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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 4: प्रणम्यो दे शभक्तोऽयं
गोपब म ु हामनाः
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
36 – 48 14 40 हन्द
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 4 प्रणम्यो दे शभक्तोऽयं गोपबन्धुमहामनाः AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 8 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 4: प्रणम्यो दे शभक्तोऽयं
गोपबन्धुमहामनाः
NCERT कक्षा 8 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के चतुथः पाठः — प्रणम्यो दे शभक्तोऽयं गोपबन्धुमहामनाः के सम्पूण हल। यह ओ डशा के
महान् समाजसेवक, स्वतन्त्रतासङ् ग्रामी और ‘उत्कलम ण’ गोपबन्धुदास का च रत-गद्य है — पाठ चत्रसंवाद से आरम्भ होता है, फर
भोजनसभा क करुण घटना, फर उनका जीवनवृत्त, और अन्त म उनका प्र सद्ध ोक ‘स्वदे शभूमौ मम लीयतां तनुः’। व्याकरण क दृ ष्ट से पाठ का
केन्द्र है पूवरूपस न्धः (दे शभक्तो + अयम् = दे शभक्तोऽयम्) तथा क्तवतु-प्रत्ययान्त पद का स्त्री लङ्ग रूप (गतवान् — गतवती)। नीचे पृष्ठ 36 से
48 तक का चत्रसंवाद, वयं शब्दाथान् जानीमः, पाठगत ोक, अत्र इदम् अवधेयम्, अभ्यासात् जायते स ः के प्रश्न १–८ (हर उपभाग स हत),
योग्यता वस्तरः तथा प रयोजनाकायम् क्रम से हल ह — पहले संस्कृत उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 8) 36 – 48
खं ड प्रश्न
14 40
माध्यम
हन्द
पाठारम्भे चत्रसंवादः — पृष्ठ 36–37
(एकदा जलप्लावपी डतानां साहाय्याथ शक्षकाः छात्राश्च सभागारे चचा कुव न्त।)
चत्रसं वादः
प्र.1 नमस्ते छात्राः ! ह्यस्तन वाता ुतवन्तः कम् ?
छात्रा उत्तरं ददा त — नमो नमः आचाय ! ओ डशा-राज्यस्य केन्द्रापडा-जनपदे महानद्यां भयङ् करः जलप्लावः सम्भूतः ।
जलप्लावेन तत्र महती हा नः सञ्जाता ।
[नमस्कार आचाय जी! ओ डशा राज्य के केन्द्रापड़ा जनपद म महानद म भयङ् कर बाढ़ आ गई। बाढ़ से वहाँ बहुत बड़ी हा न हुई है।]
वाक्य कैसे बना: ह्यस्तनीम् = ह्यः (कल) + तन प्रत्यय → ‘कल क ’; अतः ‘ह्यस्तन वाताम्’ का अथ है ‘कल का
समाचार’ — दोन पद द्वतीया वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग म ह क्य क ये ‘श्रुतवन्तः’ क्रया के कम ह।
ुतवन्तः = श्रु + क्तवतु, प्रथमा बहुवचन — ‘सुन चुके हो’। उत्तर म जलप्लावेन तृतीया एकवचन है — हा न का
‘साधन/कारण’ बाढ़ है।
ध्यान द: सम्भूतः (सम् + भू + क्त) का अथ है ‘हो गया, उत्पन्न हुआ’ और सञ्जाता (सम् + जन् + क्त, स्त्री लङ्ग)
का अथ है ‘हो गई’। ‘हा नः’ स्त्री लङ्ग है, इसी लए उसके साथ महती और सञ्जाता — दोन स्त्री लङ्ग रूप आए ह,
‘महान्’ या ‘सञ्जातः’ नह ।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 4 प्रणम्यो दे शभक्तोऽयं गोपबन्धुमहामनाः AglaSem · NCERT Solutions
प्र.2 महोदय ! ते सम्प्र त अ तदुः खताः भवेयुः खलु ?
आचायः वद त — सत्यम् अशोक ! ते सव अ तदुःखेन जीव न्त । अस्मा भः एतादृशानां दुः खतानां सहायता करणीया ।
[सच है अशोक! वे सब बहुत दुःख म जी रहे ह। हम ऐसे दुःखी लोग क सहायता करनी चा हए।]
इससे पहले आचाय ने बाढ़ क स्थ त भी बताई थी — जलप्लावेन वासगृहा ण नष्टा न, के चत् अस्व ाः च कत्सालये मृत्युना
सह युध्यन्ते । अन्ये च अनाहारेण कष्टं सहन्ते । बहवः गृहपा लताः पशवोऽ प नद स्रोतसा प्रवा हताः मृताश्च ।
[बाढ़ से घर नष्ट हो गए, कुछ बीमार लोग अस्पताल म मृत्यु से जूझ रहे ह। दूसरे भूखे रहकर कष्ट सह रहे ह। बहुत-से पालतू पशु भी
नद के प्रवाह म बहकर मर गए।]
‘अस्मा भः … करणीया’ क्य ? यह कमवाच्य का प्रयोग है। ‘करणीया’ कृत्य-प्रत्ययान्त (करणीय) पद है, जो कम
‘सहायता’ (स्त्री लङ्ग) के अनुसार सहायता करणीया बना; और कता ‘वयम्’ तृतीया वभ क्त, बहुवचन म आकर
अस्मा भः हो गया। यही ढाँचा ‘अस्मा भः पाठः पठनीयः’ म भी चलता है।
शब्द-भेद: भवेयुः व ध लङ् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन है — ‘ह गे/हो सकते ह’; ‘खलु’ यहाँ अनुमान क पु ष्ट
माँगता है (‘न?’)। एतादृशानाम् = ‘ऐसे लोग का’, षष्ठी बहुवचन।
प्र.3 महोदय ! एषः गोपबन्धुः कः ?
आचायः वद त — भवन्तः सव एतत् चत्रं पश्यन्तु । एषः अ स्त द नबन्धुः गोपबन्धुः । सम्प्र त वयं तस्य वषये जानीमः ।
[आप सब यह चत्र दे खए। ये ह द नबन्धु गोपबन्धु। अब हम उनके वषय म जानगे।]
इसके पहले आचाय ने उनका प रचय इस प्रकार दया था — यथा उत्कलम णः गोपबन्धुः जलप्लावपी डतानाम् अकुण्ठं सेवां
कृत्वा अद्या प जनमानसेषु समादृतोऽ स्त ।
[जैसे उत्कलम ण गोपबन्धु बाढ़-पी ड़त क मन लगाकर सेवा करके आज भी लोग के मन म सम्मा नत ह।]
‘समादृतोऽ स्त’ म स न्ध: समादृतः + अ स्त = समादृतोऽ स्त। ‘समादृतः’ के अन्त का वसग ‘ओ’ म बदला, और
आगे के ‘अ’ के स्थान पर अवग्रह (ऽ) आ गया — यही इस पाठ क पूवरूपस न्ध है, जो पृष्ठ 44 पर समझाई गई
है।
दो नाम, दो भाव: द नबन्धुः = द न (दुः खय ) का बन्धु — यह जनता का दया स्नेह-नाम है; उत्कलम णः =
उत्कल (ओ डशा) क म ण — यह आचाय प्रफुल्लचन्द्रराय क द हुई उपा ध है। पाठ के शीषक म उन्ह महामनाः
(उच्च वचार वाला) कहा गया है।
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 42–43
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शब्दाथाः — मातृभाषया अथ लखत
शब्दाथाः
प्र.1 मातृभाषया अथ लखत — जलप्लावपी डतानाम्, नष्टा न, अनाहारेण, नद स्रोतसा, अकुण्ठम्, समादृतः,
सुस्वादू न व्यञ्जना न, दौलभ्यम्, नःशुल्कम्, करुणध्व नः, अगुञ्जत्, बुभु क्षतः, दया वग लतहृदयः,
अ ुपूणनयनः, प रवे षतम्, पञ्च मत्रेषु, स्वतन्त्रता-सङ् ग्रामी, जन्म लब्धवान्, कारावासम्, चन्ताकुलः, दे शसेवा-
तत्परस्य, सहस्रशः, लीयताम्, प्रयान्तु, गतमा लका, अ मांसैः, दै नक-वातापत्रस्य, असीमम्, उत्कलम णः,
सम्मा नतवान्, लोकसेवकः, महामनाः।
पुस्तक क ता लका का अ न्तम स्तम्भ आपक अपनी मातृभाषा के लए खाली छोड़ा गया है — जो भी आपक भाषा हो ( हन्द ,
ओ डआ, बाङ् ला, मराठ , त मऴ् , तेलुगु, गुजराती, अस मया, पंजाबी …), उसम अथ ल खए। नीचे पुस्तक के दोन पृष्ठ (42–43)
क पूरी सूची संस्कृत-पयाय, हन्द और अंग्रेज़ी अथ के साथ द है।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 4 प्रणम्यो दे शभक्तोऽयं गोपबन्धुमहामनाः
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
mनद्यां बहुजलप्रवाहेण as e
जलप्लावपीिडतानाम्
.co धनजीवनक्ष त-ग्रस्तानाम्
बाढ़ पीिड़तों का
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Of flood victims
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aनष्टािन क्ष तग्रस्ता न नष्ट हुए Destroyed
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अनाहारे ण आहारेण वना भोजन न करने से By abstaining from food
a semनदी के पवाह से
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नदीस्रोतसा नद जलप्रवाहेण By River currents
अकु ण्ठम् कुण्ठं वना / साग्रहम् आग हपूवक Generously
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आदरप्राप्तः Honored
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समादृ तः स म्मािनत
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सुस्वादू िन
.co रु चकरा ण सूपशाकाद न वािद ष्ट भोजन
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Delicious food
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व्यञ्जनािन
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a दौलभ्यम् कष्टेन लभ्यम् क ष्ट से पाप्त िकया Difficulty in being obtained
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गया
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धनं वना Without any fees
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िनःशुल्कम्
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करुणध्विनः वकलस्वरः ag क रुणा युक्त ध् विन Weeping words
Echoes
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अग ञ्ु जत् गुञ्जनम् अकरोत् गूँजा
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बुभिु क्षतः क्षुधातुरः भूखा Hungry
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eदयािवगिलतहृदयः a
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करुणाद्रहृदयः दया पूण हृ दय वाला / Compassionate heart
a दयालु
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अश्रुपूणनयनः अश्रुयुक्तं नेत्रं यस्य सः आँस ू से भरी हुई आँखों Eyes filled with tears
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पिरवेिषतम् भोजनाथ प्रदत्तम् (अन्नम्) परोसा गया Served
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पञ्चिमत्रेष ु पञ्चसंख्याकेषु मत्रेषु पाँच िम त्र ों में Among five friends
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Freedomm fighter
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स्वतन्त्रता-सङ् ग ामी स्वतन्त्रता-सेनानीः वतन्त्र ता से नानी
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जन्म लब्धवान् जन्म प्राप्तवान् जन्म िलया
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कारावासम् कारागृहे बन्धनम् कारागार में रहना Living in jail
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िचन्ताकु लः चन्तया व्याकुलः िचन्ता से व्याकु ल Worried
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दे शसे वा-तत्परस्य
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दे शसेवां कतु तत्परस्य दे श से वा हेत ु तत्पर का Of the one who is ready to serve
a the country
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 4 प्रणम्यो दे शभक्तोऽयं गोपबन्धुमहामनाः AglaSem · NCERT Solutions
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
सहस्रशः सहस्रा धकाः हज़ारों In thousands
लीयताम् वलीनतां यान्तु िवलीन हो जाएँ (May it) merge
पयान्तु गच्छन्तु चले ं (May they) walk over
गतमािलका गतानां शृङ् खला ृ ् खला
ग ों की शङ Series of potholes
अिस्थमांसै ः अ स्थ भः मांसैः च ह ी और माँस से With the bones and flesh of the
body
दै िनक-वात पत्रस्य प्र त दनं प्रका शत-पत्रस्य दै िनक समाचारपत्र का Of the daily newspaper
असीमम् अतुलनीयम् अपार Immense / Unparallel
उत्कलमिणः उत्कलस्य म णसदृशः उपा ध वशेषः उ त्कल की मिण (एक Gem of Odisha (A title)
उपािध )
सम्मािनतवान् मानेन प्रशं सतवान् स म्मािनत िकया Honored
लोकसे वकः जनसेवकः समाज से वक Social worker
महामनाः उच्च वचारसम्पन्नः उ च्च िवचार वाला Broad-minded
शब्द क बनावट दे खए: इस पाठ के अ धकांश क ठन शब्द बहु ी ह समास ह — अ ुपूणनयनः = ‘अश्रु से पूण
ह नयन जसके, वह’; दया वग लतहृदयः = ‘दया से पघल गया है हृदय जसका, वह’; चन्ताकुलः = ‘ चन्ता से
व्याकुल’। इस समास म वग्रह सदा ‘यस्य सः’ से होता है और पूरा पद वशेषण बनकर कसी व्य क्त को बताता है।
याद रखने क तरक ब: सहस्रशः म ‘शस्’ प्रत्यय है, जो ‘संख्या के हसाब से’ अथ दे ता है — इसी से बनते ह
शतशः (सैकड़ ), अंशशः (भाग म)। इसी तरह अनाहारेण और नःशुल्कम् — दोन म नकारात्मक उपसग है (अन्
और नः), अथ है ‘ बना’।
पाठगतौ ोकौ — पृष्ठ 41
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गोपबन्धुदासस्य प्र स ं वचनम् तथा पाठस्य शीषक ोकः
ोकाः
प्र.1 स्वदे शभूमौ मम लीयतां तनुः, स्वदे शलोकास्तदनु प्रयान्तु नु। स्वराज्यमाग य द गतमा लका, ममा मांसैः
प रपू रतास्तु सा॥ — अस्य ोकस्य पद े दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।
पद े दः — स्वदे शभूमौ, मम, लीयताम्, तनुः, स्वदे शलोकाः, तदनु, प्रयान्तु, नु, स्वराज्यमाग, य द, गतमा लका, मम, अ स्थमांसैः,
प रपू रता, अस्तु, सा।
अन्वयः — मम तनुः स्वदे शभूमौ लीयताम्। तदनु स्वदे शलोकाः नु प्रयान्तु। य द स्वराज्यमाग गतमा लका (अ स्त), सा मम अ स्थमांसैः
प रपू रता अस्तु।
अथः — मेरा शरीर अपने दे श क म म वलीन हो जाए, और उसके बाद (उसी म पर चलते हुए) दे शवासी आगे बढ़। य द
स्वराज्य के माग म ग क शृङ् खला हो, तो वह मेरी ह य और माँस से भर जाए।
भावः — यह गोपबन्धुदास का प्र सद्ध वचन है, जो मूल रूप म ओ डआ भाषा म है — ‘ मशु मोर दे ह ए दे श मा टरे…’। पुस्तक ने
पृष्ठ 41 पर इसका भावाथ य दया है — स्वदे शस्य भू मभागे मम शरीरं वलीनं भवतु। दे शवा सनः मम अनुसरणं कुवन्तु।
दे शस्य स्वतन्त्रता न मत्तं यत्र यत्र प्र तबन्धकाः गताः स न्त, ते सव गताः मम अ भः मांसैश्च प रपूणाः भवन्तु। क व अपने
लए कुछ नह माँगता — न यश, न सुख; वह केवल इतना चाहता है क उसका शरीर भी दे श के काम आए। स्वतन्त्रता के माग म जो
बाधाएँ (ग े) ह, उन्ह वह अपने शरीर से पाटना चाहता है, ता क उसके बाद आने वाले लोग सरलता से आगे चल सक।
भाषा कैसे काम करती है: गतमा लका यहाँ रूपक है — स्वराज्य के माग क क ठनाइय को सड़क के ग क
शृङ् खला कहा गया है। लीयताम्, प्रयान्तु, अस्तु — तीन लोट् लकार (आ ा/प्राथना) के रूप ह, इस लए पूरा
ोक माँग नह , संकल्प-प्राथना बन जाता है। अ मांसैः तृतीया बहुवचन है — ‘ कससे भरे’ यह बताने के लए
करण म तृतीया आई।
स न्ध दे खए: स्वदे शलोकाः + तदनु = स्वदे शलोकास्तदनु ( वसगस न्ध — ‘त’ से पहले वसग का ‘स्’ हो गया);
मम + अ स्थमांसैः = ममा मांसैः (द घ/सवणद घ स न्ध — अ + अ = आ)।
प्र.2 उत्कलम ण रत्याख्यः प्र स ो लोकसेवकः। प्रणम्यो दे शभक्तोऽयं गोपबन्धुमहामनाः॥ — अस्य ोकस्य
पद े दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।
पद े दः — उत्कलम णः, इ त, आख्यः, प्र सद्धः, लोकसेवकः, प्रणम्यः, दे शभक्तः, अयम्, गोपबन्धुः, महामनाः।
अन्वयः — ‘उत्कलम णः’ इ त आख्यः प्र सद्धः लोकसेवकः महामनाः अयं दे शभक्तः गोपबन्धुः प्रणम्यः (अ स्त)।
अथः — जनका नाम ‘उत्कलम ण’ है, जो प्र सद्ध लोकसेवक और उच्च वचार वाले ह — ये दे शभक्त गोपबन्धु प्रणाम करने योग्य
ह।
भावः — यही ोक इस पाठ का शीषक भी है। इसम गोपबन्धु के तीन प रचय एक साथ रखे गए ह — उपा ध (उत्कलम णः),
कम (प्र सद्धः लोकसेवकः) और मन (महामनाः)। इन तीन के कारण वे केवल स्मरणीय नह , प्रणम्य (प्रणाम के योग्य) ह। क व
कहना चाहता है क सच्ची महानता पद या धन से नह , नःस्वाथ जनसेवा से बनती है।
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‘प्रणम्यः’ का व्याकरण: यह कृत्य-प्रत्ययान्त (प्र + नम् + ण्यत्) पद है, जसका अथ होता है ‘ जसे प्रणाम करना
चा हए’। ऐसे पद कतव्य बताते ह — पूज्यः (पूजने योग्य), वन्द्यः (वन्दना योग्य), पठनीयः (पढ़ने योग्य)। तीन पद
प्रथमा वभ क्त, एकवचन, पुं लङ्ग म ह, क्य क ये ‘गोपबन्धुः’ के वशेषण ह।
स न्ध: उत्कलम णः + इ त = उत्कलम ण र त ( वसग का ‘र्’), इ त + आख्यः = इत्याख्यः (यण् स न्ध — इ + आ
= य्), दे शभक्तः + अयम् = दे शभक्तोऽयम् (पूवरूपस न्ध), गोपबन्धुः + महामनाः = गोपबन्धुमहामनाः ( वसग का
‘र्’)।
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 44
पूवरूपस न्धः
स न्धः
प्र.1 पूवरूपस न्धः — पदस्य अन्ते यदा “ए”कारः अथवा “ओ”कारः भव त, तदनन्तरम् अ ग्रमपदस्य प्रथमवणः
“अ”कारः भव त तदा पूवरूपस न्धः भव त। तत्र “अ”कारस्य ाने “ऽ” इ त अवग्रह चह्नस्य प्रयोगः भव त। —
नयमम् उदाहरणैः सह स्पष्टीकुरुत।
नयमः — जब पहले पद के अन्त म ए या ओ हो और उसके तुरन्त बाद वाले पद का पहला वण अ हो, तब वह ‘अ’ लुप्त हो जाता है
और पहला पद ज्य का त्य (पूवरूप म) बना रहता है। लुप्त हुए ‘अ’ के स्थान पर अवग्रह- चह्न ‘ऽ’ लख दया जाता है। इसी लए
इसे पूवरूपस न्ध कहते ह — क्य क स न्ध म ‘पूव’ (पहला) रूप ही बचता है।
पदद्वयम् ( व े दः) स न्धपदम् अन्त्यवणः पाठे कुत्र आगतम्
दे शभक्तो + अयम् दे शभक्तोऽयम् ओ+अ पाठस्य शीषक ोके
सव + अिप सवऽिप ए+अ उदाहरणम् (पृष्ठ 44)
पशवो + अिप पशवोऽिप ओ+अ ‘बहवः गृहपा लताः पशवोऽ प …’
बुभिु क्षतो + अिस्म बुभिु क्षतोऽिस्म ओ+अ भक्षुकस्य क्रन्दने
अश्रुपूणनयनो + अभवत् अश्रपु ूणनयनोऽभवत् ओ+अ गोपबन्धोः वणने
‘ओ’ आया कहाँ से ? ‘दे शभक्तः’, ‘पशवः’, ‘बुभु क्षतः’ — इन सबके अन्त म मूलतः वसग है। जब आगे कोई
घोष वण (यहाँ ‘अ’) आता है तो पहले वसगस न्ध से ‘अः’ का ‘ओ’ बनता है (दे शभक्तः → दे शभक्तो), और उसके
बाद यह पूवरूपस न्ध लगती है। अथात् एक ही जगह पर दो स न्धयाँ क्रम से काम करती ह।
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लखने क सावधानी: अवग्रह ‘ऽ’ को कभी भी ‘ड’ या ‘S’ जैसा मत ल खए, और उसे पदान्त म स्थान (space)
दे कर अलग मत क जए — समादृतोऽ स्त एक ही पद है। अभ्यास के लए स्वयं स न्ध क जए — ते + अ प =
तेऽ प, कुतो + अ प = कुतोऽ प, सो + अयम् = सोऽयम्, एको + अ प = एकोऽ प।
अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 44
प्रश्नः १ — अधो ल खतानां प्रश्नानाम् एकपदे न उत्तरं लखत
एकपदे न उत्तरम्
प्र.1 (क) समाज- दनप त्रकायाः प्र तष्ठाता कः ?
गोपबन्धुदासः ।
[‘समाज’ दै नक प त्रका के संस्थापक गोपबन्धुदास थे।]
उत्तर क वभ क्त: प्रश्न म कः (कौन) है — प्रथमा वभ क्त, एकवचन, पुं लङ्ग। अतः उत्तर भी प्रथमा एकवचन म
ही आएगा — गोपबन्धुदासः, न क ‘गोपबन्धुदासम्’ या ‘गोपबन्धुदासेन’। ‘समाज- दनप त्रकायाः’ षष्ठी एकवचन है
— ‘ कसका प्र तष्ठाता’ यह बताने के लए।
पाठ का आधार (पृष्ठ 41): असौ सत्यवा द-वन वद्यालयस्य, द रद्रनारायणसेवा-सङ् घस्य, सत्यवा द-
मुद्रणालयस्य, समाजः इ त दै नक-वातापत्रस्य च प्र तष्ठाता आसीत्। पुस्तक यह भी बताती है क ‘समाजः’
दनप त्रका सौ वष से अ धक समय से आज भी प्र त दन प्रका शत होती है।
प्र.1 (ख) गोपबन्धुः कस्मै स्वभोजनं दत्तवान् ?
भक्षुकाय ।
[गोपबन्धु ने अपना भोजन भखारी को दया।]
चतुथ क्य ? प्रश्न म कस्मै है — यह ‘ कम्’ शब्द का चतुथ वभ क्त, एकवचन, पुं लङ्ग रूप है। ‘दे ना’ (दा धातु)
के साथ जसे दया जाता है वह सम्प्रदान कहलाता है और उसम चतुथ आती है — इस लए उत्तर भी चतुथ म
भक्षुकाय ही होगा।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 4 प्रणम्यो दे शभक्तोऽयं गोपबन्धुमहामनाः
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पाठ का आधार (पृष्ठ 38): कम प अ व चन्त्य झ ट त स्वस्मै प रवे षतं भोजनं हस्ते गृहीत्वा ब हरागतवान्।
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भक्षुकञ्च त ो जतवान्। — बना कुछ सोचे, अपने लए परोसा हुआ भोजन हाथ म लेकर वे तु
और भखारी.कोco वही खला दया। a
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मरणास ः कः आसीत् ?
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गोपबन्धोः पुत्रः । (एकपदे न — पुत्रः ।)
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[गोपबन्धु का अपना पुत्र मरणासन्न था।]
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शब्द का अथ: मरणासन्नः = मरण + आसन्नः — ‘जो मृत्यु के नकट है’। यह पद प्रथमा एकवचन पुं लङ्ग म है,
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इस लए उत्तर भी उसी रूप म — ‘पुत्रः’। ‘गोपबन्धोः’ षष्ठी एकवचन है (गोपबन्धु का)।
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पाठ का आधार (पृष्ठ 39): मरणास ं स्वपुत्रम प वहाय जलप्लावपी डतान् भारतमातुः सहस्रशः पुत्रान् द्रष्टु ं
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गृहात् ब हः नगतः समाजमसेवत च। — यही इस पाठ का सबसे मा मक वाक्य है: अपने एक मरणासन्न पुत्र को
छोड़कर वे ‘भारतमाता के हज़ार पुत्र ’ क सेवा करने नकल पड़े।
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गोपबन्धुः केन उपा धना सम्मा नतः अभवत् ?
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a ‘उत्कलम णः’ इ त उपा धना ।
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[गोपबन्धु ‘उत्कलम ण’ उपा ध से सम्मा नत हुए।]
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तृतीया क्य ? प्रश्नशब्द केन तृतीया वभ क्त, एकवचन है — ‘ कस साधन से’। सम्मान जस उपा ध ‘से’ मला,
वह करण है; अतः उत्तर भी तृतीया म — उपा धना। उपा ध का नाम ‘इ त’ के साथ ज्य का त्य (प्रथमा म) रहता है
— उत्कलम णः इ त उपा धना।
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g । ‘उत्कल’ ओ डशा का प्राचीन
.cआचायः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलम णः इ त उपा धना सम्माaनतवान्
कसने द ? पाठ (पृष्ठ 41) के अनुसार — समाजसेवायै दे शसेवायै च तस्य असीमं त्यागमनुभवन् वै ा नकः
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नाम है, अतः ‘उत्कलम ण’ का अथ है — ओ डशा क म ण।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 4 प्रणम्यो दे शभक्तोऽयं गोपबन्धुमहामनाः AglaSem · NCERT Solutions
प्र.1 (ङ) गोपबन्धुः क त वषा ण कारावासं प्राप्तवान् ?
वषद्वयम् । (द्वे वष ।)
[गोपबन्धु ने दो वष का कारावास भोगा।]
पाठ का वाक्य: सः वषद्वयं यावत् कारावासं प्राप्तवान्। यहाँ यावत् का अथ है ‘तक’ — अथात् दो वष तक।
‘वषद्वयम्’ द्वगु समास है (द्वयोः वषयोः समाहारः), और कालवाची होने से द्वतीया वभ क्त म आया है — संस्कृत
म ‘ कतने समय तक’ बताने के लए द्वतीया ही लगती है।
सन्दभ: यह कारावास स्वतन्त्रता-आन्दोलन के कारण हुआ — महात्मगान्धेः प्रेरणया भारतीयस्वतन्त्रतान्दोलने
गोपबन्धुः भागं गृहीतवान्। कारागार म रहकर ही उन्ह ने ‘बन्द र आत्मकथा’ और ‘कारा-क वता’ जैसी पुस्तक
ओ डआ भाषा म लख ।
अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 44–45
प्रश्नः २ — एकवाक्येन उत्तरं लखत
एकवाक्ये न उत्तरम्
प्र.2 (क) गोपबन्धुः कमथम् अ ुपूणनयनः अभवत् ?
दनत्रयात् कम प अभुक्तवतः बुभु क्षतस्य भक्षुकस्य करुणध्व न ुत्वा दया वग लतहृदयः गोपबन्धुः अ ुपूणनयनः
अभवत् ।
[तीन दन से कुछ भी न खाए हुए भूखे भखारी क करुण पुकार सुनकर, दया से पघले हुए हृदय वाले गोपबन्धु क आँख आँसुओं से
भर गईं।]
पाठ क पं क्त दे खए (पृष्ठ 38): ‘मातः, मातः ! बुभु क्षतोऽ स्म, कृपया क ञ्चत् भोजनं दे ह। दनत्रयात् कम प न
भुक्तम्। … आँ आँ …’ — इ त क्रन्दनध्व न ुत्वैव दया वग लतहृदयः गोपबन्धुः अ ुपूणनयनोऽभवत्। उत्तर म
यही कारण एक वाक्य म समेटा गया है — कारण पहले, फर प रणाम।
व्याकरण- बन्दु: ुत्वा (श्रु + क्त्वा) ‘सुनकर’ — क्त्वा प्रत्यय तब लगता है जब एक ही कता के दो काम ह और
पहला काम पहले पूरा हो। ‘श्रुत्वैव’ = श्रुत्वा + एव (वृ द्ध स न्ध: आ + ए = ऐ), अथात् ‘सुनते ही’।
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प्र.2 (ख) क दृशं पुत्रं वहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत् ?
मरणास ं स्वपुत्रं वहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत् ।
[मृत्यु के नकट पहुँचे हुए अपने पुत्र को भी छोड़कर गोपबन्धु ने समाजसेवा क ।]
प्रश्न का ढं ग: क दृशम् का अथ है ‘कैसा’ — अथात् उत्तर म पुत्र का वशेषण दे ना है, नाम नह । इसी लए उत्तर
‘मरणासन्नम्’ से आरम्भ होता है। ‘क दृशं पुत्रम्’ और ‘मरणासन्नं स्वपुत्रम्’ — दोन द्वतीया वभ क्त, एकवचन,
पुं लङ्ग म ह, क्य क ‘ वहाय’ (छोड़कर) का कम यही है।
इस उत्तर का भाव: पाठ कहता है क वे ‘भारतमातुः सहस्रशः पुत्रान्’ को दे खने गए — अथात् उनके लए
जलप्लावपी ड़त लोग भी अपने ही पुत्र थे। यही वह त्याग है जसके कारण उन्ह महामनाः और प्रणम्यः कहा गया।
प्र.2 (ग) गोपबन्धोः कृते उत्कलम णः इ त उपा धः कमथ प्रदत्तः ?
समाजसेवायै दे शसेवायै च तस्य असीमं त्यागम् अनुभवन् वै ा नकः आचायः प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् ‘उत्कलम णः’
इ त उपा धना सम्मा नतवान् ।
[समाजसेवा और दे शसेवा के लए कए गए उनके अपार त्याग को अनुभव करके वै ा नक आचाय प्रफुल्लचन्द्रराय ने गोपबन्धु को
‘उत्कलम ण’ उपा ध से सम्मा नत कया।]
चतुथ का सुन्दर प्रयोग: समाजसेवायै और दे शसेवायै — दोन चतुथ वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग ह। संस्कृत
म ‘ कसके लए’ (प्रयोजन) बताने के लए चतुथ आती है, इस लए प्रश्न का ‘ कमथम्’ इन्ह दो पद से उत्त रत हो
जाता है।
त थ (योग्यता वस्तरः, पृष्ठ 47): पुस्तक के जीवन-प रचय के अनुसार यह सम्मान १९२४ म मला। ‘उत्कल’ =
ओ डशा का प्राचीन नाम, ‘म ण’ = रत्न — अथात् ‘ओ डशा का रत्न’।
प्र.2 (घ) गोपबन्धुः कुत्र जन्म लब्धवान् ?
गोपबन्धुः ओ डशाराज्यस्य पुरीजनपदस्य साक्षीगोपालसमीपे सुआण्डो-ग्रामे जन्म लब्धवान् ।
[गोपबन्धु ने ओ डशा राज्य के पुरी जनपद म साक्षीगोपाल के पास सुआण्डो गाँव म जन्म लया।]
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सप्तमी क्य ? प्रश्नशब्द कुत्र (कहाँ) स्थान पूछता है, और स्थान बताने के लए सप्तमी वभ क्त आती है — ग्रामे
(सुआण्डो-ग्रामे), समीपे (साक्षीगोपालसमीपे)। ‘ओ डशाराज्यस्य’ और ‘पुरीजनपदस्य’ षष्ठी म ह, क्य क वे बड़े क्षेत्र
से छोटे क्षेत्र का सम्बन्ध बताते ह।
त थ (योग्यता वस्तरः, पृष्ठ 47): पुस्तक जन्म- त थ ०९/१०/१८७७ दे ती है और जन्मस्थान — सुआण्डो-ग्रामः,
पुरी-जनपदः, ओ डशाराज्यम्। पता दै त्या रदास और माता स्वणमयी दे वी थ ।
प्र.2 (ङ) गोपबन्धुः सवदा केषाम् उपयोगं कृतवान् ?
गोपबन्धुः सवदा स्वदे शस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान् ।
[गोपबन्धु ने सदा अपने ही दे श के वस्त्र और वस्तुओं का उपयोग कया।]
षष्ठी का प्रयोग: प्रश्न म केषाम् षष्ठी वभ क्त, बहुवचन है — ‘ कनका’। ‘उपयोगः’ के साथ जसका उपयोग हो,
वह षष्ठी म आता है; इस लए उत्तर म वस्त्राणां वस्तूनां च — दोन षष्ठी बहुवचन। ‘स्वदे शस्यैव’ = स्वदे शस्य + एव
(वृ द्ध स न्ध: अ + ए = ऐ), ‘एव’ यहाँ ज़ोर दे ता है — ‘अपने ही दे श के’।
जोड़कर दे खए: इसी स्वदे शी-भावना से वे कापासवस्त्र नमाणाय सः स्वयमेव सूत्रप्रस्तु तमकरोत्। — कपास के
वस्त्र बनाने के लए स्वयं सूत कातते थे। यह महात्मा गान्धी के स्वदे शी-आन्दोलन का ही आचरण है।
अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 45
प्रश्नः ३ — कोष्ठके दत्ता न पदा न उपयुज्य वाक्या न रचयत (सेवाम्, सुस्वादू न, सहायताम्, स्वदे शवस्त्रा ण, अन्यतमः)
वाक्यरचना
प्र.3 (क) ‘सेवाम्’ इ त पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
गोपबन्धुः जलप्लावपी डतानाम् अकुण्ठं सेवाम् अकरोत् ।
[गोपबन्धु ने बाढ़-पी ड़त क मन लगाकर सेवा क ।]
वाक्य कैसे बनाएँ: ‘सेवाम्’ द्वतीया वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग है — यानी यह वाक्य म कम बनेगा और
उसके साथ ‘करो त / अकरोत् / कृत्वा’ जैसी क्रया चा हए। पहले कता चु नए (गोपबन्धुः), फर कसक सेवा —
षष्ठी (जलप्लावपी डतानाम्), फर क्रया।
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अन्य सम्भव वाक्य: माता पत्रोः सेवां कुमः। · सै नकाः दे शस्य सेवां कुव न्त। · अस्मा भः रो गणां सेवां कतव्या।
प्र.3 (ख) ‘सुस्वादू न’ इ त पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
कदलीपत्रेषु सुस्वादू न व्यञ्जना न प रवे षता न ।
[केले के पत्त पर स्वा दष्ट व्यञ्जन परोसे गए।]
वशेषण- वशेष्य का मेल: सुस्वादू न नपुंसक लङ्ग, प्रथमा/ द्वतीया, बहुवचन है — इस लए इसके साथ वशेष्य भी
नपुंसक लङ्ग बहुवचन ही आना चा हए, जैसे व्यञ्जना न, फला न, भोजना न। संस्कृत का नयम है — वशेषण
अपने वशेष्य के लङ्ग, वचन और वभ क्त का अनुसरण करता है।
पाठ का वाक्य (पृष्ठ 38): बहू न सुस्वादू न व्यञ्जना न कदलीपत्रेषु प रवे षता न। — यही भोजनसभा का
दृश्य है, जसके बीच भक्षुक क पुकार सुनाई दे ती है।
प्र.3 (ग) ‘सहायताम्’ इ त पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
अस्मा भः एतादृशानां दुः खतानां सहायतां करणीया ।
[हम ऐसे दुःखी लोग क सहायता करनी चा हए।]
कमवाच्य का ढाँचा: जब कतव्य बताना हो तो कता तृतीया म (अस्मा भः) और कम प्रथमा म आता है; पर यहाँ
पुस्तक का पद ‘सहायताम्’ द्वतीया म दया है, अतः कतृवाच्य वाक्य भी उतना ही ठ क है — वयं दुः खतानां
सहायतां कुमः। दोन म से कोई एक ल खए।
अन्य सम्भव वाक्य: छात्राः वृद्धस्य सहायतां कुव न्त। · जलप्लावपी डतानां सहायताथ वयं धनं द ः।
प्र.3 (घ) ‘स्वदे शवस्त्रा ण’ इ त पदम् उपयुज्य वाक्यं रचयत।
गोपबन्धुः सवदा स्वदे शवस्त्रा ण एव धा रतवान् ।
[गोपबन्धु ने सदा अपने दे श के बने वस्त्र ही पहने।]
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पद क पहचान: स्वदे शवस्त्रा ण नपुंसक लङ्ग, बहुवचन है और यहाँ द्वतीया वभ क्त (कम) म प्रयुक्त है — ‘वस्त्र
m a s emक्रया दे खकर ही
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को पहना’। नपुंसक लङ्ग म प्रथमा और द्वतीया बहुवचन का रूप एक ही (–आ न) होता है, इस लए
तय होता है .कco
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वह कता है या कम।
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aglअन्य सम्भव वाक्य: वयं स्वदे शवस्त्रा ण धारयामः। · स्वदे शवस्त्रा ण दे शस्य उन्न त वधय न्त।
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प्र.3 (ङ) ‘अन्यतमः’ इ त पदम् उपयुज्य a g रचयत।
वाक्यं
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c पाँच मत्र म से एक थे।] g l a
[गोपबन्धु प्र .सद्ध
गोपबन्धुः प्र स े षु पञ्च मत्रेषु अन्यतमः आसीत् ।
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ag ‘अन्यतमः’ का अथ: बहुत म से ‘कोई एक’। इसके साथ जस समूह क बात हो वह सप्तमी बहुवचन म आता है
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— पञ्च मत्रेषु अन्यतमः, छात्रेषु अन्यतमः। ‘अन्यतरः’ से इसका भेद याद र खए — ‘अन्यतरः’ दो म से एक,
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‘अन्यतमः’ बहुत म से एक।
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सन्दभ: ये ‘पञ्चसखा’ थे — गोपबन्धुदास, नीलकण्ठदास, गोदावरीश मश्र, कृपा सन्धु मश्र और लङ्गराज मश्र,
जन्ह ने मलकर सत्यवा द-वन वद्यालय चलाया (पृष्ठ 48)।
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अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 45
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प्रश्नः ४ — चत्रं दृष्ट् वा पञ्च वाक्या न रचयत
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चत्रवणनम्
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चत्रं दृष्ट् वा पञ्च वाक्या न रचयत — (क) … (ख) … (ग) … (घ) … (ङ) …
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.c बाँह का सहारा देकर उसी च कत्सालय क ओर ले जा रहे ह। भवन के चार aओरg वृक्ष और माग दखाई देते ह। इसी दृश्य के
पुस्तक के चत्र (पृष्ठ 45) म यह दृश्य है — एक ओर च कत्सालयः लखा हुआ भवन है, और गोपबन्धु एक अस्वस्थ बालक को
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अपनी
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पाँच वाक्य —
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क्रमः संस्कृतवाक्यम् हन्द अथ
(क) िचत्र े एकः िचिक त्सालयः दृ श्यते । चत्र म एक च कत्सालय दखाई दे ता है।
(ख) एकः बालकः अस्वस्थः अिस्त । एक बालक अस्वस्थ है।
(ग) गोपबन्ध ःु तं बालकं िचिक त्सालयं नयित । गोपबन्धु उस बालक को च कत्सालय ले जा रहे ह।
(घ) सः बालकं स्वबाहन
ु ा अवल म्बते । वे बालक को अपनी बाँह से सहारा दे रहे ह।
(ङ) िचिक त्सालयस्य समीपे वृक्षाः माग श्च सिन्त । च कत्सालय के पास पेड़ और रास्ता है।
चत्रवणन का नयम: पहले स्थान बताइए ( चत्रे … अ स्त/दृश्यते), फर पात्र, फर क्रया, अन्त म प रवेश। हर
वाक्य म कता और क्रया का वचन मलाइए — ‘बालकः अ स्त’ (एकवचन), पर ‘वृक्षाः स न्त’ (बहुवचन)। सरल लट्
लकार ही प्रयोग क जए।
भाव जोड़ना चाह तो: रो गणां सेवा एव परमः धमः। · गोपबन्धुः द नानां बन्धुः आसीत्। — ऐसे एक वाक्य से चत्र
का सन्दे श भी आ जाएगा, क्य क पाठ बताता है क वे अध्ययनकालादे व स द रद्राणां रो गणां च सेवामकरोत्।।
अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 45
प्रश्नः ५ — समु चतेन पदे न ोकं पूरयत
ोकपू तः
प्र.5 (क) …………………… मम लीयतां तनुः
स्वदे शभूमौ मम लीयतां तनुः ।
[मेरा शरीर अपने दे श क भू म म वलीन हो जाए।]
सही पद क्य : ‘लीयताम्’ ( वलीन हो जाए) क्रया यह पूछती है — ‘कहाँ वलीन हो ?’ स्थान बताने के लए सप्तमी
वभ क्त चा हए — इस लए स्वदे शभूमौ (स्वदे शभू म → सप्तमी एकवचन)। ‘स्वदे शभू मः’ या ‘स्वदे शभू मम्’
लखना गलत होगा।
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प्र.5 (ख) उत्कलम ण रत्याख्यः प्र स ो ……………………
उत्कलम ण रत्याख्यः प्र सद्धो लोकसेवकः ।
[‘उत्कलम ण’ नाम वाले प्र सद्ध लोकसेवक।]
सही पद क्य : ‘प्र सद्धः’ वशेषण है, उसे कोई वशेष्य चा हए — और वह पुं लङ्ग, प्रथमा, एकवचन म होना चा हए।
लोकसेवकः ठ क बैठता है (प्र सद्धः + लोकसेवकः = प्र सद्धो लोकसेवकः, वसगस न्ध)। यह पं क्त पाठ के शीषक-
ोक (पृष्ठ 41) क है।
प्र.5 (ग) स्वदे शलोकास्तदनु …………………… नु
स्वदे शलोकास्तदनु प्रयान्तु नु ।
[उसके बाद दे शवासी (उस माग पर) चल।]
सही पद क्य : कता ‘स्वदे शलोकाः’ प्रथमा बहुवचन है, अतः क्रया भी बहुवचन म चा हए — प्रयान्तु (प्र + या धातु,
लोट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन = ‘चल’)। ‘प्रयातु’ (एकवचन) रखने पर कता से मेल नह बैठेगा।
प्र.5 (घ) स्वराज्यमाग य द ……………………,
स्वराज्यमाग य द गतमा लका, ।
[य द स्वराज्य के माग म ग क शृङ् खला हो,]
सही पद क्य : ‘य द’ शत लगाता है और अगली पं क्त म सा (वह — स्त्री लङ्ग सवनाम) आया है; अतः यहाँ जो पद
आएगा वह स्त्री लङ्ग, प्रथमा, एकवचन होना चा हए — गतमा लका (गतानां मा लका = ग क शृङ् खला)।
सवनाम और उसका पूवपद सदा लङ्ग-वचन म मलते ह — यही इस प्रश्न क कुंजी है।
प्र.5 (ङ) …………………… प रपू रतास्तु सा
ममा मांसैः प रपू रतास्तु सा ।
[वह (ग क शृङ् खला) मेरी ह य और माँस से भर जाए।]
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सही पद क्य : ‘प रपू रता अस्तु’ पूछता है — ‘ कससे भरे ?’ साधन बताने के लए तृतीया वभ क्त चा हए, अतः
अ मांसैः (तृतीया बहुवचन)। ‘मम + अ स्थमांसैः’ म सवणद घ स न्ध से ममा मांसैः बना। पूरा ोक इस
प्रकार है — स्वदे शभूमौ मम लीयतां तनुः, स्वदे शलोकास्तदनु प्रयान्तु नु। स्वराज्यमाग य द गतमा लका,
ममा मांसैः प रपू रतास्तु सा॥
अथ एक साथ: ‘मेरा शरीर दे श क म म मल जाए, और उस पर चलकर दे शवासी आगे बढ़; स्वराज्य के माग के
ग े मेरी ही ह ी-माँस से भर जाएँ।’ — यही गोपबन्धु का सबसे प्र सद्ध वचन है, जो मूलतः ओ डआ म है।
अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 46
प्रश्नः ६ — उदाहरणानुसारं क्रयापदं स्त्री लङ्गे प रवतयत (यथा — गतवान् — गतवती)
रूपप रवतनम्
प्र.6 (क) प्राप्तवान् — ……………………
प्राप्तवान् — प्राप्तवती ।
[(पुरुष ने) प्राप्त कया — (स्त्री ने) प्राप्त कया।]
नयम एक ही है: ये सब क्तवतु प्रत्ययान्त पद ह, जो भूतकाल का कतृवाचक अथ दे ते ह (‘ जसने कया’)। पुं लङ्ग
म प्रथमा एकवचन का रूप –वान् होता है और स्त्री लङ्ग बनाने के लए ङ प् (–ई) जुड़कर –वती हो जाता है।
उदाहरण: गतवान् → गतवती।
वाक्य म दे खए — सः कारावासं प्राप्तवान् । सा पुरस्कारं प्राप्तवती ।
प्र.6 (ख) उप वष्टवान् — ……………………
उप वष्टवान् — उप वष्टवती ।
[(पुरुष) बैठा — (स्त्री) बैठ ।]
पाठ से जो ड़ए: पृष्ठ 38 म आया है — आम न्त्रताः सव अ तथयः हस्तपादं क्षाल यत्वा आसनेषु उप वष्टवन्तः।
यहाँ उप वष्टवन्तः पुं लङ्ग बहुवचन है; एकवचन ‘उप वष्टवान्’ और उसका स्त्री लङ्ग ‘उप वष्टवती’ होगा। स्त्री लङ्ग
बहुवचन बनेगा — उप वष्टवत्यः।
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प्र.6 (ग) भुक्तवान् — ……………………
भुक्तवान् — भुक्तवती ।
[(पुरुष ने) खाया — (स्त्री ने) खाया।]
धातु पहचा नए: भुज् धातु से क्त प्रत्यय लगाकर भुक्तम् (खाया गया) और क्तवतु लगाकर भुक्तवान् ( जसने
खाया) बनता है। पाठ म क्त-रूप आया है — दनत्रयात् कम प न भुक्तम्। इसी प्रकार — बा लका भोजनं
भुक्तवती ।
प्र.6 (घ) कृतवान् — ……………………
कृतवान् — कृतवती ।
[(पुरुष ने) कया — (स्त्री ने) कया।]
पाठ से जो ड़ए: सवदा स्वदे शस्यैव वस्त्राणां वस्तूनां च उपयोगं कृतवान्। — यह गोपबन्धु के लए आया है, अतः
पुं लङ्ग। य द कता स्त्री होती तो — सा स्वदे शवस्त्राणाम् उपयोगं कृतवती ।
प्र.6 (ङ) गृहीतवान् — ……………………
गृहीतवान् — गृहीतवती ।
[(पुरुष ने) ग्रहण कया — (स्त्री ने) ग्रहण कया।]
पाठ से जो ड़ए: महात्मगान्धेः प्रेरणया भारतीयस्वतन्त्रतान्दोलने गोपबन्धुः भागं गृहीतवान्। — ‘भागं
गृहीतवान्’ का अथ है ‘भाग लया’। स्त्री लङ्ग म — सा आन्दोलने भागं गृहीतवती ।
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एक ता लका म पूरा उत्तर:
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पुं लङ्गम् स्त्री लङ्गम् अथः
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a glयथा — गतवान् गतवती गया / गई
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(क) पाप्तवान् पाप्तवती प्राप्त कया
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(ख) उपिवष्टवान् उपिवष्टवती बैठा / बैठ
(ग) भुक्तवान् aभुgतवती
क् खाया
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(घ) कृ तवान् कृ तवती कया
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(ङ) ग ृहीतवान् ग ृहीतवती ग्रहण कया / लया
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अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 46
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प्रश्नः ७ — समु चतेन पदे न सह स्तम्भौ मेलयत
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प्र.7 समु चतेन पदे न सह स्तम्भौ मेलयत — ‘अ’ स्तम्भः : 1. समाजः 2. ममा
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मांसैः 3. उत्कलम णः 4. आँ आँ . .
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इ त 5. सुस्वादू न ; ‘इ’ स्तम्भः : गोपबन्धुः, व्यञ्जना न, क्रन्दनध्व नः, दनप त्रका, प रपू रतास्तु।
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agl उत्तर
सही मेल इस प्रकार है —
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क्रमः ‘अ’ स्तम्भः ‘इ’ स्तम्भः सन्दभः (पाठे कुत्र)
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aिदनपि त्र ‘समाजः’ इ त दनप त्रका अद्या प प्र त दनं प्रकाश्यते (पृष्ठ 41)
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2. ममा स्थमांसैः पिरपूिरतास्तु ममा स्थमांसैः प रपू रतास्तु सा ( ोकः, पृष्ठ 41)
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3. उत्कलम णः गोपबन्ध ःु प्रफुल्लचन्द्ररायेण दत्ता उपा धः (पृष्ठ 41)
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आँ आँ . . इ त भक्षुकस्य क्रन्दनध्व नः (पृष्ठ 38)
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5. सुस्वादू न यञ्जनािन बहू न सुस्वादू न व्यञ्जना न कदलीपत्रेषु प रवे षता न (पृष्ठ 38)
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मलान क कुंजी — लङ्ग और वचन: सुस्वादू न नपुंसक लङ्ग बहुवचन है, इस लए उसका जोड़ीदार भी नपुंसक
बहुवचन ही होगा — व्यञ्जना न (‘गोपबन्धुः’ पुं लङ्ग एकवचन है, वह नह चलेगा)। ममा स्थमांसैः तृतीया बहुवचन
है — ‘ कससे भरे’; इस लए क्रया प रपू रतास्तु उसी के साथ जाएगी।
अथ क कुंजी: ‘समाजः’ एक समाचारपत्र का नाम है, व्य क्त का नह — इसी लए उसका जोड़ीदार ‘ दनप त्रका’
है। ‘आँ आँ’ रोने क ध्व न है, अतः ‘क्रन्दनध्व नः’। शेष एक जोड़ी बचती है — उत्कलम णः = गोपबन्धुः।
अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 46
प्रश्नः ८ — घटनाक्रमेण वाक्या न पुनः लखत
घटनाक्रमः
प्र.8 घटनाक्रमेण वाक्या न पुनः लखत — (क) भक्षुकञ्च त ो जतवान्। (ख) प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम्
उत्कलम णः इ त उपा धना सम्मा नतवान्। (ग) गोपबन्धुः अ ुपूणनयनोऽभवत्। (घ) अ तथयो हस्तपादं
क्षाल यत्वा आसनेषु उप वष्टवन्तः। (ङ) दनत्रयात् कम प न भुक्तम्।
पाठ क घटनाओं का सही क्रम —
क्रमः वाक्यम् क्या हुआ
(क) अितथयो हस्तपादं क्षालियत्वा आसनेष ु उपिवष्टवन्तः । भोज म बुलाए गए अ त थ हाथ-पैर धोकर आसन पर बैठे।
(ख) िदनत्र यात् िकमिप न भुक्तम् । बाहर से भक्षुक क पुकार — ‘तीन दन से कुछ नह खाया’।
(ग) गोपबन्ध ःु अश्रपु ूणनयनोऽभवत् । वह करुण स्वर सुनते ही गोपबन्धु क आँख भर आईं।
(घ) िभक्षक
ु ञ्च तद् भोिजतवान् । उन्ह ने अपना परोसा हुआ भोजन ले जाकर भक्षुक को खला
दया।
(ङ) पफु ल्लचन्द रायः गोपबन्ध मु ् उ त्कलमिणः इित उपािधना ऐसे त्याग के कारण आगे चलकर उन्ह ‘उत्कलम ण’ उपा ध
स म्मािनतवान् । मली।
क्रम कैसे पहचान: कहानी का सूत्र कारण → प रणाम है। पहले भोज का दृश्य (अ त थ बैठे), फर वह घटना जो
करुणा जगाती है ( भक्षुक का क्रन्दन), फर गोपबन्धु क प्र त क्रया (आँसू), फर उनका कम (भोजन दे ना), और
सबसे अन्त म समाज क स्वीकृ त (उपा ध)। ध्यान द जए — उपा ध वाली घटना पूरे जीवन के त्याग का फल है,
इस लए वह सबसे अन्त म आएगी।
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भाषा- बन्दु: त ो जतवान् = तत् + भो जतवान् (‘वह’ भोजन खला दया) — यहाँ ‘त्’ का ‘द्’ हो गया, यह
जश्त्व स न्ध है। क्षाल यत्वा (धोकर) क्त्वा-प्रत्ययान्त है, जो बताता है क यह काम बैठने से पहले हुआ।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 47–48
ोकव्याख्या, उत्कलम ण-गोपबन्धुदासस्य जीवनप रचयः, सत्यवा द-वन वद्यालयः
ोकः
प्र.1 भोजनस्या तदौलभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्। तदथ भोजनं कुयाः मा शरीरे दयां कुरु॥ — अस्य ोकस्य पद े दम्
अन्वयं भावाथ च लखत।
पद े दः — भोजनस्य, अ तदौलभ्यम्, जीवनाय, सुखप्रदम्, तदथम्, भोजनम्, कुयाः, मा, शरीरे, दयाम्, कुरु।
अन्वयः — भोजनस्य अ तदौलभ्यं ( वद्यते)। जीवनाय सुखप्रदं भोजनं कुयाः। तदथ शरीरे दयां मा कुरु।
अथः — भोजन बहुत क ठनाई से मलता है। जीवन को आगे ले जाने के लए सुख दे ने वाला भोजन करना चा हए। इस लए (भोजन
करते समय) शरीर पर दया मत क जए — अथात् संकोच छोड़कर भरपेट भोजन क जए।
भावाथः (पुस्तकानुसारम्) — भोजनम् अतीव दुलभं भव त। जीवनम् अग्रे नेतुं सुखप्रदं भोजनं करणीयम्। अतः शरीरस्य
कष्टं व चन्त्य भोजन वषये कदा प सङ् कोचः ल ा वा न करणीया इ त।
भावः — यह ोक गोपबन्धु ने भोजनसभा म हँसते हुए कहा था, इस लए इसम वनोद भी है और गम्भीर बात भी। ऊपर से यह
भोजन के समय संकोच न करने क मीठ चुटक है; भीतर से यह याद दलाता है क अन्न कतना दुलभ है — और जो व्य क्त यह
जानता है, वही भूखे क पुकार सुनकर अपना भोजन उठाकर दे दे ता है। पाठ म ठ क अगले क्षण यही होता है।
व्याकरण दे खए: कुयाः — कृ धातु, व ध लङ् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन (‘तुम्ह करना चा हए’); कुरु — लोट्
लकार, मध्यमपुरुष एकवचन (‘करो’), और उसके साथ नषेध के लए मा आया है — संस्कृत म ‘मत करो’ कहने के
लए ‘न’ नह , मा + लोट् का प्रयोग होता है। ‘जीवनाय’ चतुथ एकवचन है — प्रयोजन बताने के लए।
स न्ध: भोजनस्य + अ तदौलभ्यम् = भोजनस्या तदौलभ्यम् (सवणद घ स न्ध — अ + अ = आ)। ‘शरीरे दयां मा
कुरु’ म शरीरे सप्तमी एकवचन है — ‘शरीर पर’।
प्र.2 उत्कलम ण-गोपबन्धुदासस्य जीवनप रचयं लखत।
पुस्तक के ‘योग्यता वस्तरः’ (पृष्ठ 47) म दया गया जीवन-प रचय —
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वषयः ववरणम् हन्द
नाम उ त्कलमिणः गोपबन्ध दु ासः उत्कलम ण गोपबन्धुदास
जन्म ०९/१०/१८७७ 9 अक्तूबर 1877
जन्मस्थानम् सुआ ण् डो-ग ामः, पुर ी-जनपदः, ओिडशाराज्यम् सुआण्डो गाँव, पुरी ज़ला, ओ डशा
िपता दै त्यािरदासः दै त्या र दास
माता स्वणमयी दे वी स्वणमयी दे वी
पत्नी मोती दे वी मोती दे वी
एफ़् .ए. उ ीणः १९००, रे भेन्सा महािव ालयः, कटकम्, ओिडशा 1900, रेभेन्सा (Ravenshaw)
कॉलेज, कटक
बी.एल्. उ ीणः १९०६, कलक ा-िवश्विव ालयः 1906, कलकत्ता वश्व वद्यालय
सत्यवािद-वनिव ालयस्य पितष्ठा १९०९ 1909
िबहार-ओिडशा व्यवस्थापकसभायाः १९१७ 1917
सदस्यः
समाज-साप्तािहकपित्रकायाः १९१९ 1919
पकाशनम्
भारतीय-जातीय-आन्दोलने १९२० 1920
योगदानम्
उत्कलमिणः इित उपािधना १९२४ 1924
सम्माननम्
रचनाः अवकाशिचन्ता, बन्दीर आ त्मकथा, कारा-किवता, धम पद , गो- उनक ओ डआ रचनाएँ
माहात्म्य, निचके ता-उपाख्यान
स्वग रोहणम् (साक्षी-गोपाले ) १७.०६.१९२८ 17 जून 1928, साक्षीगोपाल म
ता लका से क्या दखता है: बी.एल्. ( व ध क उपा ध) पास करने के तीन ही वष बाद उन्ह ने सत्यवा द-
वन वद्यालय (१९०९) खोल दया — अथात् उन्ह ने वकालत क चमक छोड़कर शक्षा और सेवा का माग चुना।
इसके बाद वधा यका का सदस्यत्व (१९१७), प त्रका ‘समाज’ (१९१९), राष्ट्रीय आन्दोलन (१९२०) और अन्त म
उपा ध (१९२४) — पूरा जीवन एक ही दशा म बढ़ता दखता है।
ध्यान रख: ये सभी त थयाँ पुस्तक के ‘योग्यता वस्तरः’ से ली गई ह; परीक्षा म इन्ह का प्रयोग क जए। नाम क
संस्कृत वतनी भी वैसी ही र खए — दै त्या रदासः, स्वणमयी दे वी, मोती दे वी।
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प्र.3 सत्यवा द-वन वद्यालयः इ त वषये लखत।
सत्यवा द-वन वद्यालयः भारतस्य प्रथमः मुक्त वद्यालयः आसीत् । १९०९ स्ताब्दे अगस्तमासस्य १२ दनाङ् के
साक्षीगोपाल-नामके ाने सः प्र तष्ठा पतः ।
[सत्यवा द-वन वद्यालय भारत का पहला मुक्त वद्यालय (खुला वद्यालय) था। इसक स्थापना 12 अगस्त 1909 को साक्षीगोपाल
नामक स्थान पर हुई।]
प्र तष्ठातारः — प ण्डतः गोपबन्धुदासः, प ण्डतः नीलकण्ठदासः, प ण्डतः डा. गोदावरीश मश्रः, प ण्डतः कृपा सन्धु मश्रः, प ण्डतः
लङ्गराज मश्रः, आचायः ह रहरदासः, प ण्डतः नन्द कशोरदासः च — एतेषां दे शभक्तानां म लतप्रयासेन अयं
नःशुल्कवन वद्यालयः तदानीम् आभारतं प्र तष्ठाम् अलभत ।
[इन दे शभक्त के स म्म लत प्रयास से यह नःशुल्क वन वद्यालय उस समय पूरे भारत म प्र सद्ध हो गया।]
कायम् — पञ्चसखायः म लत्वा समाजसेवां कुवन्तः शक्षा वकासं च कारयन्तः स्वाधीनतान्दोलनाय जनान् प्रेरय न्त स्म ।
[पाँच मत्र मलकर समाजसेवा करते, शक्षा का वकास कराते और लोग को स्वाधीनता-आन्दोलन के लए प्रे रत करते थे।]
‘वन वद्यालय’ नाम क्य : यह वद्यालय खुले म, वृक्ष के बीच चलता था — कक्षाएँ पेड़ क छाया म लगती थ ,
इसी लए इसे वन वद्यालय और भारत का पहला मुक्त वद्यालय कहा गया। यहाँ शक्षा नःशुल्क थी, जैसा पाठ म
आया है — सत्यवा द-वन वद्यालये स छात्रान् नःशुल्कम् अपाठयत्।
जोड़कर दे खए: प्रश्न ३ (ङ) का ‘अन्यतमः’ इन्ह पञ्चसखाओं क ओर संकेत करता है — गोपबन्धुदास उन
प्र सद्ध पाँच मत्र म से एक थे।
प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 48
प रयोजनाकायम् — १, २
प रयोजना
प्र.1 स्वप्रदे शस्य स्वतन्त्रतासङ् ग्रा मणां नामा न सङ्गह्य तेषु एकस्य स चत्रां सं क्षप्तजीवन लखत।
यह करने का काम है — उत्तर आपके अपने प्रदे श का होगा, इस लए यहाँ पहले व ध द है, फर एक नमूना उत्तर।
कैसे क जए —
1. अपने प्रदे श के 8–10 स्वतन्त्रतासङ् ग्रा मय के नाम पुस्तकालय, पाठ्यपुस्तक या बड़ से पूछकर एकत्र क जए और सूची
बनाइए।
2. उनम से एक को चु नए — वही चु नए जसके वषय म चत्र और सामग्री सरलता से मल सके।
3. उनका चत्र चपकाइए और नीचे संस्कृत म सं क्षप्त जीवनी ल खए — इन्ह शीषक म: नाम, जन्म, जन्मस्थानम्, माता- पता,
शक्षा, कायक्षेत्रम्, प्रमुखं योगदानम्, उपा धः, स्वगारोहणम्।
4. अन्त म एक-दो वाक्य म ल खए क उनसे आपने क्या सीखा।
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नमूना उत्तर (पाठ के ही उदाहरण पर) —
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शीषकम् ववरणम्
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नाम उ त्कलमिणः गोपबन्ध दु ासः
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जन्म ०९/१०/१८७७, सुआ ण् डो-ग ामः, पुर ी-जनपदः, ओिडशाराज्यम्
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माता-िपता माता स्वणमयी दे वी, िपता दै त्यािरदासः
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िशक्षा
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एफ़् .ए . — १९०० (रे भेन्सा महािव ालयः, कटकम्); बी.एल्. — १९०६ (कलक ा-िवश्विव ालयः)
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कायक्षेत्र म् िशक्षा, समाजसे वा, पत्र कािरता, स्वतन्त्र तान्दोलनम्
स यवािद -वनिव ालय य (१९०९), दिरद नारायणसे वा-सङ् घ य, ‘समाजः’ इित वात प य च पितm
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m a s e ठा; जल लावपीिडतानां
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पमुखं
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योगदानम्
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a glउपािधः ‘उ कलमिणः’ — आचायपफु लच द रायेण द ा (१९२४)
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१७.०६.१९२८, साक्षी-गोपाले
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स्वग रोहणम्
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नमूना अनु े दः — गोपबन्धुदासः ओ डशाराज्यस्यm
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aवाम् अकरोत्, ‘समाजः’ इ त दनप त्रकां च प्रारभत। महात्मगान्धेः प्रेरणया सः
महान् समाजसेवकः स्वतन्त्रतासङ् ग्रामी च आसीत्। सः छात्रान्
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नःशुल्कम् अपाठयत्, द रद्राणां रो गणां च से
स्वतन्त्रतान्दोलने भागं गृहीतवान् वषद्वयं कारावासं च प्राप्तवान्। तस्य त्यागं दृष्ट् वा प्रफुल्लचन्द्ररायः तं ‘उत्कलम णः’ इ त
उपा धना सम्मा नतवान्।
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.c तलकः; बङ्गालः: सुभाषचन्द्रबसुः; पञ्जाबः: भगत सहः; त मऴनाडु ः:aवाg ञ्चनाथः। जीवनी छोट र खए —
सुझाव: अपने प्रदे श के अनुसार नाम चु नए — यथा ओ डशा: गोपबन्धुदासः; बहार: राजेन्द्रप्रसादः; महाराष्ट्रम्:
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ase8–10 सरल संस्कृत वाक्य पयाप्त ह।
लोकमान्य
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प्र.2 जलप्लावपी डतानां साहाय्याथ स्वक याम् एकां काययोजनां लखत।
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यह भी अपनी योजना लखने का प्रश्न है। एक अच्छ काययोजना म तीन बात होनी चा हए — क्या करगे, कैसे करगे, और
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कसके साथ मलकर करगे।
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नमू.c a
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ना उत्तर — ‘जलप्लावपी डतसाहाय्य-योजना’
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क्रमः कायम् (संस्कृतम्) हन्द
१. िव ालये ‘साहाय्यसिमितः’ रचनीया । वद्यालय म एक सहायता-स म त बनाएँ।
२. छात्र ाः वस्त्र ािण, क म्बलान्, पाठ पुस्तकािन च सङ् ग ृ ीयुः । छात्र कपड़े, कम्बल और पाठ्यपुस्तक एकत्र कर।
३. न्न
शुष्का स्य (िचिपटक -ग ड
ु -लवण-जल स्य) पेिटकाः स ज्जीकरणीयाः । सूखा अन्न (चूड़ा, गुड़, नमक, पानी) के पैकेट तैयार कर।
४. औषधािन पाथिमकोपचारपेिटकाः च िचिक त्सालयस्य सहायतया च कत्सालय क सहायता से दवाइयाँ और प्राथ मक
एक त्र ीकरणीयाः । उपचार पेट जुटाएँ।
५. ग ामे स्वच्छजल स्य पेयजल स्य च व्यवस्था करणीया । गाँव म स्वच्छ पेयजल क व्यवस्था कर।
६. िव ालयभवने अस्थायी-आ श्रयस्थलं क ल्पनीयम् । वद्यालय भवन म अस्थायी आश्रय-स्थल बनाएँ।
७. क्र
बालकानां कृ ते पठन ीडयोः व्यवस्था करणीया, येन तेषां भयं न्यूनं बच्च के लए पढ़ाई-खेल क व्यवस्था कर, जससे उनका
भवेत ् । डर कम हो।
८. स्थानीयपशासनेन सह स म्पकं कृ त्वा सामग ी पेषणीया । स्थानीय प्रशासन से सम्पक करके सामग्री भजवाएँ।
योजना बनाते समय ध्यान र खए: सहायता का क्रम भी महत्त्वपूण है — पहले जीवनरक्षा (पेयजल, भोजन,
औषध), फर आश्रय, फर शक्षा और मन का सहारा। बना योजना के भेजी गई सामग्री अक्सर व्यथ हो जाती है,
इस लए प्रशासन से पूछकर ही भे जए क कस वस्तु क आवश्यकता है।
पाठ से प्रेरणा: गोपबन्धु ने केवल धन नह भेजा — वे स्वयं पी ड़त के बीच गए। इसी लए पाठ कहता है —
अस्मा भः एतादृशानां दुः खतानां सहायता करणीया। आपक योजना म भी ‘स्वयं जाकर करने योग्य’ एक काम
अवश्य र खए।
अध्याय — एक नज़र म
पाठारम्भ — चत्रसंवादः (पृष्ठ 36–37) — जलप्लावपी ड़त क सहायता के लए शक्षक और छात्र सभागार म चचा करते
ह। हमानी बताती है क ओ डशा-राज्य के केन्द्रापडा-जनपद म महानद म भयङ् कर जलप्लाव (बाढ़) आया, जससे
बड़ी हा न हुई — घर नष्ट हुए, कुछ लोग च कत्सालय म मृत्यु से जूझ रहे ह, कुछ अनाहार से कष्ट सह रहे ह, गृहपा लत पशु
भी नद के प्रवाह म बह गए।
आदश का प रचय — आचाय कहते ह क ऐसे दुः खय क सहायता हमारा कतव्य है — यथा उत्कलम णः गोपबन्धुः, जो
जलप्लावपी ड़त क अकुण्ठ सेवा करके आज भी जनमानस म समादृत ह। फर वे चत्र दखाकर कहते ह — एषः अ स्त
द नबन्धुः गोपबन्धुः।
भोजनसभा क घटना (पृष्ठ 38) — आचाय ह रहरदास के भोज म गोपबन्धु हँसकर ोक कहते ह —
भोजनस्या तदौलभ्यं जीवनाय सुखप्रदम्। उसी क्षण बाहर से तीन दन के भूखे भक्षुक का करुण क्रन्दन सुनाई दे ता है;
गोपबन्धु अ ुपूणनयन होकर, कुछ भी सोचे बना, अपना परोसा हुआ भोजन हाथ म लेकर बाहर जाते ह और भक्षुक को
खला दे ते ह।
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जीवनवृत्त (पृष्ठ 39) — गोपबन्धुदास सत्यवा द-वन वद्यालय के अध्यापक, प्र सद्ध पञ्च मत्र (पञ्चसखा) म अन्यतम और
स्वतन्त्रतासङ् ग्रामी थे। जन्म — पुरी जनपद के साक्षीगोपाल के पास सुआण्डो-ग्राम म। वे छात्र को नःशुल्क पढ़ाते थे,
नरक्षरता दूर करने म सतत लगे रहते थे, कपास से वस्त्र बनाने के लए स्वयं सूत कातते थे और महात्मा गान्धी क प्रेरणा से
स्वतन्त्रता-आन्दोलन म भाग लेकर दो वष कारावास भोगा।
त्याग क पराकाष्ठा — कारागार म रहते हुए उन्ह ने ‘बन्द र आत्मकथा’, ‘कारा-क वता’, ‘धमपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘न चकेता-
उपाख्यान’ आ द प्रेरणादायी पुस्तक ओ डआ भाषा म लख । वे सदा स्वदे श के ही वस्त्र और वस्तुओं का उपयोग करते थे,
और मरणासन्न अपने पुत्र को भी छोड़कर जलप्लावपी ड़त ‘भारतमाता के सहस्र पुत्र ’ को दे खने घर से बाहर नकल गए।
पाठ का ोक और उपा ध (पृष्ठ 41) — उनका प्र सद्ध वचन है — स्वदे शभूमौ मम लीयतां तनुः … ममा मांसैः
प रपू रतास्तु सा (मेरा शरीर दे श क म म मल जाए; स्वराज्य के माग के ग े मेरी ह ी-माँस से भर जाएँ)। वे सत्यवा द-
वन वद्यालय, द रद्रनारायणसेवा-सङ् घ, सत्यवा द-मुद्रणालय तथा ‘समाजः’ दै नक-वातापत्र के प्र तष्ठाता थे; उनके असीम
त्याग को दे खकर आचाय प्रफुल्लचन्द्रराय ने उन्ह ‘उत्कलम णः’ उपा ध से सम्मा नत कया।
व्याकरण- बन्दु — ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ म पूवरूपस न्धः द है — पद के अन्त म ‘ए’ या ‘ओ’ हो और अगले पद का पहला
वण ‘अ’ हो, तो ‘अ’ के स्थान पर अवग्रह (ऽ) लग जाता है — दे शभक्तो + अयम् = दे शभक्तोऽयम्, सव + अ प = सवऽ प।
अभ्यास म क्तवतु-प्रत्ययान्त पद का स्त्री लङ्ग भी है — गतवान् → गतवती।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
जलप्लावपी डतानाम् न ां बहुजलपवाहेण धनजीवनक्षित- बाढ़ पी ड़त का Of flood victims
ग स्तानाम्
अकुण्ठम् कु ण्ठं िवना / साग हम् आग्रहपूवक Generously
समादृतः आदरपाप्तः सम्मा नत Honoured
दौलभ्यम् कष्टेन लभ्यम् कष्ट से प्राप्त कया गया Difficulty in being obtained
करुणध्व नः िवकलस्वरः करुणा युक्त ध्व न Weeping words
बुभु क्षतः क्षध
ु ातुर ः भूखा Hungry
दया वग लतहृदयः करुणाद हृदयः दया पूण हृदय वाला / Compassionate heart
दयालु
अश्रुपूणनयनः अश्रुयक्ु तं नेत्र ं यस्य सः आँसू से भरी हुई आँख Eyes filled with tears
वाला
पञ्च मत्रेषु पञ्चसंख्याके षु िमत्रेष ु पाँच मत्र म Among five friends
कारावासम् काराग ृहे बन्धनम् कारागार म रहना Living in jail
गतमा लका ृ ् खला
गत नां शङ ग क शृङ् खला Series of potholes
अ स्थमांसैः अिस्थिभः मांसै ः च ह ी और माँस से With the bones and flesh of the
body
उत्कलम णः उत्कलस्य मिणसदृ शः उपािधिवशेषः उत्कल क म ण (एक Gem of Odisha (A title)
उपा ध)
महामनाः उच्चिवचारसम्पन्नः उच्च वचार वाला Broad-minded
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