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अत्यंत गोपनीय केवल आंतरिक एवं सीमित प्रयोग हे तु
अंक-योजना
ववषय- हहंदी
कक्षा – दसवीं
सािान्य ननदे श :-
1. परीक्षार्थियों के सही और उर्ित आकलन के ललए उत्तर पुस्ततकाओं का मूलयांकन एक महत्वपूर्ि प्रक्रिया
है। मल
ू यांकन में एक छोटी-सी त्रुटट भी गंभीर समतया को जन्म दे सकती है , जो परीक्षार्थियों के
भववष्य, लिक्षा प्रर्ाली और अध्यापन-व्यवतथा को भी प्रभाववत कर सकती है। इससे बिने के ललए
अनरु ोध क्रकया जाता है क्रक मल
ू यांकन प्रारं भ करने से पव
ू ि ही आप मल
ू यांकन ननदे िों को पढ़ और समझ
लें।
2. योग्यता आधाररत प्रश्नों का मलू यांकन करते समय कृपया टदए गए उतरों को समझे, भले ही उत्तर
माक्रकिंग तकीम में न हो, छात्रों को उनकी योग्यता के आधार पर अंक टदए जाने िाटहए।
3. अंक योजना में उत्तरों के ललए केवल सुझाए गए मान बबंद ु होते हैं। ये केवल टदिा-ननदे िों की प्रकृनत के
हैंऔर पूर्ि नहीं हैं। यटद परीक्षार्थियों की अलभव्यस्तत सही है तो उसके अनुसार ननयत अंक टदए जाने
िाटहए।
4. परीक्षक सही उत्तर पर सही का र्िह्न () लगाएँ और गलत उतर पर गलत का ()मूलयांकनकताि द्वारा
ये र्िह्न न लगाने से ऐसा समझ में आता है क्रक उत्तर सही है , परं तु उस पर अंक नहीं टदए गए।
5. यटद क्रकसी प्रश्न के उपभाग हो तो कृपया प्रश्नों के उपभागों के उत्तरों पर दायी ओर अंक टदए जाएँ।
बाद में इन उपभागों के अंकों का योग बायाँ और के हालिये में ललखकर उसे गोलाकृत कर टदया जाए।
6. यटद क्रकसी प्रश्न के कोई उपभाग न हो तो बायीं ओर के हालिये में अंक टदए जाएँ और उन्हें गोलाकृत
क्रकयाजाए।
7. यटद परीक्षाथी ने क्रकसी प्रश्न का उत्तर दो तथानों पर ललख टदया है और क्रकसी को काटा नहीं है तो
स्जस उत्तर पर अर्धक अंक प्राप्त हो रहे हो, उस पर अंक दें और दस
ू रे को काट दें । यटद परीक्षाथी ने
अनतररतत प्रश्न/प्रश्नों का उत्तर दे टदया है तो स्जन उत्तरों पर अर्धक अंक प्राप्त हो रहे हो, उन्हें ही
तवीकार करे , उन्हीं पर अंक है।
8. एक ही प्रकार की अिुद्र्ध बार-बार हो तो उसे अनदे खा करें और उस पर हर बार अंक न काटे जाएँ।
9. यहाँ यह ध्यान रखना होगा क्रक मूलयांकन में पूर्ि अंक पैमाना 0-80 (उदाहरर् 0-80 अंक जैसा क्रक
प्रश्न में टदया गया है) का प्रयोग अभीष्ट है , अथाित परीक्षाथी ने यटद सभी अपेक्षक्षत उत्तर-बबंदओ
ु ं का
उललेख क्रकया है तो उसे पूरे अंक दे ने में संकोि न करें ।
10. ये सुननस्श्ित करें क्रक उत्तर पुस्ततका के अंदर टदए गए अंकों का आवरर् के अंकों के साथ लमलान
हो।
11. आवरर् पष्ृ ठ पर दो ततंभों के अंकों का योग जाँि लें ।
12. उत्तर पस्ु ततकाओं का मल
ू यांकन करते हुए यटद कोई उत्तर पर्
ू ि रूप से गलत हो तो उस पर (x)
ननिान लगाएँऔर िन्
ू य (0) अंक दें ।
13. उत्तर पस्ु ततका में क्रकसी प्रश्न का बबना जाँिे हुए छूट जाना या योग में क्रकसी भल
ू का पता लगना,
मल
ू यांकनसलमनत के सभी लोगों की छवव को और बोर्ि की प्रनतष्ठा को धलू मल करता है ।परीक्षक
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सुननस्श्ित करें क्रक सभी उत्तरों का मूलयांकन हुआ है । आवरर् पष्ृ ठ पर तथा योग में कोई अिुद्र्ध नहीं
रह गई है तथा कुल योग को िब्दों और अंकों में ललखा गया है ।
उपयत
ुि त मूलयांकन ननदे ि उत्तर-पुस्ततकाओं की जाँि हे तु आदे ि नहीं अवपतु केवल ननदे ि हैं। यटद इन
मूलयांकन ननदे िों में क्रकसी प्रकार की त्रुटट हो, क्रकसी प्रश्न का उत्तर तपष्ट न हो, अंक योजना में टदए
गए उत्तर से अनतररतत कोई और भी उत्तर सही हो, तो परीक्षक अपने वववेकानुसार उस प्रश्न का
मूलयांकनकरे ।
अंक-योजना
ववषय– हहंदी
कक्षा – दसवीं
कोड–A
कक्षा : दसवीं अर्धकतम अंक 80
सािान्य ननदे श :-
1. अंक योजना का उद्दे श्य मूलयांकनको अर्धकार्धक वततुननष्ठ बनाना है।
2. वर्िनात्मक प्रश्नों के अंक योजना में टदए गए उत्तर बबंद ु अंनतम नहीं है बस्लक ये सुझावात्मक
एवम ् सांकेनतक हैं।
3. यटद परीक्षाथी इन सांकेनतक बबंदओ
ु ं से लभन्न , क्रकन्तु उपयुतत उत्तर है, तो उन्हें अंक टदए जाएँ।
4. मूलयांकन कायि ननजी व्याख्या के अनुसार नहीं बस्लक अंक योजना में टदए गए ननदे िानुसार ही
क्रकया जाए।
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खंड -क
प्रश्न- संख्या उत्ति अंक ववभाजन
प्रश्न-1 व्याकिण एवि ् िचना पि आधारित प्रश्नों के उत्ति : 1x7=7
क. iv. बहुव्रीटह समास
ख. ii. दीर्ि संर्ध
ग. iii. टदन
र्. ii. ववष
र्. ii. अनत
ि. iii. इक
छ. i. ननलिज्ज व्यस्तत
प्रश्न 2 ननम्नमलखखत प्रश्नों के यथाननहदिष्ट उत्ति दीजजए। 2x4=8 अंक
क) िौपाई एक माबत्रकसम छं द है इसके प्रत्येक िरर् में 16-16 मात्राएं होती हैं ।िरर् के अंत
में जगर् तथा तगर् नहीं आने िाटहए समकल के बाद समकल और ववषम कल के बाद
ववषम कल आना िाटहए।
जैसे -रर्ुकुल रीत सदा िलल आई प्रार् जाए पर विन न जाई
यही क्षबत्रय धमि है भाई
अपने कुल की रीत ननभाई
ख) एक से अर्धक वर्ों के लमलने से जो साथिक वर्ि-समूह बनता है वह िब्द कहलाता हैं।
जैस-े सोहन, खीर, मीरा, खेलता। जब क्रकसी भी प्रकार का साथिक िब्द वातय में प्रयुतत होता
है तब वह पद कहलाता है।
ग) जहां क्रकसी व्यस्तत या वततु की लोक प्रलसद्ध व्यस्तत या वततु से तुलना की जाती है वहां
उपमा अलंकार होता है। जैसे हाय! फूल सी कोमल बच्िी हुई राख की थी ढे री।
र्) अववकारी िब्द : स्जन िब्दों का रूप-पररवतिन होता है। वे अववकारी िब्द कहलाते हैं।
जैसे कल ,वाह!,परसों ,तो , जब, अरे आटद । क्रिया वविेषर्, संबंध बोधक, समुच्ियबोधक
ववतमयाटदबोधक और ननपात अववकारी िब्दों में आते हैं।
प्रश्न- 3 ककसी एक ववषय पि ननबंध 5 अंक
क) भूलमका 1
ख) ववततार + ननधािररत िब्द सीमा 3
ग) उपसंहार 1
प्रश्न- 4 पत्र लेखन 5 अंक
क) आरं भ और अंत की औपिाररकताएं 1
ख) ववषय वततु 3
ग) भाषा 1
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खंड - ख (क्षक्षनतज काव्य खंड)
प्रश्न- 5 बहुववकल्पीय प्रश्नों के उत्ति 6 अंक
क iii. प्रजा 1
ख i. बालकाण्र् 1
ग ii. िेफाललका 1
र् ii. बबजली 1
ड़. i. हाथों की 1
ि i. बिपन 1
प्रश्न- 6 काव्यांश पि आधारित प्रश्नों के उत्ति (5)
i. कवव – सूरदास , कववता – सूरदास के पद 1
ii. प्रततत
ु पद टहंदी की पाठ्य पुततक क्षक्षनतज भाग- 2 में संकललत एवं सरू दास के पदों से ललया
गया है । 1
iii. कड़वी ककड़ी के समान 1
iv. ज्यों करुई ककरी 1
v. िंिल, अस्तथर। 1
प्रश्न- 7 काव्य-सौंदयि - (3)
(i) भाव सौंदयि 1½
(ii) लिलप सौंदयि 1½
भाव –यहां कवव तपष्ट करता है क्रक परिुराम बड़े िोर्धत थे और छोटी-छोटी बातों पर िोर्धत होते थे
उनकी वार्ी अंगारों की वषाि करती थी।
लिलप – भाषा – अवधी
छं द – दोहा
अलंकार –अनतियोस्तत अलंकार
व्यंजना- िब्द िस्तत,
वीर रस, ओज गुर्का प्रयोग हुआ है ।
प्रश्न- 8 प्रश्नों के उत्ति 3+3= 6 अंक
(क). कवव अपने जीवन िें ककसी के प्रनत ककए गए प्रेिभाव को जग जाहहि नहीं किना चाहता था।
वह नहीं चाहता था कक जजस प्रेि के सुख को उसने पाया ही नहीं औि जजसका केवल सपना-भि
दे खा उसे दस
ू िों के सािने प्रकट किे । वह प्रेि तो उसकी स्िनृ तयों का सहािा था जो उसे जीने की
प्रेिणा दे ता था।
(ख). गोवपयों के अनुसाि िाजा का धिि तो यह होना चाहहए कक वह ककसी भी दशा िें प्रजा को न
सताए। वह के सुख-चैन का ध्यान िखे।
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प्रश्न- 9 क्षक्षनतज (गद्य -खंड) के आधाि पि ननम्नमलखख बहुववकल्पीय प्रश्नों के उत्ति (6)
क. (iv) हालदार 1
ख (i) कानतिक 1
र् (iii) कनफटी 1
ड़ (iv) भानपुरा 1
ि. (ii) िहनाई 1
छ (i) लेननन 1
प्रश्न- 10. गद्यांश पि आधारित प्रश्नों के उत्ति (5)
(i) पाठ –बालगोबबन भगत , लेखक –रामवक्ष
ृ बेनीपरु ी 1
(ii) भादो की 1
(iii) झझलली की 1
(iv) बाल गोववंद भगत का गाना। 1
(v) गोदी में वपयवा,िमक उठे सझखयां, 1
प्रश्न-11 लेखक/लेखखका परिचय 5
क) जीवन पररिय 1
ख) प्रमख
ु रिनाएँ 1
ग) साटहस्त्यक वविेषताएँ 1½
र्) भाषा -िैली 1½
प्रश्न- 12. प्रश्नों के उत्ति 2+2 =4 अंक
(क) यह टटप्पर्ी उसकी संकीर्ि मानलसकता को व्यतत करती है उसके मन में दे िभस्तत का आदर
करने वालों के प्रनत सम्मान की भावना नहीं थी,उसे कैप्टन पर व्यंग्य करने की अपेक्षा उसके प्रनत
आदर भाव रखना िाटहए था। जो व्यस्तत नेताजी की प्रनतमा में कोई कमी नहीं दे ख सकता ऐसे
व्यस्तत की िारीररक कलमयों की तरफ ध्यान न दे कर उसकी भावनाओं की कदर करनी िाटहए। यह
टटप्पर्ी दभ
ु ािग्यपर्
ू ि है उसे ऐसा नहीं करना िाटहए था।
(ख) लेझखका मन्नू भंर्ारी ने अपव
ू ि उत्साह टदखाया, अपने वपता की इच्छा के ववरुद्ध सड़कों पर र्म
ू -
र्म
ू कर नारे बाजी की, भाषर् टदया ,हड़ताल की ,जलसे -जल
ु स
ू ननकाले। उसके इिारे पर परू ा
कॉलेज कक्षाएं छोड़कर आंदोलन में साथ हो लेता था ।
खंड – घ ( कृनतका भाग -2 )
प्रश्न-13. कृनतका भाग -2 के आधाि पि ककन्ही दो प्रश्नों के उत्ति 3+2+2= 7अंक
(क) माता का आंिल पाठ में लेखक की बालयावतथा का अत्यंत आकषिक रूप में र्ित्रर् क्रकया गया है
।लेखक ने बताया है क्रक उसे अपने माता-वपता का भरपरू तनेह लमला है । बिपन में क्रकतनी
ननस्श्ित और भोलापन होता है । इसका साक्षात रूप पाठ में दे खने को लमलता है । बच्िे अपने
खेल में तललीन होकर खेलते हैं ।वहां क्रकसी प्रकार का भेदभाव र्र्
ृ ा, जलन का भाव नहीं होता
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।बच्िों की दनु नया की संजीव ततवीर अंक्रकत करना लेखक का प्रमुख लक्ष्य रहा है । स्जसमें उसे
पूर्ि सफलता भी लमली है ।
अथवा
उत्तर:- गंतोक को मेहनतकि बादिाहों का िहर इसललए कहा गया है तयोंक्रक यहां के लोग बहुत
मेहनत करते हैं और अपनी जीववका कमाने के ललए संर्षि करते हैं, भले उनके पास
संसाधन कम हो । गंतोक की भौगोललक स्तथनत और आर्थिक गनतववर्धयों के कारर् लोगों
को अपनी आजीववका िलाने के ललए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है।
(ख) लेझखका की पहाड़ी यात्रा गंतोक से यूमथांग जाने के ललए आरं भ होती है ।वह अपने पूरे दल के
साथ जीप में बैठकर यात्रा िुरू करती है ।जैस-े जैसे जीप आगे बढ़ती हैं उन्होंने दे खा क्रक
टहमालय का प्राकृनतक दृश्य पल-पल में बदल रहा है । अब टहमालय अपने वविाल रूप में
टदखाई दे ने लगता है । आसमान में र्टाएं फैली हुई हैं। र्ाटटयों में दरू -दरू तक झखले हुए फूल
फैले हुए हैं। लेझखका टहमालय के िमत्कारी रूप को अपनी आत्मा में समेट लेना िाहती है ।
वह उसे दृश्य से एकात्मक हो जाती है । वह टहमालय को “मेरे नगपनत”“मेरे वविाल” कहकर
सलामी दे ती है । टहमालय कहीं हरे रं ग का कालीन ओढे नजर आता है ।
कहीं सफेद बफि की िादर ओढ़े हुए। कहीं-कहीं बादल में लुका छुपी का खेल खेलते सा लगता
है। लेझखका को पवित क्षेत्र जाद ू की छाया माया एवं खेल लगता है ।
तो कहीं लेझखका उसे दे खकर गहन वविारों में र्ूब जाती है उसे वह परम सत्य का अनभ
ु व होने
लगता है।
(ग) 'मैं तयों ललखता हूँ?' अज्ञेय जी का एक प्रलसद्ध ननबंध है .लेखक ने इस ननबंध में बताया है क्रक
लेखक की भीतरी ववविता ही उसे ललखने के ललए मजबूर करती है और ललखकर ही लेखक
उससे मुतत हो पाता है। प्रत्यक्ष अनुभव जब अनुभूनत का रूप धारर् करता है , तभी रिना पैदा
होती है। अनुभव के बबना अनुभूनत नहीं होती, परं तु यह आवश्यक नहीं है क्रक हर अनुभव
अनभ
ु नू त बने । लेखक ने अपने द्वारा रर्ित 'टहरोलिमा' कववता की रिना का उदाहरर् दे ते हुए
तपष्ट क्रकया है क्रक अनभ
ु व जब भाव - जगत ् और संवेदना का टहतसा बनता है , तभी वह
कलात्मक अनभ
ु नू त में रूपांतररत होता है।
खंड –ङ आदशि जीवन िूल्य िध्यिा
प्रश्न .14 (क). वतिमान भारतीय समाज में नारी का तथान बहुमुखी और महत्वपूर्ि है । वह अब केवल
र्रे लू कायों तक सीलमत नहीं है, बस्लक लिक्षा, राजनीनत, व्यवसाय, और समाज के ववलभन्न
क्षेत्रों में सक्रिय रूप से भाग ले रही है. हालांक्रक, लैंर्गक असमानता और सामास्जक दबाव जैसे
कुछ मुद्दे अभी भी मौजूद हैं.
(ख) इस संसार में ज्ञान के समान पववत्र करने वाला ननश्िय ही कुछ भी नहीं है । योग-लसद्ध
व्यस्तत (पववत्र अन्तःकरर् होने पर) तवयं ही इसको आत्मा में पा लेता है। इस ज्ञान की तलाि
में मनुष्य आटदकाल से ही रहा है । यह आवश्यक नहीं क्रक यह ज्ञान हमें बड़ों से ही प्राप्त हो। यटद
हमें अपने छोटों से भी ज्ञान लमले तो उसे प्राप्त करने में संकोि नहीं करना िाटहए। ऐसी ही एक
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कथा है, स्जसमें महाराजा जनक छोटे -से ननितत (टदव्यांग) बालक अष्टावि से ज्ञान प्राप्त करते
हैं।
(ग) उत्साहपव
ू क
ि जीवन जीने से हमें यह लाभलमलता है क्रक हम जीवन के हर क्षेत्र में उन्ननत कर
सकते हैं; िाहे पढ़ाई में अर्धक अंक लाने की बात हो, क्रकसी परीक्षा की तैयारी की बात हो अथवा
अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की बात हो या अन्य कोई भी कायि हो। यटद हम उसे उत्साह से करें गे
तो हमें उसमें अवश्य ही सफलता लमलेगी। प्रत्येक कायि में सफलता के ललए उत्साह का होना अनत
आवश्यक है। अतः हमें प्रत्येक कायि उत्साहपूवव
ि करना िाटहए।
(र्) गीता के अनस
ु ार, कमि की सफलता के ललए कमियोग, ज्ञानयोग और भस्ततयोग जैसे तत्त्व
सहायक होते हैं। कमियोग का अथि है, बबना फल की इच्छा के कमि करना। ज्ञानयोग का अथि है,
ज्ञान के माध्यम से कमि करना, और भस्ततयोग का अथि है, परमात्मा को समवपित होकर कमि
करना.