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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 3: संवादहीन
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — गंगा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
45 – 61 17 55 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 44 pages
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 9 · हद · गं गा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 3: संवादहीन
NCERT कक्षा 9 हद क पाठ्यपुस्तक गंगा के गद्य खंड के पाठ 3 संवादहीन के सभी अभ्यास-प्रश्न के पूरे हल। यह शेखर जोशी (1932–2022)
क एक कहानी है, जसम गाँव के बड़े घर म अकेली रह गई ताई और उनके तोते मट्ठू के रश्ते के सहारे पलायन, अकेलेपन तथा आदश और यथाथ के
द्वं द्व को उभारा गया है। पृष्ठ 52 से 61 तक छपे हर शीषक — मेरे उत्तर मेरे तक, मेरी समझ मेरे वचार, मेरे प्रश्न, मेरे अनुभव मेरे वचार, कहानी का
स दय, कहानी का अंत, वषय से संवाद के दोन समूह, व्याकरण क बात, ध्वन्यात्मकता शब्द से, शब्द-युग्म, खोजबीन शब्द क , अथ के आधार पर
वाक्य, ग त व धयाँ, मेरी पहेली, भाषा संगम और खोजबीन — का उत्तर यहाँ क्रम से दया गया है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
गंगा (कक्षा 9) 45 – 61
खं ड प्रश्न
17 55
माध्यम
हन्द
मेरे उत्तर मेरे तक — पृष्ठ 52 और 53
रचना से संवाद
रचना से सं वाद बहु वकल्पी
प्र.1 कहानी म ताई और मट्ठू का संबंध कस भाव को दशाता है? (क) परोपकार और त्याग (ख) ममता और स्नेह (ग)
करुणा और क्रोध (घ) ज ासा और सहायता
सही उत्तर — (ख) ममता और स्नेह।
यह उत्तर उपयुक्त क्य है — कहानी स्वयं इस भाव का नाम लेकर बताती है: “ताई क सारी ममता मट्ठू पर बरस पड़ी।” यह ममता
केवल कहने क नह , करने क है। जो ताई “अपनी खा तर चूल्हा जलाने म आलस्य कर जाती थ , वही अब नयमपूवक मट्ठू के लए
दाल-भात बनात ।” वे उसके “वक्त-बेवक्त के तकाज के लए रोट बचाकर” रखती ह और यह तक जान लेती ह क “ कसके खेत
म हरी मच तैयार हो गई ह।” दूसरी ओर स्नेह एकतरफा नह है — मट्ठू ताई को “कटे गी! कटे गी!! कटे गी!!!” कहकर ढाढ़स बँधाता
है और ताई उसे “जीते रहो बेटा, जुग-जुग जओ” का आशीष दे ती ह। ‘बेटा’ संबोधन ही सद्ध कर दे ता है क यह रश्ता माँ-बेटे
क ममता का है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन AglaSem · NCERT Solutions
बाक वकल्प क्य नह —
(क) परोपकार और त्याग — परोपकार म दे ने वाला ऊपर और पाने वाला नीचे होता है, और वह कसी
अनजान पर कया जाता है। ताई मट्ठू पर उपकार नह करत ; वे उससे अपना अकेलापन बाँटती ह। त्याग का
भाव यहाँ गौण है, मुख्य नह ।
(ग) करुणा और क्रोध — “मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!” जैसी खीझ कहानी म है ज़रूर, पर वह
क्ष णक है — लेखक तुरंत जोड़ता है, “ फर मान-मनौवल का दौर चलता और ताई और मट्ठू क दु नया पहले क
तरह प्रेम से चलने लगती।” जो भाव स्थायी नह , वह संबंध को प रभा षत नह कर सकता।
(घ) ज ासा और सहायता — ज ासा का कोई प्रसंग कहानी म है ही नह । सहायता का भाव है, पर वह
ममता का प रणाम है, संबंध का मूल नह ।
प्र.2 जगन मास्टर द्वारा मट्ठू को पजरे से बाहर नकालना कस भावना या मूल्य का संकेत दे ता है? (क) अनुशासन
और परंपरा (ख) उदासीनता और असावधानी (ग) आत्मगौरव और वद्रोह (घ) करुणा और नै तकता
सही उत्तर — (घ) करुणा और नै तकता।
यह उत्तर उपयुक्त क्य है — लेखक ने जगन मास्टर के भीतर चल रही पूरी प्र क्रया खोलकर रख द है। पहले करुणा जागती है —
“ पजड़े म बंद मट्ठू को दे खकर उन्ह बेचैनी होने लगती।” फर वह करुणा नै तक अपराध-बोध म बदलती है — “जब-जब मट्ठू को
दे खते, अपनी पत्नी क बु द्ध पर तरस खाते और अपने आप को भी दोषी अनुभव करते।” और अंत म वह नै तक बोध कम बन
जाता है — “जब मट्ठू क यातना असह्य हो गई, तो उन्ह ने एक दन कमरा बंदकर … उसका दरवाजा खोल दया, ता क … अपने
पाप का थोड़ा प्राय त कर ल।” ‘यातना’, ‘दोषी’, ‘पाप’, ‘प्राय श्चत’ — ये चार शब्द नै तक शब्दकोश के ह। इसके पीछे उनका
घो षत मूल्य भी पाठ म लखा है: “स्वतंत्र वचार के आदमी थे। दूसर क स्वतंत्रता पर बाधा नह डालना चाहते थे।”
बाक वकल्प क्य नह —
(क) अनुशासन और परंपरा — जगन मास्टर परंपरा का पालन नह , उलटा उल्लंघन कर रहे ह। पजरे म तोता
पालना ही उस समाज क परंपरा थी; वे उसी के वरुद्ध जा रहे ह।
(ख) उदासीनता और असावधानी — असावधानी तो हुई, पर वह प रणाम है, प्रेरणा नह । प्रश्न भावना या
मूल्य पूछ रहा है। उदासीन आदमी “हर रोज कमरा बंद” करके, मु म अनाज लेकर, दरवाजे से बाहर तक दाना
बखेरकर घंट नगरानी नह करता।
(ग) आत्मगौरव और वद्रोह — वद्रोह के लए कोई सत्ता चा हए जसके वरुद्ध खड़ा हुआ जाए; यहाँ वैसा
कोई टकराव नह । वे तो अपनी ही पत्नी के नणय पर चुपचाप दुखी होते ह — यह आत्मगौरव नह , आत्म-
धक्कार है।
ध्यान द जए: उत्तर ‘करुणा और नै तकता’ होने का अथ यह नह क जगन मास्टर का काम सही था। कहानी का
व्यंग्य ठ क यही है — अ भावना भी, बना दूसरे क स्थ त समझे, कसी का सब कुछ छ न सकती है।
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प्र.3 मट्ठू का उड़ जाना कस वचार को प्रस्तुत करता है? (क) भोजन क खोज (ख) प्रेम क आकांक्षा (ग) स्वतंत्रता
क चाह (घ) प क्षय म सम्मान क प्रवृ त्त
सही उत्तर — (ग) स्वतंत्रता क चाह।
यह उत्तर उपयुक्त क्य है — उड़ान से ठ क पहले का वाक्य पूरी बात कह दे ता है — “एक दन मट्ठू क नजर ऊपर खुले रोशनदान
पर पड़ गई और सहज कौतूहलवश वह … तरछ आँख अपने लक्ष्य क ओर दे खकर रोशनदान पर पहुँच गए।” यहाँ ‘लक्ष्य’ शब्द
नणायक है — खुला आकाश उसका लक्ष्य बन जाता है। फर “ मट्ठू ने फर तरछ आँख से रोशनदान के बाहर क दु नया क ओर
दे खा और ये गए! वो गए!!” उड़ने के बाद भी वह लौटता नह , ब ल्क “एक डाल से दूसरी डाल पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने
पंख तौलने म मशगूल रहा।” ‘पंख तौलना’ मुहावरा ही अपनी उड़ान-श क्त को नापने-आँकने का है — यानी वह अपनी नई मली
आजाद का सुख ले रहा है।
बाक वकल्प क्य नह —
(क) भोजन क खोज — पाठ इसी को सीधे काट दे ता है। जगन मास्टर “हाथ म अनाज लेकर ‘आ-आ’ क
गुहार लगा ही रहे थे” — भोजन सामने था, फर भी वह नह लौटा। भूखा पक्षी दाने क ओर आता, आकाश क
ओर नह ।
(ख) प्रेम क आकांक्षा — कहानी म कह कसी साथी पक्षी का, कसी जोड़े का, कसी बुलावे का ज़क्र नह
है। यह वकल्प पाठ से सम थत ही नह ।
(घ) प क्षय म सम्मान क प्रवृ त्त — ‘सम्मान’ मनुष्य-समाज क धारणा है; लेखक ने ऐसा कोई संकेत नह
दया। मट्ठू अपमा नत होकर नह उड़ता, आक षत होकर उड़ता है।
सोचने के लए: ध्यान द जए क पहले दन मट्ठू ने “बाहर आने क कोई इच्छा नह प्रकट क ” — क्य क वह
“ पजरे म रहने के इतने आद हो चुके थे”। स्वतंत्रता क चाह जागती है, तब जब खुला रोशनदान दख जाता है।
आजाद क इ ा भी अवसर दे खकर जागती है — यही इस प्रसंग क गहरी बात है।
प्र.4 ताई के जीवन के दुख का मुख्य कारण क्या था? (क) सम्मान और प्र तष्ठा म कमी आना (ख) प रवार से दूरी और
संवाद का अभाव (ग) आ थक वपन्नता और नधनता (घ) मट्ठू के प्र त प्रेम और संवाद
सही उत्तर — (ख) प रवार से दूरी और संवाद का अभाव।
यह उत्तर उपयुक्त क्य है — कहानी ताई का पूरा नुकसान गनाती है और फर स्वयं बता दे ती है क उनम से कस बात ने काटा।
प रवार बखर गया — “बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहर के होकर रह गए। बे टयाँ अपने-अपने हाथ पीले कराकर अपनी गृहस्थी
म रम गईं।” इसके बाद सीधा वाक्य आता है — “पेट क समस्या उनके लए कभी समस्या नह रही, पर सूने घर क भाँय-
भाँय जैसे उन्ह काटने को दौड़ती थी।” यानी दुख का ोत भूख नह , सूनापन था। इसी लए एक बोलता हुआ तोता मलते ही
उनका जीवन बदल जाता है — “बड़े घर का सूनापन धीरे-धीरे मट्ठू क बातचीत से अब रौनक म बदल गया था।” जस अभाव को
एक तोते क बातचीत भर दे ती हो, वह अभाव संवाद का ही हो सकता है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन
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बाक वकल्प क्य नह —
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.c और मट्ठू के प्र त लगाव को “सभी जानते थे”, और उनके दुख क आशंgका से पूरा गाँव च तत हो
(क) सम्मान और प्र तष्ठा म कमी — गाँव म उनक स्थ त घट नह है। लोग उन्ह न्यौते-बुलावे म बुलाते ह,
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se है।
स्वभाव
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उठता
(ग) आ थक वपन्नता — संप त्त गई ज़रूर, पर लेखक ने साफ लखा क पेट क समस्या कभी समस्या नह
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रही। वे मट्ठू के लए रेल का टकट तक खरीदने को तैयार थ — “ टकट का पैसा भी वह मट्ठू क खा तर खच
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कर दे त ।”
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(घ) मट्ठू के प्र त प्रेम और संवाद — यह दुख का कारण नह , दुख क दवा है। हाँ, अंत म उसी दवा का छन
जाना नया दुख बनता है — पर प्रश्न ‘मुख्य कारण’ पूछता है, और मुख्य कारण अकेलापन ही है।
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gमजबूरी (ख) कमपरायणता (ग)
प्र.5 m .c म मानव-समाज म व्याप्त कस वसंग त को उजागर कया गया है? (क)
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se अकेलापन (घ) संवादध मता
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सही उत्तर — (ग) अकेलापन।
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यह उत्तर उपयुक्त क्य है — ‘ वसंग त’ का अथ है — जो होना चा हए और जो वास्तव म है, इन दोन का बेमेल। कहानी ठ क
यही बेमेल दखाती है: जस घर म “पूत-प रवार, बहू-बे टयाँ, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, क्या नह था”, उसी घर म अब “ये ही दो
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प्राणी … उस सूने खंडहर म एक-दूसरे को सहारा दे ने के लए रह गए थे।” यह कसी एक ताई क कहानी नह — पलायन के बाद
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गाँव-गाँव म बुजुग इसी तरह छू ट गए ह। इसी अकेलेपन का चरम यह है क बात करने के लए एक मनुष्य नह , एक पजरे का पक्षी
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बचा है; और शीषक ‘संवादहीन’ उसी पर मुहर लगाता है।
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वकल्प क्य नह —
(क) मजबूरी — मजबूरी एक स्थ त है, समाज क वसंग त नह । बहू-बेट का शहर जाना मजबूरी हो सकता
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है, पर कहानी उस पर दोष नह मढ़ती; वह उसके प रणाम को उजागर करती है।
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(ख) कमपरायणता — यह तो एक गुण है। गुण को ‘ वसंग त’ नह कहा जाता।
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(घ) संवादध मता — यह वकल्प उलटा है। संवादध मता वह मूल्य है जसका अभाव कहानी दखाती है —
इसी लए शीषक ‘संवादधम ’ नह , ‘संवादहीन’ है।
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रचना से संवाद
रचना से सं वाद पाठ से
प्र.1 “भगवान! कैसे नैया पार लगेगी?” ताई इस वाक्य म कस ‘नैया’ क बात कर रही ह? वे यह बात क्य कह रही
ह?
यहाँ ‘नैया’ कोई असली नाव नह , ब ल्क ताई का अपना जीवन है — वशेष रूप से उनका बचा हुआ बुढ़ापा। यह रूपक है: जीवन
को नद और उसे पार करने वाले को नाव मान लया गया है। ‘नैया पार लगना’ मुहावरे का अथ है — क ठन समय से सकुशल
नकल जाना, जीवन का अंत सुख से होना।
वे यह क्य कह रही ह — कहानी क शुरुआत म ही ताई क स्थ त साफ है। बड़े घर का सारा वैभव जा चुका है — “धीरे-धीरे सब
पराए हाथ म चला गया।” बहू-बेटे शहर के होकर रह गए, बे टयाँ अपनी गृहस्थी म रम गईं, नौकर-चाकर बखर गए। बुढ़ापा है,
शरीर थका हुआ है, और घर क “भाँय-भाँय जैसे उन्ह काटने को दौड़ती थी।” ऐसे म मन म सवाल उठता है — आगे का जीवन
कसके सहारे कटे गा? यही चता गहरी साँस बनकर नकलती है।
ध्यान दे ने क बात: यह वाक्य कहानी का पहला ही वाक्य है, और यह पूरी कहानी क भाव-भू म तैयार कर दे ता है।
दलचस्प यह है क इस नराश प्रश्न का उत्तर भी ताई को मनुष्य से नह मलता — उत्तर मट्ठू दे ता है: “राम-राम
कहो, सीताराम कहो।” और आगे चलकर वही मट्ठू भरोसा भी दे ता है — “कटे गी! कटे गी!! कटे गी!!!” यानी ताई
क नैया पार लगाने वाला कोई अपना नह , एक पजरे का पक्षी है। यही कहानी क करुण वसंग त है।
प्र.2 “धीरे-धीरे सब पराए हाथ म चला गया।” इस वाक्य म कस घटना क ओर संकेत कया गया है?
इस वाक्य म ताई के प रवार क जम दारी और संप त्त के हाथ से नकल जाने क ओर संकेत है — खेती-बाड़ी, कारबार,
ज़मीन-जायदाद सब धीरे-धीरे दूसर के अ धकार म चली गई।
लेखक ने इसका पूरा कारण-क्रम पास-पास ही रख दया है, इस लए घटना समझने म क ठनाई नह होती —
पहले पलायन — “बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहर के होकर रह गए। बे टयाँ अपने-अपने हाथ पीले कराकर अपनी
गृहस्थी म रम गईं।”
फर दे खभाल का अभाव — “ कसके भरोसे कारबार संभलता।” — यानी संप त्त सँभालने वाला कोई बचा ही नह ।
फर सब कुछ खसक जाना — “धीरे-धीरे सब पराए हाथ म चला गया।”
और उसका प रणाम — “जब खेती-बाड़ी नह , कारबार नह , तो नौकर-चाकर कस दम पर टकते!”
‘धीरे-धीरे’ पर ध्यान द जए — लेखक यह नह कहता क कसी ने ज़बरदस्ती छ न लया या कोई मुकदमा हुआ।
पतन एक झटके म नह , बरस म हुआ — यही यथाथ है। बड़े घर खंडहर बनते नह , बनाए भी नह जाते; वे
धीरे-धीरे खाली होते जाते ह — यह वाक्य पूरे भारत के बहुत-से पुराने गाँव-घर क कहानी एक पं क्त म कह दे ता
है।
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प्र.3 “ताई क सारी ममता मट्ठू पर बरस पड़ी।” क्य ?
क्य क ममता ताई के भीतर पूरी क पूरी बची हुई थी, पर उसे उँडेलने के लए कोई पात्र नह बचा था। जस दन गनपत
“कह से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता” ले आया, वष क जमा हुई वह ममता एक साथ उसी पर उमड़ पड़ी — इसी लए लेखक ने
‘बहना’ नह , ‘बरस पड़ना’ लखा, जसम अचानक और भरपूर उँ डेलने का भाव है।
कारण तीन तह म सम झए —
1. ममता के सारे पात्र दूर हो गए थे। बेटे-बहुएँ शहर म, बे टयाँ अपनी गृहस्थी म। जस स्त्री ने “पूत-प रवार, बहू-बे टयाँ, नौकर-
चाकर” वाला भरा-पूरा घर दे खा हो, उसके लए यह सूनापन असह्य था।
2. मट्ठू बोलता था। वह केवल पालतू नह , संवाद का साथी था — “मौके बे-मौके ताई के सवाल का सट क उत्तर दे दे ता।” वह
जवाब दे ता था, दलासा दे ता था, आशीष तक लौटाता था — “खुश रहो! खुश रहो!!”
3. वह उन्ह फर से ‘माँ’ बना दे ता था। ममता को केवल प्रेम नह , सेवा का अवसर भी चा हए। मट्ठू ने वह अवसर लौटा दया
— “जो ताई अपनी खा तर चूल्हा जलाने म आलस्य कर जाती थ , वही अब नयमपूवक मट्ठू के लए दाल-भात बनात ।”
भाषा क बात: ‘बरस पड़ना’ म बादल का बब छपा है। बादल जब तक भरा रहता है, बोझ बना रहता है; बरसते
ही हल्का हो जाता है। ताई क ममता भी ऐसा ही बोझ बन गई थी — मट्ठू पर बरसकर वह हल्क हुई और घर
“गुलजार” हो गया।
प्र.4 “अब ताई को इस बात क पूरी जानकारी रहने लगी थी क कसके खेत म हरी मच तैयार हो गई ह और कस पेड़
म फसल के आ खरी अमरूद बचे ह।” इस वाक्य द्वारा ताई के व्य क्तत्व म आए प रवतन के वषय म क्या-क्या
पता चलता है?
यह एक छोटा-सा ब्योरा है, पर यह ताई के व्य क्तत्व म आए चार बड़े प रवतन क सूचना दे दे ता है।
पहले ( मट्ठू से पहले) अब ( मट्ठू के बाद) यह क्या बताता है
“दो जून का एक जून चूल्हा फूँक लेत ”, “व्रत- “ नयमपूवक मट्ठू के लए दाल-भात बनात ”, आ म-उपे ा से िनकलकर सि यता
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उपवास के बहाने चौका-चूल्हा टाल जात ” मच-अमरूद तक क खोज-खबर रखत — जीने का उ साह लौट आया
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दन बस कट रहे थे, कोई काम अपना नह दन भर क एक दनचया, एक ज़म्मेदारी जीवन को िफर से उ े य िमल गया
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घर क “भाँय-भाँय”, बाहर से कटाव कस खेत म क्या है — यह जानने के लए गाँव एकांत से िनकलकर समाज से िफर
म आना-जाना, पूछना जुड़ाव
बेटे-बहू-बे टयाँ दूर; ममता न ष्क्रय ब े के लए मनपसंद चीज़ जुटाने वाली माँ का मात ृ व की भूिमका िफर से जीिवत हो
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क्य यह ब्योरा इतना बड़ा है: हरी मच और अमरूद तोते क प्रय चीज़ ह। कोई माँ ही यह हसाब रखती है क
ब े क पसंद क चीज़ कब, कहाँ और कसके यहाँ मलेगी। शेखर जोशी ने ‘ताई अब मट्ठू से बहुत प्रेम करने लग ’
जैसा सपाट वाक्य नह लखा — उन्ह ने एक ठोस ब्योरे से भाव दखा दया। यही अच्छ कहानी का शल्प है:
बताना नह , दखाना।
प्र.5 “जगन मास्टर दूसरे मजाज के आदमी थे।” जगन मास्टर का व्य क्तत्व कैसा था? कहानी म से उदाहरण दे कर
स्पष्ट क जए।
जगन मास्टर सद्धांत प्रय, स्वतंत्रता-प्रेमी, संवेदनशील और अपनी धुन के पक्के आदशवाद ह — पर उनम व्यावहा रक
समझ और दूसरे क स्थ त दे खने क दृ ष्ट नह है। ‘दूसरे मजाज के’ का अथ ही है — गाँव के बाक लोग से अलग ढं ग से
सोचने वाले।
व्य क्तत्व क वशेषता कहानी से उदाहरण
सद्धांतवाद — जीवन के “उन्ह ने अपने कुछ नयम- सद्धांत बना रखे थे और भरसक को शश करते थे क उनके कारण कसी को
अपने नयम बनाए हुए कोई कष्ट न पहुँचे।”
स्वतंत्रता का समथक “स्वतंत्र वचार के आदमी थे। दूसर क स्वतंत्रता पर बाधा नह डालना चाहते थे।”
संवेदनशील, करुण “ पजड़े म बंद मट्ठू को दे खकर उन्ह बेचैनी होने लगती।” … “ मट्ठू क यातना असह्य हो गई।”
आत्म-समीक्षक, अपराध-बोध “अपने आप को भी दोषी अनुभव करते।” … “अपने पाप का थोड़ा प्राय श्चत कर ल।”
से भरे
धुन के पक्के, हार न मानने “जगन मास्टर भी अपनी धुन के पक्के थे।” — मट्ठू के न नकलने पर उन्ह ने दरवाजे से बाहर तक
वाले अनाज बखेर दया, और यह क्रम तीन-चार दन चलाया।
अध्ययनशील पजरे के पास बैठकर ‘गीता-रहस्य’ पढ़ते थे; ताई के लौटने पर मट्ठू के मुँह से गीता के ोक सुनवाने क
कल्पना क थी।
पत्नी से असहमत, पर मौन “उनसे सलाह लए बना मास्टराइन ने ताई का भार अपना लया था।” … “अपनी पत्नी क बु द्ध पर
तरस खाते।”
अ यावहािरक — यही उनकी
व् पालतू, पजरे का आद और दूसरे क अमानत — इन तीन बात को भूलकर उन्ह ने पजरा खोल दया।
कमज़ ोरी है प रणाम: “अकेले मट्ठू क्या उड़े, आदशवाद जगन मास्टर के हाथ के सभी तोते उड़ गए।”
नष्कष: जगन मास्टर बुरे आदमी नह ह — वे आदश और यथाथ के द्वं द्व के पात्र ह। उनका मूल्य (पक्षी को कैद म
नह रखना चा हए) सही है, पर उसे लागू करने का उनका तरीका गलत है, क्य क उन्ह ने ताई से न पूछा, न सोचा क
उस बूढ़ स्त्री के लए वह तोता क्या है। कहानी यह नह कहती क आदश गलत ह; वह इतना कहती है क दूसर के
जीवन म लागू कया गया अकेला आदश वनाश कर सकता है।
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प्र.6 कहानी का शीषक ‘संवादहीन’ कसके लए सबसे अ धक साथक प्रतीत होता है— ताई, जगन मास्टर, मट्ठू या
नया तोता? कारण स हत स्पष्ट क जए।
शीषक ताई के लए सबसे अ धक साथक है। शेष तीन पात्र पर वह आं शक रूप से लागू होता है, पर पूरी तरह नह ।
ताई के लए क्य — कहानी म संवाद क भूख भी उन्ह क है और संवाद का अंत भी उन्ह पर होता है।
प रवार दूर चला गया, इस लए वे पहले से ही संवादहीन थ — घर क “भाँय-भाँय जैसे उन्ह काटने को दौड़ती थी।”
मट्ठू ने वह संवाद लौटाया — “बड़े घर का सूनापन धीरे-धीरे मट्ठू क बातचीत से अब रौनक म बदल गया था।”
और कहानी का अंत उनसे वही एकमात्र संवाद फर छ न लेता है — “ताई अपने मट्ठू को गुहार कर थक गईं ले कन उनके
सूनेपन का साथी न जाने कन अमराइय म घूम रहा होगा।”
अं तम दृश्य म तो वे बोल रही ह और सामने बैठा एवजी तोता “केवल इधर-उधर ताकता रहा” — यह पूण संवादहीनता है:
एक ओर से आवाज, दूसरी ओर से चुप्पी।
बाक पात्र पर यह कहाँ तक लागू होता है —
जगन मास्टर — वे भी संवादहीन ह, पर दूसरे अथ म। उन्ह ने न ताई से पूछा, न पत्नी से बात क , न गाँव से
सलाह ली — नणय अकेले लया। उनका मौन आत्म-क द्रत है, ताई का मौन थोपा हुआ। इस लए शीषक उन
पर लागू तो होता है, पर करुणा के साथ नह , व्यंग्य के साथ।
मट्ठू — उस पर शीषक सबसे कम लागू होता है — कहानी म सबसे अ धक ‘बोलने वाला’ पात्र वही है। हाँ, वह
वही दुहराता है जो सखाया गया — यानी उसका बोलना असली संवाद नह , अनुकरण है। इस अथ म वह भी
संवादहीन ठहरता है।
नया तोता — वह अक्षरशः संवादहीन है — “उसने उन्ह दे खकर कोई हरकत नह क ।” पर वह मूक इस लए है
क उसे अभी सखाया नह गया; उसका मौन करुणा नह , स्थ त है। वह ताई क संवादहीनता को उजागर
करने का साधन-भर है।
दूसरा दृ ष्टकोण भी बनता है: य द कोई कहे क शीषक पूरे समाज के लए साथक है, तो वह भी सही है — गाँव
छोड़ चुके बेटे-बहुएँ, सलाह-मश वरा कए बना नणय लेते लोग, और सच बताने के बजाय ‘एवजी तोता’ ले आने
वाला गाँव — सभी संवाद से बच रहे ह। परीक्षा म कोई भी पक्ष ली जए, पर कारण पाठ से द जए।
प्र.7 “अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच म स्थत बड़े घर के उस सूने खंडहर म एक-दूसरे को सहारा दे ने के लए रह गए
थे।” ताई के बड़े से घर को सूना खंडहर क्य कहा गया होगा?
घर क द वार गरी नह थ — घर म रहने वाले लोग चले गए थे। लेखक ने ‘खंडहर’ शब्द भवन क दशा के लए नह , घर के
भीतर के जीवन क दशा के लए इस्तेमाल कया है। यह एक प्रतीक है।
कारण —
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन
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1. घर का अथ ही लोग ह। कभी वहाँ “पूत-प रवार, बहू-बे टयाँ, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, क्या नह था!” अब उसी म केवल दो
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प्राणी बचे — एक वृद्धा और एक तोता। जस भवन म इतने लोग क जगह हो और वह खाली पड़ा हो, वह अपने ही आकार के
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g य जैसे उन्ह काटने को दौड़ती
2. आवाज बुझ.c
कारण और भी वीरान लगता है।
गईं। लेखक ने सूनेपन को सुनाई दे ने वाली चीज़ बना दया — “सूने घर क भाँयa-भाँ
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e आवाज न बचे, वहाँ जीवन नह बचता।
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agवैभव का ढाँचा-भर शेष है। जम दारी गई, खेती-बाड़ी गई, कारबार गया — “धीरे-धीरे सब पराए हाथ म चला गया।” बचा
थी।”
3.
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केवल पुराना भवन, यानी बीते वैभव का अवशेष। और अवशेष का ही दूसरा नाम खंडहर है।
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4. ‘गाँव के बीच म स्थत’ पद वडंबना बढ़ाता है। घर गाँव के कनारे नह , ठ क बीच म है — फर भी सूना। भीड़ के बीच का
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अकेलापन ही सबसे गहरा अकेलापन होता है।
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शल्प: ‘सूना खंडहर’ शब्द-युग्म कहानी के शीषक ‘संवादहीन’ का ही दूसरा रूप है — खंडहर वह जगह है जहाँ अब
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कोई कसी से बात नह करता।
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मेरgे lप्रश्न — पृष्ठ 53 और 54
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रचना से संवाद
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रचना से सं वाद प्रश्न- नमाण
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प्र.1
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उत्तर: ताई के अकेलेपन को मट्ठू ने सहारा दया। प्रश्न क : ताई के सूनेपन को कसने सहारा दया था? प्रश्न ख :
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ताई को मट्ठू कसने भट म दया था? — इनम से कौन-सा प्रश्न उस उत्तर के लए उपयुक्त है?
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क्त. प्रश्न — प्रश्न क : “ताई के सूनेपन को कसने सहारा दया था?”
उपयुm a
l a se — दए गए उत्तर का कता ‘ मट्ठू’ है और उसम बताई गई क्रया है ‘सहारा देना’। प्रश्न क ठ क यही दो बात पूछता है —
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कसने (कता) और सहारा दया ( क्रया)। ‘अकेलापन’ और ‘सूनापन’ पयायवाची ह, इस लए अथ भी पूरी तरह मेल खाता है।
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प्रश्न ख क्य नह — वह पूछता है क मट्ठू को भट म कसने दया। उसका उत्तर मट्ठू नह , गनपत होगा — “भला हो गनपत का,
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asउपयुक्त नह ।
जसने ताई के सूनेपन को सहारा दे दया था, वह न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था।” उत्तर म गनपत का नाम
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है ही नह , इस लए वह प्रश्न इस उत्तर के लए
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नयम याद र खए: प्रश्न मलाते समय दे खए क उत्तर का कता कौन है। प्रश्नवाचक शब्द (कौन, कब, कहाँ, क्य ,
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कैसे) उसी सूचना को माँगे, जो उत्तर म नई है।
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प्र.2 उत्तर: ताई के लौटने से पहले मट्ठू उड़ गया था। प्रश्न क : ताई के लौटने के बाद मट्ठू कहाँ चला गया था? प्रश्न ख :
ताई के प्रयागराज से लौटने से पहले क्या अनहोनी हुई? — इनम से कौन-सा प्रश्न उस उत्तर के लए उपयुक्त है?
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उपयुक्त प्रश्न — प्रश्न ख : “ताईaकg
े प्रयागराज से लौटने से पहले क्या अनहोनी हुई?”
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कारण — उत्तर म दो सूचनाएँ ह — (1) समय: लौटने से पहले, और (2) घटना: मट्ठू का उड़ जाना। प्रश्न ख दोन को ठ क-ठ क
पकड़ता है; ‘अनहोनी’ शब्द भी कहानी का ही है — “गाँव म सभी के मन म इस अनहोनी घटना ने एक गहरी आशंका को जन्म दे
दया था।”
प्रश्न क क्य नह — उसम दो गल तयाँ ह। पहली, समय उलटा है — वह ‘लौटने के बाद’ पूछ रहा है, जब क घटना लौटने से पहले
हुई थी। दूसरी, वह ‘कहाँ’ पूछ रहा है, यानी स्थान माँग रहा है; और उसका उत्तर कहानी म है ही नह — लेखक स्वयं कहता है, “न
जाने कन अमराइय म घूम रहा होगा।”
प्र.3 उत्तर: गाँववाल को डर था क ताई को स ाई जानकर सदमा लगेगा। प्रश्न क : गाँववाले ताई क वापसी से क्य
च तत थे? प्रश्न ख : गाँववाले मट्ठू के उड़ने से खुश क्य थे? — इनम से कौन-सा प्रश्न उस उत्तर के लए उपयुक्त
है?
उपयुक्त प्रश्न — प्रश्न क : “गाँववाले ताई क वापसी से क्य च तत थे?”
कारण — उत्तर म ‘डर’ और उसका कारण दोन ह, और प्रश्न क ठ क कारण (‘क्य ’) माँगता है। कहानी भी यही कहती है — “ताई
के तेज स्वभाव के अ त रक्त मट्ठू के प्र त उनके लगाव को सभी जानते थे और लौटकर मट्ठू को न पाने पर उनक क्या दशा हो
सकती है, इसका अनुमान वे भली-भाँ त लगा सकते थे।” इसी चता से गनपत ने एवजी तोता लाने का सुझाव दया।
प्रश्न ख क्य नह — उसम एक गलत पूवधारणा छपी है — क गाँववाले खुश थे। पाठ इसका उलटा कहता है: वे खुश नह ,
च तत और आशं कत थे। जस प्रश्न क मान्यता ही झूठ हो, उसका कोई उत्तर सही नह हो सकता।
प्र.4 उत्तर: कहानी का शीषक ‘संवादहीन’ जीवन के मौन का प्रतीक है। प्रश्न क : कहानी का शीषक ‘संवादहीन’ क्य
उपयुक्त नह है? प्रश्न ख : शीषक ‘संवादहीन’ का क्या भावाथ है? — इनम से कौन-सा प्रश्न उस उत्तर के लए
उपयुक्त है?
उपयुक्त प्रश्न — प्रश्न ख : “शीषक ‘संवादहीन’ का क्या भावाथ है?”
कारण — दया गया उत्तर शीषक का अथ खोल रहा है — क यह जीवन म छाए मौन का प्रतीक है। ‘भावाथ’ का अथ ही है भीतर
छपा भाव। इस लए प्रश्न और उत्तर का प्रकार एक ही है — दोन व्याख्यात्मक ह।
प्रश्न क क्य नह — वह शीषक क अनुपयुक्तता पर तक माँगता है, यानी उसका उत्तर शीषक के वरुद्ध होना चा हए। दया गया
उत्तर तो शीषक क साथकता बता रहा है। प्रश्न और उत्तर क दशा उलट है, इस लए मेल नह बैठता।
याद र खए: ‘क्य उपयुक्त नह है’ जैसे प्रश्न नषेधात्मक होते ह। उनका उत्तर भी नषेधात्मक तक माँगता है। प्रश्न-
मलान म सबसे पहले यही दे खए क प्रश्न क दशा (सकारात्मक/नकारात्मक) उत्तर क दशा से मलती है या नह ।
मेरे अनुभव मेरे वचार — पृष्ठ 54
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रचना से संवाद
रचना से सं वाद अपनी बात
प्र.1 “कभी-कभार गाँव म थोड़ी दे र के लए भी न्यौते-बुलावे म जात , तो दस बार खड़क -दरवाज क साँकल टोहकर
दे खत ...” ताई क तरह जब आप अपने घर या प रवार से दूर होते ह, तो कसी वस्तु या व्य क्त क चता आपको
भीतर से कैसे परेशान करती है?
यह अनुभव-आधा रत प्रश्न है, इस लए उत्तर आपका अपना होगा। पर एक अच्छे उत्तर म तीन बात अवश्य होनी चा हए — (1) कौन
या क्या पीछे छू टा था, (2) चता ने शरीर और मन पर क्या असर डाला (मन का बार-बार वह लौटना, बेचैनी, न द न आना), और
(3) उस चता के पीछे का कारण — चता वह होती है जहाँ लगाव होता है।
ताई के प्रसंग से जो ड़ए: ताई क चता उनके व्यवहार म दखती है — दस बार साँकल टोहना, मट्ठू को “कंजूस के धन क तरह
छपाकर रखना” और “जल्द लौट आने का दलासा दे कर दे हरी से पाँव बाहर नकालना।” लेखक ने चता को कहा नह , क्रयाओं
से दखाया है। आप भी अपने उत्तर म यही क जए।
नमूना उत्तर:
पछली ग मय म मुझे दस दन के लए मामा के घर जाना पड़ा। घर पर मेरी बीमार दाद और मेरा पल्ला ‘मोती’ रह गए थे। बस म
बैठते ही मन वह अटक गया। दन म तीन-चार बार फोन करता — दाद ने दवा ली या नह , मोती ने खाना खाया या नह । मामा के
घर आम भी थे, खेल भी था, फर भी कसी काम म मन नह लगता था। रात म न द टू ट जाती और लगता क कह दाद को कुछ
चा हए तो कौन दे गा। लौटते समय बस जतनी धीमी चलती, उतनी ही बेचैनी बढ़ती जाती। घर पहुँचकर सबसे पहले म दाद के कमरे
म गया, फर मोती को गोद म उठाया — तब जाकर साँस म साँस आई।
नष्कष जो आप लख सकते ह: दूरी शरीर क होती है, चता मन क । जससे हमारा लगाव है, वह हमारे साथ
यात्रा करता रहता है। ताई का शरीर प्रयागराज म था, पर मन बड़े घर के उस पजरे के पास ही रह गया था।
प्र.2 “आ खर वह भी तो बोलता-ब तयाता प्राणी है।” क्या आप मानते ह क पशु-प क्षय म भी संवेदनाएँ होती ह?
अपने कसी अनुभव का वणन करते हुए ल खए।
हाँ, पशु-प क्षय म भी संवेदनाएँ होती ह। वे भाषा म नह बोलते, पर व्यवहार म बोलते ह — पहचानना, प्रतीक्षा करना, डरना,
चढ़ना, दुलार करना, रूठना — ये सब संवेदना के ही रूप ह।
कहानी से प्रमाण — मट्ठू केवल शब्द नह दुहराता, वह स्थ त पहचानकर प्र त क्रया दे ता है —
ताई थककर लेटत और पूछत “ मट्ठू! अब कैसे कटे गी?” तो वह ढाढ़स बँधाता — “कटे गी! कटे गी!! कटे गी!!!”
ताई आशीष दे त तो वह भी “अपनी बुजुग दखाकर” लौटाता — “खुश रहो! खुश रहो!!”
वह रूठता भी है — “अपनी कसी जद को मनवाने के लए … पानी और दाने क कटो रय को जान-बूझकर उलटा दे ते।”
वह खीझ भी लौटाता है — ताई क खीझ पर “उतनी ही खीझ के साथ हमला बोल दे ते, ‘मर जा! मर जा! मर जा!’”
वह ताई क बात सुनता है — “कभी धैयवान श्रोता बना रहता और कभी … कुछ ट का- टप्पणी कर दे ता।”
नमूना उत्तर (अपना अनुभव):
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हमारे घर म एक गाय है — क पला। मेरे दादाजी उसे रोज सुबह गुड़ खलाते थे। जस साल दादाजी नह रहे, उसके बाद कई दन
तक क पला ने ठ क से चारा नह खाया। शाम को जस समय दादाजी आते थे, उसी समय वह दरवाजे क ओर मुँह करके खड़ी हो
जाती और लंबी आवाज लगाती। कसी ने उसे बताया नह था, फर भी उसे कमी महसूस हुई। तभी मने समझा क प्रेम और अभाव
समझने के लए भाषा जरूरी नह होती।
वाक्य का संदभ: “आ खर वह भी तो बोलता-ब तयाता प्राणी है” — यह गाँव के कसी व्य क्त ने मजाक म कहा था
क रेलगाड़ी म मट्ठू का भी टकट लगेगा। हँसी म कही गई यह बात असल म गहरी बात कह जाती है — जो बोलता-
ब तयाता है, वह केवल ‘चीज़’ नह , ‘प्राणी’ है।
प्र.3 “गनपत ने ही एक सुझाव दया क मट्ठू क ही सूरत-शक्ल का एक दूसरा तोता ले आया जाए ता क ताई को भ्रम
म रखा जा सके...” ताई को भ्रम म रखना उ चत था या नह ? तक स हत अपने वचार ल खए।
मेरे वचार से ताई को भ्रम म रखना उ चत नह था — यद्य प उसके पीछे क नीयत बुरी नह थी। नीचे दोन पक्ष रखे ह, फर
नष्कष।
पक्ष म तक (जो गाँववाल ने सोचा) वपक्ष म तक (जो अ धक भारी पड़ता है)
ताई वृद्ध ह; अचानक सदमा उनके स्वास्थ्य के झूठ सदमे को टालता नह , टाल दे ता है। ताई ने पहले दन ही पहचान लया क यह उनका
लए खतरनाक हो सकता था। मट्ठू नह — “वहाँ बैठे एवजी मट्ठू ने उन्ह दे खकर कोई हरकत नह क ।”
वे मट्ठू के प्र त बहुत लगाव रखती थ और लगाव जतना गहरा हो, धोखा उतना ही गहरा चुभता है। पीछे से सच जानने पर ताई को दो
स्वभाव भी तेज था। चोट लगत — मट्ठू के जाने क और अपन के छल क ।
गाँववाल क मंशा ताई को बचाने क थी, ताई से पूछे बना नणय लेना उन्ह नणय के अ धकार से वं चत करना है — वही गलती जो
नुकसान पहुँचाने क नह । जगन मास्टर ने पजरा खोलते समय क थी।
बदले म वैसा ही तोता दे ना एक तरह क रश्त क भरपाई नह होती। मट्ठू ताई के लए ‘एक तोता’ नह , वष म बना साथी था —
भरपाई थी। उसक जगह कोई और तोता ले ही नह सकता।
नष्कष — उ चत यह होता क गाँववाले ताई को सच बताते और साथ खड़े रहते — बताते क यह कैसे हुआ, यह कसी क
दुभावना नह थी, और वे उनके साथ ह। दुख बाँटा जा सकता है; छपाया गया दुख बाद म और बड़ा होकर लौटता है। कहानी का
शीषक भी इसी ओर इशारा करता है — समस्या तोते के उड़ने क नह , संवाद न होने क है। एवजी तोता लाना असल म एक और
संवादहीनता थी।
य द आप दूसरा पक्ष ल: तो भी उत्तर मान्य है, बशत आप शत लगाएँ — “भ्रम म रखना केवल तभी उ चत होता,
जब वह अस्थायी हो और उ चत समय पर सच बता दया जाता।”
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प्र.4 “ताई सोच रही थ क उन्ह दे खते ही मट्ठू ‘राम राम सीताराम’ क रट लगाकर आसमान सर पर उठा लेगा।” क्या
कभी ऐसा हुआ क आपने सोचा कुछ और, हुआ कुछ और? उस अनुभव को ल खए।
अच्छे उत्तर म तीन चरण होने चा हए — (1) अपेक्षा (आपने क्या सोचा था और क्य ), (2) यथाथ (वास्तव म क्या हुआ), और (3)
उस क्षण क भावना और उससे मली सीख।
कहानी म यह शल्प कैसे काम करता है — लेखक ने ताई क पूरी कल्पना पहले खोलकर रखी — मट्ठू “रट लगाकर आसमान
सर पर उठा लेगा, पजड़े म कूद-फाँद मचाकर तूफान खड़ा कर दे गा” — और फर एक ठं डे वाक्य से उसे तोड़ दया: “वह केवल
इधर-उधर ताकता रहा।” अपेक्षा जतनी शोर भरी थी, यथाथ उतना ही चुप — यही वरोधाभास पाठक को भीतर तक हला दे ता
है।
नमूना उत्तर:
पछले वष वद्यालय क वाद- ववाद प्र तयो गता म मने बहुत तैयारी क थी। मुझे पूरा भरोसा था क पहला पुरस्कार मुझे ही मलेगा
— मने मन ही मन यह भी सोच रखा था क घर लौटकर माँ को ॉफ कैसे दखाऊँगा। मंच पर म अच्छा बोला भी, पर प रणाम म
मेरा नाम तीसरे स्थान पर आया। पहले कुछ क्षण तो जैसे कान ने सुना ही नह । ता लयाँ बज रही थ और म चुपचाप बैठा था। घर
लौटकर मने माँ से कहा क म हार गया। माँ ने कहा — “तुम हारे नह , तुमने पहली बार मंच पर पूरा भाषण बना अटके दया।” उस
दन मने सीखा क अपेक्षा हमारी बनाई हुई होती है, यथाथ हमारे हाथ म नह । पर यथाथ म भी कुछ न कुछ पाने को रहता ही है —
बस उसे दे खने क दृ ष्ट चा हए।
प्र.5 “ मट्ठू अब पजरे म रहने के इतने आद हो चुके थे क उन्ह ने बाहर आने क कोई इ ा नह प्रकट क ।” क्या
प्राणी सचमुच पजरे म रहने के आद हो सकते ह? अपने उत्तर के समथन म अपने आस-पास से उदाहरण भी
द जए।
हाँ, हो सकते ह। लंबी कैद स्वतंत्रता क इच्छा को मटाती नह , पर उसे सुला दे ती है। जब भोजन, पानी और सुरक्षा बना प रश्रम
के मलने लग, तो प्राणी उसी सी मत घेरे को अपनी दु नया मान लेता है। इसी को आदत का बंधन कहते ह — यह लोहे क सलाख
से भी मजबूत होता है।
कहानी इसे दो चरण म दखाती है —
1. पहला दन: दरवाजा खुला है, पर “ मट्ठू अब पजरे म रहने के इतने आद हो चुके थे क उन्ह ने बाहर आने क कोई इच्छा नह
प्रकट क ।” जगन मास्टर को दाना बखेरकर बुलाना पड़ता है, और बाहर आकर भी वह “ फर पजरे क छत पर बैठ” जाता है
— यानी पजरे से दूर नह जाता।
2. चौथा-पाँचवाँ दन: जैसे ही खुला रोशनदान दखता है, सोई हुई इच्छा जाग उठती है और वह उड़ जाता है। आदत इ ा को
मार नह पाई थी, केवल ढाँप रखा था।
आस-पास से उदाहरण:
बहुत दन तक बँधी रहने वाली बकरी या गाय क रस्सी खोल द जाए, तो भी वह खूँटे के आसपास ही घूमती रहती है।
पजरे म पले तोते या मु नया को छोड़ने पर वे अक्सर उड़ नह पाते या शाम को उसी घर लौट आते ह — क्य क उन्ह ने अपना
भोजन ढूँ ढ़ना कभी सीखा ही नह ।
च ड़याघर के जन जानवर को बाद म जंगल म छोड़ा जाता है, उनके लए पहले पुनवास का लंबा प्र शक्षण दे ना पड़ता है —
यह इसी बात का प्रमाण है क कैद आदत बना दे ती है।
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मनुष्य म भी यही होता है — जो ब ा कभी अकेले बाजार न गया हो, उसे आजाद मलने पर भी पहले दन डर लगता है।
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कहानी का बड़ा संदेश: जगन मास्टर क भूल यह थी। उन्ह ने सोचा क पजरा खोल दे ने भर से आजाद मल
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जाएगी। पर आजाद केवल दरवाजा खोलना नह है — उसके लए तैयारी भी चा हए। बना तैयारी द गई
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आजाद मट्ठू के लए वरदान थी या संकट, यह कहानी जान-बूझकर नह बताती।
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कहानी का स दय — पृष्ठ 54 और 55
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वधा से संवाद a
वधा से सं वाद ता लका
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emउनके उदाहरण दए गए ह ( चत्रात्मकता/दृश्य बब, संवादात्मकता, पुनरु क्त, अ तशयो क्त, लोकधम भाषा,
प्र.1 ‘संवादहीन’ कहानी म अनेक वशेष बदु ह जो इसे प्रभावपूण बनाते ह। नीचे कहानी के कुछ वशेष बदु और
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a gl प्रश्नोत्तर शैली)। आप भी कहानी से इसी प्रकार के एक-एक उदाहरण खोजकर ल खए।
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नीचे पूरी ता लका है — पुस्तक म दया गया अथ और उदाहरण, और उसके आगे कहानी से खोजा गया एक नया उदाहरण, साथ
म यह भी क वह उस बदु का उदाहरण क्य g
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वशेष बदु अथ पुस्तक म दया उदाहरण मेरा खोजा हुआ उदाहरण
चत्रात्मकता शब्द के माध्यम से पाठक के मन म “ मट्ठू एक डाल से दूसरी डाल “ ढीली धोती को दोनों हाथों से सँभालते हुए
(दृश्य बब) स्पष्ट और जीवंत चत्र या छ वयाँ पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर वह बाग में एक पेड़ से दू सरे पेड़ के पास,
बनाना। अपने पंख तौलने म मशगूल ‘िम ू आ ! िम ू आ !!’ पुक ारते हुए पसीना-
रहे।” पसीना होते रहे।”
— हाँफते, धोती सँभालते, पसीने से तर
मास्टर का पूर ा दृश्य आँखों के सामने खड़ा
हो जाता है।
संवादात्मकता कथ्य को आगे बढ़ाने के लए, पात्र “राम-राम कहो, सीताराम ताई — “िम ू ! अब कै से कटेगी?” / िम ू
के वचार, भाव आ द व्यक्त करने कहो।” — “कटेग ी! कटेग ी!! कटेग ी!!!”
के लए बातचीत और संवाद का — दो पंिक्तयों के इस संवाद से ताई की
प्रयोग। थकान और िम ू का सहारा, दोनों एक साथ
खुल जाते है।
ं
पुनरु क्त शब्द क बार-बार पुनरावृ त्त से “कटे गी! कटे गी!! कटे गी!!!” “मर जा! मर जा! मर जा!”
भाव क तीव्रता। — एक ही शब्द तीन बार आकर खीझ को
चरम पर पहच
ु ँ ा देता है। साथ ही “हर हर
गंग े! हर हर गंग े!!” भी पुनरुिक्त है।
अ तशयो क्त कसी पात्र, घटना, भाव या वस्तु का “रेलगाड़ी म उसका भी टकट “िम ू ‘राम राम सीताराम’ की रट लगाकर
वणन इतना बढ़ाकर करना क वह लगेगा, आ खर वह भी तो आसमान िसर पर उठा ले गा, िपंजड़ े में कू द-
असंभव या अ वश्वसनीय लगे। बोलता-ब तयाता प्राणी है।” फाँद मचाकर तूफ ान खड़ ा कर दे गा।”
— एक तोते के शोर को आसमान उठाने
और तूफान खड़ा करने िजतना बड़ा कह
देना अितशयोिक्त है।
लोकधम भाषा ग्रामीण, सहज, बोल-चाल क “भगवान! कैसे नैया पार “ अपनी अके ली जान के िलए ताई दो जून
भाषा। लगेगी?” का एक जून चू ा फूँ क ले तीं, वत-उपवास
ल्ह
के बहाने चौका-चू ा टाल जातीं।”
ल्ह
— ‘जून’, ‘चूल्हा फूँकना’, ‘चौका-चूल्हा’
— ये सब गाँव की रोजमर की जबान के
शब्द है।
ं
प्रश्नोत्तर शैली पात्र या लेखक द्वारा प्रश्न पूछना। “ मट्ठू! अब कैसे कटे गी?” “पूत-पिरवार, बहू-बेिटयाँ, नौकर-चाकर,
गाय-ढोर, या नहीं था बड़ े घर में! …
क्
िकसके भरोसे कारबार संभलता।”
— यहाँ पश्न लेखक स्वयं पूछता है और
उत्त र की अपे ा नही ं करता; ऐसा पश्न
पाठक को सोचने में शािमल कर लेता है।
ये बदु कहानी को प्रभावपूण क्य बनाते ह: ‘संवादहीन’ बहुत छोट कहानी है — कुल पाँच-छह पृष्ठ। इतनी कम
जगह म पूरा जीवन दखाने के लए लेखक व्याख्या नह करता, चत्र और संवाद रख दे ता है। लोकधम शब्द
कहानी को गाँव क मट्ट से जोड़ते ह, पुनरु क्त भाव को तीव्र करती है, और अ तशयो क्त ताई क उम्मीद को इतना
ऊँचा उठा दे ती है क अंत क चुप्पी और गहरी लगे।
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कहानी का अंत — पृष्ठ 55
वधा से संवाद
वधा से सं वाद कहानी क पहचान
प्र.1 कसी कहानी का अंत अनेक प्रकार से हो सकता है जैसे— 1. सुखांत 2. दुखांत 3. मुक्त अंत 4. अप्रत्या शत अंत
5. यथाथवाद अंत 6. प्रेरणात्मक अंत 7. व्यंग्यात्मक अंत। आपके अनुसार ‘संवादहीन’ कहानी के अंत को कस
श्रेणी म रखा जा सकता है? अपने उत्तर के कारण भी बताइए।
मेरे अनुसार ‘संवादहीन’ का अंत मुख्यतः मुक्त अंत है, और साथ-साथ यथाथवाद भी। इसम व्यंग्य क एक परत भी है।
कहानी क अं तम पं क्त — “ताई अपने मट्ठू को गुहार कर थक गईं ले कन उनके सूनेपन का साथी न जाने कन अमराइय म घूम
रहा होगा।”
श्रेणी क्य लागू होती है
मुक्त अंत कहानी कह ‘खत्म’ नह होती — बहुत-से प्रश्न खुले छोड़ दए जाते ह। ताई को सच पता चला या नह ? क्या वे एवजी तोते
(मुख्य) को अपना लगी? मट्ठू जंगल म जी वत रह पाया या नह ? लेखक एक भी उत्तर नह दे ता। ‘न जाने’ और ‘घूम रहा होगा’
— ये संदेहवाचक शब्द ही संकेत ह क नणय पाठक पर छोड़ा गया है।
यथाथवाद जीवन म भी ऐसा ही होता है — जो चला जाता है वह लौटकर नह आता, और कोई नाटक य चमत्कार नह होता। न ताई
अंत बेहोश होती ह, न गाँव इक ा होता है, न मट्ठू लौटता है। सब कुछ चुपचाप, बना शोर के घट जाता है — यही यथाथ है।
व्यंग्यात्मक अंत म सबसे बड़ी वडंबना यह है क एक आदशवाद के अच्छे इरादे ने एक वृद्धा का इकलौता सहारा छ न लया, और
परत गाँव ने उसे झूठ से ढाँकना चाहा। “अकेले मट्ठू क्या उड़े, आदशवाद जगन मास्टर के हाथ के सभी तोते उड़ गए” — यह
वाक्य व्यंग्य क तीखी नोक है।
दुखांत क्य नह कहा: दुखांत म मृत्यु, वनाश या स्पष्ट हा न दखाई जाती है और दुख को पूरा कया जाता है। यहाँ
कसी क मृत्यु नह होती, कहानी करुण अवश्य है पर उसका दुख अधूरा और खुला छोड़ा गया है — इसी लए
‘मुक्त अंत’ कहना अ धक सही है। य द आप ‘दुखांत’ लखना चाह तो भी लख सकते ह, बशत कारण द क ताई
का वयोग स्थायी है। महत्त्व श्रेणी का नह , तक का है।
प्र.2 आप इस कहानी का नया अंत कस प्रकार करना चाहगे?
पहले तय क जए क आप कौन-सी श्रेणी का अंत लखना चाहते ह, फर उसी दशा म ल खए। नया अंत लखते समय तीन शत
र खए —
पात्र का स्वभाव न बदले (ताई भावुक और तेज रह, जगन मास्टर आदशवाद रह)।
कहानी का मूल स्वर — संवादहीनता — कसी न कसी रूप म बना रहे या टू टे तो साथक ढं ग से टू टे।
अंत अचानक न लगे; उसक भू मका कहानी म पहले से मौजूद हो।
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नमूना उत्तर (प्रेरणात्मक अंत):
ताई दे र तक चुप बैठ रह । फर उन्ह ने काँपते हाथ से पजरे का दरवाजा खोल दया। नया तोता कुछ दे र सहमा-सा बैठा रहा, फर
फुदककर दे हरी पर आ गया और वह से बाहर आँगन क ओर दे खने लगा। जगन मास्टर सर झुकाए खड़े थे। ताई ने धीरे से कहा —
“मास्टर, तुमने गलत नह कया, बस पूछ लेते तो अच्छा था।” उस दन के बाद ताई ने पजरा फर कभी नह टाँगा। हर सुबह वे
आँगन म मु भर चावल बखेर दे त और बरामदे म बैठकर पुकारत — “हर हर गंगे!” कुछ दन बाद पेड़ से उतरकर तोत का एक
झुंड आँगन म आने लगा। ताई को नह पता था क उनम उनका मट्ठू है या नह , पर अब बड़े घर म भाँय-भाँय नह होती थी; वहाँ रोज
सुबह कई आवाज उतरती थ ।
दूसरे वकल्प जो आप आजमा सकते ह —
अप्रत्या शत अंत: एवजी तोता अचानक बोल उठे — “कटे गी! कटे गी!!” — और ताई समझ न पाएँ क हँस या
रोएँ।
व्यंग्यात्मक अंत: ताई सब जान जाएँ, कुछ न कह, और गाँव यह मानकर संतुष्ट रहे क उसका झूठ चल गया।
यथाथवाद अंत: ताई नए तोते को भी दाल-भात बनाकर खलाने लग — क्य क अकेलेपन के पास इंतजार
करने का समय नह होता।
पात्र, कुंभ और मेला — पृष्ठ 56
वषय से संवाद
वषय से सं वाद पता लगाइए
प्र.1 “अंत म जगन मास्टर क घरवाली ने उनक चता दूर कर द ।” कहानी म रेखां कत पात्र का नाम नह दया गया
है। इसे कह ‘मास्टराइन’, तो कह ‘जगन मास्टर क घरवाली’ कहा गया है। आपके अनुसार कहानी म ऐसा क्य
कया गया होगा?
ऐसा जान-बूझकर कया गया है, और इसके पीछे कम से कम चार कारण दखाई दे ते ह।
1. यह उस समाज का यथाथ है। गाँव म स्त्री क पहचान अक्सर उसके अपने नाम से नह , प त के नाम या पेशे से बनती है —
‘मास्टराइन’, ‘पं डताइन’, ‘लम्बरदा रन’, ‘फलाँ क घरवाली’। लेखक ने समाज क भाषा वैसी ही रख द , जैसी वह है। यह
लेखक का पक्ष नह , समाज का दपण है।
2. यह चुपचाप कया गया एक व्यंग्य है। ध्यान द जए — कहानी म ताई का भी असली नाम नह है। दोन स्त्रयाँ रश्ते के नाम
से जानी जाती ह, जब क पुरुष पात्र के अपने नाम ह — जगन मास्टर, गनपत। यह अंतर अपने आप बहुत कुछ कह दे ता है।
जस कहानी का शीषक ‘संवादहीन’ हो, उसम स्त्री का नाम तक न बोला जाना अथपूण है।
3. वह पात्र नह , भू मका है। कहानी म उसका काम इतना ही है क वह ताई क चता दूर करे और मट्ठू को अपने घर रखे।
कहानी का कद्र ताई, मट्ठू और जगन मास्टर ह। गौण पात्र को नाम न दे कर लेखक पाठक का ध्यान बँटने नह दे ता — यह
कहानी वधा क कसावट है।
4. यह वडंबना को गहरा करता है। जो स्त्री बना प त से पूछे दा यत्व लेने का साहस करती है (“उनसे सलाह लए बना
मास्टराइन ने ताई का भार अपना लया था”), उसी का अपना नाम कहानी म नह है। नणय उसका, नाम प त का।
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तुलना क जए: प्रेमचंद क कहा नय म भी ‘होरी क घरवाली’, ‘ध नया’ जैसे प्रयोग मलते ह। जहाँ नाम दया
जाता है, वहाँ पात्र व्य क्त बन जाता है; जहाँ नह दया जाता, वह वग बना रहता है।
प्र.2 (क) “गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लए प्रयागराज जा रहे थे” — ‘कुंभ-स्नान’ एक सुप्र सद्ध आयोजन है
जसम करोड़ लोग भाग लेते ह। पता लगाइए— • इसका आयोजन क्य कया जाता है? • पछली बार
इसका आयोजन कब और कहाँ हुआ था? • अगला आयोजन कब और कहाँ होगा?
1. आयोजन क्य कया जाता है —
पौरा णक आधार: समुद्र-मंथन से नकले अमृत-कलश (कुंभ) को लेकर दे वताओं और असुर म संघष हुआ। उस दौरान अमृत
क कुछ बूँद प्रयागराज, ह रद्वार, उ ैन और ना सक — इन चार स्थान पर गर । इसी स्मृ त म इन्ह चार स्थान पर कुंभ
लगता है।
ज्यो तषीय आधार: कुंभ क त थ सूय, चंद्रमा और बृहस्प त क वशेष रा श- स्थ त से तय होती है। बृहस्प त को एक रा श से
दूसरी रा श म जाते हुए लगभग 12 वष लगते ह — इसी लए एक स्थान पर पूण कुंभ हर 12 वष म और अधकुंभ हर 6 वष म
आता है। ना सक और उ ैन के कुंभ को सहस्थ कहते ह।
सामा जक-सांस्कृ तक उ े श्य: यह केवल स्नान नह , दे श भर के साधु-संत , अखाड़ , वद्वान और सामान्य श्रद्धालुओं का
महा मलन है। यहाँ शास्त्राथ, प्रवचन, लोक-कलाएँ और व्यापार भी होते ह। सन् 2017 म यूनेस्को ने कुंभ मेले को मानवता क
अमूत सांस्कृ तक वरासत क सूची म शा मल कया।
2. पछली बार — पछला और सबसे बड़ा आयोजन महाकुंभ, प्रयागराज (उत्तर प्रदे श) म हुआ, जो 13 जनवरी 2025 (पौष
पू णमा) से 26 फरवरी 2025 (महा शवरा त्र) तक चला। यह त्रवेणी संगम — गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम — पर
लगा और इसम करोड़ श्रद्धालु आए।
3. अगला आयोजन — चार स्थान का क्रम इस प्रकार चलता है:
स्थान नद कुंभ का नाम लगभग कब
प्रयागराज (उ.प्र.) गंगा-यमुना-सरस्वती संगम महाकुंभ / कुंभ िपछला — 2025; अगला अधकुं भ लगभग 2031
ना सक-त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र) गोदावरी सहस्थ कुंभ अगला — लगभग 2027–28
उ ैन (म.प्र.) क्षप्रा सहस्थ कुंभ अगला — लगभग 2028
ह रद्वार (उत्तराखंड) गंगा कुंभ िपछला — 2021; अगला लगभग 2033
जरूरी सावधानी: कुंभ क सही त थयाँ ग्रह-नक्षत्र क गणना के आधार पर अखाड़ा प रषद और संबं धत राज्य
सरकार घो षत करती ह, और वे आगे-पीछे हो सकती ह। इस लए उत्तर लखने से पहले वतमान वष क सरकारी
घोषणा एक बार जाँच ली जए — यह भी ‘पता लगाना’ सीखने का ही हस्सा है।
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प्र.2 (ख) मान ली जए क ताई आपके मोहल्ले म रहती ह। वे कुंभ-स्नान के लए कैसे गई ह गी? उनक यात्रा का वणन
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ल खए। (संकेत— कहाँ से कहाँ तक क यात्रा, टकट, यात्रा के साधन, संगी-साथी, खान-पान,
आ.cद।)
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यह कल्पना-लेखन है। अच्छे उत्तर म संकेत म दए गए सभी बदु आने चा हए और भाषा वैसी ही सहज-ग्रामीण होनी चा हए जैसी
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कहानी क है। कहानी से एक सूत्र भी उठा ली जए — ताई मट्ठू को पीछे छोड़कर च तत थ और “जल्द लौट आने का दलासा”
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दे कर नकली थ ।
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माघ का महीना था। मोहल्ले के पं डत जी ने बताया क पूस क पू णमा से प्रयागराज म कुंभ लग रहा है। ताई ने पहले तो सुनकर
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अनसुना कर दया, फर तीन दन बाद अपनी पुरानी संदूकची खोलकर बैठ गईं। उसम से एक धुला हुआ सफेद धोती-जोड़ा, ताँबे का
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लोटा और गाँठ म बँधे कुछ रुपये नकले।
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.c से शुरू हुई। सुबह चार बजे टे ो आया, जसम ताई के साथ पड़ोस क सात-आठ a g बूढ़ औरत और दो-तीन पुरुष
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भी थेs। eटे ो से रेलवे स्टे शन पहुँचे। वहाँ लंबी लाइन म लगकर मास्टर जी के लड़के ने सबके सामान्य श्रेणी के टकट लए। ताई
यात्रा हमारे मोहल्ले
la अपनी पोटली टटोलती रह , जसम सत्तू, गुड़, भुने चने और एक छोट ड बया म हल्द बँधी थी।
agबार-बार
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गाड़ी म इतनी भीड़ थी क बैठने क जगह नह मली; ताई दरवाजे के पास अपनी गठरी पर ही बैठ गईं। रास्ते भर औरत भजन गाती
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रह — “हर हर गंगे!” कसी ने पूछा, “ताई, तोता कसके पास छोड़ आईं?” तो उनक आँख भर आईं और वे बोल , “जगन मास्टर
क घरवाली के पास। कह आई हूँ, जल्द लौटूँ गी।”
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l वहाँ से पैदल और फर एक ठे ला- र ा करके संगम तक पहुँचे। रात को सब
aद्रgथा।
प्रयागराज स्टे शन पर उतरते ही भीड़ का समु
लोग एक धमशाला के बरामदे म टाट बछाकर सोए। सुबह अँधेरे म ही उठकर ताई ने संगम म डु बक लगाई, सूय को अ य दया
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और लोटे म गंगाजल भर लया। लौटते समय उन्ह ने बाजार से दो चीज खरीद — तुलसी क माला, और एक छोट -सी घंट … “ मट्ठू
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के पजरे म बाँध दूँ गी,” उन्ह ने धीरे से कहा।
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gl बातचीत। ब्योरे ही कसी वणन को स ा बनाते ह।
लखते समय ध्यान र खए: वणन म ब्योरे डा लए — टकट का दजा, खाने क पोटली, ठहरने क जगह, रास्ते क
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as मेला, उत्सव या पव मनाया जाता है? वहाँ का दृश्य, भीड़, श्रद्धा और
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आपके गाँव या नगर म कौन-सा
वातावरण का वणन कa जए। मेले म कैसी आवाज़, रंग, गंध, खान-पान, दृश्य और भाव ह गे? (संकेत—
उनका वणन पाँच ान द्रय — दे खने, सुनने, सूँघने, छू ने और स्वाद महसूस करने के आधार पर क जए।)
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इस.cप्रश्न क असली माँग है — पाँच ान द्रय से लखना। पहले अपनी सामग्री एक
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ान द्रय क्या दज करना है उदाहरण (का तक पू णमा का मेला)
आँख (दृश्य) रंग, भीड़, दुकान, झूले, लाल-पीली चूिड़यों के ढे र , चरखी-झूल ा, िबजली की झालरे ं, धूल में डू बता शाम का सूर ज
रोशनी
कान (ध्व न) आवाज, संगीत, पुकार लाउडस्पीकर पर भजन, झूले की चरमराहट, “ले लो, दस का चार!” की हाँक , मंिदर का
घंटा
नाक (गंध) खाने और वातावरण क जले बी की चाशनी, कढ़ ाई में तलती पकौड़ी, अगरबत्ती और गेंदे के फू ल, धूल की सोंध ी गंध
महक
जीभ खान-पान गरम जले बी, मूँग फली, गन्ने का रस, कु ल्हड़ की चाय, बताशे
(स्वाद)
त्वचा (स्पश) भीड़, ठं ड, धूल कं धे से कं धा छू ती भीड़, शाम की ठं डी हवा, हाथ में गरम कु ल्हड़ की तिपश
नमूना उत्तर:
हमारे कस्बे म हर वष का तक पू णमा पर नद के कनारे तीन दन का मेला लगता है। सूरज ढलते ही मैदान म बजली क झालर
जल उठती ह और पूरा आसमान लाल-पीली रोशनी से भर जाता है। एक तरफ चरखी-झूला चरमराता हुआ घूमता है, दूसरी तरफ
चू ड़य क दुकान पर औरत क भीड़ जमी रहती है।
कान पर एक साथ कई आवाज पड़ती ह — लाउडस्पीकर पर बजते भजन, दुकानदार क हाँक “ले लो, दस का चार!”, ब क
कलकारी और मं दर क ओर से आती घंटे क गूँज। हवा म जलेबी क चाशनी और तलती पकौ ड़य क महक इतनी तेज होती है
क पेट भरा हो तब भी भूख जाग जाती है। बीच-बीच म अगरबत्ती और गदे के फूल क गंध आती है, जो बताती है क पास ही मं दर
है।
भीड़ इतनी होती है क कंधे से कंधा छलता चलता है। हाथ म गरम कुल्हड़ क चाय पकड़े हुए ठं डी हवा लगती है तो अच्छा लगता
है। नद के घाट पर लोग द ये जलाकर बहाते ह — सैकड़ छोटे -छोटे द ये पानी पर काँपते हुए बहते चले जाते ह। उस समय शोर
अपने आप कम हो जाता है और सबके चेहर पर एक शांत श्रद्धा उतर आती है। मेला केवल खरीदने-खाने क जगह नह है; वह वह
जगह है जहाँ पूरा कस्बा साल म एक बार एक-दूसरे से मल लेता है।
कल्पना और लेखन — पृष्ठ 56 और 57
वषय से संवाद
वषय से सं वाद सृ ज न
प्र.1 “बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहर के होकर रह गए।” अपना घर छोड़कर नए स्थान पर बस जाना आसान नह
होता है। ताई के बहू-बेट ने गाँव क्य छोड़ा होगा? गाँव छोड़ते समय क्या-क्या सोचा होगा? अपना घर छोड़ने के
लए स्वयं को कैसे तैयार कया होगा?
(क) गाँव क्य छोड़ा होगा —
आजी वका का संकट: कहानी स्वयं संकेत दे ती है — जम दारी का दौर बीत चुका था, “धीरे-धीरे सब पराए हाथ म चला
गया।” जब खेती-बाड़ी और कारबार ही न बचे, तो कमाई का कोई साधन गाँव म नह बचता।
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नौकरी और शक्षा: पढ़े - लखे नौजवान के लए काम शहर म ही था। ब क पढ़ाई, अस्पताल, बजली-पानी जैसी सु वधाएँ
भी शहर म अ धक थ ।
बदली हुई आकांक्षाएँ: बड़े घर का पुराना रोब अब केवल स्मृ त था। नई पीढ़ अपनी पहचान अपने काम से बनाना चाहती थी,
पुरख के नाम से नह ।
सामा जक दबाव: जब आसपास के लोग शहर जाने लगते ह, तो पीछे रह जाना भी क ठन लगने लगता है।
(ख) गाँव छोड़ते समय क्या सोचा होगा — मन म एक साथ दो धाराएँ बहती ह। एक ओर उम्मीद — “वहाँ काम मलेगा, ब े
पढ़गे, हालत सुधरेगी।” दूसरी ओर अपराध-बोध — “माँ अकेली रह जाएँगी, घर सूना पड़ जाएगा, पुरख का बड़ा घर कौन
सँभालेगा?” और एक झूठा दलासा, जो लगभग हर पलायन करने वाला अपने को दे ता है — “दो-चार साल क बात है, फर लौट
आएँगे।”
(ग) स्वयं को कैसे तैयार कया होगा —
पहले कोई एक जन अकेला शहर गया होगा, काम और कमरा जमाकर फर प रवार को बुलाया होगा।
खेत-मवेशी बटाई पर या हस्सेदारी म कसी को स प दए ह गे।
माँ के लए यह तय कया होगा क हर महीने पैसे भेजते रहगे और त्योहार पर आते रहगे।
मन को यह कहकर समझाया होगा क यह हमेशा के लए नह है — “गाँव तो अपना है ही।”
कहानी का इशारा: लेखक ने बेट को खलनायक नह बनाया। उसने केवल इतना लखा — “गाँव का मोह छोड़कर
शहर के होकर रह गए।” इस ‘होकर रह गए’ म ही पूरी त्रासद है: वे बुरे नह हुए, बस लौटे नह । पलायन म
अक्सर कोई दोषी नह होता, फर भी कोई न कोई छू ट जाता है।
प्र.2 “वहाँ बैठे एवजी मट्ठू ने उन्ह दे खकर कोई हरकत नह क ” — ताई सोच रही थ क मट्ठू ‘राम राम सीताराम’
कहेगा, ले कन एवजी मट्ठू चुप था। कल्पना क जए क एक दन असली मट्ठू वापस आ गया। मट्ठू ने नए तोते
को दे खकर क्या कहा होगा? आगे क कहानी ल खए। (संकेत— प्रारंभ क जए— “एक दन आकाश म वही हरे
पंख चमके…”)
यह सृजनात्मक लेखन है। ध्यान र खए — कहानी क भाषा, पात्र का स्वभाव और उसका मूल स्वर (संवाद बनाम मौन) बना रहना
चा हए, और संवाद वैसे ही छोटे -छोटे ह जैसे मूल कहानी म ह।
नमूना उत्तर:
एक दन आकाश म वही हरे पंख चमके… दोपहर क चुप्पी म अचानक बरामदे के ऊपर एक फड़फड़ाहट हुई। ताई ने आँख उठाकर
दे खा — नीम क सबसे ऊँची डाल पर वही च च, वही लाल कंठा, वही तरछ नजर।
“हर हर गंगे!” — डाल से आवाज उतरी।
ताई के हाथ से कटोरी छू ट गई। वे उठकर आँगन म आ गईं और काँपते स्वर म बोल , “ मट्ठू… बेटा?”
मट्ठू उतरकर पजरे क छत पर आ बैठा। भीतर बैठा नया तोता सहमकर एक कोने म दुबक गया। मट्ठू ने उसे तरछ आँख से दे खा
और बोला — “राम-राम कहो, सीताराम कहो।”
नया तोता चुप रहा। मट्ठू ने फर कहा — “कटे गी! कटे गी!!”
नया तोता फर भी चुप। तब मट्ठू ने सर हलाया, मानो समझ गया हो क यह बोलना नह जानता, केवल बैठना जानता है। उसने
च च से पजरे क सलाख खटखटाई और आँगन म उतर आया।
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ताई ने काँपते हाथ से पजरे का दरवाजा खोल दया। नया तोता कुछ दे र बैठा रहा, फर फुदककर बाहर आ गया। दोन तोते आँगन
म बखरे दान को चुगने लगे।
उस दन के बाद बड़े घर म एक नया नयम बन गया। पजरा खाली बरामदे म टँ गा रहता और तोते जब चाहते आते, जब चाहते उड़
जाते। शाम को ताई दे हरी पर बैठकर पुकारत — “ मट्ठू आ! मट्ठू आ!!” और नीम क डाल से दो आवाज एक साथ उतरत । जगन
मास्टर बगल से गुजरते तो रुककर सुनते, फर सर झुकाकर आगे बढ़ जाते।
क्य यह अंत ठ क बैठता है: इसम कहानी का शीषक उलटकर साथक हो जाता है — जो घर ‘संवादहीन’ हो गया
था, वहाँ फर संवाद लौट आता है, पर पजरे के बना। यानी ताई और जगन मास्टर दोन क बात एक साथ सच हो
जाती है।
प्र.3 “अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच म स्थत बड़े घर के उस सूने खंडहर म एक-दूसरे को सहारा दे ने के लए रह गए
थे।” आज घर जाकर अपने कसी बड़े या बुजुग से बात क जए। उनसे पू छए— “आप जब मेरी आयु के थे, तब
समय कैसे बताया करते थे; क्या-क्या बात या काम करते थे? आ द”। उनके कहे हुए अनुभव अपनी पु स्तका म
ल खए।
यह ग त व ध है, इस लए उत्तर आपका अपना होगा। पहले तरीका, फर एक नमूना।
कैसे क जए —
1. समय तय क जए: शाम को या छु ट्ट के दन, जब बुजुग खाली ह । जल्दबाजी म पूछ गई बात अधूरी रह जाती है।
2. प्रश्न पहले लख ली जए: जैसे — आप कहाँ रहते थे? वद्यालय कतनी दूर था? खेल कौन-से खेलते थे? त्योहार कैसे मनते
थे? घर म सबसे बड़ी खुशी और सबसे बड़ी क ठनाई क्या थी? तब क्या नह था जो आज है?
3. टो कए मत: उन्ह पूरी बात कहने द जए। बीच-बीच म केवल “ फर क्या हुआ?” पू छए — इससे स्मृ त खुलती है।
4. उन्ह के शब्द ल खए: जो शब्द वे बोलते ह (जैसे ‘पौ फटना’, ‘जून’, ‘दे हरी’) उन्ह बद लए मत। यही उस पीढ़ क भाषा का
दस्तावेज है।
5. अंत म एक वाक्य अपना जो ड़ए: क सुनकर आपको क्या लगा।
नमूना उत्तर (दाद से बातचीत):
“उस समय गाँव म बजली नह थी। पौ फटते ही उठ जाते थे — म और मेरी बड़ी बहन कुएँ से पानी भरने जाते। दन म गोबर
पाथना, चारा काटना और सलाई का काम रहता। वद्यालय हमारे लए नह था; लड़ कयाँ चौथी से आगे कम ही पढ़ती थ ।
पर मन भारी नह रहता था, क्य क घर म लोग बहुत थे। बड़े आँगन म शाम को सब जुटते — कोई कस्सा सुनाता, कोई गीत गाता।
सावन म झूला पड़ता, तीज पर सब सज-सँवरकर मैके आत । खेलने के लए गु े-गु ड़या, गट्टक और कब ी थी। खाने म जो घर का
उपजा, वही — मक्के क रोट , साग, गुड़।
आज सु वधाएँ बहुत ह, पर आँगन खाली ह। तब हमारे पास चीज कम थ और आदमी ज्यादा; अब चीज ज्यादा ह और आदमी
कम।”
यह ग त व ध पाठ से कैसे जुड़ती है: दाद क अं तम पं क्त ठ क वही बात कहती है जो ताई का ‘सूना खंडहर’
कहता है। इस बातचीत से आप समझगे क ‘संवादहीन’ कसी एक ताई क कहानी नह — यह एक पूरी पीढ़
का अनुभव है।
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प्र.4 “ मट्ठू ने फर तरछ आँख से रोशनदान के बाहर क दु नया क ओर दे खा और ये गए! वो गए!!” मान ली जए
क जगन मास्टर ने मट्ठू क खोज के लए एक व ापन प्रका शत कया है। अपनी कल्पना से वह व ापन
बनाइए। (संकेत— आप समाचार पत्र म प्रका शत खोया-पाया या तलाश संबंधी व ापन दे ख सकते ह।)
खोया-पाया व ापन म क्या-क्या होना चा हए — मोटा शीषक, खोई हुई वस्तु/प्राणी का सट क हु लया, उसक पहचान क
खास बात, कब और कहाँ से खोया, लौटाने पर पुरस्कार, और संपक का पता। भाषा छोट , सीधी और सूचनात्मक होनी चा हए।
नमूना उत्तर:
तोता खोया है — सूचना
क्या खोया एक पालतू पहाड़ी हरा तोता, नाम — मट्ठू
हु लया गहरे हरे पंख, लाल टे ढ़ च च, गले म काला-गुलाबी कंठा; दे खने पर सर टे ढ़ा करके तरछ आँख से दे खता है
खास पहचान बोलता है — “राम-राम कहो, सीताराम कहो”, “हर हर गंगे”, “कटे गी! कटे गी!!”, “खुश रहो!”
कब और कहाँ से पछले मंगलवार दोपहर, जगन मास्टर के मकान के रोशनदान से उड़ा; अं तम बार गाँव के बाग म दे खा गया
क्य जरूरी यह तोता एक वृद्धा (ताई) क अमानत है और उनका एकमात्र साथी है
पुरस्कार सही-सलामत लौटाने वाले को उ चत पुरस्कार दया जाएगा; कसी प्रकार का प्रश्न नह पूछा जाएगा
संपक जगन मास्टर, प्राथ मक वद्यालय के पास, गाँव — [अपने गाँव का नाम ल खए]
चाह तो अंत म एक भावुक पं क्त भी जोड़ सकते ह — “यह पक्षी कसी के लए तोता है, कसी के लए बेटा।”
असली व ापन म ऐसी पं क्त नह होती, पर कहानी के संदभ म यह पूरे प्रसंग का सार कह दे ती है।
व्याकरण क बात — पृष्ठ 57
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन
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भाषा से संवाद
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भाषा से सं वाद मु हावरे
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a emशब्द का अथ होता है— मधुरभाषी, मीठा बोलनेवाला या तोता। यह शब्द इतना अ धक प्रच लत है क
‘sमट्ठू’
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इसका प्रयोग एक मुहावरे म भी कया जाता है— ‘अपने मुँह मयाँ मट्ठू बनना’ जसका अथ है ‘अपनी प्रशंसा
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आप करना’ या ‘अपने मुँह से अपनी बड़ाई करना’। आप कुछ ऐसे मुहावर क सूची बनाइए जनम कसी अन्य
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जीव-जंतु का उल्लेख कया गया हो, जैसे नीचे लखे इस वाक्य म है— “अकेले मट्ठू क्या उड़े, आदशवाद जगन
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मास्टर के हाथ के सभी तोते उड़ गए।”
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पहले पाठ का ही मुहावरा समझ ली जए — “हाथ के तोते उड़ जाना” का अथ है घबरा जाना, होश उड़ जाना, सन्न रह जाना।
लेखक ने यहाँ शब्द का दुहरा खेल कया है — मट्ठू सचमुच उड़ा, और उसी के साथ जगन मास्टर के ‘हाथmके तोते’ भी उड़ गए।
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इसी को ेष जै
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seतुओं वाले कुछ प्रच लत मुहावरे —
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन AglaSem · NCERT Solutions
मुहावरा अथ वाक्य म प्रयोग
हाथ के तोते उड़ जाना घबरा जाना, होश उड़ जाना परीक्षा का पचा दे खते ही मोहन के हाथ के तोते उड़ गए।
गधे को बाप बनाना स्वाथ के लए मूख क भी खुशामद काम नकालने के लए वह गधे को भी बाप बना लेता है।
करना
बल्ली के भाग्य से छ का टू टना बना मेहनत अचानक लाभ मल उसे यह नौकरी बल्ली के भाग्य से छ का टू टने जैसी मली।
जाना
ऊँट के मुँह म जीरा आवश्यकता क तुलना म बहुत कम इतने बड़े प रवार के लए दो रो टयाँ ऊँट के मुँह म जीरा ह।
साँप-छछू ँ दर क ग त होना दोन ओर से मु श्कल म फँस जाना गनपत क हालत साँप-छछू ँ दर जैसी थी — सच बताएँ तो
मुसीबत, छपाएँ तो मुसीबत।
च ट के पर नकलना घमंड म वनाश को न्योता दे ना थोड़ी-सी सफलता क्या मली, उसके तो च ट के पर नकल
आए।
घोड़े बेचकर सोना न श्चत होकर गहरी न द सोना परीक्षा खत्म होते ही वह घोड़े बेचकर सो गया।
मगरमच्छ के आँसू बहाना झूठा दुख दखाना नुकसान करके अब वह मगरमच्छ के आँसू बहा रहा है।
बकरे क माँ कब तक खैर संकट अंततः आकर ही रहेगा झूठ पकड़ा ही जाएगा — बकरे क माँ कब तक खैर मनाएगी।
मनाएगी
कौआ चला हंस क चाल अपनी प्रकृ त छोड़कर दूसरे क अपनी बोली छोड़कर वह कौआ चला हंस क चाल वाली दशा
नकल करना म है।
दूध का जला छाछ भी फूँक- एक बार धोखा खाकर अत्य धक एक बार ठगे जाने के बाद वह दूध का जला छाछ भी फूँक-
फूँककर पीता है सतक हो जाना फूँककर पीता है।
अंध म काना राजा अयोग्य लोग के बीच थोड़ा योग्य भी उस ट म म वह अंध म काना राजा है।
बड़ा लगे
मुग क बाँग से सवेरा नह होता कसी एक के न होने से काम नह वह चला भी गया तो क्या — मुग क बाँग से सवेरा नह होता।
रुकता
शेर के मुँह म हाथ डालना बहुत बड़ा खतरा मोल लेना बना तैयारी उस प्र तयो गता म जाना शेर के मुँह म हाथ डालना
है।
च ड़या का दूध असंभव वस्तु वह ऐसी शत रख रहा है मानो च ड़या का दूध माँग रहा हो।
अभ्यास: इनम से कोई पाँच चुनकर अपनी कॉपी म अपने वाक्य बनाइए। मुहावरा तभी सधता है जब वाक्य म
उसका अथ अपने आप खुल जाए — अथ अलग से बताना न पड़े।
ध्वन्यात्मकता शब्द से — पृष्ठ 57
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन AglaSem · NCERT Solutions
भाषा से संवाद
भाषा से सं वाद शब्द क बात
प्र.1 “जगन मास्टर का ध्यान अचानक ‘गीता-रहस्य’ से हटकर मट्ठू के पंख क ‘फड़फड़ाहट’ पर गया।” पक्षी के उड़ने
पर पंख के हलने-डु लने से उत्पन्न ध्व न ‘फड़फड़ाहट’ कहलाती है। ध्व नय का आभास कराने वाले कुछ और
शब्द ल खए और उनसे नए वाक्य बनाइए।
जो शब्द कसी ध्व न क नकल करके बने ह , उन्ह ध्वन्यात्मक या अनुकरणात्मक शब्द कहते ह। इनक खूबी यह है क पढ़ते ही
आवाज सुनाई दे ने लगती है — इसी लए ये वणन को जीवंत बना दे ते ह।
पहले इसी पाठ से — ‘फड़फड़ाहट’ के अ त रक्त कहानी म मलते ह — भाँय-भाँय (सूने घर क गूँज), चहचहाना (“पेड़ म
च ड़याँ चहचहात ”), टु कुर-टु कुर (एकटक ताकने का भाव)।
ध्वन्यात्मक शब्द कसक ध्व न नया वाक्य
फड़फड़ाहट पंख के हलने क कबूतर क फड़फड़ाहट सुनकर बल्ली भाग खड़ी हुई।
सरसराहट पत्त के हलने क रात म बाँस के झुरमुट से आती सरसराहट डरा रही थी।
गड़गड़ाहट बादल के गरजने क बादल क गड़गड़ाहट सुनते ही ब े भीतर भागे।
खटखटाहट दरवाजा पीटने क दे र रात दरवाजे क खटखटाहट से सब जाग गए।
झनझनाहट धातु के बजने क बतन गरने क झनझनाहट पूरे घर म गूँज गई।
कलकल बहते पानी क पहाड़ी नद कलकल करती हुई नीचे उतर रही थी।
टपटप बूँद के गरने क छत से टपटप पानी टपक रहा था।
भनभनाना मक्खी-मधुमक्खी क गुड़ क भेली पर म क्खयाँ भनभना रही थ ।
हन हनाना घोड़े क अस्तबल म घोड़ा जोर से हन हनाया।
टर-टर मढक क बा रश क पहली रात तालाब म टर-टर मच गई।
खनखनाना सक्क क जेब म सक्के खनखना रहे थे।
चरमराहट लकड़ी/झूले के दबने क पुराने पलंग क चरमराहट रात भर सुनाई दे ती रही।
गुराना कुत्ते-शेर क अनजान आदमी को दे खकर कुत्ता गुराने लगा।
चटचटाना जलती लकड़ी क चूल्हे म लक ड़याँ चटचटा रही थ ।
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क्य लेखक ने यही शब्द चुना: ‘फड़फड़ाहट’ इस प्रसंग का नणायक शब्द है। जगन मास्टर ‘गीता-रहस्य’ म डू बे
थे — यानी आदश और दशन म। उन्ह उससे बाहर एक ध्व न ख च लाती है। पूरी दुघटना क सूचना लेखक ने कसी
वाक्य से नह , एक ध्व न से द है।
शब्द-युग्म — पृष्ठ 57 और 58
भाषा से संवाद
भाषा से सं वाद शब्द क बात
प्र.1 “अपनी अकेली जान के लए ताई दो जून का एक जून चूल्हा फूँक लेत , व्रत-उपवास के बहाने चौका-चूल्हा टाल
जात ।” — वे शब्द जो जोड़े म लखे जाते ह, उन्ह शब्द-युग्म कहा जाता है। शब्द-युग्म मुख्यतः नम्न प्रकार के
होते ह— पुनरुक्त (बार-बार), सजातीय (उठना-बैठना), समानाथक ( दन-प्र त दन), वपरीताथक ( दन-रात)।
इन प्रकार को पाठ से उदाहरण दे कर समझाइए।
शब्द-युग्म दो शब्द को जोड़कर बनता है और उसका भाव कसी एक शब्द से अ धक होता है। पुस्तक ने चार प्रकार बताए ह — नीचे
हर प्रकार के लए इसी पाठ से उदाहरण दए गए ह।
प्रकार पहचान पुस्तक का ‘संवादहीन’ पाठ से उदाहरण
उदाहरण
पुनरुक्त एक ही शब्द दो बार बार-बार धीरे -धीरे , भाँय-भाँय, टुकुर-टुकुर, पसीना-पसीना, नए-नए, अपने-अपने,
आए छोटी-छोटी
सजातीय एक ही वग/क्षेत्र के दो उठना-बैठना खेती-बाड़ ी, चौका-चू ा, तीज- योहार, गाय-ढोर, नौकर-चाकर, खेल -
ल्ह त्
अलग शब्द तमाशे
समानाथक दोन शब्द का अथ दन-प्र त दन शादी- याह ( याह-शािदयाँ), मेले -ठे ले , भीड़ -भाड़ , यौते-बुल ावे, सूरत-
ब् ब् न्
लगभग एक श ल , मान-मनौवल , िनयम-िस ांत
क्
वपरीताथक दोन शब्द का अथ दन-रात व त-बेव त, रात-िदन (“वह रात-िदन िम ू को ले कर ही बेचैन रहने
क् क्
उलटा लगीं”), मौके बे-मौके , ऊँ च-नीच, बहू-बेटे
पहचान का सूत्र: दूसरे शब्द को हटाकर दे खए। य द अथ ज्य का त्य रहे — समानाथक; य द अथ उलट जाए —
वपरीताथक; य द पहला ही शब्द दुहराया गया हो — पुनरुक्त; और य द दोन अलग पर एक ही प रवार के ह —
सजातीय।
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प्र.2 पाठ म से चुनकर कुछ शब्द-युग्म नीचे दए गए ह। उनका अथ स्पष्ट करते हुए वाक्य म प्रयोग क जए— वक्त-
बेवक्त, नयम- सद्धांत, शाद -ब्याह, तीज-त्योहार।
शब्द- प्रकार अथ पाठ म कहाँ अपना वाक्य
युग्म
वक्त- वपरीताथक समय-असमय; जब-तब, “ मट्ठू के वक्त-बेवक्त के तकाज छोटे ब चे व त-बेव त भूख लगने
च् क् क्
बेवक्त बना कसी नयत समय के के लए रोट बचाकर रखत ।” पर रोने लगते है।ं
नयम- समानाथक जीवन जीने के बनाए हुए “उन्ह ने अपने कुछ नयम- सद्धांत गाधं ीजी अपने िनयम-िस ातं ों से
सद्धांत उसूल और आदश बना रखे थे…” कभी नहीं िडगे।
शाद - समानाथक ववाह और उससे जुड़े सारे “वे ब्याह-शा दयाँ, तीज-त्योहार, जेठ के महीने में गाँव में शादी- याह
ब्
ब्याह मांग लक आयोजन जन्म और मृत्यु-पव…” की धूम रहती है।
तीज- सजातीय व्रत, पव और उत्सव — “वे ब्याह-शा दयाँ, तीज- तीज- योहार पर ही अब िबखरा
त्
त्योहार सभी मांग लक अवसर त्योहार…” हुआ पिरवार एक जगह जुटता है।
ध्यान द जए: कहानी म ये चार शब्द-युग्म उस प्रसंग म आते ह जहाँ बड़े घर का बीता हुआ वैभव याद कया जा
रहा है। यानी ये केवल शब्द नह — ये उस भरे-पूरे जीवन के चह्न ह जो अब नह रहा। एक शब्द-युग्म भी कहानी का
भाव उठाए चलता है, यही अच्छ भाषा क पहचान है।
खोजबीन शब्द क — पृष्ठ 58
भाषा से संवाद
भाषा से सं वाद व्याकरण
प्र.1 उपयुक्त अनु े द म से खो जए— ऐसा शब्द जो ‘तंग’ का वपरीताथक है।
उत्तर — ढ ली (“ढ ली धोती को दोन हाथ से सँभालते हुए…”)।
‘तंग’ का अथ है कसा हुआ, सँकरा; और ‘ढ ला’ का अथ है जो कसा हुआ न हो। इस लए ये दोन वपरीताथक ( वलोम) शब्द ह।
ब्योरे का कमाल: धोती का ‘ढ ला’ होना यहाँ बेकार का वशेषण नह है। ढ ली धोती के कारण ही जगन मास्टर को
दोन हाथ से उसे सँभालना पड़ता है, और इसी से उनक हड़बड़ी, बेबसी और हास्य- म श्रत करुणा का चत्र बनता
है। एक वशेषण पूरा दृश्य खड़ा कर दे ता है।
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन
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उपयुक्त अनु े द म से खो जए— ऐसा वाक्यांश जो एक मुहावरा है।
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प्र.2
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a l “पसीना-पसीना होना” (“…पुकारते हुए पसीना-पसीना होते रहे”)।
उत्तरg—
अथ — बहुत परेशान या हैरान हो जाना; दौड़-धूप और घबराहट से बेहाल हो जाना। यह मुहावरा है, क्य क इसका अथ शब्द के
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सीधे अथ से नह नकलता — यहाँ केवल पसीना आना नह , हड़बड़ी और लाचारी का भाव है।
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इसी अनु े द म एक और मुहावरा भी है — “पंख तौलना”
s em(“अपने पंख तौलने म मशगूल रहे”), जसका अथ है — अपनी
श क्त या सामथ्य आँकना, उड़ान का अभ्यास करना।l
ag
मुहावरा अथ अपना वाक्य
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m.
भीड़ में खोए ब चे को ढू ँढ़ते-ढूsँढ़eते िपता पसीना-पसीना हो
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पसीना-पसीना घबराहट और भाग-दौड़ से बेहाल होना च्
होना
m . गए।
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पंख तौलना अपनी सामथ्य आँकना, उड़ान भरने क तैयारी दसवीं पास करते ही वह अपने पंख तौलने लगा।
करना
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प्र.3 उपयुक्त अनु a g
े द म से खो जए— ऐसा शब्द जो एक क्रया है।
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उत्तर — पुकारते (“‘ मट्ठू आ! मट्ठू आ!!’ पुकारते हुए…”)।
a s emशब्द से कसी काम का होना या करना जाना जाए, वह क्रया है। ‘पुकारना’ एक काम है, इस लए यह क्रया है।
gl इसी अनु े द क अन्य क्रयाएँ — सँभालते, होते रहे, तौलने, रहे, आ (‘आ!’ आ ाथक क्रया)।
जस
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.
पहचान का तरीका: वाक्य म ‘क्या कया / क्या हो रहा है?’ पू छए। उत्तर म जो शब्द आए, वही क्रया है — जैसे
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“वह क्या कर रहे थे?” → “पुकार रहे थे।”
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उपयुक्त अनु े द म से खो जए— ऐसा शब्द जो एक सं ा है।
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प्र.4
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mउत्तर .co a g
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उत्तर — धोती (जा तवाचक सं ा)।
m .
कसी वस्तु, व्य क्त, स्थान, प्राणी या भाव के नाम को सं ा कहते ह।
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अनु े द क सं ाएँ भेद
मट्ठू यि तवाचक सं ा (एक िवशेष तोते का नाम)
व् क्
धोती, बाग, पेड़, डाल, हाथ, पंख, पसीना जाितवाचक सं ा
प्र.5 उपयुक्त अनु े द म से खो जए— ऐसा शब्द जो एक सवनाम है।
उत्तर — वह (“…वह बाग म एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पास … पुकारते हुए पसीना-पसीना होते रहे”)।
सं ा के स्थान पर आने वाले शब्द को सवनाम कहते ह। यहाँ ‘वह’ जगन मास्टर के स्थान पर आया है, इस लए यह पुरुषवाचक
सवनाम (अन्य पुरुष) है।
अनुच्छेद म ‘अपने’ (“अपने पंख तौलने म”) भी सवनाम है — यह नजवाचक सवनाम है।
ध्यान द जए: लेखक ने बार-बार ‘जगन मास्टर’ न लखकर ‘वह’ लखा — इसी से भाषा क पुनरावृ त्त बचती है
और वाक्य प्रवाह म चलता रहता है। सवनाम का यही काम है।
प्र.6 उपयुक्त अनु े द म से खो जए— ऐसा शब्द जो एक वशेषण है।
उत्तर — ढ ली (“ढ ली धोती”)।
जो शब्द सं ा या सवनाम क वशेषता बताए, वह वशेषण है। यहाँ ‘ढ ली’ धोती क दशा बता रहा है, इस लए यह गुणवाचक
वशेषण है; और ‘धोती’ इसका वशेष्य है।
अन्य वशेषण — ‘एक’ और ‘दूसरे/दूसरी’ (“एक पेड़ से दूसरे पेड़”, “एक डाल से दूसरी डाल”) — ये संख्यावाचक वशेषण ह।
प्र.7 उपयुक्त अनु े द म से खो जए— ऐसा शब्द जो एक कारक है।
उत्तर — ‘से’ (“दोन हाथ से सँभालते हुए”, “एक पेड़ से दूसरे पेड़”)।
सं ा या सवनाम का क्रया के साथ संबंध बताने वाले चह्न (परसग) को कारक- चह्न कहते ह।
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अनु े द का अंश चह्न कारक
दोन हाथ से सँभालते हुए से करण कारक (साधन बताता है)
एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पास से अपादान कारक (अलग होने का भाव)
बाग म, पंख तौलने म म अिधकरण कारक ( थान/आधार)
स्
दूसरी डाल पर, दूसरे पेड़ पर पर अिधकरण कारक
ढ ली धोती को को कम कारक
प्र.8 उपयुक्त अनु े द म से खो जए— ऐसा शब्द जो एक कता है।
उत्तर — वह (अथात जगन मास्टर) — “…वह बाग म … पुकारते हुए पसीना-पसीना होते रहे।”
जो क्रया करता है, वही कता कहलाता है। यहाँ पुकारने और पसीना-पसीना होने का काम ‘वह’ (जगन मास्टर) कर रहा है।
इसी अनुच्छेद के दूसरे भाग का कता मट्ठू है — “और मट्ठू एक डाल से दूसरी डाल पर … अपने पंख तौलने म मशगूल रहे।”
वाक्य-रचना पर ध्यान द जए: पूरे अनुच्छेद म दो कता आमने-सामने रखे गए ह — वह (जगन मास्टर) हाँफते-
दौड़ते, और मट्ठू इत्मीनान से पंख तौलता हुआ। एक ही वाक्य म दो वपरीत चत्र रखकर लेखक ने बना कुछ कहे
कह दया क आजाद कसके लए संकट है और कसके लए आनंद।
अथ के आधार पर वाक्य — पृष्ठ 58 और 59
भाषा से संवाद
भाषा से सं वाद व्याकरण
प्र.1 अथ के आधार पर वाक्य के कई भेद होते ह जैसे— वधानवाचक, नषेधवाचक, प्रश्नवाचक, वस्मया दबोधक,
आ ावाचक ( व धवाचक), इ ावाचक, संदेहवाचक और संकेतवाचक। (पुस्तक क ता लका दे खए।) अब आप
भी अपनी पुस्तक म से प्रत्येक प्रकार का एक-एक वाक्य चुनकर ल खए।
नीचे पूरी ता लका है — पुस्तक म दया गया अथ और उदाहरण, और उसके आगे ‘संवादहीन’ पाठ से चुना गया नया वाक्य।
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क्र. वाक्य का भेद अथ/उपयोग पुस्तक का उदाहरण मेरा चुना हुआ वाक्य
1 वधानवाचक कसी घटना या स्थ त के बारे म जगन मास्टर ने पजरे का “ताई ने अपने जीवन में अ छेच्
वाक्य कथन करने वाला वाक्य। दरवाजा खोल दया। िदन भी दे खे थे।”
2 नषेधवाचक कसी काय के न होने या मना मट्ठू ने कोई हरकत नह क । “ ताई को घड़ ी-भर के िलए भी
वाक्य करने का भाव व्यक्त करने वाला िम ू का िवयोग सहन नहीं हो
वाक्य। सकता था।”
3 प्रश्नवाचक वाक्य कसी बात को पूछने या जानने के मट्ठू! अब कैसे कटे गी? “भगवान! कै से नैया पार
लए प्रयुक्त वाक्य। लगेगी?”
4 वस्मया दबोधक आश्चय, प्रसन्नता या दुख प्रकट मट्ठू ने फर तरछ आँख से “दे खते ही दे खते या से या हो
क् क्
वाक्य करने वाला वाक्य। रोशनदान के बाहर क दु नया गया!”
क ओर दे खा और ये गए! वो
गए!!
5 आ ावाचक कसी को कुछ करने का आदे श या राम-राम कहो, सीताराम कहो। “िम ू आ! िम ू आ!!” तथा
वाक्य आग्रह व्यक्त करने वाला वाक्य। “ताई, िम ू को भी साथ ले चलो,
उसे भी गंगा- नान करा दे ना।”
स्
6 इ ावाचक कसी आकांक्षा, आशा या इच्छा जीते रहो बेटा, जुग-जुग “खुश रहो! खुश रहो!!”
वाक्य को प्रकट करने वाला वाक्य। जओ!
7 संदेहवाचक वाक्य कसी बात को लेकर शंका या ताई के सूनेपन का साथी न “… या शायद उनकी बेवकू फी
अ न श्चतता प्रकट करने वाला जाने कन अमराइय म घूम पर हँसता रहता हो।”
वाक्य। रहा होगा।
8 संकेतवाचक इसम एक बात या काय का होना जब खेती-बाड़ी नह , कारबार “जब-जब िम ू को दे खते, अपनी
वाक्य या न होना कसी दूसरी बात या नह , तो नौकर-चाकर कस प नी की बुि पर तरस खाते
त्
काय के होने या न होने पर नभर दम पर टकते! और अपने आप को भी दोषी
होता है। अनुभव करते।”
पहचान के संकेत-शब्द: प्रश्नवाचक म — क्या, कैसे, कौन, क्य ; नषेधवाचक म — नह , मत, न; आ ावाचक म
— कहो, आ, ल खए, चलो; इच्छावाचक म — रहो, जओ, हो (आशीवाद/कामना); संदेहवाचक म — शायद, न
जाने, होगा; संकेतवाचक म — जब…तो, य द…तो, जैसे-जैसे…वैसे-वैसे क जोड़ी।
ग त व धयाँ — पृष्ठ 59
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ग त व धयाँ
ग त व धयाँ समू ह -काय
प्र.1 कहानी के रंग — समूह को अलग-अलग भावनाएँ (दुख, स्नेह, आजाद ) द जए और इसे मूक अ भनय द्वारा
प्रस्तुत क जए।
मूक अ भनय (माइम) म शब्द नह होते — भाव केवल चेहरे, हाथ, चाल और शरीर क मुद्रा से दखाना होता है। इस लए पहले तय
क जए क हर भाव का कौन-सा दृश्य लया जाए और उसम कौन-सा शारी रक संकेत उस भाव को खोलेगा।
भाव कहानी का दृश्य मूक अ भनय म क्या दखाएँ
दुख ताई कुंभ से लौटकर एवजी झुके कं धे , धीमे कदम, िपंजरे की ओर बढ़ ता काँपता हाथ; िफर िठठकना, पीछे हटना और खाली
तोते के सामने खड़ी ह आँखों से चारों ओर दे खना। मंच पर एक ही व्यिक्त और एक खाली िपंजरा — अके ले पन के
िलए खाली जगह छोिड़ ए।
स्नेह ताई मट्ठू को दाल-भात खला झुक कर कटोरी रखना, धीरे से िसर सहलाने का संके त, मुस्कान, दोनों हाथ उठाकर आशीव द
रही ह, वह आशीष दे रही ह की मुद ा; तोता बना बच्चा गदन टेढ़ी करके दे खे और िसर िहलाए।
आजाद मट्ठू का रोशनदान से उड़ पहले िसकु ड़कर बैठना (िपंजरा), िफर िसर उठाकर ऊपर दे खना, धीरे -धीरे बाँहे ं फै लाना और
जाना मंच पर घूम ते हुए ऊँचा उठना। पीछे जगन मास्टर दौड़ते हुए , धोती सँभालते हुए , माथे का पसीना
पोंछते हुए ।
प्रस्तु त के सुझाव: हर समूह को 1–2 मनट द जए। पृष्ठभू म म हल्का संगीत या केवल ताल र खए। अंत म कक्षा
से पू छए — “कौन-सा भाव सबसे पहले समझ आया और कस संकेत से?” इससे पता चलेगा क अ भनय म
कौन-सा संकेत सचमुच काम करता है।
प्र.2 पंख क योजना — छोटे समूह म सोच क अगर आपको मट्ठू क तरह उड़ने का मौका मले तो आप कहाँ जाते
और क्य ?
यह कल्पना-ग त व ध है। समूह म हर सदस्य एक जगह और एक कारण बताए; फर समूह उन्ह एक ‘उड़ान-मान चत्र’ म सजाकर
कक्षा के सामने रखे।
चचा को दशा दे ने वाले प्रश्न —
आप जहाँ जाना चाहते ह, वहाँ पैदल या गाड़ी से क्य नह जाया जा सकता?
ऊपर से दे खने पर आपका अपना गाँव/मोहल्ला कैसा दखेगा?
उड़ान का सबसे बड़ा सुख क्या होगा और सबसे बड़ा डर क्या?
क्या आप लौटना चाहगे? — यह प्रश्न सीधे मट्ठू से जुड़ता है।
नमूना उत्तर:
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन
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अगर मुझे मट्ठू क तरह पंख मल जाएँ तो सबसे पहले म अपने ही गाँव के ऊपर एक चक्कर लगाऊँगा — यह दे खने के लए क
m
जन खेत और ग लय म म रोज घूमता हूँ, वे ऊपर से कैसी दखती ह। उसके बाद म हमालय क ओर उ ग
se m.
ँ ा, क्य क शेखर जोशी
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c है। और अंत म म लौट आऊँगा — क्य क उड़ना अच्छा लगता है, पर लौटनेagके लए एक घर चा हए। शायद
कहाँ से कहाँ तक.जाती
का अल्मोड़ा और वे पहाड़ मने केवल चत्र म दे खे ह। रास्ते म गंगा के कनारे- कनारे उड़ना चाहूँगा, ता क दे ख सकूँ क एक नद
m
se चाहता होगा; उसे बस रास्ता याद नह रहा।
मट्ठू भीaलौटना
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ग त व ध क असली सीख: ‘कहाँ जाते’ से अ धक महत्त्वपूण है ‘क्य ’। यही ‘क्य ’ बताता है क हर आजाद के
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साथ एक चुनाव जुड़ा होता है — और चुनाव ही व्य क्त को बनाता है। ag
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प्र.3 “पेट क समस्या उनके लए कभी समस्या नह रही” — यह वाक्य बताता है क ताई ने भोजन संबंधी अपनी
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आवश्यकताओं पर कभी ध्यान नह दया अथवा उन्ह महत्वपूण नह माना। हमारे प रवेश म ऐसी बहुत-सी
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gम जा नए और सम झए क
.c खी करती ह। • अपने घर क म हलाओं क भोजन संबंधी रु चय के वषय
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म हलाएँ ह जो प रवार के सदस्य क आवश्यकताओं को प्राथ मकता दे ती ह और अपनी आवश्यकताओं क
se m
अनदे
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उनक पसंद का भोजन माह म कब-कब बनता है।
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comसवक्षण क तरह क जए — पू छए, ल खए, फर ग नए। agl
यह घर पर करने वाली ग त व ध है। सुझाव है क इसे एक.छोटे
a s em
agl
कैसे क जए —
1. घर क म हलाओं (माँ, दाद , बुआ, बड़ी बहन) से अलग-अलग पू छए — “आपको सबसे प्रय भोजन कौन-सा है?” जल्दबाजी
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म नह ; अक्सर पहला उत्तर होता है “मुझे तो सब अच्छा लगता है” — रुककर दोबारा पू छए।
2. एक महीने क डायरी बनाइए और रोज ल खए क क्या बना। महीने के अंत म ग नए क उनकm
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बना। om
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पसंद का भोजन कतनी बार
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3. तुलना क जए — घर के अन्य सदस्य क पसंद कतनी बार बनी?
ag 4. नष्कष ल खए और प रवार के साथ बाँ टए।
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नमूना ता लका:
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सदस्य पसंद का भोजन महीने म कतनी बार बना
माँ कढ़ -चावल 1 बार
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दाद बाजरे क रोट और साग 2 बार
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पता जी राजमा-चावल 4
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ase म और छोटा भाई
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पूरी-आलू, नूडल्स 7 बार
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नमूना नष्कष: हमारे घर म महीने भर म जो बना, उसम से अ धकांश हम ब और पताजी क पसंद का था। माँ क पसंद का
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m है। उस दन से हमने घर म एक नयम बनाया — हर र ववार भोजन क पसंद a
भोजन केवल एक बार बना — वह भी तब, जब मने खुद कहा। माँ से पूछा तो उन्ह ने कहा, “जो सबको अच्छा लगे, वही मुझे अच्छा
लगता है।” पर मुझे लगा क यह पसंद नह e
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बारी-बारी से एक व्य क्त क होगी।gl
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से जो ड़ए: ताई के बारे म लेखक का वाक्य — “पेट क समस्या उनके लए कभी समस्या नह रही” — प्रशंसा
नह , एक चुपचाप क गई शकायत है। जो स्त्री सबके लए पकाती रही, उसने अपने लए “दो जून का एक जून”
चूल्हा जलाया। यह ग त व ध हम अपने ही घर म यही बात पहचानना सखाती है।
मेरी पहेली — पृष्ठ 60
ग त व धयाँ
ग त व धयाँ समू ह -काय
प्र.1 अपने समूह के साथ मलकर ऐसी पहे लयाँ या प्रश्न बनाइए जनके उत्तर नम्न ल खत ह — तोता, ताई, कुंभ,
पजरा, कमरा, गंगा।
पहेली बनाने का सूत्र यह है — उत्तर का नाम मत ली जए, केवल उसके दो-तीन गुण बताइए और अंत म पू छए “बताओ म
कौन?” तुक मल जाए तो और अच्छा।
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन AglaSem · NCERT Solutions
उत्तर पहेली पाठ पर आधा रत प्रश्न
तोता हरा कु त , लाल है चोंच, ‘ मट्ठू’ शब्द का शा ब्दक अथ क्या है?
जो िसखा दो, वही बोलूँ सोच।
मीठा बोलूँ, नाम है प्यारा —
बोलो कौन हू ँ मैं बेचारा?
ताई बड़े घर में अके ली रहती, कहानी म मट्ठू को दाल-भात बनाकर कौन खलाती थ ?
पंछी से अपनी बात है कहती।
ममता िजसकी बरस पड़ी है —
बोलो, वह कौन-सी बूढ़ी खड़ी है?
कुंभ बारह बरस में एक बार आऊँ, ताई प्रयागराज कस आयोजन म स्नान करने गई थ ?
चार नगर में डेर ा जमाऊँ।
करोड़ों लोग मुझमें नहाएँ —
बोलो, मुझको क्या कहलाएँ?
पजरा लोहे की मेर ी पतली दीवार, जगन मास्टर ने कसका दरवाजा खोल दया था?
भीतर पंख है,ं बाहर संस ार।
रोटी-पानी भीतर रखते —
बोलो, कै द कहाँ पर करते?
कमरा चार दीवारे ं, एक िकवाड़, जगन मास्टर हर रोज क्या बंद करके मट्ठू को बाहर आने का आमंत्रण दे ते थे?
बंद करो तो बनूँ मैं आड़।
यही ं िछपाकर पाठ पढ़ ाया —
बोलो, वह स्थान कहाँ बतलाया?
गंगा पवत से मैं चलकर आई, मट्ठू क रट म जो नद बार-बार आती है, उसका नाम क्या है?
‘हर हर’ कहकर सबने बुल ाई।
तट पर मेल ा, जल में आस्था —
बोलो, कौन हू ँ मैं वह रास्ता?
कक्षा म कैसे खेल: दो समूह बनाइए। एक समूह पहेली सुनाए, दूसरा 30 सेकंड म उत्तर दे । सही उत्तर पर 2 अंक,
और य द उत्तर दे ने वाला समूह कहानी से उस शब्द का प्रसंग भी बता दे तो 1 अंक अ त रक्त — इससे खेल के
साथ-साथ पाठ भी दुहरा जाएगा।
भाषा संगम — पृष्ठ 60
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन AglaSem · NCERT Solutions
भाषा संगम
भाषा सं ग म भाषा से सं वाद
प्र.1 “वह न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था।” नीचे ‘तोता’ शब्द के लए सं वधान क आठव
अनुसूची म स म्म लत कुछ भारतीय भाषाओं म प्रयुक्त शब्द क सूची द गई है — तोता ( हद ); शुकः (संस्कृत);
तोता (पंजाबी); तोता (उदू); तोतुं (कश्मीरी); तोतो ( सधी); पोपट (मराठ ); पोपट, सूडो (गुजराती); पोपट
(क कणी); सुगा (नेपाली); तोता (बांग्ला); भाटौ (अस मया); तेनवा (म णपुरी); शुआ, शुक (ओ ड़आ); चलुक
(तेलुगु); क ळ (त मल); शुकम्, तत्त (मलयालम); ग ळ (कन्नड़)। इनके अ त रक्त य द आप ‘तोता’ शब्द को
कसी और भाषा म भी जानते ह तो उस भाषा म भी ल खए।
पहले पुस्तक क सूची को शब्द-प रवार म बाँटकर दे खए — तब पता चलता है क ये अलग-अलग शब्द नह , कुछ ही मूल शब्द
के रूप ह।
शब्द-प रवार भाषाएँ और रूप टप्पणी
‘तोता’ वग तोता ( हद , पंजाबी, उदू, बांग्ला); तोतुं (कश्मीरी); तोतो उ र और पूव भारत में यही प फै ला है।
त्त रू
( सधी)
‘शुक’ वग (संस्कृत शुकः (संस्कृत); शुआ, शुक (ओ ड़आ); शुकम्, तत्त सं कृत का शुक ही अनेक भाषाओं में उतरा
स्
मूल) (मलयालम) है।
‘पोपट’ वग पोपट (मराठ , क कणी); पोपट, सूडो (गुजराती) पि चम भारत की भाषाओं में साझा प।
श् रू
‘ क ळ/ ग ळ’ वग क ळ (त मल); ग ळ (कन्नड़); चलुक (तेलुगु) दि ण की भाषाओं का अपना पिरवार।
अन्य सुगा (नेपाली); भाटौ (अस मया); तेनवा (म णपुरी) ये वतं प है।ं
स् त्र रू
कुछ और भाषाओं म ‘तोता’ (आप अपनी जानकारी से और जो ड़ए):
अं ेजी — parrot
मै थली/भोजपुरी — सुग्गा / सुगा
अवधी — सुआ (कबीर और जायसी क क वताओं म ‘सुआ’ मलता है)
राजस्थानी — तोतो / सूवो
डोगरी — तोता
संथाली — लाटका
पुस्तक म एक मुद्रण-त्रु ट: छपी सूची म लखा है — “शुआ (शुक); (ओ ड़आ)”। वास्तव म यह “शुआ, शुक
(ओ ड़आ)” होना चा हए — कोष्ठक गलत जगह लग गया है, जससे ‘शुक’ कसी भाषा के बना रह जाता है।
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यह ग त व ध क्य द गई है: एक ही पक्षी के इतने नाम यह दखाते ह क भारत क भाषाएँ अलग-अलग होकर भी
आपस म जुड़ी ह। ‘शुक’ से ‘शुआ’ और ‘सुग्गा’ बनना भाषा-प रवतन का सुंदर उदाहरण है — शब्द यात्रा करते ह
और रास्ते म अपना रूप बदल लेते ह।
प्र.2 उपयुक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा म भी ल खए।
मूल वाक्य ( हद ): “वह न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था।”
यह प्रश्न आपक अपनी मातृभाषा माँगता है, इस लए उत्तर हर वद्याथ का अलग होगा। नीचे कुछ भाषाओं म नमूने दए ह — इन्ह
दे खकर आप अपनी भाषा म ल खए और कक्षा म सुनाइए।
भाषा वाक्य
भोजपुरी ऊ ना जाने कहाँ से एगो प्यारका पहाड़ी सुग्गा ले आइल रहे।
अवधी ऊ न जाने कहाँ ते एक िपयारा-सा पहाड़ी सुआ ले आवा रहा।
ब्रज वो न जानै कहाँ तै ं एक प्यारो-सो पहाड़ी तोता लै आयो हतो।
राजस्थानी वो कठै सूँ ठा नी ं एक प्यारो-सो पहाड़ी तोतो ले आयो हो।
मराठ तो कु ठू न कोण जाणे एक गोड-सा डोंग री पोपट घे ऊन आला होता.
बांग्ला से কাথা থেক যন একটা িমি পাহািড় তাতা িনেয় এেসিছল। (से कोथा थेके जेनो एकटा िमि ट पाहािड़ तोता िनये एसे िछलो।)
अंग्रेजी He had brought, from goodness knows where, a lovely little hill parrot.
अनुवाद करते समय ध्यान द जए: ‘न जाने कहाँ से’ एक मुहावरेदार पदबंध है — इसका शब्दशः अनुवाद मत
क जए, अपनी भाषा म जो वैसा ही भाव दे ता हो, वही ल खए। इसी तरह ‘प्यारा-सा’ का ‘-सा’ लघुता और स्नेह
दोन जोड़ता है; अपनी भाषा का समकक्ष प्रत्यय खो जए।
खोजबीन — पृष्ठ 60
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खोजबीन
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खोजबीन प रयोजना
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a s em क जए — शेखर जोशी
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खोजबीन
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प्र.1
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m उनका रचना-संसार और उनक कहा नय क मूल प्रवृ त्तयाँ।
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क्या खोजना है — इस पाठ के लेखक शेखर जोशी का जीवन,
कहाँ खो जए — वद्यालय के पुस्तकालय म उनकाlसंaग्रह शेखर जोशी कथा समग्र माँ गए; हद सा हत्य के इ तहास क पुस्तक म
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‘नई कहानी’ आंदोलन वाला अध्याय दे खए; और पाठ्यपुस्तक म दए गए क्यू-आर कोड/ लक का उपयोग क जए।
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जो आपको मलेगा (सार) —
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जन्म सन् 1932, अल्मोड़ा (उत्तराखंड); नधन सन् 2022।
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.c संग्रह — कोसी का घटवार (1958)। इसी नाम क उनक कहानी हद क aसवा g धक पढ़ गई प्रेम-कहा नय म
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पहला कहानी
l a sगनीe जाती है।
a g अन्य संग्रह — साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, आदमी का डर, डांगरी वाले, मेरा पहाड़; एक पेड़ क याद
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(शब्द चत्र), स्मृ त म रह वे (संस्मरण), न रोको उन्ह शुभ्रा (क वता), मेरा ओ लया गाँव (आत्मवृत्त)।
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सम्मान — ‘महावीर प्रसाद द्ववेद पुरस्कार’, ‘सा हत्य भूषण सम्मान’, ‘अ खल भारतीय मै थलीशरण गुप्त सम्मान’, ‘श्रीलाल
शुक्ल स्मृ त इफको सा हत्य पुरस्कार’।
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मुख्य प्रवृ त्त — पहाड़ी गाँव का जीवन,g
a l के मजदूर का संघष और ग्रामीण-शहरी मध्यवग के बदलते जीवन-मूल्य।
कारखान
उनक भाषा साद है और वे भाव को बढ़ा-चढ़ाकर नह कहते — कम कहकर अ धक कहना उनक शैली क पहचान है।
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अपनी पु स्तका म यह ल खए: लेखक का सं क्षप्त प रचय, उनक कोई एक और कहानी पढ़कर उसका सार, और
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यह क उसम और ‘संवादहीन’ म क्या समानता दखी।
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खोजबीन क जए — तोता
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प्र.2
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क्या खोजना है — ‘तोता’ शीषक या तोते पर क द्रत रचनाएँ, और स्वयं तोते के बारे म जानकारी।
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दो दशाएँ र खए —
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1. सा हत्य म तोता — हद और भारतीय सा हत्य म तोता बहुत पुराना प्रतीक है। संस्कृत कemशुकसप्त त (सत्तर कहा नयाँ जो
. cएक a gl म ‘राजा का तोता’, ‘तोता-मैना क
o तोता सुनाता है) और फारसी क तूतीनामा इसी परंपरा क पुस्तक ह। लोककथाओं
a s em कहानी’ प्र सद्ध ह। खोजते समय दे खए क तोता वहाँ कसका प्रतीक है — कह वह बु द्ध और वाणी का प्रतीक है, कह
agl बना समझे दुहराने का।
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2. पक्षी के रूप म तोता — भारत म मलने वाली प्रजा तयाँ (जैसे गुलाबी कंठ वाला रोज़- रग्ड पैराक ट), उनका भोजन, घ सला
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और झुंड म रहने का स्वभाव। यह भी जा नए क भारतीय वन्यजीव संरक्षण अ ध नयम, 1972 के अंतगत दे शी तोत को
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पजरे म पालना और उनका व्यापार कानूनन अपराध है।
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कहानी से जो ड़ए: दूसरी दशा वाली जानकारी ‘संवादहीन’ को एक नई रोशनी म रख दे ती है। जगन मास्टर जस
बात को केवल नै तक मानते थे — क पक्षी को पजरे म नह रखना चा हए — वह आज कानूनी भी है। पर कहानी
का प्रश्न फर भी बचा रहता है: क्या सही काम, गलत तरीके से करने पर भी सही रहता है?
प्र.3 खोजबीन क जए — तोते को गीत सखाना
क्या खोजना है — तोते को बोलना/गीत सखाने क प्र क्रया, और इस वषय पर लखी गई रचनाएँ। पुस्तकालय या दए गए लक
से खो जए।
जो जानने योग्य है —
तोता अथ समझकर नह बोलता — वह ध्व नय क नकल करता है। इसे अनुकरण कहते ह। बार-बार एक ही वाक्य सुनाने
पर वह उसे दुहराने लगता है।
यही बात कहानी म लखी है — “कुशाग्र बु द्ध छात्र क तरह मट्ठू ताई के पढ़ाए पाठ को न केवल हू-ब-हू दुहरा दे ता ब ल्क एक-
दो बार सुनकर याद भी रख लेता था।”
पर कहानी इससे आगे भी जाती है। मट्ठू केवल दुहराता नह , मौके पर सही बात कहता है — “मौके बे-मौके ताई के सवाल
का सट क उत्तर दे दे ता।” यह व ान से अ धक स्नेह का चमत्कार है — जो जीव जसके साथ रहता है, वह उसक आवाज का
लहजा पहचानने लगता है।
इसका उलटा प्रमाण भी कहानी म है — जगन मास्टर एवजी तोते को घंट रटाते ह, खाना-पीना छोड़कर, गला सूखने तक; पर
वह एक शब्द नह बोलता। ताई क बात तोता सीख गया, मास्टर क नह — क्य क सखाने म केवल दुहराना नह , संबंध
भी चा हए।
पु स्तका म ल खए: “तोते को गीत सखाना” वषय पर आधा पृष्ठ — इसम यह जरूर ल खए क आपक दृ ष्ट म
सखाने के लए सबसे जरूरी चीज क्या है: दुहराव, धैय, या अपनापन?
प्र.4 खोजबीन क जए — तोते क कहानी
क्या खोजना है — तोते को कद्र म रखकर लखी गई प्र सद्ध कहा नयाँ, वशेष रूप से रव द्रनाथ ठाकुर क व्यंग्य-कथा तोता-
कहानी (मूल बांग्ला — ‘तोतार शक्षा’)।
‘तोता-कहानी’ का सार — एक राजा को लगा क उसका तोता अनपढ़ है, इस लए उसे शक्षा द जानी चा हए। पं डत बुलाए गए।
पहले एक भारी सोने का पजरा बनाया गया, फर मोट -मोट पो थयाँ लखी गईं, फर पन्ने फाड़-फाड़कर तोते के मुँह म ठूँ से जाने
लगे। खच बढ़ता गया, पं डत क प्रशंसा होती रही, राजा प्रसन्न रहा। अंत म तोता मर गया — और सबने कहा क अब उसक
‘ शक्षा’ पूरी हो गई, क्य क अब वह फड़फड़ाता भी नह , उछलता भी नह । रव द्रनाथ ने इस कथा से उस शक्षा-व्यवस्था पर व्यंग्य
कया जो ब े क ज ासा और स्वतंत्रता को मारकर उसे केवल ‘आ ाकारी’ बना दे ती है।
‘संवादहीन’ से तुलना क जए —
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बदु तोता-कहानी (रव द्रनाथ) संवादहीन (शेखर जोशी)
तोते के साथ क्या पजरे म ठूँ स-ठूँ सकर ‘पढ़ाया’ जाता है, वह मर िपंजरा खोल िदया जाता है, वह उड़ जाता है
होता है जाता है
नशाना कस पर यां त्रक शक्षा-व्यवस्था और चापलूस तंत्र िबना सोचे लागू िकया गया आदश, और पलायन से उपजा
अके लापन
तोता कसका प्रतीक बालक, जसक स्वतंत्रता छ नी जाती है वह संवाद, जो एक अके ली वृ ा का सहारा है
साझी बात दोनों में तोते के साथ ‘भला’ करने वाले ही उसका और िकसी और का नुकसान कर दे ते है ं — और दोनों कहािनयाँ अंत
में चु पी पर ख म होती है।ं
प् त्
अन्य रचनाएँ जो आप खोज सकते ह: संस्कृत क शुकसप्त त, फारसी क तूतीनामा, और अपने क्षेत्र क ‘तोता-
मैना’ वाली लोककथा। पु स्तका म ल खए क इनम तोता कब बु द्धमान दखाया गया है और कब बेचारा — और
आपको कौन-सा चत्रण अ धक स ा लगा।
अध्याय — एक नज़र म
रचनाकार — शेखर जोशी का जन्म सन् 1932 म अल्मोड़ा, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदे श) म हुआ था। उनका पहला
कहानी संग्रह कोसी का घटवार सन् 1958 म प्रका शत हुआ। साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, आदमी का डर,
डांगरी वाले, मेरा पहाड़ (कहानी संग्रह), एक पेड़ क याद (शब्द चत्र-संग्रह), स्मृ त म रह वे (संस्मरण), न रोको उन्ह शुभ्रा
(क वता संग्रह) और मेरा ओ लया गाँव (आत्मवृत्त) उनक अन्य प्रमुख रचनाएँ ह। उनक कहा नय का समग्र शेखर जोशी कथा
समग्र नाम से छपा है। उन्ह ‘महावीर प्रसाद द्ववेद पुरस्कार’, ‘सा हत्य भूषण सम्मान’, ‘अ खल भारतीय मै थलीशरण गुप्त
सम्मान’ और ‘श्रीलाल शुक्ल स्मृ त इफको सा हत्य पुरस्कार’ मले। सन् 2022 म उनका नधन हुआ।
कथावस्तु — गाँव के बीच खड़े ‘बड़े घर’ म अब केवल दो प्राणी बचे ह — ताई और उनका तोता मट्ठू। कभी उस घर म पूत-
प रवार, बहू-बे टयाँ, नौकर-चाकर और गाय-ढोर थे; फर “बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहर के होकर रह गए”, बे टयाँ
अपनी गृहस्थी म रम गईं और “धीरे-धीरे सब पराए हाथ म चला गया।” गनपत कह से एक पहाड़ी तोता ले आया और ताई क
सारी ममता मट्ठू पर बरस पड़ी।
कथा का मोड़ — कुंभ-स्नान के लए प्रयागराज जाते समय ताई मट्ठू को जगन मास्टर क घरवाली के पास छोड़ जाती ह।
जगन मास्टर ‘दूसरे मजाज के आदमी’ ह — स्वतंत्र वचार वाले आदशवाद , जन्ह पजरे म बंद पक्षी दे खकर बेचैनी होती
है। वे रोज कमरा बंद करके पजरे का दरवाजा खोलते ह, और चौथे-पाँचव दन मट्ठू खुले रोशनदान से उड़ जाता है। गनपत क
सलाह पर हूबहू वैसा ही दूसरा तोता ले आया जाता है, पर लौट हुई ताई के सामने वह ‘एवजी मट्ठू’ चुप बैठा रहता है — “वह
केवल इधर-उधर ताकता रहा।”
पात्र — ताई वैभवशाली अतीत और सूने वतमान के बीच झूलती वृद्धा ह; तेज स्वभाव क , पर भीतर से गहरे लगाव वाली।
मट्ठू केवल तोता नह , ताई के लए संवाद का माध्यम, बेटे जैसा साथी और ममता का कद्र है। जगन मास्टर आदश और
व्यवहार के द्वं द्व के प्रतीक ह — उनका उ े श्य प वत्र है, पर प रणाम वनाशक। मास्टराइन और गनपत गौण पर नणायक
पात्र ह।
भाषा-शैली — कहानी क भाषा लोकधम है — “दो जून का एक जून चूल्हा फूँक लेत ”, “ कसके भरोसे कारबार
संभलता”, “भाँय-भाँय”, “मान-मनौवल”। शेखर जोशी संवाद , पुनरु क्त (“कटे गी! कटे गी!! कटे गी!!!”), दृश्य बब और
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नपे-तुले व्यंग्य से काम लेते ह। सबसे तीखा वाक्य व्यंजना का है — “अकेले मट्ठू क्या उड़े, आदशवाद जगन मास्टर के हाथ
के सभी तोते उड़ गए।”
मूल संवेदना — शीषक ‘संवादहीन’ ही कहानी क कुंजी है। जस घर म कभी दजन लोग क आवाज थ , वहाँ अब एक
पक्षी क रट हुई पं क्तयाँ ही ‘संवाद’ ह; और अंत म वह भी छन जाता है। पलायन के बाद गाँव म छू ट गए बुजुग का
अकेलापन, मनुष्य और पक्षी के बीच बना भावनात्मक पुल, तथा आदश और यथाथ का द्वं द्व — ये तीन धागे मलकर कहानी
बुनते ह।
शल्प क खूबी — कहानी का अंत मुक्त और यथाथवाद है। लेखक न ताई का वलाप लखता है, न मट्ठू को लौटाता है —
केवल एक पं क्त छोड़ जाता है: “उनके सूनेपन का साथी न जाने कन अमराइय म घूम रहा होगा।” ‘न जाने’ और ‘होगा’ क
संदेह-भरी क्रया पाठक को कहानी पूरी करने के लए छोड़ दे ती है।
अभ्यास क्या माँगता है — इस पाठ का अभ्यास पाँच बहु वकल्पी प्रश्न से शुरू होता है जनम वकल्प के साथ तक भी
माँगा गया है; फर पाठ-आधा रत व्याख्या, प्रश्न- नमाण, अनुभव-आधा रत लेखन, कहानी के शल्प- बदुओं क ता लका,
कहानी के अंत क श्रेणी, समाज से जुड़े प्रश्न, सृजनात्मक लेखन (आगे क कहानी, व ापन), और व्याकरण — मुहावरे,
ध्वन्यात्मक शब्द, शब्द-युग्म, अथ के आधार पर वाक्य-भेद तथा भाषा संगम।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ पाठ क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
ढोर पालतू गोजातीय पशुओ ं के िलए पयुक्त “पूत-प रवार, बहू-बे टयाँ, नौकर-चाकर, खेत जोतने के बाद कसान अपने
शब्द; चौपाया, डंग र गाय-ढोर, क्या नह था बड़े घर म!” ढोर को नद पर ले गया।
तकाजा आवश्यकता, इच्छा, अनुर ोध; कोई काम “ मट्ठू के वक्त-बेवक्त के तकाज के लए भूख का तकाजा है क पहले भोजन
करने के िलए बार-बार कहना रोट बचाकर रखत ।” कर लया जाए।
कुशाग्र तीव; कु श की नोंक जैस ा तीक्ष्ण “कुशाग्र बु द्ध छात्र क तरह मट्ठू ताई के रमा कुशाग्र बु द्ध क है, एक बार
पढ़ाए पाठ को … दुहरा दे ता।” पढ़ते ही याद कर लेती है।
पौ फटना पातःकाल का पकाश फू टना; तड़का होना “सुबह पौ फटने लगती, पेड़ म च ड़याँ पौ फटते ही चरवाहे गाय को लेकर
चहचहात …” नकल पड़े।
अचकचाना भौचक्का होना, चौंक उठना “ताई अचकचाकर उठ बैठत ।” अचानक घंट बजी तो म अचकचाकर
जाग गया।
नहाल पसन्न, हर तरह से तप्ृ त “ताई नहाल हो जात ।” पोते क पहली च पढ़कर दाद
नहाल हो गईं।
सत्ता अिस्तत्व, यथाथता, अिधकार, पभुत्व “वैभव और सत्ता के बीते दन क गाथा।” सत्ता आती-जाती रहती है, नाम काम
से बनता है।
अतल अथाह, तलहीन “काल क अतल गहराइय से झाँकता स्मृ त क अतल गहराई म बचपन का
एक-एक चेहरा…” वह दन आज भी सुर क्षत है।
प्रसंग पकरण, संबंध , िवषय का तारतम्य, लगाव “…ताई को नए-नए प्रसंग क याद दला बात-बात म उन्ह ने अपने गाँव का
दे ता।” प्रसंग छे ड़ दया।
रोबीला पभावशाली “जम दार साहब का रोबीला चेहरा…” फौजी चाचा का रोबीला चेहरा दे खकर
ब े चुप हो गए।
तुनक मजाज जो छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाए; “उनक गुणग्राहकता, उनक तुनक मजाज व्य क्त के साथ काम
िचड़िचड़ा तुनक मजाजी, उनका गुस्सा…” करना क ठन होता है।
वयोग िवच्छे द , िवरह, अभाव “ताई को घड़ी-भर के लए भी मट्ठू का बेटे के वयोग म माँ क आँख भर
वयोग सहन नह हो सकता था।” आईं।
साँकल ृ ला
जंजीर, िसकड़ी, शंख “दस बार खड़क -दरवाज क साँकल रात को दरवाजे क साँकल चढ़ाना
टोहकर दे खत …” मत भूलना।
टोह खोज, अनुस ंध ान, पता, दे खभाल “…साँकल टोहकर दे खत ।” पु लस चोर क टोह म गाँव-गाँव घूम
रही थी।
दे हरी/दे हली दरवाजे की चौखट की नीचे वाली लकड़ी, “… दलासा दे कर दे हरी से पाँव बाहर दुल्हन ने दे हरी लाँघते ही चावल का
िजसे लाँघ कर घर में आते-जाते है ं नकालत ।” कलश गराया।
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कक्षा 9 हद अध्याय 3 संवादहीन
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शब्द अथ पाठ क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
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मजाज
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स्वभाव, तबीयत, पकृ ित, आदत “जगन मास्टर दूसरे मजाज के आदमी
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हर आदमी का अपना मजाज होता
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थे।”
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प्राय श्चत शोधन; वह शास्त्र-िविहत कम जो पाप का “…अपने पाप का थोड़ा प्राय श्चत कर ल।” गलती मान लेना ही सबसे स ा
माजन करने के िलए िकया जाए प्राय श्चत है।
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कौतूहलवश उत्सुक तावश, अचंभे के कारण
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“…सहज कौतूहलवश वह पजरे क छत कौतूहलवश ब े ने घड़ी खोलकर ag
g l asसे … रोशनदान पर पहुँच गए।” दे ख ली।
मशगूल कायरत; िकसी काम या शगल में लगा
a “…अपने पंख तौलने म मशगूल रहे।” वह दन भर कताब म मशगूल रहता
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हुआ है।
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mअजन जीवन भर चलता
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agl रहता है।
अजन कमाना, संग ह करना “…गंगा-स्नान का पुण्य अजन कर लौट ान का
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हुई ताई…”
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एवजी बदले में काम करने वाला; स्थानापन्न “…वहाँ बैठे एवजी मट्ठू ने उन्ह दे खकर मास्टर जी क छु ट्ट म एवजी शक्षक
कोई हरकत नह क ।” पढ़ाने आए।
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आग्नेय अिग्न से उत्पन्न, अिग्न जैस ा “…तो आग्नेय दृ ष्ट से उनक ओर दे खकर उसक आग्नेय दृ ष्ट दे खकर सब चुप
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पानी पीकर फर दुहराते।” हो गए।
जून वक्त, वेल ा; िदन का अ भाग agl “…ताई दो जून का एक जून चूल्हा फूँक मजदूर को दो जून क रोट भी
लेत ।” क ठनाई से मलती है।
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seलगा।
भाँय-भाँय सूनेपन की डरावनी ध्विन; एकदम “…सूने घर क भाँय-भाँय जैसे उन्ह काटने मेले के बाद मैदान भाँय-भाँय करने
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को दौड़ती थी।”
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