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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 10: तरुण के स्वप्न
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — मल्हार
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
140 – 150 17 37 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 28 pages
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कक्षा 8 हद अध्याय 10 तरुण के स्वप्न AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 8 · हद · मल्हार
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 10: तरुण के स्वप्न
पाठ 10 नेताजी सुभाषचंद्र बोस के एक उद् बोधन (भाषण) का अंश है, जो उन्ह ने 29 दसंबर, 1929 को मे दनीपुर जला युवक-सम्मेलन म
युवाओं को संबो धत करते हुए दया था। इसम वे अपना एक ही स्वप्न — ‘नया सवागीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र’ —
तरुण को उपहार के रूप म स प दे ते ह। यह मल्हार भाग-2 का अं तम पाठ है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
मल्हार (कक्षा 8) 140 – 150
खं ड प्रश्न
17 37
माध्यम
हन्द
मेरी समझ से — पृष्ठ 142-143
पाठ से
पाठ से
प्र.1 ★
(क) नम्न ल खत प्रश्न के उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा ( ) बनाइए। कुछ प्रश्न के एक से अ धक उत्तर भी हो
सकते ह। (1) “उनके स्वप्न के उत्तरा धकारी आज हम ह।” इस कथन म रेखां कत शब्द ‘हम’ कसके लए प्रयुक्त
हुआ है? • सुभाषचंद्र बोस के लए • दे श के तरुण वग के लए • चत्तरंजन दास के लए • भारतवा सय के लए
★ दे श के तरुण वग के लए — यही सबसे सही उत्तर है। ★ भारतवा सय के लए भी लया जा सकता है, क्य क तरुण उसी
बड़े समुदाय का हस्सा ह।
“उनके स्वप्न के उत्तरािधकारी आज हम है।
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पाठ से प्रमाण — यह भाषण नेताजी ने मे दनीपुर जला युवक-सम्मेलन म दया था, और भाषण के अंत म वे सुनने वाल को
पुकारते ह — “हे मेरे तरुण भाइयो!” जनसे बात हो रही है, ‘हम’ म वे ही शा मल ह।
दो वकल्प क्य गलत ह: ‘ चत्तरंजन दास के लए’ नह हो सकता, क्य क वाक्य म ‘उनके’ ही चत्तरंजन दास ह
— जनका स्वप्न वरासत म मला। और अकेले ‘सुभाषचंद्र बोस के लए’ भी नह , क्य क ‘हम’ बहुवचन है; नेताजी
अपने को अलग नह , इसी तरुण समूह के साथ गन रहे ह।
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कक्षा 8 हद अध्याय 10 तरुण के स्वप्न AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 (2) स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न साकार होगा? • आ थक असमानता से • स्त्री-पुरुष के भन्न अ धकार से • श्रम और
कम क मयादा से • जा तभेद से
★ श्रम और कम क मयादा से।
“िजस समाज में श्र म और कम की पूरी मय दा होगी और आलसी तथा अकमण्य के िलए कोई स्थान नही ं रहेगा,
वह रा िकसी भी िवजातीय पभाव से हर पकार से मुक्त रहेगा।”
यही एकमात्र वकल्प है जसे नेताजी ने स्वाधीन राष्ट्र क शत कहा है। बाक तीन — आ थक असमानता, स्त्री-पुरुष के भन्न
अ धकार और जा तभेद — वे चीज़ ह जन्ह वे उस समाज से हटाना चाहते ह।
तक कैसे चलता है: नेताजी क पं क्त म मयादा और स्वाधीनता के बीच सीधा जोड़ है। जस दे श म अपने हाथ का
काम सम्मान पाता है, वह दे श अपनी ज़रूरत स्वयं पूरी करता है; और जो अपनी ज़रूरत स्वयं पूरी करता है, उसे
कसी बाहरी (‘ वजातीय’) प्रभाव के आगे झुकना नह पड़ता। इसी लए वे श्रम क प्र त ा को राजनी तक आज़ाद
जतना ही ज़रूरी मानते ह।
प्र.3 (3) “उनके स्वप्न के उत्तरा धकारी आज हम ह।” ‘उत्तरा धकारी’ होने से क्या अ भप्राय है? • हम उनके स्वप्न को
संजोकर रखना है • हम भी उनक तरह स्वप्न दे खने का अ धकार है • उनके स्वप्न को पूरा करने के लए हम ही
कम करना है • उनके स्वप्न पर चचा करने का दा यत्व हमारा ही है
★ उनके स्वप्न को पूरा करने के लए हम ही कम करना है — यह मुख्य उत्तर है। ★ हम उनके स्वप्न को संजोकर रखना है भी
सही माना जा सकता है, क्य क पूरा करने से पहले सँभालना पड़ता है।
पुस्तक के शब्दकोश म उत्तरा धकारी का अथ है — ‘ कसी के बाद उसक संप त्त पाने का हकदार, वा रस’। नेताजी स्वप्न को इसी
तरह एक संप त्त मानते ह जो दे शबंधु चत्तरंजन दास से उनक पीढ़ को मली है।
‘कम’ वाला उत्तर सबसे अ ा क्य है: उत्तरा धकार म केवल हक़ नह मलता, ज़म्मेदारी भी मलती है। और
भाषण क अगली ही पं क्तयाँ यह ज़म्मेदारी काम म बदल दे ती ह — “इसी स्वप्न क प्रेरणा से हम उठते ह, बैठते ह,
चलते ह, फरते ह और लखते ह, भाषण दे ते ह, काम-काज करते ह।” यहाँ गनाई गई हर क्रया कम क है, केवल
चचा या भावना क नह । इसी लए ‘चचा करने का दा यत्व’ वाला वकल्प कमज़ोर पड़ जाता है, और ‘स्वप्न दे खने का
अ धकार’ वाला वकल्प तो बात ही उलट दे ता है — वा रस को अ धकार नह , काम मला है।
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प्र.4 (4) जब प्रत्येक व्य क्त को शक्षा और उन्न त का समान अवसर प्राप्त होगा तब— • राष्ट्र क श्रम-श क्त बढ़े गी •
तरुण का साहस बढ़े गा • राष्ट्र स्वाधीन बनेगा • राष्ट्र स्वप्नदश होगा
★ राष्ट्र क श्रम-श क्त बढ़े गी और ★ राष्ट्र स्वाधीन बनेगा — दोन उत्तर पाठ से नकलते ह।
नेताजी क तीन पं क्तयाँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई ह। उन्ह क्रम म र खए और उत्तर स्वयं दख जाएगा —
1. “उस समाज में पत्येक व्यिक्त िशक्षा और उन्नित का समान सुअवसर पाए।”
2. “िजस समाज में श्र म और कम की पूरी मय दा होगी और आलसी तथा अकमण्य के िलए कोई स्थान नही ं
रहेगा,”
3. “वह रा िकसी भी िवजातीय पभाव से हर पकार से मुक्त रहेगा।”
कड़ी कैसे बनती है: जब पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका कुछ लोग तक सी मत रहता है, तो दे श क अ धकांश
प्र तभा बना काम के रह जाती है। मौका सबको मलेगा तो हर व्य क्त अपने योग्य काम म लगेगा — यही श्रम-
श क्त का बढ़ना है। और जो राष्ट्र अपनी सारी श क्त काम म लगा लेता है, उसे बाहर के सहारे क ज़रूरत नह
रहती — यही स्वाधीन बनना है।
बाक दो क्य नह : ‘तरुण का साहस बढ़े गा’ अच्छ बात है, पर पाठ इसे शक्षा के समान अवसर का सीधा
प रणाम नह बताता। ‘राष्ट्र स्वप्नदश होगा’ तो पाठ के वरुद्ध ही चला जाता है — नेताजी स्वप्न को कम से जोड़ते ह,
कल्पना म खो जाने से नह ।
प्र.5 (ख) हो सकता है क आपके समूह के सा थय ने अलग-अलग उत्तर चुने ह । अपने मत्र के साथ चचा क जए
क आपने ये उत्तर ही क्य चुने?
यह कक्षा म करने क ग त व ध है। इसे ठ क से करने का तरीका यह है —
1. हर साथी अपना चुना हुआ वकल्प बताए और साथ म पाठ क वह पं क्त पढ़े जसके कारण उसने वह वकल्प चुना।
2. जहाँ दो लोग के उत्तर अलग ह, वहाँ तय क जए क झगड़ा अथ का है या शब्द का — कई बार दोन एक ही बात अलग शब्द
म कह रहे होते ह।
3. अंत म दे खए क कस उत्तर के पीछे पाठ का सीधा प्रमाण है और कसके पीछे केवल अपनी राय।
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कक्षा 8 हद अध्याय 10 तरुण के स्वप्न
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नमूना चचा: “मने प्रश्न 4 म ‘राष्ट्र क श्रम-श क्त बढ़े गी’ चुना, क्य क उसके ठ क बाद वाली पं क्त श्रम और कम
m a s em प्रभाव से
glयही इस प्रश्न का असली
क मयादा क बात करती है।” — “मने ‘राष्ट्र स्वाधीन बनेगा’ चुना, क्य क उसी वाक्य का अंत ‘ वजातीय
coहोता है।” दोन के पास प्रमाण है, इस लए दोन उत्तर चल सकते ह — और
मुक्त रहेगा’ .पर
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सबकsहैe क प्रमाण के साथ द गई अलग राय भी सही हो सकती है।
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मलकर कर मलान — पृष्ठ 143
पाठ से
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g क जए। स्तंभ 1 — 1.
गए.cह। स्तंभ 1 म द गई पं क्तय का स्तंभ 2 म दए गए भाव- वचार से सही a
प्र.6 नीचे स्तंभ 1 म पाठ म से चुनकर कुछ पं क्तयाँ द गई ह और स्तंभ 2 म उन पं क्तय से संबं धत भाव- वचार दए
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se “इसी स्वप्न क प्रेरणा से हम उठते ह, बैठते ह, चलते ह, फरते ह और लखते ह, भाषण दे ते ह, काम-काज करते
मलान
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agl ह।” 2. “जो राष्ट्र हमारे स्वदे शी समाज के यंत्र के रूप म काम करेगा, सव प र वह समाज और राष्ट्र भारतवा सय
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का अभाव मटाएगा।” 3. “उस समाज म व्य क्त सब दृ य से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नह ।”
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स्तंभ 2 — 1. समाज म सभी व्य क्तय को सभी तरह क स्वतंत्रता हो और उस पर कसी तरह का बंधन या
सामा जक दबाव न हो। 2. हमारी समूचीem
a s दनचया और आचार- वचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) क प्रा प्त पर क द्रत ह।
a gl समाज को ध्यान म रखकर बनाई जाएँगी, उस दे श म कसी भी प्रकार का
3. जस दे श क योजनाएँ हमारे अपने
अभाव नह होगा।
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स्तं सही मलान का आधार
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भाव-
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. पूरे दन के काम गनाए गए ह। इसी को दूसरे स्तंभ म ‘समूची दनचया और a
1. “इसी स्वप्न की पेर णा से हम उठते स्तंभ 2 — पं क्त म उठना-बैठना, चलना- फरना, लखना, भाषण दे ना, काम-काज — यानी
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है,ं बैठते है,ं चलते है…
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आचार- वचार’ कहा गया है।
2. “जो रा हमारे स्वदे शी समाज के स्तंभ 2 — ‘स्वदे शी समाज का यंत्र’ का अथ है — राष्ट्र अपने ही समाज के लए काम करने
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यंत्र के रूप में काम करे ग ा… 3 वाली मशीन बने। दूसरे स्तंभ म यही बात योजनाओं क भाषा म है — ‘अपने
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भारतवािसयों का अभाव िमटाएगा।” समाज को ध्यान म रखकर बनाई गई योजनाएँ’, और उसका फल — ‘अभाव नह
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होगा’।
em 3. “उस समाज में व्यिक्त सब दृ िष्टयों a
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स्तंभ 2 — दोन म दो ही बात ह और एक ही क्रम म — पहले पूरी स्वतंत्रता, फर
a से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह 1 सामा जक दबाव का न होना।
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मरे नही ं।”
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संक्षेप म — 1 → 2, 2 → 3, 3 → 1.
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मलान का तरीका: ऐसे प्रश्न म पूरी पं क्त का अनुवाद मत ढूँ ढ़ए, उसका मुख्य शब्द पक ड़ए। पहली पं क्त का
मुख्य शब्द है ‘ दनचया’, दूसरी का ‘स्वदे शी/अभाव’, तीसरी का ‘दबाव’। यही तीन शब्द दूसरे स्तंभ म भी मल जाते
ह, और मलान अपने आप हो जाता है।
पं क्तय पर चचा — पृष्ठ 144
पाठ से
पाठ से
प्र.7 पाठ से चुनकर कुछ पं क्तयाँ नीचे द गई ह। इन्ह ध्यानपूवक प ढ़ए और इन पर वचार क जए। आपको इनका
क्या अथ समझ म आया? अपने वचार अपनी कक्षा म साझा क जए। (क) “उस समाज म अथ क वषमता न
हो।”
यहाँ अथ का मतलब है धन, और वषमता का मतलब है असमानता। पं क्त का सीधा अथ है — उस समाज म धन का बँटवारा
इतना असमान न हो क कुछ लोग के पास सब कुछ हो और बहुत के पास कुछ भी नह ।
यह शत इस भाषण म क्य आई: नेताजी इससे पहले कह चुके ह क उस समाज म ‘व्य क्त सब दृ य से मुक्त
हो’। पर जस व्य क्त के पास दो वक्त का भोजन नह , वह कागज़ पर स्वतंत्र होकर भी स्वतंत्र नह होता — उसक
हर पसंद पेट से तय होती है। इसी लए नेताजी आ थक बराबरी को स्वाधीनता क शत बनाते ह, कोई अलग दान-
पुण्य क बात नह । ध्यान द जए क अगली ही पं क्त म वे इसका उपाय भी बता दे ते ह — सबको ‘ शक्षा और उन्न त
का समान सुअवसर’।
शब्द जो ड़ए: ‘ वषमता’ का वपरीताथक शब्द ‘समानता’ है — यह जोड़ा इसी पाठ के ‘ वपरीताथक शब्द और
उनके प्रयोग’ अभ्यास म भी आया है।
प्र.8 (ख) “वही स्वप्न उनक श क्त का उत्स बना और उनके आनंद का नझर रहा।”
यह पं क्त दे शबंधु चत्तरंजन दास के बारे म है। इसका अथ है — जो स्वप्न उन्ह ने दे खा, वही उनक सारी श क्त का ोत था और
वही उनके आनंद का न सूखने वाला झरना था।
शब्दाथ — उत्स = सोता, ोत (जहाँ से पानी फूटकर नकलता है)। नझर = झरना, प्रपात।
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भाषा कैसे काम करती है: यह रूपक है — स्वप्न को सीधे पानी का सोता और झरना कह दया गया है, ‘जैसे’ या
‘समान’ जैसा कोई शब्द बीच म नह । और यह रूपक अधूरा नह छोड़ा गया, दो कदम चलता है: पहले उत्स, जहाँ से
पानी नकलता है — यानी श क्त कहाँ से आती है; फर नझर, जो लगातार बहता और छलकता रहता है — यानी
आनंद कैसा है। पहाड़ का सोता कभी थकता नह ; इसी तरह जस व्य क्त के पास कोई बड़ा लक्ष्य है, उसक श क्त
और खुशी भी चुकती नह ।
आगे जो ड़ए: इसके तुरंत बाद नेताजी कहते ह — ‘उनके स्वप्न के उत्तरा धकारी आज हम ह।’ यानी वह झरना सूखा
नह , उसक धारा अगली पीढ़ तक आ गई है।
प्र.9 (ग) “उस समाज म व्य क्त सब दृ य से मुक्त हो।”
इसका अथ है — उस समाज म व्य क्त क स्वतंत्रता कसी एक तरह क न हो, हर तरह क हो। केवल वदे शी शासन से मु क्त नह ,
ब ल्क जा त, धन, भय, रू ढ़ और सामा जक दबाव — सबसे मु क्त।
‘सब दृ य से’ पर ज़ोर क्य : यह भाषण 1929 का है, जब दे श पराधीन था और ‘मु क्त’ शब्द से लोग पहले
अंग्रेज़ी शासन से आज़ाद समझते। नेताजी उसी शब्द को चौड़ा कर दे ते ह। इसका प्रमाण अगली पं क्तय म ही है —
वे बारी-बारी से जा तभेद, नारी के असमान अ धकार और ‘अथ क वषमता’ को हटाने क बात करते ह। यानी ‘सब
दृ य से’ कोई सजावट वाक्यांश नह , आगे आने वाली पूरी सूची का शीषक है।
साथ क पं क्त मत छो ड़ए: पूरी बात है — ‘व्य क्त सब दृ य से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नह ।’
दूसरा हस्सा बताता है क नेताजी को कस बंधन क सबसे अ धक चता थी — बाहर के शासक क नह , अपने ही
समाज के दबाव क ।
सोच- वचार के लए — पृष्ठ 144
पाठ से
पाठ से
प्र.10 अब आप इस पाठ को पुन: प ढ़ए और नम्न ल खत के वषय म पता लगाकर ल खए— (क) नेताजी सुभाषचंद्र
बोस ने कस प्रकार के राष्ट्र नमाण का स्वप्न दे खा था?
नेताजी ने एक नए सवागीण स्वाधीन संपन्न समाज और उस पर टके एक स्वाधीन राष्ट्र का स्वप्न दे खा था। उस राष्ट्र क पहचान
वे स्वयं गनाते ह —
व्य क्त सब दृ य से मुक्त हो और समाज के दबाव से उसका दम न घुटे।
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जा तभेद का कोई ान न हो।
नारी मुक्त होकर पुरुष क तरह समान अ धकार का उपभोग करे और समाज तथा राष्ट्र क सेवा म समान रूप से हस्सा ले।
अथ क वषमता न हो — धन क खाई न रहे।
हर व्य क्त को शक्षा और उन्न त का समान सुअवसर मले।
श्रम और कम क पूरी मयादा हो; आलसी और अकमण्य के लए कोई जगह न रहे।
वह राष्ट्र स्वदे शी समाज के यंत्र क तरह काम करे — यानी अपने ही समाज क ज़रूरत पूरी करे — और ‘ वजातीय प्रभाव’ से
मुक्त रहे।
ध्यान दे ने क बात: इस सूची म केवल एक ही माँग राजनी तक है — वदे शी प्रभाव से मु क्त। बाक सब सामा जक
और आ थक ह। इसी लए नेताजी ‘स्वाधीन’ के साथ ‘सवागीण’ और ‘संपन्न’ शब्द भी जोड़ते ह। और अंत म वे इससे
भी आगे जाते ह — ऐसा राष्ट्र केवल भारतवा सय का अभाव मटाकर रुक नह जाएगा, ब ल्क ‘ वश्व-मानव के
समक्ष आदश-समाज और आदश-राष्ट्र के रूप म गण्य होगा’।
प्र.11 (ख) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कस लक्ष्य क प्रा प्त को अपने जीवन क साथकता के रूप म दे खा?
उन्ह ने अपने स्वप्न को साकार करने — यानी उस आदश स्वाधीन, संपन्न और समानता वाले समाज तथा राष्ट्र क स्थापना — को
ही अपने जीवन क साथकता माना।
“है िसफ यही स्वप्न जो हमें असीम शिक्त और अपार आनंद दे त ा है, जो मेरे क्षदु जीवन को भी साथ क बनाता
है।”
इसी बात को वे पहले भी कह चुके ह — “यह स्वप्न मेरे समक्ष नत्य एवं अखंड सत्य है। इस सत्य क प्र त ा के लए सबकुछ कया
जा सकता है, हर प्रकार का त्याग कया जा सकता है, हर संकट को सहा जा सकता है…”
वाक्य का भार कहाँ है: वे अपने जीवन को ‘क्षुद्र’ (छोटा, तुच्छ) कहते ह। यह वनम्रता भर नह , तक है — वे
कहना चाहते ह क अकेला जीवन अपने-आप म छोटा ही होता है; उसे बड़ा कोई लक्ष्य ही बनाता है। और वे इसे
अं तम सीमा तक ले जाते ह — इस स्वप्न को साथक बनाते हुए य द प्राण भी दे ना पड़े तो ‘वह मरण है स्वग समान’।
प्र.12 (ग) “आलसी तथा अकमण्य के लए कोई ान नह रहेगा” सुभाषचंद्र बोस ने ऐसा क्य कहा होगा?
क्य क नेताजी का पूरा स्वप्न कम पर टका है। जो समाज वे बनाना चाहते ह, वह भाषण से नह , लोग के प रश्रम से बनेगा —
इस लए उसम काम से जी चुराने वाले के लए जगह नह छोड़ी जा सकती।
पूरी पं क्त दे खए — “ जस समाज म श्रम और कम क पूरी मयादा होगी और आलसी तथा अकमण्य के लए कोई स्थान नह
रहेगा, वह राष्ट्र कसी भी वजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।” यहाँ एक ही वाक्य म दो बात एक साथ कही गई ह।
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दो कारण, दोन पाठ से:
1. मयादा का दूसरा पहलू। य द मेहनत करने वाले को सम्मान दे ना है, तो मेहनत न करने वाले को वही सम्मान नह
दया जा सकता — वरना ‘मयादा’ शब्द का कोई अथ ही नह बचता।
2. स्वाधीनता क क मत। जो समाज अपना काम स्वयं करता है, वही आत्म नभर बनता है, और आत्म नभर
समाज ही बाहरी प्रभाव से मुक्त रह पाता है। आलस्य सीधे परतंत्रता तक ले जाता है।
यह बात यह नह रुकती: ‘झरोखे से’ म दया गया नेताजी का पत्र इसी सोच का व्यावहा रक रूप है — वहाँ वे
म के खलौने और सीप के बटन जैसे छोटे -छोटे गृह-उद्योग क योजना बनाते ह, ता क गरीब प रवार फुरसत के
समय म भी कमा सक। स्वप्न बड़ा है, पर उसका पहला कदम बहुत ठोस है।
प्र.13 (घ) नेताजी सुभाषचंद्र बोस के लक्ष्य या ध्येय को पूरा करने के लए आज क युवा पीढ़ क्या-क्या कर सकती
है?
नेताजी ने जो-जो शत गनाई थ , आज का युवा उन्ह को अपने स्तर पर पूरा कर सकता है। हर काम को उसक शत से जोड़कर
दे खए —
नेताजी क शत आज युवा क्या कर सकता है
जाितभेद का स्थान न हो अपनी क क्षा, टोली और िम त्र-मंडली में िकसी के साथ जाित या पष्ृ ठभूिम के कारण अलग व्यवहार न करना
— बदलाव यही ं से शुरू होता है।
नारी को समान अिधकार घर और िवद्य ालय के काम में बराबर िहस्सा ले ना; लड़ िकयों की पढ़ ाई और खेल में उतनी ही भागीदारी को
सामान्य बात मानना।
सबको िशक्षा और उन्नित का समान जो पढ़ ाई में पीछे रह गया हो, उसकी मदद करना; बड़ े होकर अपने कौशल से अपने क्षेत्र के लोगों को
सुअवसर िसखाना।
श्रम और कम की मय दा अपना काम स्वयं करना और हाथ के काम को छोटा न समझना — यह सबसे सीधी बात है और सबसे
कम की जाती है।
स्वदे शी समाज का यंत्र स्थानीय कारीगरों और ग ृह-उ द्य ोगों की बनी चीज़ें अपनाना; अपने क्षेत्र की सम स्या पर अपने कौशल से
काम करना।
व्यिक्त सब दृ िष्टयों से मुक्त हो अपने अिधकार जानना और दू स रों के अिधकारों का उतना ही ध् यान रखना; अन्याय दे खकर चुप न
रहना।
सबसे ज़रूरी बात: नेताजी ने स्वप्न को दनचया से जोड़ा था — ‘इसी स्वप्न क प्रेरणा से हम उठते ह, बैठते ह…
काम-काज करते ह।’ इस लए उनके ध्येय को पूरा करना कोई एक बड़ा काम नह , ब ल्क रोज़ के छोटे काम म एक
दशा रखना है।
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कक्षा 8 हद अध्याय 10 तरुण के स्वप्न
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अनुमान और कल्पना से — पृष्ठ 144
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(क) “उस समाज म व्य क्त सब दृ य से मुक्त हो”, सुभाषचंद्र बोस ने कन- कन दृ य से मु क्त क बात क
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भाषण म ‘सब दृ य ’ क सूची नेताजी ने स्वयं दे द है — उसी पं क्त के बाद वे एक-एक करके बंधन गनाते ह। कम-से-कम छह
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तरह क मु क्त उसम से नकलती है —
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सामा जक मु क्त — ‘समाज के दबाव से वह मरे नह ’, यानी री त- रवाज और लोकलाज के दबाव म व्य क्त का दम न घुटे।
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जा त क.े बंधन से मु क्त — ‘उस समाज म जा तभेद का स्थान नह हो’। a
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s रुष के भेद से मु क्त — ‘नारी मुक्त होकर… समान अ धकार का उपभोग करे’।
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agl आ थक मु क्त — ‘उस समाज म अथ क वषमता न हो’, यानी गरीबी और असमानता का बंधन न रहे।
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अवसर क मु क्त — ‘प्रत्येक व्य क्त शक्षा और उन्न त का समान सुअवसर पाए’; अ शक्षा भी एक बंधन है।
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राजनी तक मु क्त — ‘वह राष्ट्र कसी भी वजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा’।
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अनुमान का आधार: यहाँ कल्पना करने क ज़रूरत बहुत कम है, क्य क लेखक ने अपनी सूची स्वयं खोल द है।
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ऐसे प्रश्न म सबसे अच्छा उत्तर वही होता है जो पाठ के भीतर से बदु उठाए और फर एक-दो बात अपनी ओर से
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जोड़े — जैसे भय से मु क्त और अंध वश्वास से मु क्त, जो नेताजी क सूची म सीधे नह ह पर उसी दशा म ह।
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agl प्र.15 (ख) “उस समाज म नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुष क तरह समान अ धकार का उपभोग करे”,
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सुभाषचंद्र बोस को अपने भाषण म नारी के लए समान अ धकार क बात क्य कहनी पड़ी?
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क्य क 1929 के भारत म स्त्रय को वे अ धकार प्राप्त नह थे। जस बात के लए वशेष रूप से कहना पड़े, वह अपने-आप
उपलब्ध नह होती — नेताजी का यह वाक्य ही उस समय क स्थ त का प्रमाण है।
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तीन कारण, तीन पाठ से जुड़े:
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1. स्वप्न अधूरा रह जाता। नेताजी ने ‘सवागीण’ समाज का स्वप्न दे खा था। य द आधी आबाद को शक्षा, संप त्त
s e m और नणय के अ धकार न ह , तो समाज ‘सब अंग म पूरा’ हो ही नह सकता।
agla 2. यह उनक सूची का हस्सा है, अपवाद नह । जस क्रम म वे जा तभेद और अथ क वषमता हटाते ह, उसी
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क्रम म नारी क असमानता भी रखते ह। तीन उनके लए एक ही तरह के बंधन ह।
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3. उन्ह केवल अ धकार नह , भागीदारी चा हए थी। वाक्य यहाँ रुकता नह — ‘और समाज तथा राष्ट्र क सेवा म
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समान रूप से हस्सा ले’। यानी वे स्त्री को सु वधा पाने वाली नह , राष्ट्र- नमाण म बराबर क भागीदार मानते थे।
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कक्षा 8 हद अध्याय 10 तरुण के स्वप्न AglaSem · NCERT Solutions
कथनी और करनी: यह बात नेताजी ने केवल कही नह । आगे चलकर ‘आजाद हद फौज’ म उन्ह ने स्त्रय क एक
अलग सैन्य टु कड़ी — रानी झाँसी रे जमट — बनाई। पाठ के ‘स्त्री सशक्तीकरण’ अभ्यास म इसी टु कड़ी के बारे म
पूछा गया है।
प्र.16 (ग) आपके वचार से हमारे समाज म और कौन-कौन से लोग ह जन्ह वशेष अ धकार दए जाने क
आवश्यकता है?
ऐसे लोग, जो कसी कारण से दूसर के बराबर शुरुआत नह कर पाते। उन्ह वशेष अ धकार इस लए चा हए ता क वे बराबरी तक
पहुँच सक — वशेष अ धकार का उ े श्य कसी को ऊपर उठाना नह , सबको एक ही रेखा पर लाना है।
कन्ह क्य कस तरह क वशेष सु वधा
िदव्यांग जन सामान्य रास्ते, कक्षा और परीक्षा उनके लए वैसे ही रै ंप और सुल भ भवन, िवशेष िशक्षा-सामगी, परीक्षा में
सुलभ नह होते अितिर क्त समय, आर क्षण
बच्चे वे अपने अ धकार स्वयं नह माँग सकते िनःशुल्क और अिनवाय िशक्षा, बाल -श्रम पर रोक , पोषण
विरष्ठ नागिरक आयु के कारण आय और आवागमन दोन सी मत पेंशन, यात्रा और िचिक त्सा में छू ट, अलग पंिक्त
हो जाते ह
वंिचत एवं िनधन शक्षा और स्वास्थ्य पर खच करने क क्षमता नह छात्रवृित्त , िनःशुल्क पाठ पुस्तक और भोजन, आवास तथा
पिरवार राशन की योजनाएँ
जनजातीय समुद ाय के दूरस्थ क्षेत्र म वद्यालय, च कत्सा और बाज़ार तक आवासीय िवद्य ालय, वनोपज पर अिधकार , िवशेष िवकास
लोग पहुँच क ठन योजनाएँ
नेताजी क बात से जो ड़ए: उनका तक था क हर व्य क्त को ‘ शक्षा और उन्न त का समान सुअवसर’ मले। पर
जब दो लोग क शुरुआत ही असमान हो, तो दोन को एक-सी सु वधा दे ने से समानता नह आती। इसी लए वशेष
अ धकार समानता के वरुद्ध नह , समानता का साधन ह।
प्र.17 (घ) सुभाषचंद्र बोस दे श के समस्त युवा वग को संबो धत करते हुए कहते ह— “हे मेरे तरुण भाइयो!” उनका
संबोधन केवल ‘भाइयो’ शब्द तक ही क्य सी मत रहा होगा?
सबसे संभा वत कारण यह है क 29 दसंबर, 1929 के उस मे दनीपुर जला युवक-सम्मेलन म उनके सामने बैठे श्रोता लगभग
सभी युवक थे। उस समय ऐसे सावज नक सम्मेलन म लड़ कय और स्त्रय क उप स्थ त बहुत कम होती थी, इस लए संबोधन भी
उसी सभा के अनुसार बन गया।
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यह उनक सोच क सीमा नह थी — इसका प्रमाण उसी भाषण म है। जस भाषण के अंत म वे ‘भाइयो’ कहते
ह, उसी के आरंभ म वे माँग करते ह क ‘उस समाज म नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्ट्र के पुरुष क तरह समान
अ धकार का उपभोग करे और समाज तथा राष्ट्र क सेवा म समान रूप से हस्सा ले।’ यानी उनका स्वप्न स्त्री-पुरुष
दोन का था, केवल उस दन क सभा एक तरफ़ा थी। आगे चलकर उन्ह ने आजाद हद फौज म स्त्रय क टु कड़ी
बनाकर यह बात काम से भी सद्ध कर द ।
आज हम क्या कहगे: आज उसी भाषण का आरंभ ‘हे मेरे तरुण सा थयो!’ या ‘भाइयो और बहनो!’ से होता। भाषा
समय के साथ बदलती है — और यह बदलाव इस बात का संकेत है क सभा म अब कौन-कौन बैठा है।
प्र.18 (ङ) “यह स्वप्न म तुम्ह उपहारस्वरूप दे ता ँ— स्वीकार करो।” सुभाषचंद्र बोस के इस आ ान पर श्रोताओं (युवा
वग) क क्या प्र त क्रया रही होगी?
श्रोता पहले कुछ क्षण स्तब्ध रहे ह गे, फर सभा ता लय और नार से गूँज उठ होगी। और सबसे गहरी प्र त क्रया शोर नह , वह
चुप्पी रही होगी जसम हर तरुण ने अपने-आप से पूछा होगा — ‘क्या म इसे स्वीकार कर सकता ँ?’
ऐसा अनुमान क्य : यह वाक्य नेताजी के भाषण का सबसे चतुर मोड़ है। नेता आमतौर पर युवाओं से कुछ माँगते ह
— समय, त्याग, ब लदान। नेताजी इसके उलट कुछ दे ते ह, और दे ने से पहले अपने को खाली भी बता दे ते ह —
‘तुम्ह दे ने लायक मेरे पास कुछ भी नह है, है सफ यही स्वप्न’। जब कोई अपनी एकमात्र संप त्त आपको स प दे , तो
उसे लौटाना क ठन हो जाता है। साथ ही ‘स्वीकार करो’ एक आ ा है — इससे बात भावना पर नह रुकती, श्रोता
के सामने एक नणय आ खड़ा होता है।
नमूना उत्तर: “सभा म कुछ पल सन्नाटा रहा। फर ‘वंदे मातरम्’ के नार से पूरा पंडाल गूँज उठा। कई तरुण ने वह
खड़े होकर हाथ उठाया, कुछ क आँख भर आईं। जो युवक उस दन घर लौटे , उनके पास एक भाषण क याद नह
थी — एक ज़म्मेदारी थी, जसे वे स्वीकार कर चुके थे।”
शीषक — पृष्ठ 145
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पाठ से
पाठ से
प्र.19 (क) आपने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के भाषण का एक अंश पढ़ा है, इसे ‘तरुण के स्वप्न’ शीषक दया गया है।
अपने समूह म चचा करके ल खए क यह शीषक क्य दया गया होगा?
यह शीषक इस लए दया गया होगा क्य क पूरे अंश म केवल दो चीज़ ह — एक स्वप्न, और वे तरुण जन्ह वह स्वप्न स पा जा रहा
है। शीषक ने पाठ के दोन सरे पकड़ लए ह।
शीषक क तीन कसौ टयाँ, तीन पर खरा:
1. वषय। ‘स्वप्न’ शब्द इस छोटे -से अंश म बार-बार आता है — दे खा गया स्वप्न, उत्तरा धकार म मला स्वप्न,
दनचया चलाने वाला स्वप्न, और अंत म उपहार म दया गया स्वप्न।
2. श्रोता। भाषण युवक-सम्मेलन म दया गया और अंत म सीधा पुकारा गया — ‘हे मेरे तरुण भाइयो!’
3. दशा। शीषक ‘नेताजी के स्वप्न’ नह , ‘तरुण के स्वप्न’ है। यह छोटा-सा अंतर बड़ी बात कहता है — भाषण के
अंत तक वह स्वप्न नेताजी का नह रह जाता, सुनने वाले तरुण का हो जाता है। शीषक वह से लया गया है जहाँ
भाषण पहुँचता है, वहाँ से नह जहाँ से शुरू होता है।
प्र.20 (ख) य द आपको भाषण के इस अंश को कोई अन्य नाम दे ना हो तो क्या नाम दगे? आपने यह नाम क्य सोचा?
यह भी ल खए।
नया शीषक सोचने का तरीका यह है — पाठ क सबसे भारी पं क्त या सबसे बार-बार लौटने वाला शब्द चु नए, और दे खए क वह
पूरे पाठ को समेट पाता है या नह । कुछ वकल्प, कारण स हत —
संभा वत शीषक क्य
स्वीकार करो भाषण का अंितम शब्द , और उसका असली उ े श्य भी यही है — श्रोता से एक िनणय माँगना।
मेर ा उपहार ‘यह स्वप्न मैं तुम्हे ं उपहार स्वरूप दे ता हू’ँ — पूरे भाषण का सबसे अनोखा क्षण यही है।
स्वप्न के उत्तरािधकारी यह पाठ के आरंभ को पकड़ ता है और साथ ही यह भी बताता है िक स्वप्न एक पीढ़ ी से दू स री तक जाता है।
एक नया समाज अंश का सबसे बड़ ा िहस्सा उसी आदश समाज की शत ं िगनाने में लगा है।
नमूना उत्तर: “म इसका नाम ‘स्वीकार करो’ रखूँगा। कारण यह है क नेताजी यहाँ कुछ बताते नह , कुछ स पते ह।
‘तरुण के स्वप्न’ नाम से पता चलता है क पाठ कसके बारे म है, पर ‘स्वीकार करो’ नाम पढ़ते ही पाठक को लगता है
क बात उससे क जा रही है। शीषक जब पाठक को भीतर ख च ले, तो वह अ धक प्रभावी होता है।”
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प्र.21 (ग) सुभाषचंद्र बोस ने अपने समय क तय या समस्याओं को अपने संबोधन म ान दया है। य द आपको
अपनी कक्षा को संबो धत करने का अवसर मले तो आप कन- कन वषय को अपने उद् बोधन म स म्म लत
करगे और उसका क्या शीषक रखगे?
पहले यह दे खए क नेताजी ने कया क्या था — उन्ह ने अपने समय क वास्त वक समस्याएँ उठाईं (जा तभेद, स्त्री क असमानता,
अथ क वषमता, आलस्य), उनके लए एक आदश त बताई, और अंत म सुनने वाल से एक माँग क । एक अच्छे उद् बोधन
का यही ढाँचा है। अपनी कक्षा के लए भी इसी ढाँचे का प्रयोग क जए।
अ े उत्तर म क्या होना चा हए —
दो-तीन ऐसे वषय जो आपक अपनी कक्षा या मोहल्ले म सचमुच दखते ह , कल्पना के नह ।
हर वषय के साथ एक ठोस बात — क्या करना है, कौन करेगा।
ऐसा शीषक जो वषय भी बताए और सुनने वाले को बुलाए भी।
नमूना उत्तर — शीषक: ‘हमारी कक्षा, हमारा हस्सा’
म तीन वषय रखूँगा —
1. सबक भागीदारी — कक्षा के कायक्रम, खेल और सफाई म हर वद्याथ का हस्सा हो, कुछ चुने हुए ब का
नह । नेताजी ने भी ‘समान रूप से हस्सा ले’ पर ज़ोर दया था।
2. पढ़ाई म एक-दूसरे क मदद — जो वषय जसे अच्छा आता है, वह सप्ताह म एक दन दूसर को पढ़ाए। इससे
‘ शक्षा का समान अवसर’ हमारी कक्षा के भीतर बनेगा।
3. अपना काम अपने हाथ — कक्षा क सफाई, सामान क दे खभाल और बगीचे का काम हम स्वयं कर। यही ‘श्रम
क मयादा’ है।
म भाषण का अंत नेताजी क तरह एक माँग से करूँगा — ‘यह कक्षा हमारी है; इसे बेहतर बनाने का काम भी हमारा
ही है।’
भाषा क बात — पृष्ठ 145
पाठ से
पाठ से
प्र.22 (क) सुभाषचंद्र बोस ने अपने भाषण म संख्या, संगठन या भाव आ द का बोध कराने वाले शब्द के साथ उनक
वशेषता अथवा गुण बताने वाले शब्द का प्रयोग कया है। उनके भाषण से वशेषता अथवा गुण बताने वाले
शब्द ढूँ ढ़कर दए गए शब्द समूह को पूरा क जए— (शब्द समूह म दए गए शब्द — सत्य, समाज, राष्ट्र, जीवन,
श क्त, आनंद; उदाहरण के रूप म ‘अखंड — सत्य’ भरा हुआ है।)
पुस्तक म पहला जोड़ा भरा हुआ है — अखंड → सत्य। बाक पाँच शब्द क वशेषताएँ भी भाषण म ही मल जाती ह। पूरा शब्द-
समूह इस प्रकार बनेगा —
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वशेषता बताने वाला शब्द शब्द भाषण क पं क्त
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अखंड (िनत्य)
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सत्य “यह स्वप्न मेरे समक्ष नत्य एवं अखंड सत्य है।”
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सव गं ीण / स्वाधीन / संपन्न “हम चाहते ह, एक नया सवागीण स्वाधीन संपन्न समाज…”
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समाज
स्वाधीन (आदश) रा “…और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र।” / “आदश-राष्ट्र के रूप म गण्य होगा।”
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seहम असीम श क्त और अपार आनंद देता है।”
क्षदु जीवन “जो मेरे क्षुद्र जीवन को भी साथक बनाता है।”
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असीम शिक्त
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अपार
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आनंद “जो हम असीम श क्त और अपार आनंद दे ता है।”
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व्याकरण क बात: जो शब्द कसी सं ा क वशेषता या गुण बताता है, वह वशेषण कहलाता है और जसक
वशेeषm
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gl क नेताजी का कोई वशेषण सजावट के लए नह है — ‘असीम’ और ‘अपार’ दोन का अथ ‘ जसक सीमा न हो’
ता बताई जाती है वह वशेष्य। यहाँ बाईं ओर के सब शब्द वशेषण ह और दाईं ओर के वशेष्य। ध्यान द जए
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है, और वे ठ क उस जगह आए ह जहाँ यह बताना था क स्वप्न से मलने वाली श क्त कभी चुकती नह ।
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(ख) सुभाषचंद्र बोस ने तो उपयुक्त वशेषताओं के साथ इन शब्द को रखा है। आप कन वशेषताओं के साथ
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इन उपयुक्त शब्द को रखना चाहगे और क्य ? ल खए।
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इस प्रश्न.c है g
म अपनी पसंद का वशेषण चुनना है, पर हर चुनाव के साथ कारण दे ना ज़रूरी a
s e m — यही प्रश्न का ‘क्य ’ माँग रहा है।
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वशेषण
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सत्य कड़ वा स त्य सच अक्सर सुनने म अच्छा नह लगता, फर भी कहना पड़ता है।
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जसम सब घुल- मलकर रह — यही नेताजी क ‘जा तभेद न हो’ वाली शत का दूसरा नाम है।
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रा आ त्मिनभर रा ‘लेखक से प रचय’ म भी लखा है क नेताजी ने आत्म नभर समाज का सपना दे खा था।
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जीवन साथक जीवन नेताजी ने अपने जीवन को ‘क्षुद्र’ कहकर भी उसे स्वप्न से ‘साथक’ बना लया — यही शब्द मुझे अ धक ठ क
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लगता है।
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agl शिक्त संगिठत शिक्त अकेली श क्त बखर जाती है; ‘आजाद हद फौज’ इसी संग ठत श क्त का उदाहरण थी।
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आनंद िनश्छल आनंद जस खुशी म कोई छल या स्वाथ न हो, वही दे र तक टकती है।
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करके दे खए: अपने चुने हुए हर जोड़े से एक वाक्य बनाइए, जैसे — ‘संग ठत श क्त के आगे बड़ी से बड़ी क ठनाई
भी टक नह पाती।’ वशेषण क परख वाक्य म ही होती है, सूची म नह ।
वपरीताथक शब्द और उनके प्रयोग — पृष्ठ 145-146
पाठ से
पाठ से
प्र.24 (क) “और उस पर एक स्वाधीन राष्ट्र” इस वाक्यांश म रेखां कत शब्द ‘स्वाधीन’ का वपरीत अथ दे ने वाला शब्द
है ‘पराधीन’। इसी प्रकार के कुछ वपरीताथक शब्द आगे दए गए ह, ले कन वे आमने-सामने नह ह। रेखाएँ
ख चकर वपरीताथक शब्द के सही जोड़े बनाइए— स्तंभ 1 — 1. स्वीकार 2. साथक 3. वषमता 4. क्षुद्र 5.
संपन्न 6. अकमण्य 7. मरण स्तंभ 2 — कमण्य/कमठ, वपन्न, अस्वीकार, जीवन, नरथक, समानता, वशाल/
वृहत/ वराट/महान
क्रम स्तंभ 1 वपरीताथक (स्तंभ 2) पहचान का सूत्र
1. स्वीकार अस्वीकार ‘अ’ उपसग जोड़ने से अथ उलट गया
2. साथक िनरथक साथक = अथ स हत; नरथक = अथ र हत (‘ नर्’ उपसग)
3. िवषमता समानता वषम = असमान, सम = बराबर
4. क्षदु िवशाल / वृहत / िवराट / महान क्षुद्र = छोटा, तुच्छ — इस लए वपरीत म सब ‘बड़े’ अथ वाले शब्द
5. संपन्न िवपन्न संपन्न = साधन-संपन्न, धनी; वपन्न = वप त्त म पड़ा, नधन
6. अकमण्य कम ण् य / कम ठ यहाँ ‘अ’ हटाने से अथ उलट जाता है
7. मरण जीवन सीधा वलोम — कोई उपसग नह , अलग शब्द
ध्यान द जए — सात शब्द इसी पाठ से आए ह: ‘स्वीकार करो’, ‘आदश को साथक बनाकर’, ‘अथ क
वषमता’, ‘मेरे क्षुद्र जीवन’, ‘संपन्न समाज’, ‘आलसी तथा अकमण्य’, ‘वह मरण है स्वग समान’। इसी लए
वपरीताथक शब्द रटने क चीज़ नह — जस पाठ म शब्द मला हो, वह उसका अथ भी पकड़ म आता है।
सूत्र: हद म वपरीत अथ तीन तरह से बनता है — (1) उपसग जोड़कर: स्वीकार → अस्वीकार, (2) उपसग
बदलकर: संपन्न → वपन्न, साथक → नरथक, (3) बलकुल अलग शब्द से: मरण → जीवन।
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प्र.25 (ख) अब स्तंभ 1 और स्तंभ 2 के सभी शब्द से दए गए उदाहरण के अनुसार वाक्य बनाकर ल खए, जैसे—
“समाज क उन्न त अकमण्य नह अ पतु कमण्य व्य क्तय पर नभर है।”
उदाहरण वाले वाक्य का ढाँचा ध्यान से दे खए — “… क नह अ पतु ख …”। एक ही वाक्य म दोन वपरीत शब्द आते ह, और
‘नह अ पतु’ उन्ह आमने-सामने खड़ा कर दे ता है। इसी ढाँचे पर सात जोड़ के वाक्य —
1. स्वीकार / अस्वीकार — स ी सलाह को अस्वीकार नह , सहष स्वीकार करना चा हए।
2. साथक / नरथक — बना लक्ष्य के कया गया प रश्रम नरथक होता है, जब क लक्ष्य के साथ कया गया वही प रश्रम साथक
हो जाता है।
3. वषमता / समानता — नेताजी ऐसे समाज के पक्ष म थे जसम अथ क वषमता नह , समानता हो।
4. क्षुद्र / वशाल — नेताजी ने अपने जीवन को क्षुद्र कहा, पर उनका स्वप्न वशाल था।
5. संपन्न / वपन्न — जस दे श म गृह-उद्योग फलते-फूलते ह, वहाँ वपन्न प रवार भी धीरे-धीरे संपन्न बनने लगते ह।
6. अकमण्य / कमठ — अवसर अकमण्य क प्रतीक्षा नह करता, वह कमठ के हाथ लगता है।
7. मरण / जीवन — जो जीवन कसी बड़े ध्येय के लए बीता हो, उसका मरण भी ‘स्वग समान’ हो जाता है।
वाक्य बनाते समय: केवल ‘नह अ पतु’ ही ज़रूरी नह — ‘जब क’, ‘पर’, ‘ब ल्क’ से भी दोन शब्द एक वाक्य म
लाए जा सकते ह। शत बस यह है क वाक्य पढ़ते ही दोन शब्द का अंतर साफ़ दखे।
आपक बात — पृष्ठ 146
पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.26 (क) आपने सुभाषचंद्र बोस के स्वप्न के बारे म जाना। आप अपने व ालय, राज्य और दे श के बारे म कैसे स्वप्न
दे खते ह? ल खए।
यह आपका अपना उत्तर होगा। अच्छा उत्तर लखने के लए नेताजी क ही व ध अपनाइए — पहले बताइए क आज क्या कमी
दखती है, फर बताइए क आदश स्थ त कैसी होगी, और अंत म एक बात ऐसी जो ड़ए जो आप स्वयं कर सकते ह। तीन स्तर —
वद्यालय, राज्य, दे श — के लए दो-तीन वाक्य पयाप्त ह।
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नमूना उत्तर:
व ालय — म ऐसे वद्यालय का स्वप्न दे खता ँ जहाँ कसी वद्याथ को उसक जा त, भाषा या घर क स्थ त के
कारण अलग न समझा जाए; जहाँ पुस्तकालय और खेल का मैदान सबके लए खुला हो; और जहाँ जो पीछे रह गया
हो, उसे बाक ब े साथ लेकर चल। म अपनी ओर से यह कर सकता ँ क ग णत म कमज़ोर अपने साथी के साथ
रोज़ आधा घंटा बैठँू ।
राज्य — म चाहता ँ क मेरे राज्य के हर गाँव तक अच्छा वद्यालय, च कत्सालय और सड़क पहुँचे, और यहाँ के
कारीगर को अपना सामान बेचने के लए बड़ा बाज़ार मले, ता क काम क तलाश म लोग को घर न छोड़ना पड़े।
दे श — म ऐसे भारत का स्वप्न दे खता ँ जो अपनी ज़रूरत क चीज़ स्वयं बनाए, जहाँ स्त्री और पुरुष को हर क्षेत्र म
समान अवसर हो, और जसे दु नया — नेताजी के शब्द म — ‘आदश-राष्ट्र के रूप म गण्य’ माने।
ध्यान र खए: स्वप्न लखते समय केवल इच्छा मत ल खए (‘सब सुखी ह ’), एक ठोस चत्र बनाइए — कौन क्या
कर रहा होगा, क्या बदला हुआ दखेगा। नेताजी ने भी यही कया था; उन्ह ने ‘अच्छा समाज’ कहकर छोड़ नह दया,
एक-एक शत गनाई।
प्र.27 (ख) हम बड़े संघष के बाद स्वतंत्रता मली है। अपनी इस स्वतंत्रता को बनाए रखने के लए हम अपने स्तर पर
क्या-क्या कर सकते ह? ल खए।
स्वतंत्रता एक बार पाकर हमेशा के लए सुर क्षत नह हो जाती — उसे हर पीढ़ को अपने आचरण से बनाए रखना पड़ता है। वद्याथ
अपने स्तर पर ये काम कर सकता है —
अपने कतव्य नभाना। हम अ धकार तो याद रखते ह, कतव्य भूल जाते ह। समय पर पढ़ाई, सावज नक संप त्त क दे खभाल
और नयम का पालन — यही सबसे छोटा और सबसे ज़रूरी काम है।
सोच-समझकर मानना। कोई बात सुनकर या पढ़कर तुरंत मान लेना और आगे बढ़ा दे ना भी एक तरह क परतंत्रता है। सच
जाँचना स्वतंत्र नाग रक का काम है।
भेदभाव न करना और न सहना। नेताजी ने जा तभेद और स्त्री-पुरुष के असमान अ धकार को स्वाधीनता के रास्ते का रोड़ा
बताया था। इन्ह अपने आसपास न बढ़ने दे ना हमारे हाथ म है।
श्रम का सम्मान करना और अपना काम स्वयं करना — यही आत्म नभरता क पहली सीढ़ है।
स्वदे शी को अपनाना — अपने क्षेत्र के कारीगर और गृह-उद्योग का सामान लेना, जैसा नेताजी अपने पत्र म सुझाते ह।
स्वतंत्रता संग्राम के इ तहास को जानना और आगे बताना, ता क यह याद रहे क यह आज़ाद कस क मत पर मली।
पाठ से जो ड़ए: नेताजी क कसौट थी — ‘वह राष्ट्र कसी भी वजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा’, और
उसक शत थी श्रम तथा कम क मयादा। यानी उनके अनुसार स्वतंत्रता क रक्षा ह थयार से नह , काम और
आत्म नभरता से होती है।
मलान क जए — पृष्ठ 147
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पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.28 (क) नीचे स्तंभ 1 म स्वतंत्रता सेना नय से संबं धत कुछ तथ्य दए गए ह और स्तंभ 2 म स्वतंत्रता सेना नय के
नाम दए गए ह। तथ्य का स्वतंत्रता सेना नय के नाम से रेखा ख चकर सही मलान क जए। इसके लए आप
अपने शक्षक , अ भभावक और पुस्तकालय तथा इंटरनेट क सहायता ले सकते ह। स्तंभ 1 — 1. 8 अप्रैल,
1929 को ‘सट्रल असबली’ म बम फकने वाले क्रां तकारी, ‘शहीद-ए-आज़म’ के नाम से जाने जाते ह। 2.
‘स्वराज पाट ’ के सं ापक म से एक, सुभाषचंद्र बोस के राजनी तक गुरु कहे जाते ह। 3. जेल म क्रां तका रय
के साथ राजबं दय के समान व्यवहार न होने के कारण क्रां तका रय ने 13 जुलाई 1929 से भूख हड़ताल शुरू
कर द । अनशन के तरसठव दन जेल म इनका दे हांत हो गया। 4. इनके जन्म दवस पर ‘अंतरराष्ट्रीय अ हसा
दवस’ मनाया जाता है। 5. नमदा नद के तट पर इनक एक वशाल प्र तमा ा पत है। जसे ‘स्टै च्यू ऑफ
यू नट ’ कहा जाता है। 6. 1921 म असहयोग आंदोलन म गरफ्तार होने पर न्यायाधीश ने इनसे पता का नाम
पूछा तो इन्ह ने कहा— “मेरा नाम आजाद है, पता का नाम स्वतंत्रता और पता कारावास है।” स्तंभ 2 — 1.
सरदार वल्लभभाई पटे ल 2. महात्मा गाँधी 3. चंद्रशेखर आजाद 4. चत्तरंजन दास 5. ज तन दास 6. भगत सह
स्तंभ 1 स्वतंत्रता थोड़ा और
सेनानी
1. से ंटल असे ंबली में बम, 6. भगत िसंह 8 अप्रैल 1929 को बटु केश्वर दत्त के साथ असबली म बम फका। उ े श्य कसी को
‘शहीद-ए-आज़म’ मारना नह था — वे स्वयं वह ठहरे रहे ता क अदालत उनक बात सुने। ‘शहीद-ए-
आज़म’ का अथ है ‘सबसे बड़ा शहीद’।
2. ‘स्वराज पाट ’ के 4. िचत्त रंजन दे शबंधु चत्तरंजन दास ने मोतीलाल नेहरू के साथ 1923 म स्वराज पाट क स्थापना
संस्थापक, बोस के दास क।
राजनीितक ग रु
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3. 13 जुल ाई 1929 की भूख 5. जितन दास लाहौर ष ंत्र मुक़दमे के बं दय के साथ जेल म सम्मानजनक व्यवहार क माँग को
हड़ताल, ितरसठवें िदन दे हांत लेकर अनशन; 63 दन बाद, 13 सतंबर 1929 को उनका नधन हुआ।
4. जन्मिदवस पर ‘अंतररा ीय 2. महात्मा गाँध ी 2 अक्तूबर उनका जन्म दन है; संयुक्त राष्ट्र इसी दन को अंतरराष्ट्रीय अ हसा दवस के
अिहंस ा िदवस’ रूप म मनाता है।
5. नमदा तट पर ‘स्टैच्यू ऑफ 1. सरदार गुजरात म नमदा नद के तट पर स्थत यह प्र तमा उन्ह ‘एकता’ का प्रतीक मानकर
यूिनटी’ वल्लभभाई पटेल बनाई गई, क्य क उन्ह ने रयासत को भारत म मलाने का काम कया।
6. “मेर ा नाम आजाद है, िपता 3. चंद शेखर तब उनक आयु लगभग पंद्रह वष थी। इसी उत्तर के बाद उनके नाम के साथ ‘आजाद’
का नाम स्वतंत्र ता…” आजाद जुड़ गया।
संक्षेप म — 1 → 6, 2 → 4, 3 → 5, 4 → 2, 5 → 1, 6 → 3.
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कक्षा 8 हद अध्याय 10 तरुण के स्वप्न
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सूत्र पक ड़ए: ऐसे प्रश्न म हर तथ्य के भीतर एक पहचान- चह्न छपा होता है — कोई उपा ध (‘शहीद-ए-आज़म’),
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कोई तारीख़ (13 जुलाई 1929), कोई स्थान (नमदा तट) या कोई वाक्य (‘मेरा नाम आजाद है’)। eपहले
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ढूँ ढ़ए, नाम अपने
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(ख) इनम से एक स्वतंत्रता सेनानी का नाम ‘तरुण के स्वप्न’ पाठ म भी आया है। उसे पहचान कर ल खए।
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प्र.29
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चत्तरंजन दास।
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“हमारे ने त ा स्वग य दे शबंध ु िच त्तरंजन दास ने भी एक स्वप्न दे खा था। वही स्वप्न उनकी शिक्त का उत्स बना
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और उनके आनंद का िनझर रहा। उनके स्वप्न के उत्तरािधकारी आज हम है।
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पाठ के आरंभ म ही नेताजी उनका नाम लेते ह। मलान वाली ता लका म भी उनका प रचय है — ‘स्वराज पाट ’ के संस्थापक म से
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एक और सुभाषचंद्र बोस के राजनी तक गुरु।
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यह नाम पाठ के आरंभ म ही क्य आता
a gl है: नेताजी अपना स्वप्न अपनी खोज बताकर शुरू नह करते। वे पहले
बताते ह क यह स्वप्न उन्ह कहाँ से मला, फर स्वयं को उसका ‘उत्तरा धकारी’ कहते ह, और अंत म उसे तरुण को
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स प दे ते ह। इस तरह पूरा भाषण एक ंखला बन जाता है — गुरु से शष्य तक, और शष्य से अगली पीढ़ तक।
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las स्वाधीन संपन्न समाज के लए प्रयास — पृष्ठ 147
agपाठ से आगे
सवागीण
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पाठ से आगे
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस और अन्य स्वतंत्रता सेना नय ने स्वाधीन संपन्न समाज क ापना के लए अपने समय
म अनेक प्रयास कए। स्वतंत्रता प्रा प्त के प ात इस दशा म क्या-क्या उल्लेखनीय प्रयत्न कए गए ह? अपनी
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सामा जक अध्ययन क पाठ्यपुस्तक, अपने अनुभव एवं पुस्तकालय क सहायता से ल खए।
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emसबसे अच्छा उत्तर वही होगा जो नेताजी क अपनी शत को क्रम से ले और हर शत के सामने स्वतंत्रता के बाद हुआ काम रखे।
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agl इससे उत्तर बखरता नह और यह भी दख जाता है क उनका स्वप्न कहाँ तक पूरा हुआ।
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कक्षा 8 हद अध्याय 10 तरुण के स्वप्न AglaSem · NCERT Solutions
नेताजी क शत स्वतंत्रता के बाद हुए प्रयत्न
व्यिक्त सब दृ िष्टयों से मुक्त हो 1950 में लागू संिवधान ने सभी नागिरकों को मूल अिधकार िदए — समानता, स्वतंत्र ता, शोषण के िवरुद्ध
अिधकार और संवैध ािनक उपचारों का अिधकार।
जाितभेद का स्थान न हो संिवधान में अस्पश्ृ यता का अंत (अनुच्छे द 17); िशक्षा और नौकिरयों में अनुस ूिचत जाित एवं जनजाित के िलए
आर क्षण।
नारी को समान अिधकार स्त्र ी-पुरुष को समान मतािधकार पहले ही चुनाव से ; उ त्त रािधकार तथा िववाह संबंध ी क़ ानूनों में सुध ार ;
पंचायतों और नगर िनकायों में मिहलाओं के िलए सीटें आरिक्षत।
अथ की िवषमता न हो पंचवष य योजनाएँ, भूिम -सुध ार , बैक
ं ों का रा ीयकरण, हिरत क्रांित और श्वेत क्रांित, तथा रोज़गार एवं खाद्य -
सुर क्षा की योजनाएँ।
सबको िशक्षा और उन्नित का िशक्षा का अिधकार — 6 से 14 वष के बच्चों के िलए िनःशुल्क और अिनवाय िशक्षा; म ध् याह्न भोजन; ‘सव िशक्षा
समान सुअवसर अिभयान’ जैसे कायक्रम।
श्रम और कम की मय दा श्रिमकों के िलए क़ ानून, न्यूनतम मज़दू र ी, बाल -श्रम पर रोक , और कु टीर तथा लघु उ द्य ोगों को बढ़ ावा।
स्वदे शी समाज का यंत्र / इस्पात, अंतिर क्ष, र क्षा और सूचना-पौद्य ोिगकी में अपनी क्षमता का िवकास — पाठ के आरंभ के िचत्र में भी
आत्मिनभरता भारतीय रे ल , उपगह-यान, पवन-चिक्कयाँ और यूपीआई िदखाए गए है। ं
उत्तर लखते समय: केवल योजनाओं के नाम मत गनाइए — हर नाम के आगे एक पं क्त म यह भी ल खए क
वह नेताजी क कस शत को पूरा करता है। और ईमानदारी से यह भी जो ड़ए क कहाँ काम शेष है, क्य क नेताजी
का स्वप्न कसी त थ पर पूरा हो जाने वाली चीज़ नह , लगातार चलने वाला काम है।
स्त्री सशक्तीकरण — पृष्ठ 148
पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.31 (क) सुभाषचंद्र बोस ने स्त्रय के लए समान अ धकार क बात क है। अपने अनुभव के आधार पर बताइए क
उन्ह कौन-कौन से वशेषा धकार राज्य क ओर से दए गए ह?
सं वधान राज्य को यह छू ट दे ता है क वह स्त्रय और ब के लए वशेष व्यवस्था कर सके। इसी आधार पर अनेक वशेषा धकार
दए गए ह। जो आपने अपने आसपास दे खे ह गे —
पंचायत और नगर नकाय म आरक्षण — स्थानीय नकाय म म हलाओं के लए सीट आर क्षत ह, इसी लए गाँव-गाँव म
म हला सरपंच और पाषद दखती ह।
मातृत्व अवकाश और सु वधाएँ — नौकरी करने वाली स्त्री को संतान के जन्म पर वेतन स हत अवकाश।
शक्षा म सहायता — बा लकाओं के लए नःशुल्क शक्षा, छात्रवृ त्त, साइ कल तथा छात्रावास जैसी योजनाएँ।
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कक्षा 8 हद अध्याय 10 तरुण के स्वप्न AglaSem · NCERT Solutions
सुरक्षा संबंधी व्यव ाएँ — कायस्थल पर उत्पीड़न के वरुद्ध क़ानून, म हला थाना और हेल्पलाइन, तथा रात म म हला
कमचारी के लए वाहन क व्यवस्था।
समान वेतन और संप त्त म समान अ धकार — समान काय के लए समान वेतन; पैतृक संप त्त म बेट को बेटे के बराबर
हस्सा।
रोज़ क छोट सु वधाएँ — बस तथा रेलगा ड़य म आर क्षत सीट, अलग डब्बा, और सरकारी कायालय म अलग पं क्त।
ये ‘ वशेष’ क्य ह: समान अ धकार क़ानून म लख दे ने भर से जीवन म नह आ जाते। जस समूह को स दय तक
अवसर नह मला, उसे बराबरी तक लाने के लए कुछ समय अ त रक्त सहारा दे ना पड़ता है। नेताजी क भाषा म
कह तो ये व्यवस्थाएँ इसी लए ह ता क स्त्री भी ‘समाज तथा राष्ट्र क सेवा म समान रूप से हस्सा ले’ सके।
प्र.32 (ख) सुभाषचंद्र बोस ने ‘आजाद हद फौज’ का नेतृत्व कया था। उसम एक टु कड़ी स्त्रय क भी थी। उस टु कड़ी
का नाम पता लगाकर ल खए। उस टु कड़ी क भू मका क्या थी? यह भी बताइए।
उस टु कड़ी का नाम था — रानी झाँसी रे जमट (झाँसी क रानी रे जमट)।
कब और कहाँ — सन् 1943 म सगापुर म इसक घोषणा हुई। इसम द क्षण-पूव ए शया म बसे भारतीय प रवार क लड़ कयाँ
और स्त्रयाँ स्वेच्छा से भत हुईं।
नाम क्य — 1857 म अंग्रेज़ से लड़ने वाली रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर, ता क सै नक को यह याद रहे क भारत क स्त्री
पहले भी युद्ध-भू म म उतर चुक है।
नेतृत्व — इसक कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने सँभाली, जो पेशे से च कत्सक थ ।
भू मका — इसक सै नक ने पुरुष सै नक क तरह ही सैन्य प्र शक्षण लया — कवायद, ह थयार चलाना और श वर का
अनुशासन। इनका काम युद्ध म भाग लेने के लए तैयार रहना, घायल क च कत्सा-सेवा करना और सै नक तथा प्रवासी
भारतीय म उत्साह जगाना था।
पाठ से जो ड़ए: 1929 के इसी भाषण म नेताजी ने कहा था क नारी ‘समाज तथा राष्ट्र क सेवा म समान रूप से
हस्सा ले’। रानी झाँसी रे जमट उसी वाक्य का काय-रूप है — उन्ह ने स्त्रय को सहायक भू मका नह , वद और
प्र शक्षण के साथ सै नक क भू मका द । उस समय दु नया क बहुत कम सेनाओं म स्त्रय क ऐसी लड़ाकू टु कड़ी
थी।
आपके प्रय स्वतंत्रता सेनानी — पृष्ठ 148
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पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.33 आप कस स्वतंत्रता सेनानी के काय व वचार से प्रभा वत ह? कारण स हत ल खए और अ भनय (रोल प्ले)
करते हुए उनके वचार को कक्षा म प्रस्तुत क जए।
यह आपक अपनी पसंद का प्रश्न है, पर उत्तर म कारण होना चा हए — केवल ‘मुझे अच्छे लगते ह’ लखना उत्तर नह है। एक
अच्छे उत्तर म तीन बात ह —
1. सेनानी का नाम और उनका एक ऐसा काम जो आपको प्रभा वत करता है।
2. उनका एक वचार या कथन, अपने शब्द म।
3. वह वचार आज आपके जीवन म कैसे काम आता है।
रोल प्ले क तैयारी — उनके कसी भाषण या पत्र का छोटा अंश चु नए (जैसे इसी पाठ का अं तम अनुच्छेद), उसे कंठस्थ क जए,
और बोलते समय वैसा ही खड़े होकर, उसी जोश से बो लए जैसा उस अवसर पर रहा होगा। एक साधारण वेशभूषा और एक-दो
सामग्री (टोपी, चश्मा, तरंगा) दृश्य को सजीव कर दे ती है।
नमूना उत्तर: “म नेताजी सुभाषचंद्र बोस से सबसे अ धक प्रभा वत ँ। जस काय ने मुझे प्रभा वत कया वह है
‘आजाद हद फौज’ का गठन — उन्ह ने भारत से बाहर रहकर, बखरे हुए भारतीय को जोड़कर एक सेना खड़ी कर
द , और उसम स्त्रय क भी टु कड़ी बनाई। उनका जो वचार मुझे सबसे अच्छा लगता है वह इसी पाठ म है —
‘आलसी तथा अकमण्य के लए कोई स्थान नह रहेगा’। इससे मने यह सीखा क बड़े सपने दे खना काफ़ नह ,
उसके लए रोज़ का काम भी करना पड़ता है। इसी लए मने तय कया है क अपना काम टालूँगा नह । रोल प्ले म म
उनके भाषण का अं तम भाग प्रस्तुत करूँगा — ‘हे मेरे तरुण भाइयो! …यह स्वप्न म तुम्ह उपहारस्वरूप दे ता ँ—
स्वीकार करो।’”
“तुम मुझे खून दो, म तुम्ह आजाद दूँ गा।” — पृष्ठ 148
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पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.34 नीचे स्तंभ 1 म कुछ नारे दए गए ह। नार के सामने ल खए क यह कसके ारा दया गया? आप पुस्तकालय
या इंटरनेट क सहायता भी ले सकते ह। नारे — स्वराज्य मेरा जन्म सद्ध अ धकार है। / करो या मरो / म आजाद
ँ, आजाद र ँगा और आजाद ही मरूँगा / इंकलाब जदाबाद, सा ाज्यवाद मुदाबाद / पूण स्वराज
नारा स्वतंत्रता सेनानी संदभ
स्वराज्य मेर ा जन्मिसद्ध बाल गंगाधर ितलक पूरा वाक्य है — ‘स्वराज्य मेरा जन्म सद्ध अ धकार है और म इसे लेकर र ँगा।’
अिधकार है। ‘जन्म सद्ध’ शब्द ही सबसे बड़ी बात कह दे ता है — स्वराज्य कोई माँगी हुई भीख
नह , जन्म के साथ मला अ धकार है।
करो या मरो महात्मा गाँध ी 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय दया गया आ ान — अब या तो दे श
आज़ाद कराएँगे या इसी प्रयत्न म मट जाएँगे।
मैं आजाद हू,ँ आजाद चंद शेखर आजाद उन्ह ने प्र त ा क थी क वे जी वत पु लस के हाथ नह आएँगे, और अंत तक इसे
रहूगँ ा और आजाद ही नभाया।
मरूँगा
इंक लाब िजंद ाबाद, भगत िसंह (और उनके 8 अप्रैल 1929 को सट्रल असबली म यही नारा गूँजा था। ‘इंकलाब जदाबाद’ पद
सामाज्यवाद मुद बाद साथी) मूलतः क व हसरत मोहानी का गढ़ा हुआ माना जाता है, पर इसे घर-घर तक
भगत सह और उनके साथी ले गए। ‘इंकलाब’ का अथ है क्रां त।
पूण स्वराज जवाहरलाल नेहरू / दसंबर 1929 के लाहौर अ धवेशन म, जसक अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने
कांगेस का लाहौर क , ‘पूण स्वराज’ का प्रस्ताव पा रत हुआ और 26 जनवरी 1930 को पहला
अिधवेशन (1929) स्वतंत्रता दवस मनाया गया।
नारे इतने असरदार क्य होते ह: नारा कुछ ही शब्द म एक पूरा वचार पकड़ा दे ता है और बोलने म लय के कारण
याद रह जाता है — इसी लए वह भीड़ को एक साथ बोलने और एक साथ सोचने पर ले आता है। पाठ म भी यही
कहा गया है क ये नारे स्वतंत्रता सेना नय के ‘अदम्य साहस, नभ कता और दे श-प्रेम को दशाते ह’। इसी कारण
नेताजी का ‘तुम मुझे खून दो, म तुम्ह आजाद दूँ गा’ भी केवल वाक्य नह रहा — वह एक सौदा था, जसम त्याग
पहले माँगा गया और फल बाद म दे ने का वचन दया गया।
प रयोजना काय — पृष्ठ 149
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पाठ से आगे
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पाठ से आगे
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a s emसभी राज्य के स्वतंत्रता सेना नय के वषय म पढ़कर उनम से 10 म हला एवं 10 पुरुष स्वतंत्रता सेना नय
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के चत्र का संग्रह करके एक संग्र हका तैयार क जए। चत्र के नीचे उनके वशेष योगदान के बारे म एक-दो
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वाक्य भी ल खए। अपनी संग्र हका तैयार करते समय ध्यान र खए क आप कसी भी राज्य से एक से अ धक
व्य क्त न चुन।
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यह हाथ से करने वाला काम है। शत सबसे महत्वपूण है — कुल 20 सेनानी, 10 म हला और 10 पुरुष, और एक राज्य से
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केवल एक व्य क्त। इसका अथ है क आपको कम-से-कम 20 अलग-अलग राज्य तक जाना पड़ेगा। इसी लए पहले नाम चु नए,
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चत्र बाद म।
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कैसे बनाएँ —
se कागज़ पर दो खाने बनाइए — ‘म हला’ और ‘पुरुष’। हर नाम के आगे उसका राज्य ल खए, ता क दोहराव तुरंत पकड़ म
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2. चत्र पुरानी प त्रकाओं, समाचार-पत्र , डाक- टकट या पुस्तकालय क पुस्तक से ली जए; न मले तो स्वयं रेखा चत्र बनाइए।
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3. हर चत्र के नीचे तीन बात ल खए — नाम, राज्य, और एक-दो वाक्य म वशेष योगदान।
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4. संग्र हका के आरंभ म एक अनुक्रम णका और अंत म यह ल खए क आपने सामग्री कहाँ से ली।
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नमूना प्र व याँ (आप इन्ह अपनी सूची के लए आधार बना सकते ह, पर राज्य दोहराइए नह ) —
नाम राज्य / क्षेत्र वशेष योगदान (एक वाक्य म)
रानी गाइिदन्ल्यू म णपुर / नागालड िकशोरावस्था में ही अंगेज़ी शासन के िवरुद्ध आंद ोलन का नेतत्ृ व िकया और लंबा
क्षेत्र कारावास भोगा।
मातंिगनी हाजरा प म बंगाल भारत छोड़ ो आंद ोलन में ितरंगा थामे जुल ूस का नेतत्ृ व करते हुए गोली लगने पर भी
झंडा नही ं िगरने िदया।
कै प्टन लक्ष्म ी सहगल त मलनाडु आजाद िहंद फौज की ‘रानी झाँस ी रे िजमेंट’ की कमान सँभाली।
िकत्तूर रानी चेन्नम्मा कनाटक 1824 में अंग ेज़ों के िवरुद्ध सशस्त्र पितरोध करने वाली आरंिभक शासकों में से
एक।
भगत िसंह पंजाब से ंटल असे ंबली में बम फें ककर बहरी सरकार तक अपनी बात पहच
ु ँ ाई; ‘शहीद -ए -
आज़म ’ कहलाए।
िबरसा मुंडा झारखंड ‘उलगुल ान’ आंद ोलन से जनजातीय समाज को अंग ेज़ी शासन और भू-व्यवस्था के
िवरुद्ध संगिठत िकया।
सरदार वल्लभभाई गुजरात बारदोली स त्यागह का नेतत्ृ व और स्वतंत्रता के बाद िरयासतों का भारत में िवलय।
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सुभाषचंद बोस ओ ड़शा (जन्म — ‘आजाद िहंद फौज’ का नेतत्ृ व और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे ं आजादी दू ँग ा’ का
कटक) आ ान।
इसी तरह शेष नाम अलग-अलग राज्य से चुनकर बीस पूरे क जए।
‘एक राज्य से एक ही’ क शत क्य रखी गई होगी: इससे आपको उन नाम तक जाना पड़ेगा जो पाठ्यपुस्तक म
कम आते ह, और यह दखेगा क स्वतंत्रता संग्राम कसी एक प्रदे श का नह , पूरे दे श का काम था।
साझी समझ — पृष्ठ 150
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कक्षा 8 हद अध्याय 10 तरुण के स्वप्न AglaSem · NCERT Solutions
पाठ से आगे · ‘झरोखे से’ — गृहउ ोग के वषय म नेताजी का एक पत्र (पृष्ठ 149)
पाठ से आगे
प्र.36 उपयुक्त पत्र म नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने गृह एवं कुट र उ ोग क बात क है। यह पत्र दे श क स्वतंत्रता से पहले
लखा गया था। अपने आस-पास के गृह एवं कुट र उ ोग के वषय म अपने सा थय के साथ चचा क जए।
चचा से पहले पत्र को एक बार फर दे ख ली जए, क्य क उसी म चचा के बदु छपे ह। यह पत्र नेताजी ने मांडले जेल से द क्षण
कलकत्ता सेवक-स म त के उप-मंत्री श्री अ नलचंद्र वश्वास को लखा था। इसम वे दो काम सुझाते ह — म के खलौने बनाना
और सीप के बटन तैयार करना।
पत्र म गृह-उ ोग क चार शत छपी ह — चचा म इन्ह को कसौट बनाइए:
1. कम पूँजी — ‘खच कुछ भी नह लगेगा… मात्र रंग के लए कुछ नकद रुपये खच ह गे।’
2. जल्द सीखा जा सके — ‘कोई भी कुछ दन म ही यह काम सीख सकता है।’
3. फुरसत के समय म हो सके — ‘रसोई के समय म से बचे खाली समय म भी, स्त्रयाँ यह काम करती रहती ह।’
4. बाज़ार क व्यव ा — ‘स म त सफ सस्ते दाम म रॉ मैट रयल आ द जुटा दे गी और तैयार वस्तुओं को अ धक
दाम म बेचने क व्यवस्था करेगी।’ नेताजी जानते थे क कारीगर का असली संकट बनाना नह , बेचना है।
चचा कैसे क जए —
1. अपने मोहल्ले या गाँव के गृह-उद्योग गनाइए — अचार-पापड़ बनाना, अगरबत्ती, मोमबत्ती, म के बरतन और द ये, टोकरी
और चटाई बुनना, कढ़ाई और सलाई, बाँस का काम, साबुन, कागज़ के लफ़ाफ़े, मधुमक्खी-पालन।
2. हर उद्योग को ऊपर क चार शत पर पर खए — कतनी पूँजी, कतने दन म सीखा जाए, कौन कर सकता है, माल कहाँ
बकता है।
3. पता क जए क आज इनक मदद के लए क्या है — स्वयं सहायता समूह, सहकारी स म तयाँ, कारीगर मेले और सरकारी
ऋण-योजनाएँ। ये नेताजी क ‘स म त’ का ही आज का रूप ह।
4. अंत म तय क जए क आपक कक्षा कोई एक छोटा उत्पाद स्वयं बनाकर वद्यालय के मेले म लगा सकती है या नह ।
पाठ से जो ड़ए: भाषण म नेताजी ने कहा था — ‘ जस समाज म श्रम और कम क पूरी मयादा होगी।’ यह पत्र उसी
वाक्य का व्यावहा रक रूप है। ध्यान द जए क जेल म बंद रहते हुए भी वे बटन बनाने के औज़ार तक क बात कर
रहे ह — बड़ा स्वप्न दे खने वाला व्य क्त छोट बात को छोटा नह समझता।
खोजबीन के लए — पृष्ठ 150
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पाठ से आगे
पाठ से आगे
प्र.37 नीचे द गई इंटरनेट कड़ी का प्रयोग करके आप सुभाषचंद्र बोस पर आधा रत फल्म दे ख सकते ह। • ‘आजाद
हद फौज’ के वषय म और अ धक जानकारी जुटाइए और अपनी कक्षा म प्रस्तुत क जए।
पुस्तक म द गई कड़ी (क्यू-आर कोड) से फ़ल्म दे खए, फर नीचे दए ढाँचे पर अपनी प्रस्तु त बनाइए। खोजबीन का उत्तर तभी
अच्छा होता है जब वह जानकारी को क्रम म रखे।
प्रस्तु त के लए आधार- बदु —
नाम — ‘आजाद हद फौज’ को अंग्रेज़ी म Indian National Army (आई.एन.ए.) कहा जाता है।
आरंभ — दूसरे वश्वयुद्ध के समय द क्षण-पूव ए शया म बनी। इसम वे भारतीय सै नक शा मल हुए जो युद्धबंद बन चुके थे,
और वहाँ बसे भारतीय नाग रक भी।
नेतृत्व — सन् 1943 म नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसका नेतृत्व सँभाला और वह ‘आजाद हद’ क अस्थायी सरकार बनाई।
टु क ड़याँ — गांधी गेड, नेहरू गेड, आजाद गेड, और स्त्रय क रानी झाँसी रे जमट।
नारे और गीत — ‘ दल्ली चलो’, ‘जय हद’, ‘तुम मुझे खून दो, म तुम्ह आजाद दूँ गा’; ‘कदम कदम बढ़ाए जा’ इसका कूच-
गीत था।
वशेषता — इसम भारत के हर प्रांत और हर धम के सै नक एक साथ थे, भोजन और वद म कोई भेद नह था — यानी वह
फौज ही नेताजी के ‘जा तभेद-र हत समाज’ का छोटा नमूना थी।
बाद म — युद्ध के बाद दल्ली के लाल क़ले म इसके अ धका रय पर चले मुक़दम ने पूरे दे श म जनभावना जगा द ।
प्रस्तु त कैसी हो: पाँच-सात मनट, एक न ा (कहाँ-कहाँ फौज स क्रय रही), दो-तीन चत्र और अंत म एक प्रश्न
कक्षा के लए — जैसे, ‘एक ही फौज म इतने प्रांत और भाषाओं के सै नक बना भेदभाव के कैसे रह पाए ह गे?’
जानकारी कहाँ से ली, यह अवश्य बताइए।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ क वधा गद्य है — यह एक भाषण/उद् बोधन का अंश है, कसी कहानी या नबंध का नह । इस लए इसम सीधा
संबोधन है (‘हे मेरे तरुण भाइयो!’), लंबे-लंबे वाक्य ह और अंत म एक आ ान है।
नेताजी अपना स्वप्न दे शबंधु चत्तरंजन दास से जोड़ते ह — ‘वही स्वप्न उनक श क्त का उत्स बना और उनके आनंद का नझर
रहा।’ फर कहते ह, ‘उनके स्वप्न के उत्तरा धकारी आज हम ह।’
उस आदश समाज क पाँच शत पाठ म गनाई गई ह — व्य क्त सब दृ य से मुक्त हो, जा तभेद का स्थान न हो, नारी को
पुरुष के समान अ धकार ह , अथ क वषमता न हो, और हर व्य क्त को शक्षा तथा उन्न त का समान सुअवसर मले।
इन शत के साथ एक शत कम क है — ‘ जस समाज म श्रम और कम क पूरी मयादा होगी और आलसी तथा अकमण्य के
लए कोई स्थान नह रहेगा, वह राष्ट्र कसी भी वजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा।’
नेताजी क दृ केवल भारत तक सी मत नह है — वह समाज और राष्ट्र वश्व-मानव के समक्ष आदश-समाज और आदश-
राष्ट्र के रूप म ‘गण्य’ होगा, यानी दु नया के सामने एक नमूना बनेगा।
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अंत नाटक य है — ‘तुम्ह दे ने लायक मेरे पास कुछ भी नह है, है सफ यही स्वप्न… यह स्वप्न म तुम्ह उपहारस्वरूप दे ता ँ—
स्वीकार करो।’ भाषण एक माँग पर नह , एक भट पर समाप्त होता है।
पाठ के साथ ‘झरोखे से’ म नेताजी का एक पत्र भी दया गया है, जो उन्ह ने मांडले जेल से द क्षण कलकत्ता सेवक-स म त के
उप-मंत्री श्री अ नलचंद्र वश्वास को लखा था — वषय है म के खलौने और सीप के बटन जैसे गृह एवं कुट र उ ोग।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ पाठ क पं क्त म ध्यान दे ने क बात
उत्स सोता, ोत, जहाँ से पानी फू टता है ‘वही स्वप्न उनक श क्त का उत्स बना’ श क्त को पानी बना दया गया है, इस लए उसका
‘ ोत’ हो सकता है
नझर झरना, पपात ‘और उनके आनंद का नझर रहा’ उत्स से नकलकर झरना बनना — एक ही चत्र
आगे बढ़ता है
सवागीण सब अंग ों में व्याप्त, हर दृ िष्ट से पूर ा ‘एक नया सवागीण स्वाधीन संपन्न स्वाधीनता केवल राजनी तक नह , सामा जक
समाज’ और आ थक भी
वषमता असमानता, ऊँच-नीच ‘उस समाज म अथ क वषमता न वपरीताथक — समानता
हो’
उत्तरा धकारी िकसी के बाद उसकी संपित्त पाने ‘उनके स्वप्न के उत्तरा धकारी आज स्वप्न को संप त्त क तरह दे खा गया है — मलती
का हकदार, वािरस हम ह’ है तो सँभालनी भी पड़ती है
अकमण्य कम के अयोग्य, आलसी, िनकम्मा ‘आलसी तथा अकमण्य के लए कोई वपरीताथक — कमण्य / कमठ
स्थान नह रहेगा’
मयादा सीमा, सदाचार, पितष्ठा ‘श्रम और कम क पूरी मयादा होगी’ यहाँ अथ ‘प्र त ा’ है — मेहनत को सम्मान
मलेगा
वजातीय िभन्न जाित का, दू स री जाित या वग ‘ कसी भी वजातीय प्रभाव से हर बाहर से थोपा गया प्रभाव, जो अपने समाज का
का प्रकार से मुक्त रहेगा’ अपना नह
गण्य िगनने लायक, मान्य, िलहाज करने ‘आदश-राष्ट्र के रूप म गण्य होगा’ दु नया उसे गनेगी, यानी उसका उदाहरण दे गी
योग्य
क्षुद्र छोटा, तुच्छ ‘जो मेरे क्षुद्र जीवन को भी साथक अपने लए ‘क्षुद्र’ कहना नेताजी क वनम्रता है;
बनाता है’ वपरीताथक — वशाल/ वराट
प्र त ा स्थापना, पितिष्ठत करना ‘इस सत्य क प्र तष्ठा के लए सबकुछ यहाँ ‘इज़्ज़त’ नह , ‘स्था पत करना’ अथ है
कया जा सकता है’
अखंड िजसका िसलिसला न टू टे, अटू ट, ‘यह स्वप्न मेरे समक्ष नत्य एवं अखंड भाषा क बात वाले शब्द-समूह का पहला जोड़ा
संपूण सत्य है’ — अखंड सत्य
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