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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 11: स म े वरं त्यागः (ख-भागः)
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
124 – 136 16 52 हन्द
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 8 · सं स्कृ त · द पकम्
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 11: स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः)
NCERT कक्षा 8 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के एकादशः पाठः — स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः) का सम्पूण हल। यह ‘ हतोपदे शः’ से लए
गए गद्य-नाट्यात्मक कथाभाग का उत्तराध है — दशम पाठ (क-भागः) म राजलक्ष्मी ने वीरवर को ‘सवतः प्रय वस्तु’ के त्याग का दुःसाध्य उपाय बताया
था; यहाँ वीरवर, श क्तधर, वेदरता और वीरवती — पूरा प रवार — सवस्व-समपण करता है, राजा शूद्रक भी अपना जीवन दे ने को तत्पर होता है,
और भगवती सवमङ्गला प्रसन्न होकर सबको जीवन लौटा दे ती ह। नीचे पृष्ठ 124 से 136 तक के पाठगत (संवादगत) प्रश्न, ‘वयं शब्दाथान् जानीमः’
क दोन सार णयाँ, ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ (वाच्यम् — कतृ, कम, भाव), अभ्यासात् जायते स ः के प्रश्न १–७ का प्रत्येक उपभाग,
योग्यता वस्तरः (दो ोक, तीन सुभा षत तथा अकमकधातुलक्षणम्) और प रयोजनाकायम् क्रमशः हल कए गए ह — पहले संस्कृत उत्तर, फर
कोष्ठक म हन्द अथ।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
द पकम् (कक्षा 8) 124 – 136
खं ड प्रश्न
16 52
माध्यम
हन्द
पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 125
वीरवरस्य गृहे श क्तधरस्य, वेदरतायाः, वीरवत्याश्च संवादः
पाठः
प्र.1 श क्तधरः — (तच्छत्वा सानन्दम्) “हे पतः ! … तत् कोऽधुना वलम्बस्तात ?” — श क्तधरः कम् अवदत् ? (पृष्ठ
125)
उत्तरम् — शिक्तधरः अवदत् — “हे िपतः ! जानाम्यहं भवतः सविपयं वस्तु। तद् अहमेव भवतः िपयतमः इित
सविविदतः। धन्योऽहं स्वािमजीिवतरक्षाथ ं यिद िविनयुक्तः। तत् कोऽधुना िवलम्बस्तात ? एवंिवधे कमिण रा स्य
राज्ञश्च िहताय मम सवस्विविनयोगः परमश्लाघ्यः।”
हन्द अथ: यह सुनकर प्रसन्नता के साथ श क्तधर बोला — “ पताजी! आपक सबसे प्रय वस्तु म जानता ँ। वह
म ही ँ — यह सब जानते ह क म आपको सबसे प्रय ँ। म धन्य ँ, य द स्वामी के जीवन क रक्षा के लए मेरा
उपयोग हो। तो अब दे र कस बात क , तात ? ऐसे काम म राष्ट्र और राजा के हत के लए मेरा सवस्व लगा दे ना परम
प्रशंसनीय है।”
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
ध्यातव्यम्: ‘क-भागः’ म राजलक्ष्मी क शत थी — ‘स्वस्य सवतः प्रयं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै उपहारः क्रयेत’।
यहाँ पुत्र स्वयं पहचान लेता है क वह ‘सव प्रय वस्तु’ वही है — कसी को उसे कहना नह पड़ता। यही इस पाठ क
सबसे मा मक पं क्त है।
व्याकरण-सङ् केतः: तच्छत्वा = तत् + ुत्वा (श्चत्व-छत्व स न्ध)। धन्योऽहम् = धन्यः + अहम् ( वसग-स न्ध)।
कोऽधुना = कः + अधुना। तात — सम्बोधन एकवचन (यहाँ पुत्र पता को आदर से ‘तात’ कहता है)।
प्र.2 वेदरता — “यद्येवम् अस्मत्कुलो चतं नाच रतव्यं त ह गृहीतस्वा मवतनस्य कथं नस्तारो भवेत् ?” — वेदरतायाः
कथनस्य आशयः कः ? (पृष्ठ 125)
उत्तरम् — वेद रता वदित यत् यिद अस्माकं कु लस्य योग् यम् आचरणं न िक्र येत , तिह स्वािमनः गृहीत स्य वेत न स्य
ऋणात् िनस्तारः (मुिक्तः) कथं भवेत ् ? अतः कु लोिचतम् आचरणम् अवश्यं करणीयम् एव।
माता वरोध नह करती — वह कुल-धम का तक दे कर प त और पुत्र का नश्चय और पक्का कर दे ती है। उसका प्रश्न वस्तुतः प्रश्न
नह , उत्तर है : “य द हम अपने कुल के योग्य आचरण न कर, तो लए हुए वेतन का ऋण चुकेगा कैसे?”
हन्द अथ: “य द ऐसा है ( क पुत्र का समपण करना है), और हमारे कुल के योग्य आचरण न कया जाए, तो स्वामी
से लए हुए वेतन (के ऋण) से छु टकारा कैसे मलेगा?”
व्याकरण-सङ् केतः: यद्येवम् = य द + एवम् (यण् स न्ध)। नाच रतव्यम् = न + आच रतव्यम् (द घ स न्ध)। भवेत् —
व ध लङ् , प्रथमपुरुष एकवचन। गृहीतस्वा मवतनस्य — षष्ठी एकवचन; समास- वग्रह = गृहीतं यत् स्वा मवतनं तस्य।
प्र.3 वीरवती — “धन्याहं यस्या ईदृशो जनको ाता च। तत् कथं वलम्ब्यते ?” — वीरवती कमथ स्वं धन्यां मन्यते ?
(पृष्ठ 125)
उत्तरम् — वीरवती वदित — “धन्या अहम्, यस्याः ईदृ शः जनकः भाता च (अिस्त )। तत् कथं िवलम्ब्यते ? एष एव
गृहीत स्वािमवत नस्य िनस्तारस्य उपायः।”
वीरवती स्वयं को इस लए धन्य मानती है क उसे ऐसा पता (जो स्वामी के लए सवस्व दे ने को तैयार है) और ऐसा भाई (जो हँसते
हुए स्वयं को अ पत करने चला है) मले ह। वह भी दे र करने का कोई कारण नह दे खती — उसके लए यही वेतन का ऋण चुकाने
का एकमात्र उपाय है।
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हन्द अथ: “म धन्य ँ, जसके ऐसे पता और ऐसा भाई ह। तो फर दे र क्य क जा रही है? यही तो स्वामी से लए
हुए वेतन का ऋण चुकाने का उपाय है।”
व्याकरण-सङ् केतः: धन्याहम् = धन्या + अहम् (द घ स न्ध)। यस्याः — यद् (स्त्री लङ्ग) का षष्ठी एकवचन।
वलम्ब्यते — भाववाच्य, लट् -लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (‘दे र क जा रही है’) — यही रूप आगे ‘अत्र इदम्
अवधेयम्’ म पढ़ाया गया है।
पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः — पृष्ठ 126
दे वालये राज्ञः शूद्रकस्य वचारः, दे व्याः वरदानम्, अन्येद्युः राज्ञः वीरवरस्य च संवादः
पाठः
प्र.4 राजा (असौ) — “तदे तत्प रत्यक्तेन मम राज्येना प क प्रयोजनम् ?” — एतत् कः, कदा च अवदत् ? (पृष्ठ 126)
उत्तरम् — एतत् राजा शूद कः स्वगतम् अिच न्तयत् — वीरवरस्य सपिरवारं सवस्वसमपणं गुप्ततया दृ ष्ट् वा। सः
व्यिच न्तयत् — “जायन्ते च िमयन्ते च मादृ शाः क्षदु जन्तवः। अने न सदृ शो लोके न भूत ो न भिवष्यित॥
तदे त त्पिरत्यक्ते न मम राज्येनािप िकं पयोजनम्।” ततः दे वी ं पित पकटयन् अवदत् — “हे मातः ! सवमङ् गले !
गृहाण मे सवस्वम्। ने ष्टं मे राज्यं न च जीिवतं वा।”
हन्द अथ: “मेरे जैसे तुच्छ प्राणी तो जन्मते और मरते ही रहते ह; इसके (वीरवर के) समान न कोई संसार म हुआ
है, न होगा। तो फर इसे (वीरवर को) खोकर बचे हुए मेरे राज्य से भी क्या प्रयोजन ?” — और फर दे वी के
सामने प्रकट होकर बोला — “हे माता सवमङ्गले! मेरा सवस्व ले ली जए। मुझे न राज्य चा हए, न जीवन।”
भावः: पाठ का सन्तुलन यह बनता है — सेवक ने स्वामी के लए प्राण दए, तो स्वामी भी सेवक के लए प्राण
दे ने को तैयार है। इसी ‘सत्त्वोत्कष’ और ‘भृत्यवात्सल्य’ पर दे वी प्रसन्न होती ह।
व्याकरण-सङ् केतः: तदे तत्प रत्यक्तेन = तत् + एतत् + प रत्यक्तेन (तृतीया एकवचन)। राज्येना प = राज्येन +
अ प। नेष्टम् = न + इष्टम् (गुण स न्ध)।
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दे वी — “वत्स ! अनेन ते सत्त्वोत्कषण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीता स्म।” — दे वी केन प्रसन्ना अभवत्, क च वरम्
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अयच्छत् ? (पृष्ठ 126)
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उत्तरम् — दे वी सवमङ् गला राज्ञः शूद क स्य सत्त् वोत्कषण (सत्त् वगुणस्य पराकाष्ठया) भृत्यवात्सल्येन च पसन्ना
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अभवत्। सा पत्यक्षीभूत ा राज्ञः करं धृत्वा अवदत् e—m“वत्स ! पसन्ना भवािम त्विय, अलं साहसेन। ने द ानी ं
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राज्यभङ् गस्ते भिवष्यित।” … “तद् गच्aछ, िवजयी भव। अयमिप सपिरवारो जयतु राजपुत्र आदशचिरतो
वीरवरः।”
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राजा ने पहले यह प्राथना क थी — ‘य द म य कृपा भगवत्या जाता, तदा ममायुःशेषेणा प प्रत्यावतत राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण
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पत्न्या दु हत्रा च’ (य द मुझ पर कृपा है, तो मेरी बची हुई आयु से भी वीरवर पुत्र, पत्नी और पुत्री स हत लौट आए)। दे वी ने ठ क वही
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वर दया — वीरवर सप रवार जी वत हो गया, राजा का राज्य भी बचा रहा।
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comभी प रवार स हत जयशील हो।” agl
हन्द अथ: “वत्स! तुम्हारे इस सत्त्वगुण क पराकाष्ठा से और सेवक के प्र त वात्सल्य से म अत्यन्त प्रसन्न ँ। अब
जाओ, वजयी हो। यह आदश च रत्र वाला राजपुत्र .वीरवर
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व्याकरण-सङ् केतः: प्रीता स्म = प्रीता + अ स्म (द घ स न्ध)। नेदानीम् = न + इदानीम् (गुण स न्ध)। राज्यभङ्गस्ते =
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राज्यभङ्गः + ते ( वसग-स न्ध)। ते — युष्मद् का षष्ठी एकवचन लघु रूप = ‘तव’।
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उत्तरम् — वीरवरः अवदत् — “aदेgवl! सा रोदनपरा नारी मद्दशनाददृ श्यतां गता। न िह कािप वात ऽ न्या स्वािमन्
!” ततः परमां पीितं गतो महीपित स्त स्मै पायच् छत् समगकण टपदे शं राजपुत्राय वीरवराय।
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.c इतना कहा क रोती हुई वह स्त्री मुझे देखते ही अदृश्य हो गई; और कोई बात aनहg है, स्वा मन्! — अपने और अपने प रवार
अगले दन (अन्येद्युः) वीरवर फर ार पर सेवा म लगा था। राजा ने उसे दे खकर पूछा — “क्या समाचार है, राजपुत्र?” वीरवर ने
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se के ब लदान क एक भी बात उसने नह कही।
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यही उत्तर पाठ का शखर है: उपकार करके उसे गनाना उपकार को छोटा कर दे ता है। वीरवर का मौन ही उसका
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सबसे बड़ा गुण सद्ध होता है — और राजा, जो सब कुछ छपकर दे ख चुका था, अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे समग्र
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कणाटप्रदे श दे दे ता है।
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व्याकरण-सङ् केतः: मद्दशनाददश्ृ यताम् = मत् + दशनात् + अदृश्यताम्। वाताऽन्या = वाता + अन्या। महीप तस्तस्मै
= महीप तः + तस्मै। प्रायच्छत् = प्र + अयच्छत् (दा धातु, लङ् -लकार) = ‘दे दया’। तस्मै … राजपुत्राय वीरवराय —
चतुथ एकवचन (सम्प्रदान कारक — जसे दया गया)।
वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 127–128
शब्दाथ-सारण्यौ तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्त ः
शब्दाथाः
प्र.7 मातृभाषया अथ लखत — (प्रथमा सारणी, पृष्ठ 127; अ न्तमः स्त ः रक्तः अ स्त, तत्र स्वमातृभाषया अथः
लेखनीयः।)
यह अ न्तम स्तम्भ अपनी मातृभाषा म भरना है ( हन्द , मराठ , बांग्ला, त मल… जो भी आपक हो)। नीचे हन्द -माध्यम के
वद्या थय के लए पृष्ठ 127 क पूरी सारणी द गई है — पहले पुस्तक का संस्कृत-पयाय, फर हन्द अथ और अंग्रेज़ी अथ।
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
आवासम् ग ृहम् घर House
नद्रालसाम् िनद ापभावेण आलस्ययुक्ताम् नी ंद के कारण अलसाई हुई को To the languishing due to sleepiness
दु हतरम् पुत्र ीम् बेटी को Daughter
अवणयत् वणनम् अकरोत् वणन िकया Described
सानन्दम् पसन्नतया पस न्नता के साथ Happily
आह अकथयत् कहा Said
व नयोगः िनयुिक्तः िनयुक्त (करना), लगाना Utilisation
परम ाघ्यः अत्यन्तं पशंस नीयः परम पशंस ा के योग्य Most appreciable
उत्सृजेत् त्यक्तव्यम् त्यागना चािहए Should sacrifice
स न्न मत्ते समुपयुक्ते कारणे बहुत अच्छा कारण होने पर Having good cause
वरम् ेयस्करम् पशंस नीय, अच्छा Praiseworthy
ब्रवी त वदित कहता है Says
आच रतव्यम् आचरणीयम् आचरण करना चािहए Should follow
नस्तारः (ऋणाद् ) िवमुिक्तः चुक ाना, छु टकारा Repay
आयतनम् पिरसरः आँगन (मिन्दर -पिरसर ) Courtyard
गृह्यताम् स्वीकु रु स्वीकार करो Accept
प्रयोगः (पाठात्): ‘स्वआवासं गत्वा’ (अपने घर जाकर) · ‘ नद्रालसां पत्न … प्राबोधयत्’ ·
‘अ खलराजलक्ष्मीसंवादं च अवणयत्’ · ‘(तच्छत्वा सानन्दम्)’ · ‘मम सवस्व व नयोगः परम ाघ्यः’ · ‘धना न
जी वतञ्चैव पराथ प्राज्ञ उत्सृजेत्’ · ‘स न्न मत्ते वरं त्यागो’ · ‘गृहीतस्वा मवतनस्य कथं नस्तारो भवेत्’ ·
‘सवमङ्गलाया आयतनं गताः’ · ‘गृह्यतामेष मद्दत्त उपहारः’।
प्र.8 मातृभाषया अथ लखत — ( तीया सारणी, पृष्ठ 128; अ न्तमः स्त ः रक्तः अ स्त, तत्र स्वमातृभाषया अथः
लेखनीयः।)
पृष्ठ 128 क सारणी के नौ शब्द नीचे दए गए ह — इनम से अ धकांश पाठ के अ न्तम भाग (दे वी के प्रकट होने और राजा के
वरदान वाले अंश) के शब्द ह।
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शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH
प्रयोजनम् लक्ष्यम् उ द्दे श्य Purpose
उ त्क्षप्तः उत्थािपतः उठाया गया Lifted upward
प्रत्यक्षीभूतया पत्यक्ष-रूपेण िवराजमानया पत्यक्ष रूप से उपिस्थत के ारा By the one who has become manifest
राज्यभङ्गः राज्य-नाशनम् राज्य का नाश Downfall of the empire
सत्त्वोत्कषण सत्त्वग ण
ु स्य पराकाष्ठया स त्त्वगुण की पराकाष्ठा से By the excellence of purity
वात्सल्येन स्नेहेन वात्स ल्यभाव से With affection
उक्त्वा कथियत्वा कहकर After saying
प्रासादम् राजभवनम् राजभवन Palace
भूपालः राजा राजा King
ध्यातव्यम्: उ त्क्षप्तः अभ्यास-प्रश्न ५ (छ) ‘स्व शरश्छे दनाथम्उ त्क्षप्तः’ म आया है — ‘अपना सर काटने के लए
(खड् ग) ऊपर उठाया गया’। प्रत्यक्षीभूतया तृतीया एकवचन (स्त्री लङ्ग) है — ‘प्रत्यक्ष हो चुक भगवती के ारा’।
उक्त्वा ‘इत्युक्त्वा’ (= इ त + उक्त्वा) म मलता है — क्त्वा-प्रत्ययान्त अव्यय।
अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 128–130
व्याकरण-पे टका — वाच्यं त्र वधम् : १. कतृवाच्यम् · २. कमवाच्यम् · ३. भाववाच्यम्
व्याकरणम्
प्र.9 कतृवाच्यं कम् ? उदाहरणैः सह स्प ीकुरुत। (पृष्ठ 128)
िनयमः — कत ृवाच् ये वाक्ये कत ृपद स्य पथमा िवभिक्तः भवित , िक्र यापदं च कत ृपदानुसािर भवित। अथ त्
िक्रयापदस्य पुरु षः वचनं च कत ृपदस्य अनुसारेण भवित। वाक्ये कमपदम् अिस्त चे त ् तस्य ि तीया िवभिक्तः
भवित।
हन्द म: कतृवाच्य म कता प्रधान होता है — कता प्रथमा म, कम तीया म, और क्रया कता के पुरुष-वचन के
अनुसार बदलती है।
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पुस्तक के उदाहरण (पृष्ठ 129):
पुरुषः एकवचनम् बहुवचनम्
प्रथमपुरुषः बालकः ग ामं गच्छित। बालकाः गामं गच्छिन्त।
मध्यमपुरुषः त्वं ग ामं गच्छिस। यूयं गामं गच्छथ।
उत्तमपुरुषः अहं ग ामं गच्छािम। वयं गामं गच्छामः।
पाठात् उदाहरणा न: ‘वीरवरः स्वावासं गत्वा … प्राबोधयत्’ · ‘राजा स्वप्रासादं प्रा वशत्’ · ‘महीप तः
समग्रकणाटप्रदे शम् अयच्छत्’ — तीन म कता प्रथमा म, कम (स्वावासम्/स्वप्रासादम्/प्रदे शम्) तीया म और
क्रया कता के अनुसार है।
प्र.10 कमवाच्यं कम् ? क्रयापदस्य रूपं कथं सध्य त ? (पृष्ठ 129–130)
िनयमः — कमवाच् ये कत ृपद स्य त ृत ीया िवभिक्तः, कमपद स्य पथमा िवभिक्तः, तथा च िक्र यापदं कमपदानुसािर
भवित। अथ त् िक्रयापदस्य पुरु षः वचनं च कमपद स्य अनुसारेण भवित।
िक्र यापद स्य रूपम् — धातुः + य + आ त्मने पदम्।
यथा — गम् (धात ःु ) + य + ते (आत्मने पदपत्ययः) = गम्यते ।
हन्द म: कमवाच्य म कम प्रधान हो जाता है। कता तृतीया (‘के ारा’) म चला जाता है, कम प्रथमा म आ जाता है,
और क्रया अब कम के वचन-पुरुष के अनुसार चलती है। यही कारण है क ‘बालकेन ग्रामः गम्यते’ म क्रया
एकवचन है, पर ‘बालकेन ग्रामाः गम्यन्ते’ म बहुवचन — कता तो वही एक बालक है, पर कम बदल गया।
पुस्तक के उदाहरण (पृष्ठ 129):
कतृवाच्यम् कमवाच्यम् (एकवचनम्) कमवाच्यम् (बहुवचनम्)
बालकः ग्रामं गच्छ त। बालके न ग ामः गम्यते। बालके न गामाः गम्यन्ते।
त्वं ग्रामं गच्छ स। त्वया ग ामः गम्यते। युष्मािभः गामाः गम्यन्ते।
अहं ग्रामं गच्छा म। मया ग ामः गम्यते। अस्मािभः गामाः गम्यन्ते।
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अन्या न यकार-स हता न रूपा ण: पठ् → पठ्यते, लख् → लख्यते, खाद् → खाद्यते — ये सब भाव-
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कमवाचक क्रयापद ह।
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पाठात्: ‘तत्.cकथं वलम्ब्यते ?’, ‘गृह्यताम् एष मद्दत्त उपहारः’ (लोट् , कमवाच्य) — कमg‘उपहारः’ प्रथमा म है,
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इसी लए क्रया एकवचन है ।
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प्र.11 भाववाच्यं कदा प्रयुज्यते ? के धातवः सवदा अकमकाः भव न्त ? (पृष्ठ 130)
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िनयमः — अकत ृवाच् यवाक्ये यिद कमपद स्य अभावः भवित , तिह भाववाच् यस्य पयोगः भवित।
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. coक्तः भवित, िक्रयापदस्य च केवलम् एकम् एव अपिरवतनीयं रूपं भवितag—l तत् च पथमपुरुषस्य
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agl एकवचनं रूपम्।
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क्य ऐसा होता है: कमवाच्य म क्रया कम के अनु.सcार चलती थी। भाववाच्य अकमक धातुओं का होता है — वहाँ agl
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कम है ही नह । जब क्रया को कसी से lमलान
जम जाती है और कता कोई भी हो, a
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करना ही नह , तो वह अपने तटस्थ रूप (प्रथमपुरुष एकवचन) म
नह बदलती।
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पुस्तक के उदाहरण (पृष्ठ 130):
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ीया) भाववाच्य-वाक्यम् क्रयापदम्
agl बालकेन बालके न हस्यते। हस्यते
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बालकै ः हस्यते। हस्यते
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त्वया / युष्मा भः त्वया हस्यते। युष्मािभः हस्यते। हस्यते
मया / अस्मा भः agमया हस्यते। अस्मािभः हस्यते। हस्यते
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सदा अकमकाः धातवः — हस्, क्र न्द् , स्था, स्ना, शी, भू इत्यादयः।
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ध्यातव्यम्: ‘हस्यते’ क्रयापद कतृपद के बदलने पर भी नह बदलता — यही भाववाच्य क पहचान है। पाठ म
‘तत् कथं वलम्ब्यते ?’ इसी शैली का प्रयोग है — कम कोई नह , क्रया प्रथमपुरुष एकवचन म।
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अभ्यासात् जायते स a
ः — पृष्ठ 131
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
प्रश्नः १ : नम्न ल खतेषु वाक्येषु रक्तवण या न स्थूलपदा न आधृत्य प्रश्न नमाणं कुरुत
अभ्यासः
प्र.12 (क) वीरवरो पत्न पुत्रं दु हतरञ्च प्राबोधयत्।
उत्तरम् — कः पत्नी ं पुत्रं दुिहतरञ् च पाबोधयत् ?
क्य ‘कः’: रेखां कत पद ‘वीरवरः’ कता है — पुं लङ्ग, प्रथमा वभ क्त, एकवचन। कता के लए प्रश्नवाचक
सवनाम ‘ कम्’ का पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन रूप कः है।
हन्द : वीरवर ने पत्नी, पुत्र और पुत्री को जगाया → कसने पत्नी, पुत्र और पुत्री को जगाया?
प्र.13 (ख) ततस्ते सव सवमङ्गलाया आयतनं गताः।
उत्तरम् — तत स्ते सव क स्याः आयतनं गताः ?
क्य ‘कस्याः’: ‘सवमङ्गलायाः’ स्त्री लङ्ग, षष्ठी वभ क्त, एकवचन है (‘सवमङ्गला का आँगन/म न्दर’)। स्त्री लङ्ग
षष्ठी एकवचन का प्रश्नवाचक रूप कस्याः है।
स -सङ् केतः: मु द्रत पाठ म ‘सवमङ्गलाया आयतनम्’ है — यह ‘सवमङ्गलायाः + आयतनम्’ का वसग-लोप रूप
है ( वसग के बाद स्वर आने पर वसग का लोप)।
प्र.14 (ग) वीरवरः वतनस्य नस्तारं पुत्रोत्सगण अकरोत्।
उत्तरम् — वीरवरः वत न स्य िन स्तारं के न अकरोत् ?
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
क्य ‘केन’: ‘पुत्रोत्सगण’ करण कारक है — पुं लङ्ग, तृतीया वभ क्त, एकवचन (‘पुत्र के त्याग से’)। तृतीया
एकवचन का प्रश्नवाचक रूप केन है।
पदच्छे दः: पुत्रोत्सगण = पुत्र + उत्सगण (गुण स न्ध: अ + उ = ओ)।
प्र.15 (घ) राजा स्वप्रासादं प्रा वशत्।
उत्तरम् — राजा कं पािवशत् ?
क्य ‘कम्’: ‘स्वप्रासादम्’ कम है — ‘प्रासाद’ शब्द पुं लङ्ग है, अतः तीया वभ क्त, एकवचन का रूप
‘प्रासादम्’ और प्रश्नवाचक रूप कम् होगा (नपुंसक लङ्ग होता तो ‘ कम्’ होता)।
हन्द : राजा अपने महल म प्र वष्ट हुआ → राजा कसम ( कस भवन म) प्र वष्ट हुआ? ‘प्र + वश्’ धातु तीया
लेती है, सप्तमी नह ।
प्र.16 (ङ) महीप तः वीरवराय समग्रकणाटप्रदे शम् अयच्छत्।
उत्तरम् — महीपितः क स्मै समगकण टपदे शम् अयच् छत् ?
क्य ‘कस्मै’: ‘वीरवराय’ सम्प्रदान कारक है — पुं लङ्ग, चतुथ वभ क्त, एकवचन (‘वीरवर को/के लए’)।
चतुथ एकवचन का प्रश्नवाचक रूप कस्मै है। ‘दा’ (दे ना) धातु के साथ जसे दया जाए, वह सदा चतुथ म आता है
— ‘सम्प्रदाने चतुथ ’।
अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 131
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प्रश्नः २ : अधो ल खतान् प्रश्नान् उत्तरत
अभ्यासः
प्र.17 (क) वीरवरः कम् अवणयत् ?
उत्तरम् — वीरवरः अिखलराजलक्ष्मीसंवादम् अवणयत्।
हन्द अथ: वीरवर ने (राजलक्ष्मी के साथ हुए) स ूण संवाद का वणन कया। पाठ क पं क्त है — ‘अथ राजपुत्रो
वीरवरो स्वावासं गत्वा नद्रालसां पत्न पुत्रं दु हतरञ्च प्राबोधयत् अ खलराजलक्ष्मीसंवादं च अवणयत्।’
पद- व ेषणम्: अ खलराजलक्ष्मीसंवादम् = अ खलः राजलक्ष्म्याः संवादः, तम् — तीया एकवचन (कम)।
अवणयत् — ‘वणय्’ ( णजन्त), लङ् -लकार, प्रथमपुरुष एकवचन।
प्र.18 (ख) प्राज्ञः धना न जी वतञ्च केभ्यः उत्सृजेत् ?
ृ ेत ्।
उत्तरम् — पाज्ञः धनािन जीिवत ञ् च परेभ्यः (पराथ ) उत्सज
हन्द अथ: बु द्धमान् व्य क्त को धन और जीवन दूसर के लए (परोपकार के लए) त्याग दे ना चा हए। ोक क
पं क्त — ‘धना न जी वतञ्चैव पराथ प्राज्ञ उत्सृजेत्।’
व्याकरण-सङ् केतः: प्रश्न म ‘केभ्यः’ चतुथ बहुवचन है, अतः उत्तर भी चतुथ बहुवचन म — परेभ्यः। ‘पराथ’ पाठ
का पद है — ‘पर + अथ’ = दूसर के प्रयोजन से। उत्सृजेत् — उद् + सृज्, व ध लङ् , प्रथमपुरुष एकवचन
(‘त्यागना चा हए’)।
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प्र.19 (ग) केन सदृशः लोके न भूतो न भ वष्य त ?
उत्तरम् — वीरवरेण (अने न ) सदृ शः लोके न भूत ो न भिवष्यित।
हन्द अथ: वीरवर के समान (व्य क्त) संसार म न पहले हुआ है, न आगे होगा। यह राजा शूद्रक का वचार है —
सप रवार आत्मोत्सग दे खकर वह मन ही मन कहता है — ‘जायन्ते च यन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः। अनेन सदृशो
लोके न भूतो न भ वष्य त॥’
व्याकरण-सङ् केतः: ‘सदृश’ शब्द के योग म तृतीया (अथवा षष्ठी) आती है — इसी लए ‘अनेन सदृशः’, ‘वीरवरेण
सदृशः’। प्रश्न का ‘केन’ भी तृतीया एकवचन है।
प्र.20 (घ) का अदृश्या अभवत् ?
उत्तरम् — सा रोदनपरा नारी (राजलक्ष्मीः) अदृ श्या अभवत्।
हन्द अथ: वह रोती हुई स्त्री — अथात् राजा शूद्रक क राजलक्ष्मी — अदृश्य हो गई। अगले दन राजा के पूछने
पर वीरवर ने यही उत्तर दया — ‘दे व ! सा रोदनपरा नारी मद्दशनाददश्ृ यतां गता।’
व्याकरण-सङ् केतः: प्रश्न ‘का’ स्त्री लङ्ग, प्रथमा एकवचन है, अतः उत्तर भी स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन म — ‘सा
… नारी’। रोदनपरा = रोदने परा (रोने म लगी हुई) — बहु ी ह-सदृश समास।
प्र.21 (ङ) सप रवारः वीरवरः कुत्र गतवान् ?
उत्तरम् — सपिरवारः वीरवरः सान न्दं स्वगृहं गतवान्।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः)
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हन्द अथ: दे वी क कृपा से सब जी वत हो जाने पर वीरवर प रवार स हत प्रसन्नतापूवक अपने घर गया। पाठ क
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पं क्त — ‘ततो दे वी गताऽदशनम्। ततो वीरवरः सप रवारो सानन्दं स्वगृहं गतः।’
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aमglआता है — ‘स्वगृहम्’। गतवान् — क्तवतु-प्रत्ययान्त भूतका लक रूप (पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन)।
व्याकरण-सङ् केतः: ‘कुत्र’ (कहाँ) का उत्तर अ धकरण/कम म आता है; ‘गम्’ धातु के साथ गन्तव्य स्थान तीया
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अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 132a
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प्रश्नः ३ : अधो ल खतेषु वाक्येषु रक्तवण यपदा न केभ्यः प्रयुक्ता न इ त उदाहरणानुगुणं लखत
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अभ्यासः
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a s emउदाहरणम् — धन्यः अहम् स्वा मजी वतरक्षाथ व नयुक्तः। → श क्तधराय ‖ (क) भगव त ! न मे प्रयोजनं
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प्र.22
a राज्येन जी वतेन वा।
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उत्तरम् — शूद काय (राज्ञे शूद काय)ag l a
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कैसे पहचान: यह वाक्य राजा शूद्रक बोल रहा है — दे वी के प्रत्यक्ष होने पर वह साष्टाङ्ग प्रणाम करके कहता है
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‘भगव त ! न मे प्रयोजनं राज्येन जी वतेन वा’ (हे भगव त! मुझे न राज्य से प्रयोजन है, न जीवन से)। अतः ‘मे’ (मेरा/
s e mझे) पद राजा शूद्रक के लए प्रयुक्त हुआ है।
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comका लघु रूप (= मम / मह्यम्)। a
व्याकरण-सङ् केतः: उत्तर चतुथ एकवचन म दे ना है (उदाहरण ‘श क्तधराय’ क तरह) — ‘ कसके लए प्रयुक्त
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हुआ’। मे — अस्मद् शब्द का षष्ठी/चतुथ एकवचन
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(ख) वत्स ! अनेन ते सत्त्वोत्कषण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीता स्म।
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ag उत्तरम् — शूद काय (राज्ञे शूद काय)
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कैसे पहचान: यह दे वी सवमङ्गला का वचन है और वह ‘वत्स!’ कहकर राजा शूद्रक को सम्बो धत कर रही है।
जन गुण क वह प्रशंसा कर रही है — सत्त्वोत्कष (सत्त्वगुण क पराकाष्ठा) और भृत्यवात्सल्य (सेवक के प्र त
वात्सल्य) — वे राजा के ही गुण ह, क्य क राजा अपने सेवक वीरवर के लए प्राण दे ने को तैयार हुआ। अतः ‘ते’
राजा शूद्रक के लए है।
व्याकरण-सङ् केतः: ते — युष्मद् शब्द का षष्ठी एकवचन लघु रूप (= तव)। प्रीता स्म = प्रीता + अ स्म।
प्र.24 (ग) धन्याहं यस्या ईदृशो जनको ाता च।
उत्तरम् — वीरवत्यै
कैसे पहचान: यह वाक्य वीरवती (वीरवर क पुत्री) बोल रही है — ‘म धन्य ँ, जसके ऐसे पता और ऐसा भाई ह’।
‘यस्याः’ का सम्बन्ध बोलने वाली से ही है, अतः वह पद वीरवती के लए प्रयुक्त हुआ है।
व्याकरण-सङ् केतः: उत्तर ‘वीरवती’ का चतुथ एकवचन — वीरवत्यै (नद -आ द ई-कारान्त स्त्री लङ्ग शब्द क
तरह)। वाक्य म यस्याः — षष्ठी एकवचन, स्त्री लङ्ग; ईदृशः — ‘इस प्रकार का’ (जनकः का वशेषण, प्रथमा
एकवचन)।
प्र.25 (घ) तदे तत्प रत्यक्तेन मम राज्येना प क प्रयोजनम् !
उत्तरम् — शूद काय (राज्ञे शूद काय)
कैसे पहचान: यह भी राजा शूद्रक का ही स्वगत-कथन है। वीरवर का सप रवार ब लदान दे खकर वह सोचता है —
‘इसे (वीरवर को) खोकर बचे हुए मेरे राज्य से भी क्या लाभ?’ अतः ‘मम’ राजा शूद्रक के लए है।
व्याकरण-सङ् केतः: मम — अस्मद् शब्द का षष्ठी एकवचन। तदे तत्प रत्यक्तेन = तत् + एतत् + प रत्यक्तेन —
तृतीया एकवचन, ‘राज्येन’ का वशेषण।
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प्र.26 (ङ) अयम् अ प सप रवारो जीवतु।
उत्तरम् — वीरवराय (राजपुत्राय वीरवराय)
कैसे पहचान: यह दे वी का आशीवचन है। पाठ म पूरा वाक्य है — ‘अयम प सप रवारो जयतु राजपुत्र
आदशच रतो वीरवरः’ — अथात् ‘अयम्’ का अथ स्वयं पाठ म खुल जाता है : यह आदशच रत राजपुत्र वीरवर
है। अतः ‘अयम्’ वीरवर के लए प्रयुक्त हुआ है।
ध्यातव्यम्: पाठ (पृष्ठ 126) म क्रयापद ‘जयतु’ मु द्रत है, जब क अभ्यास-वाक्य म ‘जीवतु’ छपा है। अथ म अन्तर
नह है — ‘जयशील हो / जी वत रहे’; दोन लोट् -लकार, प्रथमपुरुष एकवचन ह।
व्याकरण-सङ् केतः: अयम् — इदम् सवनाम, पुं लङ्ग प्रथमा एकवचन। सप रवारः = प रवारेण सह वतमानः
(बहु ी ह)।
अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 132
प्रश्नः ४ : उदाहरणानुसारं नम्न ल खता न वाक्या न अन्वयरूपेण लखत
अभ्यासः
प्र.27 यथा — कृतो मया गृहीतस्वा मवतनस्य नस्तारो स्वपुत्रोत्सगण। → गृहीतस्वा मवतनस्य नस्तारो मया
स्वपुत्रोत्सगण कृतः। ‖ (क) नेदान राज्यभङ्गस्ते भ वष्य त।
अन्वयः — इदानी ं ते राज्यभङ् गः न भिवष्यित।
अन्वय कैसे बनता है: संस्कृत का पद वन्यास मुक्त है, पर अन्वय म क्रम होता है — कता/कम → अन्य पद →
क्रयापद अन्त म। यहाँ स न्धयाँ भी खोल दे नी ह : ‘नेदानीम्’ = न + इदानीम्, ‘राज्यभङ्गस्ते’ = राज्यभङ्गः + ते।
कता ‘राज्यभङ्गः’ है, ‘ते’ (= तव) उसका सम्बन्धकारक वशेषण, और ‘न भ वष्य त’ क्रया अन्त म।
हन्द अथ: अब तुम्हारे राज्य का नाश नह होगा। (दे वी का राजा शूद्रक को दया वचन।)
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प्र.28 (ख) तेन पा ततं स्व शरः स्वकरस्थखड् गेन।
अन्वयः — ते न स्वकरस्थखड् गेन स्विशरः पािततम्।
अन्वय कैसे बनता है: यह कमवाच्य वाक्य है — कता ‘तेन’ तृतीया म, करण ‘स्वकरस्थखड् गेन’ भी तृतीया म, कम
‘स्व शरः’ प्रथमा म, और ‘पा ततम्’ (क्त-प्रत्ययान्त कृदन्त, नपुंसक लङ्ग प्रथमा एकवचन) कम के अनुरूप। अन्वय म
क्रम होगा — कता → करण → कम → क्रया।
हन्द अथ: उसने अपने हाथ म रखे खड् ग से अपना सर काट गराया।
ध्यातव्यम्: यह वाक्य पुस्तक के मु द्रत (सं क्षप्त) पाठभाग म नह छपा है — यह ‘ हतोपदे शः’ क मूल कथा का वह
अंश है जसे पाठ म केवल संकेत से दखाया गया है (‘गृह्यतामेष मद्दत्त उपहारः’ तथा ‘ततः सः आत्मानम प दे व्यै
सम पतवान्’)। इसी अंश का पद प्रश्न ५ (छ) ‘स्व शरश्छे दनाथमु त्क्षप्तः’ म भी आया है।
प्र.29 (ग) तदा ममायुःशेषेणा प जीवतु राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पत्न्या दु हत्रा च।
अन्वयः — तदा राजपुत्रः वीरवरः पुत्रेण पत्न्या दुिहत्रा च सह मम आयुःशेषेण अिप जीवतु।
अन्वय कैसे बनता है: ‘ममायुःशेषेणा प’ = मम + आयुःशेषेण + अ प — इसे खोलकर करण-पद के स्थान पर रखा
जाता है। कता ‘राजपुत्रः वीरवरः’ को आगे लाकर, ‘सह’ के साथ आने वाले तृतीयान्त पद (पुत्रेण, पत्न्या, दु हत्रा)
उसके पास रखे जाते ह, और क्रया ‘जीवतु’ अन्त म।
हन्द अथ: तब मेरी बची हुई आयु से भी राजपुत्र वीरवर पुत्र, पत्नी और पुत्री स हत जी वत हो जाए।
व्याकरण-सङ् केतः: सह के योग म तृतीया वभ क्त आती है — ‘सहयुक्तेऽप्रधाने तृतीया’। जीवतु — लोट् -लकार,
प्रथमपुरुष एकवचन (प्राथना)।
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प्र.30 (घ) तत्क्षणादे व दे वी गताऽदशनम्।
अन्वयः — दे वी त त्क्षणात् एव अदशनं गता।
अन्वय कैसे बनता है: स न्धयाँ खो लए — ‘तत्क्षणादे व’ = तत्क्षणात् + एव; ‘गताऽदशनम्’ = गता + अदशनम्।
अब कता ‘दे वी’ पहले, अपादान-सूचक ‘तत्क्षणात् एव’ उसके बाद, कम ‘अदशनम्’ और अन्त म क्रया-रूप ‘गता’।
हन्द अथ: दे वी उसी क्षण अदृश्य हो गईं।
व्याकरण-सङ् केतः: ‘अदशनं गता’ एक मुहावरा है = ‘अदृश्य हो गई’। ‘गम्’ धातु के साथ ‘अदशनम्’ तीया म
है। गता — क्त-प्रत्ययान्त, स्त्री लङ्ग प्रथमा एकवचन।
प्र.31 (ङ) महीप तस्तस्मै प्रायच्छत् समग्रकणाटप्रदे शं राजपुत्राय वीरवराय।
अन्वयः — महीपितः त स्मै राजपुत्राय वीरवराय समगकण टपदे शं पायच् छत्।
अन्वय कैसे बनता है: ‘महीप तस्तस्मै’ = महीप तः + तस्मै। कता ‘महीप तः’ पहले; फर सम्प्रदान के तीन चतु यन्त
पद एक साथ — ‘तस्मै राजपुत्राय वीरवराय’ (वे तीन एक ही व्य क्त के वशेषण ह); फर कम
‘समग्रकणाटप्रदे शम्’; और अन्त म क्रया ‘प्रायच्छत्’।
हन्द अथ: राजा ने उस राजपुत्र वीरवर को सम्पूण कणाटप्रदे श दे दया।
व्याकरण-सङ् केतः: प्रायच्छत् = प्र + अयच्छत् (‘दा’ धातु, लङ् -लकार, प्रथमपुरुष एकवचन)।
प्र.32 (च) जायन्ते च यन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः।
अन्वयः — मादृ शाः क्षदु जन्तवः जायन्ते च िमयन्ते च।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः)
a g l AglaSem · NCERT Solutions
अन्वय कैसे बनता है:
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ोक म क्रया आगे और कता पीछे रखा गया है (छन्द के कारण)। गद्य-अन्वय म कता
‘मादृशाः क्षुद्रजन्तवः’ पहले आएगा और दोन क्रयाएँ ‘जायन्ते च यन्ते च’ अन्त म। यही अन्वय eपुm
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स्तक ने भी
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योग्यता वस्तरः
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agहन्द अथ: मेरे जैसे तुच्छ प्राणी तो जन्म लेते और मरते ही रहते ह।
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व्याकरण-सङ् केतः: जायन्ते, यन्ते — दोन आत्मनेपद , लट् -लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन (कता ‘क्षुद्रजन्तवः’
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बहुवचन है)। मादृशाः = मम सदृशाः (मेरे जैसे)।
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अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 133
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प्रश्नः ५ : उदाहरणानुगुणम् अधो ल खतानां पदानां पदच्छे दं कुरुत
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अभ्यासः
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यथा — यद्येवमस्मत्कुलो चतम् = य द-एवम्-अस्मत्-कुलो चतम् · सत्त्वोत्कषण = सत्त्व-उत्कषण ‖ (क)
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प्र.33
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गृहीतस्वा मवतनस्य =
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पद च् छे द ः — गृहीत -स्वािम-वत न स्य
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s e m ‘गृहीतम् यत् स्वा मवतनम् (स्वा मनः वेतनम्), तस्य’ = स्वामी से लए हुए वेतन का। यह कमधारय-युक्त
la षष्ठी-तत्पुरुष समास है — गृहीत ( वशेषण) + स्वा म-वतन (स्वा मनः वतनम्)।
अथः:
ag
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प्रयोगः: ‘गृहीतस्वा मवतनस्य कथं नस्तारो भवेcतo् m g l a
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?’ — इसी पद पर पूरा पाठ टका है : वीरवर वेतन ले चुका है,
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अब उसे उसका ऋण चुकाना है।
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(ख) नस्तारोपायः =
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प्र.34
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पद च् छे द ः — िन स्तार-उपायः
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स - नयमः: अ + उ = ओ (गुण स ) — नस्तार + उपायः = नस्तारोपायः। अथ — ‘(ऋण से) छु टकारे का
उपाय’ (षष्ठी-तत्पुरुष)।
प्र.35 (ग) गृह्यतामेष =
पद च् छे द ः — गृह्यताम्-एषः
अथः: ‘यह स्वीकार कया जाए’। गृह्यताम् — ‘ग्रह्’ धातु, लोट् -लकार, कमवाच्य, प्रथमपुरुष एकवचन। इसी लए
वाक्य म कम ‘उपहारः’ प्रथमा वभ क्त म है — ‘गृह्यतामेष मद्दत्त उपहारः’ (मेरा दया हुआ यह उपहार स्वीकार
क जए)।
प्र.36 (घ) स्वपुत्रोत्सगण =
पद च् छे द ः — स्व-पुत्र-उत्सगण
स - नयमः: अ + उ = ओ (गुण स न्ध) — पुत्र + उत्सगण = पुत्रोत्सगण। अथ — ‘अपने पुत्र के त्याग से’ —
तृतीया एकवचन (करण)।
प्र.37 (ङ) स्वकरस्थखड् गेन =
पद च् छे द ः — स्व-कर-स्थ -खड् गेन
अथः: ‘अपने हाथ म स्थत खड् ग से’ — तृतीया एकवचन (करण)। ‘स्थ’ = ‘ तष्ठ त इ त’ (जो स्थत है) — उपपद-
तत्पुरुष।
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प्र.38 (च) तदे तत्प रत्यक्तेन =
पद च् छे द ः — तत्-एतत्-पिरत्यक्ते न
अथः: ‘तो इसके (वीरवर के) छू ट जाने पर (बचे हुए)’। ‘तत्’ यहाँ अव्यय है (= ‘तो’, ‘इस लए’); ‘एतत्-प रत्यक्तेन’
= इसके ारा त्यागे गए / इससे र हत। पूरा वाक्य — ‘तदे तत्प रत्यक्तेन मम राज्येना प क प्रयोजनम्’।
प्र.39 (छ) स्व शरश्छे दनाथमु त्क्षप्तः =
पद च् छे द ः — स्व-िशरः-छे द न -अथ म्-उित्क्षप्तः
अथः: ‘अपना सर काटने के लए ऊपर उठाया गया (खड् ग)’। उ त्क्षप्तः = उ ा पतः (उठाया गया) — यह शब्द
पृष्ठ 128 क शब्दाथ-सारणी म भी दया है।
स -सङ् केतः: शरः + छे दन → शरश्छे दन ( वसग-स : वसग का ‘श्’ म प रवतन, क्य क आगे ‘छ् ’ है)।
छे दन + अथम् → छे दनाथम् (द घ स न्ध)। अथम् + उ त्क्षप्तः → अथमु त्क्षप्तः (व्यञ्जन-स न्ध)।
प्र.40 (ज) मद्दशनाददश्ृ यताम् =
पद च् छे द ः — मत्-दशनात्-अदृ श्यताम्
अथः: ‘मेरे दे खने से (मुझे दे खते ही) अदृश्य अवस्था को’। ‘मत्-दशनात्’ पञ्चमी एकवचन (हेतु/अपादान) है,
‘अदृश्यताम्’ तीया एकवचन — ‘अदृश्यतां गता’ = अदृश्य हो गई।
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स -सङ् केतः: मत् + दशनात् = मद्दशनात् (जश्त्व स : त् + द् = द्द)। दशनात् + अदृश्यताम् =
दशनाददश्ृ यताम्।
प्र.41 (झ) तत्क्षणादे व =
पद च् छे द ः — तत्-क्षणात्-एव
अथः: ‘उसी क्षण से / तत्काल ही’। ‘तत्क्षणात्’ पञ्चमी एकवचन है और ‘एव’ अव्यय उसका बल बढ़ाता है।
प्र.42 (ञ) लब्धजी वतः =
पद च् छे द ः — लब्ध-जीिवतः
अथः: ‘ जसने जीवन पुनः प्राप्त कर लया है, वह’ — यह बहु ी ह समास है ( वग्रह : लब्धं जी वतं येन सः)। कथा
म दे वी क कृपा से वीरवर सप रवार ‘लब्धजी वतः’ हुआ।
व्याकरण-सङ् केतः: लब्ध — ‘लभ्’ धातु + क्त प्रत्यय (कमवाच्य कृदन्त)। बहु ी ह म समास का अथ कसी अन्य
पद (यहाँ वीरवर) पर जाता है — यही इसे तत्पुरुष से अलग करता है।
अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 133–134
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प्रश्नः ६ (क) : उदाहरणानुगुणं पाठगता न पदा न अ धकृत्य स युक्तपदै ः रक्तस्थाना न पूरयत
अभ्यासः
प्र.43 यथा — स्व + आवासम् = स्वावासम् ‖ तत् + ुत्वा · दु हतरम् + च · धन्यः + अहम् · जी वतम् + च + एव ·
वलम्बः + तात · कः + अधुना · न + आच रतव्यम् · धन्या + अहम् · नस्तारः + उपायः · वीरवरः + अवदत् · ततः
+ असौ · ततः + ते
बारह रक्तस्थान नीचे भरे गए ह। तीसरा स्तम्भ बताता है क कौन-सा स - नयम लगा, और चौथा स्तम्भ पाठ क वह पं क्त दे ता
है जसम वह स न्धयुक्त पद आया है।
स - वच्छे दः स युक्तं पदम् स - नयमः पाठे प्रयोगः
स्व + आवासम् स्वावासम् दीघ (अ + आ = आ) वीरवरो स्वावासं गत्वा…
तत् + ुत्वा तच्छत्वा श्चुत्व + छत्व (त् + श् = च् + छ् ) (तच्छत्वा सानन्दम्)
दु हतरम् + च दुिहतर ञ्च परसवण (म् → ञ्, ‘च’ वग के पहले ) पत्न पुत्रं दु हतरञ्च प्राबोधयत्
धन्यः + अहम् ध न्योऽहम् िवसग (अः + अ = ओ + ऽ) धन्योऽहं स्वा मजी वतरक्षाथ…
जी वतम् + च + एव जीिवतञ्चैव परसवण (म् → ञ्) + वृिद्ध (अ + ए = ऐ) धना न जी वतञ्चैव पराथ…
वलम्बः + तात िवल म्बस्तात िवसग (अः + त् = अस्, सकार-आदे श) तत् कोऽधुना वलम्बस्तात ?
कः + अधुना कोऽधुना िवसग (अः + अ = ओ + ऽ) तत् कोऽधुना वलम्बस्तात ?
न + आच रतव्यम् नाचिरतव्यम् दीघ (अ + आ = आ) अस्मत्कुलो चतं नाच रतव्यं त ह…
धन्या + अहम् ध न्याहम् दीघ (आ + अ = आ) धन्याहं यस्या ईदृशो जनको ाता च
नस्तारः + उपायः िनस्तारोपायः िवसग/ग ण
ु (अः + उ = ओ) गृहीतस्वा मवतनस्य नस्तारस्य उपायः
वीरवरः + अवदत् वीरवरोऽवदत् िवसग (अः + अ = ओ + ऽ) (संवाद-सङ् केतः)
ततः + असौ ततोऽसौ िवसग (अः + अ = ओ + ऽ) ततोऽसौ व्य चन्तयत्—
ततः + ते ततस्ते िवसग (अः + त् = अस्, सकार-आदे श) ततस्ते सव सवमङ्गलाया आयतनं गताः
याद रखने का सूत्र: वसग के बाद अ आए तो ‘ओ ऽ’ (कोऽधुना), अन्य स्वर आए तो केवल ‘ओ’ ( नस्तारोपायः),
और त् / थ् आए तो वसग ‘स्’ बन जाता है (ततस्ते, वलम्बस्तात)। ‘म्’ के बाद वग-व्यञ्जन आए तो ‘म्’ उसी वग
का पञ्चम वण बन जाता है — च वग के पहले ञ् (दु हतरञ्च)।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः)
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अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 134
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प्रश्नः ६ (ख) : नम्न ल खतपदानां स च्छे दं कुरुत
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अभ्यासः
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शूद्रकोऽ प · पुनभूपालेन · महीप तस्तस्मै · प्रायच्छत् · नृप तर प · सवषामदृश्य · वाताऽन्या · राज्यभङ्गस्ते ·
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प्र.44
ग तगन्तव्या · इत्युक्त्वा · नेदान · प्रीता स्म
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यह प्रश्न 6 (क) का उल्टा है — यहाँ जुड़े हुए पद को तोड़ना है।
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स युक्तं पदम् स च्छे दः स - नयमः
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शूद्रकोऽm
s e प शूद कः + अिप
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िवसग (अः + अ = ओ + ऽ)
ag पुनभूपालेन पुनः + भूपाले न िवसग → र् (घोष व्यञ्जन ‘भ्’ के पहले )
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महीप तस्तस्मै महीपितः + तस्मै िवसग → स् (‘त्’ के पहले )
s m(अ + अ = आ)
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प्रायच्छत् प + अयच्छत्
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नृप तर प नपृ ितः + अिप िवसग → र् (इः + अ = इर्)
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सवषामदृश्य सवषाम् + अदृ श्य व्यञ्जन-सिन्ध (म् + अ)
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वाताऽन्या वात + अन्या दीघ (आ + अ = आ); पुस्तक में लुप्त ‘अ’ अवग ह ‘ऽ’ से िदखाया गया है
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agl राज्यभङ्गस्ते राज्यभङ् गः + ते िवसग → स् (‘त्’ के पहले )
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गितः + गन्तव्या
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ग तगन्तव्या िवसग → र् (घोष व्यञ्जन ‘ग्’ के पहले )
.यण् (इ + उ = य् + उ) a g
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इत्युक्त्वा इित + उ क्त्वा
नेदानीम् न + इदानीम् agl गण
ु (अ + इ = ए)
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प्रीता स्म पीता + अिस्म दीघ (आ + अ = आ)
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.cअवग्रह (ऽ) क्या बताता है: ‘शूद्रकोऽ प’ और ‘वाताऽन्या’ म जो ‘ऽ’ चह्नaहैg, वह यह बताता है क यहाँ एक ‘अ’
m लुप्त हो गया है। स न्धच्छे द करते समय उसे लौटा दे ना होता है — इसी लए उत्तर ‘शूद्रकः + अ प’ और ‘वाता +
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ag अन्या’ बनते ह।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
प्रश्नः ७ : अधो ल खता न कथना न कथायाः घटनानुसारं लखत
अभ्यासः
प्र.45 (क) सव दृ ् वा राजा शूद्रकः अ प सवस्वसमपणाथ स ः अभवत्। (ख) पतुः वाता ुत्वा श क्तधरः प्रसन्नतया
स्वस्य समपणाथ स ः अभवत्। (ग) प्रातः राजा वीरवरम् अपृच्छत् ‘ह्यः रात्रौ कम् अभवत्’? (घ) वीरवरो गृहं
गत्वा पत्न पुत्रं पुत्रीञ्च प्राबोधयत्, सवा च वाताम् अकथयत्। (ङ) वीरवरेण उक्तम् – स्वा मन् ! न का प वाता।
सा नारी अदृश्या अभवत्। (च) भगवती प्रसन्ना अभवत्। भगवत्याः कृपया सव जी वतवन्तः। (छ) वीरवरः
प रवारेण सह सवस्वसमपणम् अकरोत्।
घटनानुसारं क्र मः — (घ) → (ख) → (छ) → (क ) → (च ) → (ग) → (ङ)
पूरा क्रम वाक्य स हत :
क्रमः कथनम् हन्द म क्या हुआ
१. (घ) वीरवरो ग ृहं गत्वा पत्नी ं पुत्र ं पुत्र ीञ्च पाबोधयत्, सव ं च वीरवर घर जाकर पत्नी, पुत्र और पुत्री को जगाता है और सारी बात
वात म् अकथयत्। बताता है।
२. िपतुः वात ं त्ु वा शिक्तधरः पसन्नतया स्वस्य समपणाथं िसद्धः िपता की बात सुनकर शिक्तधर पस न्नता से अपने समपण के िलए
(ख) अभवत्। तैयार हो जाता है।
३. वीरवरः पिरवारे ण सह सवस्वसमपणम् अकरोत्। सब सवमङ् गला के मिन्दर जाते है ं और वीरवर पिरवार सिहत सवस्व
(छ) अिपत कर दे ता है।
४. सवं दृ ष्ट् वा राजा शूद कः अिप सवस्वसमपणाथं िसद्धः िछपकर सब दे ख रहा राजा शूद क भी अपना सवस्व दे ने को तैयार हो
(क) अभवत्। जाता है।
५. (च) भगवती पसन्ना अभवत्। भगवत्याः कृ पया सव जीिवतवन्तः। भगवती पस न्न होती है ं और उनकी कृ पा से सब जीिवत हो जाते है।
ं
६. (ग) पातः राजा वीरवरम् अपच्ृ छत् ‘ह्यः रात्रौ िकम् अभवत्’? अगले िदन सुबह राजा वीरवर से पूछता है — “कल रात क्या हुआ?”
७. (ङ) वीरवरे ण उक्तम् – स्वािमन् ! न कािप वात । सा नारी वीरवर कहता है — “स्वािमन्! कोई बात नही ं। वह स्त्री अदृ श्य हो
अदृ श्या अभवत्। गई। ”
क्रम कैसे तय हुआ: कथा क क ड़याँ कारण-काय से जुड़ी ह — बात बताना पहले होगा, तभी श क्तधर सुनकर
तैयार होगा (‘ पतुः वाता ुत्वा’)। समपण के बाद ही राजा ‘सव दृ ् वा’ तैयार होता है। दे वी का प्रसन्न होना और
सबका जी वत होना उसके बाद है। ‘प्रातः’ और ‘ह्यः रात्रौ’ शब्द बताते ह क (ग) अगले दन का है, और (ङ) उसका
उत्तर होने से अन्त म आएगा।
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ध्यातव्यम्: पाठ म राजा का प्रश्न ‘का वाता राजपुत्र !’ रूप म छपा है, जब क अभ्यास-वाक्य (ग) म वही प्रश्न ‘ह्यः
रात्रौ कम् अभवत् ?’ रूप म वस्तार से दया गया है — अथ एक ही है।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 135–136
प्रश्नः १ : ोकानां पदच्छे दम् अन्वयं भावाथ च पठत स्मरत च
योग्यता वस्तरः
प्र.46 ोकः १ — धना न जी वतञ्चैव पराथ प्राज्ञ उत्सृजेत्। स न्न मत्ते वरं त्यागो वनाशे नयते स त॥ १॥ — अस्य
पदच्छे दम् अन्वयं भावाथ च लखत।
ृ ेत ् · सिन्निमत्ते · वरम् · त्यागः · िवनाशे · िनयते
पद च् छे द ः — धनािन · जीिवतम् · च · एव · पराथ · पाज्ञः · उत्सज
· सित।
ृ ेत ्। िवनाशे िनयते सित सिन्निमत्ते त्यागो वरम्।
अन्वयः — पाज्ञः धनािन जीिवतम् चै व पराथ उत्सज
अथ ः (शब्द शः) — पाज्ञः = बुिद्धमान् व्यिक्त · धनािन = धन-सम्पित्तयाँ · जीिवतम् च एव = और जीवन भी · पराथ
ृ ेत ् = त्याग दे न ा चािहए ‖ िवनाशे िनयते सित = (शरीर का) नाश तो िनिश्चत ही है, ऐसी
= दू सरों के िलए · उत्सज
िस्थित में · सिन्निमत्ते = िकसी अच्छे कारण/पयोजन पर · त्यागः = त्याग करना · वरम् = ेष्ठ है।
भावाथ ः (पुस्तकानुसारम्) — परोपकाराथ ं बुिद्ध मान् सम्पदां जीवनं च त्यक्तुं िसद्ध ः भवेत ्। यतः शरीरस्य नाशः तु
भवित एव। अतः त स्य सत्काय थ ं त्यागः ेष्ठः खलु।
भावः ( हन्द म): शरीर और सम्प त्त दोन नाशवान् ह — दे र-सबेर दोन जाएँगे ही। जब जाना न श्चत है, तो प्रश्न
केवल इतना बचता है क वे कस काम आएँ। बु द्धमान् वही है जो उन्ह य ही नष्ट होने दे ने के बजाय कसी सत्काय
के न मत्त स्वयं अ पत कर दे । यही ‘स न्न मत्ते वरं त्यागः’ है — और यही पूरे पाठ का शीषक और प्राण है।
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प्रसङ्गः: यह ोक श क्तधर कहता है (पृष्ठ 125), जब वह अपने पता से कहता है क स्वामी के जीवन क रक्षा के
लए उसका उपयोग हो तो वह धन्य है — ‘यतः — धना न जी वतञ्चैव…’।
व्याकरण-सङ् केतः: वनाशे नयते स त — स त सप्तमी (भावे सप्तमी) का सुन्दर उदाहरण = ‘नाश के न श्चत
होने पर’। उत्सृजेत् — व ध लङ् (चा हए)। जी वतञ्चैव = जी वतम् + च + एव।
पाठ-सूचना: पुस्तक म भावाथ का पहला शब्द ‘परोपराकाथ’ छपा है; शुद्ध रूप परोपकाराथम् है।
प्र.47 ोकः २ — जायन्ते च यन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः। अनेन सदृशो लोके न भूतो न भ वष्य त॥ २॥ — अस्य
पदच्छे दम् अन्वयं भावाथ च लखत।
पद च् छे द ः — जायन्ते · च · िमयन्ते · च · मादृ शाः · क्षदु जन्तवः · अने न · सदृ शः · लोके · न · भूत ः · न ·
भिवष्यित।
अन्वयः — मादृ शाः क्षदु जन्तवः जायन्ते च िमयन्ते च। लोके अने न सदृ शः न भूत ः न भिवष्यित च।
अथ ः (शब्द शः) — मादृ शाः = मेरे जै से · क्षुद जन्तवः = त च्ु छ पाणी · जायन्ते च िमयन्ते च = जन्म लेते और मरते
रहते है ं ‖ लोके = संसार में · अने न सदृ शः = इसके (वीरवर के ) समान (व्यिक्त) · न भूत ः = न हुआ · न भिवष्यित
= न होगा।
भावाथ ः (पुस्तकानुसारम्) — मत्सदृ शाः अल्पाः जन्म मृत्युं च पाप्नुविन्त। एतादृ शः जनः तु लोके पूव ं न जातः न
अगे भिवष्यित च।
भावः ( हन्द म): यह राजा शूद्रक का स्वगत-कथन है, और इसका बल तुलना म है। एक ओर ‘मेरे जैसे क्षुद्र प्राणी’
— जनका जन्म-मरण संसार म कोई अन्तर नह लाता; दूसरी ओर वीरवर — जसके जैसा न कभी हुआ, न होगा।
राजा होकर भी वह स्वयं को छोटा और अपने सेवक को अतुलनीय कह रहा है — यही उसका ‘सत्त्वोत्कष’ है, जस
पर आगे दे वी प्रसन्न होती ह।
व्याकरण-सङ् केतः: जायन्ते, यन्ते — आत्मनेपद , लट् -लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन। मादृशाः = ‘मम सदृशाः’
(मेरे जैसे) — ‘अस्मद् + दृश्’ से बना वशेषण। सदृश के योग म तृतीया — इसी लए ‘अनेन सदृशः’। न भूतः —
‘भू’ धातु का क्तान्त रूप (भूतकाल), न भ वष्य त — लृट्-लकार (भ वष्यत्काल); एक ही पं क्त म तीन काल का
संकेत मलता है।
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योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 136
प्रश्नः २ (क) : सुभा षता न पठत स्मरत च
योग्यता वस्तरः
प्र.48 यथा चतु भः कनकं परीक्ष्यते नघषणच्छे दन-ताप-ताडनैः। तथा चतु भः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन
कमणा॥ — अस्य अथ भावं च लखत।
अन्वयः — यथा कनकं चतुिभः िनघषण-छे द न -ताप-ताडनै ः परीक्ष्यते , तथा पुरु षः चतुिभः कु लेन शीलेन गुणेन
कमणा (च ) परीक्ष्यते ।
अथ ः — जै से सोना चार कसौिटयों से परखा जाता है — िनघषण (कसौटी पर िघसना), छे द न (काटना), ताप
(आग में तपाना) और ताडन (हथौड़ े से पीटना) — वैसे ही मनुष्य भी चार बातों से परखा जाता है : कु ल (वंश-
परम्परा), शील (चिरत्र, स्वभाव), गुण (योग्यता) और कम (उसके काम)।
भावः: उपमा का बल यह है क सोने क चार परीक्षाएँ क ठन ह — घसना, काटना, तपाना, पीटना। स ा सोना
उनसे बगड़ता नह , नखरता है। वैसे ही मनुष्य क परख भी सुख म नह , क ठनाई म होती है। यह सुभा षत पाठ के
साथ इसी लए दया गया है : वीरवर क परीक्षा ‘चार दन के वेतन’ से आरम्भ हुई थी और उस रात के संकट म
उसका ‘कुल, शील, गुण और कम’ — चार खरे उतरे।
अलङ् कारः: ‘यथा … तथा’ से बना दृ ान्त/उपमा अलङ् कार — उपमेय ‘पुरुषः’, उपमान ‘कनकम्’, साधारण धम
‘परीक्ष्यते’।
व्याकरण-सङ् केतः: परीक्ष्यते — कमवाच्य क्रयापद (प र + ईक्ष् + य + ते), लट् -लकार, प्रथमपुरुष एकवचन;
इसी लए कम ‘कनकम्/पुरुषः’ प्रथमा म और करण ‘चतु भः … ताडनैः’ तृतीया म है — यही ‘अत्र इदम् अवधेयम्’
का कमवाच्य- नयम है।
प्र.49 कमण्येवा धकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कमफलहेतुभूमा ते सङ्गोऽस्त्वकम ण॥ — अस्य अथ भावं च लखत।
पद च् छे द ः — कमिण · एव · अिधकारः · ते · मा · फलेष ु · कदाचन। मा · कमफलहेत ःु · भूः · मा · ते · सङ् गः ·
अस्तु · अकमिण।
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
coसङ् गः मा
अन्वयः — ते कमिण एव अिधकारः, फलेष ु कदाचन मा (अिधकारः)। कमफलहेत ःु मा भूः। ते अकम.िण
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अस्तु।
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अथ ः — त म्ु हारा अिधकार के वल कम पर है, फलों पर कभी नही ं। त मु कमफल के कारण मत बनो (अथ त् फल
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की इच्छा से कम मत करो), और कम न करने में भी त म्ु हारी आसिक्त न हो।
e m . ag
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भावः: यह ीमद्भगव ता (२.४७) का प्र सद्ध
a ोक है और इसम दो चेताव नयाँ ह, एक नह । पहली — फल क
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.
आस क्त मत रखो। दूसरी, जो प्रायः भुला द जाती है — ‘फल नह मलेगा’ यह सोचकर काम छोड़ भी मत दो
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(‘मा ते सङ्गोऽस्त्वकम ण’)। वीरवर इसी का जी वत उदाहरण है : उसने कतव्य कया, और अगलेm दन उसका ेय
.
तक नह लया
com— ‘न ह का प वाताऽन्या स्वा मन्’। a gla
a s em
a gl व्याकरण-सङ् केतः: मा नषेधाथक अव्यय है और इसके साथ प्रायः लुङ् (अद्यतन भूत) का रूप ‘अ’ के बना आता
m
है — ‘मा भूः’ (मत होओ), ‘मा अस्तु’ (न हो)। कमण्येव = कम ण + एव (यण् स न्ध)। सङ्गोऽस्तु = सङ्गः + अस्तु।
a s
m .co agl
l a se
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प्र.50 यो ह स्वधम नरतः स तेजस्वी भवे दह। वना स्वधमान्न सुखं स्वधम ह परं तपः॥ — अस्य अथ भावं च लखत।
com
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.co a g
mच्छे दः — यः · िह · स्वधमिनरतः · सः · ते जस्वी · भवेत् · इह। िवना · स्वधम त् · न · सुखम् · स्वधमः · िह ·
a s eपद
a gl
परम् · तपः।
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com g l a
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a),s सः इह ते जस्वी भवेत्। स्वधम त् िवना सुखं न (भवित)। स्वधमः िह परं
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अन्वयः — यः िह स्वधमिनरतः (भवित
a
तपः (अिस्त )।
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a है। अपने कतव्य के िबना सुख
. com
अथ ः — जो अपने धम (कतव्य) में लगा रहता है, वही इस संसार में ते जस्वीglहोता
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as नही ं िमलता। अपना कतव्य ही सबसे बड़ ा तप है।
agl c
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भावः: ‘तेज’ यहाँ रूप या बल का नह , च रत्र क आभा का नाम है — वह जो वीरवर के मुख पर तब भी है जब
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वह ार पर अकेला खड़ा है। ोक कहता
a s em है क यह आभा कसी वशेष तपस्या से नह , अपने ही कतव्य को पूरी
a gl का ‘स्वधम’ था — लया हुआ वेतन साथक करना; उसी को उसने ‘परं तपः’ बना
नष्ठा से करने से आती है। वीरवर
दया।
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m .
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
व्याकरण-सङ् केतः: वना के योग म तृतीया, तीया अथवा पञ्चमी — तीन वभ क्तयाँ चलती ह; यहाँ पञ्चमी
है — ‘स्वधमात् वना’ (मु द्रत रूप ‘स्वधमान्न’ = स्वधमात् + न)। भवे दह = भवेत् + इह (जश्त्व स न्ध)। भवेत् —
व ध लङ् ।
योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 136
प्रश्नः २ (ख) : अकमकधातुलक्षणम्
योग्यता वस्तरः
प्र.51 धातोरथान्तरे वृत्ते धात्वथनोपसङ् ग्रहात्। प्र स े र व वक्षातः धातोरक मका क्रया॥ — अकमकधातोः लक्षणं
स्प ीकुरुत।
अन्वयः — धातोः अथ न्तरे वृत्ते, धात्वथ न उपसङ् गहात्, पिसद्ध ेः, अिववक्षातः (च ) धातोः िक्र या अकिमका
(भवित )।
अथ ः — धात ु की िक्रया चार कारणों से अकमक (कम-रिहत) हो जाती है —
१. अथ न्तरे वृत्ते — धात ु जब अपने मूल अथ को छोड़ कर दू सरे अथ में चले (जै से ‘वतते ’ = होना/रहना)।
२. धात्वथ नोपसङ् गहात् — कम धात ु के अथ में ही समा जाए (जै से ‘जीवित’ में ‘जीवन’ अलग कम नही ं
बचता)।
३. पिसद्ध ेः — कम इतना पिसद्ध हो िक उसे कहने की आवश्यकता ही न रहे।
४. अिववक्षातः — वक्ता कम को कहना ही न चाहे (िववक्षा न हो)।
यह पाठ म क्य दया गया है: ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ म भाववाच्य पढ़ाया गया है, और भाववाच्य केवल अकमक
धातुओं का होता है। तो प्रश्न उठता है — कोई धातु अकमक होती कैसे है? यह ोक उसी का उत्तर दे ता है। पुस्तक
ने पृष्ठ 130 पर जो सूची द थी — हस्, क्रन्द्, स्था, स्ना, शी, भू — वे सदा अकमक धातुएँ ह; इसी लए ‘बालकेन
हस्यते’, ‘मया हस्यते’ जैसे भाववाच्य रूप बनते ह और क्रया कभी नह बदलती।
पाठ-सूचना: पुस्तक म ‘अ व वक्षातः’ छपा है; व्याकरण-परम्परा म शुद्ध रूप अ ववक्षातः ( ववक्षा = कहने क
इच्छा) है। साथ ही अ न्तम चरण पुस्तक म ‘धातोरक मका क्रया’ है (कुछ पाठ म ‘कमणोऽक मका क्रया’ मलता
है) — अथ म अन्तर नह ।
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प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 136
प्रकल्प-कायम् : पाठस्य कथाधारेण नाटक-रचना तथा मञ्चनम्
प रयोजनाकायम्
प्र.52 पाठस्य कथाधारेण सरलसंस्कृतेन एकं नाटकं रचयत तस्य मञ्चनं च कुरुत।
यह करके सीखने वाला काय है — इसका उत्तर कागज़ पर नह , कक्षा के मंच पर बनता है। नीचे पहले व ध, फर अच्छे नाटक म
क्या-क्या होना चा हए, और अन्त म एक नमूना दृश्य दया गया है जसे आप बढ़ा सकते ह।
िविधः (कै से करे)ं —
१. पात्र-चयनम् — सूत्रधारः, वीरवरः, वेद रता, शिक्तधरः, वीरवती, राजा शूद कः, दे वी सवमङ् गला। (सूत्रधार
कथा को जोड़ ता रहता है — इससे लम्बे गद्यभाग मंच पर सरल हो जाते है।
ं )
२. दृ श्य-िवभाजनम् — दृ श्य १ : वीरवरस्य गृहम् (रात्रौ, पिरवारं पबोधयन्)। दृ श्य २ : सवमङ् गलायाः दे वालयः
(समपणम्)। दृ श्य ३ : दे व्याः पाकट म् (वरदानम्)। दृ श्य ४ : पातःकाले राज ारम् (राजा-वीरवर-संवादः)।
३. संवाद -लेखनम् — पाठ के संवाद जै से के तै से लीिजए (‘हे िपतः ! जानाम्यहं भवतः सविपयं वस्त ’ु ), और जहाँ
गद्य है वहाँ छोटे -छोटे सरल वाक्य बनाइए।
४. रङ् गसङ् के ताः — कोष्ठक में — (सानन्दम्), (स्वगतम्), (साष्टाङ् गं पिणपत्य), (तं वीक्ष्य)।
५. मञ् चनम् — सरल वेशभूषा (धोती/उत्तरीय), काठ का खड् ग, दीपक, दे वी-पितमा का िचत्र; अभ्यास के बाद
कक्षा में पस्त िु त।
अच्छे नाटक म ये पाँच बात अवश्य ह : (१) कथा का पूरा क्रम — गृह → दे वालय → वरदान → प्रातःकालीन
संवाद; (२) दोन ोक अपने ठ क स्थान पर ( ोक १ श क्तधर के मुख से, ोक २ राजा के स्वगत म); (३)
प्रत्येक पात्र का अपना स्वर — श क्तधर का उत्साह, वेदरता का कुलधम-बोध, वीरवती का गव, राजा का पश्चात्ताप-
म त वस्मय; (४) अन्त म वीरवर का मौन — ‘न ह का प वाताऽन्या स्वा मन्’ — यही नाटक का चरम है; (५)
सरल संस्कृत — लम्बे समास के स्थान पर छोटे वाक्य।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
नमून ा दृ श्यम् (नमून ा उत्तर — दृ श्यम् १, संक्षेपेण) —
सूत्रधारः — अद्य कृ ष्णचत दु शी। अधरात्रौ वीरवरः स्वावासं पत्यागच्छित।
वीरवरः — (पत्नी ं पुत्रं दुिहतरं च पबोधयन्) उित्तष्ठत ! शृणतु ! अद्य रात्रौ राजलक्ष्म्या सह मम संवादः अभवत्।
वेद रता — (िनद ालसा) िकम् अभवत् आयपुत्र ?
वीरवरः — राजा शूद कः त ृत ीये िदवसे पञ्चत्वं यास्यित। एकः एव उपायः — सवतः िपयस्य वस्त नु ः दे व्यै
समपणम्।
शिक्तधरः — (सानन्दम्) हे िपतः ! जानाम्यहं भवतः सविपयं वस्त ।ु तद् अहमेव। तत् कोऽधुना िवलम्बस्तात ?
वेद रता — यद्ये वम् अस्मत्कु लोिचतं नाचिरतव्यं, तिह गृहीतस्वािमवतनस्य कथं िनस्तारो भवेत ् ?
वीरवती — धन्याहं यस्या ईदृ शो जनको भाता च। तत् कथं िवलम्ब्यते ?
सव — (उत्थाय) गच्छामः सवमङ् गलायाः आयतनम्।
(पटाक्षेपः)
सङ् केतः: मंच पर ब लदान का दृश्य प्रत्यक्ष न दखाएँ — संस्कृत नाट्यपरम्परा म भी वध, मृत्यु आ द मंच पर नह
दखाए जाते। द पक बुझाकर, पदा गराकर अथवा सूत्रधार के एक वाक्य से उसे सू चत कर — जैसे ‘(ततः सः
आत्मानम प दे व्यै सम पतवान्।)’। यही पुस्तक ने भी कया है।
अध्याय — एक नज़र म
पाठ का स्थान और रूप — यह पाठ ‘ हतोपदे शः’ क वीरवर-कथा का दूसरा भाग है। पहला पृष्ठ (124) पूरे क-भाग का
संस्कृत सारांश दे ता है, फर कथा संवाद (नाट्य) रूप म चलती है — ‘श क्तधरः –’, ‘वेदरता –’, ‘वीरवती –’, ‘वीरवरः –’,
‘दे वी –’, ‘राजा –’ तथा कोष्ठक म रङ्गसंकेत (तच्छत्वा सानन्दम्, दे वीपूजां वधाय, स्वगतम्, साष्टाङ्गं प्र णपत्य, तं वीक्ष्य)।
कथा का क्रम — वीरवर घर लौटकर सोए हुए प रवार को जगाता है और राजलक्ष्मी का पूरा संवाद सुनाता है → श क्तधर
स्वयं समझ जाता है क ‘सव प्रय वस्तु’ वही है और हँसते हुए तैयार हो जाता है → वेदरता और वीरवती भी कुल-धम का
हवाला दे कर सहमत → सब सवमङ्गला के म न्दर जाते ह → वीरवर पुत्र को अ पत करता है, फर स्वयं को, फर पत्नी और
पुत्री भी वैसा ही करती ह → छपकर दे ख रहा राजा शूद्रक भी अपना सवस्व दे ने को उद्यत होता है → दे वी प्रकट होकर राजा
का हाथ पकड़ लेती ह और सबको जी वत कर दे ती ह → अगले दन वीरवर फर ार पर सेवारत; पूछने पर कहता है ‘न ह
का प वाताऽन्या स्वा मन्’ → प्रसन्न राजा उसे समग्र कणाटप्रदे श दे दे ता है।
शीषक का अथ खुलता है — श क्तधर जस ोक को उद्धत करता है, वही पाठ का नाम है — धना न जी वतञ्चैव पराथ
प्राज्ञ उत्सृजेत्। स न्न मत्ते वरं त्यागो वनाशे नयते स त॥ — शरीर का नाश तो न श्चत ही है; इस लए कसी अच्छे न मत्त पर
कया गया त्याग ही ेष्ठ है।
च रत्र क परख — वीरवर क कतव्य नष्ठा (‘गृहीतस्वा मवतनस्य नस्तारः’ = लए हुए वेतन का ऋण चुकाना), श क्तधर का
नःसंकोच उत्साह (‘तत् कोऽधुना वलम्बस्तात ?’), वेदरता का कुलधम-बोध, वीरवती का गव (‘धन्याहं यस्या ईदृशो जनको
ाता च’) और राजा का भृत्यवात्सल्य — दे वी स्वयं कहती ह ‘अनेन ते सत्त्वोत्कषण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीता स्म’।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 11 स न्न मत्ते वरं त्यागः (ख-भागः) AglaSem · NCERT Solutions
व्याकरण का केन्द्र (अत्र इदम् अवधेयम्) — वाच्यं त्र वधम् — (1) कतृवाच्यम् : कता म प्रथमा, क्रया कता के अनुसार
(बालकः ग्रामं गच्छ त); (2) कमवाच्यम् : कता म तृतीया, कम म प्रथमा, क्रया कम के अनुसार, रूप = धातु + य +
आत्मनेपद (बालकेन ग्रामः गम्यते); (3) भाववाच्यम् : अकमक धातु के साथ, कता म तृतीया और क्रया सदा प्रथमपुरुष
एकवचन म अप रव तत (बालकेन हस्यते, अस्मा भः हस्यते)। सदा अकमक धातु — हस्, क्रन्द्, स्था, स्ना, शी, भू।
अभ्यास और योग्यता वस्तरः — अभ्यास के सात प्रश्न प्रश्न नमाण, पाठबोध, सवनाम- नदश, अन्वय, पदच्छे द, स न्ध/
स न्धच्छे द तथा घटनाक्रम पर ह। योग्यता वस्तरः म पाठ के दोन ोक का पदच्छे द–अन्वय–भावाथ, तीन सुभा षत (कनक-
परीक्षा, कमण्येवा धकारस्ते — गीता २.४७, स्वधम ह परं तपः) और अकमकधातुलक्षणम् दया गया है। प रयोजनाकायम्
— पाठ पर आधा रत नाटक रचकर उसका मञ्चन।
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त्व रत पुनरावृ त्त
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शब्दः
s e mअथः (संस्कृतम्) हन्द अथ
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आवासम् ग ृहम् घर House
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To the languishing due to sleepiness
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नद्रालसाम् िनद ापभावेण आलस्ययुक्ताम् न द के कारण अलसाई हुई को
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glaकया
दु हतरम् पुत्र ीम् बेट को Daughter
अवणयत् वणनम् अकरोत्
aवणन Described
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सानन्दम् पसन्नतया प्रसन्नता के साथ Happily
mिक्तः as e
व नयोगः
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िनयु नयुक्त (करना)
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Utilisation
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परम ाघ्यः अत्यन्तं पशंस नीयः परम प्रशंसा के योग्य Most appreciable
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उत्सृजेत् त्यक्तव्यम् त्यागना चा हए Should sacrifice
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बहुत अच्छा.c
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स न्न मत्ते समुपयुक्ते कारणे कारण होने पर Having good cause
वरम् ेयस्करम् aglप्रशंसनीय, ेष्ठ Praiseworthy
नस्तारः (ऋणाद् ) िवमुिक्तः (ऋण) चुकाना Repay
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आयतनम् आँगन, म न्दर-प रसर Courtyard
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पिरसरः
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गृह्यताम् स्वीकु रु स्वीकार करो Accept
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उ त्क्षप्तः उत्थािपतः उठाया गया Lifted upward
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प्रत्यक्षीभूतया
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प्रत्यक्ष रूप से उप स्थत के ारा By the one who has become manifest
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पत्यक्ष-रूपेण िवराजमानया
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as राज्य का नाश
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राज्यभङ्गः राज्य-नाशनम् Downfall of the empire
सत्त्वोत्कषण सत्त्वगुण क पराकाष्ठा से By the excellence of purity
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सत्त्वग ण
ु स्य पराकाष्ठया
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वात्सल्येन स्नेहेन वात्सल्यभाव से With affection
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प्रासादम् राजभवनम् राजभवन Palace
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राजा
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