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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा8
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 2: अल्पानाम प वस्तूनां संह तःः
कायसा धका
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
10 – 23 15 84 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 38 pages
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 8 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 2: अल्पानाम प वस्तूनां संह तः
कायसा धका
NCERT कक्षा 8 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के द्वतीयः पाठः — अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका के सम्पूण हल। यह पाठ दो
कथाओं को एक म परोता है — केदारक्षेत्र क यात्रा म वप त्त से घरे छात्र का संवाद, और उसी संवाद के भीतर सुनाई गई हतोपदे श क चत्रग्रीव-
कपोत- हरण्यक कथा। यहाँ अभ्यासात् जायते स द्धः के प्रश्न 1 से 8 तक का प्रत्येक उपभाग, वयं शब्दाथान् जानीमः, अत्र इदम् अवधेयम्
(ल्यप्-प्रत्ययः तथा वसगस न्धः), योग्यता वस्तरः और प रयोजनाकायम् — सब क्रमशः हल कया गया है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 8) 10 – 23
खं ड प्रश्न
15 84
माध्यम
हन्द
पाठ्य-प्रश्नाः (संवादः) — पृष्ठ 10–11
ीकेदारक्षेत्रे वपत्तौ मत्राणां नायकस्य च संवादः
सं वादः
प्र.1 दनेशः – (स वषादम्) अरे ातः ! क वद स ? अस्माकं मृत्युः एव स कटे अ स्त । एवं चेत् कथम् उपायः
चन्तनीयः ?
नायकस्य उत्तरम् — मत्र ! वषादं मा कुरु । यदा वृ ष्टः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भ वष्य त तदा वयं सम्भूय सेतुं, माग च नमाय
पुनः स्वलक्ष्यं प्र त ग मष्यामः ।
[ हन्द — दनेश नराशा म कहता है क मृत्यु ही पास खड़ी है, ऐसे म उपाय कैसे सोचा जाए? नायक उत्तर दे ता है — “ मत्र! वषाद
मत करो। जब वषा थम जाएगी और वातावरण साफ़ हो जाएगा, तब हम मलकर पुल और रास्ता बनाकर फर अपने लक्ष्य क ओर
बढ़गे।”]
ऐसा क्य : दनेश का प्रश्न वस्तुतः प्रश्न नह , हार है — वह मान चुका है क कुछ हो ही नह सकता। नायक उसे तक
से नह , क्रम से उत्तर दे ता है — पहले वृ ष्ट शान्त हो, फर वातावरण स्वच्छ हो, फर सम्भूय ( मलकर) नमाण हो।
संकट को टु कड़ म बाँट दे ना ही उसे साध्य बना दे ता है। यही पूरे पाठ का सूत्र है।
व्याकरणम्: ‘सम्भूय’ = सम् + भू + ल्यप् ( मलकर) तथा ‘ नमाय’ = नर् + मा + ल्यप् (बनाकर)। दोन अव्यय ह
और पूवका लक क्रया बताते ह — पहले मलना/बनाना, फर जाना।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 सुरेशः – एतस्यां तौ वयं कमेतत् अत्यन्तं दुःसाध्यम्, असम्भवं च काय कतु शक्नुमः ?
नायकस्य उत्तरम् — प्रय मत्रा ण ! वयम् आत्म वश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अ प काय सम्भूय अवश्यं साध यतुं शक्नुमः । तेन
अस्माकं लक्ष्यप्रा प्तः प्राणरक्षा चा प भ वष्य त ।
[ हन्द — सुरेश पूछता है — “इस स्थ त म क्या हम यह अत्यन्त क ठन और असम्भव काम कर सकते ह?” नायक कहता है —
“ प्रय मत्रो! हम आत्म व ास के बल से मलकर यह असम्भव काम भी अवश्य कर लगे। उससे हमारा लक्ष्य भी मलेगा और प्राण
भी बचगे।”]
ऐसा क्य : नायक दो शब्द जोड़ता है — आत्म व ासबलेन और सम्भूय। अकेला आत्म वश्वास ड ग है, अकेला
संगठन बना भरोसे के बखर जाता है; दोन मलकर ही ‘असम्भव’ को ‘दुःसाध्य’ भर बना दे ते ह। ध्यान द — नायक
यह नह कहता क काम आसान है, केवल यह कहता है क वह साध्य है।
शब्दाथः: दुःसाध्यम् = क ठनतया साधनीयम् (क ठनाई से होने वाला)। ‘साध यतुम्’ = साध् धातु का तुमुन्-
प्रत्ययान्त रूप ( सद्ध करने के लए)।
प्र.3 क पलः – कम् इदं सम्भव त ?
नायकस्य उत्तरम् — नूनं सम्भव त मत्र ! अ स्मन् प्रसङ्गे अहं हतोपदे शस्य एकां कथां श्रावया म ।
[ हन्द — क पल सन्दे ह करता है — “क्या यह सम्भव है?” नायक कहता है — “ नश्चय ही सम्भव है, मत्र! इसी प्रसंग म म तुम्ह
हतोपदे श क एक कथा सुनाता ँ।”]
ऐसा क्य : यह पाठ क रचना-कुशलता दखती है। नायक सन्दे ह का उत्तर उपदे श से नह , कथा से दे ता है। उपदे श
सुनकर मन तक करने लगता है, पर कथा सुनकर मन उदाहरण दे ख लेता है — और कपोत का उदाहरण ठ क उन्ह
क स्थ त का है : जाल म फँसे, संख्या म बहुत, अकेले कोई असमथ।
व्याकरणम्: ‘श्रावया म’ — श्रु धातु का णजन्त (प्रेरणाथक) रूप, लट् लकार, उत्तमपुरुष एकवचन — ‘म सुनाता
ँ’ (सुनने के लए प्रे रत करता ँ)। साधारण रूप ‘शृणो म’ का अथ होता ‘म सुनता ँ’।
प्र.4 सवऽ प – (उत्कण्ठया) का कथा ? वद मत्र ! वद ।
नायकस्य उत्तरम् — सावधानं शृण्वन्तु — इ त उक्त्वा सः हतोपदे शस्य ‘ मत्रलाभ’-प्रकरणस्य चत्रग्रीव-कपोत- हरण्यक-कथां
श्रावय त ।
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[ हन्द — सब उत्सुकता से पूछते ह — “कौन-सी कथा? कहो मत्र, कहो!” नायक कहता है — “ध्यान से सु नए” — और
हतोपदे श के ‘ मत्रलाभ’ प्रकरण क वह कथा सुनाता है जसम कपोतराज चत्रग्रीव, बहे लया और मूषकराज हरण्यक आते ह।]
ध्यातव्यम्: ‘शृण्वन्तु’ — श्रु धातु, लोट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन (आदराथ ‘सु नए’)। ‘सावधानम्’ यहाँ
क्रया वशेषण-रूप म प्रयुक्त द्वतीयान्त पद है।
स्मरणीयम्: पूरा पाठ इसी शैली म चलता है — बाहर क कथा (छात्र क यात्रा) के भीतर एक और कथा। संस्कृत म
इसे कथा के भीतर कथा (गभकथा) क परम्परा कहते ह, जो पञ्चतन्त्र और हतोपदे श क पहचान है।
पाठ्य-प्रश्नाः (कथा-भागः) — पृष्ठ 12–14
हतोपदे शस्य कपोत-कथा तथा तत्र प्रयुक्तौ द्वौ ोकौ
कथा
प्र.1 चत्रग्रीवः तण्डु लकणलु ान् कपोतान् अवदत् – “कुतोऽत्र नजने वने तण्डु लकणानां सम्भवः ? तद् नरूप्यताम् ।”
चत्रग्रीवस्य नष्कषः — क श्चद् व्याधोऽत्र भवेत् । सवथा अ वचा रतं कम न कतव्यम् ।
[ हन्द — चत्रग्रीव कहता है — “इस नजन वन म चावल के दाने भला कहाँ से आ सकते ह? इस पर वचार कया जाए। यहाँ कोई
बहे लया अवश्य होगा। बना सोचा हुआ काम कसी भी हाल म नह करना चा हए।”]
ऐसा क्य : चत्रग्रीव जाल नह दे खता — वह केवल एक असंग त दे खता है। नजन वन म चावल अपने-आप नह
आते; जहाँ बना कारण लाभ दखे वहाँ कारण छपा होता है। यही ‘ नरूप्यताम्’ (जाँचा जाए) का अथ है। बु द्धमत्ता
खतरे को दे ख लेना नह , खतरे का संकेत पढ़ लेना है।
व्याकरणम्: ‘ नरूप्यताम्’ तथा ‘ चन्त्यताम्’ — कमवाच्य, लोट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (‘जाँचा जाए’,
‘सोचा जाए’)। संस्कृत म उपदे श दे ते समय यह वनम्र प्रयोग बहुत आता है।
प्र.2 एतद्वचनं ुत्वा क श्चत् कपोतः सदपम् अवदत् – “आः कमथम् एवमुच्यते ?”
तस्य दपस्य फलम् — तस्य वचनं श्रुत्वा चत्रग्रीवस्य अव ां कृत्वा सव कपोताः भूमौ अवतीय तण्डु लकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः । अनन्तरं
ते सव तेन जालेन बद्धाः अभवन् ।
[ हन्द — एक कपोत घमण्ड से बोला — “अरे! ऐसा क्य कहा जा रहा है?” उसक बात मानकर और चत्रग्रीव क अव ा करके
सब कपोत भू म पर उतर आए और चावल खाने लगे। तुरन्त ही वे सब उस जाल म बँध गए।]
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ऐसा क्य : ध्यान द — कपोत ने तक का उत्तर तक से नह दया, दप से दया। यही पाठ क चेतावनी है : वप त्त
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लोभ से आती है, पर लोभ को रास्ता अहंकार दे ता है। और इसी लए बाद म चत्रग्रीव उसी दप कपोत
. o क तब वह भी वही गलती दोहरा रहा होता।
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नह करता —
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व्याकरणम्: ‘उच्यते’ — वच् धातु, कमवाच्य, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (‘कहा जाता है’)। ‘सदपम्’ = दपण
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सह — अव्ययीभाव-सदृश क्रया वशेषण।
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वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्यप ते । सवत्रैवं वचारे तु भोजनेऽप्यप्रवतनम्॥ १॥ — अस्य ोकस्य पदच्छे दं,
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प्र.3
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अन्वयम्, अथ भावं च लखत ।
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पदच्छे दः — वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् आपत्-काले ह उप स्थते । सवत्र एवम् वचारे तु भोजने अ प अप्रवतनम् ।
a अन्वयः — आपत्-काले ह उप स्थते वृद्धानाम् वचनम् ग्राह्यम् । तु सवत्र एवम् वचारे (स त) भोजने अ प अप्रवतनम् (भवेत्) ।
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अथः — आप त्त आने पर वृद्ध (अनुभवी जन ) का वचन मान लेना चा हए। कन्तु य द हर जगह इसी तरह (शंका करते हुए) वचार
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कया जाए तो भोजन म भी प्रवृ त्त नह हो सकेगी।
भावः — यह
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ोक कपोत क तक-सदृश कुतक है। वह कहता है — शंका करते जाओ तो खाना भी नह खाया जा सकता,
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क्य क उसम भी वष क शंका हो सकती है। बात सुनने म चतुर लगती है, पर उसम भेद यह छू ट जाता है क सामान्य सावधानी
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और नष्कारण भय एक वस्तु नह ह। चत्रग्रीव ने सब भोजन का नषेध नह कया था — केवल नजन वन म बना कारण मले
भोजन का नषेध कया था।
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ऐसा.cक्य समझ: कथा इसी कुतक का प रणाम तत्काल दखा दे ती है — अगले l a
gही वाक्य म सब जाल म बँध जाते
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aseह। हतोपदे श क शैली यही है : वह उपदे श नह दे ता, प रणाम दखा दे ता है।
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स न्धः: ग्राह्यम् + आपत्काले = ग्राह्यमापत्काले ; ह + उप स्थते = ह्यप ते (यण् स न्ध) ; सवत्र + एवम् =
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सवत्रैवम् (वृ द्ध स न्ध) ; भोजने + अ प + अप्रवतनम् = भोजनेऽप्यप्रवतनम् (पूवरूप + यण्)।
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अथ व्याधं नवृत्तं दृ ् वा कपोताः उक्तवन्तः – “स्वा मन् ! क मदान कतुम् उ चतम् ?”
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प्र.4
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चत्रग्रीवस्य उत्तरम् — प्रयकपोताः ! अस्माकं मत्रं हरण्यको नाम मूषकराजः गण्डक तीरे चत्रवने नवस त । सोऽस्माकं पाशान्
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दन्तबलेन छे त्स्य त ।
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[ हन्द — बहे लये को लौटा हुआ दे खकर कपोत ने पूछा — “स्वामी! अब क्या करना उ चत है?” चत्रग्रीव ने कहा — “ प्रय
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कपोतो! हमारा मत्र हरण्यक नाम का चूह का राजा गण्डक नद के कनारे चत्रवन म रहता है। वह अपने दाँत के बल से हमारे
बन्धन काट दे गा।”]
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ऐसा क्य : कपोत उड़ तो गए, पर जाल-स हत उड़े — अथात् संकट टला नह , केवल स्थ गत हुआ। इस लए
चत्रग्रीव उड़ान को उपल ब्ध नह मानता और तुरन्त दूसरा चरण बताता है। ध्यान द — कपोत के पास पंख ह पर
दाँत नह ; चूहे के पास दाँत ह पर पंख नह । मत्रलाभ प्रकरण का सार यही है : जो हमारे पास नह , वह मत्र के पास
है।
स न्धः तथा व्याकरणम्: ‘ हरण्यको नाम’ = हरण्यकः + नाम ( वसगस न्ध, अः + न् = ओ)। ‘सोऽस्माकम्’ = सः +
अस्माकम्। ‘छे त्स्य त’ — छद् धातु, लृट् लकार (भ वष्यत्), प्रथमपुरुष एकवचन।
प्र.5 कथां ाव यत्वा नायकः सवान् सम्बोधय त – “ मत्रा ण ! आपद्ग्रस्ताः कपोताः बु द्धबलेन संघटनसाम यन च
आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः । त ह कमथ वयं संघ टताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कतु न शक्नुमः ?”
उत्तरम् (कथायाः फलम्) — नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्सा हताः सवऽ प भयं शोकं सन्दे हं च वहाय सेतु नमाणकाय संलग्नाः जाताः ।
भगीरथप्रयत्नैः सेतु नमाणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संर क्षताः ।
[ हन्द — नायक के प्रेरक वचन से उत्सा हत होकर सब भय, शोक और सन्दे ह छोड़कर पुल बनाने के काम म लग गए। भगीरथ
जैसे प्रयत्न से पुल बनाकर उन्ह ने अपने और दूसर के भी प्राण बचा लए।]
ऐसा क्य : यह प्रश्न उत्तर माँगने के लए नह , कम कराने के लए है। नायक तीन चीज़ एक साथ हटवाता है — भय
(जो रोकता है), शोक (जो थकाता है) और सन्दे ह (जो बाँटता है)। ये तीन हट जाएँ तो जो बचता है वही ‘संह त’ है।
और ध्यान द अ न्तम पं क्त — उन्ह ने अपने ही नह , दूसर के भी प्राण बचाए; ठ क वैसे जैसे चत्रग्रीव ने पहले
आ श्रत के पाश कटवाए।
शब्दाथः: ‘भगीरथप्रयत्नैः’ — भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लए जो अथक तप कया, उसी से हन्द का
मुहावरा ‘भगीरथ प्रयत्न’ बना — अथात् अत्यन्त क ठन एवं अ वराम प रश्रम।
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 15–16
शब्दः / अथः / हन्द / English तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’
शब्दाथाः
प्र.1 मातृभाषया अथ लखत — (पाठे प्रदत्तायाः शब्दाथ-सा रण्याः अ न्तमः स्तम्भः)
यह स्तम्भ आपको स्वयं भरना है — अपनी मातृभाषा म। नीचे पुस्तक के शब्द, उनका संस्कृत पयाय, हन्द और अंग्रेज़ी अथ दए
ह; अ न्तम स्तम्भ के लए नमूना दखाया गया है।
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
भग्नः नष्टः टू ट गया Broke down
अक्रन्दन् रुद न्त स्म रोये They cried
सिवषादम् चन्तापूवकम् िवषादपूवक With sadness
सम्भूय म लत्वा िमलकर Together
तरुः वृक्षः पेड़ Tree
व्याधः लुब्धकः बहेिलया Hunter
तण्डुल कणान् तण्डु ललवान् चावल के दानों को Rice grains
िवकीय व करणं कृत्वा िबखेर कर Having scattered
िवस्तीय वस्तृतं, वस्तरणं कृत्वा फै लाकर Having spread
पच्छन्नः गुप्तः िछपा हुआ Stood secretly
िचत्रग ीवनामा चत्रग्रीवः नाम यस्य िचत्रगीव नाम का Named Chitragriva
पतीकारः प्र त वधानम् उपाय Remedy
अिवचािरतम् अ च न्ततम् िबना सोचा हुआ Not thought of
अवतीय अवतरणं कृत्वा (नीचैः उतर कर Having descended
आगत्य)
अवलोक्य दृष्ट् वा दे खकर Having seen
अपवतनम् अप्रवृ त्तः न लगना, पवृत्त न होना No inclination
पवृत्त ाः नरताः लगे हएु Engaged / engrossed
अवलम्ब्य आ श्रत्य आि त होकर Having depended on
एकिचत्तीभूय एकमनसा एक िचत्त होकर With united mind
कापुरुषलक्षणम् कु त्सतपुरुषाणां चह्नम् कायर पुरुषों का ल क्षण Signs of a coward
ितरस्कु विन्त अनादरं कुव न्त ितर स्कार करते है ं Reject
िवस्मयः आश्चयम् आश्चय Amazement
िवक्रमः अ तपराक्रमः अत्यिधक शिक्तयुक्त, Valour
पराक्रम
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उत्पितताः उड्डयनं कृतवन्तः उड़ गए Flew away
िचन्त्यताम् चन्तनीयः िचन्तन करना चािहए / Should be thought
सोिचए
आलोच्य वचाय अच्छी तरह िवचार कर Having analysed
पाशान् बन्धना न बन्धनों को Captivity
पत्यिभ ाय ात्वा जानकर , समझकर Having recognized
त्वरया शीघ्रम् शीघ Hurriedly, quickly
िनःस ृत्य नगत्य िनकल कर Coming out
मे मम मेर ा Mine
िछनत्तु छे दनं कुरु काट दे (you) Cut
आकण्य श्रुत्वा सुनकर Having heard
पहृष्टमनाः आन न्दतमनाः पस न्न मन वाला Gleeful (person)
पुल िकतः रोमा ञ्चतः पफु िल्लत होकर Excited
सत्वरम् त्वरया सह अित शीघ Quickly
उपसपित समीपम् आगच्छ त िनकट आता है Approaches near
आि तवात्सल्येन शरणम् आगतानां कृते शरण में आए हुओं के पित Affection towards people who have
स्नेहभावेन पेम से taken shelter
आशङ् क्य शङ् कां कृत्वा शङ् का करके Having doubted
अव ा तरस्कारः िनन्दा Disrespect
नमूना उत्तर (मातृभाषया अथः):
मराठ — व्याधः = पारधी, तरुः = झाड, सम्भूय = एकत्र येऊन।
बाङ् ला — व्याधः = ব াধ , तरुः = গাছ, सम्भूय = একত্র হেয়।
त मऴ् — व्याधः = ேவடன், तरुः = மரம் , सम्भूय = ஒன்று ேசர் ந் து।
गुजराती — व्याधः = પારધી , तरुः = ઝાડ , सम्भूय = ભે ગ ા મળીને ।
आप अपनी मातृभाषा का ठ क वही शब्द ल खए जो आप घर म बोलते ह — कोश का क ठन शब्द नह ।
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प्र.2 उपयुक्तेषु शब्दे षु ये पदा न ल्यप्-प्रत्ययान्ता न स न्त ता न पृथक् लखत, तेषां च प्रकृ त-प्रत्यय वभागं दशयत ।
शब्दाथ-सा रणी म दस पद ल्यप्-प्रत्ययान्त ह। सबका आरम्भ कसी उपसग से होता है और अन्त ‘य’ से — यही ल्यप् क पहचान
है।
ल्यबन्तपदम् प्रकृ त-प्रत्यय वभागः अथः
सम्भूय सम् + भू + ल्यप् मलकर
िवकीय िव + कॄ + ल्यप् बखेरकर
िवस्तीय िव + स्तॄ + ल्यप् फैलाकर
अवतीय अव + तॄ + ल्यप् उतरकर
अवलोक्य अव + लोक् + ल्यप् दे खकर
अवलम्ब्य अव + ल म्ब् + ल्यप् आश्रय लेकर
एकिचत्तीभूय एकिचत्त ी + भू + ल्यप् एक मन होकर
आलोच्य आ + लोच् + ल्यप् वचार करके
पत्यिभ ाय पित + अिभ + ा + ल्यप् पहचानकर
आशङ् क्य आ + शिक + ल्यप् शङ् का करके
ऐसा क्य : ‘ नःसृत्य’ और ‘आकण्य’ भी इसी सूची म आ सकते थे — नः + सृ + ल्यप्, आ + कण् + ल्यप्। इन
सबक एक ही कसौट लगाइए : उपसग है या नह । उपसग हो तो क्त्वा नह , ल्यप् होगा — इसी लए ‘कृत्वा’ पर
उप लगते ही ‘उपकृत्य’ बन जाता है, ‘उपकृत्वा’ नह ।
ध्यातव्यम्: ‘एक चत्तीभूय’ म उपसग नह , च्व-प्रत्ययान्त पद (एक चत्त → एक चत्ती) है; ऐसे च्व-युक्त रूप के
साथ भी क्त्वा के स्थान पर ल्यप् ही होता है।
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 17
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ल्यप्-प्रत्ययः तथा वसगस न्धः
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व्याकरणम्
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a s em-प्रत्ययः कदा भव त ? क्त्वा-प्रत्ययात् सः कथं भ ः ? उदाहरणैः स्प ीकुरुत ।
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नयमः — जहाँ एक क्रया समाप्त होने के बाद दूसरी क्रयाm .
s e होती है, वहाँ पूवका लक क्रया म धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है। कन्तु
aके स्थान पर ल्यप् होता है और ल्यप् म केवल ‘य’ शेष रहता है।
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य द उसी धातु से पहले कोई उपसग लगा हो, तो क्त्वा
गम् + क्त्वा = गत्वा (उपसग नही ं)
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आ + गम् + ल्यप् = आगत्य (उपसग ‘आ’ लगते ही क्त्वा → ल्यप्)
कृ +m . c o a g
a s e क्त्वा = कृ त्वा → उप + कृ + ल्यप् = उपकृ त्य
agl लोक् + क्त्वा = लोिकत्वा → अव + लोक् + ल्यप् = अवलोक्य
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पाठस्य उदाहरणे — तण्डु लकणान् अवलोक्य (अव + लोक् + ल्यप्) कपोतान् प्र त आह। धैयम् अवलम्ब्य (अव + लम्ब् + ल्यप्)
प्रतीकारः चन्त्यताम्।
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ऐसा क्य : क्त्वा और ल्यप् दोन का अथ एक ही है — ‘करके’। भेद केवल रूप का है, और उसका कारण उपसग
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है। इसी लए दोन का वाक्य म प्रयोग भी एक-सा होता है, और दोन अव्यय ह — अथात् लङ्ग, वचन, वभ क्त से
s e m आगत्य पठ न्त’ —
comज्य -का-त्य रहता है। gla
इनका रूप कभी नह बदलता। ‘बालकः आगत्य पठ त’, ‘बा लका आगत्य पठ त’, ‘बालकाः
.
‘आगत्य’
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agl परीक्षोपयोगी सङ् केतः: प्रश्न म ‘क्त्वा-स्थाने ल्यप्’ पूछा जाए तो पहले धातु पहचा नए, फर उ चत उपसग जो ड़ए,
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com l a
फर अन्त म ‘य’ लगाइए — स्था → उत् + स्था = उत्थाय, नम् → प्र + नम् = प्रणम्य।
. a g
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gl ase
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वसगसन्धेः चत्वारः नयमाः पाठे प्रदत्ताः । तान् उदाहरणैः सह लखत ।
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.cम वसगस न्ध के चार नयम दए गए ह। नीचे प्रत्येक नयम, उसका सूत्र-रूप और
a gपाठ का उदाहरण दया गया है।
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पाठ
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क्रमः नयमः उदाहरणम्
१ िवसग के बाद च् या छ् हो तो िवसग के स्थान पर श् हो जाता है कः + िचत् = किश्चत्
पतीकारः + िचन्त्यताम् =
पतीकारिश्चन्त्यताम्
दे वद त्त ः + छले न = दे वद त्तश्छले न
२ िवसग के बाद त् या थ् हो तो िवसग के स्थान पर स् हो जाता है चिकतः + तूष्णीम् = चिकतस्तूष्णीम्
नीितः + तावत् = नीितस्तावत्
३ िवसग से पहले अ हो और बाद में िकसी वग का तीसरा, चौथा या पाँचवाँ वण अथवा य् र् ल् व् िहर ण्यकः + नाम = िहर ण्यको नाम
ह् हो, तो ‘अः’ के स्थान पर ओ हो जाता है ततः + िहर ण्यकः = ततो िहर ण्यकः
ृ ः = व्याधो िनवत्त
व्याधः + िनवत्त ृ ः
४ िवसग से पहले और बाद दोनों ओर अ हो, तो ‘अः’ के स्थान पर ओ होता है और आगे वाला कु तः + अत्र = कु तोऽत्र
‘अ’ लुप्त होकर ऽ (अवग ह) िलखा जाता है िहतः + अिप = िहतोऽिप
सः + अस्माकम् = सोऽस्माकम्
ऐसा क्य होता है: वसग अपने-आप कोई स्वर नह , केवल ‘ह्’ जैसी एक साँस है। इस लए वह हमेशा आगे आने
वाले वण के अनुरूप ढल जाता है — तालव्य ‘च्’ के आगे तालव्य ‘श्’, दन्त्य ‘त्’ के आगे दन्त्य ‘स्’, और घोष
वण (ग, घ, ज, द, न, म, य, र, ल, व, ह) के आगे घोष ‘ओ’। यही कारण है क नयम याद करने से अच्छा है
उच्चारण- ान दे ख लेना।
ध्यातव्यम्: तीसरा और चौथा नयम एक ही ह — भेद केवल यह है क चौथे म आगे भी ‘अ’ है, इस लए वह ‘अ’
लुप्त हो जाता है और उसक जगह ऽ चह्न रख दया जाता है। ‘कुतोऽत्र’ पढ़ते समय उच्चारण ‘कुतो + त्र’ ही होगा।
अधः प्रदत्ता न ल्यप्-प्रत्ययान्ता न पदा न ध्यानेन पठत अवगच्छत च — पृष्ठ 18–19
लट् -लकार क्रया / प्रकृ त-प्रत्यय वभागः / ल्यबन्तरूपम् / ववरणाथः / वाक्या न
व्याकरणम्
प्र.1 पुस्तके प्रदत्तां ल्यप्-प्रत्ययान्तपदानां सा रण पठत, अवगच्छत च ।
पुस्तक क पूरी सा रणी नीचे द है। पाँचव स्तम्भ म वही वाक्य ह जनम ल्यबन्त पद (लाल रंग म) प्रयुक्त हुआ है।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका AglaSem · NCERT Solutions
लट् - प्रकृ त- ल्यबन्तरूपम् ववरणाथः वाक्यम्
लकार क्रया प्रत्यय वभागः
आगच्छित आ + गम् + ल्यप् आगत्य / आगमनं कृत्वा छात्रः वद्यालयम् आगत्य संस्कृतं पठ त।
आगम्य
आनयित आ + नी + ल्यप् आनीय आनयनं कृत्वा सः ग्रन्थालयात् ग्रन्थम् आनीय पठ त।
उित्तष्ठित उत् + स्था + ल्यप् उ त्थाय उत्थानं कृत्वा सुरेशः प्रातः उ ाय माता पतरौ नम त।
पणमित प्र + नम् + ल्यप् पणम्य / पणत्य प्रणामं कृत्वा शष्यः गुरुं प्रणम्य ग्रन्थं पठ त।
उपकरोित उप + कृ + ल्यप् उपकृ त्य उपकारं कृत्वा सज्जनः दुः खतजनान् उपकृत्य मोदते।
िनिदशित नर् + दश् + ल्यप् िनिद श्य नदशं कृत्वा अध्यापकः चत्रं न दश्य पाठय त।
िनिश्चनोित नस् + च + ल्यप् िनिश्चत्य नश्चयं कृत्वा छात्रः ध्येयं न श्चत्य अध्ययनं करो त।
िवस्मरित व + स्मृ + ल्यप् िवस्म ृत्य वस्मरणं कृत्वा अहं पुस्तकं वस्मृत्य आगतवान्।
पिरष्करोित प र + कृ + ल्यप् पिर ष्कृ त्य प रष्कारं कृत्वा छात्रः व्याकरणेन भाषां प रष्कृत्य वद त।
आरभते आ + रभ् + ल्यप् आर भ्य आरम्भं कृत्वा श्वः आरभ्य अहं योगासना न क रष्या म।
स्वीकरोित स्वी + कृ + ल्यप् स्वीकृ त्य स्वीकारं कृत्वा माता वस्तू न स्वीकृत्य आगच्छ त।
िविलखित व + लख् + ल्यप् िविल ख्य लेखनं कृत्वा शक्षकः सुधाखण्डेन ोकं व लख्य
पाठय त।
पक्षालयित प्र + क्षल (क्षा ल) + पक्षाल्य प्रक्षालनं कृत्वा माता वस्त्रं प्रक्षाल्य आपणं गच्छ त।
ल्यप्
अपकरोित अप + कृ + ल्यप् अपकृ त्य अपकारं कृत्वा दुजनः सज्जनम् अपकृत्य गच्छ त।
अवलोकते अव + लोक् + ल्यप् अवलोक्य अवलोकनं कपोताः तण्डु लान् अवलोक्य आनन्द न्त।
कृत्वा
आशङ् कते आ + श क + ल्यप् आशङ् क्य आशङ् कां मनुष्यः न न्दतकम ण पापम् आशङ् क्य
कृत्वा सत्कम कुरुते।
िविकरित व + कॄ + ल्यप् िवकीय वकरणं कृत्वा व्याधः तण्डु लकणान् वक य जालं
वस्तारय त।
अवतरित अव + तॄ + ल्यप् अवतीय अवतरणं कृत्वा कपोताः भूमौ अवतीय तण्डु लान् भक्षय न्त।
ृ ाित
िवस्तण व + स्तॄ + ल्यप् िवस्तीय वस्तृतं कृत्वा व्याधः जालं वस्तीय प्रच्छन्नो भूत्वा स्थतः।
अवलम्बते अव + लम्ब् + ल्यप् अवल म्ब्य अवलम्बनं मकटः वृक्षशाखाम् अवलम्ब्य शयनं करो त।
कृत्वा
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका AglaSem · NCERT Solutions
िनम ित नर् + मा + ल्यप् िनम य नमाणं कृत्वा भक्तः म न्दरं नमाय दे वम् अच त।
सा रणी पढ़ने का ढं ग: बाएँ से दाएँ च लए — पहले लट् लकार क क्रया (आगच्छ त), फर उसका वभाजन (आ
+ गम् + ल्यप्), फर बना हुआ रूप (आगत्य), फर उसका अथ (आगमनं कृत्वा), और अन्त म उसका वाक्य म
प्रयोग। पाँच स्तम्भ मलकर एक ही बात कहते ह : ल्यबन्त पद वाक्य क पहली, समाप्त हो चुक क्रया बताता
है; मुख्य क्रया वाक्य के अन्त म रहती है।
ध्यातव्यम्: कुछ धातुओं के दो रूप चलते ह — आगत्य/आगम्य, प्रणम्य/प्रणत्य। दोन शुद्ध ह। ‘ न श्चनो त’ म
‘ नस्’ का ‘स्’ ‘ च’ के प्रभाव से ‘श्’ बन जाता है — न श्चत्य; यह वही ष्टु त्व-जैसा प रवतन है जो ‘क श्चत्’ म
दखा।
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न 1 — पृष्ठ 19
अधो ल खतानां प्रश्नानाम् एकपदे न उत्तरं लखत
अभ्यासः
प्र.1 (क) मत्रा ण ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छ न्त ?
उत्तरम् — उत्तराखण्डम् । (दे वभू मम् उत्तराखण्डम्)
[ हन्द — मत्र ग्रीष्मावकाश म उत्तराखण्ड जाते ह — पाठ म उसे ‘पुण्यक्षेत्रदशनाय दे वभू मम् उत्तराखण्डम्’ कहा गया है।]
व्याकरणम्: ‘उत्तराखण्डम्’ — द्वतीया वभ क्त, एकवचन। प्रश्न ‘कुत्र’ का उत्तर यहाँ द्वतीया म है, क्य क
‘गच्छ न्त’ (ग त-अथक क्रया) का कम गन्तव्य स्थान ही होता है।
प्र.1 (ख) सवत्र कः प्रसृतः ?
उत्तरम् — अन्धकारः ।
[ हन्द — सहसा सब ओर अन्धकार फैल गया — ‘सहसा सवत्र अन्धकारः प्रसृतः’।]
व्याकरणम्: ‘अन्धकारः’ — पुं लङ्ग, प्रथमा वभ क्त, एकवचन। प्रश्नपद ‘कः’ भी प्रथमा एकवचन है, इस लए
उत्तर भी प्रथमा म ही रहेगा।
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प्र.1 (ग) कः सवान् प्रेरयन् अवदत् ?
उत्तरम् — सुधीरः । (नायकः सुधीरः)
[ हन्द — सबका अधैय दे खकर नायक सुधीर ने सबको सान्त्वना दे ते और प्रे रत करते हुए कहा।]
व्याकरणम्: ‘प्रेरयन्’ — शतृ-प्रत्ययान्त (वतमानका लक कृदन्त) रूप, पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन — ‘प्रे रत करता
हुआ’। नाम का अथ भी ध्यान द जए : सुधीरः = सु + धीर, अथात् अत्यन्त धैयवान् — पात्र का नाम ही उसका च रत्र
बता दे ता है।
प्र.1 (घ) कः हतोपदे शस्य कथां ावय त ?
उत्तरम् — नायकः । (सुधीरः)
[ हन्द — नायक (सुधीर) हतोपदे श क कथा सुनाता है — “अ स्मन् प्रसङ्गे अहं हतोपदे शस्य एकां कथां श्रावया म।”]
व्याकरणम्: ‘श्रावय त’ — णजन्त (प्रेरणाथक) क्रया : ‘सुनाता है’। ‘शृणो त’ का अथ होता ‘सुनता है’ — दोन म
यही अन्तर है।
प्र.1 (ङ) कपोतराजस्य नाम कम् ?
उत्तरम् — चत्रग्रीवः ।
[ हन्द — कपोतराज का नाम चत्रग्रीव है — ‘ चत्रग्रीवनामा कपोतराजः सप रवारः आकाशमाग गच्छ त स्म’।]
शब्दाथः: चत्र (रंग- बरंगी) + ग्रीवा (गदन) = जसक गदन रंग- बरंगी हो। ‘ चत्रग्रीवनामा’ का वग्रह है —
चत्रग्रीवः नाम यस्य सः (बहुव्री ह समास)।
प्र.1 (च) व्याधः कान् वक य जालं प्रसा रतवान् ?
उत्तरम् — तण्डु लकणान् ।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका
a g l AglaSem · NCERT Solutions
[ हन्द — बहे लये ने चावल के दाने बखेरकर जाल फैलाया — ‘व्याधः तण्डु लकणान् वक य जालं वस्तीय च प्रच्छन्नो भूत्वा
co m
स्थतः’।]
e m.
m l as
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व्याकरणम्: ‘तण्डु लकणान्’ — पुं लङ्ग, द्वतीया वभ क्त, बहुवचन। प्रश्न का ‘कान्’ भी द्वतीया बहुवचन है,
a
agl
इस लए उत्तर भी उसी म।
co m
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l as
वपत्काले वस्मयः कस्य लक्षणम् ?
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प्र.1 (छ)
a
m
co
em.
उत्तरम् — कापुरुषस्य । (कापुरुषलक्षणम्)
m l as
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[ हन्द — वप त्त के समय घबरा जाना कायर पुरुष का लक्षण है — ‘यतो ह वपत्काले वस्मयः एव कापुरुषलक्षणम्’।]
a s em
a gl क्य : चत्रग्रीव यह बात तब कहता है जब सब कपोत उसी को दोष दे रहे ह। उसका तक सीधा है — दोष ढूँ ढ़ने
ऐसा
म समय लगाना भी एक तरह क घबराहट ही है; वप त्त म बु द्ध का काम है उपाय खोजना, अपराधी नह ।
m a s
em
.co agl
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agु l+ पुरुषः = कापुरुषः ( न न्दत पुरुष, कायर)।
व्याकरणम्: ‘कापुरुषस्य’ — षष्ठी वभ क्त, एकवचन; प्रश्नपद ‘कस्य’ भी षष्ठी एकवचन है। ‘कु’ उपसग ‘पुरुष’
के साथ मलकर ‘का’ हो जाता है — क
co m
m .
m as e
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प्र.1 (ज) चत्रग्रीवस्य मत्रं हरण्यकः कुत्र नवस त ?
a g l
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a gl उत्तर
उत्तरम् — चत्रवने । (गण्डक तीरे चत्रवने)
se m
com g l a
[ हन्द — हरण्यक गण्डक नद के तट पर स्थत चत्रवन म रहता है।]
m . a
ase
agl
व्याकरणम्: ‘ चत्रवने’ — सप्तमी वभ क्त, एकवचन (अ धकरण)। प्रश्नपद ‘कुत्र’ स्थान पूछता है, इस लए उत्तर
सप्तमी म दया जाता है। ‘गण्डक तीरे’ भी सप्तमी एकवचन है।
co m
m .
m as e
.co a g l
s e mप्र.1 (झ) चत्रग्रीवः हरण्यकं कथं सम्बोधय त ?
a
agl c
m .
s e
उत्तरम् — ‘सखे’ इ त । (सखे हरण्यक !)
. com a gla
[ हन्द — चत्रग्रीव हरण्यक को ‘सखे’ (हेem
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agl
मत्र!) कहकर पुकारता है — “सखे हरण्यक! कम् अस्मा भः सह न सम्भाषसे?”]
co m
m .
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका AglaSem · NCERT Solutions
व्याकरणम्: ‘सखे’ — ‘स ख’ शब्द का सम्बोधन, एकवचन रूप। ‘स ख’ के रूप वशेष ह : सखा (प्रथमा),
सखायम् ( द्वतीया), हे सखे (सम्बोधन)।
प्र.1 (ञ) पूव केषां पाशान् छनत्तु इ त चत्रग्रीवः वद त ?
उत्तरम् — मदा तानाम् । (एतेषां कपोतानाम्)
[ हन्द — चत्रग्रीव कहता है — “पहले मेरे आ त इन कपोत के बन्धन काटो, बाद म मेरे।” — “पूव मदा श्रतानाम् एतेषां
पाशान् छनत्तु, पश्चात् मम।”]
ऐसा क्य : यही पूरे पाठ का नै तक शखर है। हरण्यक स्वाभा वक रूप से पहले अपने मत्र का बन्धन काटने आता
है, पर चत्रग्रीव रोक दे ता है — क्य क जो अपने अधीन से पहले स्वयं को मुक्त कराता है, वह नायक नह रहता।
हरण्यक इसी को ‘आ श्रतवात्सल्य’ कहकर उसे तीन लोक के स्वा मत्व के योग्य बताता है।
स न्धः तथा व्याकरणम्: ‘मदा श्रतानाम्’ = मद् + आ श्रतानाम् (मम आ श्रताः = मेरे आ श्रत); षष्ठी वभ क्त,
बहुवचन। प्रश्न का ‘केषाम्’ भी षष्ठी बहुवचन है।
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न 2 — पृष्ठ 19–20
पूणवाक्येन उत्तरं लखत
अभ्यासः
प्र.2 (क) यदा केदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् कम् अभवत् ?
उत्तरम् — यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूव वेगेन वृ ष्टः आरब्धा, सहसा सवत्र अन्धकारः प्रसृतः, नद्याः
तीव्रजलवेगेन सेतुः भग्नः, पवतस्खलनं च स ातम् ।
[ हन्द — जब वे श्रीकेदारक्षेत्र चढ़ रहे थे, तब लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही तेज़ वषा शुरू हो गई, अचानक सब ओर अँधेरा छा
गया, नद के तीव्र जल-वेग से पुल टू ट गया और पवत का स्खलन (भूस्खलन) हो गया।]
व्याकरणम्: ‘आरोहन्तः आसन्’ — शतृ-प्रत्ययान्त ‘आरोहन्’ के साथ ‘आसन्’ (लङ् लकार) का प्रयोग; यह अपूण
भूतकाल बताता है — ‘चढ़ रहे थे’। ‘भग्नः’, ‘प्रसृतः’, ‘स ातम्’ — तीन क्त-प्रत्ययान्त भूतका लक कृदन्त ह।
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प्र.2 (ख) सव उच्चस्वरेण क प्राथयन्त ?
उत्तरम् — सव उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्राथयन्त च — ‘हे भगवन् ! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इ त ।
[ हन्द — सब ऊँचे स्वर म रोने लगे और ईश्वर से प्राथना करने लगे — “हे भगवन्! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।”]
व्याकरणम्: ‘उच्चस्वरेण’ — तृतीया वभ क्त, एकवचन (साधन/प्रकार)। ‘रक्ष’ — रक्ष् धातु, लोट् लकार,
मध्यमपुरुष एकवचन। ‘प्राथयन्त’ आत्मनेपद लङ् लकार का प्रथमपुरुष बहुवचन रूप है।
प्र.2 (ग) असम्भवं काय कथं कतु शक्यते इ त नायकः उक्तवान् ?
उत्तरम् — नायकः उक्तवान् — वयम् आत्म वश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अ प काय सम्भूय अवश्यं साध यतुं शक्नुमः ।
[ हन्द — नायक ने कहा क हम आत्म व ास के बल से मलकर यह असम्भव काम भी अवश्य कर सकते ह; उससे हम लक्ष्य भी
मलेगा और प्राण क रक्षा भी होगी।]
ऐसा क्य : प्रश्न ‘कथम्’ ( कस प्रकार) है, इस लए उत्तर म साधन बताना आवश्यक है — और साधन दो ह :
‘आत्म वश्वासबलेन’ (तृतीया वभ क्त = कससे) तथा ‘सम्भूय’ (ल्यबन्त = मलकर)। यही दो शब्द पूरे पाठ क कुंजी
ह।
प्र.2 (घ) नजने वने तण्डु लकणान् दृ ् वा चत्रग्रीवः क नरूपय त ?
उत्तरम् — चत्रग्रीवः नरूपय त — “कुतोऽत्र नजने वने तण्डु लकणानां सम्भवः ? तद् नरूप्यताम् । क श्चद् व्याधोऽत्र भवेत् । सवथा
अ वचा रतं कम न कतव्यम् ।”
[ हन्द — चत्रग्रीव वचार करता है — “इस नजन वन म चावल के दाने कहाँ से आ सकते ह? इस पर सोचा जाए। यहाँ कोई
बहे लया अवश्य होगा। बना वचारे कोई काम कभी नह करना चा हए।”]
स न्धः: कुतः + अत्र = कुतोऽत्र ; व्याधः + अत्र = व्याधोऽत्र — दोन वसगस न्ध के चौथे नयम (अः + अ = ओऽ)
के उदाहरण ह।
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प्र.2 (ङ) क नी तवचनं प्र सद्धम् ?
उत्तरम् — “लघूनाम् अ प वस्तूनां संह तः कायसा धका भव त” इ त नी तवचनं लोक सद्धं प्र सद्धं च ।
[ हन्द — “छोट -छोट वस्तुओं का भी संगठन काम पूरा कर दे ता है” — यही लोकप्र सद्ध नी तवचन है। यही वाक्य ोक-रूप म
पाठ का शीषक बना है — अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका।]
ध्यातव्यम्: कथा म ‘लघूनाम्’ शब्द आया है और शीषक- ोक म ‘अल्पानाम्’। दोन का अथ एक ही है — छोटा,
दुबल। परीक्षा म जो शब्द पुस्तक के जस स्थल से पूछा जाए, वही ल खए।
प्र.2 (च) व्याधात् रक्षां प्राप्तुं चत्रग्रीवः कम् आदे शं दत्तवान् ?
उत्तरम् — चत्रग्रीवः आदे शं दत्तवान् — “अतः अस्मा भः सवः एक चत्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम्” — इ त । एवं वचाय सव
प क्षणः जालमादाय उत्प तताः ।
[ हन्द — चत्रग्रीव ने आदे श दया — “अतः हम सबको एक चत्त होकर, जाल-स हत उड़ जाना चा हए।” ऐसा वचार कर सब
पक्षी जाल लेकर उड़ गए।]
ऐसा क्य काम करता है: कोई एक कपोत अकेले जाल नह उठा सकता — पर सबक श क्त एक ही दशा म एक
ही क्षण म लगे तो जाल उठ जाता है। शत ‘बल’ नह , एक चत्तता है : अगर आधे ऊपर ख च और आधे इधर-उधर,
तो जाल टस से मस नह होगा। इसी लए चत्रग्रीव ‘सवः’ के साथ ‘एक चत्तीभूय’ भी कहता है।
प्र.2 (छ) हरण्यकः कमथ तूष्ण तः ?
उत्तरम् — हरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् च कतः सन् तूष्ण स्थतः । सः सवदा अ नष्टशङ् कया शतद्वारं ववरं कृत्वा नवस त
स्म ।
[ हन्द — हरण्यक कपोत के अचानक ऊपर से गर पड़ने के भय से च कत होकर चुप बैठा रहा। वह सदा अ नष्ट क आशङ् का
से सौ द्वार वाला बल बनाकर रहता था।]
शब्दाथः: ‘अवपातः’ = ऊपर से गरना; ‘अवपातभयात्’ = गर पड़ने के भय से (पञ्चमी वभ क्त, कारण)।
‘तूष्णीम्’ = चुपचाप — यह अव्यय है।
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ऐसा क्य : हरण्यक क सावधानी कोई कायरता नह — वह ‘शतद्वारं ववरम्’ बनाता है, अथात् सौ नकास वाला
बल। जो सबसे अ धक सहायता करने योग्य है, वह स्वयं भी सबसे अ धक सतक है — कथा यह चुपचाप कह दे ती
है।
प्र.2 (ज) पुल कतः हरण्यकः चत्रग्रीवं कथं प्रशंस त ?
उत्तरम् — हरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुल कतः सन् अब्रवीत् — “साधु मत्र ! साधु । अनेन आ श्रतवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्या प स्वा मत्वं
प्राप्तुं योग्योऽ स ।”
[ हन्द — प्रसन्न मन और रोमा ञ्चत होकर हरण्यक बोला — “धन्य हो मत्र, धन्य! इस आ तवात्सल्य के कारण तुम तीन
लोक का स्वा मत्व पाने के योग्य हो।”]
ऐसा क्य : हरण्यक चत्रग्रीव के बल, पंख या बु द्ध क प्रशंसा नह करता — केवल इस बात क करता है क उसने
अपने से पहले अपने आ त को रखा। संस्कृत नी तग्रन्थ म नेतृत्व क कसौट यही मानी गई है : अ धकार नह ,
उत्तरदा यत्व।
स न्धः: योग्यः + अ स = योग्योऽ स ( वसगस न्ध, अः + अ = ओऽ)। ‘त्रैलोक्यस्य’ = त्रयाणां लोकानां समाहारः —
तीन लोक (स्वग, पृथ्वी, पाताल)।
प्र.2 (झ) कपोताः कथं आत्मरक्षणं कृतवन्तः ?
उत्तरम् — आपद्ग्रस्ताः कपोताः बु द्धबलेन संघटनसामथ्यन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः ।
[ हन्द — वप त्त म फँसे कपोत ने बु द्ध के बल और संगठन क साम य से अपनी रक्षा क ।]
दोन क्य आवश्यक थे: केवल संगठन होता तो सब मलकर जाल-स हत उड़ जाते और थककर फर गर जाते —
बन्धन तो बना ही रहता। केवल बु द्ध होती तो चत्रग्रीव अकेला हरण्यक तक पहुँच जाता, बाक बँधे रह जाते। बु द्ध
ने दशा द , संगठन ने श क्त — इसी लए पाठ ‘संह तः’ शब्द का प्रयोग करता है, ‘संख्या’ का नह ।
व्याकरणम्: ‘बु द्धबलेन’, ‘संघटनसामथ्यन’ — दोन तृतीया वभ क्त, एकवचन; ‘कथम्’ प्रश्न का उत्तर करण-
अथ म तृतीया से ही दया जाता है।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका
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नायकस्य प्रेरकवचनैः सवऽ प कम् अकुवन् ?
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प्र.2 (ञ)
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a gl — नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्सा हताः सवऽ प भयं शोकं सन्देहं च वहाय सेतु नमाणकाय संलग्नाः जाताः । भगीरथप्रयत्नैः
उत्तरम्
सेतु नमाणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संर क्षताः ।
o m
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[ हन्द — नायक के प्रेरक वचन से उत्सा हत होकर सब भय, शोक और सन्दे ह छोड़कर पुल बनाने के काम म जुट गए। भगीरथ
s e m बचा लए।]
जैसे प्रयत्न से पुल बनाकर उन्ह ने अपने और दूसर के भी प्राण
a
agl
ऐसा क्य : ध्यान द जए, कहानी उन्ह बचाई नह गई — उन्ह ने स्वयं बचाया। कोई दै वी सहायता नह आती, कोई
बचाव-दल नह आता। पाठ का अ न्तम शब्द ‘संर क्षताः’ है और उसका कता ‘तैः’ (उनके द्वारा) है। यही कपोत-कथा
co m
का पूरा उपयोग है : सुनी हुई नी त जब आचरण बन जाए, तभी वह नी त है।
em.
m l as
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a s em : ‘ वहाय’ = व + हा + ल्यप् (छोड़कर)। ‘संर क्षताः’ — कमवाच्य का क्त-प्रत्ययान्त रूप, इस लए कता
gl
व्याकरणम्
a ‘तैः’ तृतीया वभ क्त म आया है।
m a s
em
.co agl
lasपृष्ठ 20
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न 3 —
ag
अधो ल खता न वाक्या न प ठत्वा ल्यप्-प्रत्ययान्तेषु प रवतयत
co m
.
अभ्यासः
e m
comछात्रः कक्षां प्र वश त । संस्कृतं पठ त । g l as
. a
s em
प्र.3 (क)
l a
ag उत्तर
se m
com g l a
.
उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — छात्रः कक्षां प्र वश्य संस्कृतं पठ त ।
m a
ase
[ हन्द — छात्र कक्षा म प्रवेश करके संस्कृत पढ़ता है।]
a gl
व ध समझ ली जए: दो वाक्य को एक बनाना है। जो क्रया पहले होती है उसे ल्यबन्त म बद लए (प्र वश त → प्र
co m
.
+ वश् + ल्यप् = प्र वश्य), और जो बाद म होती है वही मुख्य क्रया रहकर वाक्य के अन्त म आएगी। कता एक ही
em
as
बार लखा जाएगा।
m l
m .co a g
l a se
ag भक्तः म न्दरम् आगच्छ त । पूजां करो त ।
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प्र.3 (ख)
m a s e
e m . co agl
as
a g
उत्तरम् — भक्तः म न्दरम् आगत्य पूजां करो त । l
[ हन्द — भक्त म न्दर आकर पूजा करता है।]
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m ase
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a g l Page 19 of 38
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका AglaSem · NCERT Solutions
प्रकृ त-प्रत्ययः: आगच्छ त → आ + गम् + ल्यप् = आगत्य (अथवा आगम्य)।
प्र.3 (ग) माता भोजनं नमा त । पुत्राय ददा त ।
उत्तरम् — माता भोजनं नमाय पुत्राय ददा त ।
[ हन्द — माता भोजन बनाकर पुत्र को दे ती है।]
प्रकृ त-प्रत्ययः: नमा त → नर् + मा + ल्यप् = नमाय। ‘पुत्राय’ चतुथ वभ क्त म है, क्य क ‘दा’ धातु का
सम्प्रदान चतुथ म आता है।
प्र.3 (घ) सुरेशः प्रातः उ त्तष्ठ त । दे वं नम त ।
उत्तरम् — सुरेशः प्रातः उत्थाय दे वं नम त ।
[ हन्द — सुरेश प्रातः उठकर दे व को प्रणाम करता है।]
प्रकृ त-प्रत्ययः: उ त्तष्ठ त → उत् + स्था + ल्यप् = उ ाय। ध्यान द — ‘स्था’ का ‘स्’ उपसग ‘उत्’ के साथ
मलकर ‘त्थ’ बन जाता है।
प्र.3 (ङ) रमा पुस्तकं स्वीकरो त । व ालयं गच्छ त ।
उत्तरम् — रमा पुस्तकं स्वीकृत्य वद्यालयं गच्छ त ।
[ हन्द — रमा पुस्तक लेकर वद्यालय जाती है।]
प्रकृ त-प्रत्ययः: स्वीकरो त → स्वी + कृ + ल्यप् = स्वीकृत्य। ‘कृ’ धातु के ल्यबन्त रूप म ‘कृत्य’ ही आता है —
उपकृत्य, प रष्कृत्य, अपकृत्य, स्वीकृत्य।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका AglaSem · NCERT Solutions
प्र.3 (च) अहं गृहम् आगच्छा म । भोजनं करो म ।
उत्तरम् — अहं गृहम् आगत्य भोजनं करो म ।
[ हन्द — म घर आकर भोजन करता/करती ँ।]
ध्यातव्यम्: ल्यबन्त पद अव्यय है, इस लए कता चाहे उत्तमपुरुष (अहम्) हो या प्रथमपुरुष (सः), रूप ‘आगत्य’ ही
रहेगा — बदलती केवल मुख्य क्रया है (करो म / करो त)।
प्र.3 (छ) तण्डु लकणान् व कर त । जालं वस्तारय त ।
उत्तरम् — तण्डु लकणान् वक य जालं वस्तारय त ।
[ हन्द — (बहे लया) चावल के दाने बखेरकर जाल फैलाता है।]
प्रकृ त-प्रत्ययः: व कर त → व + कॄ + ल्यप् = वक य। ऋकारान्त धातुओं (कॄ, तॄ, स्तॄ) म ल्यप् से पहले ‘ईर्’ हो
जाता है — वक य, अवतीय, वस्तीय।
प्र.3 (ज) व्याधः तण्डु लकणान् अवलोकते । भूमौ अवतर त ।
उत्तरम् — व्याधः तण्डु लकणान् अवलोक्य भूमौ अवतर त ।
[ हन्द — व्याध चावल के दाने दे खकर भू म पर उतरता है।]
प्रकृ त-प्रत्ययः: अवलोकते → अव + लोक् + ल्यप् = अवलोक्य। ‘भूमौ’ सप्तमी वभ क्त, एकवचन
(अ धकरण) है।
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न 4 — पृष्ठ 20
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उदाहरणानुसारम् उपसगयोजनेन क्त्वा- ाने ल्यप्-प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा पदा न प रवतयत (सम्, आ, उप, उत्, व, प्र)
अभ्यासः
प्र.4 (क) छात्रः गृहं गत्वा भोजनं करो त ।
उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — छात्रः गृहम् आगत्य (आ + गम् + ल्यप्) भोजनं करो त ।
[ हन्द — छात्र घर आकर भोजन करता है।]
व ध: दए गए क्त्वान्त पद (गत्वा) क धातु पहचा नए — गम्। फर पेट म से उपयुक्त उपसग जो ड़ए — आ।
उपसग जुड़ते ही क्त्वा नह रह सकता, इस लए ल्यप् लगेगा : आ + गम् + ल्यप् = आगत्य। अथ भी बदल जाता है
— ‘गत्वा’ (जाकर) से ‘आगत्य’ (आकर)।
प्र.4 (ख) माता वस्त्रा ण क्षाल यत्वा पच त ।
उत्तरम् — माता वस्त्रा ण प्रक्षाल्य (प्र + क्षल् + ल्यप्) पच त ।
[ हन्द — माता कपड़े धोकर भोजन पकाती है।]
ध्यातव्यम्: पुस्तक क सा रणी म यही रूप दया है — प्रक्षालय त → प्र + क्षल (क्षा ल) + ल्यप् = प्रक्षाल्य।
प्र.4 (ग) शक्षकः ोकं ल खत्वा पाठय त ।
उत्तरम् — शक्षकः ोकं व लख्य ( व + लख् + ल्यप्) पाठय त ।
[ हन्द — शक्षक ोक लखकर पढ़ाते ह।]
पाठ-सम्बन्धः: सा रणी का वाक्य — ‘ शक्षकः सुधाखण्डेन ोकं व लख्य पाठय त।’ (सुधाखण्डः = चॉक)
प्र.4 (घ) रमा त्वा गीतं गाय त ।
उत्तरम् — रमा उत्थाय (उत् + स्था + ल्यप्) गीतं गाय त ।
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[ हन्द — रमा खड़ी होकर गीत गाती है।]
व्याकरणम्: ‘ स्थत्वा’ क धातु ‘स्था’ है। उपसग ‘उत्’ लगाने पर स न्ध से ‘उत् + स्था’ = उ ा हो जाता है, और
ल्यप् जुड़कर उ ाय बनता है।
प्र.4 (ङ) शष्यः सवदा गुरुं नत्वा पठ त ।
उत्तरम् — शष्यः सवदा गुरुं प्रणम्य (प्र + नम् + ल्यप्) पठ त ।
[ हन्द — शष्य सदा गुरु को प्रणाम करके पढ़ता है।]
ध्यातव्यम्: ‘प्रणम्य’ के स्थान पर ‘प्रणत्य’ रूप भी शुद्ध है — पुस्तक क सा रणी म दोन दए ह। ‘प्र’ के ‘र्’ के
कारण ‘नम्’ का ‘न’ मूधन्य ‘ण’ हो जाता है (णत्व- वधान) — प्रणम्य।
प्र.4 (च) लेखकः आलोचनं कृत्वा लख त ।
उत्तरम् — लेखकः आलोच्य (आ + लोच् + ल्यप्) लख त ।
[ हन्द — लेखक भली-भाँ त वचार करके लखता है।]
पाठ-सम्बन्धः: ‘आलोच्य’ शब्दाथ-सा रणी का ही शब्द है — आलोच्य = वचाय = ‘अच्छ तरह वचार कर’। पाठ म
भी आया है — ‘एतत् आलोच्य सव हरण्यकस्य ववरसमीपं गताः।’
अन्यः स्वीकायः वकल्पः: ‘सम्’ उपसग लगाकर समालोच्य (सम् + आ + लोच् + ल्यप्) भी लखा जा सकता है
— अथ वही, ‘भली-भाँ त समीक्षा करके’। पेट म दए छह उपसग म से ‘उप’ तथा ‘सम्’ अ त रक्त वकल्प के रूप
म ह; प्रत्येक वाक्य के लए एक-एक उपसग बाँटना आवश्यक नह ।
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न 5 — पृष्ठ 21
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
पाठे प्रयुक्तेन उपयुक्तपदे न रक्त ानं पूरयत
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अभ्यासः
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a s emसवः एक चत्तीभूय ……………… उ ीयताम् ।
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प्र.5 (क)
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उत्तरम् — सवः एक चत्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम् ।
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[ हन्द — सबको एक चत्त होकर जाल लेकर उड़ जाना चा हए।]
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व्याकरणम्: ‘जालमादाय’ = जालम् + आदाय; आदाय = आ + दा + ल्यप् (लेकर)। ‘उड्डीयताम्’ कमवाच्य लोट्
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लकार का रूप है — ‘उड़ा जाए’।
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a प्र.5 (ख) जालापहारकान् तान् ……………… पश्चाद् अधावत् ।
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उत्तरम् — जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चाद् अधावत् ।
[ हन्द — जाल ले जाने वाल को दे खकर (बहे लया) पीछे -पीछे दौड़ा।]
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पूण वाक्यम्: ‘अनन्तरं स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत्।’ — यही अभ्यास प्रश्न 6
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म ‘अवलोक्य’ का जोड़ीदार पद भी है।
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प्र.5 (ग) अस्माकं मत्रं ……………… नाम मूषकराजः गण्डक तीरे चत्रवने नवस त ।
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उत्तरम् — अस्माकं मत्रं हरण्यको नाम मूषकराजः गण्डक तीरे चत्रवने नवस त ।
[ हन्द — हमारा मत्र हरण्यक नाम का चूह का राजा गण्डक नद के तट पर चत्रवन म रहता है।]
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स न्धः: हरण्यकः + नाम = हरण्यको नाम — वसगस न्ध का तीसरा नयम (‘अः’ के आगे ‘न्’ जैसा घोष वण हो
s e m तो ‘अः’ का ‘ओ’)।
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प्र.5 (घ) हरण्यकः कपोतानाम् ……………… च कतस्तूष्ण तः ।
उत्तरम् — हरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् च कतस्तूष्ण स्थतः ।
[ हन्द — हरण्यक कपोत के ऊपर से गर पड़ने के भय से च कत होकर चुप बैठा रहा।]
व्याकरणम्: ‘अवपातभयात्’ — पञ्चमी वभ क्त, एकवचन (भय का कारण बताने के लए पञ्चमी आती है)।
स न्ध — च कतः + तूष्णीम् = च कतस्तूष्णीम् ( वसग का ‘स्’)।
प्र.5 (ङ) यतो ह वपत्काले ……………… एव कापुरुषलक्षणम् ।
उत्तरम् — यतो ह वपत्काले वस्मयः एव कापुरुषलक्षणम् ।
[ हन्द — क्य क वप त्त के समय घबरा जाना ही कायर पुरुष का लक्षण है।]
शब्द का ठ क अथ: यहाँ ‘ वस्मयः’ का अथ केवल ‘आश्चय’ नह , ब ल्क हक्का-बक्का रह जाना — वह स्तब्धता
जसम बु द्ध काम करना बन्द कर दे ती है। चत्रग्रीव इसी क नन्दा करता है, क्य क वप त्त म सबसे पहले वही चीज़
चा हए जो सबसे पहले जाती है — वचार।
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न 6 — पृष्ठ 21
पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदे न सह उपयुक्तं पदं योजयत
अभ्यासः
प्र.6 पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्प्रत्ययान्तपदे न सह उपयुक्तं पदं योजयत — (क) वक य (ख) वस्तीय (ग) अवतीय (घ)
अवलोक्य (ङ) एक चत्तीभूय (च) प्रत्य भ ाय । [पदा न — जालम्, जालापहारकान्, उ ीयताम्, तद्वचनम्, भूमौ,
तण्डु लकणान्]
पुस्तक म (घ) अवलोक्य का मलान उदाहरण-रूप म पहले से ख चा हुआ है। शेष पाँच का सही मेल नीचे है — प्रत्येक जोड़ी पाठ
के अपने वाक्य से सद्ध होती है।
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क्रमः ल्यबन्तपदम् उपयुक्तं पदम् पाठस्य वाक्यम्
(क) िवकीय तण्डुल कणान् व्याधः तण्डु लकणान् वक य जालं वस्तीय च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थतः।
(ख) िवस्तीय जालम् व्याधः जालं वस्तीय प्रच्छन्नो भूत्वा स्थतः।
(ग) अवतीय भूम ौ सव कपोताः भूमौ अवतीय तण्डु लकणान् भोक्तुं प्रवृत्ताः।
(घ) अवलोक्य जालापहारकान् स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत्। (उदाहरणम्)
(ङ) एकिचत्तीभूय उ ीयताम् अस्मा भः सवः एक चत्तीभूय जालमादाय उ ीयताम्।
(च) पत्यिभ ाय तद्वचनम् ततो हरण्यकः तद्वचनं प्रत्य भ ाय आनन्दे न त्वरया ब हः नःसृत्य अब्रवीत्।
मलान क कुंजी: ल्यबन्त पद क्रया है, इस लए उसके साथ जुड़ने वाला पद उसका कम या अ धकरण होगा —
यही जाँ चए।
‘ वक य’ ( बखेरकर) — क्या बखेरा? दाने → तण्डु लकणान् (कम)।
‘ वस्तीय’ (फैलाकर) — क्या फैलाया? जाल → जालम् (कम)।
‘अवतीय’ (उतरकर) — कहाँ उतरे? भू म पर → भूमौ (अ धकरण, सप्तमी)।
‘प्रत्य भ ाय’ (पहचानकर) — क्या पहचाना? उसका वचन → तद्वचनम् (कम)।
‘एक चत्तीभूय’ के साथ कोई कम नह — उसके साथ मुख्य क्रया ‘उड्डीयताम्’ ही आएगी।
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न 7 — पृष्ठ 21
समासयुक्तपदे न रक्त ानं पूरयत
अभ्यासः
प्र.7 (क) गण्डक्याः तीरम् = ……………… , त स्मन् = ………………
उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — गण्डक्याः तीरम् = गण्डक तीरम् ; त स्मन् = गण्डक तीरे ।
[ हन्द — गण्डक का तीर = गण्डक तीर; उसम = गण्डक तीरे।]
व ध: यह षष्ठी-तत्पुरुष समास है — वग्रह म षष्ठी वभ क्त (गण्डक्याः) है, समास बनते ही वह वभ क्त लुप्त हो
जाती है और केवल ‘गण्डक ’ शेष रहता है। दूसरा खाना केवल वभ क्त बदलने का है — ‘त स्मन्’ अथात् सप्तमी
एकवचन, इस लए गण्डक तीरम् → गण्डक तीरे।
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प्र.7 (ख) तण्डु लानां कणाः = ……………… , तान् = ………………
उत्तरम् — तण्डु लानां कणाः = तण्डु लकणाः ; तान् = तण्डु लकणान् ।
[ हन्द — चावल के कण = तण्डु लकण; उनको = तण्डु लकणान्।]
समासः: षष्ठी-तत्पुरुषः। ‘तान्’ का अथ द्वतीया बहुवचन है, इस लए ‘तण्डु लकणाः’ (प्रथमा बहुवचन) का द्वतीया
बहुवचन रूप तण्डु लकणान् लखा जाएगा।
प्र.7 (ग) जालस्य अपहारकाः = ……………… , तान् = ………………
उत्तरम् — जालस्य अपहारकाः = जालापहारकाः ; तान् = जालापहारकान् ।
[ हन्द — जाल को ले जाने वाले = जालापहारक; उनको = जालापहारकान्।]
स न्धः: जाल + अपहारकाः म द घ स न्ध होती है — अ + अ = आ, अतः जालापहारकाः। समास षष्ठी-तत्पुरुष
है।
प्र.7 (घ) अवपाताद् भयम् = ……………… , तस्मात् = ………………
उत्तरम् — अवपाताद् भयम् = अवपातभयम् ; तस्मात् = अवपातभयात् ।
[ हन्द — गर पड़ने से भय = अवपातभय; उससे = अवपातभयात्।]
समासः: यह पञ्चमी-तत्पुरुष है, क्य क वग्रह म ‘अवपातात्’ पञ्चमी वभ क्त म है। पाठ का वाक्य —
‘ हरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात् च कतस्तूष्ण स्थतः।’
प्र.7 (ङ) कापुरुषाणां लक्षणम् = ……………… , त स्मन् = ………………
उत्तरम् — कापुरुषाणां लक्षणम् = कापुरुषलक्षणम् ; त स्मन् = कापुरुषलक्षणे ।
[ हन्द — कायर पुरुष का लक्षण = कापुरुषलक्षण; उसम = कापुरुषलक्षणे।]
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समासः: षष्ठी-तत्पुरुषः। ‘लक्षणम्’ नपुंसक लङ्ग, अकारान्त — इसका सप्तमी एकवचन लक्षणे होता है।
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न 8 — पृष्ठ 21–22
साथकपदं ात्वा स न्ध वच्छे दं कुरुत
अभ्यासः
प्र.8 (क) इत्याकण्य = ……………… + ………………
उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — इत्याकण्य = इ त + आकण्य ।
[ हन्द — ‘ऐसा सुनकर’। पाठ म — ‘एतदाकण्य हरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुल कतः सन् अब्रवीत्।’]
स न्धः: यण् स न्ध — ‘इ’ के बाद असवण स्वर ‘आ’ आने पर ‘इ’ का ‘य्’ हो जाता है : इ त + आकण्य =
इत्याकण्य।
प्र.8 (ख) चत्रग्रीवोऽवदत् = ……………… + ………………
उत्तरम् (पुस्तके प्रदत्तम् उदाहरणम्) — चत्रग्रीवोऽवदत् = चत्रग्रीवः + अवदत् ।
[ हन्द — ‘ चत्रग्रीव ने कहा’।]
स न्धः: वसगस न्ध — वसग से पहले भी ‘अ’, बाद म भी ‘अ’; इस लए ‘अः’ का ‘ओ’ हुआ और आगे का ‘अ’
लुप्त होकर ऽ लखा गया।
प्र.8 (ग) बालकोऽत्र = ……………… + ………………
उत्तरम् — बालकोऽत्र = बालकः + अत्र ।
[ हन्द — ‘बालक यहाँ’।]
स न्धः: वही चौथा वसग- नयम — अः + अ = ओऽ। तुलना क जए — कुतः + अत्र = कुतोऽत्र, हतः + अ प =
हतोऽ प।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका
a g l AglaSem · NCERT Solutions
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धैयमथाभ्युदये = ……………… + ……………… + ………………
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agl — धैयमथाभ्युदये = धैयम् + अथ + अभ्युदये ।
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[ हन्द — ‘( वप त्त म) धैय और उन्न त म क्षमा’ — योग्यता वस्तर के दूसरे ोक क पहली पं क्त।]
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s e m(‘म्’ का परसवण/अनुस्वार-र हत योग), (2) अथ + अभ्युदये
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स न्धः: दो स न्धयाँ ह — (1) धैयम् + अथ = धैयमथ
= अथाभ्युदये (द घ स न्ध, अ + अ = आ)।
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भोजनेऽप्यप्रवतनम् = ……………… + ……………… + ………………
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प्र.8 (ङ)
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a उत्तरम् — भोजनेऽप्यप्रवतनम् = भोजने + अ प + अप्रवतनम् ।
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[ हन्द — ‘भोजन म भी प्रवृ त्त न होना’ — कथा के पहले ोक का अंश।]
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स न्धः: (1) भोजने + अ प = भोजनेऽglप (पूवरूप स न्ध — ‘ए’ के बाद ‘अ’ आने पर ‘अ’ लुप्त होकर ऽ), (2)
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अ प + अप्रवतनम् = अप्यप्रवतनम् (यण् स न्ध — इ → य्)।
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. comनमस्ते = ……………… + ……………… a g l
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प्र.8 (च)
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उत्तरम् — नमस्ते = नमः + ते ।
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[ हन्द — ‘तुम्ह नमस्कार’।]
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स न्धः: वसगस न्ध का दूसरा नयम — वसग के बाद ‘त्’ आने पर वसग का स् हो जाता है। तुलना — च कतः +
तूष्णीम् = च कतस्तूष्णीम्।
co m
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a s emप्र.8 (छ)
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उपाय श्चन्तनीयः = ……………… + ………………
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उत्तरम् — उपाय श्चन्तनीयः = उपायः + चन्तनीयः ।
[ हन्द — ‘उपाय सोचा जाना चा हए’।]
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स न्धः: वसग के बाद ‘च्’ हो तो वसग का श् — यही पहला वसग- नयम। पाठ का वाक्य — ‘अस्मा भः अस्य
तरस्कारम् अकृत्वा कश्चन उपाय श्चन्तनीयः।’
प्र.8 (ज) व्याधस्तत्र = ……………… + ………………
उत्तरम् — व्याधस्तत्र = व्याधः + तत्र ।
[ हन्द — ‘बहे लया वहाँ’।]
स न्धः: वसग + ‘त्’ = स् (दूसरा नयम)। यही नयम ‘नमस्ते’, ‘नी तस्तावत्’ और ‘अतस्त्वाम्’ म भी लगा है।
प्र.8 (झ) हरण्यकोऽप्याह = ……………… + ……………… + ………………
उत्तरम् — हरण्यकोऽप्याह = हरण्यकः + अ प + आह ।
[ हन्द — ‘ हरण्यक ने भी कहा’।]
स न्धः: (1) हरण्यकः + अ प = हरण्यकोऽ प ( वसगस न्ध, अः + अ = ओऽ), (2) अ प + आह = अप्याह (यण्
स न्ध, इ → य्)। ‘आह’ ब्रू/अह् धातु का परोक्ष-भूत रूप है — ‘कहा’।
प्र.8 (ञ) मूषकराजो गण्डक तीरे = ……………… + ……………… + ………………
उत्तरम् — मूषकराजो गण्डक तीरे = मूषकराजः + गण्डक + तीरे ।
[ हन्द — ‘चूह का राजा गण्डक के तट पर’।]
स न्धः तथा समासः: वसगस न्ध का तीसरा नयम — ‘अः’ के आगे घोष वण ‘ग्’ आने से मूषकराजो हुआ।
तीसरा खाना समास-घटक का है — गण्डक + तीरे = गण्डक्याः तीरे (षष्ठी-तत्पुरुष)।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका AglaSem · NCERT Solutions
प्र.8 (ट) अतस्त्वाम् = ……………… + ………………
उत्तरम् — अतस्त्वाम् = अतः + त्वाम् ।
[ हन्द — ‘इस लए तुम्ह’।]
स न्धः: वसग + ‘त्’ = स्। ध्यान द जए — यहाँ वसग से पहले ‘अ’ है, फर भी ‘ओ’ नह हुआ, क्य क आगे ‘त्’
अघोष वण है, घोष नह ।
प्र.8 (ठ) क श्चत् = ……………… + ………………
उत्तरम् — क श्चत् = कः + चत् ।
[ हन्द — ‘कोई’। पाठ म — ‘अथ कदा चत् तत्र क श्चद् व्याधः …’]
स न्धः: वसग + ‘च्’ = श् (पहला नयम)। आगे य द घोष वण आ जाए तो ‘त्’ भी ‘द्’ हो जाता है — क श्चत् +
व्याधः = क श्चद् व्याधः।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 22–23
ग्रन्थप रचयः तथा हतोपदे शस्य द्वौ ोकौ
योग्यता वस्तरः
प्र.1 ग्रन्थप रचयः — प्रस्तुतः पाठः कस्मात् ग्रन्थात् स्वीकृतः ? तस्य ग्रन्थस्य प रचयं लखत ।
उत्तरम् — प्रस्तुतः पाठः हतोपदे शग्रन्थस्य ‘ मत्रलाभ’-प्रकरणात् स्वीकृतः । अस्य ग्रन्थस्य लेखकः प ण्डतः नारायणशमा अ स्त ।
अ स्मन् ग्रन्थे मूल्ययुक्तानां, नी तयुक्तानां च वचनानां, सुभा षतानां, कथानां च सङ् ग्रहः अ स्त । अतः अयं ग्रन्थः संस्कृतसा हत्ये
अत्यन्तं समा यते । अ स्मन् ग्रन्थे चत्वा र प्रकरणा न स न्त — (१) मत्रलाभः (२) सुहृ े दः (३) वग्रहः (४) स न्धः इ त । अस्य
अध्ययनेन छात्रः नी त वद्यायां संस्कृतभाषायां च नपुणो भव त ।
[ हन्द — यह पाठ हतोपदे श ग्रन्थ के ‘ मत्रलाभ’ प्रकरण से लया गया है। इसके लेखक प ण्डत नारायण शमा ह। इस ग्रन्थ म
मूल्य और नी त से भरे वचन , सुभा षत तथा कथाओं का संग्रह है, इसी लए संस्कृत सा हत्य म इसका बहुत आदर है। इसम चार
प्रकरण ह — मत्रलाभ, सुहृ े द, वग्रह और स न्ध। इसके अध्ययन से छात्र नी त वद्या और संस्कृत भाषा — दोन म नपुण हो जाता
है।]
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‘ मत्रलाभ’ ही क्य : इस पाठ क कथा म कपोत अकेले कुछ नह कर पाते; उन्ह हरण्यक चा हए। जो अपने पास
नह है वह मत्र से मलता है — इसी वचार का नाम मत्रलाभ है। इस लए यह कथा उसी प्रकरण क है, और पाठ
का शीषक- ोक भी उसी क ओर संकेत करता है।
स्मरणीयम्: हतोपदे श का आधार पञ्चतन्त्र है, पर उसक रचना अलग है — कथा के भीतर कथा, और बीच-बीच म
नी त- ोक। ‘ हत + उपदे श’ = वह उपदे श जो हत करे।
प्र.2 अल्पानाम प वस्तूनां संह तः कायसा धका । तृणैगुणत्वमाप ैबध्यन्ते मत्तद न्तनः ॥ ( हतोपदे शः १.३६) — अस्य
ोकस्य पदच्छे दम्, अन्वयम्, अथ भावं च लखत ।
पदच्छे दः — अल्पानाम् अ प वस्तूनाम् संह तः काय-सा धका । तृणैः गुणत्वम् आपन्नैः बध्यन्ते मत्त-द न्तनः ।
अन्वयः — अल्पानाम् अ प वस्तूनां संह तः काय-सा धका (भव त) । गुणत्वम् आपन्नैः तृणैः मत्त-द न्तनः बध्यन्ते ।
अथः — छोट -छोट वस्तुओं का भी संगठन काय सद्ध कर दे ने वाला होता है। रस्सी का रूप ले चुके तनक से मतवाले हाथी तक
बाँध दए जाते ह।
भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — स्वल्पानां, नबलानाम प वस्तूनां संह तः अथात् सङ् घः, समुदायः लक्ष्य सद्धौ सहा यका भव त । यथा
— घाससमूहेन न मतरज्जुद्वारा गजेन् ा अ प बद्धाः भव न्त ।
ोक क यु क्त: क व दो अ न्तम को टयाँ आमने-सामने रखता है — एक ओर तृण ( जसे उँ गली से तोड़ा जा
सकता है), दूसरी ओर मत्त हाथी ( जसे कोई रोक नह सकता)। बीच म एक ही शब्द है जो पासा पलट दे ता है —
गुणत्वम् आप ैः, अथात् ‘रस्सी-पन को प्राप्त हुए’। तनका जब तक अलग है, तनका है; बँट जाए तो रस्सी है।
संगठन तनके क श क्त नह बढ़ाता — उसका रूप बदल दे ता है।
शब्दसौन्दयम्: ‘गुण’ शब्द के दो अथ यहाँ एक साथ चलते ह — (1) रस्सी, (2) स ण। इसे ेष कहते ह। अथात्
तनके भी ‘गुण’ पा ल तो हाथी बाँध ल।
व्याकरणम्: ‘तृणैः’ तथा ‘आपन्नैः’ — तृतीया वभ क्त, बहुवचन (करण)। ‘बध्यन्ते’ — बन्ध् धातु, कमवाच्य, लट्
लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन। ‘मत्तद न्तनः’ — ‘द न्तन्’ (हाथी) का प्रथमा बहुवचन, यही कमवाच्य का कम है।
‘कायसा धका’ स्त्री लङ्ग है क्य क उसका वशेष्य ‘संह तः’ स्त्री लङ्ग है।
पाठ-सम्बन्धः: कथा म यही ोक गद्य-रूप म आया है — ‘लघूनाम् अ प वस्तूनां संह तः कायसा धका भव त इ त
नी तवचनं लोक सद्धम्।’ और इसका प्रयोग भी दखा दया गया — अकेला कपोत जाल नह उठा सकता, सब
मलकर उठा ले जाते ह।
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प्र.3 वप द धैयमथाभ्युदये क्षमा सद स वाक्पटु ता यु ध वक्रमः । यश स चा भरु चव्यसनं ुतौ प्रकृ त सद्ध मदं ह
महात्मनाम् ॥ ( हतोपदे शः १.३२) — अस्य ोकस्य पदच्छे दम्, अन्वयम्, अथ भावं च लखत ।
पदच्छे दः — वप द धैयम् अथ अभ्युदये क्षमा सद स वाक्-पटु ता यु ध वक्रमः । यश स च अ भरु चः व्यसनम् श्रुतौ प्रकृ त- सद्धम्
इदम् ह महात्मनाम् ।
अन्वयः — अथ वप द धैयम्, अभ्युदये क्षमा, सद स वाक्-पटु ता, यु ध वक्रमः, यश स अ भरु चः, श्रुतौ व्यसनं च — इदं ह
महात्मनां प्रकृ त- सद्धं भव त ।
अथः — वप त्त म धैय, उन्न त के समय क्षमा, सभा म वाणी क कुशलता, युद्ध म पराक्रम, यश म रु च और शास्त्र-श्रवण म लगन
— ये छह गुण महापुरुष म स्वभाव से ही सद्ध होते ह।
भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — महापुरुषाणाम् एतत् आचरणं स्वभाव सद्धमेव भव त । य त्कम प भवेत् ते वपत्काले धैयमवलम्ब्य
समस्याप रहार वषये प्रयत्नं कुव न्त । सम्पत्तौ उन्नतौ च ते सवान् उपकुव न्त । सभायां ते कौशलेन भाषणं कुव न्त । युद्धे ते पराक्रमं
शौय च दशय न्त । यशो वषये ते अ भरु च प्रदशय न्त । शास्त्र वषये च ते अनुरागं प्रकटय न्त ।
ोक क रचना कैसे काम करती है: छह पं क्त-खण्ड, छह अवसर, छह गुण — और हर बार अवसर सप्तमी
वभ क्त म ( वप द, अभ्युदये, सद स, यु ध, यश स, श्रुतौ) तथा गुण प्रथमा म। कोई क्रया बीच म नह आती। यह
सूची-शैली ही ोक को कण्ठस्थ करने योग्य बना दे ती है।
ध्यान द जए, जो ड़याँ जान-बूझकर उलट ह — वप त्त म धैय (जहाँ टू टना स्वाभा वक है) और उन्न त म क्षमा
(जहाँ अकड़ना स्वाभा वक है)। महात्मा वही है जो अवसर के स्वाभा वक दोष से उलटा आचरण करे।
पाठ-सम्बन्धः: यह ोक कथा म तब आता है जब सारे कपोत चत्रग्रीव को दोष दे रहे ह और वह शान्त रहकर
उपाय सोचता है — अथात् वह स्वयं ‘ वप द धैयम्’ का जी वत उदाहरण बन जाता है। पाठ ोक कहकर छोड़ता
नह , उसे घटना म दखा दे ता है।
स न्धः: धैयम् + अथ + अभ्युदये = धैयमथाभ्युदये ; च + अ भरु चः = चा भरु चः (द घ स न्ध) ; अ भरु चः +
व्यसनम् = अ भरु चव्यसनम् ( वसग का ‘र्’) ; प्रकृ त सद्धम् + इदम् = प्रकृ त सद्ध मदम् ।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 23
क्रयापदानां प्रयोगकौशलम् तथा कक्षा-प रचचा
प रयोजनाकायम्
प्र.1 (यथा) पाठात् अधो ल खतानां क्रयापदानां प्रयोगकौशलं ात्वा तत्समाना न अन्या न वाक्या न रचयत — यथा —
तरस्कुव न्त — दुजनाः सज्जनं तरस्कुव न्त ।
यह उदाहरण पुस्तक म दया हुआ है। इससे व ध समझ ली जए — पहले क्रयापद का लकार, पुरुष और वचन दे खए, फर उसी
के अनुरूप कता चुनकर एक छोटा-सा नया वाक्य बनाइए।
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ितरस्कु विन्त → लट् लकार, पथमपुरु ष, बहवु चन
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अतः कत भी बहुवचन चािहए → दुजनाः
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वाक्यम् — दुजनाः सज्जनं ितरस्कु विन्त ।
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ध्यान इसी पर द जए: नया वाक्य बनाते समय क्रयापद को बदलना नह है — वह जैसा दया है वैसा ही रहेगा।
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a s emतरह क क्रया के पुरुष-वचन से मेल खा जाए। यही इस
बदलना केवल कता और कम को है, और वह भी इस
अभ्यास का पूरा कौशल है।
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क्रयताम् — ………………
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नमूना वाक्यम् — छात्रैः गृहकाय सम्यक् क्रयताम् ।
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[ हन्द — छात्र द्वारा गृहकाय भली-भाँ त कया जाए।]
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a gl लोट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (‘ कया जाए’)। कमवाच्य होने
व्याकरणम्: ‘ क्रयताम्’ — कृ धातु, कमवाच्य,
से कता तृतीया म (छात्रैः) और कम प्रथमा म (गृहकायम्) आएगा। पाठ के ‘ चन्त्यताम्’, ‘ नरूप्यताम्’, ‘उड्डीयताम्’
इसी प्रकार के रूप ह।
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अन्यम् उदाहरणम् : अस्मा भः वपत्काले धै य म् अवलम्ब्य उपायः क्रयताम् ।
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नवस त — ………………
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प्र.1 (ख)
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नमूना वाक्यम् — मम मत्रं वाराणस्यां नवस त ।
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[ हन्द — मेरा मत्र वाराणसी म रहता है।]
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g अथ म स्थान सप्तमी वभ क्त
.cव्याकरणम्: ‘ नवस त’ — न + वस्, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन।a‘रहना’
se m म आता है — ‘वाराणस्याम्’। पाठ का वाक्य — ‘ हरण्यको नाम मूषकराजः गण्डक तीरे चत्रवने नवस त।’
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प्र.1 (ग) आह — ………………
नमूना वाक्यम् — गुरुः शष्यम् आह — “सत्यं वद, धम चर” इ त ।
[ हन्द — गुरु शष्य से कहते ह — “सच बोलो, धम का आचरण करो।”]
व्याकरणम्: ‘आह’ — ब्रू (कथन-अथक) धातु का वशेष रूप, प्रथमपुरुष एकवचन — ‘कहता है / कहा’। इसके
साथ जससे कहा जाए वह द्वतीया म आता है ( शष्यम्)। पाठ म — ‘कपोतान् प्र त आह।’
प्र.1 (घ) छे त्स्य त — ………………
नमूना वाक्यम् — कृषकः तीक्ष्णेन शस्त्रेण वृक्षस्य शुष्कां शाखां छे त्स्य त ।
[ हन्द — कसान तेज़ ह थयार से पेड़ क सूखी शाखा काटे गा।]
व्याकरणम्: ‘छे त्स्य त’ — छद् धातु, लृट् लकार (भ वष्यत्), प्रथमपुरुष एकवचन — ‘काटे गा’। पाठ म —
‘सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छे त्स्य त।’
प्र.1 (ङ) सम्भाषसे — ………………
नमूना वाक्यम् — सखे ! त्वम् अद्य मया सह कमथ न सम्भाषसे ?
[ हन्द — मत्र! तुम आज मेरे साथ बात क्य नह कर रहे?]
व्याकरणम्: ‘सम्भाषसे’ — सम् + भाष्, आत्मनेपद , लट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन — ‘तुम बात करते हो’।
इस लए कता ‘त्वम्’ ही होगा। ‘सह’ के योग म तृतीया आती है — ‘मया सह’। पाठ का वाक्य — ‘सखे हरण्यक !
कम् अस्मा भः सह न सम्भाषसे ?’
प्र.1 (च) अब्रवीत् — ………………
नमूना वाक्यम् — पता पुत्रम् अब्रवीत् — “प रश्रमेण एव सफलता लभ्यते” इ त ।
[ हन्द — पता ने पुत्र से कहा — “प रश्रम से ही सफलता मलती है।”]
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व्याकरणम्: ‘अब्रवीत्’ — ब्रू धातु, लङ् लकार (भूतकाल), प्रथमपुरुष एकवचन — ‘कहा’। पाठ म —
‘ हरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुल कतः सन् अब्रवीत्।’
प्र.1 (छ) उपसप त — ………………
नमूना वाक्यम् — क्षुधातः बालकः मातरम् उपसप त ।
[ हन्द — भूख से पी ड़त बालक माता के पास जाता है।]
व्याकरणम्: ‘उपसप त’ = उप + सृप्, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन — ‘पास आता है’ (समीपम् आगच्छ त)।
जसके पास जाया जाए वह द्वतीया म आता है। पाठ म — ‘ हरण्यकः चत्रग्रीवस्य बन्धनं छे त्तुं सत्वरम् उपसप त।’
प्र.1 (ज) युज्यते — ………………
नमूना वाक्यम् — वपत्काले धैयम् एव युज्यते, न तु वषादः ।
[ हन्द — वप त्त के समय धैय ही उ चत है, वषाद नह ।]
व्याकरणम्: ‘युज्यते’ — युज् धातु, कमवाच्य/भाववाच्य, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन — ‘जोड़ा जाता है’,
और लक्षणा से ‘उ चत होता है, फबता है’। अभ्यास प्रश्न 6 का ‘योजयत’ इसी धातु का प्रेरणाथक लोट् -रूप है।
अन्यम् उदाहरणम्: छात्राणां कृते नय मतम् अध्ययनं युज्यते ।
प्र.2 अनया कथया वयं स्वजीवने कां शक्षां स्वीकतु शक्नुमः इ त अ धकृत्य कक्षायां प रचचा कुवन्तु ।
प रचचा कैसे क जए — कक्षा को चार-चार के दल म बाँ टए। हर दल कथा से एक शक्षा चुने, उसे कथा क एक घटना से सद्ध
करे, और फर अपने वद्यालय या मुहल्ले से उसका एक उदाहरण दे । अन्त म शक्षक श्यामपट्ट पर सभी शक्षाओं क सूची बना द।
एक अच्छे उत्तर म तीन होने चा हए — शक्षा, कथा का प्रमाण, अपने जीवन का उदाहरण।
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शक्षा कथायाः प्रमाणम् स्वजीवने प्रयोगः
संग ठन में शिक्त है अकेला कपोत जाल नह उठा सका; सब मलकर िव ालय की सफ़ ाई या वृक्षारोपण — सब िमलकर करे ं
जाल-स हत उड़ गए तो एक घ ण्टे का काम
लोभ िवपित्त का द्वार है नजन वन म चावल दे खकर कपोत लालच म उतर िबना जाने िकसी अनजान िलंक या मु ़ त उपहार पर
पड़े िक्लक न करना
िवपित्त में धै य, दोषारोपण चत्रग्रीव ने दप कपोत का तरस्कार नह कया, परीक्षा में अंक कम आने पर एक -दू स रे को दोष दे ने के
नही ं उपाय सोचा बजाय कमी ढू ँढ़ना
नेता पहले अपने सािथयों को “पूव मदा श्रतानाम् एतेषां पाशान् छनत्तु, पश्चात् दल -नायक पहले सब सद स्यों को काम और ेय बाँटे
दे खता है मम”
सच्चा िमत्र संक ट में काम हरण्यक ने अपने मत्र -स हत सब कपोत के बीमार या िपछड़ रहे सहपाठी की पढ़ ाई में सहायता
आता है बन्धन काट दए करना
बड़ों/अनुभवी की बात सुननी चत्रग्रीव ने चेताया, कपोत ने अव ा क और बँध यात्रा या खेल में िशक्षक -अिभभावक की चेतावनी को
चािहए गए हल्के में न ले ना
नमूना उत्तर (प रचचायाः सारांशः): “इस कथा से हम सबसे बड़ी शक्षा यह मलती है क संगठन बल को नह ,
स्वरूप को बदल दे ता है। तनका अकेला तनका है, पर बटकर रस्सी बन जाए तो मतवाले हाथी को बाँध लेता है।
कपोत अकेले-अकेले जाल म मरते, पर एक चत्त होकर उन्ह ने उसी जाल को उठा लया। हमारे जीवन म भी अनेक
काम ऐसे ह जो अकेले असम्भव लगते ह — वद्यालय क स्वच्छता, बाढ़ या भूकम्प म सहायता, मुहल्ले म जल-
संरक्षण। इनम सबसे क ठन भाग श क्त जुटाना नह , एक चत्त होना है। इस लए हम यह संकल्प ल क कसी भी
सामू हक काय म हम पहले दशा तय करगे, फर मलकर एक ही दशा म श क्त लगाएँगे।”
ध्यातव्यम्: प रचचा म अपने शब्द म बो लए और अपने आसपास का ही उदाहरण द जए — पाठ से केवल एक
वाक्य उद्धत कर द जए, पूरी कथा दोहराने क आवश्यकता नह ।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ का मूल वाक्य — “लघूनाम् अ प वस्तूनां संह तः कायसा धका भव त” (पृष्ठ 13)। छोट -छोट , दुबल वस्तुओं का भी
संगठन बड़ा काम कर दे ता है। शीषक म यही बात हतोपदे श के ोक-शब्द म है — अल्पानाम प वस्तूनां संह तः
कायसा धका।
बाहरी कथा (पृष्ठ 10–11) — कुछ मत्र ग्रीष्मावकाश म दे वभू म उत्तराखण्ड जाते ह। श्रीकेदारक्षेत्र चढ़ते समय तेज़ वृ ष्ट होती
है, अन्धकार फैलता है, नद के वेग से सेतु टू ट जाता है और पवतस्खलन हो जाता है। सब रोने लगते ह; केवल नायक सुधीरः
धैय नह छोड़ता।
भीतरी कथा (पृष्ठ 12–14) — गोदावरी-तीर के शाल्मली वृक्ष पर व्याध चावल बखेरकर जाल फैलाता है। कपोतराज
चत्रग्रीवः मना करता है, पर लोभ से खचे कपोत उतर पड़ते ह और बँध जाते ह। चत्रग्रीव तरस्कार नह करता — सबको
एक चत्त होकर जाल-स हत उड़ जाने का आदे श दे ता है, और मूषकराज हरण्यकः उनके पाश काट दे ता है।
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नायकत्व क परीक्षा — चत्रग्रीव कहता है — “पूव मदा श्रतानाम् एतेषां पाशान् छनत्तु, पश्चात् मम।” पहले आ श्रत के
बन्धन काटो, बाद म मेरे। हरण्यक इसी आ तवात्सल्य पर उसे तीन लोक का स्वा मत्व-योग्य कहता है।
व्याकरण का केन्द्र (पृष्ठ 17–19) — ल्यप्-प्रत्ययः। जहाँ धातु के पहले उपसग हो वहाँ क्त्वा के स्थान पर ल्यप् होता है और
केवल ‘य’ शेष रहता है — अवलोक्य, वक य, वस्तीय, अवतीय, एक चत्तीभूय, प्रत्य भ ाय। साथ ही वसगस न्ध के चार
नयम — क श्चत्, च कतस्तूष्णीम्, हरण्यको नाम, कुतोऽत्र।
शक्षा — कथा सुनाकर नायक पूछता है — “त ह कमथ वयं संघ टताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कतु न शक्नुमः?” सब भय, शोक
और सन्दे ह छोड़कर भगीरथ-प्रयत्न से सेतु बनाते ह और अपने तथा दूसर के प्राण बचा लेते ह।
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ ENGLISH
भग्नः नष्टः टू ट गया Broke down
अक्रन्दन् रुदिन्त स्म रोये They cried
सम्भूय िमिलत्वा मलकर Together
व्याधः लुब्धकः बहे लया Hunter
तण्डु लकणान् तण्डुल लवान् चावल के दान को Rice grains
वक य िविकरणं कृ त्वा बखेर कर Having scattered
वस्तीय िवस्तरणं कृ त्वा फैलाकर Having spread
प्रच्छन्नः ग प्ु तः छपा हुआ Stood secretly
अवतीय अवतरणं कृ त्वा उतर कर Having descended
एक चत्तीभूय एकमनसा एक चत्त होकर With united mind
कापुरुषलक्षणम् कु ित्सतपुरुषाणां िचह्नम् कायर पुरुष का लक्षण Signs of a coward
पाशान् बन्धनािन बन्धन को Captivity (bonds)
प्रत्य भ ाय ात्वा पहचानकर Having recognized
आ श्रतवात्सल्येन शरणम् आगतानां कृ ते शरण म आए हुओं के प्र त प्रेम Affection towards those who take
स्नेहभावेन से shelter
अव ा ितरस्कारः नन्दा, अनादर Disrespect
वस्मयः आश्चयम् आश्चय, घबराहट Amazement
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