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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 2: दो गौरैया
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — मल्हार
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
13 – 35 20 56 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 42 pages
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 8 · हद · मल्हार
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 2: दो गौरैया
NCERT कक्षा 8 हद क पाठ्यपुस्तक मल्हार के पाठ 2 दो गौरैया (कहानी — भीष्म साहनी) के सभी प्रश्न के पूरे हल। एक घर, दो ढ ठ गौरैयाँ और
एक ऐसा पता जो उन्ह नकालते- नकालते अंत म मुसकरा दे ता है — पृष्ठ 19 से 28 तक क हर ग त व ध (मेरी समझ से, मलकर कर मलान,
पं क्तय पर चचा, सोच- वचार के लए, अनुमान और कल्पना से, संवाद और अ भनय, बदली कहानी, कहने के ढं ग/ क्रया वशेषण, घर के प्राणी, हेर-
फेर मात्रा का, वाद- ववाद, कहानी क रचना, आपक बात, पाठ से आगे, च ड़य का घ सला, मल्हार, हास्य-व्यंग्य, आज क पहेली, झरोखे से, साझी
समझ) तथा ‘पढ़ने के लए’ म द गई पंचतंत्र क कथा मत्रलाभ — शीषक-दर-शीषक हल।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
मल्हार (कक्षा 8) 13 – 35
खं ड प्रश्न
20 56
माध्यम
हन्द
मेरी समझ से — पृष्ठ 19 और 20
पाठ से
पाठ से
प्र.1 ★
(क) नम्न ल खत प्रश्न के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा ( ) बनाइए। कुछ प्रश्न के एक से अ धक उत्तर भी हो
सकते ह। (1) पताजी ने कहा क घर सराय बना हुआ है क्य क— • घर क बनावट सराय जैसी बहुत वशाल है •
घर म व भन्न पक्षी और जीव-जंतु रहते ह • पताजी और माँ घर के मा लक नह ह • घर म व भन्न जीव-जंतु
आते-जाते रहते ह
तारा (★) दो वकल्प पर बनेगा — ‘घर म व भन्न पक्षी और जीव-जंतु रहते ह’ और ‘घर म व भन्न जीव-जंतु आते-जाते
रहते ह’।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
वकल्प सही / कारण
ग़लत
घर क बनावट सराय जैसी ग़लत कहानी म घर के आकार क कोई बात ही नह है। पताजी घर क बनावट पर नह , उसम
बहुत वशाल है आने-जाने वाल क भीड़ पर टप्पणी कर रहे ह।
घर म व भन्न पक्षी और सही ★ घर म चूहे बसते ह, कबूतर ह, छपक लयाँ ह, च टय क “फौज” है — ये सब वहाँ रहते
जीव-जंतु रहते ह ह, मेहमान नह ह।
पताजी और माँ घर के ग़लत मकान उन्ह का है। “घर के मा लक तो कोई दूसरे ही ह” पताजी का व्यंग्य है, कानूनी तथ्य
मा लक नह ह नह ।
घर म व भन्न जीव-जंतु सही ★ सराय क पहचान ही यही है — आना-जाना लगा रहे। बल्ली “कभी-कभी झाँक जाती
आते-जाते रहते ह है”, तोते-गौरैयाँ आ पहुँचते ह, चमगादड़ शाम को आते ह।
क्य दो उत्तर सही ह: सराय शब्द म दो बात एक साथ ह — बहुत सारे प्राणी और लगातार आवाजाही। पताजी
क शकायत यही है क घर पर उनका एका धकार नह रहा; इसी लए वे आगे जोड़ते ह — “हम तो जैसे यहाँ
मेहमान ह।” प्रश्न म पहले ही कहा गया है क एक से अ धक उत्तर हो सकते ह, इस लए दोन पर तारा बनाना ही पूरा
उत्तर है।
प्र.2 (2) कहानी म ‘घर के असली मा लक’ कसे कहा गया है? • माँ और पताजी को जनका वह मकान है • लेखक
को जसने यह कहानी लखी है • जीव-जंतुओं को जो उस घर म रहते थे • मेहमान को जो लेखक से मलने आते
थे
सही उत्तर है — जीव-जंतुओं को जो उस घर म रहते थे। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।
कहानी क पहली ही पं क्तय म पताजी कहते ह — “हम तो जैसे यहाँ मेहमान ह, घर के मा लक तो कोई दूसरे ही ह।” ‘कोई दूसरे’
का अथ यहाँ चूहे, गौरैयाँ, कबूतर, चमगादड़, छपक लयाँ, च टयाँ और बल्ली ही ह — क्य क वही घर पर बना पूछे कब्जा जमाए
बैठे ह।
यह व्यंग्य कैसे काम करता है: लेखक ‘मा लक’ और ‘मेहमान’ क जगह आपस म बदल दे ता है। कानूनी मा लक
मेहमान बन जाता है और बन बुलाए प्राणी मा लक। इस उलटफेर से पाठक को हँसी भी आती है और यह बात भी
चुपचाप बैठ जाती है क घर पर केवल मनुष्य का हक नह है — यही पूरी कहानी का मूल भाव है।
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प्र.3 (3) गौरैय के प्र त माँ और पताजी क प्र त क्रयाएँ कैसी थ ? • दोन ने खुशी से घर म उनका स्वागत कया •
पताजी ने उन्ह भगाने क को शश क ले कन माँ ने मना कया • दोन ने मलकर उन्ह घर से बाहर नकाल दया •
माँ ने उन्ह नकालने के लए कहा ले कन पताजी ने घर म रहने दया
सही उत्तर है — पताजी ने उन्ह भगाने क को शश क ले कन माँ ने मना कया।
पताजी माँ
ताली बजाई, “श...शू” कया, बाँह झुलाईं, कूदे खल खलाकर हँस द
लाठ से पंखे का गोला ठकोरा, च ड़य पर “हमला बोल दया” “तुम तो बड़े समझदार हो जी…” — व्यंग्य से सलाह द
दरवाज के नीचे और रोशनदान म कपड़े ठूँ से “दे खो जी, च ड़य को मत नकालो” — इस बार गंभीरता से
स्टू ल पर चढ़कर घ सला नोचने लगे अंत म उठकर सभी दरवाजे खोल दए
क्य बाक वकल्प नह : ‘दोन ने खुशी से स्वागत कया’ ग़लत है, क्य क पताजी शुरू से गुस्से म ह। ‘दोन ने
मलकर नकाल दया’ भी ग़लत है — माँ ने एक बार भी सहायता नह क (“माँ मदद तो करती नह थ , बैठ हँसे
जा रही थ ”)। चौथा वकल्प तो दोन क भू मकाएँ उलट कर दे ता है।
प्र.4 (4) माँ बार-बार पताजी क बात पर मुसकराती और मजाक करती थ । इससे क्या पता चलता है? • माँ चाहती
थ क गौरैयाँ घर से भगाई न जाएँ • माँ को पताजी के प्रयत्न व्यथ लगते थे • माँ को गौरैय क ग त व धय पर
हँसी आ जाती थी • माँ को दूसर पर हँसना और उपहास करना अच्छा लगता था
तारा (★) पहले दो वकल्प पर — ‘माँ चाहती थ क गौरैयाँ घर से भगाई न जाएँ’ और ‘माँ को पताजी के प्रयत्न व्यथ लगते
थे’।
पहला क्य : माँ का सबसे गंभीर वाक्य यही है — “दे खो जी, च ड़य को मत नकालो… अब तो इन्ह ने अंडे भी दे दए ह गे।”
और अंत म वही उठकर सभी दरवाजे खोल दे ती ह ता क माँ-बाप गौरैयाँ अपने ब तक पहुँच सक। इससे बड़ा प्रमाण क्या
होगा?
दूसरा क्य : “छोड़ो जी, चूह को तो नकाल नह पाए, अब च ड़य को नकालगे!” और “चलो, दो तनके तो नकल गए, अब
बाक दो हजार भी नकल जाएँगे!” — दोन वाक्य साफ़ कहते ह क माँ को यह मेहनत बेकार लग रही थी।
तीसरा और चौथा वकल्प क्य नह : माँ क हँसी गौरैय क हरकत पर नह , पताजी क हरकत पर है — वे
कहती भी ह, “ च ड़याँ पूछ रही ह क यह आदमी कौन है और नाच क्य रहा है?” और चौथा वकल्प माँ के च रत्र
पर अन्याय है: वे कसी का उपहास करने के लए नह हँसत , ब ल्क इस लए हँसती ह क वे शुरू से जानती ह क
लड़ाई कस ओर जाएगी। उनका मज़ाक ह थयार नह , समझदारी है।
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(5) कहानी म गौरैय के बार-बार लौटने को जीवन के कस पहलू से जोड़ा जा सकता है? • दूसर पर नभर रहना
m रास्ते अपनाना
• असफलताओं से हार मान लेना • अपने प्रयास को नरंतर जारी रखना • संघष को छोड़करeनए
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सही है — अपने प्रयास को नरंतर जारी रखना।
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गौरैयाँ हर बार नकाली जाती ह और हर बार लौट आती ह — कभी दरवाजे के नीचे क खाली जगह से, कभी टू टे शीशे वाले
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रोशनदान से, कभी “न जाने कस रास्ते से”। रोचक बात यह है क थकता कौन है — पताजी, जो कहते तो ह “म हार मानने वाला
आदमी नह
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ँ,” पर आ खर “तंग आ गए थे” और उनक “सहनशीलता चुक गई”।
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बाक वकल्प क्य नह : गौरैयाँ कसी पर नभर नह ह — घ सला उन्ह ने स्वयं बनाया, तनके स्वयं जुटाए। हार
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भी उन्ह ने नह मानी। और ‘नए रास्ते अपनाना’ भी ग़लत है — नए रास्ते तो उन्ह ने ज़रूर खोजे, पर लक्ष्य वही रहा:
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वही घ सला, वही घर। संघष छोड़ा नह , केवल तरीका बदला।
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a gl ध्यान द: यह लगन अंधी ज़द नह है। गौरैयाँ इस लए नह लौटत क उन्ह जीतना है, ब ल्क इस लए क वहाँ उनके
अंडे ह। कहानी का यही मोड़ अंत म पताजी का मन भी बदल दे ता है।
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(ख) हो सकता है क आपके समूह के सा थय ने अलग-अलग उत्तर चुने ह । अपने मत्र के साथ वचार क जए
क आपने ये उत्तर ही क्य चुने?
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g चुनाव का कारण पाठ से दे सक।
यह चचा.cक ग त व ध है। इसम उत्तर ‘सही या ग़लत’ से ज़्यादा महत्वपूण यह है क आपaअपने
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se कैसे क जए:
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चचा
1. हर साथी अपना चुना हुआ वकल्प पढ़े और उसके साथ कहानी क एक पं क्त बोले जो उसके पक्ष म जाती है।
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2. जहाँ मतभेद हो, वहाँ यह दे खए क दूसरे साथी ने कहानी का कौन-सा हस्सा पढ़ा है जो आपने नह पढ़ा।
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3. अंत म तय क जए — क्या दोन उत्तर साथ-साथ सही हो सकते ह? (प्रश्न 1 और 4 म ऐसा ही है।)
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नमूना उत्तर: “मने प्रश्न 4 म ‘माँ को पताजी के प्रयत्न व्यथ लगते थे’ चुना, क्य क माँ का हर व्यंग्य पताजी क
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मेहनत क ओर ही इशारा करता है — ‘अब बाक दो हजार भी नकल जाएँगे!’ मेरे मत्र ने ‘माँ चाहती थ क गौरैयाँ
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भगाई न जाएँ’ चुना और उसका प्रमाण भी मजबूत था — अंत म माँ ने ही सारे दरवाजे खोले। चचा के बाद हम लगा
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क दोन उत्तर एक-दूसरे को काटते नह , जोड़ते ह — माँ को प्रयत्न इसी लए व्यथ लगते थे क्य क वे मन से
a s em गौरैय के साथ थ ।”
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मलकर कर मलान — पृष्ठ 20 और 21
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पाठ से
पाठ से मलान
प्र.1 (क) पाठ म से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दए गए ह। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो अथ दए गए ह। अपने समूह म
इन पर चचा क जए और इन्ह इनके सबसे उपयुक्त अथ से मलाइए।
सही मलान नीचे दया गया है। हर पं क्त म यह भी बताया गया है क दूसरा अथ क्य नह चलेगा।
क्रम वाक्य सबसे उपयुक्त अथ दूसरा अथ क्य नह
1. वह शोर मचता है क कान के पि यों का शोर बहुत तेज होता है, दूसरे अथ म ‘ पताजी’ जोड़ दए गए ह, जब क वाक्य
पद फट जाएँ, पर लोग कहते ह ले िकन लोग उसे संगीत की तरह म पताजी का नाम है ही नह । यहाँ बात सब लोग क
क पक्षी गा रहे ह! सराहते है।ं आम आदत क है।
2. आँगन म आम का पेड़ है। तरह- आम के पेड़ पर अलग-अलग पकार ‘डेरा डालना’ मुहावरा है — जमकर बैठ जाना। पक्षी
तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले के प ी हर समय िनवास करते है।ं सचमुच तंबू नह लगाते; दूसरा अथ मुहावरे को
रहते ह। शब्दशः ले लेता है।
3. वह धमा-चौकड़ी मचती है क चूहों की भागदौड़ और शोर इतना दूसरे अथ म शोर मचाने वाले और न सो पाने वाले —
हम लोग ठ क तरह से सो भी होता है िक घर के लोग चैन से सो दोन उलट गए ह। मूल वाक्य से पहले ही लखा है क
नह पाते। नही ं पाते। चूहे रात-भर भागते फरते ह।
4. वह समझते ह क माँ उनका िपताजी को ऐसा भम होने लगता है ‘वह समझते ह’ का अथ है — उन्ह ऐसा लगता है।
मजाक उड़ा रही ह। िक माँ उनकी चेष्टाओं का उपहास पहला अथ (‘मजाक समझ जाते ह’) क्रया का अथ
कर रही है।ं ही बदल दे ता है।
5. पताजी ने लाठ द वार के साथ िपताजी ने लाठी एक ओर रख दी ‘छाती फैलाना’ गव और वजय क मु ा है, हाँफना
टकाकर रख द और छाती और गव से , िवजयी मुद ा में बैठ नह । इसी क्षण गौरैयाँ बाहर नकली थ और माँ
फैलाए कुस पर आ बैठे। गए। ता लयाँ बजा रही थ ।
6. इतने म रात पड़ गई। कहानी की घटनाओं के बीच धीरे - ‘रात पड़ना’ भी मुहावरा है। रात कोई वस्तु नह जो
धीरे रात हो गई और अँधेरा छा ऊपर से गरे — पहला अथ मुहावरे को शब्दशः पढ़ने
गया। क भूल है।
7. जब हम लोग नीचे उतरकर आए गौरै याँ िफर से लौट आई थी ं और च ड़याँ शास्त्रीय संगीत का अभ्यास नह करत !
तो वे फर से मौजूद थ और मजे शांत व पस न्न भाव से चहचहा रही ‘मल्हार गाना’ लेखक का प्रयोग है — चहचहाहट को
से बैठ मल्हार गा रही थ । थी ं जैसे कोई राग गा रही हों। राग का नाम दे कर उसम प्रसन्नता और न तता भर
दे ना।
इन सात म एक ही कौशल क परीक्षा है: क्या आप मुहावरे/लाक्ष णक भाषा और शब्दशः अथ म फ़क कर
पाते ह? हर पं क्त म एक ‘जाल’ रखा गया है — या तो मुहावरे को सीधा पढ़ लया गया है (डेरा, रात पड़ना, मल्हार),
या कता-कम उलट दया गया है (धमा-चौकड़ी), या वाक्य म न कही बात जोड़ द गई है ( पताजी)।
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प्र.2 (ख) अपने उत्तर को अपने मत्र के उत्तर से मलाइए और वचार क जए क आपने कौन-से अथ का चुनाव कया
है और क्य ?
यह जोड़ी/समूह म करने का काम है। मलान करते समय अपने चुनाव को इन तीन जाँच पर क सए —
1. क्या वाक्य म वह बात सचमुच लखी है? जो नाम या भाव वाक्य म नह है, वह अथ म भी नह आना चा हए (जैसे 1 म
‘ पताजी’)।
2. क्या यहाँ कोई मुहावरा है? ‘डेरा डालना’, ‘रात पड़ना’, ‘छाती फैलाना’, ‘मल्हार गाना’ — इनका सीधा अथ लेने पर वाक्य
हास्यास्पद हो जाता है।
3. कौन क्या कर रहा है? कता और कम बदल दे ने से अथ पूरा उलट जाता है (क्रम 3 और 4)।
नमूना उत्तर: “हमारे समूह म क्रम 5 पर मतभेद हुआ। एक साथी ने ‘छाती और साँस फूलने लगी’ चुना था, क्य क
पताजी सचमुच थक गए थे। पर हमने पाठ का अगला वाक्य पढ़ा — ‘आज दरवाजे बंद रखो,’ उन्ह ने हुक्म दया
— तब सबको लगा क यहाँ थकान नह , वजय का भाव है। इस लए हमने पहला अथ चुना।”
पं क्तय पर चचा — पृष्ठ 21
पाठ से
पाठ से भाव-ग्रहण
प्र.1 (क) “अब तो ये नह उड़गी। पहले इन्ह उड़ा दे ते, तो उड़ जात । अब तो इन्ह ने यहाँ घ सला बना लया है।”
यह माँ का पहला ही नणय है, और पूरी कहानी उसे सच सद्ध करती है। माँ कह रही ह क अब समय नकल चुका है — जब तक
गौरैयाँ केवल ‘मकान दे ख’ रही थ , तब तक उन्ह हटाना आसान था; अब उन्ह ने घ सला बना लया है, इस लए वे नह जाएँगी।
इसका गहरा अथ: माँ क बात म घ सले और घर का अंतर छपा है। घ सला केवल तनक का ढे र नह होता —
वह कसी प्राणी का भ वष्य होता है, क्य क उसी म अंडे आएँगे और ब े पलगे। जसने कह अपना घर बना लया,
वह उस जगह से डर के मारे नह भागता। यही कारण है क गौरैयाँ लाठ , ताली और बंद दरवाज के बाद भी लौटती
रह ।
वाक्य-रचना पर ध्यान द जए: ‘पहले उड़ा दे ते, तो उड़ जात ’ — यह ऐसी स्थ त क बात है जो अब बीत चुक है।
माँ पताजी को यह भी जता रही ह क दे र हो चुक है, और यही बात आगे उनके हर व्यंग्य क जड़ बनती है।
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प्र.2 (ख) “एक दन अंदर नह घुस पाएँगी, तो घर छोड़ दगी।”
यह पताजी क रणनी त है, और साथ ही उनक सबसे बड़ी भूल भी। वे मानते ह क पक्षी का लगाव जगह से उतना ही है जतना
सु वधा से — एक दन दरवाजा बंद मलेगा, तो वे कह और चली जाएँगी।
यह सोच क्य टू ट जाती है: पताजी ने गौरैय को मेहमान समझा, जब क वे तब तक माता- पता बन चुक थ ।
घ सले म अंडे थे। कोई भी माँ-बाप एक दन क रुकावट से अपने ब को नह छोड़ दे ते। इस लए वे दरवाजे के
नीचे क खाली जगह से आ गईं, फर टू टे शीशे वाले रोशनदान से — रास्ता बदलती रह , इरादा नह ।
कहानी-कला: लेखक इस वाक्य को ठ क उस जगह रखता है जहाँ पताजी सबसे ज़्यादा आश्वस्त ह — “छाती
फैलाए कुस पर आ बैठे” और हुक्म दया। और अगली ही पं क्त म ऊपर से “च -च ” सुनाई दे ती है। भरोसे के तुरंत
बाद उसका टू टना — यही इस कहानी का हास्य पैदा करने का तरीका है।
प्र.3 (ग) “ कसी को सचमुच बाहर नकालना हो, तो उसका घर तोड़ दे ना चा हए।”
यह कहानी का सबसे कठोर वाक्य है। गुस्से म भरे पताजी घोषणा करते ह क भगाने का असली उपाय है — ठकाना ही मटा
दे ना। तक के स्तर पर यह सही भी है: जब तक घ सला है, गौरैयाँ लौटती रहगी।
पर कहानी इस तक को हरा दे ती है। जैसे ही घ सला टू टने लगता है, ऊपर से “च -च ” क आवाज आती है और दो
नन्ह गौरैयाँ झाँकने लगती ह। जस घ सले को पताजी ‘ तनक क गंदगी’ समझ रहे थे, उसके भीतर दो जान थ ।
इसके बाद कोई उपदे श नह दया जाता — बस “ पताजी के हाथ ठठक गए” और वे चुपचाप कुस पर आ बैठते ह।
सोचने क बात: यह वाक्य केवल च ड़य तक सी मत नह है। कसी का घर उजाड़कर उसे हटा दे ना — यह मनुष्य
के साथ भी होता है। लेखक इसे कहता नह , केवल दखा दे ता है, और पाठक स्वयं यह अंतर पकड़ लेता है क बाहर
नकालना और घर तोड़ना दो अलग बात ह।
सोच- वचार के लए — पृष्ठ 21
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पाठ से
पाठ से
प्र.1 (क) आपको कहानी का कौन-सा पात्र सबसे अच्छा लगा— घर पर रहने आई गौरैयाँ, माँ, पताजी, लेखक या
कोई अन्य प्राणी? आपको उसक कौन-कौन सी बात अच्छ लग और क्य ?
यह आपक अपनी पसंद का प्रश्न है, इस लए उत्तर म पात्र + कारण + कहानी से प्रमाण — तीन होने चा हए। नीचे तीन प्रमुख
पात्र के पक्ष म सामग्री द गई है; आप जसे चुन, उसका प्रमाण साथ ल खए।
पात्र अच्छ बात कहानी से प्रमाण
माँ सूझबूझ, हास-प रहास, और चुपचाप जीव- “एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाक दरवाजे बंद कर दो” — उपाय भी वही बताती
दया ह; और अंत म सभी दरवाजे भी वही खोलती ह।
गौरैयाँ अपने घ सले के लए अटू ट लगन, नए-नए दरवाजे के नीचे से, फर टू टे शीशे वाले रोशनदान से लौट आना; और ब के
रास्ते खोजने क चतुराई लए दुबली-काली पड़ जाना।
पताजी अंत म अपनी ज़द छोड़ दे ने क ईमानदारी “ पताजी के हाथ ठठक गए” — फर लाठ एक ओर रखकर चुपचाप बैठ जाना
और अंत म मुसकराना।
नमूना उत्तर: मुझे माँ सबसे अच्छ लग । उनक दो बात वशेष ह। पहली — वे बना झगड़ा कए अपनी बात मनवा
लेती ह; लाठ उठाने क जगह वे केवल हँसती ह और कहती ह, “ च ड़याँ पूछ रही ह क यह आदमी कौन है और
नाच क्य रहा है?” दूसरी — जहाँ बात सचमुच गंभीर हो जाती है, वहाँ उनका मज़ाक तुरंत रुक जाता है और वे
कहती ह, “दे खो जी, च ड़य को मत नकालो… अब तो इन्ह ने अंडे भी दे दए ह गे।” यानी वे जानती ह क कब
हँसना है और कब गंभीर होना है। यही समझदारी मुझे सबसे अच्छ लगी।
प्र.2 (ख) लेखक के घर म च ड़या ने अपना घ सला कहाँ बनाया? उसने घ सला वह क्य बनाया होगा?
गौरैय ने घ सला बैठक क छत म लगे पंखे के गोले म बनाया। पाठ क पं क्त है — “बैठक क छत म लगे पंखे के गोले म उन्ह ने
अपना बछावन बछा लया है और सामान भी ले आई ह।”
वह क्य बनाया होगा — चार कारण:
ऊँचाई और सुरक्षा: पंखे का गोला छत से लगा है। वहाँ बल्ली नह पहुँच सकती, चूहे नह चढ़ सकते — घर म दोन मौजूद थे।
बना-बनाया कटोरा: गोला चार ओर से घरा और नीचे से खुला होता है। तनके उसम टक जाते ह और अंडे लुढ़कते नह ।
घ सले के लए इससे सु वधाजनक ढाँचा और क्या होगा!
छपाव और मौसम से बचाव: वहाँ न धूप पड़ती है, न बा रश, न सीधी हवा लगती है।
आने-जाने के रास्ते पास: रोशनदान और दरवाजे पास ही थे — यही रास्ते बाद म उन्ह बार-बार लौटने म काम आए।
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ध्यान द जए: गौरैय ने यह जगह अचानक नह चुनी। पहले दन वे “ बना पूछे उड़-उड़कर मकान दे खने” आई थ
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gसुl र क्षत लगी।
— रोशनदान पर बैठ , खड़क पर बैठ , और उड़ गईं। पताजी ने इसे ठ क ही पहचाना था: “मकान
o े रहने योग्य है या नह ।” दो दन बाद वे उसी जगह लौट जो उन्ह सबसे
कर रही ह क.cउनक
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(ग) क्या आपको लगता है क पशु-पक्षी भी मनुष्य के समान प रवार और घर का महत्व समझते ह? अपने उत्तर
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के समथन म कहानी से उदाहरण द जए।
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हाँ। यह कहानी इसी बात को सद्ध करने के लए लखी गई लगती है — और वह भी उपदे श दे कर नह , घटनाएँ दखाकर।
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कहानी क घटना यह क्या सद्ध करती है
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gl फर लौटकर वह बसना
घर म घुसकर रोशनदान और खड़क पर बैठकर “मकान दे खना”, घर चुना जाता है, यूँ ही नह बन जाता — पक्षी भी परखकर जगह
a चुनते ह।
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तनके, सूखी घास, रुई के फाहे, धागे, थग लयाँ जुटाकर घ सला घर बनाना मेहनत माँगता है, और जस चीज़ पर मेहनत लगी हो उसे
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बनाना
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बार-बार भगाए जाने पर भी लौट आना, अंड केgबाद
छोड़ना
a ब के लए ख़तरा उठाना — यह मनुष्य के माता- पता का भी सबसे
बड़ा लक्षण है।
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दुबला जाना, काली पड़ जाना, गाना बंद कर दे ना
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पक्षी भी चता और दुख अनुभव करते ह; यह केवल भूख क बात नह
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है।
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बm क “च -च ” सुनते ही माँ-बाप का झट से उड़कर आना और a g
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as च च म चुगा डालना
पुकार पहचानना और तुरंत दौड़ पड़ना — यही प रवार है।
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सबसे बड़ा प्रमाण: कहानी म पताजी को कोई समझाता नह । ब क आवाज सुनते ही उनके “हाथ ठठक
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गए”। यानी घ सला केवल तब घर लगा जब उसम ब े दखे — और यह बात मनुष्य को समझाने क नह ,
पहचानने क होती है।
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(घ) “अब म हार मानने वाला आदमी नह ँ।” इस कथन से पताजी के स्वभाव के कौन-से गुण उभरकर आते
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इस एक वाक्य से पताजी का पूरा स्वभाव खुल जाता है। उभरने वाले गुण —
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s e m पूरा करके छोड़गे। दन-पर- दन गौरैय को नकालना इसी का प्रमाण है।
a हार से ज़्यादा हारते हुए दखना चुभता है। यह वाक्य वे तभी दोहराते ह जब माँ हँसती ह।
दृढ़ता / जद: एक बार जो ठान लया, उसे
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आत्मसम्मान का तीखा भाव: उन्ह
प रश्रमी और स क्रय: वे केवल आदे श नह दे ते — स्वयं कूदते ह, लाठ उठाते ह, स्टू ल पर चढ़ते ह, कपड़े ठूँ सते ह।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
क्रोधी और तुनक मजाज: “माँ कोई बात व्यंग्य म कह, तो पताजी उबल पड़ते ह।”
पर कहानी इस गुण को उलटकर भी दखाती है। ठ क इसी वाक्य के आस-पास लेखक लखता है — “पर
आ खर वह भी तंग आ गए थे। आ खर जब उनक सहनशीलता चुक गई…”। यानी घोषणा और स ाई साथ-साथ
चल रहे ह। यही हास्य पैदा करता है: जो आदमी बार-बार कहे क वह हार नह मानता, वह असल म हारने के कगार
पर खड़ा है।
और अंत म? अंत म पताजी हारते नह , मान जाते ह — यह अंतर महत्वपूण है। लाठ वे कसी के दबाव म नह
रखते; ब को दे खकर स्वयं रख दे ते ह। ज़द छोड़ दे ना भी एक तरह का बड़प्पन है।
प्र.5 (ङ) कहानी म गौरैय के व्यवहार म कब और कैसा बदलाव आया? यह बदलाव क्य आया? (संकेत— कहानी म
खो जए क उन्ह ने गाना कब बंद कर दया?)
बदलाव तब आया जब पताजी का अ भयान रोज़ का सल सला बन गया — “अब तो रोज यही कुछ होने लगा।” और सबसे साफ़
रूप म वह उस दन दखा जब पताजी घ सला तोड़ने के लए स्टू ल पर चढ़े ।
पहले बाद म
“मजे से दोन बैठ गाना गा रही ह” “दोन चुपचाप द वार पर बैठ थ … अब वे चहक भी नह रही थ ।”
“मजे से बैठ मल्हार गा रही थ ” “कुछ-कुछ दुबला गई थ , कुछ-कुछ काली पड़ गई थ ”
पताजी का नाचना “जैसे बहुत पसंद आ रहा था” बाहर द वार पर गुमसुम बैठ रह
बदलाव क्य आया —
लगातार डर: रोज लाठ , ताली और खदे ड़े जाने ने उनक न तता छ न ली। गाना न त मन से नकलता है।
अंड क चता: अब वे केवल अपने लए नह लड़ रही थ । घ सले म अंडे थे, इस लए हर बार भगाया जाना दुगुना डर था।
थकान और भूख: दन म बाहर नकाल द जात और रात को चोरी- छपे लौटत — इसी दौड़-भाग ने उन्ह दुबला और काला
कर दया।
लेखक ने यह बदलाव कैसे दखाया: उसने कह नह लखा क ‘गौरैयाँ दुखी थ ’। उसने केवल तीन बाहरी बात
बताईं — दुबलापन, रंग और चुप्पी। पाठक स्वयं भीतर का दुख समझ लेता है। यही अच्छ कहानी क पहचान है:
भाव बताया नह जाता, दखाया जाता है।
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प्र.6 (च) कहानी म गौरैय ने कन- कन स्थान से घर म प्रवेश कया था? सूची बनाइए।
क्रम प्रवेश का रास्ता कहानी म कब
1. खुले दरवाजे से सीधे अंदर सबसे पहली बार — “एक दन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बना पूछे उड़-उड़कर
मकान दे खने लग ।”
2. दरवाज के नीचे बची खाली जब सब दरवाजे बंद कर दए गए — “दरवाजे के नीचे से आ गई ह,” माँ बोल । लेखक ने
जगह से दे खा, “सचमुच दरवाज के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह खाली थी।”
3. रोशनदान से, जसका एक जब दरवाज के नीचे कपड़े ठूँ स दए गए — “अबक बार वे रोशनदान म से आ गई थ ।”
शीशा टू टा हुआ था
4. रात म कसी अ ात रास्ते से “ दन म तो वे बाहर नकाल द जात पर रात के वक्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने कस
रास्ते से वे अंदर घुस आत ।”
इस सूची म कहानी क बनावट छपी है: हर बार पताजी एक रास्ता बंद करते ह और गौरैयाँ नया खोज लेती ह।
रास्त क यह ृंखला ही कहानी को आगे बढ़ाती है — और चौथा ‘अ ात रास्ता’ तो पताजी क हार क घोषणा
जैसा है, क्य क जस रास्ते का पता ही न हो, उसे बंद कैसे करगे?
प्र.7 (छ) इस कहानी को कौन सुना रहा है? आपको यह बात कैसे पता चली?
कहानी घर का बेटा सुना रहा है — वही लड़का जो माँ और पताजी के साथ उस घर म रहता है। कहानी प्रथम पुरुष (‘म’ शैली) म
कही गई है।
यह कैसे पता चलता है — चार सूत्र:
1. पहली ही पं क्त: “घर म हम तीन ही व्य क्त रहते ह— माँ, पताजी और म।” — यानी सुनाने वाला तीसरा व्य क्त है।
2. वह घटनाओं म शा मल है: “मने भागकर दोन दरवाजे बंद कर दए”, “मने दरवाजे के नीचे दे खा”, “म अवाक् उनक ओर
दे खता रहा।”
3. पताजी उसे डाँटते ह: “अब पताजी ने मुझे झड़ककर कहा, ‘तू खड़ा क्या दे ख रहा है? जा, दोन दरवाजे बंद कर दे ।’” —
‘तू’ और ‘ झड़कना’ बताते ह क सुनाने वाला घर का ब ा है।
4. माँ और पताजी — वह उन्ह नाम से नह , रश्ते से पुकारता है; बाहर का कोई व्य क्त ऐसा नह कहेगा।
इस शैली का लाभ: बेटा कसी का पक्ष नह लेता — वह केवल दे खता और बताता है। इसी तटस्थता के कारण
पताजी हास्यास्पद भी लगते ह और अंत म हम उनसे सहानुभू त भी होती है। य द यही कहानी पताजी स्वयं सुनाते,
तो वे अपनी हँसी उड़वाने वाली बात शायद न बताते; और य द माँ सुनात , तो वह केवल मज़ाक बनकर रह जाती।
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ध्यान रख: ‘म’ का अथ हमेशा लेखक स्वयं नह होता। यहाँ ‘म’ कहानी का एक पात्र है — कहानी का कहनेवाला।
लेखक भीष्म साहनी ह, यह हम पाठ के अंत म दए नाम से पता चलता है।
प्र.8 (ज) माँ बार-बार क्य कह रही ह गी क गौरैयाँ घर छोड़कर नह जाएँगी?
क्य क माँ वह बात जानती ह जो पताजी नह समझ रहे — गौरैयाँ अब मेहमान नह , गृहस्थ ह। इसके तीन कारण ह:
घ सला बन चुका है: “अब तो इन्ह ने यहाँ घ सला बना लया है।” जसने अपना ठकाना बना लया, वह डर के मारे उसे नह
छोड़ता।
अंडे ह: “अब इन्ह ने अंडे दे दए ह गे”, और आगे गंभीरता से — “अब तो इन्ह ने अंडे भी दे दए ह गे। अब ये यहाँ से नह
जाएँगी।” माँ स्वयं माँ ह; वे जानती ह क संतान के रहते कोई जगह नह छोड़ी जाती।
उन्ह ने पहले भी दे खा है: उसी घर म चूहे बरस से डटे ह और नकाले नह जा सके। माँ का व्यंग्य इसी अनुभव से नकलता है
— “छोड़ो जी, चूह को तो नकाल नह पाए, अब च ड़य को नकालगे!”
दोहराने का एक और कारण: माँ सीधे-सीधे यह नह कहत क “ च ड़य को मत नकालो” — यह वे केवल एक
बार, अंत म कहती ह। बाक समय वे यही दोहराती रहती ह क ये जाएँगी नह । यह उनका तरीका है — वरोध नह ,
भ वष्यवाणी। हर बार जब भ वष्यवाणी सच होती है, पताजी का उत्साह थोड़ा और घटता है। अंत म माँ को कुछ
कहना ही नह पड़ता; पताजी स्वयं मान जाते ह।
अनुमान और कल्पना से — पृष्ठ 22
पाठ से
पाठ से कल्पना
प्र.1 (क) कल्पना क जए क आप उस घर म रहते ह जहाँ च ड़याँ अपना घर बना रही ह। अपने घर म उन्ह दे खकर
आप क्या करते?
यह कल्पना का प्रश्न है, इस लए उत्तर आपका अपना होगा — पर वह व्यावहा रक होना चा हए, केवल भावुक नह । ध्यान रखने
योग्य बात:
घ सले को हाथ बल्कुल न लगाएँ — छू ने से अंडे टू ट सकते ह और पक्षी घ सला छोड़ सकते ह।
घ सले के नीचे वाला पंखा न चलाएँ; ज़रूरत हो तो उस कमरे का उपयोग कम कर द।
नीचे अख़बार बछा द ता क तनके और गंदगी आसानी से हटाई जा सके — सफ़ाई का हल घ सला हटाना नह , नीचे कागज़
बछाना है।
पास म पानी का एक उथला कटोरा और थोड़ा दाना रख द, वशेषकर गर मय म।
बल्ली को उस कमरे से दूर रख और रात म एक रास्ता खुला छोड़ द।
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नमूना उत्तर: पहले तो म घर म सबको बता दे ता क छत के पंखे म घ सला बन गया है, ता क कोई भूल से पंखा न
चला दे । फर म नीचे एक पुराना अख़बार बछा दे ता, क्य क माँ को गंदगी से चढ़ है और म नह चाहता क सफ़ाई
के नाम पर घ सला हटा दया जाए। म बालकनी म म के कटोरे म पानी रख दे ता। और सबसे बड़ी बात — म दन
म कई बार चुपचाप, दूर से उन्ह दे खा करता, क्य क पास जाने पर वे डर जात । तीन-चार हफ़्ते क ही तो बात होती
है; ब े उड़ना सीख जाते तो घ सला अपने आप खाली हो जाता।
कहानी से जो ड़ए: पताजी ने भी अंत म यही कया — कुछ नह कया, केवल दे खते रहे और मुसकराते रहे। कई
बार न करना ही सबसे अच्छा काम होता है।
प्र.2 (ख) मान ली जए क कहानी म च ड़या नह , ब ल्क नीचे दए गए प्रा णय म से कोई एक प्राणी घर म घुस गया
है। ऐसे म घर के लोग का व्यवहार कैसा होगा? क्य ? (प्रा णय के नाम— चूहा, कुत्ता, मच्छर, बल्ली, कबूतर,
कॉकरोच, ततली, मक्खी)
घर के लोग का व्यवहार इस बात पर नभर करता है क वह प्राणी कतना नुकसान करता है, कतना डराता है और दे खने म
कतना भला लगता है। इसी तक से आठ प्रा णय को दे खए —
प्राणी घर वाल का संभा वत व्यवहार कारण
चूहा तुरंत भगाने या पजरा-दवा लगाने क कपड़े, अनाज और तार कुतरता है। कहानी म भी बी सय चूहे थे और पताजी उन्ह
को शश कभी नकाल नह पाए।
कुत्ता पहले डर, फर ब का उससे दोस्ती बड़ा जीव है इस लए डर लगता है, पर वह मनुष्य से जुड़ जाता है — कई घर म वह
करने का आग्रह पालतू बन जाता है।
मच्छर बना सोचे मारना, अगरबत्ती/जाली काटता है और बीमारी फैलाता है। यहाँ कसी को दया नह आती।
लगाना
बल्ली दूध पला दे ना, पर रसोई से दूर रखना कहानी म यही होता है — “मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई”। वह अच्छ भी
लगती है और दूध-दही चुराने का डर भी रहता है।
कबूतर पहले सहन, फर जाली लगवाना गुटर-गूँ अच्छा लगता है, पर पंख और बीट बहुत फैलाते ह।
कॉकरोच तुरंत सफ़ाई और दवा घन आती है और वह रसोई म बीमारी फैलाता है।
ततली ब े खुश होकर दे खगे, कोई नह वह सुंदर है, नुकसान नह करती, और थोड़ी दे र म स्वयं उड़ जाती है।
भगाएगा
मक्खी हाथ हलाकर उड़ाना, खाना ढक दे ना वह खाने पर बैठती है — नुकसान कम, चढ़ ज़्यादा।
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इस तुलना से एक बात साफ़ होती है: हम प्रा णय के साथ न्याय नह करते, पक्षपात करते ह। ततली और मक्खी
दोन उड़ती ह और दोन नरीह ह, पर एक को हम नहारते ह और दूसरी को उड़ा दे ते ह। कहानी मeभी
s m पताजी को
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coचढ़ इस लए नह थी क वे नुकसानदे ह थ , ब ल्क इस लए क वे बना पूaछgे आई
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गौरैय से इतनी
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(ग) “म अवाक् उनक ओर दे खता रहा।” लेखक को वस्मय या हैरानी कसे दे खकर हुई? उसे वस्मय क्य हुआ
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प्र.3
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होगा?
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हैरानी उसे घ सले म से झाँकती दो नन्ह गौरैय को दे खकर हुई — “पंखे के गोले के ऊपर से नन्ह -नन्ह गौरैयाँ सर नकाले नीचे
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क ओर दे ख रही थ और च -च कए जा रही थ ।”
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वस्मय के तीन कारण:
s m पूरी तरह अनपे क्षत थी। उसने पहले सोचा क बाहर वाली गौरैयाँ लौट आई ह, और झट से बाहर देखा — पर
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gl “दोन गौरैयाँ बाहर द वार पर गुमसुम बैठ थ ।” यानी यह तीसरी और चौथी आवाज थी, जसका कसी को पता ही नह था।
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जस घ सले को तोड़ा जा रहा था, वह खाली नह था। लाठ पर घ सले का बहुत-सा हस्सा लपट चुका था — और तभी
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पता चला क उसके अंदर जान थी। यह हैरानी के साथ-साथ डर भी था।
a s emतक यह ‘घर बनाम च ड़या’ क लड़ाई थी; अब यह ‘माँ-बाप बनाम उनके
पूरी लड़ाई का अथ एक क्षण म बदल गया। अब
ब े’ का मामला बन गया।
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‘अवाक्’ शब्द ही क्य : अवाक् का अथ है — इतना च कत क मुँह से बोल न नकले। लेखक यहाँ ‘मुझे बहुत दुख
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हुआ’ या ‘मुझे बुरा लगा’ नह कहता। वह केवल बताता है क वह दे खता रह गया। और अगली पं क्तय म वह जो
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दे खता है — पताजी का स्टू ल से उतरना, लाठ एक ओर रखना, चुपचाप कुस पर बैठ जाना — उसे भी बना कसी
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टप्पणी के रख दे ता है। मौन ही यहाँ सबसे प्रभावशाली भाषा है।
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(घ) “माँ मदद तो करती नह थ , बैठ हँसcे जाmरही थ ।” माँ ने गौरैय को नकालने म पताजी क सहायता क्य glase
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नह क होगी?
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क्य क माँ इस काम से सहमत ही नह थ । सहायता वही करता है जो काम को उ चत माने।
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वे गौरैय को हटाना ही नह चाहती थ : “दे खो जी, च ड़य को मत नकालो… अब तो इन्ह ने अंडे भी दे दए ह गे।” यह
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उन्ह यह प्रयास व्यथ लगता था: जो घर से चूहे तक न नकाल सके, वह च ड़य को क्या नकालेगा! इस लए उन्ह ने हाथ
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बँटाने क जगह टप्पणी करना चुना।
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उनका वरोध का तरीका ही अलग था: वे झगड़ती नह थ , हँसती थ । हँसी उनका ह थयार भी था और सुरक्षा भी — “माँ
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को ऐसे मौक पर हमेशा मजाक सूझता है।”
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वे जानती थ क अंत क्या होगा: जब प रणाम पहले से दखाई दे रहा हो, तो व्य क्त दशक बन जाता है। और सचमुच, हर
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बार उनक बात ही सही नकली।
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पर ध्यान द जए — माँ न ष्क्रय नह थ । उन्ह ने ही उपाय बताया (“एक दरवाजा खुला छोड़ो”), उन्ह ने ही
चेताया (“पंखा चला दे ते, तो ये उड़ जात ”) और अंत म उन्ह ने ही उठकर सभी दरवाजे खोल दए ता क माँ-बाप
गौरैयाँ भीतर आ सक। यानी वे पूरे समय काम कर रही थ — पर पताजी के पक्ष म नह , गौरैय के पक्ष म।
प्र.5 (ङ) “एक चूहा अँगीठ के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सद बहुत लगती है।” लेखक ने चूहे के
वशेष व्यवहार से अनुमान लगाया क उसे सद लगती होगी। आप भी कसी एक अप र चत व्य क्त या प्राणी के
व्यवहार को ध्यान से दे खकर अनुमान लगाइए क वह क्या सोच रहा होगा, क्या करता होगा या वह कैसा व्य क्त
होगा आ द। (संकेत— आपको उसके व्यवहार पर ध्यान दे ना है, उसके रंग-रूप या वेशभूषा पर नह )
इस ग त व ध म तीन चरण ह — दे खए → व्यवहार का ब्योरा ल खए → उससे अनुमान नका लए। ध्यान रहे: अनुमान
व्यवहार से नकलना चा हए, चेहरे, कपड़े या रंग-रूप से नह ।
चरण क्या क जए उदाहरण (कहानी से)
1. नरीक्षण एक ही आदत को कई बार दे खए, एक बार दे खकर नणय मत क जए चूहा हर बार अँगीठ के पीछे ही बैठता है
2. ब्योरा जो दखा, वही ल खए — बना राय मलाए “एक चूहा अँगीठ के पीछे बैठना पसंद करता है”
3. अनुमान ‘शायद’, ‘लगता है’ जैसे शब्द के साथ कारण जो ड़ए “शायद बूढ़ा है, उसे सद बहुत लगती है”
नमूना उत्तर: हमारी गली के मोड़ पर एक व्य क्त रोज सुबह सब्जी क दुकान लगाता है। मने उसके तीन व्यवहार
दे खे — (1) वह हर ग्राहक के जाने के बाद तराजू को कपड़े से प छता है; (2) जब कोई बूढ़ म हला आती है, वह
थैली उठाकर सड़क तक साथ जाता है; (3) दोपहर म जब भीड़ नह होती, वह एक छोट डायरी म कुछ लखता
रहता है। इससे मेरा अनुमान है क वह बहुत व्यव स्थत स्वभाव का है और शायद अपना हसाब स्वयं रखता है।
डायरी म लखने क आदत से लगता है क उसने पढ़ाई क होगी और यह काम मजबूरी म शुरू कया होगा। बूढ़
म हला क थैली उठाना बताता है क उसे केवल बक्र क चता नह है। — ध्यान द जए, मने यह नह लखा क वह
कैसा दखता है या क्या पहनता है; मने केवल यह लखा क वह करता क्या है।
यह कौशल क्य ज़रूरी है: यही कौशल कहानी लखने के काम आता है। भीष्म साहनी हम कह नह बताते क
पताजी ज़ ह — वे केवल दखाते ह क पताजी लाठ उठाते ह, कूदते ह, कपड़े ठूँ सते ह। च रत्र व्यवहार से
बनता है, वशेषण से नह ।
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प्र.6 (च) “ पताजी कहते ह क यह घर सराय बना हुआ है।” सराय और घर म कौन-कौन से अंतर होते ह गे?
आधार घर सराय
रहने वाले गने-चुने, अपने लोग — एक प रवार कोई भी, कभी भी; अजन बय का आना-जाना
ठहरने क अव ध स्थायी कुछ घंट या दन क
लगाव अपनापन, जम्मेदारी, याद केवल काम-भर का संबंध; कोई लगाव नह
अनुम त बना पूछे कोई नह आता पूछने क आवश्यकता ही नह
दे खभाल रहने वाले स्वयं सँवारते ह टू ट-फूट क चता कसी को नह
मन का भाव “यह मेरा है” “कल चले जाना है”
पताजी ने यह शब्द क्य चुना: ‘सराय’ म सबसे चुभने वाली बात है — बना पूछे आना-जाना। यही उनक
शकायत है। पर कहानी अंत म इस शब्द को उलट दे ती है: गौरैयाँ सराय म ठहरने वाली यात्री नह नकल , उन्ह ने
वहाँ घ सला बनाया, अंडे दए और ब े पाले। यानी उन्ह ने उस जगह को घर क तरह बरता — और यही दे खकर
पताजी का मन बदल जाता है।
Tip: उत्तर लखते समय अंतर को ता लका म रखना सबसे स्पष्ट रहता है, क्य क प्रश्न म ‘कौन-कौन से’ पूछा गया है
— यानी एक से अ धक अंतर अपे क्षत ह।
संवाद और अ भनय — पृष्ठ 22
पाठ से
पाठ से अ भनय
प्र.1 नीचे द गई स्थ तय के लए अपने समूह म मलकर अपनी कल्पना से संवाद ल खए और बातचीत को अ भनय
ारा प्रस्तुत क जए— (क) “वे अभी भी झाँके जा रही थ और च -च करके मानो अपना प रचय दे रही थ , हम
आ गई ह। हमारे माँ-बाप कहाँ ह?” नन्ह -नन्ह दो गौरैया क्या-क्या बोल रही ह गी?
संवाद लखने के नयम: ब क भाषा छोट और सीधी र खए; उन्ह दु नया का कुछ पता नह है, इस लए उनके वाक्य ज़्यादातर
प्रश्न ह गे। एक ब ा थोड़ा साहसी और दूसरा थोड़ा डरा हुआ दखाइए — इससे संवाद म जान आ जाएगी।
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नमूना संवाद:
पहली नन्ह : च … च … यह क्या है? इतना बड़ा उजाला!
दूसरी नन्ह : मुझे डर लग रहा है। नीचे कोई खड़ा है, बहुत बड़ा-सा।
पहली: उसके हाथ म जो लंबी चीज है, वह हमारे घर को हला रही है।
दूसरी: हमारा बछावन कहाँ गया? यहाँ तो घास ही नह बची!
पहली: च -च ! सुनो, हम आ गई ह! हम यहाँ ह!
दूसरी: माँ… माँ! तुम कहाँ हो? भूख लगी है।
पहली: ज़ोर से बोलो, वे सुन लगी। वे जरूर आएँगी।
दूसरी: दे खो, दे खो! नीचे वाले ने अपनी लंबी चीज रख द ! वह चुपचाप बैठ गया।
पहली: और वह दूसरी… उसने तो सारे दरवाजे खोल दए!
दोन साथ: च -च -च ! माँ आ गई! बाबा भी आ गए!
अ भनय के लए सुझाव: दोन ब े कुस के पीछे बैठकर केवल सर नकालकर बोल — क्य क कहानी म भी वे
“ सर नकाले नीचे क ओर दे ख रही थ ”। स्वर पतला और तेज रख, और वाक्य के बीच म ‘च -च ’ जोड़ते चल।
मंच पर पताजी बना बोले लाठ नीचे रख द — यह चुप्पी ही सबसे बड़ा संवाद है।
प्र.2 (ख) “ च ड़याँ एक-दूसरे से पूछ रही ह क यह आदमी कौन है और नाच क्य रहा है?” घ सले से झाँकती गौरैयाँ
क्या-क्या बात कर रही ह गी?
यहाँ संवाद का रस हास्य है। गौरैयाँ डरी हुई नह ह — वे पताजी क उछल-कूद को समझ ही नह पा रह , और इसी नासमझी से
हँसी पैदा होती है।
नमूना संवाद:
पहली गौरैया: जरा नीचे दे खो! यह आदमी अचानक क्या करने लगा?
दूसरी: ताली बजा रहा है। शायद हमारा गाना पसंद आया है!
पहली: और यह ‘श… शू…’ क्या है? कोई नया राग है क्या?
दूसरी: बाँह भी हला रहा है। लगता है उड़ने क को शश कर रहा है।
पहली: बेचारा! पंख तो ह नह , फर भी कूद-कूदकर दे ख रहा है।
दूसरी: और वह जो सोफे पर बैठ ह, वे तो हँसे जा रही ह। उन्ह भी मजा आ रहा है।
पहली: चलो, जरा नीचे वाले पंखे पर चलकर बैठ — वहाँ से नाच अच्छा दखेगा।
दूसरी: हाँ चलो! ऐसा तमाशा तो हमने पहाड़ -घा टय म कभी नह दे खा!
कहानी से जोड़: यह संवाद कल्पना ज़रूर है, पर नराधार नह । पाठ स्वयं कहता है — “गौरैयाँ घ सले म से
नकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठ । उन्ह पताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था।” यानी लेखक ने भी
उनके मन का यही अनुमान लगाया है। अच्छा संवाद-लेखन वही है जो पाठ के संकेत को आगे बढ़ाए।
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प्र.3 (ग) “एक दन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बना पूछे उड़-उड़कर मकान दे खने लग ।” जब उन्ह ने पहली
बार घर म प्रवेश कया तो उन्ह ने आपस म क्या बात क ह गी?
यहाँ गौरैयाँ मकान दे खने आए कराएदार क तरह बात करगी — यही मज़ा है। पताजी ने भी यही कहा था क “मकान का
नरीक्षण कर रही ह क उनके रहने योग्य है या नह ।”
नमूना संवाद:
पहली गौरैया: अंदर तो आ गईं… पर कोई कुछ बोला ही नह । लगता है यहाँ मना नह है।
दूसरी: पहले ऊपर चलो। नीचे बहुत आवाजाही रहती है।
पहली: (रोशनदान पर बैठकर) यहाँ से पूरा कमरा दखता है, और एक शीशा टू टा भी है — आने-जाने का रास्ता बन
गया!
दूसरी: खड़क भी ठ क है, पर यहाँ धूप सीधी आती है। ब के लए ठ क नह ।
पहली: वह ऊपर गोल-सा क्या लटका है?
दूसरी: चार तरफ से घरा है, ऊपर छत है, नीचे से हवा भी आती है। बल्ली वहाँ तक नह चढ़ सकती।
पहली: पानी? बाहर आँगन म आम का पेड़ है और नीचे बरतन भी दखे।
दूसरी: तो तय रहा। आज चलते ह, कल तनके लेकर आएँगे।
पहली: कराया?
दूसरी: (हँसकर) रोज सुबह एक गाना — इससे ज्यादा हम दे भी क्या सकती ह!
अ भनय म क्या दखाएँ: संवाद बोलते हुए दोन पात्र जगह बदलते रह — एक बार ऊँची कुस पर (रोशनदान),
फर खड़क के पास, फर छत क ओर दे खते हुए। कहानी म भी वे स्थर नह थ : “कभी वे कसी रोशनदान पर जा
बैठत , तो कभी खड़क पर।”
प्र.4 (घ) “उनके माँ-बाप झट से उड़कर अंदर आ गए और च -च करते उनसे जा मले और उनक नन्ह -नन्ह च च म
चुगा डालने लगे।” गौरैय और उनके ब ने क्या-क्या बात क ह गी?
यह कहानी का सबसे कोमल क्षण है, इस लए संवाद म राहत, चता और स्नेह — तीन होने चा हए, हास्य नह ।
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नमूना संवाद:
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माँ गौरैया: च -च ! हम आ गईं, डरो मत। मुँह खोलो, पहले चुगा लो।
पहली नन्ह :.cतुoम इतनी दे र कहाँ थ ? हम अकेले थे और नीचे बहुत शोर हो रहा था। g
पता s e mया: हम बाहर द वार पर बैठे थे, बेटा। हम अंदर आने ही नह दया जा रहा था।a
gla नन्ह : हमारा घर हल रहा था। कुछ तनके नीचे गर गए।
गौरै
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माँ गौरैया: गरे तो गरे। तनके फर ले आएँगे — तुम दोन सही-सलामत हो, यही बहुत है।
पहली नन्ह : अब वे हम भगा तो नह दगे?
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m सारे दरवाजे खोल दए ह।
पता गौरैया: दे खो नीचे — उन्ह ने लाठ रख द हैeऔर
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glअब डरने क जरूरत नह । चुपचाप खाओ और सो जाओ।
माँ गौरैया: और वह दे खो, वे मुसकरा रहेaह।
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ध्यान द जए: कहानी अंत म शोर को बुरा नह कहती — “कमरे म फर से शोर होने लगा था, पर अबक बार
cवoादmका अंत भी इसी भाव पर होना चा हए। g l as
पताजी उनक ओर दे ख-दे खकर केवल मुसकराते रहे।” यानी शोर वही है, सुनने वाले का मन बदल गया है।
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बदली कहानी — पृष्ठ 23
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पाठ से
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पाठ से ले ख न a
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मान ली जए क घ सले म अंड से ब े न नकले होते। ऐसे म कहानी आगे कैसे बढ़ती? यह बदली हुई कहानी
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प्र.1
. c o खए।
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पहले यह समझ ली जए क कहानी का मोड़ कस बात पर टका है। पूरी कहानी म पताजी का मन एक ही चीज़ ने बदला — ब
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क “च -च ”। य द वह आवाज न आती, तो घ सला टू ट जाता और कहानी का अंत बल्कुल दूसरा होता। इस लए बदली हुई कहानी
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म आपको यह दखाना है क जीत के बाद भी सब कुछ ठ क नह लगता।
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अच्छ ‘बदली कहानी’ म क्या हो:
पात्र वही रह — माँ, पताजी, ‘म’, दो गौरैयाँ। स्वभाव भी वही: पताजी ज़ , माँ व्यंग्य करती हुईं।
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घटनाएँ उसी क्रम म उस बदु तक चल जहाँ पताजी स्टू ल पर चढ़ते ह।
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वहाँ से आपक अपनी कहानी शुरू हो।
m .co अंत म कोई भाव ज़रूर बचे — पछतावा, सूनापन, या समझ।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
नमूना उत्तर (बदली हुई कहानी):
… पताजी ने लाठ का सरा तनक पर जमाया और घुमाने लगे। सूखी घास, रुई के फाहे, धागे और थग लयाँ लाठ
के सरे पर लपटती चली गईं। इस बार कोई आवाज नह आई। थोड़ी ही दे र म पंखे का गोला बल्कुल साफ़ था, जैसे
वहाँ कभी कुछ रहा ही न हो।
पताजी स्टू ल से उतरे और लाठ द वार से टकाकर छाती फैलाए कुस पर आ बैठे। “कहा था न, म हार मानने वाला
आदमी नह ँ।”
माँ ने कुछ नह कहा। न वे हँस , न उन्ह ने कोई व्यंग्य कया। वे उठकर रसोई म चली गईं। मुझे लगा, घर म पहली
बार इतनी चुप्पी है।
मने आँगन म झाँका। दोन गौरैयाँ द वार पर बैठ थ — दुबली और काली पड़ी हुई। थोड़ी दे र बाद एक उड़कर
रोशनदान तक आई, भीतर झाँका, और लौट गई। फर दूसरी आई। फर दोन साथ आईं। तीन दन तक यही होता
रहा।
चौथे दन वे नह आईं। कमरा एकदम शांत था। न ‘च -च ’, न धमा-चौकड़ी। शाम को पताजी अखबार लेकर बैठे,
पर पढ़ा नह । बार-बार ऊपर पंखे क ओर दे खते रहे। फर उन्ह ने धीरे से कहा, “कमरा कुछ सूना-सूना नह लग
रहा?”
माँ ने इस बार भी व्यंग्य नह कया। बस इतना कहा, “जो चला जाता है, उसक जगह खाली ही रहती है जी।”
अगली सुबह मने दे खा, पताजी स्टू ल पर चढ़े हुए ह — पर लाठ उनके हाथ म नह थी। वे रोशनदान का टू टा शीशा
साफ़ कर रहे थे। मने पूछा तो बोले, “ऐसे ही। खुला रहने दो।”
यह अंत क्य अच्छा है: इसम कोई उपदे श नह दया गया, फर भी बात पहुँच जाती है। असली कहानी म पताजी
ब को दे खकर बदलते ह; बदली हुई कहानी म उन्ह खालीपन बदलता है। दोन म बदलाव एक ही है — यह
समझ क घर केवल द वार का नह होता।
कहने के ढं ग/ क्रया वशेषण — पृष्ठ 23
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से
पाठ से भाषा क बात
प्र.1 अब नीचे दए गए रेखां कत शब्द पर ध्यान द जए। इन शब्द का प्रयोग करते हुए अपने मन से वाक्य बनाइए।
(क) पताजी ने झड़ककर कहा, “तू खड़ा क्या दे ख रहा है?”
‘ झड़ककर’ का अथ है — डाँटकर, तेज और रूखे स्वर म कुछ कहना। यह बताता है क पताजी ने कहा कैसे, इस लए यह क्रया
वशेषण है।
अपने वाक्य:
दुकानदार ने ब े को झड़ककर कहा, “सामान मत छु ओ!”
भीड़ म धक्का लगने पर उसने झड़ककर पीछे दे खा।
माँ ने झड़ककर कहा क खाना छोड़कर खेलने मत जाओ।
कहानी म यह शब्द क्य : पताजी उस समय दो बार हार चुके ह और माँ हँस रही ह। उनका गुस्सा गौरैय पर नह
नकल पा रहा, इस लए वह बेटे पर नकलता है। य द लेखक केवल “ पताजी ने कहा” लखता, तो यह भीतरी
झुँझलाहट पाठक तक न पहुँचती। एक क्रया वशेषण पूरे दृश्य का तापमान बता दे ता है।
प्र.2 (ख) “दे खो जी, च ड़य को मत नकालो”, माँ ने अबक बार गंभीरता से कहा।
‘गंभीरता से’ का अथ है — बना हँसी-मज़ाक के, सोच-समझकर और महत्व दे ते हुए।
अपने वाक्य:
प्रधानाचाय ने गंभीरता से कहा क परीक्षा म नकल कसी हाल म नह चलेगी।
डॉक्टर ने गंभीरता से समझाया क दवा बीच म छोड़ना ख़तरनाक है।
वह हमेशा मज़ाक करता है, पर उस दन गंभीरता से बोला — “मुझे सचमुच मदद चा हए।”
‘अबक बार’ शब्द सबसे महत्वपूण है। पूरी कहानी म माँ हँसती रही ह — खल खलाकर, व्यंग्य से, ता लयाँ
बजाकर। ठ क इस जगह लेखक लखता है “अबक बार गंभीरता से”। इस एक बदलाव से पाठक समझ जाता है क
अब बात मज़ाक क नह रही — अंडे आ चुके ह। कहानी म यही वह मोड़ है जहाँ हास्य पीछे हटता है और करुणा
सामने आती है।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
प्र.3 (ग) “ कसी को सचमुच बाहर नकालना हो, तो उसका घर तोड़ दे ना चा हए”, उन्ह ने गुस्से म कहा।
‘गुस्से म’ — क्रोध के साथ, तमतमाकर। यह भी बताता है क बात कही कैसे गई।
अपने वाक्य:
बार-बार टोके जाने पर उसने गुस्से म कताब मेज पर पटक द ।
कप्तान ने गुस्से म कहा क इतनी लापरवाही से मैच नह जीते जाते।
गुस्से म कही गई बात अक्सर बाद म पछतावा दे ती है।
यहाँ यह शब्द क्य जरूरी था: यह वाक्य कहानी का सबसे कठोर वाक्य है। ‘गुस्से म’ जोड़कर लेखक हम बता दे ता
है क यह पताजी का स्वभाव नह , उस क्षण क झुंझलाहट है। इसी से आगे उनका बदल जाना वश्वसनीय लगता है
— जो बात ठं डे दमाग से कही जाती, उससे लौटना क ठन होता।
प्र.4 अब आप इनसे मलते-जुलते कुछ और क्रया वशेषण शब्द सो चए और उनका प्रयोग करते हुए कुछ वाक्य
बनाइए। (संकेत— धीरे से, जोर से, अटकते हुए, चल्लाकर, शरमाकर, सहमकर, फुसफुसाते हुए आ द।)
क्रया वशेषण अथ वाक्य
धीरे से बहुत कम आवाज या ग त से दाद सो रही थ , इस लए मने धीरे से दरवाजा बंद कया।
जोर से तेज आवाज या श क्त से पीछे बैठे ब ने जोर से कहा क उन्ह कुछ सुनाई नह दे रहा।
अटकते हुए रुक-रुककर, अटक-अटककर पहली बार मंच पर खड़े होकर वह अटकते हुए अपनी क वता सुना पाया।
चल्लाकर बहुत ऊँचे स्वर म ब े ने चल्लाकर बताया क गद नाली म गर गई है।
शरमाकर लजाते हुए पुरस्कार का नाम सुनकर वह शरमाकर पीछे छप गई।
सहमकर डरकर, सकुड़कर बल्ली को दे खकर चूहा सहमकर बल म घुस गया।
फुसफुसाते हुए बहुत धीमी, कानाफूसी जैसी आवाज म कक्षा म उसने फुसफुसाते हुए मुझसे उत्तर पूछा।
खल खलाकर खुलकर, ठहाके के साथ चुटकुला सुनकर पूरी कक्षा खल खलाकर हँस पड़ी।
चुपचाप बना कुछ कहे पताजी लाठ रखकर चुपचाप कुस पर बैठ गए।
हाँफते हुए तेज साँस लेते हुए वह हाँफते हुए दौड़कर आया और बोला — “बस नकल गई!”
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
पहचानने का सरल तरीका: क्रया से पू छए — “कैसे?” जो उत्तर मले, वही क्रया वशेषण है। ‘माँ हँस ’ —
कैसे? ‘ खल खलाकर’। ‘ पताजी ने कहा’ — कैसे? ‘ झड़ककर’। ध्यान र खए क ‘कब’ (कल, अभी) और ‘कहाँ’
(यहाँ, बाहर) बताने वाले शब्द भी क्रया वशेषण होते ह, पर इस ग त व ध म केवल री त यानी ‘कैसे’ वाले शब्द
लए गए ह।
घर के प्राणी — पृष्ठ 23
पाठ से
पाठ से सू ची
प्र.1 कहानी म आपने पढ़ा क लेखक के घर म अनेक प्राणी रहते थे। लेखक ने उनका वणन ऐसे कया है जैसे वे भी
मनुष्य क तरह व्यवहार करते ह। कहानी म से चुनकर उन प्रा णय क सूची बनाइए और बताइए क वे मनुष्य
जैसे कौन-कौन से काम करते थे? (क) बल्ली— ‘ फर आऊँगी’ कहकर चली जाती है।
क्रम प्राणी मनुष्य जैसा व्यवहार (पाठ के अनुसार)
(क) बल्ली ‘ फर आऊँगी’ कहकर चली जाती है — जैसे कोई मेहमान वदा लेता हो; मन हुआ तो अंदर आकर दूध पी गई, न
हुआ तो बाहर से ही लौट गई।
(ख) चूहे रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे म भागते ह और धमा-चौकड़ी मचाते ह; बतन गराते ह, डब्बे खोलते ह, प्याले
तोड़ते ह। एक चूहा अँगीठ के पीछे बैठता है जैसे उसे सद लगती हो, दूसरा टं क पर चढ़ जाता है जैसे उसे गरमी
लगती हो — दोन क अपनी-अपनी पसंद है।
(ग) चमगादड़ शाम पड़ते ही कमर के आर-पार पर फैलाए कसरत करने लगते ह — जैसे रोज शाम को व्यायाम करने वाले
लोग।
(घ) कबूतर दन-भर “गुटर-गूँ गुटर-गूँ” का संगीत सुनाते रहते ह — जैसे घर म कोई रयाज़ कर रहा हो।
(ङ) गौरैयाँ बना पूछे अंदर आकर मकान का नरीक्षण करती ह; बछावन बछाती ह और सामान ले आती ह; मजे से
बैठकर मल्हार गाती ह; ब को चुगा खलाती ह और च -च करके मानो अपना प रचय दे ती ह।
(च) च टयाँ जैसे फौज छावनी डाले हुए हो — यानी सेना क तरह घर म पड़ाव डाले बैठ ह।
(छ) पक्षी (तोते आम के पेड़ पर डेरा डाले रहते ह और सीधे इसी घर पहुँचते ह, “जैसे हमारे घर का पता लखवाकर लाया हो”।
आ द)
लेखक ऐसा क्य करता है: जब पशु-प क्षय के काम मनुष्य के शब्द म कहे जाते ह — कसरत, संगीत, नरीक्षण,
फौज, सामान, बछावन — तो पाठक उन्ह ‘जीव-जंतु’ क तरह नह , घर के सदस्य क तरह दे खने लगता है। इसी से
कहानी क सहानुभू त बनती है। यह वह गुण है जसे ‘आपक बात’ वाली ता लका म कहा गया है — कसी प्राणी
या उसके काय को कोई अन्य नाम दे ना।
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Tip: उत्तर लखते समय हर प्राणी के आगे कहानी का असली शब्द जरूर ल खए (डेरा, धमा-चौकड़ी, कसरत,
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संगीत, नरीक्षण, छावनी)। यही शब्द दखाते ह क आपने पाठ ध्यान से पढ़ा है।
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हेर-फेर मात्रा का — पृष्ठ 24
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पाठ से
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पाठ से भाषा क बात
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प्र.1 अब नीचे दए गए शब्द क मात्राओं और अथ के अंतर पर ध्यान द जए। इन शब्द का प्रयोग करते हुए अपने
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मन से वाक्य बनाइए। • नाच-नाचा-नचा
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a शब्द अथ वाक्य
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नाच नृत्य (सं ा); या ‘नाचो’ (आ ा) मेले म मोर का नाच दे खकर सब ठहर गए।
s m उस दन गौरैय के नीचे खड़े होकर इतना नाचा-कूदा क माँ हँसते-हँसते
eपताजी
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gl लोटपोट हो गईं।
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नाचा स्वयं नाचा — भूतकाल क क्रया
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नचा कसी और को नचाया — प्रेरणाथक मदारी ने डमरू बजाकर बंदर को खूब नचाया।
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क्रया
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a s eअंmतर क जड़: ‘नाचा’ म काम करने वाला स्वयं नाचता है; ‘नचा’ म कोई दूसरा उससे नाच करवाता है। ऐसी
a gl क्रयाओं को प्रेरणाथक क्रया कहते ह — जैसे पढ़ा/पढ़ाया, लखा/ लखवाया, हँसा/हँसाया। एक मात्रा हटते ही
‘करने वाला’ बदल जाता है।
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प्र.2 • हार-हरा-हारा agl
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com अथ
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वाक्य
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हार (1) पराजय (2) माला पताजी बार-बार कहते थे क वे हार मानने वाले आदमी नह ह। / वजेता के गले म
फूल का हार पहनाया गया।
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. comबा रश के बाद पूरा मैदान हरा हो गया। / हमारी ट म ने पड़ोसी व ालय को दो गोलagla
हरा
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(1) हरे रंग का (2) ‘हराना’ का रूप —
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परा जत करना
g l as से हरा दया।
हारा
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स्वयं हार गया — भूतकाल क क्रया वह मैच हारा जरूर, पर हम्मत नह हारा।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
Tip: ‘हरा’ के दोन अथ केवल वाक्य म रखकर ही पहचाने जा सकते ह — यही भाषा क खूबी है। ‘हरा पत्ता’ म
यह वशेषण है, ‘उसे हरा दया’ म क्रया।
प्र.3 • पता-पीता
शब्द अथ वाक्य
पता जनक, बाप — सं ा कहानी म पता ही सबसे अ धक परेशान दखाई दे ते ह।
पीता ‘पीना’ क्रया का रूप वह रोज सुबह एक गलास दूध पीता है।
यहाँ केवल ‘इ’ और ‘ई’ का अंतर है — पता / पीता। ह्रस्व और द घ मात्रा क यह भूल लखने म सबसे अ धक
होती है, और इससे सं ा सीधे क्रया बन जाती है। लखते समय शब्द को बोलकर दे खए — द घ मात्रा म आवाज
ठहरती है।
प्र.4 • चूक-चुक
शब्द अथ वाक्य
चूक भूल, गलती; या ‘चूकना’ = अवसर खो दे ना एक छोट -सी चूक से पूरा प्रयोग बगड़ गया। / मौका मत चूको।
चुक ‘चुकना’ = समाप्त हो जाना, खत्म हो जाना जब पताजी क सहनशीलता चुक गई, तब उन्ह ने घ सला तोड़ने क ठान ली।
पाठ से: दूसरा वाक्य कहानी से ही लया गया है — “आ खर जब उनक सहनशीलता चुक गई तो वह कहने लगे क
वह गौरैय का घ सला नोचकर नकाल दगे।” यहाँ ‘चुक’ का अथ ‘गलती’ नह , ‘खत्म हो जाना’ है।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
प्र.5 • नीचा-नीचे
शब्द अथ वाक्य
नीचा कम ऊँचाई वाला — वशेषण (नीचा/नीची/नीचे रूप बदलते ह) यह मेज बहुत नीची है, इस पर लखने म कमर दुखने लगती है।
नीचे कसी वस्तु के तले — स्थान बताने वाला शब्द गौरैयाँ घ सले म से सर नकालकर नीचे क ओर झाँक रही थ ।
अंतर पहचा नए: ‘नीचा’ कसी वस्तु का गुण बताता है (कैसी है?), जब क ‘नीचे’ स्थान बताता है (कहाँ?)। इसी
तरह ‘ऊँचा’ और ‘ऊपर’ का जोड़ा भी बनता है।
प्र.6 • सहसा-साहस
शब्द अथ वाक्य
सहसा अचानक, एकाएक — क्रया वशेषण तभी सहसा जोर क आवाज आई, “च -च , च -च !!!”
साहस हम्मत, नडरता — सं ा दो नन्ह गौरैय को बचाने के लए उनके माँ-बाप ने बड़ा साहस दखाया।
यहाँ मात्रा ही नह , अक्षर का क्रम भी बदल जाता है — स-ह-सा / सा-ह-स। पहला बताता है क कोई घटना
कब और कैसे हुई; दूसरा कसी गुण का नाम है। पहला वाक्य कहानी का सबसे नाटक य क्षण है — और ध्यान
द जए, लेखक ने वहाँ ‘अचानक’ नह , ‘सहसा’ लखा है, जो अ धक तीव्र और सा ह त्यक लगता है।
वाद- ववाद — पृष्ठ 24
पाठ से
पाठ से वाद- ववाद
प्र.1 कक्षा म एक वाद- ववाद ग त व ध का आयोजन क जए। वाद- ववाद का वषय है— “माँ च ड़य को घर से
नकालना चाहती थ ।” कक्षा म आधे समूह इस कथन के पक्ष म और आधे समूह इसके वपक्ष म तक दगे।
वाद- ववाद म दोन पक्ष के तक पाठ क पं क्तय पर टके होने चा हए, अपनी राय पर नह । नीचे दोन ओर क सामग्री द गई है।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
पक्ष म (हाँ, माँ नकालना चाहती थ ) वपक्ष म (नह , माँ नह नकालना चाहती थ )
उपाय उन्ह ने ही बताया — “एक दरवाजा खुला छोड़ो, वही उपाय गौरैय को सुर क्षत बाहर नकालने का था — लाठ से मारने से
बाक दरवाजे बंद कर दो। तभी ये नकलगी।” बचाने का।
“पंखा चला दे ते, तो ये उड़ जात ” — यह भी नकालने का पंखा चलाना लाठ घुमाने से कम खतरनाक था; और यह बात उन्ह ने हँसकर
ही सुझाव है। कही, गंभीरता से नह ।
जब गौरैयाँ बाहर नकल गईं, तो माँ ता लयाँ बजाने ता लयाँ गौरैय के जाने पर नह , पताजी क मेहनत के तमाशे पर थ — पूरी
लग । कहानी म वे यही करती आई ह।
उन्ह ने पताजी को कभी सीधे रोका नह , केवल टप्पणी अंत म उन्ह ने सीधे रोका — “दे खो जी, च ड़य को मत नकालो… अब तो
क। इन्ह ने अंडे भी दे दए ह गे।” — और यह बात ‘गंभीरता से’ कही।
— अंत म माँ ने ही उठकर सभी दरवाजे खोल दए, ता क माँ-बाप गौरैयाँ अंदर
आ सक।
— वे बार-बार दोहराती रह — “ये नकलगी नह , जी”, “अब ये यहाँ से नह
जाएँगी” — यानी वे मन ही मन उनके रुकने के पक्ष म थ ।
नष्कष (जो सभा के अंत म कहा जा सकता है): पाठ के प्रमाण वपक्ष क ओर भारी ह। माँ के सुझाव नकालने
के लए नह , ब ल्क पताजी क तोड़-फोड़ रोकने के लए थे — उन्ह ने हर बार वह उपाय बताया जसम च ड़य को
चोट न पहुँचे। और सबसे बड़ा प्रमाण कहानी का अं तम मोड़ है: दरवाजे उन्ह ने खोले, बंद नह कए।
वाद- ववाद कैसे क जए: हर वक्ता 2 मनट बोले; तक के साथ पाठ क पं क्त पढ़कर सुनाए; व्य क्तगत टप्पणी
न करे। अंत म एक साथी दोन पक्ष के तक बोड पर लखे और कक्षा मलकर तय करे क कस पक्ष के पास अ धक
प्रमाण थे — कसके पास अ धक ऊँची आवाज थी, यह नह ।
कहानी क रचना — पृष्ठ 24 और 25
पाठ से · इसी के साथ पुस्तक म ‘आपक बात’ शीषक और ‘कहानी क वशेषताएँ’ ता लका द गई है
पाठ से कहानी-कला
प्र.1 “कमरे म फर से शोर होने लगा था, पर अबक बार पताजी उनक ओर दे ख-दे खकर केवल मुसकराते रहे।” इस
पं क्त म बताया गया है क पताजी का दृ कोण कैसे बदल गया। इस प्रकार यह वशेष वाक्य है। इस तरह के
वाक्य से कहानी और अ धक प्रभावशाली बन जाती है। (क) आपको इस कहानी म ऐसी अनेक वशेषताएँ
दखाई दगी। उन्ह अपने समूह के साथ मलकर ढूँ ढ़ए और उनक सूची बनाइए।
पहले उस नमूने वाले वाक्य को सम झए। कहानी क शुरुआत म यही शोर पताजी को असह्य था — “वह शोर मचता है क कान
के पद फट जाएँ”। अंत म शोर वही है, पर प्र त क्रया उलट गई है। लेखक ने कह नह लखा क “ पताजी को गौरैय से प्रेम हो
गया” — उसने केवल एक मुसकान दखाई, और पूरा प रवतन पाठक तक पहुँच गया।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
कहानी क वशेषताओं क सूची:
1. प्रथम पुरुष कथन — घर का बेटा ‘म’ बनकर सुनाता है, इस लए घटनाएँ पास से दे खी हुई लगती ह।
2. अ तशयो क्त से हास्य — “बी सय तो चूहे बसते ह”, “च टय क तो जैसे फौज ही छावनी डाले हुए है”।
3. छोटे -छोटे संवाद — पूरी कहानी बातचीत से आगे बढ़ती है, वणन से नह ।
4. व्यंग्य — माँ का हर वाक्य सीधा नह , तरछा है।
5. पशु-प क्षय का मानवीकरण — बल्ली ‘ फर आऊँगी’ कहती है, चमगादड़ ‘कसरत’ करते ह, गौरैयाँ ‘ नरीक्षण’ करती ह।
6. दोहराव से ग त — नकालना–लौटना, नकालना–लौटना; हर बार एक नया रास्ता। इसी से कहानी म लय बनती है।
7. बना उपदे श का अंत — कोई सीख नह लखी गई, केवल एक दृश्य छोड़ दया गया।
8. छोटे ब्योर से बड़ी बात — “कुछ-कुछ दुबला गई थ , कुछ-कुछ काली पड़ गई थ ” — इससे गौरैय का दुख बना कहे कह
दया गया।
9. सामान्य घर का सामान्य दृश्य — पंखा, रोशनदान, अँगीठ , लाठ , स्टू ल; कोई असाधारण घटना नह , फर भी कहानी बँधी
रहती है।
समूह-काय कैसे क जए: कहानी को चार हस्स म बाँट ली जए और हर समूह अपने हस्से से ऐसे ‘ वशेष वाक्य’
छाँटे जो कुछ बदलते हुए दखाते ह । फर सब मलाकर एक सूची बनाइए।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया
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(ख) इस कहानी क कुछ वशेषताओं को नीचे दया गया है। इनके उदाहरण कहानी म से चुनकर ल खए।
[ता लका — कहानी क वशेषताएँ / कहानी म से उदाहरण : 1. कसी बात को कल्पना से e
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o हँसी-मज़ाक का उपयोग कया जाना 3. सोचा कुछ और, हुआ कुछaऔर gl4. दूसर के मन के भाव
बढ़ा-चढ़ाकर कहना
2. हास्य.cयानी
s m मान लगाना 5. कसी क कही बात को उसी के शब्द म लखना 6. कसी प्राणी या उसके काय को कोई
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gl अन्य नाम दे ना 7. कसने कससे कोई बात कही, यह सीधे-सीधे बताए बना उस संवाद को लखना]
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कहानी क वशेषताएँ
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कहानी म से उदाहरण
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1. कसी बात को कल्पना से बढ़ा- (पुस्तक म दया गया) “जो भी पक्षी पहा ड़य -घा टय पर से उड़ता हुआ दल्ली पहुँचता है,
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चढ़ाकर कहना पताजी कहते ह वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लखवाकर लाया
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हो।”
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और भी: “वह शोर मचता है क कान के पद फट जाएँ।” · “च टय क तो जैसे फौज ही
a s em छावनी डाले हुए है।” · “चलो, दो तनके तो नकल गए, अब बाक दो हजार भी नकल जाएँगे!”
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ag 2. हास्य यानी हँसी-मज़ाक का उपयोग “वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई और मुँह से ‘श...शू’ कहा,
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कया जाना बाँह झुलाईं, फर खड़े-खड़े कूदने लगे।”
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और: “ च ड़याँ एक-दूसरे से पूछ रही ह क यह आदमी कौन है और नाच क्य रहा है?” · “एक
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asदन अंदर नह घुस पाएँगी, तो घर छोड़ दगी।” — पर वे दरवाजे के नीचे से लौट आईं।
बार तो झूलती लाठ माँ के सर पर लगते-लगते बची।”
3. सोचा कुछ और, हुआ कुछ और a g l
“एक
और: “मने समझ लया क उन्ह अक्ल आ गई होगी… कसी दूसरी जगह चली गई ह गी।” —
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पर सुबह वे मल्हार गा रही थ । · घ सला तोड़ने चढ़े पताजी अंत म मुसकराते रह गए।
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4. दूसर के मन के भाव का अनुमान “एक चूहा अँगीठ के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सद बहुत लगती है।”
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और: “मकान का नरीक्षण कर रही ह क उनके रहने योग्य है या नह ।” · “उन्ह पताजी का
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लगाना
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नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था।” · “वह समझते ह क माँ उनका मजाक उड़ा रही ह।”
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5. कसी क कही बात को उसी के शब्द “अब तो ये नह उड़गी। पहले इन्ह उड़ा दे ते, तो उड़ जात । अब तो इन्ह ने यहाँ घ सला बना लया
और: “छोड़ोo mचूह को तो नकाल नह पाए, अब च ड़य को नकालगे!” · “आज दरवाजे l a
म लखना है।”
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m · “तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोन दरवाजे बंद कर दे।”
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बंद e
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रखो।”
6. कसी प्राणी या उसके काय को कोई a “वे फर से मौजूद थ और मजे से बैठ मल्हार गा रही थ ।” (चहचहाहट = राग)
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अन्य नाम दे ना और: चमगादड़ “कसरत करने लगते ह” · कबूतर का “गुटर-गूँ का संगीत” · पक्षी पेड़ पर
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“डेरा डाले रहते ह” · चूह क “धमा-चौकड़ी” · च टय क “फौज… छावनी” · बल्ली का
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“ फर आऊँगी” कहकर जाना।
.7.coकसने कससे कोई बात कही, यह l
agे मानो अपना प रचय दे रही थ , हम आ गई ह।
a s em सीधे-सीधे बताए बना उस संवाद को “वे अभी भी झाँके जा रही थ और च -च करक
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हमारे माँ-बाप कहाँ ह?” — यहाँ न उद्धरण- चह्न ह, न ‘उन्ह ने कहा’, फर भी ब क बात
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लखना सुनाई दे जाती है।
और: पृष्ठ 15 पर पताजी के वाक्य के तुरंत बाद बना कसी सूचना के अगला संवाद शुरू हो
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जाता है — “छोड़ो जी, चूह को तो नकाल नह पाए…”, और बोलने वाले का नाम वाक्य के
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अंत म आता है।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
इन सात वशेषताओं का जोड़ ही ‘शैली’ है। ध्यान द जए क इनम से पाँच का काम एक ही है — लेखक बताता
नह , दखाता है। वह न कहता है क घर म बहुत जीव ह (‘फौज’ कह दे ता है), न कहता है क पताजी हास्यास्पद
लग रहे थे (उन्ह कूदते हुए दखा दे ता है), न कहता है क पताजी बदल गए (उन्ह मुसकराते हुए छोड़ दे ता है)। इसी
कारण यह छोट -सी घरेलू घटना एक यादगार कहानी बन जाती है।
पाठ से आगे — पृष्ठ 25
पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.1 (क) “गौरैय ने घ सले म से सर नकालकर नीचे क ओर झाँककर दे खा और दोन एक साथ ‘च -च ’ करने
लग ।” आपने अपने घर के आस-पास प क्षय को क्या-क्या करते दे खा है? उनके व्यवहार म आपको कौन-कौन
से भाव दखाई दे ते ह?
इस प्रश्न म अपना नरीक्षण लखना है। अच्छा उत्तर वह है जसम पहले पक्षी का काम लखा हो, फर उससे झलकने वाला भाव।
पक्षी का व्यवहार दखाई दे ने वाला भाव
गौरैया का आँगन म फुदकना, नल के नीचे पानी म नहाना और पंख फड़फड़ाना न तता और उल्लास
कौए का कसी बल्ली या चील को दे खकर लगातार काँव-काँव करना और सब कौओं का चेतावनी और मल-जुलकर बचाव
इक ा हो जाना
कबूतर का दूसरे कबूतर के आगे-पीछे गरदन फुलाकर घूमना प्रेम- नवेदन और अ धकार-भाव
च ड़या का च च म तनका दबाए बार-बार एक ही जगह आना तैयारी और घर बनाने क लगन
घ सले के पास कोई आ जाए तो च ड़या का तेज-तेज चीखना और सर पर मँडराना डर और संतान क रक्षा का आवेग
ब का मुँह खोलकर लगातार च -च करना भूख और भरोसा — क माँ-बाप जरूर
आएँगे
शाम को तोत और मैनाओं का झुंड बनाकर एक ही पेड़ पर लौटना और खूब शोर करना दन भर क थकान के बाद घर लौटने क
खुशी
नमूना उत्तर: हमारे आँगन म तुलसी के गमले के पास रोज सुबह दो गौरैयाँ आती ह। पहले वे इधर-उधर दे खती ह,
फर पानी के कटोरे म उतरकर खूब नहाती ह और पंख झाड़ती ह — उस समय उनम बल्कुल ब जैसी मस्ती
दखती है। पर जस दन छत पर बल्ली दख जाती है, उनक आवाज ही बदल जाती है — तेज, रुक-रुककर, और
वे नीचे उतरती ही नह । इससे मुझे लगता है क उनक अलग-अलग आवाज के अलग-अलग अथ ह, ठ क जैसे
कहानी म ब क ‘च -च ’ का अथ था — हम आ गई ह, हमारे माँ-बाप कहाँ ह?
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 (ख) “कमरे म फर से शोर होने लगा था, पर अबक बार पताजी उनक ओर दे ख-दे खकर केवल मुसकराते रहे।”
कहानी के अंत म पताजी गौरैय का अपने घर म रहना स्वीकार कर लेते ह। क्या आप भी कोई स्थान या वस्तु
कसी अन्य के साथ साझा करते ह? उनके बारे म बताइए। साझेदारी म य द कोई समस्या आती है तो उसे कैसे हल
करते ह?
उत्तर म तीन बात आनी चा हए — क्या साझा करते ह, क्या समस्या आती है, और उसे कैसे हल करते ह।
साझा क जाने वाली चीज आम समस्या हल
भाई-बहन के साथ पढ़ने क मेज एक को शां त चा हए, दूसरे को बोलकर समय बाँट लेना — पहले एक घंटा एक का, फर
पढ़ना है दूसरे का
कक्षा म साथी के साथ बच जगह और सामान फैलाने पर झगड़ा बीच म एक सीमा तय कर लेना और पहले से
पूछकर सामान लेना
मोहल्ले का मैदान छोटे ब े और बड़े लड़के एक साथ मैदान के हस्से और खेलने के समय बाँट दे ना
खेलना चाहते ह
घर का आँगन — प क्षय और दाना बखरता है, बीट गरती है एक कोना उनके लए तय कर दे ना और वह सफाई
गलह रय के साथ करना
नमूना उत्तर: म अपनी साइ कल छोटे भाई के साथ साझा करता ँ। शुरू म रोज झगड़ा होता था — कभी वह दे र से
लौटता, कभी हवा नकाल आता। फर हमने तीन नयम बना लए: (1) स्कूल के दन म शाम को पहले एक घंटा
मेरा, फर उसका; (2) जो चलाकर लाएगा, वही हवा जँचवाएगा; (3) जसे कसी दन ज्यादा जरूरत हो, वह पहले
से बता दे गा। नयम बनने के बाद झगड़ा लगभग खत्म हो गया।
मुझे लगता है क साझेदारी क सबसे बड़ी शत यही है — दूसरे क जरूरत को भी असली मानना। कहानी म
पताजी क गलती यही थी क उन्ह गौरैय क जरूरत ‘असली’ लगती ही नह थी; उन्ह केवल अपना कालीन दख
रहा था। जस क्षण उन्ह दो नन्ह च च दख , साझेदारी अपने-आप बन गई।
प्र.3 (ग) प रवार के लोग गौरैय को घर से बाहर भगाने क को शश करते ह, कतु गौरैय के ब के कारण उनका
दृ कोण बदल जाता है। क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है क कसी को दे खकर या कसी से मलकर आपका
दृ कोण बदल गया हो?
यह अनुभव का प्रश्न है। अच्छे उत्तर क बनावट यह रहेगी — पहले म क्या सोचता था → फर क्या हुआ/ दखा → अब क्या
सोचता ँ। कहानी भी ठ क इसी क्रम म चलती है।
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नमूना उत्तर: हमारी गली के कोने पर एक बुजुग रहते ह जो हमेशा चल्लाते रहते थे — “गद मत मारो!”, “यहाँ मत
खेलो!” हम सब उन्ह चड़ चड़ा और झगड़ालू मानते थे और उनके घर के आगे जान-बूझकर शोर करते थे।
एक दन हमारी गद उनके आँगन म चली गई। म डरते-डरते लेने गया तो दे खा क आँगन म ढे र सारे गमले ह और वे
एक-एक पत्ती प छ रहे ह। उन्ह ने गद उठाकर द और बस इतना कहा, “बेटा, गद से डंठल टू ट जाता है। ये पौधे मेरी
पत्नी लगाकर गई थ ।”
उस एक वाक्य ने मेरा पूरा दृ ष्टकोण बदल दया। वे झगड़ालू नह थे — वे कुछ बचाने क को शश कर रहे थे, और
हम यह पता ही नह था। उसके बाद हमने खेलने क जगह थोड़ी आगे कर ली, और अब वे कभी-कभी हमारा खेल
दे खने भी आ जाते ह।
इस अनुभव म और कहानी म एक ही बात समान है — दृ ष्टकोण तक से नह बदलता, कारण दख जाने से बदलता
है। पताजी को भी कसी ने समझाया नह था; उन्ह ने बस दो नन्ह गौरैयाँ दे ख ल ।
लखते समय ध्यान रख: केवल ‘मेरी सोच बदल गई’ लख दे ना काफ नह । वह क्षण बताइए जसम बदलाव हुआ
— कहानी म वह क्षण एक आवाज है: “च -च , च -च !!!”
च ड़य का घ सला — पृष्ठ 26
पाठ से आगे
पाठ से आगे प रयोजना
प्र.1 घ सला बनाना च ड़य के जीवन का एक सामान्य हस्सा है। व भन्न पक्षी अलग-अलग तरह के घ सले बनाते ह।
इन घ सल म वे अपने अंडे दे ते ह और अपने चूज को पालते ह। (क) अपने आस-पास व भन्न प्रकार के घ सले
ढूँ ढ़ए और उन्ह ध्यान से दे खए और नीचे द गई ता लका को पूरा क जए। (सावधानी— उन्ह हाथ न लगाएँ
अन्यथा प क्षय , उनके अंड और आपको भी खतरा हो सकता है) [ता लका के स्तंभ— क्रम संख्या | घ सले को
कहाँ दे खा | घ सला कन चीज से बनाया गया था | घ सला खाली था या नह | घ सला कस पक्षी का था]
यह ता लका आपके अपने नरीक्षण से भरी जानी है — इस लए नीचे जो दया गया है, वह भरने का नमूना है, नकल करने के लए
उत्तर नह । घ सले को छू ना नह है; दूर से, चुपचाप दे खए, और हो सके तो दोपहर म दे खए जब पक्षी अकसर बाहर रहते ह।
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क्रम घ सले को कहाँ दे खा घ सला कन चीज से घ सला खाली था घ सला कस पक्षी
संख्या बनाया गया था या नह का था
1. घर के रोशनदान के कोने म सूखी घास, तनके, रुई के फाहे, नह — दो ब े थे गौरैया
धागे
2. नीम के पेड़ क ऊँची शाखा टह नयाँ, तार का टु कड़ा, कपड़े खाली था कौआ
पर क कतरन
3. बरामदे के पंखे और बल्ब के तनके और सूखी प त्तयाँ नह — कबूतरी बैठ थी कबूतर
बीच
4. बड़े पत्त वाले पौधे पर, दो मकड़ी के जाले के धागे से सले खाली था दज च ड़या (टे लर
पत्ते सले हुए पत्ते, भीतर रुई बड)
5. पुरानी द वार क दरार म म और तनके पता नह चला — बहुत मैना
भीतर था
दे खते समय क्या-क्या नोट क जए: घ सला कस ऊँचाई पर है, वह खुला है या ढका, वह कसी चीज़ से टका है
या लटका है। बया का घ सला लटकता है, दज च ड़या पत्ते सी दे ती है, गौरैया छे द और कोने चुनती है, अबाबील
म से बनाती है। जगह और सामग्री दे खकर ही अकसर पक्षी पहचाना जा सकता है।
सावधानी दोहराइए: घ सले को छू ने से मनुष्य क गंध लग सकती है, अंडे टू ट सकते ह और कई बार पक्षी घ सला
ही छोड़ दे ते ह। कहानी म भी घ सले को छे ड़ने का प रणाम हमने दे खा — गौरैयाँ दुबली और चुप पड़ गईं।
प्र.2 (ख) व भन्न प क्षय के घ सल के संबंध म एक प्रस्तु त तैयार क जए। उसम आप चाह तो उनके चत्र और थोड़ी
रोचक जानकारी स म्म लत कर सकते ह।
प्रस्तु त क रूपरेखा (6 स्लाइड या 6 चाट-पन्ने):
1. शीषक: “घ सले — प क्षय के घर”। साथ म एक वाक्य: घ सला रहने क जगह नह , ब े पालने क जगह होता है।
2. घ सला कस काम आता है: अंड को गरने और ठं ड से बचाना, ब को बल्ली-साँप-कौए से बचाना, बा रश और धूप से
आड़।
3. घ सल के प्रकार: कटोरानुमा (गौरैया, बुलबुल), लटकता हुआ (बया), सला हुआ (दज च ड़या), म का (अबाबील), छे द
वाला (कठफोड़वा, तोता), केवल कंकड़ का घेरा ( टटहरी)।
4. सामग्री: तनके, सूखी घास, पत्ते, रुई, धागे, बाल, पंख — और आजकल प्ला स्टक व तार भी, जो प क्षय के लए खतरनाक
है।
5. रोचक जानकारी: बया का घ सला नर बनाता है और मादा उसे परखकर ही स्वीकार करती है। दज च ड़या च च से पत्त म
छे द कर धागे से सलाई करती है। कोयल स्वयं घ सला नह बनाती — वह कौए के घ सले म अंडा दे दे ती है।
6. हम क्या कर सकते ह: बालकनी म पानी का कटोरा रख, घ सला न छे ड़, लकड़ी का घ सला-बक्सा टाँग, और 20 माच को
वश्व गौरैया दवस मनाएँ।
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया
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प्रस्तु त सुधारने के दो सुझाव: (1) हर स्लाइड पर शब्द कम और चत्र बड़ा रख — घ सल क प्रस्तु त म चत्र ही
m a s em से एक अपनी
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मुख्य बात है। (2) अपने आस-पास ख ची गई एक तस्वीर जरूर लगाएँ; इंटरनेट से ली गई दस तस्वीर
co है।
तस्वीर भारी .पड़ती
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मल्हार — पृष्ठ 26
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पाठ से आगे
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पाठ से आगे सं गीत a g l
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प्र.1 “जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फर से मौजूद थ और मजे से बैठ मल्हार गा रही थ ।” ‘मल्हार’ भारतीय
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.c स्तक का नाम मल्हार भी इसी राग के नाम पर है। नीचे द गई इंटरनेट कagड़य के माध्यम से राग मल्हार को
शास्त्रीय संगीत के एक प्र सद्ध राग का नाम है। यह राग वषा ऋतु से जुड़ा है। आप जानते ही ह क आपक हद
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se सु नए और इसका आनंद ली जए—
पाठ्यपु
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यह सुनने क ग त व ध है। पुस्तक म द गई कड़ी (या QR कोड) से राग मल्हार सु नए और सुनते समय इन बात पर ध्यान द जए
—
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गायन क ग त कैसी है — धीमी, गंभीर, या तेज?
क्या सुनते हुए मन म बादल, बूँद, ठं डी हवा जैसा कोई चत्र बनता है?
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तबले क थाप और स्वर के उतार-चढ़ाव म क्या आपको वषा क लय सुनाई दे ती है?
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gहोकर चहचहा रही थ ।” पर उसने
m .c‘मल्हार’ शब्द क्य आया: लेखक चाहता तो लख सकता था — “वे प्रसन्न
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यहाँ
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चहचहाहट को एक राग का नाम दे दया। इससे तीन बात एक साथ हो गईं — (1) गौरैय क खुशी एक कला जैसी
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ऊँचाई पा गई; (2) पताजी क झुँझलाहट और उनके गाने का वरोध और तीखा हो गया, क्य क जसे वे शोर मानते
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ह वह लेखक के लए संगीत है; और (3) कहानी म वषा और नएपन का भाव बना कहे आ गया।
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ase
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Did you know? मल्हार वषा ऋतु का राग है और यही नाम आपक पाठ्यपुस्तक का भी है, क्य क वषा म
प्रकृ त नया रूप लेती है — यह पुस्तक भी सृजन, स दय और नएपन पर बल दे ती है। मयाँ मल्हार, मेघ मल्हार, गौड़
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मल्हार — मल्हार के कई रूप गाए जाते ह।
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agl हास्य-व्यं
ग्य — पृष्ठ 27
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पाठ से आगे
पाठ से आगे भाषा क बात
प्र.1 (क) आपको इस कहानी म कौन-कौन से वाक्य पढ़कर हँसी आई? उन वाक्य को चुनकर ल खए।
हँसी लाने वाले वाक्य को छाँटते समय यह दे खए क हँसी कस बात से आ रही है — बढ़ा-चढ़ाकर कहने से, कसी क मु ा से, या
बात के उलट जाने से।
वाक्य हँसी क्य आती है
“जो भी पक्षी पहा ड़य -घा टय पर से उड़ता हुआ दल्ली पहुँचता है… जैसे बात इतनी बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है क प क्षय के पास घर का
हमारे घर का पता लखवाकर लाया हो।” पता होने क कल्पना बन जाती है।
“एक चूहा अँगीठ के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सद चूहे को बूढ़ा आदमी बना दया गया है — जसे सद लगती है
बहुत लगती है।” और जसक अपनी पसंद दा जगह है।
“उन्ह ने जोर से ताली बजाई और मुँह से ‘श...शू’ कहा, बाँह झुलाईं, फर एक गंभीर, गुस्सैल पता का यह दृश्य ही हास्यास्पद है — और
खड़े-खड़े कूदने लगे।” वे इसे बड़ी गंभीरता से कर रहे ह।
“ च ड़याँ एक-दूसरे से पूछ रही ह क यह आदमी कौन है और नाच क्य पताजी क चेष्टा को च ड़य क आँख से दखा दया गया —
रहा है?” और वहाँ से वह ‘नाच’ लगती है।
“एक बार तो झूलती लाठ माँ के सर पर लगते-लगते बची।” नशाना च ड़य पर था और खतरा माँ पर आ गया — यही
उलटफेर हँसाता है।
“तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले ह और तुम गौरैय को तारीफ़ के शब्द म उलट बात कही गई है।
बाहर नकाल रहे हो।”
“चलो, दो तनके तो नकल गए, अब बाक दो हजार भी नकल जाएँगे!” बहुत बड़ी संख्या बताकर पताजी क सफलता को नन्हा-सा
दखा दया गया।
“इतनी तकलीफ करने क क्या जरूरत थी। पंखा चला दे ते, तो ये उड़ इतनी मेहनत के बाद इतना आसान उपाय सुनना — यही
जात ।” वडंबना हँसाती है।
प्र.2 (ख) अब चुने हुए वाक्य म से कौन-कौन से वाक्य ‘व्यंग्य’ कहे जा सकते ह? उन पर सही का चह्न लगाइए।
पहचान क कसौट यह है — क्या बात सीधे कही गई है या उलट /संकेत से? और क्या उसम कसी क कमी या वडंबना
उजागर हो रही है? दोन उत्तर ‘हाँ’ ह , तभी वह व्यंग्य है।
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वाक्य व्यंग्य? कारण
“छोड़ो जी, चूह को तो नकाल नह ✓ कहा जा रहा है ‘ नकालगे’, अथ है ‘नह नकाल पाओगे’। पताजी क
पाए, अब च ड़य को नकालगे!” पछली असफलता याद दलाकर उनक कमी उजागर क गई है। पाठ
स्वयं कहता है — “माँ ने व्यंग्य से कहा।”
“तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी ✓ ‘बड़े समझदार’ प्रशंसा के शब्द ह, पर आशय उलटा है — यही व्यंग्य क
दरवाजे खुले ह और तुम गौरैय को बाहर सबसे पहचानी हुई चाल है।
नकाल रहे हो।”
“चलो, दो तनके तो नकल गए, अब ✓ ऊपर से उत्साह, भीतर से यह चढ़ाना क इस ग त से काम कभी पूरा
बाक दो हजार भी नकल जाएँगे!” नह होगा।
“इतनी तकलीफ करने क क्या जरूरत ✓ सहानुभू त के रूप म कही गई बात, पर उसका असली अथ है — तुमने
थी। पंखा चला दे ते, तो ये उड़ जात ।” बेकार म मेहनत क ।
“ च ड़याँ पूछ रही ह क यह आदमी कौन ✓ पताजी के प्रयास को ‘नाच’ कहकर उसका उपहास कया गया है —
है और नाच क्य रहा है?” और वह भी सीधे नह , च ड़य के मुँह से।
“उन्ह ने ताली बजाई… फर खड़े-खड़े ✗ (केवल हास्य) यह घटना का सीधा वणन है। इसम कोई उलट बात या संकेत नह है —
कूदने लगे।” हँसी दृश्य से आती है, कहने के ढं ग से नह ।
“शायद बूढ़ा है उसे सद बहुत लगती ✗ (हास्य + यह चूहे के मन का मीठा अनुमान है, कसी क कमी उजागर करना नह ।
है।” कल्पना)
“झूलती लाठ माँ के सर पर लगते-लगते ✗ (प र स्थ तजन्य हँसी स्थ त से पैदा हुई है, भाषा के मोड़ से नह ।
बची।” हास्य)
हास्य और व्यंग्य म अंतर: हास्य केवल हँसाता है; व्यंग्य हँसाते हुए चोट भी करता है और सोचने पर मजबूर भी।
इसी लए इस कहानी के सारे व्यंग्य माँ के मुँह से नकलते ह — वे लड़ती नह , हँसाती ह, पर उनक हर हँसी म एक
तक छपा है। पुस्तक क प रभाषा भी यही कहती है: “व्यंग्य म बात को सीधे न कहकर उलटा या संकेतात्मक ढं ग से
कहा जाता है ता क उसम चुटक लापन भी हो और गंभीर सोच क संभावना भी बनी रहे।”
आज क पहेली — पृष्ठ 27
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से आगे
पाठ से आगे पहे ली
प्र.1 नीचे द गई चत्र-पहेली म बल्ली को चूहे तक पहुँचाइए।
यह उलझी रेखाओं वाली पहेली है — पुस्तक के बाएँ नीचे कोने म बल्ली है और दाएँ ऊपर कोने म चूहा। इनके बीच बहुत-सी लक र
आपस म उलझी हुई ह, पर उनम से केवल एक ही लक र बल्ली से चलकर चूहे तक पहुँचती है। इसे अपनी पुस्तक म प सल से हल
क जए — नीचे हल करने क सबसे भरोसेमंद व ध द गई है।
हल करने क व ध:
1. चूहे क ओर से शुरू क जए। चूहे से नकलने वाली लक र एक ही है, जब क बल्ली क ओर से कई रास्ते खुलते दखते ह।
कम वकल्प वाले सरे से चलना हमेशा आसान होता है।
2. प सल क नोक लक र पर र खए और उसे बना उठाए चलाइए। उँ गली से नह — प सल से, ता क आप दे ख सक क कहाँ
तक पहुँचे।
3. हर चौराहे पर सीधे चलते र हए। इस तरह क पहेली म लक र एक-दूसरे के ऊपर से गुजरती ह, मुड़ती नह । जहाँ दो लक र
कटती दख, वहाँ अपनी वाली लक र क मोटाई और मोड़ को दे खकर उसी को आगे बढ़ाइए।
4. कोई रास्ता कनारे पर जाकर खत्म हो जाए, तो वहाँ हल्का-सा × बनाइए और चूहे पर लौटकर दूसरी लक र ली जए। एक बार
जाँची हुई लक र दुबारा मत जाँ चए।
5. जब प सल बल्ली तक पहुँच जाए, तो पूरी लक र को रंगीन प सल से गाढ़ा कर द जए — यही आपका उत्तर है।
ध्यान द जए: पहेली का हल हर ब े को अपनी पुस्तक म स्वयं ख चना है, इस लए यहाँ रेखा का चत्र नह दया
जा सकता। रास्ता एक ही है — य द आपक लक र चूहे से चलकर बल्ली तक पहुँच गई, तो वही सही रास्ता है।
यह पहेली यह क्य द गई है: पूरी कहानी म पताजी भी यही करते रहे — एक रास्ता बंद, दूसरा खुल गया; दूसरा
बंद, तीसरा खुल गया। और गौरैयाँ हर बार सही रास्ता खोज लेती थ । बल्ली और चूहे क यह पहेली उसी दौड़ का
खेल-रूप है।
झरोखे से — पृष्ठ 28
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पाठ से आगे · वश्व गौरैया दवस
पाठ से आगे पठन
प्र.1 ‘दो गौरैया’ कहानी म आपने पढ़ा क ‘दो गौरैया’ लेखक के घर म बन बुलाए अ त थ क तरह आ जाती ह।
पछले कई वष से गाँव-नगर म इन नन्ह च ड़य क संख्या नरंतर कम होती जा रही है। इस लए भारत सरकार
ने इनके संरक्षण के लए 20 माच को ‘ वश्व गौरैया दवस’ घो षत कया है। आइए, पढ़ते ह ‘ वश्व गौरैया दवस’
पर प्रेस सूचना ब्यूरो ारा प्रका शत लेख का एक अंश—
पढ़ने के बाद इस अंश क मुख्य बात ये ह —
दवस: हर साल 20 माच को वश्व गौरैया दवस मनाया जाता है, ता क इन छोटे प्रा णय के प्र त जागरूकता बढ़े और उनक
रक्षा हो सके।
स्थ त: जो घरेलू गौरैया कभी बहुतायत म पाई जाती थी, वह अब कई जगह पर “एक दुलभ दृश्य और रहस्य बन गई है”।
सांस्कृ तक महत्व: “भारत म गौरैया सफ़ पक्षी नह ह; वे साझा इ तहास और संस्कृ त का प्रतीक ह।” हद म गौरैया, त मल
म कुरुवी, उदू म च रया — कई नाम से जानी जाती ह और पी ढ़य से दै नक जीवन का हस्सा रही ह।
गौरैया के घटने के कारण (लेख के अनुसार):
कारण असर
सीसा र हत पे ोल के उपयोग से पैदा हुए वे उन क ट को नुकसान पहुँचाते ह जन पर गौरैया भोजन के लए नभर है
जहरीले यौ गक
शहरीकरण गौरैया के प्राकृ तक घ सले के स्थान छन गए
आधु नक इमारत क बनावट उनम वे कोने-छे द ही नह होते जहाँ गौरैया घ सला बना सके, इस लए ब को पालने
क जगह कम हो गई
साभार: पयावरण, वन एवं जलवायु प रवतन मंत्रालय (भारत सरकार)।
यह लेख कहानी के साथ क्य रखा गया है: कहानी म पताजी दरवाज के नीचे कपड़े ठूँ सते ह और रोशनदान का
टू टा शीशा बंद कर दे ते ह — यानी वे गौरैय के रास्ते बंद कर दे ते ह। लेख बताता है क आज पूरे दे श म यही हो रहा
है, पर अनजाने म: नई इमारत म रोशनदान, छ े और दरार ही नह बचे। कहानी एक घर क बात करती है, लेख
पूरे शहर क — और दोन का नष्कष एक ही है: जगह न बचे, तो पक्षी भी नह बचते।
Check it yourself: अपने घर के आस-पास ग नए क सुबह कतनी गौरैयाँ दखती ह। फर घर के कसी बड़े
से पू छए क उनके बचपन म कतनी दखती थ । यह छोटा-सा सवक्षण लेख क बात को आँकड़ से भी अच्छा
समझा दे गा।
साझी समझ — पृष्ठ 28
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया
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पाठ से आगे
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पाठ से आगे चचा
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a s emद गई इंटरनेट कड़ी का प्रयोग कर इस लेख को पूरा प ढ़ए और कक्षा म चचा क जए।
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नीचे
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पुस्तक म द गई कड़ी (या QR कोड) से प्रेस सूचना ब्यूरो काm .
s e पूरा लेख प ढ़ए, फर कक्षा म इस क्रम से चचा क जए।
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चचा के लए तैयारी: पढ़ते समय तीन बात अलग-अलग
gla नोट क जए — (1) तथ्य और आँकड़े, (2) गौरैया घटने के कारण, (3)
सुझाए गए उपाय।
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चचा के प्रश्न:
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1. क्या हमारे मोहल्ले म भी गौरैयाँ पहले से कम हुई ह? कसने क्या दे खा?
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2. हमारे घरcक बनावट म गौरैया कहाँ घ सला बना सकती है? क्या ऐसी कोई जगह बची है? g
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वe ालय म हम क्या कर सकते ह — दाना-पानी के बतन, घ सला-बक्से, पेड़-पौधे, क टनाशक का कम प्रयोग?
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agl4. 20 माच को हम कक्षा म क्या आयो जत कर सकते ह — पोस्टर, नुक्कड़ नाटक, या इसी कहानी का मंचन?
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चचा का प रणाम एक काम म बद लए: बातचीत के अंत म कक्षा मलकर तीन काम तय करे और उन्ह चाट पर
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लखकर टाँग दे — जैसे “हर कक्षा क खड़क पर पानी का एक कटोरा”, “ व ालय के पेड़ पर पाँच घ सला-
परgप्रदशनी”।
बक्से”, “20 माच को गौरैया दवस a ‘साझी समझ’ का अथ ही यह है क समझ अकेले क न रहे,
सबक बने — और फर काम म उतरे।
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के लए — मत्रलाभ (पंचतंत्र से) — पृष्ठ 29–35
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पढ़ने के लए प रयोजना
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प्र.1 अभी आपने जो कहानी पढ़ वह पंचतंत्र से ली गई है। पंचतंत्र हमारे दे श क ऐसी अ त पुस्तक है जो आज भी
वश्व म मनोरंजन और नै तक ान प्राप्त करने के उ े श्य से पढ़ -पढ़ाई जाती है। अपने पुस्तकालय म से पंचतंत्र
क कहा नय क पुस्तक खोजकर प ढ़ए और इसक कोई एक कहानी कक्षा म सुनाइए।
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यह.cग त व ध दो हस्स क है — पढ़ना और सुनाना। नीचे पहले ‘ मत्रलाभ’ का सार
a gदया गया है (ता क आप उसे आदश मानकर
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se अपनी कहानी तैयार कर सक), फर सुनाने क व ध।
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‘ मत्रलाभ’ का सार: म हलारोप्य नगर के एक वशाल वटवृक्ष पर लघुपतनक नाम का कौआ रहता था। एक दन उसने एक व्याध
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(बहे लये) को आते दे खा और सब प क्षय को चेता दया क उसके बखेरे दाने कालकूट ( वष) क तरह समझना। पक्षी मान गए, पर
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कबूतर का राजा चत्रग्रीव अपने हजार सा थय स हत लोभ म आकर जाल म फँस गया — “लोभ से ववेकश क्त नष्ट हो जाती
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है।”
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चत्रग्रीव ने घबराने के बजाय बु द्ध से काम लया: सब कबूतर एकजुट होकर जाल समेत उड़ गए। फर वे अपने मत्र हरण्यक चूहे
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कक्षा 8 हद अध्याय 2 दो गौरैया AglaSem · NCERT Solutions
के पास पहुँचे। हरण्यक पहले चत्रग्रीव के बंधन काटने लगा, पर चत्रग्रीव ने कहा — “पहले मेरे सा थय के बंधन काट दो… मेरा
धम है क पहले इनक सुख-सु वधा को दृ ष्ट म रखूँ।” यह दे खकर लघुपतनक हरण्यक पर मुग्ध हो गया और उससे मत्रता माँगी।
हरण्यक ने पहले मना कया — “तुम भोक्ता हो, म तुम्हारा भोजन ँ” — पर कौए के अनुरोध और शपथ के बाद मैत्री हो गई।
आगे अकाल पड़ने पर दोन द क्षण दशा के तालाब पर मन्थरक कछु ए के पास चले गए। वहाँ व्याध से भागकर आया चत्रांग हरन
भी उनका मत्र बन गया। एक दन चत्रांग जाल म फँस गया; हरण्यक ने जाल काट दया, पर तभी मन्थरक को व्याध ने पकड़
लया। तब कौए ने उपाय सोचा — चत्रांग मरा हुआ बनकर लेट गया, कौआ उसे च च मारने लगा, और जैसे ही व्याध कछु ए को
जमीन पर रखकर हरन क ओर बढ़ा, हरण्यक ने मन्थरक के बंधन काट दए। चार बच नकले।
सीख: “ मत्रता म बड़ी श क्त है। हम अपने मत्र क सहायता के लए सदै व तत्पर रहना चा हए।”
पात्र कौन कस गुण से मदद करता है
लघुपतनक कौआ दूर तक दे खने क क्षमता, सूझ-बूझ, उपाय सोचना
चत्रग्रीव कबूतर का राजा संकट म धैय और सा थय को पहले रखने का नेतृत्व
हरण्यक चूहा तीखे दाँत — जाल काटना; और सतकता
मन्थरक कछु आ सलाह दे ना और मत्र के लए स्वयं जो खम उठाना
चत्रांग हरन तेज दौड़ और अंत म मरा हुआ बनकर व्याध को भरमाना
कक्षा म कहानी कैसे सुनाएँ:
1. चुनाव: पुस्तकालय से पंचतंत्र ली जए और ऐसी कहानी चु नए जो 4–5 मनट म पूरी हो सके — जैसे ‘शेर और खरगोश’, ‘बंदर
और मगरमच्छ’, ‘एकता म बल’ (कबूतर और जाल), ‘नीले सयार क कथा’।
2. ढाँचा याद क जए, शब्द नह : कहानी को चार टु कड़ म बाँ टए — पात्र-प रचय, समस्या, उपाय, प रणाम और सीख। र ा
मारने से कहानी सुनाना क ठन हो जाता है, ढाँचा याद रहने से आसान।
3. संवाद बो लए: पंचतंत्र क जान उसके संवाद ह। हर पात्र के लए स्वर थोड़ा बद लए — कौए क आवाज तेज, कछु ए क
धीमी।
4. सीख अंत म, एक वाक्य म: उपदे श लंबा न क जए। पंचतंत्र स्वयं यही करता है — “लोभ से ववेकश क्त नष्ट हो जाती है।”
Did you know? पंचतंत्र क रचना वष्णु शमा ने क मानी जाती है और यह संसार क सबसे अ धक अनू दत
पुस्तक म से एक है — अरबी, फ़ारसी, ग्रीक, ला तन होते हुए यह यूरोप तक पहुँची। यानी जो कहानी आपने अभी
पढ़ , वह सैकड़ वष से और दजन भाषाओं म सुनाई जा रही है।
‘दो गौरैया’ के साथ यह कथा क्य : दोन म पशु-पक्षी मनुष्य क तरह सोचते और बोलते ह। पर अंतर भी दे खए
— पंचतंत्र म जानवर सीख दे ने के लए मनुष्य जैसे बनाए गए ह, जब क ‘दो गौरैया’ म गौरैयाँ पूरी तरह गौरैयाँ ही
रहती ह; वहाँ मनुष्य ही उनसे कुछ सीखता है। एक कथा उपदे श दे ती है, दूसरी दृश्य दखाकर छोड़ दे ती है।
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अध्याय — एक नज़र म
दो गौरैया भीष्म साहनी क एक कहानी है, जसे घर का बेटा प्रथम पुरुष (‘म’) म सुनाता है। पुस्तक क अनुक्रम णका म इसे
‘कहानी’ कहा गया है और लेखक का नाम पाठ के अंत म तथा ‘लेखक से प रचय’ म दया गया है — भीष्म साहनी (1915–
2003)।
घर म तीन ही व्य क्त ह — माँ, पताजी और ‘म’। पर पताजी कहते ह क यह घर सराय बना हुआ है, क्य क आम के पेड़
के पक्षी, चूहे, बल्ली, चमगादड़, कबूतर, छपक लयाँ और च टयाँ — सब उसी घर के ‘असली मा लक’ बने हुए ह।
एक दन दो गौरैयाँ बना पूछे अंदर आकर मकान का ‘ नरीक्षण’ करती ह और दो दन बाद बैठक क छत म लगे पंखे के गोले
म घ सला बना लेती ह। यह से पताजी और गौरैय क लंबी लड़ाई शुरू होती है।
पताजी ताली बजाते ह, ‘श...शू’ करते ह, कूदते ह, लाठ घुमाते ह, दरवाज के नीचे कपड़े ठूँ सते ह, टू टे शीशे वाला रोशनदान
बंद करते ह — और गौरैयाँ हर बार लौट आती ह। माँ इस पूरे संघष पर व्यंग्य करती हुई हँसती रहती ह।
अंत म पताजी स्टू ल पर चढ़कर घ सला ही नोचने लगते ह — ‘ कसी को सचमुच बाहर नकालना हो, तो उसका घर तोड़ दे ना
चा हए।’ तभी ऊपर से ‘च -च ’ सुनाई दे ती है — घ सले म दो नन्ह गौरैयाँ नकल आई ह। पताजी के हाथ ठठक जाते ह।
कहानी का अंत बना कसी उपदे श के होता है — पताजी लाठ एक ओर रख दे ते ह, माँ सभी दरवाजे खोल दे ती ह, और शोर
फर शुरू होने पर पताजी केवल मुसकराते रहते ह। यही एक वाक्य पूरे दृ ष्टकोण-प रवतन को कह दे ता है।
पाठ भाषा क तीन बात सखाता है — क्रया वशेषण (कोई काम कैसे हुआ — खल खलाकर, झड़ककर, गंभीरता से),
मात्रा के हेर-फेर से अथ-प रवतन (नाच–नाचा–नचा, चूक–चुक) और व्यंग्य (बात सीधे न कहकर उलटे या संकेत से
कहना)।
पाठ के साथ ‘झरोखे से’ म वश्व गौरैया दवस (20 माच) पर प्रेस सूचना ब्यूरो के लेख का अंश है, और ‘पढ़ने के लए’ म
पंचतंत्र क कथा मत्रलाभ — कौआ, चूहा, कछु आ और हरन क मत्रता क कहानी।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ पाठ क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
सराय याि यों के ठहरने की जगह, जहाँ लोग “ पताजी कहते ह क यह घर सराय बना हुआ रेल छू टने तक हम सराय म ठहरे
आते-जाते रहते है ं है।” रहे।
डेरा डालना िकसी जगह जमकर बैठ जाना, अस्थायी “तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते ह।” बारात तीन दन धमशाला म डेरा
िठकाना बनाना डाले रही।
धमा- उछल-कू द और शोर-शराबा “वह धमा-चौकड़ी मचती है क हम लोग ठ क छु के दन ब क धमा-चौकड़ी
चौकड़ी तरह से सो भी नह पाते।” सुबह से शुरू हो जाती है।
अँगीठ कोयला जलाकर से ंक ने-पकाने का छोटा “एक चूहा अँगीठ के पीछे बैठना पसंद करता स दय म दाद अँगीठ के पास
चू ा है।” बैठकर कहानी सुनाती थ ।
रोशनदान दीवार में ऊपर की ओर बना हवा-रोशनी “अबक बार वे रोशनदान म से आ गई थ रोशनदान से आती धूप कमरे म
का छोटा झरोखा जसका एक शीशा टू टा हुआ था।” एक चौकोर बना रही थी।
नरीक्षण ध्यान से दे ख-परखकर जाँच करना “मकान का नरीक्षण कर रही ह क उनके रहने अ धकारी ने व ालय के भवन का
योग्य है या नह ।” नरीक्षण कया।
व्यंग्य हँस ी-मज़ाक या उपहास के माध्यम से “छोड़ो जी, चूह को तो नकाल नह पाए, अब उसक बात सीधी लगती है, पर
िकसी कमी या िवडंबना को उजागर च ड़य को नकालगे!” माँ ने व्यंग्य से कहा। उसम गहरा व्यंग्य छपा रहता है।
करना
थगली कपड़े का छोटा टुक ड़ा, पैबंद “सूखी घास और रुई के फाहे और धागे और पुरानी रजाई पर जगह-जगह
थग लयाँ लाठ के सरे पर लपटने लग ।” थग लयाँ लगी थ ।
चुगा पि यों का दाना-भोजन “उनक नन्ह -नन्ह च च म चुगा डालने लगे।” गौरैया दन-भर ब के लए चुगा
जुटाती रही।
अवाक् चिकत होकर बोलती बंद हो जाना “म अवाक् उनक ओर दे खता रहा।” प रणाम सुनकर वह कुछ दे र
अवाक् खड़ा रह गया।
सहनशीलता सहने की शि त, धै य “जब उनक सहनशीलता चुक गई तो वह कहने शक्षक क सहनशीलता ही कक्षा
लगे…” को सँभाले रखती है।
गुमसुम चुपचाप, िबना बोले , उदास “दोन गौरैयाँ बाहर द वार पर गुमसुम बैठ हार के बाद पूरी ट म गुमसुम बैठ
थ ।” थी।
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