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NCERT Solutions Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार

AglaSem पर कक्षा 8 हिंदी पाठ 4 हरिद्वार (मल्हार) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 8 Hindi Chapter 4 (Malhar).
NCERT Solutions Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार - Page 1 of 49

About NCERT Solutions Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार

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Frequently Asked Questions

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NCERT Solutions Class 8 Hindi Chapter 4 हरिद्वार – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा8

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 4: ह र ार

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — मल्हार

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

45 – 62 24 51 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 48 pages

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 8 · हद · मल्हार

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 4: ह र ार
NCERT कक्षा 8 हद क पाठ्यपुस्तक मल्हार के पाठ 4 ह र ार के सभी प्रश्न के पूरे हल। यह भारतदु ह रश्चंद्र (1850–1885) का लखा एक
यात्रा-वृत्तांत है, जो पत्र के रूप म क ववचन सुधा प त्रका म 14 अक्टू बर सन् 1871 ई. को छपा था। इसक हद आज क हद से लगभग 150 वष
पुरानी है, इस लए यहाँ हर उत्तर के साथ पुराने शब्द का अथ और लेखक क चत्र ख चने वाली शैली भी समझाई गई है। पृष्ठ 45 से 62 तक क हर
ग त व ध — मेरी समझ से, मलकर कर मलान, मलकर कर चयन, पं क्तय पर चचा, सोच- वचार के लए, अनुमान और कल्पना से, लख संवाद,
‘है’ और ‘ह’ का उपयोग, भाव क पहचान, काल क पहचान, पत्र क रचना, पत्र, शब्द से जुड़े शब्द, लेखन के अनोखे तरीके, आपक बात, प्रकृ त का
स दय और संरक्षण, स्वास्थ्य और योग, सज्जन वृक्ष, अपने शब्द, यात्रा के व्यय क गणना, यात्रा सबके लए, आज क पहेली, झरोखे से और खोजबीन
के लए — शीषक-दर-शीषक हल क गई है।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

मल्हार (कक्षा 8) 45 – 62

खं ड प्रश्न

24 51

माध्यम

हन्द

मेरी समझ से — पृष्ठ 49–50
पाठ से

पाठ से

प्र.1 ★
(क) नम्न ल खत प्रश्न के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा ( ) बनाइए। कुछ प्रश्न के एक से अ धक उत्तर भी हो
सकते ह। 1. “सज्जन ऐसे क पत्थर मारने से फल दे ते ह” का क्या अथ है? • लेखक के अनुसार सज्जन लोग
बना पूछे स्वा दष्ट रसीले फल दे ते ह। • लेखक फलदार वृक्ष क उदारता को मानवीय रूप म व्यक्त कर रहे ह। •
लेखक का मानना था क ह र ार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे। • लेखक को पत्थर मारकर पके हुए फल
तोड़कर खाना पसंद था।

सही उत्तर — लेखक फलदार वृक्ष क उदारता को मानवीय रूप म व्यक्त कर रहे ह। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।

प्रमाण पाठ से ही: यह वाक्य पत्र म वृक्ष वाले अनुच्छेद के बीच आया है — “फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल,
बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक क जले पर भी कोयले और राख से लोग का मनोरथ पूण करते ह। सज्जन ऐसे क
पत्थर मारने से फल दे ते ह।” यानी ‘सज्जन’ यहाँ वृक्ष ह। पुस्तक स्वयं आगे ‘काल क पहचान’ म इसी वाक्य को इस
रूप म लखती है — “वृक्ष ऐसे ह क पत्थर मारने से फल दे ते ह।” इससे संदेह ही नह बचता।

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

वकल्प सही / कारण
गलत

सज्जन लोग बना पूछे रसीले फल गलत वाक्य का वषय मनुष्य नह , वृक्ष ह। ‘पत्थर मारने’ क बात मनुष्य पर लागू ही नह
दे ते ह होती।

फलदार वृक्षों की उदारता को सही ★ वृक्ष पर पत्थर मारो तो भी वह बदले म फल ही दे ता है — यही सज्जन का स्वभाव है।
मानवीय रूप में व्यक्त करना नज व वृक्ष को सज्जन मनुष्य का गुण दे ना मानवीकरण कहलाता है।

ह र ार के सभी दुकानदार सज्जन गलत दुकानदार क चचा बहुत बाद म आती है — “पंडे दुकानदार इत्या द कनखल व
थे ज्वालापुर से आते ह।” इस वाक्य से उसका कोई संबंध नह ।

लेखक को पत्थर मारकर फल गलत यह वाक्य का शब्दशः, सतही अथ है। पूरा अनुच्छेद वृक्ष क परोपकार-वृ त्त क प्रशंसा
तोड़ना पसंद था कर रहा है, लेखक क आदत नह बता रहा।

ध्यान द: पुराने वाक्य म क्रया का कता अक्सर छू ट जाता है। ऐसे वाक्य का अथ अकेले वाक्य से नह , उससे पहले-
बाद क पं क्तय से नकालना चा हए।

प्र.2 2. “वैराग्य और भ क्त का उदय होता था” इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है? • शारी रक
थकान और मान सक बेचैनी • आ थक संतोष और मान सक वकास • मान सक शां त और आध्या त्मक अनुभव
• सामा जक स ाव और पा रवा रक प्रेम

सही उत्तर — मान सक शां त और आध्या त्मक अनुभव। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।
पूरी पं क्त इस प्रकार है — “ चत्त म बारंबार ान, वैराग्य और भ क्त का उदय होता था। झगड़े-लड़ाई का कह नाम भी नह था।”
तीन शब्द — ान, वैराग्य, भ क्त — मन क अव ाएँ ह, शरीर या धन क नह ।

क्य : ‘वैराग्य’ का अथ है सांसा रक वस्तुओं से मन का हट जाना और ‘भ क्त’ का अथ है ईश्वर क ओर मन का लग
जाना। जस मन म ये दोन बार-बार उठ रहे ह , वह मन न थका हुआ है, न बेचैन — वह शांत है। और यह शां त
कसी सामा जक या पा रवा रक कारण से नह , तीथ के वातावरण से आई है, इस लए इसे आध्या त्मक कहा
जाएगा।

शारी रक थकान और मान सक बेचैनी — इसका उलटा सच है; लेखक कहते ह “ जतना समय बीता, बड़े आनंद से बीता।”
आ थक संतोष — पत्र म धन-कमाई क कोई बात ही नह है।
सामा जक स ाव और पा रवा रक प्रेम — “झगड़े-लड़ाई का नाम नह था” से स ाव झलकता तो है, पर वाक्य का मुख्य
भाव वह नह है; ‘वैराग्य’ और ‘भ क्त’ शब्द सीधे आध्या त्मक अनुभव क ओर ले जाते ह।

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

प्र.3 3. “पत्थर पर का भोजन का सुख सोने क थाल से बढ़कर था” इस वाक्य का सवा धक उपयुक्त नष्कष क्या है?
• संतु ष्ट म सुख होता है। • सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते ह। • लेखक के पास सोने क थाली नह थी। • पत्थर
पर रखा भोजन अ धक स्वा दष्ट होता है।

सही उत्तर — संतु ष्ट म सुख होता है। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।
लेखक तुलना कन दो चीज क कर रहे ह, यह पक ड़ए —

एक ओर — गंगा तट , पत्थर की थाली, पास आते ठं डे छी ंटे

दू सरी ओर — सोने की थाल

िवजेत ा — पत्थर वाला भोजन

िन ष्कष : स ुख थ ाली की कीमत से नही,ं खाने वाले के मन की त ृिप्त से बनता है।

क्य यही नष्कष: ‘सोने क थाल’ यहाँ केवल एक बतन नह , अमीरी और ठाट का प्रतीक है। लेखक कह रहे ह
क जस क्षण मन भरा हुआ था, उस क्षण सबसे सादा प्रबंध भी सबसे बड़े ठाट से आगे नकल गया — यानी सुख
का असली ोत संतोष है। यही बात पत्र म पंड के बारे म भी कही गई है — “एक पैसे को लाख करके मान लेते
ह।”

“सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते ह” — यह उलट बात है, ऐसा कोई नयम पत्र नह बनाता।
“लेखक के पास सोने क थाली नह थी” — तुलना बतन क उपलब्धता क नह , अनुभव क है।
“पत्थर पर रखा भोजन अ धक स्वा दष्ट होता है” — स्वाद पत्थर से नह , वातावरण और मन से बढ़ा था।

प्र.4 4. “एक दन मने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत नकट परोसकर भोजन कया।”
यह प्रसंग कस मूल्य को बढ़ावा दे ता है? • अंध व ास और लालच • मानवता और दे शप्रेम • सादगी और
आत्म नभरता • स्वच्छता और प्रकृ त प्रेम

इस प्रश्न के दो उत्तर पर तारा (★) बनाया जा सकता है — मुख्य रूप से सादगी और आत्म नभरता, और उसके साथ स्वच्छता
और प्रकृ त प्रेम।

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार
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वाक्य का अंश वह कौन-सा मूल्य दखाता है

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“मैंने… रसोई करके ” m laर sनही,ं भोजन स्वयं बनाया।
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आत्मिनभरता — िकसी नौकर या दुक ान पर िनभ

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“पत्थरaही
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a g l पर … परोसकर” सादगी — थाली-आसन का आडंबर नही,ं जो सामने था वही मेज भी और
थाली भी।

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“जल के अत्यंत िनकट”, “जल के छलके पास ही ठं ढे-ठं ढे पेम — ले खक ने पकृ ित से दू र नही,ं उसके बीच बैठकर खाया।
आते थे”
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बाक दो क्य नह : ‘अंध वश्वास और लालच’ का इस प्रसंग म कोई चह्न नह — न कोई कमकांड है, न पाने क
इच्छा। ‘मानवता और दे शप्रेम’ भारतदु के दूसरे लेखन का बड़ा स्वर है, पर इस वाक्य म कसी दूसरे मनुष्य या दे श
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क बात ही नह है, केवल लेखक, पत्थर और गंगा ह।
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a s emद: प्रश्न-पत्र म ऐसा प्रश्न आए तो पहले सादगी और आत्म नभरता ल खए और फर एक पं क्त म दूसरा
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ध्यान
a वकल्प जोड़कर कारण दे द जए — पुस्तक स्वयं कहती है क एक से अ धक उत्तर हो सकते ह।

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5. लेखक का ह र ार अनुभव मुख्यतः कस प्रकार का था? • राजनी तक • आध्या त्मक • सामा जक • प्राकृ तक

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m (★) बनाइए।
प्रश्न म ‘मुख्यतः’ शब्द है, इस लए सबसे उपयुक्त उत्तर एक ही है — आध्या त्मक। इसी के सामनेeतारा
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co भारी पं क्तयाँ सब मन क अव ा क ह —
पत्र क .सबसे gl a
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agl “जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है”
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“मेरा तो चत्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और नमल हुआ क वणन के बाहर है”

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“म चत्त से तो अब तक वह नवास करता ँ” .co g
“ चत्त म बारंबार ान, वैराग्य और भ क्त का उदय होता था”

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प्राकृ तक क्य नह (और आधा agक्य है): पत्र म प्रकृ त का वणन बहुत है — पवत, वल्ली, वृक्ष, पक्षी, ह रयाली,

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गंगा। पर ध्यान द जए क लेखक हर प्राकृ तक दृश्य को अंत म मन क प वत्रता से जोड़ दे ते ह — वृक्ष ‘तपस्या’
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करते ह, घास तक ‘पुण्यभू म’ का प्रमाण बन जाती है। यानी प्रकृ त यहाँ साधन है और आध्या त्मक अनुभव लक्ष्य।

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इस लए ‘प्राकृ तक’ पर भी तारा बनाइए तो उसे दूसरे क्रम पर र खए, और यह कारण ल खए।
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emराजनी तक और सामा जक उत्तर नह बनते — इस पत्र म न शासन क चचा है, न समाज-सुधार क । (भारतदु क दूसरी रचनाओं
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agl म ये स्वर ह, इस पत्र म नह ।)
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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

प्र.6 6. पत्र क भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है? • क ठन शब्द का प्रयोग और बो झलता • मुहावर का अ धक
प्रयोग • सरलता और चत्रात्मकता • ज टलता और सं क्षप्तता

सही उत्तर — सरलता और चत्रात्मकता। इसी के सामने तारा (★) बनाइए।
चत्रात्मकता का अथ है — पढ़ते ही आँख के सामने चत्र बन जाना। नमूने दे खए —

पं क्त आँख के सामने क्या बनता है

“बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े है ं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते है”ं एक पैर पर खड़ ा तपस्वी — और उसी मुद ा में खड़ ा पेड़

“मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है” ठं डा-मीठा शरबत, जो जमकर बफ बन गया हो

“मानो हरे गलीचा की जाित्रयों के िवश्राम के हेत ु िबछायत िबछी थी” दू र तक िबछा हुआ हरा कालीन

बाक वकल्प क्य नह : कुछ शब्द आज हम क ठन लगते ह (वल्ली, मष्ट, ब धक, नदान), पर वे उस समय क
सामान्य हद थे — भाषा जान-बूझकर बो झल नह बनाई गई। मुहावरे इसम बहुत कम ह; इसक श क्त मुहावर म
नह , उपमाओं म है। और यह पत्र सं क्षप्त भी नह — वणन खुलकर, वस्तार से कया गया है।

प्र.7 (ख) हो सकता है क आपके समूह के सा थय ने अलग-अलग उत्तर चुने ह । अपने मत्र के साथ चचा क जए
क आपने ये उत्तर ही क्य चुने?

यह चचा का प्रश्न है — इसका ‘एक’ उत्तर नह , चचा करने का तरीका होता है। नीचे वह तरीका और एक नमूना चचा द गई है।
चचा कैसे क जए

1. हर साथी पहले अपना चुना हुआ वकल्प बताए — बना कारण।
2. फर हर कोई पाठ म से एक पं क्त ढूँ ढ़कर पढ़े , जो उसके उत्तर को सही ठहराती हो। बना पं क्त के तक नह माना जाएगा —
यही इस ग त व ध का नयम र खए।
3. जहाँ दो अलग उत्तर ह , वहाँ दे खए क दोन क पं क्तयाँ कह एक-दूसरे को काट तो नह रह । अगर नह काट रह , तो दोन
उत्तर सही हो सकते ह।
4. अंत म ल खए — “हम सहमत हुए क…” और “हम असहमत रहे क्य क…”।

नमूना उत्तर: हमारे समूह म प्रश्न 5 पर मतभेद हुआ। तीन सा थय ने ‘आध्या त्मक’ चुना और दो ने ‘प्राकृ तक’। ‘आध्या त्मक’ वाल
ने पं क्त द — “मेरा तो चत्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और नमल हुआ क वणन के बाहर है।” ‘प्राकृ तक’ वाल ने पं क्त द —
“यह भू म तीन ओर सुंदर हरे-हरे पवत से घरी है।” चचा के बाद हम इस नष्कष पर पहुँचे क दोन पं क्तयाँ सच ह, पर लेखक ने
प्रकृ त का वणन भी अंत म मन क प वत्रता सद्ध करने के लए कया है — जैसे “यहाँ क घास भी ऐसी सुगंधमय है” कहकर वे
भू म को ‘पुण्यभू म’ सद्ध करते ह। इस लए हमने ‘आध्या त्मक’ को पहला और ‘प्राकृ तक’ को दूसरा उत्तर माना।

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

Tip: ऐसे प्रश्न म अंक इस बात के मलते ह क आपने अपने उत्तर के लए पाठ से प्रमाण दया या नह — केवल
“मुझे यही ठ क लगा” लखने से बात नह बनती।

मलकर कर मलान — पृष्ठ 50
पाठ से

पाठ से मलान

प्र.1 पाठ से चुनकर कुछ शब्द नीचे दए गए ह। आपस म चचा क जए और इनके उपयुक्त संदभ से इनका मलान
क जए— शब्द — 1. ह र ार 2. गंगा 3. भगीरथ 4. च ण्डका 5. भागवत 6. दालचीनी संदभ — 1. मान्यताओं के
अनुसार दुगा का एक रूप। 2. यह अठारह पुराण म से सवप्र सद्ध एक पुराण है। इसम अ धकांश श्री कृष्ण संबंधी
कथाएँ ह। 3. यह भारत के उत्तराखंड राज्य म त एक प्र सद्ध तीथ ान है। यहाँ से गंगा पहाड़ को छोड़कर
मैदान म आती है। 4. यह एक पेड़ का नाम है। यह द क्षण भारत म बहुतायत से मलता है। इस पेड़ क सुगं धत
छाल दवा और मसाले के काम म आती है। इसे दारचीनी भी कहते ह। 5. यह भारतवष क एक प्रधान नद है जो
हमालय से नकलकर लगभग 1560 मील पूव क ओर बहकर बंगाल क खाड़ी म गरती है। इसके अनेक नाम ह,
जैसे— भागीरथी, त्रपथगा, अलकनंदा, मंदा कनी, सुरनद आ द। 6. ये अयोध्या के प्र सद्ध सूयवंशी राजा थे।
कहा जाता है क ये घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। इसी लए गंगा का एक नाम ‘भागीरथी’ भी है।

सही मलान इस प्रकार है —

क्रम शब्द सही पहचानने क कुंजी
संदभ

1. हिर ार 3 उत्तराखंड का तीथ, जहाँ गंगा पहाड़ छोड़कर मैदान म उतरती है — इसी लए पाठ म गंगा का “पाट
भी बहुत छोटा है पर वेग बड़ा है।”

2. गंग ा 5 एकमात्र संदभ जसम ‘नद ’ शब्द है और भागीरथी, अलकनंदा, मंदा कनी जैसे नाम गनाए गए ह।

3. भगीरथ 6 ‘राजा’ शब्द केवल इसी संदभ म है। पाठ क पं क्त भी यही जोड़ती है — “जो राजा भगीरथ के
उज्ज्वल क त क लता-सी दखाई दे ती है।”

4. चिण्डका 1 दे वी का नाम है, इस लए दुगा के रूप वाला संदभ। पाठ म — “उसके शषर पर च ण्डका दे वी क मू त
है।”

5. भागवत 2 ग्रंथ का नाम है, इस लए पुराण वाला संदभ। पाठ म — “ दन म श्री भागवत का पारायण भी कया।”

6. दालचीनी 4 पेड़ और मसाले वाला संदभ। पाठ म — “यहाँ क कुशा… जसम से दालचीनी, जा वत्री इत्या द क
अच्छ सुगंध आती है।”

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

मलान का सूत्र: पहले हर संदभ म श्रेणी बताने वाला शब्द ढूँ ढ़ए — ‘नद ’, ‘राजा’, ‘पुराण’, ‘पेड़’, ‘तीथ ान’,
‘दुगा का रूप’। फर वही श्रेणी बाईं ओर के शब्द से जो ड़ए। पूरा संदभ पढ़ने क जरूरत ही नह पड़ती — यह
तरीका कसी भी मलान-प्रश्न म काम आता है।

क्या आप जानते ह? ‘भगीरथ’ के नाम से ही मुहावरा बना है — भगीरथ प्रयत्न, अथात् बहुत बड़ा और लंबा
प रश्रम। जैसे — “गाँव तक सड़क लाने म सरपंच को भगीरथ प्रयत्न करना पड़ा।”

मलकर कर चयन — पृष्ठ 51
पाठ से

पाठ से चयन

प्र.1 (क) पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दए गए ह। प्रत्येक वाक्य के सामने दो-दो नष्कष दए गए ह— एक सही
और एक ामक। अपने समूह म इन पर वचार क जए और उपयुक्त नष्कष पर सही का चह्न लगाइए। 1. पवत
पर अनेक प्रकार क वल्ली हरी-भरी सज्जन के शुभ मनोरथ क भाँ त फैलकर लहलहा रही है। 2. बड़े-बड़े वृक्ष
भी ऐसे खड़े ह मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते ह और साधुओं क भाँ त घाम, ओस और वषा अपने ऊपर
सहते ह। 3. इन वृक्ष पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते ह और नगर के दुष्ट ब धक से नडर होकर कल्लोल करते
ह। 4. जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ म जमाया है। 5. एक
दन मने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत नकट परोसकर भोजन कया। 6. नश्चय
है क आप इस पत्र को ानदान द जएगा।

छह वाक्य के सही नष्कष और यह भी क दूसरा नष्कष क्य भ्रामक है —

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

क्रम सही नष्कष ( ) ✓ दूसरा नष्कष ामक क्य है

1. लताओं का फै लना स ज्जनों की दूसरा नष्कष तुलना को उलट दे ता है। लेखक लताओं क बात कर रहे ह और सज्जन के
शुभ इच्छाओं की तरह सौम्यता और मनोरथ केवल उपमान ह — यानी जससे तुलना क गई। “सज्जन क शुभ इच्छाएँ लताओं
सुंद रता को दश ता है। के समान फैल जाती ह” कहने पर वषय बदलकर सज्जन हो जाते ह, जो वाक्य म है ही नह ।

2. वक्षृ ों की िस्थित साधुओं जैस ी है जो दूसरे म ‘ ववश ह’ शब्द है — यही गड़बड़ है। साधु मौसम सहने को मजबूर नह होता, वह
हर मौसम को सहते हुए तपस्या स्वेच्छा से सहता है; इसी को तपस्या कहते ह। ‘ ववश’ कहते ही प्रशंसा दया म बदल जाती है
करते है।ं और लेखक का भाव नष्ट हो जाता है।

3. यहाँ के पक्षी पकृ ित में सुरिक्षत दूसरा कहता है क पक्षी डरकर यहाँ आए ह — पर वाक्य म शब्द ‘ नडर’ है। वे नगर के
अनुभव करते है,ं इसिलए वे िनडर ब धक ( शका रय ) से डरकर नह भागे, ब ल्क यहाँ उनका डर ही समाप्त हो गया है। ह र ार
होकर क ल्लोल करते है।ं क वशेषता बताना यहाँ लेखक का उ े श्य है।

4. गंगाजल की ठं डक और िमठास दूसरा नष्कष कल्पना को तथ्य समझ लेता है। “मानो चीनी के पने को बरफ म जमाया है”
का अनुभव बहुत मनोहारी है। एक कल्पना है (मानो = जैसे); इसका अथ यह नह क गंगाजल से सचमुच शक्कर और बफ
बनाई जा सकती है।

5. ले खक ने गंगा के समीप बैठकर दूसरा नष्कष पाठ से टकराता है — पाठ कहता है “जल यहाँ का अत्यंत शीतल है” और
भोजन िकया, िजससे उनकी “जल के छलके पास ही ठं ढे -ठं ढे आते थे।” गंगा का पानी गरम था, यह पाठ के वरुद्ध है।
पकृ ित से िनकटता झलकती है।

6. ले खक चाहता है िक पत्र को महत्व दूसरा ‘ ानदान’ का शब्दशः अथ ‘कह जगह दे ना’ लगा लेता है। पर पत्र संपादक को लखा
दे क र पकािशत िकया जाए। गया है, इस लए यहाँ ‘ ान’ का अथ है — प त्रका के पन्न म जगह, अथात् छापना।

इन छह म एक ही जाल है: भ्रामक नष्कष हर बार या तो तुलना को उलट दे ता है, या ‘मानो/जैसे’ क कल्पना को
सचाई मान लेता है, या एक शब्द ( नडर, ववश, ानदान) का अथ बदल दे ता है। इस लए ऐसा प्रश्न हल करते समय
वाक्य का मुख्य कता और एक-एक शब्द दोन जाँ चए।

पं क्तय पर चचा — पृष्ठ 52
पाठ से

पाठ से

प्र.1 पाठ से चुनकर कुछ पं क्तयाँ नीचे द गई ह। इन्ह ध्यानपूवक प ढ़ए और इन पर वचार क जए। आपको इनका
क्या अथ समझ म आया? अपने वचार अपने समूह म साझा क जए और ल खए। (क) “यहाँ क कुशा सबसे
वलक्षण होती है जसम से दालचीनी, जा वत्री इत्या द क अच्छ सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है
क यह ऐसी पुण्यभू म है क यहाँ क घास भी ऐसी सुगंधमय है।”

सीधा अथ: ह र ार क कुशा (पूजा म काम आने वाली घास) असाधारण होती है — उसम से दालचीनी और जा वत्री जैसे मसाल
क सुगंध आती है। लेखक कहते ह क यह सुगंध ही आँख के सामने यह बात सद्ध कर दे ती है क यह भू म प वत्र है, क्य क जहाँ
क घास तक सुगं धत हो, वह भू म साधारण कैसे हो सकती है।

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार
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लेखक यहाँ कर क्या रहे ह — यह दे खना अ धक जरूरी है। उनका तक सबसे छोट चीज से शुरू होकर सबसे बड़े नष्कष तक
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जाता है —
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घास — भूिम की सबसे छोटी और सबसे साधारण चीज
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aयह घास भी सुगंिधत है

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→ तो यहाँ का सबसे मामूली अंश भी असाधारण है
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→ िन ष्कष: पूरी भूिम पण्ु यभूिम है
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क्य यह तक असरदार है: य द लेखक मं दर या गंगा क प वत्रता का प्रमाण दे ते तो बात साधारण होती — मं दर
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तो प वत्र होते ही ह। पर वे प्रमाण घास से लेते ह, जसे कोई गनता ही नह । इससे पाठक को लगता है क प वत्रता

c o mान म नह , पूरी म म घुली हुई है। यही इस पं क्त क खूबी है। g l as
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कसी एक
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a g शब्द: वलक्षण = अनोखा, असाधारण। प्रगट = प्रकट (पुरानी वतनी)। जा वत्री = जायफल के ऊपर लपटा

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सुगं धत मसाला। प्रत्यक्ष = आँख के सामने, साफ-साफ।
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प्र.2
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(ख) “अहा! इनके जन्म भी धन्य ह जनसे अथ वमुख जाते ही नह । फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज,

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लकड़ी और जड़; यहाँ तक क जले पर भी कोयले और राख से लोग का मनोरथ पूण करते ह।”

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g(अथ ) खाली हाथ नह लौटता। वृक्ष
.c लेखक वृक्ष के जन्म को धन्य कहते ह, क्य क उनके पास से कोई माँगने वाला

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se सब कुछ देता है — फल, फूल, सुगंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़ तक। और सबसे बड़ी बात यह क जल
सीधा अथ:

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अपना

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जाने के बाद भी वह कोयले और राख के रूप म लोग के काम आता है।

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वाक्य क रचना ही उसका अथ है। दे खए —

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फल → फूल → गंध → छाया → पत्ते → छाल → बीज → लकड़ ी → जड़

(ऊपर से नीचे तक , बाहर से भीतर तक — पूरा वृक्ष चुक जाता है)
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और िफर भी…
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“यहाँ तक िक जले पर भी” → कोयला और राख
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: दे ना वृक्ष का काम नही,ं स्वभाव है — जलने के बाद भी नही ं छूटता।
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अथ

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‘अहा!’ यहाँ क्य है: यह वस्मया दबोधक शब्द लेखक क प्रशंसा और कृतज्ञता दोन दखाता है। इसे हटा द जए
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s e mे साथ वाक्य एक भाव बन जाता है। सूची का लंबा होना भी जान-बूझकर है
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तो वाक्य केवल सूचना रह जाता है; इसक
— नौ चीज एक साथ गनाकर
aglलेखक पाठक के मन म ‘और भी… और भी…’ का भाव भर दे ते ह।

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भाव: यह पं क्त परोपकार का आदश रखती है — स ा दान वह है जसम दे ने वाला अपने लए कुछ बचाकर न रखे। आगे इसी
वचार को लेखक एक और वाक्य म समेट दे ते ह — “सज्जन ऐसे क पत्थर मारने से फल दे ते ह।”

शब्द: अथ = जसे कोई प्रयोजन (अथ) हो, माँगने वाला, याचक। वमुख = मुँह मोड़े हुए, नराश। धन्य =
सराहनीय, सफल।

सोच- वचार के लए — पृष्ठ 52
पाठ से

पाठ से

प्र.1 पाठ को पुन: ध्यान से प ढ़ए, पता लगाइए और ल खए। (क) “और संपादक महाशय, म चत्त से तो अब तक
वह नवास करता ँ…” लेखक का यह वाक्य क्या दशाता है? क्या आपने कभी कसी ान को छोड़कर ऐसा
अनुभव कया है? कब-कब? (संकेत— कसी ान से लौटने के बाद भी उसी के वषय म सोचते रहना)

यह वाक्य क्या दशाता है: लेखक शरीर से ह र ार से लौट आए ह, पर मन से नह लौटे । ‘ चत्त’ का अथ है मन और ‘ नवास करना’
का अथ है रहना — यानी “मेरा शरीर लौट आया, मन वह रह गया।” यह वाक्य तीन बात एक साथ कहता है —

1. अनुभव क गहराई — जो जगह केवल अच्छ लगती है, वह याद रहती है; जो जगह भीतर तक छू जाती है, वह मन म बस
जाती है।
2. वणन क सचाई — पत्र म जो लखा गया है वह सुनी-सुनाई बात नह , अब तक जया जा रहा अनुभव है।
3. पत्र का उपसंहार — इसके तुरंत बाद लेखक कहते ह क अब वे “मौनावलंबन” करते ह, यानी चुप हो जाते ह। जो कहा नह
जा सकता, उसके आगे चुप हो जाना ही ठ क है।

ध्यान द जए: ‘ नवास करता ँ’ वतमान काल म है, जब क पूरी यात्रा भूतकाल म हो चुक है। काल का यही
बदलना बताता है क वह अनुभव उनके लए अब भी चालू है, बीता हुआ नह ।

नमूना उत्तर (अपना अनुभव): पछली ग मय म म अपनी नानी के गाँव गया था। लौटने के बाद कई दन तक कक्षा म बैठे-बैठे
मुझे वह का आँगन, नीम का पेड़ और शाम को तालाब क ओर जाती पगडंडी याद आती रही। रात को छत पर लेटते ही लगता क म
गाँव क चारपाई पर ँ। तभी मुझे समझ आया क कसी जगह से लौट आना और उसे छोड़ दे ना — ये दो अलग बात ह।

Tip: अपना अनुभव लखते समय एक ठोस चत्र जरूर द जए — कोई पेड़, कोई आवाज, कोई गंध। केवल
“बहुत अच्छा लगा” लखने से उत्तर कमजोर हो जाता है।

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प्र.2 (ख) “पंडे भी यहाँ बड़े वलक्षण संतोषी ह। एक पैसे को लाख करके मान लेते ह।” लेखक का यह कथन आज के
समाज म कतना सच है? क्या अब भी ऐसे संतोषी लोग मलते ह? अपने वचार उदाहरण स हत ल खए।

पहले पं क्त का अथ: ‘एक पैसे को लाख करके मान लेना’ का अथ यह नह क वे एक पैसे को लाख गनने क भूल करते ह। अथ
यह है क जो थोड़ा-सा मल जाए, उसे वे लाख जतना मानकर संतुष्ट हो जाते ह। ‘ वलक्षण’ शब्द से पता चलता है क लेखक को
यह बात अनोखी लगी।
आज के समाज म कतना सच: इसका उत्तर एकतरफा नह हो सकता, इस लए दोन पक्ष रखकर फर अपनी बात क हए।

पक्ष तक

आज यह कम सच बाजार और व ापन हर दन नई जरूरत गढ़ते ह। तीथ ान तक म मोल-भाव, तय ‘रेट’ और भीड़ का दबाव है।
है संतोष को अब अक्सर कमजोरी या पछड़ापन मान लया जाता है।

िफर भी यह सच कम म खुश रहने वाले लोग आज भी ह — गाँव के दस्तकार, छोट दुकान वाले, मं दर-म स्जद के सेवक। वे प्रचार म
बचा हुआ है नह आते, इस लए दखाई कम दे ते ह; ह कम नह ।

नमूना उत्तर: मेरे वचार से यह कथन आज पूरी तरह सच नह , पर पूरी तरह झूठ भी नह है। हमारे मोहल्ले म एक बुजुग साइ कल-
मरम्मत करने वाले ह। पंचर लगाने के वे तय पैसे ही लेते ह और य द कोई व ाथ बाद म पैसे दे ने आता है तो कहते ह — “रहने दो
बेटा, हवा तो मुफ्त क है।” उनक दुकान कभी बड़ी नह हुई, पर वे कभी परेशान नह दखे। दूसरी ओर, बड़े बाजार म मने ऐसे लोग
भी दे खे ह जनके पास सब कुछ होते हुए भी असंतोष ही दखाई दे ता है। इससे मने यह समझा क संतोष कमाई पर नह , स्वभाव
पर नभर करता है — और यही बात भारतदु 150 वष पहले भी कह रहे थे।

प्र.3 (ग) “म द वान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टका था। यह ान भी उस क्षेत्र म टकने योग्य ही है।”
आपके वचार से लेखक ने उस ान को ‘ टकने योग्य’ क्य कहा है? उस ान म कौन-कौन सी वशेषताएँ ह गी
जो उसे ‘ टकने योग्य’ बनाती ह गी? (संकेत— केवल आराम, सु वधा या कोई और कारण भी।)

‘ टकने योग्य’ कहने का कारण अकेले आराम या सु वधा नह है। इसका प्रमाण अगला ही वाक्य है — “चार ओर से शीतल पवन
आती थी।” लेखक ने सु वधाओं क सूची नह गनाई, वातावरण क बात कही। यानी उनके लए वह ान ठहरने लायक इस लए
था क वहाँ मन ठहर सकता था।

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वशेषता पाठ से संकेत / कारण

ऊँचाई और खुल ापन “घर के ऊपर के बंगले पर” — ऊपरी मं जल, इस लए नीचे क भीड़ और शोर से दूर, और चार ओर का दृश्य
सामने।

शीतल, स्वच्छ हवा “चार ओर से शीतल पवन आती थी” — पवत और गंगा से आती हवा।

तीथ और घाट की वे रात के ग्रहण म स्नान कर सके और गंगा तट पर जाकर भोजन बना सके — इसका अथ है क घाट पास ही
िनकटता था।

शांित और सुर क्षा पूरे क्षेत्र के बारे म लेखक लखते ह — “झगड़े-लड़ाई का कह नाम भी नह था” और “ह र ार म यह बखेड़ा
कुछ नह है।”

आत्मीय मेजबान वे कसी सराय म नह , द वान कृपा राम के घर ठहरे थे। प र चत का घर यात्री को केवल छत नह , अपनापन भी
दे ता है।

साधना के िलए वह रहकर उन्ह ने “ दन म श्री भागवत का पारायण भी कया” — यानी वह ान पढ़ने-ध्यान करने लायक भी
अनुकू लता था।

नष्कष: यात्री के लए ‘अच्छा ठकाना’ वह नह जहाँ सबसे ज्यादा सु वधा हो, ब ल्क वह है जो यात्रा के उ े श्य के
अनुकूल हो। भारतदु तीथ के अनुभव के लए आए थे, इस लए उनके लए ऊँचाई, हवा, शां त और घाट क नकटता
— यही ‘ टकने योग्य’ होने क कसौट बनी।

प्र.4 (घ) “फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक क जले पर भी कोयले और राख से
लोग का मनोरथ पूण करते ह।” इस वाक्य के माध्यम से आपको वृक्ष के महत्व के बारे म कौन-कौन सी बात
सूझ रही ह?

यह एक वाक्य वृक्ष के महत्व क पूरी सूची बन जाता है। उसे क्रम से खो लए —

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वृक्ष का अंग मनुष्य के कस काम आता है

फल, बीज भोजन और अगली फसल — बीज से नया वृक्ष जन्म ले ता है

फू ल, गंध सौंद य, पूजा, इत्र और मन की पस ता न्न

छाया राहगीर, पशु और िकसान — सबको धूप से राहत

पत्ते पत्तल , चारा, खाद ; और यही पत्ते पाणवायु बनाते है ं

छाल, जड़ औषिध; जड़ ें िम ी को बाँधकर कटाव रोकती है ं

लकड़ी घर, दरवाजे, हल , नाव, ईंधन

कोयला और राख जल जाने के बाद भी — ईंधन और खेत की खाद

इससे जो बात सूझती ह:

1. वृक्ष का कुछ भी व्यथ नह जाता। जड़ से लेकर राख तक हर अंश कसी न कसी के काम आता है — प्रकृ त म कचरा नाम
क कोई चीज नह होती।
2. वृक्ष बना शत दे ता है। वह न पूछता है क लेने वाला कौन है, न बदले म कुछ माँगता है। इसी लए लेखक ने उसे ‘सज्जन’
कहा।
3. वह मरकर भी दे ता है। यही इस वाक्य क सबसे बड़ी बात है — “यहाँ तक क जले पर भी।” मनुष्य का उपकार प्रायः उसके
जीवन के साथ समाप्त हो जाता है, वृक्ष का नह ।
4. इस लए वृक्ष काटना केवल एक पेड़ खोना नह है — वह इन सारी चीज को एक साथ खोना है। एक पेड़ लगाना इस लए
दान से कम नह ।

भाषा पर ध्यान द जए: लेखक ने ‘वृक्ष उपयोगी ह’ जैसा सीधा वाक्य नह लखा। उन्ह ने नौ चीज गनाईं और अंत
म ‘यहाँ तक क’ जोड़कर एक और चीज और बढ़ा द । सूची जतनी लंबी होती जाती है, प्रभाव उतना ही गहरा
होता जाता है — यह वणन क एक सीखने लायक व ध है।

अनुमान और कल्पना से — पृष्ठ 52–53
पाठ से

पाठ से कल्पना

प्र.1 (क) “यह भू म तीन ओर सुंदर हरे-हरे पवत से घरी है।” कल्पना क जए क आप ह र ार म ह। आप वहाँ क्या-
क्या करना चाहगे?

यह कल्पना का प्रश्न है, पर इसे अच्छा बनाने का एक नयम है — जो कुछ आप करना चाह, वह पाठ म व णत ह र ार से जुड़ा
हो। तभी उत्तर म यह दखेगा क आपने पाठ पढ़ा है।
अच्छे उत्तर म क्या-क्या हो सकता है

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार
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ह र क पैड़ी के घाट पर बैठकर गंगा क धारा और शाम क आरती दे खना
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नील धारा और गंगा क मुख्य धारा — दोन को अलग-अलग पहचानने क को शश करना
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च ण्डका दे वी क मू त वाले उस छोटे चुट ला पवत तक चढ़ना और ऊपर से पूरा नगर दे खना

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कनखल जाकर उस ान को दे खना जहाँ क कथा पाठ म द गई है

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पवत पर फैली वल्ली और वहाँ क सुगं धत कुशा को पास से दे खना
वृक्ष पर बैठे रंग- बरंगे प क्षय को दे खना और उनक आवाज पहचानने का प्रयास करना

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गंगा तट पर बैठकर, छ ट के बीच, अपनी यात्रा-डायरी लखना

नमूना उत्तर: य द म ह र ार जाऊँ तो सबसे पहले ह र क eपैm
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aशब्दl बहुत होता है; म आँख बंद करके वही शब्द सुनना चा ँगा। फर म उस छोटे
ड़ी के पत्थर पर बैठकर गंगा को केवल दे खना चा ँगा — बना कुछ
कए। लेखक ने लखा है क यहाँ जल के वेग का g
पवत पर च ँ गा जसके शखर पर च ण्डका दे वी क मू त है, ता क ऊपर से दोन धाराओं को अलग-अलग दे ख सकूँ। शाम को म

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घाट क सी ढ़य पर बैठकर अपनी डायरी म वही लखूँगा जो उस दन मने दे खा — ठ क वैसे ही जैसे भारतदु जी ने अपने मत्र को
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पत्र लखा था। और लौटते समय म वहाँ एक पौधा लगाना चा ँगा, क्य क जस जगह ने इतना दया, उसे कुछ लौटाना भी चा हए।

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Tip: ऐसे उत्तर म क्रम र खए — पहले क्या, फर क्या, अंत म क्या। बखरी हुई सूची से लखा हुआ अनुच्छेद हमेशा

a gl अच्छा लगता है।

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agl भव को अपनी कल्पना से ल खए।
प्र.2 (ख) “जल के छलके पास ही ठं ढे -ठं ढे आते थे।” कल्पना क जए क आप गंगा के तट पर ह और पानी के छ टे
आपके मुँह पर आ रहे ह। अपने अनु

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m a s emकर — केवल आँख नह ।
gl
यह इं द्रय-अनुभव लखने का अभ्यास है। अच्छा उत्तर वही होगा जसम एक से अ धक इं द्रयाँ काम

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a s eइंmद्रय
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क्या लखा जा सकता है

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स्पश छ ट क ठं डक, धूप म तपे चेहरे पर उनका पड़ना, पत्थर क गरमाहट, गीली हथेली पर चलती हवा

m अपने ही मन का सन्नाटा
coआरती, g l a
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श्रवण धारा क कलकल, घं टयाँ, दूर से आती

a s
हरा-नीला जल, बहते दlये, ऊपर उड़ते पक्षी, हलती परछाइयाँ
दृ िष्ट
ag

com
घ ाण / स्वाद गीली म और फूल क गंध, ह ठ पर आई बूँद का हल्का ठं डापन

नमूना उत्तर: म गंगा के कनारे उस चौड़े पत्थर पर बैठा ँ जो दन भर क धूप से अब भी गरमeहैm
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o बूँद उछलकर मेरे मुँह पर आ गरती ह — इतनी ठं डी क पहली बार म आँaखglअपने आप बंद हो जाती ह। दो-चार बूँद
। धारा पत्थर से टकराती है और

. c-छोट
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छोट

g l as भीतर से दूर कह घं टय क झंकार आ रही है। सामने पानी पर एक द या बहता चला जा रहा है। कुछ देर बाद मुझे लगता है क म
ह ठ पर आ जाती ह; पानी का हल्का-सा मीठापन महसूस होता है। कान म लगातार कलकल क आवाज है, और उसी आवाज के
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कुछ सोच ही नह रहा — बस बैठा ँ। शायद इसी को लेखक ने ‘ चत्त का नमल हो जाना’ कहा था।

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m ल खए — वह दखाइए जससे अच्छा लगा। भाव को नाम दे ने के
लखने का सूत्र: ‘बहुत अच्छा लगा’eमत agl
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a l म र खए; पाठक भाव तक स्वयं पहुँच जाएगा।
बजाय उसका कारण चत्र के gरूप

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प्र.3 (ग) “सज्जन ऐसे क पत्थर मारने से फल दे ते ह।” य द पेड़-पौधे सच म मनुष्य क तरह व्यवहार करने लग तो
क्या होगा?

इस प्रश्न म मजा तभी है जब आप दोन संभावनाएँ सोच — अच्छा भी और डरावना भी।

य द पेड़ मनुष्य जैसे हो क्या हो सकता है
जाएँ तो…

वे बोल सकते वे बता पाते क उन्ह पानी कब चा हए, कौन-सी बीमारी लगी है, कहाँ क म मर रही है। खेती और वन-
रक्षा बहुत आसान हो जाती।

वे मना कर सकते कुल्हाड़ी उठते ही वे वरोध करते। तब शायद पेड़ काटना उतना ही गंभीर माना जाता जतना कसी को
चोट पहुँचाना।

वे चल-िफर सकते वे सूखे इलाके छोड़कर चले जाते — और सबसे जरूरतमंद जगह ही सबसे पहले उजड़ जात ।

उनमें मनुष्य के अवग ण
ु भी आ वे भी छाया और फल के बदले कुछ माँगते, हसाब रखते, नाराज होते। तब “पत्थर मारने से फल दे ते ह”
जाते वाली बात ही समाप्त हो जाती।

नमूना उत्तर: य द पेड़-पौधे मनुष्य क तरह व्यवहार करने लग तो पहली नजर म यह बहुत अच्छा लगेगा — वे अपनी जरूरत बता
सकगे, अपने कटने का वरोध कर सकगे और शायद हम उन्ह वस्तु समझना छोड़ दगे। पर थोड़ा और सोचने पर एक डर भी लगता
है। मनुष्य जैसा बनने का अथ है — बदले म कुछ चाहना, नाराज होना, हसाब रखना। तब कोई पेड़ यह भी कह सकता है क “मने
कल छाया द थी, आज नह दूँ गा।” और तब वृक्ष क वह सबसे बड़ी वशेषता ही नष्ट हो जाएगी जसक प्रशंसा भारतदु ने क थी
— बना शत, बना बदले, बना थके दे ते रहना। इस लए मुझे लगता है क पेड़ जैसे ह वैसे ही ठ क ह; बदलने क जरूरत उनम नह ,
हमारे व्यवहार म है।

प्र.4 (घ) “यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई ह— एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से।” इस
पाठ म ‘गंगा’ शब्द के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया गया है। आपके अनुसार उन्ह ने ऐसा क्य कया होगा?

क्य क लेखक के लए गंगा केवल एक नद नह , आदरणीय ह। ‘श्री’ और ‘जी’ हद म आदर बताने वाले शब्द ह — ‘श्री’ नाम से
पहले लगता है, ‘जी’ नाम के बाद।

गंगा → के वल नदी का नाम

श्र ी गंग ा जी → आदरणीय, पूज्य, अपनी-सी

+ िक्रया भी बदल जाती है → “श्री गंगा जी दो धारा हो गई है”ं

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सबसे बड़ा प्रमाण पाठ म ही है: लेखक लखते ह — “यहाँ केवल गंगा जी ही दे वता ह, दूसरा दे वता नह ।” ‘गंगा’
एकवचन शब्द है, फर भी उसके साथ ‘ह’ लगा है। यही आदराथ बहुवचन है, जसक चचा अगली ग त व ध (‘है’
और ‘ह’ का उपयोग) म क गई है। यानी आदर केवल ‘श्री’ और ‘जी’ म नह , वाक्य क क्रया तक म उतर आया है।

इसके तीन कारण एक साथ काम कर रहे ह —

1. भारतीय परंपरा — न दय को माता और दे वी माना जाता है; गंगा को ‘गंगा माँ’ कहा जाता है।
2. पत्र का वषय — यह तीथयात्रा का वणन है। जस पूरे पत्र का भाव भ क्त और श्रद्धा का हो, उसम नद का नाम रूखा नह आ
सकता।
3. उस समय क भाषा-शैली — 150 वष पहले पूज्य व्य क्तय , ग्रंथ और ान के नाम के साथ ‘श्री’ लगाना सामान्य था। पाठ
म और भी उदाहरण ह — “श्री भागवत का पारायण”।

अपने आसपास दे खए: हम आज भी कहते ह — रामायण जी, गीता जी, गुरु जी, माता जी, अमृतसर के लए ‘श्री
अमृतसर सा हब’। भाषा म आदर इसी तरह घुला रहता है।

प्र.5 (ङ) कल्पना क जए क आप ह र ार एक श्रवणबा धत या दृ ष्टबा धत व्य क्त के साथ गए ह। उसक यात्रा को
अच्छा बनाने के लए कुछ सुझाव द जए।

सबसे पहली बात — उनसे पू छए क उन्ह क्या चा हए, अपने मन से मदद थो पए मत। सहायता तभी सहायता है जब वह साथी
को स्वतंत्र बनाए, नभर नह ।

कसके लए सुझाव

दृ िष्टबािधत दृश्य को शब्द म क हए — “हमारे बाईं ओर घाट क सी ढ़याँ ह, सामने धारा तेज बह रही है, दा हनी ओर मं दर है।”
साथी
बाक इं द्रय को काम म लगाइए — जल के ठं डे छ टे , धारा का कलकल शब्द, फूल और अगरबत्ती क गंध, घाट के
पत्थर क गरमाहट।
चलते समय अपनी कोहनी पकड़ने द जए, उन्ह आगे मत ख चए। सीढ़ , ढलान या ग ा आने से पहले बताइए —
“तीन सी ढ़याँ नीचे।”
छड़ी, ेल-न ा या मोबाइल के स्क्र न-रीडर का प्रबंध र खए; भीड़ म मलने का एक न श्चत ान तय कर ली जए।

श्रवणबािधत
बात करते समय आमने-सामने र हए और साफ रोशनी म — ता क वे ह ठ और चेहरा पढ़ सक। मुँह ढककर या पीठ
साथी पीछे से मत बो लए।
जरूरी बात लखकर या मोबाइल पर टाइप करके दखाइए; संकेत और चत्र का प्रयोग क जए।
घोषणाएँ (गाड़ी का समय, आरती का समय, कोई चेतावनी) तुरंत उन तक पहुँचाइए — वे उन्ह सुन नह पाएँगे।
य द संभव हो तो सांके तक भाषा जानने वाले साथी या गाइड को साथ र खए; समूह म हाथ हलाकर ध्यान ख चने
का एक तय संकेत बना ली जए।

दोनों के िलए भीड़ कम होने के समय का चयन, रुक-रुककर चलना, बैठने क जगह पहले से दे ख लेना, सुगम्य (रप वाले) रास्ते चुनना,
समान और सबसे जरूरी — उनसे ब जैसा नह , बराबरी का व्यवहार।

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सोचने क बात: पाठ म लेखक ह र ार को आँख से दे खते ह, पर उसका असर वे मन पर बताते ह — “मन शुद्ध हो
जाता है।” इसका अथ यह हुआ क कसी ान का असली अनुभव केवल आँख का मोहताज नह । सही सहायता
मले तो हर व्य क्त उस अनुभव तक पहुँच सकता है।

लख संवाद — पृष्ठ 53
पाठ से

पाठ से ले ख न

प्र.1 (क) “मेरे संग कल्लू जी मत्र भी परमानंद थे।” लेखक और कल्लू जी के बीच ह र ार यात्रा पर एक काल्प नक
संवाद ल खए।

संवाद लखने के नयम: बोलने वाले का नाम बाईं ओर, उसके बाद नशान (:), फर उसक बात। हर वक्ता क बात नई पं क्त से।
बातचीत छोट -छोट हो, भाषण न बने। और यहाँ एक बात और — संवाद म पाठ क सामग्री आनी चा हए, तभी वह इसी पाठ
का संवाद लगेगा।
नमूना उत्तर
भारतदु: कल्लू जी, आज सवेरे घाट पर आपको दे खा नह । कहाँ रह गए थे?
कल्लू जी: म नील धारा क ओर नकल गया था। सो चए तो — एक ही गंगा जी यहाँ दो धाराओं म बँट जाती ह, और बीच म एक
नीचा-सा हरा पवत खड़ा है।
भारतदु: मने भी वही दे खा। और उस छोटे चुट ला पवत के शखर पर च ण्डका दे वी क मू त है, यह आपने दे खी?
कल्लू जी: दे खी। पर मुझे सबसे व चत्र यह लगा क इतने बड़े तीथ म दे वता केवल गंगा जी ही ह, दूसरा कोई नह ।
भारतदु: यही तो इसक वशेषता है। और यहाँ के लोग दे खए — पंडे तक एक पैसे को लाख करके मान लेते ह। इतना संतोष मने
कह नह दे खा।
कल्लू जी: सच कहा। कल आपने तट पर पत्थर पर बैठकर जो भोजन कराया था, वह स्वाद अब तक याद है। जल के ठं डे छ टे बार-
बार मुँह पर आ रहे थे।
भारतदु: मुझे भी लगा क सोने क थाल म खाया हुआ भोजन भी उस सुख के आगे फ का है।
कल्लू जी: तो अब क्या सोचा है? कब तक ठहरगे?
भारतदु: लौटना तो पड़ेगा, कल्लू जी। पर सच पू छए तो चत्त से म यह रह जाऊँगा। संपादक महोदय को यही सब लखकर भेजूँगा।
कल्लू जी: अवश्य ल खए। जो लोग यहाँ नह आ सकते, वे आपके पत्र से ही यह आनंद पा लगे।

Tip: संवाद म आठ से बारह पं क्तयाँ पयाप्त होती ह। अंत ऐसा र खए जो आगे क ओर खुलता हो — जैसे यहाँ पत्र
लखने क बात पर बातचीत समाप्त होती है।

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प्र.2 (ख) “यह भू म तीन ओर सुंदर हरे-हरे पवत से घरी है।” लेखक और प्रकृ त के बीच एक कल्पनात्मक संवाद
तैयार क जए— जैसे पवत बोल रहे ह ।

यहाँ पवत को बोलने वाला बनाना है — नज व को मनुष्य क तरह बोलता दखाना मानवीकरण कहलाता है। यह वही यु क्त है जो
लेखक ने वृक्ष को ‘सज्जन’ और ‘तपस्वी’ कहकर स्वयं अपनाई है।
नमूना उत्तर
पवत: रुको, यात्री! इतनी दूर से आए हो, थोड़ी दे र मेरी छाया म बैठ जाओ।
भारतदु: आप बोलते भी ह? म तो अब तक आपको केवल दे ख रहा था।
पवत: दे खने वाले बहुत आते ह, सुनने वाले कम। म तीन ओर से इस भू म को घेरे खड़ा ँ — यही मेरा काम है। हवा को छानकर
भेजता ँ, इसी लए यहाँ क पवन इतनी शीतल लगती है।
भारतदु: और आप पर फैली ये हरी-भरी वल्ली?
पवत: वे मेरी नह , तुम्हारी ह। जैसे सज्जन के शुभ मनोरथ फैलते चले जाते ह, वैसे ही ये लताएँ फैलती ह — बना यह पूछे क
लाभ कसे मलेगा।
भारतदु: ये बड़े-बड़े वृक्ष तो जैसे तपस्या म खड़े ह ।
पवत: ठ क पहचाना। घाम सहते ह, ओस सहते ह, वषा सहते ह — और उफ तक नह करते। पक्षी उन पर घर बनाते ह और नडर
होकर कल्लोल करते ह, क्य क यहाँ उन्ह कोई ब धक नह मलता।
भारतदु: म यह सब अपने पत्र म लखूँगा। आप कुछ कहना चाहगे मेरे पाठक से?
पवत: बस इतना — जो लोग मुझे दे खने आएँ, वे मुझे मुझसे थोड़ा बेहतर छोड़कर जाएँ। तीथ केवल जल से प वत्र नह होता, आने
वाल के व्यवहार से भी होता है।
भारतदु: यह बात म पत्र के अंत म अवश्य लखूँगा। प्रणाम!

यह संवाद अच्छा क्य है: इसम पवत केवल सुंदर बात नह करता — वह पाठ क ही सामग्री (शीतल पवन, वल्ली,
तपस्वी वृक्ष, नडर पक्षी, ब धक) दोहराता है और अंत म एक वचार दे ता है। बना वचार के संवाद केवल बातचीत
रह जाता है।

‘है’ और ‘ह’ का उपयोग — पृष्ठ 53–54

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार
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पाठ से
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पाठ से भाषा क बात

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s m म रेखां कत शब्द के प्रयोग पर ध्यान द जए— • वशेष आश्चय का वषय यह है क यहाँ केवल गंगा
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प्र.1
जी ही दे वता ह, दूसरा दे वता नह । • य तो वैरा गय ने मठ मं दर कई बना लए ह। आप जानते ही ह क एकवचन

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संज्ञा शब्द के साथ ‘है’ का प्रयोग कया जाता है और बहुवचन संज्ञा शब्द के साथ ‘ह’ का। सो चए, ‘गंगा’ शब्द
एकवचन है, फर भी इसके साथ ‘ह’ क्य लखा गया है?
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क्य क यहाँ ‘ह’ बहुवचन नह , आदर बता रहा है। इसे आदराथ बहुवचन कहते ह — जब हम कसी एक व्य क्त या पूज्य वस्तु का

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आदर करना चाहते ह, तब उसे एकवचन होते हुए भी बहुवचन क तरह लखते-बोलते ह।

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वाक्य संज्ञा क्रया ‘ह’ क्य

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ag यहाँ के वल गंग ा जी ही दे वता है ं गंगा (एकवचन) है ं आदराथ बहुवचन — गंगा को दे वी/माता मानकर आदर दया गया

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वैर ािगयों ने मठ मंिदर कई बना िलए है ं है ं
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मठ मं दर (कई) यह सचमुच का बहुवचन है — गनती म एक से अ धक

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दोन ‘ह’ एक जैसे दखते ह, पर कारण अलग ह। पहले म ‘ह’ का कारण आदर है, दूसरे म संख्या। यही इस
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ग त व ध क मूल बात है — क्रया दे खकर यह मत मान ली जए क सं ा एक से अ धक है; पहले दे खए क वह

m
सं ा आदरणीय तो नह ।
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पहचानने के दो सहारे —

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‘जी’, ‘श्री’, ‘साहब’, ‘महाशय’, ‘महोदय’ जैसा कोई आदर-सूचक शब्द साथ लगा हो, तो प्रायः आदराथ बहुवचन होता है

agl — “श्री गंगा जी”, “डा कया जी”, “डॉक्टर साहब”।
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सं ा के साथ आने वाले सवनाम भी बदल जाते ह — वह → वे, उसका → उनका, उससे → उनसे। जैसे — “ पता जी सो रहे
ह, उन्ह मत जगाओ।”
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पुस्तक के अपने उदाहरण — “मेरे पता जी सो रहे ह।”, “भारत के प्रधानमंत्री भाषण दे रहे ह।” दोन म व्य क्त एक ही है, फर भी

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क्रया बहुवचन म है।

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प्र.2 अब ‘आदराथ बहुवचन’ को ध्यान म रखते हुए उपयुक्त शब्द से रक्त ान क पू त क जए— 1. प्रधानाचाय
जी व ालय म नह ________, वे अभी सभा म उप त ________। 2. माता- पता हमारे जीवन के मागदशक होते
________, हम उनका कहना मानना चा हए। 3. मेरी बहन बाजार जा रही ________ वहाँ से कताब ले आएगी। 4.
बाहर फेरीवाला ________ ________। ________ बुला लाओ। 5. डा कया जी आए ________। उन्ह भी बुला लाओ।
6. आप तो बहुत दन बाद ________, ________ का स्वागत है। 7. डॉक्टर साहब बहुत व ान ________, ________
से परामश लेना चा हए। 8. आपके माता- पता कहाँ ________? क्या म ________ से मल सकता ँ? 9. ये हमारे
हद के अध्यापक ________, हम ________ से बहुत-कुछ सीखते-समझते ह। 10. बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर
________ ________।

पूरे वाक्य इस प्रकार बनगे —

क्रम पूरा वाक्य यह रूप क्य

1. पधानाचाय जी िव ालय में नही ं है,ं वे अभी सभा में एक ही व्यिक्त, पर ‘जी’ लगा है और आगे ‘वे’ आया है — आदराथ बहुवचन।
उपिस्थत है।
ं

2. माता-िपता हमारे जीवन के मागदशक होते है,ं हमें ‘माता-िपता’ स्वयं दो व्यिक्त है ं — यह सामान्य बहुवचन है, आदराथ नही ं।
उनका कहना मानना चािहए।

3. मेर ी बहन बाजार जा रही है, वहाँ से िकताबे ं ले अपने से छोटे या बराबर के िलए सामान्यतः एकवचन — इसिलए ‘है’। आगे
आएगी। ‘आएगी’ भी एकवचन है, यही सुर ाग है।

4. बाहर फे रीवाला आया है। उसे बुल ा लाओ। पिरिचत नही,ं कोई आदर-सूचक शब्द नही ं — इसिलए एकवचन और सवनाम
‘उसे ’।

5. डािकया जी आए है।
ं उन्हे ं भी बुल ा लाओ। ‘जी’ और आगे ‘उ न्हे’ं — दोनों आदर के संके त, इसिलए ‘है’ं । (यही ं वाक्य 4 से
तुल ना कीिजए।)

6. आप तो बहुत िदन बाद आए है,ं आपका स्वागत है। ‘आप’ स्वयं आदर -सूचक सवनाम है, इसिलए िक्रया सदा बहुवचन में — ‘आया
है’ कभी नही ं।

7. डॉक्टर साहब बहुत िव ान है,ं उनसे परामश ले ना ‘साहब’ आदर -सूचक है, इसिलए ‘है’ं और ‘उनसे ’।
चािहए।

8. आपके माता-िपता कहाँ है?ं क्या मैं उनसे िमल संख्या से भी बहुवचन और आदर से भी — दोनों कारण एक साथ।
सकता हू?ँ

9. ये हमारे िहंद ी के अध्यापक है,ं हम इनसे बहुत-कु छ ‘ये’ से वाक्य शुरू हुआ है, इसिलए आगे ‘इनसे ’ ही आएगा — ‘उनसे ’ नही ं। पास
सीखते-समझते है।
ं वाले के िलए ये/इनसे , दू र वाले के िलए वे/उनसे ।

10. बंद र पेड़ पर उछल-कू द कर रहा है। पशु के िलए आदराथ बहुवचन नही ं लगाया जाता — इसिलए ‘रहा है’।

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इस अभ्यास का असली पाठ: वाक्य 4 और 5 को साथ रखकर दे खए — “फेरीवाला आया है” पर “डा कया जी
आए ह”। दोन एक ही व्य क्त-जैसे पद ह, अंतर केवल ‘जी’ का है। यानी आदर व्याकरण म भी दखता है, केवल
व्यवहार म नह ।

सावधानी: आदराथ बहुवचन म क्रया के साथ-साथ सवनाम और वशेषण भी बदलते ह — वह→वे, उसे→उन्ह,
उसका→उनका, यह→ये, इसे→इन्ह। आधा बदलकर आधा छोड़ दे ना (जैसे “डा कया जी आए ह, उसे बुला
लाओ”) अशुद्ध है।

भाव क पहचान — पृष्ठ 54–55
पाठ से

पाठ से भाषा क बात

प्र.1 नीचे कुछ पं क्तयाँ द गई ह। सो चए क इनम कौन-सा भाव प्रकट हो रहा है? पहचा नए और चुनकर ल खए—
( दए गए भाव — प्रेम, संतोष, भ क्त, श्रद्धा, वैराग्य, आश्चय, करुणा, हास्य, शां त, परोपकार, दया, दुख) 1. उस
समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने क थाल के भोजन से कह बढ़ के था। 2. चत्त म बारंबार ज्ञान,
वैराग्य और भ क्त का उदय होता था। 3. पंडे भी यहाँ बड़े वलक्षण संतोषी ह। 4. हर तरफ प वत्रता और प्रसन्नता
बखरी हुई थी। 5. सज्जन ऐसे क पत्थर मारने से फल दे ते ह।

सही भाव और उनका कारण —

क्रम पं क्त का संकेत- भाव क्य
शब्द

1. “सोने की थाल से कही ं संतोष जो मला, उसी म पूरा सुख मल गया — कसी बेहतर वस्तु क चाह ही नह बची।
बढ़ के था” यही संतोष है।

2. “वैर ाग्य और भिक्त का भिक्त (और यहाँ भाव के नाम वाक्य म ही मौजूद ह। मन का ईश्वर क ओर मुड़ना = भ क्त;
उदय” वैराग्य) संसार से हटना = वैराग्य। दोन लखे जा सकते ह।

3. “बड़े िवल क्षण संतोषी संतोष (साथ में पंड का भाव संतोष है। पर ‘ वलक्षण’ शब्द लेखक का अपना भाव भी बता दे ता है
है”ं आश्चय) — उन्ह यह दे खकर आश्चय हुआ। दोन ल खए तो कारण अवश्य द जए।

4. “पिवत्रता और पसन्नता शांित न कोई हलचल, न कोई कमी — केवल एक ठहरा हुआ, स्वच्छ वातावरण। इसी
िबखरी हुई थी” पं क्त के आसपास लेखक लखते ह “झगड़े-लड़ाई का कह नाम भी नह था।”

5. “पत्थर मारने से फल परोपकार बुराई के बदले भी भलाई करना — दे ना ही जसका स्वभाव हो। यह दया नह है;
दे ते है”ं दया म ऊपर-नीचे का भाव होता है, परोपकार म नह ।

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भाव पहचानने का तरीका: पहले वाक्य का मुख्य शब्द ढूँ ढ़ए (सुख, वैराग्य, संतोषी, प्रसन्नता, फल दे ते ह)। फर
पू छए — यह कसक अव ा बता रहा है, कहने वाले क या जसके बारे म कहा जा रहा है उसक ? वाक्य 3 म
दोन ह, इसी लए उसम दो भाव नकल आते ह।

दया और करुणा म अंतर: दया म दे ने वाला स्वयं को बड़ा मानता है; करुणा म दूसरे का दुख अपना-सा लगता है;
परोपकार म बना कसी भाव के, स्वभाववश उपकार होता है। इस पाठ के वृक्ष तीसरी श्रेणी के ह।

काल क पहचान — पृष्ठ 55
पाठ से

पाठ से भाषा क बात

प्र.1 “यहाँ ह र क पैड़ी नामक एक पक्का घाट है और यह स्नान भी होता है।” आप जानते ही ह गे क काल के तीन
भेद होते ह— भूतकाल, वतमान काल और भ वष्य काल। परस्पर चचा करके पता लगाइए क ऊपर दए गए
वाक्य म कौन-सा काल प्रद शत हो रहा है? सही पहचाना, यह वाक्य वतमान काल को प्रद शत कर रहा है। (क)
नीचे द गई पाठ क इन पं क्तय को पढ़कर बताइए, इनम क्रया कौन-से काल को प्रद शत कर रही है?
(भूतकाल/वतमान/भ वष्य) 1. नश्चय है क आप इस पत्र को ानदान द जएगा। 2. यह भू म तीन ओर सुंदर
हरे-हरे पवत से घरी है। 3. वृक्ष ऐसे ह क पत्थर मारने से फल दे ते ह। 4. चत्त म बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भ क्त
का उदय होता था। 5. म द वान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टका था।

क्रया के अंत को दे खए — वही काल बताता है।

क्रम क्रया काल पहचान

1. दीिजएगा भिवष्य ‘-गा’ भ वष्य का चह्न है। यह आदरपूवक कया गया अनुरोध है, जो काम अभी होना बाक है।
काल

2. िघरी है वतमान ‘है’ — जो बात आज भी वैसी ही है। ऐसी सदा सच रहने वाली बात वतमान म ही कही जाती है।
काल

3. है,ं दे ते है ं वतमान ‘दे ते ह’ — यह वह वतमान है जो आदत या स्वभाव बताता है (सामान्य वतमान)।
काल

4. होता था भूतकाल ‘था’ भूत का चह्न। ‘होता था’ का अथ है — तब बार-बार होता रहता था (अपूण भूतकाल)।
‘बारंबार’ शब्द इसी क पु ष्ट करता है।

5. िटका था भूतकाल ‘था’ — और यह काम पूरा भी हो चुका था, इस लए पूण भूतकाल।

4 और 5 दोन भूतकाल ह, फर भी अलग ह: “होता था” बताता है क काम बार-बार होता रहा; “ टका था”
बताता है क काम एक बार हुआ और पूरा हो गया। इसी लए पहले को अपूण और दूसरे को पूण भूतकाल कहते ह।

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सूत्र: है / ह / ता है → वतमान · था / थे / ता था / चुका था → भूत · गा / गी / गे / इएगा → भ वष्य।

प्र.2 (ख) अब इन वाक्य के काल को अन्य काल म बदलकर ल खए और नए वाक्य बनाइए।

हर वाक्य को तीन काल म बदलकर दे खए। ध्यान र खए — केवल क्रया बदलेगी, वाक्य का अथ नह ।

मूल वाक्य भूतकाल वतमान काल भ वष्य काल

िनश्चय है िक आप इस पत्र को िनश्चय था िक आपने इस पत्र िनश्चय है िक आप इस पत्र को — (मूल वाक्य)
स्थानदान दीिजएगा। (भिवष्य) को स्थानदान िदया। स्थानदान दे ते है।
ं

यह भूिम तीन ओर सुंद र हरे -हरे यह भूिम तीन ओर सुंद र हरे - — (मूल वाक्य) यह भूिम तीन ओर सुंद र हरे -हरे
पवतों से िघरी है। (वतमान) हरे पवतों से िघरी थी। पवतों से िघरी रहेगी।

वृक्ष ऐसे है ं िक पत्थर मारने से फल वक्षृ ऐसे थे िक पत्थर मारने — (मूल वाक्य) वक्षृ ऐसे होंगे िक पत्थर मारने से
ं (वतमान)
दे ते है। से फल दे ते थे। फल दे ंगे।

िचत्त में बारंबार ान, वैर ाग्य और — (मूल वाक्य) िचत्त में बारंबार ान, वैराग्य िचत्त में बारंबार ान, वैराग्य
भिक्त का उदय होता था। (भूत) और भिक्त का उदय होता है। और भिक्त का उदय होगा।

मैं दीवान कृ पा राम के घर के ऊपर — (मूल वाक्य) मैं दीवान कृ पा राम के घर के मैं दीवान कृ पा राम के घर के
के बंग ले पर िटका था। (भूत) ऊपर के बंगले पर िटका हू।ँ ऊपर के बंगले पर िटकूँ गा।

अब अपने नए वाक्य बनाइए — इसी ढाँचे पर, अपने आसपास से। कुछ नमूने —

भूत — पछले वष हमारी कक्षा नद के कनारे भ्रमण पर गई थी।
वतमान — हर र ववार हमारी कक्षा नद के कनारे भ्रमण पर जाती है।
भ वष्य — अगले महीने हमारी कक्षा नद के कनारे भ्रमण पर जाएगी।

ध्यान रखने क बात: काल बदलते समय अक्सर समय बताने वाला शब्द भी बदलना पड़ता है — कल, आज,
अगले महीने, पछले वष। केवल क्रया बदलकर “कल हमारी कक्षा जाएगी” लख दे ना अशुद्ध हो जाता है।

पत्र क रचना — पृष्ठ 55–56

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पाठ से
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पाठ से मलान

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a s emइस पत्र क कुछ वशेषताएँ द गई ह। अपने समूह के साथ मलकर इन वशेषताओं से जुड़े वाक्य से इनका
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नीचे
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प्र.1
मलान क जए— पत्र क वशेषताएँ — 1. व्य क्तपरकता— पत्र लेखन म लेखक के वचार, अनुभव और

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भावनाएँ प्रमुख होते ह। 2. संवादात्मकता— पत्र संवाद का रूप है; पाठक से सीधा संवाद होता है। 3. स्वाभा वक

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शैली— भाषा कृ त्रम नह होती; भावनाओं के अनुरूप होती है। 4. व्य क्तगत अनुभव का वणन— जहाँ लेखक
mअ भवादन या संबोधन— पत्र का आरंभ, जसम संबो धत
अपने वास्त वक अनुभव को साझा करता है।e5.
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glजाता है। 6. हस्ताक्षर— लेखक अपने नाम या संबंध से पत्र को समाप्त
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व्य क्त को आदरपूवक संबो धत कया
करता है। 7. उपसंहार और नवेदन— लेखक पत्र समाप्त करता है और अपनी इच्छा या नवेदन प्रकट करता है।

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8. मुख्य वषय-वस्तु पत्र से उदाहरण — “ग्रहण म बड़े आनंदपूवक स्नान कया… · श्रीमान क ववचन सुधा
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संपादक महाम हम मत्रवरेषु! · आपका मत्र — यात्री · मुझे ह र ार का समाचार लखने म बड़ा आनंद होता है…

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· ह र ार क प्राकृ तक सुंदरता, धा मकता, साधु-संन्या सय का जीवन, नद , पवत, जल, गंगा स्नान आ द का
gहै…” · और संपादक महाशय, म
m .cत वस्तार से वणन। जैसे— “यह भू म तीन ओर सुंदर हरे-हरे पवत से घरी
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se चत्त से तो अब तक वह नवास करता ँ… नश्चय है क आप इस पत्र को ानदान द जएगा। · एक दन मने श्री
अत्यं
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agl गंगा जी के तट पर रसोई करके… · और संपादक महाशय, म चत्त से तो अब तक वह नवास करता ँ…” आप

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एक वशेषता को एक से अ धक वाक्य से भी जोड़ सकते ह।

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एक उपयुक्त मलान इस प्रकार बनता है — a

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क्रम पत्र क पत्र से उदाहरण यही क्य
वशेषता

1. व्यिक्तपरकता “मुझे हिर ार का समाचार िलखने में बड़ ा आनंद होता है…” वाक्य का कद्र ‘मुझे’ है — वषय ह र ार
है, पर बात लेखक के अपने आनंद क हो
रही है।

2. संवादात्मकता “और संपादक महाशय, मैं िचत्त से तो अब तक वही ं िनवास बीच वणन म अचानक ‘संपादक
करता हू…
ँ ” महाशय’ कहकर पाठक क ओर मुड़ना
— मानो सामने बैठकर बात हो रही हो।

3. स्वाभािवक शैल ी “ग हण में बड़ े आनंद पूवक स्नान िकया…” न कोई सजावट, न बड़े-बड़े शब्द — जो
कया, वैसा ही सीधे कह दया।

4. व्यिक्तगत अनुभवों “एक िदन मैंने श्री गंग ा जी के तट पर रसोई करके …” यह लेखक का अपना, एक वशेष दन
का वणन का अनुभव है — सामान्य जानकारी
नह ।

5. अिभवादन या “श्रीमान किववचन सुध ा संपादक महामिहम िम त्र वरे ष!ु ” पत्र क पहली पं क्त, जसम आदरपूवक
संबोधन संबोधन है। ‘ मत्रवरेषु’ = श्रेष्ठ मत्र के
प्र त।

6. हस्ताक्षर “आपका िम त्र — यात्र ी” पत्र का अं तम भाग, जहाँ लेखक अपना
संबंध और पहचान लखता है।

7. उपसंहार और “और संपादक महाशय, … िनश्चय है िक आप इस पत्र को यह समापन भी है और नवेदन भी —
िनवेद न थानदान दीिजएगा।”
स् पत्र छापने क प्राथना।

8. मुख्य िवषय-वस्तु हिर ार की पाकृ ितक सुंद रता, धािमकता, साधु-संन्यािसयों का यह कसी एक पं क्त क नह , पूरे पत्र
जीवन, नदी, पवत, जल , गंगा स्नान आिद का िवस्तार से वणन क सामग्री क बात है — यही उसका
— जैसे “यह भूिम तीन ओर सुंद र हरे -हरे पवतों से िघरी है…” वषय है।

पहचानने का सूत्र: पत्र के ान से वशेषता पहचानी जा सकती है — सबसे ऊपर आया वाक्य संबोधन है, सबसे
नीचे का हस्ताक्षर, उससे ठ क पहले वाला उपसंहार और नवेदन। बीच का पूरा भाग वषय-वस्तु है, और उसी म
जगह-जगह व्य क्तपरकता, संवादात्मकता और अनुभव-वणन बखरे रहते ह।

पुस्तक कहती है क एक वशेषता को एक से अ धक वाक्य से भी जोड़ा जा सकता है। जैसे — “मुझे ह र ार का
समाचार लखने म बड़ा आनंद होता है…” को व्य क्तपरकता के साथ-साथ स्वाभा वक शैली से भी जोड़ा जा
सकता है, और “और संपादक महाशय…” वाला वाक्य संवादात्मकता तथा उपसंहार दोन का उदाहरण है। बस,
हर जोड़ के साथ कारण ल खए।

पत्र — पृष्ठ 56

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पाठ से

पाठ से ले ख न

प्र.1 आपने जो यात्रा-वणन पढ़ा है, इसे भारतदु ह रश्चंद्र ने एक संपादक को पत्र के रूप म लखकर भेजा था। आप भी
अपनी कसी यात्रा के वषय म अपने कसी प र चत को पत्र लखकर बताइए।

पत्र म ये अंग अवश्य आने चा हए — भेजने वाले का पता और दनांक, संबोधन, अ भवादन, कुशल-क्षेम, मुख्य वषय (यात्रा का
वणन), उपसंहार, और अंत म स्व नदश तथा नाम।
वणन को अच्छा बनाने के तीन सूत्र (तीन इसी पाठ से सीखे जा सकते ह) —

1. दे खी हुई एक ठोस चीज ल खए, सामान्य बात नह । भारतदु ‘बहुत सुंदर पवत थे’ नह लखते; वे लखते ह क पवत तीन
ओर ह और उन पर वल्ली फैली है।
2. तुलना का प्रयोग क जए — “मानो…”, “क भाँ त…”, “-सी”। इसी से चत्र बनता है।
3. अंत म अपना भाव ल खए — यात्रा ने आपको क्या दया।

नमूना उत्तर
14, शवाजी नगर
भोपाल (म.प्र.)
दनांक: 12 अक्टू बर 20XX
पूज्य मामा जी,
सादर प्रणाम।
आशा है आप सब सकुशल ह गे। म भी यहाँ ठ क ँ। पछले सप्ताह हमारे व ालय क ओर से हम भीमबेटका क गुफाओं को दे खने
गए थे। उसी यात्रा का हाल आपको सुनाना चाहता ँ।
हम सवेरे छह बजे बस से नकले। रास्ते म दोन ओर बरसात के बाद क ऐसी ह रयाली थी मानो कसी ने धरती पर हरी चादर बछा
द हो। पहाड़ी पर चढ़ते ही बड़े-बड़े पत्थर दखाई दे ने लगे — कुछ इस तरह टके हुए क लगता था अभी लुढ़क पड़गे, पर वे हजार
वष से वैसे ही खड़े ह। गुफाओं क द वार पर लाल और सफेद रंग से बने चत्र दे खकर म दे र तक चुप खड़ा रहा — हरन, बैल,
नाचते हुए लोग, शकार करते हुए लोग। सो चए, जन हाथ ने ये चत्र बनाए, वे हजार वष पहले मट चुके ह, पर उनक बनाई रेखाएँ
आज भी हमसे बात कर रही ह।
दोपहर म हम एक च ान क छाया म बैठकर घर से लाया भोजन साथ मलकर खाया। पत्त म परोसा गया वह सादा भोजन मुझे
कसी भी होटल के खाने से अच्छा लगा। लौटते समय मने अपनी डायरी म लखा — जो चीज सबसे पुरानी है, वही सबसे नई लगी।
मामी जी को प्रणाम और छोट बहन को स्नेह। उत्तर अवश्य द जएगा।
आपका भांजा
अनुराग

Tip: पत्र म तीन से चार अनुच्छेद पयाप्त ह — एक कुशल-क्षेम का, दो वणन के, एक समापन का। पूरे पत्र म एक
ही काल बनाए र खए (यात्रा हो चुक है, इस लए भूतकाल)।

शब्द से जुड़े शब्द — पृष्ठ 57

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पाठ से

पाठ से शब्द क बात

प्र.1 नीचे दए गए ान म ‘ह र ार’ से जुड़े शब्द अपने मन से या पाठ से चुनकर ल खए— (शब्द-जाल के बीच म
‘ह र ार’ लखा है और उसके चार ओर सात रक्त खाने दए गए ह।)

बीच म ‘ह र ार’ है; सात खान म पाठ से चुने हुए शब्द भ रए। एक भरा हुआ नमूना —

खाने म ल खए पाठ म यह कहाँ है / यह ह र ार से कैसे जुड़ा है

गंगा “एक ओर त्रभुवन पावनी श्री गंगा जी क प वत्र धारा बहती है” — ह र ार क पहचान ही गंगा है।

हिर की पैड़ी “यहाँ ह र क पैड़ी नामक एक पक्का घाट है और यह स्नान भी होता है।”

नील धारा “श्री गंगा जी दो धारा हो गई ह— एक का नाम नील धारा…”

कनखल पाँच मुख्य तीथ म से एक — “यह कनखल तीथ बड़ा उत्तम है।”

िवल्वपवत “ वल्व पवत भी पास ही एक सुहाना पवत है जस पर वल्वेश्वर महादे व क मू त है।”

कु शा “यहाँ क कुशा सबसे वलक्षण होती है” — यहाँ क घास तक सुगं धत है।

धमशाला “तट पर राजाओं क धमशाला या त्रय के उतरने के हेतु बनी ह।”

और भी शब्द जो भरे जा सकते ह — कुशावत्त, ज्वालापुर, च ण्डका दे वी, पंडे, घाट, तीथ, स्नान, जनेऊ, वैरागी, दुकान, ग्रहण,
भागवत, पवत, ह रयाली।

ऐसा शब्द-जाल बनाते समय एक बात का ध्यान र खए: सभी सात शब्द एक ही तरह के न ह । अच्छा शब्द-जाल
वह है जसम अलग-अलग श्रे णयाँ आएँ — ान (कनखल, ज्वालापुर), प्रकृ त (गंगा, वल्वपवत, कुशा), लोग
(पंडे, वैरागी, यात्री) और कम (स्नान, पारायण)। इससे यह भी दख जाता है क ह र ार क्या-क्या है।

लेखन के अनोखे तरीके — पृष्ठ 57–58

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

पाठ से

पाठ से भाषा क बात

प्र.1 (क) ‘ह र ार’ पाठ म लेखक ने ह र ार के अपने अनुभव को बहुत ही सा ह त्यक और कल्पनाशील भाषा म
प्रस्तुत कया है जसम कई ान पर उन्ह ने तुलनात्मक वाक्य के माध्यम से दृश्य का वणन कया है। जैसे—
हरी-भरी लताओं क तुलना सज्जन से इस प्रकार क गई है— “पवत पर अनेक प्रकार क वल्ली हरी-भरी
सज्जन के शुभ मनोरथ क भाँ त फैलकर लहलहा रही है।” नीचे कुछ तुलनात्मक वाक्य दए गए ह। पाठ म
ढूँ ढ़ए क इन तुलनात्मक वाक्य को लेखक ने कस प्रकार व शष्ट तरीके से लखा है यानी व शष्टता प्रदान क
है? 1. वृक्ष क तुलना साधुओं से क गई है। 2. गंगाजल क मठास क तुलना चीनी से क गई है। 3. ह रयाली
क तुलना गलीचे से क गई है। 4. नद क धारा क तुलना राजा भगीरथ के यश (क त) से क गई है।

पाठ क मूल पं क्तयाँ ये ह —

क्रम लेखक क अपनी पं क्त व शष्टता कहाँ है

1. “बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े है ं मानो एक पैर से के वल ‘वृक्ष साधु जैसे है’ं नही ं कहा। पहले मुद ा िदखाई — एक पैर पर खड़ ा
खड़े तपस्या करते है ं और साध ओ
ु ं की भाँित घाम, तपस्वी — िफर तीन क ष्ट िगनाए (घाम, ओस , वष )। इससे तुल ना एक पूरा िचत्र
ओस और वष अपने ऊपर सहते है।
ं ” बन गई।

2. “जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और िमष्ट भी यहाँ एक साथ दो गुण पकड़ े गए है ं — ठं डक और िमठास। ‘चीनी का पना’
वैस ा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया िमठास दे ता है, ‘बरफ में जमाना’ ठं डक। एक ही क ल्पना में दोनों समा गए।
है। ”

3. “वष के कारण सब ओर हिरयाली ही िदखाई गलीचा के वल सुंद रता के िलए नही ं आया — उसका पयोजन भी बताया गया,
पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जाित्रयों के िवश्राम “जाित्र यों के िवश्राम के हेत”ु । इससे पकृ ित एक मेजबान बन जाती है जो याित्र यों
के हेत ु िबछायत िबछी थी।” के िलए िबछावन िबछा रही है।

4. “एक ओर ित्रभुवन पावनी श्री गंग ा जी की पिवत्र सबसे सूक्ष्म तुल ना। धारा िदखाई दे ती है, कीित िदखाई नही ं दे ती — िफर भी
धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीित ‘लता-सी’ जोड़ कर ले खक ने दोनों को िमला िदया, क्योंिक दोनों दू र तक फै लती
की लता-सी िदखाई दे ती है। ” है।ं साथ ही यह कथा भी याद िदला दी िक गंगा को भगीरथ ही लाए थे।

अलंकार पहचा नए: जहाँ ‘क भाँ त’, ‘-सी’, ‘जैसा’ आए — वहाँ उपमा है (क्रम 1 का दूसरा भाग, क्रम 4)।
जहाँ ‘मानो’ आए और एक चीज को दूसरी होने क कल्पना क जाए — वहाँ उत्प्रेक्षा है (क्रम 1 का पहला भाग, 2
और 3)। और वृक्ष को तपस्या करते हुए दखाना मानवीकरण है।

सीखने क बात: भारतदु क तुलना कभी अकेली नह आती — उसके साथ एक ब्योरा जुड़ा रहता है (एक पैर से
खड़े, वश्राम के हेतु, उज्ज्वल क त)। अपनी लखाई म भी उपमा के साथ एक ब्योरा जोड़ द जए; वाक्य तुरंत
जीवंत हो जाएगा।

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार
a g l AglaSem · NCERT Solutions

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m ये आज क
(ख) “म उस पुण्य भू म का वणन करता ँ जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है।” “पंडे भी यहाँ बड़े
वलक्षण संतोषी ह। एक पैसे को लाख करके मान लेते ह।” उपयुक्त पं क्तय को ध्यान से देeखए,
प्र.2

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o नह लखी गई ह। इसे लेखक ने न केवल अपनी शैली म लखा है, अaपतु
हद क.cतरह gl इसम प्राचीन हद भाषा
a s eछmव भी दखाई दे ती है। नीचे कुछ पं क्तयाँ द गई ह आप इन्ह आज क हद म ल खए। 1. “इन वृक्ष पर
gl अनेक रंग के पक्षी चहचहाते ह और नगर के दुष्ट ब धक से नडर होकर कल्लोल करते ह।” 2. “वषा के कारण
क
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सब ओर ह रयाली ही दृ ष्ट पड़ती थी मानो हरे गलीचा क जा त्रय के वश्राम के हेतु बछायत बछ थी।” 3. “यह

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ऐसा नमल तीथ है क इच्छा क्रोध क खा न जो मनुष्य ह सो वहाँ रहते ही नह ।” 4. “मेरा तो चत्त वहाँ जाते ही
ऐसा प्रसन्न और नमल हुआ क वणन के बाहरm
आनंदपूवक स्नान कया और दन म श्रीla s e है।” 5. “यहाँ रा त्र को ग्रहण हुआ और हम लोग ने ग्रहण म बड़े

a g भागवत का पारायण भी कया।” 6. “उस समय के पत्थर पर का भोजन
का सुख सोने क थाल के भोजन से कह बढ़ के था।” 7. “ नश्चय है क आप इस पत्र को ानदान द जएगा।”

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em.

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आज क हद म ये पं क्तयाँ इस प्रकार लखी जा सकती ह —

a s emआज क हद म
a gl क्रम कौन-सा शब्द बदलना पड़ा

इन पेड़ों पर रंग-िबरंगे पक्षी चहचहाते है ं और शहर के ू र
िशकािरयों का डर छोड़ कर मस्ती से चहकते-खेल ते रहते om शकारी · कल्लोल करना → मस्ती करना, खेलना a s
1. वृक्ष → पेड़ · अनेक रंग के → रंग- बरंगे · नगर → शहर · ब धक →

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क्र

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है।ं
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2. agही िदखाई दे ती थी,
बािरश की वजह से चारों ओर हिरयाली वषा → बा रश · दृ ष्ट पड़ना → दखाई दे ना · जा त्रय → या त्रय ·
मानो याित्रयों के आराम के िलए हरे रंग का कालीन िबछा वश्राम के हेतु → आराम के लए · गलीचा → कालीन · बछायत →

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.
िदया गया हो। बछावन/ बछा हुआ

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3.
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यह तीथ इतना पिव है िक लालच और गु से से भरे हुए
. लोग वहाँ िटक ही नही ं पाते।
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से भरे हुए · सो → वे ag
las
नमल → प वत्र/स्वच्छ · इच्छा → लालच · क्रोध क खा न → गुस्से

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agl 4. वहाँ पहचु ँ ते ही मेरा मन इतना पस और शांत हो गया िक
न्न चत्त → मन · नमल → शांत/स्वच्छ · वणन के बाहर है → वणन
उसका वणन िकया ही नही ं जा सकता।
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नह कया जा सकता

coबड़mे g l a
5.
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m का पूरा
यहाँ रात में गहण लगा और हम सबने गहण के समय
आनंद से नान िकया तथा िदन में ीमद्sभeागवत
रा त्र → रात · ग्रहण हुआ → ग्रहण लगा · आनंदपूवक → आनंद से ·
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स् श्र पारायण → आरंभ से अंत तक पूरा पाठ
पाठ भी िकया।

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उस समय पत्थर पर बैठकर खाए गए भोजन का सुख सोने थाल → थाली · बढ़ के था → अ धक था · ‘पत्थर पर का भोजन’

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6.
की थाली में खाए गए भोजन से कही ं अिधक था। जैसी बनावट को खोलकर लखना पड़ा
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m a e द जएगा → जगह दगे/प्रका शत
sानदान
.co मुझे िव वास है िक आप इस प को अपनी पि का में जगह
7.
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नश्चय है → वश्वास है ·

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श् त्र त्र

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दे ंगे (छापेंगे)।
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ध्यान दे ने वाली बात: बदलाव केवल शब्द का नह होता, वाक्य क बनावट का भी होता है। जैसे 6 म ‘पत्थर पर
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का भोजन का सुख’ म दो बार ‘का’ आया है — आज क हद म इसे ‘पत्थर पर बैठकर खाए गए भोजन का सुख’

a s emसो…’ क पुरानी जोड़ी को हटाकर सीधा वाक्य बनाना पड़ता है।
लखना पड़ता है। इसी तरह 3 म ‘जो…

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Check it yourself: अनुवाद करने के बाद अपना वाक्य जोर से प ढ़ए। य द कह अटकना पड़े तो वह कोई
पुरानी बनावट बची रह गई है।

प्र.3 (ग) इस रचना म ह रश्चंद्र जी ने कह -कह प्राचीन वतनी का प्रयोग कया है, जैसे— शखर के लए शषर, या त्रय
के लए जा त्रय । ऐसे शब्द क सूची बनाइए। आप इन शब्द को कैसे लखते ह? कक्षा म चचा क जए।

पाठ म मलने वाली प्राचीन वतनी और आज का रूप —

पाठ म (प्राचीन वतनी) आज हम ऐसे लखते ह अंतर कस तरह का है

िशषर िशखर ‘ख’ के ान पर ‘ष’

जाित्रयों याित्रयों ‘य’ के ान पर ‘ज’

मनोथ मनोरथ ‘र’ के बाद का ‘थ’ जुड़कर संयुक्त-सा लखा गया

ठं ढे-ठं ढे ठं डे-ठं डे ‘ड’ के ान पर ‘ढ’

बरफ बफ ‘र’ पर रेफ न लगाकर पूरा ‘र’ लखना

पगट पकट ‘क’ के ान पर ‘ग’

कु शावत्त कु शावत दोहरा ‘त्त’, आज एक ‘त’

चिण्डका चंिडका आधे ‘ण्’ के ान पर अनुस्वार (◌ं)

धारों धाराओं बहुवचन बनाने का पुराना ढं ग

दारचीनी दालचीनी ‘ल’ के ान पर ‘र’ (पाठ म दोन रूप मलते ह)

साक्षात साक्षात् अंत का हलंत (◌्) आज लगाया जाता है

कल्लोल क ल्लोल / कलोल वतनी वही, पर शब्द आज कम प्रयोग होता है

इनके अलावा कुछ शब्द ऐसे ह जनक वतनी नह , प्रयोग बदल गया है — वल्ली (लता), मष्ट (मीठा), ब धक ( शकारी), अथ
(याचक), नदान (आ खरकार), बछायत ( बछावन), पना (शरबत), पाट (नद क चौड़ाई)। इन्ह भी अपनी सूची म अलग खाने म
ल खए।

चचा के लए एक प्रश्न: वतनी बदलती क्य है? क्य क भाषा बोलने वाल के साथ चलती है। छपाई के मानक तय
होने से पहले हर लेखक जैसा बोलता था वैसा लखता था — इसी लए ‘यात्री’ कसी क्षेत्र म ‘जात्री’ बोला जाता था
और वैसा ही छप जाता था। आज मानक वतनी तय है, इस लए ऐसा अंतर कम दखता है।

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पुस्तक म ही एक रोचक अंतर दे खए: पाठ के मूल अंश म पं क्त है — “सब ओर ह रयाली ही दखाई पड़ती
थी”, जब क इसी पं क्त को अभ्यास म उद्धत करते समय लखा गया है — “सब ओर ह रयाली ही दृ ष्ट पड़ती थी”।
दोन का अथ एक ही है; ‘दृ ष्ट पड़ना’ पुराना प्रयोग है।

आपक बात — पृष्ठ 58
पाठ से आगे

पाठ से आगे

प्र.1 1. “मने गंगा जी के तट पर रसोई करके… भोजन कया।” क्या आपने कभी खुले वातावरण म या प्रकृ त के पास
भोजन कया है? वह अनुभव घर के खाने से कैसे भन्न था?

यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है। अच्छे उत्तर म तीन बात होनी चा हए — कहाँ और कब, वहाँ क्या-क्या महसूस हुआ, और
वह अनुभव घर के खाने से कन बात म अलग था।

तुलना का बदु घर का भोजन खुले म कया भोजन

वातावरण पंखा, द वार, तय जगह हवा, धूप-छाँव, पिक्षयों की आवाज, िम ी की गंध

तैयारी बना-बनाया मल जाता है सब िमलकर करते है ं — लकड़ ी बीनना, पत्तल लगाना, पानी लाना

साथ प्रायः प रवार, जल्द -जल्द सब एक साथ बैठते है,ं कोई जल्दी नही ं होती

स्वाद आदत का वही खाना अिधक स्वािद ष्ट लगता है — भूख, थकान और साथ िमलकर स्वाद बढ़ ा दे ते है ं

नमूना उत्तर: पछले वष हमारी कक्षा एक दन के भ्रमण पर बाँध के कनारे गई थी। दोपहर म हम सब एक पीपल के नीचे बैठ गए।
कसी ने पत्तल बछाई, कसी ने पानी क बोतल बाँट , और सबने अपने-अपने ट फन खोलकर बीच म रख दए। कसी क पूरी,
कसी का पराँठा, कसी का अचार — सब मलकर खाया गया। ऊपर से पत्त म से छनकर धूप गर रही थी और सामने पानी हल
रहा था। घर म खाते समय म अक्सर जल्द म रहता ँ; उस दन पहली बार मुझे लगा क खाना भी आराम से करने क चीज है। जो
रोट घर म साधारण लगती है, वही उस दन बहुत स्वा दष्ट लगी — शायद इसी लए भारतदु जी ने भी लखा था क पत्थर पर कया
वह भोजन सोने क थाल से बढ़कर था।

प्र.2 2. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने क थाल के भोजन से कह बढ़ के था।” आपके जीवन म
ऐसा कोई क्षण आया, जब कसी सामान्य-सी वस्तु ने आपको गहरा सुख दया हो? उसके बारे म बताइए।

उत्तर क बनावट: पहले वह क्षण बताइए, फर वह वस्तु, और अंत म यह क वह साधारण वस्तु उस दन असाधारण क्य बन गई।
अं तम बात ही उत्तर क जान है।

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नमूना उत्तर: पछली ग मय म एक दोपहर म साइ कल से लौट रहा था। लू चल रही थी और बोतल का पानी खत्म हो चुका था।
रास्ते म एक बुजुग ने अपनी दुकान के बाहर रखी म क सुराही से मुझे एक गलास पानी दया। वह न कोई ठं डा पेय था, न कसी
दुकान का। पर उस समय वह गलास भर पानी मुझे कसी भी चीज से अ धक अच्छा लगा। घर लौटकर ज का पानी पीते समय
मुझे वह स्वाद याद आया और मने सोचा — वस्तु तो वही थी, अंतर मेरी जरूरत का था।

यही बात पाठ भी कहता है: लेखक के लए भी भोजन नया नह था, थाली नई थी — पत्थर। पर जगह, समय और
मन क अव ा ने उस साधारण भोजन को सबसे बड़ा सुख बना दया। इसका अथ यह हुआ क सुख वस्तु म नह ,
वस्तु और हमारे बीच के संबंध म होता है।

Tip: ऐसा उत्तर लखते समय बड़ी और महँगी घटनाएँ मत चु नए। जतनी साधारण वस्तु होगी, उत्तर उतना ही
प्रभावी बनेगा — यही प्रश्न का उ े श्य भी है।

प्र.3 3. “हर तरफ प वत्रता और प्रसन्नता बखरी हुई थी।” आपको कस ान पर प वत्रता और प्रसन्नता का अनुभव
होता है? क्या कोई ऐसा ान है जहाँ जाते ही मन शांत हो गया हो? उस ान क कौन-सी बात आपको अच्छ
लग ?

ध्यान र खए — प्रश्न ‘प वत्र ान’ का नह , उस ान का है जहाँ आपका मन शांत होता है। वह मं दर, गुरु ारा, म स्जद या
गरजाघर हो सकता है; पर पुस्तकालय, नद का कनारा, खेत, छत या दाद का कमरा भी हो सकता है।
अच्छे उत्तर म ये बात आनी चा हए

ान का नाम और वह कहाँ है
वहाँ क दो-तीन ठोस बात — कोई आवाज, कोई गंध, कोई दृश्य
मन शांत क्य होता है — इसका कारण

नमूना उत्तर: हमारे मोहल्ले के पीछे एक पुराना बगीचा है जसम एक बड़ा बरगद है। शाम को वहाँ बहुत कम लोग होते ह। उस
बरगद क जड़ पर बैठते ही सबसे पहले शोर कम हो जाता है — सड़क क आवाज दूर से आती हुई लगती है। ऊपर हजार पत्त क
सरसराहट होती है और लौटते प क्षय का शोर। म म पानी छड़का हो तो एक गंध उठती है जो मुझे बहुत अच्छ लगती है। वहाँ
मुझसे कोई कुछ नह पूछता, कोई काम याद नह दलाता। शायद इसी लए वहाँ बैठते ही मन शांत हो जाता है। मुझे लगता है क
कसी ान क प वत्रता उसक इमारत से नह , वहाँ मलने वाली शां त और सुरक्षा से बनती है — जैसे ह र ार म लेखक को
“झगड़े-लड़ाई का कह नाम भी नह ” मला था।

प्र.4 4. पाठ म व णत है, यहाँ के वृक्ष “फल, फूल, गंध… जले पर भी कोयले और राख से लोग का मनोरथ पूण करते
ह।” क्या आपके जीवन म कोई पेड़, फूल या प्राकृ तक वस्तु है जससे आप वशेष जुड़ाव महसूस करते ह? क्य ?

उत्तर म ‘क्य ’ सबसे जरूरी है। जुड़ाव कसी न कसी याद से बनता है — कसने लगाया, कसके साथ दे खा, कब सहारा मला।
वही याद ल खए।

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नमूना उत्तर: हमारे आँगन म एक अमरूद का पेड़ है जसे मेरे दादा जी ने मेरे जन्म के वष लगाया था। घरवाले कहते ह क म और
वह पेड़ साथ-साथ बड़े हुए। ग मय म उसक छाया म चारपाई डाली जाती है, बरसात म उसके पत्त से टपकती बूँद गनना मुझे
अच्छा लगता है, और स दय म उसके फल पूरे मोहल्ले म बँटते ह। पछले वष तेज आँधी म उसक एक बड़ी डाल टू ट गई थी। उस
रात मुझे ठ क से न द नह आई — मानो घर का कोई सदस्य घायल हो गया हो। तभी मने समझा क पाठ म जन वृक्ष को ‘सज्जन’
कहा गया है, वे वस्तु नह होते; वे साथी होते ह। मेरा उससे जुड़ाव इस लए है क उसने कभी कुछ माँगा नह और दे ना कभी बंद नह
कया।

Try This: अपने चुने हुए पेड़ या पौधे का एक चत्र बनाइए और उसके चार ओर वे सब चीज ल खए जो वह
आपको दे ता है — ठ क वैसे ही जैसे लेखक ने फल, फूल, गंध, छाया… क सूची बनाई थी।

प्रकृ त का स दय और संरक्षण — पृष्ठ 58–59
पाठ से आगे

पाठ से आगे प रयोजना

प्र.1 “यह भू म तीन ओर सुंदर हरे-हरे पवत से घरी है…” आपने पत्र म पढ़ा क ह र ार का प्राकृ तक स दय अ त
है। इस स दय को बनाए रखने म प्रत्येक मानव क महत्वपूण भू मका है। इस वषय म अपने समूह म चचा
क जए। इसके बाद अपने समूह के साथ मलकर “तीथ ही नह , पृथ्वी भी पावन हो!” वषय पर जन-जागरूकता
पोस्टर बनाइए।

पहले चचा — कन बदुओं पर

तीथ ान पर सबसे बड़ी समस्याएँ क्या ह — प्ला स्टक, पूजा-सामग्री और पॉली थन का नद म बहाना, भीड़, वाहन का धुआँ,
पहाड़ पर अ नयो जत नमाण।
क्या हम केवल तीथ को प वत्र मानते ह और अपने मोहल्ले, नद , तालाब को नह ? यही तो नारे का प्रश्न है — पावन केवल
तीथ क्य , पूरी पृथ्वी क्य नह ?
एक व ाथ क्या कर सकता है — अपना कचरा वापस लाना, कपड़े का थैला, नल बंद करना, पौधा लगाना, दूसर को टोकना।

पोस्टर कैसे बनाइए — नयम

1. एक ही मुख्य नारा, सबसे बड़े अक्षर म और सबसे ऊपर।
2. एक ही मुख्य चत्र — बहुत सारे छोटे चत्र पोस्टर को कमजोर कर दे ते ह।
3. तीन से चार छोटे संदेश, हर एक अ धक-से-अ धक पाँच-छह शब्द का।
4. नीचे एक कोने म समूह का नाम/कक्षा। खाली जगह छो ड़ए — भरा हुआ पोस्टर पढ़ा नह जाता।

नमूना पोस्टर (सामग्री)

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार
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तीथ ही नही ं पृथ्वी भी पावन हो

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(िच त्र: बीच में एक नदी और उसके िकनारे पवत ; एक ओर कचरा-मुक्त स्वच् छ घाट , दू सरी ओर कू ड़ े से भरा
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a•gजोl साथ लाए है,ं वही वापस ले जाएँ

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• नदी को भे ंट फूल चढ़ ाइए, पॉलीिथन नही ं
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• एक यात्रा, एक पौधा
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• पिवत्रता जल में नही ं, व्यवहार में है a

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— कक्षा 8, पय वरण मंडल

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नारा अच्छा क्य है: “तीथ ही नह , पृथ्वी भी पावन हो!” म एक तुलना छपी है — यह हमारी अपनी सोच पर प्रश्न

a gl उठाता है। जस पोस्टर म केवल आदे श हो (“कचरा मत फैलाओ”) वह भूल जाता है; जो सोचने पर मजबूर करे, वह
याद रह जाता है।

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स्वास्थ्य और योग — पृष्ठ 59 a g
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पाठ से आगे

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पाठ से आगे गतवध

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a s em “ चत्त म बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भ क्त का उदय होता था।” (क) 5 मनट ध्यान लगाकर या मौन बैठकर अपने
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प्र.1

a आस-पास क ध्व नय को सु नए, अपनी ास पर ध्यान द जए तथा ध्यान को क द्रत करने का प्रयास क जए।
इस अनुभव के वषय म एक अनुच्छेद ल खए।
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पहले ग त व ध क जए, तब ल खए। बैठने का तरीका — सीधी कमर, आँख बंद या अधखुली, हाथ घुटन पर, साँस सामान्य।
पाँच मनट का समय पहले से लगा ली जए ता क बार-बार घड़ी न दे खनी पड़े।

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अनुच्छेद म क्या-क्या ल खए

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om सी ध्व नयाँ सुनाई द — जो पहले सुनाई नह देती थ l as
पहले एक मनट म क्या हुआ (प्रायः मन इधर-उधर भागता है)
.cकौन-कौन a g
se m साँस पर ध्यान देते समय क्या बदला
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पाँच मनट बाद कैसा लगा

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— भीतर जाती हवा ठं डी लगती है और बाहर आती हवा हल्क गरम। इसकेag
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नमूना उत्तर: जब म आँख बंद करके बैठा तो पहले एक मनट म मन बल्कुल र नह हुआ — कभी गृहकाय याद आया, कभी

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बाद धीरे-धीरे आवाज अलग-अलग सुनाईsदेeने लग । पंखे क घरघराहट, दूर सड़क पर कसी गाड़ी का हॉन, बगल के पेड़ पर बैठ
कल का खेल। फर मने ध्यान केवल साँस पर लगाया

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

च ड़या, और सबसे पास — मेरी अपनी साँस। ये सारी आवाज पहले भी थ , पर मने कभी सुनी नह थ । पाँच मनट बाद जब मने
आँख खोल तो शरीर हल्का लगा और मन म जल्दबाजी नह थी। मुझे लगा क ध्यान का अथ मन को रोकना नह , उसे एक जगह
टकने दे ना है।

Did you know? हर वष 21 जून को अंतररा ीय योग दवस मनाया जाता है। इसक शुरुआत संयुक्त राष्ट्र
संघ के प्रस्ताव के बाद सन् 2015 से हुई।

प्र.2 (ख) अंतररा ीय योग दवस के उपलक्ष्य म अपने व ालय के कायक्रम को बताने के लए एक ‘सूचना’ ल खए
जसे सूचना-पट पर लगाया जा सके।

सूचना के अंग — सं ा का नाम, ‘सूचना’ शीषक, दनांक, वषय, मुख्य जानकारी (क्या, कब, कहाँ, कसके लए), और अंत म
लखने वाले का नाम एवं पद। सूचना म भाव नह , केवल जानकारी होती है और वह सदै व सं क्षप्त होती है।
नमूना उत्तर

राजकीय उ च् च तर मा ध्यिमक िव ालय , हिर ार

स ूच ना

िदनांक : 14 जून 20XX

िवषय — अंत ररा ीय योग िद वस के काय क्र म

समस्त िव ािथयों को सूिचत िकया जाता है िक 21 जून को अंत ररा ीय योग िदवस के अवसर पर िव ालय में

िनम्निलिखत कायक्रम आयोिजत िकए जाएँगे —

1. सामूिहक योगाभ्यास — पातः 6:30 से 7:30 बजे तक, िव ालय पांगण में

2. ‘योग और स्वस्थ जीवन’ िवषय पर व्याख्यान — पातः 8:00 बजे, सभागार में
3. पोस्टर एवं िनबंध पितयोिगता — पातः 9:00 बजे, कक्षा-कक्षों में

सभी िव ाथ सफेद वेशभूषा में उपिस्थत हों तथा अपने साथ योग-मैट या चादर अवश्य लाएँ। नाम 19 जून तक

कक्षाध्यापक के पास िलखवा दे ं।

कु . मीरा वम

सिचव, िव ाथ पिरषद्

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

ध्यान द जए: सूचना म ‘हम सबको योग करना चा हए’ जैसे उपदे श नह लखे जाते। जो पढ़ने वाला जानना चाहता
है — क्या, कब, कहाँ, क्या लाना है, नाम कहाँ लखवाना है — बस वही लखा जाता है। इसे एक बॉक्स म
लखकर सूचना-पट पर लगाइए।

सज्जन वृक्ष — पृष्ठ 59
पाठ से आगे

पाठ से आगे प रयोजना

प्र.1 “सज्जन ऐसे क पत्थर मारने से फल दे ते ह।” (क) एक पौधा लगाइए और उसक दे खभाल क जए ता क वह
कुछ वष म बड़ा पेड़ बन सके। उसे एक नाम द जए और उसका मत्र ब नए।

यह करने वाली ग त व ध है। इसे ठ क से करने के लए यह क्रम अपनाइए —

1. पौधा चु नए — वही जो आपके क्षेत्र म आसानी से पनपे। नीम, पीपल, अमरूद, जामुन, अमलतास, गुड़हल, तुलसी —
ानीय पौधे सबसे कम दे खभाल माँगते ह। नसरी या वन वभाग से पूछ ली जए।
2. जगह चु नए — जहाँ बड़ा होने पर उसे जगह मले, धूप आती हो और वह कसी द वार या तार के नीचे न हो।
3. लगाइए — ग ा पौधे क जड़ से थोड़ा बड़ा, नीचे थोड़ी खाद, फर म दबाकर तुरंत पानी। आसपास घेरा लगा द जए ता क
पशु न पहुँच।
4. दे खभाल — शुरू के कुछ हफ्ते रोज पानी, फर सप्ताह म दो-तीन बार। खरपतवार हटाते र हए। महीने म एक बार जड़ के पास
क म हल्क खोद द जए ता क हवा मले।
5. नाम द जए — जैसे ‘सज्जन’, ‘मीत’, ‘छाया’, ‘ह रया’। नाम दे ने से लगाव बनता है और लगाव से दे खभाल छू टती नह ।

मेरा पौधा ववरण

नाम स ज्जन

पकार नीम

लगाने का िदनांक 5 जुल ाई 20XX

स्थान िव ालय के मैद ान का उ त्तरी कोना

दे खभाल का िदन पत्येक मंगलवार और शिनवार

नाम ‘सज्जन’ ही क्य : पाठ क जस पं क्त से यह ग त व ध नकली है, उसी म वृक्ष को सज्जन कहा गया है। नाम
म पाठ क याद जुड़ जाए तो ग त व ध केवल काम नह , पढ़ाई का हस्सा बन जाती है।

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 (ख) उसके बारे म अपनी दै नं दनी म नय मत रूप से ल खए।

दै नं दनी (डायरी) लखने का ढं ग: ऊपर दनांक और दन, फर उस दन जो दे खा वह — और अंत म अपनी एक पं क्त का
वचार। हर बार लंबा लखने क जरूरत नह ; नय मत होना लंबा होने से अ धक जरूरी है।
प्रत्येक प्र व ष्ट म ये चीज दज क जए — पौधे क ऊँचाई, नई प त्तयाँ, पानी दया या नह , मौसम, और कोई वशेष बात (क ड़ा लगा,
कली आई, कोई पक्षी बैठा)।
नमूना उत्तर (तीन प्र व ष्टयाँ)
5 जुलाई, श नवार — आज ‘सज्जन’ को मैदान के उत्तरी कोने म लगाया। ऊँचाई लगभग एक बत्ता। म दबाकर दो लोटा पानी
दया और चार ओर बाँस का घेरा बना दया। लगाते समय हाथ म से भर गए, पर अच्छा लगा। सोचा — यह पेड़ मुझसे लंबा तब
होगा जब म शायद इस व ालय म नह र ँगा।
19 जुलाई, श नवार — दो नई प त्तयाँ नकली ह, बहुत हल्के हरे रंग क । इस सप्ताह अच्छ बा रश हुई इस लए पानी नह दे ना
पड़ा। नीचे उगी घास हटाई। पड़ोस क कक्षा के दो ब े भी दे खने आए और उन्ह ने भी एक पौधा लगाने का नश्चय कया।
16 अगस्त, श नवार — ऊँचाई अब लगभग डेढ़ फुट। कुछ प त्तय के कनारे कटे हुए मले — शायद कोई क ड़ा है। माली काका ने
नीम के ही पत्त का पानी छड़कने को कहा, दवा नह । आज पहली बार एक गौरैया घेरे पर आकर बैठ । पाठ क वह पं क्त याद आई
— “इन वृक्ष पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते ह।” मेरा पेड़ अभी छोटा है, पर काम शुरू हो चुका है।

Tip: हर महीने क एक तस्वीर या एक छोटा रेखा चत्र भी डायरी म चपकाइए। साल के अंत म उन्ह साथ रखकर
दे खए — पौधे का बढ़ना और अपना लखना, दोन साथ-साथ दखाई दगे।

अपने शब्द — पृष्ठ 59–60
पाठ से आगे

पाठ से आगे शब्द क बात

प्र.1 “शीतल वायु… स्पश ही से पावन करता हुआ संचार करता है।” आइए, एक रोचक ग त व ध करते ह। ‘शीतल’
शब्द को कद्र म र खए और उसके चार ओर ये चार बात ल खए— अथ, वपरीताथक शब्द, समानाथ शब्द,
वाक्य प्रयोग। अब इसी प्रकार आपके समूह का प्रत्येक सदस्य इस पत्र से एक-एक शब्द चुनकर उसके लए ऐसा
ही शब्द- चत्र बनाए।

‘शीतल’ का शब्द- चत्र

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

खाना भ रए

अथ ठं डा; िजसे छू ने या पास होने से ठं डक और सुख िमले

समानाथ शब्द ठं डा, शीत, सद , शीतल -सा सुहावना

िवपरीताथक शब्द उ ष्ण, गरम, तप्त, ताप

वाक्य पयोग पवतों से आती शीतल वायु ने दोपहर की सारी थकान िमटा दी।

अब इसी ढं ग पर पत्र के और शब्द — समूह के हर सदस्य के लए एक-एक —

शब्द अथ समानाथ वपरीताथक वाक्य प्रयोग

िनमल स्वच्छ, बना मैल का शुद्ध, स्वच्छ, पावन मिलन, गंद ा, दू िषत पहाड़ी झरने का नमल जल तली तक
दखाई दे ता है।

िमष्ट मीठा मधुर, मीठा कटु, कड़ वा, ितक्त उसक मष्ट वाणी सुनकर क्रोध शांत हो
गया।

िवलक्षण अनोखा, असाधारण अद् भतु , अनोखा, साधारण, सामान्य छोट उम्र म उसक वलक्षण प्र तभा
अपूव सबको च कत कर गई।

संतोषी जो जतने म गुजारा हो जाए संतष्ु ट, तप्ृ त, लोभी, असंतष्ु ट, संतोषी व्य क्त के पास कम होकर भी
उतने म प्रसन्न रहे अल्पसंतोषी लालची कमी नह होती।

पावन प वत्र करने वाला पिवत्र, पुण्य, शुद्ध अपिवत्र, अशुद्ध गंगा को पावन नद माना जाता है।

पसन्न खुश हिषत, आनंिदत, उदास , िख , दुखी
न्न प रणाम सुनकर पूरा प रवार प्रसन्न हो
खुश गया।

ऐसा शब्द- चत्र क्य उपयोगी है: केवल अथ रटने से शब्द याद नह रहता। पर जब आप उसका समानाथ ,
वपरीताथक और अपना बनाया वाक्य — तीन एक साथ लखते ह, तो शब्द चार दशाओं से जुड़ जाता है और
लखते समय अपने आप याद आ जाता है।

यात्रा के व्यय क गणना — पृष्ठ 60

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार
a g l AglaSem · NCERT Solutions

पाठ से आगे
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पाठ से आगे गतवध

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इस पत्र म आपने ह र ार क एक यात्रा का वणन पढ़ा है। मान ली जए क आपको अपने मत्र या अ भभावक
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प्र.1
के साथ अपनी रु च के कसी ान क यात्रा करनी है। उस ान को ध्यान म रखते हुए नम्न ल खत प्रश्न के

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उत्तर द जए— (क) मान ली जए क यात्रा के लए आपको ₹1000 दए गए ह। यात्रा, खाना आ द सब मलाकर
एक व्यय ववरण बनाइए।
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चुना गया ान: अपने शहर से लगभग 60 कलोमीटर दूर एक पुराना कला और उसके पास का तालाब — एक दन क यात्रा,

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चार मत्र के साथ।

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क्रम मद ब्योरा रा श (₹)

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a g 1. बस का िकराया (आना-जाना) ₹120 एक ओर × 2 240

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2. पवेश शुल्क कला — व ाथ टकट 40

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3. बस अ े पर
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सुबह का नाश्ता 80

4. दोपहर का भोजन agl ानीय भोजनालय म थाली 150

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5. पानी और पेय बोतल तथा न बू-पानी 60

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स्थानीय ऑटो/िरक्शा 120

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स्म ृित िचह्न छोट वस्तु (प्रश्न ख दे खए) 100

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8. आपात के िलए बचत दे र हो जाने, दवा या बस छू टने क त के लए 210

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जोड़ िमलाकर दे िखए —
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240 + 40 = 280
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280 + 80 = 360
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510 + 60 = 570

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570 + 120 = 690

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690 + 100 = 790
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790 + 210 = 1000 ✔ a g l

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

बजट बनाने के तीन नयम: (1) पहले अ नवाय खच ल खए — आना-जाना, टकट, भोजन, पानी। (2) फर
इच्छा वाले खच — स्मृ त चह्न, खेल, आइसक्र म। (3) कम-से-कम पाँचवाँ हस्सा आपात के लए बचाकर
र खए। जो बजट पूरा-का-पूरा खच दखाता है, वह असल म बजट नह होता।

Try This: यात्रा से लौटकर वास्त वक खच क एक दूसरी सूची बनाइए और दोन को साथ र खए। कहाँ अनुमान
गलत नकला — यही सबसे उपयोगी सीख होती है।

प्र.2 (ख) मान ली जए क आप इस यात्रा म एक छोट वस्तु (स्मृ त चह्न) खरीदना चाहते ह। आप क्या खरीदगे और
क्य ? (संकेत — सो चए, क्या वह आवश्यक है? बजट कैसे संभालगे?)

म क्या खरीदूँ गा: उस ान के कारीगर क बनाई एक छोट म क कुल्हड़-जोड़ी या हाथ से बुना कपड़े का थैला — लगभग
₹100 म।
क्य — तीन कारण

1. यह उसी जगह क पहचान है। जो चीज हर शहर म मलती है (क चेन, प्ला स्टक का खलौना), वह स्मृ त चह्न नह बनती।
ानीय हाथ से बनी वस्तु उस जगह क कहानी साथ लाती है।
2. पैसा वह के कारीगर तक पहुँचता है। इससे यात्रा से उस जगह को भी कुछ मलता है, केवल हम ही नह ।
3. यह काम भी आती है। कपड़े का थैला रोज उपयोग होगा और एक पॉली थन कम इस्तेमाल होगी — यानी वस्तु याद भी है और
उपयोगी भी।

क्या यह आवश्यक है? सच कह तो नह — स्मृ त चह्न कभी आवश्यक नह होता। इसी लए इसे बजट म सबसे अंत म रखा गया
है। य द दन म कोई अनपे क्षत खच आ जाए (बस छू ट जाए, दवा लेनी पड़े), तो सबसे पहले यही खच छोड़ा जाएगा।
बजट कैसे संभालूँगा

सुबह ही तय कर लूँगा क स्मृ त चह्न पर ₹100 से अ धक नह जाएगा — पहले सीमा, फर खरीदारी।
खरीदने से पहले दो-तीन दुकान पर दाम दे ख लूँगा।
खरीदारी लौटते समय करूँगा, ता क तब तक पता चल जाए क कतना पैसा वास्तव म बचा है।
हर खच एक छोट परची पर लखता चलूँगा — बजट टू टता तभी है जब हसाब मन म रखा जाता है, कागज पर नह ।

पाठ से जो ड़ए: भारतदु जी ने ह र ार से कोई वस्तु नह खरीद — वे “ चत्त से” वह रह गए और उन्ह ने अनुभव
को पत्र के रूप म सहेजा। कभी-कभी सबसे अच्छा स्मृ त चह्न वह होता है जो हम खरीदते नह , लखते ह।

यात्रा सबके लए — पृष्ठ 60–61

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

पाठ से आगे

पाठ से आगे गतवध

प्र.1 (क) कल्पना क जए क कुछ मत्र का समूह एक यात्रा पर जा रहा है। आप एक मागदशक या टू रस्ट गाइड ह।
आप इन सबक यात्रा को सु वधाजनक बनाने के लए कन- कन बात का ध्यान रखगे? उपयुक्त चत्र म सबक
अलग-अलग आवश्यकताएँ हो सकती ह। इन्ह ध्यान म रखते हुए सो चए क वहाँ पहुँचने, घूमने, भोजन आ द म
आप कैसे सहायता करगे?

पुस्तक म दया गया चत्र ध्यान से दे खए — उसम एक जैसे लोग नह ह। उसम छड़ी लए एक दृ ष्टबा धत व्य क्त, कान क मशीन
लगाए एक बुजुग, प हयेदार कुस पर बैठ एक लड़क , गोद म शशु लए एक म हला, छोटे ब े, चश्मा लगाए बुजुग और अलग-
अलग पहनावे के स्त्री-पुरुष — सब एक ही समूह म ह। अच्छा गाइड वही है जसक योजना इन सबके लए एक साथ काम करे।

चरण कन बात का ध्यान रखूँगा

यात्रा से सबसे पहले हर व्य क्त से पूछूँगा क उसे कस बात म सहायता चा हए — अनुमान नह लगाऊँगा। दवाइयाँ, चश्मा, कान क
पहले मशीन, बैटरी, छाता, पानी — इनक सूची पहले ही भेज दूँ गा। पूरे माग क जानकारी लखकर भी दूँ गा और बोलकर भी बताऊँगा,
ता क दृ ष्टबा धत और श्रवणबा धत — दोन तक बात पहुँचे।

वहाँ ऐसी बस/गाड़ी चुनूँगा जसम चढ़ने के लए रप हो या नीची सीढ़ । प हयेदार कुस और शशु वाली माता के लए दरवाजे के पास
पहुच
ँ ने में क सीट पहले से रखूँगा। रास्ते म हर दो घंटे पर वश्राम, जहाँ शौचालय सुलभ हो।

घूम ने में पहले से पता कर लूँगा क कहाँ सी ढ़याँ ह और कहाँ ढलान वाला रास्ता। समूह क चाल सबसे धीमे चलने वाले के हसाब से
रखूँगा, सबसे तेज के नह । जो दखाई नह दे ता उसे शब्द म बताऊँगा; जो सुनाई नह दे ता उसे लखकर या संकेत से बताऊँगा।
बीच-बीच म छाया म बैठने क जगह तय रखूँगा।

भोजन में पहले पूछूँगा — कसी को कोई चीज से एलज है? कोई शाकाहारी/ नराहारी है? ब और बुजुग के लए हल्का भोजन।
भोजनालय ऐसा चुनूँगा जहाँ प हयेदार कुस अंदर तक जा सके और शौचालय पास हो। पानी सबके पास हमेशा रहे।

सुर क्षा सबके पास एक परची — जस पर समूह का नाम, मेरा नंबर और लौटने का समय हो। भीड़ म बछड़ जाने पर मलने का एक
ान पहले ही तय। प्राथ मक च कत्सा पेट साथ। और हर आधे घंटे म एक बार गनती।

सबसे बड़ा नयम: सहायता ऐसी हो जो साथी को स्वतंत्र बनाए, दयनीय नह । कसी क प हयेदार कुस बना पूछे
मत ख चए, दृ ष्टबा धत साथी का हाथ पकड़कर मत ले जाइए — अपना हाथ पकड़ने द जए। और बात हमेशा उसी
व्य क्त से क जए, उसके साथ आए व्य क्त से नह ।

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 (ख) अपने कसी मत्र के साथ बना बोले संवाद क जए— संकेत से। अब सो चए क यात्रा म श्रवणबा धत
व्य क्त के लए क्या-क्या आवश्यक होगा?

पहले ग त व ध: मत्र के साथ पाँच मनट बना बोले बात क जए — केवल हाथ, चेहरे और संकेत से। को शश क जए क आप ये
बात कह सक — “भूख लगी है”, “बस उधर है”, “थोड़ा रुको”, “मुझे समझ नह आया”, “धन्यवाद”। फर सो चए क कस बात
म सबसे अ धक क ठनाई हुई।
प्रायः यह अनुभव होता है — साधारण बात संकेत से आसानी से कह द जाती ह, पर जैसे ही कोई नई जानकारी दे नी हो (जैसे
“गाड़ी दस मनट दे र से आएगी”), संकेत कम पड़ जाते ह। ठ क यही क ठनाई यात्रा म श्रवणबा धत व्य क्त के सामने आती है।
यात्रा म उनके लए क्या-क्या आवश्यक होगा

ल खत सूचना — गाड़ी का समय, प्लेटफाम, कायक्रम, चेतावनी: सब लखकर या मोबाइल पर टाइप करके दखाना। रेलवे
स्टे शन पर लगे प्रदशन-पट ( डस्प्ले बोड) इसी लए महत्वपूण ह।
आमने-सामने और रोशनी म बात — ता क वे ह ठ, चेहरा और भाव पढ़ सक। पीठ पीछे से या मुँह ढककर बोलने से कुछ
काम नह बनता। धीरे और साफ बो लए, चल्लाइए मत।
सांके तक भाषा — य द समूह म कोई भारतीय सांके तक भाषा जानता हो तो सबसे अच्छा। न हो तो कुछ तय संकेत पहले से
बना ली जए — रुकना, चलना, खतरा, भोजन, शौचालय, मलने का ान।
दृश्य संकेत — न े, चत्र, तीर के नशान, रंगीन बैज। समूह का ध्यान ख चने के लए हाथ हलाना या हल्का-सा कंधे पर स्पश
(पीछे से अचानक नह )।
उपकरण का ध्यान — कान क मशीन क अ त रक्त बैटरी, उसे भीगने से बचाना, और मोबाइल म कंपन (वाइ ेशन) चालू
रखना।
व्यवहार — उनक उप त म उनके बारे म कसी और से बात मत क जए। और यह मत मा नए क सुनाई न दे ने का अथ
समझ न आना है।

Did you know? भारत म भारतीय सांके तक भाषा (Indian Sign Language) के लए एक अलग शोध
एवं प्र शक्षण कद्र है। समाचार म जो व्य क्त कोने के छोटे खाने म हाथ से संकेत करता दखता है, वह यही भाषा
बोल रहा होता है।

प्र.3 (ग) यात्रा करते हुए ऐ तहा सक धरोहर या भवन क सुरक्षा के लए आप कन कन बात का ध्यान रखगे?

धरोहर एक बार टू ट जाए तो दोबारा नह बनती — यही उसे साधारण इमारत से अलग करता है। इस लए नयम कड़े होते ह।

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क्या नह करना है क्य

दीवारों पर नाम िलखना या खुर चना पत्थर पर िलखा िनशान सै क ड़ ों वष रहता है और मूल नक्काशी को स्थायी रूप से नष्ट कर दे ता है।
यह कानूनन अपराध भी है।

मूितयों, नक्काशी या िभित्तिचत्रों को छू ना हाथ का पसीना और तेल पत्थर तथा रंग को धीरे -धीरे खा जाता है। हजारों हाथ िमलकर वही करते
है ं जो सिदयों की बािरश नही ं कर पाई।

कही ं भी कचरा, पॉलीिथन या बचा खाना इससे पिरसर गंद ा होता है, आवारा पशु और कीट आते है ं और नमी से दीवारे ं खराब होती है।ं
फें कना

दीवारों-रे िलंग पर चढ़ ना, बाड़ पार करना पुरानी संरचना कमजोर हो चुक ी होती है — खतरा इमारत को भी है और आपको भी।

मना होने पर भी फ्लै श या ितपाई से िचत्र तेज पकाश पुराने रंगों और िभित्तिचत्रों को फीका करता है। इसीिलए कई जगह ‘नो फ्लै श’ िलखा
ले ना होता है।

पत्थर, ईंट या कोई अवशेष ‘िनशानी’ के हर आगंतक
ु एक टुक ड़ ा ले जाए तो कु छ वष ं में स्मारक ही नही ं बचेगा।
रूप में ले जाना

और क्या-क्या क जए — नधा रत रास्ते पर ही च लए; सूचना-पट प ढ़ए और उनका पालन क जए; शोर मत क जए; गाइड या
पुरातत्व वभाग के कमचारी क बात मा नए; कह टू ट-फूट या नुकसान दखे तो उसक सूचना द जए; और जो दूसरे लोग नयम
तोड़ रहे ह उन्ह वनम्रता से टोक द जए।

सो चए: भारतदु जी ने 1871 म जो ह र ार दे खा था, उसका बड़ा हस्सा आज भी है — इसी लए हम उनका वणन
पढ़कर मला सकते ह। धरोहर क रक्षा का अथ यही है — आने वाली पीढ़ को भी वही मलावा जो हम मला।

आज क पहेली — पृष्ठ 61
पाठ से आगे

पाठ से आगे पहे ली

प्र.1 पाठ म से शब्द खो जए और नीचे दए गए रक्त ान म ल खए— 1. एक मसाले का नाम 2. कपास से जुड़ा
एक शब्द 3. जहाँ स्नान होता है 4. वृक्ष के कसी अंग का नाम 5. एक नगर या तीथ का नाम 6. व्यापार से जुड़ा
ान 7. एक नद का नाम 8. एक पवत का नाम 9. एक धा मक ग्रंथ का नाम

सारे उत्तर पाठ म से ही मलते ह —

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार
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क्रम संकेत उत्तर पाठ क पं क्त

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एक मसाले का नाम दालचीनी
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“ जसम से दालचीनी, जा वत्री इत्या द क अच्छ सुगंध आती है” (जा वत्री भी सही है)

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जनेऊ “जनेऊ यहाँ का अच्छा महीन और उज्ज्वल बनता है” — जनेऊ कपास के सूत से ही
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घाट
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3. जहाँ स्नान होता है “यहाँ ह र क पैड़ी नामक एक पक्का घाट है और यह स्नान भी होता है” (ह र क पैड़ी

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भी स्वीकाय)

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4. वृक्ष के कसी अंग का
नाम
छाल ag“फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़” — इनम से कोई भी लखा
जा सकता है

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5. एक नगर या तीथ का कनखल “यह कनखल तीथ बड़ा उत्तम है” (ह र ार, ज्वालापुर, कुशावत्त भी सही)

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नाम

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se mव्यापार से जुड़ा ान
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दुक ान
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6. “दुकान भी बनी ह पर रात को बंद रहती ह”

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a 7. एक नद का नाम गंगा “एक ओर त्रभुवन पावनी श्री गंगा जी क प वत्र धारा बहती है” (नील धारा भी सही)

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8. एक पवत का नाम िवल्वपवत “ वल्व पवत भी पास ही एक सुहाना पवत है जस पर वल्वेश्वर महादे व क मू त है”

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भागवत
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9. एक धा मक ग्रंथ का “ दन म श्री भागवत का पारायण भी कया”
नाम

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Try This: अब आप स्वयं इसी पत्र से नौ नए संकेत बनाइए (जैसे — ‘एक प वत्र घास का नाम’, ‘एक दे वी का
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नाम’, ‘नद क चौड़ाई के लए प्रयुक्त शब्द’) और अपने साथी को हल करने द जए।

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झरोखे से — ह र ार के माग म — पृष्ठ 61
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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

पाठ से आगे

पाठ से आगे

प्र.1 भारतदु ह रश्चंद्र ारा लखे एक और पत्र का एक अंश नीचे दया गया है। इसे प ढ़ए और आपस म वचार
क जए। ह र ार के माग म — “ह र ार के माग म अनेक प्रकार के वृक्ष और पक्षी दे खने म आए। एक पीले रंग
का पक्षी छोटा बहुत मनोहर दे खा गया। बया एक छोट च ड़या है उसके घ सले बहुत मले। ये घ सले सूखे बबूल
काँटे के वृक्ष म ह और एक-एक डाल म लड़ी क भाँ त बीस-बीस, तीस-तीस लटकते ह। इन प क्षय क
शल्प व ा तो प्र सद्ध ही है, लखने का कुछ काम नह है। इसी से इनका सब चातुय प्रगट है क सब वृक्ष छोड़ के
काँटे के वृक्ष म घर बनाया है। इसके आगे ज्वालापुर और कनखल और ह र ार ह, जसका वृत्तांत अगले नंबर म
लखूँगा।”

अंश का सार: ह र ार पहुँचने से पहले, रास्ते म लेखक ने अनेक वृक्ष और पक्षी दे खे — एक छोटा पीला पक्षी और बया च ड़या के
बहुत-से घ सले। ये घ सले सूखे बबूल के काँटेदार पेड़ पर, एक ही डाल म लड़ी क तरह बीस-तीस क संख्या म लटके थे। लेखक
कहते ह क बया क शल्प व ा तो प्र सद्ध ही है, उसके बारे म लखने क जरूरत नह ; उसक असली चतुराई इस बात से पता
चलती है क उसने सब पेड़ छोड़कर काँटे वाले पेड़ पर घर बनाया।
चचा के लए बदु

1. बया ने काँटेदार पेड़ ही क्य चुना? क्य क काँटे उसके शत्रुओं — साँप, नेवला, बल्ली, बंदर — को ऊपर चढ़ने नह दे ते।
यानी बया ने अपनी रक्षा के लए वह चीज चुनी जससे सब बचते ह। लेखक इसे उसका ‘चातुय’ कहते ह। इसम एक जीवन-सूत्र
भी है — क ठनाई से बचकर नह , क ठनाई का उपयोग करके सुरक्षा मलती है।
2. यह अंश मुख्य पाठ से कैसे जुड़ता है? दोन म लेखक वही करते ह — छोट -सी चीज दे खकर बड़ी बात कहते ह। मुख्य पाठ
म घास से भू म क प वत्रता सद्ध होती है; यहाँ घ सले से बया क बु द्ध। और दोन म तुलना है — यहाँ घ सले ‘लड़ी क भाँ त’
लटकते ह।
3. ‘अगले नंबर म लखूँगा’ का अथ: ‘नंबर’ यानी प त्रका का अंक। इससे पता चलता है क भारतदु ये पत्र क्रमशः, धारावा हक
रूप से छपने के लए लखते थे — आज के ब्लॉग या यात्रा-श्रृंखला क तरह। यही कारण है क मुख्य पाठ म भी वे संपादक से
पत्र को ‘ ानदान’ दे ने का नवेदन करते ह।
4. यह अंश यहाँ क्य दया गया है? क्य क मुख्य पाठ ह र ार पहुँचने के बाद से शुरू होता है। यह अंश हम बताता है क रास्ता
कैसा था — यानी यात्रा-वृत्तांत का वह हस्सा जो पाठ म छू ट गया था।

Did you know? बया (Baya Weaver) का घ सला घास क प त्तय को बुनकर बनाया जाता है और उसका
ार नीचे क ओर एक लंबी नली जैसा होता है, ता क कोई भीतर आसानी से न घुस सके। नर बया कई घ सले बनाता
है और मादा उनम से एक चुनती है — इसी लए एक ही डाल पर कई घ सले लटके दखाई दे ते ह, जैसा लेखक ने
लखा है।

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

पाठ से आगे

पाठ से आगे प रयोजना

प्र.1 भारतदु ह रश्चंद्र का एक प्र सद्ध नाटक है— अंधेर नगरी। इसे पुस्तकालय या इंटरनेट से ढूँ ढ़कर प ढ़ए और अपने
सहपा ठय के साथ चचा क जए।

यह पढ़ने और चचा करने क प रयोजना है। नीचे उतनी जानकारी द जा रही है जससे आप पढ़ना शुरू कर सक और चचा को दशा
मल सके — पर नाटक स्वयं पढ़ना जरूरी है।
नाटक के बारे म

अंधेर नगरी भारतदु ह रश्चंद्र का लखा एक छोटा-सा प्रहसन (हास्य-व्यंग्य नाटक) है, जो सन् 1881 म लखा गया। यह छह
अंक का है और एक ही बैठक म पढ़ा जा सकता है।
कथा — महंत अपने दो चेल , गोबरधनदास और नारायणदास के साथ एक नगर म पहुँचते ह। वहाँ बाजार म हर चीज — साग,
मठाई, चूरन — सब “टके सेर” बकती है। महंत समझ जाते ह क जस राज्य म अच्छे -बुरे का, महँगे-सस्ते का कोई भेद ही
नह , वहाँ रहना खतरनाक है, और वे चेले को वहाँ से चलने को कहते ह।
गोबरधनदास सस्ते माल के लोभ म रुक जाता है। आगे राजा के दरबार म एक द वार गरने का मामला आता है और दोष एक से
दूसरे पर टलते-टलते अंत म गोबरधनदास ही फाँसी के लए पकड़ लया जाता है — केवल इस लए क फंदे म वही ठ क बैठता
है। अंत म महंत आकर उसे बचाते ह।
नाटक क सबसे प्र सद्ध पं क्त — “अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।”

चचा के लए प्रश्न

1. ‘अंधेर नगरी’ का शासन कस तरह चलता है? उसम न्याय क क्या त है?
2. महंत नगर छोड़ने को क्य कहते ह और गोबरधनदास क्य रुक जाता है? इससे लालच के बारे म क्या पता चलता है?
3. “टके सेर भाजी टके सेर खाजा” — जहाँ सब कुछ एक ही दाम पर बके, वहाँ मेहनत और गुण का क्या मूल्य रह जाता है?
4. यह नाटक 1881 म लखा गया था। क्या इसका व्यंग्य आज भी लागू होता है? उदाहरण दे कर बताइए।
5. इसे हास्य के रूप म लखने से बात अ धक असर करती है या गंभीर लेख के रूप म लखने से? क्य ?

‘ह र ार’ से जोड़कर दे खए: दोन रचनाएँ एक ही लेखक क ह, पर स्वर बल्कुल अलग ह। ‘ह र ार’ म भारतदु
प्रशंसा करते ह और ‘अंधेर नगरी’ म व्यंग्य। इससे पता चलता है क एक ही लेखक अपने उ े श्य के अनुसार भाषा
और स्वर बदलता है — पत्र म आत्मीय और चत्रात्मक, नाटक म तीखा और हास्यपूण। यही ‘लेखन के अनोखे
तरीके’ का असली अथ है।

कैसे खोज: ‘अंधेर नगरी’ का पूरा पाठ अनेक पुस्तकालय म और सावज नक डोमेन के ड जटल संग्रह म उपलब्ध
है, क्य क यह बहुत पुरानी रचना है। कक्षा म इसका एक अंक मं चत करके दे खए — यह नाटक अ भनय के लए
ही लखा गया था।

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कक्षा 8 हद अध्याय 4 ह र ार AglaSem · NCERT Solutions

अध्याय — एक नज़र म
ह र ार कोई कहानी या नबंध नह , एक पत्र है। भारतदु ह रश्चंद्र ने इसे क ववचन सुधा प त्रका के संपादक के नाम लखा और
उसी म यह 14 अक्टू बर 1871 ई. को छपा। पत्र का आरंभ संबोधन से होता है — “श्रीमान क ववचन सुधा संपादक महाम हम
मत्रवरेषु!” — और अंत हस्ताक्षर से — “आपका मत्र / यात्री / — भारतदु ह रश्चंद्र”। इस लए यह एक साथ पत्र भी है और
यात्रा-वृत्तांत भी।
लेखक ह र ार को पहले आँख से दखाते ह — तीन ओर हरे पवत, पवत पर फैली वल्ली (लताएँ), एक पैर पर खड़े तपस्वी-
से बड़े वृक्ष, रंग- बरंगे नडर पक्षी, बरसात के बाद क ह रयाली, दो धाराओं म बँट गंगा, नील धारा, च ण्डका दे वी क मू त
वाला चुट ला पवत और ह र क पैड़ी का पक्का घाट।
फर वे ह र ार को मन से दखाते ह। यहाँ “केवल गंगा जी ही दे वता ह, दूसरा दे वता नह ”; पंडे “एक पैसे को लाख करके मान
लेते ह”; “इच्छा क्रोध क खा न जो मनुष्य ह सो वहाँ रहते ही नह ”; और “झगड़े-लड़ाई का कह नाम भी नह था।” इस क्षेत्र
के पाँच मुख्य तीथ वे गनाते ह — ह र ार, कुशावत्त, नीलधारा, वल्वपवत और कनखल।
पत्र का सबसे यादगार अनुभव सादगी का है — गंगा तट पर पत्थर पर ही रसोई करके, जल के छ ट के बीच कया गया
भोजन, जसका सुख “सोने क थाल के भोजन से कह बढ़ के था।” यह से पाठ का मूल भाव नकलता है — सुख वस्तु म
नह , संतोष म है।
लेखक क सबसे बड़ी खूबी उनक तुलनात्मक, चत्र ख चने वाली भाषा है — लताएँ सज्जन के शुभ मनोरथ क भाँ त
फैली ह, वृक्ष साधुओं क भाँ त घाम-ओस-वषा सहते ह, गंगाजल मानो “चीनी के पने को बरफ म जमाया” हो, ह रयाली मानो
या त्रय के वश्राम के लए बछा हरा गलीचा हो, और गंगा क धारा राजा भगीरथ क उज्ज्वल क त क लता-सी दखती है।
भाषा लगभग 150 वष पुरानी है, इस लए इसम पुरानी वतनी और पुराने शब्द मलते ह — शखर के लए शषर, या त्रय के
लए जा त्रय , मनोरथ के लए मनोथ, ठं डे के लए ठं ढे । पाठ के अंत म ‘झरोखे से’ म भारतदु के एक और पत्र का अंश ह र ार
के माग म दया गया है, जसम बया पक्षी के घ सल क शल्प व ा का वणन है।

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त्व रत पुनरावृ त्त

शब्द अथ पाठ क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग

वल्ली लता, बेल “अनेक प्रकार क वल्ली हरी-भरी सज्जन के शुभ बरसात म द वार पर वल्ली फैलकर
मनोरथ क भाँ त फैलकर लहलहा रही है” हरी चादर-सी बछ गई।

मनोरथ मन की इच्छा, कामना “सज्जन के शुभ मनोरथ क भाँ त” प रश्रम करने वाल का मनोरथ दे र से
ही सही, पूरा होता है।

घाम तेज धूप “साधुओं क भाँ त घाम, ओस और वषा अपने ऊपर दोपहर के घाम म खेत का काम बहुत
सहते ह” क ठन हो जाता है।

अथ िजसे कोई पयोजन हो; माँग ने “इनके जन्म भी धन्य ह जनसे अथ वमुख जाते ही स ा दानी कसी अथ को खाली हाथ
वाला, याचक नह ” नह लौटाता।

ब धक िशकारी, पािणयों को मारने “नगर के दुष्ट ब धक से नडर होकर कल्लोल करते ह” ब धक के डर से पक्षी घने जंगल म
वाला चले गए।

कल्लोल आनंद से उछलना-कू दना, “अनेक प्रकार के जल-जंतु कल्लोल करते हुए” ब े पानी म कल्लोल करते रहे और
क्रीड़ा करना शाम हो गई।

मष्ट मीठा “जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मष्ट भी वैसा ही है” कुएँ का जल ठं डा और मष्ट था।

पाट नदी की चौड़ाई “श्री गंगा जी का पाट भी बहुत छोटा है पर वेग बड़ा है” पहाड़ म नद का पाट छोटा होता है,
मैदान म चौड़ा।

बखेड़ा झगड़ा, झंझट, फालतू का “ह र ार म यह बखेड़ा कुछ नह है” छोट -सी बात पर इतना बखेड़ा खड़ा
बवाल करना ठ क नह ।

नदान अंत में, आिखरकार “ नदान इस उत्तम क्षेत्र म जतना समय बीता, बड़े आनंद नदान सबने मलकर वही रास्ता चुना
से बीता” जो सबसे सरल था।

पारायण िकसी ग ंथ का आरंभ से अंत “ दन म श्री भागवत का पारायण भी कया” दाद ने सात दन म रामायण का
तक पूर ा पाठ पारायण पूरा कया।

मौनावलंबन चुप हो जाना, मौन धारण “वृत्तांत व दत करके मौनावलंबन करता ँ” अपनी बात कहकर वक्ता ने
कर ले ना मौनावलंबन कर लया।

ानदान जगह दे ना; यहाँ — पित्रका “ नश्चय है क आप इस पत्र को ानदान द जएगा” संपादक ने मेरी क वता को अपनी
में छापना प त्रका म ानदान दया।

वलक्षण अनोखा, असाधारण “पंडे भी यहाँ बड़े वलक्षण संतोषी ह” उसक याददाश्त सचमुच वलक्षण है।

कुशा पूजा में काम आने वाली एक “यहाँ क कुशा सबसे वलक्षण होती है” पं डत जी ने कुशा क अँगूठ बनाकर
पिवत्र घास उँ गली म पहनी।

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 8
TypeSolution
Pages49
Languagehindi
Updated19 Sep 2026