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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 5 गीता सुगीता कर्तव्या

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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 5 गीता सुगीता कर्तव्या – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा8

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 5: गीता सुगीता कत ा

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

49 – 60 15 54 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 37 pages

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 8 · सं स्कृ त · द पकम्

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 5: गीता सुगीता कतव्या
NCERT कक्षा 8 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के पञ्चमः पाठः — गीता सुगीता कतव्या का स ूण हल। पाठ कुरुक्षेत्र के गीता-जयन्ती-
महोत्सव से आरम्भ होता है, जहाँ कथावाचक का सुना हुआ ोक सुनकर रमेश अपने पता से पूछता है — ‘गीता का ? कथं सुगीता कतव्या ?’ पता
उसे महाभारत-युद्ध का प्रसंग बताकर श्रीमद्भगव ता के आठ चुने हुए ोक पढ़ाते ह — स्थतप्रज्ञ का लक्षण, क्रोध से वनाश तक क ंखला,
ज्ञानप्रा प्त के तीन उपाय, भगवान् को प्रय भक्त के गुण तथा वाङ्मय तप। नीचे पृष्ठ 49 से 60 तक के पाठगत प्रश्न, हर ोक का पदच्छे दः →
अन्वयः → अथः → भावः, ‘वयं शब्दाथान् जानीमः’, ‘अत्र इदम् अवधेयम्’, अभ्यासात् जायते स द्धः के प्रश्न १–८ (प्रत्येक उपभाग स हत),
योग्यता वस्तरः तथा प रयोजनाकायम् क्रमशः हल कए गए ह — पहले संस्कृत उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

द पकम् (कक्षा 8) 49 – 60

खं ड प्रश्न

15 54

माध्यम

हन्द

पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 49–50
पाठारम्भे संवादः — रमेशः तथा तस्य पता

पाठः

प्र.1 “ पतः ! गीता का ?” (रमेशः पतरम् अपृच्छत् — पृष्ठ 49)

उत्तरम् — कु रुक्षेत्रे भगवता श्र ीकृ ष्णेन अजुनाय यः उपदे शः द त्तः, सः एव श्र ीमद् भगवद् गीता अिस्त।

पता पूरी कथा इस प्रकार कहते ह — बहुभ्यः वषभ्यः पूव कुरुक्षेत्रे कौरवाणां पाण्डवानां च मध्ये सङ् ग्रामः अभवत्। त स्मन्
युद्धे स्वबान्धवान् दृष्ट् वा अजुनः युद्धं कतु न इच्छ त स्म। तदा भगवान् श्रीकृष्णः युद्धपराङ्मखम् अजुनं कतव्यपालनाथम्
उप दष्टवान्। श्रीकृष्णस्य उपदे शः एव श्रीमद्भगव ता अ स्त। गीतायाम् अमृततुल्याः उपदे शाः स न्त।

हन्द अथ: बहुत वष पहले कुरुक्षेत्र म कौरव और पाण्डव के बीच युद्ध हुआ। उस युद्ध म अपने ही ब ुओं को
सामने दे खकर अजुन युद्ध करना नह चाहता था। तब भगवान् श्रीकृष्ण ने युद्ध से वमुख अजुन को कतव्य-पालन के
लए उपदे श दया। श्रीकृष्ण का वही उपदे श श्रीमद्भगव ता है। गीता म अमृत के समान उपदे श ह।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

व्याकरण-सङ् केतः: युद्धपराङ्मखम् = युद्धात् पराङ्मखः (जो युद्ध से मुँह मोड़े हो) — यहाँ द्वतीया वभ क्त,
एकवचन, पुं लङ्ग, क्य क यह ‘अजुनम्’ का वशेषण है। उप दष्टवान् — क्तवतु-प्रत्ययान्त भूतका लक क्रया
(उप दश् + क्तवतु), प्रथमा एकवचन पुं लङ्ग = ‘उपदे श दया’। इच्छ त स्म — वतमानका लक क्रया के साथ ‘स्म’
लगने पर अथ भूतकाल का हो जाता है (= ‘ऐच्छत्’ / चाहता था)।

प्र.2 “कथं सुगीता कतव्या ?” (रमेशस्य द्वतीयः प्रश्नः — पृष्ठ 49)

उत्तरम् — गीता उत्तमभावेन पिठत व्या, त स्याः अभ्यासः सम्यक् रूपेण करणीयः, कायक्षेत्रे जीवन क्षेत्रे च त स्याः
उपदे शाः अनुपालनीयाः — एवं गीता ‘सुगीता’ भवित।

यही उत्तर पता ठ क अगले पृष्ठ पर दे ते ह — “अस्य आशयः अ स्त यत् गीतायाः अभ्यासः सम्यक् रूपेण करणीयः। गीता
उत्तमभावेन प ठतव्या। कायक्षेत्रे जीवनक्षेत्रे च गीतायाः उपदे शाः अनुपालनीयाः।”

हन्द अथ: ‘सुगीता कतव्या’ का आशय है — गीता का अभ्यास भली-भाँ त कया जाए, गीता उत्तम भाव से पढ़
जाए, और उसके उपदे श का पालन कायक्षेत्र तथा जीवनक्षेत्र — दोन म कया जाए। केवल कण्ठस्थ कर लेना
‘सुगीता’ नह है; पढ़ना + भाव समझना + आचरण करना — तीन मलकर ‘सुगीता’ बनते ह।

व्याकरण-सङ् केतः: कतव्या, करणीयः, प ठतव्या, अनुपालनीयाः — ये सब व ध-कृत्य प्रत्यय (तव्यत् तथा
अनीयर्) से बने पद ह, जो ‘करना चा हए / कया जाना चा हए’ अथ दे ते ह। इनका लङ्ग-वचन कम के अनुसार
बदलता है — गीता (स्त्री लङ्ग) → कतव्या, प ठतव्या; अभ्यासः (पुं लङ्ग) → करणीयः; उपदे शाः (पुं लङ्ग बहुवचन)
→ अनुपालनीयाः।

प्र.3 “त ह सुगीता कतव्या इत्यस्य कः आशयः ?” (रमेशः — पृष्ठ 50)

उत्तरम् (िपतुः वचनम्) — अस्य आशयः अिस्त यत् गीतायाः अभ्यासः सम्यक् रूपेण करणीयः। गीता उत्तमभावेन
पिठतव्या। कायक्षेत्रे जीवनक्षेत्रे च गीतायाः उपदे शाः अनुपालनीयाः।

इसके तुरन्त बाद पता पाठ क योजना भी बता दे ते ह — “अ स्मन् पाठे वयं श्रीमद्भगव तायाः काँश्चन ोकान् पठामः। वयं
ोकान् म लत्वा गायामः अ प।” (इस पाठ म हम गीता के कुछ ोक पढ़गे और मलकर गाएँगे भी।)

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

भावः: ‘सुगीता’ शब्द म ‘सु’ उपसग का बल है — सु + गीता = भली प्रकार गाई/पढ़ गई। इस लए प्रश्न ‘ कतनी
बार पढ़ ’ का नह , ‘कैसे पढ़ ’ का है। पाठ का पूरा शीषक- ोक भी यही कहता है — जो गीता स्वयं भगवान् के
मुख से नकली है, उसी को ठ क से आत्मसात् कर लो; फर अन्य शास्त्र के वस्तार क आवश्यकता ही नह रहती।

ध्यातव्यम्: काँश्चन = ‘कुछ’ ( कम् + चन, द्वतीया बहुवचन पुं लङ्ग) — इसी लए पाठ म गीता के केवल आठ चुने
हुए ोक दए गए ह, पूरी गीता नह ।

ोक-व्याख्या (पदच्छे दः · अन्वयः · अथः · भावः) — पृष्ठ 49–51
मङ्गल ोकः तथा ोकाः १–३

ोकाः

ोकः (मङ्गलाचरणम्) गीता सुगीता कतव्या कमन्यैः शास्त्र वस्तरैः ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्मा द्व नःसृता ॥ (पृष्ठ 49) — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — गीता सुगीता कतव्या िकम् अन्यैः शास्त्र-िवस्तरैः । या स्वयम् पद्मनाभस्य मुख-पद्मात् िविनःसतृ ा ॥
अन्वयः — या (गीता) स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्मात् िविनःसतृ ा, (सा) गीता सुगीता कतव्या; अन्यैः शास्त्रिवस्तरैः
िकम् ?

अथः ( हन्द ): जो गीता स्वयं पद्मनाभ (भगवान् वष्णु–श्रीकृष्ण) के मुख-कमल से नकली है, उसी गीता को भली-भाँ त गाना/
पढ़ना चा हए। फर दूसरे शास्त्र के वस्तार से क्या प्रयोजन?

भावः: यह ोक पाठ का शीषक- ोक है और कथावाचक इसी को गा रहा था। इसका कहना है क गीता स्वयं
भगवान् के मुख से नकला उपदे श है, इस लए उसका स्थान सबसे ऊपर है। जब एक ही ग्रन्थ को ठ क से जी
लया जाए, तो अनेक ग्रन्थ को ऊपर-ऊपर से पढ़ते रहने क आवश्यकता नह रहती। पाठ इसी बात को आगे
वस्तार दे ता है — गीता पढ़ने क नह , पालन करने क वस्तु है।

व्याकरण-सङ् केतः: मुखप ात् व नःसृता — ‘मुखप ात्’ पञ्चमी वभ क्त, एकवचन (अपादान — जहाँ से
नकली)। अन्यैः शास्त्र वस्तरैः — तृतीया वभ क्त, बहुवचन; ‘ कम् + तृतीया’ का अथ होता है ‘इनसे क्या
लाभ?’। कतव्या — तव्यत् प्रत्यय, स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन (‘गीता’ का वधेय)। स न्ध: मुखप ात् + व नःसृता =
मुखपद्मा द्व नःसृता (जश्त्व स — त् → द्); कम् + अन्यैः = कमन्यैः। पद्मनाभः = प ं नाभौ यस्य सः —
बहु ी ह समास।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या
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तधीमु नरुच्यते ॥ १ ॥ (पृष्ठ 50) — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावंeचmलखत।
ोकः १ ःखेष्वनु द्वग्नमनाः सुखेषु वगतस्पृहः ।

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वीतरागभयक्रोधः

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पद च् छे द ः — दुःखेष ु अनुि ग्नमनाः सुखेष ु िवगतस्पृहः वीत-राग-भय- ोधः िस्थतधीः मुिनः उच्यते ।
अन्वयः — दुःखेष ु अनुि ग्नमनाः सुखेष ु िवगतस्पृहeः m . c ag
a s वीत-राग-भय- ोधः मुिनः िस्थतधीः (इित) उच्यते ।

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अथः ( हन्द ): जो ःख म मन से वच लत नह होता, सुख म जसक कोई लालसा शेष नह रहती, और जो राग, भय तथा क्रोध

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— तीन से र हत हो चुका है, वह मु न तधीः ( स्थर बु द्ध वाला, स्थतप्रज्ञ) कहलाता है।

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भावः (पाठस्य भावाथः): “यः मनुष्यः आपत्कालेषु उद्वे गं न अनुभव त। यः सुखप्राप्तये अ प नस्पृहः
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a s em हतः) भव त। यः इच्छा, आस क्तः, भयः, क्रोधः, इत्येतेभ्यः मुक्तः भव त। सः मौनी पुरुषः
gl भव त।”
(इच्छार तप्रज्ञः

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अथात् — जो मनुष्य वप त्त के समय घबराता नह , जो सुख पाने के लए भी लाला यत नह रहता, और जो इच्छा,

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आस क्त, भय तथा क्रोध — इन सबसे मुक्त है, वही मननशील पुरुष तप्रज्ञ है। ध्यान द जए — ोक दोन
ओर से परीक्षा लेता है: ःख म न टू टना और सुm
a s e ख म न बहना। स्थरता का अथ भावशून्यता नह , ब ल्क प र स्थ त
के हाथ बु द्ध का न बकना है।
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व्याकरण-सङ् केतः: ःखेषु, सुखेषु — सप्तमी वभ क्त, बहुवचन, नपुंसक लङ्ग; यहाँ ‘आधार’ ( वषय) के अथ
m .
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म सप्तमी है — ठ क वही नयम जो पाठ क ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ पेट म दया है। स न्ध: ःखेषु + अनु द्वग्नमनाः
c ष्वनु द्वग्नमनाः (यण् स — उ → व्); स्थतधीः + मु नः = तधीमुagनः ( वसग-स — वसग का र्);
= .ःखे
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aseमु नः + उच्यते = मु नरुच्यते। समास: ‘वीतरागभयक्रोधः’ = वीताः रागः भयं क्रोधः च यस्य सः — बहु ी ह। उच्यते
agl — कमवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन।

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as त वभ्रमः ।
ोकः २
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aबु द्धनाशात्प्रणश्य त ॥ २ ॥ (पृष्ठ 50) — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।
क्रोधाद्भव त सम्मोहः सम्मोहात्स्मृ
स्मृ तभ्रंशाद् बु द्धनाशो

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m पदच्छे दः — a g
l a se ोधात् भवित सम्मोहः सम्मोहात् स्मृितिवभ मः स्मृितभ ंशात् बुिद्धनाशः बुिद्धनाशात् पणश्यित ।
ag अन्वयः — ोधात् सम्मोहः भवित । सम्मोहात् स्मृितिवभमः (भवित) । स्मृितभंशात् बुिद्धनाशः (भवित) ।
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बुिद्धनाशात् (जनः) पणश्यित ।

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अथः ( हन्द ): क्रोध से सम्मोह (कतव्य-अकतव्य का अ ववेक) होता है, सम्मोह से स्मृ त वभ्रम (स्मरणश क्त का नाश) होता है,
स्मृ त के नष्ट होने से बु द्ध का नाश होता है, और बु द्ध के नाश से मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

भावः (पाठस्य भावाथः): “मानवस्य यदा क्रोधः भव त तदा क्रोधात् अ ववेकः उत्पद्यते। अ ववेकात् आत्मानं
वस्मर त। क योग्यं कञ्च अयोग्यम् इ त अ व चन्त्य क्रोधात् व्यामोहं प्रा ो त। यदा अ धकः व्यामोहः भव त
तदा मनुष्यस्य स्मृ तः न ष्क्रया नष्टा च भव त। स्मृतेः नाशात् बु द्धः नश्य त। बुद्धेः नाशात् सः मनुष्यः वनाशं
प्रा ो त।”
यह ोक कारण-काय क एक सीढ़ है, और उसका ढाँचा ही उसका उपदे श है — पतन एक ही छलाँग म नह
होता, चार चुपचाप उतरती हुई सी ढ़य से होता है:

ोधः → सम्मोहः → स्मृितिवभमः → बुिद्धनाशः → िवनाशः

इस लए बचाव भी वह करना है जहाँ ंखला शुरू होती है — पहली सीढ़ पर। एक बार बु द्ध चली गई तो रुकने का उपाय ही नह
बचता।

व्याकरण-सङ् केतः: क्रोधात्, सम्मोहात्, स्मृ तभ्रंशात्, बु द्धनाशात् — चार पञ्चमी वभ क्त, एकवचन, पुं लङ्ग;
यहाँ पञ्चमी ‘उत्प त्त/कारण’ के अथ म है (‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का दूसरा नयम)। स न्ध: क्रोधात् + भव त =
क्रोधाद्भव त (जश्त्व — त् → द्); बु द्धनाशः + बु द्धनाशात् = बु द्धनाशो बु द्धनाशात् ( वसग-स — अः + ब्
→ ओ)। प्रणश्य त — प्र + नश् धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन।

ोकः ३ त द्व द्ध प्र णपातेन प रप्रश्नेन सेवया ।
उपदे क्ष्य न्त ते ज्ञानं ज्ञा ननस्तत्त्वद शनः ॥ ३ ॥ (पृष्ठ 51) — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — तद् िविद्ध पिणपाते न पिरपश्ने न सेवया उपदे क्ष्यिन्त ते ज्ञानम् ज्ञािननः तत्त्वदिशनः ।
अन्वयः — तद् पिणपाते न सेवया पिरपश्ने न िविद्ध, ते तत्त्वदिशनः ज्ञािननः ज्ञानम् उपदे क्ष्यिन्त ।

अथः ( हन्द ): उस (आत्म)ज्ञान को प्रणाम करके, सेवा करके तथा वनम्रता से बार-बार प्रश्न पूछकर जानो। वे तत्त्व को दे ख
चुके ज्ञानी जन तुम्ह ज्ञान का उपदे श दगे।

भावः (पाठस्य भावाथः): “भगवान् श्रीकृष्णः अजुनम् उप दश त — हे अजुन ! भवान् गुरोः समीपं गत्वा
यथाथज्ञानं प्राप्तुं प्रयासं करोतु। भवान् वनीतः जज्ञासुः च भूत्वा गुरोः सेवां करोतु। तत्त्वज्ञानी गुरुः भवते
ज्ञानं प्रदास्य त। यतः ये सत्यस्य दशनं कृतवन्तः ते एव यथाथज्ञा ननः भव न्त।”
यह ोक ज्ञान पाने के तीन उपाय गनाता है, और तीन का क्रम भी अथपूण है — पहले प्र णपातः (नम्रता), फर
प रप्रश्नः ( जज्ञासा से बार-बार पूछना) और साथ म सेवा। केवल प्रश्न पूछना काफ नह ; बना नम्रता के पूछा गया
प्रश्न वाद- ववाद बन जाता है। यहाँ ‘पुनः पुनः प्रश्नकरणम्’ को दोष नह , गुण कहा गया है — व ाथ के लए यही
सबसे बड़ी सीख है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

व्याकरण-सङ् केतः: प्र णपातेन, प रप्रश्नेन, सेवया — तीन तृतीया वभ क्त, एकवचन (करण — जसके द्वारा);
‘सेवया’ स्त्री लङ्ग, शेष दो पुं लङ्ग। व द्ध — वद् धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन = ‘तुम जानो’।
उपदे क्ष्य न्त — उप + दश्, लृट् लकार (भ वष्यत्), प्रथम पुरुष, बहुवचन = ‘उपदे श दगे’। स न्ध: तत् + व द्ध =
त द्व द्ध; ज्ञा ननः + तत्त्वद शनः = ज्ञा ननस्तत्त्वद शनः ( वसग → स्)।

ोक-व्याख्या (पदच्छे दः · अन्वयः · अथः · भावः) — पृष्ठ 52–54
ोकाः ४–८ तथा सुभा षतम्

ोकाः

ोकः ४ श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयते न्द्रयः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शा न्तम चरेणा धगच्छ त ॥ ४ ॥ (पृष्ठ 52) — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् तत्परः संयते िन्द यः ज्ञानम् लब्ध्वा पराम् शािन्तम् अिचरेण अिधगच्छित ।
अन्वयः — संयते िन्द यः तत्परः श्रद्धावान् (मनुष्यः) ज्ञानं लभते । तथा ज्ञानं लब्ध्वा (सः) अिचरेण परां शािन्तम्
अिधगच्छित ।

अथः ( हन्द ): जसक इ न्द्रयाँ संयत ह, जो तत्पर (लगन वाला) है और श्रद्धा से युक्त है — वही मनुष्य ज्ञान पाता है। और ज्ञान पा
लेने पर वह शीघ्र ही परम शा न्त को प्राप्त कर लेता है।

भावः (पाठस्य भावाथः): “यः श्रद्धालुः मनुष्यः दव्यज्ञानं प्राप्तुं नरन्तरं प्रयासं करो त। तथैव यः मनुष्यः
इ न्द्रया ण स्ववशे कृतवान्। सः मनुष्यः दव्यज्ञानं प्राप्स्य त। तादृशं दव्यं ज्ञानं प्राप्य सः पुरुषः जीवने
अनन्तम् आनन्दं प्रा ो त।”
ोक ज्ञान के लए तीन शत रखता है — श्रद्धा (भरोसा), तत्परता (लगन) और इ न्द्रय-संयम। तीन साथ चा हए:
श्रद्धा के बना पढ़ा हुआ टकता नह , लगन के बना पूरा होता नह , और संयम के बना मन पढ़ाई पर रुकता नह ।
ोक ३ के तीन बाहरी उपाय (प्र णपात, प रप्रश्न, सेवा) और ोक ४ के ये तीन भीतरी गुण मलकर एक ही सीख
पूरी करते ह।

व्याकरण-सङ् केतः: लब्ध्वा — लभ् धातु + क्त्वा प्रत्यय (पूवका लक क्रया) = ‘पाकर’; क्त्वा का प्रयोग तभी होता
है जब दोन क्रयाओं का कता एक ही हो। परां शा न्तम् — द्वतीया वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग (कम)। अ चरेण
— तृतीया एकवचन, अथ ‘शीघ्र ही, बना दे र कए’। स न्ध: शा न्तम् + अ चरेण = शा न्तम चरेण; अ चरेण +
अ धगच्छ त = अ चरेणा धगच्छ त (द घ स — अ + अ = आ); श्रद्धावान् + लभते = श्रद्धावाँल्लभते (न् का ल्
म प रवतन तथा अनुना सक चह्न)।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

ोकः ५ अद्वे ष्टा सवभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
नममो नरहङ् कारः सम ःखसुखः क्षमी ॥ ५ ॥ (पृष्ठ 52) — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — अ ेष्टा सवभूत ानां मैत्रः करुणः एव च िनममः िनरहङ् कारः समदुःखसुखः क्षमी ।
अन्वयः — (यः) सवभूत ानाम् अ ेष्टा मैत्रः च करुणः एव िनममः िनरहङ् कारः समदुःखसुखः क्षमी (अिस्त, सः एव
मम िपयः भवित ।)

अथः ( हन्द ): जो सब प्रा णय से द्वे ष नह करता, जो सबका मत्र और करुणावान् है, जो ‘मेरा-मेरा’ क भावना तथा अहङ् कार से
र हत है, जो सुख और ःख म समान भाव रखता है और क्षमाशील है — (वही भगवान् को प्रय है)।

भावः (पाठस्य भावाथः): “हे अजुन ! यः कस्याम प प र तौ वच लतः न भव त। यः ईष्यार हतः
समस्तप्रा णनां कृते मत्रभावयुतः दयालुः च भव त। यः ममत्वर हतः, अहङ् कार वहीनः, सुख ःखेषु
समभावयुतः क्षमाशीलः च भव त तादृशः पुरुषः भगवतः अत्यन्तं प्रयः भक्तः भव त।”
ध्यान दे ने योग्य बात यह है क यहाँ गनाए गए सब गुण दूसर के साथ व्यवहार के गुण ह — अद्वे ष, मैत्री, करुणा,
नममता, नरहङ् कार, क्षमा। अथात् भ क्त क परीक्षा म न्दर म नह , लोग के बीच होती है। ोक १ का
‘ स्थतधीः’ यहाँ समाज म उतरकर ‘भगवान् का प्रय भक्त’ बन जाता है।

व्याकरण-सङ् केतः: सवभूतानाम् — षष्ठी वभ क्त, बहुवचन = ‘सब प्रा णय का/से’। अद्वे ष्टा — न + द्वे ष्टा (नञ्-
तत्पुरुष), प्रथमा एकवचन (‘द्वे ष न करने वाला’)। समास: ‘ नममः’ = नगतं ममत्वं यस्मात् सः, ‘ नरहङ् कारः’ =
नगतः अहङ् कारः यस्य सः, ‘सम ःखसुखः’ = समे ःखसुखे यस्य सः — तीन बहु ी ह समास। स न्ध: करुणः +
एव = करुण एव ( वसग-स — अः + ए); नममः + नरहङ् कारः = नममो नरहङ् कारः।

ोकः ६ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ नश्चयः ।
मय्य पतमनोबु द्धय मद्भक्तः स मे प्रयः ॥ ६ ॥ (पृष्ठ 53) — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — सन्त ष्ु टः सततम् योगी यतात्मा दृ ढिनश्चयः मिय अिपतमनोबुिद्धः यः मद् भक्तः सः मे िपयः ।
अन्वयः — यः योगी सततं सन्त ष्ु टः यतात्मा दृ ढिनश्चयः मिय (च) अिपतमनोबुिद्धः (भवित) सः मद् भक्तः मे िपयः
(भवित) ।

अथः ( हन्द ): जो योगी सदा सन्तुष्ट रहता है, जसका मन-इ न्द्रयाँ वश म ह, जो दृढ़ नश्चय वाला है और जसने अपना मन तथा
बु द्ध मुझम अ पत कर द है — ऐसा मेरा भक्त मुझे प्रय है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

भावः (पाठस्य भावाथः): “हे पाथ ! यः नरन्तरं सन्तुष्टः भव त। अथात् कस्या प वस्तुनः अभावात् कदा प
असन्तुष्टः न भव त। यः मनः इ न्द्रया ण च व जत्य संयमी भव त। यः स्वबु ा परमेश्वरस्य स्वरूपं
रीकरो त। यश्च मनः बु द्ध च ईश्वरे समपय त। सः मनुष्यः मम अतीव प्रयतमः भक्तः भव त।”
यहाँ ‘सन्तुष्टः’ क व्याख्या पाठ स्वयं दे दे ता है — कसी वस्तु के अभाव म भी असन्तोष न होना। सन्तोष का अथ
‘कुछ न चाहना’ नह , ‘न मलने पर भी न टू टना’ है। और ‘दृढ नश्चयः’ बताता है क सन्तोष आलस्य नह है — नश्चय
दृढ़ रहता है, केवल फल क चन्ता से मन डाँवाडोल नह होता।

व्याकरण-सङ् केतः: मे — अस्मद् शब्द का षष्ठी एकवचन रूप (‘मम’ का ही सं क्षप्त रूप) = ‘मुझे/मेरा’। म य —
अस्मद् शब्द, सप्तमी एकवचन = ‘मुझम’। समास: ‘यतात्मा’ = यतः आत्मा येन सः, ‘दृढ नश्चयः’ = दृढः नश्चयः
यस्य सः, ‘अ पतमनोबु द्धः’ = अ पतं मनः बु द्धः च येन सः — बहु ी ह। स न्ध: म य + अ पत० = मय्य पत० (यण्
स — इ → य्); ०बु द्धः + यः = ०बु द्धयः ( वसग → र्); मत् + भक्तः = मद्भक्तः (जश्त्व)।

ोकः ७ यस्मान्नो द्वजते लोकः लोकान्नो द्वजते च यः ।
हषामषभयोद्वे गैमुक्तो यः स च मे प्रयः ॥ ७ ॥ (पृष्ठ 53) — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — यस्मात् न उि जते लोकः लोकात् न उि जते च यः हष-अमष-भय-उ ेगैः मुक्तः यः सः च मे िपयः ।
अन्वयः — यस्मात् लोकः न उि जते , यः च लोकात् न उि जते , यः च हष-अमष-भय-उ ेगैः मुक्तः सः मे िपयः
(भवित) ।

अथः ( हन्द ): जससे संसार उ द्वग्न (व्याकुल) नह होता, और जो स्वयं संसार से उ द्वग्न नह होता, तथा जो हष, ईष्या, भय और
चन्ता — इन सबसे मुक्त है, वह मुझे प्रय है।

भावः (पाठस्य भावाथः): “हे अजुन ! यस्मात् मनुष्यात् कोऽ प मनुष्यः प्राणी वा उ द्वग्नः न भव त। यश्च
मनुष्यः अन्यस्मात् जनात् प्रा णनः वा उ द्वग्नः न भव त। यश्च हषण, ईष्यया, भीत्या, चन्तया च र हतः
भव त। सः मम अतीव प्रयः भक्तः भव त।”
यह ोक क सबसे सुन्दर बात है — कसौट दोन दशाओं म लगाई गई है: न म कसी के लए परेशानी बनूँ, न
कोई मेरे लए परेशानी बने। पहला वाक्य दूसर के प्र त मेरे व्यवहार क जाँच करता है, दूसरा मेरे अपने मन क । जो
व्य क्त दोन ओर से शान्त है, वही सच्चे अथ म भक्त है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या
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व्याकरण-सङ् केतः: यस्मात्, लोकात् — पञ्चमी वभ क्त, एकवचन (अपादान — ‘ जससे’, ‘संसार से’)।
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m a s em अमषः =
gl स न्ध: यस्मात्
हषामषभयोद्वे गैः — तृतीया वभ क्त, बहुवचन; हषः च अमषः च भयं च उद्वे गः च तैः — द्वन्द्व समास।
. co उ द्वजते — उद् + वज् धातु, आत्मनेपद, लट् लकार, प्रथम पुरुषaएकवचन।
em लोकात् + न = लोकान्न (परसवण — त् → न्); मुक्तः + यः = मुक्तो यः; हषामषभयोद्वे गैः + मुक्तः
ईष्या/असहनशीलता।
+ न =sयस्मान्न;
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a=gl०द्वे गैमुक्तः।

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ोकः ८ अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रय हतं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ ८ ॥ (पृष्ठ 54) — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

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पद च् छेmद ः — अनु ेगकरम् वाक्यम् सत्यम् िपयिहतम् च यत् स्वाध्यायाभ्यसनम् च एव वाङ् मयम् तपः उच्यते ।
l a se
a g अन्वयः — यद् वाक्यम् अनु ेगकरं सत्यं िपयिहतं च (तथा) स्वाध्यायाभ्यसनं च एव वाङ् मयं तपः उच्यते ।

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m .co agl
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अथः ( हन्द ): जो वचन उद्वे ग न उत्पन्न करने वाला हो, सत्य हो, प्रय और हतकारी हो — तथा साथ म स्वाध्याय का अभ्यास हो
— वही वाङ्मय तप (वाणी का तप) कहलाता है।
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भावः (पाठस्य भावाथः): “यत् अनुद्वेगकरं (भाषणम् उद्वे गं न जनयेत्), सत्यं, प्रयकरं, हतकरं, च भाषणं

co m
.
स्यात्, तत् वाङ्मयं तपः इ त कथ्यते। शास्त्राद नां स्वाध्यायः, तेषाम् अभ्यासः च वा चकं तपः कथ्यते। तथा
m
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स्वाध्यायः अभ्यासश्चा प यथा व ध वाङ्मयं तपः इ त उच्यते।”
l a se
यहाँ.c‘तप’ क प रभाषा बदल द गई है — तप का अथ केवल उपवास या वन-गमनa g नह , बोलने का संयम भी तप
m
aseहै। और ोक चार शत एक साथ रखता है — बात अनुद्वेगकर हो, सत्य हो, प्रय हो और हतकर हो। चार साथ
agl चा हए: कड़वा सच भी अधूरा तप है, और मीठा झूठ तो तप है ही नह ।

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m . a
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s + उच्यते = तप उच्यते ( वसग-लोप)। समास: ‘अनुद्वेगकरम्’ = न
व्याकरण-सङ् केतः: स न्ध: स्वाध्याय + अभ्यसनम् = स्वाध्यायाभ्यसनम् (द घ स — अ + अ = आ); च + एव
= चैव (वृ द्ध स — अ + ए = ऐ);laतपः
g
उद्वे गकरम् (नञ्-तत्पुरुष); ‘ प्रयaहतम्’ = प्रयं च हतं च (द्वन्द्व); ‘वाङ्मयम्’ = वाचा न मतम् / वाणी-सम्ब ी। उच्यते

co m
— कमवाच्य, लट् लकार, प्रथम पुरुष एकवचन। पुस्तक म भावाथ के भीतर ‘भषणम्’ छपा है, जसका शुद्ध रूप

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‘भाषणम्’ है।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

सुभा षतम् प्रयवाक्यप्रदानेन सव तुष्य न्त जन्तवः,
तस्मात् तदे व वक्तव्यं वचनेन का द रद्रता । (पृष्ठ 54 — ‘अतः वद्या थ भः स्मरणीयं यत् —’) — अथ भावं
च लखत।

पद च् छे द ः — िपय-वाक्य-पदाने न सव त ष्ु यिन्त जन्तवः, तस्मात् तत् एव वक्तव्यम् वचने न का दिरद ता ।
अन्वयः — िपयवाक्यपदाने न सव जन्तवः त ष्ु यिन्त, तस्मात् तत् एव वक्तव्यम् । वचने न का दिरद ता ?

अथः ( हन्द ): प्रय वचन दे ने से सब प्राणी सन्तुष्ट हो जाते ह; इस लए वैसा ही ( प्रय वचन) बोलना चा हए। बोलने म भला कैसी
कंजूसी?

भावः: पाठ इस सुभा षत को ोक ८ के ठ क बाद रखता है, और स्वयं कहता है — ‘अतः वद्या थ भः
स्मरणीयम्’ (इस लए व ा थय को यह याद रखना चा हए)। तक बहुत सीधा है: मीठा बोलने म कुछ खच नह
होता, फर भी उससे सब प्रसन्न हो जाते ह — तो कठोर बोलकर मुफ़्त म शत्रुता क्य मोल ली जाए? ‘वचनेन का
द रद्रता’ — यह प्रश्न ही उत्तर है।

व्याकरण-सङ् केतः: प्रयवाक्यप्रदानेन, वचनेन — तृतीया वभ क्त, एकवचन (करण)। जन्तवः — जन्तु शब्द,
प्रथमा बहुवचन, पुं लङ्ग। वक्तव्यम् — वच् धातु + तव्यत् प्रत्यय ( व ध-कृत्य) = ‘बोलना चा हए’। तस्मात् —
पञ्चमी एकवचन, यहाँ ‘इस लए’ अथ म।

वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 55–56
शब्दाथ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भः

शब्दाथाः

शब्दाथाः पाठे प्रदत्तानां शब्दानाम् अथान् लखत तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ इ त स्तम्भं पूरयत। (पृष्ठ 55–56)

पाठ क सारणी के सभी शब्द नीचे दए गए ह। अ न्तम स्तम्भ तुम्ह अपनी मातृभाषा म भरना है — यहाँ उदाहरण के रूप म
हन्द /भोजपुरी शैली के नमूने दए गए ह; तुम अपनी भाषा (मराठ , बांग्ला, त मळ, गुजराती, अस मया…) के शब्द लखो।

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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH मातृभाषया
(नमूना)

महोत्सवः पव त्यौहार Festival परब / ितहार

कथावाचकः उपन्यासकः कथा वाचक The narrator / the कथा कहे वाला
proponent

सुग ीता गानमयी अच्छ तरह से गाई जाने Melodious Song नीक से गावल
वाली

युद्धपराङ् मुखम् युद्ध- वमुखम् युद्ध वमुख The war-averse लड़ाई से मुँह मोड़े
वाला

अम ृततुल्याः अमृतेन सदृशाः / अमृत के समान like nectar अमिरत जइसन
अ तमहत्त्वपूणाः

अनुि ग्नमनाः यस्य मनः वच लतं न अ वच लत मन वाला Person of tranquil mind जेक र मन डोले
भव त ना

िवगतस्पहृ ः अनुरागर हतः आस क्त र हत Detached िबना मोह वाला

वीत-राग-भय- वीतः रागः भयं क्रोधः वासना, भय और क्रोध से Free from attachment, मोह-डर -ग स्ु सा से
ोधः यस्य र हत fear and anger मुक्त

िस्थतधीः स्थरम तमान् स्थर मन वाला steady minded िथर मित वाला

मुिनः य तः तपस्वी The sage तपसी / स न्त

सम्मोहः ककतव्य वमूढता कतव्य अकतव्य का Delusion भरम
अ ववेक

स्म ृितिवभमः स्मृ तनाशः स्मरणश क्त का नाश होना Loss / failure of memory याद के नाश

श्रद्धावान् श्रद्धालुः श्रद्धा से युक्त Devoted सरधा वाला

संयतेिन्द यः इ न्द्रयसंयमी संय मत इ न्द्रय वाला One who has controlled इिन्द य के बस में
his senses रखे वाला

पिणपातेन नमस्कारेण प्रणाम के द्वारा by bowing down / by परनाम कर के
salutation

पिरपश्नेन पुनः पुनः प्रश्नकरणेन प्रश्न के द्वारा by questioning (with पूछ-पूछ के
humility)

उपदे क्ष्यिन्त उपदे शं प्रदास्य न्त उपदे श दगे They will preach िसखइहे ं

तत्त्वदिशनः दाश नकाः तत्त्वज्ञानी Those who have realized सच के जाने वाला
the Truth

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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH मातृभाषया
(नमूना)

िविद्ध जानी ह तुम जानो (Let You) Know तूँ जान

अ ेष्टा द्वे षर हतः द्वे ष न करने वाला One who never hates के हू से बैर ना
राखे वाला

सवभूतानां सवषां प्रा णनाम् सभी प्रा णय का of all beings सब जीव के

मैत्र ः मैत्रीपूणः मत्रता के भाव वाला Friendly दोस्ताना

करुणः दयाद्र चत्तः करुणावान् Compassionate दयालु

िनममः ममत्व-भावनार हतः ममत्व क भावना से वहीन Free from the sense of ‘मोर -मोर ’ ना करे
‘mine’ वाला

िनरहङ् कारः गवहीनः अहंकार र हत Egoless िबना घमंड वाला

समदुःखसुखः ःखेषु सुखेषु च सुख और ःख म समान Same in pain and सुख-दुख में एक
समानभाव-शीलः भाव वाला pleasure समान

क्षमी क्षमावान् क्षमाशील Endowed with माफ करे वाला
forbearance

उि जते उद्वे गं गच्छ त उ द्वग्न होता है agitated घबरा जाला

लोकः जगत् संसार The world दुिनया

हष मषभयो ेग ैः आ ाद-क्रोध-भय- हष, क्रोध, भय और From joy, impatience, खुस ी-ग स्ु सा-डर -
चन्ता द भः चताओं से fear and anxiety िचंता से

यतात्मा संयमी य त, जसने इ न्द्रय को Self-Restrained अपना पर काबू
अपने नयन्त्रण म कर लया वाला
है

दृ ढिनश्चयः दृढः नश्चयः यस्य सः दृढ़ नश्चय वाला Firmly resolute / पक्का इरादा वाला
determined

अिपतमनोबुिद्धः अ पतं मनः बु द्धः च मन और बु द्ध को अ पत One who has offered his मन-बुिद्ध सौंप दे वे
येन सः करने वाला mind and intellect वाला

अनु ेग करम् न उद्वे गकरम् व्याकुलता न करने वाला Unoffending / non- दुख ना दे वे वाला
agitating

अभ्यसनं अभ्यासः अभ्यास Practice अिभयास

वाङ् मयम् वा चकम् वा चक Verbal penance बोली के तप

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याद रखने क यु क्त: इस सूची के आधे शब्द बहु ी ह समास ह, जनका अथ सदा ‘…वाला’ होता है —
अनु द्वग्नमनाः ( जसका मन वच लत न हो वाला), वीतरागभयक्रोधः, स्थतधीः, सम ःखसुखः, दृढ नश्चयः,
अ पतमनोबु द्धः। एक बार यह पहचान आ गई तो अथ अपने आप खुल जाता है।

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 57
व्याकरण-पे टका — सप्तमी तथा पञ्चमी वभक्तेः प्रयोगः

व्याकरणम्

नयमः 1 “आधारे सप्तमी वभक्तेः प्रयोगः भव त। यथा — उत्पी ठकायां पुस्तकम् अ स्त। ःखेषु अनु द्वग्नमनाः
भवेत्। सुखेषु वगतस्पृहः भवेत्।” — इदं नयमम् उदाहरणैः सह स्पष्टीकुरुत।

िनयमः — यत्र आधारः (अिधकरणम्) बोध्यते , तत्र सप्त मी िवभिक्तः भवित ।
(जहाँ ‘कहाँ / िकसमें / िकस दशा में’ का बोध हो, वहाँ सप्तमी िवभिक्त लगती है।)

वाक्यम् सप्तम्यन्तं पदम् वभ क्तः · वचनम् हन्द

उत्पीिठकायां पुस्तकम् अिस्त। उ त्पीिठकायाम् सप्तमी · एकवचनम् (स्त्री लङ्गम्) मेज़ पर पुस्तक है।

दुःखेष ु अनुि ग्नमनाः भवेत।
् दुःखेष ु सप्तमी · बहुवचनम् (नपुंसक लङ्गम्) ःख म मन वच लत न हो।

सुखेष ु िवगतस्पहृ ः भवेत।
् सुखेष ु सप्तमी · बहुवचनम् (नपुंसक लङ्गम्) सुख म लालसा न रहे।

क्य यह नयम यह दया गया है: पाठ का ोक १ पूरा ही सप्तमी पर टका है — ‘ ःखेषु… सुखेषु…’। सप्तमी
केवल स्थान नह बताती; यहाँ वह दशा/प र त बताती है — ‘ ःख क स्थ त म’। इस लए अनुवाद करते समय
‘म / पर’ लगाइए।

अपने वाक्य बनाकर दे खो: व ालये छात्राः पठ न्त। ( व ालय म) · वृक्षे खगाः स न्त। (वृक्ष पर) · आपत्तौ धैय न
त्यजेत्। ( वप त्त म)

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या
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“उत्प त्त-अथ कारणाथ वा पञ्चमी- वभक्तेः प्रयोगः भव त। यथा — क्रोधात् सम्मोहः भव त। सम्मोहात्

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नयमः 2

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स्मृ त वभ्रमः भव त। स्मृ तभ्रंशात् बु द्धनाशः भव त।” — इदं नयमम् उदाहरणैः सह स्पष्टीकु

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िनयमः — यत्र उत्पित्तः (िकससे उत्पन्न हआ
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ु ) अथवा कारणम् (िकस कारण से) बोध्यते , तत्र पञ् चमी िवभिक्तः
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भवित ।

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वाक्यम् पञ्चम्यन्तं पदम् वभ क्तः · वचनम् हन्द

क्रोध से सम्मोहm
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m glaसे स्मृ त का नाश होता है।
ोधात् सम्मोहः भवित। ोधात् पञ्चमी · एकवचनम् होता है।

. c o aसम्मोह
s e mस्मृितिवभमः भवित। पञ्चमी · एकवचनम्
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सम्मोहात् स म् मोहात्

aglस्मृितभंशात् बुिद्धनाशः भवित। स्म ृितभंशात् पञ्चमी · एकवचनम् स्मृ त नष्ट होने से बु द्ध नष्ट होती है।

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. co२mक व्याकर णक कुंजी है। पूरा ोक पञ्चमी क एक agl
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क्य यह नयम यह दया गया है: यह ठ क ोक

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agकरने
ंखला है — क्रोधात् → सम्मोहात् → स्मृ तभ्रंशात् → बु द्धनाशात्। हर पद बताता है क अगली हा न कस
कारण हुई। इस लए ोक २ को याद का सबसे आसान तरीका यही है — चार पञ्चमी-रूप याद कर लो,

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ोक अपने-आप जुड़ जाएगा।
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ध्यातव्यम्: पञ्चमी वभ क्त ‘अपादान’ (जहाँ से अलग होना) म भी आती है — जैसे इसी पाठ के
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l a se ‘यस्मात्… लोकात्…’ तथा मङ्गल ोक म ‘मुखप ात् व नःसृता’। दोन प्रयोग म हन्द अनुवाद ‘…से’ ही होता है।

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अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 57
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प्रश्नः १ : अधो ल खतानां प्रश्नानाम् एकपदे न उत्तरं लखत

अभ्यासः

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श्रद्धावान् जनः क लभते ?
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प्र.1 (क)

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as उत्तर
agl c
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उत्तरम् — ज्ञानम्।
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(िहन्दी: श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञान पाप्त करता है।)
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पूणवाक्येन — श्रद्धावान् जनः ज्ञानं लभते।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

आधारः: ोक ४ — ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयते न्द्रयः’। ोक म स्पष्ट कहा है क श्रद्धा, तत्परता और
इ न्द्रय-संयम — तीन वाला मनुष्य ज्ञान पाता है।

व्याकरणम्: ज्ञानम् — द्वतीया वभ क्त, एकवचन, नपुंसक लङ्ग (कम, क्य क ‘लभते’ क्रया का कम है)।
‘ कम्’ का उत्तर सदा उसी वभ क्त म दे ना चा हए जस वभ क्त म प्रश्नवाचक पद है — यहाँ ‘ कम्’ द्वतीया म है,
अतः उत्तर भी द्वतीया म।

प्र.1 (ख) कस्मात् सम्मोहः जायते ?

उत्तरम् — ोधात्।
(िहन्दी: ोध से सम्मोह उत्पन्न होता है।)

पूणवाक्येन — क्रोधात् सम्मोहः जायते।

आधारः: ोक २ — ‘क्रोधाद्भव त सम्मोहः’। ‘सम्मोह’ का अथ पाठ क शब्दाथ-सारणी म दया है —
ककतव्य वमूढता, अथात् क्या करना चा हए और क्या नह , यह ववेक ही न रहना।

व्याकरणम्: प्रश्न म ‘कस्मात्’ पञ्चमी एकवचन है, अतः उत्तर भी पञ्चमी वभ क्त, एकवचन म — ‘क्रोधात्’।
यही ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का नयम है — कारण के अथ म पञ्चमी।

प्र.1 (ग) सम्मोहात् क जायते ?

उत्तरम् — स्मृितिवभमः।
(िहन्दी: सम्मोह से स्मृितिवभ म — स्मरणशिक्त का नाश — होता है।)

पूणवाक्येन — सम्मोहात् स्मृ त वभ्रमः जायते।

आधारः: ोक २ — ‘सम्मोहात्स्मृ त वभ्रमः’। पूरी ंखला याद र खए: क्रोधः → सम्मोहः → स्मृ त वभ्रमः →
बु द्धनाशः → वनाशः।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

व्याकरणम्: स्मृ त वभ्रमः — प्रथमा वभ क्त, एकवचन, पुं लङ्ग (‘जायते’ क्रया का कता)। यहाँ ‘ कम्’ प्रथमा म
है, इस लए उत्तर भी प्रथमा म।

प्र.1 (घ) अजुनाय गीतां कः उप दष्टवान् ?

उत्तरम् — श्र ीकृ ष्णः (भगवान् श्र ीकृ ष्णः)।
(िहन्दी: अजुन को गीता का उपदे श भगवान् श्र ीकृ ष्ण ने िदया।)

पूणवाक्येन — अजुनाय गीतां भगवान् श्रीकृष्णः उप दष्टवान्।

आधारः: पाठ का प्रथम पृष्ठ — ‘तदा भगवान् श्रीकृष्णः युद्धपराङ्मखम् अजुनं कतव्यपालनाथम् उप दष्टवान्।
श्रीकृष्णस्य उपदे शः एव श्रीमद्भगव ता अ स्त।’

व्याकरणम्: ‘कः’ प्रथमा एकवचन है, अतः उत्तर प्रथमा वभ क्त, एकवचन, पुं लङ्ग — श्रीकृष्णः। उप दष्टवान् —
क्तवतु प्रत्ययान्त भूतका लक क्रया, जो कता के लङ्ग-वचन के अनुसार चलती है (स्त्री लङ्ग म ‘उप दष्टवती’)।
अजुनाय — चतुथ एकवचन (‘ जसके लए’)।

प्र.1 (ङ) हषामषभयोद्वे गैः मुक्तः नरः कस्य प्रयः भव त ?

उत्तरम् — भगवतः (श्र ीकृ ष्णस्य)।
(िहन्दी: वह भगवान् का िपय होता है।)

पूणवाक्येन — हषामषभयोद्वे गैः मुक्तः नरः भगवतः (श्रीकृष्णस्य) प्रयः भव त।

आधारः: ोक ७ — ‘हषामषभयोद्वे गैमुक्तो यः स च मे प्रयः’। यहाँ ‘मे’ भगवान् श्रीकृष्ण के लए आया है,
क्य क पूरा उपदे श वही अजुन को दे रहे ह। इसी लए उत्तर म ‘मे’ के स्थान पर भगवतः / श्रीकृष्णस्य लखना
चा हए।

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व्याकरणम्: ‘कस्य’ षष्ठी वभ क्त, एकवचन है, अतः उत्तर भी षष्ठी म — भगवतः (भगवत् शब्द, षष्ठी
एकवचन)। ध्यान रहे — ‘भगवान्’ लखना यहाँ अशुद्ध होगा।

अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 57
प्रश्नः २ : पूणवाक्येन उत्तरं लखत

अभ्यासः

प्र.2 (क) क दृशं वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते ?

उत्तरम् — यद् वाक्यम् अनु ेगकरं सत्यं िपयिहतं च भवित , तत् स्वाध्यायाभ्यसने न सह वाङ् मयं तपः उच् यते ।

हन्द अथ: जो वचन उद्वे ग उत्पन्न न करने वाला, सत्य, प्रय तथा हतकारी हो — वही (स्वाध्याय के अभ्यास स हत) वाङ्मय तप
कहलाता है।

आधारः तथा भावः: ोक ८ — ‘अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रय हतं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप
उच्यते॥’ ध्यान दो क ोक चार शत एक साथ रखता है, कोई एक नह — बात ःख न दे , झूठ न हो, प्रय हो
और हत भी करे। जो केवल प्रय है पर हतकर नह , वह चापलूसी है; जो सत्य है पर उद्वे गकर है, वह अभी तप नह
बना।

व्याकरणम्: ‘क दृशम्’ का उत्तर सदा वशेषण-रूप म दे ना होता है, और वशेषण अपने वशेष्य (यहाँ ‘वाक्यम्’,
नपुंसक लङ्ग द्वतीया/प्रथमा एकवचन) के लङ्ग-वचन- वभ क्त के अनुसार चलता है — इसी लए अनुद्वेगकरम्,
सत्यम्, प्रय हतम् — तीन नपुंसक लङ्ग एकवचन म ह।

प्र.2 (ख) क दृशः जनः तधीः उच्यते ?

उत्तरम् — यः जनः दुःखेष ु अनुि ग् नमनाः, सुखेष ु िवगत स्पृहः, वीत -राग-भय- ोधः च भवित, सः मुिनः िस्थतधीः
उच्यते ।

हन्द अथ: जो मनुष्य ःख म वच लत नह होता, सुख म जसक लालसा नह रहती, और जो राग, भय तथा क्रोध से र हत है
— वही मु न तधीः ( स्थर बु द्ध वाला) कहलाता है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

आधारः तथा भावः: ोक १ — ‘ ःखेष्वनु द्वग्नमनाः सुखेषु वगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः
तधीमु नरुच्यते॥’ पाठ का भावाथ इसे और खोलता है — ‘यः मनुष्यः आपत्कालेषु उद्वे गं न अनुभव त… सः
मौनी पुरुषः स्थतप्रज्ञः भव त।’ अथात् स्थतधी वह नह जस पर ःख आता ही नह , ब ल्क वह है जसक बु द्ध
ःख आने पर भी अपनी जगह से हलती नह ।

व्याकरणम्: स्थतधीः = स्थता धीः (बु द्धः) यस्य सः — बहु ी ह समास, प्रथमा एकवचन। शब्दाथ-सारणी म
इसका अथ ‘ स्थरम तमान्’ दया है।

प्र.2 (ग) जनः कथं प्रणश्य त ?

उत्तरम् — ोधात् सम्मोहः भवित, सम्मोहात् स्मृितिवभमः भवित, स्मृितभंशात् बुिद्धनाशः भवित, बुिद्धनाशात् च
जनः पणश्यित।

हन्द अथ: क्रोध से सम्मोह, सम्मोह से स्मृ त का नाश, स्मृ त के नाश से बु द्ध का नाश, और बु द्ध के नाश से मनुष्य स्वयं नष्ट हो
जाता है।

ोधः → सम्मोहः → स्मृितिवभमः → बुिद्धनाशः → िवनाशः

आधारः तथा भावः: ोक २। इस उत्तर क सबसे बड़ी बात यही है क वनाश अचानक नह आता — वह चार
सी ढ़याँ उतरकर आता है, और हर सीढ़ पछली का सीधा प रणाम है। इस लए रोकना पहली सीढ़ पर ही सम्भव है
— क्रोध पर। पाठ का भावाथ कहता है — ‘ क योग्यं कञ्च अयोग्यम् इ त अ व चन्त्य क्रोधात् व्यामोहं प्रा ो त’।

व्याकरणम्: ‘कथम्’ (कैसे) के उत्तर म कारण बताने वाली पञ्चमी क ंखला द गई है — क्रोधात्, सम्मोहात्,
स्मृ तभ्रंशात्, बु द्धनाशात् (सभी पञ्चमी एकवचन)।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या
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जनः कथम् उत्तमां शा न्त प्रा ो त ?
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उत्तरम् — संयते िन्द यः त त्परः श्रद्ध ावान् जनः ज्ञानं लभते ; ज्ञानं लब्ध्वा सः अिचरेण परां (उत्तमा)ं शािन्तम्
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अिधगच्छित।
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g श्रद्धावान् है — वह ज्ञान पाता है; और ज्ञान पाकर शीघ्र ही परम शा न्त प्राप्त
हन्द अथ: जसक इ न्द्रयाँ संयत ह, जो तत्परaऔर

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कर लेता है।

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seपरां m.
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आधारः तथा भावः: ोक ४ — ‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयते न्द्रयः। ज्ञानं लब्ध्वा
शा न्तम.cचरेणा धगच्छ त॥’ उत्तर म क्रम मत बद लए — शा न्त सीधे नह मलती,aज्ञान g के रास्ते मलती है, और
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se भी तीन गुण के रास्ते: श्रद्धा + तत्परता + इ न्द्रयसंयम।
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व्याकरणम्: लब्ध्वा — क्त्वा प्रत्यय (पूवका लक क्रया) = ‘पाकर’। परां शा न्तम् — द्वतीया एकवचन, स्त्री लङ्ग।
अ चरेण — तृतीया एकवचन = ‘शीघ्र ही’।
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उपदे शप्राप्तये त्रयः उपायाः के भव न्त ?
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प्र.2 (ङ)

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उत्तरम् — उपदे शपाप्त ये पिणपातः, पिरपश्नः, सेवा च — एते त्रयः उपायाः भविन्त।
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उपायः पाठे प्रयुक्तं रूपम् अथः अ भप्रायः

पिणपातः पिणपातेन नमस्कारेण — प्रणाम के द्वारा नम्रता से गुरु के पास जाना

. comसे बार-बार पूछना
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पिरपश्नः पिरपश्नेन पुनः पुनः प्रश्नकरणेन — प्रश्न के द्वारा जज्ञासा

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से वा से वया सेवा के द्वारा गुरु क सेवा म लगे रहना

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ag आधारः तथा भावः: ोक ३ — ‘त द्व द्ध प्र णपातेन प रप्रश्नेन सेवया’। तीन का क्रम भी सखाने वाला है —
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पहले नम्रता, फर प्रश्न। बना नम्रता के पूछा गया प्रश्न शास्त्राथ बन जाता है, सीखना नह । और यहाँ ‘बार-बार पूछना’
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को दोष नह , उपाय कहा गया है — व ाथ के लए यह बड़ी राहत क बात है।

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व्याकरणम्: ोक म तीन पद तृतीया वभ क्त, एकवचन (करण कारक) म ह — प्र णपातेन, प रप्रश्नेन, सेवया।
प्रश्न ‘के भव न्त’ (प्रथमा बहुवचन) म है, इस लए उत्तर म मूल रूप प्रथमा म लखे गए ह — प्र णपातः, प रप्रश्नः,
सेवा।

अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 58
प्रश्नः ३ : कोष्ठके दत्ता न पदा न उपयुज्य वाक्या न रचयत (सेवया, स्मृ त वभ्रमः, योगी, वाङ्मयं, तधीः)

अभ्यासः

प्र.3 (क) अनुद्वेगकरं सत्यं प्रय हतं च वाक्यं ........................... तपः उच्यते ।

पूणवाक्यम् — अनु ेगकरं सत्यं िपयिहतं च वाक्यं वाङ् मयं तपः उच्यते ।

हन्द : उद्वे ग न दे ने वाला, सत्य, प्रय और हतकारी वचन वाङ्मय (वाणी का) तप कहलाता है।

चुनाव का कारण: ‘तपः’ के ठ क पहले उसका वशेषण चा हए, और सारणी म वाङ्मयम् = वा चकम् (वाणी-
सम्ब ी) दया है। ोक ८ का उत्तराध यही वाक्य है — ‘वाङ्मयं तप उच्यते’।

प्र.3 (ख) सततं सन्तुष्टः दृढ नश्चयः च ........................... भव त ।

पूणवाक्यम् — सततं सन्त ष्ु टः दृ ढिनश्चयः च योगी भवित ।

हन्द : जो सदा सन्तुष्ट और दृढ़ नश्चय वाला है, वह योगी होता है।

चुनाव का कारण: ोक ६ म यही तीन वशेषण एक साथ आए ह — ‘सन्तुष्टः सततं योगी… दृढ नश्चयः’। वाक्य
म कता चा हए, और ‘योगी’ ही प्रथमा एकवचन पुं लङ्ग कता बन सकता है।

व्याकरणम्: योगी — यो गन् शब्द, प्रथमा वभ क्त, एकवचन, पुं लङ्ग (न्-कारान्त शब्द; बहुवचन म ‘यो गनः’)।

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प्र.3 (ग) अनु द्वग्नमनाः मु नः ........................... उच्यते ।

पूणवाक्यम् — अनुि ग्नमनाः मुिनः िस्थतधीः उच्यते ।

हन्द : अ वच लत मन वाला मु न तधीः ( स्थर बु द्ध वाला) कहलाता है।

चुनाव का कारण: यह ोक १ का ही सार है — ‘ ःखेष्वनु द्वग्नमनाः… स्थतधीमु नरुच्यते’। ‘उच्यते’ (कहलाता
है) के साथ जो नाम दया जाता है, वह कता के समान प्रथमा म रहता है।

प्र.3 (घ) तद् आत्मज्ञानं प्र णपातेन प रप्रश्नेन ........................... च व द्ध ।

पूणवाक्यम् — तद् आत्मज्ञानं पिणपाते न पिरपश्ने न सेवया च िविद्ध ।

हन्द : उस आत्मज्ञान को प्रणाम, प्रश्न और सेवा के द्वारा जानो।

चुनाव का कारण: ोक ३ क तीन-उपाय वाली सूची यहाँ अधूरी है — प्र णपातेन और प रप्रश्नेन दए ह, तीसरा
सेवया ही शेष है। ध्यान दो क तीन पद एक ही वभ क्त (तृतीया) म ह, इस लए रक्त स्थान म भी तृतीया रूप ही
आएगा।

व्याकरणम्: सेवया — सेवा शब्द (आकारान्त स्त्री लङ्ग), तृतीया वभ क्त, एकवचन = ‘सेवा के द्वारा’।

प्र.3 (ङ) सम्मोहात् ........................... भव त ।

पूणवाक्यम् — सम्मोहात् स्मृितिवभमः भवित ।

हन्द : सम्मोह से स्मृ त वभ्रम (स्मरणश क्त का नाश) होता है।

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चुनाव का कारण: ोक २ क ंखला म ‘सम्मोहात्’ के ठ क बाद ‘स्मृ त वभ्रमः’ ही आता है। ‘सम्मोहात्’ पञ्चमी
म कारण बता रहा है, इस लए रक्त स्थान म काय (प रणाम) आएगा, जो प्रथमा म होगा।

अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 58
प्रश्नः ४ : अधो ल खता न पदा न उपयुज्य वाक्या न रचयत

अभ्यासः

प्र.4 (क) उच्यते — ................................................

वाक्यम् — यः दुःखेष ु अनुि ग् नमनाः भवित सः िस्थतधीः उच् यते ।
(िहन्दी: जो दुःखों में िवचिलत नही ं होता, वह िस्थतधी कहलाता है।)

अन्या न वाक्या न — सत्यं प्रय हतं च वचनं वाङ्मयं तपः उच्यते । · गीता श्रीकृष्णस्य उपदे शः उच्यते ।

व्याकरणम्: उच्यते — वच् धातु का कमवाच्य रूप, लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन = ‘कहा जाता है /
कहलाता है’। कमवाच्य म कता तृतीया म और कम प्रथमा म आता है, इस लए वाक्य म ‘सः’ प्रथमा म है।

प्र.4 (ख) च — ................................................

वाक्यम् — रमेशः त स्य िपता च गीताजयन्ती-महोत्सवं गतवन्तौ ।
(िहन्दी: रमेश और उसके िपता — दोनों गीता-जयन्ती महोत्सव में गए।)

अन्या न वाक्या न — सत्यं प्रयं च वचनं वदे त् । · भक्तः नममः नरहङ् कारः च भव त ।

व्याकरणम्: च एक अव्यय (समुच्चयबोधक) है — इसका रूप कभी नह बदलता, और यह संस्कृत म सदा उन पद
के बाद आता है जन्ह वह जोड़ता है ( हन्द के ‘और’ क तरह बीच म नह )। दो कता जुड़ने पर क्रया द्ववचन म हो
जाती है — इसी लए ‘गतवन्तौ’।

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प्र.4 (ग) न — ................................................

वाक्यम् — ोधी जनः िकं योग्यं िकञ्च अयोग्यम् इित न जानाित ।
(िहन्दी: ोधी मनुष्य यह नही ं जान पाता िक क्या उिचत है और क्या अनुिचत।)

अन्या न वाक्या न — स्थतप्रज्ञः ःखेषु न उ द्वजते । · वयं कदा प असत्यं न वदे म ।

व्याकरणम्: न नषेधवाचक अव्यय है और सामान्यतः क्रया के ठ क पहले रखा जाता है। स के समय यह अगले
शब्द से जुड़ भी सकता है — जैसे पाठ म ‘यस्मात् + न’ = यस्मान्न, ‘लोकात् + न’ = लोकान्न।

प्र.4 (घ) लब्ध्वा — ................................................ [पुस्तके अस्य वकल्पस्य कृते ‘(ङ)’ इ त मु द्रतम् अ स्त]

वाक्यम् — ज्ञानं लब्ध्वा जनः अिचरेण परां शािन्तम् अिधगच् छित ।
(िहन्दी: ज्ञान पाकर मनुष्य शीघ ही परम शािन्त पाप्त कर लेत ा है।)

अन्यत् वाक्यम् — गुरोः उपदे शं लब्ध्वा शष्यः प्रसन्नः अभवत् ।

व्याकरणम्: लब्ध्वा = लभ् + क्त्वा प्रत्यय (पूवका लक क्रया) = ‘पाकर’। क्त्वा-प्रत्ययान्त पद अव्यय होते ह —
इनका रूप नह बदलता। नयम यह है क क्त्वा तभी लगता है जब दोन क्रयाओं का कता एक ही हो; य द उपसग
लगा हो तो क्त्वा के स्थान पर ‘ल्यप्’ आता है (जैसे प्राप्य, व जत्य — दोन इसी पाठ म ह)।
पुस्तक म प्रश्न ४ के चौथे वकल्प पर छपाई क भूल से ‘(घ)’ के स्थान पर ‘(ङ)’ मु द्रत है; क्रम म यह चौथा वकल्प
है।

प्र.4 (ङ) कुयात् — ................................................

वाक्यम् — मनुष्यः सवदा सत्यं िपयं िहतकरं च वचनं कु य त् ।
(िहन्दी: मनुष्य को सदा सत्य, िपय और िहतकारी वचन बोलना चािहए।)

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या
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अन्यत् वाक्यम् — छात्रः प्र त दनं स्वाध्यायस्य अभ्यासं कुयात् ।
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व्याकरणम्: कुयात् — कृ धातु, व ध लङ् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन = ‘करना चा हए’। व ध लङ् उपदे श,

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वधान या ‘चा हए’ के अथ म आता है — इसी कारण गीता जैसे उपदे श-ग्रन्थ म इसका प्रयोग बहुत होता है (जैसे

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पाठ क व्याकरण-पेट म ‘भवेत्’)।

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अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 58
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प्रश्नः ५ : पाठानुसारं समु चतेन पदे न ोकं पूरयत a

अभ्यासः

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श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः ............................... ।

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पूण पिङ् क्तः — श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयते.िcन्o
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(श्लोकः ४, पृष्ठ 52)
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अथः: श्रद्धावान्, तत्पर और संयत इ न्द्रय वाला मनुष्य ज्ञान पाता है।

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e+mइ न्द्रयः = संयते न्द्रयः (गुण स
व्याकरणम्: संयते न्द्रयः = संयता न इ न्द्रया ण यस्य सः — बहु ी ह समास, प्रथमा एकवचन पुं लङ्ग। स : संयत

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— अ + इ = ए)।
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............................... चैव वाङ्मयं .तप g l a
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पूण पिङ् क्तः — स्वाध्यायाभ्यसनं चै व वाङ् मयं तप उच्यते ।
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com ८, पृष्ठ 54)
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अथः: स्वाध्याय का अभ्यास भी वाणी का तप कहलाता है।
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व्याकरणम्: स : स्वाध्याय + अभ्यसनम् = स्वाध्यायाभ्यसनम् (द घ स — अ + अ = आ); च + एव = चैव
(वृ द्ध स — अ + ए = ऐ); तपः + उच्यते = तप उच्यते ( वसग-लोप)। ‘स्वाध्यायः’ = स्वस्य अध्ययनम् — अपने
पाठ का स्वयं अभ्यास।

प्र.5 (ग) सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा ............................... ।

पूण पिङ् क्तः — सन्त ष्ु टः सततं योगी यतात्मा दृ ढिन श्चयः ।
(श्लोकः ६, पृष्ठ 53)

अथः: सदा सन्तुष्ट, संयमी और दृढ़ नश्चय वाला योगी…

व्याकरणम्: दृढ नश्चयः = दृढः नश्चयः यस्य सः — बहु ी ह समास, प्रथमा एकवचन (सारणी म अथ ‘दृढ़ नश्चय
वाला’)। ध्यान दो — इस पं क्त के चार पद (सन्तुष्टः, योगी, यतात्मा, दृढ नश्चयः) एक ही कता के वशेषण ह,
इस लए सब प्रथमा एकवचन म ह।

प्र.5 (घ) ............................... भव त सम्मोहः सम्मोहात्स्मृ त वभ्रमः ।

पूण पिङ् क्तः — ोधात् भवित सम्मोहः सम्मोहात्स्मृितिवभमः ।
श्लोके सिन्धयुक्तं रूपम् — ोधाद् भवित सम्मोहः सम्मोहात्स्मृितिवभमः ॥ (श्लोकः २, पृष्ठ 50)

अथः: क्रोध से सम्मोह होता है और सम्मोह से स्मृ त वभ्रम होता है।

व्याकरणम्: क्रोधात् — पञ्चमी वभ क्त, एकवचन (कारण के अथ म)। स : क्रोधात् + भव त = क्रोधाद्भव त
(जश्त्व स — त् → द्); सम्मोहात् + स्मृ त वभ्रमः = सम्मोहात्स्मृ त वभ्रमः।

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प्र.5 (ङ) त द्व द्ध ............................... प रप्रश्नेन सेवया ।

पूण पिङ् क्तः — ति िद्ध पिणपाते न पिरपश्ने न सेवया ।
(श्लोकः ३, पृष्ठ 51)

अथः: उस ज्ञान को प्रणाम के द्वारा, प्रश्न पूछकर और सेवा करके जानो।

व्याकरणम्: प्र णपातेन — तृतीया वभ क्त, एकवचन (करण कारक — ‘ जसके द्वारा’); सारणी म अथ
‘नमस्कारेण’। तीन उपाय एक ही वभ क्त म ह, इस लए रक्त स्थान भी तृतीया माँगता है — ‘प्र णपातः’ लखना
अशुद्ध होगा।

अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 58–59
प्रश्नः ६ : उदाहरणानुसारं पदा न स्त्री लङ्गे प रवतयत

अभ्यासः

प्र.6 (उदाहरणम्) उदाहरणम् — श्रद्धावान् – श्रद्धावती ; बु द्धमान् – बु द्धमती । (पुस्तके एतौ उत्तरौ रक्तवणन पू रतौ
स्तः) — नयमं स्पष्टीकुरुत।

िनयमः — ‘वान्’ (वतुप)् → ‘वती’ तथा ‘मान्’ (मतुप)् → ‘मती’।
श्रद्धावान् → श्रद्धावती · बुिद्ध मान् → बुिद्ध मती

ऐसा क्य होता है: ‘श्रद्धावान्’ जैसे शब्द मूल संज्ञा म मतुप्/वतुप् प्रत्यय जोड़कर बनते ह और इनका अथ होता है
‘…वाला’ (श्रद्धा + वान् = श्रद्धा वाला)। पुं लङ्ग म इनका प्रथमा एकवचन रूप ‘…वान् / …मान्’ होता है। स्त्री लङ्ग
बनाने के लए इनम ङ प् (ई) जुड़ता है, जससे रूप ‘…वती / …मती’ बन जाता है। कौन-सा प्रत्यय लगेगा —
‘मान्’ या ‘वान्’ — यह मूल शब्द के अ न्तम वण पर नभर करता है (अ/आ के बाद प्रायः ‘वान्’, इ/उ के बाद प्रायः
‘मान्’)।

ध्यातव्यम्: ‘श्रीमान्’ का स्त्री लङ्ग श्रीमती है — यही रूप हम आज भी नाम के आगे लगाते ह। इसी तरह ‘बु द्धमान्’
का ‘बु द्धमती’। इस एक नयम से नीचे के पाँच उत्तर बन जाते ह।

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प्र.6 (क) गुणवान् − ................................................

उत्तरम् — गुणवान् → गुणवती
(िहन्दी: गुणों वाली)

वाक्ये प्रयोगः — सीता गुणवती छात्रा अ स्त । (सीता गुणवती छात्रा है।)

व्याकरणम्: गुण + वतुप् → गुणवान् (पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन); स्त्री लङ्ग म गुणवती (ईकारान्त, नद -वत् रूप चलते
ह)।

प्र.6 (ख) आयुष्मान् − ................................................

उत्तरम् — आयुष्मान् → आयुष्मती
(िहन्दी: लम्बी आयु वाली)

वाक्ये प्रयोगः — आयुष्मती भव पु त्र ! (हे पुत्री, तुम द घायु हो !)

व्याकरणम्: आयुस् + मतुप् → आयुष्मान्; स्त्री लङ्ग आयुष्मती। यहाँ ‘स्’ का ‘ष्’ हो गया है (षत्व)। ‘आयुष्मान्
भव / आयुष्मती भव’ संस्कृत का प्र सद्ध आशीवचन है।

प्र.6 (ग) क्षमावान् − ................................................

उत्तरम् — क्षमावान् → क्षमावती
(िहन्दी: क्षमाशील स्त्री)

वाक्ये प्रयोगः — क्षमावती नारी सवषां प्रया भव त । (क्षमाशील स्त्री सबको प्रय होती है।)

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व्याकरणम्: क्षमा + वतुप् → क्षमावान्; स्त्री लङ्ग क्षमावती। इसी अथ का एक और शब्द इसी पाठ के ोक ५ म
आया है — क्षमी (क्षमावान्), जसका स्त्री लङ्ग ‘क्ष मणी’ होता है।

प्र.6 (घ) ज्ञानवान् − ................................................

उत्तरम् — ज्ञानवान् → ज्ञानवती
(िहन्दी: ज्ञान वाली)

वाक्ये प्रयोगः — ज्ञानवती श क्षका छात्रान् पाठय त । (ज्ञानवती श क्षका छात्र को पढ़ाती है।)

व्याकरणम्: ज्ञान + वतुप् → ज्ञानवान्; स्त्री लङ्ग ज्ञानवती। ध्यान दो — ‘ज्ञानी’ का स्त्री लङ्ग ‘ज्ञा ननी’ होता है,
‘ज्ञानवती’ नह ; दोन अलग प्रत्यय से बने ह।

प्र.6 (ङ) श्रीमान् − ................................................

उत्तरम् — श्र ीमान् → श्र ीमती
(िहन्दी: शोभा/सम्पित्त वाली; ‘श्रीमती’)

वाक्ये प्रयोगः — श्रीमती सीता व ालयस्य प्रधानाचाया अ स्त । (श्रीमती सीता व ालय क प्रधानाचाया ह।)

व्याकरणम्: श्री + मतुप् → श्रीमान्; स्त्री लङ्ग श्रीमती। ‘श्री’ ईकारान्त है, इस लए ‘वान्’ नह , ‘मान्’ प्रत्यय लगा
— यही कारण है क यहाँ ‘श्रीवान्’ अशुद्ध होगा।

अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 59

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या
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प्रश्नः ७ : समु चतेन पदे न सह स्तम्भौ मेलयत (अ – इ)
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अभ्यासः

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se m ‘अ’ स्तम्भस्य पदा न — (क) सवभूतानाम् (ख) अनु द्वग्नमनाः (ग)
g l a तधीः (घ) प रप्रश्नेन (ङ)
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प्र.7 (मेलनम्)
संयते न्द्रयः ; ‘इ’ स्तम्भस्य पदा न — पुनः पुनः प्रश्नकरणेन / रम तमान् / इ न्द्रयसंयमी / यस्य मनः

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वच लतं न भव त / सवषां प्रा णनाम् — एतौ स्तम्भौ मेलयत।

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अ इ (शुद्धं मेलनम्) हन्द अथ पाठे कुत्र ?

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(क) सवभूतानाम् सवषां पािणनाम् सभी प्रा णय का

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(ख) अनुि ग्नमनाः यस्य मनः िवचिलतं न भवित अ वच लत मन वाला ोकः १

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agl(ग) िस्थतधीः िस्थरमितमान् स्थर मन/बु द्ध वाला ोकः १

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(घ) पिरपश्नेन पुनः पुनः पश्नकरणेन बार-बार प्रश्न पूछकर ोकः ३

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(ङ) संयतेिन्द यः इिन्द यसंयमी संय मत इ न्द्रय वाला ोकः ४

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मलाने क कु ी: पहले वभ क्त दे खो, फर अथ — यही सबसे तेज़ तरीका है।

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सवभूतानाम् षष्ठी बहुवचन है, इस लए उसका जोड़ भी षष्ठी बहुवचन ही होगा — सवषां प्रा णनाम्। ‘भूत’ का
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यहाँ अथ ‘प्राणी’ है।

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प रप्रश्नेन तृतीया एकवचन है, अतः जोड़ भी तृतीया म — पुनः पुनः प्रश्नकरणेन। शेष वकल्प म कोई तृतीया
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रूप है ही नह , इस लए यह पहली नज़र म तय हो जाता है।

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बचे तीन प्रथमा एकवचन के बहु ी ह पद ह — अनु द्वग्नमनाः (मन वच लत न हो), तधीः (धी = बु द्ध

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स्थर हो → स्थरम तमान्), संयते न्द्रयः (इ न्द्रयाँ संयत ह → इ न्द्रयसंयमी)। इनम ‘मनः’ वाला अथ मन से,
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‘धीः/म त’ वाला बु द्ध से और ‘इ न्द्रय’ वाला इ न्द्रय से जुड़ता है — शब्द का मूल घटक ही उत्तर बता दे ता है।

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ध्यातव्यम्: ‘मनः’ और ‘धीः’ को एक न समझ लेना — मनः भाव/चंचलता का स्थान है, धीः नणय करने वाली
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बु द्ध है। इसी लए ‘अनु द्वग्नमनाः’ का जोड़ ‘यस्य मनः वच लतं न भव त’ है और ‘ स्थतधीः’ का ‘ स्थरम तमान्’।

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अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 59
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

प्रश्नः ८ : श्रीमद्भगव तायाः वषये पञ्च वाक्या न लखत

अभ्यासः

प्र.8 (क–ङ) श्रीमद्भगव तायाः वषये पञ्च वाक्या न लखत — (क) … (ख) … (ग) … (घ) … (ङ) …

(क ) श्रीमद् भ गवद् गीता भगवतः श्रीकृ ष्णस्य अजुन ाय पदत्तानां जीवनमूल्यसम्बद्धानाम् उपदे शानां सङ् कलनात्मकः

गन्थः अिस्त ।

(ख) महिषः वेद व्यासः महाभारतस्य भीष्मपविण श्रीमद् भ गवद् गीतां विणतवान् ।

(ग) गीतायाम् अष्टादश अध्यायाः सप्तशतं (७००) श्लोकाः च सिन्त ।

(घ) कु रुक्षेत्रे युद्ध पराङ् मुखम् अजुन ं कतव्यपालनाथ ं श्रीकृ ष्णः उपिदष्टवान् ।

(ङ) गीतायाम् अमृत त ल्ु याः उपदे शाः सिन्त, अतः गीता सुगीता कत व्या ।

हन्द अथ: (क) श्रीमद्भगव ता भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अजुन को दए गए जीवन-मूल्य से जुड़े उपदे श का
संकलन-ग्रन्थ है। (ख) मह ष वेदव्यास ने महाभारत के भीष्मपव म गीता का वणन कया। (ग) गीता म अठारह
अध्याय और सात सौ ोक ह। (घ) कुरुक्षेत्र म युद्ध से वमुख अजुन को कतव्य-पालन के लए श्रीकृष्ण ने उपदे श
दया। (ङ) गीता म अमृत के समान उपदे श ह, इस लए गीता को भली-भाँ त पढ़ना-अपनाना चा हए।

कहाँ से लए गए: वाक्य (क), (ख), (ग) पाठ के योग्यता वस्तरः (पृष्ठ 59) से ह, तथा (घ) और (ङ) पाठ के प्रथम
पृष्ठ (पृष्ठ 49) से। इसी लए ये पाँच वाक्य परीक्षा म पूरी तरह सुर क्षत ह — ये तुम्हारे अपने गढ़े हुए नह , पुस्तक के
अपने वाक्य ह।
व्याकरण-सङ् केतः: भीष्मपव ण — पवन् शब्द, सप्तमी वभ क्त, एकवचन (‘भीष्मपव म’)। गीतायाम् —
सप्तमी एकवचन। व णतवान् — क्तवतु-प्रत्ययान्त भूतका लक क्रया।

योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 59–60

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श्रीमद्भगव ता — प रचयः, अष्टादश अध्यायाः तथा ‘सरसं गायामः’

योग्यता वस्तरः

प्र.1 “भगवतः श्रीकृष्णस्य अजुनाय प्रदत्तानां जीवनमूल्यसम्बद्धानाम् उपदे शानां सङ् कलनात्मकः ग्रन्थः अ स्त
श्रीमद्भगव ता। मह षः वेदव्यासः महाभारतस्य भीष्मपव ण श्रीमद्भगव तां व णतवान्। गीतायाम् अष्टादश
अध्यायाः सप्तशतं (७००) ोकाः च स न्त।” — अस्य अनुच्छेदस्य आशयं हन्द्यां लखत।

सारः — गन्थः = श्र ीमद् भगवद् गीता · वक्ता = भगवान् श्र ीकृ ष्णः · श्रोता = अजुनः · वणियता = महिषः वेद व्यासः ·
स्थानम् = महाभारत स्य भीष्मपव · अध्यायाः = १ ८ · श्लोकाः = ७००

हन्द अथ: श्रीमद्भगव ता वह ग्रन्थ है जसम भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अजुन को दए गए, जीवन-मूल्य से जुड़े उपदे श का
संकलन है। मह ष वेदव्यास ने इसका वणन महाभारत के भीष्मपव म कया है। गीता म अठारह अध्याय और सात सौ (700)
ोक ह।

ध्यान दे ने योग्य बात: गीता कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नह , वह महाभारत का ही एक अंश है — भीष्मपव के भीतर का
संवाद। और पाठ यह भी बताता है क उसके उपदे श ‘जीवनमूल्यसम्बद्ध’ ह, अथात् वे युद्ध क नह , जीने क बात
करते ह। इसी लए इस पाठ म चुने गए आठ ोक भी कतव्य, क्रोध, ज्ञान, मैत्री और वाणी — रोज़ के जीवन के
वषय ह।

व्याकरणम्: अष्टादश = अष्ट + दश (18), सप्तशतम् = 700 — संस्कृत म संख्यावाचक वशेषण अपने वशेष्य के
अनुसार चलते ह, इसी लए ‘अध्यायाः’ (बहुवचन) के साथ ‘अष्टादश’ और ‘ ोकाः’ के साथ ‘सप्तशतम्’ आया है।

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प्र.2 गीतायाः अष्टादश अध्यायानां नामा न (कोष्ठके वषयेण सह) लखत। (पृष्ठ 60)

क्रमः अध्यायस्य नाम वषयः (पुस्तकानुसारम्) हन्द संकेत

१ अजुनिवषादयोगः सैन्य- नरीक्षणम् अजुन का वषाद, सेना का नरीक्षण

२ साङ् ख्ययोगः गीतायाः सारः गीता का सार

३ कम योगः कमणः महत्त्वम् कम का महत्त्व

४ ज्ञ ान-कम -संन्यासयोगः दव्यज्ञानम् दव्य ज्ञान

५ कम संन्यासयोगः कम-वैराग्य-योगः कम और वैराग्य

६ आ त्मसंयमयोगः ध्यान-योगः ध्यान-योग

७ ज्ञ ान-िवज्ञ ानयोगः भगवद्ज्ञानस्य प्रा प्तः भगवान् के ज्ञान क प्रा प्त

८ अक्षर -बह्मयोगः भगवतः प्रा प्तः भगवान् क प्रा प्त

९ राजिव ा-राजग ह्य
ु योगः परमं गुप्तं ज्ञानम् सबसे गोपनीय ज्ञान

१० िवभूितयोगः भगवतः ऐश्वयम् भगवान् का ऐश्वय

११ िवश्वरूप-दशनयोगः वश्वरूपस्य दशनम् वश्वरूप का दशन

१२ भिक्तयोगः भ क्तभावज्ञानम् भ क्त-भाव का ज्ञान

१३ क्षेत्र -क्षेत्र ज्ञ -िवभागयोगः प्रकृतेः पुरुषस्य चेतनायाः च ज्ञानम् प्रकृ त, पुरुष और चेतना

१४ ु त्र य-िवभागयोगः
गण प्रकृतेः गुणत्रयस्य वणनम् तीन गुण का वणन

१५ पुरुषोत्त मयोगः वश्वस्य केन्द्ररूपेण ब्रह्मणः वणनम् ब्रह्म का वणन

१६ दै वासुर -स म् पि भागयोगः दै वी-आसुरी-स्वभावानां वणनम् दै वी और आसुरी स्वभाव

१७ श्रद्धात्र य-िवभागयोगः श्रद्धायाः वभागानां वणनम् श्रद्धा के तीन भेद

१८ मोक्ष-संन्यासयोगः उपसंहारः, संन्यास- स द्ध-वणनम् उपसंहार, संन्यास क स द्ध

दे खने क बात: हर अध्याय के नाम के अन्त म ‘…योगः’ लगा है — गीता स्वयं अपने हर अध्याय को एक ‘योग’
कहती है, अथात् जुड़ने का एक-एक माग। पहला अध्याय वषाद ( ःख) से शुरू होता है और अ न्तम मोक्ष पर
समाप्त होता है — यही गीता क पूरी यात्रा है।

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पाठे न सम्बन्धः: इस पाठ के आठ ोक अलग-अलग अध्याय से चुने गए ह — ोक १ तथा २ ( स्थतप्रज्ञ, क्रोध
क ंखला) साङ् ख्ययोग के भाव के ह, ोक ३ तथा ४ ज्ञान-कम-संन्यासयोग के, ोक ५–७ भ क्तयोग के,
और ोक ८ श्रद्धात्रय- वभागयोग के तप-प्रकरण का है।

प्र.3 ‘सरसं गायामः’ — भगव ता क ञ्चदधीता, गङ्गा-जल-लव-क णका पीता। सकृद प येन मुरा र समचा, तस्य यमः
क कुरुते चचाम्॥ कतव्यद क्षां च समत्व शक्षां, ज्ञानस्य भक्षां शरणाग तञ्च। ददा त गीता करुणाद्रभूता, कृष्णेन
दत्ता जगतां हताय॥ (पृष्ठ 60) — अनयोः ोकयोः अथ भावं च लखत।

पथमः श्लोकः — अन्वयः: येन भगवद् गीता िकिञ्चत् अधीता, गङ् गा-जल-लव-किणका पीता, सकृ त् अिप मुरािरः
समच (समिचतः), तस्य यमः िकं चच ं कु रुते ?

अथः ( हन्द ): जसने भगव ता को थोड़ा भी पढ़ लया, गङ्गाजल क एक बूँद भी पी ली, और एक बार भी मुरा र (श्रीकृष्ण) क
भली-भाँ त पूजा कर ली — भला यमराज उसक क्या चचा करगे? (अथात् उसे मृत्यु का भय नह रहता।)

ि तीयः श्लोकः — अन्वयः: करुणाद भूत ा कृ ष्णेन जगतां िहताय दत्ता गीता कतव्यदीक्षां च समत्विशक्षां ज्ञानस्य
िभक्षां शरणागितं च ददाित ।

अथः ( हन्द ): करुणा से भीगी हुई, श्रीकृष्ण द्वारा संसार के हत के लए द गई गीता हम चार वस्तुएँ दे ती है — कतव्य क द क्षा,
समता क शक्षा, ज्ञान क भक्षा तथा शरणाग त।

भावः: पहला ोक अल्प प्रयास का बड़ा फल बताता है — ‘ क ञ्चत्’ (थोड़ा), ‘लव-क णका’ (एक बूँद),
‘सकृत्’ (एक बार) — तीन शब्द जान-बूझकर छोटे रखे गए ह, ता क व ाथ यह न सोचे क आरम्भ करने के लए
बहुत बड़ी तैयारी चा हए। दूसरा ोक गीता के पूरे उपदे श का सार चार शब्द म बाँध दे ता है, और चार इसी पाठ
के ोक म दखाई दे ते ह — कतव्य ( ोक ३), समत्व ( ोक १ तथा ५ का ‘सम ःखसुखः’), ज्ञान ( ोक ४)
और शरणाग त ( ोक ६ का ‘मय्य पतमनोबु द्धः’)।

काव्य-सौन्दयम्: दूसरे ोक म द क्षा – शक्षा – भक्षा — तीन तुकान्त शब्द एक पं क्त म रखे गए ह; यह
अनुप्रास तथा यमक-सदृश ध्व न-सौन्दय है, जससे ोक गाने योग्य बन जाता है — इसी लए पुस्तक ने इसे ‘सरसं
गायामः’ (आओ, रस के साथ गाएँ) शीषक के नीचे रखा है। व्याकरणम्: ‘जगतां हताय’ — हताय चतुथ
एकवचन (‘ हत के लए’), जगताम् षष्ठी बहुवचन; ‘कृष्णेन दत्ता’ — कमवाच्य म कता तृतीया म।

प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 60

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या
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प रयोजना-काय (प्रकल्प)
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प रयोजनाकायम्

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कक्षायां तधीः’ इ त वषयम् अ धकृत्य ‘मम जीवनलक्ष्यम्’ इत्य स्मन् वषये प रचचा
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ापयतु ।

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नहg, बोलने का अभ्यास है — इस लए तैयारी इस तरह करो:
यह करना है: कक्षा म ‘ स्थतधीः’ ( स्थर बु द्ध) के गुण को आधार बनाकर ‘मम जीवनलक्ष्यम्’ (मेरा जीवन-लक्ष्य) वषय पर
प रचचा आयो जत करनी है। यह ल खत उत्तर a

१. आधार तय करो —
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ोक १ को कक्षा म लखकर उसके तीन लक्षण अलग-अलग लख लो: ःख म अ वचल, सुख म
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नस्पृह, राग-भय-क्रोध से मुक्त।

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२. दल बनाओ — ४–५ छात्र के समूह; हर समूह एक लक्षण ले और बताए क अपने लक्ष्य तक पहुँचने म वह लक्षण कैसे काम

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l a seसङ् केत-वाक्य तैयार रखो — हर वक्ता कम-से-कम दो संस्कृत वाक्य बोले (नीचे नमूना दया है), शेष हन्द /मातृभाषा
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४. नष्कष — अन्त म शक्षक या एक छात्र सभी बात को जोड़कर एक वाक्य म सार कहे।

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अच्छ प रचचा म क्या-क्या होना चा हए: (क) लक्ष्य का स्पष्ट नाम ( च कत्सकः, शक्षकः, कृषकः, सै नकः,
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अ भयन्ता, वैज्ञा नकः…); (ख) उस लक्ष्य के माग क एक क ठनाई; (ग) उस क ठनाई म ‘ स्थतधीः’ होना कैसे
सहायक होगा; (घ) ोक १ या ४ से एक उद्धरण। केवल ‘मुझे डॉक्टर बनना है’ कह दे ना पयाप्त नह — पाठ से

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जोड़ना आवश्यक है।
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a s em नमूना उत्तर (प रचचायाः आरम्भः):

ag l छात्रः — मम जीवनलक्ष्यं च कत्सकः भ वतुम् अ स्त। च कत्सकस्य काय प्र त दनं रो गणां ःखं पश्या म। य द अहं
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ःखेषु उ द्वग्नः भवा म त ह च कत्सां कतु न शक्नो म। अतः मया तधीः भ वतव्यम्।

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छात्रा — मम लक्ष्यं श क्षका भ वतुम् अ स्त। परीक्षायाम् अङ् काः न्यूनाः भवेयुः, तथा प अहं न वषीदा म।
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s है… य द म ःख दे खकर स्वयं घबरा जाऊँ तो च कत्सा कैसे करूँगा?
‘श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयते न्द्रयः’ इ त गीतायाः वचनं मम प्रेरणा अ स्त।
( हन्द : मेरा जीवन-लक्ष्य च कत्सकla
इस लए मुझे स्थर बु द्ध वाला बनना
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a होगा। / मेरा लक्ष्य श क्षका बनना है। परीक्षा म अंक कम आ सकते ह, फर भी
बनना

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म नराश नह होती — ‘श्रद्धावान् ही ज्ञान पाता है’ यह गीता-वचन मेरी प्रेरणा है।)

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व वध-धमाणां धमग्रन्थानां नामा न व लख्य कस्य चत् एकस्य धमग्रन्थस्य ववरणं लखत ।

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यह करना है: पहले व भन्न धम के धमग्रन्थ के नाम लखो, फर उनम से कसी एक का ववरण लखो।

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धमः धमग्रन्थस्य नाम (संस्कृतम्) हन्द नाम भाषा

सनातनः (िहन्दू ) वेद ाः, उपिनषदः, श्रीमद् भगवद् ग ीता, रामायणम्, वेद, उप नषद्, गीता, रामायण, संस्कृतम्
धमः महाभारतम् महाभारत

बौद्धधमः ित्र िपटकम् (ध म् मपदम्) त्र पटक (धम्मपद) पा ल

जैनधमः आगमाः (क ल्पसूत्र म्, तत्त्वाथसूत्र म्) आगम ग्रन्थ प्राकृतम् /
अधमागधी

िसक्खधमः ग रु
ु ग न्थसािहबः गुरु ग्रन्थ सा हब गुरुमुखी

इस्लामधमः कु रानशरीफः कुरान शरीफ अरबी

ईसाईधमः बाइिबलः बाइ बल हब्रू / ग्रीक

पारसीधमः जेन्दावेस्ता ज़ेन्द अवेस्ता अवेस्ता

अच्छे ववरण म क्या होना चा हए: ग्रन्थ का नाम · वह कस धम का है · कसने कहा/रचा · कतना बड़ा है
(अध्याय/ ोक/भाग) · उसक भाषा · उसका मुख्य सन्दे श · तथा एक उद्धरण। केवल नाम गना दे ना ववरण नह
है।

नमूना उत्तर — श्रीमद्भगव तायाः ववरणम्:
श्रीमद्भगव ता सनातनधमस्य प्र सद्धः धमग्रन्थः अ स्त। अयं ग्रन्थः महाभारतस्य भीष्मपव ण वतते। मह षः
वेदव्यासः एनं व णतवान्। अ स्मन् ग्रन्थे अष्टादश अध्यायाः सप्तशतं (७००) ोकाः च स न्त। कुरुक्षेत्रस्य रणभूमौ
भगवान् श्रीकृष्णः युद्धपराङ्मखम् अजुनं कतव्यपालनाथम् उप दष्टवान् — सः एव उपदे शः गीता अ स्त। गीतायाः भाषा
संस्कृतम् अ स्त। गीता कमयोगं, ज्ञानयोगं, भ क्तयोगं च उप दश त। तस्याः मुख्यः सन्दे शः अ स्त — फलम् अनपेक्ष्य
स्वकतव्यं कुरु। गीतायाम् अमृततुल्याः उपदे शाः स न्त, अतः उच्यते — ‘गीता सुगीता कतव्या कमन्यैः
शास्त्र वस्तरैः’।
( हन्द : श्रीमद्भगव ता सनातन धम का प्र सद्ध धमग्रन्थ है। यह महाभारत के भीष्मपव म आता है। मह ष वेदव्यास
ने इसका वणन कया। इसम अठारह अध्याय और सात सौ ोक ह। कुरुक्षेत्र क रणभू म म श्रीकृष्ण ने युद्ध से
वमुख अजुन को कतव्य-पालन का उपदे श दया — वही उपदे श गीता है। इसक भाषा संस्कृत है। गीता कमयोग,
ज्ञानयोग और भ क्तयोग सखाती है। इसका मुख्य सन्दे श है — फल क चन्ता कए बना अपना कतव्य करो।)

सूचना: यह प रयोजना-काय है, अतः ववरण अपने शब्द म लखो और जस ग्रन्थ को चुनो, उसके वषय म
पुस्तकालय अथवा अपने घर के बड़ से एक-दो बात और पूछ लो। सभी धम के ग्रन्थ के प्र त समान आदर रखना
ही इस काय का असली उ े श्य है।

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अध्याय — एक नज़र म
पाठ का ढाँचा — पूरा पाठ रमेश और उसके पता के संवाद के रूप म चलता है। कुरुक्षेत्र म गीता-जयन्ती-महोत्सव म सुना
गया ोक ‘गीता सुगीता कतव्या कमन्यैः शास्त्र वस्तरैः’ ही पाठ का शीषक और मूल प्रश्न बन जाता है।
‘सुगीता कतव्या’ का आशय — पता स्वयं उत्तर दे ते ह — गीतायाः अभ्यासः सम्यक् रूपेण करणीयः; गीता उत्तम भाव से
पढ़ जाए और उसके उपदे श कायक्षेत्र तथा जीवनक्षेत्र दोन म उतारे जाएँ। केवल पाठ करना नह , आचरण करना ही
‘सुगीता’ है।
आठ ोक, चार वषय — (1) ोक १ — तधीः/ तप्रज्ञ का लक्षण; (2) ोक २ — क्रोध → सम्मोह →
स्मृ त वभ्रम → बु द्धनाश → वनाश क ंखला; (3) ोक ३–४ — ज्ञान पाने के तीन उपाय (प्र णपात, प रप्रश्न, सेवा) तथा
श्रद्धा का फल; (4) ोक ५–७ — भगवान् को प्रय भक्त के गुण; ोक ८ — वाङ्मय तप।
व्याकरण का केन्द्र — पाठ क ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ पेट दो वभ क्तयाँ सखाती है — आधार के अथ म सप्तमी ( ःखेषु,
सुखेषु) तथा उत्प त्त/कारण के अथ म पञ्चमी (क्रोधात्, सम्मोहात्, स्मृ तभ्रंशात्)। ोक २ इन्ह का जी वत उदाहरण है।
वाणी का तप — ोक ८ के अनुसार जो वचन अनुद्वेगकर, सत्य, प्रय और हतकर हो, और साथ म स्वाध्याय का अभ्यास
हो — वही ‘वाङ्मयं तपः’ है। पाठ इसे सुभा षत से पुष्ट करता है — प्रयवाक्यप्रदानेन सव तुष्य न्त जन्तवः।
योग्यता वस्तरः — श्रीमद्भगव ता मह ष वेदव्यास द्वारा महाभारत के भीष्मपव म व णत है; इसम अष्टादश (18) अध्याय
तथा सप्तशत (700) ोक ह। पाठ के अन्त म अठारह अध्याय के नाम तथा ‘सरसं गायामः’ के दो गेय ोक दए गए ह।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 5 गीता सुगीता कतव्या AglaSem · NCERT Solutions

त्व रत पुनरावृ त्त

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ ENGLISH

सुगीता गानमयी अच्छ तरह से गाई जाने वाली Melodious Song

अमृततुल्याः अम ृतेन सदृ शाः / अितमहत्त्वपूण ः अमृत के समान like nectar

अनु द्वग्नमनाः यस्य मनः िवचिलतं न भवित अ वच लत मन वाला Person of tranquil mind

वगतस्पृहः अनुर ागरिहतः आस क्त र हत Detached

स्थतधीः िस्थरमितमान् स्थर मन वाला steady minded

मु नः यितः तपस्वी The sage

सम्मोहः िकं कतव्यिवमूढता कतव्य-अकतव्य का अ ववेक Delusion

स्मृ त वभ्रमः स्म ृितनाशः स्मरणश क्त का नाश होना Loss / failure of memory

प्र णपातेन नमस्कारे ण प्रणाम के द्वारा by bowing down / by salutation

प रप्रश्नेन पुनः पुनः पश्नकरणेन प्रश्न के द्वारा by questioning (with humility)

तत्त्वद शनः दाशिनकाः तत्त्वज्ञानी Those who have realized the Truth

संयते न्द्रयः इिन्द यसंयमी संय मत इ न्द्रय वाला One who has controlled his senses

नममः ममत्व-भावनारिहतः ममत्व क भावना से वहीन Free from the sense of ‘mine’

अनुद्वेगकरम् न उ ेग करम् व्याकुलता न करने वाला Unoffending / non-agitating

वाङ्मयम् वािचकम् वा चक Verbal penance

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 8
TypeSolution
Pages38
Updated19 Sep 2026