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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 1 संगच्छध्वं संवदध्वम्

AglaSem पर कक्षा 8 संस्कृत पाठ 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् (दीपकम्) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 1 (Deepakam).
NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् - Page 1 of 27

About NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 1 संगच्छध्वं संवदध्वम्

NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् is available here for free download. Published by NCERT for Class 8, this solution can be viewed online or downloaded as a PDF (27 pages). Candidates preparing for Class 8 can use NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् to understand the exam pattern, the type of questions asked, and the overall difficulty level.

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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा8

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 1: संगच्छध्वं संवदध्वम्

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

1–9 12 38 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 26 pages

Page 2

कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् AglaSem · NCERT Solutions

क ा 8 · सं स्कृ त · द पकम्

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 1: संगच्छध्वं संवदध्वम्
संगच्छध्वं संवदध्वम् द पकम् (कक्षा ८) का प्रथम पाठ है। यह वै दक पद्यपाठ है — ऋग्वेद के अ न्तम (दशम) मण्डल के अ न्तम सूक्त १०.१९१ के,
जो ‘संज्ञान-सूक्तम्’ अथवा ‘संघटन-सूक्तम्’ नाम से प्र सद्ध है, तीन प्र सद्ध मन्त्र यहाँ पढ़ाए गए ह। पाठ का आरम्भ एक चत्र-संवाद से होता है, जसम
आचाय वद्या थय को समझाते ह क वजय का मूल कारण एकता, सामञ्जस्य तथा मलकर काय करना है।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

द पकम् (क ा 8) 1–9

खं ड प्रश्न

12 38

माध्यम

हन्द

चत्र-संवादः — पृष्ठ 1
पाठार े आचाय-छात्र-संवादः (पाठ्य प्रश्न)

चत्र-सं वादः

प्र.1 अ प भवन्तः जान न्त यत् भवतां प्र तद्व न्द्वनः कथं परा जताः ?

आम्, जानीमः। तस्य दलस्य क्र डकेषु परस्परं मनोभेदः द्वे षभावः च आसीत्, ते अन्योन्यं सहयोगं न कृतवन्तः, अतः ते
परा जताः। ( हन्द — हाँ, हम जानते ह। उस दल के खला ड़य म आपस म मनोभेद तथा द्वे षभाव था, उन्ह ने एक-दूसरे का
सहयोग नह कया, इसी लए वे हार गए।)

संवादस्य आधारः: चत्र-संवाद म छात्रा कहती है — “अस्माकं दलस्य क्र डकेषु परस्परं सम्यक् सामञ्जस्यम्
आसीत्, कन्तु वप क्ष-दले तत् नासीत्।” अथात् हार का कारण खला ड़य क कमज़ोरी नह , दल के भीतर का
बखराव था।

पाठ-सङ् केत: यही प्रश्न पूरे पाठ का द्वार है — जीत खेल-कौशल से पहले सामञ्जस्य से आती है, और यही बात
आगे वेदमन्त्र दोहराते ह।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 त ह वदन्तु, वजयप्राप्त्यथ क कम् आवश्यकम् ?

वजयप्राप्त्यथ म लत्वा कायकरणम्, एकता, परस्परं सामञ्जस्यं च आवश्यकम्। ( हन्द — वजय पाने के लए मलकर काय
करना, एकता तथा परस्पर सामञ्जस्य आवश्यक है।)

िवजयस्य त्रीिण साधनािन —

१. िमिलत्वा कायकरणम् (िमलकर काम करना)

२. एकता (एक होकर रहना)

३. परस्परं सामञ् जस्यम् (आपसी तालमेल)

क्य ये तीन: मलकर काम करने से श क्त बढ़ती है, एकता से लक्ष्य एक बनता है, और सामञ्जस्य से वह श क्त
बखरती नह । तीन म से एक भी न हो तो दल म संख्या रहती है, साम य नह ।

प्र.3 आचाय ! कस्मात् वेदात् गृहीतः एष सन्दे शः ? कः च अस्य अ भप्रायः ?

एष सन्दे शः ऋग्वेदात् गृहीतः। अयं मन्त्रांशः ‘संज्ञान-सूक्तस्य’ अ स्त, यत् ‘संघटन-सूक्तम्’ इत्य प प्रख्यातम्। अस्य
अ भप्रायः — म लत्वा गच्छत, एकस्वरेण वदत, परस्परं मनोभावान् सम्यक् जानीत। ( हन्द — यह सन्दे श ऋग्वेद से लया
गया है। यह ‘संज्ञान-सूक्त’ का अंश है, जो ‘संघटन-सूक्त’ नाम से भी प्र सद्ध है। इसका अ भप्राय है — मलकर चलो, एक स्वर म
बोलो, एक-दूसरे के मन को भली-भाँ त जानो।)

प्रश्नः उत्तरम्

कस्मात् वेद ात् ? ऋ वेदात् (प चमी िवभि तः — अपादानम्)
ग् ञ् क्

कस्मात् सूक्तात् ? सं ान-सू तात् / संघटन-सू तात् (ऋ. १०.१९१)
ज्ञ क् क्

कः अिभपायः ? सङ् घिटत पेण सहजीवनम् — एकता, समवाक् , समान मनः
रू

ध्यान द: ‘कस्मात् वेदात्’ म पञ्चमी वभ क्त है, इस लए उत्तर भी पञ्चमी म — ऋग्वेदात्, ‘ऋग्वेदः’ नह । यह भेद
अभ्यास के प्रश्न ३ (च) म भी काम आएगा।

मन्त्राणां भावाथ जानीमः — पृष्ठ 2–4

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् AglaSem · NCERT Solutions

ऋग्वेदस्य संज्ञान-सूक्तस्य (१०.१९१) त्रयः मन्त्राः — पदच्छे दः, अन्वयः, अथः, भावः

मन्त्राथः

प्र.1 प्रथमस्य मन्त्रस्य पदच्छे दम् अन्वयं भावाथ च लखत — “संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनां स जानताम्। दे वा भागं
यथा पूव संजानाना उपासते॥ १॥”

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांिस जानताम्।

दे वा भागं यथा पूव संजानाना उपासते ॥ १॥

पदच्छे दः — संगच्छध्वम् + संवदध्वम् + सम् + वः + मनां स + जानताम् + दे वाः + भागम् + यथा + पूव + संजानानाः + उपासते।
अन्वयः — (यूयम्) संगच्छध्वं संवदध्वं, वः मनां स संजानताम्। यथा पूव दे वाः भागं संजानानाः उपासते।
अथः ( हन्द ) — (हे मनुष्यो!) तुम मलकर चलो, एक स्वर म बोलो, तुम्हारे मन एक-दूसरे को भली-भाँ त जान — ठ क वैसे ही,
जैसे सृ ष्ट के आरम्भ म दे वगण अपना-अपना भाग (कतव्य) स्वीकार कर, परस्पर एकमत होकर अपने कम का नवाह करते थे।

पदम् अथः

संग च्छध्वम् िमिल वा ग छत — िमलकर आगे बढ़ ो (लोट् , म यमपु ष, बहुवचन, आ मनेपद)
त् च् ध् रु त्

संवदध्वम् एक वरे ण वदत — एक वर में बोलो
स् स्

वः मनांिस यु माकं िच ािन — तु हारे मन
ष् त्त म्

जानताम् जान तु — जाने,ं पिरिचत हों
न्

दे वाः ब ा डीय-श तयः — अि न, वायु, आिद य आिद
ह्म ण् क् ग् त्

भागम् स्वं वं कत यम् — अपना-अपना िह सा
स् व् स्

संजानानाः एकमनसः भू वा — एक िवचार वाले होकर
त्

उपासते से व ते — ापूवक कत य िनभाते है ं
न् श्र व्

भावः: मन्त्र तीन क्रम म एकता माँगता है — पहले चरण मल (संगच्छध्वम्), फर वाणी मले (संवदध्वम्), और अन्त
म मन मल (मनां स जानताम्)। साथ चलना सबसे सरल है, मन का मलना सबसे क ठन — इसी लए वह अन्त म
रखा गया है। उदाहरण सृ ष्ट से लया गया है : अ ग्न, वायु और सूय आपस म झगड़ते नह , प्रत्येक अपना भाग
चुपचाप नभाता है, इसी लए सृ ष्ट-यज्ञ चलता रहता है। मनुष्य भी प रवार, वग, समाज तथा राष्ट्र म इसी समन्वय से
चले, तो अभ्युदय न त है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम्
a g l AglaSem · NCERT Solutions

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m.
ध्यान द: ‘संगच्छध्वम्’ म गम्-धातु के साथ ‘सम्’ उपसग है, इस लए रूप आत्मनेपद म बना — यही बात पृष्ठ ६ के

m as e
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‘अत्र इदम् अवधेयम्’ म समझाई गई है।

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प्र.2 द्वतीयस्य मन्त्रस्य पदच्छे दम् अन्वयं भावाथ च लखत — “समानो मन्त्रः स म तः समानी समानं मनः सह

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चत्तमेषाम्। समानं मन्त्रम भमन्त्रये वः समानेन वो ह वषा जुहो म॥ २॥”

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समानो मन्त्रः सिमितः समानी समानं मनः सह िचत्तमेषाम्।

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समानं मन्त्रमिभमन्त्रये वः समाने न वो हिवषा जुहोिम॥ २॥

m .co a g
l a se
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a वः + समानेन + वः + ह वषा + जुहो म।
पदच्छे दः — समानः + मन्त्रः + स म तः + समानी + समानम् + मनः + सह + चत्तम् + एषाम् + समानम् + मन्त्रम् + अ भमन्त्रये +

m a s
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अन्वयः — एषां मन्त्रः समानः, स म तः समानी, मनः समानं, चत्तं सह (अस्तु)। वः समानं मन्त्रम् अ भमन्त्रये, वः समानेन ह वषा

se m
जुहो म।

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अथः ( हन्द ) — एक ही कम म साथ लगे हुए इन लोग का चन्तन समान हो, इनक लक्ष्य स द्ध समान हो, मन समान हो और बु द्ध
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से उपजा ज्ञान भी एक हो जाए। हे मनुष्यो! तुम्हारे उस समान सङ् कल्प को म दव्यभाव से जोड़कर प्रकट करता ँ, और तुम्हारी

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सामू हक प्राथना रूपी ह व से ज्ञानयज्ञ सम्पन्न करता ँ।

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पदम् अथः

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s e m िवचारः, िच तनम् — सोच
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मन्त्रः न्

समाना पाि तः, ल यिसि ः — समान िसि
m
सिमितः क्ष्

बुि ज यं ानम् — बुि से बनाomान l a se
िचत्तम्
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न् ज्ञ ज्ञ

l a s—e अिभमि त कर पचािरत करता हू ँ
सं कृ य पचारयािम
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अिभमन्त्रये स् त् न्त्र

हिवषा पाथनापूवके ण समपणेन — पाथना पी आहिु त से
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रू

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ानकममयं य ं साधयािम — ानय स पन्न करता हू ँ
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जुहोिम ज्ञ ज्ञ ज्ञ ज्ञ म्

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m भावः: पहला मन्त्र करने क एकता माँगता है, दूसरा सोचने क । जस समूह के लोग का चन्तन अलग-अलग हो, a g
l a se
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वह साथ चलकर भी एक दशा म नह जाता। इसी लए ऋ ष चार वस्तुओं को समान करना चाहता है — मन्त्र

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(सोच), स म त (लक्ष्य), मनः (भावना) और चत्त (ज्ञान)। अ न्तम दो पं क्तयाँ बताती ह क ऋ ष और महात्मा ऐसे
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सङ् कल्प को केवल कहते नह , उसे दव्यभाव से जोड़कर समाज म फैलाते ह और उसक सफलता के लए प्राथना
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करते ह।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् AglaSem · NCERT Solutions

ध्यान द: यहाँ ‘ह वषा’ का अथ घी या सामग्री नह , प्राथनारूपी समपण है और ‘जुहो म’ का अथ अ ग्न म आहु त
दे ना नह , ज्ञानयज्ञ करना है — पुस्तक क शब्दाथ-ता लका यही अथ दे ती है।

प्र.3 तृतीयस्य मन्त्रस्य पदच्छे दम् अन्वयं भावाथ च लखत — “समानी व आकू तः समाना हृदया न वः। समानमस्तु वो
मनो यथा वः सुसहास त॥ ३॥”

समानी व आकू ितः समाना हृदयािन वः।

समानमस्त ु वो मनो यथा वः सुसहासित॥ ३॥

पदच्छे दः — समानी + वः + आकू तः + समाना + हृदया न + वः + समानम् + अस्तु + वः + मनः + यथा + वः + सु + सह +
अस त।
अन्वयः — (हे मानवाः!) वः आकू तः समानी (अस्तु)। वः हृदया न समाना (सन्तु)। यथा वः सह सु अस त, (तथा) वः मनः समानम्
अस्तु।
अथः ( हन्द ) — हे मनुष्यो! तुम्हारा सङ् कल्प समान हो, तुम्हारे हृदय सामरस्यपूण ह , और तुम्हारा मन भी एकरूप तथा
सामञ्जस्ययुक्त हो — जससे तुम्हारा संघटन सुन्दर और उत्कृष्ट बने।

पदम् अथः

आकू ितः सङ् क पः — इरादा, संक प
ल् ल्

समानी समाना — एक जैसी
हृदयािन अ तःकरणािन — दय (नपुंसकिलङ् ग, बहुवचन)
न् हृ

वः यु माकम् — तु हारा
ष् म्

सु सह असित सुसंघिटतः भवेत ् — भली-भाँित संगिठत हो

भावः: यह मन्त्र एकता क सबसे भीतरी परत तक जाता है। बाहर से साथ चलना, एक स्वर म बोलना — ये दखते
ह; पर सङ् कल्प और हृदय नह दखते। ऋ ष कहता है क जब तक भीतर का इरादा एक न हो, बाहर क एकता
टकती नह । इसी से प रवार, गण, समाज, राष्ट्र तथा वश्व म सुख, शा न्त और मैत्रीभाव वराजते ह, और स्वजीवन म
प्रसन्नता, सौमनस्य, उत्साह, आयु, आरोग्य, वजय, समृ द्ध, धम, ज्ञानप्रा प्त तथा आत्मतृ प्त प्राप्त होती है।

तीन मन्त्र का क्रम: १ — कम क एकता (चलो, बोलो), २ — वचार क एकता ( चन्तन, लक्ष्य), ३ — भाव क
एकता (सङ् कल्प, हृदय)। यही तीन सी ढ़याँ मलकर ‘संघटन’ बनाती ह — इसी लए इस सूक्त का दूसरा नाम
संघटन-सूक्तम् है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् AglaSem · NCERT Solutions

वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 5
शब्दाथ-ता लका तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त क्रयाकलापः

कायकलापः

प्र.1 पाठे प्रयुक्तानां शब्दानाम् अथान् ज्ञात्वा अ न्तमे स्त े मातृभाषया अथ लखत।

यह पुस्तक का अपना क्रयाकलाप है — ता लका के अ न्तम स्तम्भ म हर शब्द का अथ अपनी मातृभाषा (जैसे मराठ , बाङ्गला,
त मऴ, गुजराती, ओ ड़आ…) म लखना है। नीचे संस्कृत, हन्द तथा अंग्रेज़ी अथ दए ह; इन्ह के आधार पर अपनी भाषा का शब्द
चुन।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् AglaSem · NCERT Solutions

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH

संग च्छध्वम् म लत्वा गच्छत िमलकर चलो May you walk together

संवदध्वम् एकस्वरेण वदत सहमितपूवक बोले ं May you speak in one voice

समवेतस्वरे ण स म्म लत-स्वरेण सि मिलत विन से
म् ध् By chanting in unison

मनािं स चत्ता न मनों को Minds

जानताम् जानन्तु जाने ं May you know

दे वाः ब्रह्माण्डीय-शक्तयः / वै श्वक- सृि ट की मूलभूत शि तयाँ
ष् क् Cosmic forces & celestial
शक्तयः phenomena

संजानानाः एकमनसः भूत्वा एक िवचार वाले होकर Being amicable

उपासते सेवन्ते श्र ापूवक कत य िनवहण व् Devotedly performing

अभ्युद यम् अ भवृ द्धः लौिकक उन्नित Elevation and prosperity

मन्त्रः वचारः िच तन न् Contemplation

सिमितः समाना प्रा प्तः समान िसि Common resolutions

वः युष्मभ्यम् तु हारे
म् For you

अिभमन्त्रये संस्कृत्य प्रचारया म अिभमि त करके पचािरत
न्त्र (I) Consecrate and propagate
करता हू ँ
हिवषा प्राथनापूवकेण समपणेन पाथना पूवक य ाहिु त ारा ज्ञ By oblatory prayers

जुहोिम ज्ञानकममयं यज्ञं साधया म िद य य कम को साधता/ती हू ँ
व् ज्ञ Performing Yajña & divine
offerings

आकू ितः सङ् कल्पः संक प ल् Resolution

सु सह सुसंघ टतः भवेत् सुसंघिटत हो May you be united
असित

संिहता मूलमन्त्रपाठः मूल वैिदक म पाठ न्त्र Original Vedic text

बह्मणा सृ ष्टकत्रा / परमेश्वरेण सृि ट के िनम ता परमा मा के
ष् त् By the creator of the universe
ारा
िनरवहन् नवाहम् अकुवन् िनव ह िकया Took responsibility

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् AglaSem · NCERT Solutions

नमूना उत्तर (मराठ ) — संगच्छध्वम् = ‘एकत्र चला’, संवदध्वम् = ‘एका सुरात बोला’, मनां स = ‘मने’, आकू तः =
‘संकल्प’। (बाङ्गला) — संगच्छध्वम् = ‘एकसाथे चलो’, मनां स = ‘मनगु ल’। अपनी भाषा म लखते समय ध्यान
रख क अथ वही रहे जो संस्कृत स्तम्भ म दया है, शब्द चाहे बदल जाए।

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 6
ाकरण-सूचना — ‘सम्’ उपसगयुक्तः गम्-धातुः, लोट् -लकारः, अस्मद्-युष्मद्-शब्दयोः वैक ल्पकरूपा ण

ाकरणम्

प्र.1 गम्-धातुः सामान्यतया क दृशः अ स्त ? ‘सम्’ उपसग यो जते स त तस्य रूपेषु कः प रवतनः भव त ?

गम्-धातुः सामान्यतया परस्मैपद अ स्त। यदा ‘सम्’ इ त उपसगयुक्तः गम्-धातुः भव त, तदा तस्य आत्मनेपदरूपा ण
भव न्त। ( हन्द — गम् धातु साधारणतः परस्मैपद है; परन्तु जब उसम ‘सम्’ उपसग जुड़ता है, तब उसके रूप आत्मनेपद म बनते
ह।)

गम् + ित = गच् छित (परस्मैपदम्)

सम् + गच्छित = सङ् गच् छते (आत्मने पदम्)

क्य यह ज़रूरी है: इसी नयम के कारण पाठ का शीषक-पद ‘संगच्छध्वम्’ बना है, ‘संगच्छत’ नह । य द उपसग न
होता तो लोट् मध्यमपुरुष बहुवचन का रूप ‘गच्छत’ होता — परस्मैपद का। ‘सम्’ जुड़ते ही आत्मनेपद का प्रत्यय
‘ध्वम्’ लगा और रूप बना ‘संगच्छध्वम्’।

प्र.2 गम्-धातोः लोट् -लकारस्य रूपा ण लखत। लोट् -लकारः केषु अथषु प्रयुज्यते ?

परस्मैपदम् (गम् — गच्छ् )

पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्

पथमपुरुषः ग छतु
च् ग छताम्
च् ग छ तु
च् न्

मध्यमपुरुषः गछ
च् ग छतम्
च् ग छत
च्

उत्तमपुरुषः ग छािन
च् ग छाव
च् ग छाम
च्

आत्मनेपदम् (सम् + गम्)

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम्
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पुरुषः एकवचनम् द्ववचनम् बहुवचनम्

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पथमपुरुषः च् च् च् न्

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g l a संग छ व संग छे थाम् संग छ वम्
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मध्यमपुरुषः च् स् च् च् ध्

उत्तमपुरुषः संग छै
च् संग छावहै
च् संग छामहै
च्

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लोट् -लकारस्य त्रयः प्रयोगाः —

1. आज्ञाथ — यथा : छात्राः ! यूयम् उ त्तष्ठत। यूg l a
a यम् उप वशत।
2. आमन्त्रणाथ — यथा : भवन्तः आगच्छन्तु। साध क्र डामः।

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3. आशीवादाथ — यथा : आयुष्मान् भव। वजयी भव। शवास्ते पन्थानः सन्तु।

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ध्यान रखने क बात: लोट् -लकार का अनुवाद हमेशा ‘आज्ञा’ नह होता। ‘आयुष्मान् भव’ म आदे श नह , आशीवाद

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है; ‘भवन्तः आगच्छन्तु’ म वनम्र नमन्त्रण है। वाक्य का सन्दभ दे खकर ही अथ तय कर।
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Tip: उत्तमपुरुष के रूप (गच्छा न, गच्छाव, गच्छाम) प्रायः ‘म जाऊँ ?’, ‘हम दोन चल’, ‘हम सब चल’ जैसे प्रस्ताव

m.co
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के अथ म आते ह — इसी से अभ्यास प्रश्न ६ के (घ) और (ङ) हल ह गे।

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प्र.3 अस्मद्-युष्मद्-शब्दयोः केषु वभ क्तषु वैक ल्पकरूपा ण भव न्त ? उदाहरणैः स्प ीकुरुत।

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se -युष्मद्-शब्दयोः द्वतीया-चतुथ -षष्ठी- वभ क्तषु वैक ल्पकरूपा ण भव न्त। ( हन्द — ‘अस्मद्’ (म/हम) तथा ‘युष्मद्’

g l aअस्मद्
a (तुम) शब्द के द्वतीया, चतुथ और षष्ठी वभ क्त म दो-दो रूप — पूण रूप तथा लघु वैक ल्पक रूप — चलते ह।)

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com g l a
वभ क्तः अस्मद् — पूणरूपम्
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अस्मद् — वैक ल्पकरूपम्

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शा ध माम् त्वांlप्रपन्नम्
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ि तीया शािध मा वा पपन्नम्।
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दे िह मे वरदे वरम्।
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चतुथ दे ह म ं वरदे वरम्।

वमेव सव ं मे दे वदे व।em . c o
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षष्ठी त्वमेव सव मम दे वदे व।
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g l as वभ क्तः युष्मद् — पूणरूपम् युष्मद् — वैक ल्पकरूपम्

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अहं वा मो िय यािम।
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ि तीया अहं त्वां मोक्ष यष्या म।

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चतुथ
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नमः तुभ्यम् (नमस्तुभ्यम्)।co नमः ते (नम ते)। स्
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षष्ठी शष्यः तव अहम्। ष्

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Page 11

कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् AglaSem · NCERT Solutions

पाठ से जो ड़ए: मन्त्र म बार-बार आया ‘वः’ इसी ‘युष्मद्’ का वैक ल्पक रूप है — ‘सं वो मनां स’, ‘समानी व
आकू तः’ म इसका अथ ‘युष्माकम्’ (तुम्हारा) है, और ‘वः ह वषा जुहो म’ म ‘युष्मभ्यम्’ (तुम्हारे लए)।

नयम: ये वैक ल्पक (लघु) रूप वाक्य के आरम्भ म कभी नह आते — इसी लए ‘मे वरदे वरं दे ह’ लखना ठ क
नह ; ‘दे ह मे वरदे वरम्’ ठ क है।

अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 7
प्रश्न १ — संज्ञानसूक्तं सस्वरं पठत स्मरत लखत च

अभ्यासात् जायते स ः

प्र.1 संज्ञानसूक्तं सस्वरं पठत स्मरत लखत च।

यह वाचन-कण्ठ ीकरण का अभ्यास है — तीन मन्त्र को सस्वर (स्वर स हत) पढ़ना, याद करना और शुद्ध लखना है। नीचे तीन
मन्त्र दए ह; इन्ह ही दोहराएँ।

ॐ

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांिस जानताम्।

दे वा भागं यथा पूव संजानाना उपासते ॥ १॥

समानो मन्त्रः सिमितः समानी समानं मनः सह िचत्तमेषाम्।

समानं मन्त्रमिभमन्त्रये वः समाने न वो हिवषा जुहोिम॥ २॥

समानी व आकू ितः समाना हृदयािन वः।

समानमस्त ु वो मनो यथा वः सुसहासित॥ ३॥

सस्वर पाठ कैसे कर —

1. पहले पूरा मन्त्र पद-पद करके शुद्ध बोल : सं-गच्छ-ध्वम् / सं-वद-ध्वम् / सं वो म-नां- स जा-न-ताम्।
2. फर पूरी पं क्त एक साँस म, समवेतस्वरेण (सब मलकर एक स्वर म) बोल — मन्त्र का यही ढं ग पाठ म बताया गया है।
3. प्रत्येक पं क्त के अन्त म ‘।’ पर थोड़ा रुक, ‘॥’ पर पूरा रुक।
4. लखते समय ध्यान रख — मनां स (अनुस्वार), संजानाना, चत्तमेषाम्, सुसहास त — ये चार शब्द सबसे अ धक अशुद्ध लखे
जाते ह।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् AglaSem · NCERT Solutions

कण्ठस्थ करने क यु क्त: तीन मन्त्र म ‘सम्/समान’ बार-बार लौटता है — संगच्छध्वं, संवदध्वं, समानो मन्त्रः,
समानी स म तः, समानी आकू तः, समानम् अस्तु। इसी शब्द को सूत्र मानकर याद कर, पूरा सूक्त जल्द बैठ
जाएगा।

अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 7
प्रश्न २ — अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखत

अभ्यासात् जायते स ः

प्र.2 (क) सवषां मनः क दृशं भवेत् ?

सवषां मनः समानं सामञ्जस्ययुतम् एकरूपं च भवेत्। ( हन्द — सबका मन समान, सामञ्जस्ययुक्त तथा एकरूप होना
चा हए।)

आधार-मन्त्रः: “समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहास त॥३॥” — तुम्हारा मन समान हो, जससे तुम्हारा संघटन
सुन्दर बने। दूसरे मन्त्र म भी यही कहा है — “समानं मनः सह चत्तमेषाम्।”

ाकरण-सङ् केत: ‘क दृशं’ नपुंसक लङ्ग, प्रथमा, एकवचन है (क्य क ‘मनः’ नपुंसक लङ्ग एकवचन है), अतः उत्तर
भी समानम् — नपुंसक लङ्ग एकवचन म ही होगा, ‘समानाः’ नह ।

प्र.2 (ख) सङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य कः अ भप्रायः ?

‘सङ्गच्छध्वं संवदध्वम्’ इत्यस्य अ भप्रायः अ स्त — यूयं सव म लत्वा अग्रे गच्छत, संभूय अभ्युदयं साधयत, परस्परं सम्यक्
वचार व नमयं कुवन्तः एकस्वरेण वदत च। ( हन्द — इसका अ भप्राय है — तुम सब मलकर आगे बढ़ो, साथ मलकर उन्न त
करो, और आपस म भली-भाँ त वचार का आदान-प्रदान करते हुए एक स्वर म बोलो।)

पदम् अ भप्रायः

सङ् गच्छध्वम् पिरवारे , गणे, समाजे, रा े, िव वे च िमिल वा अगे ग छत — साथ चलो
श् त् च्

संवदध्वम् पर परं िवचारिविनमयं कृ वा एक वरे ण वदत — एक वर में बोलो
स् त् स् स्

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गहराई म: ‘संवदध्वम्’ का अथ केवल ‘एक-सा बोलना’ नह है। ‘सं + वद्’ का भाव है — संवाद, अथात् पहले एक-
दूसरे को सुनना, फर सहम त बनाना, तब एक स्वर म बोलना। बना संवाद के बनी एकरूपता ऊपर-ऊपर क होती
है; इसी लए ऋ ष पहले संवाद माँगता है।

प्र.2 (ग) सव क प रत्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः ?

सव वैमनस्यं (मनोभेदं द्वे षभावं च) प रत्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः। ( हन्द — सब लोग वैमनस्य अथात् मनोभेद और द्वे षभाव
को छोड़कर एकता के भाव से जएँ।)

आधारवाक्यम्: पाठ म स्पष्ट कहा है — “इ ं यूयं सव वैमनस्यं प रत्यज्य ऐक्यभावेन जीवत, तथा सव
अभीष्टफला न च प्रा ुत।” चत्र-संवाद म भी हार का कारण यही ‘मनोभेदः द्वे षभावः च’ बताया गया था — अथात्
पाठ का आरम्भ और मन्त्र का सन्दे श, दोन एक ही बात कहते ह।

ाकरण-सङ् केत: ‘प रत्यज्य’ ल्यबन्त (पूवका लक) रूप है — ‘छोड़कर’। इसके साथ जो छोड़ा जाता है, वह
द्वतीया वभ क्त म आता है, इसी लए वैमनस्यम् ( द्वतीया एकवचन)।

प्र.2 (घ) अ स्मन् पाठे का प्रेरणा अ स्त ?

अ स्मन् पाठे सङ् घ टतरूपेण सहजीवनस्य कृते प्रेरणा अ स्त। ( हन्द — इस पाठ म संग ठत रूप से मल-जुलकर जीने क
प्रेरणा है।)

आधारवाक्यम्: “एतैः मन्त्रैः सङ् घ टतरूपेण सहजीवनस्य कृते प्रेरणा लभ्यते। एतेन स्वजीवने लोके च प्रसन्नता,
सौमनस्यम्, उत्साहः, आयुः, आरोग्यं, वजयः, समृ द्धः, धमः, ज्ञानप्रा प्तः, आत्मतृ प्तः च भव त।”

पाठस्य सन्दे शः —

१. िमिलत्वा कम कु रुत (संगच्छध्वम्)

२. संवादे न एकस्वरेण वदत (संवदध्वम्)

३. परस्परं मनोभावान् जानीत (मनांिस जानताम्)

४. समानः सङ् कल्पः, समानं हृदयं, समानं मनः (आकू ितः, हृदयािन, मनः)

= सङ् घटनम् एव अभ्युद यस्य मूलम्

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Tip: यह प्रश्न बार-बार पूछा जाता है। उत्तर म एक वाक्य ‘सङ् घ टतरूपेण सहजीवनस्य प्रेरणा’ अवश्य लख, फर
एक-दो पं क्त म यह जोड़ क इससे प रवार, समाज तथा राष्ट्र म सुख, शा न्त और मैत्रीभाव वराजते ह।

अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 7
प्रश्न ३ — रेखाङ् कतपदा न आधृत्य प्रश्न नमाणं कुरुत

अभ्यासात् जायते स ः

प्र.3 (क) परमेश्वरः सवत्र ाप्तः अ स्त।

कः सवत्र ाप्तः अ स्त ? ( हन्द — सवत्र कौन व्याप्त है ?)

कैसे बना: रेखाङ् कत पद परमेश्वरः पुं ल्लङ्ग, प्रथमा वभ क्त, एकवचन है और वाक्य का कता है। कता
(प्रा णवाचक, पुं ल्लङ्ग, प्रथमा एकवचन) के लए प्रश्नवाचक शब्द कः होता है — इस लए ‘परमेश्वरः’ के ान पर
‘कः’ रखकर वाक्य वैसा ही रहने दया।

प्र.3 (ख) वयम् ईश्वरं नमामः।

वयं कं नमामः ? ( हन्द — हम कसको नमन करते ह ?)

कैसे बना: ईश्वरम् यहाँ कम है — पुं ल्लङ्ग, द्वतीया वभ क्त, एकवचन। पुं ल्लङ्ग द्वतीया एकवचन का प्रश्नवाचक
रूप कम् है, अतः ‘ईश्वरं’ के ान पर ‘कं’ आया।

ध्यान द: ‘नम्’ धातु के साथ प्रायः चतुथ भी आती है (नमः शवाय), कन्तु इस वाक्य म ‘नमामः’ के साथ द्वतीया
प्रयुक्त है — इस लए प्रश्न भी द्वतीया म ‘कं’ ही बनेगा।

प्र.3 (ग) वयम् ऐक्यभावेन जीवामः।

वयं केन भावेन जीवामः ? ( हन्द — हम कस भाव से जीते ह ?)
अथवा — वयं कथं जीवामः ? (हम कैसे जीते ह ?)

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम्
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कैसे बना: ऐक्यभावेन पुं ल्लङ्ग, तृतीया वभ क्त, एकवचन है और यहाँ ‘जीने का ढं ग’ बताता है। तृतीया एकवचन
mदोन उत्तर
का प्रश्नवाचक रूप केन है, इस लए ‘केन भावेन’। ढं ग पूछने के लए अव्यय ‘कथम्’ भी चलता हैe—
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cरेoखाङ् कत पद क वभ क्त सुर क्षत रखने वाला उत्तर ‘केन भावेन’ अ धक a
glठ क है।
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ईश्वरस्य प्राथनया शा न्तः प्राप्यते।
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प्र.3 (घ)

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कस्य प्राथनया शा न्तः प्राप्यते ? ( हन्द — कसक प्राथना से शा न्त प्राप्त होती है ?)

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m a s em षष्ठी एकवचन का
कैसे बना: ईश्वरस्य पुं ल्लङ्ग, षष्ठी वभ क्त, एकवचन है (सम्बन्ध बताता है — कसक प्राथना)।
प्रश्नवाचकco
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रूप कस्य है।

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सावधानी: इस वाक्य म ‘प्राथनया’ (तृतीया) भी है, पर रेखा ‘ईश्वरस्य’ के नीचे है — इस लए प्रश्न ‘कया’ नह ,

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‘कस्य’ बनेगा। रेखाङ् कत पद ही प्रश्न का लक्ष्य होता है।

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प्र.3 (ङ) अहं समाजाय श्रमं करो म।

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अहं कस्मै करो म ? ( हन्द — म कसके लए प रश्रम करता/करती ँ ?)

a gla कैसे बना: समाजाय पुं ल्लङ्ग, चतुथ वभ क्त, एकवचन है और ‘प्रयोजन’ ( कसके लए) बताता है। चतुथ

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एकवचन का प्रश्नवाचक रूप कस्मै है।
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Tip: चतुथ का चह्न ‘के लए’ है — जहाँ हन्द म ‘के लए’ आए, वहाँ संस्कृत म चतुथ और प्रश्न म ‘कस्मै’
समझ।

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. co(च)m अयं पाठः ऋग्वेदात् सङ् क लतः। a g l
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प्र.3

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अयं पाठः कस्मात् सङ् क लतः ? ( हन्द — यह पाठ कससे संक लत है ?)

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कैसे बना: ऋग्वेदात् पुं ल्लङ्ग, पञ्चमी वभ क्त, एकवचन है — यह ‘अपादान’ है, अथात् जहाँ से पाठ लया गया।
पञ्चमी एकवचन का प्रश्नवाचक रूप कस्मात् है।

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जोड़कर दे खए: चत्र-संवाद म छात्र ने भी यही रूप पूछा था — “कस्मात् वेदात् गृहीतः एष सन्दे शः ?” — वही
वभ क्त यहाँ अभ्यास म लौट है।

प्र.3 (छ) वेदस्य अपरं नाम श्रु तः।

कस्य अपरं नाम श्रु तः ? ( हन्द — कसका दूसरा नाम श्रु त है ?)

कैसे बना: वेदस्य पुं ल्लङ्ग, षष्ठी वभ क्त, एकवचन है, इस लए प्रश्नवाचक रूप कस्य।

Did you know? वेद को ‘श्रु त’ इस लए कहते ह क्य क वह गुरु-मुख से सुनकर ही शष्य-परम्परा म सुर क्षत
रहा — लखकर नह , सुनकर। इसी कारण उसका पाठ सस्वर और शुद्ध उ ारण के साथ करना आवश्यक माना
गया।

प्र.3 (ज) मन्त्राः वेदेषु भव न्त।

मन्त्राः केषु भव न्त ? ( हन्द — मन्त्र कनम होते ह ?)
अथवा — मन्त्राः कुत्र भव न्त ? (मन्त्र कहाँ होते ह ?)

कैसे बना: वेदेषु पुं ल्लङ्ग, सप्तमी वभ क्त, बहुवचन है (अ धकरण — ‘म’)। सप्तमी बहुवचन का प्रश्नवाचक रूप
केषु है। ान पूछने के लए अव्यय ‘कुत्र’ भी लख सकते ह, पर वभ क्त और वचन दोन बनाए रखने वाला उत्तर
‘केषु’ ही श्रेष्ठ है।

अभ्यास का सार: प्रश्न नमाण का नयम एक ही है — रेखाङ् कत पद क वभ क्त, लङ्ग और वचन दे खो, फर
‘ कम्’ शब्द का उसी वभ क्त- लङ्ग-वचन वाला रूप रखो; शेष वाक्य ज्य का त्य रहेगा और अन्त म ‘?’ लगेगा।

अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 8

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प्रश्न ४ — प कातः शब्दान् चत्वा अधो ल खतेषु मन्त्रेषु रक्तस्थाना न पूरयत

अभ्यासात् जायते स ः

प्र.4 (क) सङ्गच्छध्वं ………… सं वो ………… जानताम्। दे वा ………… यथा पूव सं………… उपासते। [प का —
संवदध्वं, स म तः, आकू तः, भागं, मनः, हृदया न, जानाना, समानं, मनो, ह वषा, सुसहास त, मनां स]

पूण मन्त्रः —

सङ् गच्छध्वं संवद ध्वं सं वो मनािं स जानताम्।

दे वा भागं यथा पूव संजानाना उपासते ॥ १॥

रक्तस्थानम् पू रतं पदम् अथः

पथमम् संवद वंध् एकस्वरेण वदत — एक स्वर म बोलो

ि तीयम् मनांिस चत्ता न — मन (नपुंसक लङ्ग, बहुवचन)

ततृ ीयम् भागं स्वं स्वं कतव्यम् — अपना हस्सा

चतुथम् जानाना ‘सं’ + जानाना = संजानानाः — एकमत होकर

कैसे पहचान: ‘सङ्गच्छध्वं’ के बाद वही रूप चा हए जो उसी लय और उसी लोट् -आत्मनेपद रूप म हो — इसी लए
संवदध्वं। ‘सं वो …… जानताम्’ म क्रया ‘जानताम्’ बहुवचन है, अतः कम भी बहुवचन मनां स ही होगा, ‘मनः’
नह । अ न्तम रक्त ान से पहले ‘सं’ छपा है, इस लए वहाँ केवल जानाना बैठेगा — ‘संजानाना’ पूरा नह ।

प्र.4 (ख) समानो मन्त्रः ………… समानी समानं ………… सह चत्तमेषाम्। ………… मन्त्रम भमन्त्रये वः समानेन वो
………… जुहो म।

पूण मन्त्रः —

समानो मन्त्रः सिमितः समानी समानं मनः सह िचत्तमेषाम्।

समानं मन्त्रमिभमन्त्रये वः समाने न वो हिवषा जुहोिम॥ २॥

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रक्तस्थानम् पू रतं पदम् अथः

पथमम् सिमितः समाना प्रा प्तः / लक्ष्य स द्धः

ि तीयम् मनः चत्तम् — मन

ततृ ीयम् समानं एकरूपम् — समान (यहाँ ‘मन्त्रम्’ का वशेषण)

चतुथम् हिवषा प्राथनापूवकेण समपणेन

कैसे पहचान: ‘समानी’ स्त्री लङ्ग वशेषण है, इस लए उसके साथ स्त्री लङ्ग संज्ञा स म तः ही आएगी। ‘समानं ……
सह चत्तम्’ म ‘समानं’ नपुंसक लङ्ग है, अतः मनः (नपुंसक लङ्ग एकवचन)। ‘…… मन्त्रम् अ भमन्त्रये’ म मन्त्रम्
द्वतीया एकवचन है, इस लए उसका वशेषण भी द्वतीया एकवचन समानम् (समानं)। अन्त म ‘जुहो म’ (हवन
करता ँ) के साथ करण म ह वषा ही बैठेगा।

प्र.4 (ग) समानी व ………… समाना ………… वः। समानमस्तु वो ………… यथा वः …………।

पूण मन्त्रः —

समानी व आ कू ितः समाना हृद यािन वः।

समानमस्त ु वो मनो यथा वः स ुसहासित ॥ ३॥

रक्तस्थानम् पू रतं पदम् अथः

पथमम् आकू ितः सङ् कल्पः — संकल्प (स्त्री लङ्ग)

ि तीयम् हृ दयािन अन्तःकरणा न — हृदय (नपुंसक लङ्ग बहुवचन)

ततृ ीयम् मनो मनः (स न्ध से ‘मनो’) — मन

चतुथम् सुसहासित सुसंघ टतः भवेत् — भली-भाँ त संग ठत हो

कैसे पहचान: ‘समानी’ स्त्री लङ्ग है → आकू तः (स्त्री लङ्ग)। ‘समाना’ के साथ नपुंसक लङ्ग बहुवचन → हृदया न।
‘समानम् अस्तु वो ……’ म ‘समानम्’ नपुंसक लङ्ग एकवचन है, अतः मनः; कन्तु आगे ‘यथा’ का ‘य’ आने से
वसग-स न्ध होकर वह ‘मनो’ लखा जाता है — प का म यही रूप दया गया है। अ न्तम ान पर क्रया चा हए,
इस लए सुसहास त।

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Check it yourself: प का म १२ शब्द थे और रक्त ान भी १२ ही ह — य द आपने सही भरा है, तो प का
का कोई शब्द बचना नह चा हए और कोई दुबारा नह आना चा हए।

अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 8
प्रश्न ५ — पाठे प्रयुक्तान् शब्दान् भावानुसारं परस्परं योजयत

अभ्यासात् जायते स ः

प्र.5 पाठे प्रयुक्तान् शब्दान् भावानुसारं परस्परं योजयत — (क) संगच्छध्वम् (ख) संवदध्वम् (ग) मनः (घ) उपासते (ङ)
वसू न (च) वश्वा न (छ) आकू तः | [सेवन्ते, चत्तम्, म लत्वा चलत, सङ् कल्पः, समस्ता न, एकस्वरेण वदत,
धना न]

शु ं मेलनम् —

क्रमः शब्दः भावानुसा र पदम् हन्द अथ

(क) संग च्छध्वम् िमिल वा चलत
त् मलकर चलो

(ख) संवदध्वम् एक वरे ण वदत
स् एक स्वर म बोलो

(ग) मनः िच म्
त्त मन, अन्तःकरण

(घ) उपासते से व ते
न् श्रद्धापूवक कतव्य नभाते ह

(ङ) वसूिन धनािन धन, सम्प त्तयाँ

(च) िवश्वािन सम तािन
स् सारे, सब

(छ) आकू ितः सङ् क पः ल् संकल्प, इरादा

मलान का तक: तीन जोड़े लोट् -लकार क क्रयाएँ ह — ‘संगच्छध्वम्’ और ‘ म लत्वा चलत’, ‘संवदध्वम्’ और
‘एकस्वरेण वदत’, ‘उपासते’ और ‘सेवन्ते’ (दोन आत्मनेपद, प्रथमपुरुष बहुवचन)। शेष चार संज्ञाएँ ह और लङ्ग-
वचन से पहचानी जाती ह — ‘मनः’ तथा ‘ चत्तम्’ दोन नपुंसक लङ्ग एकवचन; ‘वसू न’ तथा ‘धना न’ दोन
नपुंसक लङ्ग बहुवचन; ‘ वश्वा न’ तथा ‘समस्ता न’ दोन नपुंसक लङ्ग बहुवचन वशेषण; ‘आकू तः’ तथा ‘सङ् कल्पः’
दोन का अथ एक — इरादा।

ध्यान द: ‘वसू न’ तथा ‘ वश्वा न’ पाठ म छपे तीन मन्त्र म नह आते; ये संज्ञान-सूक्त (ऋ. १०.१९१) के प्रथम मन्त्र
— “संस मद्युवसे वृषन्नग्ने वश्वान्यय आ। इळस्पदे स मध्यसे स नो वसून्या भर॥” — के शब्द ह, जो सूक्त का ही
अंश है। अथ याद रख : वसू न = धना न, वश्वा न = समस्ता न।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम्
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अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 8
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प्रश्न ६ — उदाहरणानुसारेण लट् -लकारस्य वाक्या न लोट् -लकारेण प रवतयत
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अभ्यासात् जायते स

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यथा — बा लकाः नृत्य न्त → बा लकाः नृत्यन्तु।
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प्र.6 (यथा)

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यह पुस्तक का दया हुआ उदाहरण है। इसी ढं ग से आगे के वाक्य बदलने ह।

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बािलकाः न ृत् यि न्त (लट् -लकारः — नाचती है)ं
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em त् न् (लोट् -लकारः — नाचे ं / नाचनी चािहए)
↓

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a gl बािलकाः नृ य त ु

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बदलने का नयम: कता का रूप नह बदलता — केवल क्रया लट् से लोट् म जाती है। इसके लए क्रया का पुरुष
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l का प्रथमपुरुष बहुवचन नृत्यन्तु आया।
(प्रथम / मध्यम / उत्तम) और वचन (एक / द्व / बहु) पहचा नए, फर उसी खाने का लोट् -रूप र खए। यहाँ
agलोट्
‘नृत्य न्त’ प्रथमपुरुष बहुवचन है, अतः

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पुरुषः लट् (एक/ द्व/बहु) लोट् (एक/ द्व/बहु)

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m la / पठ तु
पठतुa/gपठताम्
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पथमपुरुषः पठ त / पठतः / पठ न्त न्

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a gl मध्यमपुरुषः पठ स / पठथः / पठथ पठ / पठतम् / पठत
पठािन / पठाव / पठाम
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उत्तमपुरुषः पठा म / पठावः / पठामः

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बालकाः हस न्त
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प्र.6 (क)

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comहसन्तु। ( हन्द — बालक हँस।)
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बालकाः
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क्य : ‘हस न्त’ लट् -लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन है। लोट् म प्रथमपुरुष बहुवचन का प्रत्यय ‘अन्तु’ है, अतः हस् +
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अन्तु = हसन्तु।

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प्र.6 (ख) युवां तत्र गच्छथः

युवां तत्र गच्छतम्। ( हन्द — तुम दोन वहाँ जाओ।)

क्य : ‘युवाम्’ (तुम दोन ) के साथ क्रया मध्यमपुरुष, द्ववचन म है — लट् म ‘गच्छथः’। लोट् के मध्यमपुरुष द्ववचन
का रूप गच्छतम् है (पृष्ठ ६ क परस्मैपद-ता लका दे खए)।

सावधानी: ‘गच्छताम्’ मत ल खए — वह प्रथमपुरुष द्ववचन (वे दोन जाएँ) है। ‘गच्छतम्’ और ‘गच्छताम्’ का
अन्तर केवल एक मात्रा का है, पर अथ पूरा बदल जाता है।

प्र.6 (ग) यूयं धावथ

यूयं धावत। ( हन्द — तुम सब दौड़ो।)

क्य : ‘यूयम्’ (तुम सब) के साथ क्रया मध्यमपुरुष, बहुवचन म है। लट् का रूप ‘धावथ’ है और लोट् का रूप धावत
— केवल ‘थ’ के ान पर ‘त’।

Tip: मध्यमपुरुष बहुवचन म लट् और लोट् बहुत मलते-जुलते दखते ह (पठथ → पठत, धावथ → धावत)। ‘थ’
दे खते ही समझ ली जए क वह लट् है।

प्र.6 (घ) आवां लखावः

आवां लखाव। ( हन्द — हम दोन लख।)

क्य : ‘आवाम्’ (हम दोन ) के साथ क्रया उत्तमपुरुष, द्ववचन म है। लट् का रूप ‘ लखावः’ है; लोट् म वसग हट
जाता है और रूप बनता है लखाव।

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प्र.6 (ङ) वयं पठामः

वयं पठाम। ( हन्द — हम सब पढ़।)

क्य : ‘वयम्’ (हम सब) के साथ क्रया उत्तमपुरुष, बहुवचन म है। लट् ‘पठामः’ → लोट् पठाम — यहाँ भी केवल
वसग हटा है।

अथ का भेद: उत्तमपुरुष के लोट् -रूप आज्ञा नह , प्रस्ताव दे ते ह — ‘पठाम’ का अथ ‘हम पढ़’ / ‘चलो पढ़’ है। इसी
भाव म पाठ म आया है — “आगच्छन्तु, वयम् अस्य सूक्तस्य प्र सद्धान् त्रीन् मन्त्रान् पठामः।”

योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 9
वै दक वाङ्मयस्य प रचयः तथा ऋग्वेदस्य वभाजनम्

योग्यता वस्तरः

प्र.1 वेदाः, ाह्मणा न, उप नषदः, उपवेदाः, वेदोपाङ्गा न / षड् -दशना न, वेदाङ्गा न च का न स न्त ?

पुस्तक इस ान पर वै दक वाङ्मय का पूरा न ा एक साथ दे ती है। इसे ता लका के रूप म याद रखना सरल है।

क्रमः वगः नामा न सङ् ख्या

१ वेद ाः ऋ वेदः, यजुवदः, सामवेदः, अथववेदः
ग् ४

२ बाह्मणािन ऐतरे यः, शतपथः, सामिवधानं, गोपथः, इ यादयः त् अनेका न

३ उपिनषदः (पिस ाः) ईशः, के न, कठः, प नः, मु डकः, मा डू यः, ऐतरे यः, तैि रीयः, छा दो यः, बहृ दार यकः,
श् ण् ण् क् त्त न् ग् ण् १०
इ यादयः
त् प्र सद्धाः

४ उपवेद ाः आयुवदः, धनुवदः, गा धववेदः, अथवेदः / थाप यवेदः
न् स् त् ४

५ वेद ोपाङ् गािन / षड् - यायः, वैशेिषकं , साङ् यं, योगः, पूव-मीमांसा, उ र-मीमांसा (वेदा तः)
न् ख् त्त न् ६
दशनािन

६ वेद ाङ् गािन िश ा, याकरणं, छ दः, िन तं, योितषं, क पः
क्ष व् न् रुक् ज् ल् ६

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम् AglaSem · NCERT Solutions

इन्ह कैसे जोड़कर दे ख: चार वेद मूल सं हता ह। ब्राह्मण ग्रन्थ बताते ह क यज्ञ-कम कैसे कया जाए; उप नषद्
बताते ह क उसके पीछे का तत्त्वज्ञान क्या है। उपवेद जीवन के व्यावहा रक शास्त्र ह — च कत्सा (आयुवद), युद्ध
(धनुवद), सङ्ग त-कला (गान्धववेद) तथा वास्तु- शल्प ( ापत्यवेद)। वेदाङ्ग वेद को शुद्ध पढ़ने और समझने के छह
साधन ह, और षड् -दशन उसी ज्ञान क छह वचारधाराएँ।

याद रखने क यु क्त: छह वेदाङ्ग को शरीर से जोड़कर याद करते ह — शक्षा = ना सका (उ ारण), व्याकरण =
मुख, नरुक्त = श्रोत्र, छन्द = चरण, कल्प = हस्त, ज्यो तष = नेत्र। इसी क्रम म सूची दोहराएँ, भूलगे नह ।

प्र.2 ऋग्वेदस्य वभाजनं कथं भव त ? अस्य पाठस्य आधारः कः ?

ऋग्वेदे मन्त्राणां सङ् ख्या — दश सह ा ण, पञ्च शता न, द्वपञ्चाशत् च (१०,५५२) मन्त्राः स न्त। अस्य ग्रन्थस्य वभजनं
द्वधा भव त। ( हन्द — ऋग्वेद म १०,५५२ मन्त्र ह और इस ग्रन्थ का वभाजन दो प्रकार से होता है।)

क्रमः वभाजनम् ववरणम्

१ मण्डलक्रमः १० म डलािन, ८५ अनुवाकाः, १,०२८ सू तािन
ण् क्

२ अष्टकक्रमः ८ अ टकाः, प य टकम् ८ अ यायाः, आह य ६४ अ यायाः
ष् त् ष् ध् त् ध्

अष्टकक्रमे अध्यायानां गणना —

८ अष्टकाः × ८ अध्यायाः पत्यष्टकम्

= ६४ अध्यायाः

अस्य पाठस्य आधारः — ऋग्वेदस्य अ न्तमस्य दशम-मण्डलस्य अ न्तमम् एकशता धक-एकनव ततमं (१०.१९१) सूक्तम् अ स्त,
यत् ‘संज्ञान-सूक्तम्’, ‘संघटन-सूक्तम्’ वे त नामभ्यां प्र सद्धम् अ स्त। ( हन्द — यह पाठ ऋग्वेद के अ न्तम अथात् दसव मण्डल के
अ न्तम, १९१व सूक्त पर आधा रत है, जो ‘संज्ञान-सूक्त’ तथा ‘संघटन-सूक्त’ — दोन नाम से प्र सद्ध है।)

यह सूक्त अन्त म क्य ? ऋग्वेद का समापन इसी एकता के सन्दे श से होता है — मानो पूरा वेद अन्त म यही कहना
चाहता हो क जो कुछ पढ़ा-सुना, उसका सार ‘ मलकर चलो, एक स्वर म बोलो, एक मन हो’ ही है। इसी लए इसका
नाम ‘संज्ञान’ (सम्यक् ज्ञान / एकमत होना) और ‘संघटन’ (संग ठत होना) दोन पड़ा।

Did you know? ‘एकशता धक-एकनव ततमम्’ का अथ है ‘एक सौ के ऊपर इक्यानवेवाँ’ अथात् १९१वाँ —
संस्कृत म बड़ी संख्याओं के क्रमवाचक इसी प्रकार जोड़कर बनाए जाते ह।

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प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 9
क्रयात्मक काय — भावाथ-चचा, ऋग्वेदस्य सूक्तनामा न, एकतायाः उपायाः

प रयोजनाकायम्

प्र.1 अस्य सूक्तस्य भावाथ मत्रैः सह मातृभाषया चचयत।

यह चचा-काय है — मत्र के साथ अपनी मातृभाषा म बैठकर सूक्त का भाव समझना। शक्षक इसे कक्षा म समूह-चचा के रूप म
कराएँगे।
चचा कैसे कर ( व ध) —

1. चार-पाँच के समूह बनाइए। हर समूह एक मन्त्र लेकर पहले उसका शब्दाथ (पृष्ठ ५ क ता लका से) पढ़े ।
2. फर हर सदस्य अपनी भाषा म एक वाक्य कहे क उस मन्त्र से उसे क्या समझ आया।
3. अन्त म समूह मलकर तीन वाक्य लखे — मन्त्र क्या कहता है, आज के जीवन म उसका उदाहरण क्या है, और उसे कक्षा म
कैसे उतारा जाए।

अच्छ चचा म ये बात अवश्य आएँ —

तीन मन्त्र का क्रम — कम क एकता → वचार क एकता → भाव क एकता।
दे व का उदाहरण — अ ग्न, वायु, सूय अपना-अपना कतव्य बना झगड़े नभाते ह।
एकता का लाभ — प्रसन्नता, सौमनस्य, उत्साह, आरोग्य, वजय, समृ द्ध।

नमूना उत्तर ( हन्द म चचा का सार): “इस सूक्त का भाव यह है क कसी भी समूह क श क्त उसक संख्या म
नह , उसके तालमेल म है। हमारे वद्यालय के दल ने फुटबॉल इसी लए जीती क्य क खला ड़य म सामञ्जस्य था।
जब हम मलकर चलते ह, एक-दूसरे को सुनकर बोलते ह और मन म भेद नह रखते, तब घर, कक्षा और गाँव —
तीन म शा न्त रहती है। मन्त्र कहता है क यही री त सृ ष्ट के आरम्भ से दे व क भी थी।” — इसी को अपनी
मातृभाषा म क हए।

प्र.2 संज्ञानसूक्तम् इव ऋग्वेदस्य पञ्चानां सूक्तानां नामा न लखत।

ऋग्वेदस्य पञ्च प्र स ा न सूक्ता न —

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 1 संगच्छध्वं संवदध्वम्
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क्रमः सूक्तस्य नाम स्थानम् (मण्डलम्·सूक्तम्) वषयः

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नासदीयसूक्तम् १०.१२९
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सृष्टेः उत्प त्त वषयकं चन्तनम् — सृ ष्ट से पहले क्या था ?

a s eपुmरुषसूक्तम्
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२ १०.९० वराट् पुरुषस्य वणनम्
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३ िहरण्यगभसूक्तम् १०.१२१ सृ ष्टकतुः हरण्यगभस्य स्तु तः

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४ वाक्सूक्तम् (दे वीसूक्तम्) १०.१२५
em . वाग्दे व्याः माहात्म्यम् ag
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५ नदीसूक्तम् १०.७५ agla सन्धु-आ द-नद नां स्तु तः

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( हन्द — ये पाँच सूक्त संज्ञान-सूक्त क ही तरह ऋग्वेद के प्र सद्ध सूक्त ह। ध्यान द जए क इनम से चार दसव मण्डल के ही ह

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— वही मण्डल जससे हमारा पाठ लया गया है।)
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a s emनाम भी लख सकते ह: अक्षसूक्तम् (१०.३४), उषस्सूक्तम् (१.११३), इन्द्रसूक्तम्, अरण्यानीसूक्तम्
अन्य

a gl (१०.१४६)। उत्तर म नाम के साथ मण्डल-सूक्त क संख्या भी लख — इससे उत्तर पूण माना जाता है।
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प्र.3 संज्ञानसूक्तस्य आधारेण भवत्सु एकतां स्थाप यतुं व वधान् उपायान् अध्यापकैः सह आलोचयत।
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यह शक्षक के साथ क जाने वाली आलोचना ( वचार- वमश) है — कक्षा म एकता कैसे बनाई जाए, इसके उपाय सोचने ह।

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अच्छे उत्तर म क्या हो — हर उपाय सूक्त के कसी मन्त्र से जुड़ा हो, और वह उपाय ऐसा हो जसे कक्षा सचमुच कर सके। नीचे

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ता लका इसी ढं ग से बनी है।

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मन्त्रस्य सन्दे शः क ायाम् उपायः

omwork) — प येक पिरयोजना चतुण ं छा ाणां समूहेन एव िक्रयताम्, येन सव l a se
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समूह-कायम् (group
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emभवेयःु ।
संग च्छध्वम् — िमलकर चलो त् त्र

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सहभािगनः
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संवदध्वम् — एक स्वर में बोलो agपlितिदनं पाथनासभायां समवेत वरे ण म पाठः; वादिववादे पथमं वणम्, ततः उ रम्।
स् न्त्र श्र त्त

m िलखतु, पठतु च।
िम -पिरचय-िदवसः’ — प येकः छा ः अ य य छा य िवषये प च वा oयािन
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मनांिस जानताम् — मन एक-दू स रे को ‘ त्र त् त्र न् स् त्रस् ञ् क्

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comसमानी — लक्ष्य समान हो
जाने ं

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ag— यथा ‘अ माकं क ा व छतमा भिव यित’।
m क ायाः एकं वािषकं ल यं िनि च य िभि प े िलखत
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क्ष क्ष् श् त् त्त त्र स् क्ष स् च् ष्

agl िववादे म य थता — यदा ौ छा ौ कलहं कु तः, तदा ततृ ीयः िम ं समाधानं कारयतु; ‘ यताम्’ इित
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समाना हृदयािन — हृदय एक हों ध् स् त्र रु त्र क्षम्

व तुं िश णम्।
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सु सह असित — संघ टन सुन्दर हो . co
क्रीडायां पितमासं दलपिरवतनम्, येन सवः सह क्रीिडतुं शक्यते, न च स्थाियणः गुटाः भवेयःु ।
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नमूना उत्तर (आलोचना का सार): “हमने अध्यापक जी के साथ मलकर तय कया क कक्षा म एकता के लए
तीन काम तुरन्त आरम्भ करगे — (१) हर सप्ताह समूह बदलकर काम करगे, जससे सब सबके साथ काम करना
सीख; (२) प्राथनासभा म सब मलकर संज्ञान-सूक्त का सस्वर पाठ करगे; (३) कक्षा के भ त्तपत्र पर ‘संगच्छध्वं
संवदध्वम्’ लखकर नीचे उस सप्ताह कसने कसक सहायता क , यह लखगे। एक मास बाद हम स्वयं दे खगे क
झगड़े घटे या नह ।”

यह काय क्य : सूक्त का सन्दे श केवल याद करने का नह , बरतने का है। जब तक एकता कक्षा के दै नक व्यवहार म
नह उतरती, मन्त्र केवल शब्द रह जाता है — यही बात आचाय ने चत्र-संवाद म क्र डोत्सव के उदाहरण से समझाई
थी।

अध्याय — एक नज़र म
पाठ का आरम्भ चत्र-संवाद से होता है — वद्यालय के क्र डोत्सव म पादकन्दुक-क्र डा (फुटबॉल) जीतने पर आचाय पूछते ह
क प्र तद्वन्द्व कैसे हारे। छात्र उत्तर दे ते ह — अपने दल म परस्पर सामञ्जस्य था, वपक्षी दल म मनोभेद और द्वे षभाव था, वे
एक-दूसरे का सहयोग नह करते थे।
आचाय नष्कष दे ते ह — वजय के लए म लत्वा कायकरणम्, एकता तथा परस्परं सामञ्जस्यम् आवश्यक है; और यही
सन्दे श वेद म ‘संगच्छध्वं संवदध्वम्’ के रूप म दया गया है।
पाठ के तीन मन्त्र ऋग्वेद के संज्ञान-सूक्त (१०.१९१) से लए गए ह। पहला मन्त्र कहता है — मलकर चलो, एक स्वर म
बोलो, तुम्हारे मन एक-दूसरे को जान; जैसे सृ ष्ट के आरम्भ म दे व (अ ग्न, वायु, आ दत्य आ द ब्रह्माण्डीय श क्तयाँ) अपना-
अपना भाग स्वीकार कर उत्कृष्ट समन्वय से कम करते थे।
दूसरा मन्त्र सामू हक कम का आधार बताता है — सबका मन्त्र ( चन्तन) समान हो, स म त (लक्ष्य स द्ध) समान हो, मन समान
हो, चत्त एक भूत हो। तीसरा मन्त्र कहता है — तुम्हारा सङ् कल्प (आकू तः) समान हो, हृदय सामरस्यपूण ह , मन एकरूप हो,
जससे तुम्हारा संघटन सुन्दर बने।
व्याकरण क दृ ष्ट से पाठ लोट् -लकार सखाता है — गम्-धातु के परस्मैपद (गच्छतु, गच्छ, गच्छा न…) तथा ‘सम्’ उपसग
लगने पर आत्मनेपद (संगच्छताम्, संगच्छध्वम्, संगच्छामहै…) रूप; साथ ही लोट् के तीन प्रयोग — आज्ञाथ, आमन्त्रणाथ,
आशीवादाथ।
अस्मद्-युष्मद् शब्द के द्वतीया, चतुथ तथा षष्ठी वभ क्तय म वैक ल्पक रूप (मा/मे/नौ/नः, त्वा/ते/वाम्/वः) भी इसी पाठ
म प र चत कराए गए ह।

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त्व रत पुनरावृ त्त

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH

संगच्छध्वम् िमिलत्वा गच्छत मलकर चलो May you walk together

संवदध्वम् एकस्वरे ण वदत सहम तपूवक बोल May you speak in one voice

समवेतस्वरेण सिम्मिलत-स्वरे ण स म्म लत ध्व न से By chanting in unison

मनां स िचत्तािन मन को Minds

जानताम् जानन्तु जान May you know

दे वाः बह्माण्डीय-शक्तयः / वैिश्वक-शक्तयः सृ ष्ट क मूलभूत श क्तयाँ Cosmic forces & celestial phenomena

संजानानाः एकमनसः भूत्वा एक वचार वाले होकर Being amicable

उपासते से वन्ते श्रद्धापूवक कतव्य- नवहण Devotedly performing

अभ्युदयम् अिभवृि ः लौ कक उन्न त Elevation and prosperity

मन्त्रः िवचारः चन्तन Contemplation

स म तः समाना पाि तः समान स द्ध Common resolutions

वः युष्मभ्यम् तुम्हारे For you

अ भमन्त्रये संस्कृ त्य पचारयािम अ भम न्त्रत करके प्रचा रत करता ँ (I) Consecrate and propagate

ह वषा पाथनापूवके ण समपणेन प्राथना पूवक यज्ञाहु त द्वारा By oblatory prayers

जुहो म ज्ञानकममयं यज्ञं साधयािम दव्य यज्ञ कम को साधता/ती ँ Performing Yajña & divine offerings

आकू तः सङ् कल्पः संकल्प Resolution

सु सह अस त सुस ंघ िटतः भवेत ् सुसंघ टत हो May you be united

सं हता मूल मन्त्रपाठः मूल वै दक मन्त्र पाठ Original Vedic text

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 8
TypeSolution
Pages27
Updated19 Sep 2026