aglasem.com
Home Schools Admission Career Mock Test PDF Docs Playground
ClassChoose class
StateSelect state

NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ?

AglaSem पर कक्षा 9 हिंदी पाठ 2 क्या लिखूँ? (गंगा) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 9 Hindi Chapter 2 (Ganga).
NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ? - Page 1 of 48

About NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ?

NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ? is available here for free download. Published by NCERT for Class 9, this solution can be viewed online or downloaded as a PDF (48 pages). Candidates preparing for Class 9 can use NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ? to understand the exam pattern, the type of questions asked, and the overall difficulty level.

Frequently Asked Questions

How can I download NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ??

Open this page and click the Download button to save NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ? as a PDF. It is completely free on AglaSem Docs.

Is NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ? free to download?

Yes. NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ? can be viewed online and downloaded as a PDF free of cost on AglaSem Docs.

How many pages does NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ? have?

NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ? contains 48 pages, which you can read online or download together as a single PDF.

Where can I find more Class 9 study material?

You can find more Class 9 question papers, sample papers, syllabus, and answer keys on AglaSem Docs.

NCERT Solutions Class 9 Hindi Chapter 2 क्या लिखूँ? – Text

Read the full text of this solution below — useful to quickly search, copy and reference the content online without downloading the PDF.

📄 View text version (48 pages)

Page 1

F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा9

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 2: क्या लखू?ँ

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — गंगा

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

30 – 44 14 34 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 47 pages

Page 2

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 9 · हद · गं गा

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 2: क्या लखू?
ँ
NCERT कक्षा 9 हद क पाठ्यपुस्तक गंगा के पाठ 2 क्या लखूँ? के सभी अभ्यास-प्रश्न के पूरे हल। यह पदुमलाल पुन्नालाल ब ी (1894–
1971) का एक आत्मपरक नबंध है, जसम लेखक ‘दूर के ढोल सुहावने होते ह’ और ‘समाज-सुधार’ — इन दो वषय पर नबंध लखने क उलझन
के बहाने पूरी नबंध-रचना प्र क्रया को खोलकर रख दे ता है। पृष्ठ 30 से 44 तक क हर ग त व ध — रचना से संवाद (मेरे उत्तर मेरे तक, मेरी समझ मेरे
वचार), वधा से संवाद ( नबंध लखने क कला, भाव- वस्तार, मेरा अनुभव), वषय से संवाद, सृजन, भाषा से संवाद (व्याकरण क बात —
समास, उपसग एवं प्रत्यय, भाव एक शब्द अनेक), ग त व धयाँ, भाषा संगम, झरोखे से और खोजबीन — शीषक-दर-शीषक हल क गई है।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

गंगा (कक्षा 9) 30 – 44

खं ड प्रश्न

14 34

माध्यम

हन्द

मेरे उत्तर मेरे तक — पृष्ठ 35–36
अभ्यास → रचना से संवाद → मेरे उत्तर मेरे तक

रचना से सं वाद बहु वकल्पी + तक

प्र.1 नम्न ल खत प्रश्न के सट क उत्तर चु नए और यह भी बताइए क आपको ये उत्तर उपयुक्त क्य लगते ह? 1. “हैट
टाँगने के लए कोई भी खूँट काम दे सकती है... असली वस्तु है हैट, खूँट नह ।” नबंध म ‘हैट’ और ‘खूँट ’ का
उल्लेख कस भाव को सबसे अ धक उजागर करता है? (क) वषय से अ धक लेखक के भाव क प्रधानता को
दशाना (ख) वचार से अ धक तथ्य आधा रत सामग्री को प्रमुख बताना (ग) शैली से अ धक भाषा व्यव ाक
उपयो गता बताना (घ) उदाहरण से अ धक सद्धांत आधा रत लेखन का समथन करना

सही उत्तर — (क) वषय से अ धक लेखक के भाव क प्रधानता को दशाना।

यह उत्तर उपयुक्त क्य है: यह दृष्टांत ए.जी. गा डनर के कथन को समझाने के लए आया है। गा डनर कहते ह क
लखने क एक वशेष मान सक स्थ त होती है, जसम “ वषय क चता नह रहती। कोई भी वषय हो, उसम हम
अपने हृदय के आवेग को भर ही दे ते ह।” इसके ठ क बाद हैट-खूँट का उदाहरण आता है और लेखक स्वयं उसका
अथ खोल दे ता है — “इसी तरह मन के भाव ही तो यथाथ वस्तु ह, वषय नह ।” यहाँ हैट = लेखक के मन के भाव
(असली वस्तु) और खूँट = वषय (केवल टाँगने का आधार)। जैसे हैट कसी भी खूँट पर टँ ग सकता है, वैसे ही
भाव कसी भी वषय के सहारे प्रकट हो सकते ह। इस लए यह दृष्टांत वषय क नह , भाव क प्रधानता उजागर
करता है।

शेष वकल्प क्य नह —

Page 1 of 47

Page 3

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

वकल्प नणय कारण

(क) वषय से अ धक सही ✓ “असली वस्तु है हैट, खूँट नह ” का सीधा अनुवाद यही है — भाव असली, वषय गौण।
लेखक के भाव क
प्रधानता

(ख) वचार से अ धक तथ्य ग़लत दृष्टांत म तथ्य या सामग्री क बात है ही नह । उलटे लेखक आगे स्वीकार करता है क उसके पास
आधा रत सामग्री न वश्वकोश है, न कोई ग्रंथ — फर भी वह लखेगा।

(ग) शैली से अ धक भाषा ग़लत शैली और भाषा-व्यवस्था क चचा नबंध म बाद म, आचाय के प्रसंग म आती है। हैट-खूँट वाला
व्यवस्था क उपयो गता वाक्य उससे बहुत पहले, गा डनर के प्रसंग म आया है और उसका वषय ‘भाव बनाम वषय’ है।

(घ) उदाहरण से अ धक ग़लत यह वकल्प बात को उलट दे ता है। यहाँ तो स्वयं एक उदाहरण दे कर सद्धांत समझाया जा रहा है;
सद्धांत आधा रत लेखन लेखक सद्धांत-प्रधान लेखन का समथन कह नह करता — वह तो आगे शास्त्र क कसौ टय
पर चुटक लेता है।

ध्यान द जए: ऐसे प्रश्न म उत्तर ढूँ ढ़ने का सबसे पक्का तरीक़ा यह है क दृष्टांत के तुरंत बाद वाली पं क्त प ढ़ए —
प्रायः लेखक स्वयं वहाँ उसका अथ खोल दे ता है, जैसे यहाँ खोला है।

प्र.2 2. “उनम लेखक क स ी अनुभू त रहती है... उसका उल्लास रहता है।” मानटे न क पद्ध त लेखक के लए कस
नणय का आधार बनती है? (क) शैली और स्पष्ट-सहज भाषा को महत्व न दे ना (ख) परंपरागत नबंधकार को
अस्वीकार करना (ग) अध्ययन के बना अपने वचार प्रस्तुत कर दे ना (घ) अनुभव आधा रत स्वच्छं द लेखन को
अपनाना

सही उत्तर — (घ) अनुभव आधा रत स्वच्छं द लेखन को अपनाना।

यह उत्तर उपयुक्त क्य है: मानटे न के वषय म लेखक लखता है क “उन्ह ने स्वयं जो कुछ दे खा, सुना और
अनुभव कया, उसी को अपने नबंध म ल पबद्ध कर दया” और ऐसे नबंध क सबसे बड़ी वशेषता यह है क “वे
मन क स्वच्छं द रचनाएँ ह”। इसी पूरे वणन के तुरंत बाद लेखक अपना नणय सुनाता है — “तब इसी पद्ध त का
अनुसरण कर म भी क्य न नबंध लखूँ।” अथात् मानटे न क पद्ध त उसे यह आधार दे ती है क वह शास्त्र क
रूपरेखा-सामग्री वाली व ध छोड़कर अपने दे खे-सुने-भोगे अनुभव के बल पर, स्वच्छं द ढं ग से लखे। आगे का पूरा
नबंध — ढोल, नव-वधू, तरुण-वृद्ध — इसी नणय का फल है।

शेष वकल्प क्य नह —

(क) शैली और स्पष्ट-सहज भाषा को महत्व न दे ना — ठ क उलटा है। लेखक सहज भाषा का पक्षधर है; उसने स्वयं कहा है,
“म छोटे -छोटे वाक्य अच्छ तरह लख सकता ँ।” जस दुब धता पर वह व्यंग्य करता है, वह आचाय क माँग है, उसक अपनी
पसंद नह ।
(ख) परंपरागत नबंधकार को अस्वीकार करना — लेखक कसी को अस्वीकार नह करता। वह वनम्रता से कहता है क
अंग्रेजी नबंधकार “इन आचाय क कसौट पर भले ही खरे सद्ध न ह , पर अंग्रेजी सा हत्य म उनका मान अवश्य है।” यह
अस्वीकार नह , दूसरा रास्ता चुनना है।

Page 2 of 47

Page 4

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

(ग) अध्ययन के बना अपने वचार प्रस्तुत कर दे ना — मानटे न क पद्ध त आलस्य का नाम नह है। ‘दे खना, सुनना और
अनुभव करना’ स्वयं एक क ठन अध्ययन है। लेखक ने भी नबंधशास्त्र के कई आचाय क रचनाएँ दे ख — पढ़े बना वह भी
नह लख रहा।

प्र.3 3. “तरुण के लए भ वष्य उज्ज्वल... वृद्ध के लए अतीत सुखद...” यह तुलना कस पर आधा रत है? (क) तक
और भावना (ख) ज्ञान और शक्षा (ग) प रश्रम और उपल (घ) अ भलाषा और अनुभव

सही उत्तर — (घ) अ भलाषा और अनुभव।

यह उत्तर उपयुक्त क्य है: इस तुलना क जड़ म नबंध का कद्र य वाक्य है — “दूर रहने से हम यथाथता क
कठोरता का अनुभव नह होता।” तरुण के पास अभी अनुभव नह , केवल अ भलाषा (चाह, स्वप्न) है; इस लए जो
अभी आया ही नह — भ वष्य — वह उसे उज्ज्वल दखता है। वृद्ध के पास अब अनुभव है और वह अनुभव उसे
बीते हुए दन क ओर ख चता है; इस लए जो बीत चुका — अतीत — वह उसे सुखद लगता है। लेखक इसी को
आगे खोलता है — “तरुण क्रां त के समथक होते ह और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक।” क्रां त अ भलाषा से जन्मती
है, संरक्षण अनुभव से।

शेष वकल्प क्य नह —

वकल्प क्य नह

(क) तक और तुलना का आधार बु द्ध बनाम भावना नह है। लेखक दोन को समान रूप से स्वप्न दे खते हुए दखाता है — “दोन के
भावना ही स्वप्न सुखद होते ह।” दोन ही भावना के पक्ष म ह।

(ख) ज्ञान और पूरे प्रसंग म ज्ञान या शक्षा का कोई उल्लेख ही नह । भेद उम्र और दूरी का है, पढ़ाई- लखाई का नह ।
शक्षा

(ग) प रश्रम और यहाँ कसी क उपल ब्ध नापी ही नह जा रही। असंतोष दोन को है — तरुण भ वष्य को ख चकर वतमान म लाना
उपल ब्ध चाहता है, वृद्ध अतीत को। यह उपल ब्ध का नह , दृ ष्ट का अंतर है।

(घ ) अिभलाषा और यही दो श द त ण और वृ की मनःि थित को ठीक -ठीक पकड़ ते है ं — एक के पास चाह है, दू स रे के पास बीता हुआ
ब् रु द्ध स्

अनुभव जीवन।

प्र.4 4. नबंध म अमीर खुसरो क कहानी का उल्लेख कस संदभ म कया गया है? (क) क वता लेखन क कला को
समझाने के लए (ख) एक साथ कई वषय को संबो धत करने क प्र तभा दखाने के लए (ग) ढोल के महत्व को
दशाने के लए (घ) सामा जक सुधार के उदाहरण के रूप म

सही उत्तर — (ख) एक साथ कई वषय को संबो धत करने क प्र तभा दखाने के लए।

Page 3 of 47

Page 5

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ?
a g l AglaSem · NCERT Solutions

. com
यह उत्तर उपयुक्त क्य है: लेखक क समस्या यह थी क उसे दो नबंध लखने ह — न मता के लए ‘दूर के ढोल

m a s em
gथेl , उन्ह ने एक ही पद्य म
सुहावने’ और अ मता के लए ‘समाज-सुधार’। ठ क इसी अड़चन पर उसे खुसरो याद आते ह। कुएँ पर चार स्त्रय ने
. co माँगे — खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल — और “अमीर खुसरो प्र तभावान
a
m क पू त कर द ” —
eइच्छाओं
चार अलग वषय

a s
gl पकाई जतन से, चरखा दया चला। आया कुत्ता खा गया, तू बैठ ढोल बजा॥”
चार क
a“खीर

com
कहानी के तुरंत बाद लेखक स्वयं नष्कष लखता है — “मुझम खुसरो क प्र तभा नह है, पर उनक इस पद्ध त को

.
स्वीकार करने से मेरी क ठनाई आधी रह जाती है। म भी एक नबंध म इन दोन वषय का समावेश कर दूँ गा।” इससे
emलेने क यु क्त के संदभ म आई है। ag
a s
agl
स्पष्ट है क कहानी कई वषय को एक साथ साध

शेष वकल्प क्य नह —

co m
m.
(क) क वता लेखन क कला — पद्य यहाँ साधन है, साध्य नह । लेखक को क वता नह , नबंध लखना है; वह खुसरो से छं द

o m
नह , पद्ध त उधार ले रहा है।
l a se
m .cके महत्व को दशाना — ‘ढोल’ पद्य क चार वस्तुओं म से केवल एक है। य द aउgेश्य ढोल होता तो खीर, चरखा और
sु त्तेe का कोई काम न था।
(ग) ढोल

g l aक
a (घ) सामा जक सुधार का उदाहरण — इस कहानी म समाज-सुधार का दूर-दूर तक कोई संबंध नह । समाज-सुधार वाला

s
भाग तो इसके बहुत बाद, बुद्धदे व-कबीर-नानक के प्रसंग म आता है।
m a
em
.co agl
a s
a l पहुँच जाता है। दो वषय एक ही सूत्र म बँध जाते ह।
जोड़ने वाली बात: यही यु क्त नबंध का ढाँचा बन जाती है — लेखक ‘ढोल’ से शुरू करके ‘दूरी’ तक, दूरी से
‘तरुण-वृद्ध’ तक और वहाँ से ‘सुधार ’gतक

com
m .
o m l a se
.c(ख) सुधार केवल बड़े वचारक द्वारा संभव ह। (ग) सुधार केवल आधु नकagयुग क दे न ह। (घ) सुधार का कोई
प्र.5 5. नबंध म समाज-सुधार के संदभ म क्या कहा गया है? (क) सुधार क आवश्यकता हर युग म बनी रहती है।

se m अंत नह , ले कन दोष समाप्त हो जाते ह।
g l a
a
se m
com l a

. a g
m
ase
सही उत्तर — (क) सुधार क आवश्यकता हर युग म बनी रहती है।

agl
यह उत्तर उपयुक्त क्य है: नबंध का वाक्य ही यही है — “मनुष्य जा त के इ तहास म कोई ऐसा काल ही नह

m
हुआ, जब सुधार क आवश्यकता न हुई हो।” इसके समथन म लेखक बुद्धदे व, महावीर स्वामी, नागाजुन,
. co
em
शंकराचाय, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी — यानी अलग-अलग युग के

m l as
.cकोo सद्ध करता है। g
सुधारक — एक पं क्त म गना दे ता है और पूछता है, “पर सुधार का अंत कब हुआ है?” यही ‘हर युग’ वाली बात

m a
l a se
ag
.c
m
शेष वकल्प क्य नह —

m a s e
e m . co agl
g l as
a

com
m .
m ase
.co


a g l Page 4 of 47

Page 6

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

वकल्प नणय पाठ से प्रमाण

(क ) हर युग में आवश्यकता सही ✓ “कोई ऐसा काल ही नह हुआ, जब सुधार क आवश्यकता न हुई हो।”

(ख) केवल बड़े वचारक द्वारा ग़लत लेखक ने साफ़ लखा है — “सुधारक का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव म होता है।”
संभव यानी सुधार बड़े नाम तक सी मत नह , वह हर गली-गाँव म चलता रहता है।

(ग) केवल आधु नक युग क ग़लत सूची बुद्धदे व और महावीर स्वामी से आरंभ होती है — ये ढाई हज़ार वष पुराने ह। साथ ही
दे न लखा है क यह चचा “अना द काल से लेकर आज तक होती आ रही है।”

(घ) सुधार का अंत नह , पर ग़लत यह वकल्प आधा सच है, इसी लए भ्रामक है। पाठ कहता है — “न दोष का अंत है और न
दोष समाप्त हो जाते ह सुधार का।” दोष समाप्त नह होते; उलटे “जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए ह।”

तक क कसौट : वकल्प (घ) जैसे ‘आधे सही’ वकल्प परीक्षा म सबसे अ धक चूक कराते ह। उपाय एक ही है —
पूरे वाक्य को पाठ क पं क्त से मलाइए, केवल उसके पहले आधे हस्से से नह ।

मेरी समझ मेरे वचार — पृष्ठ 36
अभ्यास → रचना से संवाद → मेरी समझ मेरे वचार

रचना से सं वाद कक्षा म चचा

प्र.1 नीचे दए गए प्रश्न पर कक्षा म चचा क जए और उनके उत्तर ल खए— 1. नबंध लेखन के वषय म ए.जी.
गा डनर और लेखक के वचार म क्या अंतर है?

दोन का अंतर एक वाक्य म यह है — गा डनर के लए नबंध ‘उतरता’ है, ब ी के लए नबंध ‘बनाना पड़ता’ है।

Page 5 of 47

Page 7

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

बदु ए.जी. गा डनर पदुमलाल पुन्नालाल ब ी

लखने क “ लखने क एक वशेष मान सक स्थ त होती है” — मन “मने उस मान सक स्थ त का अनुभव ही नह कया है,
स्थ त म उमंग, हृदय म ू त, म स्तष्क म आवेग उठता है और जसम भाव अपने आप उ त हो जाते ह।”
“लेख लखना ही पड़ता है।”

प्र क्रया भाव स्वयं उठते ह; लेखन सहज, अनायास। “मुझे तो सोचना पड़ता है, चता करनी पड़ती है, प रश्रम
करना पड़ता है, तब कह म एक नबंध लख सकता ँ।”
यानी लेखन प्रयत्नसाध्य है।

वषय का वषय गौण है — “कोई भी वषय हो, उसम हम अपने वषय बड़ी चता है — ‘दूर के ढोल’ पर पाँच पेज कैसे भर
स्थान हृदय के आवेग को भर ही दे ते ह।” हैट असली है, खूँट और अना द काल से चली आ रही ‘समाज-सुधार’ क बहस
नह । पाँच पेज म कैसे समेट?

शीषक शीषक बनाना सबसे क ठन काम मानते ह — “शीषक दे ने शीषक तो पहले से तय ह (न मता और अ मता के दए हुए);
का भार म अपने मत्र पर छोड़ दे ता ँ।” उसक क ठनाई शीषक बनाने क नह , दए हुए शीषक को
भरने क है।

रूपरेखा प्रसंग म रूपरेखा का समथन नह ; वे सहज प्रवाह के पक्ष “म सोच ही नह सकता क इस वषय क कैसी रूपरेखा है…
म ह। इस लए मुझसे तो रूपरेखा तैयार न होगी।”

पर वरोध कहाँ है, कहाँ नह : ध्यान द जए, ब ी गा डनर को ग़लत नह कहते — “गा डनर साहब के इस कथन
क यथाथता म मुझे संदेह नह , पर मेरे लए क ठनता यह है क…” यानी अंतर सद्धांत का नह , स्वभाव और
अनुभव का है। गा डनर उस लेखक क बात कर रहे ह जसे प्रेरणा मलती है; ब ी उस लेखक क , जसे मेज़ पर
बैठकर, घड़ी दे खते हुए, दो घंटे म दो नबंध दे ने ह। यही ईमानदारी इस नबंध को आत्मीय बनाती है।

प्र.2 2. लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोन ही वतमान से असंतुष्ट रहते ह, पर दोन क असंतु ष्ट के कारण भन्न
ह। आपके वचार से उनक असंतु ष्ट के क्या-क्या कारण हो सकते ह?

असंतोष एक ही है, पर उसक दशा उलट है — तरुण का असंतोष आगे क ओर दे खता है, वृद्ध का पीछे क ओर। पाठ का
वाक्य है — “तरुण भ वष्य को वतमान म लाना चाहते ह और वृद्ध अतीत को ख चकर वतमान म दे खना चाहते ह।”

Page 6 of 47

Page 8

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

तरुण के असंतोष के कारण वृद्ध के असंतोष के कारण

भ वष्य का चत्र उन्ह ने कल्पना म गढ़ा है और वतमान उससे मेल अतीत का चत्र उन्ह ने स्मृ त म सँजोया है, और स्मृ त कठोरता को छाँट
नह खाता — इस लए वतमान अधूरा लगता है। दे ती है — इस लए वतमान उतरा हुआ लगता है।

प रवतन क ग त धीमी लगती है; व्यवस्थाएँ, नयम और परंपराएँ प रवतन क ग त तेज़ लगती है; जन मूल्य म वे पले, वे छू टते दखते
बाधा जान पड़ती ह। ह।

वे जीवन-संग्राम से अभी दूर ह, इस लए “संसार का चत्र बड़ा ही वे अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए ह, इस लए
मनमोहक प्रतीत होता है” — और उतना सुंदर संसार न मलने पर “अतीतकाल क स्मृ त बड़ी सुखद लगती है” — और वैसा वतमान न
क्षोभ होता है। पाकर क्षोभ होता है।

अपनी श क्त, उत्साह और नएपन को आज़माने का अवसर अनुभव और परामश का मान घटता दखता है; नणय म अपनी जगह
वतमान म कम दखता है। कम लगती है।

इसी लए वे क्रां त के समथक बनते ह — “अभी और तुरंत” इसी लए वे अतीत-गौरव के संरक्षक बनते ह — “जो सद्ध हो चुका,
उनका स्वर है। उसे बचाओ” उनका स्वर है।

एक ही जड़, दो शाखाएँ: दोन के असंतोष क जड़ वही है जो पूरे नबंध क धुरी है — दूरी। भ वष्य तरुण से दूर है,
अतीत वृद्ध से दूर है; और “दूर रहने से हम यथाथता क कठोरता का अनुभव नह होता।” जो पास है — वतमान —
उसक कठोरता दोन को दखती है, इस लए दोन उससे असंतुष्ट ह। लेखक इसे दोष नह मानता; वह कहता है क
इन्ह दोन के कारण “वतमान सदै व क्षुब्ध रहता है और इसी से वतमान काल सदै व सुधार का काल बना रहता है।”
अथात् यह असंतोष ही समाज को आगे बढ़ाता है।

अपने अनुभव से जो ड़ए: घर म मोबाइल के समय को लेकर होने वाली बहस इसी का छोटा रूप है — ब े कहते
ह “नया ज़माना है”, बड़े कहते ह “हमारे समय म ऐसा नह था।” दोन अपनी-अपनी दूरी से बोल रहे होते ह।

प्र.3 3. न मता और अ मता कन वषय पर नबंध लखवाना चाहती ह? उनके द्वारा सुझाए गए वषय पर नबंध
लखने म लेखक को क्या-क्या क ठनाइयाँ आईं?

न मता का आदे श है क लेखक “दूर के ढोल सुहावने होते ह” पर नबंध लखे, और अ मता का आग्रह है क वह “समाज-सुधार”
पर लखे। दोन वषय परीक्षा म आ चुके ह, इस लए लेखक को केवल नबंध नह लखने — दोन को नबंध-रचना का रहस्य भी
समझाना है।
लेखक क क ठनाइयाँ —

1. मान सक त ही नह बनती। गा डनर वाली वह उमंग- ू त-आवेग क स्थ त उसने कभी अनुभव नह क ; उसे तो
“सोचना पड़ता है, चता करनी पड़ती है, प रश्रम करना पड़ता है।”
2. दो उलटे स्वभाव के वषय। एक वषय बहुत छोटा है — “दूर के ढोल सुहावने अवश्य होते ह। पर क्या वे इतने सुहावने होते ह
क उन पर पाँच पेज लखे जा सक?” दूसरा बहुत बड़ा — समाज-सुधार क चचा “अना द काल से लेकर आज तक होती आ
रही है और जसके संबंध म बड़े-बड़े वज्ञ म भी वरोध है”, उसे पाँच पेज म कैसे समेटा जाए?

Page 7 of 47

Page 9

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

3. सामग्री का अभाव। नबंध के दो प्रधान अंग ह — सामग्री और शैली। पर “यह कौन जानता था क ‘दूर के ढोल सुहावने’ पर
भी नबंध लखने क आवश्यकता होगी।” पहले पता होता तो पुस्तकालय म अनुसंधान कर लेता; अब न वश्वकोश है, न कोई
ग्रंथ, और समय भी नह ।
4. समय क कमी। “मुझे तो यह बैठकर दो ही घंट म दो नबंध तैयार कर दे ने ह गे।”
5. रूपरेखा नह बनती। नबंध लखने से पहले उसका सार दस-पाँच शब्द म कैसे लखा जाए? वह स्वयं कहता है — “मुझसे तो
रूपरेखा तैयार न होगी।” (साथ ही याद दलाता है क गा डनर को तो शीषक बनाने म ही सबसे अ धक क ठनाई होती थी और
शेक्सपीयर ने घबराकर एक नाटक का नाम ही रख दया — ‘जैसा तुम चाहो’।)
6. शैली का द्वं द्व। आचाय कहते ह वाक्य छोटे -छोटे पर एक-दूसरे से बँधे ह ; पर लेखक कहता है — “म तो ँ मास्टर”, वद्वत्ता के
प्रदशन के लए वाक्य आधे पृष्ठ म समाप्त होने चा हए, जैसे बाणभट्ट ने कादं बरी म लखे; और भाषा म अस्पष्टता भी चा हए,
क्य क दुब धता गांभीय लाती है — जैसे श्रीहष और सेनाप त ने क । दोन माँग एक साथ पूरी करना असंभव है। इसी उलझन म
वह पूछता है — “तब क्या कया जाए?”

क ठनाई का हल कैसे नकला: दो रास्त से। पहला — मानटे न क पद्ध त, यानी शास्त्र क जगह अपना दे खा-
सुना-अनुभव कया लखना। दूसरा — अमीर खुसरो क यु क्त, यानी दोन वषय को एक ही नबंध म मला दे ना।
इसके बाद लेखक ‘ढोल’ से चलकर ‘दूरी’, ‘तरुण-वृद्ध’ और ‘सुधार’ तक पहुँच जाता है, और दोन वषय अपने
आप एक हो जाते ह।

प्र.4 4. नबंधशास्त्र के आचाय ने आदश नबंध लखने क कौन-सी यु क्तयाँ सुझाई ह? आप कसी भी वषय पर
नबंध लखने से पहले कस तरह क तैयारी करते ह?

(क) आचाय क सुझाई यु क्तयाँ — नबंध पढ़ते हुए ये पाँच बात सामने आती ह:

क्रम यु क्त पाठ के शब्द म

1. नबंध छोटा हो “ नबंध छोटा होना चा हए। छोटा नबंध बड़े क अपेक्षा अ धक अच्छा होता है, क्य क बड़े नबंध
म रचना क सुंदरता नह बनी रह सकती।”

2. दो प्रधान अंग — सामग्री “ नबंध के दो प्रधान अंग ह— सामग्री और शैली।” पहले सामग्री एकत्र करनी होगी, वचार-समूह
और शैली सं चत करना होगा; इसके लए मनन चा हए।

3. पहले रूपरेखा बनाइए “ वज्ञ का कथन है क नबंध लखने के पहले उसक रूपरेखा बना लेनी चा हए।”

4. भाषा म प्रवाह हो “भाषा म प्रवाह होना चा हए। इसके लए वाक्य छोटे -छोटे ह , पर एक-दूसरे से बँधे।”

5. अलंकार, मुहावरे, “अलंकार , मुहावर और लोको क्तय का समावेश भी नबंध के लए आवश्यक बताया जाता है।”
लोको क्तयाँ

एक व्यंग्य भी पहचा नए: ‘आधे पृष्ठ का लंबा वाक्य’ और ‘भाषा म अस्पष्टता/दुब धता’ आचाय क यु क्त नह ,
लेखक का व्यंग्य है — वह वद्वत्ता के दखावे पर चुटक ले रहा है। इसे ‘आदश नबंध का नयम’ मानकर मत
ल खए।

Page 8 of 47

Page 10

ase
कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ?
a g l AglaSem · NCERT Solutions

(ख) म नबंध लखने से पहले क्या तैयारी करता/करती ँ —
co m
e m.
m l as
.co a g
नमूना उत्तर: “सबसे पहले म वषय को अपने शब्द म एक वाक्य म लखता ँ, ता क यह तय हो जाए क वास्तव म

a s em
पूछा क्या गया है। फर पाँच-सात मनट क े काग़ज़ पर जो कुछ मन म आता है — घटनाएँ, उदाहरण, आँकड़े,
l क कही बात — बना क्रम के लख लेता ँ। इसके बाद उन बदुओं को तीन खान म बाँटता ँ: भू मका
gकसी
a( वषय क्या है और आज क्य महत्त्वपूण है), वस्तार (दो-तीन पक्ष, हर पक्ष के साथ एक उदाहरण) और नष्कष

co m
ag
(मेरी अपनी राय)। यही मेरी रूपरेखा बन जाती है। य द वषय पर जानकारी कम हो तो पुस्तकालय या पाठ्यपुस्तक

m .
as e
से दो-तीन तथ्य नोट कर लेता ँ। लखते समय म वाक्य छोटे रखता ँ, आरंभ म एक लोको क्त या प्रश्न रखता ँ

a g l
और अंत म वही बात दोहराता ँ जो भू मका म उठाई थी — इससे नबंध बँधा हुआ लगता है। लख लेने के बाद एक
बार पढ़कर वतनी, वराम- चह्न और दोहराए गए शब्द ठ क करता ँ।”

. c om
पर एक बात लेखक से भी सी खए: रूपरेखा सहायक है, बंधन नह । ब ी क बात म स em
s
om‘सार’ नह नकाला जा सकता। इस लए रूपरेखा को अं तम मानकर aमतglचaलए — लखते- लखते
ाई है क लखने से
पहले हर cबार
.
a s em
gl
कोई अच्छा वचार आ जाए तो रूपरेखा बदल द जए।
a
m उसी को अपने नबंध म ल पबद्ध कर दया।” नबंध a s
m . cवoकया, agl
लेखन के लए दे खने, सुनने और अनुaभsवeकरने क क्या उपयो गता हो सकती है?
प्र.5 5. मानटे न ने “जो कुछ दे खा, सुना और अनुभ

agl

co m

m .
e
दे खना, सुनना और अनुभव करना नबंध क सामग्री जुटाने का सबसे सुलभ और सबसे स ा साधन है। जो बात हमने स्वयं भोगी

m l as
.co g
है, उसे लखने के लए न वश्वकोश चा हए, न पुस्तकालय — और वही बात पाठक तक सबसे सीधी पहुँचती है।

e m a
s
la वषय क सामग्री उपलब्ध हो सके।” अनुभव यह अड़चन मटा देता है — वह हर समय लेखक के पास रहता है।
सामग्री का अक्षय भंडार। लेखक क सबसे बड़ी अड़चन यही थी क “यहाँ न तो वश्वकोश है और न कोई ऐसा ग्रंथ जसम इन

ag
se m
स ाई और वश्वसनीयता। मानटे न-शैली के नबंध क वशेषता पाठ म यही बताई गई है — “उनम लेखक क स ी

com
अनुभू त रहती है। उनम उसके स े भाव क स ी अ भव्य क्त होती है, उनम उसका उल्लास रहता है।” उधार लया हुआ
g l a
m . a
e
s तो तथ्य सबके एक जैसे ह गे, पर अनुभव कसी दो का एक नह होगा। इसी से
वचार ठं डा होता है; भोगा हुआ अनुभव गरम।
मौ लकता। एक ही वषय पर सौ लोग aलख
g l
a है।
नबंध “मन क स्वच्छं द रचना” बनता

m
छोट -सी बात से बड़ा सत्य नकालने क श क्त। इसका सबसे अच्छा प्रमाण यही पाठ है। लेखक ने ढोल क आवाज़ सुनी,

. co
m
दूर बैठे आदमी के मन का चत्र दे खा — और उसी से यह सत्य नकाल लया क “दूर रहने से हम यथाथता क कठोरता का

o m
अनुभव नह होता।” यह वाक्य कसी ग्रंथ से नह आया, अनुभव से आया।
l a se
.cसजीव चत्रण। अनुभव ब्योरे देता है — कोलाहल से भरा घर, कोने म बैठ ल agाशील नव-वधू, उसके हृदय का प्रेम-उल्लास-
m संकोच-आशंका- वषाद। ऐसे ब्योरे कसी सद्धांत से नह , देखी हुई दु नया से मलते ह।
l a se
ag
.c
सहज भाषा। जो अपना अनुभव लखता है, उसे क ठन शब्द ओढ़ने नह पड़ते। इसी लए ऐसे नबंध म न ‘ज्ञान क ग रमा’ का
बोझ रहता है, न ‘कल्पना क म हमा’ का।
s e m
m a
e m . co agl
g l as
a

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 9 of 47

Page 11

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

एक संतुलन भी याद र खए: अनुभव अध्ययन का वकल्प नह , पूरक है। स्वयं ब ी ने भी नबंधशास्त्र के कई
आचाय क रचनाएँ दे ख , गा डनर को पढ़ा, खुसरो और बाणभट्ट को याद कया — और तब अनुभव के सहारे
लखा। पढ़ा हुआ ढाँचा दे ता है, भोगा हुआ प्राण। अच्छा नबंध दोन के मेल से बनता है।

अभ्यास के लए: आज से एक छोट ‘अनुभव-पोथी’ र खए। रोज़ दो पं क्तयाँ ल खए — आज क्या दे खा, कसक
कोई बात कान म रह गई, और कस बात पर मन ठठका। महीने भर बाद दे खए, कसी भी वषय पर नबंध लखने
के लए आपके पास अपने उदाहरण तैयार मलगे।

नबंध लखने क कला — पृष्ठ 36–37
अभ्यास → वधा से संवाद → नबंध लखने क कला

वधा से सं वाद आरे ख

प्र.1 शैली का अथ अ भव्य क्त का ढं ग होता है। नबंधकार व भन्न प्रकार से वषय को प्रस्तुत करता है। इस पाठ म
नबंध लेखन क प्र क्रयाओं के वषय म चचा क गई है। दए गए आरेख को दे खए और इसके आधार पर एक
नबंध ल खए।

पुस्तक का आरेख नबंध-रचना क छह अव ाएँ दखाता है। बीच म वषय है और उसके चार ओर ये छह चरण —

1. पेर णा

6. लेख न और समापन 2. िवषय चयन

िवषय

5. शै ली िनध रण 3. सामगी संगह

4. रूपरे ख ा िनम ण

Page 10 of 47

Page 12

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

पुस्तक के आरेख के अनुसार नबंध-रचना क छह अवस्थाएँ। (पुस्तक म बीच का शब्द ‘ वषय’ श्वेत अक्षर म छपा है और रेखाओं के नीचे
दब गया है।)

हर चरण का अथ, पाठ से जोड़कर —

चरण क्या करना है पाठ म इसका संकेत

प्रेरणा लखने का भीतरी दबाव या बाहरी आग्रह — कुछ कहने क गा डनर क “ वशेष मान सक स्थ त”; और लेखक के
उमंग। लए न मता-अ मता का आग्रह।

वषय चयन क्या लखना है, यह तय करना; वषय क सीमा बाँधना। “दूर के ढोल सुहावने” और “समाज-सुधार” — एक
बहुत छोटा, दूसरा बहुत बड़ा।

सामग्री संग्रह मनन, पठन, अनुभव और उदाहरण जुटाना। “पहले तो मुझे सामग्री एकत्र करनी होगी, वचार-समूह
सं चत करना होगा।”

रूपरेखा बदुओं का क्रम तय करना — भू मका, वस्तार, नष्कष। “ नबंध लखने के पहले उसक रूपरेखा बना लेनी
नमाण चा हए।”

शैली नधारण कहने का ढं ग चुनना — वणनात्मक, वचारात्मक या “अब मुझे शैली न त करनी है… भाषा म प्रवाह होना
आत्मपरक; वाक्य और भाषा का स्वरूप। चा हए।”

लेखन और लखना और उसे ऐसे अंत तक पहुँचाना क आरंभ क बात नबंध का अंत — “दोन के ही स्वप्न सुखद होते ह,
समापन पूरी हो जाए। क्य क दूर के ढोल सुहावने होते ह।”

Page 11 of 47

Page 13

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

नमूना नबंध — “दूर के ढोल सुहावने होते ह” (आरेख के छह चरण पर चलकर)
1. प्रेरणा — मेले से लौटते हुए दूर से आती ढोल क आवाज़ बहुत भली लगी थी; पास पहुँचा तो कान भन्ना गए।
तभी मन म यह प्रश्न उठा — क्या दूरी सचमुच चीज़ को सुंदर बना दे ती है?
2. वषय चयन — वषय है — ‘दूर के ढोल सुहावने होते ह’। म इसे केवल लोको क्त के अथ तक सी मत न रखकर
जीवन-दृ ष्ट के रूप म लूँगा।
3. सामग्री संग्रह — (i) ढोल का अपना अनुभव, (ii) परीक्षा के बाद क छु ट्टयाँ, जो दूर से बहुत सुंदर लगती ह,
(iii) दाद का बार-बार कहना क “हमारे ज़माने म…”, (iv) पाठ क पं क्त — “दूर रहने से हम यथाथता क
कठोरता का अनुभव नह होता।”
4. रूपरेखा — भू मका (लोको क्त का शा ब्दक अथ) → ढोल का उदाहरण → दूरी और यथाथ का संबंध → तरुण
और वृद्ध → लाभ और हा न → नष्कष।
5. शैली — आत्मपरक और सरल; छोटे वाक्य; आरंभ म एक चत्र, अंत म एक वचार।
6. लेखन और समापन —
गाँव के मेले क ढोल जब दूर से सुनाई दे ती है तो लगता है कोई उत्सव बुला रहा है। पर ढोल के पास खड़े होकर
सु नए — कान के पद फटने लगते ह। ढोल वही है, बजाने वाला वही है; बदली है तो केवल दूरी। यही अनुभव हमारी
लोको क्त म बँधकर आया है — ‘दूर के ढोल सुहावने होते ह’।
दूरी ककशता को छान दे ती है और कल्पना को जगह दे दे ती है। दूर बैठा आदमी ढोल क आवाज़ म कसी घर का
ववाह दे ख लेता है, कोने म बैठ लजाई हुई दुल्हन दे ख लेता है। जो पास है, वह ब्योरे दे खता है — गम , भीड़,
थकान; जो दूर है, वह केवल चत्र दे खता है।
यही बात मनुष्य के समय के साथ भी है। जो अभी संसार के जीवन-संग्राम से दूर ह, उन्ह संसार का चत्र बड़ा ही
मनमोहक लगता है; और जो अपनी तरुणाई से दूर हट आए ह, उन्ह बीता हुआ समय सुखद लगता है। तरुण भ वष्य
के स्वप्न दे खता है, वृद्ध अतीत के — और दोन वतमान से असंतुष्ट रहते ह। दोन के स्वप्न सुखद इस लए ह क दोन
दूर के ढोल ह।
इस दूरी का लाभ भी है और हा न भी। लाभ यह क वह हम आशा दे ती है — जो दूर का सुंदर चत्र है, वही तो हम
चलने क श क्त दे ता है। हा न यह क दूरी का सुख हम वतमान से रूठना सखा दे ता है, और हम जो पास है उसे
तुच्छ मानने लगते ह। जो अपने आज को छोटा समझता है, वह अपने कल को भी बड़ा नह बना पाता।
इस लए ठ क रास्ता बीच का है — दूर के ढोल सुनते र हए, वे सपने दे ते ह; पर पास के ढोल से भा गए मत, वही सच
है। जस दन हम पास क ककशता को भी सह लेना सीख जाएँगे, उस दन दूर का सुहावनापन झूठा सुख नह ,
स ा उत्साह बन जाएगा।

ध्यान द जए: आरेख क छह अवस्थाएँ एक-दूसरे से जुड़ी ह, इसी लए वे एक ही कद्र से नकली रेखाओं के रूप म
दखाई गई ह — कोई सीढ़ नह है जस पर एक बार चढ़कर उतर जाएँ। सामग्री जुटाते-जुटाते वषय क सीमा बदल
सकती है, और लखते- लखते रूपरेखा।

Page 12 of 47

Page 14

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 अगर आपको नबंध लेखन का कोई और ढं ग बेहतर लगता है तो उसे ऐसे ही आरेख से दशाइए और बताइए क
आपको वह ढं ग क्य बेहतर लगता है?

हाँ, एक और ढं ग संभव है — जसे ‘पहले लखो, फर सँवारो’ कहा जा सकता है। इसम रूपरेखा पहले नह , पहले क े मसौदे के
बाद बनती है। यह ढं ग स्वयं इस पाठ के लेखक क क ठनाई से नकला है — “ नबंध लख लेने के बाद म उसका सारांश कुछ ही
शब्द म भले ही लख दूँ , पर नबंध लखने के पहले उसका सार दस-पाँच शब्द म कैसे लखा जाए?”

अन ुभव / कच्चा क्रम और काट-छाँट
पश्न मसौदा रूपरेखा और अंत

लौटकर िफर से िलखना — जब तक बात साफ़ न हो जाए

‘पहले लखो, फर सँवारो’ — इसम अं तम चरण से तीर लौटकर दूसरे चरण पर आता है, यानी लेखन एक चक्र है, सीधी रेखा नह ।

यह ढं ग मुझे बेहतर क्य लगता है —

1. ख़ाली काग़ज़ का डर मट जाता है। रूपरेखा बनाने बै ठए तो पहला वाक्य ही नह सूझता; लखना शुरू क जए तो वचार
अपने आप खुलने लगते ह। लेखक ने यही ईमानदारी से कहा है — रूपरेखा उससे तैयार ही नह होती।
2. सार लखने से पहले सोचना ज़रूरी है। सार तभी नकलता है जब बात पूरी बन चुक हो। इस लए रूपरेखा को क े मसौदे
के बाद रखना अ धक स्वाभा वक है।
3. यह मानटे न क पद्ध त से मेल खाता है। जो दे खा, सुना और अनुभव कया — वही पहले काग़ज़ पर आ जाए; क्रम बाद म
बैठाया जा सकता है। इसी से नबंध म “स ी अनुभू त” बची रहती है।
4. काट-छाँट अंत म होती है। इससे आचाय क वह शत भी पूरी हो जाती है क “ नबंध छोटा होना चा हए” — क्य क छोटा
करना लखे हुए को छाँटकर ही होता है, बना लखे नह ।

पर एक सावधानी: यह ढं ग तभी काम करता है जब काट-छाँट सचमुच क जाए। परीक्षा म समय कम होता है,
इस लए वहाँ पुस्तक वाला क्रम (पहले रूपरेखा) अ धक सुर क्षत है; घर पर लखते समय, जब सोचने-सुधारने का
समय हो, यह चक्र य ढं ग अ धक अच्छा फल दे ता है।

भाव- वस्तार — पृष्ठ 37

Page 13 of 47

Page 15

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ?
a g l AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास → वधा से संवाद → भाव- वस्तार
co m
em.
m as
वधा से सं वाद भाव- वस्तार

.co a g l
a s emम से चुनकर कुछ ऐसे और वाक्य नीचे दए गए ह। इन वाक्य का अपने शब्द म भाव- वस्तार क जए—
gl
पाठ
a
प्र.1
“जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर ह, उन्ह संसार का चत्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है।”

com
m . ag
se

l a
agहै, वह उसने अपनी कल्पना से बनाया है, अनुभव से नह । कल्पना का बनाया चत्र
भाव- वस्तार — जो युवा अभी जीवन क लड़ाई म उतरा ही नह है — जसने अभी न रोज़ी कमाई है, न घर चलाया है, न हार का
स्वाद चखा है — उसके सामने संसार का जो चत्र
सदा सुंदर होता है, क्य क उसम केवल वही रंग भरे जाते ह जो हम प्रय ह; उसम पसीना, प्रतीक्षा और असफलता के रंग नह होते।

co m
m.
इसी लए दूर से दे खने पर नौकरी, प्र स द्ध, स्वतंत्रता — सब कुछ बहुत मनमोहक जान पड़ता है। ज्य -ज्य वह पास जाता है, ब्योरे

m
दखने लगते ह और वही चत्र कठोर हो जाता है।
as e
.co a g l
a s em
l
पाठ से संबंध: यह वाक्य नबंध के कद्र य सूत्र का ही एक उदाहरण है — “दूर रहने से हम यथाथता क कठोरता का
a g अनुभव नह होता।” जैसे दूर से सुनी गई ढोल क ककशता मधुर लगती है, वैसे ही दूर से दे खा गया संसार सुंदर
s
लगता है। ‘जीवन-संग्राम’ शब्द ध्यान दे ने योग्य है — लेखक जीवन को संग्राम (युद्ध) कहता है, और युद्ध का स दय
m a
.co agl
केवल उसे दखता है जो मैदान से बाहर खड़ा है।

se m
g l a
a
यह दोष नह है: लेखक इस भोलेपन का उपहास नह करता। यही मनमोहक चत्र तरुण को साहस दे ता है, उसे

m
क्रां त का समथक बनाता है। य द सबको आरंभ म ही सारी क ठनाइयाँ दख जात , तो कोई नया काम शुरू ही न

. co
m
करता।

m as e
.co a g l
a s em
agl प्र.2 “मनुष्य जा त के इ तहास म कोई ऐसा काल ही नह हुआ, जब सुधार क आवश्यकता न हुई हो।”
se m
com g l a
m . a
ase
agl
भाव- वस्तार — मनुष्य का समाज कभी पूण नह रहा। हर युग म कुछ न कुछ ऐसा रहा है जसे बदलने क ज़रूरत महसूस हुई —
कभी रू ढ़, कभी अन्याय, कभी अंध वश्वास, कभी असमानता। इसी लए हर युग ने अपने सुधारक पैदा कए। सुधार कोई एक बार
पूरा हो जाने वाला काम नह है, वह लगातार चलने वाली प्र क्रया है, क्य क जीवन बदलता है तो उसके साथ नए दोष भी जन्म लेते

co m
.
ह।

e m
m l as
.co a g
m नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद, महात्मा गांधी — और तुरंत जोड़ दे ता है क इन नाम पर “सुधारक क
लेखक का तक कैसे चलता है: वह पहले प्रमाण दे ता है — बुद्धदे व, महावीर स्वामी, नागाजुन, शंकराचाय, कबीर,

l a se
ag
c
गणना समाप्त नह होती। सुधारक का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव म होता है।” फर वह सबसे मा मक बात कहता

m .
है — “जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए ह और उन सुधार का फर नव सुधार कया जाता है।” यानी सुधार
m a s e
. co agl
का चक्र कभी रुकता नह । और इसी से वह नष्कष नकालता है — “तभी तो यह जीवन प्रग तशील माना गया
e m
as
है।”

a g l
आज के उदाहरण —

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 14 of 47

Page 16

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

एक समय बा लकाओं का वद्यालय जाना ही बड़ा सुधार था; आज प्रश्न यह है क वे कस स्तर क शक्षा तक पहुँच।
खेती क पैदावार बढ़ाने के लए रासाय नक खाद एक सुधार माना गया था; आज उसी से मट्ट क हा न दख रही है और जै वक
खाद नया सुधार बन रहा है।

नष्कष: इस लए ‘हमारे समय म सब ठ क था’ या ‘अब सब ठ क हो गया’ — दोन बात अधूरी ह। जागरूक समाज
वही है जो हर पीढ़ म अपने दोष पहचानकर उन्ह सुधारता रहे।

प्र.3 “आज जो तरुण ह, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न दे खगे।”

भाव- वस्तार — आज जो युवा हर पुरानी बात को चुनौती दे ता है, नया चाहता है और वतमान से असंतुष्ट है, कल वही बूढ़ा होगा।
तब उसका आज ‘अतीत’ बन चुका होगा और वह उसी को सुनहरा कहकर याद करेगा — “हमारे समय म तो…”। जस पीढ़ से वह
आज भड़ रहा है, ठ क उसी क जगह पर एक दन वह स्वयं खड़ा मलेगा, और तब उसके सामने नए तरुण का एक और दल होगा,
जो भ वष्य का स्वप्न दे खेगा।

यह वाक्य नबंध म क्य आया है: लेखक इसे सा हत्य के उदाहरण से सद्ध करता है — “ हद म प्रग तशील
सा हत्य का नमाण हो रहा है। उसके नमाता यह समझ रहे ह क उनके सा हत्य म भ वष्य का गौरव न हत है। पर
कुछ ही समय के बाद उनका यह सा हत्य भी अतीत का स्मारक हो जाएगा।” यानी हर नई चीज़ एक दन पुरानी हो
जाती है — यह कसी क हार नह , समय का नयम है।

इसका संदेश —

वनम्रता। जो आज नया है, कल पुराना होगा। इस लए पुराने का उपहास करना अपने ही भ वष्य का उपहास करना है।
सहानुभू त। बड़ क ‘हमारे ज़माने म’ वाली बात अब चढ़ाने वाली नह , समझ म आने वाली लगती है — वे भी कभी हमारी
ही जगह खड़े थे।
नरंतरता। लेखक ठ क इसी के बाद नबंध का अं तम वाक्य लखता है — “दोन के ही स्वप्न सुखद होते ह, क्य क दूर के
ढोल सुहावने होते ह।” यानी तरुण और वृद्ध शत्रु नह , एक ही यात्रा के दो पड़ाव ह।

प्र.4 “ नबंध छोटा होना चा हए। छोटा नबंध बड़े क अपेक्षा अ धक अच्छा होता है।”

भाव- वस्तार — नबंध क सफलता उसक लंबाई से नह , उसक कसावट से नापी जाती है। छोटे नबंध म लेखक को हर वाक्य
तौलना पड़ता है, इस लए उसम फ़ालतू बात नह आ पाती और आरंभ से अंत तक एक ही सूत्र बना रहता है। लंबा नबंध लखते-
लखते बखरने लगता है — वषय से हटकर दूसरी बात आ जाती ह, वही बात दुहराई जाने लगती है और पढ़ने वाले का मन उचट
जाता है। पाठ म आचाय का कारण भी यही दया गया है — “बड़े नबंध म रचना क सुंदरता नह बनी रह सकती।”

Page 15 of 47

Page 17

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

‘रचना क सुंदरता’ का अथ: सुंदरता का मतलब सजावट नह , अनुपात है — जैसे भू मका बहुत लंबी और
नष्कष दो पं क्तय का न हो; जैसे हर बात अपनी सही जगह पर हो। छोट रचना म यह अनुपात सँभालना आसान
है। यही बात इस पाठ पर भी लागू होती है — ‘क्या लखूँ?’ स्वयं एक छोटा नबंध है, फर भी उसम गा डनर,
आचाय, मानटे न, खुसरो, ढोल, तरुण-वृद्ध और सुधार — सब आ गए ह, क्य क एक भी वाक्य व्यथ नह है।

पर सावधानी: ‘छोटा’ का अथ ‘अधूरा’ नह है। जस नबंध म वषय क मुख्य बात ही न आ पाए, वह छोटा नह ,
कमज़ोर है। लेखक ने इस कथन को स्वीकार करते हुए एक शरारती कारण भी बताया है — “इस कथन को मान
लेने म ही मेरा लाभ है।” क्य क उसे दो घंट म दो नबंध दे ने थे! यह उसक आत्मपरक शैली का सुंदर उदाहरण है।

मापदं ड: लख लेने के बाद अपने नबंध से कोई एक अनुच्छेद हटाकर दे खए। य द हटाने पर भी बात पूरी बनी रहती
है, तो वह अनुच्छेद वहाँ आवश्यक नह था। यही ‘छोटा नबंध’ बनाने क सबसे सरल कसौट है।

मेरा अनुभव — पृष्ठ 38
अभ्यास → वधा से संवाद → मेरा अनुभव

वधा से सं वाद अपनी बात

प्र.1 इस नबंध म लेखक को दो वषय (‘दूर के ढोल सुहावने होते ह’ और ‘समाज-सुधार’) पर नबंध लखने थे।
पछली कक्षाओं म आपने भी बहुत से वषय पर अनुच्छेद, संवाद और नबंध लखे ह। आपको कन वषय पर
लखना सरल या क ठन लगा और क्य ?

यह प्रश्न आपके अपने अनुभव का है, इस लए उत्तर हर वद्याथ का अलग होगा। पर एक अच्छा उत्तर तीन बात ज़रूर बताता है —
कौन-सा वषय, सरल/क ठन क्य , और उससे क्या सीखा।

वषय कस तरह का प्रायः सरल लगता है, क्य क… प्रायः क ठन लगता है, क्य क…

अनुभव से जुड़ा (मेरा वद्यालय, सामगी पहले से मन में है; योरे अपने
ब् —
वषा का एक दन, मेरी पहली रेल आप याद आते है।ं यही मानटेन वाली
यात्रा) प ित है।
द्ध

बहुत बड़ा और बहसतलब — िवषय की सीमा तय करना किठन है। ले खक की भी यही
(समाज-सुधार, वज्ञान: वरदान िशकायत थी — िजस पर “बड़ े-बड़ े िव ों में भी िवरोध है”, उसे
ज्ञ

या अ भशाप) पाँच पेज में कै से िलखा जाए।

बहुत छोटा या एक-पं क्त वाला — बात दो वा यों में समा त हो जाती है; उसे फै लाने के िलए
क् प्

(दूर के ढोल सुहावने होते ह) उदाहरण और जीवन-दृ ि ट जोड़ नी पड़ ती है।
ष्

तथ्य-आधा रत (जल संरक्षण, ढाँचा साफ़ रहता है — कारण, आँकड़े और नाम याद रखने पड़ते ह; बना तैयारी के लखना
भारत का अंत रक्ष कायक्रम) प्रभाव, उपाय। क ठन है।

Page 16 of 47

Page 18

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

नमूना उत्तर: “मुझे ‘मेरी दाद ’ और ‘हमारे गाँव का मेला’ जैसे वषय पर लखना सबसे सरल लगा, क्य क उनके
लए मुझे कुछ याद नह करना पड़ा — जो दे खा था, वही लख दया। दाद क सुबह क चाय, मेले म गुब्बारे वाले
क आवाज़, ढोल क गूँज — ये सब चत्र मन म तैयार थे। इसके उलट ‘भ्रष्टाचार’ और ‘ वज्ञान: वरदान या
अ भशाप’ पर लखना क ठन लगा। कारण यह था क वषय बहुत बड़ा था और मुझे यह तय ही नह हो पा रहा था
क कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ रुकूँ; मेरे अपने उदाहरण भी कम थे, इस लए वही घसी- पट बात लखनी पड़ ।
‘समय का महत्त्व’ बीच का वषय था — वचार तो थे, पर वे मेरे नह , सुने हुए थे, इस लए नबंध स ा नह लगा।
इससे मने यह सीखा क क ठन वषय को भी सरल बनाने का एक ही उपाय है — उसे अपने कसी अनुभव
से जोड़ लेना। जब मने ‘भ्रष्टाचार’ को अपने मोहल्ले के राशन क दुकान वाली घटना से जोड़कर लखा, तो वही
नबंध अपने आप बहने लगा।”

पाठ से जो ड़ए: लेखक क क ठनाई भी यही थी — वषय उसके चुने हुए नह थे, दूसर के दए हुए थे। उसने उन्ह
अपने ढं ग से दे खकर, अपने अनुभव और अपनी यु क्त से हल कया। वषय हमारा न हो, तो भी दृ ष्ट हमारी हो
सकती है — यही इस पाठ क सबसे उपयोगी सीख है।

वषय से संवाद — पृष्ठ 38
अभ्यास → वषय से संवाद

वषय से सं वाद जानकारी एकत्र

प्र.1 नबंध म बुद्धदे व, महावीर स्वामी, नागाजुन, शंकराचाय, कबीर, नानक आ द कई महान व्य क्तय के नाम आए
ह। इनके वषय म जानकारी एक त्रत करके संक्षेप म बताइए क इन्ह ने अपने समय म समाज के लए क्या-क्या
काय कए।

नबंध म लेखक ने इन्ह ‘सुधारक’ कहकर गनाया है — और साथ म राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद तथा महात्मा गांधी को भी।
नीचे इन सबका सं क्षप्त प रचय दया गया है।

Page 17 of 47

Page 19

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

सुधारक समय समाज के लए कया गया काय

बुद्धदे व लगभग दुःख और उसके नवारण का माग बताया — चार आय सत्य और अष्टां गक माग। कमकांड, पशुब ल
(गौतम बुद्ध) 563–483 और जन्म के आधार पर ऊँच-नीच का वरोध कया। संघ म सब वग के लए द्वार खोले और उपदे श
ई.पू. जनता क भाषा पा ल म दए, संस्कृत म नह — यह अपने आप म बड़ा सामा जक सुधार था।

महावीर लगभग जैन धम के 24व तीथकर। अ हसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचय और अप रग्रह — इन पाँच व्रत पर बल
स्वामी 599–527 दया। ‘अनेकांतवाद’ (हर बात को अनेक दृ ष्टय से दे खना) का सद्धांत दया, जो अस हष्णुता का बड़ा
ई.पू. उपचार है। उपदे श जनभाषा प्राकृत म दए।

नागाजुन लगभग बौद्ध दाश नक; माध्य मक (शून्यवाद) दशन के प्रवतक। ‘मध्यमकशास्त्र’ उनक प्र सद्ध कृ त है। उन्ह ने
दूसरी तक और ववेक क परंपरा को आगे बढ़ाया और अंध वश्वास के स्थान पर प्रश्न पूछने क दृ ष्ट द । नालंदा
शताब्द से भी उनका नाम जुड़ा है।

शंकराचाय लगभग अद्वै त वेदांत के प्रवतक — “सब म एक ही आत्मा है” का सद्धांत, जो ऊँच-नीच के भेद पर सीधी चोट
788–820 करता है। शास्त्राथ क परंपरा को जी वत कया और चार मठ ( ंगेरी, पुरी, द्वारका, बदरी/ज्यो तमठ)
ई. क स्थापना कर उत्तर-द क्षण को एक सूत्र म बाँधा।

कबीर 15व नगुण भ क्त के संत-क व। हदू और मुसलमान दोन के बाहरी आडंबर , जा त-भेद, मू त-पूजा के दखावे
शताब्द और पं डत-मुल्ला के अ धकार पर नभय होकर प्रहार कया। सधुक्कड़ी भाषा म साखी, सबद और रमैनी
लखकर सामान्य जन को दशन क भाषा द ।

गुरु नानक 1469– सख धम के प्रवतक। “एक ओंकार” का संदेश दया, जा त-भेद और छु आछू त का वरोध कया। संगत
1539 (सब मलकर बैठ) और पंगत/लंगर (सब एक पं क्त म बैठकर खाएँ) क परंपरा चलाकर समानता को
केवल उपदे श नह , दै नक व्यवहार बना दया। ‘ करत करो, नाम जपो, वंड छको’ — मेहनत करो, नाम
लो, बाँटकर खाओ — उनका सूत्र है।

राजा 1772– ‘आधु नक भारत के जनक’। सती प्रथा के वरुद्ध अ भयान चलाया, जससे 1829 म उस पर रोक लगी।
राममोहन राय 1833 वधवा- ववाह और स्त्री- शक्षा के पक्षधर रहे; ब्रह्म समाज क स्थापना क और आधु नक शक्षा तथा
समाचार-पत्र क स्वतंत्रता के लए काम कया।

स्वामी 1824– आय समाज (1875) के संस्थापक। “वेद क ओर लौटो” का नारा दया। मू त-पूजा, बाल- ववाह और
दयानंद 1883 जा त-भेद का वरोध कया; स्त्री- शक्षा और वधवा- ववाह का समथन कया। सत्याथ प्रकाश उनक
सरस्वती प्र सद्ध पुस्तक है।

महात्मा गांधी 1869– सत्य और अ हसा को राजनी त का साधन बनाया। स्वतंत्रता-संग्राम का नेतृत्व करते हुए छु आछू त-
1948 नवारण, ग्राम-स्वावलंबन, स्वदे शी, खाद , बु नयाद शक्षा और हदू-मु स्लम एकता के लए काम कया।
हद स्वराज और सत्य के प्रयोग उनक कृ तयाँ ह।

इस सूची का संदेश: ध्यान द जए, ये नाम ढाई हज़ार वष म फैले हुए ह — बुद्ध से गांधी तक। लेखक ने इन्ह एक
साथ इसी लए रखा है क यह सद्ध हो जाए क “मनुष्य जा त के इ तहास म कोई ऐसा काल ही नह हुआ, जब
सुधार क आवश्यकता न हुई हो।” और वह तुरंत जोड़ दे ता है क गनती यह समाप्त नह होती — “सुधारक का
दल नगर-नगर और गाँव-गाँव म होता है।”

Page 18 of 47

Page 20

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ?
a g l AglaSem · NCERT Solutions

. com
आस-पास और भी ऐसे व्य क्त और सं ाएँ ह जो स्त्री- शक्षा, पयावरण, असमानता, वशेषem
प्र.2 नबंध म उ ल्ल खत महान व्य क्तय ने अपने द्वारा कए गए काय से समाज को एक नई दशा दखाई। हमारे

m a s
l और ल खए।
o आ द के लए काय करते ह। ऐसे व्य क्तय , सं ाओं के वषय म पताagलगाइए
आवश्यकता समूह

. cजन)
em
( दव्यांग

l a s
ag

com
यह खोजने का काम है, इस लए उत्तर आपके अपने क्षेत्र से भी जुड़ना चा हए। नीचे कुछ जाने-माने नाम दए गए ह — इन्ह प ढ़ए,
और फर अपने नगर या गाँव के दो नाम इसी ता लका म जो ड़ए।
e m . ag
g l as
क्षेत्र व्य क्त / सं ा
a काय

स्त्री- शक्षा सा वत्रीबाई फुले और ज्यो तबा फुले
co m
सन् 1848 म पुणे म लड़ कय के लए वद्यालय खोला। सा वत्रीबाई

e m.
भारत क पहली म हला श क्षकाओं म गनी जाती ह; उन्ह ने

m l as
.co
वधवाओं और वं चत बा लकाओं क शक्षा के लए वरोध सहकर भी

a g
m
काम कया।

l a se
a g बेट बचाओ, बेट पढ़ाओ / कस्तूरबा गांधी
बा लका वद्यालय
सरकारी योजनाएँ, जो बा लकाओं के नामांकन, ठहराव और आवासीय
शक्षा के लए चलाई जाती ह।

m ड म पेड़ से लपटकर उन्ह कटने से बचाया — “क्या ह जंगल a s
m .co उत्तराखं agl
पयावरण सुंदरलाल बहुगुणा और गौरा दे वी ( चपको

a se
आंदोलन) के उपकार? मट्ट , पानी और बयार।”

ag l
राजद्र सह (तरुण भारत संघ) राजस्थान म जोहड़ बनवाकर सूखी न दय को फर बहाया; इसी लए

m
‘जलपुरुष’ कहलाते ह।

. co
e m
as
जादव पायग (‘फ़ॉरेस्ट मैन’) असम म ब्रह्मपुत्र के रेतीले टापू पर अकेले पेड़ लगाकर वष म पूरा
m l
.co a g
जंगल खड़ा कर दया।

s m /
eअसमानता
a
gl सामा जक न्याय
डॉ. भीमराव आंबेडकर छु आछू त के वरुद्ध संघष; सं वधान- नमाण म समानता, स्वतंत्रता और
a बंधुता के मूल्य क प्र तष्ठा। “ श क्षत बनो, संग ठत रहो, संघष करो।”

se m
बाबा आमटे (आनंदवन)
com
कुष्ठरो गय के लए महाराष्ट्र म ‘आनंदवन’ बसाया, जहाँ वे उपचार के
g l a
m . a
e
साथ सम्मान और काम भी पाते ह।

s
दव्यांगजन
a gla
नेशनल एसो सएशन फ़ॉर द ब्लाइंड दृ ष्टबा धत तथा अन्य दव्यांग वद्या थय के लए ब्रेल पुस्तक, बोलती
(NAB), ब्लाइंड पीपल्स एसो सएशन पुस्तक, प्र शक्षण और रोज़गार।

om
(अहमदाबाद), समथनम ट्रस्ट (बगलुरु)

. c
a s em
com agl
अरु णमा सन्हा दुघटना म एक पैर खोने के बाद एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली दव्यांग

m . म हला; अब दव्यांग खला ड़य को प्र श क्षत करती ह।

ase
agl c
m .
m a s e
e m . co agl
g l as
a

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 19 of 47

Page 21

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

अपने आस-पास कैसे खोज — तरीक़ा:

1. वद्यालय के प्रधानाचाय या स्थानीय समाचार-पत्र के संवाददाता से पू छए क आपके क्षेत्र म कौन-सी संस्थाएँ
काम कर रही ह।
2. ग्राम पंचायत/नगरपा लका कायालय म स्वयं सहायता समूह और म हला मंडल क सूची मल जाती है।
3. जस व्य क्त या संस्था को चुन, उसके बारे म पाँच बात ल खए — नाम, कब से काम कर रहे ह, कस समस्या
पर, अब तक क्या बदला, और आप कैसे जुड़ सकते ह।
4. य द संभव हो तो एक छोट भटवाता (इंटरव्यू) क जए और उनके अपने शब्द ज्य -के-त्य ल खए — नबंध म
वही सबसे जीवंत लगते ह।

नमूना उत्तर ( ानीय): “हमारे कस्बे म ‘नई करण’ नाम क एक छोट संस्था है, जसे दो अध्या पकाओं ने
मलकर शुरू कया था। वे प्र त दन शाम को मज़दूर क बस्ती म जाकर उन ब को पढ़ाती ह जो दन म माता-
पता के साथ काम पर चले जाते ह। सात वष म बस्ती के अठारह ब े वद्यालय म नय मत हो गए ह और दो
लड़ कयाँ पहली बार दसव तक पहुँची ह। संस्था के पास न भवन है, न वेतन — बस एक तरपाल, कुछ चटाइयाँ
और मुहल्ले के दान क पुस्तक। म और मेरे दो मत्र र ववार को वहाँ जाकर छोटे ब को गनती और अक्षर सखाते
ह।”

प्र.3 आपको ‘समाज-सुधार’ करने का अवसर मले तो आप क्या-क्या सुधार करना चाहगे और कैसे करना चाहगे?
ल खए।

अच्छे उत्तर क शत यह है क हर सुधार के साथ उसे करने का तरीक़ा भी बताया जाए। केवल “म भ्रष्टाचार मटाऊँगा” लखना
उत्तर नह है; “कैसे” बताना उत्तर है।

Page 20 of 47

Page 22

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

कौन-सा सुधार क्य ज़रूरी कैसे करूँगा/करूँगी

हर ब ा व ालय ब स्तय म आज भी बहुत ब े काम मोहल्ले का सवक्षण करके नाम-सूची बनाना; माता- पता से मलकर
म पर जाते ह या बीच म पढ़ाई छोड़ दे ते बात करना; वद्यालय के बाद एक-दो घंटे का न:शुल्क ‘सहायता वग’
ह। चलाना, ता क पछड़ा ब ा हार न माने।

बे टय के साथ घर के भीतर का भेद बाहर के भेद से अपने घर से आरंभ; कक्षा म ‘हमारी बहन क्या पढ़ना चाहती ह’ वषय
बराबरी बड़ा होता है — खाना, खेल, पढ़ाई पर चचा; पंचायत/ वद्यालय क द वार पर बा लका- शक्षा योजनाओं क
और नणय, सब म। जानकारी लगाना।

स्वच्छता और बीमारी का सबसे सस्ता इलाज सफ़ाई गीले-सूखे कचरे के अलग डब्बे; वद्यालय म खाद का ग ा (जै वक
कचरा प्रबंधन है। खाद); हर श नवार आधे घंटे का श्रमदान; प्ला स्टक क जगह कपड़े का
थैला।

अंध वश्वास के झाड़-फूँक और अफ़वाह आज भी जान वज्ञान-प्रदशनी म ‘चमत्कार के पीछे का वज्ञान’ दखाना; साँप काटने,
वरुद्ध ववेक ले लेती ह। बुख़ार और ग्रहण जैसी बात पर डॉक्टर को बुलाकर बातचीत कराना।

दव्यांग सा थय के बाधा उनक अक्षमता म नह , हमारी वद्यालय म रप और चौड़े दरवाज़े क माँग रखना; कक्षा म आगे क
लए सुगमता व्यवस्था म होती है। सीट; सामग्री बड़े अक्षर म; ‘सहपाठ मत्र’ क व्यवस्था।

पानी और पेड़ गरता भूजल और कटते पेड़ अगली वषाजल संचयन क टं क ; ‘एक वद्याथ , एक पेड़’ और उसक दे खभाल
पीढ़ का प्रश्न ह। का र जस्टर; नल क टपकन ठ क कराना।

नमूना उत्तर: “य द मुझे अवसर मले तो म सबसे पहले अपने मोहल्ले म बीच म पढ़ाई छोड़ दे ने वाले ब पर काम
करूँगा। म अकेले भाषण नह दूँ गा, क्य क भाषण से कोई सुधार नह होता। म पहले घर-घर जाकर पता लगाऊँगा
क कतने ब े वद्यालय नह जाते और क्य नह जाते — कह कारण फ़ स है, कह छोटे भाई-बहन क दे खभाल,
कह दूरी। फर उन्ह कारण के अनुसार उपाय करूँगा: वद्यालय से छात्रवृ त्त क जानकारी दलाऊँगा, शाम का
पढ़ाई-वग चलाऊँगा और महीने म एक बार अ भभावक क बैठक कराऊँगा जसम ब का काम दखाया जाए। म
मानता ँ क सुधार ऊपर से आदे श दे कर नह , साथ खड़े होकर होता है — जैसे गुरु नानक ने लंगर चलाकर
समानता सखाई, कहकर नह ।”

पाठ क चेतावनी भी याद र खए: लेखक ने लखा है — “जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए ह।” इस लए
कसी भी सुधार को अं तम सत्य मानकर मत च लए। हर कुछ वष म यह दे खते रहना चा हए क जो उपाय हमने
कया, वह अब भी काम कर रहा है या नई क ठनाई बन गया है।

प्र.4 भारतीय ज्ञान सा हत्य म अनेक ान पर नै तक, आध्या त्मक और व्यावहा रक जीवन म संतुलन क बात क
गई है। इस वषय पर अपने शक्षक के साथ मलकर चचा क जए।

चचा को दशा दे ने के लए यह ढाँचा काम आएगा — पहले तीन शब्द का अथ साफ़ क जए, फर भारतीय ज्ञान-परंपरा से
उदाहरण ली जए, और अंत म अपने दनचया पर लागू क जए।

Page 21 of 47

Page 23

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

पक्ष अथ असंतुलन का प रणाम

नै तक सही-ग़लत का ववेक — सत्य, अ हसा, केवल नी त क बात करने वाला व्य क्त य द व्यवहार म असमथ हो,
ईमानदारी, दूसर के प्र त करुणा। तो उपदे शक बनकर रह जाता है।

आध्या त्मक भीतर क शां त, आत्म- चतन, अपने से बड़ी कसी केवल आध्या त्मक बने रहने पर कतव्य और प रवार क उपेक्षा हो
बात से जुड़ाव। सकती है।

व्यावहा रक रोज़ी-रोट , पढ़ाई, कौशल, समय-प्रबंधन, केवल व्यावहा रक रहने पर मनुष्य लाभ-हा न क मशीन बन जाता
सांसा रक दा यत्व। है।

भारतीय ज्ञान-परंपरा से उदाहरण —

पुरुषाथ चतुष्टय — धम, अथ, काम, मोक्ष। यही संतुलन का सबसे पुराना सूत्र है। अथ (आजी वका) और काम (इच्छाएँ)
व जत नह ह; शत केवल यह है क वे धम (नै तकता) के भीतर रह और अंततः मोक्ष क ओर ले जाएँ।
गीता — “योगः कमसु कौशलम्” (कम म कुशलता ही योग है) तथा नष्काम कम का सद्धांत। काम छोड़ना नह , फल क
आस क्त छोड़नी है — यह आध्यात्म और व्यवहार को एक साथ जोड़ दे ता है।
तरुक्कुरल ( तरुवल्लुवर) — इसके तीन भाग ही अरम् (धम), पोरुल् (अथ) और इन्बम् (काम) ह — अथात् संतुलन उसक
रचना-योजना म ही है।
पंचतंत्र और हतोपदे श — कहा नय के माध्यम से नी त और व्यवहार-बु द्ध दोन सखाते ह; इनका लक्ष्य ही ‘नी तशास्त्र’ के
साथ ‘लोक-व्यवहार’ है।
वदुर नी त और चाणक्य नी त — राज-काज और गृहस्थी जैसे व्यावहा रक वषय को नै तक कसौट पर रखकर दे खती ह।
आश्रम व्यव ा — ब्रह्मचय (सीखना), गृहस्थ (कमाना और दा यत्व नभाना), वानप्रस्थ और संन्यास (स पना और मुक्त होना)
— जीवन के हर पड़ाव के लए अलग संतुलन।
प्राथना-वाक्य — “सव भवन्तु सु खनः, सव सन्तु नरामयाः” — इसम ‘सुख’ (व्यावहा रक), ‘ नरामय’ (शारी रक) और सबके
लए मंगल-कामना (नै तक-आध्या त्मक) एक साथ ह।

चचा कैसे चलाएँ ( शक्षक के साथ):

1. कक्षा को तीन दल म बाँ टए — नै तक, आध्या त्मक, व्यावहा रक। हर दल अपने पक्ष के समथन म दो उदाहरण
और एक भारतीय ग्रंथ क उ क्त लाए।
2. फर एक स्थ त द जए — जैसे, “परीक्षा म मत्र नक़ल के लए कह रहा है”, या “घर क आ थक तंगी म पढ़ाई
छोड़ने का दबाव है” — और पू छए क तीन पक्ष क्या सलाह दगे।
3. अंत म सब मलकर ल खए क संतुलन कसी एक को चुनने का नाम नह , तीन को उनक सही जगह दे ने का
नाम है।

इस पाठ से जोड़: ‘क्या लखूँ?’ स्वयं संतुलन का उदाहरण है। लेखक न शास्त्र क सारी शत मान लेता है, न उन्ह
ठु कराता है; वह दोन के बीच अपना व्यावहा रक रास्ता नकाल लेता है — मानटे न क स ाई और खुसरो क
चतुराई को मलाकर। यही संतु लत दृ ष्ट है।

सृजन — पृष्ठ 38–39

Page 22 of 47

Page 24

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास → सृजन

सृ ज न ले ख न

प्र.1 ‘दूर के ढोल सुहावने होते ह’ एक लोको क्त है। लोक म प्रच लत लोक प्रय वाक्य या वाक्यांश को लोको क्त कहते
ह, जो कसी वशेष अथ या सीख को व्यक्त करता है। लोको क्त भाषा को समृद्ध करती है तथा वचार को
प्रभावशाली ढं ग से व्यक्त करने म सहायता करती है। यह लोग के अनुभव, वश्वास और मूल्य को दशाती है।
आपने यह लोको क्त भी सुनी होगी— ‘आम के आम गुठ लय के दाम’। अब आप इस लोको क्त और ‘जै वक
खाद क न म त म हमारा प्रयास’ वषय को मलाकर एक सं क्षप्त लेख तैयार क जए।

पहले लोको क्त का अथ — ‘आम के आम गुठ लय के दाम’ का अथ है — एक ही काम से दोहरा लाभ मलना। आम खाकर
स्वाद भी मला और उसक गुठ लयाँ बेचकर पैसे भी मल गए; कुछ भी व्यथ नह गया। जै वक खाद पर यह लोको क्त ठ क बैठती
है, क्य क वहाँ भी जसे हम ‘कचरा’ कहकर फक दे ते ह, वही खाद बनकर लौट आता है।

नमूना लेख — “आम के आम, गुठ लय के दाम : जै वक खाद क न म त म हमारा प्रयास”
हमारे वद्यालय क रसोई से रोज़ एक बाल्ट छलके नकलते थे, बगीचे से सूखे पत्त का ढे र लगता था और सब कुछ
पीछे के ग े म जलाकर समाप्त कर दया जाता था। धुआँ उठता था और बात वह ख़त्म हो जाती थी। पछले सत्र म
हमारी वज्ञान- श क्षका ने कक्षा म एक प्रश्न रखा — “जो चीज़ मट्ट से आई है, उसे मट्ट म लौटाने के बजाय हम
जला क्य दे ते ह?” उसी प्रश्न से हमारा ‘जै वक खाद’ का काम शुरू हुआ।
हमने वद्यालय के कोने म डेढ़ मीटर लंबा, एक मीटर चौड़ा और आधा मीटर गहरा ग ा खोदा। उसम परत-दर-परत
सामग्री डाली — नीचे सूखे पत्ते और भूसा, उस पर रसोई के गीले छलके और स ब्ज़य क कतरन, फर थोड़ा गोबर
और ऊपर मट्ट क हल्क परत। हर सप्ताह हम उसे लकड़ी से पलट दे ते और ज़रूरत भर पानी छड़कते, ता क ढे र
न बहुत गीला रहे, न सूखा। ध्यान यह रखा क प्ला स्टक, काँच या धातु का कोई टु कड़ा भीतर न जाए। लगभग ढाई
महीने म वह ढे र काली, भुरभुरी, मट्ट जैसी महक वाली जै वक खाद म बदल गया। दूसरे चरण म हमने कचुओं क
सहायता से वम कंपोस्ट भी बनाया, जो और भी जल्द तैयार हुआ।
अब लाभ ग नए और दे खए क लोको क्त कैसे सच होती है। पहला लाभ — वद्यालय का कचरा समाप्त हो गया,
न धुआँ, न बदबू, न म क्खयाँ। दूसरा लाभ — बगीचे के लए खाद ख़रीदनी नह पड़ी; टमाटर, मेथी और गदे क
क्या रयाँ पहले से अच्छ हुईं। तीसरा लाभ — बची हुई खाद हमने छोटे -छोटे थैल म भरकर अ भभावक- दवस पर
बेची और उससे मले पैसे से पुस्तकालय के लए कताब आईं। जो कचरा फका जा रहा था, उसी ने पहले पौधे दए
और फर पुस्तक — सचमुच ‘आम के आम, गुठ लय के दाम’।
इसका एक लाभ ऐसा भी है जो दखता नह । रासाय नक खाद पैदावार तो बढ़ा दे ती है, पर धीरे-धीरे मट्ट क जान
नकाल लेती है; जै वक खाद मट्ट को जी वत रखती है — उसम कचुए और सूक्ष्म जीव बने रहते ह, पानी रुकता है
और अगली फ़सल के लए ज़मीन तैयार रहती है। यहाँ भी दोहरा लाभ है — आज क फ़सल भी, और आने वाले
वष क ज़मीन भी।
हमारा प्रयास बहुत छोटा है — एक ग ा, कुछ पत्ते और थोड़ा-सा धैय। पर उसने हम एक बड़ी बात सखा द : प्रकृ त
म कुछ भी कचरा नह होता, केवल ग़लत जगह पर रखी हुई चीज़ होती है। य द हर घर अपने रसोई-कचरे से
खाद बनाने लगे, तो नगर का आधा कूड़ा वह समाप्त हो जाए और गमल -खेत को मुफ़्त खाद मल जाए। इससे
अच्छा सौदा और क्या होगा — आम के आम, गुठ लय के दाम!

Page 23 of 47

Page 25

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ?
a g l AglaSem · NCERT Solutions

. com
लेख लखते समय क्या-क्या रखना चा हए: (i) लोको क्त का अथ पहले साफ़ क जए; (ii) वषय से उसका मेल
दm
सद्ध क जए — केवल शीषक म लोको क्त चपका दे ना काफ़ नह ; (iii) प्र क्रया के ठोस ब्योरे e
m a s
l है; (v) अंत म
जए (ग ा, परत,
co गनाते समय ‘दोहरा लाभ’ स्पष्ट दखाइए, क्य क लोको क्त क आत्माagवही
समय); (iv) .लाभ
emको दोहराकर लेख को गोल क जए।
लोकोsक्त
a
agl

co m
em . ag
as
प्र.2 “जब ढोल के पास बैठे हुए लोग के कान के पद फटते रहते ह, तब दूर कसी नद के तट पर संध्या समय, कसी

a g l
दूसरे के कान म वही शब्द मधुरता का संचार कर दे ते ह।” आपने पढ़ा क ढोल के पास बैठे व्य क्त क अपेक्षा दूर
बैठे व्य क्त के लए ढोल क आवाज़ का अनुभव भन्न है। अपने अनुभव के आधार पर कसी ऐसी घटना का

m
उल्लेख अपनी डायरी म क जए, जब कसी वस्तु, व्य क्त या सं ा के वषय म दूर से आपका अनुमान कुछ और

co
m.
रहा हो, पर नकट से आपका अनुभव बल्कुल अलग रहा हो।

m as e
.co a g l
se m
g l a
a
डायरी-लेखन म क्या-क्या होना चा हए —

ऊपर त थ, दन और ान; भाषा ‘म’ म, बोलचाल जैसी सहज।

om a s
. c agl
पहले वह दूर वाला अनुमान — आप क्या सोचते थे और क्य सोचते थे।
फर वह घटना जसने पास ले जाकर सच दखायाm
s e — दृश्य, ध्व न और अपने मन क हलचल के ब्योरे स हत।
a पाठ क पं क्त जोड़ देने से डायरी और साथक हो जाती है।
अंत म नष्कष — इससे मने क्या सीखा। lयहाँ
ag
डायरी स ी होनी चा हए, सजाई हुई नह । जो सचमुच बीता, वही ल खए।

co m
m .
m as e
.co a g l
se m
g l a
a
se m
com g l a
m . a
ase
agl

co m
m .
m as e
.co a g l
se m
g l a
a c
m .
m a s e
e m . co agl
g l as
a

co m
m .
m ase
.co


a g l Page 24 of 47

Page 26

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

नमूना उत्तर (डायरी):
14 अगस्त, बुधवार · रात 9:30 · घर
आज मुझे अपनी एक पुरानी राय बदलनी पड़ी, और अच्छा लगा क बदलनी पड़ी।
हमारे मोहल्ले के आ ख़री छोर पर एक वृद्धाश्रम है। म वहाँ से रोज़ साइ कल से नकलता था। बाहर से वह मुझे
हमेशा उदास जगह लगती थी — ऊँची द वार, बंद फाटक, अंदर से कभी-कभी कसी के खाँसने क आवाज़। मने
मन ही मन तय कर रखा था क यह वह जगह है जहाँ लोग छोड़ दए जाते ह, और वहाँ केवल रोना-धोना होता होगा।
म उधर से जल्द -जल्द नकल जाता था।
आज स्वतंत्रता दवस क तैयारी के सल सले म हमारी कक्षा को वह कायक्रम करने भेजा गया। भीतर घुसते ही मेरा
बनाया हुआ चत्र टू टने लगा। आँगन म तुलसी और गुड़हल के गमले थे, एक कोने म दो दादा जी शतरंज पर झुके हुए
थे और उन्ह हमारे आने क ख़बर तक नह हुई। रसोई से मूँगफली क चक्क क गंध आ रही थी। एक दाद जी ने
मुझसे मेरा नाम पूछा, फर बताया क वे चालीस वष तक वद्यालय म ग णत पढ़ाती रही ह, और मेरी कॉपी माँगकर
उन्ह ने वह सवाल दो पं क्तय म हल कर दया जस पर म परस से अटका था। जब हमने ‘वंदे मातरम्’ गाया तो वे
सब भी साथ गाने लगे — कसी का स्वर काँप रहा था, पर सब गा रहे थे।
लौटते समय मुझे लगा क दुःख वहाँ है ज़रूर — कुछ आँख म मने प्रतीक्षा भी दे खी। पर वहाँ केवल दुःख नह है;
वहाँ हँसी है, दनचया है, अपनापन है, और बहुत सारा अनुभव है जसे सुनने वाला कोई नह मलता। मेरा अनुमान
दूर से बना था, इस लए अधूरा था।
आज कक्षा म पढ़ा हुआ वाक्य बार-बार याद आ रहा है — “दूर रहने से हम यथाथता क कठोरता का अनुभव
नह होता।” मेरे साथ तो उलटा हुआ — दूर से मुझे केवल कठोरता दखी थी, पास आकर उसके भीतर क गरमाहट
दखी। शायद बात एक ही है: दूर से हम जो दे खते ह, वह वस्तु नह , अपनी कल्पना दे खते ह। अब से कसी जगह या
व्य क्त के बारे म राय बनाने से पहले म एक बार पास जाकर दे खूँगा। कल फर जाऊँगा — दाद जी ने कहा है क वे
मुझे त्रकोण म त भी समझा दगी।

ध्यान र खए: यह नमूना है, आपका उत्तर नह । आप अपनी कसी स ी घटना पर ल खए — कसी नए वद्यालय,
कसी अनजान सहपाठ , कसी अस्पताल, कसी गाँव या कसी खेल के बारे म बनी हुई राय, जो पास जाकर बदल
गई हो। जो अपना अनुभव होगा, उसम ब्योरे अपने आप आएँगे — और ब्योरे ही कसी डायरी को स ा बनाते ह।

व्याकरण क बात : समास — पृष्ठ 39–40

Page 25 of 47

Page 27

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास → भाषा से संवाद → व्याकरण क बात (समास)

भाषा से सं वाद व्याकरण

प्र.1 नबंध म ऐसे अनेक सामा सक शब्द आए ह। उन शब्द को ढूँ ढ़कर उनका समास वग्रह क जए और समास का
नाम ल खए। आपक समझ के लए एक उदाहरण ता लका म दया गया है। (उदाहरण — सामा सक पद :
नबंधशास्त्र, समास वग्रह : नबंध का शास्त्र, समास का नाम : तत्पुरुष समास) पाठ से अन्य उदाहरण चुनकर
अपनी लेखन पु स्तका म ल खए।

ता लका इस प्रकार भरी जाएगी। पहली पं क्त पुस्तक क द हुई है; शेष सब इसी पाठ से चुने गए ह।

Page 26 of 47

Page 28

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

सामा सक समास वग्रह समास का पाठ म कहाँ
पद नाम

नबंधशास्त्र नबंध का शास्त्र त पु ष समास
त् रु “ नबंधशास्त्र के आचाय क सम्म त” (पुस्तक का
उदाहरण)

नबंध-रचना नबंध क रचना त पु ष समास
त् रु “ नबंध-रचना का रहस्य समझाना पड़ेगा”

समाज-सुधार समाज का सुधार त पु ष समास
त् रु “अ मता का आग्रह है क म समाज-सुधार पर
लखूँ”

अतीत-गौरव अतीत का गौरव त पु ष समास
त् रु “वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक”

वश्वकोश वश्व का कोश त पु ष समास
त् रु “यहाँ न तो वश्वकोश है”

पुस्तकालय पुस्तक + आलय = पुस्तक का आलय त पु ष समास
त् रु “पुस्तकालय म जाकर इस वषय का अनुसंधान कर
(घर) लेता”

ववाहोत्सव ववाह + उत्सव = ववाह का उत्सव त पु ष समास
त् रु “ कसी के ववाहोत्सव का चत्र अं कत कर लेता
है”

मनोभाव मन के भाव त पु ष समास
त् रु “अपने मनोभाव को व्यक्त करने के लए”

बाल्यावस्था बाल्य + अवस्था = बाल्य क अवस्था त पु ष समास
त् रु “जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट
आए ह”

लोको क्त लोक + उ क्त = लोक क उ क्त त पु ष समास
त् रु “‘दूर के ढोल सुहावने होते ह’ एक लोको क्त है”

जीवन-संग्राम जीवन रूपी संग्राम कमधारय “संसार के जीवन-संग्राम से दूर ह”
समास

नव-वधू नव (नई) है जो वधू कमधारय “ कसी ल ाशील नव-वधू क कल्पना”
समास

महात्मा महान् है जो आत्मा कमधारय “स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी”
समास

ल ाशील ल ा है शील (स्वभाव) जसका — वह बहुवीिह समास “ कसी ल ाशील नव-वधू क कल्पना”
(नव-वधू)

प्रग तशील प्रग त है शील जसका — वह (जीवन) बहुवीिह समास “तभी तो यह जीवन प्रग तशील माना गया है”

प्र तभावान प्र तभा है जसम — वह (व्य क्त, अथात् बहवु ीिह समास “अमीर खुसरो प्र तभावान थे”
खुसरो)

पंच-पात्र पाँच पात्र का समूह ि गु समास
द्व लेखक-प रचय — नबंध-संग्रह पंच-पात्र

त्रवेणी तीन वे णय (धाराओं) का समाहार ि गु समास
द्व लेखक-प रचय — कहानी-संग्रह त्रवेणी

Page 27 of 47

Page 29

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

सामा सक समास वग्रह समास का पाठ म कहाँ
पद नाम

हास्य-व्यंग्य हास्य और व्यंग्य ं समास
द्वद्व “अनमेली एक प्रकार क हास्य-व्यंग्यपूण काव्य
शैली है”

जाँच-पड़ताल जाँच और पड़ताल ं समास
द्वद्व शब्द-संपदा — ‘अनुसंधान’ का अथ

आस-पास आस और पास ं समास
द्वद्व “हमारे आस-पास और भी ऐसे व्य क्त और संस्थाएँ
ह”

नगर-नगर प्रत्येक नगर म अ ययीभाव
व् “सुधारक का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव म होता
समास है”

गाँव-गाँव प्रत्येक गाँव म अ ययीभाव
व् वही पं क्त
समास

यथाथ यथा + अथ = अथ के अनुसार (जैसा अ ययीभाव
व् “दूर रहने से हम यथाथता क कठोरता का अनुभव
सचमुच है) समास नह होता”

पहचानने का सरल तरीक़ा (छह भेद, छह प्रश्न):

तत्पुरुष — क्या बीच म कोई परसग (का, के, क , से, के लए, म) छपा है और दूसरा पद प्रधान है? → हाँ, तो
तत्पुरुष। जैसे नबंधशास्त्र = नबंध का शास्त्र।
कमधारय — क्या पहला पद दूसरे का वशेषण है, या दोन म उपमेय-उपमान का संबंध है? जैसे नव-वधू (नई
वधू), जीवन-संग्राम (जीवन रूपी संग्राम)।
द्वगु — क्या पहला पद संख्यावाची है और अथ समूह का है? जैसे त्रवेणी, पंच-पात्र।
बहु ी ह — क्या अथ इन दोन पद म नह , कसी तीसरे म है? जैसे ल ाशील — अथ ‘ल ा’ या ‘शील’
नह , वह स्त्री है जसम ल ा है।
द्वं द्व — क्या दोन पद बराबर ह और बीच म ‘और’ लग जाता है? जैसे जाँच-पड़ताल।
अव्ययीभाव — क्या पूरा पद क्रया- वशेषण जैसा काम कर रहा है, या वह पुनरुक्त है? जैसे यथाथ, नगर-नगर।

एक सावधानी: जीवन-संग्राम को य द आप ‘जीवन का संग्राम’ मान तो वह तत्पुरुष भी कहा जा सकता है। पर पाठ
का भाव ‘जीवन रूपी संग्राम’ का है — यानी रूपक — इस लए यहाँ कमधारय अ धक ठ क बैठता है। ऐसे शब्द म
वग्रह ही यह तय करता है क समास कौन-सा है, इस लए वग्रह हमेशा ल खए।

ध्यान द जए: इस नबंध म द्वगु समास का कोई उदाहरण नह मलता, इस लए ऊपर दोन उदाहरण पाठ के आरंभ
म दए गए लेखक-प रचय से लए गए ह। अपनी लेखन-पु स्तका म लखते समय यह भी बता द जए क उदाहरण
कहाँ से लया है — यही अच्छ अध्ययन-आदत है।

उपसग एवं प्रत्यय — पृष्ठ 41

Page 28 of 47

Page 30

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ?
a g l AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास → भाषा से संवाद → व्याकरण क बात (उपसग एवं प्रत्यय)
co m
e m.
m as
भाषा से सं वाद व्याकरण

.co a g l
a s em
gl
नबं ध से उपसग और प्रत्यय वाले शब्द ढूँ ढ़कर अपनी लेखन-पु स्तका म ल खए।
a
प्र.1

o m
c ag

.
m है (दुर् + बोध = दुब ध), और प्रत्यय शब्द के अंत म (सुधार + क =
s
पहले नयम दोहरा ली जए — उपसग शब्द के आरंभ म लगता
सुधारक)। दोन अपने आप, अकेले प्रयोग नह होते।la
e
(क) उपसग वाले शब्द ( नबंध से) —
ag

co m
em.
m l as
m .co a g
l a se
a g
m a s
m .co agl
l a se
a g

co m
m .
m as e
.co a g l
se m
g l a
a
se m
com g l a
m . a
ase
agl

co m
m .
m as e
.co a g l
se m
g l a
a c
m .
m a s e
e m . co agl
g l as
a

co m
m .
m ase
.co


a g l Page 29 of 47

Page 31

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

शब्द उपसग मूल शब्द अथ-संकेत

दुब ध / दुब धता दुर् बोध क ठनाई से समझ आने वाला

अना द अन् आद जसका आरंभ न हो

अस्पष्टता अ स्पष्टता अभाव — स्पष्ट न होना

अज्ञ अ ज्ञ जो जानता न हो

असंतोष अ संतोष संतोष का अभाव

प्रवाह प्र वाह आगे बहना

प्रग तशील प्र गत आगे क ग त

प्रयत्न प्र यत्न वशेष प्रयास

अनुभव / अनुभू त अनु भव / भू त पीछे -पीछे , साथ-साथ होना

अनुसंधान अनु संधान खोज म पीछे लगना

अनुसरण अनु सरण पीछे चलना

वरोध / ववेचना व रोध / वेचना वशेष या वपरीत भाव

समावेश सम् आवेश साथ-साथ आना, शा मल होना

सम्म त / सं चत सम् म त / चत मलकर, एक साथ

आवेग / आदे श / आग्रह आ वेग / दे श / ग्रह ओर, तक, पूणता

उ त / उत्पन्न / उल्लास उत् स्थत / पन्न / लास ऊपर उठना

प रश्रम पर श्रम चार ओर से, पूरी तरह

नबंध न बंध भली-भाँ त बँधा हुआ

नमाण नर् माण पूरी तरह गढ़ना

प्रतीत / प्र तभा प्र त इत / भा ओर, प्रत्येक, सामने

(ख) प्रत्यय वाले शब्द ( नबंध से) —

Page 30 of 47

Page 32

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

शब्द मूल शब्द प्रत्यय क्या बना

सुधारक सुधार क करने वाला (कतृवाचक)

लेखक लेख क लखने वाला

नबंधकार / व्यंग्यकार नबंध / व्यंग्य कार रचने वाला

समथक / संरक्षक समथ / संरक्ष क समथन/रक्षा करने वाला

क ठनाई क ठन आई भाववाचक संज्ञा

क ठनता / मधुरता / यथाथता / दुब धता / क ठन / मधुर / यथाथ / दुब ध / ता भाववाचक संज्ञा
अस्पष्टता अस्पष्ट

गंभीरता (गांभीय) गंभीर ता / य गुण का भाव

ल ाशील / प्रग तशील ल ा / प्रग त शील वैसा स्वभाव रखने वाला

प्र तभावान प्र तभा वान जसम वह गुण हो

मनमोहक मनमोह क मन मोह लेने वाला

मान सक / सामा जक / सा ह त्यक / ता कक मानस / समाज / सा हत्य / तक इक संबंध बताने वाला
वशेषण

स्मरणीय स्मरण ईय जसे स्मरण कया जाए

सुहावने सुहाव ना अच्छा लगने वाला

ल पबद्ध लप बद्ध ल प म बँधा हुआ

पहचान का सूत्र: शब्द को बीच से पक ड़ए — पहले मूल शब्द खो जए (बोध, सुधार, क ठन, प्रग त)। जो उसके
पहले जुड़ा है वह उपसग, जो बाद म जुड़ा है वह प्रत्यय। कुछ शब्द म दोन एक साथ होते ह — जैसे दुब धता = दुर्
(उपसग) + बोध (मूल) + ता (प्रत्यय) और अस्पष्टता = अ + स्पष्ट + ता।

प्र.2 नीचे दए गए वाक्य को उ चत उपसग या प्रत्यय लगाकर पूरा क जए— • नबंध लखना बड़ी ______ (क ठन…)
क बात है। • वतमान से दोन को ______ (…संतोष) होता है। • वाक्य म कुछ ______ (…स्पष्ट…) भी चा हए,
क्य क यह ______ (…स्पष्ट…) या ______ (…बोध…) गांभीय ला दे ती है।

पूरे वाक्य इस प्रकार बनगे —

Page 31 of 47

Page 33

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

पूरा वाक्य भरा गया शब्द कैसे बना

नबंध लखना बड़ी क ठनाई क बात है। किठनाई क ठन + आई (प्रत्यय) — वशेषण से भाववाचक संज्ञा बनी।
(‘क ठनता’ भी शुद्ध है, पर वाक्य के प्रवाह म ‘क ठनाई’ ही
स्वाभा वक लगता है।)

वतमान से दोन को असंतोष होता है। असंतोष अ (उपसग) + संतोष — अभाव का अथ। पाठ क पं क्त भी यही है
— “वतमान से दोन को असंतोष होता है।”

वाक्य म कुछ अस्पष्टता भी चा हए, क्य क अ प टता,
स् ष् अस्पष्टता = अ + स्पष्ट + ता; दुब धता = दुर् + बोध + ता। दोन म
यह अस्पष्टता या दुब धता गांभीय ला दे ती अ प टता,
स् ष् उपसग और प्रत्यय, दोन लगे ह।
है। दुब धता

पाठ से मलान क जए: तीसरा वाक्य नबंध म ज्य -का-त्य आया है — “भाषा म अस्पष्टता भी चा हए, क्य क
यह अस्पष्टता या दुब धता गांभीय ला दे ती है।” पर यह लेखक क अपनी राय नह , व्यंग्य है। वह दखा रहा है क
वद्वत्ता का दखावा करने वाले लोग जान-बूझकर क ठन लखते ह — जैसे श्रीहष और सेनाप त ने कया। स्वयं
ब ी क भाषा इस पूरे नबंध म सरल है। अभ्यास म शब्द भरते समय व्याकरण ठ क र खए, पर बात का व्यंग्य भी
सम झए।

ऐसे रक्त ान भरने का तरीक़ा: कोष्ठक म दया गया मूल शब्द दे खए, फर वाक्य म उसक ज़रूरत दे खए —
संज्ञा चा हए, वशेषण चा हए या उलटा अथ चा हए। ‘क ठन’ वशेषण है पर वाक्य म ‘क बात’ से पहले संज्ञा
चा हए, इस लए ‘आई’ प्रत्यय लगा; ‘संतोष’ संज्ञा है पर वहाँ उलटा अथ चा हए, इस लए ‘अ’ उपसग लगा।

Page 32 of 47

Page 34

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

प्र.3 नीचे दए गए शब्द म उपसग या प्रत्यय लगाकर नए शब्द बनाकर ल खए। आपक सहायता के लए एक
उदाहरण नीचे दया गया है। — मधुर, सुधार, सुंदर, ग त, समाज। उदाहरण— मधुर → मधुरता, मधुरमय, सुमधुर

मूल शब्द नए शब्द कैसे बने

मधुर मधुरता, मधुरमय, सुमधुर मधुर + ता; मधुर + मय; सु + मधुर
(उदाहरण)

सुधार सुधारक , सुधारवादी, सुधारा मक , कु सुधार
त् सुधार + क (करने वाला); सुधार + वाद ; सुधार + आत्मक; कु + सुधार
( बगाड़ने वाला सुधार)

सुंदर सुंद रता, सुंद रतम, असुंद र, सुंद री सुंदर + ता; सुंदर + तम (सबसे अ धक); अ + सुंदर; सुंदर + ई
(स्त्री लग)

गत गितशील , गितमान, पगित, दुगित, सद् गित, ग त + शील; ग त + मान; प्र + ग त; दुर् + ग त; सत् + ग त; अ + ग त
अगित

समाज सामािजक , समाजवाद , समाजसे वी, समाज + इक (‘स’ का ‘सा’ हो गया); समाज + वाद; समाज + सेवी; अ
असामािजक , समाजशा स्त्र + सामा जक; समाज + शास्त्र

अब इन्ह वाक्य म दे खए —

राजा राममोहन राय भारत के महान सुधारक थे।
ताजमहल क सुंदरता दे खकर आँख ठहर जाती ह।
समय कभी नह रुकता, वह सदा ग तशील रहता है।
कूड़ा सड़क पर फकना एक असामा जक काम है।
दाद क लोरी म ऐसी मधुरता थी क ब ा तुरंत सो गया।

एक बात ध्यान र खए: उपसग-प्रत्यय लगाते समय शब्द का रूप कभी-कभी बदल जाता है — समाज →
सामा जक, सत् + ग त → सद्ग त, दुर् + ग त → दुग त। यह ध्व न-प रवतन (सं ध) है, भूल नह । इस लए नया शब्द
बनाकर एक बार बोलकर दे खए — य द वह भाषा म सचमुच चलता है, तभी ल खए।

भाव एक शब्द अनेक — पृष्ठ 41

Page 33 of 47

Page 35

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ?
a g l AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास → भाषा से संवाद → भाव एक शब्द अनेक
co m
e m.
m as
भाषा से सं वाद शब्द क बात

.co a g l
a s em
gl
इस पाठ म अनेक ऐसे शब्द का प्रयोग कया गया है जनके अथ परस्पर मलते-जुलते ह। उदाहरण के लए,
a
प्र.1
वचार-मनन- चतन या सुहावने-मधुर-मनमोहक। पाठ म से ऐसे शब्द ढूँ ढ़ए तथा वाक्य प्रयोग के द्वारा उनके अथ

m
स्पष्ट क जए।

. co ag
se m
l a
agऔर वाक्य-प्रयोग —

पाठ से चुने गए ऐसे शब्द-समूह, उनका साझा भाव

co m
em.
m l as
m .co a g
l a se
a g
m a s
m .co agl
l a se
a g

co m
m .
m as e
.co a g l
se m
g l a
a
se m
com g l a
m . a
ase
agl

co m
m .
m as e
.co a g l
se m
g l a
a c
m .
m a s e
e m . co agl
g l as
a

co m
m .
m ase
.co


a g l Page 34 of 47

Page 36

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

शब्द-समूह (पाठ से) साझा भाव वाक्य-प्रयोग

िवचार – मनन – िचंतन (पुस्तक सोचना इस वचार पर मने रात भर मनन कया, और सुबह तक चतन ने रास्ता
का उदाहरण) दखा दया।

सुहावने – मध रु – मनमोहक जो अच्छा लगे दूर के ढोल सुहावने लगते ह, उनक ध्व न मधुर हो जाती है और पूरा दृश्य
(पुस्तक का उदाहरण) मनमोहक बन जाता है।

उमंग – स्फू ित – आवेग भीतर उठने वाला वेग मंच पर जाते समय मन म उमंग थी, शरीर म ू त थी, और बोलते-बोलते
ऐसा आवेग आया क लखा हुआ भाषण भूल ही गया।

िवज्ञ – आचाय – िवद्वान जानने वाला इस वषय पर वज्ञ लोग म मतभेद है; हमारे आचाय क राय अलग है और
नगर के दूसरे वद्वान उससे सहमत नह ।

सम्मित – मत – राय कसी के सोचने का पहले मने आचाय क सम्म त जानी, फर अपने मत्र का मत पूछा, और
पक्ष अंत म अपनी राय बनाई।

अनुस ंध ान – खोज – जाँच- ढूँ ढ़ना य द समय होता तो पुस्तकालय म अनुसंधान कर लेता; अब तो जो खोज हो
पड़ताल सक , वही है — बाक़ जाँच-पड़ताल बाद म।

किठनता – किठनाई – ग त्ु थी अड़चन प्रश्न क क ठनता म समझता ँ; मेरी क ठनाई यह है क इसक गु ी कह
से खुलती ही नह ।

दुब ध – अस्पष्ट – गूढ़ जो सहज समझ न क वता दुब ध थी, उसका अथ अस्पष्ट रहा, पर शक्षक ने उसका गूढ़ भाव
आए खोलकर रख दया।

पद्धित – पणाली – माग करने का ढं ग मानटे न क पद्ध त सरल है; इसी प्रणाली से लखने पर मुझे भी माग मल
गया।

उल्लास – आनंद – पमोद हष ववाह के घर म उल्लास था, ब के मन म आनंद था और आँगन म प्रमोद
क धूम मची थी।

कक श – कठोर – कटु जो कड़ा और अ प्रय ढोल क ककश ध्व न पास वाल को कठोर लगती है, पर दूर वाले को वह
लगे कटु प्रतीत ही नह होती।

कोलाहल – शोर – हल्ला बहुत लोग क मली- बारात के कोलाहल म कसी क बात सुनाई नह दे रही थी; इतना शोर था
जुली आवाज़ क माँ क आवाज़ भी हल्ले म डू ब गई।

यथाथ – सत्य – वास्तिवक जो सचमुच है दूर से दखने वाला चत्र सुंदर था, पर यथाथ कुछ और नकला; सत्य सामने
आया तो मने उसक वास्त वक स्थ त समझी।

अनुभिू त – अनुभव – संवेद ना भीतर होने वाला बोध अच्छे नबंध म लेखक क स ी अनुभू त रहती है; उसका अनुभव ही पढ़ने
वाले के मन म संवेदना जगाता है।

तरुण – युवा – नवयुवक जवान तरुण भ वष्य के स्वप्न दे खते ह; हर युवा बदलाव चाहता है, और यही
नवयुवक समाज को आगे ले जाते ह।

िवषाद – उदासी – अवसाद मन का भारीपन वदाई के समय नव-वधू के मन म वषाद था; उसक आँख क उदासी
दे खकर सबका मन अवसाद से भर गया।

Page 35 of 47

Page 37

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

पर पयायवाची पूरी तरह एक-से नह होते: यही इस अभ्यास क असली सीख है। ‘मधुर’ और ‘मनमोहक’ दोन
अच्छे लगने वाले ह, पर मधुर कान के लए है और मनमोहक मन के लए। इसी तरह ‘कोलाहल’ म भीड़ का भाव है
और ‘कलरव’ म मधुरता का — इसी लए लेखक ने ढोल के साथ ‘आनंद का कलरव’ लखा, ‘कोलाहल’ नह ,
जब क घर के लए ‘कोलाहल से पूण घर’ लखा। शब्द चुनते समय यही बारीक़ अंतर दे खना चा हए।

ग त व धयाँ — पृष्ठ 42
अभ्यास → भाषा से संवाद → ग त व धयाँ

ग त व धयाँ भाषा से सं वाद

प्र.1 “खीर पकाई जतन से, चरखा दया चला। आया कुत्ता खा गया, तू बैठ ढोल बजा॥” पाठ म अमीर खुसरो क यह
प्र सद्ध अनमेली आई है। अनमेली एक प्रकार क हास्य-व्यंग्यपूण काव्य शैली है जसम असंगत वाक्य एवं
वपरीत तय को जोड़कर मनोरंजन कया जाता है। अमीर खुसरो आम लोग के मन को बहलाने व हँसाने के
उ े श्य से ऐसे प्रयोग कया करते थे। आप उनके द्वारा र चत अन्य अनमे लय , मुक रय व पहे लय का शक्षक क
सहायता से ढूँ ढ़कर संकलन क जए।

पहले तीन रूप का अंतर समझ ली जए — तभी संकलन ठ क-ठ क बनेगा।

रूप पहचान पाठ/परंपरा से उदाहरण

अनमेली असंगत, आपस म न मलने वाली बात जोड़कर हास्य पैदा करना। “खीर पकाई जतन से, चरखा दया चला।
(अन मली) हर पं क्त अलग वषय क , फर भी छं द एक। आया कुत्ता खा गया, तू बैठ ढोल बजा॥” — इसी
म चार स्त्रय के चार वषय (खीर, चरखा, कुत्ता,
ढोल) आ गए।

मुकरी (कह- सखी अपनी सहेली से बात करती है। तीन पं क्तय म ऐसा वणन “वो आवे तब शाद होय। उस बन दूजा और न
मुकरी) क लगे कसी प्रयजन क बात हो रही है, और अंत म वह ‘मुकर’ कोय।
जाती है — “ना स ख, …!” मीठे लाग वा के बोल। ऐ स ख साजन? ना स ख
ढोल॥”

पहेली कसी वस्तु का वणन बना नाम लए, ता क सुनने वाला अनुमान “एक थाल मोती से भरा, सबके सर पर औंधा
लगाए। उत्तर एक ही होता है। धरा।
चार ओर वह थाली फरे, मोती उससे एक न
गरे॥” — उत्तर : आकाश

दो-सुख़ने दो अलग-अलग प्रश्न, जनका उत्तर एक ही शब्द से मल जाए — प्रश्न — “गोश्त क्य न खाया? डोम क्य न गाया?”
शब्द-चातुय का खेल। उत्तर — “गला न था।” (एक ही ‘गला’ दोन का
उत्तर।)

Page 36 of 47

Page 38

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

संकलन कैसे बनाएँ — तरीक़ा:

1. एक पतली कॉपी ली जए और उसे चार भाग म बाँ टए — अनमेली, मुकरी, पहेली, दो-सुख़ने।
2. सामग्री तीन जगह से मलेगी — (i) वद्यालय के पुस्तकालय क ‘अमीर खुसरो क पहे लयाँ’ जैसी पुस्तक, (ii)
घर के बड़े-बुजग, जन्ह ये मौ खक रूप से याद ह, (iii) शक्षक क सहायता से इंटरनेट/एन.सी.ई.आर.ट . क
सामग्री।
3. हर रचना के साथ तीन बात ल खए — रचना, उसका उत्तर/अथ, और कस रूप क है।
4. दाद -नानी से पूछना मत भू लए — मुक रयाँ और पहे लयाँ आज भी सबसे अ धक मौ खक परंपरा म जी वत ह,
पुस्तक म नह । जो आपको सुनाई जाए, उसे उन्ह के शब्द म ल खए और नीचे बताने वाले का नाम ल खए।
5. अंत म कक्षा म ‘पहेली- दवस’ र खए — एक दल पहेली पूछे, दूसरा उत्तर दे ।

खुसरो कौन थे: अमीर खुसरो (सन् 1253–1325) दल्ली के फ़ारसी और हदवी (खड़ी बोली क आरं भक रूप)
के क व थे, हज़रत नज़ामु न औ लया के शष्य। उन्ह ने सा हत्य को दरबार से नकालकर आम लोग क ज़बान
तक पहुँचाया — इसी लए उनक पहे लयाँ और मुक रयाँ आज सात सौ वष बाद भी गाँव-गाँव म जी वत ह। पाठ म
लेखक ने उन्ह ‘प्र तभावान’ कहा है, और उनक यु क्त उधार लेकर अपने दो वषय को एक नबंध म समेट लया।

ध्यान रहे: मौ खक परंपरा क रचनाओं के अलग-अलग क्षेत्र म थोड़े अलग पाठ मलते ह, और कुछ रचनाएँ खुसरो
के नाम से जुड़ जाती ह। इस लए संकलन म जहाँ से आपने रचना ली है, वह ोत भी लख द जए — यही ईमानदार
अध्ययन का ढं ग है।

प्र.2 कक्षा म ‘युवा और वृद्ध— दो पी ढ़य के पीढ़ गत अंतर’ पर वाद- ववाद का आयोजन क जए। वाद- ववाद के
नयम के लए आप कक्षा 7 और 8 क पाठ्यपुस्तक मल्हार के कुछ पाठ का अभ्यास दे खकर अपनी प्र तयो गता
के नयम नधा रत कर सकते ह।

(क) आयोजन के नयम —

1. कक्षा दो पक्ष म बँटे — पक्ष (युवा दृ ष्ट सही है) और वपक्ष (वृद्ध क दृ ष्ट सही है)। हर पक्ष म 3–4 वक्ता।
2. हर वक्ता को दो मनट; अंत म एक-एक मनट का खंडन (rebuttal)।
3. हर तक के साथ एक उदाहरण या प्रमाण दे ना अ नवाय — बना उदाहरण का तक नह गना जाएगा।
4. व्य क्त पर नह , वचार पर बोलना है। कसी का उपहास करने पर अंक कटगे।
5. एक अध्यक्ष (समय और अनुशासन) और तीन नणायक। अंक — वषय-ज्ञान 10, तक-श क्त 10, भाषा और उ ारण 5,
हाव-भाव 5।
6. अंत म पाँच मनट का ‘ मलन-सत्र’ — दोन पक्ष मलकर बताएँ क कन बात पर वे सहमत ह।

(ख) दोन पक्ष के तक —

Page 37 of 47

Page 39

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

पक्ष : युवा दृ ष्ट वपक्ष : वृद्ध दृ ष्ट

“तरुण क्रां त के समथक होते ह” — हर सुधार युवा साहस से “वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक” — जो सद्ध हो चुका है, उसे सँभालना भी
शुरू हुआ है। सती प्रथा हो या बा लका- शक्षा, बदलाव पहले उतना ही ज़रूरी है। हर पुरानी बात रू ढ़ नह होती; कुछ बात परखी हुई
नई पीढ़ ने माँगा। बु द्ध होती ह।

नई तकनीक, नई भाषा और नए काम युवा जल्द सीखते ह; अनुभव वह चीज़ है जो कसी कक्षा म नह मलती। संकट के समय
समय बदल रहा है तो कौशल भी बदलने चा हए। ठहरकर सोचना बड़ से ही सीखा जाता है।

वतमान से असंतोष ही प्रग त क जड़ है — पाठ कहता है क जल्दबाज़ी का नणय महँगा पड़ता है। भाव- वस्तार वाली पं क्त यही कहती
इसी क्षोभ से “वतमान काल सदै व सुधार का काल बना रहता है — युवा “त्व रत नणय” चाहते ह, वृद्ध “अनुभव और परंपरागत ढं ग”
है।” पर वश्वास करते ह।

युवा भ वष्य म जएँगे, इस लए भ वष्य का नणय उनक बात भ वष्य अतीत क न व पर ही खड़ा होता है; जड़ काटकर पेड़ ऊँचा नह
सुनकर होना चा हए। कया जा सकता।

नमूना उत्तर — समापन वक्तव्य (दोन पक्ष के बाद): “आदरणीय अध्यक्ष महोदय, दोन पक्ष क बात सुनकर
मुझे लगता है क यह प्र तयो गता कसी एक के जीतने से पूरी नह होगी। हमारे पाठ ‘क्या लखूँ?’ म लेखक ने बहुत
सुंदर बात कही है — तरुण को भ वष्य उज्ज्वल दखता है और वृद्ध को अतीत सुखद, क्य क दोन अपनी-अपनी
दूरी से दे ख रहे ह; और ‘दूर के ढोल सुहावने होते ह।’ दोन के स्वप्न स े ह और दोन अधूरे भी। इससे भी बड़ी
बात लेखक यह कहता है — ‘आज जो तरुण ह, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न दे खगे।’ यानी हम आज
जस पीढ़ से बहस कर रहे ह, कल हम स्वयं वही ह गे। इस लए मेरा नवेदन है क युवा से साहस ली जए और वृद्ध
से ववेक; नणय तेज़ हो, पर अनुभव क कसौट पर कसा हुआ हो। यही दोन पी ढ़य क स ी जीत होगी।
धन्यवाद।”

वाद- ववाद और वातालाप का अंतर: वाद- ववाद म आपको अपने पक्ष के लए बोलना है, पर दूसरे पक्ष को सुनना
भी उतना ही आवश्यक है — खंडन तभी अच्छा होता है जब आपने सामने वाले क बात ठ क-ठ क समझी हो। बहस
जीतने का सबसे अच्छा तरीक़ा ऊँची आवाज़ नह , पक्का उदाहरण है।

भाषा संगम — पृष्ठ 42

Page 38 of 47

Page 40

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ?
a g l AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास → भाषा से संवाद → भाषा संगम
co m
e m.
m as
भाषा सं ग म भारतीय भाषाएँ

.co a g l
“se
m
gl a नबंध लखने के पहले उसक रूपरेखा बना लेनी चा हए।” नीचे ‘ नबंध’ शब्द के लए सं वधान क आठव
a
प्र.1
अनुसूची म स म्म लत कुछ भारतीय भाषाओं म प्रयुक्त शब्द क सूची द गई है। — नबंध ( हद ); नबंधः

om
(संस्कृत); नबंध (पंजाबी); मजमून (उदू); मजमून (कश्मीरी); मज्मूनु, नबंधु ( स ी); नबंध (मराठ ); नबंध

. c ag
(गुजराती); नबंध (क कणी); नबंध (नेपाली); नबंध, प्रबंध (बांग्ला); नबंध-रचना (अस मया); नबंध, वाड़्डू
mलुगु); क टुरै (त मल); उपन्यासम् (मलयालम); लेख, प्रबंध
(म णपुरी); प्रबंध, रचना (ओ ड़आ); व्यासमुe(ते
s
a
agl‘ नबंध’ शब्द को कसी और भाषा म भी जानते ह तो उस भाषा म भी
(कन्नड़)। — इनके अ त रक्त य द आप
ल खए।

co m
em.
as

m l
.co
पुस्तक क सूची के अ त रक्त ये शब्द भी जोड़े जा सकते ह —
m a g
l a se
a g भाषा ‘ नबंध’ के लए टप्पणी
शब्द

m a s
मै थली / भोजपुरी / अवधी / िनबंध
m .co हद प्रदेश क बो लय म तत्सम रूप ही चलता है। agl
छत्तीसगढ़
l a se
डोगरी िनबंa
ध
g —

co m
िनबंध (िलिप के
m .
बोडो / संताली संताली म ऑल- चक ल प म लखा जाता है।

om
अनुस ार)
l a se
अंग्रेज़.ीc agअथ है ‘प्रयत्न, आज़माइश’।
sem
च essai से आया, जसका
a
essay

agl च essai मानटे न क पुस्तक का नाम ही Essais (1580) था — इसी से यह वधा
का नाम बना।
se m
com उदू, कश्मीरी और स ी म यही शब्द आया है। g l a
m .) a
ase
फ़ारसी / अरबी मज़ मून (‫ﻣﻀﻤﻮ ن‬

a gl
सूची से क्या दखता है — यह दे खना ही असली अभ्यास है:

co m
m
तीन प रवार साफ़ दखते ह। उत्तर-भारत क भाषाओं म संस्कृत से आया नबंध/प्रबंध चलता है; उदू-
.
o m l a se
कश्मीरी- स ी म फ़ारसी-अरबी से आया मज़मून; और द क्षण क भाषाओं म उनके अपने शब्द — तेलुगु

m .c व्यासमु, त मल क टुरै, मलयालम उपन्यासम्, कन्नड़ लेख/प्रबंध। ag
as e
agl
शब्द के भीतर अथ छपा है। ‘ नबंध’ = न + बंध, यानी ‘भली-भाँ त बँधा हुआ’ — यह बात पाठ म ही बताई
गई है। त मल ‘क टु रै’ म भी क टु का अथ ‘बाँधना’ और उरै का ‘कथन’ है — यानी बँधा हुआ कथन। दो
.c
s e m
m a
अलग भाषा-प रवार, पर एक ही कल्पना!

e m . co
एक ही शब्द के दो अथ। मलयालम का ‘उपन्यासम्’ हद के ‘उपन्यास’ जैसा दखता है, पर वहाँ उसका अथ
agl
g l as
‘ नबंध/प्रस्तु त’ है। इसी लए कसी भाषा का शब्द केवल रूप दे खकर नह , अथ पूछकर समझना चा हए।
a

com
m .
m ase
.co


a g l Page 39 of 47

Page 41

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 उपयुक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा म भी ल खए। (वाक्य — “ नबंध लखने के पहले उसक रूपरेखा बना लेनी
चा हए।”)

यह काम हर वद्याथ को अपनी मातृभाषा म करना है — घर म जो भाषा बोली जाती है, उसी म। सहायता के लए कुछ भाषाओं म
यह वाक्य नीचे दया गया है; इन्ह दे खकर अपनी भाषा का वाक्य बनाइए और घर के बड़ से जँचवा ली जए।

भाषा वाक्य

हद नबंध लखने के पहले उसक रूपरेखा बना लेनी चा हए।

संस्कृत िनब धं िलिखतुं पूव ं त य परे खा रचनीया।
न् स् रू

मराठ िनबंध िलिह यापूव याची परे षा तयार क न यावी.
ण् त् रू रू घ्

गुजराती નબંધ લખતાં પહે લાં તે ન ી રૂપરે ખ ા બનાવી લે વી જોઈએ .
पंजाबी ਿਨਬੰਧ ਿਲਖਣ ਤੋਂ ਪਿਹਲ ਉਸ ਦੀ ਰ ੂਪਰੇਖਾ ਬਣਾ ਲੈ ਣੀ ਚਾਹੀਦੀ ਹੈ ।

बांग्ला িনবন্ধ লখার আেগ তার র পেরখা তির কের নওয়া উিচত।

उदू ‫۔‬‫ﻣﻀﻤﻮ ن ﻟﮑﮭﻨﮯ ﺳﮯ ﭘﮩﻠﮯ اس ﮐﺎ ﺧﺎﮐﮧ ﺑﻨﺎ ﻟﯿﻨﺎ ﭼﺎﮨﯿﮯ‬

नेपाली िनब ध ले भु दा पिहले यसको परे खा बनाइिलनुपछ।
न् न् त् रू

भोजपुरी िनबंध िलखे से पिहले ओकर परे खा बना ले वे के चाही ं।
रू

छत्तीसगढ़ िनबंध िलखे के पिहली ओकर परे खा बना ले ना चाही।
रू

करने का ढं ग: पहले वाक्य को तीन टु कड़ म तो ड़ए — (1) ‘ नबंध लखने के पहले’, (2) ‘उसक रूपरेखा’, (3)
‘बना लेनी चा हए’। अब हर टु कड़े को अपनी भाषा म क हए, फर जो ड़ए। इससे अनुवाद शब्द-दर-शब्द नह , भाव-
दर-भाव होगा — और यही अच्छा अनुवाद है।

यह अभ्यास क्य है: ‘भाषा संगम’ का उ े श्य केवल अनुवाद कराना नह है। जब आप एक ही बात कई भारतीय
भाषाओं म दे खते ह, तो दो बात समझ म आती ह — पहली, क हमारी भाषाएँ अलग होकर भी एक-दूसरे से
जुड़ी हुई ह; और दूसरी, क हर भाषा क अपनी वाक्य-रचना है (जैसे उदू म ‘मज़मून’ और ‘ख़ाका’ — शब्द बदले,
पर बात वही रही)। यही भारत क भाषाई व वधता का पाठ है।

झरोखे से — पृष्ठ 43

Page 40 of 47

Page 42

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास → झरोखे से (‘म क्य लखता ँ?’ — स दानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’)

झरोखे से तु ल नात्मक पठन

प्र.1 पाठ म आदश नबंध लेखन के वषय म वस्तार से बताया गया है। अब आप स दानंद हीरानंद वात्स्यायन
‘अज्ञेय’ का लेख ‘म क्य लखता ँ?’ प ढ़ए—

‘झरोखे से’ म दया गया यह अंश आपके पाठ का साथी है — ब ी पूछते ह “क्या लखूँ?” और अज्ञेय पूछते ह “म क्य लखता
ँ?” एक वषय क उलझन है, दूसरा प्रेरणा क खोज।
अंश का आशय —

अज्ञेय आरंभ म ही कहते ह क यह प्रश्न दे खने म सरल है, पर है बहुत क ठन, क्य क इसका स ा उत्तर “लेखक के आंत रक
जीवन के स्तर से संबंध रखता है” — और मन के इतने सारे स्तर को कुछ वाक्य म बाँधना संभव ही नह । इस लए वे इतना ही
करते ह क उनम से कुछ का ‘स्पश’ कर ल।
उनका सबसे मा मक उत्तर यह है — “म इसी लए लखता ँ क स्वयं जानना चाहता ँ क क्य लखता ँ।” यानी लेखन
उत्तर दे ने का नह , उत्तर खोजने का साधन है। लखे बना यह उत्तर मल ही नह सकता।
वे इसे ‘आभ्यंतर ववशता’ कहते ह — भीतर क एक ऐसी बेचैनी जसे लेखक तभी पहचान पाता है जब लख लेता है, और
लखकर ही उससे मुक्त हो जाता है।
वे यह भी मानते ह क ख्या त मलने के बाद बाहर क ववशता से भी लखा जाता है — “संपादक के आग्रह से, प्रकाशक के
तकाजे से, आ थक आवश्यकता से।” पर स ा कृ तकार अपने सामने यह भेद ईमानदारी से बनाए रखता है क कौन-सी रचना
भीतरी प्रेरणा का फल है और कौन-सा लेखन बाहरी दबाव का।
अंत म वे एक सुंदर बात जोड़ते ह — कभी-कभी बाहर का दबाव वास्तव म दबाव नह रहता, वह “भीतरी उन्मेष का
न मत्त” बन जाता है, यानी बाहरी माँग भीतर क कली को खोल दे ने का बहाना बन जाती है।
एक बारीक़ भेद भी वे करते ह — “सभी लेखक कृ तकार नह होते, न उनका सब लेखन ही कृ त होता है।” लेखन कोई भी कर
सकता है; कृ त वही बनती है जो भीतर से आए।

दोन लेख क तुलना —

बदु ‘क्या लखूँ?’ — ब ी ‘म क्य लखता ँ?’ — अज्ञेय

प्रश्न वषय का — क्या लखा जाए प्रेरणा का — क्य लखा जाए

स्वर हल्का, वनोदपूण, आत्म-प रहास से भरा गंभीर, आत्म व ेषणपरक

लखने का बाहर से — न मता और अ मता का आग्रह, दो घंटे भीतर से — आभ्यंतर ववशता; बाहरी दबाव को वे गौण मानते
कारण क समय-सीमा ह

क ठनाई कहाँ सामग्री, रूपरेखा, शैली और समय म अपने ही मन के स्तर को पहचानने म

समाधान मानटे न क पद्ध त + खुसरो क यु क्त लख डालना ही समाधान है — “ लखे बना इस प्रश्न का उत्तर
नह मल सकता”

Page 41 of 47

Page 43

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

दोन कहाँ मलते ह: दलचस्प यह है क दोन अंततः एक ही जगह पहुँचते ह — स ा लेखन भीतर से आता है।
ब ी शास्त्र क सारी कसौ टयाँ गनाकर अंत म मानटे न क उस पद्ध त को चुनते ह जसम “लेखक क स ी
अनुभू त रहती है”; अज्ञेय सीधे उसी भीतरी प्रेरणा से बात शुरू करते ह। और अज्ञेय क यह बात क बाहर का दबाव
‘भीतरी उन्मेष का न मत्त’ बन जाता है, ठ क ब ी के नबंध पर लागू होती है — न मता-अ मता का आग्रह बाहरी
दबाव था, पर उसी दबाव से यह सुंदर नबंध जन्मा।

अज्ञेय के वषय म: स दानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (1911–1987) हद के प्रयोगवाद क व, कथाकार
और नबंधकार थे। तार सप्तक के संपादन से उन्ह ने नई क वता क दशा बदली; शेखर : एक जीवनी और नद के
द्व प उनके प्र सद्ध उपन्यास ह। उन्ह ज्ञानपीठ पुरस्कार मला था।

अपने लए ल खए: अब आप स्वयं आधे पृष्ठ म ल खए — “म क्य लखता/ लखती ँ?” सो चए क क्या आप
केवल परीक्षा के लए लखते ह, या कभी बना कहे भी कुछ लखा है — कोई डायरी, कोई च , कोई तुकबंद ?
वही उत्तर आपका सबसे स ा उत्तर होगा।

खोजबीन — पृष्ठ 43
अभ्यास → खोजबीन

खोजबीन पु स्तकालय/इं ट रने ट

प्र.1 पाठ म आए सा हत्यकार बाणभट्ट, श्रीहष, अमीर खुसरो, सेनाप त, महात्मा गांधी, ए.जी. गा डनर, शेक्सपीयर,
मानटे न के वषय म पुस्तकालय या इंटरनेट से ढूँ ढ़कर प ढ़ए।

खोजबीन शुरू करने से पहले यह ता लका दे ख ली जए — इससे पता चल जाएगा क कसे क्य खोजना है, यानी पाठ म उसका
नाम कस काम से आया है।

Page 42 of 47

Page 44

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

सा हत्यकार काल / दे श पहचान और प्रमुख रचनाएँ पाठ म कस संदभ म

बाणभट्ट 7व शताब्द , सम्राट हषवधन के दरबारी क व। कादं बरी (गद्य-कथा) “बाणभट्ट ने कादं बरी म ऐसे ही वाक्य
भारत (संस्कृत) और हषच रत (ऐ तहा सक जीवनी) उनक कृ तयाँ ह। लखे ह” — आधे पृष्ठ के लंबे वाक्य
उनक गद्य-शैली लंबे समास और लंबे वाक्य के लए वाले व्यंग्य म।
प्र सद्ध है — कहावत ही है, “बाणो च्छष्टं जगत्सवम्”।

श्रीहष 12व शताब्द , महाकाव्य नैषधीयच रतम् के रच यता; दाश नक ग्रंथ “श्रीहष ने जान-बूझकर अपने काव्य म
भारत (संस्कृत) खंडनखंडखाद्य भी लखा। उनक शैली जान-बूझकर ऐसी गु याँ डाल द ह, जो अज्ञ से न
क्लष्ट और पां डत्यपूण मानी जाती है। सुलझ सक।”

अमीर खुसरो 1253–1325, फ़ारसी और हदवी के क व, संगीतज्ञ; हज़रत कुएँ पर चार स्त्रय वाली कहानी —
दल्ली नज़ामु न औ लया के शष्य। पहे लयाँ, मुक रयाँ, दो- “एक ही पद्य म चार क इच्छाओं क
सुख़ने और अनमे लयाँ लख और आम जन क भाषा पू त कर द ।”
को सा हत्य म जगह द ।

सेनाप त 17व शताब्द , क वत्त रत्नाकर के रच यता। ऋतु-वणन और अनुप्रास “सेनाप त ने भी अपनी क वता दुब ध
री तकाल तथा यमक के चमत्कारपूण प्रयोग के लए प्र सद्ध; कर द है।”
(ब्रजभाषा) इसी कारण उनक क वता क ठन मानी जाती है।

महात्मा गांधी 1869–1948, सत्य और अ हसा के प्रयोक्ता; स्वतंत्रता-संग्राम के नेता सुधारक क सूची म — बुद्धदे व से
भारत और समाज-सुधारक। हद स्वराज तथा आत्मकथा लेकर गांधी तक।
सत्य के प्रयोग उनक कृ तयाँ ह।

ए.जी. गा डनर 1865–1946, अंग्रेज़ पत्रकार और नबंधकार; ‘Alpha of the नबंध का आरंभ ही उनके कथन से
इंग्लड Plough’ छद्म नाम से लखते थे। Pebbles on the होता है — “ लखने क एक वशेष
Shore और Leaves in the Wind उनके नबंध- मान सक स्थ त होती है”; और शीषक
संग्रह ह। हल्के-फुल्के, आत्मीय नबंध उनक वशेषता बनाने क क ठनाई वाली बात भी उन्ह
है। क है।

शेक्सपीयर 1564–1616, अंग्रेज़ी के सबसे प्र सद्ध नाटककार और क व। हैमलेट, “घबराकर नाम न रख सकने के कारण
इंग्लड मैकबेथ, ओथेलो, कग लयर उनक त्रास दयाँ ह और उन्ह ने अपने एक नाटक का नाम रखा
ऐज़ यू लाइक इट (‘जैसा तुम चाहो’) सुखांत नाटक। ‘जैसा तुम चाहो’।”

मानटे न ( मशेल 1533–1592, आधु नक नबंध- वधा के जनक। उनक पुस्तक “उस पद्ध त के जन्मदाता मानटे न
द मॉन्तेन) ांस Essais (1580) से ही ‘essay’ शब्द चला — समझे जाते ह… उनम लेखक क
जसका अथ है ‘प्रयत्न/आज़माइश’। उन्ह ने अपने ही स ी अनुभू त रहती है।”
अनुभव, संदेह और आदत पर लखा।

Page 43 of 47

Page 45

as e
कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ?
a g l AglaSem · NCERT Solutions

co m
m.
खोजबीन कैसे क जए — तरीक़ा:

o m l a se
.c े सं क्षप्त प रचय मल जाते ह। g
1. वद्यालय के पुस्तकालय से आरंभ क जए — हद सा हत्य का इ तहास, वश्व सा हत्य कोश और बाल-ज्ञानकोश
म इनm a
sरनेe ट पर खोजते समय नाम के साथ पहचान भी ल खए — जैसे केवल ‘सेनाप त’ नह , ‘सेनाप त
सबक
l a
ag
2. इं ट
री तकालीन क व’। वरना दूसरा ही प रणाम आएगा।

co m
ag
3. हर सा हत्यकार के लए अपनी कॉपी म चार पं क्तयाँ ल खए — काल, भाषा, दो प्रमुख रचनाएँ, और एक
m .
वशेषता।
as e
a g l
4. अंत म एक समय-रेखा बनाइए — बाणभट्ट (7व सद ) → श्रीहष (12व ) → खुसरो (13व ) → मानटे न और
शेक्सपीयर (16व ) → सेनाप त (17व ) → गा डनर और गांधी (20व )। इससे दखेगा क लेखक ने चौदह सौ
वष और तीन महाद्व प के लेखक को एक छोटे -से नबंध म बुन दया है।
co m
se m.
o m l a
gओर बाणभट्ट, श्रीहष और
m .cदे ने योग्य है: पाठ म इन नाम को दो वरोधी दल म बाँटकर दे खए — एक
a
aसेsनeाप त, जनके सहारे लेखक क ठन-दुब ध शैली पर व्यंग्य करता है; दूसरी ओर गा डनर और मानटेन, जो सहज,
यह ध्यान

agl आत्मीय और अनुभव-आधा रत लेखन के पक्षधर ह। लेखक क सहानुभू त स्पष्ट रूप से दूसरे दल के साथ है — और
m a s
.co agl
यही इस नबंध का छपा हुआ पक्ष है।

sem
g l a
a

co m
m .
e
अध्याय — एक नज़र म
m l as
.co a g
emमध्यप्रदेश) म हुआ था और नधन सन् 1971 म। हद सा हत्य म उनक ख्या त कुशल आलोचक, क व, नबंधकार और हास्य-
रचनाकार प रचय — पदुमलाल पुन्नालाल ब ी का जन्म सन् 1894 म खैरागढ़, राजनंदगाँव, छत्तीसगढ़ (तत्कालीन

a s
a gl व्यंग्यकार के रूप म है, पर स्मरण वे वशेष रूप से अपने नबंध के लए कए जाते ह। पंच-पात्र, पद्म-वन, प्रबंध पा रजात और
se m
कुछ बखरे पन्ने उनके नबंध-संग्रह ह; अश्रुदल और शतदल काव्य; झलमला और त्रवेणी कहानी-संग्रह; वश्व सा हत्य, हद

com
कहानी सा हत्य, हद सा हत्य वमश तथा हद उपन्यास सा हत्य आलोचना-ग्रंथ ह। उन्ह ने सरस्वती और छाया प त्रकाओं
g l a
m . a
e
वहsभी आत्मपरक (व्य क्तव्यंजक) नबंध — जसम लेखक स्वयं पाठक से बात करता
का संपादन भी कया।
वधा — यह पाठ एक नबंध है, और a
g l
a हार और अपनी चतुराई, सब हँसते-हँसते सामने रख देता है। यही आत्मपरक शैली इस
हुआ चलता है, अपनी उलझन, अपनी

com
नबंध को जीवंत, आत्मीय और प्रभावशाली बनाती है।

.
em नबंध लखकर उन्ह ‘ नबंध-
कथ्य — लेखक को दो घंट म दो नबंध लखने ह। न मता का आदे श है — ‘दूर के ढोल सुहावने होते ह’ पर ल खए; अ मता

m a s
o का रहस्य’ भी समझाना है। यही ‘क्या लखूँ?’ क छटपटाहट पूरे नबंध काgढाँlचा बन जाती है।
का आग्रह है — ‘समाज-सुधार’ पर ल खए। दोन वषय परीक्षा म आ चुके ह, इस लए आदश

. cरचना a
asem
g l
नबंध-शास्त्र क कसौ टयाँ — लेखक पहले आचाय क सम्म त दे खता है और एक-एक कसौट पर स्वयं को खरा उतरने म
a c
.
असमथ पाता है — नबंध छोटा हो; उसके दो प्रधान अंग ह सामग्री और शैली; पहले रूपरेखा बनाइए; भाषा म प्रवाह हो,
वाक्य छोटे -छोटे पर एक-दूसरे से बँधे ह ; अलंकार, मुहावरे और लोको क्तयाँ भी ह । हर कसौट पर वह हल्क -सी चुटक लेता
s e m
. c om
है — “म तो ँ मास्टर”, इस लए वाक्य आधे पृष्ठ म समाप्त होने चा हए, जैसे बाणभट्ट ने कादं बरी म लखे; और भाषा म
a g la
दुब धता भी चा हए, क्य क वही गांभीयm
s e
g aधकार क दूसरी परंपरा का जन्मदाता मानटेन (मॉन्तेन) को माना जाता है। उन्ह ने जो
लाती है — जैसे श्रीहष और सेनाप त ने जान-बूझकर क ।
मानटे न क पद्ध त — अंग्रेजी lनबं
a
दे खा, सुना और अनुभव कया, उसी को लख दया। ऐसे नबंध मन क स्वच्छं द रचनाएँ होते ह — उनम न क व क उदात्त

co m
m .
m as e
.co


a g l Page 44 of 47

Page 46

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

कल्पना होती है, न आख्या यका-लेखक क सूक्ष्म दृ ष्ट, न वज्ञ क तकपूण ववेचना; उनम लेखक क स ी अनुभू त और
स े भाव क स ी अ भव्य क्त होती है। लेखक यही रास्ता चुन लेता है।
अमीर खुसरो क यु क्त — दो वषय क समस्या का हल लेखक को अमीर खुसरो क कहानी से मलता है। कुएँ पर चार
स्त्रय ने क्रमशः खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल पर क वता माँगी और खुसरो ने एक ही पद्य म चार को तृप्त कर दया — “खीर
पकाई जतन से, चरखा दया चला। आया कुत्ता खा गया, तू बैठ ढोल बजा॥” लेखक भी दोन वषय को एक ही नबंध म
मला दे ता है — और यह से नबंध का दूसरा, सुंदर आधा भाग शुरू होता है।
मूल संवेदना — ढोल दूर से सुहावना इस लए लगता है क उसक ककशता दूर तक नह पहुँचती; दूर बैठा व्य क्त उसी
ध्व न म ववाहोत्सव, ल ाशील नव-वधू और उसके प्रेम-उल्लास-संकोच-आशंका- वषाद का चत्र दे ख लेता है। इसी से लेखक
जीवन का बड़ा सत्य नकालता है — “दूर रहने से हम यथाथता क कठोरता का अनुभव नह होता।” इसी लए तरुण को
भ वष्य उज्ज्वल दखता है और वृद्ध को अतीत सुखद; तरुण क्रां त के समथक होते ह और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक;
दोन वतमान से असंतुष्ट रहते ह और इसी लए वतमान सदा सुधार का काल बना रहता है।
समाज-सुधार का पक्ष — मनुष्य-जा त के इ तहास म कोई ऐसा काल नह हुआ जब सुधार क आवश्यकता न रही हो।
बुद्धदे व, महावीर स्वामी, नागाजुन, शंकराचाय, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी पर
सुधारक क गणना समाप्त नह होती — “सुधारक का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव म होता है।” न दोष का अंत है और न
सुधार का; जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए ह — इसी से जीवन प्रग तशील माना गया है। इस तरह दोन वषय एक
ही सूत्र म बँध जाते ह।
भाषा-शैली — बोलचाल जैसी सहज खड़ी बोली, आत्मकथात्मक ‘म’, बीच-बीच म प्रश्न पूछकर पाठक को साथ लेना, और
सबसे बढ़कर सौम्य व्यंग्य — यही इस नबंध का शल्प है। लेखक नबंध-शास्त्र का वरोध नह करता, बस उसे व्यवहार म
उतारने क क ठनाई दखाकर मुस्कुरा दे ता है। सा ह त्यक-सांस्कृ तक संदभ (बाणभट्ट, श्रीहष, सेनाप त, खुसरो, शेक्सपीयर,
गा डनर, मानटे न) का प्रयोग बोझ नह बनता, बात को खोलता है।
अभ्यास क्या माँगता है — इस पाठ का अभ्यास केवल कथ्य नह पूछता। मेरे उत्तर मेरे तक म वकल्प के साथ तक भी दे ना
है; वधा से संवाद म नबंध-लेखन क प्र क्रया का आरेख पढ़कर स्वयं नबंध लखना है और चार वाक्य का भाव- वस्तार
करना है; भाषा से संवाद म समास के छह भेद, उपसग-प्रत्यय और पयायवाची शब्द-समूह साधने ह; सृजन म लोको क्त-
आधा रत लेख और डायरी लखनी है; और झरोखे से म अज्ञेय का ‘म क्य लखता ँ?’ पढ़कर उसी प्रश्न को दूसरी दशा से
दे खना है।

Page 45 of 47

Page 47

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

त्व रत पुनरावृ त्त

शब्द अथ पाठ क पं क्त / सं द भ अपने वाक्य म प्रयोग

ू त फु रती, उ े जना, मन में कु छ पकट होना “हृदय म कुछ ऐसी ू त-सी आती सुबह क सैर से दन भर ू त बनी
है” रहती है।

आवेग िबना सोचे-िवचारे कु छ कर बैठने की अंतःपेर णा, “म स्तष्क म कुछ ऐसा आवेग-सा आवेग म लया गया नणय प्रायः
झोंक , उतावली उत्पन्न होता है” पछतावा दे ता है।

यथाथ / सत्य, वास्तिवक, जैस ा सचमुच है वैस ा “दूर रहने से हम यथाथता क कहानी सुंदर है, पर उसम यथाथ क
यथाथता कठोरता का अनुभव नह होता।” छाया कम है।

उ त उठा हुआ , उत्पन्न, अपने आप ऊपर आया हुआ “ जसम भाव अपने आप उ त हो सभा म एक नया प्रश्न उ त हो
जाते ह” गया।

रहस्य ग प्ु त भेद , मम, भीतरी बात “मुझे उन दोन को नबंध-रचना का सफलता का रहस्य नरंतर अभ्यास
रहस्य समझाना पड़ेगा” है।

वज्ञ जानकार, समझदार, िवद्वान “ जसके संबंध म बड़े-बड़े वज्ञ म इस वषय पर वज्ञ लोग क राय
भी वरोध है” भी बँट हुई है।

सम्म त सहमित, राय, मत “सबसे पहले नबंधशास्त्र के आचाय मने यह काम गुरुजी क सम्म त से
क सम्म त जान लूँ” आरंभ कया।

अनुसंधान अन्वेषण, खोज, जाँच-पड़ताल “पुस्तकालय म जाकर इस वषय का वैज्ञा नक वष तक एक ही प्रश्न पर
अनुसंधान कर लेता” अनुसंधान करते ह।

वश्वकोश वह ग ंथ िजसमें संस ार के सारे िवषयों का िववरण “यहाँ न तो वश्वकोश है” क ठन शब्द का अथ मने वश्वकोश
हो म दे खा।

दुब ध / जो शीघ समझ में न आए, गूढ़, किठन “सेनाप त ने भी अपनी क वता दुब ध बना ज़रूरत क दुब धता लेखन
दुब धता कर द है” का दोष है, गुण नह ।

गांभीय गंभीरता, गहराई, जिटलता “यह अस्पष्टता या दुब धता गांभीय उसके भाषण म वषय का गांभीय
ला दे ती है” साफ़ झलकता था।

गु ी उलझन, गाँठ, किठनाई “अपने काव्य म ऐसी गु याँ डाल शक्षक ने दो पं क्तय म सारी गु ी
द ह” सुलझा द ।

अज्ञ ज्ञानरिहत, नासमझ “जो अज्ञ से न सुलझ सक” अज्ञ बालक को डाँटने से नह ,
समझाने से लाभ होता है।

पद्ध त पथा, पिरपाटी, पणाली, तरीका “उस पद्ध त के जन्मदाता मानटे न हर वद्यालय क पढ़ाने क अपनी
समझे जाते ह” पद्ध त होती है।

पा ात्य पिश्चम का, पिश्चमी “भारतीय और पा ात्य सा हत्य के उन्ह ने पा ात्य संगीत भी उतने ही
सद्धांत का सामंजस्य” मन से सीखा।

Page 46 of 47

Page 48

कक्षा 9 हद अध्याय 2 क्या लखूँ? AglaSem · NCERT Solutions

शब्द अथ पाठ क पं क्त / सं द भ अपने वाक्य म प्रयोग

आख्या यका िसलिसले वार कहानी या वृ ांत, िश ा दे ने वाली “न आख्या यका-लेखक क सूक्ष्म कादं बरी संस्कृत क प्र सद्ध
किल्पत कथा दृ ष्ट” आख्या यका है।

उदात्त ऊँचा, महान, ेष्ठ “उनम न क व क उदात्त कल्पना महाकाव्य का नायक उदात्त च रत्र
रहती है” वाला होता है।

अ भव्य क्त व्यक्त होना, पकट होना, पकाशन “उसके स े भाव क स ी चत्रकला भी भाव क अ भव्य क्त
अ भव्य क्त होती है” का माध्यम है।

अनुसरण पीछे चलना, अनुक रण करना “इसी पद्ध त का अनुसरण कर म भी अच्छ आदत का अनुसरण करने म
क्य न नबंध लखूँ” ल ा कैसी?

समावेश शािमल होना, िमलना, पवेश “अलंकार , मुहावर और नबंध म उदाहरण का समावेश उसे
लोको क्तय का समावेश” रोचक बनाता है।

कोलाहल बहुत लोगों के एक साथ बोलने से होने वाला “कोलाहल से पूण घर के एक कोने म मेले का कोलाहल दूर तक सुनाई दे
शोर, हंग ामा बैठ हुई…” रहा था।

कलरव मध रु ध्विन, कोमल शोर “ढोल क ध्व न के साथ आनंद का भोर म प क्षय का कलरव मन मोह
कलरव” लेता है।

वषाद अवसाद, उदासी “आशंका और वषाद से युक्त हृदय वदाई के समय उसके चेहरे पर
के कंपन” वषाद उतर आया।

लोको क्त लोक में पचिलत वह वाक्य/वाक्यांश जो कोई “‘दूर के ढोल सुहावने होते ह’ एक ‘नाच न जाने आँगन टे ढ़ा’ एक
िवशेष अथ या सीख व्यक्त करे लोको क्त है।” प्र सद्ध लोको क्त है।

अनमेली हास्य-व्यंग्यपूण काव्य-शैल ी िजसमें असंग त वाक्य “पाठ म अमीर खुसरो क यह प्र सद्ध खुसरो क अनमेली सुनकर सारी
और िवपरीत िस्थितयाँ जोड़ी जाती है ं अनमेली आई है।” कक्षा हँस पड़ी।

समास दो या अिधक शब्दों के मेल से एक नए शब्द की “गंगा+जल = गंगाजल, दे श+भ क्त ‘ नबंधशास्त्र’ म तत्पुरुष समास है।
रचना; समास का अथ है ‘सं ेप’ = दे शभ क्त”

उपसग भाषा के साथक लघुतम खंड जो शब्दों के आरंभ “‘बोध’ के पहले ‘दुर्’ उपसग” ‘अ’ उपसग लगने से ‘संतोष’ का
में लगकर नया शब्द बनाते है ं उलटा ‘असंतोष’ बन गया।

प्रत्यय भाषा के साथक लघुतम खंड जो शब्दों के अंत में “‘क ठन’ शब्द के बाद म ‘आई’ ‘क’ प्रत्यय से ‘सुधार’ का
लगकर नया शब्द बनाते है ं प्रत्यय” ‘सुधारक’ बना।

Page 47 of 47

Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 9
TypeSolution
Pages48
Languagehindi
Updated19 Sep 2026