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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा8
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 8: नए मेहमान
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — मल्हार
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
106 – 125 17 49 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 43 pages
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 8 · हद · मल्हार
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 8: नए मेहमान
NCERT कक्षा 8 हद क पाठ्यपुस्तक मल्हार के पाठ 8 नए मेहमान के सभी प्रश्न के पूरे हल। यह उदयशंकर भट्ट (1898–1966) क एक
एकांक है — गरमी क एक रात, कराये का एक छोटा-सा मकान, और दो ऐसे मेहमान जन्ह घर का कोई नह जानता। पृष्ठ 106 से 125 तक क हर
ग त व ध — मेरी समझ से, पं क्तय पर चचा, मलकर कर मलान, सोच- वचार के लए, अनुमान और कल्पना से, एकांक क रचना, अ भनय क
बारी, भाषा क बात, आपक बात, सावधानी और सुरक्षा, सृजन, गरमी का प्रकोप, तार से संदेश, नाप-तौल और मुद्राएँ, झरोखे से, साझी समझ और
खोजबीन के लए — शीषक-दर-शीषक हल क गई है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
मल्हार (कक्षा 8) 106 – 125
खं ड प्रश्न
17 49
माध्यम
हन्द
मेरी समझ से — पृष्ठ 117 और 118
पाठ से
पाठ से
प्र.1 ★
(क) नम्न ल खत प्रश्न के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा ( ) बनाइए। कुछ प्रश्न के एक से अ धक उत्तर भी हो
सकते ह। 1. आगंतुक ने वश्वनाथ के ब को ‘सीधे लड़के’ कस संदभ म कहा? • अ त थय क सेवा करने के
कारण • कसी तरह का प्रश्न न करने के कारण • आ ाका रता के भाव के कारण • गरमी को चुपचाप सहने के
कारण
तारा (★) तीन वकल्प पर लगेगा — अ त थय क सेवा करने के कारण, कसी तरह का प्रश्न न करने के कारण और
आ ाका रता के भाव के कारण।
यह बात नन्हेमल तब कहता है जब प्रमोद कह से बरफ का ठं डा पानी ढूँ ढ़ लाता है और दोन गट-गट पीकर तृप्त हो जाते ह —
“ कतने सीधे लड़के ह।” और बाबूलाल तुरंत जोड़ता है — “शहर के ह न!”
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
वकल्प सही / पाठ से आधार
ग़लत
अ त थय क सेवा करने सही ★ प्रमोद बरफ का पानी लाता है, करण पंखा तेज करती है — बना कसी शकायत के।
के कारण
कसी तरह का प्रश्न न करने सही ★ बड़े लोग बार-बार पूछते ह “आप कहाँ से आए ह?”, पर ब े कुछ नह पूछते। नाम पूछे
के कारण जाने पर बस “प्रमोद।” “ करण।” कहकर चुप हो जाते ह।
आ ाका रता के भाव के सही ★ “ज़रा कुस इधर खसका दो”, “पंखा तेज कर दे ना, करण” — हर आदे श तुरंत माना
कारण जाता है।
गरमी को चुपचाप सहने के ग़लत गरमी तो घर का हर व्य क्त सह रहा है। यह बात नन्हेमल ने ब के व्यवहार पर कही है,
कारण गरमी सहने पर नह ।
‘सीधा’ शब्द का असली रंग: यहाँ ‘सीधा’ केवल तारीफ नह है। हद म ‘सीधा’ का अथ भोला, जो सवाल न करे
भी होता है। नन्हेमल और बाबूलाल असल म यह जाँच रहे ह क इस घर म उनसे कोई कड़ा सवाल तो नह पूछेगा।
इसी लए बाबूलाल का ताना — “शहर के ह न!” — भी साथ आता है। एकांक कार ने इन दो शब्द से ही दोन
मेहमान क नीयत खोल द है।
प्र.2 2. “एक ये पड़ोसी ह, नदयी…” वश्वनाथ ने अपने पड़ोसी को नदयी क्य कहा? • उन्ह कष्ट म दे खकर प्रसन्न
होते ह • पड़ोसी कसी प्रकार का सहयोग नह करते ह • लड़ने-झगड़ने के अवसर ढूँ ढ़ते ह • अ त थय का अपमान
करते ह
तारा (★) पहले दो वकल्प पर — उन्ह कष्ट म दे खकर प्रसन्न होते ह और पड़ोसी कसी प्रकार का सहयोग नह करते ह।
तीसरा वकल्प भी तक के साथ लया जा सकता है।
वकल्प सही / पाठ से आधार
ग़लत
उन्ह कष्ट म दे खकर प्रसन्न सही ★ रेवती के अपने शब्द — “वे तो हमको मुसीबत म दे खकर प्रसन्न होते ह।” लाला क औरत
होते ह का जवाब भी यही सद्ध करता है — “उन्ह और कसी को सोता दे खकर न द नह आती।”
पड़ोसी कसी प्रकार का सही ★ ठ क इसी वाक्य म वश्वनाथ का कारण छपा है — “जो खाली छत पड़ी रहने पर भी ब
सहयोग नह करते ह के लए एक खाट नह बछाने दगे।”
लड़ने-झगड़ने के अवसर तक स हत आगे का दृश्य इसका प्रमाण है — थोड़ा-सा पानी फैलने पर पड़ोसी तेजी से भीतर आ जाता
ढूँ ढ़ते ह सही ★ है, पुरानी बात उखाड़ता है और कहता है “आपसे रोज ही गलती होती है।”
अ त थय का अपमान करते ग़लत पड़ोसी अ त थय से मलता तक नह । उसक नाराजगी वश्वनाथ पर है — “मेहमान आपके
ह ह गे, मेरे नह ।”
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ध्यान द जए: जस समय वश्वनाथ यह वाक्य बोलता है, पड़ोसी वाला झगड़े का दृश्य अभी हुआ ही नह है।
इस लए उसके मन म उस समय सीधे-सीधे दो ही बात ह — सहयोग न करना और दूसरे के दुख म खुश होना। तीसरा
वकल्प पूरी एकांक पढ़ लेने के बाद ही उ चत ठहरता है।
प्र.3 3. “ईश्वर कर इन दन कोई मेहमान न आए।” रेवती इस तरह क कामना क्य कर रही है? • मेहमान के ठहरने
क उ चत व्यवस्था न होने के कारण • रेवती का स्वास्थ्य कुछ समय से ठ क न होने के कारण • अ त थय के आने
से घर का काय बढ़ जाने के कारण • उसे अ त थय का आना-जाना पसंद न होने के कारण
तारा (★) पहले तीन वकल्प पर — मेहमान के ठहरने क उ चत व्यवस्था न होने के कारण, रेवती का स्वास्थ्य कुछ समय से
ठ क न होने के कारण और अ त थय के आने से घर का काय बढ़ जाने के कारण।
वकल्प सही / पाठ से आधार
ग़लत
ठहरने क उ चत व्यवस्था न सही ★ “छत इतनी छोट है क पूरी खाट भी तो नह आत । एक खाट पर दो-दो, तीन-तीन ब े
होने के कारण सोते ह, तब भी पूरा नह पड़ता।” — घर म स्वयं प रवार के लए जगह नह है।
स्वास्थ्य ठ क न होने के सही ★ “ पछले पंद्रह दन से दद के मारे सर फट रहा है।” आगे वह बताती है क हाथ-पैर अब
कारण बैठे-बैठे भी सुन्न हो जाते ह।
घर का काय बढ़ जाने के सही ★ “म ही जानती ँ जैसे रोट बनाती ँ।” नौकर टकता नह , पानी तीन मं जल चढ़ाना पड़ता
कारण है — सारा बोझ अकेली रेवती पर है।
उसे अ त थय का आना-जाना ग़लत एकांक का अंत ही इसे काट दे ता है। भाई के आते ही वही रेवती, उसी सरदद और उसी
पसंद न होने के कारण गरमी म कहती है — “म अभी खाना बनाती ँ… भैया भूखे नह सो सकते।”
यही एकांक का क य वचार है: रेवती को अ त थ से चढ़ नह है — उसे सामथ्य से बाहर के आ तथ्य से चढ़
है। तंग मकान, बीमार शरीर, खाली जेब और अकेले हाथ — इन चार सीमाओं के भीतर हर मेहमान एक संकट बन
जाता है। एकांक कार उसे स्वाथ नह दखाता, थका हुआ दखाता है।
प्र.4 4. “हे भगवान! कोई मुसीबत न आ जाए।” रेवती कौन-सी मुसीबत नह आने के लए कहती है? • पानी क कमी
होने क • पड़ो सय के चल्लाने क • मेहमान के आने क • गरमी के कारण बीमारी क
तारा (★) मेहमान के आने क — इसी वकल्प पर।
यह वाक्य ठ क उस क्षण नकलता है जब बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता है। वश्वनाथ कहता है “न जाने। दे खता ँ।” और रेवती
के मुँह से यह डर नकल पड़ता है। थोड़ी ही दे र पहले वह कह चुक थी — “ईश्वर कर इन दन कोई मेहमान न आए।” दरवाजे क
दस्तक ने उसी डर को छू लया।
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वकल्प क्य नह
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पानी क कमी होने क
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पानी क शकायत घर म पहले से है, पर वह ‘आने वाली’ मुसीबत नह — दस्तक से उसका कोई संबंध नह ।
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पड़ो सय के चल्लाने क पड़ोसी दरवाजा नह खटखटाते; वे तो सीधे छत से चल्लाते ह। वह दृश्य भी अभी आगे आना है।
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गरमी के कारण बीमारी क यह उसका पुराना डर है (“मुझे डर है, कह कोई बीमार न पड़ जाए”), पर इस दस्तक वाले क्षण क बात नह ।
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नाटक पढ़ने का सूत्र: संवाद का अथ हमेशा उससे ठ क पहले के रंगमंच- नदश से खुलता है। यहाँ कोष्ठक क
ag है।)” — पूरे वाक्य का अथ तय कर दे ती है।
एक पं क्त — “(बाहर से कोई दरवाजा खटखटाता
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5. इस एकांक के आधार पर बताएँ क मुख्य रूप से कौन-सी बात कसी रचना को नाटक का रूप दे ती है? •
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संवाद • कथा • वणन • मंचन
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तारा (★) संवाद पर। मंचन को भी तक के साथ चुना जा सकता है।
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वकल्प सही / कारण
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संवाद सही ★ इस एकांक म लेखक कह भी अपनी ओर से कहानी नह सुनाता। हम जो कुछ जानते ह — गरमी, गरीबी,
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पड़ोसी क कड़वाहट, मेहमान का झूठ — सब पात्र के मुँह से जानते ह। पुस्तकmस्वयं कहती है, “एकांक म
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कहानी मुख्य रूप से संवाद से आगे बढ़ती है।”
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ग़लत कथा तो कहानी, उपन्यास और आत्मकथा म भी होती है। इस लए कथा नाटक क पहचान नह बन सकती।
वणन ग़लत वणन गद्य क हर वधा म मलता है। नाटक म तो वणन घटकर केवल कोष्ठक के छोटे -छोटे नदश म समट
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जाता है।
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मंचन तक स हत नाटक लखा ही मंच के लए जाता है — इसी लए इसम ान, वेशभूषा, प्रवेश-प्र ान और ‘यव नका’ तक के
सही ★ नदश दए जाते ह। पर मंचन प्रस्तु त है, रचना नह ; इस लए पहला उत्तर अ धक सट क है।
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परख कैसे कर: जस तत्व को हटा दे ने पर रचना नाटक रह ही न जाए, वही उसका मुख्य तत्व है। ‘नए मेहमान’ म
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से संवाद हटा द जए — कुछ बचेगा ही नह । कथा या वणन हटा द जए — नाटक फर भी खड़ा रहेगा।
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प्र.6 (ख) हो सकता है क आप सभी ने अलग-अलग उत्तर चुने ह । अब अपने सहपा ठय के साथ चचा क जए क
आपने ये उत्तर ही क्य चुने?
यह चचा का काम है। चचा म केवल यह न बताइए क आपने क्या चुना, ब ल्क यह बताइए क एकांक क कस पं क्त ने आपको
वह चुनने पर मजबूर कया।
चचा का ढाँचा: हर उत्तर के लए तीन बात क हए — (1) मने यह वकल्प चुना, (2) इसका आधार यह संवाद या
यह रंगमंच- नदश है, (3) दूसरा वकल्प मुझे इस लए कमजोर लगा।
नमूना उत्तर: “प्रश्न 3 म मने तीन वकल्प चुने। मेरा आधार रेवती के अपने वाक्य ह — ‘ पछले पंद्रह दन से दद के मारे सर फट रहा
है’ और ‘म ही जानती ँ जैसे रोट बनाती ँ।’ चौथा वकल्प मने इस लए छोड़ दया क्य क एकांक के अंत म वही रेवती अपने भाई
के लए खुशी-खुशी खाना बनाने उठ जाती है। अगर उसे मेहमान ही नापसंद होते, तो भाई के लए भी नापसंद होते।”
इस ग त व ध का उ े श्य: बहु वकल्पी प्रश्न म एक से अ धक उत्तर तभी सही हो सकते ह जब हर उत्तर के पीछे
पाठ का प्रमाण हो। चचा म आप दे खगे क जनके पास प्रमाण है, उनका उत्तर टकता है; जन्ह ने अनुमान से चुना,
उनका नह । सा हत्य म राय अलग हो सकती है, पर आधार चा हए ही।
पं क्तय पर चचा — पृष्ठ 118
पाठ से
पाठ से
प्र.1 पाठ म से चुनकर कुछ पं क्तयाँ नीचे द गई ह। इन्ह ध्यानपूवक प ढ़ए और इन पर वचार क जए। आपको इनका
क्या अथ समझ म आया? अपने वचार अपनी कक्षा म साझा क जए। — “पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है,
और प्यास है क बुझने का नाम नह लेती।”
अथ: गरमी इतनी है क पानी पेट भर चुका है, पर प्यास फर भी नह मरी। वश्वनाथ चार गलास पीकर आया है और ह ठ अब भी
सूख रहे ह।
भाव: यह पं क्त एक साथ दो बात कहती है। ऊपर से यह गरमी क तीव्रता बताती है। भीतर से यह उस प रवार क पूरी हालत का
चत्र है — जो उपाय उनके पास है, वह उनक तकलीफ के आगे बहुत छोटा है। पानी है, पर राहत नह ; मकान है, पर हवा नह ;
कमाई है, पर बड़ा मकान नह ।
भाषा कैसे काम करती है: ‘प्यास है क बुझने का नाम नह लेती’ म प्यास को एक ज व्य क्त क तरह बरता
गया है, जो मानने से इनकार कर रहा हो — यह मानवीकरण है। ‘पेट फूला जा रहा है’ म अ तशयो क्त है। दोन
मलकर पाठक को गरमी बताते नह , महसूस कराते ह।
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प्र.2 “सारे शहर म जैसे आग बरस रही हो।”
अथ: लू और तपन इतनी है मानो आसमान से पानी नह , आग बरस रही हो। पूरा शहर तप रहा है — केवल एक घर नह ।
भाव: वश्वनाथ यह वाक्य कहकर आगे जोड़ता है — “इसी लए यहाँ ग मय म सभी बड़े लोग पहाड़ पर चले जाते ह।” और रेवती
का उत्तर पूरी बात खोल दे ता है — “चले जाते ह गे। गरीब क तो मौत है।” यानी गरमी सब पर बरसती है, पर उससे बचने का
उपाय सबके पास नह । यहाँ मौसम का वणन चुपके से एक सामा जक बात कह जाता है।
भाषा कैसे काम करती है: ‘बरसना’ शब्द वषा का है। उसे आग के साथ जोड़ते ही अथ उलट जाता है — जो शब्द
राहत का था, वही यातना का बन गया। ‘जैसे’ के कारण यह उपमा है।
प्र.3 “यह तो हमारा ही भाग्य है क चने क तरह भाड़ म भुनते रहते ह।”
अथ: जैसे भाड़ (भ ) म चने डालकर भूने जाते ह, वैसे ही हम इस तंग, गरम मकान म भुनते रहते ह — और यही हमारी कस्मत
है।
भाव: यह रेवती का सबसे कड़वा वाक्य है। इससे ठ क पहले वह कह चुक है क नौकर तीन मं जल पानी चढ़ाने से भाग जाता है —
“ कसी को क्या जरूरत पड़ी है जो गरमी म भुने।” यानी नौकर के पास तो भाग जाने का वकल्प है, उनके पास वह भी नह ।
‘भाग्य’ शब्द म शकायत भी है और हार भी।
भाषा कैसे काम करती है: ‘चने क तरह’ — उपमा; ‘भाड़ म भुनना’ — मुहावरा, जसका अथ है बहुत कष्ट
सहना। चने क तुलना खास तौर पर चुभती है, क्य क चना सबसे सस्ता और सबसे मामूली दाना है। रेवती अपने
प रवार को उतना ही मामूली और उतना ही बेबस मान रही है।
प्र.4 “आह, अब जान म जान आई। सचमुच गरमी म पानी ही तो जान है।”
अथ: ठं डा पानी पीते ही नन्हेमल को राहत मलती है। ‘जान म जान आना’ का अथ है — घबराहट दूर होकर चैन आ जाना।
भाव: ऊपर से यह गरमी म पानी के महत्त्व क बात है। पर इसे कहने वाला कौन है, यह दे खना जरूरी है। नन्हेमल एक ऐसा मेहमान
है जसने अभी तक अपना प रचय तक ठ क से नह दया, और जसक राहत के लए इस घर का ब ा गरमी म बाहर जाकर बरफ
ढूँ ढ़ लाया है। एक क ‘जान म जान’ दूसरे क दौड़-भाग से आई है — एकांक यही वडंबना बार-बार दखाती है।
भाषा कैसे काम करती है: एक ही वाक्य म ‘जान’ शब्द दो अथ म आया है — पहले ‘प्राण/चेतना’, फर ‘प्राण दे ने
वाली वस्तु’। एक शब्द के दो अथ का यह खेल वाक्य को याद रह जाने लायक बना दे ता है। ‘आह’ जैसा उ ार संवाद
को मंच पर बोलने लायक भी बनाता है।
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मलकर कर मलान — पृष्ठ 118
पाठ से
पाठ से
प्र.1 स्तंभ 1 म कुछ पं क्तयाँ द गई ह और स्तंभ 2 म उनसे मलते-जुलते भाव दए गए ह। स्तंभ 1 क पं क्तय को
स्तंभ 2 क उनके सही भाव वाली पं क्तय से रेखा ख चकर मलाइए— स्तंभ 1: 1. लाख के आदमी खाक म
मल गए। 2. धोती ऐसी चरा रही है, जैसे पुरानी हो। 3. माल-मसाला तो अंट म है न? 4. खाने म क्या दे र-दार है।
5. पहले आत्मा फर परमात्मा — स्तंभ 2: 1. भोजन क व्यवस्था कब तक हो जाएगी 2. पहले अपना ध्यान फर
दूसरा काम 3. बहुत ही समृद्ध व्य क्त थे पर अब उनके पास कुछ भी नह है 4. कपड़ा पसीने से भीगकर पुराने
जैसा हो गया है 5. धनरा श सुर क्षत तो है न!
सही मलान इस प्रकार है:
स्तंभ 1 → स्तंभ 2 यह भाव क्य
1. लाखों के आदमी → बहुत ही समृद्ध व्य क्त थे पर नन्हेमल संपतराम के बारे म कहता है — “उन बेचार का कारोबार
खाक में िमल गए। 3 अब उनके पास कुछ भी नह है सब चौपट हो गया।” ‘खाक म मलना’ मुहावरा है — पूरी तरह नष्ट
हो जाना।
2. धोती ऐसी चर रही → कपड़ा पसीने से भीगकर पुराने बाबूलाल क धोती नई है — “ पछले दन नकद नौ रुपये खच करके
है, जैसे पुर ानी हो। 4 जैसा हो गया है खरीद थी” — पर पसीने से भीगकर चरचराने लगी है।
3. माल-मसाला तो → धनरा श सुर क्षत तो है न! ‘अंट ’ = कमर म धोती क गाँठ, जहाँ रुपये रखे जाते थे। नन्हेमल
अंटी में है न? 5 का उत्तर इसे पक्का कर दे ता है — “नह , जेब म है, बंडी क जेब म
है।”
4. खाने में क्या दे र - → भोजन क व्यव ा कब तक नन्हेमल भूख और न द का हवाला दे कर खाने क दे र पूछ रहा है —
दार है। 1 हो जाएगी “बात यह है क न द बड़े जोर से आ रही है।”
5. पहले आत्मा िफर → पहले अपना ध्यान फर दूसरा रेवती कहती है — “जब शरीर ही ठ क नह रहता तो फर और क्या
परमात्मा 2 काम करूँ?” यानी पहले अपना शरीर सँभालूँ, बाक बाद म।
मलान करने क तरक ब: पहले वे जोड़े मलाइए जनम कोई शब्द साफ संकेत दे — ‘माल-मसाला’ म धन का
संकेत है, ‘खाने म’ म भोजन का। बचे हुए वकल्प म से चुनना तब आसान हो जाता है। यही तरीका परीक्षा म भी
काम आता है।
ध्यान द जए: ये पाँच प्रयोग बोलचाल क भाषा के ह, कताबी नह । उदयशंकर भट्ट ने पात्र क जुबान वैसी ही
रखी है जैसी उस समय एक कस्बाई व्यापारी और एक थक हुई गृ हणी बोलती — इसी लए संवाद आज भी स े
लगते ह।
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सोच- वचार के लए — पृष्ठ 118 और 119
पाठ से
पाठ से
प्र.1 एकांक को पुनः प ढ़ए, पता लगाइए और ल खए— (क) “शहर म तो ऐसे ही मकान होते ह।” नन्हेमल का ‘ऐसे
ही मकान’ से क्या आशय है?
‘ऐसे ही मकान’ से नन्हेमल का आशय है — शहर के वे तंग, बंद और हवा-र हत कराये के मकान, जनम एक छोटा कमरा,
उसके पीछे एक और कमरा, नीचे एक जरा-सा आँगन और ऊपर साझी छत होती है।
वह यह बात तब कहता है जब बाबूलाल पूछता है — “पं डत जी, क्या मकान इतना ही बड़ा है?” नन्हेमल उत्तर दे ता है — “दे ख नह
रहे, इसके पीछे एक कमरा दखाई दे ता है। पं डत जी, इसके पीछे आँगन होगा और ऊपर छत होगी? शहर म तो ऐसे ही मकान होते
ह।”
इस वाक्य म दो बात छपी ह:
शहर क स ाई — वश्वनाथ स्वयं थोड़ी दे र बाद यही बात आँकड़ म कहता है: “आठ-नौ लाख आदमी इस
शहर म रहते ह और उनम से छह-सात लाख आदमी इसी तरह के मकान म रहते ह।” यानी नन्हेमल क बात
गलत नह है।
नन्हेमल का असली मकसद — वह सहानुभू त नह जता रहा। वह घर क जगह नाप रहा है — क सोने के
लए कहाँ जगह है, नहाने का प्रबंध कहाँ होगा। तुरंत बाद उसका अगला प्रश्न भी यही है — “नहाने का प्रबंध तो
होगा, पं डत जी?”
ध्यान द जए: ‘तो’ और ‘ही’ — दोन बल दे ने वाले शब्द इस छोटे -से वाक्य म ह। ‘शहर म तो ऐसे ही मकान होते
ह’ का भाव है — इसम कोई नई या शकायत करने लायक बात नह , सब ऐसे ही रहते ह। इसी अंदाज से नन्हेमल
अपने ठहरने का रास्ता बना रहा है।
प्र.2 (ख) पड़ोसी को वश्वनाथ से कस तरह क शकायत है? आपके वचार से पड़ोसी का व्यवहार उ चत है या
अनु चत? तक स हत उत्तर द जए।
शकायत क्या है: पड़ोसी क शकायत तीन बात को लेकर है —
1. वश्वनाथ के मेहमान ने उसक छत पर हाथ धो लए और गंदा पानी फैल गया — “म यह बदाश्त नह कर सकता क मेरी छत
पर इस तरह गंदा पानी फैलाया जाए।”
2. यह पहली बार नह हुआ — “अभी उसी दन आपके एक और मेहमान ने पानी फैला दया था। फर वह हमारी खाट बछाकर
लेट गया था।”
3. उसे लगता है क इस छोटे मकान म इतने मेहमान बुलाना ही गलत है — “य द मेहमान बुलाने ह तो बड़ा-सा मकान लो।”
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मेरा मत: पड़ोसी क शकायत उ चत है, पर उसका व्यवहार अनु चत है। ये दोन बात अलग-अलग ह और इन्ह अलग-अलग
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तौलना चा हए।
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aशकायत छत उसक है। उस पर दूसर का गंदा पानी फैलाना और उसक खाट पर बना पूछे लेट जाना — दोन ही उसका अ धकार
क्य उ चत छ नना है। वश्वनाथ स्वयं मानता है — “वाकई गलती हो गई।”
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व्यवहार क्य (1) गलती मानी जा चुक है, फर भी वह ताना मारता है — “कहाँ तक कोई क्षमा करे। क्षमा, क्षमा!” (2) खाली पड़ी छत पर
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“बड़ा-सा मकान लो” कहना गरीबीgपर सीधा तंज है, और अनु चत है, क्य क वश्वनाथ दो साल से दन-रात एक करके मकान
के लए एक खाट तक बछाने नह दे ता। (3) रेवती के अनुसार — “वे तो हमको मुसीबत म दे खकर प्रसन्न होते ह।” (4)
ढूँ ढ़ ही रहा है।
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नष्कष: अपने अ धकार क बात कहना हर व्य क्त का हक है, पर उसे कहने का ढं ग ही यह eतय
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बचेगा या.cटूoटेगा। पड़ोसी अपनी बात शां त से भी कह सकता था और यह भी जोड़ सकता
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सुsलeा ली जए।” तब वही शकायत सहयोग बन जाती।
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(ग) एकांक म वश्वनाथ नन्हेमल और बाबूलाल
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इसके तीन कारण एकांक म साफ दखते ह।
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1. संकोच — वश्वनाथ पूछता तो है, पर हर बार अधूरा — “जी, आप लोग…”, “क्षमा क जएगा आप कहाँ से आए ह?”, “क्षमा
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agl 2. आ तथ्य क परंपरा — ‘अ त थ देवो भव’ के संस्कार म पले मध्यवग य व्य क्त के लए रात को दरवाजे पर आए आदमी को
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लौटा दे ना लगभग असंभव है। वह रेवती से कहता है — “कोई भी ह , जब आए ह तो खाना जरूर खाएँगे।” और आगे —
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“क्या कहगे क रातभर भूखा मारा।” उसे अपनी परेशानी से ज्यादा यह चता है क लोग क्या कहगे।
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3. दोन मेहमान क चतुराई — वे वश्वनाथ को मौका ही नह दे ते। वे बस्तर और संदूक लेकर सीधे भीतर आ जाते ह, उसे
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‘पं डत जी’ और ‘चाचा’ कहकर पुकारते ह, संपतराम और सेठ जगद शप्रसाद जैसे नाम गनाते ह, और जब भी कोई सीधा प्रश्न
आता है, बात मोड़ दे ते ह — “अरे पं डत जी, आप कैसी बात करते ह? हम तो आपके पास के ह।”
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mहो जाए, तो वह सेवा नह ,
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गहरी बात: एकांक का यही वषय है — आ तथ्य का वह संस्कार जब सामथ्य से बड़ा
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. cबोझ la संस्कार और सामथ्य के बीच
omबन जाता है। वश्वनाथ बुरा आदमी नह है और मेहमान भी डाकू नह aह;gटकराव
as em है। इसी लए ‘मान न मान म तेरा मेहमान’ कहावत पाठ के आरंभ म ही दे द गई है।
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
प्र.4 (घ) एकांक के उन संवाद को ढूँ ढ़कर ल खए जनसे पता चलता है क बाबूलाल और नन्हेमल वश्वनाथ के
प र चत नह ह?
एकांक म ऐसे संवाद क्रम से आते ह और हर बार शक और गहरा होता जाता है।
संवाद यह क्या सद्ध करता है
िवश्वनाथ — “जी, आप लोग…” पहली ही मुलाकात म वश्वनाथ को प रचय पूछना पड़
रहा है।
िवश्वनाथ — “क्षमा कीिजएगा आप कहाँ से आए है?ं ” वह उन्ह पहचान नह पा रहा।
िवश्वनाथ — “कौन संपतराम?” … “मैं संपतराम को नही ं जानता।” मेहमान जस साझे प र चत का नाम ले रहे ह, वह
वश्वनाथ के लए अनजान है।
रे वती — “ये लोग कौन है?ं जान-पहचान के तो मालूम नही ं पड़ते। ” / िवश्वनाथ — घर का कोई भी व्य क्त उन्ह नह जानता।
“न जाने कौन है।
ं ”
िवश्वनाथ — “तो आप कोई िच ी-िव ी लाए है?ं ” / दोनों (सकपकाकर) — “िच ी, कोई प्रमाण नह — और ‘सकपकाकर’ का रंगमंच-
िच ी तो नही ं लाए है।
ं ” नदश उनक घबराहट खोल दे ता है।
िवश्वनाथ — “पर कृ ष्णा गली तो यहाँ छह है।
ं कौन-सी गली में बताया था?” / उन्ह पता तक याद नह — वे कसी जान-पहचान के
नन्हेम ल — “हमें तो यह मालूम नही ं है… याद ही नही ं रहा।” भरोसे नह , अंदाजे से आए ह।
िवश्वनाथ (खीझकर) — “िजसके यहाँ आपको जाना है, उसका नाम भी तो बताया जससे मलने आए ह, उसका नाम भी नह मालूम।
होगा?” / नन्हेम ल — “नाम तो याद नही ं आता।”
िवश्वनाथ — “ले िकन मैं किवराज तो नही ं हू?ँ ” … “पर मैं तो वैद्य नही ं हू।
ँ ” वे जस व्य क्त को खोज रहे ह, वह वश्वनाथ है ही नह ।
बाबूल ाल — “आप तो, पंिडत जी, शायद वैद्य है?ं ” मेहमान स्वयं अंदाज लगा रहे ह क मेजबान करता क्या
है।
दोनों (उछलकर) — “अरे हाँ, वही तो किवराज रामलाल।” अं तम प्रमाण — उन्ह क वराज रामलाल वैद्य के यहाँ
जाना था, वश्वनाथ के यहाँ नह ।
लेखन-कौशल दे खए: उदयशंकर भट्ट कह भी यह नह लखते क “ये दोन अजनबी ह।” वे केवल संवाद रखते
जाते ह और पाठक स्वयं नष्कष नकालता है — यही नाटक क श क्त है। साथ ही ‘सकपकाकर’, ‘खीझकर’,
‘उछलकर’ जैसे तीन छोटे रंगमंच- नदश पूरे दृश्य का तनाव बता दे ते ह।
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प्र.5 (ङ) एकांक के उन वाक्य को ढूँ ढ़कर ल खए जनसे पता चलता है क शहर म भीषण गरमी पड़ रही है।
एकांक म गरमी केवल पृष्ठभू म नह , लगभग एक पात्र है। ये वाक्य इसे सद्ध करते ह —
“इन बंद मकान म रहना कतना भयंकर है! मकान है क भट्ट !”
“पत्ता तक नह हल रहा है। जैसे साँस बंद हो जाएगी। सर फटा जा रहा है।”
“पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है और प्यास है क बुझने का नाम नह लेती।”
“आँगन म घड़े म भी तो पानी ठं डा नह होता— हवा लगे तब तो ठं डा हो।”
“सारे शहर म जैसे आग बरस रही हो। यहाँ क गरमी से तो ईश्वर बचाए।”
“इन सुकुमार बालक का क्या अपराध है? तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है।”
“और ऊपर भी क्या हवा है! चार तरफ द वार तप रही ह।”
“ब े को ले जाओ। यह गरमी म भुन रहा है।”
“पैदल चले आ रहे ह, कपड़े तो ऐसे हो गए क नचोड़ लो।”
“मेरे कपड़े नचोड़कर दे ख लो, एक लोटे से कम पसीना नह नकलेगा।”
“ठं डा-ठं डा पानी पलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे ह।”
“तबीयत अब शांत हुई है, फर भी पसीने से नहा गया ँ।”
“यह तो हमारा ही भाग्य है क चने क तरह भाड़ म भुनते रहते ह।”
रंगमंच- नदश भी गरमी बताते ह: “कमरा बेहद गरम है।”, “मेज पर रखा हुआ पुराना पंखा चल रहा है, जससे
बहुत कम हवा आ रही है।”, “पंखे क हवा केवल उस ब े को लग रही है। फर भी वह पसीने से तर है।” — यानी
संवाद और नदश, दोन मलकर एक ही प्रभाव बनाते ह।
क्य इतनी गरमी दखाई गई: गरमी यहाँ केवल मौसम नह है। वह घर क चड़ चड़ाहट, थकान और असमथता को
हर क्षण बढ़ाती रहती है। य द मौसम सुहावना होता, तो वही दो मेहमान इतना बड़ा संकट न लगते। मौसम को कथा
का दबाव बनाना एकांक कार क कुशलता है।
अनुमान और कल्पना से — पृष्ठ 119 और 120
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पाठ से
पाठ से
प्र.1 अपने समूह म मलकर चचा क जए— (क) एकांक म वश्वनाथ अपनी पत्नी को अ त थय के लए भोजन क
व्यवस्था करने के लए कहता है। साथ ही रेवती क अस्वस्थता का वचार करके भोजन बाजार से मँगवाने का
सुझाव भी दे ता है। ले कन उसने स्वयं अ त थय के लए भोजन बनाने के वषय म क्य नह सोचा?
क्य क उस समय के मध्यवग य घर म रसोई को ‘स्त्री का काम’ मान लया गया था — इतना गहरा मान लया गया था क
वश्वनाथ के मन म यह वकल्प उठता ही नह ।
ध्यान द जए, वश्वनाथ असंवेदनशील नह है। वह रेवती के सरदद को जानता है, उसे छत पर सुलाना चाहता है, ब े को गोद म
लेकर पंखा झलता है, और यहाँ तक कहता है — “जीवन म तुम्ह कोई सुख न दे सका।” जब वह दे खता है क रेवती क तबीयत
ठ क नह , तो वह तुरंत रास्ता भी सुझाता है — “बाजार से कुछ मँगा दो न!” यानी उसे परवाह है। पर वह परवाह भी उसे रसोई तक
नह ले जाती। उसक सोच म समाधान दो ही हो सकते ह — पत्नी बनाए या बाजार से आए। तीसरा समाधान — ‘म बना दूँ ’ —
उसक कल्पना म है ही नह ।
यह कसक सीमा है: यह वश्वनाथ क व्य क्तगत कमी से ज्यादा उस समय के सामा जक ढाँचे क सीमा है।
रोचक बात यह है क इसी पुस्तक के ‘झरोखे से’ अंश म नराला जी का उदाहरण दया गया है, जो अपने अ त थ के
लए “भोजन बनाने से लेकर जूठे बतन माँजने तक का काम” स्वयं सहष करते थे। दोन को साथ रखकर प ढ़ए —
पुस्तक चुपचाप एक तुलना सामने रख दे ती है।
आज के संदभ म: घर का काम कसी एक व्य क्त का नह , सबका साझा उत्तरदा यत्व है। य द वश्वनाथ रसोई म
हाथ बँटा दे ता, तो रेवती को न तुनककर मना करना पड़ता, न बाजार के तीन-चार रुपये खच करने पड़ते — और
मेहमान भी बना कड़वाहट के खा-पीकर चले जाते।
प्र.2 (ख) एकांक म वश्वनाथ का बेटा प्रमोद अ त थय के पेयजल क व्यवस्था करता है और छोट बहन का भी ध्यान
रखता है। प्रमोद को इस तरह के उत्तरदा यत्व क्य दए गए ह गे?
क्य क इस घर म काम बाँटने के लए और कोई है ही नह , और प्रमोद घर का सबसे बड़ा ब ा है।
नौकर नह टकता — वश्वनाथ स्वयं कहता है, “नौकर भी नह टकता है।” रेवती कारण बताती है — “पानी जो तीन मं जल
पर चढ़ाना पड़ता है, इसी लए भाग जाता है।”
माँ बीमार है — रेवती पंद्रह दन से सरदद से परेशान है, हाथ-पैर सुन्न पड़ते ह, और अकेली रसोई सँभालती है।
पता मेहमान म उलझा है — वश्वनाथ को अ त थय के पास बैठना पड़ रहा है, इस लए बाहर के काम बेटे को स पने पड़ते ह
— “दे खो प्रमोद, कह से बरफ मले तो ले आओ”, “प्रमोद, इन्ह नीचे नल पर ले जाओ।”
बड़े ब े क भू मका — ऐसे प रवार म सबसे बड़े ब े को जल्द बड़ा होना पड़ता है। प्रमोद खुद बताता है — “वहाँ उषा
रोने लगी। उसे चुप कराया, पानी पलाया और पंखा झलता रहा।” यह कसी ने कहा नह था; उसने स्वयं कया।
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पात्र-रचना क दृ ष्ट से: प्रमोद को ये काम दे कर एकांक कार दो चीज एक साथ साधता है। पहली — वह घर क
तंगी दखा दे ता है बना यह कहे क ‘घर गरीब है’। दूसरी — वह मेहमान क ढठाई को और चुभने वाला बना दे ता
है, क्य क बरफ ढूँ ढ़ने गरमी म बाहर एक ब ा जाता है, और ‘जान म जान’ मेहमान क आती है। यही कारण है क
प्रमोद जैसा छोटा पात्र भी एकांक म जरूरी है।
प्र.3 (ग) “कैसी बात करते हो, भैया! म अभी खाना बनाती ँ” भीषण गरमी और सर म दद के बावजूद भी रेवती
भोजन क व्यवस्था करने के लए क्य तैयार हो गई होगी?
क्य क इस बार आने वाला अजनबी नह , उसका अपना भाई है। श्रम वही है, गरमी वही है, सरदद भी वही है — पर रश्ता बदल
गया है, इस लए वही काम बोझ नह रहा।
दोन दृश्य को साथ र खए, अंतर साफ दखेगा —
अजनबी मेहमान के लए भाई के लए
“(तुनककर) खाना तो खलाना ही होगा— तुम भी खूब हो!” “(प्रसन्न होकर) अरे अरे भैया ह! आओ, आओ, तुमने तो खबर भी न द ।”
“म खाना नह बनाऊँगी, पहले आत्मा फर परमात्मा।” “कैसी बात करते हो भैया! म अभी खाना बनाती ँ।”
“पहले तुम पूछ लो, म बाद म खाना बनाऊँगी।” “अब क्या, मैं खाना बनाऊँ गी। भैया भूखे नही ं सो सकते। ”
कारण, एक-एक करके:
अपनापन — भाई घर का है, ‘मेहमान’ नह । उसके लए कया गया काम सेवा लगता है, मजबूरी नह ।
अपराध-बोध — भाई ने तार भेजा था, जो मला नह ; वह चार घंटे भटकता रहा। रेवती को लगता है क उसक ओर से कमी
रह गई।
भाई का संकोच — वह स्वयं कहता है, “खाना-वाना रहने दो… मुझे भूख नह है” और “शायद रात को आप लोग को कोई
कष्ट हो।” जो अ त थ संकोच करता है, उसके लए मन अपने आप उदार हो जाता है — ठ क इसके उलट नन्हेमल और
बाबूलाल थे, जो माँग-माँगकर मँगवा रहे थे।
एकांक क असली बात यह है: रेवती आ तथ्य- वरोधी नह है। एकांक यह नह कहती क मेहमान बुरे होते ह।
वह यह कहती है क आ तथ्य तब सुख है जब वह मन से नकले, और तब यातना है जब वह थोप दया जाए।
यही कारण है क लेखक ने भाई का प्रवेश ठ क उन दो मेहमान के जाते ही रखा — तुलना अपने आप हो जाती है।
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान
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m ह? अपने
(घ) एकांक से गरमी क भीषणता दशाने वाली कुछ पं क्तयाँ द जा रही ह। अपनी कल्पना और अनुमान से
बताइए क सद और वषा क भीषणता के लए आप इनके स्थान पर क्या-क्या वाक्य प्रयोगeकरते
प्र.4
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वाक्य .को coदए गए उ चत स्थान पर ल खए: 1. यह गरमी म भुन रहा है। 2. पर बरफ a gभीl कोई कहाँ तक पए। 3.
a s emशहर म जैसे आग बरस रही हो। 4. प्यास है क बुझने का नाम नह लेती। 5. चार तरफ द वार तप रही ह। 6.
gl ठं डा-ठं डा पानी पलाओ दोस्त, प्राण सूखे जा रहे ह। 7. सचमुच गरमी म पानी ही तो जान है। 8. यह तो हमारा ही
सारे
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भाग्य है क चने क तरह भाड़ म भुनते रहते ह। 9. फर भी पसीने से नहा गया ँ।
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पहली पं क्त पुस्तक म भरी हुई द गई है। उसी ढंaगgपर शेष आठ इस प्रकार भरे जा सकते ह (आपके वाक्य इनसे अलग भी हो सकते
ह — बस भाव वही रहना चा हए):
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गरमी क भीषणता दशाने वाली
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सद क भीषणता दशाने वाली
पं क्तयाँ as
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वषा क भीषणता दशाने वाली
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पं क्तयाँ पं क्तयाँ
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g l a यह सद म जम गया। यह वषा म भीग रहा है।
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1. यह गरमी में भुन रहा है।
पर रजाई भी कोई कहाँ तक ओढ़ े । पर छाता भी कोई कहाँ तक ताने।
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2. पर बरफ भी कोई कहाँ तक िपए।
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3. सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो। सारे शहर पर जै.सcे oबरफ जम रही हो।
em
सारे शहर पर जैसे आसमान फट पड़ ा हो। agl
a s
4. प्यास है िक बुझने का नाम नही ं ले ती।
a gिठठुlरन है िक जाने का नाम नही ं ले ती। झड़ ी है िक थमने का नाम नही ं ले ती।
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5. चारों तरफ दीवारे ं तप रही है।
ं चारों तरफ दीवारे ं बरफ हुई जा रही है।ं चारों तरफ दीवारे ं सील रही है।ं
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m ा दे दो दोस्त, पाण काँपे जा
सूखा-सूखाeकपड़
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comहै।ं
गरम-गरम चाय िपलाओ दोस्त, पाण जमे जा
aरहेgहैl।ं
6. ठं डा-ठं डा पानी िपलाओ दोस्त, पाण
. रहे है।ं
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सूखे जा रहे
a 7. सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है।
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सचमुच सद में धूप ही तो जान है। सचमुच वष में सूखी छत ही तो जान है।
यह तो हमारा ही भाग्य है िक बरफ की िस ल्ली यह तो हमारा ही भाग्य है िक मेंढक की तरह
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m है।ं a
8. यह तो हमारा ही भाग्य है िक चने की
तरह भाड़ में भुनते रहते है।
ं की तरह जमतेoरहते
. c पानी में डू बते-उतराते रहते है।ं
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9. िफर भी पसीने से नहा गया हू।
ँ िफर भी ठं ड से नीला पड़ गया हू।ँ िफर भी छाते के नीचे भीग गया हू।ँ
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वाक्य बनाते समय यह ध्यान र खए: मूल वाक्य क बनावट मत बद लए, केवल उसम मौसम बद लए। जैसे पं क्त
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4 का ढाँचा है — “X है क Y का नाम नह लेती”। उसम ‘प्यास–बुझने’ क जगह ‘ ठठु mरन–जाने’ रख द जए, ढाँचा
. gla को उपमा से ही बद लए — तब
cवहीomरहेगा और भाव नया हो जाएगा। इसी तरह पं क्त 8 म उपमा (‘चने कaतरह’)
as em वाक्य म वही व्यंग्य बना रहेगा।
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Tip: ‘तर’ (गीला), ‘ ठठु रन’, ‘झड़ी’ (लगातार वषा), ‘सीलन’ जैसे मौसम-शब्द याद र खए। एक अ ा वाक्य वही
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है जो मौसम का नाम लए बना मौसम महसूस करा दे — जैसे ‘पत्ता तक नह हल रहा है’ म ‘गरमी’ शब्द है ही
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नह ।
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
एकांक क रचना — पृष्ठ 120 और 121
पाठ से
पाठ से
प्र.1 (क) अपने समूह म मलकर इस एकांक क वशेषताओं क सूची बनाइए।
‘नए मेहमान’ क वशेषताएँ, एकांक के लक्षण के अनुसार —
वशेषता एकांक से प्रमाण
एक ही अंक पूरी रचना कह भी अंक या दृश्य म नह बँटती; आरंभ से ‘यव नका’ तक एक ही प्रवाह है।
एक ही स्थान “ ान — भारत का कोई बड़ा नगर”; और सारा घटनाक्रम वश्वनाथ के उसी एक कमरे म घटता है। छत,
आँगन और नल क घटनाएँ भी मंच पर नह , संवाद म आती ह।
एक ही समय “गरमी क ऋतु, रात के आठ बजे का समय” से लेकर आधी रात तक — कुछ ही घंट क कथा।
सी मत पात्र वश्वनाथ, रेवती, नन्हेमल, बाबूलाल, प्रमोद, करण, पड़ोसी और आगंतुक — गनती के पात्र, और हर एक
का काम न श्चत।
एक ही समस्या पर क त पूरी एकांक एक ही प्रश्न पर टक है — ‘ये मेहमान कौन ह और इनका क्या कया जाए?’ कोई उपकथा
कथानक नह ।
संवाद-प्रधानता लेखक कह भी अपनी ओर से कथा नह कहता; सब कुछ पात्र के मुँह से खुलता है।
आरंभ म पात्र-प रचय, “ वश्वनाथ — गृहप त”, “नन्हेमल, बाबूलाल — अ त थ”, “रेवती — वश्वनाथ क पत्नी” आ द।
स्थान और समय
कोष्ठक म रंगमंच- नदश “कमरे के पूव क ओर दो दरवाजे… मेज पर रखा हुआ पुराना पंखा चल रहा है… कमरा बेहद गरम है।”
अ भनय संकेत (आँचल से मुँह का पसीना प छती हुई), (तुनककर), (सकपकाकर), (खीझकर), (उछलकर), (इशारे से),
(प्रसन्न होकर)।
वेशभूषा संबंधी नदश “कमीज के ऊपर काली बंडी, सर पर सफेद पग ड़याँ… दोन मैली धो तयाँ पहने ह।” उम्र और चेहरे तक
बताए गए ह।
नेपथ्य का प्रयोग “(नेपथ्य म— ‘अरे बाबू, मेरी धोती दे दे ना।’)” और “(नेपथ्य म— भले आदमी, न जाने कहाँ मकान लया है
—)”।
यव नका से समा प्त अं तम संवाद के बाद “(यव नका)” लखकर परदा गरने का संकेत।
बोलचाल क सजीव भाषा मुहावरे और रोजमरा के प्रयोग — “मकान है क भट्ट !”, “जान म जान आई”, “हाँ नह तो!”
अंत म च काने वाला मोड़ पता चलता है क मेहमान को क वराज रामलाल वैद्य के यहाँ जाना था; और उनके जाते ही असली मेहमान
— रेवती का भाई — आ पहुँचता है।
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क्य यही वशेषताएँ: एकांक को कम समय म एक ही बैठक म मंच पर पूरा होना होता है। इसी लए उसम ान,
समय, पात्र और समस्या — चार सी मत रखे जाते ह। ‘नए मेहमान’ इन चार कसौ टय पर खरी उतरती है, इसी लए
यह एकांक है, नाटक नह ।
प्र.2 (ख) आगे कुछ वाक्य दए गए ह। एकांक के बारे म जो वाक्य आपको सही लग रहे ह, उनके सामने ‘हाँ’
ल खए। जो वाक्य सही नह लग रहे ह, उनके सामने ‘नह ’ ल खए। 1. ‘नए मेहमान’ एकांक म पूरी कहानी एक
ही स्थान, घर म घ टत होती दखाई गई है। 2. एकांक म पात्र क संख्या बहुत अ धक है। 3. एकांक म एक
कहानी छपी है। 4. एकांक और कहानी म कोई अंतर नह है। 5. एकांक म कहानी क घटनाएँ अलग-अलग
दन या महीन म हो रही ह। 6. एकांक म कहानी मुख्य रूप से संवाद से आगे बढ़ती है। 7. एकांक म पात्र को
अ भनय के लए नदश दए गए ह।
क्र. वाक्य हाँ / कारण
नह
1. पूरी कहानी एक ही ान, हाँ सारा घटनाक्रम वश्वनाथ के एक कमरे म होता है। छत, नल और आँगन क बात भी
घर म घ टत होती दखाई संवाद के रास्ते ही मंच तक आती ह।
गई है।
2. एकांक म पात्र क संख्या नही ं कुल आठ पात्र ह और उनम भी मंच पर एक साथ चार-पाँच से अ धक नह आते।
बहुत अ धक है। एकांक म पात्र सी मत ही रखे जाते ह।
3. एकांक म एक कहानी हाँ बना बुलाए दो मेहमान का आना, संदेह, पूछताछ और अंत म गलत घर का खुलासा —
छपी है। यह पूरी कहानी है, जो संवाद म गुँथी हुई है।
4. एकांक और कहानी म कोई नही ं कहानी लेखक स्वयं सुनाता है और वह पढ़ने के लए होती है; एकांक पात्र के संवाद
अंतर नह है। से चलती है और मंच पर खेलने के लए लखी जाती है। उसम रंगमंच- नदश, वेशभूषा
और अ भनय संकेत होते ह।
5. घटनाएँ अलग-अलग दन नही ं पूरी कथा एक ही रात क है — “रात के आठ बजे का समय” से लेकर “ढूँ ढ़ते-ढूँ ढ़ते
या महीन म हो रही ह। आधी रात हो गई” तक।
6. कहानी मुख्य रूप से संवाद हाँ गरमी, गरीबी, पड़ोसी क कड़वाहट और मेहमान का झूठ — हर बात कसी न कसी
से आगे बढ़ती है। पात्र के मुँह से हम तक पहुँचती है।
7. पात्र को अ भनय के लए हाँ (तुनककर), (सकपकाकर), (खीझकर), (उछलकर), (आँचल से मुँह का पसीना प छती
नदश दए गए ह। हुई) — ये सब अ भनय संकेत ह।
वाक्य 3 और 4 को साथ प ढ़ए: दोन एक-दूसरे को काटते नह । एकांक म कहानी होती जरूर है (इस लए 3 पर
‘हाँ’), पर कहने का तरीका बलकुल अलग होता है (इस लए 4 पर ‘नह ’)। यही अंतर पहचानना इस ग त व ध का
असली उ े श्य है।
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अ भनय क बारी — पृष्ठ 121
पाठ से
पाठ से गतवध
प्र.1 (क) क्या आपने कभी मंच पर कोई एकांक या नाटक दे खा है? ट वी पर फल्म और धारावा हक तो अवश्य दे खे
ह गे! अपने अनुभव से बताइए क य द आपको अपने वद्यालय म ‘नए मेहमान’ एकांक का मंचन करना हो तो
आप क्या-क्या तैया रयाँ करगे। (उदाहरण के लए— इस एकांक म आप क्या-क्या जोड़गे जससे यह और
अ धक रोचक बने, कौन-से पात्र जोड़गे या पात्र क वेशभूषा क्या रखगे?)
यह आपके अपने अनुभव का प्रश्न है। उत्तर म तीन बात अवश्य आनी चा हए — मंच क तैयारी, पात्र क तैयारी और आपके
अपने जोड़े हुए वचार।
तैयारी क्या-क्या एकांक म आधार
मंच-सज्जा एक मेज (उस पर कुछ कताब और अखबार), दो कु सयाँ, एक पलंग, एक खूँट , आरंभ का रंगमंच- नदश यही
एक पुराना टे बल-पंखा, पानी का घड़ा और लोटा- गलास। सामान गनाता है।
दरवाज क दो प्रवेश-माग — एक बाहर जाने के लए (द क्षण), एक भीतर के लए (प श्चम)। “द क्षण का ार बाहर आने-जाने
व्यव ा परदे या कु सय से दोन ओर के रास्ते अलग दखाए जा सकते ह। के लए। प श्चम का ार भीतर
खुलता है।”
वेशभूषा वश्वनाथ — कुरता-धोती; रेवती — साड़ी, हाथ म पंखा; नन्हेमल और बाबूलाल पुस्तक स्वयं वेशभूषा बता दे ती है
— कमीज के ऊपर काली बंडी, सर पर सफेद पगड़ी, मैली धोती, कंधे पर बस्तर — उसे बदलने क जरूरत नह ।
और हाथ म संदूक; प्रमोद- करण — साधारण ब के कपड़े।
ध्व न (जो और दरवाजा खटखटाने क आवाज, नेपथ्य से पड़ोसन के चल्लाने क आवाज, पंखे “(बाहर से कोई दरवाजा
रोचक बनाएगी) क घरघराहट, गट-गट पानी पीने क आवाज, और अंत म रात के सन्नाटे क धीमी खटखटाता है।)”, “(नेपथ्य म—
ध्व न। …)”
प्रकाश पीली, म द्धम रोशनी — रात और उमस का प्रभाव पैदा करेगी। पड़ोसी के प्रवेश “रात के आठ बजे का समय।”
पर रोशनी थोड़ी तेज करके तनाव बढ़ाया जा सकता है।
क्या जोड़ सकते आरंभ म एक छोटा सूत्रधार जो दशक को समय और ान बता दे ; बीच म गली ‘तार न मलना’ एकांक का एक
ह से गुजरते कुल्फ वाले क आवाज; अंत म तार लेकर आते डा कये क एक बड़ा सूत्र है, जसे मंच पर दखाया
झलक, जससे पता चले क तार दे र से पहुँचा। जा सकता है।
नमूना उत्तर: “मने अपने वद्यालय के वा षकोत्सव म एक एकांक दे खी थी। ‘नए मेहमान’ का मंचन करने के लए म सबसे पहले
कक्षा क एक मेज, दो कु सयाँ और एक तख्त मंच पर रखूँगा और पीछे एक पुराना पंखा लगाऊँगा। सबसे जरूरी है गरमी का
एहसास — इसके लए हर पात्र बार-बार पसीना प छे गा और हाथ के पंखे से हवा करेगा। म आरंभ म एक सूत्रधार जो ग
ँ ा जो दो
पं क्तय म समय- ान बता दे , और अंत म तार लेकर आते डा कये को दखाऊँगा, जससे दशक को समझ आए क खबर दे र से
क्य पहुँची।”
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
Tip: जोड़ते समय यह दे खए क जोड़ी गई चीज कहानी को आगे बढ़ाए, केवल सजावट न रहे। डा कया जोड़ना
अ ा है क्य क वह ‘तार न मलने’ क गु ी सुलझाता है; बना काम का कोई पात्र जोड़ना एकांक को कमजोर कर
दे गा।
प्र.2 (ख) अब आपको अपने-अपने समूह म इस एकांक को प्रस्तुत करने क तैयारी करनी है। इसके लए आपको यह
सोचना है क कौन कस पात्र का अ भनय करेगा। आपके शक्षक आपको तैयारी के बाद अ भनय के लए
नधा रत समय दगे (जैसे 10 मनट या 15 मनट)। आपको इतने ही समय म एकांक प्रस्तुत करनी है। बारी-बारी
से प्रत्येक समूह एकांक प्रस्तुत करेगा।
यह समूह-काय है। इसे व्यव त रूप से करने का तरीका नीचे दया गया है।
1. भू मकाएँ बाँ टए — आठ अ भनय-भू मकाएँ ह और तीन मंच के पीछे क ।
पात्र स्वभाव — अ भनय म क्या दखाना है
वश्वनाथ (45 वष) गंभीर, संकोची, थका हुआ। आवाज धीमी और शष्ट, पर बीच-बीच म झुँझलाहट (खीझकर)। वाक्य अधूरे छोड़ने क
आदत — “जी, आप लोग…”
रेवती बीमार, चड़ चड़ी, पर भीतर से उदार। सर दबाना और आँचल से पसीना प छना उसका ायी हाव-भाव है। अंत म
स्वर बलकुल बदल जाना चा हए — प्रसन्न और स्नेह भरा।
नन्हेमल (35 वष) बड़ी मूँछ, बे झझक, बातूनी। ऊँची आवाज, बात टालने क कला। ‘हाँ साहब’ उसका त कयाकलाम है।
बाबूलाल (24 वष) अधकट मूँछ, लंबा मुख। छोटा है, इस लए बड़े क हाँ म हाँ मलाता है और ‘चाचा’ कहकर पुकारता है। ‘हाँ नह तो!’
उसका त कयाकलाम है।
प्रमोद समझदार, दौड़-भाग करने वाला बड़ा बेटा। शांत स्वर, तेज चाल।
करण छोट , धीरे से बात करने वाली। “( वश्वनाथ से धीरे से) फर खाना?” — यह पं क्त फुसफुसाकर बोलनी है।
पड़ोसी तेज कदम से प्रवेश, ऊँची और कटु आवाज, शकायती लहजा।
आगंतुक (रेवती का थका हुआ पर स्नेही और संकोची। उसका प्रवेश ही मंच का वातावरण बदल दे ।
भाई)
मंच के पीछे ध्व न (दरवाजा, नेपथ्य क आवाज), प्रकाश, और सामान सँभालने वाला — तीन साथी।
2. समय बाँ टए (15 मनट के लए) —
0–4 मनट : वश्वनाथ और रेवती क गरमी, मकान और पड़ोसी वाली बातचीत।
4–8 मनट : दस्तक, दोन मेहमान का प्रवेश, पानी-खाना और नहाने क माँग।
8–11 मनट : रेवती क झुँझलाहट, पड़ोसी का झगड़ा।
11–14 मनट : पूछताछ, ‘क वराज रामलाल वैद्य’ का खुलासा, मेहमान का जाना।
14–15 मनट : भाई का प्रवेश और रेवती का अं तम संवाद, फर यव नका।
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान
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3. अभ्यास क जए — पहले बैठकर संवाद प ढ़ए, फर खड़े होकर चाल और मुद्रा के साथ, फर सामान के साथ पूरा दोहराइए।
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पुस्तक के सुझाव मा नए — आस-पास क चीज (कुस , मेज) ही काम म ली जए और जगह कम हो तो अपने
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संवाद बो लए।
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aप छता रहे, कपड़े झटकता रहे और पंखा झलता रहे, तो दशक को उमस दखने लगेगी — और तभी मेहमान का
अ भनय का एक सूत्र: इस एकांक क सबसे बड़ी चुनौती संवाद नह , गरमी है। य द हर पात्र लगातार पसीना
बोझ भी उसे महसूस होगा।
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भाषा क बात — पृष्ठ 121 और 122
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पाठ से
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पाठ से
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a glप्र.1 “सारे शहर म जैसे आग बरस रही हो।” “चार तरफ द वार तप रही ह।” “यह तो हमारा ही भाग्य है क चने क
तरह भाड़ म भुनते रहते ह।” उपयुक्त वाक्य म रेखां कत शब्द गरमी क प्रचंडता को दशा रहे ह क तापमान
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गया है, उन प्रयोग को छाँटकर अपनी लेखन .पुc स्तका म ल खए। agl
अत्य धक है। एकांक म इस प्रकार के और भी प्रयोग हुए ह जहाँ शब्द के माध्यम से वशेष प्रभाव उत्पन्न कया
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एकांक म ऐसे प्रयोग भरे पड़े ह। इन्ह प्रभाव के अनुसार छाँटकर ल खए —
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प्रयोग कौन-सा प्रभाव कैसे
“मकान है िक भ ी!” गरमी क प्रचंडता मकान को सीधे भ कह दे ना — रूपक। तुलना का शब्द
(‘जैसा’) भी नह लगाया गया, इस लए असर और तेज है।
“प ा तक नही ं िहल रहा है। ” हवा का बलकुल ‘गरमी’ शब्द कहे बना उमस दखा दे ना। यह एक मुहावरे जैसा
बंद होना प्रयोग है।
“पानी पीते-पीते पेट फू ला जा रहा है” बेचैनी अ तशयो क्त — बात को बढ़ाकर कहना।
“जाने कब तक इस जेल खाने में सड़ना होगा।” घुटन और बेबसी मकान के लए ‘जेलखाना’ — रूपक; और ‘सड़ना’ शब्द
नराशा भर दे ता है।
“तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है। ” शरीर क तपन ‘उबलना’ पानी का शब्द है, शरीर के लए प्रयोग होते ही
अ तशयो क्त बन जाता है।
“कपड़े तो ऐसे हो गए िक िनचोड़ लो।” / “एक पसीने क अ धकता अ तशयो क्त — पसीने को लोटे से नापना।
लोटे से कम पसीना नही ं िनकले ग ा।”
“पाण सूखे जा रहे है।
ं ” प्यास क तीव्रता ‘प्राण’ का सूखना असंभव है — इसी असंभव से प्रभाव बनता है।
“िफर भी पसीने से नहा गया हू।
ँ ” उमस नहाकर आने पर भी पसीने से नहाना — वरोधाभास जैसा
प्रभाव।
“िसर फटा जा रहा है। ” असह्य पीड़ा दद को शरीर के टू टने जैसा दखाना।
“गरीबों की तो मौत है। ” व्यंग्य और करुणा दो शब्द म पूरा वग-भेद कह दे ना।
“लाखों के आदमी खाक में िमल गए।” पूण बरबाद मुहावरा; ‘लाख के आदमी’ म समृ द्ध और ‘खाक’ म शून्य —
दोन आमने-सामने।
“अब जान में जान आई।” गहरी राहत एक ही शब्द ‘जान’ को दो अथ म बरतना।
“ठं डा-ठं डा पानी”, “गट-गट पानी पीते है”ं , दृश्य और ध्व न का पुनरुक्त और अनुकरणात्मक शब्द — इनसे संवाद बोलने पर
“जोर-जोर से पंखा”, “हबड़-तबड़” सजीव चत्र सुनाई दे ने लगता है।
इन सबका साझा गुण: ये सब बोलचाल के प्रयोग ह, कताबी अलंकार नह । उदयशंकर भट्ट ने पात्र को वैसी ही
भाषा द जैसी एक तपते शहर म एक थका हुआ प रवार सचमुच बोलता। इसी लए यह एकांक पढ़ने म नह , सुनने
म और अ लगती है — और यही नाटक क भाषा क कसौट है।
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प्र.2 मुहावरे — “आज दो साल से दन-रात एक करके ढूँ ढ़ रहा ँ।” “लाख के आदमी खाक म मल गए।” उपयुक्त
वाक्य म रेखां कत वाक्यांश ‘रात- दन एक करना’ तथा ‘खाक म मलना’ मुहावर का प्रायो गक रूप है। ये वाक्य
म एक वशेष प्रभाव उत्पन्न कर रहे ह। एकांक म आए अन्य मुहावर क पहचान करके ल खए और उनके अथ
समझते हुए उनका अपने वाक्य म प्रयोग क जए।
मुहावरा अथ एकांक म मेरा अपना वाक्य
जान में जान आना घबराहट दूर होकर चैन “आह! अब जान म जान आई।” बेटे का फोन आते ही माँ क
मलना जान म जान आई।
िसर फटना तेज सरदद होना “दद के मारे सर फटा जा रहा है।” दन भर के शोर से मेरा सर फटा
जा रहा है।
आग बरसना अत्य धक गरमी पड़ना “सारे शहर म जैसे आग बरस रही हो।” जून क दोपहर म तो आसमान
से आग बरसती है।
भाड़ में भुनना बहुत कष्ट सहना “चने क तरह भाड़ म भुनते रहते ह।” बना पंखे के उस कमरे म हम
भाड़ म भुनते रहे।
गला तर करना पानी पीकर प्यास बुझाना “ज़रा गला ही तर कर लूँ।” दौड़ से लौटकर उसने पहले गला
तर कया।
पाण सूखना बहुत घबरा जाना या व्याकुल “प्राण सूखे जा रहे ह।” अँधेरी गली म अकेला दे खकर
होना मेरे प्राण सूख गए।
चल बसना मर जाना “और वह चल बसी।” लंबी बीमारी के बाद वे चल बसे।
चौपट होना पूरी तरह नष्ट हो जाना “उन बेचार का कारोबार सब चौपट हो बाढ़ म कसान क सारी फसल
गया।” चौपट हो गई।
ध नु सवार होना कसी बात क लगन या जद “तुम्ह भी न जाने क्या धुन सवार हो जाती उसे इन दन तैराक सीखने क
चढ़ जाना है।” धुन सवार है।
हाथ-पैर फू ल जाना / घबराहट या कमजोरी से शरीर “पहले सोते-सोते हाथ-पैर सुन्न हो जाते परीक्षा-भवन म प्रश्न दे खकर
सुन्न हो जाना का जवाब दे दे ना थे, अब बैठे-बैठे हो जाते ह।” उसके हाथ-पैर फूल गए।
प ा तक न िहलना बलकुल हवा न चलना; पूरी “पत्ता तक नह हल रहा है।” दोपहर क उमस म पत्ता तक
तरह सन्नाटा होना नह हल रहा था।
पसीने से नहा जाना बहुत अ धक पसीना आना “ फर भी पसीने से नहा गया ँ।” मैदान से लौटते-लौटते वह पसीने
से नहा गया।
कहावत भी दे खए: पाठ के आरंभ क भू मका म एक कहावत आई है — ‘मान न मान म तेरा मेहमान’, यानी
बना संबंध के जबरदस्ती अपनापन जताना। पूरी एकांक इसी एक कहावत का वस्तार है।
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मुहावरा और कहावत म अंतर: मुहावरा वाक्य का अंश होता है और क्रया के साथ रूप बदलता है (‘जान म जान
आई’, ‘जान म जान आएगी’)। कहावत पूरा वाक्य होती है और उसका रूप नह बदलता।
प्र.3 बात पर बल दे ना — “वह तो कहो, म भी ढूँ ढ़कर ही रहा।” उपयुक्त वाक्य से रेखां कत शब्द ‘ही’ हटाकर प ढ़ए—
“वह तो कहो, म भी ढूँ ढ़कर रहा” (क) दो-दो के जोड़े म चचा क जए क वाक्य म ‘ही’ के प्रयोग से कस बात को
बल मल रहा था और ‘ही’ हटा दे ने से क्या कमी आई?
‘ही’ कस बात को बल दे रहा था: उसने आधी रात तक भटकने के बाद भी हार नह मानी — मकान ढूँ ढ़कर ही दम लया। यहाँ
‘ही’ दृढ़ नश्चय पर बल दे ता है: काम पूरा कए बना नह छोड़ा।
वाक्य से पहले का संदभ इसे और साफ करता है। आगंतुक कहता है — “भाई, बहुत बड़ा शहर है। वह तो कहो, म भी ढूँ ढ़कर ही
रहा, नह तो न जाने कहाँ होटल या धमशाला म रहना पड़ता।” यानी उसक जद न होती, तो वह रात होटल म काटता।
‘ही’ हटाने से क्या कमी आई:
वाक्य का जोर खत्म हो गया — “म भी ढूँ ढ़कर रहा” म अब कोई नश्चय नह बचा, बस एक सूचना रह गई।
वाक्य अधूरा-सा लगने लगा — पाठक को लगता है क आगे कुछ और आना चा हए।
अगले हस्से से जुड़ाव टू ट गया — “नह तो न जाने कहाँ होटल म रहना पड़ता” का वरोध तभी साथक है जब पहले खंड म
जद हो।
क्य होता है ऐसा: ‘ही’ अपने आप म कोई नई सूचना नह दे ता — वह केवल यह बताता है क वाक्य का भार
कस शब्द पर रखना है। ऐसे शब्द का काम बोलने म स्वर के उतार-चढ़ाव जैसा होता है। (व्याकरण म इन्ह नपात
कहा जाता है।) इसी लए ‘ही’ का ान बदलते ही अथ भी बदल जाता है — “म ही ढूँ ढ़कर रहा” का अथ है क
और कोई नह ढूँ ढ़ पाता; “म ढूँ ढ़कर ही रहा” का अथ है क मने हार नह मानी।
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प्र.4 (ख) नीचे लखे वाक्य म ऐसे स्थान पर ‘ही’ का प्रयोग क जए क वे सामने लखा अथ दे ने लगे— 1. वश्वनाथ
के अ त थ यहाँ रुकगे — और कसी के अ त थ नह । 2. वश्वनाथ के अ त थ यहाँ रुकगे — यहाँ के अ त रक्त
और कह नह । 3. वश्वनाथ के अ त थ यहाँ रुकगे — यहाँ रुकना न श्चत है।
क्र. वां छत अथ ‘ही’ लगाकर बना ‘ही’ कस शब्द पर लगा
वाक्य
1. और कसी के अ त थ िवश्वनाथ के ही अितिथ यहाँ ‘ वश्वनाथ के’ पर — यानी कसके अ त थ, यह तय कया जा रहा है।
नह । रुकें गे।
2. यहाँ के अ त रक्त और िवश्वनाथ के अितिथ यही ं ‘यहाँ’ पर — यानी कहाँ रुकगे, यह तय कया जा रहा है। (‘यहाँ + ही’
कह नह । रुकें गे। मलकर यह बन जाता है।)
3. यहाँ रुकना न श्चत है। िवश्वनाथ के अितिथ यहाँ क्रया ‘रुकगे’ पर — यानी रुकना पक्का है, इसम कोई संदेह नह ।
रुकें गे ही।
नयम पक ड़ए: ‘ही’ हमेशा उस शब्द के तुरंत बाद आता है जस पर बल दे ना है। इस लए एक ही वाक्य के तीन
अलग-अलग अथ केवल ‘ही’ क जगह बदलकर बनाए जा सकते ह — शब्द वही रहते ह, क्रम भी लगभग वही रहता
है।
ध्यान रहे: कुछ शब्द म ‘ही’ जुड़कर नया रूप बना लेता है — यहाँ + ही = यह , वहाँ + ही = वह , अब + ही =
अभी, तब + ही = तभी, यह + ही = यही, वह + ही = वही। इसी लए दूसरे वाक्य म ‘यहाँ ही’ नह , ‘यह ’ लखना
अ धक सहज है।
प्र.5 • “तुम नहाने तो जाओ।” उपयुक्त वाक्य म ‘तो’ का स्थान बदलकर अथ म आए प रवतन पर ध्यान द— “तुम तो
नहाने जाओ।” “तुम नहाने जाओ तो।” ‘ही’ और ‘तो’ के ऐसे और प्रयोग करके वाक्य बनाइए।
पहले दए गए तीन वाक्य का अंतर सम झए —
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वाक्य बल कस पर अथ
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तुम नहाने तो
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बाक बात छोड़ो, पहले नहाने का काम कर आओ। (एकांक म वश्वनाथ यही कहकर आगंतुक
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जाओ। को भेजता है और फर रेवती से बात करता है।)
aतुgम lतो नहाने ‘तुम’ पर दूसर क चता मत करो, तुम अपना काम करो।
जाओ।
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तुम नहाने जाओ पूरी क्रया पर, शत
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पहले जाओ तो सही — फर आगे क बात होगी। इसम हल्का उलाहना भी है। ag
तो। के रूप म
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‘ही’ के मेरे अपने वाक्य:
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रेवती ही खाना बनाएगी। (और कोई नह बनाएगा।)
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रेवती खाना ही बनाएगी। (और कोई काम नह करेगी।)
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s अभी बरफ लेकर आ जाएगा। (अब + ही)
रेवती खाना ही। (बनाना न श्चत है।)
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agl मेहमान वह ठहरे थे। (वहाँ + ही)
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‘तो’ के मेरे अपने वाक्य:
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तुम पानी तो पी लो। (कम से कम इतनाgतोl कर ही लो।)
तुम तो पहले पानी पी लो। (और लोग क बात बाद म।)
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तुम पानी पी लो तो। (पहले यह कर लो, फर आगे बात करगे।)
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आया तो वह था, पर बहुत दे र से। (आना सच है, समय गलत था।)
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m नह )। ‘तो’ कसी बात को अलग करके सामने रखता है, पर बाक को नकारता नह (‘पानी तो पी लो’ = खानाa g
‘ही’ और ‘तो’ म अंतर: ‘ही’ कसी बात को सी मत करता है — बाक सबको बाहर कर दे ता है (‘रेवती ही’ = और
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a gl भले न खाओ, पानी पी लो)। इसी लए ‘तो’ म अक्सर आग्रह, तुलना या हल्का उलाहना घुला रहता है।
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आपक बात — पृष्ठ 123
पाठ से आगे
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पाठ से आगे
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m .c (क) “रेवती— ये लोग कौन ह? जान-पहचान के तो मालूम नह पड़तेa।gवश्वनाथ— क्या पूछ लूँ? दो-तीन बार
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पूछा, ठ क-ठ क उत्तर ही नह दे ते।” उपयुक्त संवाद से पता चलता है क वश्वनाथ दु वधा क स्थ त म है। क्या
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आपके सामने कभी कोई ऐसी दु वधापूण स्थ त आई है जब आपको यह समझने म समय लगा हो क क्या सही
है और क्या गलत? अपने अनुभव साझा क जए।
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यह आपके अपने अनुभव का प्रश्नaहैg, इस लए उत्तर आपका अपना होगा। पर अ े उत्तर म चार बात होनी चा हए —
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1. स्थ त — क्या हुआ था, कब और कहाँ।
2. दु वधा — दोन रास्ते क्या थे और दोन म कुछ-कुछ ठ क क्य लग रहा था।
3. नणय — आपने आ खर क्या कया और कस आधार पर।
4. सीख — अब पीछे मुड़कर दे खने पर आप क्या सोचते ह।
नमूना उत्तर: “कक्षा-परीक्षा के दन मेरे पास बैठे मत्र ने चुपके से उत्तर पूछ लया। एक ओर मन कह रहा था क वह मेरा अ ा मत्र
है और उसक माँ बीमार होने के कारण वह पढ़ नह पाया था; दूसरी ओर यह भी पता था क परीक्षा म बताना गलत है। मुझे समझ
ही नह आ रहा था क दोस्ती नभाऊँ या ईमानदारी। मने उस समय उत्तर नह बताया, पर छु ट्ट के बाद उसके घर जाकर पूरा पाठ
उसे समझाया और अगली परीक्षा म वह स्वयं अ े अंक ले आया। अब मुझे लगता है क मेरा नणय ठ क था — स ी मदद वह है
जो दूसरे को आगे के लए तैयार करे, उस क्षण भर के लए बचा भर न दे ।”
वश्वनाथ क दु वधा से इसक तुलना: वश्वनाथ के सामने भी दो सही बात आमने-सामने थ — अ त थ का
सम्मान और अपने प रवार क रक्षा। दु वधा तब क ठन होती है जब चुनाव सही और गलत के बीच नह , ब ल्क दो
सही बात के बीच हो। ऐसे म यह दे खना चा हए क कस नणय से कसी को ायी नुकसान नह होगा।
प्र.2 (ख) एकांक से ऐसा लगता है क नन्हेमल और बाबूलाल सगे संबंधी ही नह , अ े मत्र भी ह। आपके अ े
मत्र कौन-कौन ह? वे आपको क्य प्रय ह?
यह व्य क्तगत उत्तर है। इसम केवल मत्र के नाम मत गनाइए — हर नाम के साथ एक कारण और एक घटना द जए, तभी
उत्तर स ा लगेगा।
दे खए एकांक क्या दखाती है: नन्हेमल और बाबूलाल क मत्रता उनके संवाद से झलकती है — बाबूलाल हर
बात म ‘चाचा’ कहकर बड़े का साथ दे ता है (“उतना ही म।”), नन्हेमल पानी आने पर कहता है “लो चाचा, पहले तुम
पी लो”, और मु श्कल म दोन एक-दूसरे को बचा लेते ह (“म उस समय नह था… तुम्ह ने रेल म बताया था।”)।
यानी मत्रता क पहचान बड़े-बड़े वाद म नह , छोटे -छोटे व्यवहार म मलती है।
नमूना उत्तर: “मेरे सबसे अ े मत्र आरव और सलमा ह। आरव मुझे इस लए प्रय है क्य क वह मेरी गलती मेरे मुँह पर कह दे ता है
— जब मने एक छोटे ब े का मजाक उड़ाया था, तो सबके सामने नह , पर अकेले म उसने मुझे टोका था। सलमा इस लए प्रय है
क्य क वह सुनना जानती है; मेरे नाना के दे हांत के बाद वह रोज मेरे साथ बैठकर बना कुछ पूछे बस साथ रहती थी। मेरे लए अ ा
मत्र वह है जो सुख म साथ हँसे और दुख म साथ चुप रह सके।”
प्र.3 (ग) आप अपने कसी संबंधी या मत्र के घर जाने से पहले क्या-क्या तैयारी करते ह?
एक अ े अ त थ क तैयारी दो हस्स म होती है — सूचना दे ने क तैयारी और सामान क तैयारी।
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तैयारी क्या कर क्य
पहले से फोन या संदेश से बता दे ना क हम कब आ रहे ह, यही वह बात है जो एकांक म नह हुई। रेवती को खाना बनाने का
बताना कतने लोग ह और कतने दन रुकगे। समय ही नह मला और सारा तनाव इसी से खड़ा हुआ।
पहुँचने का दन म पहुँचने क को शश करना; बहुत रात या नन्हेमल और बाबूलाल रात आठ बजे के बाद पहुँचे, जब घर सोने क
समय बहुत सवेरे पहुँचने से बचना। तैयारी कर रहा था।
पता ठ क से पूरा पता, गली का नाम और फोन नंबर पहले दोन मेहमान को न गली का नाम याद था, न जससे मलना था
लेना लख लेना। उसका नाम — इसी लए गलत घर पहुँच गए।
अपना अपने कपड़े, तौ लया, दवाइयाँ, चाजर, पानी क ता क मेजबान पर छोट -छोट चीज का बोझ न पड़े।
सामान बोतल साथ रखना।
छोटा-सा घर के ब के लए कुछ ले जाना या अपने क्षेत्र यह दखाता है क आप सोच-समझकर आए ह।
उपहार क कोई चीज ले जाना।
घर के नयम पानी, नहाने और सोने क व्यव ा के बारे म पूछ छत पर हाथ धोकर पानी फैलाना — पड़ोसी से झगड़ा इसी छोट -सी
पूछना लेना और उसी के अनुसार चलना। लापरवाही से हुआ।
सार: एक अ ा अ त थ वह है जसका आना मेजबान के लए आयोजन बने, आप त्त नह । और इसके लए सबसे
बड़ी चीज सूचना है — मेजबान को तैयारी का समय दे ना ही सबसे बड़ा शष्टाचार है।
प्र.4 (घ) वश्वनाथ के पड़ोसी उनका कसी प्रकार से भी सहयोग नह करते ह। आप अपने पड़ो सय का कस प्रकार से
सहयोग करते ह?
उत्तर अपने अनुभव से ल खए, पर उसे केवल ‘अ े -अ े ’ वाक्य क सूची मत बनाइए — असली उदाहरण द जए।
ऐसे सहयोग कए जा सकते ह:
पड़ोसी के घर कोई न हो तो उनका कू रयर या डाक ले लेना और लौटने पर दे दे ना।
बुजुग पड़ो सय का सामान सी ढ़य तक पहुँचाना, दवा लाकर दे ना।
बीमारी या दुघटना म तुरंत सहायता करना, जरूरत पड़े तो अपने माता- पता को बुलाना।
छोटे ब को त्योहार, जन्म दन या पढ़ाई म साथ ले लेना।
तेज आवाज म संगीत न बजाना, सी ढ़य और साझी छत को साफ रखना — यह भी सहयोग ही है।
पानी, बजली या सफाई क साझी समस्या पर मलकर बात करना।
नमूना उत्तर: “हमारे बगल म एक अकेली बुजुग म हला रहती ह। उनक आँख कमजोर ह, इस लए म सप्ताह म दो बार उनके पत्र
और बजली का बल पढ़कर सुना दे ती ँ। पछली गरमी म जब उनके घर पानी क मोटर खराब हो गई, तो हमने तीन दन तक अपने
घर से पानी भरकर पहुँचाया। वे बदले म हमारे लए अचार बनाकर भेजती ह।”
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एकांक से जो ड़ए: वश्वनाथ के पड़ोसी के पास खाली छत थी और ब को केवल एक खाट चा हए थी। जो चीज
उसके पास फालतू पड़ी थी, वही दे ने से उसने मना कर दया। इससे सीखने लायक बात यह है क सहयोग म अक्सर
कोई नुकसान नह होता, केवल थोड़ी-सी उदारता चा हए होती है।
प्र.5 (ङ) नन्हेमल और बाबूलाल का व्यवहार सामान्य अ त थय जैसा नह है। आपके अनुसार सामान्य अ त थय का
व्यवहार कैसा होना चा हए?
अ त थ का व्यवहार कैसा हो, यह समझने का सबसे आसान तरीका है — दे खए क नन्हेमल और बाबूलाल ने क्या-क्या कया, और
उसका उल्टा क जए।
नन्हेमल और बाबूलाल ने क्या कया एक अ े अ त थ को क्या करना चा हए
अपना प रचय कभी साफ नह दया — “हम तो आपके पास के ह।” पहुँचते ही स्पष्ट प रचय दे ना — म कौन ँ, कसके कहने पर
आया ँ।
बना सूचना और बना च के रात को आ धमके। पहले से खबर दे ना और उ चत समय पर पहुँचना।
माँग-माँगकर सेवा कराई — “दस से कम नह पीऊँगा”, “नहाने का प्रबंध जो मल जाए उसी म संतोष करना; अपना काम यथासंभव
तो होगा?” स्वयं करना।
घर क त क परवाह नह क , जब क करण दो बार खाने के बारे म मेजबान क सु वधा-असु वधा पर ध्यान दे ना और बोझ कम
पूछ चुक थी। करना।
पड़ोसी क छत पर पानी फैला दया। घर और आस-पड़ोस के नयम का पालन करना।
पूछे जाने पर बहाने बनाए — “नाम तो याद नह आता।” सच बोलना; गलती हो जाए तो स्वीकार करना।
तुलना क जए — रेवती का भाई भी बना खबर पहुँचा (क्य क तार नह मला), पर उसका व्यवहार बलकुल अलग है। वह कहता
है — “शायद रात को आप लोग को कोई कष्ट हो” और “इस समय खाना-वाना रहने दो। म पानी पीकर सो जाऊँगा।” वह
होटल म ठहरने तक क बात सोचता है। यही एक स े अ त थ का लक्षण है — वह अपने आराम से पहले मेजबान क सु वधा
सोचता है।
ध्यान रखने क बात: ‘अ त थ दे वो भव’ केवल मेजबान के लए नयम नह है। यह अ त थ पर भी उतनी ही
जम्मेदारी डालता है — दे वता वही कहलाता है जो लेता कम है और दे ता अ धक है।
सावधानी और सुरक्षा — पृष्ठ 123
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.1 (क) वश्वनाथ ने नन्हेमल और बाबूलाल से उनका प रचय नह पूछा और उन्ह घर के भीतर ले आए। य द आप
उनके स्थान पर होते तो क्या करते?
म दरवाजे पर ही, वनम्रता से पर स्पष्ट रूप से, पूरा प रचय पूछ लेता — और प रचय स्पष्ट हुए बना उन्ह घर के भीतर न ले जाता।
म क्रम से यह करता:
1. दरवाजा पूरा न खोलकर पहले पूछता — “आप कौन ह और कससे मलना है?” भीतर आने का न्योता उत्तर मलने के बाद
दे ता।
2. कसका नाम लेकर आए ह, यह पक्का करता — वे ‘संपतराम’ का नाम ले रहे थे, जसे वश्वनाथ जानता ही नह था। यह
रुककर पूछ लेना चा हए था।
3. पता मलाता — उन्ह ‘रेलवे रोड, कृष्णा गली’ जाना था। यह पता वश्वनाथ के घर का है या नह , यह पहले ही मल जाता।
4. कसी प्रमाण क बात करता — “कोई च लाए ह?” यह प्रश्न वश्वनाथ ने बहुत दे र से पूछा। यह पहला प्रश्न होना चा हए
था।
5. पड़ोस या प रवार को साथ रखता — य द संदेह बना रहता, तो घर के कसी बड़े व्य क्त को साथ बुला लेता।
6. मदद से मना न करता — म उन्ह भीतर न बुलाकर भी पानी पला सकता था, सही पता बता सकता था और पास क धमशाला
या क वराज रामलाल वैद्य का घर बता सकता था। सावधानी और सज्जनता साथ-साथ चल सकती ह।
वश्वनाथ से यह चूक क्य हुई: वह अ शष्ट कहलाने से डर गया। उसने हर बार प्रश्न शुरू कया और ‘क्षमा
क जएगा’ कहकर बीच म छोड़ दया। सीखने क बात यह है — प रचय पूछना अ शष्टता नह है। अ शष्टता तरीके
म होती है, प्रश्न म नह ।
प्र.2 (ख) आपके माता- पता या अ भभावक क अनुप स्थ त म य द कोई अप र चत व्य क्त आए तो आप क्या-क्या
सावधा नयाँ बरतगे?
घर पर अकेले होने पर सबसे बड़ा नयम एक ही है — दरवाजा न खोल और बातचीत दरवाजे के भीतर से ही कर।
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान
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करना चा हए नह करना चा हए
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पहले आइ-होल या खड़क से दे खना क कौन है। बना दे खे दरवाजा खोल दे ना।
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दरवाजा बंद रखकर पूछना — “आप कौन ह? कससे काम है?” यह बता दे ना क “घर पर कोई नह है, म अकेला ँ।” इसके बजाय
a क हए — “पापा अभी व्यस्त ह, आप बाद म आइए।”
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तुरंत माता- पता को फोन करना और उन्ह बताना क कौन आया है। अपना नाम, स्कूल, पता या घर का समय-चक्र बताना।
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मरम्मत, बजली-पानी या डलीवरी वाले को माता- पता के लौटने कसी भी अप र चत को घर के भीतर बुलाना, चाहे वह वद म ही क्य
तक रुकने के लए कहना। न हो।
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पैकेट या सामान लेने से पहले माता- पता से पूछ लेना। अप र चत से मली खाने-पीने क चीज लेना।
चुप रह जाना या डर के कारण कसी कोeनm
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घबराहट हो तो भरोसेमंद पड़ोसी को बुलाना, या 112 बताना।
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(आपातकालीन नंबर) / 1098 (चाइल्डलाइन) पर फोन करना।
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पहले से तैयारी: माता- पता, एक पड़ोसी और एक रश्तेदार के फोन नंबर कह लखकर या फोन म सहेजकर
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र खए। दरवाजे क चटखनी और चेन ठ क हालत म ह , यह भी दे ख ली जए।
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‘नए मेहमान’ से सीख: एकांक म मेg
a l चोर नह नकले — पर वश्वनाथ को यह पता नह था जब उसने उन्ह
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भीतर बुलाया। सावधानी इस लए नह बरती जाती क सामने वाला बुरा है; इस लए बरती जाती है क हम अभी पता
नह क वह कौन है।
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laजsन — पृष्ठ 123
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पाठ से आगे ले ख न
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(क) आपने यह एकांक पढ़ । इस एकांक म एक कहानी कही गई है। उस कहानी को अपने शब्द म ल खए।
(जैसे— एक दन मेरे घर म मेहमान आ गए…)
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emवणन म बदल देना। कहानी कसी एक पात्र क जुबानी लखी जा सकती है (यहाँ प्रमोद क जुबानी लखी गई है)।
यहाँ एकांक को कहानी म बदलना है। इसका अथ है — संवाद को हटाकर घटनाओं को क्रम से सुनाना, और रंगमंच- नदश को
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नमूना उत्तर — ‘उस रात के मेहमान’
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एक दन मेरे घर म मेहमान आ गए, और वह दन मुझे आज तक याद है।
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गरमी क वह रात ऐसी थी क पत्ता तक नह हल रहा था। हमारा कराये का मकान वैसे भी छोटा है — दो कमरे, एक छोटा-सा
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agके पंखे से हवा कर रहे थे और बार-बार कह रहे थे क मकान है क भट्ट । माँ का सर पंद्रह दन
आँगन और ऊपर एक साझी छत। मेज पर रखा पुराना पंखा घरघराता तो बहुत था, पर हवा नाम क चीज नह दे ता था। पता जी
दफ्तर से लौटकर छोटे भाई को हाथ
से दद कर रहा था। उन्ह ने ईश्वर से बस एक ही बात माँगी थी — इन दन कोई मेहमान न आए।
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
तभी दरवाजा खटखटा। पता जी नीचे गए और थोड़ी दे र बाद दो अजनबी बस्तर और संदूक उठाए ऊपर चढ़ आए। कमीज के ऊपर
काली बंडी, सर पर सफेद पगड़ी। बड़े का नाम नन्हेमल था, छोटे का बाबूलाल। वे आते ही ‘पं डत जी’ कहकर बैठ गए, पसीना
प छा और ठं डे पानी क माँग क । म दौड़कर गली से बरफ ले आया। दोन गट-गट पानी पीकर बोले — अब जान म जान आई। फर
मुझसे और बहन करण से नाम पूछा और आपस म कहा, “ कतने सीधे लड़के ह।”
पता जी बार-बार पूछते रहे क वे कौन ह, कहाँ से आए ह। वे कभी कसी संपतराम का नाम लेते, कभी सेठ जगद शप्रसाद का।
च पूछ गई तो सकपका गए। भीतर माँ ने साफ कह दया क वे खाना नह बनाएँगी। इसी बीच मेहमान ने पड़ोसी क छत पर
हाथ धो लए, पानी फैल गया और पड़ोसी अंकल गुस्से म आ धमके — “मेहमान आपके ह गे, मेरे नह ।” पता जी बार-बार क्षमा
माँगते रहे, और वे बार-बार ताना मारकर चले गए।
आ खर पता जी ने सीधा पूछ लया क जनके यहाँ जाना है, उनका नाम क्या है और वे करते क्या ह। बहुत सोचने के बाद बाबूलाल
बोला — शायद क वराज ह, वैद्य ह। तब मुझे याद आया क पछली गली म क वराज रामलाल वैद्य रहते ह। दोन उछल पड़े — “अरे
हाँ, वही तो!” और राम-राम कहकर मेरे साथ चल दए। म उन्ह उनका घर दखाकर लौटा तो माँ चैन क साँस ले रही थ ।
पर उसी समय नीचे से आवाज आई — “भले आदमी, न जाने कहाँ मकान लया है, ढूँ ढ़ते-ढूँ ढ़ते आधी रात हो गई।” माँ का चेहरा
खल उठा। मामा जी आए थे। उन्ह ने झाँसी से तार भेजा था, जो हम मला ही नह , और वे चार घंटे से मकान खोज रहे थे। मामा जी
बार-बार कहते रहे क इतनी गरमी म खाना रहने दो, वे पानी पीकर सो जाएँगे। पर माँ, जन्ह ने घंटे भर पहले खाना बनाने से साफ
मना कर दया था, उसी सरदद और उसी गरमी म रसोई क ओर चल द । जाते-जाते उन्ह ने बस इतना कहा — “भैया भूखे नह सो
सकते।”
उस रात मुझे समझ आया क मेहमानदारी बोझ है या सुख, यह मेहमान के आने से नह , आने वाले के अपनेपन से तय होता है।
कहानी लखते समय ध्यान द जए:
संवाद बलकुल न रख, ऐसा जरूरी नह — पर उन्ह को र खए जो कहानी का मोड़ बनाते ह (जैसे “भैया भूखे
नह सो सकते।”)।
रंगमंच- नदश को वणन बना द जए — “कमरा बेहद गरम है” को “कमरा भ जैसा तप रहा था” लख
द जए।
घटनाओं का क्रम मत बद लए — दस्तक → मेहमान का आना → पड़ोसी का झगड़ा → खुलासा → भाई का
आना।
अंत म अपनी एक पं क्त जो ड़ए, जसम आपक समझ दखे। कहानी वह से आपक बनती है।
गरमी का प्रकोप — पृष्ठ 123 और 124
पाठ से आगे
पाठ से आगे समू ह -काय
प्र.1 “तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है।” एकांक म भीषण गरमी का वणन कया गया है। आप गरमी के प्रकोप
से बचने के लए क्या-क्या सावधानी बरतगे? पाँच-पाँच के समूह म चचा कर। मुख्य बदुओं को चाट पेपर पर
लखकर बुले टन बोड पर लगाएँ और इन्ह व्यवहार म लाएँ।
चचा के बाद चाट पेपर पर बदुओं को शीषक म बाँटकर ल खए — तभी वह पढ़ने और मानने लायक बनेगा।
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
क्षेत्र क्या कर क्य
पानी प्यास लगने का इंतजार कए बना थोड़ी-थोड़ी दे र म पानी पसीने से शरीर का पानी और नमक दोन नकलते ह।
पएँ। न बू-पानी, ना रयल पानी, छाछ, आम पन्ना और शकंजी केवल पानी नह , नमक-चीनी वाला घोल भी जरूरी है।
ल। बाहर जाते समय पानी क बोतल साथ रख।
समय दोपहर 12 से 4 बजे के बीच धूप म नकलने से बच। खेलकूद इन्ह घंट म लू सबसे तेज होती है।
सुबह या शाम को रख।
कपड़े ढ ले, सूती और हल्के रंग के कपड़े पहन। बाहर नकल तो सूती कपड़ा पसीना सोखता है और हल्का रंग धूप लौटा
टोपी, छाता, गमछा या दुपट्टे से सर ढक। दे ता है।
भोजन हल्का और ताजा भोजन कर। तरबूज, खरबूजा, ककड़ी, खीरा, गरमी म खाना जल्द खराब होता है; टाइफाइड और पेट
दही खाएँ। बाहर का कटा-खुला और बासी खाना न खाएँ। क बीमा रयाँ इसी मौसम म फैलती ह। एकांक म भी
सामने वाले घर क लड़क टाइफाइड से चल बसी थी।
घर दन म धूप वाली खड़ कय पर परदे या खस क चक लगाएँ, दन म गरम हवा रोकनी है, रात म ठं डी हवा भीतर लानी है।
रात म खड़ कयाँ खोल द। छत या आँगन म पानी छड़क।
लू लगने तुरंत छाया म लटाएँ, कपड़े ढ ले कर, गीले कपड़े से शरीर चक्कर आना, उल्ट , तेज बुखार और पसीना बंद हो जाना
पर प छ, नमक-चीनी का घोल या ओ.आर.एस. द, और डॉक्टर के — ये लू के लक्षण ह, इन्ह हल्के म न ल।
पास ले जाएँ।
दूसर का प क्षय के लए छत पर पानी का सकोरा रख। घर आए गरमी सब पर बरसती है, पर उससे बचने के साधन सबके
ध्यान डा कये, कू रयर वाले या मजदूर को पानी पूछ। छोटे ब और पास नह होते — रेवती के शब्द म, “गरीब क तो मौत
बुजुग पर वशेष ध्यान द। है।”
लंबी दृ ष्ट पेड़ लगाएँ और लगे हुए पेड़ बचाएँ; बजली-पानी बरबाद न छायादार पेड़ आस-पास का तापमान कई डग्री तक घटा
कर। दे ता है।
चाट बनाते समय: बड़े अक्षर म केवल 6–8 बदु ल खए, हर बदु के साथ एक चत्र बनाइए, और सबसे ऊपर एक
नारा ल खए — जैसे “पानी पएँ, छाँव म रह, दूसर को भी बचाएँ”। बुले टन बोड पर वही चाट काम करता है
जो दूर से पढ़ा जा सके।
तार से संदेश — पृष्ठ 124
पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.1 (क) तार भेजने के आधार पर अनुमान लगाएँ क यह एकांक लगभग कतने वष पहले लखी गई होगी?
अनुमान — यह एकांक लगभग 80 से 90 वष पहले लखी गई होगी, यानी बीसव सद के चौथे-पाँचव दशक के आसपास।
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अनुमान का आधार, एक-एक करके:
संकेत एकांक म इससे क्या नकलता है
तार का “कल ही तो झाँसी से दया था।” तार तब संदेश भेजने का सबसे तेज साधन था। न फोन का जक्र है, न कसी
प्रचलन और साधन का। भारत म तार-सेवा 15 जुलाई 2013 को पूरी तरह बंद हो गई
— यानी यह उससे बहुत पहले का समय है।
लेखक का उदयशंकर भट्ट — 1898 से 1966 एकांक 1966 से पहले ही लखी गई होगी। यानी आज से कम-से-कम साठ
जीवनकाल वष पहले।
मुद्रा “साढ़े नौ आने गज”, “सवा रुपया ‘आना’ 1957 तक चलन म था। उसके बाद दे श म दशमलव मुद्रा (नए पैसे)
गज” आ गई।
क मत नौ रुपये म धोती, सवा रुपये गज ये क मत आजाद से पहले या उसके तुरंत बाद क ह।
मलमल, तीन-चार रुपये म दो लोग का
भोजन
जीवन-शैली घड़े का पानी, बरफ बाजार से मँगाना, घर म न ज है, न नल का ऊपर तक पानी — यानी बहुत पुराना समय।
मेज पर रखा एक पुराना पंखा, तीन
मं जल पानी चढ़ाना
ध्यान द जए: एकांक म कह भी लखने का वष नह दया गया, इस लए यह अनुमान है, तथ्य नह । पर अनुमान
भी प्रमाण पर टका हो तो उसे तक कहते ह। ऊपर के पाँच संकेत एक ही दशा म इशारा करते ह, इसी लए यह
अनुमान भरोसे लायक है।
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प्र.2 (ख) आजकल संदेश भेजने के कौन-कौन से साधन सुलभ ह?
साधन कैसे काम करता है वशेषता
मोबाइल फोन पर बात आवाज तुरंत दूसरे तक सबसे तेज और सबसे सरल; पढ़ना- लखना न आता हो तब भी काम
आता है।
एस.एम.एस. और इंटरनेट संदेश लखा हुआ संदेश, चत्र, संदेश सुर क्षत रहता है, बाद म पढ़ा जा सकता है; बक और सरकारी
(मैसे जग ऐप) ध्व न-संदेश सूचनाएँ इसी से आती ह।
ई-मेल इंटरनेट के माध्यम से पत्र लंबे और औपचा रक संदेश तथा दस्तावेज के लए।
और फाइल
वी डयो कॉल आवाज के साथ चेहरा भी दूर बैठे प रवार से आमने-सामने जैसी बात।
सोशल मी डया एक साथ बहुत लोग तक सूचना बहुत तेजी से फैलती है — इसी लए बना जाँचे कुछ आगे
नह बढ़ाना चा हए।
भारतीय डाक — पत्र, स्पीड पोस्ट, डा कये के माध्यम से आज भी सबसे भरोसेमंद और कानूनी रूप से मान्य; दे श के कोने-
मनीऑडर कोने तक पहुँचता है।
तार से आज तक: तार म शब्द क गनती के हसाब से पैसे लगते थे, इस लए संदेश बहुत छोटा और सूखा होता
था। आज संदेश लंबा भी हो सकता है, चत्र और आवाज के साथ भी। पर एक बात नह बदली — संदेश तभी काम
का है जब वह सही समय पर सही व्य क्त तक पहुँचे। एकांक म तार भेजा तो गया था, पर समय पर पहुँचा नह —
और सारी परेशानी वह से शुरू हुई।
प्र.3 (ग) आप कसी को संदेश भेजने के लए कस माध्यम का सवा धक उपयोग करते ह?
यह आपका अपना उत्तर होगा। इसे लखते समय केवल माध्यम का नाम मत द जए — यह भी बताइए क कस काम के लए
कौन-सा माध्यम चुनते ह और क्य ।
नमूना उत्तर: “म सबसे अ धक मोबाइल फोन का उपयोग करता ँ। घर पर दे र होने क सूचना दे नी हो तो सीधे फोन कर लेता ँ,
क्य क उसम तुरंत उत्तर मल जाता है। मत्र से गृहकाय पूछना हो या कसी पन्ने का चत्र भेजना हो तो संदेश-ऐप का प्रयोग करता
ँ, क्य क लखी हुई बात बाद म भी दख जाती है। नानी को जन्म दन क बधाई दे नी हो तो वी डयो कॉल करता ँ, क्य क उन्ह
चेहरा दे खकर ज्यादा अ ा लगता है। और वद्यालय म छु ट्ट का प्राथना-पत्र भेजना हो तो ई-मेल करता ँ, क्य क वह औपचा रक
रकॉड बन जाता है।”
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान
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अ ा उत्तर वह है जसम चुनाव का कारण हो: तीन-चार प र
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तयाँ बनाइए — घर, मत्र, रश्तेदार, वद्यालय
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— और हर एक के लए अलग माध्यम बताइए। इससे पता चलता है क आप सोच-समझकर माध्यम
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agl (घ) अपने कसी प्रय व्य क्त को एक पत्र लखकर भारतीय डाक ारा भे जए।
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यह करके दे खने वाली ग त व ध है। पत्र ल खए,ag
लफाफे पर पूरा पता और पनकोड ल खए, टकट लगाइए और डाकपेट म
डा लए या डाकघर म जमा क जए।
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अनौपचा रक पत्र का ढाँचा:
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coपूmज्य नानी जी / प्रय मामा जी g l
ऊपर दाईं ओर — अपना पता और दनांक
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aअseभवादन — सादर प्रणाम / नमस्ते
agl पहला अनु े द — कुशल-क्षेम
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दूसरा अनु े द — मुख्य बात
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तीसरा अनु े द — आगे क बात, नमंत्रण या शुभकामना
अंत — आपका प्रय पौत्र / भांजा, नाम
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नमूना पत्र:
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14, गांधी नगर
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जबलपुर — 482002
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2 सतंबर 2026
ag पूज्य नानी जी,
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m बार गरमी बहुत पड़ी। हमने कक्षा म ‘नए मेहमान’ नाम क a
सादर प्रणाम।
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आशा है आप कुशल ह गी। हम सब यहाँ ठ क.ह। a g l
एक एकांक पढ़ , जसम एक घर म aबनाs m दो मेहमान आ जाते ह। उसे पढ़ते हुए मुझे बार-बार आपक याद
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आई, क्य क आप जब भी आतीag ह, हफ्ता भर पहले च भेज दे ती ह।
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उसी एकांक म एक जगह ‘तार’ का जक्र आया है। अध्या पका जी ने बताया क अब तार-सेवा बंद हो चुक है।
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इसी लए मने सोचा क आपको फोन नह , च लखूँ — जैसे पहले लखी जाती थी। मुझे यह लखने म बहुत
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आपका प्रय पौत्र
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
पत्र भेजते समय: लफाफे के बीच म पाने वाले का पूरा नाम, पता और पनकोड ल खए, और पीछे या ऊपर बाईं
ओर अपना पता। पनकोड ही डाक को सही डाकघर तक पहुँचाता है — एकांक क उलझन इसी बात से पैदा हुई
थी क पता अधूरा था।
नाप, तौल और मु ाएँ — पृष्ठ 124
पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.1 (क) पता लगाइए क एक रुपये म कतने आने होते ह?
एक रुपये म सोलह (16) आने होते थे।
पुरानी भारतीय मुद्रा क पूरी सीढ़ इस प्रकार थी —
1 रुपया = 16 आने
1 आना = 4 पैसे (पुराने पैसे)
1 पैसा = 3 पाई
इसिलए 1 रुपया = 16 × 4 = 64 पुराने पैसे = 192 पाई
1957 म भारत ने दशमलव प्रणाली अपनाई और तब से 1 रुपया = 100 (नए) पैसे हो गया। ‘आना’ धीरे-धीरे चलन से बाहर हो
गया।
Did you know? ‘सोलह आने सच’ मुहावरा इसी मुद्रा से बना है। सोलह आने यानी पूरा एक रुपया — अथात्
पूरी तरह सच। इसी तरह ‘बारह आने’ का अथ होता था — तीन-चौथाई।
प्र.2 (ख) चार आने म कतने पैसे होते ह?
चार आने म 25 पैसे होते ह।
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
1 रुपया = 100 पैसे और 1 रुपया = 16 आने
इसिलए 16 आने = 100 पैसे
1 आना = 100 ÷ 16 = 6.25 पैसे
4 आने = 4 × 6.25 = 25 पैसे
इसी कारण चवन्नी (25 पैसे) को ‘चार आने’ और अठन्नी (50 पैसे) को ‘आठ आने’ कहा जाता था — और आज भी बहुत से लोग
यही कहते ह।
जाँच ली जए: 8 आने = 8 × 6.25 = 50 पैसे ✓, और 16 आने = 16 × 6.25 = 100 पैसे ✓ — यानी पूरा एक
रुपया। हसाब सही बैठ रहा है।
एकांक का हसाब लगाइए: नन्हेमल ने मलमल सवा रुपया गज खरीद , जब क न ामल के यहाँ वही साढ़े नौ
आने गज मल रही थी।
सवा रुपया = 1.25 रुपये = 1.25 × 16 = 20 आने
नत्थामल का भाव = 9.5 आने
6 गज पर खच = 6 × 20 = 120 आने = 120 ÷ 16 = ₹7.50
नत्थामल के यहाँ खच होता = 6 × 9.5 = 57 आने = 57 ÷ 16 ≈ ₹3.56
यानी लगभग ₹3.94 अिधक दे ने पड़ े — दुगन
ु े से भी ज्यादा भाव।
इसी लए नन्हेमल कहता है, “बड़ा ठग है।” यह छोटा-सा हसाब उसके स्वभाव को भी खोल दे ता है — वह हर चीज
का मोल-भाव याद रखने वाला आदमी है।
प्र.3 (ग) आपके आस-पास गज शब्द का प्रयोग कस संदभ म कया जाता है? पता लगाइए और ल खए।
‘गज’ शब्द आज भी कई जगह सुनाई दे ता है —
कपड़े क दुकान पर — साड़ी, परदे , चादर और सूट का कपड़ा आज भी बहुत दुकानदार ‘गज’ म नापते ह — “दो गज कपड़ा
दे द जए।” दज भी अक्सर गज म ही बताते ह।
जमीन के लेन-दे न म — प्लॉट का माप ‘वग गज’ (square yard) म बताया जाता है — “सौ गज का मकान”। उत्तर भारत
म यह बहुत आम है।
रस्सी, तार और फ ते के लए — दुकानदार अब भी गज म नापकर दे ते ह।
खेल म — क्रकेट क पच 22 गज लंबी होती है; इसी लए ‘22 गज क पट्ट ’ मुहावरे क तरह बोला जाता है। फुटबॉल और
गोल्फ म भी दूरी गज म बताई जाती है।
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मुहावरे म — ‘दो गज जमीन’ यानी कब्र भर क जगह; ‘गज भर क जबान’ यानी बहुत बोलना।
पता कैसे लगाएँ: पास क कपड़े क दुकान पर जाकर पू छए क वे मीटर म नापते ह या गज म, और क्य । कसी
बुजुग से पू छए क पहले कन- कन चीज का माप गज म होता था। जो पता चले, उसे लखकर कक्षा म साझा
क जए।
प्र.4 (घ) बताइए क एक गज म कतनी फ ट होती ह?
एक गज म तीन (3) फ ट होती ह।
1 गज = 3 फीट
1 फीट = 12 इंच
इसिलए 1 गज = 3 × 12 = 36 इंच
मीटर में — 1 गज ≈ 0.914 मीटर (लगभग एक मीटर से थोड़ ा कम)
याद रखने का सरल तरीका: एक गज लगभग एक मीटर के बराबर है — बस थोड़ा-सा छोटा। इसी लए जब दुकानदार मीटर म
दे ता है, तो कपड़ा गज से लगभग 9 सट मीटर ज्यादा मलता है।
माप बराबर
1 गज 3 फीट = 36 इंच ≈ 0.914 मीटर
1फट 12 इंच ≈ 30.5 से ंटीमीटर
1 मीटर ≈ 1.09 गज = लगभग 39.37 इंच
क्रकेट क पच 22 गज = 66 फीट ≈ 20.12 मीटर
दोन प्रणा लयाँ क्य चलती ह: गज, फ ट और इंच टश प्रणाली के माप ह, जो अंग्रेजी शासन के समय भारत
म आए। मीटर और सट मीटर मी क प्रणाली के ह, जसे भारत ने 1956 के बाद अपनाया। सरकारी काम म
मी क चलता है, पर बाजार क जबान म पुराने माप आज भी जी वत ह — ठ क वैसे ही जैसे ‘चार आने’ आज भी
सुनाई दे ता है।
झरोखे से — पृष्ठ 125
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.1 क व सूयकांत त्रपाठ ‘ नराला’ का जीवन सादगी भरा था, परंतु वे अपने आ तथ्य के लए जाने जाते थे। उनके
घर म कोई अ त थ आ जाए तो वे उसके सत्कार के लए जी-जान से जुट जाते थे। महादे वी वमा क पुस्तक पथ के
साथी से नराला के आ तथ्य भाव का एक छोटा-सा अंश प ढ़ए—
यह अंश महादे वी वमा क पुस्तक पथ के साथी से लया गया है, जसम उन्ह ने अपने समकालीन सा हत्यकार के रेखा चत्र लखे ह।
पाठ के साथ इसे रखने का कारण साफ है — यह ‘नए मेहमान’ के ठ क उल्ट तस्वीर सामने रखता है।
अंश क्या कहता है:
नराला जी अचानक पहुँचकर कहते — “मेरे इक्के पर कुछ लक ड़याँ, थोड़ा घी आ द रखवा दो। अ त थ आए ह, घर म सामान
नह है।” यानी घर म सामान न होने पर भी अ त थ को लौटाने क बात उनके मन म आती ही नह ।
“भोजन बनाने से लेकर जूठे बतन माँजने तक का काम वे अपने अ त थ दे वता के लए सहष करते ह।” — सेवा कसी और से
नह करवाते, स्वयं करते ह, और खुशी से करते ह।
महादे वी जी आधु नक युग पर व्यंग्य करती ह — “ततीस को ट दे वताओं के दे श म इस वग के दे वताओं क संख्या कम नह , पर
आधु नक युग ने उनक पूजा व ध म बहुत कुछ सुधार कर लया है।” यानी अब अ त थ-सेवा बेयरा और नौकर कर दे ते ह, और
गृहप त को बस खाने क मेज पर बैठे रहने का ‘कतव्य’ नभाना पड़ता है — कुछ तो उससे भी छू ट जाते ह।
अंत म वे कहती ह क नराला जी म आ तथ्य का वही पुरातन संस्कार है जो इस दे श के ामीण कसान म मलता है — गहरा,
सहज और बना दखावे का।
‘नए मेहमान’ से तुलना क जए:
बदु नराला (पथ के साथी) वश्वनाथ (नए मेहमान)
अ त थ के आने पर उत्साह — सामान न हो तो उधार लाकर भी जुट घबराहट और संकोच — “य द कोई अ त थ आ जाए तो
भाव जाते ह। क्या होगा?”
सेवा कौन करता है स्वयं — भोजन बनाने से बतन माँजने तक। पत्नी, ब े, या बाजार — “बाजार से कुछ मँगा दो न!”
अ त थ कौन है ‘जो अपना घर समझकर आए ह’ — अपनापन अजनबी, जो अपनापन केवल जताते ह।
दोन ओर से।
दोन को साथ पढ़ने से क्या मलता है: एकांक दखाती है क आ तथ्य का संस्कार सामथ्य से टकराने पर कैसे
बोझ बन जाता है। यह अंश दखाता है क वही संस्कार मन से नकलने पर कैसे सुख बन जाता है। दोन म अंतर पैसे
का नह है — नराला जी भी सादगी भरा जीवन जीते थे। अंतर भाव का है। और यही बात एकांक के अंत म रेवती
भी सद्ध कर दे ती है, जब वह अपने भाई के लए उसी थके शरीर से रसोई म चली जाती है।
साझी समझ — पृष्ठ 125
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान
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पाठ से आगे
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पाठ से आगे समू ह -काय
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a s emम ‘अ त थ दे वो भव’ क परंपरा रही है। आपके घर जब अ त थ आते ह तो आप उनका अ भवादन कैसे
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भारत
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प्र.1
करते ह, अपनी भाषा म बताइए और अपने सहपा ठय के साथ चचा क जए क अ त थय को आप अपने राज्य,
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क्षेत्र का कौन-सा पारंप रक व्यंजन खलाना चाहते ह।
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agहर क्षेत्र का ढं ग अलग है। दो हस्स म ल खए — अ भवादन और व्यंजन।
यह उत्तर आपका अपना होगा, क्य क हर घर और
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अ भवादन के अलग-अलग रूप: हाथ जोड़कर नमस्ते या प्रणाम; बड़ के चरण छू ना; ‘राम-राम’ (जैसे एकांक के अंत म वश्वनाथ
भारत), ‘नमोश्कार’ (बंगाल), ‘जोहार’ (झारखंड-ओ डशा का आ दवासी अ भवादन)। कई घर म अ त eथm
और मेहमान कहते ह); ‘नमस्कार’, ‘सत श्री अकाल’, ‘आदाब’, ‘जय जनद्र’, ‘खम्मा घणी’ (राज
. ान), ‘नमस्कारम्’ (द क्षण
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दया जाता है,co gl
के आते ही पहले पानी
m . फर बैठने को कहा जाता है — यह भी अ भवादन का ही अंग है।
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sे eअनुसार पारंप रक व्यंजन:
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क्षेत्र क
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राज्य / क्षेत्र पारंप रक व्यंजन
पूरी-सब्जी,.cलट्ट -चोखा, ठे कुआ, मालपुआ
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उत्तर प्रदे श / बहार
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राज ान ag दाल-बाट -चूरमा, गट्टे क सब्जी, घेवर
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पंजाब मक्के क रोट –सरस का साग, छोले-भटू रे, लस्सी
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गुजरात ढोकला, थेपला, ऊं धयू, श्रीखंड
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eमहाराष्ट्र a
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पूरन पोली, मोदक, वड़ा पाव
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बंगाल माछे र झोल, लुची-आलूर दम, रसगुल्ला, संदेश
coभmर, डोसा, प गल, अ वयल, पायसम g l a
द क्षण भारत
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इडली-सां
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aseबाँस क सब्जी, प ा, थुक्पा, मोमो
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पूव त्तर
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जम्मू-कश्मीर / हमाचल राजमा-चावल, धाम, कहवा
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m दया जाता है। हम बड़ के
नमूना उत्तर: “हमारे घर अ त थ के आते ही सबसे पहले उन्ह बैठने को कहा जाता है और ठं डाeपानी
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. coछू कर प्रणाम करते ह और हमउम्र लोग से हाथ जोड़कर नमस्ते कहते ह। म अपने
a glअ त थय को अपने क्षेत्र का दाल-बाट -
emचूरमा खलाना चा ँगी, क्य क यह हमारे यहाँ हर खास मौके पर बनता है और इसे मेरी दाद अब भी उपल क आँच पर बनाती ह।”
चरण
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चचा म यह दे खए: कक्षा म जब सब अपने-अपने अ भवादन और व्यंजन बताएँगे, तो दखेगा क शब्द और स्वाद
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अलग-अलग ह, पर भाव एक ही है — आए हुए को सम्मान दे ना और अपने पास जो सबसे अ ा है, वह उसके आगे
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a s em अथ है।
रखना। यही ‘अ त थ दे वो भव’ का असली
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
खोजबीन के लए — पृष्ठ 125
पाठ से आगे
पाठ से आगे प रयोजना
प्र.1 इस एकांक म ‘आने’, ‘गज’ और ‘तार’ शब्द आए ह। इनके वषय म वस्तार से जानकारी इक क जए। इसके
लए आप अपने अ भभावक, अध्यापक, पुस्तकालय या इंटरनेट क सहायता भी ले सकते ह।
यह खोजबीन का काम है। तीन शब्द क जानकारी एक-एक पन्ने पर इक क जए और अंत म एक छोट प रयोजना-पु स्तका
बनाइए।
शब्द क्या है कब तक चला और क्या खोज
आना पुरानी भारतीय मुद्रा। 1 रुपया = 16 आने, 1 1957 म दशमलव मुद्रा घर के बुजुग से पू छए क उनके बचपन म
आना = 4 पुराने पैसे = 12 पाई। सक्के थे — (1 रुपया = 100 नए पैसे) एक आने म क्या-क्या आता था। ‘सोलह आने
पाई, ढे ला, पैसा, आना, दुअन्नी, चवन्नी, अठन्नी। आने के बाद धीरे-धीरे बंद। सच’ जैसे मुहावरे इक े क जए। य द कसी
के पास पुराना सक्का हो तो उसका चत्र
बनाइए।
गज लंबाई क इकाई। 1 गज = 3 फ ट = 36 इंच ≈ सरकारी काम म 1956 के कपड़े क दुकान पर जाकर पू छए क गज म
0.914 मीटर। ब्र टश (इंपी रयल) प्रणाली से बाद मी क प्रणाली आ नापते ह या मीटर म। ‘वग गज’ म जमीन कैसे
आई। गई, पर बाजार म गज नापी जाती है, यह पता क जए। क्रकेट क
आज भी चलता है। पच 22 गज क्य होती है, यह भी खो जए।
तार टे लीग्राफ — बजली क धारा और पूव- भारत म पहली तार-सेवा पता क जए क मोस कोड म SOS कैसे
नधा रत संकेत (मोस कोड) से भेजा जाने 1850 के दशक म शुरू; भेजा जाता है। कसी बुजुग से पू छए क उन्ह
वाला संदेश। संदेश शब्द क गनती के हसाब 15 जुलाई 2013 को पूरी कभी तार मला था या नह और तब कैसा
से भेजा जाता था, इस लए बहुत छोटा रखा तरह बंद। लगा था। अपने शहर का पुराना डाकघर दे खने
जाता था। जाइए।
प रयोजना कैसे प्रस्तुत कर: तीन पन्ने बनाइए — हर पन्ने पर शब्द, उसका अथ, एक चत्र, एक जानकारी-ता लका
और एक ‘क्या आप जानते ह?’ बॉक्स। सबसे नीचे ल खए क जानकारी कहाँ से मली — दाद से, पुस्तकालय क
कस कताब से, या कस वेबसाइट से। ोत लखना अ खोजबीन क पहचान है।
यह ग त व ध क्य द गई: ये तीन शब्द आज चलन से बाहर ह, फर भी हमारी भाषा म जदा ह — ‘चार आने’,
‘दो गज जमीन’, ‘तार भेजना’। भाषा पुरानी चीज को शब्द म सँभालकर रखती है। इन्ह खोजना असल म अपने
समाज का हाल का इ तहास खोजना है।
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
अध्याय — एक नज़र म
नए मेहमान एक एकांक है — यानी ऐसा नाटक जसम केवल एक ही अंक होता है। इसके रच यता उदयशंकर भट्ट (1898–
1966) ह, जनका जन्म उत्तर प्रदे श के इटावा म हुआ। उन्ह ने रे डयो के लए अनेक नाटक लखे, नाटक और फल्म म
अ भनय भी कया। उपन्यास लोक-परलोक और एकांक संग्रह पद के पीछे उनक च चत रचनाएँ ह।
पूरी एकांक एक ही स्थान (भारत के कसी बड़े नगर म कराये का एक छोटा मकान), एक ही रात (गरमी क ऋतु, रात आठ
बजे से आधी रात तक) और गने-चुने पात्र म घटती है — वश्वनाथ, रेवती, उनके ब े प्रमोद और करण, दो अप र चत
अ त थ नन्हेमल और बाबूलाल, पड़ोसी, तथा अंत म आने वाला आगंतुक (रेवती का भाई)।
कथा संवाद से आगे बढ़ती है। घर पहले से ही गरमी, बीमारी, तंग जगह और चड़ चड़े पड़ोसी से जूझ रहा है — तभी
दरवाजा खटखटता है और बस्तर-संदूक लेकर दो अजनबी भीतर आ जाते ह। ‘मान न मान म तेरा मेहमान’ वाली त बन
जाती है।
वश्वनाथ बार-बार पूछता है क वे कौन ह, पर हर बार टाल दया जाता है — कभी संपतराम, कभी जगद शप्रसाद, कभी
‘क वराज’, कभी ‘वैद्य’। अंत म पता चलता है क उन्ह क वराज रामलाल वैद्य के यहाँ जाना था; वे गलत घर म घुस आए थे।
यही एकांक का चरम मोड़ है।
उनके जाते ही रेवती का भाई आ पहुँचता है, जसका तार नह मला था। जो रेवती अजन बय के लए खाना बनाने से साफ
मना कर चुक थी, वही अब सरदद और भीषण गरमी के बावजूद कहती है — “भैया भूखे नह सो सकते।” यह एकांक
अपनी असली बात कह जाती है: आ तथ्य तब बोझ है जब वह थोपा गया हो, और तब सुख है जब वह अपनेपन से नकले।
एकांक क बनावट को समझने के लए यह पाठ दो शब्द दे ता है — रंगमंच- नदश (कोष्ठक म दए गए वे वाक्य जो समय,
ान, वेशभूषा और अ भनय बताते ह) और संवाद (पात्र ारा कही गई बात)। अंत म ‘यव नका’ यानी परदा गरने का संकेत
है।
भाषा क दृ ष्ट से पाठ मुहावर ( दन-रात एक करना, खाक म मलना, जान म जान आना), अ तशयो क्त भरे प्रयोग
(‘मकान है क भट्ट !’, ‘पत्ता तक नह हल रहा है’) और बल दे ने वाले शब्द ‘ही’ तथा ‘तो’ का अभ्यास कराता है। साथ ही
अब चलन से बाहर हो चुके तार, आना और गज क जानकारी भी दे ता है।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द / अथ एकांक क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
पद
एकांक एक ही अंक (भाग) वाला नाटक, िजसमें िकसी एक “ये ‘नए मेहमान’ एकांक का एक हमारी कक्षा ने वा षकोत्सव म एक
घटना को संक्षेप में िदखाया जाता है अंश है।” एकांक प्रस्तुत क ।
रंगमंच- कोष्ठक में िदया गया वह िनदश जो समय, स्थान, “गरमी क ऋतु, रात के आठ बजे रंगमंच- नदश पढ़े बना नाटक का
नदश वेशभूषा और अिभनय बताता है का समय…” मंचन नह हो सकता।
संवाद पात्रों ारा आपस में कही गई बाते ं “ वश्वनाथ— उफ्फ, बड़ी गरमी है” अ े संवाद ही नाटक क जान
होते ह।
नेपथ्य मंच के पीछे का भाग, जहाँ से आवाज़ आती है पर “(नेपथ्य म— ‘अरे बाबू, मेरी धोती दे नेपथ्य से आती आवाज़ ने दशक
पात्र िदखाई नही ं दे ता दे ना।’)” को च का दया।
यव नका रंग मंच का परदा; ‘यविनका’ िलखकर नाटक की “(यव नका)” अं तम संवाद के साथ ही यव नका
समािप्त िदखाई जाती है गर गई।
भट्ट अनाज भूनने की भ ी; यहाँ अत्यंत गरम कमरे के “मकान है क भट्ट !” दोपहर म लोहे क छत वाला कमरा
िलए रूपक भट्ट बन जाता है।
जेलखाना कारागार; यहाँ तंग , हवा-रिहत मकान के िलए “जाने कब तक इस जेलखाने म बना खड़क का वह कमरा
रूपक सड़ना होगा।” जेलखाने जैसा लगता था।
सुकुमार कोमल, नाजुक “इन सुकुमार बालक का क्या सुकुमार पौध को तेज धूप से
अपराध है?” बचाना पड़ता है।
चराना कपड़े का पसीने या नमी से चरचराकर फटने-सा “धोती ऐसी चरा रही है, जैसे पुरानी पसीने से कमीज चरा रही थी।
लगना हो।”
अंट कमर में धोती की गाँठ, जहाँ रुपये-पैसे िछपाए जाते “माल-मसाला तो अंट म है न?” गाँव के बुजुग आज भी अंट म पैसे
थे रखते ह।
माल- यहाँ — रुपया-पैस ा, धनरािश (चोरी-िछपे कही गई “माल-मसाला तो अंट म है न?” उसने पूछा क सारा माल-मसाला
मसाला बात) सुर क्षत है या नह ।
बंडी कमीज के ऊपर पहनी जाने वाली िबना बाँह की “कमीज के ऊपर काली बंडी, सर सद म उसने कुरते के ऊपर बंडी
सदरी पर सफेद पग ड़याँ।” डाल ली।
हबड़-तबड़ अफरा-तफरी, हड़बड़ी “इस हबड़-तबड़ म दोन ब े ऊपर स्टे शन पर उतरते समय बड़ी हबड़-
से उतरकर आते ह।” तबड़ मची।
कदा चत शायद, संभवतः “ फर भी कदा चत कोई मुझे जानता कदा चत वह कल तक लौट आए।
हो”
सकपकाना पकड़े जाने पर घबरा जाना, बात बनाते न बनना “दोन (सकपकाकर) च , च तो झूठ पकड़ा जाते ही वह सकपका
नह लाए ह।” गया।
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कक्षा 8 हद अध्याय 8 नए मेहमान AglaSem · NCERT Solutions
शब्द / अथ एकांक क पं क्त अपने वाक्य म प्रयोग
पद
तुनकना िचढ़ कर, झुँझलाकर बोलना “रेवती (तुनककर) खाना तो खलाना थकान म छोट -सी बात पर भी वह
ही होगा—” तुनक जाता है।
तार टेल ीग ाफ — िबजली के संके तों से भेजा जाने वाला “क्या मेरा तार नह मला?” पहले जरूरी खबर तार से भेजी
शीघ संदे श, अब अपचिलत जाती थी।
आना पुर ानी भारतीय मुद ा — एक रुपये में सोलह आने “साढ़े नौ आने गज बक रही थी।” ‘सोलह आने सच’ मुहावरा इसी
मुद्रा से बना है।
गज लंबाई नापने की पुर ानी इकाई — एक गज = तीन “सवा रुपया गज द ” दुकानदार ने दो गज कपड़ा नाप
फीट कर दया।
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