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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 3: सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं
कुरु
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
24 – 35 11 55 हन्द
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 8 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 3: सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं
कुरु
NCERT कक्षा 8 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के तृतीयः पाठः — सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु के सम्पूण हल। यह पाठ कसी एक
कथा का नह , ब ल्क आठ सुभा षत (नी त ोक ) का संग्रह है, जन्ह वष्णुपुराण, महाभारत, भतृह र के नी तशतक, हतोपदे श तथा चाणक्यनी त
जैसी नी तपरम्परा से चुना गया है। पाठ का आरम्भ पतामही और पौत्री के चत्र-संवाद से होता है — सुष्ठु भा षता न इ त सुभा षता न — और फर
प्रत्येक ोक के साथ पुस्तक स्वयं पदच्छे दः, अन्वयः तथा भावाथः दे ती है। नीचे पृष्ठ 24 से 35 तक के चत्र-संवाद के प्रश्न, आठ ोक का
पदच्छे द → अन्वय → अथ → भाव (छन्द तथा अलङ् कार स हत), वयं शब्दाथान् जानीमः, अत्र इदम् अवधेयम्, अभ्यासात् जायते स द्धः के
प्रश्न १–५ (हर उपभाग स हत), योग्यता वस्तरः तथा प रयोजनाकायम् क्रम से हल कए गए ह — पहले संस्कृत उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 8) 24 – 35
खं ड प्रश्न
11 55
माध्यम
हन्द
चत्र-संवादः — पृष्ठ 24
पाठारम्भे पताम ाः पौत्र्याः च संवादः
पाठः
प्र.1 नी त ोकाः ...?
उत्तरम् — आम्। नी त ोकाः। नी त ोकाः नाम सुभा षता न। (हाँ, नी त ोक। नी त ोक ही सुभा षत कहलाते ह।)
पौत्री पतामही से एक नई कथा सुनाने को कहती है — पताम ह! एकां नूतनां कथां कथयतु। पतामही उत्तर दे ती ह — वत्से! त्वं
प्र त दनं तु कथां शृणो ष, अद्य नी त ोकान् शृणु। (बेट ! तुम तो प्र त दन कथा सुनती हो, आज नी त ोक सुनो।) तब पौत्री आश्चय
से पूछती है — ‘नी त ोकाः …?’
क्य यही उत्तर: पतामही का ही अगला वाक्य इसका उत्तर है — नी त ोकाः नाम सुभा षता न। अथात् जन
ोक म जीवन क नी त, अथात् सही आचरण क सीख होती है, उन्ह ही सुभा षत कहते ह। ‘नाम’ अव्यय यहाँ
‘अथात् / कहलाते ह’ के अथ म आया है।
व्याकरण-सूचना: शृणु — ‘श्रु’ धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन (तुम सुनो)। शृणो ष — लट् लकार,
मध्यम पुरुष, एकवचन (तुम सुनती हो)। कथयतु — लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन — बड़ के लए आदरपूवक
प्राथना।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 क नाम सुभा षता न ?
उत्तरम् — सुष्ठु भा षता न इ त सुभा षता न, अथात् शोभना न वचना न। ता न सवदा जनानां हताय भव न्त। (जो अ तरह कहे
गए ह , वे सुभा षत ह, अथात् सुन्दर वचन। वे सदा लोग के हत के लए होते ह।)
शब्द -रचना: सु + भािषत = सुभािषतम्
सु = सुष्ठु / शोभनम् (अच्छी तरह, सुन्दर)
भािषतम् = किथतम्, उक्तं वचनम् (कहा गया वचन)
अतः सुभ ािषतम् = सुष्ठु भािषतं वचनम्
भाव सम झए: सुभा षत क पहचान केवल यह नह क वह सुन्दर लगे, ब ल्क यह है क वह जनानां हताय हो —
सबके हत का हो। इसी लए पतामही आगे कहती ह क सुभा षत स्वकतव्यस्य अकतव्यस्य च वषये स्पष्टतया
मागदशनं कुव न्त — क्या करना चा हए और क्या नह , यह स्पष्ट रूप से बताते ह।
ध्यातव्यम्: ‘इ त’ यहाँ प रभाषा जोड़ने वाला अव्यय है — ‘सुष्ठु भा षता न इ त सुभा षता न’ = ‘अ तरह कहे
गए वचन — यही सुभा षत ह।’
प्र.3 सुभा षतपठनेन कः लाभः ?
उत्तरम् — सुभा षतपठनेन आदश-मानवजीवन- नमाणाय प्रेरणा प्राप्यते। मानवजीवनस्य सुखाय समृ े च सुभा षतानां पठनस्य
आवश्यकता अ स्त। यः सुभा षता न प ठत्वा कायक्षेत्रे तस्य ज्ञानस्य प्रयोगं करो त सः बहून् लाभान् प्रा ो त। (सुभा षत पढ़ने से
आदश मानव-जीवन बनाने क प्रेरणा मलती है। मानव-जीवन के सुख और समृ द्ध के लए सुभा षत का पठन आवश्यक है। जो
सुभा षत पढ़कर अपने कायक्षेत्र म उस ज्ञान का प्रयोग करता है, वह बहुत लाभ पाता है।)
प्रेरणा — आदश जीवन गढ़ने क दशा मलती है।
मागदशन — कतव्य और अकतव्य का भेद स्पष्ट होता है।
सुख और समृ द्ध — जीवन सुखमय बनता है।
प्रयोग — पढ़ा हुआ जब कायक्षेत्र म उतरता है, तभी वास्त वक लाभ होता है।
सबसे महत्त्वपूण बात: पतामही का बल केवल पठन पर नह , प्रयोग पर है — यः … कायक्षेत्रे तस्य ज्ञानस्य प्रयोगं
करो त सः बहून् लाभान् प्रा ो त। इस लए पाठ का शीषक भी ‘सुभा षत-रस पीकर जीवन सफल करो’ है — केवल
पढ़ो नह , आचरण म उतारो।
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व्याकरण-सूचना: सुभा षतपठनेन — तृतीया वभ क्त, एकवचन (‘सुभा षत पढ़ने से’) — साधन या कारण
बताने म तृतीया आती है।
सुभा षता न — पदच्छे दः, अन्वयः, अथः, भावः च — पृष्ठ 25–29
पाठे आगतानां अष्टानां सुभा षतानां सम्पूण व्याख्यानम् (छन्दः, अलङ् कारः च स हतम्)
ोकव्याख्या
ोक 1 गाय न्त दे वाः कल गीतका न धन्यास्तु ते भारतभू मभागे। स्वगापवगास्पदमागभूते भव न्त भूयः पुरुषाः
सुरत्वात्॥ १॥ — इस ोक का पदच्छे द, अन्वय, अथ तथा भाव ल खए।
ोतः — वष्णुपुराणम्। छन्दः — उपजा त (प्र त पाद 11 अक्षर; इन्द्रव ा और उपेन्द्रव ा का मश्रण)। अलङ् कारः — रूपक
(भारतभू म पर ‘स्वग और मोक्ष के माग’ का आरोप) तथा अनुप्रास (भारतभू मभागे, भव न्त भूयः म ‘भ’ क आवृ त्त)।
पद च्छे द ः — गायिन्त। दे वाः। िकल। गीतकािन। धन्याः। त ।ु ते । भारतभूिमभागे।
स्वग पवग स्पद-मागभूते । भविन्त। भूयः। पुरु षाः। सुरत्वात्।
अन्वयः — भारतभू मभागे (ये) भव न्त ते धन्याः इ त दे वाः गीतका न गाय न्त कल। स्वगापवगास्पद-मागभूते (भारतभू मभागे) तु
(दे वाः) सुरत्वात् भूयः पुरुषाः (भव न्त)।
अथः — दे वता नश्चय ही यह गीत गाते ह क ‘जो भारतभू म के भाग म जन्म लेते ह, वे धन्य ह’। स्वग और मोक्ष — दोन क प्रा प्त
का माग बनी हुई इस भारतभू म म तो दे वता भी अपना दे वत्व छोड़कर बार-बार मनुष्य बनते ह।
पदम् अथः हन्द
िकल नश्चयेन श्
िन चय ही
धन्याः प्रशं सताः पशंस ा क ग्
े यो य
अपवगः नवाणम् मो क्ष
आस्पदम् स्थानम् स्थान, आधार
भूयः पुनः पुनः -
बार बार
सुर त्वात् दे वत्वात् त्
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु
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भावः: जो मनुष्य इस भारतभू म म जन्म पाते ह, वे धन्य ह — ऐसा गुणगान स्वयं दे वता करते ह। अतः हम सब
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भारतीय भाग्यशाली ह। धम, अथ, काम और मोक्ष — चार पुरुषाथ क प्रा प्त का माग बने इस भूeख
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o ष्य-रूप म जन्म लेना चाहते ह। ोक का तक सीधा है — जस भू मaकोglपाने के लए दे वता तक
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अपनाsदेeवपद छोड़ने को तैयार ह , उस भू म म जन्म लेना कतना बड़ा सौभाग्य है!
दे वत्व छोड़कर
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समास- वग्रहः: स्वगापवगास्पदमागभूते = स्वगः च अपवगः च (स्वगापवग ), तयोः आस्पदम् = स्वगापवगास्पदम्,
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तस्य मागभूते — अथात् ‘स्वग तथा मोक्ष के स्थान का माग बने हुए (भूभाग) म’। भारतभू मभागे = भारतभूम्याः
भागे (षष्ठी तत्पुरुष), सप्तमी वभ क्त, एकवचन।
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m करी च सहस्य
गुणी गुणं वे त्त न वे त्त नगुणः बली बलं वे त्त न वे त्त नबलः। पको वसन्तस्य गुणं नeवायसः
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cबलंo न मूषकः॥ २॥ — इस ोक का पदच्छे द, अन्वय, अथ तथा भाव लaखए। gl a
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ोतः — भतृहरेः नी तशतकम्। छन्दः — वंशस्थ (प्र त पाद 12 अक्षर; गण-क्रम — ज त ज र)। अलङ् कारः — दृष्टान्त (पूवाध म
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सामान्य नयम, उत्तराध म कोयल-कौआ तथा हाथी-चूहा के उदाहरण) तथा छे कानुप्रास (गुणी गुणं, बली बलं)।
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पद च्छे द ः — गुणी। गुणम्। वेित्त। a g
न। वेित्त। िनगुणः। बली। बलम्। वेित्त। न। वेित्त। िनबलः।
िपकः। वसन्तस्य। गुणम्। न। वायसः। करी। च। िसंहस्य। बलम्। न। मूषकः।
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अन्वयः — गुणी गुणं वे त्त। नगुणः (गुणं) न वे त्त। बली बलं वे त्त, नबलः (बलं) न वे त्त। पकः वसन्तस्य गुणं (वे त्त), वायसः
a s em(वसन्तस्य गुणं) न (वे त्त)। करी च सहस्य बलं (वे त्त)। मूषकः ( सहस्य बलं) न वे त्त।
agl अथः — गुणवान् व्य क्त ही गुण को पहचानता है, गुणहीन नह पहचानता। बलवान् ही बल को जानता है, बलहीन नह जानता।
कोयल ही वसन्त के गुण को जानती है, कौआ नह ; और हाथी ही सह के बल को जानता है, चूहा नह ।
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भावः: गुणवान् मनुष्य दूसर के सद्गण पहचान लेता है, परन्तु गुणहीन दूसर के गुण समझ ही नह पाता। बलवान्
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दूसर का बल आँक लेता है, बलहीन नह । वसन्त आने पर कोयल उसके गुण के अनुरूप मधुर कुहू-कुहू करती है, पर
कौआ मधुर गा ही नह सकता। हाथी पशुराज सह के बल को जानता है, पर चूहा उसे जान ही नह सकता। नष्कष
— योग्य ही योग्यता का महत्त्व जान सकता है, अयोग्य नह ।
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om 8 के लए एक वचार: इस l a se
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ोक का उपयोग दूसर को ‘अयोग्य’aकहने
se m सन्दे श यह है क य द हम दूसर के गुण नह दे ख पा रहे, तो सम्भव है कमी हमारी अपनी दृ ष्ट म हो। इस लए गुण-
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ग्रहण क क्षमता स्वयं एक गुण है।
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व्याकरण-सूचना: नगुणः = नगतः गुणः यस्मात् सः (बहुव्री ह समास) — गुणर हत। पकः (कोयल), वायसः
(कौआ), करी (हाथी), मूषकः (चूहा) — चार प्रथमा वभ क्त, एकवचन, पुं ल्लङ्ग। वे त्त — ‘ वद्’ धातु, लट्
लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
ोक 3 भव न्त नम्रास्तरवः फलोद्गमैनवाम्बु भदूर वल म्बनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृ द्ध भः स्वभाव एवैष
परोपका रणाम्॥ ३॥ — इस ोक का पदच्छे द, अन्वय, अथ तथा भाव ल खए।
ोतः — भतृहरेः नी तशतकम्। छन्दः — वंशस्थ (प्र त पाद 12 अक्षर)। अलङ् कारः — अथान्तरन्यास (पहले वृक्ष तथा मेघ के
वशेष उदाहरण, फर अ न्तम पाद म ‘यही परोपका रय का स्वभाव है’ — सामान्य सद्धान्त); साथ ही दृष्टान्त।
पद च्छे द ः — भविन्त। नमाः। तरवः। फलोद् गमैः। नवाम्बुिभः। दू रिवलिम्बनः। घनाः।
अनुद्ध ताः। सत्पुरु षाः। समृिद्धिभः। स्वभावः। एव। एषः। परोपकािरणाम्।
अन्वयः — तरवः फलोद्गमैः नम्राः भव न्त। घनाः नवाम्बु भः दूर वल म्बनः (भव न्त)। सत्पुरुषाः समृ द्ध भः अनुद्धताः (भव न्त)।
परोपका रणाम् एष एव स्वभावः (भव त)।
अथः — वृक्ष फल के भार से झुक जाते ह; बादल नए जल से भरकर नीचे क ओर झुक आते ह; और सज्जन पुरुष सम्प त्त बढ़ने
पर घमण्ड नह करते। परोपका रय का यही स्वभाव होता है।
कौन कससे क्या होता है
तरवः (वृक्ष) फलोद्गमैः (फल के भार से) नम ाः — झ ुक जाते है ं
घनाः (बादल) नवाम्बु भः (नए जल से) म्
दू रिवल ि बनः — नीचे झ ुक आते है ं
सत्पुरुषाः (सज्जन) समृ द्ध भः (सम्प त्त से) अन ुद्धताः — गवरिहत रहते है ं
भावः: समय आने पर वृक्ष म फल लगते ह और फल के भार से वे वृक्ष झुक जाते ह। इसी प्रकार नए जल से भरे
बादल नीचे झुक आते ह, धरती क ओर आते ह और वषा करते ह। संसार म बहुत-से परोपकारी लोग ह; अपनी
समृ द्ध के समय वे उद्दण्डता प्रकट नह करते। वे सहृदय और वनम्र होकर सदा परोपकार म लगे रहते ह और
परोपकार को व्रत क तरह धारण करते ह। व्यासमह ष ने भी कहा है — परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।
तक को पक ड़ए: तीन उदाहरण म एक ही नयम काम कर रहा है — जो जतना भरता है, उतना झुकता है।
खाली डाल और सूखा बादल तने रहते ह। इस लए झुकना दुबलता नह , सम्पन्नता का चह्न है। यही कारण है क
वकल्प ‘वृक्षाणां कठोरता’ या ‘परोपका रणां दुबलता’ इस ोक का अथ नह हो सकते।
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स न्ध- वच्छे दः: नम्रास्तरवः = नम्राः + तरवः ( वसगस न्ध)। फलोद्गमैनवाम्बु भः = फलोद्गमैः + नवाम्बु भः।
स्वभाव एवैष = स्वभावः + एव + एषः ( वसगलोप तथा वृ द्धस न्ध)। अनुद्धताः = न उद्धताः (नञ् तत्पुरुष समास)।
ोक 4 यथा चतु भः कनकं परीक्ष्यते नघषणच्छे दनतापताडनैः। तथा चतु भः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन
कमणा॥ ४॥ — इस ोक का पदच्छे द, अन्वय, अथ तथा भाव ल खए।
ोतः — नी तपरम्परा का प्र सद्ध ोक (चाणक्यनी त म उपलब्ध)। छन्दः — वंशस्थ (प्र त पाद 12 अक्षर)। अलङ् कारः —
दृष्टान्त (‘यथा … तथा’ से सोने क परीक्षा और मनुष्य क परीक्षा का बम्ब-प्र त बम्ब भाव)।
पद च्छे द ः — यथा। चत िु भः। कनकम्। परीक्ष्यते । िनघषण-च्छे द न-ताप-ताडनै ः। तथा।
चत िु भः। पुरु षः। परीक्ष्यते । कु लेन । शीलेन । गुणेन । कमणा।
अन्वयः — यथा नघषण-छे दन-ताप-ताडनैः चतु भः (उपायैः) कनकं परीक्ष्यते, तथा कुलेन शीलेन गुणेन कमणा (च) चतु भः पुरुषः
परीक्ष्यते।
अथः — जैसे घसना, काटना, तपाना और पीटना — इन चार उपाय से सोने क परीक्षा क जाती है, वैसे ही कुल, शील, गुण और
कम — इन चार कसौ टय से मनुष्य क परीक्षा क जाती है।
सोने क कसौट अथ मनुष्य क कसौट अथ
िनघषणम् घसना कु ले न िकस पिरवार में ज म न्
छे द नम् काटना शीले न कै सा स्वभाव
तापः अ ग्न म तपाना गण
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कौन से ग ुण
ताडनम् पीटना कमणा कै से कम
भावः: सुनार सोने क शुद्धता आँकने के लए पहले कसौट -पत्थर पर उसे घसता है, फर उस सोने को काटता है,
फर आग म तपाता है और अन्त म सोने के टु कड़े पर प्रहार करता है। इन चार प्रकार से परीक्षा करके ही वह सोने
क पूण शुद्धता जान पाता है। उसी प्रकार मनुष्य क भी चार उपाय से परीक्षा करनी चा हए — यह व्य क्त कस
प रवार म जन्मा? इसका स्वभाव कैसा है? यह कन गुण से युक्त है? और कस कम के कारण यह सवत्र आदर
पाता है? इन्ह कसौ टय पर परखकर ही कसी का व्य क्तत्व जाना जा सकता है।
ध्यान द जए: चार कसौ टयाँ बराबर क नह ह — कुल मनुष्य के हाथ म नह है, पर शील, गुण और कम उसके
अपने बनाए हुए ह। इस लए ोक चार म से तीन कसौ टयाँ ऐसी दे ता है जन पर हम स्वयं काम कर सकते ह। सोने
क तरह मनुष्य भी क ठनाई क आँच म ही परखा जाता है।
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व्याकरण-सूचना: परीक्ष्यते — कमवाच्य (लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन) — ‘परीक्षा क जाती है’। चतु भः,
नघषणच्छे दनतापताडनैः, कुलेन, शीलेन, गुणेन, कमणा — सभी तृतीया वभ क्त (करण कारक), क्य क ये
परीक्षा के साधन ह।
ोक 5 अष्टौ गुणाः पुरुषं द पय न्त प्रज्ञा च कौल्यं च दमः ुतं च। पराक्रमश्चाबहुभा षता च दानं यथाश क्त कृतज्ञता
च॥ ५॥ — इस ोक का पदच्छे द, अन्वय, अथ तथा भाव ल खए।
ोतः — महाभारत क नी तपरम्परा का सुप्र सद्ध ोक। छन्दः — उपजा त (प्र त पाद 11 अक्षर; इन्द्रव ा एवं उपेन्द्रव ा का
मश्रण — पहले पाद म छन्द क थोड़ी छू ट है)। अलङ् कारः — रूपक क छाया (‘द पय न्त’ म गुण को द पक-सदृश कहा गया
— गुण मनुष्य को प्रका शत करते ह) तथा समुच्चय (एक साथ आठ गुण का कथन)।
पद च्छे द ः — अष्टौ। गुणाः। पुरु षम्। दीपयिन्त। पज्ञा। च। कौल्यम्। च। दमः। श्रुत म्। च।
पराक्रमः। च। अबहुभ ािषता। च। दानम्। यथाशिक्त। कृ तज्ञता। च।
अन्वयः — प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, श्रुतं, पराक्रमः, अबहुभा षता च, यथाश क्त दानं, कृतज्ञता च (इत्येते) अष्टौ गुणाः पुरुषं द पय न्त।
अथः — आठ गुण मनुष्य को चमकाते ह — व शष्ट बु द्ध, अ े कुल म जन्म, इ न्द्रय का संयम, शास्त्र का ज्ञान, पराक्रम, कम
कन्तु साथक बोलना, सामथ्य के अनुसार दान और कृतज्ञता।
क्रमः गुणः अथः (संस्कृत) हन्द
१ पज्ञा वशेषज्ञानम् ष्
िविश ट ब ुि द्ध
२ कौल्यम् कुलीनता च्
अ छे कु ल में ज म न्
३ दमः इ न्द्रयसंयमः न्
इि द यों का संयम
४ श्रुतम् शास्त्रज्ञानम् शा स्त्र ों का ज्ञ ान
५ पराक्रमः साहसः वीरता
६ अबहुभािषता मतभा षता कम और साथक बोल ना
७ यथाशिक्त दानम् सामथ्यानुसारं दानशीलता साम थ् य के अन ुसार द ान
८ कृ तज्ञता उपकारस्मरणम् िकए हुए उ पकार को मानना
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भावः: इन आठ गुण से युक्त मनुष्य समाज म सदा सम्मान पाता है। मनुष्य उत्तम गुण का आश्रय लेकर ही
सम्मा नत होता है, इसी लए कहा गया है — गुणवान् पूज्यते नरः। ध्यान दे ने योग्य बात यह है क ‘द पय न्त’ क्रया
चुनी गई है — गुण मनुष्य को द पक क तरह प्रका शत करते ह; अथात् प्रकाश बाहर से नह आता, गुण से भीतर
ही जलता है।
समास- वग्रहः: यथाश क्त = श क्तम् अन तक्रम्य (अव्ययीभाव समास) — ‘सामथ्य से बाहर जाए बना’।
अबहुभा षता = न बहुभा षता (नञ् तत्पुरुष) — बहुत न बोलना। पराक्रमश्चाबहुभा षता = पराक्रमः + च +
अबहुभा षता ( वसगस न्ध तथा द घस न्ध)। अष्टौ — संख्यावाचक वशेषण, प्रथमा बहुवचन।
ोक 6 न सा सभा यत्र न स न्त वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वद न्त धमम्। धमः स नो यत्र न सत्यम स्त सत्यं न
तद्यच्छलमभ्युपै त॥ ६॥ — इस ोक का पदच्छे द, अन्वय, अथ तथा भाव ल खए।
ोतः — महाभारतम्। छन्दः — उपजा त (प्र त पाद 11 अक्षर; पहला पाद उपेन्द्रव ा, दूसरा इन्द्रव ा)। अलङ् कारः — अनुप्रास
तथा शृंखलाबद्ध (एकावली-सदृश) कथन-शैली — प्रत्येक चरण का अ न्तम पद अगले चरण का वषय बन जाता है : सभा →
वृद्ध → धम → सत्य।
पद च्छे द ः — न। सा। सभा। यत्र। न। सिन्त। वृद्धाः। वृद्धाः। न। ते । ये। न। वदिन्त। धमम्।
धमः। सः। नो। यत्र। न। सत्यम्। अिस्त। सत्यम्। न। तद् । यद् । छलम्। अभ्युपैित।
अन्वयः — सा सभा न (अ स्त), यत्र वृद्धाः न स न्त। ते वृद्धाः न (स न्त), ये धम न वद न्त। सः धमः न उ (अ स्त), यत्र सत्यं न अ स्त।
तत् सत्यं न (अ स्त), यत् छलम् अभ्युपै त।
अथः — वह सभा, सभा नह जहाँ वृद्ध (अनुभवी एवं ज्ञानी जन) न ह । वे वृद्ध, वृद्ध नह जो धम क बात न कह। वह धम, धम नह
जसम सत्य न हो। और वह सत्य, सत्य नह जो छल से युक्त हो।
श्र ृंखला इस पकार बनती है —
सच्ची सभा ← उसमें वृद्ध हों
सच्चे वृद्ध ← जो धम कहे ं
सच्चा धम ← िजसमें सत्य हो
सच्चा सत्य ← िजसमें छल न हो
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भावः: इस संसार म अनेक प्रकार क सभाएँ होती ह। सभाओं म लोग का जमघट होता है, बहुत बोलना चलता है,
पर उससे सफलता नह मलती। वस्तुतः वही सभा सफल होती है जसम आयु से वृद्ध और ज्ञान सेem
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प्रकार के जन.cहo। फर वे ज्ञानवृद्ध धम के वषय म बोल। और धम-सम्बन्धी चचा म सत्य ही
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यहाँ ‘वृद्ध’ का अथ: केवल आयु म बड़ा नह । ोक स्वयं प रभाषा दे रहा है — वृद्ध वही है जो धम क बात
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कहे। भावाथ म पुस्तक ने दो शब्द दए ह — वयोवृद्धाः (आयु म बड़े) और ज्ञानवृद्धाः (ज्ञान म बड़े)। सभा को दोन
चा हए।
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स न्ध- वच्छे दः: सत्यम स्त = सत्यम् + अ स्त। तद्यच्छलमभ्युपै त = तत् + यत् + छलम् + अभ्युपै त। अभ्युपै त =
s e mअवधारण-अथक
अव्यय)। com gla
अ भ + उप + ए त (यण् स न्ध ‘अ भ + उप’ म, वृ द्ध स न्ध ‘उप + ए त’ म)। नो = न + उ (‘उ’
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पदच्छे द, अन्वय, अथ तथा भाव ल खए।.co agl
ोक 7 दुजनेन समं सख्यं प्री त चा प न कारयेत्। उष्णो दह त चा ारः शीतः कृष्णायते करम्॥ ७॥ — इस ोक का
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उत्तर agl
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ोतः — चाणक्यनी तः। छन्दः — अनुष्टुप् ( ोक) — प्र त पाद 8 अक्षर, कुल 32 अक्षर। अलङ् कारः — दृष्टान्त (दुजन के लए
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अङ्गारे का उदाहरण); साथ ही वरोधमूलक चमत्कार — अङ्गारा गरम हो तो जलाता है और ठण्डा हो तो काला करता है, अथात्
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हा न दोन दशाओं म।
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a gl पद छे दः — दुजने न। समम्। सख्यम्। पीितम्। च। अिप। न। कारयेत्।
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उष्णः। दहित। च। अङ् गारः। शीतः। कृ ष्णायते । करम्।
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अन्वयः — दुजनेन समं सख्यं प्री त च अ प न कारयेत्। उष्णः अङ्गारः दह त, शीतः च करं कृष्णायते।
अथः — दुष्ट व्य क्त के साथ न मत्रता करनी चा हए और न प्रेम। अङ्गारा य द गरम हो तो हाथ जला दे ता है, और य द ठण्डा हो तो
हाथ काला कर दे ता है।
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a s emका समानान्तर
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अ ारे क अवस्था प रणाम दुजन
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— जल ा दे ता है क्रोध म हो तो प्रत्यक्ष हा न
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शीतः (ठण्डा) — काल ा कर दे ता है शान्त दखे तब भी बदनामी
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कृ णायते
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
भावः: दुजन के साथ मैत्री नह करनी चा हए, क्य क दुजन वश्वास के योग्य नह होता। उसके साथ बन्धुता या प्री त
भी नह करनी चा हए, क्य क उस दुजन के मुख म मधुरता होती है पर हृदय म कपट। अङ्गारा गरम हो तो ताप से
हाथ जला दे ता है; और य द वही अङ्गारा ठण्डा हो तो भी हाथ को मैला कर दे ता है। इसी प्रकार दुजन सदा अ नष्ट
करता है और कराता भी है। अतः वद्या से अलङ् कृत होने पर भी दुजन का त्याग करना चा हए।
तक क सुन्दरता: उपमा केवल ‘दुजन जलाता है’ तक नह रुकती। क व दोन अवस्थाएँ गनाता है — इससे सद्ध
होता है क दुजन से बचने का कोई ‘सुर क्षत समय’ नह होता। यही इस ोक का सबसे बलवान् तक है।
व्याकरण-सूचना: कारयेत् — व ध लङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन (‘करनी चा हए’ — उपदे श के अथ म)।
दुजनेन — तृतीया वभ क्त, एकवचन; ‘समम्’ (साथ) के योग म तृतीया आती है। चा ारः = च + अङ्गारः
(द घस न्ध)। कृष्णायते — नामधातु (कृष्ण → कृष्णायते ‘काला करता है’), आत्मनेपद।
ोक 8 यथा ेकेन चक्रेण न रथस्य ग तभवेत्। एवं पुरुषकारेण वना दै वं न सध्य त॥ ८॥ — इस ोक का पदच्छे द,
अन्वय, अथ तथा भाव ल खए।
ोतः — हतोपदे शः। छन्दः — अनुष्टुप् ( ोक) — प्र त पाद 8 अक्षर। अलङ् कारः — दृष्टान्त (‘यथा … एवं’) तथा रूपक —
भावाथ म मानव-जीवन को रथ और प्रयत्न एवं भाग्य को उसके दो प हये कहा गया है।
पद च्छे द ः — यथा। िह। एके न। चक्रे ण। न। रथस्य। गितः। भवेत ्।
एवम्। पुरु षकारेण। िवना। दै वम्। न। िसध्यित।
अन्वयः — यथा ह एकेन चक्रेण रथस्य ग तः न भवेत्, एवं पुरुषकारेण वना दै वं न सध्य त।
अथः — जैसे एक ही प हये से रथ नह चल सकता, वैसे ही पुरुषाथ के बना भाग्य सद्ध नह होता (फल नह दे ता)।
मानवरथस्य े चक्रे
मानवरथः
पयत्नः दैवम्
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
पुस्तक के भावाथ के अनुसार — प्रयत्न और भाग्य मानव-रूपी रथ के दो प हये ह। एक प हये से रथ नह चलता।
भावः: रथ क ग त दो प हय से ही ठ क प्रकार होती है। एक प हये से रथ का चलना सम्भव नह ; रथ क ग त रुक
जाएगी। इसी प्रकार पुरुषाथ के बना फल सद्ध नह होता। भाग्य के रहते हुए भी उद्योग से ही फल मलता है। यहाँ
अनुभव कया जाता है क प्रयत्न और भाग्य — ये मानव-रथ के दो प हये ह। कहा भी गया है — उद्यमेन ह
सध्य न्त काया ण न मनोरथैः।
व्याकरण-सूचना: ेकेन = ह + एकेन (यण् स न्ध)। ग तभवेत् = ग तः + भवेत् ( वसगस न्ध)। एकेन चक्रेण,
पुरुषकारेण — तृतीया वभ क्त, एकवचन। ‘ वना’ के योग म तीया, तृतीया अथवा पञ्चमी — तीन वभ क्तयाँ
हो सकती ह; यहाँ तृतीया प्रयुक्त है। भवेत् — व ध लङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन।
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 30–31
पाठे प्रयुक्तानां पदानां संस्कृत-अथः, हन्द अथः, English अथः च
शब्दाथाः
प्र.1 वयं शब्दाथान् जानीमः — पाठे प्रयुक्तानां पदानाम् अथान् लखत।
पुस्तक ने पृष्ठ 30 और 31 पर पाठ के सभी क ठन पद क सारणी द है। नीचे वही पूरी सारणी क्रम से द गई है — शब्दः →
संस्कृत-अथः → हन्द → English।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
ृ ् खिलतम्
शङ अनुशा सतम् अन ुशािसत Disciplined
गायिन्त गानं कुव न्त गाते है ं Sing
िकल नश्चयेन श्
िन चय से With determination
धन्याः प्रशं सताः पशंस नीय Praiseworthy
अपवगः नवाणम् मो क्ष Liberation
भूयः पुनः पुनः बार बार - Over and over again
सुर त्वात् दे वत्वात् त्
दे व व से From divinity
वेित्त जाना त जानता है Knows
िनग ण
ु ः गुणहीनः ग ुण रिहत Without virtue
बली बलवान् बल शाल ी Powerful
िनबलः बलर हतः बल हीन Weak
िपकः को कलः कोयल Cuckoo
वायसः काकः कौआ Crow
करी गजः हाथी Elephant
नमाः अवनताः झ ुके हुए Bent
तरवः पादपाः क्ष
वृ Trees
फलोद् ग मैः फलभारैः फ ल ों के भार से With weight of fruits
अम्बुिभः जलैः जल से भरे हुए Filled with water
दू र िवलिम्बनः दूरात् अधः अवनताः दू र से नीचे झ ुके हुए Come down from above
घनाः मेघाः बाद ल Clouds
अनुद्धताः गवशून्याः अिभमान से रिहत Polite
सत्पुरुषाः सज्जनाः च्
अ छे ल ोग Good people
सम ृिद्धिभः प्रचुरैः धनैः बहुत धन से With abundance of wealth
कनकम् सुवणम् सोना Gold
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
परीक्ष्यते परी क्षतं भव त उ सकी परी क्षा की जाती है Is tested
िनघषणम् घषणम् िघसना Rubbing
छे द नम् कतनम् काटना Cutting
ताडनैः प्रहारैः पहार के ारा By hitting
कु ले न वंशेन कु ल से By the family
शीले न स्वभावेन स्वभाव से By nature
कमणा कायण काय से By work
दीपयिन्त प्रकाशय न्त पकािशत करते है ं Illuminate
पज्ञा वशेषज्ञानम् ष्
िविश ट ब ुि द्ध Extra-ordinary intelligence
कौल्यम् कुलीनता च्
अ छे कु ल में ज म न् Birth in a good family
दमः इ न्द्रयसंयमः न्
इि द यों का संयम Control over senses
श्रुतम् शास्त्रज्ञानम् शा स्त्र ों का ज्ञ ान Knowledge of scriptures
पराक्रमः साहसः वीरता Bravery
अबहभ
ु ािषता मतभा षता कम और साथक बोल ना Speaking less but meaningfully
छलम् कपटता छल ना Cheating
अभ्युपैित प्रा ो त प्
पा त करता है Associates
दुजनेन दुष्टजनेन ष् व्यिक्त से
दु ट With wicked people
समम् सह साथ With
सख्यम् मैत्री िम त्र ता Friendship
दहित ज्वलय त जल ाता है Burns
अङ् गारः दग्धकाष्ठः अङ्गारा Charcoal
कृ ष्णायते म लनं करो त काल ा करता है Blackens
दै वम् भाग्यम् भा य ग् Luck
िसध्यित सद्धं भव त फ ल ता है Fruitifies
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु
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याद रखने क यु क्त: इस सारणी के अनेक शब्द जोड़ म ह — गुणी ↔ नगुणः, बली ↔ नबलः, पकः ↔
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वायसः, करी ↔ मूषकः, उष्णः ↔ शीतः। वपरीताथक जोड़े बनाकर याद करने से शब्द जल्द और
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मातृभाषया अथ लखत।
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सारणी का पाँचवाँ स्तम्भ खाली छोड़ा गया है — उसम आपको अपनी मातृभाषा म अथ लखना है। यह प्रश्न हर वद्याथ के लए
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अलग होगा, क्य क हर एक क मातृभाषा अलग हो सकती है (मराठ , बाङ् ला, त मल, गुजराती, ओ ड़या, अस मया, पंजाबी, तेलुगु
आ द)।
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a 2. य द आपक भाषा म वही तत्सम शब्द चलता हो, तो उसे ज्य -का-त्य ल खए (जैसे पराक्रमः — मराठ ‘पराक्रम’, गुजराती
1. पहले शब्द का संस्कृत-अथ (दूसरा स्तम्भ) प ढ़ए, हन्द अथ नह । संस्कृत से सीधे अपनी भाषा म जाइए।
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‘पराक्रम’, बाङ् ला ‘পরাক্রম’)।
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3. य द तत्सम शब्द न चलता हो, तो अपनी भाषा का रोज़ बोला जाने वाला शब्द ल खए (जैसे पकः — मराठ ‘को कळा’,
त मल ‘குய ல் ’, तेलुगु ‘కోయిల’)।
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l वाक्य बनाकर दे खए — तभी अथ पक्का होता है।
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4. अन्त म हर शब्द का अपनी भाषा म एक
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नमूना उत्तर (मातृभाषा — मराठ ):
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शब्दः संस्कृत-अथः मातृभाषया अथः (मराठ )
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िपकः को कलः
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कोिकळ ा
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काकः
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वायसः कावळ ा
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तरवः पादपाः
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घनाः मेघाः ढग
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कनकम् सुवणम्
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सोने
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दै वम् भाग्यम्
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नशीब
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m Check it yourself: अपनी सारणी भरने के बाद घर के कसी बड़े को वे शब्द दखाइए और पू छए क आपक a g
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भाषा म इनके लए कोई पुराना या काव्य वाला शब्द भी है क्या। प्रायः एक ही अथ के दो शब्द मलगे — एक
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बोलचाल का, एक सा हत्य का।
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अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 32 a
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
ोक-रचना, छन्द तथा पाठगत स न्ध-समासयुक्त पदा न
व्याकरणम्
प्र.1 संस्कृत ोकेषु प्र तपद्यं पादचतुष्टयम् अ स्त। छन्दोबद्ध-सस्वरगानशैली अ प अ स्त। — इस कथन को उदाहरण
दे कर समझाइए।
उत्तरम् — प्रत्येक संस्कृत ोक म चार पाद (चरण) होते ह और वह कसी न कसी छन्द म बँधा होता है, इस लए उसे स्वर लगाकर
गाया भी जा सकता है।
पद्यम् (श्लोकः) = च त्वारः पादाः
पादः 1 + पादः 2 = पथमा पिङ् क्तः (पूव धः)
पादः 3 + पादः 4 = ि तीया पिङ् क्तः (उत्तराधः)
पादान्ते ‘।’ तथा श्लोकान्ते ‘॥’ िचह्नम्
उदाहरणम् (सप्तमः ोकः) —
पादः पाठः अक्षरसंख्या
1 दुजनेन समं सख्यं 8
2 प्री त चा प न कारयेत् 8
3 उष्णो दह त चाङ्गारः 8
4 शीतः कृष्णायते करम् 8
छन्द कैसे पहचान: पहले हर पाद के अक्षर ग नए (मात्रा नह , अक्षर)। इस पाठ म तीन प्रकार मलते ह —
8 अक्षर प्र त पाद → अनुष्टुप् ( ोक) — ोक 7 तथा 8।
11 अक्षर प्र त पाद → उपजा त (इन्द्रव ा + उपेन्द्रव ा) — ोक 1, 5, 6।
12 अक्षर प्र त पाद → वंशस्थ — ोक 2, 3, 4।
यही ‘छन्दोबद्धता’ है, और इसी कारण ोक सस्वर गाया जा सकता है।
Try This: कक्षा म ोक 7 को ताल दे कर गाइए — प्रत्येक पाद पर आठ बार ताली। छन्द अपने-आप पकड़ म
आ जाएगा।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 ोकेषु स न्धसमासयुक्तपदा न भव न्त। यथा — नम्रास्तरवः, अभ्युपै त, अनुद्धताः, यथाश क्त। — इनका वग्रह
क जए और नयम बताइए।
पुस्तक ने चार पद उदाहरण के रूप म दए ह। इनका वग्रह इस प्रकार है —
पदम् वग्रहः प्रकारः नयमः
नमास्तरवः नम ाः + तरवः स न्धः ‘आः’ के बाद वग का प्रथम अक्षर (त्) आने पर वसग ‘स्’ म बदल जाता है
( वसगस न्धः)
अभ्युपैित अिभ + उ प + एित स न्धः (यण् + वृ द्ध) अ भ + उप → अभ्युप् (इ + उ = य्); उप + ए त → उपै त (अ + ए = ऐ)
अनुद्धताः न उ द्धताः समासः नञ् तत्पुरुष समास — नषेधवाचक ‘न’ पूवपद म
यथाशिक्त शि क्तम् समासः अव्ययीभाव समास — पूवपद अव्यय (यथा), पूरा समस्तपद अव्यय बन
अनित क्रम् य जाता है
दोन म अन्तर: स न्ध केवल ध्व न का मेल है — दो पद पास-पास आने पर उनक ध्व नयाँ बदल जाती ह, अथ
नह बदलता। समास अथ का मेल है — दो पद मलकर एक नया पद बनाते ह जसका अपना एक अथ होता है।
‘नम्रास्तरवः’ म स न्ध तोड़ने पर दो अलग पद (नम्राः, तरवः) वापस मल जाते ह; ‘अनुद्धताः’ म वग्रह करने पर अथ
खोलना पड़ता है।
प्र.3 पाठे आगतानाम् अन्येषां स न्धयुक्तपदानां वच्छे दं कुरुत। (पाठ के अन्य स न्धयुक्त पद का वच्छे द क जए।)
अभ्यास के लए इसी पाठ से लए गए और भी पद —
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
पदम् स न्ध- वच्छे दः स न्धः
धन्यास्तु न्
ध याः + तु वसगस न्धः
फलोद् ग मैनवाम्बुिभः फ ल ोद् गमैः + नवाम्ब ुिभः वसगस न्धः (‘◌ः’ → ‘र्’)
दू र िवलिम्बनो घनाः दू रिवल ि बनः म् + घनाः वसगस न्धः (‘◌ः’ → ‘ओ’)
स्वभाव एवैष स्वभावः + एव + एषः वसगलोपः + वृ द्धस न्धः (अ + ए = ऐ)
पराक्रमश्चाबहुभािषता परा क्र + +
मः च अबहुभािषता वसगस न्धः (‘◌ः’ → ‘श्’) + द घस न्धः
सत्यमिस्त त्
स यम् + अिस्त व्यञ्जनस न्धः (म् → अनुस्वारः/मकारः)
तद्यच्छलमभ्युपैित तत ् + यत ् + छल म् + अभ्य ुपैित व्यञ्जनस न्धः (त् + य् = द्य्; त् + छ् = ्)
उष्णो दहित उ णःष् + द हित वसगस न्धः (‘◌ः’ → ‘ओ’)
चाङ् गारः च + अङ्गारः द घस न्धः (अ + अ = आ)
ेके न िह + एके न यण् स न्धः (इ + ए = य् + ए)
गितभवेत ् गितः + भवेत ् वसगस न्धः (‘◌ः’ → ‘र्’)
Tip: वसगस न्ध क सबसे काम क तीन बात याद र खए — (1) अः के बाद घोष वण हो तो ‘अः’ → ओ (उष्णः
+ दह त = उष्णो दह त); (2) इः/ईः/एः के बाद घोष वण हो तो वसग → र् (ग तः + भवेत् = ग तभवेत्); (3) आः
के बाद घोष वण हो तो वसग लुप्त हो जाता है (धन्याः + ते = धन्या ते)।
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न १ — पृष्ठ 32
पाठस्य आधारेण अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न लखत
अभ्यासः
प्र.1 (क) गीता न के गाय न्त ?
उत्तरम् — दे वाः। (दे वता गीत गाते ह।)
आधार: प्रथम ोक — गाय न्त दे वाः कल गीतका न। यहाँ ‘गाय न्त’ क्रया का कता ‘दे वाः’ है, इस लए एकपद
उत्तर दे वाः ही होगा।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
व्याकरण: दे वाः — प्रथमा वभ क्त, बहुवचन, पुं ल्लङ्ग। प्रश्न ‘के’ (प्रथमा बहुवचन) है, इस लए उत्तर भी प्रथमा
बहुवचन म ही आएगा — प्रश्न क वभ क्त ही उत्तर क वभ क्त।
प्र.1 (ख) कः बलं न वे त्त ?
उत्तरम् — नबलः। (बलहीन व्य क्त बल को नह जानता।)
आधार: तीय ोक — बली बलं वे त्त न वे त्त नबलः। बलवान् बल को जानता है, बलहीन नह जानता।
व्याकरण: नबलः — प्रथमा वभ क्त, एकवचन, पुं ल्लङ्ग। प्रश्न ‘कः’ एकवचन म है, अतः उत्तर भी एकवचन म।
सावधानी — यहाँ उत्तर ‘मूषकः’ नह है; मूषक का सम्बन्ध ‘ सहस्य बलं’ से है, सामान्य ‘बलं’ से नह ।
प्र.1 (ग) कः वसन्तस्य गुणं वे त्त ?
उत्तरम् — पकः। (कोयल वसन्त के गुण को जानती है।)
आधार: तीय ोक — पको वसन्तस्य गुणं न वायसः। अथात् कोयल वसन्त का गुण जानती है, कौआ नह ।
भावाथ म पुस्तक कहती है — वसन्तकाले आगते पकः वसन्तस्य गुणानुरूपं कुहुतानं करो त। परन्तु काकः मधुरं गातुं
न शक्नो त।
व्याकरण: पकः — प्रथमा वभ क्त, एकवचन, पुं ल्लङ्ग। वसन्तस्य — षष्ठी वभ क्त, एकवचन (‘वसन्त का’)।
प्र.1 (घ) मूषकः कस्य बलं न वे त्त ?
उत्तरम् — सहस्य। (चूहा सह के बल को नह जानता।)
आधार: तीय ोक — करी च सहस्य बलं न मूषकः। हाथी सह का बल जानता है, चूहा नह जान सकता।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु
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व्याकरण: प्रश्न ‘कस्य’ षष्ठी वभ क्त, एकवचन म है, इस लए उत्तर भी षष्ठी एकवचन म — सहस्य (केवल ‘ सहः’
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लखना अशुद्ध होगा)।
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प्र.1 (ङ) फलोद्गमैः के नम्राः भव न्त ?
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उत्तरम् — तरवः। (वृक्ष फल के भार से झुक जाते ह।)
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आधार: तृतीय ोक — भव न्त नम्रास्तरवः फलोद्गमैः। फल आने पर वृक्ष भार से झुक जाते ह।
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.c तरवः — ‘तरु’ (उकारान्त पुं ल्लङ्ग) शब्द का प्रथमा वभ क्त, बहुवचन aरूप।
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se क्त, बहुवचन (करण कारक — ‘भार से’)।
व्याकरण:
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प्र.1 (च) केन समं सख्यं न करणीयम् ?
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उत्तरम् — दुजनेन। (दुष्ट व्य क्त के साथ मत्रता नह करनी चा हए।)
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m .c सप्तम ोक — दुजनेन समं सख्यं प्री त चा प न कारयेत्। भावाथaमgकहा गया है — दुजनेन सह मैत्री
aseन करणीया। यतो ह दुजनः वश्वासयोग्यः न भव त।
आधार:
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व्याकरण: प्रश्न ‘केन’ तृतीया वभ क्त, एकवचन म है, अतः उत्तर भी तृतीया एकवचन — दुजनेन। ‘समम्’ (साथ)
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के योग म तृतीया वभ क्त आती है।
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केन वना दै वं न सध्य त ?
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प्र.1 (छ)
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आधार: अष्टम ोक — एवं पुरुषकारेण वना दै वं न सध्य त। जैसे एक प हये से रथ नह चलता, वैसे ही
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अकेला भाग्य फल नह दे ता।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु AglaSem · NCERT Solutions
व्याकरण: पुरुषकारेण — तृतीया वभ क्त, एकवचन। ‘ वना’ के योग म तीया, तृतीया अथवा पञ्चमी वभ क्त
होती है; ोक म तृतीया प्रयुक्त है, अतः वही उत्तर म ल खए। पुरुषकारः = पुरुषाथः, उद्यमः (मेहनत)।
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न २ — पृष्ठ 32–33
पाठस्य आधारेण अधो ल खतानां प्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखत
अभ्यासः
प्र.2 (क) तरवः कदा नम्राः भव न्त ?
उत्तरम् — तरवः फलोद्गमैः नम्राः भव न्त। (वृक्ष तब झुकते ह जब उन पर फल आ जाते ह, अथात् फल के भार से वे झुक जाते ह।)
क्य : तृतीय ोक क पहली पं क्त ही यह कहती है — भव न्त नम्रास्तरवः फलोद्गमैः। भावाथ म पुस्तक स्पष्ट
करती है — समयानुसारं वृक्षेषु फला न जायन्ते। फलभारेण ते वृक्षाः नम्राः भव न्त। अथात् जब वृक्ष सम्पन्न होता है,
तभी वह झुकता है — यही ोक का असली सन्दे श है।
पूणवाक्य कैसे बनाएँ: प्रश्न म जो पद ह (तरवः, नम्राः, भव न्त) उन्ह उत्तर म र खए और ‘कदा’ के स्थान पर कारण/
समय बताने वाला पद (फलोद्गमैः) जोड़ द जए। इससे वाक्य स्वयं पूण हो जाता है।
प्र.2 (ख) समृ द्ध भः के अनुद्धताः भव न्त ?
उत्तरम् — समृ द्ध भः सत्पुरुषाः अनुद्धताः भव न्त। (बहुत धन-सम्प त्त पाकर भी सज्जन पुरुष अ भमान नह करते।)
क्य : तृतीय ोक — अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृ द्ध भः। भावाथ के अनुसार — स्वसमृ द्धकाले ते औद्धत्यं न
प्रकटय न्त। ते सहृदयाः वनम्राः च सन्तः सदै व परोपकाराय यत्नशीलाः भव न्त। जैसे फल से लदा वृक्ष और जल से
भरा बादल झुक जाते ह, वैसे ही सम्पन्न सज्जन और अ धक वनम्र हो जाते ह।
व्याकरण: समृ द्ध भः — तृतीया वभ क्त, बहुवचन (‘समृ द्धय से’)। अनुद्धताः = न + उद्धताः (नञ् तत्पुरुष
समास) — घमण्ड से र हत।
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प्र.2 (ग) सत्पुरुषाणां स्वभावः क दृशः भव त ?
उत्तरम् — सत्पुरुषाणां स्वभावः अनुद्धतः परोपकारी च भव त। (सज्जन का स्वभाव अ भमान-र हत तथा परोपकार करने वाला
होता है।)
ोक के शब्द म — स्वभाव एवैष परोपका रणाम् (परोपका रय का यही स्वभाव होता है)।
वस्तार से: भावाथ के अनुसार सज्जन —
अपनी समृ द्ध के समय औद्धत्य प्रकट नह करते;
सहृदय तथा वनम्र होते ह;
सदा परोपकार के लए यत्नशील रहते ह और परोपकार को व्रत क तरह धारण करते ह।
इसी लए व्यासमह ष का वचन उद्धत कया गया है — परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्। (परोपकार पुण्य के
लए है और दूसर को पीड़ा दे ना पाप के लए।)
व्याकरण: सत्पुरुषाणाम् — षष्ठी वभ क्त, बहुवचन। क दृशः — ‘कैसा’ — इसका उत्तर सदा वशेषण-रूप म
आना चा हए, इस लए ‘अनुद्धतः’, ‘परोपकारी’ जैसे वशेषण लखे गए।
प्र.2 (घ) सत्यम् कदा सत्यम् न भव त ?
उत्तरम् — यत् सत्यं छलम् अभ्युपै त तत् सत्यं सत्यं न भव त। (जो सत्य छल से जुड़ जाता है, वह सत्य वास्तव म सत्य नह रह
जाता।)
क्य : षष्ठ ोक का अ न्तम चरण — सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपै त। भावाथ के अनुसार धम-सम्बन्धी चचा म सत्यम्
एव वक्तव्यं यत् सत्यं तथ्ययुक्तं भवेत् न तु छलनायुक्तम् — बोला हुआ वचन तभी सत्य है जब वह तथ्य पर टका
हो, छल-कपट से जुड़ा न हो।
Class 8 के लए वचार: यह ोक एक सूक्ष्म बात कहता है — शब्द तथ्यतः सही होते हुए भी वचन असत्य हो
सकता है, य द उसे कसी को ठगने क नीयत से कहा जाए। इसी लए सत्य क कसौट केवल शब्द नह , नीयत भी
है।
व्याकरण: अभ्युपै त = अ भ + उप + ए त; अथ — प्राप्त करता है, साथ जुड़ता है। तद् … यद् — यत्-तत्
नत्यसम्बन्धी सवनाम युग्म; संस्कृत म ‘यत्’ वाला उपवाक्य पहले और ‘तत्’ वाला बाद म आता है।
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प्र.2 (ङ) दै वं कदा न सध्य त ?
उत्तरम् — पुरुषकारेण वना दै वं न सध्य त। (पुरुषाथ के बना भाग्य सद्ध नह होता, अथात् फल नह दे ता।)
क्य : अष्टम ोक — एवं पुरुषकारेण वना दै वं न सध्य त। भावाथ के अनुसार भाग्ये स्थतेऽ प उद्योगेन एव फलं
लभ्यते — भाग्य म लखा हो तब भी फल प रश्रम से ही मलता है। प्रयत्न और भाग्य मानव-रथ के दो प हये ह; एक
प हये से रथ नह चलता।
याद र खए: पाठ म उद्धत सू क्त — उद्यमेन ह सध्य न्त काया ण न मनोरथैः। (काम प रश्रम से सद्ध होते ह, केवल
मन के इराद से नह ।)
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न ३ — पृष्ठ 33
स्तम्भयोः मेलनं कुरुत — (अ) उ क्तः तथा (आ) भावाथः
अभ्यासः
प्र.3 (क) गाय न्त दे वाः कल गीतका न — इसका सही भावाथ (आ) स्तम्भ से चुनकर मलाइए।
उत्तरम् — गाय न्त दे वाः कल गीतका न → भारतभूमेः माहात्म्यवणनम्।
सम्पूण मेलन-सारणी (सात उत्तर एक साथ) —
(अ) उ क्तः (आ) भावाथः
गायिन्त दे वाः िकल गीतकािन भारतभ ूमेः माहा त्म् यवणनम्
गण
ु ी गण
ु ं वेित्त स ज्जनः एव ग ुणानां मम ज्ञ ः
भविन्त नमाः तरवः फलोद् ग मैः स पु त् रुषाणां स्वाभािवकी नम ता
यथा चतुिभः कनकं परीक्ष्यते सुवण ं चत ुिभः पकारै ः परी यते क्ष्
अष्टौ ग ण
ु ाः पुरुषं दीपयिन्त पज्ञ ा, द मः, द ानं, कृ तज्ञ ता इत्याद यः
दुजनेन समं सख्यं न कारयेत ् ष् ष्
द ु टसङ्गः उ णाङ्गारसदृ शः
एके न चक्रेण न रथस्य गितः क त्
े वल ं दै वं पय नं िवना अिस द्धम्
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क्य यही मेल: प्रथम ोक म दे वता गाते ह क भारतभू म म जन्मे लोग धन्य ह और दे वता भी यहाँ मनुष्य-रूप म
जन्म चाहते ह — यह पूरा वणन भारतभू म क म हमा का ही है, इस लए ‘भारतभूमेः माहात्म्यवणनम्’ सही उत्तर
है।
मलान क यु क्त: पहले हर उ क्त म मुख्य शब्द ढूँ ढ़ए — दे वाः/भारतभू म, गुणी/गुण, तरवः/नम्राः, कनकं/
चतु भः, अष्टौ गुणाः, दुजनः, चक्रम्/रथः। फर (आ) स्तम्भ म उसी मुख्य शब्द क प्र तध्व न खो जए। मलान अपने-
आप हो जाएगा।
प्र.3 (ख) गुणी गुणं वे त्त
उत्तरम् — गुणी गुणं वे त्त → सज्जनः एव गुणानां ममज्ञः। (सज्जन ही गुण का मम जानने वाला होता है।)
क्य : ोक कहता है क गुणवान् ही गुण को पहचानता है, गुणहीन नह — इसे ही ‘ममज्ञ’ शब्द से कहा गया है।
ममज्ञः = मम (गूढ़ रहस्य) को जानने वाला।
प्र.3 (ग) भव न्त नम्राः तरवः फलोद्गमैः
उत्तरम् — भव न्त नम्राः तरवः फलोद्गमैः → सत्पुरुषाणां स्वाभा वक नम्रता। (सज्जन क वनम्रता स्वाभा वक होती है।)
क्य : वृक्ष और बादल का उदाहरण अन्ततः सज्जन के लए दया गया है — स्वभाव एवैष परोपका रणाम्।
‘स्वभाव’ शब्द का ही अनुवाद वकल्प म ‘स्वाभा वक नम्रता’ के रूप म आया है।
प्र.3 (घ) यथा चतु भः कनकं परीक्ष्यते
उत्तरम् — यथा चतु भः कनकं परीक्ष्यते → सुवण चतु भः प्रकारैः परीक्ष्यते। (सोने क परीक्षा चार प्रकार से क जाती है।)
क्य : कनकम् का अथ ही सुवणम् (सोना) है, और चार उपाय ह — नघषण ( घसना), छे दन (काटना), ताप
(तपाना), ताडन (पीटना)।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 3 सुभा षतरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु
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अष्टौ गुणाः पुरुषं द पय न्त
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प्र.3 (ङ)
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agl — अष्टौ गुणाः पुरुषं द पय न्त → प्रज्ञा, दमः, दानं, कृतज्ञता इत्यादयः।
उत्तरम्
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क्य : यह वकल्प उन्ह आठ गुण म से चार को गनाकर ‘इत्यादयः’ कह दे ता है। पूरे आठ गुण ह — प्रज्ञा, कौल्यम्,
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दमः, श्रुतम्, पराक्रमः, अबहुभा षता, यथाश क्त दानम्
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प्र.3 (च) दुजनेन समं सख्यं न कारयेत्
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उत्तरम् — दुजनेन समं सख्यं न कारयेत् → दुष्टसङ्गः उष्णाङ्गारसदृशः। (दुष्ट क संग त गरम अङ्गारे के समान है।)
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है, ठण्डा हो तो काला करता है — दोन तरह हा न।.c agl
क्य : ोक का उत्तराध ही यह उपमा दे ता है — उष्णो दह त चा ारः शीतः कृष्णायते करम्। गरम हो तो जलाता
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एकेन चक्रेण न रथस्य ग तः
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प्र.3 (छ)
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उत्तर .c a g
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se — एकेन चक्रेण न रथस्य ग तः → केवलं दैवं प्रयत्नं वना अ सद्धम्। (केवल भाग्य, प्रयत्न के बना, अ सद्ध ही रहता है।)
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उत्तरम्
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क्य : एक प हया = अकेला भाग्य; दूसरा प हया = पुरुषाथ। दोन मल तभी रथ चलता है, अथात् तभी फल मलता
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है।
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अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न ४ — पृष्ठ 33
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m a s emत, ुतम्, शीलेन
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अधः प्रदत्तमञ्जूषातः पदा न चत्वा रक्तस्थाना न पूरयत — मञ्जूषा : फलोद्गमैः, गुणं, कृतज्ञता, सध्य
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अभ्यासः
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गुणी ....................... वे त्त न वे त्त नगुणः।
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प्र.4 (क)
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उत्तरम् — गुणी गुणं वे त्त न वे त्तag
नगुणः। (गुणवान् गुण को जानता है, गुणहीन नह जानता।)
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चुनाव का आधार: ‘वे त्त’ सकमक क्रया है, इसे कम चा हए। कम तीया वभ क्त म आता है — मञ्जूषा म
तीया एकवचन का पद केवल गुणं है। ोक 2 से भी यही सद्ध होता है।
प्र.4 (ख) भव न्त नम्राः तरवः .......................।
उत्तरम् — भव न्त नम्राः तरवः फलोद्गमैः। (वृक्ष फल के भार से झुक जाते ह।)
चुनाव का आधार: ‘ कस कारण से झुके?’ — कारण/साधन बताने के लए तृतीया वभ क्त चा हए। मञ्जूषा म
तृतीया बहुवचन का पद फलोद्गमैः है ( ोक 3)।
प्र.4 (ग) पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन, ......................., गुणेन, कमणा।
उत्तरम् — पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन, शीलेन, गुणेन, कमणा। (मनुष्य कुल, स्वभाव, गुण और कम से परखा जाता है।)
चुनाव का आधार: रक्त स्थान के आगे-पीछे के तीन पद (कुलेन, गुणेन, कमणा) तृतीया वभ क्त, एकवचन म
ह, इस लए चौथा पद भी उसी रूप म होना चा हए — शीलेन ( ोक 4)। शीलम् = स्वभावः।
प्र.4 (घ) गुणाः पुरुषं द पय न्त – प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, .......................।
उत्तरम् — गुणाः पुरुषं द पय न्त – प्रज्ञा, कौल्यं, दमः, श्रुतम्। (गुण मनुष्य को चमकाते ह — बु द्ध, कुलीनता, इ न्द्रय-संयम,
शास्त्रज्ञान।)
चुनाव का आधार: ोक 5 का क्रम ही है — प्रज्ञा च कौल्यं च दमः ुतं च। अतः दमः के बाद ुतम् ही आएगा।
ुतम् = शास्त्रज्ञानम्।
प्र.4 (ङ) दानं यथाश क्त ....................... च।
उत्तरम् — दानं यथाश क्त कृतज्ञता च। (सामथ्य के अनुसार दान और कृतज्ञता।)
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चुनाव का आधार: ोक 5 का अ न्तम चरण — दानं यथाश क्त कृतज्ञता च। आठ गुण क सूची का अ न्तम
गुण कृतज्ञता ही है। कृतज्ञता = कए हुए उपकार को याद रखना।
प्र.4 (च) एवं पुरुषकारेण वना दै वं न .......................।
उत्तरम् — एवं पुरुषकारेण वना दै वं न सध्य त। (इसी प्रकार पुरुषाथ के बना भाग्य सद्ध नह होता।)
चुनाव का आधार: वाक्य म क्रया ही नह है — मञ्जूषा म एकमात्र क्रयापद सध्य त है (लट् लकार, प्रथम पुरुष,
एकवचन), और कता ‘दै वम्’ भी एकवचन है, इस लए क्रया एकवचन म ही ठ क बैठती है ( ोक 8)।
मञ्जूषा-अभ्यास क सामान्य व ध: पहले दे खए क रक्त स्थान पर क्रया चा हए या संज्ञा; य द संज्ञा चा हए तो
आस-पास के पद से वभ क्त पहचा नए। इन दो जाँच से प्रायः एक ही वकल्प बचता है।
अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्न ५ — पृष्ठ 34–35
समु चतं वकल्पं चनुत (बहु वकल्पात्मकाः प्रश्नाः)
अभ्यासः
प्र.5 (क) “गाय न्त दे वाः कल गीतका न” — इत्यस्य ोकस्य मुख्य वषयः कः ? (i) वसन्तस्य सौन्दयम् (ii)
भारतभूमेः गौरवम् (iii) कमणां फलम् (iv) दानस्य प्रभावः
उत्तरम् — (ii) भारतभूमेः गौरवम्। (भारतभू म का गौरव।)
क्य : पूरा ोक भारतभू म क प्रशंसा म है — दे वता गाते ह क यहाँ जन्म लेने वाले धन्य ह, और स्वग तथा मोक्ष
का माग बनी इस भू म म दे वता भी बार-बार मनुष्य बनकर जन्म लेना चाहते ह। यह भारतभू म के गौरव का ही वणन
है।
अन्य वकल्प क्य नह : ‘वसन्तस्य सौन्दयम्’ ोक 2 का प्रसंग है, ‘कमणां फलम्’ ोक 4/8 से जुड़ता है और
‘दानस्य प्रभावः’ ोक 5 का एक अंश-भर है — इनम से कोई भी ोक 1 का मुख्य वषय नह ।
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प्र.5 (ख) “गुणी गुणं वे त्त” — इत्यत्र कः गुणं न जाना त ? (i) गुणी (ii) नगुणः (iii) पकः (iv) बली
उत्तरम् — (ii) नगुणः। (गुणहीन व्य क्त गुण को नह जानता।)
क्य : ोक का पूरा वाक्य है — गुणी गुणं वे त्त न वे त्त नगुणः। ‘न वे त्त’ का कता नगुणः है। भावाथ भी कहता
है — गुणहीनः जनः अपरेषां सुगुणान् अवगन्तुं समथः न भव त।
अन्य वकल्प क्य नह : ‘गुणी’ तो जानता ही है; ‘बली’ का सम्बन्ध बल से है, गुण से नह ; और ‘ पकः’ वसन्त का
गुण जानती है — वह ‘न जानने वाला’ पक्ष नह है।
प्र.5 (ग) “ पको वसन्तस्य गुणं न वायसः” — इत्यस्य तात्पय कम् ? (i) पकः मधुरं गाय त न वायसः (ii) सुजन एव
गुणं जाना त (iii) वायसः अ प सरसं गानं करो त (iv) वसन्तः नगुणः अ स्त
उत्तरम् — (ii) सुजन एव गुणं जाना त। (सज्जन ही गुण को पहचानता है।)
क्य — ‘तात्पय’ और ‘अथ’ का अन्तर सम झए: प्रश्न अथ नह , तात्पय पूछ रहा है। अथ तो वकल्प (i) भी है
— कोयल मधुर गाती है, कौआ नह । परन्तु क व ने यह उदाहरण कस लए दया? पूरे ोक क सीख यह है क
योग्य ही योग्यता को पहचानता है। कोयल-कौआ तो केवल दृष्टान्त ह। इस लए तात्पय वकल्प (ii) है।
अन्य वकल्प क्य नह : (iii) ोक के वरुद्ध है — कौआ मधुर नह गा सकता; (iv) तो ोक के अथ का ही
उलटा है, क्य क वसन्त तो गुण से भरा है, बस उसे पहचानने वाला चा हए।
प्र.5 (घ) “भव न्त नम्राः तरवः फलोद्गमैः” — इत्यस्य अथः कः ? (i) वृक्षाणां कठोरता (ii) सत्पुरुषाणाम् उन्न तः (iii)
फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भव न्त (iv) परोपका रणां दुबलता
उत्तरम् — (iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भव न्त। (फल से लदे वृक्ष झुक जाते ह।)
क्य : यहाँ प्रश्न सीधा अथ पूछ रहा है, तात्पय नह । पं क्त का शब्दाथ ठ क यही है — तरवः (वृक्ष) फलोद्गमैः (फल
के भार से) नम्राः (झुके हुए) भव न्त।
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अन्य वकल्प क्य नह : (i) ‘कठोरता’ ोक के उलट है — यहाँ तो झुकना बताया गया है; (ii) ‘उन्न त’ क बात
इस पं क्त म नह ; (iv) ‘दुबलता’ कहना बड़ी भूल होगी — झुकना दुबलता नह , सम्पन्नता और वनम्रता का चह्न
है।
प्र.5 (ङ) “न सा सभा यत्र न स न्त वृद्धाः” — इत्यत्र सभायाः महत्त्वं कम् ? (i) सभा मनोरञ्जनाय भव त (ii) सभा
धनसम्प त्त प्रदातुं शक्नो त (iii) धम पदे शाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः (iv) सभा केवलं राजकायाथ
भव त
उत्तरम् — (iii) धम पदे शाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः। (धम का उपदे श दे ने के लए सभा म ज्ञानवृद्ध लोग का होना आवश्यक
है।)
क्य : ोक कहता है क जस सभा म वृद्ध न ह वह सभा ही नह , और वृद्ध वही है जो धम क बात कहे। भावाथ
भी यही कहता है — सा एव सभा सफला भव त यत्र वयोवृद्धाः ज्ञानवृद्धाः च जनाः भवेयुः। पुनर प ते ज्ञानवृद्धाः
धम वषये वदे युः।
अन्य वकल्प क्य नह : (i) और (ii) सभा को मनोरंजन या धन का साधन बताते ह — ोक का वषय ही नह ;
(iv) सभा को केवल राजकाय तक सी मत कर दे ता है, जब क ोक धम और सत्य क चचा क बात कर रहा है।
प्र.5 (च) दुजनेन सह सख्यं कमथ न कायम् ? (i) सः मत्रं भव त (ii) सः धनं ददा त (iii) सः शक्षां ददा त (iv) सः
उष्णा ारवद् हा नकरः भव त
उत्तरम् — (iv) सः उष्णाङ्गारवद् हा नकरः भव त। (वह गरम अङ्गारे क तरह हा न पहुँचाने वाला होता है।)
क्य : सप्तम ोक क उपमा यही है — उष्णो दह त चा ारः शीतः कृष्णायते करम्। भावाथ के अनुसार दुजन
वश्वासयोग्यः न भव त और तस्य दुजनस्य मुखे माधुय परं हृदये कपटता भव त। इस लए वद्या से अलङ् कृत होने पर
भी दुजन का त्याग करना चा हए।
व्याकरण: उष्णा ारवत् = उष्णाङ्गारः इव (‘वत्’ प्रत्यय ‘के समान’ के अथ म)। कमथम् = कस लए, क्य ।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 35
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सुभा षतानां ोतग्रन्थाः — वष्णुपुराणम्, महाभारतम्, भतृह रः, हतोपदे शः, चाणक्यनी तः
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योग्यता वस्तरः
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a s emपुराणम् — इसके वषय म पुस्तक क्या बताती है ?
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वष्णु
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पुस्तक के शब्द म — प्र सद्धे षु अष्टादशसु पुराणेषु वष्णुपm .
s e ुराणम् अन्यतमम्। अ स्मन् पुराणे प्रायेण सप्तसह ा धक ोकाः स न्त।
a। भारतवषस्य गौरव वषये वष्णुपुराणम् अतीव प्रामा णकं तथ्यं प्रकाशय त।
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अत्र भगवतः वष्णोः तस्य च अवताराणां वषये व णतम्
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बन्दुः ववरणम्
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स्थान पिस द्ध अठारह प ुराणों में से एक
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श्लोक-संख्या
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पायः सात हज़ ार से अिधक
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भगवान ् िव ण ु तथा उ नके अवतारों का वण न
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िवशेषता त् न् थ् य दे ता है
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भारतवष के गौरव के िवषय में अ य त पामािणक त
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gl— ‘गाय न्त दे वाः कल गीतका न’ — इसी वष्णुपुराण से लया गया है।
पाठ से सम्बन्ध: पाठ का पहला aोक
इसी लए योग्यता वस्तर म सबसे पहले इसी ग्रन्थ का प रचय दया गया है। ‘भारतवष के गौरव’ वाली बात और
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ोक 1 का वषय — दोन एक ही ह।
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a gl प्र.2 महाभारतम् — इसके वषय म पुस्तक क्या बताती है ?
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पुस्तक के शब्द म — संस्कृतसा हत्ये महाभारतम् इ त इ तहासग्रन्थः पञ्चमवेदरूपेण स्वीकृतः। अ स्मन् ग्रन्थे लक्षा धकाः ोकाः
स न्त। अतः शतसाह ीसं हता इ त अस्य अपरं नाम। महाभारते अष्टादश पवा ण स न्त।
स्वरूप — इ तहासग्रन्थ, जो पञ्चम वेद के रूप म स्वीकृत है।
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आकार — एक लाख से अ धक ोक।
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om — अठारह पव। l
अपर नाम — शतसाह ी सं हता (‘शत-साह ी’ अथात् एक लाख ोक वाली)।
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पाठ से सम्बन्ध: पाठ का छठा ोक ‘न सा सभा यत्र न स न्त वृद्धाः’ महाभारत क नी तपरम्परा का है; ‘अष्टौ
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गुणाः पुरुषं द पय न्त’ ( ोक 5) भी इसी परम्परा से आता है। महाभारत केवल युद्ध-कथा नह , नी त और धम का
वशाल कोश भी है — यही बात योग्यता वस्तर बताना चाहता है।
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प्र.3 भतृह रः — इनके वषय म पुस्तक क्या बताती है ?
पुस्तक के शब्द म — भतृह रः संस्कृतकाव्यवाङ्मये महान् क वः अ स्त। नी तशास्त्र वशारदस्य तस्य कृतयः नी तशतकं शृङ्गारशतकं
वैराग्यशतकं चे त भारतीयज्ञानपरम्परां पोषय न्त।
कृ तः वषयः
नीितशतकम् नीित , सद ाचार तथा व्यवहार के सौ श्ल ोक
ृ ् गारशतकम्
शङ -
ृ ् गार रस क
शङ े सौ श्ल ोक
वैर ाग्यशतकम् ग्
वैर ा य तथा संस ार की क्षणभंग ुरता के सौ श्ल ोक
पाठ से सम्बन्ध: इस पाठ के दूसरे (‘गुणी गुणं वे त्त’) तथा तीसरे (‘भव न्त नम्रास्तरवः’) ोक भतृह र के
नी तशतक के प्र सद्ध ोक ह। ‘शतक’ का अथ है सौ ोक का संग्रह — इसी लए तीन कृ तय के नाम म
‘शतकम्’ आता है।
प्र.4 हतोपदे शः — इसके वषय म पुस्तक क्या बताती है ?
पुस्तक के शब्द म — प ण्डतनारायणेन हतोपदे शः कथाग्रन्थः सङ् क लतः। ग्रन्थेऽ स्मन् व वधाः कथाः नी त ोकाः च स न्त।
हतोपदे शः चतुधा वभक्तः — मत्रलाभः, सुहृ े दः, वग्रहः, स न्धः।
सङ् कलनकता — प ण्डत नारायण।
स्वरूप — कथाग्रन्थ, जसम कथाएँ और नी त ोक दोन ह।
चार भाग — मत्रलाभः ( मत्र पाना), सुहृ े दः ( मत्र म फूट), वग्रहः (युद्ध), स न्धः (मेल)।
पाठ से सम्बन्ध: पाठ का आठवाँ ोक ‘यथा ेकेन चक्रेण न रथस्य ग तभवेत्’ हतोपदे श का सुप्र सद्ध ोक है।
हतोपदे श क शैली यही है — पहले एक छोट कथा, फर उससे नकला नी त ोक। इसी कारण उसका नाम ‘ हत
का उपदे श’ है।
प्र.5 चाणक्यनी तः — इसके वषय म पुस्तक क्या बताती है ?
पुस्तक के शब्द म — चाणक्यस्य नी त ोकाः मा णक्यसदृशाः स न्त। बालानां च रत्र नमाणाय आदशमानवजीवनप्र तष्ठाथ च
आचायस्य चाणक्यस्य नीत्युपदे शाः अत्यन्तम् उपयो गनः स न्त।
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चाणक्य के नी त ोक मा णक्य (रत्न) के समान बहुमूल्य ह।
वे बालक के च रत्र- नमाण के लए उपयोगी ह।
वे आदश मानव-जीवन क प्र तष्ठा के लए भी अत्यन्त उपयोगी ह।
पाठ से सम्बन्ध: पाठ का चौथा (‘यथा चतु भः कनकं परीक्ष्यते’) तथा सातवाँ (‘दुजनेन समं सख्यं’) ोक इसी
चाणक्यनी त-परम्परा के ह। ‘मा णक्यसदृशाः’ उपमा ध्यान दे ने योग्य है — रत्न छोटा होता है पर मूल्यवान्; वैसे ही ये
ोक छोटे ह पर जीवनभर काम आते ह।
एक दृ ष्ट म — कौन-सा ोक कस परम्परा से:
ोकः ोत-परम्परा
1. गायिन्त दे वाः िकल गीतकािन ष्
िव ण ुप ुराणम्
2. ग ण
ु ी गण
ु ं वेित्त ृ
भतहरे ः नीितशतकम्
3. भविन्त नमास्तरवः ृ
भतहरे ः नीितशतकम्
4. यथा चतुिभः कनकं परीक्ष्यते चाण क्यनीितः
5. अष्टौ ग ण
ु ाः पुरुषं दीपयिन्त महाभारतम् (नीितपर म्परा)
6. न सा सभा यत्र न सिन्त वृद्धाः महाभारतम्
7. दुजनेन समं सख्यम् चाण क्यनीितः
8. यथा ेके न चक्रेण िहतोपदे शः
पुस्तक ने ये पाँच ग्रन्थ इसी लए योग्यता वस्तर म रखे ह — पाठ के आठ सुभा षत इन्ह क परम्परा से चुने गए ह।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 35
प्रकल्प-कायम् (Project work)
प रयोजनाकायम्
प्र.1 अन्तजालात् पुस्तकेभ्यश्च वश तसुभा षतानां सङ् ग्रहं कुरुत।
यह संग्रह-काय है। इसे आपको स्वयं करना है; नीचे व ध, अ े संग्रह क शत और एक नमूना दया गया है।
करने क व ध —
1. एक अलग कॉपी बनाइए और उसका नाम र खए सुभा षत-सङ् ग्रहः।
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2. ोत तय क जए — पुस्तकालय से भतृह र का नी तशतकम्, हतोपदे शः, चाणक्यनी तः, पञ्चतन्त्रम्; तथा वश्वसनीय
संस्कृत वेबसाइट।
3. प्रत्येक सुभा षत के साथ चार बात अवश्य ल खए — (क) ोक, (ख) पदच्छे द अथवा क ठन शब्द के अथ, (ग) हन्द
भावाथ, (घ) ोत-ग्रन्थ का नाम।
4. बीस ोक को वषय के अनुसार बाँ टए — जैसे प रश्रम, मत्रता, वद्या, वनम्रता, समय, वाणी।
5. अन्त म सुन्दर आवरण-पृष्ठ बनाइए और शक्षक को दखाइए।
नमूना उत्तर (संग्रह क तीन प्र व ष्टयाँ):
क्र. सुभा षतम् भावाथः ( हन्द ) ोतः
1 उद्यमेन िह िसध्यिन्त काय िण न काम पिर श्रम से िस द्ध होते है,ं के वल मन के इराद ों से नही।
ं सोए हुए हतोपदे शः
मनोरथैः। िसंह के मुँह में िहरण स्वयं नही ं घुस ते।
न िह सुप्तस्य िसंहस्य पिवशिन्त
मुखे म ृग ाः॥
2 िवद्या ददाित िवनयं िवनयाद्याित िवद्य ा िवनय दे ती है, िवनय से योग्यता आती है, योग्यता से धन, धन से हतोपदे शः
पात्रताम्। धम और धम से सुख िमल ता है।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोित धनाद्धम ं ततः
सुखम्॥
3 काकः कृ ष्णः िपकः कृ ष्णः को भेद ः कौआ भी काल ा , कोयल भी काल ी — िफ र भेद क्या? वस न्त आने सुभा षतरत्नभाण्डागारम्
िपककाकयोः। पर पता चल ता है — कौआ कौआ ही रहता है और कोयल कोयल ।
वसन्तसमये पाप्ते काकः काकः
िपकः िपकः॥
Tip: तीसरा नमूना पाठ के दूसरे ोक ( पक-वायस) से जुड़ जाता है। संग्रह करते समय ऐसे ोक चु नए जो पाठ
के भाव से जुड़ — तब संग्रह केवल सूची नह , एक वषय-क्रम बन जाता है।
प्र.2 कम प नी तवाक्यम् अ धकृत्य पञ्चवाक्या न संस्कृतेन लखत।
कसी एक नी तवाक्य को चुनकर उसके वषय म संस्कृत म पाँच वाक्य लखने ह।
अच्छे उत्तर म क्या होना चा हए —
पहला वाक्य म नी तवाक्य का उल्लेख;
दूसरे-तीसरे वाक्य म उसका अथ तथा एक उदाहरण;
चौथे वाक्य म उससे मलने वाली शक्षा;
पाँचव वाक्य म अपने जीवन से जोड़कर नष्कष;
वाक्य छोटे और शुद्ध ह — कता और क्रया का वचन-मेल अवश्य जाँ चए।
नमूना उत्तर (नी तवाक्यम् — ‘उद्यमेन ह सध्य न्त काया ण न मनोरथैः’):
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1. ‘उद्यमेन िह िसध्यिन्त काय िण न मनोरथै ः’ इित सुपिसद्धं नीितवाक्यम् अिस्त।
2. अस्य अथः अिस्त — काय िण पिरश्रमेण एव िसध्यिन्त, के वलं िचन्तने न न िसध्यिन्त।
3. यथा — सुप्तस्य िसंहस्य मुखे मृगाः स्वयं न पिवशिन्त, िसंहेन उद्यमः करणीयः एव।
4. अतः छात्रैः पितिदनम् अध्ययने पिरश्रमः करणीयः, के वलं सफलतायाः स्वप्नः न द ष्टव्यः।
5. अहम् अिप पितिदनं िनयमेन पठािम, यतः उद्यमेन एव लक्ष्यं पाप्यते ।
अन्य नी तवाक्य जन पर लखा जा सकता है: सत्यमेव जयते · वद्या ददा त वनयम् · परोपकारः पुण्याय ·
गुणवान् पूज्यते नरः · अ हसा परमो धमः। इनम से अ न्तम दो इसी पाठ म आए ह।
प्र.3 पाठे आगता न सुभा षता न कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां ावयत।
पाठ के आठ सुभा षत कण्ठस्थ करके कक्षा म सुनाने ह। यह काय आपको स्वयं करना है — नीचे याद करने और सुनाने क व ध
द गई है।
कण्ठस्थ करने क व ध —
1. पहले अथ सम झए, फर याद क जए। बना अथ के याद कया ोक जल्द भूल जाता है।
2. ोक को पाद-पाद करके याद क जए — पहले पाद 1, फर 1+2, फर 1+2+3, फर पूरा।
3. छन्द के अनुसार गाइए — अनुष्टुप् (8 अक्षर) वाले ोक 7, 8 सबसे सरल ह, इन्ह से आरम्भ क जए; फर वंशस्थ (12
अक्षर) वाले 2, 3, 4; अन्त म उपजा त (11 अक्षर) वाले 1, 5, 6।
4. प्र त दन दो ोक ली जए — चार दन म आठ याद हो जाएँगे। पाँचव दन सब दोहराइए।
सुनाते समय ध्यान रखने योग्य बात —
उ ारण शुद्ध हो — वशेषकर ष / श / स तथा ऋ का उ ारण।
पाद के अन्त म (‘।’ पर) थोड़ा वराम ली जए, ोक के अन्त म (‘॥’ पर) कुछ अ धक।
सस्वर पाठ क जए — स्वर लगाने से ोक भी सुन्दर लगता है और स्मरण भी पक्का होता है।
सुनाने के बाद एक वाक्य म उसका भावाथ भी क हए — इससे सुनने वाल को भी लाभ होगा।
Try This: कक्षा म दो दल म ोक-अन्ताक्षरी क जए — एक दल ोक का पहला पाद बोले, दूसरा दल शेष
तीन पाद पूरे करे। इससे आठ सुभा षत खेल-खेल म पक्के हो जाएँगे।
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अध्याय — एक नज़र म
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g पुस्तक ने स्वयं पदच्छे दः
पाठ का m .c — यह पाठ सुभा षत-संग्रह है। इसम आठ नी त ोक ह और हर ोक कaे नीचे
sकोe स न्ध-र हत करके अलग करना), अन्वयः (गद्य-क्रम) और भावाथः दया है। इसी क्रम से ोक पढ़ना संस्कृत- ोक
स्वरूप
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agसमझने क सही व ध है।
(पद
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सेoकहे गए ह , वे सुभा षत ह; वे सदा लोग के हत के लए होते ह
चत्र-संवाद (पृष्ठ 24) — पौत्री पतामही से नई कथा माँगती है; पतामही कहती ह क आज नी त ोक सुनो। सुष्ठु
भा षता न इ त सुभा षता न — अथात् जो वचन सुन्दर ढं ग.c
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और कतव्य-अकतव्य का स्पष्ट मागदशन करते ह।sem
आठ ोक के वषय — (1) भारतभू मaका
a (2) गुण को गुणी ही पहचानता है, (3) फल से लदा वृक्ष और जल से
glगौरव,
भरा बादल झुकते ह — वैसे ही सज्जन समृ द्ध म वनम्र रहते ह, (4) सोने क तरह मनुष्य क भी चार कसौ टयाँ, (5) मनुष्य
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को चमकाने वाले आठ गुण, (6) स ी सभा का लक्षण, (7) दुजन क संग त अङ्गारे-जैसी, (8) पुरुषाथ के बना भाग्य नह
a s2,e3, 4 म प्र त पाद 12
फलता।
o m 1, 5, 6 म प्र त पाद 11 अक्षर ह — उपजा त (इन्द्रव ा + उपेन्द्रव ा)। lोक
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छन्द — ोक
a s emह — वंशस्थ। ोक 7 और 8 प्र त पाद 8 अक्षर वाले अनुष्टुप् ( ोक) छन्द म ह। पुस्तक भी कहती है —
gl संस्कृत ोकेषु प्र तपद्यं पादचतुष्टयम् अ स्त। छन्दोबद्ध-सस्वरगानशैली अ प अ स्त।
अक्षर
a व्याकरण- बन्दु — पाठ के स न्ध-समासयुक्त पद : नम्रास्तरवः = नम्राः + तरवः ( वसगस न्ध), अभ्युपै त = अ भ + उप +
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ए त (यण् तथा वृ द्ध स न्ध), अनुद्धताः = न उद्धताः (नञ् तत्पुरुष समास), यथाश क्त = श क्तम् अन तक्रम्य (अव्ययीभाव
समास)।
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सन्दे श — सुभा षत केवल याद करने के लए नह , आचरण म उतारने के लए ह। जो इन्ह पढ़कर अपने कायक्षेत्र म इस ज्ञान
का प्रयोग करता है, वही बहुत लाभ पाता है — यः सुभा षता न प ठत्वा कायक्षेत्रे तस्य ज्ञानस्य प्रयोगं करो त सः बहून् लाभान्
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प्रा ो त।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः (पाठे प्रयुक्तः) संस्कृत-अथः हन्द अथ ENGLISH
सुभा षतम् सुष्ठु भािषतं वचनम् सुन्दर ढं ग से कहा गया वचन Well-spoken saying
सुरत्वात् दे वत्वात् दे वत्व से From divinity
वे त्त जानाित जानता है Knows
पकः कोिकलः कोयल Cuckoo
वायसः काकः कौआ Crow
नम्राः अवनताः झुके हुए Bent
फलोद्गमैः फलभारै ः फल के भार से With weight of fruits
अनुद्धताः गवशून्याः अ भमान से र हत Polite
कनकम् सुवणम् सोना Gold
अबहुभा षता िमतभािषता कम और साथक बोलना Speaking less but meaningfully
अङ्गारः दग्धकाष्ठः अङ्गारा Charcoal
दै वम् भाग्यम् भाग्य Luck
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