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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा8
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 10: स म े वरं त्यागः (क-भागः)
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
111 – 123 14 57 हन्द
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 10 स न्न मत्ते वरं त्यागः (क-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 8 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 10: स न्न मत्ते वरं त्यागः (क-भागः)
NCERT कक्षा 8 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के दशमः पाठः — स न्न मत्ते वरं त्यागः (क-भागः) का सम्पूण हल। यह पाठ ‘ हतोपदे शः’
कथाग्रन्थ से लया गया गद्य-नाट्यात्मक कथाभाग है। शोभावती नगरी के राजा शूद्रक क सेवा म नयुक्त कतव्य नष्ठ राजपुत्र वीरवर आधी रात के
करुण क्रन्दन का अनुसरण करता है और राजलक्ष्मी से जान लेता है क राजा को बचाने का एक ही, अत्यन्त दुःसाध्य उपाय है। नीचे पृष्ठ 111 से 123
तक के पाठगत (संवादगत) प्रश्न, ‘वयं शब्दाथान् जानीमः’, ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ (वाक्यान्वयः तथा भूतकालः), अभ्यासात् जायते स द्धः के प्रश्न
१–७ का प्रत्येक उपभाग, योग्यता वस्तरः (तीन ोक तथा ‘जीमूतवाहनस्य कथा’) और प रयोजनाकायम् क्रमशः हल कए गए ह — पहले संस्कृत
उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 8) 111 – 123
खं ड प्रश्न
14 57
माध्यम
हन्द
पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 112
राजसभायां रा ः शूद्रकस्य, वीरवरस्य, म न्त्रणश्च संवादः
पाठः
प्र.1 राजा — “ क ते वतनम् ?” (पृष्ठ 112)
उत्तरम् — वीरवरः — “पितिदनं सुवणशतचत ष्ु टयं दे व !”
हन्द अथ: राजा पूछते ह — “तुम्हारा वेतन ( कतना) है?” वीरवर उत्तर दे ता है — “हे दे व! प्र त दन चार सौ
स्वणमुद्राएँ।” सुवणशतचतुष्टयम् = सुवण-शत × चतुष्टय = सौ स्वणमुद्राओं का चौगुना = 400 स्वणमुद्राएँ।
व्याकरण-सङ् केतः: ते — युष्मद् शब्द का षष्ठी एकवचन का लघु (अनुदात्त) रूप = ‘तव’ (तुम्हारा)। वतनम् —
नपुंसक लङ्ग, प्रथमा एकवचन; इसी का पयाय ‘वेतनम्’ पाठ म आगे आता है (वेतनापणेन, वेतना थनः)।
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प्र.2 राजा — “का ते सामग्री ?” (पृष्ठ 112)
उत्तरम् — वीरवरः — “इमौ बाहू, एष खड् गश्च।”
हन्द अथ: राजा पूछते ह — “तुम्हारे पास (काम क ) सामग्री क्या है?” वीरवर कहता है — “ये दो भुजाएँ और यह
तलवार।” वह न सेना गनाता है, न धन — केवल अपना पुरुषाथ और अपना शस्त्र। यही उत्तर पूरे पाठ म उसके
च रत्र क कुंजी है।
व्याकरण-सङ् केतः: इमौ बाहू — प्रथमा द्ववचन (पुं लङ्ग), क्य क भुजाएँ दो ह; ‘इदम्’ सवनाम का वचन
‘इमौ’। एष खड् गश्च = एषः + खड् गः + च ( वसग-स न्ध से ‘एष खड् गश्च’); प्रथमा एकवचन, पुं लङ्ग।
प्र.3 मन्त्री — (तदालोक्य) “दे व ! दनचतुष्टयस्य वेतनापणेन प्रथमं परीक्ष्यतां स्वरूपमस्य वेतना थनो राजपुत्रस्य,
कमुपपन्नमेतत् वेतनं न वे त।” — मन्त्री कम् उपायं सूचय त ?
उत्तरम् — मन्त्री सूच यित यत् चत णु ं िदनानां वेत नं द त्त् वा पथमम् अस्य वेत नािथ नः राजपुत्रस्य स्वरूपं परीक्ष्यताम्
— एतत् वेत नम् उपपन्नम् अिस्त न वा इित ायताम्।
राजा ने पहले ‘नैतच्छक्यम्’ (यह सम्भव नह ) कहकर मना कर दया था और वीरवर प्रणाम करके सभा से नकल गया था। तभी
मन्त्री यह बीच का माग सुझाते ह — चार दन का वेतन दे कर पहले परीक्षा ले ली जए। म न्त्रय के इसी वचन से राजा ने ताम्बूल
दे कर वीरवर को नयुक्त कया — “अथ म न्त्रणां वचनात् ताम्बूलदानेन नयो जतोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरप तना।”
हन्द अथ: “हे दे व! चार दन का वेतन दे कर पहले इस वेतन चाहने वाले राजपुत्र का स्वरूप परख ली जए क यह
वेतन उ चत है या नह ।” — अथात् व्य क्त को उसक माँग से नह , उसके काम से आँका जाए।
ध्यातव्यम्: पाठ म यह वाक्य ‘प्रथमं परीक्ष्यतां’ रूप म छपा है, जब क अभ्यास-प्रश्न ३ (ग) म वही वाक्य ‘प्रथमम्
अवगम्यतां’ रूप म छपा है। दोन का अथ एक ही है — ‘पहले परख लया जाए / समझ लया जाए’। दोन लोट् -
लकार, कमवाच्य, प्रथमपुरुष एकवचन के रूप ह।
पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 113–114
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अधरात्रौ रा ः, वीरवरस्य राजलक्ष्म्याश्च संवादः
पाठः
प्र.4 राजा — “कोऽत्र द्वा र तष्ठ त ?” (पृष्ठ 113)
उत्तरम् — वीरवरः — “सेवको वीरवरोऽ त्र ािर वत्तते दे व !”
हन्द अथ: राजा (आधी रात को) पूछते ह — “यहाँ ार पर कौन खड़ा है?” वीरवर उत्तर दे ता है — “हे दे व!
आपका सेवक वीरवर यहाँ ार पर है।” कृष्ण-चतुदशी क आधी रात म भी वह ार छोड़कर नह गया — क्य क
‘यदा राजा स्वयमा दश त तदा या त स्वगृहम्’ (राजा जब स्वयं आ ा द, तभी वह घर जाता है)।
व्याकरण-सङ् केतः: कोऽत्र = कः + अत्र ( वसग-स न्ध)। वीरवरोऽत्र = वीरवरः + अत्र। ा र — ‘ ार’ शब्द का
सप्तमी एकवचन (आधार अथ म) = ‘ ार पर’।
प्र.5 वीरवरः — “का त्वमम्ब ! कमथ वलप स ?” (पृष्ठ 113)
उत्तरम् — सा स्त्री रा ः शूद क स्य राजलक्ष्मीः आसीत्। सा अवदत् — “वत्स ! अहमेत स्य भूपालस्य शूद क स्य
राजलक्ष्मीरिस्म। … साम्पतं त ु दे व्या अपराधेन ाद्य पभ ृित त ृत ीये िदवसे राजा पञ् च त् वं यास्यित , तदाहमनाथा
भिवष्यािम। तिददानी ं नात्र स्थास्यामीित क्र न्दािम।”
हन्द अथ: वीरवर पूछता है — “हे माता! आप कौन ह? कस लए वलाप कर रही ह?” वह उत्तर दे ती है —
“वत्स! म इस राजा शूद्रक क राजलक्ष्मी हूँ। बहुत समय से इसक भुजाओं क छाया म बड़े सुख से रहती हूँ। कन्तु
अब दे वी के अपराध के कारण आज से तीसरे दन राजा मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा, तब म अनाथ हो जाऊँगी। इस लए
अब यहाँ नह रहूँगी — यही सोचकर रो रही हूँ।”
व्याकरण-सङ् केतः: का त्वमम्ब = का + त्वम् + अम्ब; ‘अम्ब’ सम्बोधन एकवचन (हे माता!)। पञ्चत्वं यास्य त —
मुहावरा; ‘पञ्चत्वं गम्/या’ = पाँच महाभूत म मल जाना, अथात् मरना। वलप स, क्रन्दा म — लट् -लकार,
मध्यमपुरुष / उत्तमपुरुष एकवचन।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 10 स न्न मत्ते वरं त्यागः (क-भागः)
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वीरवरः — (तदाकण्य प्र णपत्य) “भगव त ! अस्त्यत्र क श्चदुपायो येन भगवत्याः पुन रह चरवासो भव त, सु चरं
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जीव त च स्वामी ?” (पृष्ठ 114)
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उत्तरम् — राजलक्ष्मीः — “अिस्त वत्स ! एकै वात्र पवृित्तः, सा चातीव दुःसाध्या।”
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agे पूछता है — “हे भगव त! क्या यहाँ कोई ऐसा उपाय है जससे आपका
हन्द अथ: वीरवर यह सुनकर प्रणाम करक
फर से यहाँ चरकाल तक नवास हो और स्वामी द घकाल तक जी वत रह?” राजलक्ष्मी कहती है — “है, वत्स! यहाँ
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एक ही आचरण (उपाय) है, और वह अत्यन्त क ठन है।”
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.c केतः: भगव त — भगवती (स्त्री लङ्ग) का सम्बोधन एकवचन। भगवत्याः a g — षष्ठी एकवचन
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व्याकरण-सङ्
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(आपका)। एकैवात्र = एका + एव + अत्र (वृ द्ध-स न्ध से ‘एकैव’)। प्र णपत्य, तदाक य — ल्यप्-प्रत्ययान्त अव्यय
(प्रणाम करके, वह सुनकर)।
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प्र.7 agl ! कथय, कः सः उपायः दुःसाध्यः ?” (पृष्ठ 114)
वीरवरः — (साष्टाङ्गं नमस्कृत्य) “अम्ब
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उmत्त.रम् a g न भगव यै सवमङ् गलायै
c — राजल मीः — “ ूयतां पु ! यिद वया व य सवतः िपयं व त ु सहासवदने
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क्ष् श्र त्र त् स् स् स् त्
उपहारः िक्र येत , तदा पुन ज िवष्यित राजा शूद को वष णां शतम्, अहञ् च सुखेन िनवत्स्यािम।”
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asतक फर जी वत रहेगा और म भी सुखपूवक (यहाँ) नवास करूँगी।” —
हन्द अथ: “सुनो पुत्र! य द तुम अपनी सबसे प्रय वस्तु को हँसते हुए मुख से भगवती सवमङ्गला को उपहार-रूप
म अ पत कर दो, तो राजा शूद्रक सौlवष
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a इसी से पाठ का शीषक बनता है: स न्न मत्ते वरं त्यागः (अच्छे न मत्त के लए
यही वह ‘दुःसाध्य’ उपाय है, और
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त्याग ही ेष्ठ है)।
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m गताऽदृश्यतां तत्सम्मुखात्।)’। आगे वीरवर क्या करता है — यह एकादश पाठ ‘स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः)’
ध्यातव्यम्: यह कहकर राजलक्ष्मी उसी क्षण उसके सामने से अदृश्य हो गई — ‘(ततः सा तत्क्षणादे व
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म है।
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व्याकरण-सङ् केतः: क्रयेत — व ध लङ् , कमवाच्य, प्रथमपुरुष एकवचन ( कया जाए)। इसी लए कता ‘त्वया’
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तृतीया म है। भगवत्यै सवमङ्गलायै — चतुथ एकवचन (सम्प्रदान — जसके लए उपहार दया जाए)।
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वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 114–116
शब्दाथ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्त ः
शब्दाथाः
प्र.8 मातृभाषया अथ लखत — (सारण्यां प्रदत्तानां पदानाम् अ न्तमः स्त ः रक्तः अ स्त; तत्र स्वमातृभाषया अथः
लेखनीयः।)
यह स्तम्भ अपनी मातृभाषा म भरना है ( हन्द , मराठ , बांग्ला, त मल… जो भी आपक हो)। नीचे हन्द -माध्यम के वद्या थय के
लए पूरी सारणी द गई है — पहले पुस्तक का संस्कृत-पयाय, फर हन्द अथ।
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) मातृभाषया ( हन्द ) अथः
महीप तः भूपालः राजा
महापराक्रमी अितबलशाली बहुत बलवान्
नानाशास्त्र वत् अनेके षां शास्त्राणां ाता अनेक शास्त्र ों का ाता
पूतच रत्रः पिवत्रं चिरत्रं यस्य पिवत्र चिर त्र वाला
प्र तवस त स्म अवसत् रहता था
वृत्त्यथम् आजीिवकां पाप्तुम ् आजीिवका पाने के िलए
समायाताः आगतवन्तः आए
प्र तहारम् ारपालम् ारपाल को
दौवा रकः ारपालकः ारपाल
वतनम् वेतनम् वेतन
उपपन्नम् उपयुक्तम् / युिक्तयुक्तम् उपयुक्त / उिचत
सुवणशतचतुष्टयम् चतुश्शतसंख्यकाः स्वणमुद ाः चार सौ स्वणमुद ाएँ
नगतः बिहः गतवान् बाहर चला गया
आलोक्य दृ ष्ट् वा दे खकर
नयो जतः से वायां िनयुक्तः िनयुक्त
धृतायुधः शस्त्रयुक्तः शस्त्र धारण िकए हएु
अह नशम् िदवसः राित्रः च िदन-रात
करुणरोदनध्व नम् करुणाजनकं रोदनध्विनम् क रुणाजनक क्रन्दन-ध्विन
व्य चन्तयत् अिचन्तयत् सोचा
सू चभेद्ये गहने सघन
त मरे अन्धकारे अन्धकार में
पृष्ठतः पष्ृ ठभागात् पीछे से
नरूपया म पश्यािम दे खता हू ँ
खड् गपा णः खड् ग वान् जनः खड् ग धारी
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रोदनपरा रोदनं कु वती रोती हुई
वलप स रोदनं करोिष रो रही हो
क्रन्दा म रोदनं करोिम रो रही हू ँ
साष्टाङ्गं नमस्कृत्य अष्टिभः अङ् गैः सह पणामं कृ त्वा आठों अंग ों सिहत पणाम करके
प्रत्युवाच उत्तरं दत्तवती उ त्त र िदया
पञ्चत्वम् म ृत्युम ् म ृत्यु को
अनाथा स्वािमनं िवना स्वामी के िबना
प्रवृ त्तः आचरणम् आचरण
सु चरम् दीघकालं यावत् दीघ काल तक
दुःसाध्या कािठन्येन अनुपालनीया किठनाई से पालन करने योग्य
सहासवदनेन हास्य-युक्त-मुखेन हँस ते हुए मुख से
नवत्स्या म वासं किरष्यािम रहूग
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तत्क्षणादे व तत्कालम् उसी क्षण
ध्यान द जए: ‘उपपन्नम्’ सारणी म दो बार आया है — एक बार ‘उपयुक्तम्’ (Appropriate) और एक बार
‘यु क्तयुक्तम्’ (Suitable) अथ म। दोन जगह भाव एक ही है — ‘जो ठ क बैठे’। इसी तरह ‘ वलप स / क्रन्दा म
/ रोदनपरा’ — तीन एक ही धातु-भाव (रोना) के अलग-अलग रूप ह: क्रमशः मध्यमपुरुष एकवचन, उत्तमपुरुष
एकवचन और स्त्री लङ्ग वशेषण (प्रथमा एकवचन)।
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 116–117
व्याकरण-पे टका — १. वाक्यान्वयः · २. भूतकालः
व्याकरणम्
प्र.9 १. वाक्यान्वयः — संस्कृतभाषायाः ‘मुक्तः पद वन्यासक्रमः’ इ त कम् ? पाठात् उदाहरणद्वयं दत्त्वा स्पष्टीकुरुत।
उत्तरम् — संस्कृ तभाषायाः अने क वैिशष्ट ेष ु अन्यतमः अिस्त मुक्तः पदिवन्यास मः — त ाम वाक्ये कत ृ-कम-
क्र न्न
िक्र यािदपदािन वयं स्वेच् छया िभ न्निभ न्नक्र मेण िनयोजियत ुं शक्न मु ः।
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तद्यथा (पे टकायाः उदाहरणम्) —
रामः वनम् अगच्छत्।
अगच्छत् रामः वनम्।
वनम् अगच्छत् रामः।
तीन वाक्य शुद्ध ह और तीन का अथ एक ही है — ‘राम वन को गया’। कारण यह है क संस्कृत म सम्बन्ध पद के ान से नह ,
वभ क्त से तय होता है — ‘रामः’ प्रथमा है इस लए वही कता रहेगा, चाहे वह वाक्य म कह भी बैठे; ‘वनम्’ तीया है इस लए
वही कम रहेगा।
पाठात् उदाहरणे (पुस्तके प्रदत्ते) —
सामान्यः वाक्यक्रमः (पाठे ) सा हत्ये वाक्यक्रमः
शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्। आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी।
तदविशष्टं भोज्यिवलासव्ययाथं पत्न्याः हस्ते िनिक्षपित च। िनिक्षपित च तदविशष्टं भोज्यिवलास व्ययाथ ं पत्न्याः हस्ते।
ऐसा क्य होता है: सा हत्य म लेखक क्रया या कम को आगे रखकर रस, लय और बल उत्पन्न करता है —
‘आसीत् शोभावती…’ से कथा का ‘था एक नगरी…’ वाला वातावरण तुरन्त बन जाता है। इसी लए पुस्तक का नदश
है — “पाठकः पदानां वभ क्तं सम्यक् आलोच्य तेषाम् अन्वयं कुयात्।” (पाठक पद क वभ क्त ठ क से दे खकर
उनका अन्वय करे।)
Try This: पाठ का वाक्य ‘अथ म न्त्रणां वचनात् ताम्बूलदानेन नयो जतोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरप तना।’
ली जए और इसका सामान्य क्रम बनाइए — ‘अथ नरप तना म न्त्रणां वचनात् असौ राजपुत्रः वीरवरः ताम्बूलदानेन
नयो जतः।’ ध्यान द जए, कता ‘नरप तना’ तृतीया म है क्य क वाक्य कमवाच्य म है।
प्र.10 २. भूतकालः — भूतकालस्य भावः संस्कृते क त प्रकारैः प्रकट्यते ? अस्मात् पाठात् उदाहरणा न दत्त्वा लखत।
उत्तरम् — कालस्य पायः त्रयः भे द ाः सिन्त — वत मानकालः, भूत कालः, भिवष्यत्-कालः। एते ष ु भूत कालः
‘अतीतस्य कालस्य’ वाचकं पदम् अिस्त। सामान्यतः भूत कालाय लङ् -लकारस्य पयोगः भवित।
पाठ के अनुसार भूतकाल चार प्रकार से प्रकट होता है —
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प्रकारः नयमः अ स्मन् पाठे उदाहरणम्
mके आगे ‘अ’ और लङ् के पत्यय as e
१. लङ् -
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धातु
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उपाग च्छत् (उप + अग च्छत्), अनयत्, व्यिचन्तयत्
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लकारः (िव + अिचन्तयत्
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a२.gलट्l + ‘स्म’ वतमानकािलक िक्रया-पद के साथ ‘स्म’ जोड़ने पर अथ भूतकाल पितवसित स्म (= अवसत्, ‘रहता था’)
का हो जाता है
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३. क्तवतु-
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ृ च्य में रहती है
धातु + क्तवतु; वाक्य की संर चना कतवा श्रत ृ ोत्, ‘सुना’)
ु वान् (= अशण ag
प्रत्ययः
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४. क्त-प्रत्ययः
aृ च्य, कमवाच्य तथा भाववाच्य
धातु + क्त; इसके पयोग में वाक्य कतवा िनग तः, िनयोिजतः, आलोिकता
— तीनों में हो सकता है
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अन्तर सम झए: ‘ ुतवान्’ (क्तवतु) म कता ही प्रथमा म रहता है — सः राजा ुतवान् करुणरोदनध्व न कञ्चन
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gl इस लए कता ‘नरप तना’ तृतीया वभ क्त म और क्रया- वशेषण ‘ नयो जतः’ कम (राजपुत्रः) के अनुसार पुं लङ्ग
(कतृ वाच्य, ‘राजा ने सुना’)। कन्तु ‘ नयो जतः’ (क्त) कमवाच्य म है — नयो जतोऽसौ राजपुत्रो नरप तना,
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प्रथमा एकवचन म है। ‘आलो कता’ स्त्री लङ्ग है क्य क कम ‘का चत् सुन्दरी’ स्त्री लङ्ग है।
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पुस्तक का सङ् केत: “कतृ-कम-भाव-वाच्यानां वषये अ ग्रमपाठस्य अवधेयांशे द्रष्टव्यम्।” — अथात् वाच्य-
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प रवतन का पूरा ववेचन एकादश पाठ (ख-भागः) क ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ पे टका म है।
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m स द्धः — पृष्ठ 118 as e
coजायते
अभ्यासात्
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agl अभ्यासः
प्रश्नः १ : पाठम् आधृत्य उदाहरणानुगुणं लखत ‘आम्’ अथवा ‘न’
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प्र.11 (क) क वीरवरः राजपुत्रः आसीत् ?
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उत्तरम् — आम् (हाँ)
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a s emपाठे प्रमाणम् — “अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यथ कस्माद प देशाद् राज ारमुपागच्छत्।”
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हन्द : हाँ, वीरवर राजपुत्र था। वह कसी दूसरे दे श से आजी वका के लए शोभावती के राज ार पर आया था।
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उसके साथ पत्नी वेदरता, पुत्र श क्तधर और कन्या वीरवती भी आए थे।
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प्र.12 (ख) “ क ते वतनम्” ? इ त क शूद्रकः अपृच्छत् ?
उत्तरम् — आम् (हाँ)
पाठे प्रमाणम् — “राजा — क ते वतनम् ?” — यह प्रश्न राजा शूद्रक ने ही पूछा था, और वीरवर ने उत्तर दया — “प्र त दनं
सुवणशतचतुष्टयं दे व !”
हन्द : हाँ, ‘तुम्हारा वेतन क्या है?’ यह शूद्रक ने ही पूछा। ध्यान रहे — पाठ म केवल ‘राजा’ लखा है, और उस नगरी
का राजा शूद्रक ही है।
प्र.13 (ग) क वीरवरं रा ः समीपे दौवा रकः अनयत् ?
उत्तरम् — आम् (हाँ)
पाठे प्रमाणम् — “(ततो दौवा रकः तं प्रभोः समीपम् अनयत्।)”
हन्द : हाँ, वीरवर के कहने पर ारपाल ही उसे स्वामी (राजा) के पास ले गया। वीरवर ने उससे कहा था — “भोः
प्र तहार! वृत्त्यथमागतो राजपुत्रोऽ स्म, तस्मान्नय मां स्वा मनः समीपम्।”
व्याकरण-सङ् केतः: अनयत् — ‘नी’ धातु, लङ् -लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन = ‘ले गया’। प्र तहारः और
दौवा रकः दोन का अथ ‘ ारपाल’ ही है।
प्र.14 (घ) क राजा शूद्रकः राजपुत्रं वीरवरं साक्षात् दृष्ट् वा एव वृ त्तम् अयच्छत् ?
उत्तरम् — न (नही ं)
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 10 स न्न मत्ते वरं त्यागः (क-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
पाठे प्रमाणम् — पहले तो राजा ने साफ़ मना कर दया — “नैतच्छक्यम् !” (यह सम्भव नह ) — और वीरवर प्रणाम करके सभा
से नकल गया। बाद म म न्त्रय क सलाह पर ही नयु क्त हुई — “अथ म न्त्रणां वचनात् ताम्बूलदानेन नयो जतोऽसौ राजपुत्रो
वीरवरो नरप तना।”
हन्द : नह । राजा ने वीरवर को सामने दे खते ही वृ त्त (नौकरी) नह द । चार सौ स्वणमुद्रा प्र त दन का वेतन सुनकर
उसने इनकार कया। म न्त्रय ने सुझाया क चार दन का वेतन दे कर पहले परीक्षा ली जाए — तभी ताम्बूल दे कर
उसे नयुक्त कया गया।
Tip: उस युग म ताम्बूल-दान नयु क्त या स्वीकृ त का औपचा रक चह्न था — जैसे आज नयु क्त-पत्र दे ना।
प्र.15 (ङ) क वीरवरः स्ववेतनस्य चतुथ भागम् एव पत्न्यै यच्छ त स्म ?
उत्तरम् — आम् (हाँ)
पाठे प्रमाणम् — “स च राजपुत्रः प्र त दनं प्रभाते राजदशनादनन्तरं स्ववेतनस्य यच्छ त दे वेभ्यः अधम्। तस्य चाद्ध द रद्रे भ्यो
ददा त, न क्षप त च तदव शष्टं भोज्य वलासव्ययाथ पत्न्याः हस्ते।”
गणना —
कु ल वेत न = 1
दे वेभ्यः = 1/2
शेष = 1 − 1/2 = 1/2; तस्य अध ं दिरदे भ्यः = 1/2 × 1/2 = 1/4
अविशष्टं पत्न्यै = 1 − 1/2 − 1/4 = 1/4 (चत थ
ु ः भागः)
हन्द : हाँ। वेतन का आधा दे वताओं को, बचे हुए आधे का आधा (यानी कुल का चौथाई) द रद्र को, और जो शेष
बचा — कुल का चौथाई भाग — वही भोजन तथा अन्य ख़च के लए पत्नी के हाथ म दे ता था। यही वीरवर क
त्यागवृ त्त है, जो पाठ के शीषक ‘स न्न मत्ते वरं त्यागः’ क भू मका बनाती है।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 10 स न्न मत्ते वरं त्यागः (क-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
प्र.16 (च) क करुण-रोदन-ध्व न राजा ुतवान् ?
उत्तरम् — आम् (हाँ)
पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा कृष्णचतुदश्यामधरात्रे स राजा ुतवान् करुणरोदनध्व न कञ्चन।”
हन्द : हाँ। कृष्णपक्ष क चतुदशी क आधी रात को राजा ने कसी करुण क्रन्दन क ध्व न सुनी। उसी को सुनकर
उसने पूछा — ‘कोऽत्र ा र तष्ठ त?’ और फर वीरवर को आदे श दया — ‘क्रन्दनमनुसर राजपुत्र!’
व्याकरण-सङ् केतः: ुतवान् = ु + क्तवतु — भूतका लक कतृवाच्य रूप, पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन (‘सुना’)। यही
उदाहरण ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ म भी दया गया है।
प्र.17 (छ) क करुणरोदनध्व नः दवसे ुतः आसीत् ?
उत्तरम् — न (नही ं)
पाठे प्रमाणम् — “अथैकदा कृष्णचतुदश्यामधरात्रे स राजा ुतवान् करुणरोदनध्व न कञ्चन।”
हन्द : नह , वह ध्व न दन म नह , कृष्ण-चतुदशी क आधी रात म सुनी गई थी। इसी कारण अन्धकार भी इतना
घना था क राजा ने स्वयं कहा — ‘सू चभेद्ये त मरेऽ स्मन्’ (इस सुई से भी न भदने वाले अन्धकार म)।
ध्यातव्यम्: कृष्णचतुदश्यामधरात्रे = कृष्णचतुदश्याम् + अधरात्रे — दोन पद सप्तमी एकवचन म ह, क्य क यहाँ
काल का आधार बताया जा रहा है।
प्र.18 (ज) क राजलक्ष्म्या उक्तः उपायः अतीव दुःसाध्यः आसीत् ?
उत्तरम् — आम् (हाँ)
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पाठे प्रमाणम् — “अ स्त वत्स ! एकैवात्र प्रवृ त्तः, सा चातीव दुःसाध्या।”
हन्द : हाँ। राजलक्ष्मी ने स्वयं कहा क उपाय एक ही है और वह अत्यन्त क ठन है — अपनी सबसे प्रय वस्तु को
हँसते मुख से भगवती सवमङ्गला को अ पत करना। क ठनाई केवल त्याग म नह , ‘सहासवदनेन’ (मुस्कुराते हुए)
त्याग करने म है — दुःख के साथ कया गया त्याग स ा त्याग नह माना गया।
प्र.19 (झ) क भगवती सवमङ्गला उपायं संसूच्य शीघ्रमेव अदृश्या अभवत् ?
उत्तरम् — न (नही ं)
पाठे प्रमाणम् — उपाय बताकर अदृश्य होने वाली राजलक्ष्मी थी, भगवती सवमङ्गला नह — “(ततः सा तत्क्षणादे व गताऽदृश्यतां
तत्सम्मुखात्।)”
हन्द : नह । भगवती सवमङ्गला तो वह दे वी ह जन्ह प्रय वस्तु का उपहार दे ना है — वे कथा म प्रकट ही नह
होत । वीरवर से बात करने वाली और उपाय बताकर उसी क्षण अदृश्य हो जाने वाली राजलक्ष्मी है, जो स्वयं को
‘एतस्य भूपालस्य शूद्रकस्य राजलक्ष्मीर स्म’ कहकर प रचय दे ती है।
Check it yourself: पृष्ठ 114 का वाक्य फर प ढ़ए — ‘य द त्वया… भगवत्यै सवमङ्गलायै उपहारः क्रयेत’।
यहाँ ‘सवमङ्गलायै’ चतुथ वभ क्त म है, अथात् वे सम्प्रदान ह — बोलने वाली नह ।
अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 118–119
प्रश्नः २ : अधो ल खतान् प्रश्नान् पूणवाक्येन उत्तरत
अभ्यासः
प्र.20 (क) शूद्रकः क दृशः राजा आसीत् ?
उत्तरम् — शूद कः महापरा मी नानाशास्त्रिवत् पूत चिरत्रः च महीपितः आसीत्।
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हन्द अथ: शूद्रक बहुत पराक्रमी, अनेक शास्त्र का ाता और प वत्र च रत्र वाला राजा था। पाठ क पहली ही पं क्त
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यह तीन गुण एक साथ गनाती है — “तत्र शूद्रको नाम महापराक्रमी नानाशास्त्र वत् पूतच रत्रःeमहीप
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प्र तवस त स्म।”
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aglव्याकरण-सङ् केतः: तीन पद महीप तः के वशेषण ह, इस लए तीन पुं लङ्ग, प्रथमा वभ क्त, एकवचन म ह।
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‘क दृशः’ का उत्तर सदा वशेषण से दया जाता है।
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(ख) वीरवरः कस्य समीपं गन्तुम् इच्छ त स्म ?
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a gl उत्तरम् — वीरवरः वािमनः (रा ः शूदक य) समीपं ग तमु ् इ छित म।
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हन्द अथ: वीरवर स्वामी अथात् राजा शूद्रक के पास जाना चाहता था। उसने ारपाल से कहा — “भोः प्र तहार !
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वृत्त्यथमागतो राजपुत्रोऽ स्म, तस्मान्नय मां स्वा मनः समीपम्।” (इस लए मुझे स्वामी के पास ले चलो।)
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व्याकरण-सङ् केतः: प्रश्न म ‘कस्य’ षष्ठी है, इस लए उत्तर भी षष्ठी म ही आएगा — ‘स्वा मनः / रा ः शूद्रकस्य’।
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इच्छ त स्म — लट् + स्म = भूतकाल (‘चाहता था’)।
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ag (ग) रा ः शूद्रकस्य ‘का ते सामग्री ?’ इ त प्रश्नस्य उत्तरं वीरवरः कम् अयच्छत् ?
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उत्तरम् — वीरवरः अवदत् — “इमौ बाहू, एष खड् ग च।” इित। श्
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हन्द अथ: वीरवर ने उत्तर दया — “ये दो भुजाएँ और यह तलवार (ही मेरी सामग्री है)।” अथात् उसके पास न
g द्रा माँगने वाला व्य क्त जब यह
.cसेना थी, न सम्प त्त — केवल अपना बाहुबल और अपना शस्त्र। चार सौaस्वणमु
se m उत्तर दे ता है, तभी राजा च ककर कहता है — ‘नैतच्छक्यम्!’
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Did you know? ‘सामग्री’ का यहाँ अथ है — काय करने के साधन। वीरवर का उत्तर बताता है क वह अपने
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वेतन को अपनी क्षमता से जोड़कर दे ख mता है, दखावे से नह । आगे क कथा म वही दो भुजाएँ और तलवार राजा
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तथा राष्ट्र को बचाती ह।
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प्र.23 (घ) वीरवरः स्वगृहं कदा गच्छ त स्म ?
उत्तरम् — यदा राजा स्वयम् आिदशित स्म, तदा एव वीरवरः स्वगृहं गच् छित स्म।
पाठे प्रमाणम् — “धृतायुधः सः राज ारमह नशं सेवते। यदा राजा स्वयमा दश त तदा या त स्वगृहम्।”
हन्द अथ: वह शस्त्र धारण कए दन-रात राज ार क सेवा करता था; घर तभी जाता था जब राजा स्वयं आ ा दे ते
थे। यही कारण है क आधी रात को भी, जब राजा ने पूछा ‘कोऽत्र ा र तष्ठ त?’, तो उत्तर मला — ‘सेवको
वीरवरोऽत्र ा र वत्तते दे व!’
व्याकरण-सङ् केतः: ‘यदा… तदा…’ नत्य-सम्बन्धी अव्यय-युग्म है — एक के बना दूसरा अधूरा। उत्तर म भी यही
जोड़ा रखना चा हए।
प्र.24 (ङ) वीरवरः स्ववेतनस्य अध केभ्यः यच्छ त स्म ?
उत्तरम् — वीरवरः स्ववेत न स्य अध ं दे वेभ्यः यच् छित स्म।
पाठे प्रमाणम् — “स च राजपुत्रः प्र त दनं प्रभाते राजदशनादनन्तरं स्ववेतनस्य यच्छ त दे वेभ्यः अधम्।”
हन्द अथ: वह प्र त दन सवेरे राजा के दशन के बाद अपने वेतन का आधा भाग दे वताओं को (दे व-काय म) दे ता था।
शेष का आधा द रद्र को और जो बचता, वह पत्नी के हाथ म रख दे ता था।
व्याकरण-सङ् केतः: प्रश्न म ‘केभ्यः’ चतुथ बहुवचन है ( कनके लए?), इस लए उत्तर भी चतुथ बहुवचन म —
‘दे वेभ्यः’। ‘दा’ धातु के साथ जसे दया जाए वह सम्प्रदान होकर चतुथ लेता है।
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प्र.25 (च) राजलक्ष्मीः कुत्र सुखेन अवसत् ?
उत्तरम् — राजलक्ष्मीः रा ः शूद क स्य भुजच् छायायां सुमहता सुखेन अवसत्।
पाठे प्रमाणम् — “ चरमेतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन नवसा म।”
हन्द अथ: राजलक्ष्मी राजा शूद्रक क भुजाओं क छाया म बहुत बड़े सुख से चरकाल तक रहती थी।
‘भुजच्छाया’ का अथ है — बाहुबल का संरक्षण; अथात् राजा के पराक्रम से सुर क्षत होकर राज्य क लक्ष्मी (समृ द्ध)
वहाँ टक हुई थी।
अलङ् कारः: यहाँ रूपक है — राज्य क समृ द्ध को स्त्री-रूप म ‘राजलक्ष्मी’ कहा गया, और राजा के बाहुबल को
‘छाया’। भाव यह है क जहाँ रक्षा है, वह लक्ष्मी टकती है।
व्याकरण-सङ् केतः: ‘भुजच्छायायाम्’ — स्त्री लङ्ग, सप्तमी एकवचन (आधार); ‘कुत्र’ का उत्तर सप्तमी म ही
मलता है।
प्र.26 (छ) राजलक्ष्म्याः दुःखस्य कारणं ुत्वा बद्धाञ्ज लः वीरवरः कम् अवदत् ?
उत्तरम् — वीरवरः अवदत् — “भगवित ! अस्त्यत्र किश्चदुपायो येन भगवत्याः पुन िरह िचरवासो भवित , सुिचरं
जीवित च स्वामी ?” इित।
हन्द अथ: राजलक्ष्मी के दुःख का कारण सुनकर वीरवर ने प्रणाम करके कहा — “हे भगव त! क्या कोई ऐसा
उपाय है जससे आपका फर यहाँ चरकाल तक नवास हो जाए और स्वामी (राजा) द घकाल तक जी वत रह?”
च रत्र-सङ् केतः: ध्यान द जए — वीरवर ने अपने वेतन, अपने घर या अपनी नौकरी क चन्ता नह क । उसका
पहला प्रश्न ही स्वामी के जीवन और राज्य क लक्ष्मी के लए है। यही ‘स्वा मभ क्तः राष्ट्राय समपणभावः च’ है,
जसे पाठ क प्रस्तावना ‘प्रेरणाहः’ कहती है।
अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 119
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प्रश्नः ३ : उदाहरणानुसारं नम्न ल खता न वाक्या न अन्वयरूपेण लखत
अभ्यासः
प्र.27 (क) आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी।
अन्वयः — शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्।
हन्द अथ: शोभावती नाम क कोई नगरी थी।
क्य यही क्रम: सामान्य (गद्य) अन्वय म क्रम होता है — कता → वशेषण → क्रया। यहाँ कता ‘नगरी’ (प्रथमा
एकवचन, स्त्री लङ्ग) है, ‘शोभावती नाम’ तथा ‘काचन’ उसके वशेषण, और ‘आसीत्’ (लङ् , प्रथमपुरुष एकवचन)
क्रया। पाठ म क्रया को आगे रखकर कथा-शैली का सौन्दय उत्पन्न कया गया है — यही ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का
पहला उदाहरण भी है।
प्र.28 (ख) प्र त दनं सुवणशतचतुष्टयं दे व !
अन्वयः — दे व ! (मम वत नम्) पितिदनं सुवणशतचत ष्ु टयम् (अिस्त )।
हन्द अथ: हे दे व! (मेरा वेतन) प्र त दन चार सौ स्वणमुद्राएँ (है)।
क्य यही क्रम: संवाद म सम्बोधन-पद ‘दे व!’ प्रायः अन्त म रख दया जाता है, पर अन्वय म उसे सबसे पहले लाया
जाता है। साथ ही यह वाक्य पछले प्रश्न ‘ क ते वतनम्?’ का उत्तर है, इस लए अन्वय म लुप्त कता ‘मम वतनम्’ तथा
लुप्त क्रया ‘अ स्त’ कोष्ठक म जोड़ना उ चत है।
प्र.29 (ग) दे व ! दनचतुष्टयस्य वेतनापणेन प्रथममवगम्यतां स्वरूपमस्य वेतना थनो राजपुत्रस्य, कमुपपन्नमेतत् वेतनं न
वे त।
अन्वयः — दे व ! िदनचत ष्ु टयस्य वेत नापणेन अस्य वेत नािथ नः राजपुत्रस्य स्वरूपं पथमम् अवगम्यताम्, एतत्
वेत नम् उपपन्नं िकम्, न वा — इित।
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हन्द अथ: हे दे व! चार दन का वेतन दे कर पहले इस वेतन चाहने वाले राजपुत्र का स्वरूप समझ लया जाए (परख
लया जाए) क यह वेतन उ चत है या नह ।
क्य यही क्रम: ‘स्वरूपम्’ (कम) के साथ उसका षष्ठी-सम्बन्धी पद ‘अस्य वेतना थनो राजपुत्रस्य’ जुड़ा है, इस लए
अन्वय म दोन पास-पास रखे गए। ‘अवगम्यताम्’ लोट् -लकार, कमवाच्य है, इस लए वह अन्त म आता है।
ध्यातव्यम्: पाठ (पृष्ठ 112) म यही वाक्य ‘प्रथमं परीक्ष्यतां’ रूप म छपा है और अभ्यास म ‘प्रथमम् अवगम्यताम्’।
अथ म कोई अन्तर नह — ‘परखा जाए / समझ लया जाए’। परीक्षा म अभ्यास-प्रश्न म दया गया रूप ही ल खए।
प्र.30 (घ) क्रन्दनमनुसर राजपुत्र !
अन्वयः — राजपुत्र ! क्र न्दनम् अन स
ु र।
हन्द अथ: हे राजपुत्र! (उस) क्रन्दन का अनुसरण करो (उस रोने क आवाज़ के पीछे जाओ)।
क्य यही क्रम: सम्बोधन ‘राजपुत्र!’ पहले, फर कम ‘क्रन्दनम्’ ( तीया एकवचन), फर क्रया ‘अनुसर’ (लोट् -
लकार, मध्यमपुरुष एकवचन) — यही सामान्य वाक्यक्रम है।
स : क्रन्दनमनुसर = क्रन्दनम् + अनुसर (म्-स न्ध / अनुस्वार का पुनः ‘म्’ हो जाना)।
प्र.31 (ङ) अथ म न्त्रणां वचनात् ताम्बूलदानेन नयो जतोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरप तना।
अन्वयः — अथ नरपितना मिन्त्रणां वचनात् असौ राजपुत्रः वीरवरः ताम्बूलदाने न िनयोिजतः।
हन्द अथ: इसके बाद म न्त्रय के कहने से राजा ने ताम्बूल दे कर उस राजपुत्र वीरवर को (सेवा म) नयुक्त कर
लया।
क्य यही क्रम: यह वाक्य कमवाच्य म है — इसी लए कता ‘नरप तना’ तृतीया म है और क्रया-पद ‘ नयो जतः’
कम (राजपुत्रः वीरवरः) के अनुसार पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन म। अन्वय म कता (तृतीया) पहले, कम बीच म, क्रया
अन्त म रखी जाती है।
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(च) नैष गन्तुमह त राजपुत्र एकाक सू चभेद्ये त मरेऽ स्मन्।
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अन्वयः — एषः राजपुत्रः एकाकी अिस्मन् सूिचभे द्ये ितिमरे गन्त ुं न अहित।
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हन्द अथ: यह राजपुत्र इस सुई से भी न भेदे जा सकने वाले (अत्यन्त सघन) अन्धकार म अकेला जाने योग्य नह
है।
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क्य यही क्रम: ‘एषः’ और ‘एकाक ’ दोन ‘राजपुत्रः’ के वशेषण ह, इस लए उसी के साथ रखे गए। ‘अ स्मन्
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सू चभेद्ये त मरे’ तीन सप्तमी एकवचन म ह (आधार), अतः एक समूह म। अन्त म ‘गन्तुं न अह त’ — तुमुन्नन्त +
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क्रया।
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a gl स : नैष = न + एष (वृ द्ध-स न्ध); त मरेऽ स्मन् = त मरे + अ स्मन् (पूवरूप-स न्ध)। यह राजा का स्वगत कथन
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है — अथात् वह मन-ही-मन कहता है।
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(छ) भगव त ! अस्त्यत्र क श्चदुपायो येन भगवत्याः पुन रह चरवासो भव त, सु चरं जीव त च स्वामी ?
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mन्वयः — भगवित ! अत्र किश्चत् उपायः अिस्त, येन भगवत्याः पुनः इह िचरवासः भवित, स्वामी च सुिचरं जीवित
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हन्द अथ: हे भगव त! क्या यहाँ कोई ऐसा उपाय है, जससे आपका फर से यहाँ चरकाल तक नवास हो और
स्वामी द घकाल तक जी वत रह?
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क्य यही क्रम: मूल वाक्य क्रया ‘अ स्त’ से आरम्भ होता है (सा ह त्यक क्रम); अन्वय म कता ‘क श्चत् उपायः’ पहले
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और क्रया ‘अ स्त’ बाद म रखी जाती है। ‘येन’ से आरम्भ होने वाला वाक्यांश उपवाक्य है, इस लए उसका क्रम m
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भीतर-ही-भीतर सुधारा गया — ‘स्वामी च सु चरं जीव त’।
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प्र.34 (ज) तदा पुनज वष्य त राजा शूद्रको वषाणां शतम्।
अन्वयः — तदा राजा शूद कः वष णां शतं पुन ः जीिवष्यित।
हन्द अथ: तब राजा शूद्रक सौ वष तक फर से जी वत रहेगा।
क्य यही क्रम: ‘तदा’ (अव्यय) पहले, कता ‘राजा शूद्रकः’ (प्रथमा एकवचन), फर कालवाचक ‘वषाणां शतम्’,
अन्त म क्रया ‘पुनः जी वष्य त’ (लृट्-लकार = भ वष्यत्काल, प्रथमपुरुष एकवचन)।
व्याकरण-सङ् केतः: वषाणाम् — नपुंसक लङ्ग, षष्ठी बहुवचन; ‘वषाणां शतम्’ = वष का सौ, अथात् सौ वष।
अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 120
प्रश्नः ४ : उदाहरणानुगुणं पाठगता न पदा न अ धकृत्य रक्त ाना न पूरयत (स - वच्छे दः)
अभ्यासः
प्र.35 यथा — अथैकदा = अथ + एकदा — एवमेव अधो ल खतानां पदानां रक्त ाना न पूरयत — वृत्त्यथम्,
कस्माद प, कोऽ प, राजपुत्रोऽ स्म, यथेष्टम्, वेतनापणेन, तदालोक्य, ततोऽसौ, वत्तना थनो, तदव शष्टं,
राजदशनादनन्तरं, वे त, राजलक्ष्मीरुवाच, चाद्ध, ब हनगरादालो कता, का प, प्रत्युवाच, राजलक्ष्मीर स्म,
ास्यामी त, भुजच्छायायां, अस्त्यत्र, क श्चदुपायो।
पुस्तक म जो ान रक्त छोड़े गए ह, वे नीचे नारङ्ग रंग वाले खाने म भरे गए ह।
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स पदम् = वच्छे दः स ेः नाम
अथैकदा (यथा) = अथ + एकदा वृ द्ध-स न्धः (अ + ए = ऐ)
वृत्त्यथम् = वृित्त + अथम् यण्-स न्धः (इ + अ = य्)
कस्माद प = क स्मात् + अिप जश्त्व-स न्धः (त् + अ = द्)
कोऽ प = कः + अिप वसग(पूवरूप)-स न्धः
राजपुत्रोऽ स्म = राजपुत्र ः + अिस्म वसग(पूवरूप)-स न्धः
यथेष्टम् = यथा + इष्टम् गुण-स न्धः (आ + इ = ए)
वेतनापणेन = वेतन + अपणेन द घ-स न्धः (अ + अ = आ)
तदालोक्य = तत् + आलोक्य जश्त्व-स न्धः (त् + आ = द्)
ततोऽसौ = ततः + असौ वसग(पूवरूप)-स न्धः
वत्तना थनो = वत्त न + अिथनः द घ-स न्धः (अ + अ = आ)
तदव शष्टं = तत् + अविशष्टम् जश्त्व-स न्धः (त् + अ = द्)
राजदशनादनन्तरं = राजदशनात् + अनन्तरम् जश्त्व-स न्धः
वे त = वा + इित गुण-स न्धः (आ + इ = ए)
राजलक्ष्मीरुवाच = राजल क्ष्म ीः + उवाच वसग-स न्धः (◌ः + उ = र्)
चाद्ध = च + अध म् द घ-स न्धः (अ + अ = आ)
ब हनगरादालो कता = बिहः + नगरात् + आलोिकता वसग-स न्धः (◌ः + न् = र्) तथा जश्त्व-स न्धः
का प = का + अिप द घ-स न्धः (आ + अ = आ)
प्रत्युवाच = पित + उवाच यण्-स न्धः (इ + उ = य्)
राजलक्ष्मीर स्म = राजल क्ष्म ीः + अिस्म वसग-स न्धः (◌ः + अ = र्)
ास्यामी त = स्थास्यािम + इित द घ-स न्धः (इ + इ = ई)
भुजच्छायायां = भुज + छायायाम् छत्व(तुक्-आगम)-स न्धः
अस्त्यत्र = अिस्त + अत्र यण्-स न्धः (इ + अ = य्)
क श्चदुपायो = किश्चत् + उपायः जश्त्व-स न्धः (त् + उ = द्)
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तीन काम क पहचान:
① वसग के बाद ‘अ’ हो तो वसग और ‘अ’ मलकर ‘ओऽ’ बनते ह — कः + अ प = कोऽ प, ततः + असौ =
ततोऽसौ।
② वसग के बाद स्वर (अ को छोड़कर) या मृदु व्यञ्जन हो तो वसग ‘र्’ बन जाता है — राजलक्ष्मीः + उवाच =
राजलक्ष्मीरुवाच, ब हः + नगरात् = ब हनगरात्।
③ ‘त्’ के बाद स्वर हो तो ‘त्’ का ‘द्’ हो जाता है (जश्त्व) — तत् + आलोक्य = तदालोक्य, क श्चत् + उपायः =
क श्चदुपायः।
ध्यातव्यम्: ‘चाद्ध’ पाठ म ‘ तस्य चाद्ध द रद्रे भ्यो ददा त’ के रूप म आया है = च + अधम् (‘और आधा’)। तथा
‘वत्तना थनो’ का पूरा वच्छे द ‘वत्तन + अ थनः’ है; पाठ म यही शब्द ‘वेतना थनो’ (वेतन + अ थनः) रूप म भी
मलता है — दोन का अथ ‘वेतन चाहने वाले का’ ही है।
अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 121
प्रश्नः ५ : अधो ल खतेषु वाक्येषु रक्तवण यपदा न केभ्यः प्रयुक्ता न इ त उदाहरणानुगुणं लखत
अभ्यासः
प्र.36 यथा — अहं भवतः सेवायां नयो जतः। — रा े ॥ (क) ततः असौ तद्रोदनस्वरानुसरणक्रमेण प्रच लतः।
उत्तरम् — वीरवराय
क्य : यह वाक्य राजा के मुख से नह , कथावाचक के मुख से है — “(ततोऽसौ तद्रोदनस्वरम् अनुसरन् प्रच लतः।)”
— अथात् वह (वीरवर) उस रोने के स्वर का अनुसरण करता हुआ चल पड़ा। राजा क आ ा ‘क्रन्दनमनुसर
राजपुत्र!’ पाकर जाने वाला वीरवर ही है, इस लए ‘असौ’ वीरवर के लए प्रयुक्त है।
हन्द अथ: वह (वीरवर) उस क्रन्दन-स्वर के पीछे -पीछे चल पड़ा।
ध्यान द जए: उत्तर चतुथ वभ क्त म लखा जाता है (‘ कसके लए प्रयुक्त हुआ?’) — जैसे उदाहरण म ‘भवतः’
का उत्तर ‘रा े’ है, वैसे ही यहाँ ‘वीरवराय’।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 10 स न्न मत्ते वरं त्यागः (क-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
प्र.37 (ख) तत् अहम् अ प गच्छा म पृष्ठतोऽस्य।
उत्तरम् — रा े शूद काय
क्य : यह राजा शूद्रक का स्वगत कथन है — “(स्वगतम्) नैष गन्तुमह त राजपुत्र एकाक सू चभेद्ये त मरेऽ स्मन्।
तस्मात् अहम प गच्छा म पृष्ठतोऽस्य, नरूपया म च कमेत द त।” अतः ‘अहम्’ राजा के लए प्रयुक्त है।
हन्द अथ: इस लए म भी इसके पीछे -पीछे जाता हूँ और दे खता हूँ क यह क्या है।
कथा-सङ् केतः: इसी वाक्य से कथा का मोड़ बनता है — राजा स्वयं खड् ग लेकर पीछे -पीछे जाता है, इस लए आगे
(ख-भागः म) वीरवर क सारी बात वह अपने कान से सुनता है।
प्र.38 (ग) चरम् एतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन नवसा म।
उत्तरम् — रा े शूद काय
क्य : यह वाक्य राजलक्ष्मी कहती है, और ठ क पछले वाक्य म वह बता चुक है — “अहम् एतस्य भूपालस्य
शूद्रकस्य राजलक्ष्मीर स्म।” अतः ‘एतस्य’ राजा शूद्रक के लए ही आया है।
हन्द अथ: म चरकाल से इसक (राजा शूद्रक क ) भुजाओं क छाया म बड़े सुख से रहती हूँ।
प्र.39 (घ) सा चातीव दुःसाध्या।
उत्तरम् — पवृत्त् यै (उपायाय)
क्य : पूरा वाक्य है — “अ स्त वत्स ! एकैवात्र प्रवृ त्तः, सा चातीव दुःसाध्या।” अथात् ‘सा’ ठ क पहले आए
‘प्रवृ त्तः’ (आचरण/उपाय) के लए प्रयुक्त है, कसी व्य क्त के लए नह ।
हन्द अथ: और वह (उपाय) अत्यन्त क ठन है।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 10 स न्न मत्ते वरं त्यागः (क-भागः)
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व्याकरण-सङ् केतः: ‘प्रवृ त्तः’ स्त्री लङ्ग है, इसी लए सवनाम ‘सा’ और वशेषण ‘दुःसाध्या’ — दोन स्त्री लङ्ग प्रथमा
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एकवचन म ह। लङ्ग-मेल से ही पता चल जाता है क ‘सा’ कसके लए है।
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प्र.40 (ङ) क ते वतनम् ?
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उत्तरम् — वीरवराय
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क्य : यह राजा का प्रश्न है और वह वीरवर से पूछ रहा है, इस लए ‘ते’ (= तव, तुम्हारा) वीरवर के लए प्रयुक्त है।
a s emभी वीरवर ही दे ता है — ‘प्र त दनं सुवणशतचतुष्टयं दे व!’
gl हन्द अथ: तुम्हारा वेतन क्या है?
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व्याकरण-सङ् केतः: ‘ते’ युष्मद् शब्द के षष्ठी एकवचन (तव) तथा चतुथ एकवचन (तुभ्यम्) — दोन का लघु रूप
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है। यहाँ ‘वतनम्’ के साथ सम्बन्ध है, इस लए षष्ठी का अथ ‘तुम्हारा’ लया जाएगा।
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अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 121
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प्रश्नः ६ : अधो ल खता न वाक्या न प ठत्वा तेन सम्बद्धं ोकं पाठात् चत्वा लखत
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अभ्यासः
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(क) राजलक्ष्मीः वद त यत् य द वीरवरः स्वस्य सव प्रयं वस्तु त्यज त तदा सा पुनः शूद्रकस्य समीपे ास्य त।
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पाठात् सम्बद्ध ः अंशः — “श्र ूयतां पुत्र ! यिद त्वया स्वस्य सवतः िपयं वस्त ु सहासवदने न भगव
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se यािम।”
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उपहारः ि येत , तदा पुन ज िव यित राजा शूद को वष णां शतम्, अह च सुखेन िनव
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हन्द अथ: “सुनो पुत्र! य द तुम अपनी सबसे प्रय वस्तु हँसते हुए मुख से भगवती सवमङ्गला को उपहार-रूप म
अ पत कर दो, तो राजा शूद्रक सौ वष तक फर जी वत रहेगा और म भी सुखपूवक (यहाँ) रहूँगी।”
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ध्यातव्यम्: प्रश्न म ‘ ोकं’ शब्द छपा है, कन्तु यह पाठ (क-भागः) पूणतः गद्य-नाट्यात्मक है — इसम कोई
ोक नह है। अतः यहाँ ‘पाठ से सम्बद्ध गद्यांश’ ही चुनकर लखना अपे क्षत है। परीक्षा म वही मूल वाक्य उद्धत
क जए जो ऊपर दया गया है।
प्र.42 (ख) राजा शूद्रकः प्रथमं वीरवरस्य वृत्त्यथ प्राथनां न स्वीकरो त।
पाठात् सम्बद्ध ः अंशः — “राजा — नै त च् छक्यम् !” (तत् श्र त्ु वा वीरवरः राजानं पणम्य राजसभातः िनगतः।)
हन्द अथ: राजा ने कहा — “यह सम्भव नह !” यह सुनकर वीरवर राजा को प्रणाम करके राजसभा से बाहर चला
गया। प्र त दन चार सौ स्वणमुद्रा का वेतन राजा को अत्य धक लगा, इस लए उसने पहली बार म प्राथना स्वीकार नह
क।
च रत्र-सङ् केतः: ध्यान द जए, इनकार सुनकर भी वीरवर न झगड़ता है, न गड़ गड़ाता है — ‘राजानं प्रणम्य
नगतः’, प्रणाम करके चला जाता है। यह शालीनता ही म न्त्रय का ध्यान ख चती है।
स : नैतच्छक्यम् = न + एतत् + शक्यम्।
प्र.43 (ग) एकदा कोऽ प वीरवरः नाम राजपुत्रः वृ त्त प्राप्तुं रा ः शूद्रकस्य समीपं गच्छ त।
पाठात् सम्बद्ध ः अंशः — “अथै क दा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त् यथ ं क स्मादिप दे शाद् राज ारमुपागच् छत्। ते न सह
वेद रता नाम त स्य पत् नी, शिक्तधरो नाम सुत ः, वीरवती नाम क न्या च समायाताः।”
हन्द अथ: एक बार वीरवर नाम का राजपुत्र आजी वका के लए कसी दूसरे दे श से (शोभावती के) राज ार पर
आया। उसके साथ उसक पत्नी वेदरता, पुत्र श क्तधर और पुत्री वीरवती भी आए।
Tip: यही वाक्य प्रश्न ७ के उदाहरण (यथा) म पदच्छे द के लए भी लया गया है — ‘अथ एकदा वीरवरनामा
राजपुत्रः वृत्त्यथ कस्मात् अ प दे शात् राज ारम् उपागच्छत्।’
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प्र.44 (घ) सः तस्य कतव्य नष्ठां साक्षात् पश्य त।
पाठात् सम्बद्ध ः अंशः — “राजा — (स्वगतम्) नै ष गन्त मु हित राजपुत्र एकाकी सूिचभे द्ये ितिमरेऽ िस्मन्। त स्मात्
अहमिप गच् छािम पृष्ठतोऽ स्य, िन रूपयािम च िकमेत िदित। (ततो नरपितः खड् गपािणः त स्य अन स
ु रणक्र मेण बिहः
िनरगच् छत् नगरी ारात्।)”
हन्द अथ: राजा ने मन-ही-मन सोचा — “इस सघन अन्धकार म यह राजपुत्र अकेला जाने योग्य नह है। इस लए म
भी इसके पीछे जाता हूँ और दे खता हूँ क बात क्या है।” — फर राजा हाथ म तलवार लए उसके पीछे -पीछे नगर के
ार से बाहर नकल गया। इसी प्रकार वह वीरवर क कतव्य नष्ठा को अपनी आँख से दे खता है।
पूरक अंश: कतव्य नष्ठा का मूल वणन इससे पहले आ चुका है — “धृतायुधः सः राजद्वारमह नशं सेवते। यदा
राजा स्वयमा दश त तदा या त स्वगृहम्।” (शस्त्र धारण कए वह दन-रात राज ार क सेवा करता है; राजा क
आ ा मलने पर ही घर जाता है।)
प्र.45 (ङ) राजा म न्त्रणां मन्त्रणया वीरवराय वृ त्त यच्छ त।
पाठात् सम्बद्ध ः अंशः — “मन्त्री — (तदालोक्य) दे व ! िदनचत ष्ु टयस्य वेत नापणेन पथमं परीक्ष्यतां स्वरूपमस्य
वेत नािथ नो राजपुत्रस्य, िकमुपपन्नमेत त् वेत नं न वेित। अथ मिन्त्रणां वचनात् ताम्बूलदाने न िनयोिजतोऽसौ
राजपुत्रो वीरवरो नरपितना।”
हन्द अथ: मन्त्री ने यह दे खकर कहा — “हे दे व! चार दन का वेतन दे कर पहले इस वेतनाथ राजपुत्र का स्वरूप
परख ली जए क यह वेतन उ चत है या नह ।” इसके बाद म न्त्रय के कहने से राजा ने ताम्बूल दे कर उस राजपुत्र
वीरवर को नयुक्त कर लया।
अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 122
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प्रश्नः ७ : अधो ल खतानां वाक्यानां पदच्छे दं कुरुत
अभ्यासः
प्र.46 (क) वृत्त्यथमागतो राजपुत्रोऽ स्म।
पद च् छे द ः — वृित्त + अथ म् + आगतः + राजपुत्रः + अिस्म।
लेखनीयं रूपम् — वृत्त् यथ म् आगतः राजपुत्रः अिस्म।
हन्द अथ: म आजी वका के लए आया हुआ राजपुत्र हूँ।
स याँ: वृत्त्यथम् = वृ त्त + अथम् (यण्); ‐अथमागतो = अथम् + आगतः; आगतो राजपुत्रोऽ स्म — ‘आगतः’ का
वसग ‘र’ के पहले ‘ओ’ हुआ, तथा राजपुत्रः + अ स्म = राजपुत्रोऽ स्म (पूवरूप-स न्ध)।
प्र.47 (ख) अथैकदा कृष्णचतुदश्यामधरात्रे स राजा ुतवान् करुणरोदनध्व न कञ्चन।
पद च् छे द ः — अथ + एकदा + कृ ष्णचत दु श्याम् + अधरात्रे + सः + राजा + श्र तु वान् + क रु णरोदन ध्विनम् +
क ञ् चन।
लेखनीयं रूपम् — अथ एकदा कृ ष्णचतुद श्याम् अधरात्रे सः राजा श्र तु वान् क रु णरोदन ध्विनं क ञ् चन।
हन्द अथ: इसके बाद एक बार कृष्णपक्ष क चतुदशी क आधी रात को उस राजा ने कोई करुण क्रन्दन-ध्व न सुनी।
स याँ: अथैकदा = अथ + एकदा (वृ द्ध); कृष्णचतुदश्यामधरात्रे = कृष्णचतुदश्याम् + अधरात्रे।
व्याकरण-सङ् केतः: ‘कृष्णचतुदश्याम्’ तथा ‘अधरात्रे’ दोन सप्तमी एकवचन — काला धकरण। ‘ ुतवान्’ क्तवतु-
प्रत्ययान्त भूतका लक कतृवाच्य रूप।
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प्र.48 (ग) तदहम प गच्छा म पृष्ठतोऽस्य नरूपया म च कमेत द त।
पद च् छे द ः — तत् + अहम् + अिप + गच् छािम + पृष्ठतः + अस्य + िन रूपयािम + च + िकम् + एतत् + इित।
लेखनीयं रूपम् — तत् अहम् अिप गच् छािम पृष्ठतः अस्य, िन रूपयािम च िकम् एतत् इित।
हन्द अथ: इस लए म भी इसके पीछे -पीछे जाता हूँ और दे खता हूँ क यह क्या (माजरा) है।
स याँ: तदहम प = तत् + अहम् + अ प (जश्त्व); पृष्ठतोऽस्य = पृष्ठतः + अस्य (पूवरूप); कमेत द त = कम् +
एतत् + इ त।
प्र.49 (घ) अस्त्यत्र क श्चदुपायो येन भगवत्याः पुन रह चरवासो भव त।
पद च् छे द ः — अिस्त + अत्र + किश्चत् + उपायः + येन + भगवत्याः + पुन ः + इह + िचरवासः + भवित।
लेखनीयं रूपम् — अिस्त अत्र किश्चत् उपायः येन भगवत्याः पुन ः इह िचरवासः भवित।
हन्द अथ: क्या यहाँ कोई ऐसा उपाय है जससे आपका फर यहाँ चरकाल तक नवास हो जाए?
स याँ: अस्त्यत्र = अ स्त + अत्र (यण्); क श्चदुपायो = क श्चत् + उपायः (जश्त्व); पुन रह = पुनः + इह ( वसग →
र्); ‘ चरवासो भव त’ म चरवासः + भव त ( वसग → ओ)।
प्र.50 (ङ) एकैवात्र प्रवृ त्तः सा चातीव दुःसाध्या।
पद च् छे द ः — एका + एव + अत्र + पवृित्तः + सा + च + अतीव + दुःसाध्या।
लेखनीयं रूपम् — एका एव अत्र पवृित्तः, सा च अतीव दुःसाध्या।
हन्द अथ: यहाँ एक ही उपाय (आचरण) है, और वह अत्यन्त क ठन है।
स याँ: एकैव = एका + एव (वृ द्ध-स न्ध, आ + ए = ऐ); एकैवात्र = एकैव + अत्र (द घ); चातीव = च + अतीव
(द घ)।
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व्याकरण-सङ् केतः: ‘एका’, ‘सा’, ‘दुःसाध्या’ — तीन स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन ह, क्य क ये सब ‘प्रवृ त्तः’
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(स्त्री लङ्ग) से जुड़े ह।
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योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 122
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प्रश्नः १ : पाठस्य भावानुगुणम् अत्र केचन ोकाः प्रदत्ताः स न्त। एतान् पठत
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योग्यता वस्तरः
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प्र.51 कुवन्नेवेह कमा ण जजी वषेच्छतं समाः। एवं त्व य नान्यथेतोऽ स्त न कम लप्यते नरे॥ (यजुवदः ४०.२)
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a पद च् छे द ः — कु वन् + एव + इह + कम िण + िजजीिवषेत ् + शतम् + समाः। एवम् + त्विय + न + अन्यथा + इतः
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+ अिस्त + न + कम + िलप्यते + नरे।
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अन्वयः — इह कमा ण कुवन् एव शतं समाः जजी वषेत्। एवं (स त) त्व य नरे कम न लप्यते; इतः अन्यथा (मागः) न अ स्त।
अथः — इस संसार म कम करते हुए ही सौ वष जीने क इच्छा करनी चा हए। ऐसा करने पर तुझ मनुष्य म कम का लेप (बन्धन)
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नह लगता। इससे भन्न कोई दूसरा माग नह है।
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m ोक कहता है क जीवन क लम्बाई क कामना कम से भागकर नहa,sकम e करते हुए करनी
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.c जो व्य क्त अपना कतव्य ईमानदारी से करता रहता है, कम उसे बाँधताaनहg । वीरवर इसी का जी वत
भावः — यह
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aseउदाहरण है — वह ‘धृतायुधः अह नशं’ राज ार क सेवा करता है, वेतन का बड़ा भाग दे वताओं और द रद्र को दे
चा हए।
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दे ता है, और आधी रात के आदे श पर भी बना प्रश्न कए चल पड़ता है।
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शब्द-सङ् केतः: समाः = वषा ण (वष), तीया बहुवचन। जजी वषेत् = जी वतुम् इच्छे त् — ‘जीव्’ धातु का सन्नन्त
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रूप, व ध लङ् , प्रथमपुरुष एकवचन। लप्यते — कमवाच्य लट् , ‘ लप्’ धातु ( चपकना, लपटना)।
स : कुवन्नेवेह = कुवन् + एव + इह; जजी वषेच्छतं = जजी वषेत् + शतम्; नान्यथेतोऽ स्त = न + अन्यथा + इतः
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+ अ स्त।
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प्र.52 यथा छायातपौ नत्यं सुसंबद्धौ परस्परम्। एवं कम च कता च सं ष्टा वतरेतरम्॥ (पञ्चतन्त्रम्)
पद च् छे द ः — यथा + छाया-आतपौ + िन त्यम् + सुसंबद्ध ौ + परस्परम्। एवम् + कम + च + कत + च +
संिश्लष्टौ + इतरेत रम्।
अन्वयः — यथा छायातपौ नत्यं परस्परं सुसंबद्धौ (स्तः), एवं कम च कता च इतरेतरं सं ष्टौ (स्तः)।
अथः — जैसे छाया और धूप सदा एक-दूसरे से भली प्रकार जुड़े हुए ह, वैसे ही कम और कता भी परस्पर गुँथे हुए ह।
भावः — कता अपने कम से अलग नह हो सकता। जो कम हम करते ह, वही हमारी पहचान बनकर हमारे साथ
चलता है — जैसे धूप हो तो छाया अवश्य होगी। इसी लए कम चुनते समय सावधान रहना चा हए: वीरवर ने जो
कतव्य-कम चुना, वही उसका यश बन गया।
अलङ् कारः — उपमा। ‘यथा… एवम्’ यही उपमा का वाचक है; उपमेय = कम और कता, उपमान = छाया और
धूप, साधारण धम = परस्पर सुसम्बद्ध होना।
व्याकरण-सङ् केतः: ‘छायातपौ’, ‘सुसंबद्धौ’, ‘सं ष्टौ’ — सब द्ववचन म, क्य क दोन जोड़े दो-दो वस्तुओं के
ह। ‘छायातपौ’ द्वन्द्व समास है (छाया च आतपः च)।
प्र.53 काय कम ण नवृत्ते यो बहून्य प साधयेत्। पूवकाया वरोधेन स काय कतुमह त॥ (वाल्मी क-रामायणम्)
पद च् छे द ः — काय + कमिण + िनवृत्ते + यः + बहूिन + अिप + साधयेत ्। पूव-काय-अिवरोधेन + सः + कायम् +
कत म्ु + अहित।
अन्वयः — यः काय कम ण नवृत्ते (स त) पूवकाया वरोधेन बहू न अ प (काया ण) साधयेत्, सः काय कतुम् अह त।
अथः — जो व्य क्त हाथ म लया हुआ काय पूरा हो जाने पर, पहले कए गए काय म बाधा डाले बना और भी अनेक काय सद्ध
कर सके — वही काय करने योग्य (स ा कायकता) है।
भावः — यह ोक कायकुशलता क प रभाषा दे ता है — एक काम अधूरा छोड़कर दूसरा उठा लेना कुशलता नह ;
कुशलता है क्रम — पहला पूरा करो, उसम बाधा न पड़े ऐसे दूसरा उठाओ। वीरवर यही करता है: पहले वह प्र त दन
क सेवा पूरी करता है, फर वेतन का बँटवारा, फर राजा क नई आ ा — एक भी कतव्य छू टता नह ।
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व्याकरण-सङ् केतः: ‘काय कम ण नवृत्ते’ — यह स त सप्तमी (भावे सप्तमी) का प्रयोग है, अथात् ‘काय पूरा हो
जाने पर’। तीन पद सप्तमी एकवचन म ह। कतुम् अह त = करने योग्य है (तुमुन्नन्त + अह् धातु)।
स : बहून्य प = बहू न + अ प (यण्); कतुमह त = कतुम् + अह त।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 123
प्रश्नः २ : पठत बोधत — ‘जीमूतवाहनस्य कथा’
योग्यता वस्तरः
प्र.54 ‘जीमूतवाहनस्य कथा’ प ठत्वा तस्याः सारं लखत। कथायाः जीमूतवाहनस्य पाठस्य वीरवरेण सह कः साम्यः ?
कथासारः (संस्कृ तम्) — पुरा िवदे हनगरस्य शुद्ध के त ःु नाम धम त्मा राजा आसीत्। त स्य पुत्रः जीमूत वाहनः
बाल्यकालाद् एव धमिन ष्ठः, त् यागशीलः, परोपकाररतः, दीनान क
ु म्पी च आसीत्। सः धम चरणं कत ुं राज्यं त् यक्त् वा
वनं गतवान्। एकदा सागरतीरे सः एकं दुःिखतं वृद्ध ं नागम् अपश्यत्। नागः अवदत् यत् पितिदनम् एकः नागः
गरु डाय दात व्यः भवित , अद्य च त स्य पुत्रस्य शङ् खचूडस्य क्र मः अिस्त। तदा जीमूत वाहनः शङ् खचूडनागस्य
रू पं धृत् वा स्वयं गरु डस्य समीपं गतवान्। गरु डेन भ क्ष्यमाणः अिप सः िकमिप क ष्टं न दिशतवान्, िन श्चलः एव
िस्थतवान्। त स्य िनिवकारं धैय ं दृ ष्ट् वा गरु डः िविस्मतः अभवत्, भोजनात् िवरतः, सव ं वृत्तान्तं ात् वा तं
साधुवादे न मुक्तवान्, ‘नागवंशस्य हननात् िवरंस्ये’ इित पित ाम् अिप कृ तवान्।
हन्द सार: प्राचीन काल म वदे हनगर के राजा शुद्धकेतु के पुत्र जीमूतवाहन बचपन से ही धम नष्ठ, त्यागशील,
परोपकारी और द न पर दया करने वाले थे। वे धम-आचरण के लए राज्य छोड़कर वन चले गए। समुद्र-तट पर
उन्ह ने एक दुःखी वृद्ध नाग को दे खा, जसका पुत्र शङ् खचूड उस दन गरुड़ का आहार बनने वाला था। जीमूतवाहन
ने शङ् खचूड का रूप धारण करके स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दया। खाए जाते समय भी उन्ह ने न कोई कष्ट
दखाया, न हले — अत्यन्तं स हष्णुतया तत्र नश्चलः तवान्। यह अद्भत धैय दे खकर गरुड़ रुक गया, पूरी बात
जानकर उन्ह साधुवाद के साथ मुक्त कर दया और प्र त ा क क अब वह नागवंश का वध नह करेगा।
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वीरवरेण सह साम्यम् (वीरवर से समानता): दोन कथाओं का केन्द्र एक ही है — स न्न मत्ते वरं त्यागः, अथात्
अच्छे न मत्त के लए कया गया त्याग ही ेष्ठ है।
त्याग का पात्र: वीरवर को राजा और राज्यलक्ष्मी के लए सवा धक प्रय वस्तु का त्याग करना है; जीमूतवाहन
दूसरे के प्राण बचाने के लए अपना शरीर दे दे ते ह।
प्रसन्नता से त्याग: राजलक्ष्मी क शत थी — ‘सहासवदनेन’; जीमूतवाहन भी ‘ कम प कष्टं न द शतवान्’ —
मुख पर पीड़ा तक नह आने द ।
प रणाम: दोन का त्याग व्यथ नह जाता — एक से राजा का जीवन बचता है, दूसरे से पूरा नागवंश।
प्र.55 परोपकाराय फल न्त वृक्षाः परोपकाराय वह न्त नद्यः। परोपकाराय दुह न्त गावः परोपकाराथ मदं शरीरम्॥ —
अस्य ोकस्य अन्वयम् अथ भावं च लखत।
पद च् छे द ः — परोपकाराय + फलिन्त + वृक्षाः। परोपकाराय + वहिन्त + न द्य ः। परोपकाराय + दुहिन्त + गावः।
परोपकार-अथ म् + इदम् + शरीरम्।
अन्वयः — वृक्षाः परोपकाराय फल न्त, नद्यः परोपकाराय वह न्त, गावः परोपकाराय दुह न्त, इदं शरीरम् (अ प) परोपकाराथम्
(अ स्त)।
अथः — वृक्ष दूसर के उपकार के लए फलते ह, न दयाँ दूसर के उपकार के लए बहती ह, गाएँ दूसर के उपकार के लए दूध दे ती
ह — यह शरीर भी परोपकार के ही लए है।
भावः — प्रकृ त का हर अंग अपने लए नह , दूसर के लए काम करता है — वृक्ष अपना फल स्वयं नह खाता, नद
अपना जल स्वयं नह पीती, गाय अपना दूध स्वयं नह पीती। इसी क्रम म अ न्तम पं क्त मनुष्य पर आकर टकती है:
तो फर यह मानव-शरीर भी परोपकार के लए ही है। जीमूतवाहन और वीरवर — दोन इसी सद्धान्त पर जीते ह।
अलङ् कारः — अनुप्रास तथा दृष्टान्त। ‘परोपकाराय’ क चार बार आवृ त्त (पदावृ त्त / लाटानुप्रास) ोक को ग त
और बल दे ती है, और वृक्ष-नद -गाय के तीन दृष्टान्त अ न्तम कथन को स्वतः सद्ध कर दे ते ह।
व्याकरण-सङ् केतः: ‘परोपकाराय’ — चतुथ एकवचन (प्रयोजन/ताद य म चतुथ )। ‘वृक्षाः, नद्यः, गावः’ — तीन
प्रथमा बहुवचन, इस लए क्रयाएँ भी बहुवचन म (फल न्त, वह न्त, दुह न्त)।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 10 स न्न मत्ते वरं त्यागः (क-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
प्रकल्प-कायम्
प रयोजनाकायम्
प्र.56 १. कतव्य नष्ठाम् अ धकृत्य दश सूक्तीनां ोकानां वा सङ् ग्रहणं कुरुत।
करने क व ध: एक पतली कॉपी या चाट ली जए। हर पृष्ठ पर एक सू क्त/ ोक इस क्रम म ल खए — (1) मूल संस्कृत, (2)
हन्द अथ, (3) ग्रन्थ का नाम, (4) एक पं क्त म यह क यह सू क्त कतव्य नष्ठा के बारे म क्या कहती है। ोक कहाँ से ल
— गीता, यजुवद, हतोपदे श, पञ्चतन्त्र, वाल्मी क-रामायण, भतृह र का नी तशतक, चाणक्यनी त। अपनी पाठ्यपुस्तक द पकम् म
ही पाँचव और दसव पाठ म कई मल जाएँगे।
नमूना उत्तर (दश सूक्तयः):
क्रमः सू क्तः / ोकः हन्द अथ ोतः
१ कु वन्नेवेह कम िण िजजीिवषेच्छतं समाः। कम करते हुए ही सौ वष जीने की इच्छा करनी चािहए। यजुवदः ४०.२
२ कमण्येवािधकारस्ते मा फले ष ु तेर ा अिधकार कम में ही है, फलों में कभी नही ं। ीमद्भगव ता २.४७
कदाचन।
३ यथा छायातपौ िनत्यं सुस ंबद्धौ जैसे छाया और धूप, वैसे ही कम और कत सदा जुड़े रहते है।
ं पञ्चतन्त्रम्
परस्परम्।
४ पूवकाय िवरोधे न स काय ं कतुमहित। पहले के काय में बाधा डाले िबना जो काम करे , वही काय वाल्मी क-रामायणम्
करने योग्य है।
५ उद्यमेन िह िसध्यिन्त काय िण न काम पिर श्रम से िस द्ध होते है,ं के वल इच्छा करने से नही ं। हतोपदे शः
मनोरथैः।
६ परोपकाराथिमदं शरीरम्। यह शरीर परोपकार के िलए ही है। सुभा षतम् (पाठे )
७ आलस्यं िह मनुष्याणां शरीरस्थो महान् आल स्य मनुष्य के शरीर में बैठा हआ
ु सबसे बड़ा शत्र ु है। हतोपदे शः
िरपुः।
८ िक्रयािसिद्धः सत्त्वे भवित महतां महापुरुषों की सफलता उनके स त्त् व (आ त्मबल ) से होती है, नी तशतकम्
नोपकरणे। साधनों से नही ं। (भतृह रः)
९ श्रेयान्स्वधम िवग ण
ु ः भली पकार िकए गए दू स रे के धम से , ग ण
ु रिहत अपना धम ही ीमद्भगव ता ३.३५
परधम त्स्वनुिष्ठतात्। श्रेष्ठ है।
१० सिन्निमत्ते वरं त्यागः। अच्छे िनिम त्त के िलए त्याग ही श्रेष्ठ है। अस्य पाठस्य
शीषकम्
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 10 स न्न मत्ते वरं त्यागः (क-भागः)
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Tip: प्रत्येक सू क्त के नीचे दो-तीन पं क्तय म यह भी लख द जए क वह वीरवर के कस काय पर ठ क बैठती है
— जैसे सू क्त ⑧ ‘ क्रया स द्धः सत्त्वे…’ वीरवर के उत्तर ‘इमौ बाहू, एष खड् गश्च’ पर बलकुल e
s mक बैठती है।
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इससे आपक.cपoरयोजना केवल सङ् ग्रह न रहकर ववेचन बन जाएगी।
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२. अस्य पाठस्य कृते का नचन नूतना न शीषका ण लखत।
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करने क व ध: अच्छा शीषक तीन शत पूरी करता है — (1) वह पाठ के मुख्य भाव को पकड़े, केवल घटना को नह ; (2) वह
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छोटा हो; (3) उसम पाठ का कोई महत्त्वपूण पद आए तो और अच्छा। इस पाठ के तीन सम्भा वत केन्द्र ह — वीरवर क
कतव्य नष्ठा, स्वा मभ क्त/राष्ट्रभ क्त, और त्याग।
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नमूना उत्तर (नूतना न शीषका ण):
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a glसंस्कृत-शीषकम् हन्द अथ क्य उपयुक्त
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कतव्य नष्ठः वीरवरः कतव्यिनष्ठ वीरवर पूर ा पाठ वीरवर की कतव्यिनष्ठा के चारों ओर घूम ता है।
se mपाठ का सबसे यादगार संवाद, जो नायक का पूरा चिरत्र एक पंिक्त में कह दे ता है।
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इमौ बाहू, एष ये दो भुजाएँ और यह
खड् गश्च तलवार
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क्रन्दन
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राजलक्ष्म्याः क्रन्दनम् राजल क्ष्म ी का कथा का मोड़ यही ं से आता है; यह शीषक िज ासा जगाता है।
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s e mरा ाय समपणभावः च
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स्वा मभक्तेः आदशः स्वािमभिक्त का आदश पाठ की पस्तावना स्वयं कहती है — ‘तस्य स्वािमभिक्तः
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पेर णाहः’।
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seअह नशं सेवते
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िदन-रात से वा करता है पाठ का ही पद; वीरवर की अिवराम से वा को सीधे पकड़ता है।
दुःसाध्यः उपायः क-भाग यही ं समाप्त होता है — शीषक आगे की कथा की ओर संके त करता है।
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किठन उपाय
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. कथा के आरम्भ को पकड़ता है और ‘वेतनाथ ’ पाठ का ही शब्द है। a g l
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वेतनाथ राजपुत्रः वेतन चाहने वाला राजपुत्र
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Check it yourself: अपना बनाया हुआ शीषक जाँचने का सरल तरीका — उसे पढ़कर पू छए, “क्या इससे यह
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पता चलता है क पाठ कस बारे म है?” य द उत्तर ‘हाँ’ है और शीषक पाँच शब्द से छोटा है, तो वह अच्छा शीषक
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है।
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अध्याय — एक नज़र म
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ag –’, ‘वीरवरः –’, ‘मन्त्री –’, ‘राजलक्ष्मीः –’ के संवाद और कोष्ठक म रङ्गसंकेत (जैसे स्वगतम्,
पाठ का ोत और रूप — पाठ ‘ हतोपदे शः’ से लया गया है और यह गद्य तथा संवाद (नाट्य) दोन म चलता है —
कथावाचन के बीच-बीच म ‘राजा
तदालोक्य, साष्टाङ्गं नमस्कृत्य) आते ह। पाठ दो भाग म है; यह ‘क-भागः’ है, आगे क कथा ग्यारहव पाठ (ख-भागः) म है।
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कथा का ढाँचा — शोभावती नगरी → महापराक्रमी, नानाशास्त्र वत्, पूतच रत्र राजा शूद्रक → आजी वका के लए आया
राजपुत्र वीरवर (साथ म पत्नी वेदरता, पुत्र श क्तधर, कन्या वीरवती) → चार सौ स्वणमुद्रा प्र त दन का वेतन माँगना → राजा
का ‘नैतच्छक्यम्’ → म न्त्रय क सलाह से चार दन क परीक्षा → कृष्णचतुदशी क आधी रात का क्रन्दन → राजलक्ष्मी का
प्रकट होना और दुःसाध्य उपाय बताना।
वीरवर का च रत्र — वह अपनी ‘सामग्री’ केवल ‘इमौ बाहू, एष खड् गश्च’ बताता है। वेतन का आधा दे वताओं को, बचे हुए
का आधा द रद्र को, और शेष चौथाई ही पत्नी के हाथ म दे ता है — तथा धृतायुधः अह नशं राज ार क सेवा करता है। यही
‘कतव्य नष्ठा’ पाठ का प्राण है।
शीषक का अथ — ‘स न्न मत्ते वरं त्यागः’ = अच्छे न मत्त (सत्काय) के लए त्याग ही ेष्ठ है। राजलक्ष्मी क शत — ‘य द
त्वया स्वस्य सवतः प्रयं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सवमङ्गलायै उपहारः क्रयेत’ — इसी शीषक को खोलती है: सबसे प्रय
वस्तु का हँसते मुख से त्याग।
व्याकरण का केन्द्र (अत्र इदम् अवधेयम्) — दो बात: (1) वाक्यान्वयः — संस्कृत का मुक्त पद वन्यास; ‘रामः वनम्
अगच्छत् / अगच्छत् रामः वनम् / वनम् अगच्छत् रामः’ — तीन शुद्ध ह, इस लए पाठक को पहले वभ क्त दे खकर अन्वय
करना चा हए। (2) भूतकालः — लङ् -लकार (उपागच्छत्, अनयत्, व्य चन्तयत्), लट् + स्म (प्र तवस त स्म), क्तवतु-प्रत्यय
( ुतवान्) तथा क्त-प्रत्यय ( नगतः, नयो जतः, आलो कता)।
योग्यता वस्तरः — पाठ के भाव के अनुरूप तीन ोक दए गए ह — कुवन्नेवेह कमा ण… (यजुवदः ४०.२), यथा छायातपौ…
(पञ्चतन्त्रम्), काय कम ण नवृत्ते… (वाल्मी क-रामायणम्) — तथा ‘पठत बोधत’ म जीमूतवाहनस्य कथा और परोपकाराय
फल न्त वृक्षाः… ोक।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ ENGLISH
महीप तः भूपालः राजा King
महापराक्रमी अितबलशाली बहुत बलवान् Very brave
नानाशास्त्र वत् अनेके षां शास्त्राणां ाता अनेक शास्त्र का ाता Who knows many shastras
पूतच रत्रः पिवत्रं चिरत्रं यस्य प वत्र च रत्र वाला Of high character
वृत्त्यथम् आजीिवकां पाप्तुम ् आजी वका पाने के लए To get livelihood
प्र तहारम् / दौवा रकः ारपालम् / ारपालकः ारपाल (को) (To the) door-keeper
वतनम् वेतनम् वेतन Salary
सुवणशतचतुष्टयम् चतुश्शतसंख्यकाः स्वणमुद ाः चार सौ स्वणमुद्राएँ Four hundred gold coins
उपपन्नम् उपयुक्तम् / युिक्तयुक्तम् उपयुक्त, उ चत Appropriate, Suitable
धृतायुधः शस्त्रयुक्तः शस्त्र धारण कए हुए Armed
अह नशम् िदवसः राित्रः च दन-रात Day and Night
सू चभेद्ये त मरे गहने अन्धकारे सघन अन्धकार म In dense darkness
खड् गपा णः खड् ग वान् जनः खड् गधारी One with sword
साष्टाङ्गं नमस्कृत्य अष्टिभः अङ् गैः सह पणामं कृ त्वा आठ अंग स हत प्रणाम करके After bowing with eight parts
पञ्चत्वम् म ृत्युम ् मृत्यु को To the death
प्रवृ त्तः आचरणम् आचरण Follow-up
दुःसाध्या कािठन्येन अनुपालनीया क ठनाई से पालन करने योग्य Difficult to be followed
सहासवदनेन हास्य-युक्त-मुखेन हँसते हुए मुख से With a smiling face
तत्क्षणादे व तत्कालम् उसी क्षण On the spot
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