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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 12 सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते

AglaSem पर कक्षा 8 संस्कृत पाठ 12 सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते (दीपकम्) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 12 (Deepakam).
NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 12 सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते - Page 1 of 36

About NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 12 सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते

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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 12 सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा8

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 12: सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके
महीयते

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

137 – 145 13 46 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 35 pages

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 8 · सं स्कृ त · द पकम्

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 12: सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके
महीयते
NCERT कक्षा 8 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के द्वादशः पाठः — सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते का सम्पूण हल। यह शक्षा (वेदाङ्ग)
वषय का पद्यात्मक पाठ है, जसम पाँच ोक के द्वारा बताया गया है क वण का उच्चारण न तो अस्पष्ट (अव्यक्त) हो और न ही आवश्यकता से
अ धक ज़ोर लगाकर (पी डत) — जैसे बा घन अपने बच्च को दाँत म इस प्रकार पकड़ती है क वे न गर और न घायल ह । पाठ के आरम्भ म आचाय
कक्षा म इन्द्र और वृत्रासुर क कथा सुनाते ह, जहाँ एक स्वर के बदल जाने से ‘इन्द्रशत्रुः’ का अथ ही उलट गया। नीचे पृष्ठ 137 से 145 तक का चत्र-
संवाद तथा कथा, पाँच ोक का पदच्छे द–अन्वय–अथ–भाव, वयं शब्दाथान् जानीमः क पूरी सारणी, अत्र इदम् अवधेयम् (षट् वेदाङ्गा न),
अभ्यासात् जायते स द्धः के प्रश्न १–६ का प्रत्येक उपभाग, योग्यता वस्तरः (क तथा ख) और प रयोजनाकायम् क्रमशः हल कए गए ह — पहले
संस्कृत उत्तर, फर कोष्ठक म हन्द अथ।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

द पकम् (कक्षा 8) 137 – 145

खं ड प्रश्न

13 46

माध्यम

हन्द

चत्र-संवादः तथा कथा (पाठे वद्यमानाः प्रश्नाः) — पृष्ठ 137
पाठारम्भे कक्षायां आचायस्य, छात्राणां हमान्याश्च संवादः तथा इन्द्र-वृत्रासुर-कथा

चत्र-सं वादः

प्र.1 छात्राः आचाय कम् अवदन् ? आचायः च कम् उत्तरम् अयच्छत् ?

छात्राः — ‘नमस्ते आचाय ! अद्य वयम् एकां कथां श्रोतुम् इच्छामः। कृपया कथां श्रावय त वा महोदय !’
आचायः — ‘नमस्ते छात्राः ! भवतां मनोरञ्जनाथम् आदौ कथाश्रवणम्। अनन्तरं पाठनम्।’

हन्द म: छात्र ने कहा — ‘नमस्ते आचाय! आज हम एक कथा सुनना चाहते ह। कृपया कथा सुनाइए।’ आचाय ने
उत्तर दया — ‘नमस्ते छात्रो! तुम्हारे मनोरंजन के लए पहले कथा सुनना, उसके बाद पढ़ाई।’ फर वे कहते ह —
‘त ह सावधानं शृण्वन्तु’ (तो ध्यान से सुनो)।

ध्यान द जए: ‘श्रावय त’ णजन्त (प्रेरणाथक) रूप है — श्रु (सुनना) → श्रावय त (सुनाता है)। ‘श्रोतुम्’ तुमुन्-
प्रत्ययान्त = ‘सुनने के लए’। ‘शृण्वन्तु’ लोट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन = ‘सुन’।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते AglaSem · NCERT Solutions

प्र.2 वृत्रासुरः कमथ यज्ञं का रतवान् ? यज्ञे आहु तमन्त्रः कः आसीत् ?

उत्तरम् — स्वस्य बलं वध यतुम् इन्द्रं जेतुं च वृत्रासुरः यज्ञं का रतवान्। यज्ञे आहु तमन्त्रः आसीत् — ‘इन्द्रशत्रुवधस्व’ इ त।

हन्द अथ: दे वताओं के राजा इन्द्र थे और असुर का राजा वृत्रासुर था। दोन म सदा वैरभाव रहता था। अपना बल
बढ़ाने और इन्द्र को जीतने के लए वृत्रासुर ने यज्ञ कराया। उस यज्ञ का आहु त-मन्त्र था — ‘इन्द्रशत्रुवधस्व’ अथात्
‘इन्द्रशत्रु बढ़े ’।

व्याकरण-सङ् केतः: ‘वध यतुम्’ तथा ‘जेतुम्’ — तुमुन्-प्रत्यय (‘…के लए’)। ‘का रतवान्’ — णच् + क्तवतु,
अथात् ‘करवाया’ (स्वयं नह कया)। ‘वधस्व’ — वृध् धातु, लोट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन, आत्मनेपद = ‘तू
बढ़’।

प्र.3 ऋ त्वजः कम् अकुवन् ? तस्य प रणामः कः अभवत् ?

उत्तरम् — ऋ त्वजः मन्त्रे स्वरं प रव ततवन्तः। स्वरप रवतनेन अथः प रव ततः। प रणामतः वृत्रासुरस्य स्थाने इन्द्रस्य बलं व धतम्।
बलवान् इन्द्रः व ेण वृत्रासुरं मा रतवान्।

यह हुआ कैसे: ऋ त्वज (यज्ञ कराने वाले पुरो हत ) ने सोचा क यज्ञ के अन्त म वृत्रासुर बलवान् होकर लोग को
सताएगा — ‘यज्ञावसाने वृत्रासुरो बली भूत्वा जनान् पीड यष्य त इ त वचाय’ — इस लए उन्ह ने मन्त्र का स्वर बदल
दया।
‘इन्द्रशत्रुः’ के दो पाठ —
• जैसा वृत्रासुर चाहता था : इन्द्रः शत्रुः यस्य सः — बहु ी ह समास, अन्त्य स्वर उदात्त → अथ ‘ जसका शत्रु इन्द्र है,
वह (वृत्रासुर) बढ़े ’।
• जैसा ऋ त्वज ने बोला : इन्द्रस्य शत्रुः — तत्पुरुष समास, आ द स्वर उदात्त → अथ ‘इन्द्र का शत्रु (नाश करने
वाला इन्द्र) बढ़े ’।
केवल स्वर बदला, एक भी अक्षर नह — फर भी अथ उलट गया।

पाठ से जो ड़ए: यही इस पाठ क जड़ है। य द स्वर या वण क एक छोट -सी चूक पूरे मन्त्र का फल उलट सकती
है, तो पढ़ते-बोलते समय हम कतना सावधान रहना चा हए! इसी से आगे ोक ३ का सद्धान्त नकलता है — ‘एवं
वणाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पी डताः’।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते AglaSem · NCERT Solutions

प्र.4 कथाश्रवणानन्तरं छात्राः हमानी च कम् अवदन् ? कथायाः शक्षा का ?

छात्रः — ‘बहु सुन्दरी कथा महोदय ! त ह वयम प पठनकाले भाषणकाले च स्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कुमः।’
हमानी के प्र त आचायः — ‘त्वं यथाथ भाषसे हमा न ! शुद्धोच्चारणस्य सन्दभ एव अधुना एतं वषयं पठामः।’

कथा क शक्षा: उच्चारण केवल ‘सुनने म अच्छा लगना’ नह है — वह अथ का वाहक है। स्वर या वण बदलते ही
वाक्य का अथ, और कभी-कभी उसका उल्टा अथ, नकल आता है। इस लए पढ़ते समय और बोलते समय —
दोन म — उच्चारण स्पष्ट (व्यक्त) और शुद्ध होना चा हए।

ध्यान द जए: ‘ हमा न’ — सम्बोधन प्रथमा, एकवचन (मूल रूप हमानी, ईकारान्त स्त्री लङ्ग; सम्बोधन म ह्रस्व
‘इ’)। ‘भाषसे’ — भाष् धातु, लट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन, आत्मनेपद = ‘तुम बोलती हो’।

पाठः — पञ्च ोकाः (पदच्छे दः · अन्वयः · अथः · भावः) — पृष्ठ 138–140
पुस्तके प्रत्येकं ोकस्य पदच्छे दः, अन्वयः, भावाथः च मु द्रताः स न्त

पाठः

प्र.5 ोकः १ — यद्य प बहु नाधीषे तथा प पठ पुत्र व्याकरणम्। स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्॥
१॥ — अस्य पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — यद्य िप · बहु · न · अधीषे · तथािप · पठ · पुत्र · व्याकरणम् · स्वजनः · श्वजनः · मा · अभूत ् ·

सकलम् · शकलम् · सकृ त् · शकृ त्।

अन्वयः — पुत्र ! यद्य िप बहु न अधीषे तथािप व्याकरणं पठ। येन स्वजनः श्वजनः (इित ) सकलं शकलं (इित )

सकृ त् शकृ त् (इित ) च मा अभूत ्।

अथ ः (शब्दशः) — पुत्र = हे बेट ा · यद्यिप = यद्यिप, चाहे · बहु न अधीषे = त मु बहुत न पढ़ ो · तथािप = तो भी ·

व्याकरणं पठ = व्याकरण पढ़ ो ‖ मा अभूत ् = ऐसा न हो जाए िक · स्वजनः (बन्धु) ‘श्वजनः’ (कु त्ता) · सकलम्

(पूरा) ‘शकलम्’ (टु क ड़ ा) · सकृ त् (एक बार) ‘शकृ त्’ (मल) बन जाए।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते
a g l AglaSem · NCERT Solutions

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भावाथ ः (पुस्तकान स
ु ारम्) — अिय पुत्र ! यद्यिप भवान् वा बहून ् िवषयान् पिठत ुं न पारयित तथािप व्याकरणं त ु
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अवश्यं पठत ।
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ु येन उच्चारणसमये स्वजनः (अथ त् बन्धुः) इत्यस्य स्थाने श्वजनः (अथ त् शुन कः) इित न भवेत ्।
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एवमेव, सकृ त् (अथ त् एकवारम्) इत्यस्य स्थाने शकृ त् (अथ त् िवष्ठा) इित, सकलम् (पूणम्) इत्यस्य स्थाने
aशकलं (खण्डम्) इित दोषपूणम् उच्चारणं न भवेत्।

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g ‘स’ क जगह ‘श’ — और तीन बार अथ गौरव से गरकर हास्य या
भावः ( हन्द म): क व व्याकरण क एक ही ज़रूरत गनाता है, पर वह नणायक है — अथ क रक्षा। तीन
उदाहरण म बदलाव सफ़ एक वण का हैa—
अपमान बन जाता है :

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• स्वजनः (अपना ब ु) → श्वजनः (कुत्ता)

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• सकलम् (पूरा) → शकलम् (टु कड़ा)
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c बार) → शकृत् (मल)
• सकृत्.(एक
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seलए ‘बहुत वषय न पढ़ पाओ तो कोई बात नह , पर व्याकरण छोड़ना मत’ — क्य क व्याकरण ही सखाता है
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a क कौन-सा वण कहाँ और कैसे बोला जाए।

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as ‘पुत्र’ सम्बोधन प्रथमा, एकवचन, पुं ल्लङ्ग। ‘मा अभूत्’ —
व्याकरण-सङ् केतः: ‘अधीषे’ = अ ध + इङ् (अधीते धातु, लट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन — ‘तुम पढ़ते हो’।
‘पठ’ लोट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन l(आज्ञा)।
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a (अडागम) नह लगता; इस लए ‘माऽभूत्’, ‘मा भूत्’ — ‘न हो जाए’।
‘मा’ के साथ लुङ् लकार, और अ-कार

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स न्ध: श्वजनो माभूत् = श्वजनः + मा अभूत् ( वसग-स तथा स्वर-स )।
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a s em ोकः २ — व्या ी यथा हरेत् पुत्रान् दं ाभ्यां न च पीडयेत्। भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वणान् प्रयोजयेत्॥ २॥ —
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प्र.6

a अस्य पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।

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पद च् छे द ः — व्याघी · यथा · हरेत ् · पुत्रान् · दं ाभ्याम् · न · च · पीडयेत ् · भीता · पतनभे द ाभ्याम् · त द्वद् · वण न्

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· पयोजयेत ्।
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m .अc न्वयः — यथा पतनभे दाभ्यां भीता व्याघी दं ाभ्यां पुत्रान् हरेत् न च पीडयेaतg् तद्वत् (जनः) वण न् पयोजयेत्।
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अथ ः (शब्दशः) — यथा = जै से · पतनभे द ाभ्यां भीता = िगरने और िचर जाने (घाव) — दोनों से डरी हुई · व्याघी

= बािघन · दं ाभ्याम् = अपने दो दाँeतm . c a g
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ों (दाढ़ ों) से · पुत्रान् हरेत ् = बच्चों को उठा ले जाती है · न च पीडयेत ् =

और उन्हे ं चोट नही ं पहँच ag‖ lतद्वत् = उसी पकार · (मनुष्यः) वण न् पयोजयेत् = मनुष्य वण ं का उच्चारण करे।
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भावाथ ः (पुस्तकान स
ु ारम्) — व्याघी स्विशशुं दन्तै ः नयित। तस्याः दन्ताः अतीव तीक्ष्णाः भविन्त। अतः सा िशशुं

तथा न गृ ाित येन िशशुः क्षतः भवेत ्। एवमेव तथा न गृ ाित येन िशशुः पते त ्। वण नाम् उच्चारणम् अिप तथै व

कतव्यम्। वण च् चारणम् अितकठोररूपेण अितशैिथ ल्येन वा न कत व्यम्।

भावः ( हन्द म): यह पूरे पाठ का सबसे सुन्दर दृष्टान्त है। बा घन के दाँत बहुत तीखे ह और बच्चा बहुत कोमल —
इस लए उसे एक साथ दो डर ह : पकड़ ढ ली रखे तो बच्चा गर जाएगा (पतन), कसकर पकड़े तो घायल हो जाएगा
(भेद)। वह ठ क बीच क पकड़ बनाती है — न ढ ली, न कसी।
वण का उच्चारण भी ऐसा ही सन्तुलन माँगता है — बहुत ढ ला बोलो तो वण अस्पष्ट (अव्यक्त) हो जाएगा, बहुत
ज़ोर लगाओ तो पी ड़त हो जाएगा। शुद्ध उच्चारण इन दोन के बीच है।

अलङ् कारः: यहाँ उपमा अलंकार है — ‘यथा… तद्वत्’। उपमेय = वण का उच्चारण, उपमान = बा घन का बच्चे
को उठाना, साधारण धम = सन्तु लत पकड़, वाचक शब्द = यथा/तद्वत्।
व्याकरण-सङ् केतः: ‘दं ाभ्याम्’ तथा ‘पतनभेदाभ्याम्’ — दोन तृतीया वभ क्त, द्ववचन, स्त्री लङ्ग (‘दो दाँत
से’, ‘ गरने और घाव — दोन से’)। ‘हरेत्’, ‘पीडयेत्’, ‘प्रयोजयेत्’ — तीन व ध लङ् लकार, प्रथमपुरुष
एकवचन (‘करना चा हए’ का भाव)। ‘भीता’ — स्त्री लङ्ग वशेषण, व्या ी का वशेषण।

प्र.7 ोकः ३ — एवं वणाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पी डताः। सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते॥ ३॥ — अस्य
पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — एवम् · वण ः · पयोक्त व्याः · न · अव्यक्ताः · न · च · पीिडताः · सम्यग् · वणपयोगेण · बह्मलोके ·

महीयते ।

अन्वयः — एवम् अव्यक्ताः पीिडताः च वण ः न पयोक्त व्याः। सम्यक् वणपयोगेण (सः) बह्मलोके महीयते ।

अथ ः (शब्दशः) — एवम् = इस पकार · वण ः पयोक्तव्याः = वण ं का पयोग (उच्चारण) करना चािहए · न अव्यक्ताः

= न तो अस्पष्ट · न च पीिडताः = और न ही (अिधक ज़ोर से) पीिड़ त ‖ सम्यक् वणपयोगेण = वण ं के ठीक-ठीक
पयोग से · बह्मलोके महीयते = (मनुष्य) बह्मलोक में सम्मान पाता है।

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भावाथ ः (पुस्तकान स
ु ारम्) — वण नाम् उच्चारणसमये इदम् अवधेयं यत् वण ः स्पष्टतया स्वाभािवकरूपेण च

उच्चारणीयाः। एते न श्रोता वक्त ःु भावान् सम्यक्तया अवगच्छित। एवं सावधानम् उच्चारणशीलः समाजे सम्मानं

पाप्नोित।

भावः ( हन्द म): यही पाठ का शीषक- ोक है और यही उसका नष्कष। पछला ोक दृष्टान्त था, यह उसका
सद्धान्त है — दो सीमाएँ बताकर बीच का रास्ता तय कर दे ता है :
• न अव्यक्ताः — बहुत कम प्रयत्न से बोले गए, अस्पष्ट (पुस्तक क प रभाषा : अव्यक्ताः = अस्पष्टाः,
अल्पप्रयत्नयुक्ताः)
• न च पी डताः — आवश्यकता से अ धक ज़ोर लगाकर बोले गए (पुस्तक क प रभाषा : पी डताः = बा धताः,
अ धकप्रयत्नयुक्ताः)
इसका फल भी बताया — ‘ब्रह्मलोके महीयते’। पुस्तक स्वयं इसका व्यावहा रक अथ खोलती है — ‘एवं सावधानम्
उच्चारणशीलः समाजे सम्मानं प्रा ो त’ — शुद्ध बोलने वाला समाज म आदर पाता है। कारण सीधा है : शुद्ध
उच्चारण से ही श्रोता वक्ता का भाव ठ क-ठ क समझ पाता है।

व्याकरण-सङ् केतः: ‘प्रयोक्तव्याः’ — तव्यत् (कृत्य) प्रत्यय = ‘प्रयोग कए जाने चा हए’; प्रथमा वभ क्त,
बहुवचन, पुं ल्लङ्ग (वणाः का वशेषण)। ‘वणप्रयोगेण’ — तृतीया वभ क्त, एकवचन (करण/हेतु म)। ‘महीयते’
— कमवाच्य-सा दखने वाला आत्मनेपद रूप, लट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन = ‘पूजा जाता है, सम्मान पाता है’।
स न्ध: ‘नाव्यक्ता’ = न + अव्यक्ताः (द घ स्वर-स ); ‘सम्यग्वण°’ = सम्यक् + वण° (जश्त्व-स — क् → ग्)।

प्र.8 ोकः ४ — माधुयमक्षरव्य क्तः पदच्छे दस्तु सुस्वरः। धैय लयसमथ च षडेते पाठका गुणाः॥ ४॥ — अस्य
पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — माधुयम् · अक्षरव्यिक्तः · पद च् छे द ः · तु · सुस्वरः · धैयम् · लयसमथ म् · च · षट् · एते · पाठका ·

गुणाः।

अन्वयः — माधुयम् अक्षरव्यिक्तः पद च् छे द ः तु सुस्वरः धैय ं लयसमथ ं च एते षट् पाठकाः गुणाः (भविन्त )।

भावाथ ः (पुस्तकान स
ु ारम्) — मधुरेण स्पष्टम् उच्चारणम्, अपेिक्षतस्थाने पदच्छे द ः, सवषां श्रवणयोग्येन

समुिचतस्वरेण कथनम्, सन्दे हं िवना पठनाय धैय,ं िवषये च तल्लीनता इित एते उत्तमस्य पाठकस्य षड् गुणाः

भविन्त। पठनम् इित कौशलं सम्पादियत ुं वयम् एतान् गुणान् वधयामः।

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छह गुण एक-एक करके —

गुणः पुस्तक का अथ पढ़ते समय इसका मतलब

माधुयम् मध रु भावः िमठास — सुनने वाले को कड़वा या रूखा न ल गे

अक्षरव्य क्तः अक्षराणां स्फु टतया उच्चारणम् हर अ क्ष र अल ग और साफ़ सुनाई दे

पदच्छे दः अपेिक्षतस्थाने िवरामः जहाँ रु कना चािहए वही ं रु कना — बीच शब्द में नही ं

सुस्वरः शोभनः स्वरः मध ुर स् , वर जो सबको सुनाई दे

धैयम् िवश्वासः त् श्
आ मिव वास — िबना घबराए , िबना स न्दे ह के पढ़ना

लयसमथम् िवषये तल्लीनता ल य बनाए रखना और िवषय में डू बकर पढ़ ना

भावः ( हन्द म): ‘अच्छा पाठक’ कसे कह — यह ोक उसक पूरी प रभाषा छह शब्द म दे दे ता है। ध्यान
द जए क इनम तीन गुण ध्व न से जुड़े ह (माधुयम्, अक्षरव्य क्तः, सुस्वरः), एक अथ से (पदच्छे दः — गलत जगह
रुकने से अथ बदल जाता है), और दो पाठक के मन से (धैयम्, लयसमथम्)। इसी लए पुस्तक कहती है — पढ़ना
भी एक कौशल है, जसे अभ्यास से बढ़ाया जाता है।

व्याकरण-सङ् केतः: ‘षट् ’ संख्यावाचक वशेषण; ‘एते’ — प्रथमा बहुवचन, पुं ल्लङ्ग। ‘पाठकाः गुणाः’ = पाठक
(पढ़ने वाले) के गुण; ‘पाठका’ म स के कारण वसग लुप्त है (पाठकाः + गुणाः)।
स न्ध: ‘माधुयमक्षरव्य क्तः’ = माधुयम् + अक्षरव्य क्तः; ‘पदच्छे दस्तु’ = पदच्छे दः + तु ( वसग-स ); ‘षडेते’ = षट्
+ एते (जश्त्व-स )।

प्र.9 ोकः ५ — गीती शी ी शरःक ी तथा ल खतपाठकः। अनथज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः॥ ५॥ — अस्य
पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — गीती · शीघी · िशरःक म्पी · तथा · िलिखतपाठकः · अनथ ज्ञः · अल्पक ण्ठः · च · षट् · एते ·

पाठकाधमाः।

अन्वयः — गीती शीघी िशरःक म्पी िलिखतपाठकः अनथ ज्ञः अल्पक ण्ठः च एते षट् पाठकाधमाः भविन्त ।

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ु ारम्) — यः जनः गीतगानम् इव पठित, शीघं-शीघं वेगेन वा पठित, मस्तकदोलनं कृ त्वा
भावाथ ः (पुस्तकान स

पठित, यः जनः िलिखत्वा िलिखत्वा पठित, अथबोधं िवना पठित, मन्दस्वरेण पठित सः अधमपाठकः इित उच्यते ।

अतः पठनकाले वयम् एतान् दोषान् पिरष्कृ त्य पठामः चे त ् आदशपाठकाः भवामः।

छह दोष एक-एक करके —

दोषः पुस्तक का अथ क्य दोष है

गीती यः गीतगानम् इव पठित ब्
गाकर पढ़ ने से श द िखंच जाते है ं और अथ पीछे छूट जाता है

शी ी यः वेग ेन पठित बहुत तेज़ पढ़ ने से अ क्ष र आपस में िमल जाते है ं — अक्षर व्यिक्त नष्ट

शरःकम्पी यः िशरः चालयन् पठित िसर िहल ाना ध् यान बाँटता है और स्वर ल ड़ खड़ ाता है

ल खतपाठकः यः िलिखत्वा िलिखत्वा पठित क -
े वल िल खे को दे ख दे खकर रटना — क ण् ठस्थ नही ं होता

अनथज्ञः यः अथं न जानाित च्
अथ न जानने पर पद छेद भी गल त जगह पड़ ता है

अल्पकण्ठः दुबलध्विनयुक्तः इतने धीमे पढ़ ना िक श्र ोता तक पहु ँचे ही नही ं — सुस्वर का उ ल्टा

भावः ( हन्द म): ोक ४ ने बताया था क क्या करना है; यह ोक बताता है क क्या नह करना। दोन को साथ
रखकर दे खए तो हर दोष कसी न कसी गुण का ठ क उलटा है — शी ी ↔ अक्षरव्य क्तः, अल्पकण्ठः ↔ सुस्वरः,
अनथज्ञः ↔ पदच्छे दः, गीती ↔ माधुयम्। पुस्तक अन्त म आशा भी दे ती है — ये दोष स्वभाव नह , आदत ह; इन्ह
सुधार ल (‘एतान् दोषान् प रष्कृत्य’) तो हम भी आदशपाठक बन सकते ह।

व्याकरण-सङ् केतः: ‘गीती’, ‘शी ी’, ‘ शरःक ी’ — इ न-प्रत्ययान्त कतृवाचक रूप, प्रथमा एकवचन, पुं ल्लङ्ग
(‘…करने वाला’)। ‘अनथज्ञः’ = अनथ + ज्ञः (जो अथ नह जानता); ‘अल्पकण्ठः’ = अल्पः कण्ठः यस्य सः
(बहु ी ह)।
स न्ध: ‘अनथज्ञोऽल्पकण्ठश्च’ = अनथज्ञः + अल्पकण्ठः + च — यहाँ दो स याँ ह : वसग + अ → ‘ओऽ’
(पूवरूप-स , इसी लए अवग्रह ‘ऽ’ लगा), और अल्पकण्ठः + च → अल्पकण्ठश्च (श्चत्व-स )।

वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 140–141

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते
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शब्दाथ-सारणी तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भः
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शब्दाथाः

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a s emशब्दाथान् जानीमः’ — पृष्ठ 140–141 क पूरी शब्दाथ-सारणी (शब्दः · अथः · हन्द · English)।
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‘वयं
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प्र.10

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नीचे पुस्तक क दोन पृष्ठ क सारणी ज्य -क -त्य द गई हैm .
a s e — पहले संस्कृत पयाय, फर हन्द और अंग्रेज़ी अथ।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते AglaSem · NCERT Solutions

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द ENGLISH

ऋ त्वजः पुर ोिहताः प ुरोिहत Priests

करतालम् करताडनध्विनः ताल ी Clap

अधीषे पठिस त ुम पढ़ ते हो You read

श्वजनः शुनकः / कु क्कु रः कु त्त ा Dog

सकलम् सम्पूणम् पूर ा Entire

शकलम् खण्डम् टुक ड़ ा Fragment

सकृत् एकवारम् एक बार Once

शकृत् मलम् ष्
िव ठ ा (मल ) Faeces

अव्यक्ताः अस्पष्टाः अ स् ष् ( श्
प ट आव यकता से कम Unclear (Usage of less effort as
(अल्पपयत्नयुक्ताः) त्
पय न करना ) supposed to be used)

पी डताः बािधताः पीिड़ त (आवश्यकता से अिधक Afflicted (Usage of more effort as
(अिधकपयत्नयुक्ताः) त्
पय न से य ु त क् ) supposed to be used)

महीयते पूज्यते / सम्मानं लभते म्
स मािनत होता है Honoured / respected

व्या ी शादू ला (स्त्रीव्याघ ः) बािघन Tigress

दं ाभ्याम् दन्ताभ्याम् द ाँतों से With the fangs

पीडयेत् िहंस नं कु य त् ष्
क ट दे May cause pain

भीता भयेन पूिरता डरी हई
ु Afraid

प्रयोजयेत् उच्चारणं / पयोगं कु य त् च्
उ चारण / पयोग कर सकता है May pronounce / apply

माधुयम् मध रु भावः िमठास / माध ुय Sweetness

अक्षरव्य क्तः अक्षराणां स्फु टतया अ क्ष स् ष्
र प टता Clarity of letters
उच्चारणम्

सुस्वरः शोभनः स्वरः मध ुर स्
वर Pleasant voice

धैयम् िवश्वासः त् श्
आ मिव वास Courage / Self-Confidence

पाठकाः पठनसम्बिन्धनः पढ़ ने से स बि धत म् न् Related to Reading

शी ी यः वेग ेन पठित तेज़ गित से पढ़ ने वाल ा Fast reader

शरःकम्पी यः िशरः चालयन् पठित िसर िहल ाकर पढ़ ने वाल ा One who nods head and reads

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते AglaSem · NCERT Solutions

अनथज्ञः यः अथं न जानाित जो अथ नही ं जानता Who does not understand meaning

अल्पकण्ठः दुबलध्विनयुक्तः धीमे स्
वर वाल ा Weak-voiced

सबसे ज़रूरी दो पं क्तयाँ: इस पाठ क पूरी कसौट सारणी क इन्ह दो पं क्तय म है — अव्यक्ताः =
अल्पप्रयत्नयुक्ताः (ज़रूरत से कम प्रयत्न) और पी डताः = अ धकप्रयत्नयुक्ताः (ज़रूरत से अ धक प्रयत्न)। ोक
३ इन्ह दोन को मना करता है — ‘नाव्यक्ता न च पी डताः’। इन्ह रट ली जए, पूरा पाठ खुल जाएगा।

प्रयोगः (पाठात्): ‘ऋ त्वजः मन्त्रे स्वरं प रव ततवन्तः’ · ‘यद्य प बहु न अधीषे’ · ‘व्या ी यथा हरेत् पुत्रान् दं ाभ्यां
न च पीडयेत्’ · ‘भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वणान् प्रयोजयेत्’ · ‘सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’।

प्र.11 मातृभाषया अथ लखत — (सारणी का अ न्तम स्तम्भ रक्त है; वहाँ अपनी मातृभाषा म अथ लखना है।)

यह स्तम्भ अपनी मातृभाषा म भरना है — हन्द , मराठ , बांग्ला, त मल, गुजराती… जो भी आपक हो। ऊपर प्रश्न 10 क सारणी
म हन्द अथ पहले ही दे दए गए ह, इस लए हन्द -माध्यम के वद्याथ वही उतार ल।
नमूना उत्तर (मराठ म) —

शब्दः हन्द मराठ (मातृभाषया)

श्वजनः कु त्ता कु त्र ा

सकलम् पूर ा संपूण

शकलम् टुक ड़ा त ुकडा

व्या ी बािघन वाघीण

भीता डरी हुई घाबरले ल ी

माधुयम् िमठास गोडवा

धैयम् आत्मिवश्वास त् श्
आ मिव वास

महीयते सम्मािनत होता है न्
स मािनत होतो

करने का तरीका: पहले संस्कृत पयाय (दूसरा स्तम्भ) प ढ़ए, फर हन्द अथ दे खए, और तब अपनी भाषा का वह
शब्द ढूँ ढ़ए जो ठ क वही काम करता हो। शब्दकोश का पहला शब्द मत उठा ली जए — जैसे ‘पी डताः’ का अथ
यहाँ ‘दुखी’ नह , ब ल्क ‘ज़रूरत से अ धक ज़ोर लगाकर बोला गया’ है। सन्दभ ही सही अथ तय करता है।

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अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 142
व्याकरण-पे टका — ‘ शक्षा-कल्प-व्याकरण- नरुक्त-छन्दः-ज्यो तषम्’ इ त षट् वेदाङ्गा न

वे दाङ्गा न

प्र.12 षट् वेदाङ्गा न का न स न्त ? तेषु प्रत्येकस्य वषयः कः ?

उत्तरम् — ‘ शक्षा-कल्प-व्याकरण- नरुक्त-छन्दः-ज्यो तषम्’ इ त षट् वेदाङ्गा न स न्त। ( शक्षा, कल्प, व्याकरण, नरुक्त, छन्द तथा
ज्यो तष — ये छह वेदाङ्ग ह।)

वेदाङ्गम् पुस्तक का वाक्य हन्द म वषय

१. शक्षा िशक्षाग न्थेष ु वण नाम् उच्चारणिविधः, स्वराः, िवरामः च विणताः सिन्त। वण ं क च्
े उ चारण की िविध , स्वर और िवराम
(कहाँ रुकें )

२. कल्पः कल्पग न्थेष ु यज्ञादीनां ि यािवधे ः वणनम् अिस्त। यज्ञ आिद की ि -
या िविध

३. व्याकरणग न्थेष ु भाषायाः िनयमाः सिन्त। भाषा के िनयम

व्याकरणम्

४. नरुक्तम् अिस्मन् शास्त्रे शब्दानां व्युत्पित्तः वतते। ब्
श द ों की व् त् त्त ( ब्
य ु पि श द कहाँ से बना )

५. छन्दः अिस्मन् शास्त्रे मात्रा-ताल-इत्यािददृ ष्ट ा गायनसम्बद्धं वणनम् अिस्त। मा त्र - ष्
ा ताल आिद की दृ ि ट से गायन (छन्द -रचना)

६. ज्यो तषम् अिस्मन् शास्त्रे सूय-चन्द -इत्यादीनां नक्षत्राणां गतेः एवं तेषां पभावस्य - न्
सूय च द आिद न क्षत्र ों की गित और उ नका पभाव

वणनम् अिस्त।

‘अङ्ग’ क्य कहा गया: जैसे शरीर के अङ्ग के बना शरीर काम नह करता, वैसे ही इन छह शास्त्र के बना वेद
ठ क-ठ क पढ़ा और समझा नह जा सकता। इसी पाठ के योग्यता वस्तर (ख) का अ न्तम ोक इसी रूपक को
खोलता है — छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते — छन्द वेद के पैर, कल्प हाथ, ज्यो तष आँख, नरुक्त
कान, शक्षा नाक और व्याकरण मुख है।

प्र.13 ‘ शक्षा’ इ त वेदाङ्गे क व णतम् ? अस्य पाठस्य तेन सह कः सम्बन्धः ?

उत्तरम् — शक्षाग्रन्थेषु वणानाम् उच्चारण व धः, स्वराः, वरामः च व णताः स न्त। ( शक्षा-ग्रन्थ म वण के उच्चारण क व ध, स्वर
तथा वराम का वणन है।)

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पाठ से सम्बन्ध: यह पूरा पाठ ‘ शक्षा’ वेदाङ्ग का ही वषय है — तीन बात पाठ म मलती ह :
• उच्चारण व धः — ‘एवं वणाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पी डताः’ ( ोक ३) तथा बा घन का दृष्टान्त ( ोक २)।
• स्वराः — इन्द्र-वृत्रासुर क कथा, जहाँ ‘इन्द्रशत्रुः’ का केवल स्वर बदलने से अथ ही उलट गया।
• वरामः — ‘पदच्छे दः’, जसे ोक ४ पाठक का एक गुण गनाता है — ठ क जगह रुकना।
और योग्यता वस्तर के अ न्तम ोक का चरण ‘तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते’ पाठ के शीषक
‘सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’ से सीधे जुड़ जाता है।

पा रभा षक शब्द: ‘ शक्षा’ का यहाँ अथ ‘पढ़ाई / education’ नह है। यह ध्व न- वज्ञान (phonetics) का
प्राचीन शास्त्र है। ‘पा णनीय- शक्षा’, ‘माण्डू क्य- शक्षा’, ‘याज्ञवल्क्य- शक्षा’ — इसी शास्त्र के ग्रन्थ ह, और
योग्यता वस्तर (ख) म इन्ह तीन के ोक दए गए ह।

प्र.14 ोकः १ कथय त — ‘तथा प पठ पुत्र व्याकरणम्’। ‘व्याकरणम्’ इ त वेदाङ्गं कमथम् आवश्यकम् ?

उत्तरम् — व्याकरणग्रन्थेषु भाषायाः नयमाः स न्त। अतः व्याकरणेन वना शुद्धं भाषणं शुद्धं लेखनं च न सम्भव त।

क्य : भाषा के नयम ही तय करते ह क कौन-सा वण कहाँ आएगा, कौन-सी वभ क्त लगेगी और शब्द का रूप क्या
बनेगा। नयम न जानने पर स्वजनः बोलते-बोलते श्वजनः हो जाता है और सकृत् हो जाता है शकृत् — अथात्
अपमानजनक या हास्यास्पद अथ नकल आता है। इसी लए ोक कहता है — बाक वषय भले कम पढ़ो, पर
व्याकरण अवश्य पढ़ो।

जोड़कर दे खए: पा णनीय- शक्षा के ोक म व्याकरण को वेद का ‘मुख’ कहा गया है — ‘मुखं व्याकरणं स्मृतम्’।
मुख से ही तो बोला जाता है; इस लए शुद्ध बोलने का शास्त्र ही व्याकरण है। यही इस पाठ के पहले ोक क बात
है।

अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 142
प्रश्नः १ : पाठे वद्यमानानां ोकानाम् उच्चारणं स्मरणं लेखनं च कुरुत

अभ्यासः

प्र.15 पाठे वद्यमानानां ोकानाम् उच्चारणं स्मरणं लेखनं च कुरुत।

यह करने का प्रश्न है — तीन काम एक साथ : उच्चारण (बोलकर पढ़ना), स्मरण (कण्ठस्थ करना) और लेखन ( लखकर
अभ्यास)। नीचे पाँच ोक और उनके साथ उच्चारण क वे जगह द गई ह जहाँ प्रायः चूक होती है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते
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१ . यद्यिप बहु नाधीषे तथािप पठ पुत्र व्याकरणम्।
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स्वजनः श्वजनो माभूत ् सकलं शकलं सकृ त् शकृ त्॥ १॥
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२ . व्याघी यथा हरेत ् पुत्रान् दं ाभ्यां न च पीडयेत ्।
a भीता पतनभे दाभ्यां तद्वद् वण न् पयोजयेत्॥ २॥

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३ . एवं वण ः पयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीिडताः।
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सम्यग्वणपयोगेण बह्मलोके महीयते ॥ ३॥
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४ . माधुयमक्षरव्यिक्तः पदच्छे द स्त ु सुस्वरः। a

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धैय ं लयसमथ ं च षडेते पाठका गुणाः॥ ४॥

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५ . गीती शीघी िशरःकम्पी तथा िलिखतपाठकः।
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अनथज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः॥ ५॥

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उच्चारण म सावधानी — इन्ह शब्द पर पूरा पाठ टका है:
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शब्द क्या ध्यान रख गलत बोलने पर

स्वजनः / श्वजनः agl
‘स्व’ में स , ‘श्व’ में श — दोनों अलग है ं न् → त्त
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सकलं / शकलं वही ‘स’–‘श’ का भेद पूर ा → टुक ड़ा

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सकृत् / शकृत्
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वही ‘स’–‘श’ का भेद ; अन्त में हलन्त ‘त्’ → मल

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एक बार

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ाभ्याम् द् + अं + ष् + ट् + र् — संयक्ु ताक्षर ‘ ’ को तोड़कर नही ं, एक साथ अ स् ष् ( व् क् ) च्
प ट अ य त उ चारण

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च्
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प्रयोक्तव्याः ‘क्त’ का जोड़ स्पष्ट, पर ज़ोर लगाकर नही ं पीिडत उ चारण

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अवग ह ‘ऽ’ पर रुकना नही ं —c‘ज्ञो-ल्पकण्ठश्च’ g l a
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अनथज्ञोऽल्पकण्ठश्च बहता रहे पद छेद द ोष -

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कण्ठस्थ करने का तरीका: (1) पहले पदच्छे द के साथ धीरे-धीरे प ढ़ए — तब हर पद अलग सुनाई दे गा; (2) फर

coमmह — हर चरण म
अन्वय पढ़कर अथ पक्का क जए — अथ जाने बना रटना ‘अनथज्ञः’ दोष है; (3) तब पूरा ोक लय म पाँच बार
.
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बो लए; (4) अन्त म बना दे खे ल खए और पुस्तक से मलाइए। सारे ोक अनुष्टुप् छन्द

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आठ अक्षर, इस लए लय अपने-आप बैठ जाती है।

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ोक बोलते समय अपने ही उच्चारण को ोक ४ क कसौट पर जाँ चए — क्या

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माधुयम् है? क्या अक्षरव्य क्तः है? क्या पदच्छे दः ठ क जगह पड़ा? और ोक ५ के छह दोष म से कोई आपम
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तो नह ?

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अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 142
प्रश्नः २ : अधो ल खतानां प्रश्नानाम् एकपदे न उत्तरा ण लखत

अभ्यासः

प्र.16 (क) पाठकाः केषां सम्यक् प्रयोगं कुयुः ?

उत्तरम् — वणानाम् (वण का)।

आधार: ोक ३ — ‘एवं वणाः प्रयोक्तव्या… सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’।

व्याकरण: प्रश्न म ‘केषाम्’ षष्ठी वभ क्त, बहुवचन म है, इस लए उत्तर भी उसी वभ क्त-वचन म — ‘वणानाम्’
(वण, पुं ल्लङ्ग, षष्ठी बहुवचन)। ‘वणानाम्’ के स्थान पर ‘वणाः’ लख दे ना अशुद्ध होगा।

प्र.17 (ख) कम् अवश्यमेव पठनीयम् ?

उत्तरम् — व्याकरणम् (व्याकरण)।

आधार: ोक १ — ‘यद्य प बहु नाधीषे तथा प पठ पुत्र व्याकरणम्’ — चाहे और कुछ कम पढ़ो, व्याकरण
अवश्य पढ़ो।

व्याकरण: ‘व्याकरणम्’ — नपुंसक लङ्ग, प्रथमा वभ क्त, एकवचन (यहाँ ‘पठनीयम्’ कृत्य-प्रत्ययान्त के साथ
कम प्रथमा म आता है)।

प्र.18 (ग) ब्रह्मलोके केन सम्मानं भव त ?

उत्तरम् — सम्यग्वणप्रयोगेण (वण के ठ क-ठ क प्रयोग से)।

आधार: ोक ३ का उत्तराध और पाठ का शीषक — ‘सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’।

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व्याकरण: प्रश्न म ‘केन’ तृतीया वभ क्त, एकवचन है (‘ कससे?’), इस लए उत्तर भी तृतीया एकवचन म —
‘सम्यग्वणप्रयोगेण’। यहाँ तृतीया करण (साधन) के अथ म है।
स न्ध: सम्यक् + वणप्रयोगेण = सम्यग्वणप्रयोगेण (जश्त्व-स — क् का ग्)।

प्र.19 (घ) अधमाः पाठकाः क त भव न्त ?

उत्तरम् — षट् (छह)।

आधार: ोक ५ — ‘…अनथज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः’। वे छह ह — गीती, शी ी, शरःकम्पी,
ल खतपाठकः, अनथज्ञः, अल्पकण्ठः।

व्याकरण: ‘क त’ का उत्तर संख्यावाचक शब्द से दे ते ह। ‘षट् ’ का ही रूप स म ‘षड् ’ हो जाता है — ‘षट् + एते
= षडेते’। ोक ४ म भी ‘षडेते पाठका गुणाः’ — गुण भी छह ही ह।

प्र.20 (ङ) धैय केषां गुणः ?

उत्तरम् — पाठकानाम् (पढ़ने वाल का)।

आधार: ोक ४ — ‘धैय लयसमथ च षडेते पाठका गुणाः’। पुस्तक क सारणी म ‘धैयम् = वश्वासः’ अथात्
आत्म वश्वास — बना घबराए, बना सन्दे ह के पढ़ने क श क्त।

व्याकरण: ‘केषाम्’ (षष्ठी बहुवचन) का उत्तर ‘पाठकानाम्’ (पाठक, पुं ल्लङ्ग, षष्ठी बहुवचन) — ‘पाठकाः’ लखना
अशुद्ध होगा।

अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 143

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प्रश्नः ३ : अधो ल खतानां प्रश्नानाम् पूणवाक्येन उत्तरा ण लखत

अभ्यासः

प्र.21 (क) व्या ी दं ाभ्यां कान् नय त ?

उत्तरम् — व्या ी दं ाभ्यां स्वपुत्रान् नय त।
(बा घन अपने दो दाँत से अपने बच्च को ले जाती है।)

आधार: ोक २ — ‘व्या ी यथा हरेत् पुत्रान् दं ाभ्यां न च पीडयेत्’; और भावाथ — ‘व्या ी स्व शशुं दन्तैः
नय त’। वह ऐसे पकड़ती है क बच्चा न गरे और न घायल हो — यही सन्तुलन वण च्चारण म चा हए।

व्याकरण: ‘कान्’ द्वतीया वभ क्त, बहुवचन, पुं ल्लङ्ग है, इस लए उत्तर म भी द्वतीया बहुवचन — ‘पुत्रान् /
स्वपुत्रान्’। ‘दं ाभ्याम्’ तृतीया द्ववचन (‘दो दाँत से’)।

प्र.22 (ख) वणाः कथं प्रयोक्तव्याः ?

उत्तरम् — वणाः न अव्यक्ताः न च पी डताः, अ पतु स्पष्टतया स्वाभा वकरूपेण च प्रयोक्तव्याः।
(वण का उच्चारण न अस्पष्ट हो और न ज़रूरत से अ धक ज़ोर लगाकर — वे स्पष्ट और स्वाभा वक रूप से बोले जाने चा हए।)

आधार: ोक ३ — ‘एवं वणाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पी डताः’; भावाथ — ‘वणाः स्पष्टतया
स्वाभा वकरूपेण च उच्चारणीयाः’।
पुस्तक क अपनी प रभाषा याद र खए — अव्यक्ताः = अल्पप्रयत्नयुक्ताः (ज़रूरत से कम प्रयत्न), पी डताः =
अ धकप्रयत्नयुक्ताः (ज़रूरत से अ धक प्रयत्न)। शुद्ध उच्चारण इन दोन के बीच है — ठ क वैसे ही जैसे बा घन क
पकड़ न ढ ली, न कसी।

प्र.23 (ग) पाठकानां षड् -गुणाः के भव न्त ?

उत्तरम् — माधुयम्, अक्षरव्य क्तः, पदच्छे दः, सुस्वरः, धैय लयसमथ च — एते षट् पाठकानां गुणाः भव न्त।

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गुणः हन्द अथ

माधुयम् िमठास — मध ुर उ च्चारण

अक्षरव्य क्तः अ क्ष रों की स् ष्
प टता

पदच्छे दः उ िचत स् थान पर िवराम

सुस्वरः मध ुर एवं सबको सुनाई दे ने वाल ा स्
वर

धैयम् त् श्
आ मिव वास — िबना स न्दे ह के पढ़ना

लयसमथम् ल य बनाए रखना , िवषय में तल्ल ीनता

आधार: ोक ४ — ‘माधुयमक्षरव्य क्तः पदच्छे दस्तु सुस्वरः। धैय लयसमथ च षडेते पाठका गुणाः॥’

प्र.24 (घ) के अधमाः पाठकाः भव न्त ?

उत्तरम् — गीती, शी ी, शरःक ी, ल खतपाठकः, अनथज्ञः, अल्पकण्ठः च — एते षट् अधमाः पाठकाः भव न्त।

दोषः कैसा पाठक

गीती जो गाकर पढ़ ता है

शी ी जो बहुत तेज़ ी से पढ़ ता है

शरःकम्पी जो िसर िहल ाते हुए पढ़ ता है

ल खतपाठकः -
जो िल ख िल खकर / दे ख-दे खकर ही पढ़ता है

अनथज्ञः जो अथ जाने िबना पढ़ ता है

अल्पकण्ठः जो बहुत धीमे स्वर में पढ़ ता है

आधार: ोक ५ और उसका भावाथ। पुस्तक अन्त म जोड़ती है — ‘अतः पठनकाले वयम् एतान् दोषान्
प रष्कृत्य पठामः चेत् आदशपाठकाः भवामः’ — ये दोष जन्मजात नह , आदत ह; सुधारे जा सकते ह।

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(ङ) ‘स्वजनः’ ‘श्वजनः’ च इत्यनयोः अथदृ ा कः भेदः ?
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a gl — ‘स्वजनः’ इत्यस्य अथः बन्धुः, ‘श्वजनः’ इत्यस्य अथः तु शुनकः (कुक्कुरः)।
उत्तरम्
(‘स्वजनः’ का अथ है अपना ब ु, और ‘श्वजनः’ का अथ है कुत्ता।)

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भेद कहाँ से आया: दोन शब्द म केवल पहला वण बदला है — स्व बनाम श्व, अथात् ‘स’ और ‘श’ का अन्तर।

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इतने-से अन्तर से अथ ‘अपना प्रय ब ु’ से गरकर ‘कुत्ता’ हो जाता है। यही ोक १ क चेतावनी है — ‘स्वजनः
श्वजनो माभूत्’ — ऐसा न हो जाए!

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Tip: ‘श्व’ वाले शब्द याद र खए — श्वन् (कुत्ता) से बने : श्वजनः, श्वा, शुनकः। और ‘स्व’ वालेe:m
m a s स्वजनः, स्वक यः,

. co‘अपना’ के अथ म। बोलते समय ‘श’ का उच्चारण करते हुए जीभ तालु aकglओर जाती है, ‘स’ म दाँत
m
स्वदे शः —
कseओर।
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(च) ‘सकलं’ ‘शकलं’ च इत्यनयोः अथदृ ा.cकः
e m भेदः ? agl
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प्र.26

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.
उत्तरम् — ‘सकलम्’ इत्यस्य अथः स ूणम्, ‘शकलम्’ इत्यस्य अथः तु खण्डम्।

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(‘सकलम्’ का अथ है पूरा, और ‘शकलम्’ का अथ है टु कड़ा।)
m l
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m द जए: यहाँ भी अन्तर केवल ‘स’ और ‘श’ का है, पर अथ एक-दूसरे के ठ क उल्टे हो गए — ‘पूरा’ बनाम a g
a s eध्यान
agl ‘टुकड़ा’। इसी प्रकार ोक १ का तीसरा युग्म है — सकृत् (एक बार) और शकृत् (मल)। तीन उदाहरण एक ही
बात सद्ध करते ह : एक वण क चूक पूरे शब्द का अथ बदल दे ती है।
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अभ्यासात् जायते स द्धः — पृaष्ठ

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते AglaSem · NCERT Solutions

प्रश्नः ४ : अधो ल खता न लक्षणा न पाठकस्य गुणाः वा दोषाः वा इ त वभजत

अभ्यासः

प्र.27 अधो ल खता न लक्षणा न पाठकस्य गुणाः वा दोषाः वा इ त वभजत — अक्षरव्य क्तः, शी ी, ल खतपाठकः,
लयसमथम्, अनथः, अल्पकण्ठः, माधुयम्, गीती, पदच्छे दः, शरःक ी, अनथज्ञः, धैयम्, सुस्वरः। (यथा — गुणाः
: अक्षरव्य क्तः · दोषाः : शी ी)

गुणाः दोषाः

यथा — अक्षरव्य क्तः शी ी

माधुयम् गीती

पदच्छे दः शरःकम्पी

सुस्वरः ल खतपाठकः

धैयम् अनथज्ञः

लयसमथम् अल्पकण्ठः

— अनथः

छाँटने का नयम: जो शब्द ोक ४ म आया है वह गुण है, और जो ोक ५ म आया है वह दोष है — बस ोक
याद ह तो यह प्रश्न अपने-आप हल हो जाता है।
• ोक ४ (गुण) — माधुयम्, अक्षरव्य क्तः, पदच्छे दः, सुस्वरः, धैयम्, लयसमथम्।
• ोक ५ (दोष) — गीती, शी ी, शरःकम्पी, ल खतपाठकः, अनथज्ञः, अल्पकण्ठः।

पाठ-सूचना: पुस्तक क सूची म ‘अनथः’ और ‘अनथज्ञः’ — दोन छपे ह, इस लए कुल तेरह शब्द ह। ोक ५ म
मूल पद ‘अनथज्ञः’ ही है (जो अथ नह जानता)। ‘अनथः’ का अथ है अथ का अभाव — वह भी पढ़ने का दोष ही
है, इस लए उसे भी दोषाः स्तम्भ म र खए। इस कारण गुण छह और दोष सात बनते ह।

Try This: अब अपनी कक्षा म कसी मत्र को ोक पढ़ते हुए सु नए और इसी ता लका के आधार पर बताइए क
उसम कौन-से गुण दखे और कौन-सा दोष। यही काम आगे प रयोजनाकायम् म करना है।

अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 144

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प्रश्नः ५ : ोकानुसारं रक्तस्थाना न उ चतैः शब्दै ः पूरयत

अभ्यासः

प्र.28 (क) भीता ............................ तद्वद् वणान् प्रयोजयेत्।

उत्तरम् — भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वणान् प्रयोजयेत्।

ोक २ का उत्तराध: ‘भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वणान् प्रयोजयेत्॥’ — अथात् ‘ गरने और चर जाने — दोन से
डरी हुई (बा घन)’। ये ही दो डर पूरे पाठ क दो सीमाएँ ह : ढ ला बोलो तो अव्यक्त, कसकर बोलो तो पी डत।

व्याकरण: ‘पतनभेदाभ्याम्’ — पतन + भेद का द्वन्द्व समास, तृतीया वभ क्त, द्ववचन (भय-अथ म यहाँ ‘भीता’
के साथ)।

प्र.29 (ख) ............................ लयसमथ च षडेते पाठका गुणाः।

उत्तरम् — धैय लयसमथ च षडेते पाठका गुणाः।

ोक ४ का उत्तराध: ‘धैय लयसमथ च षडेते पाठका गुणाः॥’ — पूवाध म चार गुण (माधुयम्, अक्षरव्य क्तः,
पदच्छे दः, सुस्वरः) आ चुके ह; शेष दो — धैयम् और लयसमथम् — यह आते ह, तभी गनती छह पूरी होती है।

अथ: पुस्तक क सारणी म ‘धैयम् = वश्वासः’ — अथात् आत्म वश्वास, बना सन्दे ह और बना घबराहट के पढ़ने क
साम य।

प्र.30 (ग) गीती शी ी ............................ तथा ल खतपाठकः।

उत्तरम् — गीती शी ी शरःक ी तथा ल खतपाठकः।

ोक ५ का पूवाध: ‘गीती शी ी शरःक ी तथा ल खतपाठकः।’ — ‘ शरःकम्पी’ अथात् यः शरः चालयन्
पठ त (जो सर हलाते हुए पढ़ता है)।

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व्याकरण: ‘ शरःकम्पी’ = शरस् + क म्पन् — इ न-प्रत्ययान्त कतृवाचक पद, प्रथमा एकवचन। ‘ शरः’ म वसग है;
बोलते समय उसे गरा न द, अन्यथा ‘ शरकम्पी’ जैसा अशुद्ध रूप बनेगा।

प्र.31 (घ) एवं वणाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च ............................ ।

उत्तरम् — एवं वणाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पी डताः।

ोक ३ का पूवाध: ‘एवं वणाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पी डताः।’ — ‘पी डताः’ का अथ पुस्तक स्वयं दे ती है :
बा धताः (अ धकप्रयत्नयुक्ताः), अथात् आवश्यकता से अ धक ज़ोर लगाकर बोले गए वण।

ध्यान द जए: यह पं क्त दो नषेध एक साथ करती है — ‘न अव्यक्ताः’ और ‘न च पी डताः’। इसी लए इस
रक्तस्थान म ‘स्पष्टाः’ जैसा कोई सकारात्मक शब्द नह आ सकता; यहाँ दूसरी बुरी सीमा का नाम चा हए।

प्र.32 (ङ) स्वजनः ............................ माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्।

उत्तरम् — स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्।

ोक १ का उत्तराध: ‘स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्॥’ — तीन युग्म एक ही ढाँचे पर ह :
पहले शुद्ध शब्द, फर उसका बगड़ा रूप — स्वजनः/श्वजनः, सकलम्/शकलम्, सकृत्/शकृत्।

स न्ध: ‘श्वजनो माभूत्’ = श्वजनः + मा + अभूत्। वसग के बाद ‘म’ (मृदु व्यंजन) आने से वसग का ‘ओ’ हो गया
— वसग-स न्ध। और ‘मा + अभूत् = माभूत्’ — द घ स्वर-स ।

अभ्यासात् जायते स द्धः — पृष्ठ 144

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प्रश्नः ६ : अधो ल खता न वाक्या न सत्यम् वा असत्यम् वा इ त लखत (यथा — पदच्छे दः पाठकानां गुणः अ स्त। — सत्यम्)

अभ्यासः

प्र.33 (क) गानस हतपठनं पाठकानां दोषः भव त।

उत्तरम् — सत्यम्

क्य : ोक ५ का पहला ही दोष ‘गीती’ है, जसका अथ पुस्तक ने दया है — ‘यः जनः गीतगानम् इव पठ त’
अथात् जो गाकर पढ़ता है। गाकर पढ़ने पर अक्षर खच जाते ह, पदच्छे द लय के हसाब से पड़ता है — अथ के
हसाब से नह — और सुनने वाला भाव के बजाय धुन सुनने लगता है।

प्र.34 (ख) माधुय नाम अक्षराणाम् उच्चारणे स्पष्टता अ स्त।

उत्तरम् — असत्यम्

क्य : अक्षर के उच्चारण क स्पष्टता का नाम ‘अक्षरव्य क्तः’ है (पुस्तक : अक्षराणां ु टतया उच्चारणम्), माधुयम्
नह । ‘माधुयम्’ का अथ है मधुरभावः — उच्चारण म मठास। दोन अलग-अलग गुण ह और ोक ४ म अलग-
अलग गनाए गए ह।
शुद्ध वाक्य होगा — अक्षरव्य क्तः नाम अक्षराणाम् उच्चारणे स्पष्टता अ स्त।

प्र.35 (ग) शकृत् नाम एकवारम् इ त अथः अ स्त।

उत्तरम् — असत्यम्

क्य : पुस्तक क सारणी के अनुसार सकृत् = एकवारम् (एक बार) और शकृत् = मलम् ( वष्ठा)। यहाँ वाक्य ने ठ क
वही चूक कर द है जससे ोक १ बचने को कहता है — ‘स’ क जगह ‘श’।
शुद्ध वाक्य होगा — सकृत् नाम एकवारम् इ त अथः अ स्त।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते
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(घ) अव्यक्ताः वणाः प्रयोक्तव्याः भव न्त।
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प्र.36

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agl — असत्यम्
उत्तरम्

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क्य : ोक ३ स्पष्ट नषेध करता है — ‘एवं वणाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पी डताः’ अथात् अव्यक्त वण प्रयोग
नह करने चा हए। ‘अव्यक्ताः’ का अथ है अस्पष्ट, m
s e अल्पप्रयत्न से बोले गए।
a भव न्त।
agl
शुद्ध वाक्य होगा — अव्यक्ताः वणाः न प्रयोक्तव्याः

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(ङ) व्या ी यथा पुत्रान् हर त तथा वणान् प्रयोजयेत्।

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प्र.37

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क्य : यह ोक २ क ही बात है — ‘व्या ी यथा .हरे coतm agl
e m
asन गरने दे ती है, न घायल करती है — वैसे ही वण का उच्चारण करना
् पुत्रान् दं ाभ्यां न च पीडयेत्। भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद्

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वणान् प्रयोजयेत्॥’ जैसे बा घन बच्च को
चा हए।

. c om
Tip: ‘सत्यम्/असत्यम्’ वाले प्रश्न म पहले यह दे खए क वाक्य का शब्द ोक का ही eहैm
s
gla (ख) और (ग) म शब्द ही
omनह गया — केवल ‘हरेत्’ के स्थान पर ‘हर त’ है, जससे अथ नह aबगड़ता।
या बदल दया गया है।
यहाँ cबदला
m .
aseबदल दया गया था, इस लए वे असत्य ह।
agl
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योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 144
(क) अक्षर/मात्राप रवतनेन अथप रवतनं भव तlas
ag
योग्यता वस्तरः

co m
m .
m a e (सूयः), फलम् (आ ा दफलम्)
(क) अक्षर/मात्राप रवतनेन अथप रवतनं भव त — यथा : मत्रम् (बन्धुः) –sमत्रः
gl) – अवधानम् (एकाग्रता), प्र तपलम्
co – पलम् (मांसः), पुरुषः (जनः) – परुषः (कठोरः), अवदानम् (योगदानम्
प्र.38

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(प्र तक्षणम्) – प्र तफलम् (प रणामः), नद त (ध्व न करो त) – नुद त (प्रेरय त), ददा त (दानं करो त) – दधा त
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(धारणं करो त)। — एतान् पठत बोधत च।

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पुस्तक के सात युग्म नीचे ह। हर युग्म म एक अक्षर या एक मात्रा ही बदली है, फर भी अथ पूरा बदल गया है।
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शुद्ध शब्द अथः बदला हुआ शब्द अथः क्या बदला

मत्रम् बन्ध ःु (दोस्त) मत्रः सूयः (सूय) लङ्ग — नपुंसक से पुं ल्लङ्ग

फलम् आमािदफलम् (फल) पलम् मांस ः (मांस ) फ् → प् (महाप्राण से अल्पप्राण)

पुरुषः जनः (मनुष्य) परुषः कठोरः (कठोर ) ‘उ’ मात्रा → ‘अ’

अवदानम् योगदानम् (योगदान) अवधानम् एकाग ता (ध् यान) द् → ध् (अल्पप्राण से महाप्राण)

प्र तपलम् पितक्षणम् (हर क्षण) प्र तफलम् पिरणामः (पिरणाम ) प् → फ्

नद त ध्विनं करोित (गरजता है) नुद त पेर यित (पेिरत करता है) ‘अ’ → ‘उ’ मात्रा

ददा त दानं करोित (दे ता है) दधा त धारणं करोित (धारण करता है) द् → ध्

क्या सीखने को मला: ध्यान द जए क बदलाव कस- कस तरह का है — कह महाप्राण और अल्पप्राण का
(प/फ, द/ध), कह मात्रा का (उ/अ), कह केवल लङ्ग का ( मत्रम्/ मत्रः)। ये ठ क वही चूक ह जो जल्दबाज़ी म या
अव्यक्त उच्चारण म हो जाती ह। इसी लए ोक ४ ‘अक्षरव्य क्तः’ को पाठक का गुण मानता है — हर अक्षर अलग
और साफ़ सुनाई दे ना चा हए।

वाक्य म दे खए, तब भेद पक्का होगा:
• मत्रं मे प्रयम् अ स्त। (मेरा मत्र प्रय है।) — मत्रः प्राच्यां द श उदे त। (सूय पूव दशा म उगता है।)
• सः पुरुषः साधुः अ स्त। (वह मनुष्य सज्जन है।) — तस्य वचनं परुषम् आसीत्। (उसका वचन कठोर था।)
• छात्रः पाठे अवधानं करो त। (छात्र पाठ म ध्यान लगाता है।) — तस्य अवदानं महत्। (उसका योगदान बड़ा है।)

Try This: इसी ढं ग के कुछ और युग्म खो जए और कक्षा म सुनाइए — जैसे कमलम् (कमल) / कलमम् (कलम),
दनम् ( दन) / द नम् (द रद्र), अ नलः (वायु) / अनलः (अ ग्न)। इनका अथ शब्दकोश म जाँच ली जए।

योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 145

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(ख) नम्न ल खतान् ोकान् अ प स्मरत — माण्डू क्य- शक्षा, याज्ञवल्क्य- शक्षा, नी त ोकः तथा पा णनीय- शक्षा का रका

योग्यता वस्तरः

प्र.39 ोकः १ — आलस्यात् मूखसंयोगाद् भयाद् रोग नपीडनात्। अत्याशक्त्याच्च मानाच्च षड् भ वद्या वनश्य त॥
(माण्डू क्य- शक्षा) — अस्य पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — आलस्यात् · मूखसंयोगात् · भयात् · रोगिनपीडनात् · अत् याशक्त् या · च · मानात् · च · षिड् भ ः ·

िवद्य ा · िवन श्यित।

अन्वयः — आलस्यात्, मूखसंयोगात्, भयात्, रोगिनपीडनात्, अत् याशक्त् या मानात् च — (एिभः) षिड् भ ः िवद्य ा

िवन श्यित।

अथ ः (शब्दशः) — आलस्यात् = आलस्य से · मूखसंयोगात् = मूख ं की संगित से · भयात् = डर से ·

रोगिनपीडनात् = रोग की पीड़ ा से · अत्याशक्त्या = अत्यिधक आसिक्त/लालसा से · मानात् = अिभमान से ‖
षिड् भ ः = इन छह कारणों से · िवद्या िवनश्यित = िवद्या नष्ट हो जाती है।

भावः: वद्या पा लेना एक बात है, उसे बचाए रखना दूसरी। यह ोक वद्या के छह शत्रु गनाता है — आलस्य
(अभ्यास छू ट जाता है), मूख क संग त (गलत बात पक्क हो जाती है), भय (जानते हुए भी बोल नह पाते), रोग
(मन पढ़ाई म नह लगता), अत्य धक आस क्त (मन दूसरी ओर खच जाता है) और अ भमान (‘मुझे तो आता ही
है’ मान लेने पर सीखना बन्द हो जाता है)। यह ोक इसी पाठ के साथ इस लए दया गया है क शुद्ध उच्चारण भी
नरन्तर अभ्यास से ही टकता है — छोड़ते ही बगड़ जाता है।

व्याकरण: ‘आलस्यात्, मूखसंयोगात्, भयात्, रोग नपीडनात्, मानात्’ — सब पञ्चमी वभ क्त, एकवचन
(कारण/हेतु के अथ म)। ‘अत्याशक्त्या’ तृतीया एकवचन और ‘षड् भः’ भी तृतीया बहुवचन (करण म)।
स न्ध: ‘अत्याशक्त्याच्च’ = अत्याशक्त्या + च; ‘मानाच्च’ = मानात् + च (श्चत्व-स — त् → च्); ‘षड् भ वद्या’ =
षड् भः + वद्या ( वसग → र्)।

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प्र.40 ोकः २ — जलमभ्यासयोगेन शैलानां कुरुते क्षयम्। ककशानां मृदुस्पश कमभ्यासात् न साध्यते? (याज्ञवल्क्य-
शक्षा) — अस्य पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — जलम् · अभ्यासयोगेन · शैलानाम् · कु रु ते · क्षयम्। कक शानाम् · मृद ुस्पशम् · िकम् · अभ्यासात् ·

न · साध्यते ।

अन्वयः — जलम् अभ्यासयोगेन शैलानां क्षयं कु रु ते , कक शानां (च ) मृद ुस्पशम् (करोित )। अभ्यासात् िकं न

साध्यते ?

अथ ः (शब्दशः) — जलम् = पानी · अभ्यासयोगेन = बार-बार िगरते रहने के योग से · शैलानां क्षयं कु रुते =

पहाड़ ों को भी िघसा दे त ा है · कक शानां मृद ुस्पशम् = कठोर वस्त ओ
ु ं को कोमल स्पश वाला (बना दे त ा है) ‖

अभ्यासात् िकं न साध्यते = भला अभ्यास से क्या िसद्ध नही ं होता ?

भावः: पानी क एक बूँद पत्थर के आगे कुछ भी नह — पर वही बूँद बार-बार गरती रहे तो पत्थर म ग ा बन जाता
है, और नद का पानी नुक ले पत्थर को घसकर चकना गोल कर दे ता है। अ न्तम पं क्त प्रश्न के रूप म उत्तर दे ती
है — अभ्यास से कुछ भी असम्भव नह ।
इस पाठ के लए इसका सीधा अथ है : आज आपका उच्चारण अटकता हो, संयुक्ताक्षर मु श्कल लगते ह — कोई
बात नह । रोज़ थोड़ा-थोड़ा बोलकर प ढ़ए; पत्थर घसता है, तो जीभ क्य नह सधेगी? इसी लए इस पुस्तक के
अभ्यास-खण्ड का नाम ही है — ‘अभ्यासात् जायते स द्धः’।

व्याकरण: ‘अभ्यासयोगेन’ तृतीया एकवचन; ‘अभ्यासात्’ पञ्चमी एकवचन (‘अभ्यास से’); ‘शैलानाम्’ तथा
‘ककशानाम्’ षष्ठी बहुवचन। ‘साध्यते’ — कमवाच्य रूप (यक् + आत्मनेपद), लट् लकार = ‘ सद्ध कया जाता है’।
स न्ध: ‘जलमभ्यास°’ = जलम् + अभ्यास°; ‘ कमभ्यासात्’ = कम् + अभ्यासात्।

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प्र.41 ोकः ३ — येषां तीथाऽगता वद्या नत्यमभ्यासव तता। ते भव न्त दुराधषाः स सहाः इव पवताः॥ (माण्डू क्य-
शक्षा) — अस्य पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — येषाम् · तीथ गता · िवद्य ा · िन त् यम् · अभ्यासवित ता · ते · भविन्त · दुराधष ः · सिसंहाः · इव ·

पवताः।

अन्वयः — येषां िवद्य ा तीथ गता िन त् यम् अभ्यासवित ता च (अिस्त ), ते सिसंहाः पवताः इव दुराधष ः भविन्त ।

अथ ः (शब्दशः) — येषाम् = िजनकी · िवद्या तीथ गता = िवद्या योग्य गुरु /श्रेष्ठ ोत से आई हुई है · िनत्यम्

अभ्यासवितता = और िनत्य अभ्यास में बनी रहती है ‖ ते = वे · सिसंहाः पवताः इव = िसंहों से भरे पवतों की भाँित
· दुराधष ः भविन्त = अजेय (िजन्हे ं कोई दबा न सके ) होते है।
ं

भावः: ोक वद्या क दो शत रखता है — (1) वह तीथ से आई हो, अथात् सुयोग्य गुरु और शुद्ध परम्परा से मली
हो; और (2) वह नत्य अभ्यास म बनी रहे। दोन ह तभी वह वद्या अजेय बनाती है।
उपमा भी सोच-समझकर चुनी गई है — पवत तो अपने-आप म बड़ा है ही, पर सह से भरा पवत कोई छू भी नह
सकता। वैसे ही, केवल पढ़ा हुआ व्य क्त बड़ा है; पर अभ्यास से जी वत रखी वद्या वाला व्य क्त अजेय है।

अलङ् कारः: उपमा — वाचक शब्द ‘इव’; उपमेय = वद्वान् जन, उपमान = स सह पवत, साधारण धम = दुराधषत्व
(अजेयता)।
व्याकरण: ‘येषाम्’ षष्ठी बहुवचन; ‘स सहाः’ बहु ी ह समास = ‘ सह स हत’। ‘तीथागता’ = तीथात् आगता।
स न्ध: ‘ नत्यमभ्यास°’ = नत्यम् + अभ्यास°।

प्र.42 ोकः ४ — काकचेष्टो बकध्यानः श्वान नद्रस्तथैव च। अल्पाहारी गृहत्यागी वद्याथ पञ्चलक्षणः॥
(लोकप्रच लत-नी त ोकः) — अस्य पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — काकचे ष्ट ः · बक ध्यानः · श्वानिनद ः · तथा · एव · च · अल्पाहारी · गृहत् यागी · िवद्य ाथ ·

पञ् चलक्षणः।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते
a g l AglaSem · NCERT Solutions

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अन्वयः — काकचे ष्ट ः, बक ध्यानः, श्वानिनद ः तथै व च अल्पाहारी, गृहत् यागी (च ) — (एवं) िवद्य ाथ पञ् चलक्षणः
m as e
(भवित )।
.co a g l
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aलक्षणम् शब्दशः अथ वद्याथ के लए इसका अथ

co m
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काकचेष्टः
m
कौए जैस ी चेष्टा वाला , हर अवसर पकड़ने वाल ा

e
सद ा सतक और चौक ा

g l as — जब तक ल क्ष्य न िमले , दृ िष्ट हटे नही ं
a
बकध्यानः बग ल
ु े जैसे ध्यान वाला एकाग ता

श्वान नद्रः ल् — प ुकारते ही जाग जाना, आल स्य नही ं
m
कु त्ते जैस ी नी ंद वाला

co
ह की नीद
ं

न्
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अल्पाहारी थोड़ा खाने वाला — भरा पेट पढ़ाई नही ं होने दे ता

m घर छोड़ने वाला
कम और स त ुिल त भोजन

गृहत्यागी .co a g l
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द्य
s
िव ा क -
े िल ए घर की सुख सुिवधा छोड़ ने को तैयार

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ag भावः: यह बहुत प्र सद्ध नी त ोक है। यहाँ तीन पशु-प क्षय क उपमा उनके गुण के लए है, स्वभाव के लए नह
m a s
cे oबना agl
— कौए क चालाक नह , उसक सतकता; कुत्ते का भ कना नह , उसक हल्क न द। इस पाठ के सन्दभ म सबसे
काम का लक्षण है बकध्यानः — क्य क एकाग्रता .क
e m
as
न पदच्छे द ठ क पड़ता है, न वण स्पष्ट नकलते ह।

a g l
व्याकरण: ‘काकचेष्टः’, ‘बकध्यानः’, ‘श्वान नद्रः’, ‘पञ्चलक्षणः’ — सब बहु ी ह समास (‘काकस्य इव चेष्टा यस्य
सः’)। ‘अल्पाहारी’, ‘गृहत्यागी’ — ण न-प्रत्ययान्त।
. c om
स न्ध: ‘काकचेष्टो बकध्यानः’ = काकचेष्टः + बकध्यानः ( वसग → ओ); ‘श्वान नद्रस्तथैवe’m
m a s = श्वान नद्रः + तथा + एव

. co तथा वृ द्ध-स ‘आ + ए = ऐ’)। a gl
em
( वसग-स

a s
agl
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omच लखत।
ोकः ५ — यथा खनन् ख नत्रेण नरो वाय धगच्छ त। तथा गुरुगतां वद्यां शुश्रुषुर धगच्छ त॥ (याज्ञवल्क्य-
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प्र.43

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शक्षा) — अस्य पदच्छे दम् अन्वयम् अथ a
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पद च् छे द ः — यथा · खनन् · खिन त्रेण · नरः · वािर · अिधगच् छित · तथा · गुरु गताम् · िवद्य ाम् · शुश्र ूषःु ·
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comच्छित।
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अन्वयः — यथा नरः खिन त्रेण खनन् वािर अिधगच् छित , तथा शुश्र ूषःु गुरु गतां िवद्य ाम् अिधगच् छित।
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते AglaSem · NCERT Solutions

अथ ः (शब्दशः) — यथा = जै से · नरः = मनुष्य · खिनत्रेण खनन् = कु दाल से खोदता हआ
ु · वािर अिधगच्छित =
(भूिम से) जल पा लेत ा है ‖ तथा = वैसे ही · शुश्र ूषःु = सेवा करने वाला (िशष्य) · गुरु गतां िवद्याम् = गुरु में िस्थत

िवद्या को · अिधगच्छित = पाप्त कर लेत ा है।

भावः: जल भू म के भीतर पहले से है — पर वह अपने-आप ऊपर नह आता; खोदना पड़ता है। वैसे ही वद्या गुरु
के भीतर पहले से है — पर वह अपने-आप शष्य म नह उतरती; शुश्रूषा (सेवा, वनय और श्रद्धा से सुनना) करनी
पड़ती है।
उपमा का सबसे सुन्दर बन्दु यह है क दोन जगह श्रम शष्य का है, वस्तु दूसरे के पास — इस लए वद्या माँगने से
नह , अ जत करने से मलती है।

अलङ् कारः: उपमा (यथा… तथा)। उपमेय = शुश्रूषु शष्य का वद्या पाना, उपमान = खोदकर जल पाना, साधारण
धम = श्रम से प्रा त।
व्याकरण: ‘खनन्’ — शतृ-प्रत्ययान्त (‘खोदता हुआ’), प्रथमा एकवचन। ‘ख नत्रेण’ तृतीया एकवचन (करण —
‘कुदाल से’)। ‘शुश्रूषुः’ — उ-प्रत्ययान्त (‘सुनने/सेवा करने क इच्छा वाला’)।
स न्ध: ‘नरो वा र’ = नरः + वा र; ‘वाय धगच्छ त’ = वा र + अ धगच्छ त (यण्-स — इ → य्);
‘शुश्रूषुर धगच्छ त’ = शुश्रूषुः + अ धगच्छ त ( वसग → र्)।
पाठ-सूचना: पुस्तक म ‘शुश्रुषुः’ छपा है; शुद्ध रूप शुश्रूषुः (द घ ऊ) है।

प्र.44 ोकः ६ — छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते। ज्यो तषामयनं चक्षु नरुक्तं श्रोत्रमुच्यते॥ शक्षा ाणं तु
वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्। तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते॥ (पा णनीय- शक्षा का रका) — अनयोः
पदच्छे दम् अन्वयम् अथ भावं च लखत।

पद च् छे द ः — छन्द ः · पादौ · तु · वेद स्य · हस्तौ · क ल्पः · अथ · पठ ते । ज्योितषाम् · अयनम् · च क्षःु · िन रुक्तम्

· श्र ोत्रम् · उच् यते । िशक्षा · घाणम् · तु · वेद स्य · मुखम् · व्याकरणम् · स्मृत म्। त स्मात् · साङ् गम् · अधीत्य ·

एव · बह्मलोके · महीयते ।

अन्वयः — छन्द ः तु वेद स्य पादौ, अथ क ल्पः हस्तौ पठ ते । ज्योितषाम् अयनं च क्षःु , िन रुक्तं श्र ोत्रम् उच् यते ।

िशक्षा तु वेद स्य घाणम्, व्याकरणं (च ) मुखं स्मृत म्। त स्मात् साङ् गम् (वेद म्) अधीत्य एव (जनः) बह्मलोके
महीयते ।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते AglaSem · NCERT Solutions

वेदाङ्गम् वेद-पुरुष का अङ्ग क्य वही अङ्ग

छन्दः पादौ (दोनों पैर ) न्
छ द पर ही वेद खड़ ा और गितमान है

कल्पः हस्तौ (दोनों हाथ) हाथ से काम होता है — क ल्प यज्ञ की ि या बताता है

ज्यो तषम् चक्षःु (आँख) आँख से दू र दे खते है ं — ज्योितष काल और नक्षत्र दे खता है

नरुक्तम् श्रोत्रम् (कान) ब्
कान से श द ग हण होता है — िनरुक्त शब्द का मूल बताता है

शक्षा घ ाणम् (नाक) नाक श्
वास और स्वर का द्व
ार है — िशक्षा उ च्चारण िसखाती है

व्याकरणम् मुखम् (मुख) मुख से बोल ा जाता है — व्याकरण शद्ध
ु रूप गढ़ता है

भावः: यहाँ पूरे वेद को एक पुरुष (शरीर) मानकर छह वेदाङ्ग को उसके अङ्ग बताया गया है — यही रूपक
अलंकार है। जब सब अङ्ग साथ ह तभी शरीर पूरा है; इस लए अ न्तम चरण कहता है — ‘तस्मात् साङ्गम् अधीत्य
एव ब्रह्मलोके महीयते’ — वेद को उसके छह अङ्ग स हत पढ़कर ही मनुष्य ब्रह्मलोक म सम्मान पाता है।
यही ोक इस पाठ का नाम पूरा करता है। पाठ का शीषक है ‘सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते’ और यहाँ है
‘साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते’ — दोन म फल एक ही है, और उस तक पहुँचने का पहला अङ्ग वही ‘ शक्षा’ है
जस पर यह पूरा पाठ है।

व्याकरण: ‘पादौ’, ‘हस्तौ’ — प्रथमा वभ क्त, द्ववचन (दो पैर, दो हाथ)। ‘वेदस्य’ षष्ठी एकवचन। ‘पठ्यते’,
‘उच्यते’, ‘महीयते’ — कमवाच्य / आत्मनेपद लट् रूप। ‘अधीत्य’ — ल्यप्-प्रत्यय (‘पढ़कर’)।
स न्ध: ‘कल्पोऽथ’ = कल्पः + अथ (पूवरूप-स , अवग्रह ‘ऽ’); ‘चक्षु नरुक्तम्’ = चक्षुः + नरुक्तम्; ‘श्रोत्रमुच्यते’
= श्रोत्रम् + उच्यते; ‘साङ्गमधीत्यैव’ = साङ्गम् + अधीत्य + एव (‘अधीत्य + एव’ म वृ द्ध-स ‘अ + ए = ऐ’)।

प रयोजनाकायम् — पृष्ठ 145
प्रकल्प-कायम् : कक्षायां ोकोच्चारण-प्र तयो गता तथा गुण-दोष-अवलोकनम्

प रयोजनाकायम्

प्र.45 कक्षायां ोकोच्चारण-प्र तयो गतां स्थाप यत्वा न मत-सूच्यनुगुणम् उच्चारणम् अवलोकनीयम्।

यह करके सीखने का काम है — कक्षा म ोक-उच्चारण क प्र तयो गता कराइए और पहले से बनाई गई एक सूची (मूल्यांकन-
ता लका) के अनुसार सबका उच्चारण पर खए।
करने का तरीका —

1. ोक तय क जए — पाठ के पाँच ोक (अथवा योग्यता वस्तर के ोक)। हर वद्याथ को कम-से-कम एक ोक बोलना
है।

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2. सूची बनाइए — कसौट अपने मन से मत ग ढ़ए; ोक ४ के छह गुण और ोक ५ के छह दोष ही सूची ह। प्रत्येक गुण के 5
अङ् क र खए (कुल 30) और प्रत्येक दोष पर 1 अङ् क का टए।
3. नणायक चु नए — तीन वद्याथ और आचाय। सब अलग-अलग अंक द, फर औसत नकाल।
4. अवलोकन ल खए — हर प्र तभागी के लए एक पं क्त : ‘कौन-सा गुण दखा, कौन-सा दोष रहा’। यही अगले प्रश्न क
ता लका म भरना है।
5. अन्त म सुधार का अभ्यास — जन दोष क पुनरावृ त्त सबसे अ धक दखी, कक्षा उन्ह का दस-दस बार अभ्यास करे।

नमूना मूल्यांकन-सूची ( न मत-सूची) —

क्रमः कसौट ( ोक ४ अनुसारम्) अङ् काः क्या दे ख

१ माध यु म् 5 स्वर म मठास है या रूखापन

२ अक्षरव्यिक्तः 5 ‘स’–‘श’, ‘द’–‘ध’, संयुक्ताक्षर साफ़ ह?

३ पदच्छे द ः 5 वराम अथ के अनुसार पड़ा या बीच शब्द
म

४ सुस्वरः 5 अ न्तम पं क्त के छात्र तक आवाज़ पहुँची?

५ धै यम् 5 बना अटके, बना घबराए

६ लयसमथम् 5 अनुष्टुप् क लय पूरे ोक म बनी रही?

— दोषाः (गीती, शीघ ी, िशरःकम्पी, िलिखतपाठकः, अनथज्ञः, –1 पित जो दोष दखे, उसका नाम ल खए
अल्पकण्ठः) द ोषः

सङ् केतः: प्र तयो गता से पहले सबको यह सूची दखा द जए। जब वद्याथ को पता हो क कन छह बात पर
परखा जाएगा, तो वह उन्ह छह पर अभ्यास करता है — और यही इस प रयोजना का असली उ े श्य है, जीतना
नह ।

प्र.46 अत्र के के गुणाः दोषाः च जाताः इ त अधः लखत — (गुणाः / दोषाः — ता लका)

यह ता लका अपनी कक्षा क प्र तयो गता दे खकर भरनी है, इस लए उत्तर हर कक्षा म अलग होगा। नीचे नमूना दया गया है —
दे खए क हर पं क्त म कसने क्या कया यह लखा गया है, केवल शब्द नह ।
नमूना उत्तर:

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते AglaSem · NCERT Solutions

गुणाः दोषाः

अक्षरव्य क्तः — रमेशः ‘दं ाभ्याम्’ इत्यत्र संयुक्ताक्षरं स्पष्टम् शी ी — मोहनः द्वतीयं ोकम् अ तवेगेन प ठतवान्, पदा न
उच्चा रतवान्। म लता न।

पदच्छे दः — सीता ‘नाव्यक्ता · न च पी डताः’ इत्यत्र उ चतस्थाने अल्पकण्ठः — गीता मन्दस्वरेण अपठत्, अ न्तमपङ् क्तौ न श्रुतम्।
वरामं कृतवती।

सुस्वरः — अनीता उच्चस्वरेण मधुरं च अपठत्, सवः श्रुतम्। शरःक ी — सुरेशः पठनकाले शरः चा लतवान्।

धैयम् — हमानी वना सङ् कोचं पञ्च ोकान् स्मृत्वा अपठत्। गीती — कश्चन छात्रः ोकं गीतम् इव अगायत्।

माधुयम् / लयसमथम् — वनयः अनुष्टुप्-लयम् अन्तपयन्तम् अनथज्ञः — एकः छात्रः ‘सकृत्’ इत्यस्य स्थाने ‘शकृत्’ इ त अवदत्,
अरक्षत्। अथ न ज्ञातवान्।

अच्छे उत्तर म क्या होना चा हए: केवल ‘माधुयम्’, ‘शी ी’ जैसे शब्द लख दे ना अधूरा उत्तर है। हर पं क्त म तीन
बात आनी चा हए — (1) गुण/दोष का नाम, (2) कस ोक या शब्द पर वह दखा, और (3) उसका असर
क्या पड़ा। तभी अवलोकन काम का बनता है।

अन्त म यह अवश्य क जए: जो दोष सबसे अ धक बार मला, उसे कक्षा के बोड पर ल खए और अगले सप्ताह
उसी पर अभ्यास क जए। पुस्तक का वाक्य याद र खए — ‘अतः पठनकाले वयम् एतान् दोषान् प रष्कृत्य पठामः
चेत् आदशपाठकाः भवामः।’ (य द हम इन दोष को सुधारकर पढ़ तो आदश पाठक बन जाएँगे।)

अध्याय — एक नज़र म
पाठ का वषय और वेदाङ्ग-सम्बन्ध — यह पाठ ‘ शक्षा’ नामक वेदाङ्ग का वषय है। पुस्तक क ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ पे टका
स्वयं कहती है — शक्षाग्रन्थेषु वणानाम् उच्चारण व धः, स्वराः, वरामः च व णताः स न्त। अथात् वण का उच्चारण कैसे हो,
स्वर कैसे लग और कहाँ रुकना है — यही ‘ शक्षा’ पढ़ाती है, और यही इस पाठ के पाँच ोक का वषय है।
पाठ क कथा (पृष्ठ 137) — दे वराज इन्द्र और असुरराज वृत्रासुर क कथा। वृत्रासुर ने इन्द्र को जीतने के लए यज्ञ कराया,
जसका आहु तमन्त्र था — ‘इन्द्रशत्रुवधस्व’। ऋ त्वज ने डरकर मन्त्र का स्वर बदल दया; स्वर बदलते ही अथ बदल गया और
वृत्रासुर के स्थान पर इन्द्र का बल बढ़ गया। यही कथा पूरे पाठ क भू मका है — उच्चारण क एक चूक अथ ही उलट दे ती
है।
पाठ के पाँच ोक — (१) यद्य प बहु नाधीषे… व्याकरण अवश्य पढ़ो, नह तो स्वजनः (ब ु) ‘श्वजनः’ (कुत्ता), सकलम्
(पूरा) ‘शकलम्’ (टु कड़ा), सकृत् (एक बार) ‘शकृत्’ (मल) बन जाएगा; (२) व्या ी यथा हरेत् पुत्रान्… बा घन-दृष्टान्त; (३)
एवं वणाः प्रयोक्तव्या… पाठ का शीषक- ोक; (४) माधुयमक्षरव्य क्तः… पाठक के छह गुण; (५) गीती शी ी शरःकम्पी…
पाठक के छह दोष।
पुस्तक क अपनी कसौट — अव्यक्त बनाम पी डत — शब्दाथ-सारणी म पुस्तक स्वयं प रभाषा दे ती है : अव्यक्ताः =
अस्पष्टाः (अल्पप्रयत्नयुक्ताः) अथात् आवश्यकता से कम प्रयत्न, और पी डताः = बा धताः (अ धकप्रयत्नयुक्ताः) अथात्
आवश्यकता से अ धक प्रयत्न। शुद्ध उच्चारण इन दोन के बीच का — स्पष्ट और स्वाभा वक — है। बा घन का दृष्टान्त ठ क
यही सन्तुलन दखाता है : पकड़ ढ ली हो तो शशु गर जाए (अव्यक्त), कसी हो तो घायल हो जाए (पी डत)।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते
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पाठक के छह गुण और छह दोष — गुण : माधुयम् ( मठास), अक्षरव्य क्तः (अक्षर क स्पष्टता), पदच्छे दः (सही जगह
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वराम), सुस्वरः (मधुर स्वर), धैयम् (आत्म वश्वास), लयसमथम् (लय म समथता)। दोष : गीती (गाकर पढ़ना), शी ी (बहुत

comधीमे पढ़ना)। g l as
अल्पकण्ठः .(बहुत
तेज़ पढ़ना), शरःक ी ( सर हलाना), ल खतपाठकः (दे ख-दे खकर/ लख- लखकर पढ़ना), अनथज्ञः (अथ न जानना),

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अभ्यास तथा वस्तार — ‘अभ्यासात् जायते स द्धः’ के छह प्रश्न — ोक-स्मरण, एकपदे न उत्तर, पूणवाक्येन उत्तर, गुण/
दोष- वभाजन, ोकानुसार रक्तस्थान-पू त तथा सत्यम्/असत्यम्। योग्यता वस्तरः (क) म एक अक्षर या मात्रा बदलने से

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अथ बदलने के सात युग्म ( मत्रम्– मत्रः, फलम्–पलम्, पुरुषः–परुषः, अवदानम्–अवधानम्, प्र तपलम्–प्र तफलम्, नद त–

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emको ही पूरा करता है।
नुद त, ददा त–दधा त) और (ख) म माण्डू क्य- शक्षा, याज्ञवल्क्य- शक्षा तथा पा णनीय- शक्षा के ोक ह। अ न्तम ोक
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‘तस्मात् साङ्गमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते’ पाठ के शीषक

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 12 सम्यग्वणप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते AglaSem · NCERT Solutions

त्व रत पुनरावृ त्त

शब्दः अथः (संस्कृतम्) हन्द अथ ENGLISH

अधीषे पठिस तुम पढ़ते हो You read

श्वजनः शुनकः / कु क्कु रः कुत्ता Dog

सकलम् / सम्पूणम् / खण्डम् पूरा / टु कड़ा Entire / Fragment
शकलम्

सकृत् / शकृत् एकवारम् / मलम् एक बार / वष्ठा Once / Faeces

अव्यक्ताः अस्पष्टाः (अल्पपयत्नयुक्ताः) अस्पष्ट (आवश्यकता से कम प्रयत्न) Unclear (less effort than needed)

पी डताः बािधताः (अिधकपयत्नयुक्ताः) पी ड़त (आवश्यकता से अ धक Afflicted (more effort than needed)
प्रयत्न)

महीयते पूज्यते / सम्मानं लभते सम्मा नत होता है Honoured / respected

व्या ी शादू ला (स्त्रीव्याघ ः) बा घन Tigress

दं ाभ्याम् दन्ताभ्याम् दाँत से With the fangs

प्रयोजयेत् उच्चारणं / पयोगं कु य त् उच्चारण / प्रयोग कर सकता है May pronounce / apply

अक्षरव्य क्तः अक्षराणां स्फु टतया अक्षर-स्पष्टता Clarity of letters
उच्चारणम्

धैयम् िवश्वासः आत्म वश्वास Courage / Self-Confidence

शरःकम्पी यः िशरः चालयन् पठित सर हलाकर पढ़ने वाला One who nods head and reads

अनथज्ञः यः अथं न जानाित जो अथ नह जानता Who does not understand
meaning

अल्पकण्ठः दुबलध्विनयुक्तः धीमे स्वर वाला Weak-voiced

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 8
TypeSolution
Pages36
Updated19 Sep 2026