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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा

AglaSem पर कक्षा 8 संस्कृत पाठ 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (दीपकम्) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 7 (Deepakam).
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About NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा

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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 7 मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा8

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 7: म ल
ु म ष
ू ा सुन्दरसुरभाषा

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

75 – 84 15 59 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 38 pages

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 8 · सं स्कृ त · द पकम्

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 7: म ल
ु म ष
ू ा सुन्दरसुरभाषा
NCERT कक्षा 8 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के सप्तमः पाठः — म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा का सम्पूण हल। यह पाठ एक गी तकाव्य
(चार पद्य का स्तु त-गीत) है, जसम क व संस्कृतभाषा को ‘माता’ कहकर सम्बो धत करता है और उसे मु नय -क वय द्वारा सँवारी हुई सुन्दर शब्द-
म ूषा बताता है। पाठ का आरम्भ श्रावणी पू णमा — संस्कृत दवस के चत्र-संवाद से होता है। नीचे पृष्ठ 75 से 84 तक क सारी सामग्री क्रमशः हल
क गई है — चत्र-संवाद के प्रश्न, चार ोक का पदच्छे दः → अन्वयः → अथः → भावः, ‘वयं शब्दाथान् जानीमः’, ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ (समास-
प्रकरण), अभ्यासात् जायते स द्धः के प्रश्न १–८ प्रत्येक उपभाग स हत, योग्यता वस्तरः क पाँच संस्कृतप्रश स्तयाँ तथा प रयोजनाकायम् —
पहले संस्कृत उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

द पकम् (कक्षा 8) 75 – 84

खं ड प्रश्न

15 59

माध्यम

हन्द

चत्र-संवादः (पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः) — पृष्ठ 75
पाठारम्भे ओ मतायाः तस्याः सख्याः च संवादः

चत्र-सं वादः

प्र.1 “भ ग न ! अद्य श्रावणी पू णमा अ स्त। वदतु एतस्याः क वै शष्ट्यम् ?” — अस्य प्रश्नस्य उत्तरं लखत।

उत्तरम् — अद्य श्र ावणी पूिणमा अिस्त , अतः अद्य संस्कृ तिदवसः अिस्त। एतत् एव अस्याः ितथे ः वैिशष्ट म्।

संवादे सखी उत्तरं ददा त — “अहं जाना म अद्य संस्कृत दवसः अ स्त। वयम् एतम् आसप्ताहम् आचरामः।”

हन्द अथ: आज श्रावण मास क पू णमा है। इसी दन संस्कृत दवस मनाया जाता है — यही इस त थ क
वशेषता है। सखी कहती है — “म जानती ँ, आज संस्कृत दवस है। हम इसे सप्ताह भर मनाते ह।”

व्याकरण-सङ् केतः: भ ग न — ‘भ गनी’ शब्द का सम्बोधन, एकवचन, स्त्री लङ्ग रूप (द घ ‘ई’ सम्बोधन म ह्रस्व
‘इ’ हो जाती है)। वदतु — लोट् लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन; यहाँ ‘भवती’ के साथ आदरसूचक अनुरोध के अथ म
प्रयुक्त।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 छात्राः संस्कृत दवसं कयन्तं कालं आचर न्त ?

उत्तरम् — छात्राः संस्कृ तिदवसम् आसप्त ाहम् आचरिन्त । (सप्ताहपयन्तम्)

संवादस्य पङ् क्तः — “वयम् एतम् आसप्ताहम् आचरामः।”

हन्द अथ: वद्याथ संस्कृत दवस को केवल एक दन नह , ब ल्क पूरे सप्ताह तक मनाते ह — इसे ‘संस्कृत
सप्ताह’ कहा जाता है।

व्याकरण-सङ् केतः: आसप्ताहम् = आ (सीमा-वाचक अव्यय उपसग) + सप्ताहम् — यह अव्ययीभाव समास का
उदाहरण है, जसम पूवपद अव्यय होता है और पूरा पद अव्यय बन जाता है (जैसे पाठ क पेट म ‘रूपस्य योग्यम् =
अनुरूपम्’)।

प्र.3 “ क भवत्याः वद्यालये संस्कृत दवसम् अ धकृत्य केषाञ्चन व शष्टकायक्रमाणां योजना कृता ?” — सख्याः उत्तरं
कम् ?

उत्तरम् — आम् ओिमते ! मम िवद्य ालये अने के षां कायक्र माणां योजना रिचता।

हन्द अथ: “हाँ ओ मता ! मेरे वद्यालय म अनेक कायक्रम क योजना बनाई गई है।” — अथात् संस्कृत दवस के
उपलक्ष्य म वद्यालय म अनेक व शष्ट कायक्रम रखे गए ह।

व्याकरण-सङ् केतः: अ धकृत्य = ‘को लेकर / के वषय म’ — यह ल्यप्-प्रत्ययान्त अव्यय है (अ ध + कृ + ल्यप्)
और सदा द्वतीया वभ क्त के साथ आता है, इसी लए ‘संस्कृत दवसम् अ धकृत्य’ ठ क है। केषाञ्चन = कम् +
चन, षष्ठी बहुवचन = ‘कुछ’।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा AglaSem · NCERT Solutions

प्र.4 ओ मतायाः सखी कस्यां प्र तयो गतायां भागं ग्रहीष्य त ?

उत्तरम् — ओिमतायाः सखी गीतगायनपितयोिगतायां भागं गहीष्यित।

संवादे सा वद त — “आम् ओ मते ! अहं तु गीतगायनप्र तयो गतायां भागं ग्रहीष्या म।”

हन्द अथ: ओ मता क सहेली गीत-गायन प्र तयो गता म भाग लेगी। यही संवाद पाठ को उसके गीत तक ले
जाता है — पाठ के चार पद्य वही गीत ह।

व्याकरण-सङ् केतः: ग्रहीष्या म / ग्रहीष्य त — ‘ग्रह्’ धातु, लृट् लकार (भ वष्यत्काल); उत्तमपुरुष एकवचन तथा
प्रथमपुरुष एकवचन। प्र तयो गतायाम् — सप्तमी एकवचन, स्त्री लङ्ग (आधार अथ म)।

प्र.5 ओ मता कम् इच्छ त ? तस्याः कृते सखी क यच्छ त ?

उत्तरम् — ओिमता अिप त त्र आगन्त मु ् इच् छित। त स्याः कृ ते सखी अधुन ा एव िनमन्त्रणपत्रं यच् छित।

संवादः — ओ मता — “भ ग न ! अहम प आगन्तुम् इच्छा म।” सखी — “अवश्यम्। अहं भवत्याः कृते अधुना एव
नमन्त्रणपत्रं यच्छा म।”

हन्द अथ: ओ मता भी उस कायक्रम म आना चाहती है। सहेली तुरन्त कहती है — “अवश्य ! म आपके लए अभी
नमन्त्रण-पत्र दे ती ँ।”

व्याकरण-सङ् केतः: आगन्तुम् — तुमुन्-प्रत्ययान्त अव्यय (आ + गम् + तुमुन्) = ‘आने के लए’; ‘इ ा म’ जैसी
क्रया के साथ यही रूप आता है। भवत्याः कृते — ‘कृते’ के योग म षष्ठी वभ क्त होती है = ‘आपके लए’।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा
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संवादस्य अन्ते ओ मता क प्राथयते ? सखी च क वद त ?
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प्र.6

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उत्तरम् — ओिमता पाथयते — “भिगिन ! त त्र भवती िकं गीतं गास्यित ? कृ पया मामिप श्र ावयतु।” सखी वदित
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— “अस्तु, अहं गायािम, भवती अनुगायतु।”
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हन्द अथ: ओ मता पूछती है — “बहन ! वहाँ आप कौन-सा गीत गाएँगी ? कृपया मुझे भी सुनाइए।” सहेली

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कहती है — “ठ क है, म गाती ँ, आप साथ म गाइए।” इसी अनुरोध के उत्तर म पाठ के चार पद्य गाए जाते ह
— इस लए यह चत्र-संवाद पूरे गीत क भू मका है।
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a s em केतः: श्रावयतु — ‘श्रु’ धातु का णच्-प्रत्ययान्त (प्रेरणाथक) रूप — ‘सुनाइए’ (न क ‘सु नए’)।
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व्याकरण-सङ्
a अनुगायतु — अनु + गै, लोट् लकार = ‘साथ-साथ गाइए’; इसी से ‘अनुगायन’ शब्द बनता है।

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ोक-व्याख्या (पदच्छे दः · अन्वयःg· lअथः · भावः) — पृष्ठ 76–77
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गीतस्य प्रथमः द्वतीयश्च पद्यः

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ोकाः
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.co मु नवर वक सतक ववर वल सत- a g l
a s em ोकः 1

agl म ुलम ूषा, सुन्दरसुरभाषा।
अ य मातस्तव पोषणक्षमता

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मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा॥ १॥ — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

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पद च् छे द ः — मुिनवर-िवकिसत-किववर-िवलिसत-मञ्जुल-मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा। अिय मातः ! तव पोषणक्षमता
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मम वचनातीता सुन्दरसुरभाषा।
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m .अc न्वयः — (त्वं) मुिनवरिवकिसतकिववरिवलिसतमञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुaरgभाषा (अिस)। अिय मातः ! तव
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ag पोषणक्षमता मम वचनातीता अिस्त।
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अथः ( हन्द ) — हे सुन्दर दे वभाषा (संस्कृत) ! तुम श्रेष्ठ मु नय द्वारा वक सत और श्रेष्ठ क वय द्वारा सुशो भत क गई

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मनोहर शब्द-म ूषा हो। हे माता ! तुम्हारी पोषण करने क क्षमता मेरी वाणी से परे है — म उसका वणन नह कर सकता।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा AglaSem · NCERT Solutions

भावः: पुस्तक स्वयं भाव इस प्रकार दे ती है — संस्कृतभाषा अतीव सुन्दरभाषा दे वभाषारूपेण च प र चता
अ स्त। मुनयः अस्याः संस्कृतभाषायाः वकासं कृतवन्तः। एषा भाषा भू यष्ठानां भारतीयभाषाणां, तथा
वश्वस्य बहूनां भाषाणां च जननी-भाषा ( ोतो-भाषा) गुरुभाषा (पूरक-भाषा) वा अ स्त। बहवः कवयः
काव्यरचनया अस्याः सौन्दय व धतवन्तः। कोमलपदावल्या प रपूणा एषा ानपे टका अ स्त। संस्कृतभाषा
स्वपदाव ल भः अन्याः भाषाः ानं व ानं च प रपोषय त। संस्कृतभाषायाः गौरवं वणनातीतम् अ स्त।
अथात् — संस्कृत को मु नय ने गढ़ा, क वय ने सजाया; वह अ धकांश भारतीय भाषाओं तथा वश्व क अनेक
भाषाओं क जननी-भाषा या गुरु-भाषा है और अपने शब्द-भण्डार से दूसरी भाषाओं का पोषण करती है। इसी लए
उसका गौरव वणन से परे है।

काव्य-सौन्दयम्: ‘म ुलम ूषा’ तथा ‘सुन्दरसुरभाषा’ म एक ही वण क आवृ त्त होने से अनुप्रास अलङ् कार है।
भाषा को ‘म ूषा’ (पेट ) कहना रूपक है — शब्द उस पेट म रखे रत्न ह। भाषा को ‘मातः’ कहकर पुकारना
मानवीकरण है।

व्याकरण-सङ् केतः: मातस्तव का स न्ध- व े द = मातः + तव ( वसग स न्ध — वसग का ‘स्’ हो गया)। मातः —
सम्बोधन, एकवचन, स्त्री लङ्ग (यही अभ्यास-प्रश्न ४ का दया गया उदाहरण है)। वचनातीता = वचनम् + अतीता —
तत्पुरुष समास, प्रथमा एकवचन स्त्री लङ्ग।

ोकः 2 वेदव्यास-वाल्मी क-मुनीनां
का लदास-बाणा दकवीनाम्।
पौरा णक-सामान्य-जनानां
जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा॥ २॥ — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — वेद व्यास-वाल्मीिक-मुन ीनाम् कािलदास-बाणािदकवीनाम् पौरािणक-सामान्य-जनानाम् जीवनस्य
आशा सुन्दरसुरभाषा।

अन्वयः — (त्वं) वेद व्यासवाल्मीिकमुन ीनां कािलदास-बाणािदकवीनां पौरािणक-सामान्यजनानां जीवनस्य आशा
(अिस)। त्वं सुन्दरसुरभाषा (अिस)।

अथः ( हन्द ) — हे सुन्दर दे वभाषा ! तुम वेदव्यास और वाल्मी क जैसे मु नय क , का लदास और बाणभट्ट आ द क वय
क , तथा पुराण के अध्येताओं और साधारण जन क — सबके जीवन क आशा हो।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा AglaSem · NCERT Solutions

भावः: पुस्तक का भावाथ — संस्कृतभाषा अ त रमणीया भाषा अ स्त। वाल्मी क-वेदव्यास-इत्यादयः मुनयः
रामायण-महाभारत-पुराणाद न् ग्रन्थान् र चतवन्तः। का लदास-बाणभट्ट-प्रभृतयः व शष्टाः कवयः अ प
उपादे या न काव्या न र चतवन्तः। प्राचीनकालाद् आरभ्य इदान यावत् सामान्यजनानां जीवनं संस्कृतभाषया
र चतैः काव्यैः प्रभा वतम् अ स्त। संस्कृतभाषा बहूनां लक्ष्याणां प्रा पका अ स्त। अतः संस्कृतभाषा
सुन्दरभाषा अ स्त।
यहाँ क व का तक ध्यान दे ने योग्य है — वह संस्कृत को केवल वद्वान क भाषा नह कहता। तीन वग गनाता है
— मु न, क व और सामान्य जन — और तीन को एक ही पं क्त म रखता है। इसी से सद्ध होता है क संस्कृत कसी
वग- वशेष क नह , सबके जीवन क आशा है।

व्याकरण-सङ् केतः: ‘मुनीनाम्’, ‘कवीनाम्’, ‘जनानाम्’ — तीन षष्ठी वभ क्त, बहुवचन ह, और तीन का
सम्बन्ध ‘जीवनस्य’ से है। ‘जीवनस्य’ भी षष्ठी है कन्तु एकवचन — यही अन्तर अभ्यास-प्रश्न ४ म पूछा गया है।
बाणा दकवीनाम् = बाणः आ दः येषां ते, तेषाम् — बहु ी ह समास।

ोक-व्याख्या (पदच्छे दः · अन्वयः · अथः · भावः) — पृष्ठ 78–79
गीतस्य तृतीयः चतुथश्च पद्यः

ोकाः

ोकः 3 श्रु तसुख ननदे सकलप्रमोदे
स्मृ त हतवरदे सरस वनोदे ।
ग त-म त-प्रेरक-काव्य वशारदे
तव संस्कृ तरेषा, सुन्दरसुरभाषा॥ ३॥ — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — श्रुितसुखिननदे सकलपमोदे स्मृितिहतवरदे सरसिवनोदे गित-मित-पेरककाव्यिवशारदे तव संस्कृ ितः
एषा सुन्दरसुरभाषा।

अन्वयः — हे ! श्रुितसुखिननदे ! सकलपमोदे ! स्मृितिहतवरदे ! सरसिवनोदे ! गित-मित-पेरक-काव्यिवशारदे !
तव एषा संस्कृ ितः (अिस्त)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (अिस)।

अथः ( हन्द ) — हे कान को सुख दे ने वाली ध्व न वाली ! हे सबको आनन्द दे ने वाली ! हे स्मृ त को हतकारी वरदान दे ने
वाली ! हे मधुर वनोद करने वाली ! हे ग त और बु द्ध को प्रेरणा दे ने वाले काव्य म पारंगत ! — यह संस्कृ त तुम्हारी ही है, हे
सुन्दर दे वभाषा !

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भावः: पुस्तक का भावाथ — वस्तुतः रमणीया दे वत्व वधा यनी संस्कृतभाषा संस्कृतेः जननी सदृशी अ स्त।
संस्कृतभाषायाः ध्व नश्रवणेन सुखं वधते, सव जनाः आन न्दताः भव न्त। संस्कृतभाषा वररूपेण
संस्कारजन्यं ानं प्रयच्छ त, सरसं वनोदभावं च प्रकाशय त। मानवजीवने उत्तमां ग त बु द्ध च प्रददा त।
काव्यशास्त्रप रपूणा संस्कृतभाषा अस्माकं संस्कृ त रक्ष त प्रसारय त च।
यह पद्य भाषा और संस्कृ त के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है — ‘संस्कृ त’ शब्द ही ‘संस्कृत’ से बना है। क व कहता
है क हमारी संस्कृ त संस्कृत क ही दे न है; भाषा उसे केवल सुर क्षत नह रखती, फैलाती भी है।

काव्य-सौन्दयम्: यह पूरा पद्य सम्बोधन क माला है — पाँच पद सम्बोधन एकवचन म ह और ‘-दे ’ म अन्त
होकर अन्त्यानुप्रास बनाते ह ( ननदे , प्रमोदे , वरदे , वनोदे , वशारदे )। इसी कारण अभ्यास-प्रश्न २ (ङ) म इन्ह
सम्बोधनपद क सूची माँगी गई है।

व्याकरण-सङ् केतः: संस्कृ तरेषा का स न्ध- व े द = संस्कृ तः + एषा ( वसग स न्ध — ‘इः’ के बाद स्वर आने पर
वसग का ‘र्’ हो गया)। संस्कृ तः — प्रथमा वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग।

ोकः 4 नवरस-रु चरालङ् कृ त-धारा
वेद वषय-वेदान्त- वचारा।
वैद्य-व्योम-शास्त्रा द- वहारा
वजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा॥ ४॥ — पदच्छे दं, अन्वयम्, अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — नवरस-रुिचरा अलङ् कृ ित-धारा वेद िवषय-वेद ान्त-िवचारा। वैद्य -व्योम-शास्त्रािद-िवहारा िवजयते
धरायाम् सुन्दरसुरभाषा।

अन्वयः — नवरस-रुिचरा अलङ् कृ ितधारा वेद िवषयवेद ान्तिवचारा वैद्य व्योमशास्त्रािदिवहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा
िवजयते ।

अथः ( हन्द ) — नौ रस से मनोहर, अलङ् कार को धारण करने वाली, वेद तथा वेदान्त के वचार से युक्त और आयुवद,
खगोलशास्त्र आ द शास्त्र म वचरण करने वाली सुन्दर दे वभाषा इस धरती पर वजयी होती है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा AglaSem · NCERT Solutions

भावः: पुस्तक का भावाथ — संस्कृतकाव्यशास्त्रेषु शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अ त-
शान्त-प्रभृतयः नवसंख्याकाः रु चराः रसाः स न्त। शब्दाथपूणाः व वधाः अलङ् काराः शोभन्ते। वेद-
उप नषद्-वेदान्त-पुराणाद नां वचाराः जनान् अ भप्रेरय न्त। च कत्सा व ान-खगोलशास्त्रा द भः सह
संस्कृतभाषा पृ थव्यां वहर त। एवं संस्कृतभाषा सवत्र वजयते।
यह पद्य पूरे गीत का नष्कष है। पहले तीन पद्य म क व ने संस्कृत के सौन्दय, उसके रच यताओं और उसक
संस्कृ त क बात क । अब वह उसका वस्तार दखाता है — वह केवल काव्य क भाषा नह , दशन (वेदान्त),
च कत्सा (आयुवद) और खगोल (व्योमशास्त्र) क भी भाषा है। इसी सवव्यापकता के कारण वह ‘धरायां
वजयते’ — धरती पर वजयी है।

ध्यातव्यम् — नव रसाः: शृङ्गारः, हास्यः, करुणः, रौद्रः, वीरः, भयानकः, बीभत्सः, अ तः, शान्तः। अभ्यास-प्रश्न १
(घ) तथा २ (ग) दोन इसी सूची पर आधा रत ह।

व्याकरण-सङ् केतः: रु चरालङ् कृ त = रु चरा + अलङ् कृ त (द घ स्वर स न्ध — आ + अ = आ)। वजयते — ‘ व +
ज’ धातु, आत्मनेपद, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन। धरायाम् — सप्तमी एकवचन (आधार अथ म) —
अभ्यास-प्रश्न ४ म यही पूछा गया है।

वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 79–80

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा
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शब्दाथ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भः
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वयं शब्दाथान् जानीमः

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ष्ठe 79 क शब्दाथ-सारणी के शब्द ( वक सता, वल सता, म
gl aपृ ुला, म ूषा, पोषणक्षमता, मे, अतीता,
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प्र.1
वृन्दानाम्, नवम्, वचनातीता, भू यष्ठानाम्) के संस्कृत-पयाय, हन्द अथ तथा अंग्रेज़ी अथ ल खए और अ न्तम

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स्तम्भ ‘मातृभाषया अथ लखत’ भ रए।

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शब्दः अथः हन्द ENGLISH मातृभाषया अथः (नमूना —
(संस्कृतम्) हन्द )
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Progressively
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िवकिसता वस्ता रता बढ़ाई गई / फैलाई गई

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मञ्जुल ा मनोहरा मन को हरने Lovely / Charming सुन्दर, प्यारी

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पोषणक्षमता पालनश क्तः Nurturing capacity पालने-पोसने क श क्त

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वचनातीता वणनातीता वाणी से परे Beyond words जो कहा न जा सके

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o है वह मराठ म, जसक बाङ् ला है वह बाङ् ला म लखेगा। ऊपर नमूaनgाlउत्तर हन्द म दया गया है।
ध्यातव्यम्: अ न्तम स्तम्भ ‘मातृभाषया अथ लखत’ का उत्तर हर छात्र के लए अलग

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क्य उपयोगी: इस सारणी के लगभग सब शब्द स्त्री लङ्ग वशेषण ह ( वक सता, वल सता, म ुला, अतीता) —

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क्य क इन सबका वशेष्य ‘भाषा’ है, जो स्त्री लङ्ग है। वशेषण अपने वशेष्य के लङ्ग-वचन- वभ क्त का अनुसरण

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करता है — यही संस्कृत का मूल नयम है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 पृष्ठ 80 क शब्दाथ-सारणी के शब्द (श्रु तसुख ननदे , सकलप्रमोदे , सरस वनोदे , काव्य वशारदे , रु चरा,
अलङ् कृ तधारा, व्योमशास्त्रम्, धरायाम्) के अथ ल खए।

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH

श्रुितसुखिननदे ! श्रवणसुखध्व नदा त्र ! कण िपय ध् विन दे ने वाल ी ! Sound of which is pleasant to listen

सकलपमोदे ! सवभ्यः आनन्दम य ! सभी को आनन्द दे ने वाल ी That which gives pleasure to all

सरसिवनोदे सरस वनोदशीले मध ुर िवनोद करने वाल ी That which creates pleasant humour

काव्यिवशारदे ! काव्यपारङ्गते काव्य करने में पारंग त Oh! Proficient in Literature

रुिचरा रु चकरा आनन्द पद ान करने वाल ी That which gives happiness

अलङ् कृ ितधारा अलङ् काराणाम् आधात्री अल ंक ारों को धारण करने वाल ी Well ornamented

व्योमशास्त्रम् अन्त रक्षशास्त्रम् अन्तिर क्ष िव ान Astronomy

धरायाम् पृ थव्याम् धरती पर On earth

व्याकरण-सङ् केतः: पहले चार शब्द के आगे वस्मया दबोधक चह्न (!) छपा है — इससे पता चलता है क वे
सम्बोधन वभ क्त, एकवचन म ह। ‘रु चरा’ और ‘अलङ् कृ तधारा’ बना चह्न के ह क्य क वे प्रथमा वभ क्त म
चौथे पद्य के वशेषण ह। यही अन्तर ोक ३ और ४ क शैली का अन्तर है — तीसरा पद्य पुकार है, चौथा वणन।

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 80
व्याकरणम् — समासः

अत्र इदम् अवधे य म्

प्र.1 समासः कः ? पाठे प्रदत्तां प रभाषाम् उदाहरणैः सह लखत।

पिरभाषा (पुस्तक स्य वचनम्) — परस्परसम्ब ानां साथ कपदानाम् एकपदीभावः समासः इित क थ्यते । पायेण
द्वयोः ततोऽिधकानां वा पदानां संिक्षप्तीकरणं नाम समासः।

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हन्द अथ: आपस म सम्बन्ध रखने वाले साथक पद का एक पद बन जाना ही समास कहलाता है। सामान्यतः दो
या दो से अ धक पद का सं क्षप्तीकरण ही समास है।

पुस्तक के उदाहरण —

वग्रहः (खुला रूप) समस्तपदम् (जुड़ा रूप)

नद्याः तीरम् नद ीतीरम्

रा ः पुत्र ः राजपत्र
ु ः

सुर ाणां भाषा सुर भाषा

पोषणस्य क्षमता पोषण क्ष मता

वचनम् अतीता वचनातीता

नवसंख्याकाः रसाः नवरसाः

नवरसै ः रुिचरा नवरस रुिचरा

ध्यातव्यम्: समास बनने पर बीच क वभ क्त लुप्त हो जाती है — ‘सुराणां भाषा’ म षष्ठी का ‘णाम्’ दखता है,
पर ‘सुरभाषा’ म नह । इसी लए समास खोलने को वग्रह कहते ह — वग्रह म वही लुप्त वभ क्त फर से लौट आती
है।

प्र.2 समासानां क त प्रभेदाः स न्त ? तेषां नामा न उदाहरणैः सह लखत।

उत्तरम् — समासानां षट् पभे द ाः सिन्त — अव्ययीभावः, त त्पुरु षः, कमधारयः, िद्वगुः, द्वन्द्वः, बहवु ीिहः च।

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समासः नयमः (पुस्तकानुसारम्) उदाहरणम्

अव्ययीभावः प्रायः पूवपद अव्यय होता है रूपस्य योग्यम् = अनरू
ु पम्

तत्पुरुषः परपद (उत्तरपद) प्रधान होता है सुर ाणां भाषा = सुर भाषा

िद्वग ःु पूवपद संख्यावाचक होता है पञ् चानां वटानां समाहारः = पञ्चवटी

बहवु ीिहः अन्य पद (बाहर का पद) प्रधान होता है पीतम् अम् बरं यस्य सः = पीताम्बरः (श्रीिवष्ण ुः)

कमधारयः वशेषण- वशेष्य का समास (तत्पुरुष का ही भेद) सुन्द री सुर भाषा = सुन्द रसुर भाषा

द्वन्द्वः दोन पद समान रूप से प्रधान रामः च कृ ष्णः च = रामकृ ष्णौ

पहचान का सरल सूत्र: यह दे खए क अथ का बल कस पद पर है — पहले पद पर हो तो अव्ययीभाव, दूसरे पर
हो तो तत्पुरुष, दोन पर बराबर हो तो द्वन्द्व, और कसी तीसरे (समास से बाहर के) पद पर हो तो बहु ी ह।
‘पीताम्बरः’ म न ‘पीत’ प्रधान है, न ‘अम्बर’ — प्रधान है वष्णु, जो पद म है ही नह ; इसी लए वह बहु ी ह है।

प्र.3 अ स्मन् पाठे प्रयुक्तानां समस्तपदानां वग्रहं कुरुत — म ुलम ूषा, सुन्दरसुरभाषा, पोषणक्षमता, वचनातीता,
नवरसरु चरा, अलङ् कृ तधारा, व्योमशास्त्रम्।

समस्तपदम् वग्रहः समासः

मञ्जुल मञ्जूषा म ञ् ज ुल ा म ञ् जूषा कमधारयः

सुन्दरसुर भाषा सुन्द री सुर भाषा कमधारयः

सुर भाषा सुर ाणां भाषा षष्ठी तत्पुरुषः

पोषणक्षमता पोषण स्य क्ष मता षष्ठी तत्पुरुषः

वचनातीता वचनम् अतीता द्वतीया तत्पुरुषः

नवरसाः नवसंख्याकाः रसाः द्वगुः

नवरसरुिचरा नवरसै ः रुिचरा तृतीया तत्पुरुषः

अलङ् कृ ितधारा अल ङ्कृ तीनां धारा (अल ङ्काराणाम् आधात्र ी) षष्ठी तत्पुरुषः

व्योमशास्त्रम् व्योम् नः शास्त्र म् षष्ठी तत्पुरुषः

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Try This: पाठ का सबसे लम्बा समास है — मु नवर वक सतक ववर वल सतम ुलम ूषा। इसे टु कड़ म
खो लए — मु नवरैः वक सता, क ववरैः वल सता, म ुला म ूषा। ऐसे लम्बे समास संस्कृत काव्य क वशेषता ह
और उन्ह द घसमास कहा जाता है।

अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्नः १ — पृष्ठ 81
अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां एकपदे न उत्तरं लखत

अभ्यासात् जायते स द्धः

प्र.1 (क) सुन्दरसुरभाषा कस्य वचनातीता ?

उत्तरम् — मम (कवेः)।

ोक १ क पङ् क्त — “अ य मातस्तव पोषणक्षमता मम वचनातीता”। अथात् संस्कृतभाषा क पोषण-क्षमता क व क वाणी
से परे है।

हन्द अथ: ‘मेरे’ — यहाँ ‘म’ अथात् गीत गाने वाला क व। वह कहता है क माता संस्कृत क पालन-श क्त इतनी
बड़ी है क मेरे शब्द उसका वणन नह कर सकते।

व्याकरण-सङ् केतः: मम — अस्मद् शब्द क षष्ठी वभ क्त, एकवचन। प्रश्न म ‘कस्य’ भी षष्ठी एकवचन है —
प्रश्नवाचक और उत्तर क वभ क्त सदा एक ही रहती है। यही परखने के लए यह प्रश्न बना है।

प्र.1 (ख) संस्कृतभाषा कुत्र वजयते ?

उत्तरम् — धरायाम् (पृिथव्याम्)।

ोक ४ क अ न्तम पङ् क्त — “ वजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा”।

हन्द अथ: संस्कृतभाषा धरती पर वजयी होती है। क व यह नह कहता क वह कसी एक दे श या एक वग म
सफल है — वह पूरी पृथ्वी पर वजयी है, क्य क उसम काव्य भी है, दशन भी, और व ान भी।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा
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व्याकरण-सङ् केतः: धरायाम् — ‘धरा’ (स्त्री लङ्ग) क सप्तमी वभ क्त, एकवचन, अ धकरण (आधार) के अथ

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म। ‘कुत्र’ प्रश्न का उत्तर सदा सप्तमी वभ क्त या स्थानवाचक अव्यय म आता है।

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प्र.1 (ग) संस्कृतभाषा कस्य आशा ?

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उत्तरम् — जीवन स्य।
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ोक २ क अ न्तम पङ् क्त — “जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा”।

emअथ: संस्कृतभाषा जीवन क आशा है — मु नय , क वय तथा सामान्य जन , सबके जीवन क । ‘आशा’ a
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यहाँ केवल इ ा नह , सहारा और भरोसा के अथ म है।

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mएकवचन, नपुंसक लङ्ग। ध्यान द जए — इसी पद्य के ‘मुनीनाम्, agl
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व्याकरण-सङ् केतः: जीवनस्य — षष्ठी वभ क्त,
a अभ्यास-प्रश्न ४ यही अन्तर जाँचता है।
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कवीनाम्, जनानाम्’ भी षष्ठी ह, पर बहुवचन।

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संस्कृते क त रसाः स न्त ?
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उत्तरम् — नव (नवसंख्याकाः)।
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ोक ४ के भावाथ म पुस्तक स्वयं गनाती है — शृङ्गार-हास्य-करुण-रौद्र-वीर-भयानक-बीभत्स-अ त-शान्त-प्रभृतयः
नवसंख्याकाः रु चराः रसाः स न्त।

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m भयानक, बीभत्स, अ त
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हन्द अथ: संस्कृत काव्यशास्त्र म नौ रस माने गए ह — शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर,

. omशान्त। इसी लए इन्ह ‘नवरस’ कहते ह, और पद्य का पहला शब्द ही ‘नवरस-रु
cऔर a gla चरा’ है।
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व्याकरण-सङ् केतः: नव संख्यावाचक शब्द है। ‘नवसंख्याकाः रसाः = नवरसाः’ — यह द्वगु समास है, क्य क

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पूवपद संख्यावाचक है।

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प्र.1 (ङ) कस्याः ध्व नश्रवणेन सुखं वधते ?

उत्तरम् — संस्कृ तभाषायाः।

ोक ३ का भावाथ — “संस्कृतभाषायाः ध्व नश्रवणेन सुखं वधते, सव जनाः आन न्दताः भव न्त।”

हन्द अथ: संस्कृतभाषा क ध्व न सुनने से सुख बढ़ता है। यही बात पद्य के सम्बोधन ‘श्रु तसुख ननदे ’ (कान को
सुख दे ने वाली ध्व न वाली) म कही गई है।

व्याकरण-सङ् केतः: संस्कृतभाषायाः — षष्ठी वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग। प्रश्न म ‘कस्याः’ है — स्त्री लङ्ग षष्ठी
एकवचन; इस लए उत्तर भी स्त्री लङ्ग म ही आना चा हए, ‘संस्कृतस्य’ नह ।

अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्नः २ — पृष्ठ 81
अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूणवाक्येन उत्तरं लखत

अभ्यासात् जायते स द्धः

प्र.2 (क) संस्कृतभाषा केषां जीवनस्य आशा अ स्त ?

उत्तरम् — संस्कृ तभाषा वेद व्यास-वाल्मीिक -मुन ीना,ं कािलदास-बाणािदकवीना,ं पौरािणक -सामान्यजनानां च
जीवनस्य आशा अिस्त।

हन्द अथ: संस्कृतभाषा वेदव्यास तथा वाल्मी क जैसे मु नय क , का लदास तथा बाणभट्ट आ द क वय क
और पुराण के अध्येताओं तथा सामान्य जन क — इन सबके जीवन क आशा है।

उत्तर-कौशलम्: प्रश्न म ‘केषां’ (षष्ठी बहुवचन) है, इस लए उत्तर म भी तीन वग षष्ठी बहुवचन म ही आने चा हए
— मुनीनाम्, कवीनाम्, जनानाम्। पूणवाक्य वाले प्रश्न म क्रया ‘अ स्त’ लगाना न भूल।

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प्र.2 (ख) केषां वचाराः जनान् अ भप्रेरय न्त ?

उत्तरम् — वेद -उपिनषद् -वेद ान्त -पुराणादीनां िवचाराः जनान् अिभपेरयिन्त ।

हन्द अथ: वेद, उप नषद्, वेदान्त तथा पुराण आ द के वचार लोग को प्रे रत करते ह। ोक ४ क पङ् क्त
‘वेद वषय-वेदान्त- वचारा’ इसी बात को कहती है — संस्कृत केवल शब्द क भाषा नह , वचार क भाषा है।

व्याकरण-सङ् केतः: अ भप्रेरय न्त — ‘अ भ + प्र + ईर्’ का णच्-प्रत्ययान्त (प्रेरणाथक) रूप, लट् लकार,
प्रथमपुरुष बहुवचन — क्य क कता ‘ वचाराः’ बहुवचन है। कम ‘जनान्’ द्वतीया बहुवचन है।

प्र.2 (ग) कैः रसैः समृद्धा सा हत्यपरम्परा वराजते ?

उत्तरम् — शृङ्गार-हास्य-क रु ण-रौद -वीर-भयानक -बीभत्स-अद् भतु -शान्त -इित नविभः रसैः समृ ा
सािहत्यपरम्परा िवराजते ।

क्रमः रसः ायीभावः

१ ृ ् गारः
शङ रितः

२ हास्यः हासः

३ करुणः शोकः

४ रौद ः क्र ोधः

५ वीरः उ त्साहः

६ भयानकः भयम्

७ बीभत्सः ज ुग प्ु सा

८ अद् भतु ः िवस्मयः

९ शान्तः िनवद ः

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हन्द अथ: संस्कृत क सा हत्य-परम्परा नौ रस से समृद्ध होकर शो भत होती है। ‘रस’ का अथ है — काव्य पढ़ते
या सुनते समय पाठक के मन म जो आनन्दमय भाव जगता है। पुस्तक क सूची इन्ह नौ रस क है।

व्याकरण-सङ् केतः: ‘कैः रसैः’ — तृतीया वभ क्त, बहुवचन (करण/साधन के अथ म)। इस लए उत्तर भी
‘नव भः रसैः’ — तृतीया बहुवचन — म दे ना चा हए।

प्र.2 (घ) संस्कृतभाषा केषु शास्त्रेषु वहर त ?

उत्तरम् — संस्कृ तभाषा वैद्य शास्त्र-व्योमशास्त्र-आिदषु शास्त्रेष ु िवहरित। (िचिकत्सािव ान-खगोलशास्त्रािदिभः
सह संस्कृ तभाषा पृिथव्यां िवहरित।)

हन्द अथ: संस्कृतभाषा आयुवद ( च कत्साशास्त्र), व्योमशास्त्र (खगोलशास्त्र) आ द शास्त्र म वचरण करती
है। ोक ४ क पङ् क्त ‘वैद्य-व्योम-शास्त्रा द- वहारा’ का सीधा अथ यही है।

क्य महत्त्वपूण: यह प्रश्न पाठ का सबसे बड़ा सन्दे श खोलता है — संस्कृत केवल धम या काव्य क भाषा नह है।
चरक-सं हता, सुश्रुत-सं हता ( च कत्सा) तथा आयभट य, सूय सद्धान्त (खगोल) जैसे वै ा नक ग्रन्थ भी संस्कृत म
ही लखे गए। इसी वस्तार के कारण क व उसे ‘धरायां वजयते’ कहता है।

व्याकरण-सङ् केतः: ‘केषु शास्त्रेषु’ — सप्तमी वभ क्त, बहुवचन; अतः उत्तर भी ‘शास्त्रेषु’ सप्तमी बहुवचन म।

प्र.2 (ङ) संस्कृतभाषायाः का न का न सम्बोधनपदा न अत्र प्रयुक्ता न ?

उत्तरम् — अत्र संस्कृ तभाषायाः कृ ते ‘मातः’, ‘श्र िु तसुखिननदे ’, ‘सकलपमोदे ’, ‘स्मृितिहतवरदे ’, ‘सरसिवनोदे ’,
‘गित -मित -पेरक -काव्यिवशारदे ’ इित सम्बोधनपदािन पयुक्तािन।

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सम्बोधनपदम् अथः ोकः

अिय मातः ! हे माता ! १

श्रुितसुखिननदे ! हे कानों को सुख दे ने वाल ी ध् विन वाल ी ! ३

सकलपमोदे ! हे सबको आनन्द दे ने वाल ी ! ३

स्म ृितिहतवरदे ! हे स्म ृित को िहतकारी वरद ान दे ने वाल ी ! ३

सरसिवनोदे ! हे मध ुर िवनोद करने वाल ी ! ३

गित-मित-पेर क-काव्यिवशारदे ! हे गित और ब ुि को पेिरत करने वाले काव्य में पारंग त ! ३

भावः: इतने सारे सम्बोधन एक ही उ े श्य से आए ह — क व संस्कृत को नज व भाषा नह , जी वत माता मानता है।
जससे बात क जाती है, उसी को पुकारा जाता है; इस लए पूरा गीत ‘पुकार’ के रूप म चलता है। यही मानवीकरण
अलङ् कार है।

व्याकरण-सङ् केतः: ये सब पद सम्बोधन वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग म ह। आकारान्त स्त्री लङ्ग शब्द (जैसे
‘माता’) का सम्बोधन ‘मातः’ बनता है, और ‘ ननदा, प्रमोदा’ जैसे शब्द का सम्बोधन ‘ ननदे , प्रमोदे ’ — अन्त म
‘ए’। पुस्तक ने शब्दाथ-सारणी म इन्ह पद के आगे ! चह्न भी छापा है।

अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्नः ३ — पृष्ठ 81–82
रेखाङ् कतपदा न आ श्रत्य प्रश्न नमाणं कुरुत

अभ्यासात् जायते स द्धः

प्र.3 (क) मु नगणाः संस्कृतभाषायाः वकासं कृतवन्तः।

पश्नः — मुिनगणाः क स्याः िवकासं कृ तवन्त ः ?

हन्द अथ: मूल वाक्य = “मु नगण ने संस्कृतभाषा का वकास कया।” रेखाङ् कत पद ‘संस्कृतभाषायाः’ के
स्थान पर प्रश्नवाचक पद रखने पर बनेगा — “मु नगण ने कसका वकास कया ?”

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा
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नयमः: प्रश्न- नमाण का एक ही सूत्र है — रेखाङ् कत पद हटाइए, उसी लङ्ग-वचन- वभ क्त का प्रश्नवाचक पद
mप्रश्नवाचक रूप
र खए, शेष वाक्य ज्य -का-त्य र खए। यहाँ ‘संस्कृतभाषायाः’ षष्ठी, एकवचन, स्त्री लङ्ग है; उसीeका
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कस्याः है। .co
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सामान्यजनानां जीवनं काव्यैः प्रभा वतम् अ स्त।
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पश्नः — सामान्यजनानां जीवनं कै ः पभािवतम् अिस्त ? co m
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gl जीवन कनसे प्रभा वत है ?”
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व्याकरण-सङ् केतः: ‘काव्यैः’ तृतीया वभ क्त, बहुवचन, नपुंसक लङ्ग है (करण के अथ म)। तृतीया बहुवचन का
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प्रश्नवाचक रूप कैः है। य द एकवचन होता (‘काव्येन’) तो प्रश्न ‘केन’ बनता — यह भेद ध्यान म र खए।
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कवयः अ प उपादे या न काव्या न र चतवन्तः।
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पश्नः — कवयः अिप कीदृ शािन काव्यािन रिचतवन्त ः ?
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हन्द अथ: मूल वाक्य = “क वय ने भी ग्रहण करने योग्य (उत्तम) काव्य रचे।” प्रश्न बनेगा — “क वय ने भी
कैसे काव्य रचे ?”

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क्य ‘क दृशा न’, ‘का न’ नह : रेखाङ् कत पद ‘उपादे या न’ वशेषण है, सं ा नह । वशेषण के स्थान पर सदा
.cक दृश् (कैसा) रूप आता है — ‘का न’ तब आता जब ‘काव्या न’ रेखाङ् aकतg होता। यहाँ ‘क दृशा न’ द्वतीया
m बहुवचन नपुंसक लङ्ग है, ठ क ‘उपादे या न’ क तरह।
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प्र.3 (घ) संस्कृतभाषा पृ थव्यां वहर त।

पश्नः — संस्कृ तभाषा कु त्र िवहरित ?

हन्द अथ: मूल वाक्य = “संस्कृतभाषा पृथ्वी पर वचरण करती है।” प्रश्न बनेगा — “संस्कृतभाषा कहाँ वचरण
करती है ?”

व्याकरण-सङ् केतः: ‘पृ थव्याम्’ सप्तमी वभ क्त, एकवचन है और स्थान बता रही है। स्थानवाचक सप्तमी के
लए प्रश्नवाचक अव्यय कुत्र प्रयुक्त होता है (‘कस्याम्’ भी व्याकरण क दृ ष्ट से ठ क है, पर स्थान के अथ म ‘कुत्र’
ही स्वाभा वक है)।

प्र.3 (ङ) संस्कृतभाषा व वधभाषाः प रपोषय त।

पश्नः — संस्कृ तभाषा काः पिरपोषयित ?

हन्द अथ: मूल वाक्य = “संस्कृतभाषा व वध भाषाओं का पोषण करती है।” प्रश्न बनेगा — “संस्कृतभाषा
कनका पोषण करती है ?”

व्याकरण-सङ् केतः: ‘ व वधभाषाः’ यहाँ कम है — द्वतीया वभ क्त, बहुवचन, स्त्री लङ्ग। स्त्री लङ्ग द्वतीया बहुवचन
का प्रश्नवाचक रूप काः है। (नपुंसक लङ्ग होता तो ‘का न’, पुं लङ्ग होता तो ‘कान्’।)

प्र.3 (च) वेद-वेदाङ्गाद न गभीरा ण शास्त्रा ण स न्त।

पश्नः — वेद -वेद ाङ् गादीिन गभीरािण कािन सिन्त ?

हन्द अथ: मूल वाक्य = “वेद, वेदाङ्ग आ द गम्भीर शास्त्र ह।” प्रश्न बनेगा — “वेद-वेदाङ्ग आ द गम्भीर क्या ह ?”

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व्याकरण-सङ् केतः: ‘शास्त्रा ण’ प्रथमा वभ क्त, बहुवचन, नपुंसक लङ्ग है; उसी का प्रश्नवाचक रूप का न है।
ध्यान द जए क (ग) म वशेषण रेखाङ् कत था इस लए ‘क दृशा न’ आया, और यहाँ सं ा रेखाङ् कत है इस लए
‘का न’ — दोन प्रश्न पास-पास इसी लए रखे गए ह।

अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्नः ४ — पृष्ठ 82
अधः प्रदत्तानां पदानाम् उदाहरणानुसारं वभ क्तं वचनं च लखत

अभ्यासात् जायते स द्धः

प्र.4 अधः प्रदत्तानां पदानाम् उदाहरणानुसारं वभ क्तं वचनं च लखत —
यथा — मातः = सम्बोधनम्, एकवचनम्।
(पदा न) तव · म ूषा · संस्कृ तः · जनानाम् · जीवनस्य · धरायाम् · शास्त्रेषु

पदम् वभ क्तः वचनम् लङ्गम् / मूलशब्दः

यथा — मातः स म् बोधनम् एकवचनम् स्त्री लङ्गम् — मातृ

तव षष्ठी एकवचनम् सवनाम — युष्मद्

मञ्जूषा पथमा एकवचनम् स्त्री लङ्गम् — म ूषा

संस्कृ ितः पथमा एकवचनम् स्त्री लङ्गम् — संस्कृ त

जनानाम् षष्ठी बहव
ु चनम् पुं लङ्गम् — जन

जीवनस्य षष्ठी एकवचनम् नपुंसक लङ्गम् — जीवन

धरायाम् स प्तमी एकवचनम् स्त्री लङ्गम् — धरा

शास्त्रेष ु स प्तमी बहुवचनम् नपुंसक लङ्गम् — शास्त्र

पहचानने का तरीका — प्रत्यय दे खए:

-स्य / -याः → षष्ठी एकवचन (जीवनस्य)
-आनाम् / -ानाम् → षष्ठी बहुवचन (जनानाम्)
-ए / -आयाम् → सप्तमी एकवचन (धरायाम्)
-एषु / -ासु → सप्तमी बहुवचन (शास्त्रेषु)
बना कसी प्रत्यय के, कता के रूप म खड़ा पद → प्रथमा (म ूषा, संस्कृ तः)

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ध्यातव्यम् — ‘तव’ पर वशेष: ‘तव’ युष्मद् (तुम) सवनाम क षष्ठी एकवचन है = ‘तुम्हारा’। यह सवनाम है,
इस लए इसका कोई अलग लङ्ग नह होता — पुरुष हो या स्त्री, ‘तव’ ही रहेगा। ोक १ म ‘अ य मातस्तव
पोषणक्षमता’ = ‘हे माता, तुम्हारी पोषण-क्षमता’।

Check it yourself: ‘संस्कृ तः’ और ‘म ूषा’ दोन प्रथमा एकवचन ह, पर उनके अन्त अलग दखते ह —
इसका कारण यह है क ‘म ूषा’ आकारान्त स्त्री लङ्ग (रमा जैसा) है और ‘संस्कृ तः’ इकारान्त स्त्री लङ्ग (म त
जैसा)। प्रथमा एकवचन म आकारान्त का रूप नह बदलता, इकारान्त म वसग जुड़ता है।

अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्नः ५ — पृष्ठ 82
अधो ल खतानां पद्यांशानां यथायोग्यं मेलनं कुरुत

अभ्यासात् जायते स द्धः

प्र.5 अधो ल खतानां पद्यांशानां यथायोग्यं मेलनं कुरुत —
कवगः — (क) अ य मातस्तव पोषणक्षमता · (ख) वेदव्यास-वाल्मी क-मुनीनां · (ग) पौरा णक-सामान्यजनानाम् ·
(घ) श्रु तसुख ननदे सकलप्रमोदे · (ङ) वैद्यव्योम-शास्त्रा द वहारा
खवगः — स्मृ त हतवरदे सरस वनोदे · वजयते धरायाम् · मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा ·
का लदासबाणा दकवीनाम् · जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा

कवगः खवगः (सही मेल) ोकः

(क) अिय मातस्तव पोषणक्षमता मम वचनातीता , सुन्द रसुर भाषा १ ( दया गया उदाहरण)

(ख) वेद व्यास-वाल्मीिक-मुनीनां कािल द ासबाणािद कवीनाम् २

(ग) पौरािणक-सामान्यजनानाम् जीवनस्य आशा , सुन्द रसुर भाषा २

(घ) श्रुितसुखिननदे सकलपमोदे स्म ृितिहतवरदे सरसिवनोदे ३

(ङ) वैद्य व्योम-शास्त्रािदिवहारा िवजयते धरायाम् ४

मेल कैसे पहचान: हर पद्य क पङ् क्तयाँ क्रम से जुड़ी ह, इस लए पहले ोक पहचा नए, फर उसक अगली
पङ् क्त उठाइए।

(ख) और (ग) दोन ोक २ से ह — (ख) पहली पङ् क्त है, तो उसक जोड़ी दूसरी पङ् क्त
‘का लदासबाणा दकवीनाम्’ है; (ग) तीसरी पङ् क्त है, तो उसक जोड़ी चौथी पङ् क्त ‘जीवनस्य आशा…’ है।
(घ) ोक ३ क पहली पङ् क्त है → उसक जोड़ी दूसरी पङ् क्त ‘स्मृ त हतवरदे सरस वनोदे ’।
(ङ) ोक ४ क तीसरी पङ् क्त है → उसक जोड़ी अ न्तम पङ् क्त ‘ वजयते धरायाम्’।

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Tip: तुक (अन्त्यानुप्रास) भी सहायता करती है — ‘ ननदे ’ क तुक ‘ वनोदे ’ से मलती है, ‘ वहारा’ क तुक
‘धरायाम्’ वाली पङ् क्त से। संस्कृत गीत म जोड़ी पहचानने का यह सबसे तेज़ तरीका है।

अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्नः ६ — पृष्ठ 82–83
उदाहरणानुसारम् अधः प्रदत्तानां पदानाम् एकपदे न अथ लखत

अभ्यासात् जायते स द्धः

प्र.6 (क) यथा, दे वस्य आलयः = दे वालयः। (क) सुराणां भाषा = ?

उत्तरम् — सुरभाषा।

हन्द अथ: ‘सुराणां भाषा’ = दे वताओं क भाषा, जसका एक पद है सुरभाषा। यही शब्द पाठ क टे क
‘सुन्दरसुरभाषा’ म आता है।

समासः: यह षष्ठी तत्पुरुष है — वग्रह म षष्ठी वभ क्त (‘णाम्’) दखती है, समास बनने पर लुप्त हो जाती है।
पुस्तक क ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ पेट म इसी को तत्पुरुष का उदाहरण बताया गया है — “तत्पुरुषसमासे परपदस्य
प्राधान्यं भव त। यथा — सुराणां भाषा — सुरभाषा।”

प्र.6 (ख) सुन्दरी सुरभाषा = ?

उत्तरम् — सुन्द रसुरभाषा।

हन्द अथ: ‘सुन्दरी सुरभाषा’ = सुन्दर दे वभाषा = सुन्दरसुरभाषा। यही पाठ का शीषक-शब्द और गीत क टे क
है।

समासः: यह कमधारय है, क्य क ‘सुन्दरी’ वशेषण है और ‘सुरभाषा’ वशेष्य। समास बनते समय स्त्री लङ्ग वशेषण
‘सुन्दरी’ अपना पुंव ाव लेकर ‘सुन्दर’ हो जाता है — इसी लए ‘सुन्दरीसुरभाषा’ नह , ‘सुन्दरसुरभाषा’ बनता है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा
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नवरसैः रु चरा = ?
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प्र.6 (ग)

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उत्तरम् — नवरसरु िचरा।
co m
e m . ag
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हन्द अथ: ‘नवरसैः रु चरा’ = नौ रस से मनोहर = नवरसरु चरा। ोक ४ का पहला ही शब्द यही है —
‘नवरस-रु चरालङ् कृ त-धारा’।

. c om
समासः: यह तृतीया तत्पुरुष है — वग्रह म तृतीया वभ क्त (‘ऐः’) है। यह उदाहरण पुस्तक कm‘अत्र इदम्
अवधेयम्’ oपेटmम भी दया गया है — “नवरसैः रु चरा — नवरसरु चरा”। l a se
.c a g
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प्र.6 (घ) पोषणस्य क्षमता = ?

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उत्तरम् — पोषणक्षमता।
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m .c अथ: ‘पोषणस्य क्षमता’ = पोषण करने क क्षमता = पोषणक्षमता। agोक १ क पङ् क्त — ‘अ य
se
हन्द
a मातस्तव पोषणक्षमता मम वचनातीता’।
agl
se m
com g l a
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समासः: षष्ठी तत्पुरुष — पुस्तक क पेट म भी यही उदाहरण छपा है (“पोषणस्य क्षमता — पोषणक्षमता”)। अथ
m a
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agl
का बल दूसरे पद ‘क्षमता’ पर है, इसी लए तत्पुरुष है।

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म ुला भाषा = ?

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प्र.6 (ङ)

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mउत्तर.co a g
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उत्तरम् — मञ् जुलभाषा।
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e m . co agl
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हन्द अथ: ‘म ुला भाषा’ = मन को हरने वाली भाषा = म ुलभाषा। पाठ म इसी री त से ‘म ुला म ूषा’
का समास होकर म ुलम ूषा बना है — जो पाठ का शीषक है।

com
m .
m ase
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समासः: कमधारय ( वशेषण + वशेष्य)। ध्यान द जए — (ख) क ही तरह यहाँ भी स्त्री लङ्ग वशेषण ‘म ुला’
समास म ‘म ुल’ बन जाता है। यह पुंव ाव का नयम कमधारय क पहचान का सबसे अ ा सुराग है।

अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्नः ७ — पृष्ठ 83
पे टकातः पदा न चत्वा रक्त ाना न पूरयत

अभ्यासात् जायते स द्धः

प्र.7 (पे टका) पे टका — का लदासबाणा द, आशा, संस्कृ तः, वजयते, मम, वेद वषय, म ुलम ूषा, सकलप्रमोदे
यथा — मु नवर- वक सत-क ववर- वल सत- म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा।
— सम्पूण उत्तर-ता लका द जए।

क्रमः पूण पङ् क्तः ( रक्त ानं पू रतम्) पे टकातः पदम्

यथा मुिनवर-िवकिसत-किववर-िवलिसत- म ञ्जुल म ञ्जूषा सुन्दरसुर भाषा। म ञ् ज ुल म ञ् जूषा

(क) अिय मातः तव पोषणक्षमता मम वचनातीता। मम

(ख) वेद व्यास-वाल्मीिक-मुनीनां कािलदासबाणािद कवीनाम्। कािल द ासबाणािद

(ग) पौरािणक-सामान्य-जनानां जीवनस्य आशा। आशा

(घ) श्रुितसुखिननदे सकलपमोदे स्म ृितिहतवरदे सरसिवनोदे । सकल पमोदे

(ङ) गित-मित-पेर क-काव्य-िवशारदे , तव संस्कृ ितः एषा सुन्दरसुर भाषा। संस्कृ ितः

(च) नवरस-रुिचरालङ् कृ ितधारा वेद िवषय-वेद ान्तिवचारा। वेद िवषय

(छ) वैद्य -व्योम-शास्त्रािद-िवहारा िवजयते धरायाम्, सुन्दरसुर भाषा। िवजयते

Tip — भरने क व ध: पे टका म आठ पद ह और उदाहरण स हत आठ ही स्थान — इस लए हर पद ठ क एक
बार आएगा। पहले वे स्थान भ रए जहाँ तुक या व्याकरण सुराग दे ते ह (जैसे (घ) म ‘-दे ’ अन्त वाले सम्बोधन चा हए,
तो ‘सकलप्रमोदे ’ ही बैठेगा), फर बचे हुए पद बचे स्थान म र खए।

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प्र.7 (क) अ य मातः तव पोषणक्षमता ………………… वचनातीता।

उत्तरम् — अिय मातः तव पोषणक्षमता मम वचनातीता।

हन्द अथ: हे माता ! तुम्हारी पोषण-क्षमता मेरी वाणी से परे है। — क व स्वयं को सामने रखकर कहता है क म
वणन नह कर सकता।

क्य ‘मम’: ‘वचनातीता’ का अथ है ‘वचन से परे’ — कसके वचन से ? यह बताने के लए षष्ठी वभ क्त चा हए।
पे टका म एकमात्र षष्ठी-रूप ‘मम’ ही है। यही अभ्यास-प्रश्न १ (क) का भी उत्तर है।

प्र.7 (ख) वेदव्यास-वाल्मी क-मुनीनां ………………… कवीनाम्।

उत्तरम् — वेद व्यास-वाल्मीिक-मुन ीनां कािलदासबाणािद कवीनाम्।

हन्द अथ: वेदव्यास और वाल्मी क जैसे मु नय क तथा का लदास, बाणभट्ट आ द क वय क …

क्य यही पद: रक्त स्थान के ठ क बाद ‘कवीनाम्’ है, अथात् क वय के नाम चा हए। पे टका म क व-नाम वाला
एकमात्र पद ‘का लदासबाणा द’ है। ‘का लदासबाणा द + कवीनाम्’ मलकर एक ही समस्तपद
‘का लदासबाणा दकवीनाम्’ बनता है।

प्र.7 (ग) पौरा णक-सामान्य-जनानां जीवनस्य …………………।

उत्तरम् — पौरािणक-सामान्य-जनानां जीवनस्य आशा।

हन्द अथ: पुराण के अध्येताओं तथा सामान्य जन के जीवन क आशा (संस्कृतभाषा है)।

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क्य यही पद: ‘जीवनस्य’ षष्ठी है — ‘ कसका ?’ का उत्तर तो मल गया, अब ‘क्या ?’ चा हए, अथात् प्रथमा
वभ क्त का सं ापद। पे टका म ‘आशा’ ही ऐसा पद है। यही प्रश्न १ (ग) का उत्तर भी है।

प्र.7 (घ) श्रु तसुख ननदे ………………… स्मृ त हतवरदे सरस वनोदे ।

उत्तरम् — श्रुितसुखिननदे सकलपमोदे स्मृितिहतवरदे सरसिवनोदे ।

हन्द अथ: हे कण प्रय ध्व न वाली ! हे सबको आनन्द दे ने वाली ! हे स्मृ त को हतकारी वरदान दे ने वाली ! हे
मधुर वनोद करने वाली !

क्य यही पद: आस-पास के तीन पद सम्बोधन एकवचन म ह और ‘-दे ’ पर समाप्त होते ह। पे टका म इसी साँचे का
एकमात्र पद ‘सकलप्रमोदे ’ है — तुक और वभ क्त, दोन मल जाती ह।

प्र.7 (ङ) ग त-म त-प्रेरक-काव्य- वशारदे , तव ………………… एषा सुन्दरसुरभाषा।

उत्तरम् — गित-मित-पेरक-काव्य-िवशारदे , तव संस्कृ ितः एषा सुन्दरसुरभाषा।

हन्द अथ: हे ग त और बु द्ध को प्रे रत करने वाले काव्य म पारंगत ! यह संस्कृ त तुम्हारी ही है, हे सुन्दर दे वभाषा !

क्य यही पद: ‘तव … एषा’ — ‘तुम्हारी यह …’ के बीच कोई स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन सं ा चा हए, क्य क ‘एषा’
स्त्री लङ्ग है। पे टका म ‘संस्कृ तः’ ही ऐसा पद है। मूल ोक म यह ‘संस्कृ तरेषा’ के रूप म स न्ध कए हुए छपा है
(संस्कृ तः + एषा)।

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प्र.7 (च) नवरस-रु चरालङ् कृ तधारा ………………… -वेदान्त वचारा।

उत्तरम् — नवरस-रुिचरालङ् कृ ितधारा वेद िवषय-वेद ान्तिवचारा।

हन्द अथ: नौ रस से मनोहर तथा अलङ् कार को धारण करने वाली, वेद- वषय और वेदान्त के वचार से युक्त …

क्य यही पद: रक्त स्थान के तुरन्त बाद एक योजक चह्न (-) छपा है, अथात् वहाँ समास का पूवपद आना है,
स्वतन्त्र पद नह । पे टका म केवल ‘वेद वषय’ ही ऐसा अपूण (प्रा तप दक) रूप है — शेष सब पूरे पद ह।

प्र.7 (छ) वैद्य-व्योम-शास्त्रा द- वहारा ………………… धरायाम्, सुन्दरसुरभाषा।

उत्तरम् — वैद्य -व्योम-शास्त्रािद-िवहारा िवजयते धरायाम्, सुन्दरसुरभाषा।

हन्द अथ: आयुवद, खगोलशास्त्र आ द शास्त्र म वचरण करने वाली सुन्दर दे वभाषा धरती पर वजयी होती है।

क्य यही पद: पूरे रक्तस्थान-अभ्यास म यही एक वाक्य ऐसा है जसम अब तक कोई क्रया नह है — और पे टका
म एकमात्र क्रयापद ‘ वजयते’ है ( व + ज, आत्मनेपद, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन)। इसी लए वही यहाँ बैठता
है।

अभ्यासात् जायते स द्धः — प्रश्नः ८ — पृष्ठ 83–84

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अधो ल खत वकल्पेषु प्रसङ्गानुसारम् अथ चनुत
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अभ्यासात् जायते स द्धः

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ुलम ूषा” इत्यस्य अथः कः ? (i) कठोरभाषा (ii) शोचनीया भाषा (iii) मनोहररूपेण संक लता (iv)
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प्र.8 (क)
सामान्यभाषा

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उत्तरम् — (iii) मनोहररूपेण संक िलता। a

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m अथ दे ते ह —
हन्द अथ: म ुला = मनोहरा (मन को हरने वाली) और म ूषा = पे टका (पेट )। दोन eमलकर
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l शब्द अलग-अलग यही
co म संक लत (सजाई हुई) शब्द क पेट । पुस्तक क शब्दाथ-सारणीaमgदोन
मनोहर .रूप

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अथ दे कर छपे ह।
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co;m(iv) ‘सामान्यभाषा’ कहने से ‘म agl
अन्य वकल्प क्य गलत: (i) ‘कठोरभाषा’ तो ‘म ुला’ का ठ क उल्टा है; (ii) ‘शोचनीया’ का अथ है ‘ ःख के
योग्य’ — पूरे गीत का स्वर प्रशंसा का है, शोक का .नह
em
ुल’ (मनोहर) शब्द का
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agl
अथ ही नकल जाता।

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s e m (iii) पौरा णक-
comसामान्यजनानाम् (iv) छात्राणाम् gla
प्र.8 (ख) सुन्दरसुरभाषा केषां जीवनस्य आशा उच्यते ? (i) केवलं कवीनाम् (ii) बालकानाम्

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l
ag उत्तर
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उत्तरम् — (iii) पौरािणक -सामान्यजनानाम्।.com g l a
em a
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आधारः: ोक २ क पङ् क्त — “पौरा णक-सामान्य-जनानां जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा।” अथात्

co m
.
संस्कृत पुराण-अध्येताओं तथा सामान्य जन के जीवन क आशा है।

se m
om : वकल्प (i) म ‘केवलम्’ शब्द ही उसे गलत बना दे ता है। l a
ोकaमg क व तीन वग गनाता है — मु न, क व
.cध्यातव्यम्
m और सामान्य जन। इस लए ‘केवल क वय क ’ कहना पद्य के भाव के वरुद्ध है। यही इस प्रश्न क असली परीक्षा है।
l a se
ag
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प्र.8 (ग) सुन्दरसुरभाषा कुत्र वजयते ? (i) आकाशे (ii) जलधौ (iii) धरायाम् (iv) पवने

उत्तरम् — (iii) धरायाम्।

आधारः: ोक ४ क अ न्तम पङ् क्त — “ वजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा।” अथात् वह धरती पर वजयी होती
है।

अथ-सङ् केतः: ‘जलधौ’ = समुद्र म, ‘पवने’ = वायु म, ‘आकाशे’ = आकाश म — ये तीन सप्तमी म तो ह, पर पद्य
म इनका कोई उल्लेख नह । क व जान-बूझकर ‘धरा’ कहता है, क्य क उसका आशय है — संस्कृत इसी लोक म,
मनुष्य के बीच जी वत और वजयी है, केवल स्वग क भाषा बनकर नह रह गई।

प्र.8 (घ) सुन्दरसुरभाषायां क ना स्त ? (i) शास्त्र ानम् (ii) संस्कृ तः (iii) वेदान्त चन्तनम् (iv) अशु द्धः

उत्तरम् — (iv) अशुि ः।

तकः: प्रश्न पूछता है — संस्कृतभाषा म क्या नह है ? गीत के अनुसार उसम शास्त्र ान है (वैद्य-व्योम-शास्त्रा द-
वहारा), संस्कृ त है (तव संस्कृ तरेषा) और वेदान्त- चन्तन है (वेद वषय-वेदान्त- वचारा) — तीन वकल्प पद्य म
स्पष्ट मलते ह। शेष बचा अशु द्धः — और वही उत्तर है।

Did you know? संस्कृत को ‘शुद्ध’ भाषा इसी लए कहा जाता है क्य क ‘संस्कृत’ शब्द का अथ ही है — सम् +
कृत = भली-भाँ त संस्का रत, प रष्कृत। पा ण न क अष्टाध्यायी ने उसके हर रूप को नयम से बाँध दया, इस लए
उसम मनमानी या अशु द्ध क जगह नह रहती। पाठ 13 ‘वण ारण- शक्षा’ इसी शु द्ध पर आधा रत है।

प्र.8 (ङ) क वः सुन्दरसुरभाषां केन पदे न सम्बोधय त ? (i) पतः (ii) मातः (iii) ातः (iv) दातः

उत्तरम् — (ii) मातः।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा AglaSem · NCERT Solutions

आधारः: ोक १ क तीसरी पङ् क्त — “अ य मातस्तव पोषणक्षमता”, जसका स न्ध- व े द है मातः + तव।
अतः क व संस्कृतभाषा को ‘मातः’ (हे माता) कहकर पुकारता है।

भावः: ‘माता’ सम्बोधन आक स्मक नह है। उसी पङ् क्त म आगे ‘पोषणक्षमता’ (पालने-पोसने क श क्त) शब्द
आता है — और पालन-पोषण माता का ही काम है। ोक १ के भावाथ म पुस्तक स्वयं कहती है क संस्कृत अनेक
भाषाओं क जननी-भाषा है। इस लए सम्बोधन और अथ, दोन एक-दूसरे को पुष्ट करते ह।

व्याकरण-सङ् केतः: मातः — ‘मातृ’ शब्द का सम्बोधन, एकवचन, स्त्री लङ्ग। यही पद अभ्यास-प्रश्न ४ म उदाहरण
के रूप म दया गया है — मातः = सम्बोधनम्, एकवचनम्।

योग्यता वस्तरः — संस्कृतप्रशस्तयः — पृष्ठ 84
संस्कृतभाषायाः म हमानं वणयन्तः पञ्च ोकाः

योग्यता वस्तरः

प्रश स्तः 1 मातृभू मः सदा सेव्या मातृभाषा तथैव च।
भारतं मातृभू मन मातृभाषा ह संस्कृतम्॥ — अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — मात ृभूिमः सदा सेव्या मात ृभाषा तथा एव च। भारतम् मात ृभूिमः नः मात ृभाषा िह संस्कृ तम्।
अन्वयः — मात ृभूिमः सदा सेव्या, तथा एव च मात ृभाषा (सेव्या)। नः मात ृभूिमः भारतम् (अिस्त), मात ृभाषा िह
संस्कृ तम् (अिस्त)।

अथः ( हन्द ) — मातृभू म क सदा सेवा करनी चा हए, और उसी प्रकार मातृभाषा क भी। हमारी मातृभू म भारत है और
मातृभाषा संस्कृत है।

भावः: ोक भू म और भाषा को एक ही स्तर पर रखता है — जैसे दे श क सेवा कतव्य है, वैसे ही भाषा क सेवा
भी। दूसरी पं क्त ‘मातृभाषा’ को संस्कृत बताती है, क्य क भारत क अ धकांश भाषाएँ संस्कृत से ही नकली ह —
यह वही बात है जो पाठ के ोक १ के भावाथ म ‘जननी-भाषा’ कहकर कही गई है।

व्याकरण-सङ् केतः: सेव्या — ‘सेव्’ धातु + यत् (कृत्य) प्रत्यय, स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन = ‘सेवा करने योग्य’।
मातृभू मन = मातृभू मः + नः ( वसग स न्ध); ‘नः’ = अस्माकम् (हमारी)।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा AglaSem · NCERT Solutions

प्रश स्तः 2 भारतस्य प्र तष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृ तस्तथा।
वहाय संस्कृतं ना स्त संस्कृ तः संस्कृता श्रता॥ — अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — भारतस्य पितष्ठे द्वे संस्कृ तम् संस्कृ ितः तथा। िवहाय संस्कृ तम् न अिस्त संस्कृ ितः संस्कृ त-
आिश्रता।

अन्वयः — भारतस्य द्वे पितष्ठे — संस्कृ तं तथा संस्कृ ितः। संस्कृ तं िवहाय संस्कृ ितः न अिस्त, (यतः सा)
संस्कृ तािश्रता (अिस्त)।

अथः ( हन्द ) — भारत क दो प्र तष्ठाएँ ह — संस्कृत और संस्कृ त। संस्कृत को छोड़कर संस्कृ त नह रहती, क्य क संस्कृ त
संस्कृत के ही आश्रय पर टक है।

भावः: यह ोक पाठ के ोक ३ (‘तव संस्कृ तरेषा’) का ही वस्तार है। क व का तक सीधा है — संस्कृ त भाषा म
जीती है। हमारे संस्कार, कथाएँ, मन्त्र, शास्त्र — सब संस्कृत म लखे ह। भाषा गई तो उन तक पहुँचने का रास्ता ही
बन्द हो जाएगा, इस लए संस्कृ त अपने-आप क्षीण हो जाएगी।

शब्द-क्र डा: ‘संस्कृत’ और ‘संस्कृ त’ — दोन एक ही धातु से बने ह (सम् + कृ = भली-भाँ त करना)। पूरे ोक म
ये दो शब्द बार-बार लौटते ह; समान ध्व न क यह आवृ त्त अनुप्रास तथा यमक जैसा प्रभाव दे ती है और ोक को
कण्ठस्थ करने म सहायक होती है।

प्रश स्तः 3 पुरुषाः संस्कृताः सन्तु म हलाः सन्तु संस्कृताः।
संस्कृतेन वचारेण राष्ट्रं भातु सुसंस्कृतम्॥ — अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — पुरु षाः संस्कृ ताः सन्त ु मिहलाः सन्त ु संस्कृ ताः। संस्कृ ते न िवचारेण रा म् भात ु सुसंस्कृ तम्।
अन्वयः — पुरु षाः संस्कृ ताः सन्त ,ु मिहलाः (अिप) संस्कृ ताः सन्त ।
ु संस्कृ ते न िवचारेण रा ं सुसंस्कृ तं भात ।
ु

अथः ( हन्द ) — पुरुष संस्कारवान् ह , म हलाएँ भी संस्कारवान् ह । संस्कारयुक्त वचार से राष्ट्र सुसंस्कृत होकर शो भत हो।

भावः: यहाँ ‘संस्कृतः’ का अथ केवल ‘संस्कृत जानने वाला’ नह , ब ल्क सुसंस्कृत, प रष्कृत, संस्कारवान् है। ोक
का क्रम ध्यान दे ने योग्य है — पहले व्य क्त (पुरुष और म हला, दोन बराबर), फर राष्ट्र। अथात् राष्ट्र अपने-आप
सुसंस्कृत नह होता; वह तभी होता है जब उसके नाग रक संस्कारवान् ह ।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा AglaSem · NCERT Solutions

व्याकरण-सङ् केतः: सन्तु तथा भातु — दोन लोट् लकार (आ ा/कामना) के प्रथमपुरुष रूप ह; ‘सन्तु’ बहुवचन
(कता ‘पुरुषाः/म हलाः’), ‘भातु’ एकवचन (कता ‘राष्ट्रम्’)। कामना-वाक्य म लोट् लकार ही आता है।

प्रश स्तः 4 संस्कृतं संस्कृतेमूलं ान व ानवा र धः।
वेदतत्त्वाथस ुष्टं लोकालोककरं शवम्॥ — अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — संस्कृ तम् संस्कृ ते ः मूलम् ान-िव ान-वािरिधः। वेद -तत्त्वाथ-सञ्जुष्टम् लोक-आलोककरम्
िशवम्।

अन्वयः — संस्कृ तं संस्कृ ते ः मूलम् (अिस्त), ानिव ानवािरिधः (अिस्त)। (तत्) वेद तत्त्वाथसञ्जुष्टं
लोकालोककरं िशवम् (अिस्त)।

अथः ( हन्द ) — संस्कृत संस्कृ त क जड़ है और ान- व ान का समुद्र है। वह वेद के तत्त्वाथ से भरी हुई, संसार को प्रकाश
दे ने वाली और कल्याणकारी है।

भावः: यह ोक पाठ के चौथे पद्य से सीधे जुड़ता है। वहाँ कहा गया था क संस्कृत वेदान्त, आयुवद और
खगोलशास्त्र — सब म वचरण करती है; यहाँ उसी बात को एक रूपक म बाँध दया गया है — ान व ानवा र धः
= ान और व ान का समुद्र। समुद्र का रूपक इस लए, क्य क उसम गहराई भी है और अनन्त वस्तार भी।

शब्दाथः: वा र धः = वा र (जल) + ध (धारण करने वाला) = समुद्र। स ुष्टम् = भली-भाँ त युक्त। लोकालोककरम्
= लोक + आलोककरम् = संसार को प्रकाश दे ने वाला। शवम् = कल्याणकारी।

प्रश स्तः 5 यावद् भारतवष स्याद् यावद् वन्ध्य हमाचलौ।
यावद् गङ्गा च गोदा च तावदे व ह संस्कृतम्॥ — अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — यावत् भारतवषम् स्यात् यावत् िवन्ध्य-िहमाचलौ। यावत् गङ् गा च गोदा च तावत् एव िह संस्कृ तम्।
अन्वयः — यावत् भारतवष ं स्यात्, यावत् िवन्ध्यिहमाचलौ (स्याताम्), यावत् गङ् गा च गोदा च (स्याताम्), तावत्
एव िह संस्कृ तम् (स्यात्)।

अथः ( हन्द ) — जब तक भारतवष रहेगा, जब तक वन्ध्याचल और हमालय रहगे, जब तक गङ्गा और गोदावरी बहती रहगी —
तब तक संस्कृत भी रहेगी।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 म ुलम ूषा सुन्दरसुरभाषा
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भावः: यह पाँच प्रश स्तय का चरम
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ोक है। क व संस्कृत क आयु को न दय और पवत क आयु से जोड़ दे ता है
— अथात् संस्कृत भारत क भू म जतनी ही स्थायी है। ध्यान द जए क उसने उत्तर का हमालयeऔर
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gl सद्ध होता है क
कo गङ्गा और द क्षण क गोदावरी — दोन दशाओं से एक-एक चुना है। इससे
वन्ध्य, उत्तर.c
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संस्कृतseकसी एक प्रदे श क नह , पूरे भारत क भाषा है।
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व्याकरण-सङ् केतः: यावत् … तावत् — यह नत्य-सम्बन्धी अव्यय-युग्म है (‘जब तक … तब तक’)। स्यात् —

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‘अस्’ धातु, व ध लङ् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन = ‘हो/रहे’। वन्ध्य हमाचलौ — द्वन्द्व समास, द्ववचन ( वन्ध्यः
च हमाचलः च)।
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प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 84
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त्री ण क्रयाकलाप-काया

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प रयोजनाकायम्

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कायम् 1 संस्कृतेन जीवनं कथं समृद्धं भवेत् इ त अ धकृत्य ‘सुन्दरसुरभाषा धरायां वजयते’ इ त संस्कृतना टकया
छात्राः जागरूकाः करणीयाः।
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यह क्या माँगता है: ‘संस्कृत से जीवन कैसे समृद्ध होता है’ — इस वषय पर ‘सुन्दरसुरभाषा धरायां वजयते’ नाम क एक छोट

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संस्कृत ना टका तैयार करके सहपा ठय को जागरूक करना।
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l a se कैसे कर — व ध:

ag 1. पात्र चु नए (5–6): सूत्रधारः, छात्रः, छात्रा, आचायः, वैद्यः (आयुवद), ज्यो तषी/खगोल वद्।

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oस्mकृत म ह; दृश्य ३ — सब मलकर पाठ का गीत गाते ह और l a
2. ढाँचा बनाइए (3 दृश्य): दृश्य १ — छात्र पूछता है “संस्कृतेन क लाभः ?”; दृश्य २ — वैद्य और खगोल वद्
दखाते ह क चरक-सं हता और आयभट .यcसं
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agl— ‘अहं पठा म।’ ‘एतत् शास्त्रं संस्कृते अ स्त।’ ‘संस्कृतं सवत्र वजयते।’
ना टका ‘धरायां वजयते’ पर समाप्त
3. भाषा सरल र खए: छोटे वाक्य

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4. अन्त म पाठ के चार पद्य समवेत स्वर म गाइए — यही ना टका का सबसे प्रभावी भाग होगा।

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नमूना उत्तर (ना टकायाः आरम्भः):
सूत्रधारः — स्वागतम्। अद्य वयं संस्कृत दवसम् आचरामः।
छात्रः — आचाय ! संस्कृतेन अस्माकं जीवनं कथं समृद्धं भव त ?
आचायः — शृणु वत्स ! संस्कृते वेदाः स न्त, आयुवदः अ स्त, ज्यो तःशास्त्रम् अ स्त। एषा भाषा ान व ानवा र धः
अ स्त।
वैद्यः — आम् ! चरकसं हता सुश्रुतसं हता च संस्कृते एव ल खते।
छात्रा — अहो ! त ह संस्कृतं केवलं प्राचीना भाषा ना स्त, अ प तु व ानस्य अ प भाषा अ स्त।
सव (गाय न्त) — वजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा !
( हन्द : सूत्रधार स्वागत करता है; छात्र पूछता है क संस्कृत से जीवन कैसे समृद्ध होता है; आचाय वेद, आयुवद और
ज्यो तष का उदाहरण दे ते ह; वैद्य बताता है क चरक और सुश्रुत क सं हताएँ संस्कृत म ही ह; छात्रा समझती है क
संस्कृत व ान क भी भाषा है; और सब मलकर गीत गाते ह।)

कायम् 2 सरलसंस्कृतगीतानां सङ् ग्रहं कुरुत कक्षायां च गायत। यथा — सुरससुबोधा वश्वमनो ा, मनसा सततं
स्मरणीयम्, मृद प च चन्दनम स्मन् दे शे, इत्याद न।

यह क्या माँगता है: सरल संस्कृत गीत का अपना संग्रह बनाइए और कक्षा म गाइए। पुस्तक ने तीन गीत के नाम स्वयं सुझाए ह।

अच्छे संग्रह म क्या होना चा हए:

प्रत्येक गीत क पूरी पङ् क्तयाँ साफ़ अक्षर म — क ठन शब्द के नीचे अथ।
गीत का वषय (दे शभ क्त, प्रकृ त, भाषा-म हमा, प्राथना) और रच यता, य द ात हो।
गाने क लय/ताल का सङ् केत — कहाँ ठहरना है, कहाँ टे क दोहरानी है।
हर गीत का एक-पं क्त का हन्द भावाथ।

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नमूना उत्तर (सङ् ग्रहस्य प्रथमं पृष्ठम्):

क्रमः गीतम् वषयः भावः ( हन्द )

१ सुर ससुबोधा िवश्वमनो ा -
भाषा मिहमा संस्कृत रसपूण, सरलता से समझ म आने वाली और सारे संसार को
प्रय है

२ मनसा सततं स्मरणीयम् पाथना / मन से नरन्तर स्मरण करने योग्य
स्मरण

३ म ृद िप च चन्दनमिस्मन् दे शे दे शभिक्त इस दे श क तो मट्ट भी चन्दन के समान प वत्र है

४ मञ्जुल मञ्जूषा -
भाषा मिहमा अस्माकं पाठस्य गीतम् — संस्कृत मु न-क वय क सजाई शब्द-
सुन्दरसुर भाषा म ूषा है

गायन-सङ् केतः: हर पद्य के बाद टे क ‘सुन्दरसुरभाषा’ को समवेत स्वर म दोहराइए — इसी से गीत का प्रभाव बनता
है।

कायम् 3 संस्कृतसा हत्ये प्र सद्धानां कवीनां काव्यानां च सङ् ग्रहः करणीयः।

यह क्या माँगता है: संस्कृत सा हत्य के प्र सद्ध क वय और उनक रचनाओं का एक सूची-संग्रह बनाना। पाठ के ोक २ म जन
नाम का उल्लेख है (वेदव्यास, वाल्मी क, का लदास, बाणभट्ट), उन्ह से आरम्भ क जए।

अच्छे संग्रह म क्या होना चा हए: हर प्र व ष्ट म क व का नाम, रचना का नाम, रचना का प्रकार (महाकाव्यम् /
नाटकम् / गद्यकाव्यम् / नी तग्र ः) तथा एक प्र सद्ध पं क्त। केवल नाम गनाना पयाप्त नह — रचना का प्रकार
लखने से सा हत्य का ढाँचा समझ म आता है।

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नमूना उत्तर:

क वः काव्यम् / ग्रन्थः प्रकारः

वाल्मीिकः रामायणम् आ दकाव्यम्

वेद व्यासः महाभारतम् , प ुराणािन इ तहासः / पुराणम्

कािलदासः अिभ ानशाकु न्तल म् , मेघ दू तम्, रघुवंशम्, कु मारस म्भवम् नाटकम् / खण्डकाव्यम् / महाकाव्यम्

बाणभ ः काद म् बरी , हषचिरतम् गद्यकाव्यम्

भासः स्वप्नवासवद त्त म् नाटकम्

भारिवः िकराताजनीयम्
ु महाकाव्यम्

माघः िशश ुपाल वधम् महाकाव्यम्

ृ
भतहिरः नीितशतकम् , शङ
ृ ् गारशतकम्, वैर ाग्यशतकम् शतककाव्यम्

िवष्णश
ु म पञ् चतन्त्र म् कथाग्र ः / नी तग्र ः

जयदे वः गीतगोिवन्द म् गी तकाव्यम्

Try This: संग्रह पूरा करने के बाद हर क व के आगे एक प्र सद्ध पं क्त भी जो ड़ए — जैसे का लदास के लए
‘पुराण मत्येव न साधु सवम्’, भतृह र के लए ‘ वद्या नाम नरस्य रूपम धकम्’। इससे संग्रह केवल सूची न रहकर
पाठ्य-सामग्री बन जाएगा।

अध्याय — एक नज़र म
पाठ का स्वरूप — यह कोई कथा या संवाद-पाठ नह , ब ल्क चार पद्य का गीत है। हर पद्य का अ न्तम शब्द
‘सुन्दरसुरभाषा’ है — यही टे क ( ुवपद) पूरे गीत को बाँधती है। ‘सुरभाषा’ = दे वताओं क भाषा, अथात् संस्कृत।
शीषक का अथ — म ुला = मन को हरने वाली, म ूषा = पेट । इस लए ‘म ुलम ूषा’ का अथ है — मनोहर रूप म
संक लत शब्द क सुन्दर पेट । क व कहता है क यह पेट मु नय ने वक सत क और क वय ने सजाया।
चार पद्य क चार बात — (१) संस्कृत मु न-क वय क सँवारी शब्द-म ूषा है, उसक पोषणक्षमता वणन से परे है; (२) वह
वेदव्यास-वाल्मी क जैसे मु नय , का लदास-बाण जैसे क वय तथा सामान्य जन — सबके जीवन क आशा है; (३) वह कान
को सुख दे ने वाली, सबको आनन्द दे ने वाली, स्मृ त- हतकारी तथा हमारी संस्कृ त है; (४) वह नवरस , अलङ् कार , वेद-वेदान्त-
वचार तथा आयुवद-खगोलशास्त्र स हत धरती पर वजयी है।
माता के रूप म सम्बोधन — पूरा गीत सम्बोधन- वभ क्त म चलता है — अ य मातः !, श्रु तसुख ननदे !, सकलप्रमोदे !,
स्मृ त हतवरदे !, सरस वनोदे !, ग त-म त-प्रेरक-काव्य वशारदे ! इसी लए अभ्यास का प्रश्न २ (ङ) सम्बोधनपद क सूची
माँगता है और प्रश्न ८ (ङ) का उत्तर मातः है।

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व्याकरण का केन्द्र — समासः — ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ पेट बताती है क परस्पर सम्बद्ध साथक पद का एकपद भाव ही
समास है, और उसके छह प्रभेद ह — अव्ययीभावः, तत्पुरुषः, कमधारयः, द्वगुः, द्वन्द्वः, बहु ी हः। पाठ के ही उदाहरण —
सुराणां भाषा = सुरभाषा, पोषणस्य क्षमता = पोषणक्षमता, नवरसैः रु चरा = नवरसरु चरा।
योग्यता वस्तरः — पाठ के अन्त म संस्कृतप्रशस्तयः नाम से पाँच प्र सद्ध ोक दए गए ह, जो संस्कृत को मातृभाषा, भारत
क प्र तष्ठा, संस्कृ त का मूल तथा ान- व ान का समुद्र बताते ह — यावद् भारतवष स्याद् … तावदे व ह संस्कृतम्।

त्व रत पुनरावृ त्त

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH

वक सता िवस्तािरता वक सत क गई Progressively developed

वल सता रिञ्जता आनन्द दे ने वाली That which gives joy

म ुला मनोहरा मन को हरने वाली Lovely / Charming

म ूषा पेिटका पेट Box / Encasement

पोषणक्षमता पालनशिक्तः पोषण क क्षमता Nurturing capacity

अतीता अितक्रान्ता पार हो Beyond

वचनातीता वणनातीता वाणी से परे Beyond words

भू यष्ठानाम् अिधकतराणाम् अ धकांश Mostly

श्रु तसुख ननदे ! श्रवणसुखध्विनदाित्र ! कण प्रय ध्व न दे ने वाली ! Sound of which is pleasant to listen

सकलप्रमोदे ! सवभ्यः आनन्दमिय ! सभी को आनन्द दे ने वाली That which gives pleasure to all

सरस वनोदे सरसिवनोदशीले मधुर वनोद करने वाली That which creates pleasant humour

काव्य वशारदे ! काव्यपारङ् गते काव्य करने म पारंगत Oh! Proficient in Literature

रु चरा रुिचकरा आनन्द प्रदान करने वाली That which gives happiness

अलङ् कृ तधारा अलङ् काराणाम् आधात्री अलंकार को धारण करने वाली Well ornamented

व्योमशास्त्रम् अन्तिरक्षशास्त्रम् अन्त रक्ष व ान Astronomy

धरायाम् पिृ थव्याम् धरती पर On earth

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 8
TypeSolution
Pages39
Updated19 Sep 2026