर खुला पड़ा रहता है।

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om12.8 — पृष्ठ 239
क्रयाकलाप
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agl क्रयाकलाप 12.8
आइए, चचा कर — एं जयोस्पम, 12.6.4 जगत प्लांट

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s बीजपत्री म समू हत क जए। चचा क जए क इनक संरचनाएँ उन्ह
अपने आस-पास से व भन्न प त्तयाँ एकत्र क जए और उनके आकार तथा शरा- वन्यास का अवलोकन क जए।
इसके साथ ही इन्ह एकबीजपत्रीaऔर
प्र.1

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अलग-अलग प र स्थ तय aम जी वत रहने के लए अनुकू लत होने म कस प्रकार सहायता करती ह।

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seबीजपत्री को भरोसे के साथ

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प त्तय को शरा- वन्यास के आधार पर छाँ टए — यही एक लक्षण एकबीजपत्री और

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अलग दे ता है।
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वशेषता एकबीजपत्री पत्ती बीजपत्री पत्ती

िशरा-िवन्यास समांतर — शराएँ आधार से सरे तक साथ-साथ जािलकावत — म ध् य िशरा से िनकलता शािखत जाल
चलती ह

आकार लंबी, सँकरी, फ ते या फलक जैसी चौड़ी, पायः स्पष्ट फलक और वृंत सिहत

एकत्र करने योग्य घास, मक्का, गे ँ, गन्ना, केला, कैना, प्याज नीम , आम , पीपल , ग ड
ु ़ हल , तुल सी, ग ल
ु ाब, चना,
उदाहरण सूर जमुखी

ये संरचनाएँ उत्तरजी वता म कैसे सहायक ह — चचा के बदु

समांतर शराएँ और सँकरा फलक (एकबीजपत्री) पवन म फटने के स्थान पर झुक जाते ह और जल शीघ्र बहा दे ते ह। घास
पत्ती के आधार से बढ़ती है, इस लए चरे जाने या काटे जाने के बाद भी फलक फर उग आता है — यही एक कारण है क जहाँ
चराई अ धक हो वहाँ घास ही छाई रहती ह।
चौड़ी जा लकावत प त्तयाँ ( बीजपत्री) सूय के प्रकाश के सामने बड़ा क्षेत्रफल रखती ह, अतः अ धक प्रकाश ग्रहण करती ह
— छायादार वन के नीचे यह लाभदायक है। शा खत शरा-जाल का अथ यह भी है क फट पत्ती का शेष भाग भी पू त पाता
रहता है, क्य क जल दरार के चार ओर से जा सकता है।
मोट , मोमी या छोट प त्तयाँ — जैसे शुष्क स्थान के अनेक पौध म — जल क हा न घटाती ह; इसका चरम उदाहरण चीड़
क सुई जैसी पत्ती है।
बड़ी, कोमल, पतली प त्तयाँ — जैसे केला या वषावन के पौधे — वहाँ मलती ह जहाँ जल पयाप्त और पवन कम हो; केले क
पत्ती पवन म अपनी समांतर शराओं के साथ फट जाती है, जससे पौधा उखड़ने के स्थान पर दबाव से बच जाता है।

कॉपी के लए नमूना उत्तर: "मने 12 प त्तयाँ एकत्र क । घास, मक्का, केला और कैना म समांतर शराएँ और लंबे
सँकरे फलक थे — ये एकबीजपत्री ह। नीम, आम, गुड़हल, पीपल, तुलसी, गुलाब, चना और सूरजमुखी म मध्य शरा
और शा खत जाल था — ये बीजपत्री ह। नीम और आम क प त्तयाँ चमड़े जैसी और चमकदार थ , जससे हमारी
शुष्क गम म जल क हा न कम होती है, जब क तुलसी क पत्ती पतली और कोमल थी और जल न मलने पर पौधा
शीघ्र मुरझा जाता है।"

क्रयाकलाप 12.9 — पृष्ठ 239 – 240
आइए, अध्ययन कर — ता लका 12.3, पादप जगत के वग

क्रयाकलाप 12.9

प्र.1 प्रत्येक पादप समूह क व शष्ट वशेषताओं का ध्यानपूवक अध्ययन क जए।

पाँच समूह को क्रम से प ढ़ए और दे खए क हर एक कौन-सी एक समस्या हल करता है। इस तरह रखने पर ता लका 12.3 सूची
नह , एक क्रम बन जाती है।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

समूह व शष्ट वशेषताएँ यह कौन-सी समस्या हल करता
है

थैल ोफाइटा शरीर थैलस जैसा; प रवेश से गैस , पोषक तत्व और जल का सीधा आदान- अभी कोई नही ं — यह के वल जल के
प्रदान; अ धकांशतः जलीय। उदाहरण: स्पाइरोगाइरा िलए भली-भाँित अनुकू िलत है

बायोफाइटा मूलाभास, तने व पत्ती जैसी संरचनाएँ; संवहनी ऊतक नह ; जनन के लए जल स्थल पर िनवास — परंत ु के वल वही ं
आवश्यक। उदाहरण: माक शया, मॉस जहाँ नमी बनी रहे

टेिरडोफाइटा वास्त वक जड़, तना और प त्तयाँ; जाइलम और फ्लोएम; बीज नह ; जनन के पिरवहन और अवलंब — िजससे पौधा
लए जल आवश्यक। उदाहरण: फन ऊँचा बढ़ सके

िजम्नोस्पम सुई या शल्क जैसी प त्तयाँ; बीज फल म बंद नह , शंकुओं पर अनावृत; नषेचन जल के िबना जनन, तथा ठं डे और
के लए जल क आवश्यकता नह । उदाहरण: चीड़, साइकैड शुष्क स्थानों में उ त्त रजीिवता

एंिजयोस्पम सु वक सत जड़, तना और प त्तयाँ; पुष्प ारा ल गक जनन; बीज फल के अंदर पभावी परागण और बीज पकीणन —
बंद; बीज क ट , प क्षय , जंतुओं, वायु या जल ारा प्रक णत। उदाहरण: इसीिलए सव िधक िविवध पय वास
गुलमोहर

एक वाक्य म याद रखने योग्य: शैवाल से लेकर एं जयोस्पम तक पादप समूह संरचनात्मक प रवतन का एक क्रम
दशाते ह जो स्थलीय जीवन क चुनौ तय का सामना करने म सहायक ह। आरं भक पादप अवलंब और जनन के
लए जल पर नभर थे; क्रमशः उनम प रवहन ऊतक, फर बीज, फर पुष्प वक सत हुए।

प्र.2 इन वशेषताओं का व ेषण क जए और द गई ता लका म समूह क उत्तरजी वता के लए उनके लाभ तथा
उनके समक्ष आई चुनौ तय अथवा अपवाद को ल खए।

नीचे ता लका 12.3 पूरी भरकर द गई है। पुस्तक क अपनी प्र व ष्टयाँ रखी गई ह और रक्त पं क्तयाँ भरी गई ह।

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पादप समूह क उत्तरजी वता के लए लाभ अपवाद / चुनौ तयाँ
समूह

थैल ोफाइटा सरल पादप काय संरचना इनक उत्तरजी वता और जल म इनके ये स्थल पर नही ं रह सकते। न जड़ें, न उपत्वचा, न
प्रसार को सुगम करती है। पूरी सतह से जल, ख नज और गैस संवहनी ऊतक — जल से बाहर तुर ंत सूख जाते है,ं
सीधे अवशो षत होती ह, अतः प रवहन ऊतक क ऊँचे नही ं बढ़ सकते और स्वयं को सँभाल नही ं
आवश्यकता ही नह । अनेक जलीय आहार ृंखलाओं का सकते।
आधार ह और ऑक्सीजन नमुक्त करते ह।

बायोफाइटा ये पादप जगत के उभयचर ह। इनक काया नम स्थल पर रहने के इन्हे ं सदा जल (नमी) की आवश्यकता होती है।
लए अनुकू लत है। मूलाभास इन्ह च ान और मृदा से जोड़ दे ते संवहनी ऊतक न होने से ये छोटे और नीचे ही रह जाते
ह, अतः ये उन नंगी सतह पर बस जाते ह जहाँ और कुछ नह है;ं नर युग्मकों को तैर ना पड़ता है, अतः शुष्क मौसम में
उगता, और स्पंज क भाँ त नमी रोककर मृदा बनने म जनन रुक जाता है।
सहायक होते ह।

टेिरडोफाइटा ये स्थल पर रहते ह। ये पूरे पौधे म जल और भोजन का प रवहन जल के अभाव में जनन नही ं होता। ये बीज नही ं बनाते,
करते ह। वास्त वक जड़ मृदा म गहरे जल तक पहुँचती ह और अतः बीजाण ु में न संिचत भोजन है न र क्षक आवरण,
जाइलम तने को कठोर करता है, अतः ये ऊँचे बढ़कर अपनी और वह के वल नम , छायादार स्थान पर ही अंकु िरत हो
प त्तयाँ प्र तस्प धय से ऊपर रख सकते ह। सकता है।

िजम्नोस्पम प त्तयाँ शुष्क प र स्थ तय के लए अनुकू लत होती ह। जनन के बीज फल से आवृत नही ं होते। फल न होने से पकीणन
लए जल क आवश्यकता नह होती। ये जीवन क नरंतरता के ृ बीज सरलता से
में सहायता नही ं िमलती और अनावत
लए बीज बनाते ह। सुई जैसी प त्तयाँ और मोट उपत्वचा ठं ड, खा िलया जाता है; परागण पवन पर िनभर है, अतः
पवन और सूखा झेल लेती ह, इसी लए ये ऊँचे पवत और ठं डे बहुत सारा परागकण व्यथ जाता है।
क्षेत्र म छाए रहते ह।

एंिजयोस्पम ये पुष्प, फल और बीज उत्पन्न करते ह। इनका जनन तंत्र जनन िविभन्न कम कों ारा परागण पर िनभर करता
सु वक सत है। ये जीवन क नरंतरता के लए बीज बनाते ह। इनके है। इनमें सुिवकिसत ऊतक तंत्र के माध् यम से जिटल
बीज आव रत होते ह। पुष्प परागणकताओं को आक षत करते पिक्रयाएँ होती है।
ं परागणकत समाप्त हो जाए तो
ह, अतः बहुत कम परागकण व्यथ जाता है; फल बीज को बीज बनना ही रुक जाता है — अथ त पौधे की
जनक से दूर ले जाते ह, अतः संत त जनक से प्र तस्पधा नह उ त्त रजीिवता िकसी दू स री जाित की उ त्त रजीिवता से
करती। बँध जाती है।

पूरी ता लका म दखता प्र तरूप: हर लाभ अपने साथ एक नई नभरता लाता है। संवहनी ऊतक फन को ऊँचा
बढ़ने दे ता है, पर अब उसे न लका प्रणाली बनाए भी रखनी है। बीज जम्नोस्पम को जल से मुक्त करता है, पर
अनावृत बीज असुर क्षत है। पुष्प एं जयोस्पम का जनन दक्ष बनाता है, पर उसे क ट, पक्षी या चमगादड़ से बाँध दे ता
है। कोई भी समूह चुनौती से मुक्त नह है — और यही कारण है क "श्रेष्ठ" समूह ारा शेष को हटा दे ने के बजाय
आज भी इतने समूह साथ-साथ मलते ह।

पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 241

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पोरीफेरा और नाइडे रया — 12.6.5 जगत ए नमे लया

प्र.1 स्पंज एक ही स्थान पर स्थर रहते ह और जलीय पयावरण म पाए जाते ह। क्या आपको लगता है क वे स्थल पर
जी वत रह सकते ह? क्य अथवा क्य नह ?

नह । स्पंज स्थल पर जी वत नह रह सकता, क्य क उसके सभी जैव प्रक्रम उसके शरीर से बहते जल पर नभर ह।

तंत्र क्या है: स्पंज बहुको शक य तो है परंतु उसम ऊतक और अंग संगठन नह होते। उसम न मुख है, न आहार नाल,
न क्लोम, न हृदय, न पे शयाँ, न तं त्रका तंत्र। इसके स्थान पर उसके शरीर के अनेक छद्र से जल नरंतर बहता रहता
है, और वही धारा एक साथ चार काम करती है —

यह भोजन के कण सीधे को शकाओं तक पहुँचाती है;
यह ऑक्सीजन सीधे को शकाओं तक पहुँचाती है;
यह अप शष्ट पदाथ को बाहर ले जाती है;
यह स्पंज क जनन को शकाओं को भी बाहर और भीतर ले जाती है।

जल हट जाए तो चार काम एक साथ रुक जाते ह। कोई अंग उन्ह सँभाल भी नह सकता, क्य क अंग ह ही नह ।
स्थलीय जंतु को श्वसन के लए फेफड़े या श्वासन लकाएँ चा हए, पाचन के लए आहार नाल, और सूखने से बचने के
लए जलरोधी आवरण — स्पंज म इनम से कुछ नह है, और उसका शरीर छद्रयुक्त है, अतः वह मनट म सूख
जाएगा।

क्या आप जानते ह? अनुसंधान अध्ययन दशाते ह क एक कलोग्राम स्पंज प्र त दन 24000 लीटर समुद्र जल को
नस्यं दत कर सकता है। यही एक आँकड़ा बता दे ता है क यह जंतु धारा पर कतना पूणतः नभर है — वह जल म
इतना नह रहता जतना अपने से होकर बहते जल पर जीता है।

प्र.2 यद्य प नाइडे रया के शरीर म एक ही छद्र होता है जो भोजन के अंतग्रहण और अप शष्ट के नष्कासन दोन का
काय करता है। क्या आप अनुमान लगा सकते ह क इस शरीर क संरचना क क्या क मयाँ हो सकती ह?

एक ही छद्र का अथ है क भोजन ग्रहण और अप शष्ट नष्कासन एक साथ नह हो सकते, और पाचन को चरण म बाँटा
नह जा सकता। इससे तीन क मयाँ नकलती ह।

1. अप शष्ट नकलते समय भोजन लेना रुक जाता है। एक ही ार दोन दशाओं म प्रयुक्त होता है, अतः जंतु नरंतर नह खा
सकता। एक सरे पर मुख और दूसरे पर गुदा वाली आहार नाल भोजन को एक ही दशा म चलाती है और दोन प्रवाह को अलग
रखती है।
2. आहार नाल म वशेषीकरण संभव नह । एक छद्र वाली दे हगुहा म पाचन एक ही कक्ष म होता है। नली होने पर अलग-अलग
भाग क्रम से अलग-अलग काय कर सकते ह — पीसना, फर एंजाइम पाचन, फर अवशोषण, फर जल का पुनरवशोषण। यह
कह अ धक दक्ष है।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण
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3. अप चत अप शष्ट आते हुए भोजन से मल जाता है। पोषक और अप शष्ट एक ही स्थान साझा करते ह, जससे अवशोषण
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सी मत होता है और अप शष्ट फर से ग्रहण होने का जो खम रहता है।
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फर भी नाइडे रया के लए यह चल क्य जाता है: हाइ ा या जेली फश का शरीर केवल दो को शका स्तर मोटा
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gl है, अतः भीतरी स्तर क हर को शका पाचन गुहा को सीधे छू ती है और वह से भोजन सोख लेती है — रु धर
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होता
त क आवश्यकता ही नह । यह रचना तभी कमी बनती है जब जंतु बड़ा और मोटा हो जाए। अध्याय के अगले

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चरण इसी का समाधान करते ह: गोल कृ मय म दो छद्र — मुख और गुदा होते ह, जो इस क्रम क पहली वास्त वक

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एक दशीय आहार नाल है।

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प्र तरूप दे खए: पोरीफेरा (ऊतक नह , सारा काम जल क धारा करती है) → नाइडे रया (वास्त वक ऊतक,

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स्पशक से स क्रय शकार, परंतु एक छद्र) → प्लैट हे ल्म ीस ( पाश्व सम म त, फर भी एक छद्र) → नेमाटोडा
(दो छद्र)। हर चरण पछली उपल ब्ध रखता है और एक कमी दूर करता है।
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a प्रश्न — पृष्ठ 242
पाठ्य
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ऐने लडा और आ पोडा — 12.6.5 जगत ए नमे लया

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इनके शरीर बेलनाकार और खंड gमl वभा जत होते ह। खंडीभवन से जीव को क्या लाभ हो सकते ह? कचुए क
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ग त का अवलोकन करने से आपको यह संकल्पना न मत करने म सहायता मल सकती है।

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खंडीभवन अ धक लचीलेपन और ग त पर अपेक्षाकृत अ धक नयंत्रण को संभव बनाता है — क्य क प्रत्येक खंड को अलग

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से चलाया जा सकता है, पूरे शरीर को एक ठोस पड क भाँ त काम नह करना पड़ता।

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कचुए को दे खए, तंत्र स्पष्ट हो जाएगा। छोटा और मोटा होने क एक तरंग शरीर म आगे से पीछे क ओर दौड़ती
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है। कसी भी क्षण कुछ खंड लंबे और पतले होते ह (आगे क बल पकड़ते हुए) और कुछ छोटे व मोटे (लंगर क
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भाँ त टके हुए)। य द पूरे शरीर को एक साथ सकुड़ना पड़ता तो वह एक ही ढे र म छोटा हो जाता और कह नह

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जाता। शरीर वभा जत होने के कारण हर खंड क अपनी वतुल और अनुदैध्य पे शयाँ होती ह और दे हगुहा ( चत्र
12.15) का अपना द्रव भरा कक्ष होता है जसके वरुद्ध वह धकेल सके — इसी लए तरंग जंतु के साथ चलकर उसे

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आगे बढ़ा दे ती है। तं त्रका रज्जु पूरी लंबाई म फैली है और हर खंड तक शाखा भेजती है, जससे समय- नधारण

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सट क रहता है।
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a s em लाभ, क्रम से —

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लचीली, तरंग जैसी ग त — मृदा म बल बनाने के लए अ नवाय।
स्थानीय स्तर पर सट क नयंत्रण, क्य क पे शयाँ और तं त्रकाएँ हर खंड म दोहराई गई ह।
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सुरक्षा का अंतर — एक खंड को क्ष त पहुँचने से पूरा जंतु न ष्क्रय नह होता।
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a s emइकाइयाँ आगे चलकर अलग-अलग काय ले सकती ह — आ पोडा म ठ क यही
a वक्षl और उदर बनकर पाद, पंख, श्रृं गका और मुखांग धारण करते ह।
वशेषीकरण क संभावना। दोहराई गई
हुआ है, जहाँ अलग खंड सर, g

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ध्यान द जए: ऐने लड म अंग तंत्र स्तर का संगठन होता है और दे हगुहा भी उप स्थत होती है। दे हगुहा खंड जतनी
ही महत्त्वपूण है: यह आहार नाल को दे ह भ त्त से अलग रखती है, जससे जंतु अपनी ही आँत को दबाए बना चल
सकता है, और उसम भरा द्रव पे शय के लए कंकाल का काम करता है।

प्र.2 आ पोड क एक नधारक संरचनात्मक वशेषता कठोर ब हःकंकाल (दृढ़ बाह्य आवरण) का वकास है। इस
बाहरी आवरण के क्या लाभ हो सकते ह?

ब हःकंकाल सुरक्षा प्रदान करता है, जल क हा न कम करता है और मांसपे शय को अवलंब दे ता है — और इन्ह के
कारण आ पोड शुष्क और अर क्षत पयावरण म जी वत रह पाते ह, जहाँ कोमल शरीर वाले जंतु नह रह सकते।

1. सुरक्षा। कठोर आवरण कोमल अंग को परभ क्षय और भौ तक क्ष त से बचाता है।
2. जल क हा न म कमी। आवरण पर मोम क परत होती है। स्थल पर यही नणायक लाभ है — कचुए को नम मृदा म रहना
पड़ता है क्य क उसक त्वचा से जल उड़ता है; भृंग गम सूखी भू म पर चल सकता है।
3. श क्तशाली पे शय को अवलंब। पे शयाँ आवरण के भीतरी तल से जुड़ी होती ह और उस पर उत्तोलक क भाँ त खचती ह।
दृढ़ आधार होने से छोटा जंतु भी बड़ा बल उत्पन्न कर लेता है — इसी लए क ट अपनी लंबाई से कई गुना कूद जाते ह और केकड़े
का चीलीपद कवच तोड़ सकता है।
4. सं धत उपांग। नाम ही यह कहता है — आ का अथ है सं धत और पोडा का अथ है पाद। दृढ़ प काओं के बीच क सं धयाँ
पाद, पंख और मुखांग को सट क, श क्तशाली और नयं त्रत ग त दे ती ह।

इसक क मत: दृढ़ आवरण बढ़ नह सकता। आ पोड को समय-समय पर नम चन करना पड़ता है — पुराना
ब हःकंकाल उतारकर नया कठोर बनाना — और जब तक नया आवरण मुलायम है, जंतु असुर क्षत रहता है।
ब हःकंकाल अपनी दृढ़ता क तुलना म भारी भी होता है, यही एक कारण है क कुत्ते जतने बड़े क ट नह होते।

सो चए और बताइए — पृष्ठ 242
आ पोडा — 12.6.5 जगत ए नमे लया

सो चए और बताइए

प्र.6 एक कचुआ (ऐने लडा) और एक भृंग (आ पोडा) दोन का शरीर खंडयुक्त होता है परंतु भृंग का ब हःकंकाल
कठोर होता है। भृंग का ब हःकंकाल उसे जी वत रहने म कस प्रकार सहायता करता है?

ब हःकंकाल ही भृंग को उस खुले, शुष्क संसार म रहने योग्य बनाता है जसम कचुआ नह जा सकता। दोन का शरीर
खंडयुक्त है, अतः खंडीभवन अंतर नह है — दृढ़, मोमयुक्त बाह्य आवरण अंतर है।

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कचुआ (ऐने लडा) भृंग (आ पोडा)

शरीर खंडयुक्त, कोमल, बेलनाकार खंडयुक्त, खंड िसर , वक्ष और उदर में िवशेषीकृ त

कं काल नह — द्रव भरी दे हगुहा द्रवचा लत कंकाल का काम करती है कठोर बिहःकं काल

जल की हािन अ धक — त्वचा नम रहनी चा हए; श्वसन भी त्वचा से होता है कम — मोमी आवरण शरीर को सील कर दे ता है

कहाँ रह सकता है केवल नम मृदा म; खुली धूप म मर जाता है शुष्क और अरिक्षत पय वरण में, म रुस्थल सिहत

उपांग नह — पेशी तरंग और शूक से चलता है संिधत पाद और पंख

यह तीन काम करता है, और हर एक क्य महत्त्वपूण है:

सुरक्षा। भृंग के कठोर अग्रपंख और दे ह प काएँ परभ क्षय से और पत्थर व छाल के बीच कुचले जाने से कवच
का काम करती ह।
जल क हा न घटाना। यही नणायक है। कचुए क त्वचा को गीला रहना पड़ता है क्य क गैस का आदान-
प्रदान उसी से होता है, अतः वह नम मृदा तक सी मत है और रात म या वषा के बाद ही बाहर आता है। भृंग का
मोमी आवरण वाष्पन रोकता है और वह छोटे छद्र से श्वास लेता है जन्ह बंद भी कर सकता है। इसी लए भृंग
पृथ्वी के सबसे शुष्क स्थान म भी मलते ह।
श क्तशाली पे शय को अवलंब। पे शयाँ दृढ़ आवरण के भीतरी तल पर खचती ह, अतः भृंग को चलने,
खोदने, पकड़ने और उड़ने के लए सशक्त और सट क उत्तोलन मलता है। कचुआ केवल द्रव के वरुद्ध धकेल
सकता है।

परीक्षा के लए संकेत: प्रश्न पूछता है क यह भृंग क उत्तरजी वता म कैसे सहायक है। उत्तर म तीन काय ल खए
और फर प रणाम बताइए — आ पोडा सवा धक संख्या और सवा धक वस्तार वाला जंतु समूह इसी लए है
क्य क ब हःकंकाल ने सूखने क समस्या हल कर द , जो स्थलीय जीवन क सबसे बड़ी बाधा थी।

व ान एवं समाज — पृष्ठ 244
आपदाओं के वरुद्ध अवरोधक के रूप म वन

व ान एवं समाज

प्र.1 व्यापक व वध वनस्प तजात (flora) और प्रा णजात (fauna) से समृद्ध वन कस प्रकार अवरोधक क भाँ त
काय करते ह और आपदाओं के प्रभाव को कम करते ह?

जैव व वधता से समृद्ध वन एक साथ तीन प्रकार के अवरोधक बनाते ह — भौ तक, जै वक और रासाय नक। अध्याय हर
एक का एक उदाहरण दे ता है।

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अवरोधक अध्याय का उदाहरण तंत्र
का प्रकार

भौितक वष 1999 का ओ डशा महाचक्रवात: जन मैंग ोव की सघन जड़ें और तने पवन तथा तूफ ानी लहर का वेग तोड़ दे ते
गाँव म मग्रोव अ धक थे वहाँ उतना ही कम है,ं और तलछट को थामे रखते है ं िजससे तट कटता नही ं
वनाश हुआ

जैिवक प मी घाट म मंक ज्वर (क्यासानूर वन िकलनी िजन अनेक जंतओ ु ं का र क्त पीती है, उनमें से बहुत सारे ऐसे
रोग, के.एफ.डी.): समृद्ध जैव व वधता से परपोषी है ं िजनके शरीर में िवषाण ु पितकृ ित नही ं कर सकता। ऐसे
कलनी ज नत रोग का जो खम सामान्यतः परपोषी िजतने अिधक होंग े, उतने अिधक दंश "व्यथ" जाएँग े और उतनी
कम होता है ही कम संक्रिमत िकलिनयाँ मनुष्य तक पहच
ु ँ ेंग ी

रासायिनक वन क मृदा और पादप मूल; मग्रोव मृदा िविवध सूक्ष्म जीव पदू षकों को अवशोिषत, रूपात
ं िरत अथवा िवघिटत कर
ु वत्त ा सुध रती है; मैंग ोव म ृद ा तलछट और भारी
दे ते है ं िजससे जल की ग ण
धातुओ ं को पािशत करके समुद और निदयों में पदू षण फै लने से रोकती
है

केवल वृक्ष का आवरण नह , व वधता ही क्य : तीन उदाहरण म सुरक्षा इस लए मलती है क्य क अनेक
प्रकार के जीव अ तव्यापी काय करते ह। एक ही जा त का वृक्षारोपण कुछ हद तक पवन रोक दे गा, परंतु उसम एक
ही प्रकार क जड़ संरचना, एक ही प्रकार के मृदा सूक्ष्मजीव और एक ही प्रकार के परपोषी ह गे। कोई पीड़क, रोग या
लवण-लहर उस एक जा त को समाप्त कर दे तो पूरा अवरोधक एक साथ ढह जाता है। व वध वन चलता रहता है
क्य क एक जा त के वफल होने पर दूसरी वही काम करती रहती है। इस गुण का एक नाम है — पा र स्थ तक
बहुल्यता, और यही व वध तंत्र को स्था यत्व दे ता है।

आगे जो ड़ए: इसी कारण अनुभाग 12.10 जैव व वधता के ास को इतनी गंभीरता से लेता है। जा तय का लुप्त
होना केवल सूची से नाम घटाना नह है — यह अवरोधक को पतला कर दे ता है, और यह क्ष त तभी दखाई दे ती है
जब अगला चक्रवात या अगला प्रकोप आता है।

पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 244

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12.7.1 वग करण क पदानुक्रमी प्रकृ त

प्र.1 चत्र 12.17 का अवलोकन और व ेषण क जए। आप क्या नष्कष नकालते ह?

बाघ मटर
जगत जगत
एिनमेिलया (पािणजगत) प्लांट ी (पादप जगत)

संघ संघ
कॉडटा मैग् नोिलयोफाइटा

वी ज के राकप क नेअ
उपसंघ वग
वट बेट ा (कशेरुकी) मैग् नोिलयोिप्सडा
वग गण
मैमेिलया (स्तनधारी) फे बेलीस
गण कु ल
कािन वोरा (माँसाहारी) फे बेसी
कु ल वंश
फे िलडी (िवडाल) पाइसम
वंश जाित
पेंथेरा पाइसम सेट ाइवम

राकप ीह कए लवके
जाित
पी. टाइिगस

चत्र 12.17, पृष्ठ 245 — वग करण का परा मड, शीष पर जगत से लेकर आधार पर जा त तक, बाघ तथा मटर के पौधे
के उदाहरण स हत। पुनःआरे खत — पुस्तक म यही सूचना चत्र के दो पंख तथा उनके साथ द गई दो ता लकाओं के
रूप म छपी है।

वग करण एक अंत न हत पदानुक्रम है: यह बहुत बड़े समूह से आरंभ होकर छोटे और अ धक व शष्ट समूह तक जाता है,
और प्रत्येक नम्नतर स्तर पर जीव अ धक समान वशेषताएँ साझा करते ह। प्रत्येक नम्नतर समूह अपने से ऊपर वाले
समूह के भीतर पूरी तरह समाया रहता है।

जगत → संघ → वग → गण → कु ल → वंश → जाित

सद स्य घटते जाते है ं साझा िवशेषताएँ बढ़ ती जाती है ं

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जगत · एिनमेिलया जगत · प्लांटी

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a उपसंघ · वट बेटा वग · मैग्नोिलयोिप्सडा

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वग · मैमेिलया गण · फेबेलीस

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गण · कािनवोरा
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कु ल · फेिलडी a वंश · पाइसम

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वंश · पेंथरे ा जाित · पी. सेटाइवम

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जाित · पी. टाइिगस

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चत्र 12.17 को समा हत बक्स के रूप म दे खए: हर स्तर अपने ऊपर वाले के भीतर समाया है, और हर नीचे का चरण अथात कम सदस्य

ag कतु अ धक साझा वशेषताएँ।

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नष्कष, अध्याय के अपने बब म: यह व्यवस्था एक पते (address) क तरह काय करती है। घर का पता दे श से

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राज्य, जला, गली और मकान संख्या तक समटता है — हर चरण पछले के भीतर है और अंत म ठ क एक स्थान
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का नाम आता है। इसी प्रकार ए नमे लया → कॉडटा → वट ेटा → मैमे लया → का नवोरा → फे लडी → पथेरा

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→ पी. टाइ ग्रस करोड़ जंतुओं से समटकर एक जा त तक पहुँच जाता है। इसी से वैज्ञा नक जीव क पहचान,

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तुलना और अध्ययन कर पाते ह तथा उनके परस्पर संबंध समझ पाते ह।

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s e m नष्कष — दोन परा मड क आकृ त एक ही है। बाघ और मटर का पौधा जतने भन्न हो सकते ह उतने
la भन्न ह, फर भी दोन ठ क सात स्तर से गुज़रते ह। यह योजना सावभौ मक है: संपूण जीवजगत पर वही सीढ़
दूसरा

ag लगती है, और इसी से दूर-दूर के समूह क तुलना संभव होती है।
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सो चए और बताइए — पृष्ठ 247

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12.9 जीवाश्म — प्रमाण के रूप म / 12.10 जैव व वधता पर मंडराता खतरा

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सो चए और बताइए

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क्या जैव व वधता शब्द का संबंध केवल जीव क व वधता से है अथवा इसम अन्य तत्व भी स म्म लत ह?

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इसम जीव क सूची से कह अ धक स म्म लत है। जैव व वधता तीन स्तर पर मापी जाती है, और अध्याय तीन का उपयोग

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करता है, भले ही नाम सबसे अ धक पहले का लेता हो।
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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

1. जातीय व वधता — भन्न- भन्न जा तय क संख्या और व वधता। यह स्पष्ट स्तर है: पक्के म लगभग 300 पक्षी जा तयाँ,
संपूण भारत म लगभग 1300।
2. एक जा त के भीतर आनुवं शक व वधता — एक ही प्रकार के जीव के बीच का अंतर। अध्याय इसी से आरंभ होता है:
सहस्र वष से कृषक सूखा स हष्णुता, पीड़क प्र तरोधकता और न्यून पोषक तत्व वाली मृदा म उगने क क्षमता जैसी उपयोगी
वशेषताओं वाली कस्म संर क्षत करते आए ह, क्य क व वधता से फसल के नष्ट होने का जो खम कम होता है और खाद्य
सुरक्षा सुदृढ़ होती है। ये सारी कस्म एक ही जा त ह; व वधता उनके जीन म है।
3. पा रतंत्र और पयावास क व वधता — स्वयं स्थान क व वधता। भारत के प्राकृ तक भूदृश्य म उत्तर म पवत, प म म
मरुस्थल, पूव त्तर म वषावन, द क्षण म पठार और लंबी तट रेखाएँ ह। प्रत्येक क्षेत्र क अपनी मृदा और जलवायवीय स्थ तयाँ ह,
और ये व भन्न पयावास मलकर व वध जा तय को आश्रय दे ते ह।

अ त रक्त स्तर क्य मायने रखते ह: जस वन म जा तय क संख्या तो उतनी ही हो पर उनके भीतर कोई
आनुवं शक व वधता न हो, वह भंगुर होता है — एक नया रोग पूरी एकरूप फसल को समाप्त कर सकता है, और
कृ ष म ऐसा बार-बार हुआ है। और कोई दे श सैद्धां तक रूप से हर जा त को च ड़याघर म जी वत रख ले, फर भी
उसक जैव व वधता जा चुक होगी, क्य क अंतः क्रयाएँ — धनेश और फलदार वृक्ष, राइजो बयम और दलहन क
जड़, लाइकेन म कवक और शैवाल — केवल कायशील पयावास म ही रहती ह। जैव व वधता म ये संबंध भी
स म्म लत ह।

ध्यान द जए: म णपुर क लोकटक झील के फुम डस पयावास व वधता के अपूरणीय होने का अच्छा उदाहरण ह।
संगाई हरण उसी एक तैरते घास मैदान का स्था नक है; फुम डस बचाए बना हरण बचाने का कोई अथ ही नह ।

प्र.8 य द आपको कसी तालाब म कोई नया जीव दखाई दे ता है तो आप उसे वग कृत करने के लए उसक कन
वशेषताओं का अवलोकन करगे और क्य ?

चत्र 12.5 के क्रम म — सबसे मौ लक लक्षण से सबसे सूक्ष्म तक — ता क हर अवलोकन संभावनाओं को लगभग आधा कर दे ।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

क्रम म क्या दे खूँगा क्य — यह क्या तय करता है

1 को शका का प्रकार: क्या झल्ली आबद्ध कद्रक है? (उच्च आवधन या कें द क नही ं → मोनेर ा, और जाँच वही ं समाप्त। कें द क है
अ भरंजन चा हए) → आगे

2 संगठन का स्तर: एक को शका या अनेक? एककोिशकीय सुकें द की → पोिटस्टा। बहुक ोिशकीय →
आगे

3 को शका भ त्त: उप स्थत या अनुप स्थत? उप स्थत हो तो काइ टन या िभित्त नही ं → एिनमेिलया। काइिटन → फं जाई।
सेल्युलोस? से ल्युल ोस → प्लांटी

4 पोषण क व ध: हरा और स्वयं भोजन बनाता है, या अवशो षत करता फं जाई (अवशोषण) और प्लांटी (पकाश संश्ले षण) के
है, या नगलता है? िवभाजन की पुिष्ट

5 शरीर संगठन और सम म त; जंतु हो तो पृष्ठरज्जु या कशेरुक दं ड है? एिनमेिलया के भीतर स्थान — अकशेरुकी या कॉडट,
िफर संघ

6 ग त और पोषण क व ध (कूटपाद, पक्ष्माभ, कशाभ; स्पशक; मुख समूह और सँक रा हो जाता है और पायः जीव का नाम भी
और गुदा) िमल जाता है

7 जनन और अंत म डीएनए तुलना स्थान की पुिष्ट करती है और िनकटतम संबंध ी बताती है

यही क्रम क्य : कुंजी का उ े श्य यह है क हर प्रश्न उत्तर दे ने योग्य हो और अ धक-से-अ धक संभावनाएँ काट दे ।
को शका का प्रकार संपूण जीवजगत को दो म बाँट दे ता है; रंग या आमाप लगभग कुछ भी नह बाँटता। मौ लक
लक्षण से आरंभ करना आपको क्रयाकलाप 12.1 वाले जाल से भी बचाता है — क ऊपरी समानता (दोन तैरते ह,
दोन हरे ह) असंबद्ध जीव को एक साथ रख सकती है।

व्यावहा रक बात: तालाब के प्र तदश म सबसे अ धक प्रो टस्ट ही मलते ह — अमीबा, पैरामी शयम और यूग्लीना
( चत्र 12.7)। य द आपका जीव कूटपाद, पक्ष्माभ या कशाभ से चलता है और वास्त वक कद्रक युक्त एक को शका
है, तो लगभग न त रूप से वह वह का है।

प्र.9 आनुवं शक अध्ययन सजीव के संबंध म गहन जानकारी क्य प्रदान करते ह?

क्य क डीएनए स्वयं अनुदेश-समुच्चय है, उसका कोई बाहरी प रणाम मात्र नह । दखाई दे ने वाला हर लक्षण — आकृ त, रंग,
पोषण क व ध — डीएनए का ही उत्पाद है, अतः डीएनए क तुलना जीव क तुलना ठ क उसी स्तर पर करती है जहाँ वंशाग त
वास्तव म होती है।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

आनुवं शक प्रमाण रूप-रंग से अ धक गहरा क्य है — चार कारण:

यह वंशक्रम का सीधा अ भलेख है। प्रत्येक जी वत को शका म आनुवं शक पदाथ (डीएनए) होता है जसम
उस जीव क वृ द्ध और प्रकाय संबंधी अनुदेश न हत होते ह, और वह जनक से संत त म प्र त ल पत होता है।
जन जीव का डीएनए समान होता है उन्ह सहपूवजता वाला माना जाता है। समान रूप सहपूवजता का अथ रख
भी सकता है और नह भी; समान डीएनए का बहाना बनाना कह क ठन है।
यह भ्रामक समानता को भेद दे ता है। डॉ ल्फन मछली जैसी दखती है और चमगादड़ का पंख पक्षी जैसा, परंतु
डीएनए दोन को दृढ़ता से स्तनधा रय के साथ रखता है। इसी प्रकार जो जीव एक जैसे दखते ह उनके छपे
अंतर भी डीएनए उजागर कर दे ता है।
यह वहाँ भी काम करता है जहाँ संरचना कुछ नह दे ती। दो जीवाणु सूक्ष्मदश म एक जैसे दं ड दख सकते ह।
तुलना के लए बाहरी लक्षण लगभग है ही नह । डीएनए दो के स्थान पर हजार लक्षण दे दे ता है।
यह मात्रात्मक है। दो अनुक्रम म कतना अंतर है, यह मापा जा सकता है, अतः संबंध को केवल कहा नह ,
क्रम म रखा जा सकता है।

इससे वास्तव म क्या बदला: जीव क डीएनए स्तर पर तुलना ही वह काय है जसके आधार पर काल वूस ने वष
1977 म तीन डोमेन पद्ध त — बैक्ट रया, आ कया और यूकै रया — प्रस्ता वत क । इससे पता चला क "जीवाणु"
कहकर एक साथ रखे गए कुछ जीव आपस म उतने ही भन्न ह जतने वे हमसे ह, और यह क अ त सूक्ष्मजीव
प्रकार क व वधता उससे कह अ धक है जतना हम पहले सोचते थे। सूक्ष्मदश म कतना भी दे खते रहने से
यह कभी सामने नह आता।

प्र.10 जलवायु म होने वाले प रवतन जैव व वधता को कस प्रकार प्रभा वत कर सकते ह?

जलवायु वे प र स्थ तयाँ तय करती है जनके लए हर जा त अनुकू लत है। जब ये प र स्थ तयाँ जा तय के अनुकूलन या
स्थानांतरण क ग त से तेज़ बदलती ह, तो जनसंख्याएँ घटती ह और जा तयाँ लुप्त होती ह — और चूँ क जा तयाँ एक-
दूसरे पर नभर ह, यह क्ष त फैलती जाती है।
मुख्य माग, तंत्र स हत —

पयावास स्वयं बदल जाता है। भारत के हर क्षेत्र का अपना तापमान और वषा है, और यही व वध पयावास व वध जा तय को
आश्रय दे ते ह। तापन उस तापमान-प को ऊँचाई या अक्षांश क ओर खसका दे ता है जसक जा त को आवश्यकता है।
हमालय या प मी घाट क जा त ऊपर तभी तक जा सकती है जब तक पवत है — पवत- शखर और स्था नक जा तय के
पास जाने को कोई स्थान बचता ही नह , इसी लए स्था नक जा तयाँ सबसे पहले जाती ह।
समय-चक्र बेमेल हो जाता है। पुष्पन, फलन, प्रजनन और प्रवास तापमान और वषा से प्रे रत होते ह। य द पौधा पहले पु ष्पत
हो जाए और उसका परागणकता पुराने समय पर नकले, तो दोन असफल रहते ह। बगनी मढक केवल मानसून म प्रजनन के
लए बाहर आता है; मानसून खसका तो उसका पूरा प्रजनन काल गड़बड़ा जाता है।
चरम घटनाएँ बढ़ती ह। प्रबल चक्रवात, लंबे सूखे और भारी बाढ़ सीधे मारते भी ह और पयावास भी नष्ट करते ह — जैसे
लोकटक झील के वे फुम डस जन पर संगाई हरण नभर है।
महासागर और प्रवाल। गम और अ धक अम्लीय समुद्र जल प्रवाल को वरं जत कर दे ता है। प्रवाल भ त्तयाँ, जैसे अध्याय के
आरंभ म उ ल्ल खत अंडमान सागर क भ त्तयाँ, असंख्य जा तय को आश्रय दे ती ह; भ त्त गई तो वे सब गईं।

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ंखलाबद्ध क्ष त। अध्याय सद्धांत स्पष्ट कहता है: पृथ्वी से जब कोई एक जा त वलुप्त हो जाती है तो उस पर नभर
अन्य जा तयाँ भी धीरे-धीरे कम हो सकती ह और अंततः वलुप्त भी हो सकती ह। परागणकता हटा द जए तो उसके पौधे
असफल; पौधे गए तो शाकाहारी भी।

"तेज़ी" यहाँ मुख्य शब्द क्य है: आज दखती व वधता द घकाल तक नरंतर होते प रवतन का प रणाम है —
छोटे -छोटे अंतर अनेक पी ढ़य म सं चत होते गए। अनुकूलन एक धीमी, पीढ़ -दर-पीढ़ चलने वाली प्र क्रया है।
वतमान जलवायु प रवतन दशक म हो रहा है। द घजीवी, धीमी ग त से प्रजनन करने वाली और पहले से दुलभ
जा तयाँ इस ग त के साथ चल ही नह सकत , और सबसे पहले वही समाप्त होती ह।

व ान एवं समाज — पृष्ठ 248
लोकटक झील के फुम डस और संगाई हरण

व ान एवं समाज

प्र.1 वतमान वष म फुम डस नष्ट होते जा रहे ह और संगाई हरण को आई.यू.सी.एन. क रेड डेटा सूची म स म्म लत
कया गया है। पयावास के नष्ट होने से संगाई हरण क जनसंख्या पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। वतमान म फुम डस
और संगाई हरण के संरक्षण के लए प्रयास कए जा रहे ह। संगाई हरण और उसके पयावास को बचाने के लए
अपने सुझाव द जए।

सबसे पहले फुम डस बचाइए — हरण को उनसे अलग करके बचाया ही नह जा सकता। संगाई म णपुर का स्था नक है और
अपना अ धकांश समय लोकटक झील के केइबुल लामजाओ रा ीय उद्यान के तैरते घास मैदान पर बताता है, अतः पयावास ही
उसक जीवन-रक्षक प्रणाली है।
सुझाव, जस पर वे काय करते ह उसके अनुसार —

1. लोकटक झील का जल-स्तर चक्र पुनः स्था पत क जए। फुम डस म क तैरती परत ह जनक मोटाई कुछ सट मीटर से
दो मीटर तक होती है, और इन पर उगी मूलबद्ध वनस्प तय को समय-समय पर झील के तल को छू कर पोषक तत्व लेने पड़ते ह।
जल-स्तर स्थायी रूप से ऊँचा रखने से वे तैरती तो रहती ह पर भूखी रह जाती ह और पतली पड़ने लगती ह। जल-स्तर को उसी
प्राकृ तक ढं ग से घटने-बढ़ने दे ना सबसे महत्त्वपूण कदम है।
2. पोषक और गाद का प्रवेश घटाइए। वा हत मल का उपचार क जए और जलग्रहण क्षेत्र से उवरक का बहाव रो कए ता क
झील खरपतवार से न भर जाए; आस-पास क ढलान पर वनस्प त लगाइए और बचाइए ता क गाद कम आए।
3. पयावास क रक्षा और वस्तार। केइबुल लामजाओ रा ीय उद्यान क सीमा का पालन करवाइए, फुम डस काटना और जलाना
रो कए, और य द संभव हो तो अ त रक्त क्षेत्र जो ड़ए ता क जनसंख्या एक ही छोटे क्षेत्र म समट न रहे — छोटे क्षेत्र तक
सी मत जा त एक ही दुघटना म समाप्त हो सकती है।
4. स्थानीय समुदाय के साथ काम क जए। मछु आरे प रवार झील पर नभर ह। वैक ल्पक आजी वका द जए, उन्ह नगरानी
और पयटन म जो ड़ए और रखवाली के काम का पा रश्र मक द जए — जो संरक्षण स्थानीय लोग क आजी वका छ नता है वह
टकता नह ।
5. जनसंख्या क वै ा नक नगरानी। नय मत गणना क जए और पहचान के लए हरण के अपने व शष्ट लक्षण का उपयोग
क जए — वही खुर और लंबे पैर क वशेष बनावट जससे प्रकृ तवा दय ने वष 1953 म इसे पहचाना था — ता क गरावट
का पता बाद म नह , आरंभ म ही चल जाए।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण
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6. सुरक्षा जनसंख्या बनाए र खए। उ चत अ भलेख के साथ च ड़याघर म बंद प्रजनन समूह र खए, ता क एक बाढ़, रोग या
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आग से पूरी जा त समाप्त न हो जाए।
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एक संरक्षण .संcसाधन है। a
7. जागरूकता फैलाइए। संगाई म णपुर का राज्य पशु है और नृत्य करने वाला हरण कहलाता है; उसके प्र त स्थानीय गव स्वयं म

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वष 1951 क कहानी क्य महत्त्वपूण है: इस जा त को वष 1951 म वलुप्त घो षत कर दया गया था और वष

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1953 म पुनः खोजा गया — इसके खुर और लंबे पैर क वशेष बनावट ही वह आधार थी जससे प्रकृ तवाद इसे

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पहचान सके। यह वग करण का संरक्षण-काय है: जसे आप पहचान नह सकते उसे बचा भी नह सकते। साथ ही ag
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यह चेतावनी भी है — कोई जा त " वलुप्त" से "पुनः खोजी गई" केवल एक बार बन सकती है।
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अभ्यास प्रश्न — पृष्ठ 249 – 251
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अध्याय के अंत क

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अभ्यास प्रश्न

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प्र.1 मीना और ह र ने अपने उद्यान म एक जंतु दे खा। ह र ने उसे क ट कहा जब क मीना ने कहा क वह कचुआ है। उस
सही वकल्प को चु नए जो यह पु ष्ट करताm
s e है क वह एक क ट है। (i) पाश्व सम म त क काया (ii) सं धत पाद
a कम खंडीभवन वाली काया
वाली काया (iii) बेलनाकार काया l(iv)
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(ii) सं धत पाद वाली काया।
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m : प्रश्न उस वशेषता को माँगता है जो पु ष्ट करे क जंतु क ट है — अथात वह क ट म हो और कचुए म न हो। हर
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वकल्प कचुआ (ऐने लडा)
c o m क ट (आ पोडा) क्या यह नणय करता है?
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(i) ि पाश्व समिमित की हाँ हाँ नही ं — दोनों में है
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(ii) संिधत पाद वाली पाद होते ही नह तीन जोड़ी सं धत पाद हाँ

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m .co(iii) बेलनाकार काया हाँ — बेलनाकार और यह नधारक लक्षण नह
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l a se खंडयुक्त संके त करता है

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(iv) कम खंडीभवन वाली अत्य धक खंडयुक्त यह भी खंडयुक्त ( सर, वक्ष, नही ं — दोनों खंडयुक्त है ं

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काया उदर)

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a s emसंरचनात्मक वशेषता है — नाम ही यह कहता है: आ अथात सं धत
और पोडा अथात पाद। कचुaएgमl एक भी नह होता।
सं धत उपांग आ पोडा क नधारक

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संकेत: "कौन-सा वकल्प पु ष्ट करता है" वाले प्रश्न म सदा वही लक्षण खो जए जो एक म उप स्थत और दूसरे म
अनुप स्थत हो। जो लक्षण दोन म हो, वह चाहे कतना ही सत्य हो, कभी पु ष्ट नह कर सकता।

प्र.2 स्पंज, जंतु जगत क सबसे सरल शरीर-संरचना वाले जीव का प्र त न धत्व करते ह। उनके शरीर म वास्त वक
ऊतक और अंग नह होते ह। स्पंज को शकाओं क कौन-सी वशेषता उसे जंतु जगत के अंतगत वग कृत करने
का आधार है? (i) माइटोकॉ या क अनुप स्थ त (ii) प्रकाश सं ेषण करने क क्षमता (iii) को शका झल्ली
क उप स्थ त (iv) को शका भ त्त क उप स्थ त

(iii) को शका झल्ली क उप स्थ त। अ भप्राय यह है क स्पंज क को शका के चार ओर को शका झल्ली होती है, को शका
भ त्त नह — और चत्र 12.5 म को शका भ त्त का अभाव ही वह वभाजन है जो ए नमे लया तक ले जाता है।

शेष तीन गलत क्य ह:

(i) माइटोकॉ या क अनुप स्थ त — तथ्य ही गलत है। स्पंज सुकद्रक है और उसक को शकाओं म
माइटोकॉ या होते ह; इनके बना को शका ऊजा मुक्त ही नह कर सकती।
(ii) प्रकाश सं ेषण करने क क्षमता — यह तो स्पंज को ए नमे लया से बाहर कर दे ती। जंतु वषमपोषी होते
ह; स्पंज जल क धारा से भोजन कण ख चता है।
(iv) को शका भ त्त क उप स्थ त — को शका भ त्त उसे प्लांट या फंजाई म रखती, ए नमे लया म नह ।

यह प्रश्न सोचने योग्य क्य है: स्पंज एक स्थान पर स्थर रहता है, उसम ऊतक नह , अंग नह , मुख नह , तं त्रकाएँ
नह — जंतु पहचानने के हमारे सारे सामान्य आधार गायब ह। अतः वग करण को चत्र 12.5 के गहरे मानदं ड पर
लौटना पड़ता है: जो बहुको शक य सुकद्रक जीव को शका भ त्त र हत हो और भोजन के लए दूसर पर नभर हो,
वह जंतु है — चाहे दखने म कतना ही पादप जैसा क्य न हो।

प्र.3 अपने आस-पास के वातावरण म दो अलग-अलग जीव का अवलोकन क जए। उनक कौन-सी वशेषताएँ
आपको उनम अंतर करने म सहायता करती ह? ये वशेषताएँ कस प्रकार से उन्ह भन्न समूह म रखने म सहायता
प्रदान करती ह?

दो ऐसे जीव ली जए जो लगभग सभी को मल जाएँगे — कौआ और बगीचे क छपकली — और उन्ह लक्षण पर तुलना
क जए जनका उपयोग अध्याय करता है।

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वशेषता कौआ छपकली यह क्या तय करती
है

दे हावरण पर (feathers) शुष्क शल्क पक्षी बनाम सरीस ृप

अग पाद पंख म रूपांत रत चलने वाले पाद गित की िविध

जबड़े दाँतर हत च च दाँतयुक्त जबड़े भोजन ग हण की िविध

शरीर का नयततापी ( स्थर) अ नयततापी — धूप सककर शरीर गम पक्षी बनाम सरीस ृप
ताप करती है

जनन कठोर कवच वाले अंडे, घ सले म, चूज क च मल अंडे म म दबाए, कोई दे खभाल जनन का पितरूप
दे खभाल नह

कशेरुक दंड उप स्थत उप स्थत साझा — दोनों
कशेरुकी है ं

ये वशेषताएँ समूहन कैसे करती ह: वग करण उस स्तर को खोजता है जहाँ दो जीव क समानता समाप्त हो जाती
है।

दोन बहुको शक य, वषमपोषी, को शका भ त्त र हत सुकद्रक ह → दोन ए नमे लया म।
दोन म कशेरुक दं ड है → दोन कॉडटा, कशेरुक ।
अब इनके रास्ते अलग होते ह। अध्याय कहता है क कशेरुक जीव को उनके पयावास उपयोग, दे हावरण और
जनन के व्यापक प्र तरूप के आधार पर पाँच समूह म बाँटा गया है। पर, च च, पंख और नयततापी होना कौए
को पक्षी बनाते ह; शुष्क शल्क, चलने वाले पाद और अ नयततापी होना छपकली को सरीसृप।

अंतर य ही कह भी प्रकट नह होते — वे एक वशेष स्तर पर प्रकट होते ह, और वही स्तर वग करण है।

कॉपी के लए नमूना उत्तर: "मने द वार पर बैठा कौआ और नीम के तने पर छपकली दे खी। दोन म कशेरुक दं ड
है, अतः दोन कशेरुक ह। कौए म पर, पंख और च च है तथा वह घ सले म कठोर कवच वाले अंडे दे ता है, इस लए
वह पक्षी है। छपकली म शुष्क शल्क, चार चलने वाले पाद और दाँत ह, और वह सुबह धूप सकती है क्य क अपना
शरीर स्वयं गम नह रख सकती, इस लए वह सरीसृप है।"

प्र.4 कोई वै ा नक वग करण करने के लए जाइलम और फ्लोएम क उप स्थ त क तुलना म को शक य संगठन को
अ धक मौ लक आधार बनाना कस प्रकार न्यायसंगत सद्ध करता है।

क्य क को शक य संगठन प्रत्येक सजीव पर लागू होता है, जब क जाइलम और फ्लोएम केवल एक जगत के एक कोने
पर। मानदं ड तभी मौ लक कहलाता है जब वह पहले ही वभाजन म संपूण जीवजगत को छाँट सके; जाइलम-फ्लोएम तो आरंभ ही
नह कर सकते।

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न्यायसंग त के बदु:

सावभौ मकता। हर जीव को शकाओं से बना है, अतः "पूवकद्रक या सुकद्रक ?" और "एकको शक य या
बहुको शक य?" ये प्रश्न जीवाणु, अमीबा, मशरूम, मॉस, फन और बाघ — सबसे पूछे जा सकते ह। "क्या इसम
जाइलम है?" जीवाणु, कवक या हाथी से पू छए तो प्रश्न नरथक है — तीन का उत्तर "नह " है, अतः यह कुछ
भी अलग नह करता।
वभाजन का वस्तार। को शका प्रकार चत्र 12.5 के पहले ही वभाजन पर संपूण जीवजगत को दो म बाँट
दे ता है। संवहनी ऊतक केवल जगत प्लांट को, और उसम भी उसके पाँच म से दो वग को बाँटता है।
गहराई। को शका म झल्ली आबद्ध कद्रक है या नह , यह जीवन क मूल वास्तुकला का अंतर है; अध्याय इसे
नणायक मानता है। इसी लए तो बेहतर सूक्ष्मद शय से यह पता चलने पर क अमीबा म वास्त वक कद्रक है और
जीवाणु म नह , जीवाणुओं को प्रो टस्टा से नकालकर पृथक जगत मोनेरा म रखा गया।
वश्वसनीयता। को शक य संगठन जीव के पूरे जीवन म स्थर रहता है। कसी पौधे म संवहनी ऊतक कतना
वक सत है, यह आयु और उगने क प र स्थ तय से बदल सकता है।
उपयोग का क्रम। यह कहना नह है क जाइलम-फ्लोएम महत्त्वहीन ह — वही तो टे रडोफाइटा को ायोफाइटा
से अलग करते ह। यह इस बात का दावा है क पदानुक्रम म कस लक्षण का स्थान कहाँ है — व्यापक लक्षण
ऊपर, वशेषीकृत लक्षण नीचे।

संकेत: सामान्य नयम यह है क उच्च स्तर का अच्छा लक्षण वह है जो सावभौ मक, गहरा और स्थर हो। कसी भी
प्रस्ता वत मानदं ड को इन तीन शब्द पर पर खए और प्रायः तुरंत दख जाएगा क पदानुक्रम म उसका स्थान कहाँ है।

प्र.5 य द आपको एक बना नाम वाली स्लाइड पर ऐसा एकको शक य जीव मले जसम सुस्पष्ट कद्रक तथा अनेक
पक्ष्माभ ह तो उसके कस समूह का सदस्य होने क सवा धक संभावना है? कारण बताइए।

जगत प्रो टस्टा — और सवा धक संभावना यह है क वह पैरामी शयम जैसा पक्ष्माभी जीव है।

कारण, चत्र 12.5 के क्रम म:

1. सुस्पष्ट कद्रक का अथ है क को शका सुकद्रक है। इससे मोनेरा तुरंत बाहर हो जाता है, जसके सदस्य
पूवकद्रक होते ह और जनका कद्रक आद्य तथा झल्ली र हत होता है।
2. एकको शक य होने का अथ है संगठन का स्तर एकको शक य है। इससे फंजाई, प्लांट और ए नमे लया बाहर
हो जाते ह, जन्ह अध्याय बहुको शक य बताता है।
3. एकको शक य सुकद्रक जीव, प रभाषा से ही, प्रो टस्टा है।
4. अनेक पक्ष्माभ इसक पु ष्ट करते ह। पक्ष्माभ तैरने और भोजन कण को को शका के भीतर बुहारने के अंग ह
— ठ क वही उपकरण जो पैरामी शयम के पास है, जो चत्र 12.7 म दखाए गए प्रो टस्ट म से एक है।
जीवाणुओं म कशाभ हो सकते ह परंतु इस प्रकार का पक्ष्माभी आवरण नह , और न कोई कवक या पादप
को शका तैरती है।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण AglaSem · NCERT Solutions

एक ईमानदार सावधानी: यीस्ट भी एकको शक य सुकद्रक है, फर भी अध्याय उसे फंजाई म रखता है क्य क
उसक को शका भ त्त काइ टन क बनी है। अतः केवल "एकको शक य सुकद्रक " पूणतः नभ्रात नह है। यहाँ
पक्ष्माभ नणय कर दे ते ह — यीस्ट म पक्ष्माभ नह होते और वह तैरता भी नह ।

प्र.6 कसी पा र स्थ तक तंत्र के संतुलन और स्था यत्व म जीव क व वधता कस प्रकार योगदान दे ती है?

क्य क व वध पा रतंत्र म अनेक जीव अ तव्यापी काय करते ह, अतः एक के वफल होने पर दूसरा वही काय सँभाल लेता
है — और क्य क ये काय स्वयं ऐसे बंद चक्र बनाते ह जो पदाथ को घुमाते रहते ह।
1. हर भू मका भरी रहती है और चक्र पूरे होते ह।

पादप और सूक्ष्मदश य शैवाल भोजन का उत्पादन करते ह और ऑक्सीजन नमुक्त करते ह — महासागर के सूक्ष्मदश य
शैवाल अ धकांश ऑक्सीजन नमुक्त करते ह जसे हम श्वास से लेते ह।
जंतु उपभोग करते ह, और ऐसा करके कसी एक जनसंख्या को अ नयं त्रत बढ़ने से रोकते ह।
कवक और जीवाणु गरी प त्तय का अपघटन करते ह और अप शष्ट को खाद म बदलकर ख नज मृदा म लौटाते ह। अध्याय के
अनुसार इनके बना मृत पौध और जंतुओं का वघटन अत्यंत कम हो जाएगा, जससे मृदा क उवरता और पा र स्थ तक संतुलन
पर प्र तकूल प्रभाव पड़ेगा।
पक्षी, मधुम क्खयाँ और चमगादड़ परागण करते ह; धनेश और अन्य जंतु बीज प्रक णन।

2. व वधता तंत्र को अ त रक्त क्षमता दे ती है। य द कसी घास मैदान के पौध का परागण बीस क ट जा तयाँ करती ह और कोई
रोग तीन को समाप्त कर दे , तो परागण फर भी होता रहेगा। य द यह काम केवल एक जा त करती, तो बीज बनना पूरी तरह रुक
जाता। यही तक अपघटक , परभ क्षय और नाइ ोजन स्थरीकरण करने वाले जीवाणुओं पर भी लागू होता है।
3. ज टल आहार जाल आघात सह लेते ह। जस परभक्षी के पास कई शकार जा तयाँ ह वह एक के दुलभ होने पर दूसरी क
ओर मुड़ सकता है, अतः न परभक्षी गरता है न शकार। एकल कड़ी वाली ंखला म यह छू ट नह होती।
4. व वधता स्वयं आपदा से बचाती है। वष 1999 के ओ डशा महाचक्रवात म जन गाँव म मग्रोव अ धक थे वहाँ कम वनाश
हुआ; प मी घाट म वन व वधता क्यासानूर वन रोग के वरुद्ध जै वक अवरोधक क भाँ त काय करती है, क्य क अनेक जंतु ऐसे
परपोषी ह जनम वषाणु प्र तकृ त नह कर सकता।

सामान्य सद्धांत: स्था यत्व बहुल्यता और परस्पर जुड़ाव से आता है, कसी एक जा त के अप रहाय होने से नह ।
इसी लए क्ष त खतरनाक भी है — अध्याय क अपनी चेतावनी है क जब कोई एक जा त वलुप्त होती है तो उस पर
नभर अन्य जा तयाँ भी घट सकती ह और अंततः वलुप्त हो सकती ह। हर क्ष त एक धागा हटाती है, और कम धाग
वाला जाल अ धक सरलता से फट जाता है।

प्र.7 य द सभी एकको शक य जीव को एक ही जगत म रख दया जाए तो कौन-कौन सी समस्याएँ उत्पन्न ह गी?

तब पूणतः भन्न को शका संरचना, भन्न पोषण और भन्न वंशक्रम वाले जीव को एक ही डब्बे म रखना पड़ेगा — और
यही भूल इ तहास को दो बार सुधारनी पड़ी है।

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कक्षा 9 वज्ञान अध्याय 12 जीवजगत का स्वरूप — व वधता एवं वग करण
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1. पूवकद्रक और सुकद्रक एक साथ आ जाएँगे। जीवाणु म झल्ली आबद्ध कद्रक नह , अमीबा म वास्त वक कद्रक है। यह
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जीवजगत का सबसे गहरा वभाजन है। एक साथ रखने से यह वभाजन छप जाता है। अध्याय स्वयं दज करता है क ठ क इसी
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g अमीबा, अवशोषण से पोषण
.c और अपघटक मल जाएँगे। प्रकाश सं ेषी साइनोबैक्ट रया, वषमपोषी
कारण जीवाणुओं को नकालकर मोनेरा म रखा गया और वष 1938 म चार जगत प्रणाली बनी।

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se यीस्ट और दोन के बीच बदलता यूग्लीना — सब एक ही जगत म ह गे और उनम आमाप के अ त रक्त कुछ भी साझा
2. उत्पादक, उपभोक्ता
लेlनa
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नह होगा।

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3. यह समूहन वंशक्रम के वषय म कुछ नह बताएगा। एकको शक य होना कसी पूवज से मला साझा गुण नह है — यह

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बहुको शकता का अभाव है। कसी अभाव के आधार पर समूह बनाने से संबंध के वषय म कुछ पता नह चलता, जब क
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वग करण का पूरा उ े श्य ही यह है क समान वशेषताएँ समान पूवज बताती ह।
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4. बहुको शक य अपवाद अनाथ हो जाएँगa यीस्ट एकको शक य है परंतु काइ टन को शका भ त्त के कारण फंजाई म रखा
जाता है। "एकको शक य जगत" यीस्ट को उन्ह फफूँद और मशरूम से अलग कर दे ता जनसे वह स्पष्टतः संबं धत है।

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5. इसका कोई पूवानुमान मूल्य नह होगा। यह जान लेने से क जीव "एकको शक य" है, उसके वषय म और कुछ भी पता नह

s e m अनेक अन्य तथ्य
c ानmदे। gla
चलेगा — न को शका संरचना, न पोषण, न पा र स्थ तक य भू मका। अच्छा समूह वह है जसक सदस्यता
का पूवानुमo
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a gl ऐ तहा सक प्रमाण: यह प्रयोग वास्तव म कया जा चुका है। वष 1866 क तीन जगत प्रणाली ने सारे सूक्ष्मजीव
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को प्रो टस्टा म डाल दया था। बेहतर सूक्ष्मद शय ने कद्रक का अंतर दखाया और प्रणाली को बाँटना पड़ा। और वष
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1977 म डीएनए प्रमाण ने पूवकद्र कय को फर बाँटा — बैक्ट रया और आ कया म। आमाप के आधार पर एक

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साथ रखने क भूल दो बार सुधारी जा चुक है।

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वषाणुओं के वषय म आप पहले क कक्षाओं म पढ़ चुके ह। इन्ह पाँच-जगत म से कसी के भी अंतगत क्य नह
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रखा गया? कारण बताइए।

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क्य क पाँच जगत प्रणाली जीव का वग करण उनक को शकाओं से करती है — और वषाणु म को शका होती ही नह ।

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चत्र 12.5 का हर मानदं ड उस पर लगाया ही नह जा सकता।

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पाँच जगत प्रणाली का मानदं ड
gl ase वषाणु म क्या है

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कोिशका पकार — पूवकें द की या सुकें द की कोई नही ं। यह अकोिशकीय है: के वल आनुवंिशक पदाथ और पोटीन आवरण

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संग ठन का स्तर — एककोिशकीय या बहक
ु ोिशकीय
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कोई नही ं — यह कोिशकाओं से बना ही नही ं है
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em पोषण की िविध — स्वपोषी या िवषमपोषी
कोिशका संर चना — िभित्त उपिस्थत या अनुपिस्थत न कोिशका िझल्ली, न िभित्त , न कोिशकाद व्य, न कोिशकांग , न राइबोसोम

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agl कोई नही ं। यह न भोजन ले ता है, न बनाता है, न श्वसन करता है; इसमें उपापचय ही

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नही ं

m इनमें से कोई नही ं a s e
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पािरिस्थितकीय भूिमका — उत्पादक, उपभोक्ता,

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अपघटक

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages81
Languagehindi
Updated19 Sep 2026