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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १

AglaSem पर कक्षा 8 संस्कृत पाठ 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ (दीपकम्) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 8 Sanskrit Chapter 13 (Deepakam).
NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ - Page 1 of 33

About NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १

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NCERT Solutions Class 8 Sanskrit Chapter 13 वर्णोच्चारण-शिक्षा १ – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा8

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 13: वण ारण- श ा १

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — द पकम्

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

146 – 158 13 48 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 32 pages

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 8 · सं स्कृ त · द पकम्

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 13: वण ारण- शक्षा १
NCERT कक्षा 8 संस्कृत क पाठ्यपुस्तक द पकम् के त्रयोदशः पाठः — वण ारण- शक्षा १ का स ूण हल। यह पुस्तक का अ न्तम पाठ है और
शक्षा (वेदाङ्ग) का व्यावहा रक भाग — इसम बताया गया है क मुँह के भीतर वण बनता कैसे है। ना भ-प्रदे श → उरः → कण्ठ- बलः → आस्यम् —
इन चार अङ्ग से चलकर वायु आस्य म पहुँचती है और वहाँ षट् स्थाना न — कण्ठः, तालु, मूधा, दन्तः, ओष्ठः, ना सका म वण-रूप म प्रकट होती है।
पाठ स्थानम् (जहाँ वण बनता है) और करणम् (जो अङ्ग उसे छू ता है) — इन दो तत्त्व क चचा करता है; तीसरा तत्त्व आभ्यन्तर-प्रयत्नः अगली कक्षा
के लए छोड़ा गया है। नीचे पृष्ठ 146 से 158 तक का पूरा पाठ, मुरली का दृष्टान्त, पा रभा षक-शब्दाथान् जानीमः तथा वयं शब्दाथान् जानीमः क
पूरी सार णयाँ, अभ्यासात् जायते स ः के प्रश्न १–५ का प्रत्येक उपभाग, अत्र इदम् अवधेयम् (स्वर तथा व्यञ्जन क प रभाषा), योग्यता वस्तरः
के पा णनीय- शक्षा-सूत्र (करण-प्रकरणम्) तथा पृष्ठ 158 का षट् स्थाना न–षट् करणा न वण-चक्र क्रमशः हल कए गए ह — पहले संस्कृत उत्तर,
फर कोष्ठक म हन्द अथ।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

द पकम् (कक्षा 8) 146 – 158

खं ड प्रश्न

13 48

माध्यम

हन्द

पाठः — मनुष्येषु वाग्-उत्प त्त-प्र क्रया (पाठे वद्यमानः प्रश्नः) — पृष्ठ 146–147
वण ारणे शरीरस्य चत्वा र अङ्गा न, वायोः मागः तथा त्री ण तत्त्वा न

पाठः

प्र.1 वणानाम् उ ारणाथम् आस्येन सह शरीरस्य का न अङ्गा न उपयुज्यन्ते ? तेषां तन्त्रा ण च का न ?

उत्तरम् — वणानाम् उ ारणे केवलम् आस्यस्य एव उपयोगः न भव त; आस्येन सह शरीरस्य चत्वा र अङ्गा न उपयुज्यन्ते। (वण के
उ ारण म केवल मुख का ही उपयोग नह होता; मुख के साथ शरीर के चार अङ्ग काम करते ह।)

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

क्रमः अङ्गम् तन्त्रम् हन्द म ENGLISH
(संस्कृतम्)

१. ना भ-प्रदे शः मांस पेशी-बल- नािभ-भाग की मांस पेिशयाँ — Navel-region — Abdominal Muscles
तन्त्रम् पेशी-दाब तन्त्र (Muscular-pressure System)

२. उरः वायु-बल- छाती — फे फड़ े और उरःपाचीर Chest — Lungs & Diaphragm (Air-
तन्त्रम् (डायाफ ाम ) — वायु-दाब तन्त्र pressure System)

३. कण्ठ- बलः ध्विन-तन्त्रम् वर -यन्त्र / स्वरतिन्त्रयाँ — ध् विन
स् Voice-box — Larynx / Vocal-cords
तन्त्र (Phonatory & Resonatory System)

४. आस्यम् उच्चारण- म स्तक — मुख और नाक — Head — Mouth & Nose (Articulatory
तन्त्रम् उ च्चारण तन्त्र System)

ध्यान द जए: पुस्तक आगे जोड़ती है — आस्यस्य अभ्यन्तरे — (क) मुखम् (Mouth / Oral cavity), (ख)
ना सका (Nose / Nasal cavity) — च उभौ भवतः। अथात् ‘आस्यम्’ केवल मुँह नह ; उसके भीतर मुख और
ना सका दोन गुहाएँ आती ह। यही कारण है क आगे छह स्थान म पाँच मुख म और एक (ना सका) नाक म गने
जाते ह।

शब्द-सूचना: यहाँ ‘आस्यम्’ का अथ पुस्तक क पा रभा षक सारणी म शरः / मस्तकम् (Head) दया है, केवल
‘मुँह’ नह । ‘मुँह’ के लए अलग शब्द मुखम् (वक्त्रम् / वदनम्) है।

प्र.2 यदा वयं क चत् शब्दं वण वा उ ार यतुम् इच्छामः, तदा का प्र क्रया भव त ? क्रमेण लखत।

उत्तरम् — चत्वा र सोपाना न भव न्त —

1. सवप्रथमं ना भ-प्रदे शे स्थताः मांसपेश्यः उरः नोदय न्त। (सबसे पहले ना भ-भाग क मांसपे शयाँ छाती को दबाती ह।)
2. उरः पुनः ासकोश- स्थतं वायुम् ऊध्व नःसारय त। ( फर छाती फेफड़ म भरी वायु को ऊपर क ओर बाहर नकालती है।)
3. सः वायुः ऊध्व सरन् कण्ठ- बलं प्रा ो त। (वह वायु ऊपर चलती हुई कण्ठ- बल — स्वर-यन्त्र — तक पहुँचती है।)
4. ततः, सः वायुः पुनः ऊध्व सरन् आस्यं प्र वश त। (उसके बाद वह वायु फर ऊपर चलकर आस्य म प्रवेश करती है।)

आस्य म प्रवेश करने के बाद — मुखे, ना सकायां च स्थतेषु षट् सु उ ारण-स्थानेषु वणानुसारं स्वक यं स्थानं प्राप्य, सः वायुः त स्मन्
स्थाने वण-रूपेण प्रकट भव त। (मुख और नाक म स्थत छह उ ारण-स्थान म से वण के अनुसार अपना स्थान पाकर वही वायु उस
स्थान पर वण के रूप म प्रकट होती है।)

क्रम क्य याद रख: यह क्रम नीचे से ऊपर है — ना भ → उरः → कण्ठ- बल → आस्य। अभ्यास का प्रश्न ३ (क)
ठ क इसी क्रम क परीक्षा लेता है : ‘श्वासकोश स्थतः वायुः ऊध्व चरन् पूवम् आस्यं प्रा ो त’ — यह असत्य है,
क्य क वायु पहले कण्ठ- बल पाती है, आस्य बाद म।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

शब्दाथ: नोदय न्त = अ भपीडय न्त (दबाती ह), नःसारय त = ब हः प्रेषय त (बाहर नकालती है), सरन् = चरन्
(चलती हुई), प्रकट भव त = उत्पद्यते (प्रकट/उत्पन्न होती है)।

प्र.3 ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे स्थतेषु षट् सु स्थानेषु सः वायुः वणरूपेण कथं प्रकट भव त ?’ — (पाठे पृष्ठे 147 उप स्थतः
प्रश्नः)

उत्तरम् — वायुः स्वयम् एव वणः न भव त। सा वायुः य स्मन् स्थाने रुध्यते वा घष त, तत्र यत् करणम् तं स्पृश त समीपं वा या त —
तयोः मेलनेन एव त स्मन् स्थाने वणः प्रकट भव त। (वायु अपने आप वण नह है। वह जस स्थान पर रुकती या रगड़ खाती है और
वहाँ जो करण उसे छू ता या उसके पास जाता है — इन दोन के मेल से ही उस स्थान पर वण प्रकट होता है।)

पुस्तक का अपना उत्तर: पुस्तक यह आगे कहती है — ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे वणानाम् उत्पत्त्यथ वस्तुतः त्री ण
तत्त्वा न आवश्यका न भव न्त’ — (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः। अथात् इसी प्रश्न का पूरा
उत्तर आगे के दो अनुभाग (क) स्थानम् और (ख) करणम् दे ते ह, और तीसरा तत्त्व अगली कक्षा म पढ़ाया जाएगा।

मुरली से सम झए: बाँसुरी म हवा एक ही है, पर छद्र (स्थान) बदलने और अङ्ग लय (करण) क पकड़ बदलने से
अलग-अलग स्वर नकलते ह। ठ क वैसे ही एक ही वायु से क, च, ट, त, प — भन्न- भन्न वण बनते ह।

प्र.4 आस्यस्य अभ्यन्तरे वणानाम् उत्पत्त्यथ क त तत्त्वा न आवश्यका न ? का न च ता न ? अ स्मन् पाठे केषां चचा
भव त ?

उत्तरम् — त्री ण तत्त्वा न आवश्यका न भव न्त — (क) प्रथमम् — स्थानम्, (ख) तीयम् — करणम्, (ग) तृतीयम् —
आभ्यन्तर-प्रयत्नः। (तीन तत्त्व आवश्यक ह — पहला स्थान, दूसरा करण, तीसरा आभ्यन्तर-प्रयत्न।)
पुस्तक स्वयं कहती है — ‘अ स्मन् पाठे स्थानस्य, करणस्य च चचा कुमः। आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य वषये अ ग्रमायां कक्षायां
ास्यामः।’ (इस पाठ म हम ‘स्थान’ और ‘करण’ क ही चचा करगे; ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ के वषय म अगली कक्षा म जानगे।)

इसी लए पाठ का नाम ‘वण ारण- शक्षा १’ है — यह दो भाग म से पहला भाग है। तीन तत्त्व म से दो यहाँ ह,
तीसरा अगली कक्षा म। इस लए इस पाठ से आभ्यन्तर-प्रयत्न (स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, ववृत आ द) के भेद पूछे ही नह
जाएँगे — जो पूछा जाएगा वह स्थान और करण ही है।

व्याकरण: ‘तत्त्वा न’ प्रथमा वभ क्त, बहुवचन, नपुंसक लङ्ग (तत्त्वम् — अकारान्त नपुंसक)। ‘त्री ण’ भी
नपुंसक लङ्ग बहुवचन का रूप है — इसी लए ‘त्रयः’ नह , ‘त्री ण’ लखा गया है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १
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(क) स्थानम् — पृष्ठ 148–149
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‘स्थानम्’ इत्यस्य प रभाषा, आस्ये षट् उ ारण-स्थाना न तथा मुरली-दृ ान्तः
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स्थानम्

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‘स्थानम्’ इ त कम् उच्यते ? पाठस्य प रभाषा-वाक्यं लखत।
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प्र.5

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उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — वणस्य उ ारण-समये, श्वासकोशतः ऊध्व सरन् वायुः, कण्ठ- बल-माध्यमेन आस्यस्य अभ्यन्तरं

m
प्र वश्य, तत्र मुखे ना सकायां वा य स्मन् स्थले वणरूपेण प्रकट भव त, तत् — ‘स्थानम्’ इ त उच्यते।

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( हन्द अथ — वण के उ ारण के समय फेफड़ से ऊपर चलती हुई वायु, कण्ठ- बल के रास्ते आस्य के भीतर प्रवेश करके, वहाँ

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मुख म या नाक म जस स्थल पर वण के रूप म प्रकट होती है, वही ‘स्थान’ कहलाता है।)

em का मम: ‘स्थानम्’ वह जगह है जहाँ वण बनता है — वह अङ्ग नह जो हलता है। हलने वाला अङ्ग a
a s
a gl प रभाषा
‘करणम्’ कहलाता है। पा रभा षक सारणी भी यही कहती है — स्थानम् = आस्ये उ ारणस्य स्थलम् (‘Place’
of Articulation), और करणम् = आस्ये उ
m
ारणस्य उपकरणम् (‘Tool’ of Articulation)। स्थान =
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m .co agl
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जगह, करण = औज़ार — यही भेद पूरे पाठ क रीढ़ है।

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प्र.6 आस्ये क त उ ारण-स्थाना न स न्त ? ता न का न च ? ( चत्रानुसारं लखत।)

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em — आस्ये षट् स्थाना न स न्त — मुखे पञ्च, ना सकायाम् एकम्। (आस्य म छह स्थान ह — मुख म पाँच और नाक म एक।)

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उत्तरम्
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मुखे — कण्ठः, तालु, मूधा, दन्तः, ओष्ठः — इ त पञ्च स्थाना न।

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ना सकायाम् — ना सका — इत्येव षष्ठं स्थानम्।

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पृष्ठ 148 का चत्र ‘आस्ये वणानां षट् उ ारण-स्थाना न’ इन्ह इसी क्रम म अङ् कत करता है —

चत्रे अङ् कः स्थानम्
aकgु त्रl हन्द ENGLISH

co m
१. कण्ठः मुखे (सव न्तः) गला / क ण्ठ-स्थान
m .
Throat / Glottis / Soft Palate

m l a se Palate
.co तालु-स्थान
ag
Hard

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२. तालु मुखे

a s
agl मूधा मुखे मूध -स्थान Alveolar Ridge

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(Base of) Tooth
s e m
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दाँत / द न्त-स्थान
m
४. दन्तः मुखे

m . co agl
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५. ओष्ठः मुखे (सवबिहः) होंठ / ओष्ठ-स्थान Lip

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ना सका ag नािसकायाम् Nose / Nasal cavity
६. नाक / नािसका-स्थान

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

अन्तः (भीतर) से बिहः (बाहर) की ओर — मुख के पाँच स्थान

१ कण्ठः २ तालु ३ मूध ४ दन्तः ५ ओष्ठः

अन्तः बिहः

षष्ठं स्थानम् — नािसका (मुखे न, अिपतु नािसकायाम्)

िवपरीत-क्रमः (अभ्यासे पश्नः ४) — ओष्ठः → दन्तः → मूध → तालु → कण्ठः

मुख के पाँच स्थान भीतर से बाहर क ओर; छठा स्थान ना सका है। अभ्यास प्रश्न ४ इसी पं क्त को उलटकर लखवाता है।

ध्यान रहे: ‘मूधा’ का अथ यहाँ ‘ सर’ नह है। पुस्तक क सारणी म मूधा = मूदध्् वा / मू ा, Alveolar Ridge
— अथात् दाँत के ठ क पीछे तालु का उठा हुआ भाग। यह से ट-वग, र्, ष् बोले जाते ह।

प्र.7 स्थानस्य काय- नदशनाथ ‘मुरली’ इ त उदाहरणं पुस्तकं कथं प्रयुङ्क्ते ?

उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — स्थानस्य सम्यक् काय- नदशनाथ ‘मुरली’ समु चतम् उदाहरणम् अ स्त। मुरल्याः ‘अङ्ग ल च्छद्रा ण’
आस्यस्य ‘स्थाना न’ इव व्यवहर न्त। मुरली-न लकया आगच्छन् वायुः अङ्ग ल च्छद्रे षु एव व वध-ध्व न-रूपेण प्रकट भव त।
( हन्द अथ — ‘स्थान’ का काम अच्छ तरह दखाने के लए बाँसुरी उपयुक्त उदाहरण है। बाँसुरी के छद्र आस्य के स्थान क तरह
काम करते ह। बाँसुरी क नली से आती हुई हवा उन्ह छद्र पर तरह-तरह क ध्व न के रूप म प्रकट होती है।)

मुरल्याम् आस्ये क्या समझाता है

मुरली-न लकया आगच्छन् वायुः श्वासकोशात् ऊध्वं सरन् वायुः दोनों में मूल कारण एक ही है — वायु

अङ्ग ल च्छद्रा ण स्थानािन (कण्ठ, तालु, मूध , दन्त, ओष्ठ, नािसका) जहाँ ध् विन/वण पकट होता है

अङ्गलयः (मुरल वादयन्त्यः) करणािन (िज ा, स्व-स्थानम्) जो छू ता है या पास जाता है (पष्ृ ठ 150–151)

उदाहरण इतना अच्छा क्य है: बाँसुरी म हवा एक ही रहती है, फर भी सात स्वर नकलते ह — क्य क छद्र
बदलता है। ठ क वैसे ही मुँह म वायु एक ही है, पर स्थान बदलने से क् / च् / ट् / त् / प् जैसे भन्न वण बनते ह।
इसी लए पुस्तक कहती है क वायु स्वयं वण नह , स्थान पर पहुँचकर वण बनती है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

अभ्यास से जो ड़ए: प्रश्न १ (ङ) — ‘स्थानस्य काय नदशनाथ क समु चतम् उदाहरणम् अ स्त ?’ इसका एकपद
उत्तर है — मुरली। और प्रश्न २ (ग) — ‘मुरल्याः अङ्ग ल च्छद्रा ण क दृशं व्यवहर न्त ?’ इसका उत्तर है — स्थाना न
इव।

(ख) करणम् — पृष्ठ 150–151
‘करणम्’ इत्यस्य प रभाषा, ज ा-करणम् (तालव्य-मूधन्य-दन्त्य) तथा स्व-स्थानं करणम् (कण्ठ्य-ओष्ठ्य-ना सक्य)

करणम्

प्र.8 ‘करणम्’ इ त कम् उच्यते ? मुरली- नदशने करणा न का न ?

उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — वणस्य उ ारण-समये, आस्यस्य यः भागः स्थानं स्पृश त, स्थानस्य समीपं वा या त, सः भागः —
‘करणम्’ इ त कथ्यते।
( हन्द अथ — वण के उ ारण के समय आस्य का जो भाग स्थान को छू ता है या स्थान के पास तक जाता है, वही भाग ‘करण’
कहलाता है।)
मुरली- नदशने — मुरल वादयन्त्यः ‘अङ्गलयः’ — आस्यस्य करणा न इव व्यवहर न्त। अङ्गलयः यदा अङ्ग ल च्छद्रा ण व वधरूपेण
स्पृश न्त, तेषां समीपं वा या न्त; तदा तेषु अङ्ग ल च्छद्रे षु व वध-ध्वनयः प्रकट भव न्त। (बाँसुरी बजाती हुई अङ्ग लयाँ आस्य के
करण क तरह काम करती ह। अङ्ग लयाँ जब छद्र को भाँ त-भाँ त से छू ती ह या उनके पास जाती ह, तब उन छद्र पर अलग-
अलग ध्व नयाँ प्रकट होती ह।)

दो शब्द एक साथ याद र खए: ‘स्पृश त’ (छू ता है) और ‘समीपं या त’ (पास तक जाता है) — प रभाषा म दोन
ह। इसी लए करण को केवल ‘छू ने वाला अङ्ग’ कहना अधूरा है; कुछ वण (जैसे ऊष्म य्, र्, ल्, व्, श्, ष्, स्) म
करण स्थान को पूरा छू ता नह , केवल पास तक जाता है — फर भी वह करण ही है।

पा रभा षक सारणी: करणम् = आस्ये उ ारणस्य उपकरणम् — हन्द म ‘उपकरण’ या ‘यन्त्र’, अंग्रेज़ी म
‘Tool’ of Articulation। तुलना क जए — स्थानम् = ‘Place’ of Articulation।

प्र.9 तालु, मूधा, दन्तः — एतेषु त्रषु स्थानेषु क करणं भव त ? प्रत्येकस्य वशेष-करणं च कम् ?

उत्तरम् (पुस्तकस्य पे टका-वाक्यम्) — तालु, मूधा, दन्तः च — एतेषु त्रषु स्थानेषु → ‘ ज ा’ करणं भव त। (तालु, मूधा और
दन्त — इन तीन स्थान म करण जीभ होती है।)
पुस्तक वस्तार से कहती है — तालव्यानां, मूधन्यानां, दन्त्यानां च वणानाम् उ ारणाथ → ज ा — यथाक्रमं तालु, मूधानं,
दन्तं च स्थानं स्पृश त, समीपं वा या त, येन यथाक्रमं तत्-तद्-वणानाम् उत्प त्तः भव त। अतः एतेषां त्र वधानां वणानाम्
उ ारणाथ → ज ा — ‘करणम्’, अथात् ‘उपकरणं’ भव त।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

कन्तु प्रत्येक वग म जीभ का अलग-अलग भाग काम करता है — यही वशेष-करणम् है —

वणाः स्थानम् सामान्य- वशेष-करणम् ( ज ायाः भागः) पा णनीय-सूत्रम्
करणम्

तालव्याः तालु ज ा िज ा-म ध् यः (जीभ का म ध् य भाग) ज ामध्येन –
वणाः तालव्यानाम्।

मूधन्याः वणाः मूध ज ा िज ा-उपागः (जीभ के अग भाग से थोड़ ा पहले का ज ोपाग्रेण –
भाग) मूधन्यानाम्।

दन्त्याः वणाः दन्तः ज ा िज ा-अगः (जीभ का अग भाग / नोक ) ज ाग्रेण – दन्त्यानाम्।

स्वयं करके दे खए: ‘च’ बो लए — जीभ का बीच वाला भाग तालु से लगेगा। ‘ट’ बो लए — जीभ थोड़ी मुड़कर
उपाग्र से मूधा को छु एगी। ‘त’ बो लए — जीभ क नोक सीधे दाँत पर लगेगी। तीन म करण एक ही ( ज ा), पर
भाग भन्न — इसी लए तीन वण भन्न सुनाई दे ते ह।

अभ्यास से जो ड़ए: प्रश्न २ (ङ) — ‘तालव्यानां, मूधन्यानां, दन्त्यानां च वणानाम् उ ारणाथ सामान्यं करणं कम्
अ स्त ?’ उत्तर — ज ा। और प्रश्न ३ (घ) — ‘तालव्य-वणानाम् उ ारणाथ दन्तः स्थानं स्पृश त’ — यह असत्य
है, क्य क वहाँ ज ा-मध्य तालु को छू ता है।

प्र.10 कण्ठः, ओष्ठः, ना सका — एतेषु त्रषु स्थानेषु क करणं भव त ? एतेषां वणानाम् उ ारणे ज ायाः का स्थ तः
?

उत्तरम् (पुस्तकस्य पे टका-वाक्यम्) — कण्ठः, ओष्ठः, ना सका च — एतेषु त्रषु स्थानेषु → ‘स्व-स्थानम्’ एव करणं भव त।
(कण्ठ, ओष्ठ और ना सका — इन तीन स्थान म करण वही स्थान स्वयं होता है।)
पुस्तक का वस्तार — कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानाम्, ना सक्यानां च वणानाम् उ ारणे ज ा प्रायः न ष्क्रया भव त। एतेषां
वणानाम् उ ारणाथ → तत्-तत्-स्थानस्य एव क त् पर-भागः, तत्-तत्-स्थानस्य पूव-भागं स्पृश त, समीपं वा या त। अतः एतेषां
त्र वधानां वणानाम् उ ारणाथ → स्व-स्थानं — ‘करणम्’, अथात् ‘उपकरणं’ भव त।
( हन्द अथ — कण्ठ्य, ओष्ठ्य और ना सक्य वण के उ ारण म जीभ प्रायः न ष्क्रय रहती है। इनके लए उसी स्थान का कोई
पर-भाग उसी स्थान के पूव-भाग को छू ता है या उसके पास जाता है। इसी लए इनम ‘स्व-स्थान’ ही करण बन जाता है।)

वणाः वशेष-स्थानम् ( जसे छु आ जाता है) वशेष-करणम् (जो छू ता है)

कण्ठ्याः वणाः कण्ठस्य पष्ृ ठ-भागः क ण्ठस्य अग-भागः

ओष्ठ्याः वणाः उ त्त रोष्ठः (ऊपर का होंठ) अधरोष्ठः (नीचे का होंठ)

ना सक्याः वणाः नािसका-मूल स्य उपिर -भागः नािसका-मूल स्य अधो-भागः

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

‘स्वस्थानकरणः’ का अथ: पा रभा षक सारणी क प रभाषा है — ‘ नजस्थानस्य पर-भागः एव करणं यस्य
वणस्य’ ( जस वण के उ ारण-स्थान का पर-भाग ही उसका करण हो)। सरल भाषा म — यहाँ छू ने वाला और
छु आ जाने वाला एक ही अङ्ग के दो भाग ह, इस लए बाहर से कोई तीसरा औज़ार (जीभ) लाने क ज़रूरत नह
पड़ती। ‘प’ बोलकर दे खए — नीचे का ह ठ ऊपर के ह ठ से लगता है, जीभ कह नह जाती।

अभ्यास से जो ड़ए: प्रश्न २ (घ) — ‘केषां वणानाम् उ ारणे ज ा प्रायः न ष्क्रया भव त ?’ उत्तर —
कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानाम्, ना सक्यानां च। प्रश्न ३ (च) उलटकर पूछा गया है — ‘तत्तत्स्थानस्य एव क त्
पूवभागः, तत्तत्स्थानस्य परभागं स्पृश त’ — यह असत्य है; पुस्तक म पर-भाग पूव-भाग को छू ता है।

पा रभा षक-शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 152–154
शक्षा-शास्त्र क पूरी पा रभा षक शब्दावली — शब्दः · अथः · हन्द · English

शब्दाथाः

प्र.11 ‘ शक्षा’ तथा वाग्-उत्प त्त से जुड़े पा रभा षक शब्द (पृष्ठ 152) — शब्दः, अथः, हन्द तथा English स हत
ल खए।

पुस्तक क सारणी ज्य -क -त्य —

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १
a g l AglaSem · NCERT Solutions

co m
m.
शब्दः अथः हन्द ENGLISH

m as e
शक्षा
.co
वण च्चारण-शास्त्रम् वण ं के शुद्ध उ च्चारण का
a g l
Phonetics (& Phonology)

se m िवधान एवं िव ान

l a
aउg ारणम् कथनम् / वाङ् -िनष्पित्तः कथन Articulation (Speech) / Pronunciation

m
.co ag
ध्व नः ध्वानः ध् विन Sound / Phonation / Resonation

श दsem
gla
शब्दः पदम् ब् Word

वाक्यम् वचः / परस्परािन्वत-पद-समूहः
a वा य क् Sentence

co m
m.
वाक् वाणी Speech / Spoken words
e
वाणी / गीः

m l as
वणः
m .co शब्दस्य अवयवभूतः लघुतमः ध्विनः वण
a g
Letter / Phoneme / Grapheme

l a se
a g आस्यम् िशरः / मस्तकम् म स्तक Head

a s
Mouth / Oral cavity
m
मुखम् वक्त्रम् / वदनम् मुँह

e
. c o
m/ नािसका- थान agl
s
ना सका नासा नाक Nose / Nasal cavity
a
स्

कण्ठ- agl
स्वरयन्त्रम् / ध्विनयन्त्रम् / कण्ठ- स् वरतन्त्री / घोषतन्त्री Voice-box / Larynx [Vocal-cords]
बलम् कू पः / कु हरम्

co m
m .
e
अधो-गसनी Lower Pharynx / Hypopharynx /

as
गल- बलम् अधो-ग सनी

m l
.co g
Laryngopharynx

eउरःm a
a s
gl
व ः छाती Chest

a
m
फे फड़ े Lungs

se
श्वासकोशः फु प्फु सः

m
co-भाग g l a
. a
sem
ना भ- तुन्दकू पी- ेत्र ः नािभ Navel-region / Abdominal Muscles

a
agl
प्रदे शः

मांसपेश्यः स्नायवः स् नायु Muscles

co m
.
बलम् दबाव Pressure
m
पणोदः / अिभपीडनम्

m l a se
.co g Body)
aHuman
तन्त्रम् पणाली पणाली (Anatomy) System / System (of

se m
g l a
a c
m .
e
दो शब्द जो अक्सर उलझते ह: आस्यम् = मस्तक (Head), जब क मुखम् = मुँह (Oral cavity)। और कण्ठ-
m a s
. co agl
बलम् (Larynx, गले म नीचे) कण्ठः (उ ारण-स्थान) से अलग है।

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a

co m
m .
m ase
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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

प्र.12 वणमाला तथा वण-भेद से जुड़े पा रभा षक शब्द (पृष्ठ 152–153) — शब्दः, अथः, हन्द तथा English स हत
ल खए।

शब्दः अथः हन्द ENGLISH

वणमाला वण नां क्रम-पूवक-व्यवस्था वण ं की म -पूवक व्यवस्था
क्र Alphabet / Sequence of Letters

स्वरः अच् / अच्-वणः वर (स्वतन्त्र-वण)
स् Vowel [V]

अक्षरम् स्वरः, एक-स्वर-के िन्द त-वण- वर या एक -स्वर -के िन्द त-वण-
स् Syllable
समूहः वा समूह

समानाक्षरम् िसम् सामान्य-स्वर Simple-Vowel / Monophthong
[V]

सन्ध्यक्षरम् सिन्ध-स्वरः सिन्ध -स्वर Compound-Vowel / Diphthong
[V]

व्यञ्जनम् हल्, हल्-वणः य जन
व् ञ् Consonant [C]

स्पशः वग य-वणः पश-वण
स् Stop / Plosive [C], (Touch)

वग यः स्पश-वणः वग य-वण Class-Consonants / Grouped [C]

अन्तःस्थः वणमालायां स्पश नाम् ऊष्मणां च वणमाला में स्पश एवं ऊष्मा वण ं के Glide (Situated In-between)
मध्ये िस्थतः व्यञ्जन-वणः म ध् य िस्थत व्यञ्जन-वण

अध-स्वरः स्वरस्य िकिञ्चद् -ग ण
ु -सदृ शः स्वर के समान कु छ गुण वाले Semivowel / Semiconsonant [C]
व्यञ्जन-वणः व्यञ् जन-वण

ऊष्मा संघ ष / वायुपधानम् वाष्प / भाप िनःस ृत करने वाले Fricative [C]; Sibilant (श, ष, स);
संघ ष वण Aspirate (ह)

अयोगवाहः संयोगवाहः / पत्याहार-सूत्र ेभ्यः माहेश्वर -सूत्रों में अपिठत िविशष्ट After-sound [C]
बिहभूतः िविशष्टः व्यञ्जन-वणः व्यञ् जन-वण

अनुस्वारः स्वरानुग ः िबन्दु / स्वर के बाद उ च्चािरत शुद्ध Nasalised Resonant sound
नािस क्य व्यञ्जन वण [ ◌ं ] uttered after a Vowel [C]

वसगः िवसजनीयः िवसग [ ◌ः ] Released “h” like sound (ḥ) [C]

अनुना सकः स्वस्थानेन सह नािसकया अिप चन्द -िबन्दु [ ◌ँ ] Nasalised Letter
उच्चािरतः वणः

सानुना सकः अनुनािसक-ग ण
ु -सिहतः अनुनािसक गुण के सिहत Letter with Nasalisation

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नरनुना सकः अनुनािसक-ग ण
ु -रिहतः अनुनािसक गुण के रिहत Letter without Nasalisation

संयुक्त- संयोगः वर -रिहत व्यञ्जनों का समूह
स् Conjunct Consonants [C]
व्यञ्जना न

अनुस्वार और अनुना सक का भेद: अनुस्वारः [ ◌ं ] स्वर के बाद बोला जाने वाला शुद्ध ना सक्य व्यञ्जन है —
जैसे ‘अंशः’। अनुना सकः [ ◌ँ ] वह वण है जो अपने स्थान के साथ-साथ नाक से भी बोला जाए — जैसे
‘हँसना’। पहला अलग वण है, दूसरा उसी वण का गुण।

प्र.13 ‘स्थानम्’ से जुड़े पा रभा षक शब्द (पृष्ठ 153–154) — कण्ठः से लेकर दन्त्योष्ठ्यः तक — सारणी-रूप म
ल खए।

पुस्तक इस खण्ड का शीषक-वाक्य दे ती है — स्थानम् = आस्ये उ ारणस्य स्थलम् (मस्तक म उ ारण का ‘स्थल’) —
‘Place’ of Articulation (in the head)।

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शब्दः अथः हन्द ENGLISH

कण्ठः गलः (िज ामूल ः) गला / क ण्ठ-स्थान Throat / Glottis / Soft Palate / Velum (Uvula,
Upper-Pharynx / Oropharynx)

कण्ठ्यः कण्ठ-स्थानोत्पन्नः वणः क ण्ठ-स्थान में उ त्प न्न Guttural / Velar (Letter) (Uvular, Pharyngeal)
वण

तालु तालुक म् / काकु दम् तालु-स्थान Hard Palate

तालव्यः तालु-स्थानोत्पन्नः वणः तालु-स्थान में उ त्प न्न Palatal (Letter)
वण

मूधा मूद्धव् / मूद्ध मूध -स्थान Alveolar Ridge

मूधन्यः मूध -स्थानोत्पन्नः वणः मूध -स्थान में उ त्प वण
न्न Retroflex / Alveolar / Cerebral

दन्तः रदनः / दशनः दाँत / द न्त-स्थान (Base of) Tooth

दन्त्यः दन्त-स्थानोत्पन्नः वणः द न्त-स्थान में उ त्प वण
न्न Dental (Letter)

ओष्ठः दन्तवासः / दशनवासः होंठ / ओष्ठ-स्थान Lip

ओष्ठ्यः ओष्ठ-स्थानोत्पन्नः वणः ओष्ठ-स्थान में उ त्प न्न Labial / Bilabial (Letter)
वण

ना सक्यः नासा-स्थानोत्पन्नः वणः नािसका-स्थान में उ त्प न्न Nasal (Letter)
वण

कण्ठ- कण्ठ-तालु-स्थानयोः क ण्ठ एवं तालु स्थानों में Velar-palatal / Palato-velar
तालव्यः उत्पन्नः वणः उ त्प वण
न्न

कण्ठौष्ठ्यः कण्ठ-ओष्ठ-स्थानयोः क ण्ठ एवं ओष्ठ स्थानों में Velar-labial / Labio-velar
उत्पन्नः वणः उ त्प वण
न्न

दन्त्योष्ठ्यः दन्त-ओष्ठ-स्थानयोः द न्त एवं ओष्ठ स्थानों में Dento-labial / Labio-dental
उत्पन्नः वणः उ त्प वण
न्न

बनाने का नयम: स्थान के नाम म ‘-य’ जोड़ने से उस स्थान से नकलने वाले वण का नाम बनता है — कण्ठ →
कण्ठ्य, तालु → तालव्य, मूधा → मूधन्य, दन्त → दन्त्य, ओष्ठ → ओष्ठ्य, ना सका → ना सक्य। परीक्षा म यही
जोड़ी बार-बार पूछ जाती है।

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प्र.14 ‘करणम्’ से जुड़े पा रभा षक शब्द (पृष्ठ 154) — उपकरणम् से स्वस्थानकरणः तक — सारणी-रूप म ल खए।

पुस्तक इस खण्ड का शीषक-वाक्य दे ती है — करणम् = आस्ये उ ारणस्य उपकरणम् (मस्तक म उ ारण का ‘उपकरण’ या
‘यन्त्र’) — ‘Tool’ of Articulation (in the Head)।

शब्दः अथः हन्द ENGLISH

उपकरणम् यन्त्रम् साधन Tool

ज ा रसना जीभ Tongue

ज ा-मध्यः िज ायाः मध्यभागः जीभ का म ध् य भाग Middle of Tongue

ज ा-उपाग्रः िज ाग ात् िकिञ्चत् जीभ के अग भाग से थोड़ ा Near Tip of Tongue
पूवभागः पहले का भाग

ज ा-अग्रः िज ायाः अग भागः जीभ का अग भाग Tip of Tongue

स्वस्थानकरणः िनजस्थानस्य पर-भागः िजस वण का उ च्चारण-स्थान Such letters where a part of the ‘Place’ of
एव करणं यस्य वणस्य का पर -भाग ही उसका करण Articulation itself acts as the ‘Tool’ of
हो Articulation

ज ा के तीन भाग एक क्रम म: जीभ क नोक से पीछे क ओर च लए — अग्रः (नोक, दन्त्य वण के लए) →
उपाग्रः (नोक से ज़रा पीछे , मूधन्य वण के लए) → मध्यः (बीच, तालव्य वण के लए)। और स्थान भी उसी क्रम म
पीछे हटता है — दन्तः → मूधा → तालु। दोन क्रम एक साथ चलते ह — यही याद रखने क कुंजी है।

वयं शब्दाथान् जानीमः — पृष्ठ 154

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १
a g l AglaSem · NCERT Solutions

पाठ के क ठन शब्द क सारणी तथा ‘मातृभाषया अथ लखत’ स्तम्भ
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e m.
m as
शब्दाथाः

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a s emशब्दाथान् जानीमः’ — पृष्ठ 154 क पूरी शब्दाथ-सारणी (शब्दः · अथः · हन्द · English)।
gl
‘वयं
a
प्र.15

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ag

m .
l a se हन्द
ag
शब्दः अथः (संस्कृतम्) ENGLISH

नतान्तम् अत्यन्तम् अतीव Very / Highly

co m
e m.
नदुष्टम् दोष-रिहतम् / शुद्धम् दोष-रिहत / शुद्ध Impeccable

m l as
.co a g
sem
नोदय न्त अिभपीडयिन्त दबाते है ं Press

aनःसारय त
agl
बिहः पेषयित बाहर िनकालता है Pushes out

a s
com
बढ़ ता हुआ Move

agl
सरन् चरन्

m .उ प होता है
प्रकट भव त उत्पद्यते
as e Appears / Is produced

agl
त् न्न

नदशने उदाहरणे उदाहरण में Example

co m
.
मुरली वंशी बाँस ुर ी Flute

em
m l as
.co g
प रभाषा शास्त्रीय व्याख्या Technical definition
a
शास्त्रीय-व्याख्यानम्

a s em
a gl वाक्य म प्रयोग क जए:
• नतान्तम् — शुद्धम् उ ारणं नतान्तं महत्त्वपूणम् अ स्त। (शुद्ध उ ारण अत्यन्त महत्त्वपूण है।)
se m
com g l a
.
• प्रकट भव त — वायुः स्थाने वणरूपेण प्रकट भव त। (वायु स्थान पर वण के रूप म प्रकट होती है।)
m a
ase
• नदशने — नदशने मुरली समु चतम् उदाहरणम् अ स्त। (उदाहरण म बाँसुरी उपयुक्त दृष्टान्त है।)

agl

com
मातृभाषया अथ लखत — (सारणी का अ न्तम स्तम्भ रक्त है; वहाँ अपनी मातृभाषा म अथ लखना है।)
m .
e
प्र.16

c o m g l as
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a sem

agl यह स्तम्भ अपनी मातृभाषा म भरना है — हन्द , मराठ , बांग्ला, गुजराती, त मल, तेलुगु… जो भी आपक हो। हन्द -माध्यम के
c
m .
e
वद्याथ ऊपर प्रश्न 15 क सारणी का हन्द स्तम्भ ही उतार ल।

m a s
. co agl
नमूना उत्तर (मराठ म) —

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g l as
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m .
m ase
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शब्दः हन्द मराठ (मातृभाषया)

नतान्तम् अतीव अत्यंत

नदुष्टम् दोष-रिहत / शुद्ध दोषरिहत / शुद्ध

नोदय न्त दबाते है ं दाबतात

नःसारय त बाहर िनकालता है बाहेर काढतो

सरन् बढ़ ता हुआ सरकत

प्रकट भव त उत्पन्न होता है पकट होतो

नदशने उदाहरण में उदाहरणात

मुरली बाँस ुर ी बासरी

प रभाषा शास्त्रीय व्याख्या शास्त्रीय व्याख्या

करने का तरीका: पहले संस्कृत पयाय (अथः स्तम्भ) प ढ़ए, फर हन्द अथ, और तब अपनी भाषा का सबसे
स्वाभा वक शब्द ल खए — शब्दकोश का क ठन पयाय नह , ब ल्क जो घर म बोला जाता है। ‘मुरली’ के लए
बांग्ला म बाँ श, गुजराती म वांसळ , त मल म पुल्लाङ् कुऴल्।

अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 155
प्रश्नः १ : अधो ल खतप्रश्नानाम् उत्तरा ण एकपदे न पदे न वा उत्तरत

अभ्यासः

प्र.17 (क) उर स क तन्त्रं भव त ?

उत्तरम् — वायु-बल-तन्त्रम्। (छाती म वायु-बल-तन्त्र होता है — Air-pressure System।)

आधार (पृष्ठ 146): ‘२. उरः (Chest — Lungs & Diaphragm) / वायु-बल-तन्त्रम् — (Air-pressure
System)’। उरः म श्वासकोश (फेफड़े) और उरःप्राचीर (डाया ाम) ह, जो वायु का दाब बनाकर उसे ऊपर भेजते ह
— इस लए इसका तन्त्र ‘वायु-बल’ का तन्त्र कहलाता है।

व्याकरण: ‘उर स’ सप्तमी वभ क्त, एकवचन, नपुंसक लङ्ग (उरस् — सकारान्त नपुंसक) — अथ ‘छाती म’।
उत्तर ‘तन्त्रम्’ प्रथमा एकवचन नपुंसक लङ्ग है, क्य क प्रश्न म ‘ क तन्त्रं भव त’ पूछा गया है।

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प्र.18 (ख) ना भप्रदे शे स्थताः मांसपेश्यः क नोदय न्त ?

उत्तरम् — उरः (नोदय न्त)। (ना भ-भाग म स्थत मांसपे शयाँ छाती को दबाती ह।)

आधार (पृष्ठ 146): ‘१. सवप्रथमं ना भ-प्रदे शे स्थताः मांसपेश्यः उरः नोदय न्त।’ यही वाग्-उत्प त्त का पहला
चरण है — बोलना ना भ से शुरू होता है, गले से नह । इसी लए गायक और वक्ता ‘पेट से बोलो’ कहते ह।

व्याकरण: ‘उरः’ यहाँ तीया वभ क्त, एकवचन, नपुंसक लङ्ग है (कम — कसे दबाती ह?)। उरस् शब्द के
प्रथमा और तीया एकवचन दोन का रूप ‘उरः’ ही होता है। ‘नोदय न्त’ = अ भपीडय न्त (दबाती ह)।

प्र.19 (ग) आस्यस्य आभ्यन्तरे वणानाम् उत्पत्त्यथ तीयं तत्त्वं कम् अ स्त ?

उत्तरम् — करणम्। (दूसरा तत्त्व ‘करण’ है।)

आधार (पृष्ठ 147): ‘(क) प्रथमम् — स्थानम्, (ख) तीयम् — करणम्, (ग) तृतीयम् — आभ्यन्तर-प्रयत्नः।’
क्रम याद र खए — पहले जगह तय होती है, फर उस जगह तक पहुँचने वाला औज़ार, और अन्त म उस औज़ार का
प्रयत्न ( कतना दबाव, कतनी दूरी) — जो अगली कक्षा म पढ़ाया जाएगा।

व्याकरण: ‘करणम्’ प्रथमा वभ क्त, एकवचन, नपुंसक लङ्ग। प्रश्न म ‘तत्त्वं कम् अ स्त’ है, इस लए उत्तर भी
प्रथमा एकवचन नपुंसक लङ्ग म ही आएगा।

प्र.20 (घ) आस्ये क त स्थाना न स न्त ?

उत्तरम् — षट् (स्थाना न)। (आस्य म छह स्थान ह।)

आधार (पृष्ठ 148): ‘आस्ये — षट् स्थाना न वयं दृष्टवन्तः’ — मुखे कण्ठः, तालु, मूधा, दन्तः, ओष्ठः (पञ्च) तथा
ना सकायाम् ना सका (एकम्) — कुल छह। ध्यान रहे, प्रश्न ‘मुखे’ नह , ‘आस्ये’ पूछता है — और आस्य म मुख
तथा ना सका दोन आते ह, इस लए उत्तर पाँच नह , छह है।

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व्याकरण: ‘षट् ’ अव्यय-सदृश संख्यावाचक है; इसके साथ सं ा बहुवचन म आती है — ‘षट् स्थाना न स न्त’।
‘क त’ का उत्तर सदै व संख्या से दया जाता है।

प्र.21 (ङ) स्थानस्य काय नदशनाथ क समु चतम् उदाहरणम् अ स्त ?

उत्तरम् — मुरली। (बाँसुरी उपयुक्त उदाहरण है।)

आधार (पृष्ठ 149): ‘स्थानस्य सम्यक् काय- नदशनाथ मुरली समु चतम् उदाहरणम् अ स्त।’ बाँसुरी म हवा एक ही
है, पर छद्र बदलते ही स्वर बदल जाता है — ठ क वैसे ही मुँह म वायु एक ही है, पर स्थान बदलते ही वण बदल
जाता है।

व्याकरण: ‘मुरली’ प्रथमा वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग (ईकारान्त स्त्री लङ्ग — नद -वत्)। शब्दाथ-सारणी म
इसका पयाय वंशी दया गया है।

प्र.22 (च) करणा न मुरल्याः कस्य भागम् इव व्यवहर न्त ?

उत्तरम् — अङ्गलीः इव (अङ्गलयः इव)। (करण बाँसुरी बजाती हुई अङ्ग लय क तरह काम करते ह।)

आधार (पृष्ठ 150): ‘यथा नदशने — मुरल वादयन्त्यः अङ्गलयः — आस्यस्य करणा न इव व्यवहर न्त।’
अङ्ग लयाँ छद्र को छू ती ह या उनके पास जाती ह — ठ क वही काम करण ( ज ा या स्व-स्थान) स्थान के साथ
करते ह।

यह जोड़ी अलग-अलग याद क जए: अङ्ग ल च्छद्रा ण → स्थाना न इव (पृष्ठ 149) और अङ्गलयः →
करणा न इव (पृष्ठ 150–151)। परीक्षा म दोन उलटकर पूछे जाते ह। ‘अङ्गलयः’ प्रथमा बहुवचन, स्त्री लङ्ग
(अङ्ग ल — इकारान्त स्त्री लङ्ग); ‘कस्य भागम्’ के उत्तर म तीया चा हए, इस लए ‘अङ्गलीः इव’ भी शुद्ध है।

अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 155

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प्रश्नः २ : अधो ल खतप्रश्नानाम् उत्तरा ण पूणवाक्येन लखत

अभ्यासः

प्र.23 (क) करणं क भव त ?

उत्तरम् — वणस्य उ ारण-समये, आस्यस्य यः भागः स्थानं स्पृश त, स्थानस्य समीपं वा या त, सः भागः ‘करणम्’ इ त
कथ्यते।
(वण के उ ारण के समय आस्य का जो भाग स्थान को छू ता है या स्थान के पास तक जाता है, वही भाग ‘करण’ कहलाता है।)

दो-दो शब्द पर ध्यान: प रभाषा म ‘स्पृश त’ के साथ ‘समीपं वा या त’ भी है। स्पश-वण (क्, च्, ट् , त्, प्) म
करण स्थान को पूरा छू ता है; अन्तःस्थ और ऊष्म वण (य्, र्, ल्, व्, श्, ष्, स्, ह्) म वह केवल पास तक जाता है
और वायु वहाँ से रगड़ खाकर नकलती है। दोन ही अवस्था म वह अङ्ग ‘करण’ ही कहलाएगा।

तुलना: स्थानम् = ‘Place’ of Articulation (कहाँ), करणम् = ‘Tool’ of Articulation ( कससे)।
एक जगह है, दूसरा औज़ार।

प्र.24 (ख) उरः ासकोश स्थतं वायुं कुत्र नःसारय त ?

उत्तरम् — उरः ासकोश- स्थतं वायुम् ऊध्व नःसारय त। (छाती फेफड़ म स्थत वायु को ऊपर क ओर नकालती है।)

आधार (पृष्ठ 146): ‘२. उरः पुनः श्वासकोश- स्थतं वायुम् ऊध्व नःसारय त।’ और अगला चरण बताता है क वह
ऊपर जाती हुई वायु पहले कण्ठ- बलं प्राप्त करती है, फर आस्य म प्रवेश करती है। अतः पूरा उत्तर इस प्रकार भी
लखा जा सकता है — उरः श्वासकोश- स्थतं वायुम् ऊध्व कण्ठ- बलं प्र त नःसारय त।

व्याकरण: ‘वायुम्’ तीया वभ क्त, एकवचन, पुं ल्लङ्ग (वायु — उकारान्त पुं ल्लङ्ग)। ‘ऊध्वम्’ अव्यय है
( दशा-वाचक), इस लए इसका रूप कभी नह बदलता। ‘कुत्र’ का उत्तर स्थान या दशा से दया जाता है।

प्र.25 (ग) मुरल्याः अङ्ग ल च्छद्रा ण क दृशं व्यवहर न्त ?

उत्तरम् — मुरल्याः अङ्ग ल च्छद्रा ण आस्यस्य ‘स्थाना न’ इव व्यवहर न्त। (बाँसुरी के छद्र आस्य के स्थान क तरह काम करते
ह।)

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १
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. com
आधार (पृष्ठ 149): ‘मुरल्याः अङ्ग ल च्छद्रा ण आस्यस्य स्थाना न इव व्यवहर न्त। मुरली-न लकया आगच्छन्
m होती है,
वायुः अङ्ग ल च्छद्रे षु एव व वध-ध्व न-रूपेण प्रकट भव त।’ अथात् जैसे बाँसुरी क ध्व न छद्र परeप्रकट
s
m
co पर प्रकट होता है — नली म या श्वास-नली म नह । gl a
. a
em
वैसे ही वण स्थान

a s
gl
aव्याकरण: ‘मुरल्याः’ षष्ठी वभ क्त, एकवचन, स्त्री लङ्ग (मुरली → मुरल्याः — ‘बाँसुरी के’)। ‘अङ्ग ल च्छद्रा ण’

co m
ag
प्रथमा बहुवचन, नपुंसक लङ्ग। ‘क दृशम्’ का अथ ‘कैसा / कसके समान’ — इस लए उत्तर म ‘इव’ अवश्य आना

m .
as e
चा हए।

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m.
प्र.26 (घ) केषां वणानाम् उ ारणे ज ा प्रायः न ष्क्रया भव त ?

m as e
.co a g l
se m
g l a
a ना सक्य वण के उ ारण म जीभ प्रायः न ष्क्रय रहती है।)
उत्तरम् — कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानाम्, ना सक्यानां च वणानाम् उ ारणे ज ा प्रायः न ष्क्रया भव त। (कण्ठ्य, ओष्ठ्य और

m a s
m .co agl
se
क्य : इन तीन स्थान म करण के लए बाहर से कसी अङ्ग क ज़रूरत ही नह पड़ती — ‘स्व-स्थानम् एव करणं

g l a
भव त’। कण्ठ म कण्ठ का अग्र-भाग कण्ठ के पृष्ठ-भाग को छू ता है, ओष्ठ म अधरोष्ठ उत्तरोष्ठ को, और ना सका म
a
ना सका-मूल का अधो-भाग उप र-भाग को। जीभ को हलने क आवश्यकता ही नह — इसी लए वह न ष्क्रय है।

co m
m .
ase
‘प्रायः’ क्य लखा है: ‘प्रायः’ = लगभग / प्रायशः। पुस्तक सतक शब्द चुनती है, क्य क बोलते समय जीभ मुँह म
m
.co
रहती तो है, पर करण का काम नह करती। इस लए उत्तर म भी ‘प्रायः’ लखना ठ क है।
a g l
s e m
la
व्याकरण: ‘केषाम्’ षष्ठी बहुवचन है, अतः उत्तर भी षष्ठी बहुवचन म — कण्ठ्यानाम्, ओष्ठ्यानाम्, ना सक्यानाम्।

ag
se m
com उ ारणाथ सामान्यं करणं कम् अ स्त ? g l a
. a
em
प्र.27 (ङ) तालव्यानां, मूधन्यानां, दन्त्यानां च वणानाम्

a s
उत्तर agl
उत्तरम् — तालव्यानां, मूधन्यानां, दन्त्यानां च वणानाम् उ
co m
ारणाथ सामान्यं करणं ‘ ज ा’ अ स्त। (इन तीन प्रकार के वण

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के उ ारण के लए सामान्य करण जीभ है।)

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gषु → ‘ ज ा’ करणं भव त।’
m .cआधार (पृष्ठ 150 क पे टका): ‘तालु, मूधा, दन्तः च — एतेषु त्रषु स्थाने
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योग्यता वस्तर का सूत्र भी यही कहता है — ‘तालव्य-मूधन्य-दन्त्यानां — ज ा करणम्।’
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‘सामान्य’ और ‘ वशेष’ का भेद: तीन का सामान्य करण एक ही है — ज ा; पर वशेष करण अलग-अलग ह
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— तालव्य म ज ा-मध्यः, मूधन्य मem
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aglहै।
ज ा-उपाग्रः, दन्त्य म ज ा-अग्रः। अभ्यास का प्रश्न ५ ठ क इसी ‘सामान्य
बनाम वशेष’ भेद पर आधा रत

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

प्र.28 (च) कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, ना सक्यानां च वणानाम् उ ारणाथ स्थानस्य करणस्य च मध्ये क भव त ?

उत्तरम् — कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, ना सक्यानां च वणानाम् उ ारणाथ स्थानस्य करणस्य च मध्ये अभेदः भव त; यतः तेषां ‘स्व-
स्थानम् एव करणं’ भव त।
(इन वण के उ ारण म स्थान और करण के बीच कोई भेद नह रहता, क्य क इनका अपना स्थान ही करण बन जाता है।)

पुस्तक का वाक्य (पृष्ठ 151): ‘कण्ठः, ओष्ठः, ना सका च — एतेषु त्रषु स्थानेषु → स्व-स्थानम् एव करणं
भव त।… तत्-तत्-स्थानस्य एव क त् पर-भागः, तत्-तत्-स्थानस्य पूव-भागं स्पृश त, समीपं वा या त।’ अथात्
दोन भू मकाएँ एक ही अङ्ग नभाता है — उसका एक भाग स्थान बनता है और दूसरा भाग करण।

वग स्थानम् बनने वाला भाग करणम् बनने वाला भाग

कण्ठ्याः कण्ठस्य पष्ृ ठ-भागः क ण्ठस्य अग-भागः

ओष्ठ्याः उत्तरोष्ठः अधरोष्ठः

ना सक्याः नािसका-मूल स्य उपिर-भागः नािसका-मूल स्य अधो-भागः

छोटा उत्तर भी स्वीकाय: ‘स्व-स्थानम् एव करणं भव त’ — पा णनीय- शक्षा का सूत्र भी यही है : ‘शेषाः —
स्वस्थानकरणाः।’

अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 155
प्रश्नः ३ : अधो ल खतेषु वाक्येषु आम् / न इ त ल खत्वा उ चतभावं सूचयत

अभ्यासः

प्र.29 (क) ासकोश स्थतः वायुः ऊध्व चरन् पूवम् आस्यं प्रा ो त।

उत्तरम् — न। (नह ।)
शु ं वाक्यम् — श्वासकोश- स्थतः वायुः ऊध्व चरन् पूव कण्ठ- बलं प्रा ो त, ततः आस्यं प्र वश त। (फेफड़ क वायु ऊपर चलती
हुई पहले कण्ठ- बल तक पहुँचती है, उसके बाद आस्य म प्रवेश करती है।)

आधार (पृष्ठ 146): ‘३. सः वायुः ऊध्व सरन् कण्ठ- बलं प्रा ो त। ४. ततः, सः वायुः पुनः ऊध्व सरन् आस्यं
प्र वश त।’ अथात् क्रम म कण्ठ- बल तीसरा और आस्य चौथा चरण है — इस लए ‘पूवम् आस्यं प्रा ो त’ असत्य
है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

भ्रम कहाँ होता है: ‘कण्ठ- बलः’ (Larynx) और ‘कण्ठः’ (उ ारण-स्थान) दो अलग चीज़ ह। कण्ठ- बल आस्य
से नीचे गले म है; कण्ठ (स्थान) आस्य के भीतर है। वायु पहले नीचे वाले कण्ठ- बल से गुज़रती है।

प्र.30 (ख) सवप्रथमं ना भ-प्रदे शे स्थताः मांसपेश्याः कण्ठं नोदय न्त।

उत्तरम् — न। (नह ।)
शु ं वाक्यम् — सवप्रथमं ना भ-प्रदे शे स्थताः मांसपेश्यः उरः नोदय न्त। (सबसे पहले ना भ-भाग क मांसपे शयाँ छाती को दबाती
ह, कण्ठ को नह ।)

क्य उरः ही: मांसपे शयाँ ना भ-प्रदे श म ह और उनके ठ क ऊपर उरः (छाती) है, जसम श्वासकोश भरे हुए ह। दबाव
उरः पर पड़ेगा तभी वायु बाहर नकलेगी। कण्ठ तो बहुत ऊपर है — वहाँ वायु पहुँचती है, दबती नह ।

क्रम दोहराइए: ना भ-प्रदे शः → उरः → कण्ठ- बलः → आस्यम्। यही चार-चरणीय क्रम प्रश्न ३ (क) और (ख) दोन
का आधार है।

प्र.31 (ग) आस्यस्य आभ्यन्तरे वणानाम् उत्पत्त्यथम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः आवश्यकम् अ स्त।

उत्तरम् — आम्। (हाँ।)

आधार (पृष्ठ 147): ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे वणानाम् उत्पत्त्यथ वस्तुतः त्री ण तत्त्वा न आवश्यका न भव न्त — (क)
स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः।’ अतः यह वाक्य सत्य है — आभ्यन्तर-प्रयत्न तीसरा आवश्यक तत्त्व
है।

कन्तु इस पाठ म नह : पुस्तक स्वयं कहती है — ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य वषये अ ग्रमायां कक्षायां ास्यामः।’ तत्त्व
आवश्यक है (इस लए ‘आम्’), पर उसका वस्तार अगली कक्षा म पढ़ाया जाएगा। इसी कारण पाठ का नाम
‘वण ारण- शक्षा १’ है।

प्र.32 (घ) तालव्य-वणानाम् उ ारणाथ दन्तः स्थानं स्पृश त।

उत्तरम् — न। (नह ।)

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शु ं वाक्यम् — तालव्य-वणानाम् उ ारणाथ ज ायाः मध्य-भागः ( ज ा-मध्यः) तालु इ त स्थानं स्पृश त। (तालव्य वण के
उ ारण के लए जीभ का मध्य भाग तालु नामक स्थान को छू ता है।)

दो भूल एक साथ: वाक्य म (१) करण गलत है — ‘दन्तः’ करण नह , स्थान है; और (२) तालव्य वण का करण
ज ा है, दाँत नह । सूत्र स्पष्ट है — ‘ ज ामध्येन — तालव्यानाम्।’

स्वयं जाँ चए: ‘च’ बो लए — जीभ का बीच वाला भाग ऊपर तालु से लगेगा, दाँत कह काम नह करगे। अब ‘त’
बो लए — तब जीभ क नोक दाँत पर लगेगी; वह दन्त्य वण है, तालव्य नह ।

प्र.33 (ङ) मूधन्यानां वणानाम् उ ारणाथ ज ा स्थानं स्पृश त।

उत्तरम् — आम्। (हाँ।)

आधार (पृष्ठ 150): ‘तालव्यानां, मूधन्यानां, दन्त्यानां च वणानाम् उ ारणाथ → ज ा — यथाक्रमं तालु, मूधानं,
दन्तं च स्थानं स्पृश त, समीपं वा या त।’ मूधन्य वण (ट् ठ् ड् ढ् ण् र् ष्) इसी म आते ह, अतः वाक्य सत्य है।

और ठ क-ठ क कह तो: मूधन्य वण म ज ा का उपाग्र-भाग मूधा को छू ता है — सूत्र है ‘ ज ोपाग्रेण —
मूधन्यानाम्।’ अथात् ‘ ज ा’ कहना सही है, ‘ ज ा-उपाग्रः’ कहना और भी सट क।

प्र.34 (च) तत्तत्स्थानस्य एव क त् पूवभागः, तत्तत्स्थानस्य परभागं स्पृश त।

उत्तरम् — न। (नह ।)
शु ं वाक्यम् — तत्-तत्-स्थानस्य एव क त् पर-भागः, तत्-तत्-स्थानस्य पूव-भागं स्पृश त, समीपं वा या त। (उसी स्थान का
कोई पर-भाग, उसी स्थान के पूव-भाग को छू ता है या उसके पास जाता है।)

क्रम उलटा है: प्रश्न म ‘पूवभागः… परभागं स्पृश त’ लखा है, जब क पुस्तक (पृष्ठ 151) म ठ क इसका उलटा है —
पर-भागः → पूव-भागं। पा रभा षक सारणी क प रभाषा भी यही पुष्ट करती है — ‘स्वस्थानकरणः =
नजस्थानस्य पर-भागः एव करणं यस्य वणस्य’। अथात् करण = पर-भाग और स्थान = पूव-भाग।

याद रखने का सूत्र: जो हलता है वह करण (पर-भाग), जो स्थर रहता है वह स्थान (पूव-भाग)। ‘प’ बो लए —
नीचे का ह ठ (अधरोष्ठः = करणम्) हलकर ऊपर के ह ठ (उत्तरोष्ठः = स्थानम्) से लगता है।

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अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 156
प्रश्नः ४ : मुखे उपलभ्यमाना न स्थाना न ब हष्ठात् अन्तः यथाक्रमं (अथात् वपरीत-क्रमेण) लखन्तु

अभ्यासः

प्र.35 मुखे उपलभ्यमाना न स्थाना न ब हष्ठात् अन्तः यथाक्रमं (अथात् वपरीत-क्रमेण) लखन्तु — (क) मूधा (ख)
दन्तः (ग) तालु (घ) कण्ठः (ङ) ओष्ठः

उत्तरम् — ब हष्ठात् अन्तः क्रमः इत्थम् अ स्त —

क्रमः स्थानम् कुत्र

(क) ओष्ठः सवबिहः — होंठ

(ख) द न्तः होंठ के ठीक भीतर — दाँत

(ग) मूध दाँतों के पीछे उठा हआ
ु भाग

(घ) तालु तालु — मुँह की छत

(ङ) क ण्ठः सव न्तः — गला

एकपङ् क्त्याम् — ओष्ठः → दन्तः → मूधा → तालु → कण्ठः।

यह क्रम कहाँ से आया: पृष्ठ 148 का चत्र ‘आस्ये वणानां षट् उ ारण-स्थाना न’ स्थान को भीतर से बाहर क
ओर गनता है — १. कण्ठः, २. तालु, ३. मूधा, ४. दन्तः, ५. ओष्ठः। प्रश्न इसी क्रम को उलटकर (ब हष्ठात् अन्तः =
बाहर से भीतर) लखने को कहता है, इस लए उत्तर पुस्तक क गनती का ठ क वपरीत है।

बिहष्ठात् अन्तः — बाहर से भीतर की ओर

ओष्ठः दन्तः मूध तालु कण्ठः

बिहः अन्तः

पुस्तकस्य गणना (अन्तः → बिहः) : १ कण्ठः · २ तालु · ३ मूध · ४ दन्तः · ५ ओष्ठः

बाहर से भीतर क ओर मुख के पाँच स्थान। ना सका मुख म नह है, अतः इस क्रम म नह गनी जाती।

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सावधानी: प्रश्न ‘मुखे उपलभ्यमाना न स्थाना न’ पूछता है — इस लए ना सका इस सूची म नह आएगी। ना सका

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आस्य का छठा स्थान अवश्य है, पर वह मुख म नह , ना सका म है।

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अभ्यासात् जायते स ः — पृष्ठ 156

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प्रश्नः ५ : यथायोग्यं मेलनं कुरुत — सामान्य-स्थानम् · वशेष-स्थानम् · सामान्य-करणम् · वशेष-करणम्

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अभ्यासः
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यथायोग्यं मेलनं कुरुत — सामान्य-स्थानम् (ओष्ठः, दन्तः, ना सका, कण्ठः, मूधा, तालु) · वशेष-स्थानम् (मूधा,
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प्र.36

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ना सकामूलस्य उप रभागः, तालु, उत्तरोष्ठः, दन्तः, कण्ठस्य पृष्ठभागः) · सामान्य-करणम् (स्वस्थानं करणम् /

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com ज ोपाग्रः) l
ज ा करणम्) · वशेष-करणम् (अधरोष्ठः, ज ाग्रः, ज ामध्यः, कण्ठस्य अग्रभागः, ना सकामूलस्य
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अधोभागः,

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उत्तरम् — शु ं मेलनम् इत्थम् —

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सामान्य-स्थानम् वशेष-स्थानम्
g l a सामान्य-करणम् वशेष-करणम्

ओष्ठः उत्तरोष्ठः
a स्वस्थानं करणम् अधरोष्ठः

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seनािसकामूल य अधोभागः
दन्तः दन्तः ज ा करणम् िज ागः

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ना सका नािसकामूल स्य उपिरभागः स्वस्थानं करणम् स्

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a gl कण्ठः कण्ठस्य पष्ृ ठभागः स्वस्थानं करणम् क ण्ठस्य अगभागः

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मूधा ज ा करणम् िज ोपागः
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तालु तालु ज ा करणम् िज ाम ध् यः

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मलाने का तरीका — तीन कदम:

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१. पहले सामान्य-करण तय क जए। य द स्थान तालु, मूधा या दन्तः है → करण ‘ ज ा करणम्’। य द स्थान

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कण्ठः, ओष्ठः या ना सका है → करण ‘स्वस्थानं करणम्’। (पृष्ठ 150–151 क दोन em पे टकाएँ यही कहती ह।)
. c२.o फर वशेष-करण भ रए। ज ा वाले तीन म — तालु ↔ ज ामध्यः, a gमूlधा ↔ ज ोपाग्रः, दन्तः ↔
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ज ाग्रः (सूत्र : ज ामध्येन–तालव्यानाम्, ज ोपाग्रेण–मूधन्यानाम्, ज ाग्रेण–दन्त्यानाम्)। स्वस्थान वाले तीन म
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— कण्ठः ↔ कण्ठस्य अग्रभागः, ओष्ठः ↔ अधरोष्ठः, ना सका ↔ ना सकामूलस्य अधोभागः (पृष्ठ 151 के तीन
चत्र क कोष्ठक-पं क्तयाँ)।
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३. अन्त म वशेष-स्थान। ज ा वाले तीन म स्थान वही रहता है — तालु ↔ तालु, मूधा ↔ मूधा, दन्तः ↔ दन्तः,
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क्य क वहाँ छू ने वाला बाहर से (जीभ)emआता है। स्वस्थान वाले तीन म स्थान उसी अङ्ग का दूसरा भाग होता है —
aglओष्ठः ↔ उत्तरोष्ठः, ना सका ↔ ना सकामूलस्य उप रभागः।
कण्ठः ↔ कण्ठस्य पृष्ठभागः,

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जोड़ी बनाकर याद क जए: स्वस्थान-करण वाले तीन म वशेष-स्थान और वशेष-करण आमने-सामने पड़ते ह
— पृष्ठभागः ↔ अग्रभागः, उत्तरोष्ठः ↔ अधरोष्ठः, उप रभागः ↔ अधोभागः। ऊपर वाला (या पीछे वाला) स्थान,
नीचे वाला (या आगे वाला) करण।

अत्र इदम् अवधेयम् — पृष्ठ 157
प रभाषा — ‘स्वरः’ तथा ‘व्यञ्जनम्’ इत्यनयोः प रभाषा-वाक्ये

प रभाषा

प्र.37 ‘स्वरः’ इत्यस्य प रभाषा-वाक्यं कम् ? तस्य अथ च लखत।

प रभाषा-वाक्यम् — स्वयं राजन्ते इ त स्वराः।
पुस्तकस्य अथः — ये वणाः (स्वयं) स्वतन्त्ररूपेण (राजन्ते) उ ायन्ते, ते → स्वराः भव न्त।
( हन्द — जो वण अपने आप, स्वतन्त्र रूप से बोले जाते ह, वे स्वर होते ह।)

पद- व ेषण: स्वयम् = अपने आप, बना कसी के सहारे। राजन्ते = शो भत होते ह / प्रकट होते ह — यहाँ
पुस्तक इसका अथ ‘उ ायन्ते’ (उ ा रत होते ह) करती है। अथात् स्वर वह वण है जसे बोलने के लए कसी दूसरे
वण क सहायता नह चा हए — ‘अ’, ‘इ’, ‘उ’ अकेले ही पूरे बोले जा सकते ह।

जाँच क जए: ‘क्’ को अकेले बोलने क को शश क जए — नह बोल पाएँगे; ‘क्अ’ कहना ही पड़ेगा। पर ‘अ’
अकेले पूरा बोला जाता है। यही स्वर और व्यञ्जन का मूल भेद है। पा रभा षक सारणी म स्वरः = अच् / अच्-वणः
(Vowel) दया है।

प्र.38 ‘व्यञ्जनम्’ इत्यस्य प रभाषा-वाक्यं कम् ? तस्य अथ च लखत।

प रभाषा-वाक्यम् — अन्वग् भव त व्यञ्जनम्।
पुस्तकस्य अथः — उ ारणाथ यः वणः अचं (स्वरं) प्र त परा तः भव त, सः वणः → ‘व्यञ्जनं’ भव त।
( हन्द — उ ारण के लए जो वण स्वर पर आ त रहता है, वही वण व्यञ्जन होता है।)

‘अन्वग्’ का अथ: ‘अनु + अञ्च्’ — पीछे -पीछे चलने वाला। व्यञ्जन स्वर के पीछे -पीछे चलता है, अकेला खड़ा
नह हो सकता। इसी लए लखने म भी उसके नीचे हलन्त् ( ◌् ) लगाना पड़ता है — क्, ख्, ग् — और बोलते समय
उसम ‘अ’ जोड़ना पड़ता है — क, ख, ग।

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दोन प रभाषाएँ आमने-सामने: स्वरः = स्वतन्त्रः (अपने बल पर), व्यञ्जनम् = परा तः (दूसरे के सहारे)।
पा रभा षक सारणी म व्यञ्जनम् = हल्, हल्-वणः (Consonant) और स्वरः = अच् (Vowel) — ‘अच्’ तथा
‘हल्’ ये माहेश्वर-सूत्र के प्रत्याहार ह।

योग्यता वस्तरः — पृष्ठ 157
पा णनीय- शक्षा-सूत्रा ण — करण-प्रकरणम् (सूत्रा ण तथा तेषाम् अथाः)

योग्यता वस्तरः

प्र.39 ‘करण-प्रकरणम्’ कमथम् अत्र द यते ? षष्ठ-कक्षायाः ‘स्थान-प्रकरणेन’ सह अस्य कः सम्ब ः ?

पुस्तकस्य वाक्यम् — षष्ठ-कक्षायां ‘स्थान-प्रकरणस्य’ सूत्रा ण दृष्टवन्तः। अधुना ‘करण-प्रकरणस्य’ सूत्रा ण — (छठ कक्षा म हमने
‘स्थान-प्रकरण’ के सूत्र दे खे थे; अब ‘करण-प्रकरण’ के सूत्र दे खते ह।)

क्रम इस प्रकार बनता है: पा णनीय- शक्षा वेदाङ्ग ‘ शक्षा’ का प्र सद्ध ग्रन्थ है। उसम वण ारण के तीन तत्त्व क्रम
से आते ह — पहले स्थान (कक्षा ६ म पढ़ा), फर करण (यहाँ, कक्षा ८ म), और फर प्रयत्न (अगली कक्षा म)।
इसी लए इस पाठ म जो कुछ चत्र और पे टकाओं से समझाया गया, वही योग्यता वस्तर म मूल सूत्र-रूप म दया
गया है — ता क वद्याथ प रभाषा और शास्त्र-वाक्य दोन को जोड़कर दे ख सके।

पूरा सूत्र-समूह एक साथ: ‘करणम् अ प।’ · ‘तालव्य-मूधन्य-दन्त्यानां — ज ा करणम्।’ · ‘ ज ामध्येन —
तालव्यानाम्।’ · ‘ ज ोपाग्रेण — मूधन्यानाम्।’ · ‘ ज ाग्रेण — दन्त्यानाम्।’ · ‘शेषाः — स्वस्थानकरणाः।’ ·
‘इत्येतत् करणम्।’ — नीचे प्रत्येक का अथ अलग-अलग दया गया है।

प्र.40 सूत्रम् — ‘करणम् अ प।’ अस्य अथः कः ?

अथः (पुस्तकानुसारम्) — अधुना (वण ारणस्य) ‘करणं’ जानीमः। (अब हम वण ारण का ‘करण’ जानते ह।)

‘अ प’ क्य : ‘अ प’ = भी। स्थान-प्रकरण समाप्त हो चुका; अब करण भी जानना है — यह सूत्र प्रकरण का
आरम्भ-सूचक है। शास्त्र-ग्रन्थ म ऐसा छोटा सूत्र नए प्रकरण का ार खोलता है, जैसे व्याकरण म ‘अथ
शब्दानुशासनम्’।

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प्र.41 सूत्रम् — ‘तालव्य-मूधन्य-दन्त्यानां — ज ा करणम्।’ अस्य अथः कः ?

अथः (पुस्तकानुसारम्) — तालव्यानां मूधन्यानां दन्त्यानां च वणानाम् उ ारणे → ‘ ज ा’ करणं भव त। (तालव्य, मूधन्य
और दन्त्य वण के उ ारण म करण जीभ होती है।)

यह सामान्य नयम है: यह सूत्र तीन वग का सामान्य करण एक साथ बता दे ता है। आगे के तीन सूत्र बताएँगे क
उसी जीभ का कौन-सा भाग कस वग के लए काम करता है — अथात् वशेष करण। अभ्यास का प्रश्न २ (ङ)
इसी सूत्र पर आधा रत है।

व्याकरण: ‘तालव्य-मूधन्य-दन्त्यानाम्’ षष्ठी वभ क्त, बहुवचन — ‘तालव्य, मूधन्य तथा दन्त्य वण का’। ‘ ज ा’
प्रथमा एकवचन, स्त्री लङ्ग और ‘करणम्’ प्रथमा एकवचन, नपुंसक लङ्ग — यह वधेय है, अतः लङ्ग-भेद होते
हुए भी वाक्य शुद्ध है।

प्र.42 सूत्रम् — ‘ ज ामध्येन — तालव्यानाम्।’ अस्य अथः कः ?

अथः (पुस्तकानुसारम्) — तालव्य-वणानाम् उ ारणे → ज ायाः ‘मध्य-भागः’ करणं भव त। (तालव्य वण के उ ारण म
जीभ का मध्य भाग करण होता है।)

कौन-से वण: तालव्य वण ह — इ ई · ए ऐ · च् छ् ज् झ् ञ् · य् · श्। इन सबम जीभ का बीच वाला भाग ऊपर
उठकर तालु के पास जाता है। ‘च’ और ‘श’ बोलकर दे खए — दोन म जीभ का मध्य ही काम करता है।

व्याकरण: ‘ ज ामध्येन’ तृतीया वभ क्त, एकवचन — ‘जीभ के मध्य भाग से’। करण-कारक म तृतीया आती है
(‘करणे तृतीया’) — और यहाँ वषय ही ‘करण’ है, इस लए तृतीया वभ क्त का प्रयोग वशेष रूप से साथक है।

प्र.43 सूत्रम् — ‘ ज ोपाग्रेण — मूधन्यानाम्।’ अस्य अथः कः ?

अथः (पुस्तकानुसारम्) — मूधन्य-वणानाम् उ ारणे → ज ायाः ‘उपाग्र-भागः’ करणं भव त। (मूधन्य वण के उ ारण म
जीभ का उपाग्र भाग करण होता है।)

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‘उपाग्रः’ कसे कहते ह: पा रभा षक सारणी क प रभाषा है — ‘ ज ाग्रात् क चत् पूवभागः’ अथात् जीभ क
नोक से थोड़ा पीछे का भाग (Near Tip of Tongue)। मूधन्य वण ह — ऋ ॠ · ट् ठ् ड् ढ् ण् · र् · ष्। ‘ट’
बो लए — जीभ ज़रा मुड़कर उपाग्र से मूधा को छू ती है; इसी लए अंग्रेज़ी म इन्ह Retroflex (मुड़े हुए) कहा जाता
है।

स दे खए: ‘ ज ा + उपाग्रेण’ म गुण-स से ‘आ + उ = ओ’ हुआ, अतः रूप बना ‘ ज ोपाग्रेण’।

प्र.44 सूत्रम् — ‘ ज ाग्रेण — दन्त्यानाम्।’ अस्य अथः कः ?

अथः (पुस्तकानुसारम्) — दन्त्य-वणानाम् उ ारणे → ज ायाः ‘अग्र-भागः’ करणं भव त। (दन्त्य वण के उ ारण म जीभ
का अग्र भाग — नोक — करण होता है।)

कौन-से वण: दन्त्य वण ह — ऌ · त् थ् द् ध् न् · ल् · स्। इनम जीभ क नोक सीधे दाँत के मूल से लगती है। ‘त’
और ‘ट’ को बारी-बारी बो लए — अन्तर साफ़ दखेगा : ‘त’ म नोक दाँत पर, ‘ट’ म उपाग्र मूधा पर।

तीन सूत्र एक साथ याद क जए: जीभ क नोक → दन्त्य, नोक से ज़रा पीछे → मूधन्य, मध्य → तालव्य।
जैसे-जैसे करण पीछे हटता है, स्थान भी पीछे हटता जाता है (दन्तः → मूधा → तालु)।

प्र.45 सूत्रम् — ‘शेषाः — स्वस्थानकरणाः।’ अस्य अथः कः ? ‘शेषाः’ इ त के ?

अथः (पुस्तकानुसारम्) — शेषाणां (कण्ठ्य-ओष्ठ्य-ना सक्यानां) वणानाम् उ ारणे → ‘स्वस्थानं’ (स्वस्य स्थानस्य क द्
भाग वशेषः) एव → करणं भव त।
(शेष वण के — अथात् कण्ठ्य, ओष्ठ्य तथा ना सक्य वण के — उ ारण म उनका अपना स्थान ही, ठ क-ठ क कह तो उसी
स्थान का कोई वशेष भाग, करण बन जाता है।)

‘शेषाः’ कौन: छह स्थान म से तीन (तालु, मूधा, दन्तः) पछले सूत्र म आ चुके; जो बचे — कण्ठः, ओष्ठः, ना सका
— वे ही ‘शेषाः’ ह। सूत्र-शैली क यह खूबी है — जो पहले कह दया गया उसे दुहराया नह जाता, बाक को ‘शेष’
कहकर एक ही शब्द म समेट लया जाता है।

जोड़कर दे खए: पुस्तक का पे टका-वाक्य (पृष्ठ 151) — ‘कण्ठः, ओष्ठः, ना सका च — एतेषु त्रषु स्थानेषु → स्व-
स्थानम् एव करणं भव त।’ और पा रभा षक प रभाषा — ‘स्वस्थानकरणः = नजस्थानस्य पर-भागः एव करणं यस्य
वणस्य।’ तीन वाक्य एक ही बात कहते ह।

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सूत्रम् — ‘इत्येतत् करणम्।’ अस्य अथः कः ?
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agl(पुस्तकानुसारम्) — अत्र पयन्तम् एतत् उ ारणस्य ‘करणं’ च चतम्। (यहाँ तक उ ारण के ‘करण’ क चचा हुई।)
अथः

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यह उपसंहार-सूत्र है: जैसे ‘करणम् अ प।’ प्रकरण खोलता है, वैसे ही ‘इत्येतत् करणम्।’ उसे बन्द करता है। बीच
के पाँच सूत्र म करण का पूरा नयम आ गया — पहले
s e mसामान्य ( ज ा), फर तीन वशेष (मध्य, उपाग्र, अग्र), और
a का होगा, जो अगली कक्षा म पढ़ाया जाएगा।
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अन्त म शेष (स्वस्थान)। अगला प्रकरण ‘प्रयत्न’

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पाठ का समापन: यही इस पाठ का और द पकम् कक्षा 8 क पूरी पुस्तक का भी अ न्तम अंश है। पृष्ठ 158 का

m a s em दे ता है — उसे
‘आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थाना न, षट् करणा न च’ चक्र सब कुछ एक चत्र म समेटकर दखा
बार-बार.देcoखए, यही सबसे अच्छा पुनरावतन है।
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आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थाना न, षट् करणा न चm(वण-चक्रम्) — पृष्ठ 158 a s
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पाठस्य अ न्तमं चत्रम् — षट् सु स्थानेषु उत्पद्यमानाः वणाः तथा ते

वण-चक्रम्
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पृष्ठे 158 स्थतस्य वण-चक्रस्य अनुसारं — क स्मन् स्थाने के वणाः उत्पद्यन्ते तथा तत्र क करणं भव त ?
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प्र.47

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a gl पुस्तक का अ न्तम चत्र ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे षट् स्थाना न, षट् करणा न च’ पूरे पाठ को एक ही चक्र म समेट देता है। बाहरी
अध-वृत्त म षट् स्थाना न ह, भीतरी अध-वृत्त म षट् करणा न, और बीच के छल्ल म उन स्थान से नकलने वाले वण।
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स्थानम् वग-नाम तत्र उत्पद्यमानाः वणाः (चक्रानुसारम्) करणम्

१. कण्ठः कण्ठ ाः agl अ आ आ३ · क् ख् ग् घ् ङ् · ह् · िवसगः ◌ः स्व-स्थानं करणम्

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२. तालु तालव्याः इ ई ई३ · च् छ् ज् झ् ञ् · य् · श् ज ा-मध्यः

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३. मूधा मूध न्याः ऋ ॠ ऋ३ · ट् ठ् ड् ढ् ण् · र् · ष्
g l a ज ा-उपाग्रः

m .४. दन्तः a
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दन्त्याः ऌ ॡ३ · त् थ् द् ध् न् · ल् · स् ज ा-अग्रः

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५. ओष्ठः उ ऊ ऊ३ · प् फ् ब् भ् म् · व् (द न्त्योष्ठ ः) ओष्ठः (अधरोष्ठः)
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ओष्ठ ाः

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ङ् ञ् ण् न् म् · अनुस्वारः ◌ं
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६. ना सका नािसक्याः स्व-स्थानं करणम्

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

चक्र पढ़ने का तरीका: सबसे बाहरी छल्ला स्वर दे ता है, उसके भीतर वग य व्यञ्जन (स्पश), फर अन्तःस्थ (य् र्
ल् व्), फर ऊष्म (श् ष् स् ह्), और सबसे भीतर अयोगवाह (अनुस्वार ◌ं, वसग ◌ः)। नीचे क प म यही क्रम
लखा है — समानाक्षरा ण · सन्ध्यक्षरा ण · स्पशाः · अन्तःस्थाः · ऊष्माणः · अयोगवाहौ, और उन पर दो
शीषक — स्वराः तथा व्यञ्जना न।

ङ् ञ् ण् न् म् दो बार क्य ? क्य क इनका स्थान दो ह — ङ् कण्ठ्य भी है और ना सक्य भी; ञ् तालव्य भी और
ना सक्य भी; इसी प्रकार ण्, न्, म्। इनके उ ारण म वायु मुख के अपने वग-स्थान पर रुकती है और साथ ही नाक
से भी नकलती है — इसी लए चक्र म ये दोन जगह दखाए गए ह।

प्र.48 कण्ठ-तालव्यः, कण्ठौष्ठ्यः, दन्त्योष्ठ्यः — एते के वणाः ? एतेषां स्थानं क त ?

उत्तरम् — एते ते वणाः, येषाम् उ ारणे एकं न, अ पतु े स्थाने काय कुरुतः। (ये वे वण ह जनके उ ारण म एक नह , ब ल्क दो
स्थान काम करते ह।) पा रभा षक-शब्दाथ-सारणी म पुस्तक इन तीन को अलग से गनाती है —

पा रभा षकः शब्दः अथः (पुस्तकानुसारम्) वणाः ENGLISH

कण्ठ-तालव्यः कण्ठ-तालु-स्थानयोः उत्पन्नः वणः ए , ऐ , ऐ३ Velar-palatal / Palato-velar

कण्ठौष्ठ्यः कण्ठ-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वणः ओ, औ, औ३ Velar-labial / Labio-velar

दन्त्योष्ठ्यः दन्त-ओष्ठ-स्थानयोः उत्पन्नः वणः व् Dento-labial / Labio-dental

क्य दो स्थान: ए वस्तुतः ‘अ + इ’ का स -स्वर (सन्ध्यक्षरम्) है — ‘अ’ कण्ठ्य है और ‘इ’ तालव्य, इस लए ‘ए’
कण्ठ-तालव्य हुआ। इसी तरह ओ = ‘अ + उ’, जहाँ ‘उ’ ओष्ठ्य है — अतः ‘ओ’ कण्ठौष्ठ्य। और व् बोलते समय
नीचे का ह ठ ऊपर के दाँत से लगता है — दो अङ्ग, दो स्थान, इस लए दन्त्योष्ठ्य। पृष्ठ 158 के चक्र म भी ‘ए ऐ३’
कण्ठ और तालु के बीच, ‘ओ औ३’ कण्ठ और ओष्ठ के बीच तथा ‘व्’ दन्त और ओष्ठ के बीच रखे गए ह।

स्वयं पर खए: ‘अ’ लम्बा ख चकर धीरे-धीरे ‘इ’ क ओर जाइए — बीच म जो ध्व न बनती है वही ‘ए’ है। यही
अभ्यास ‘अ’ से ‘उ’ क ओर क जए — ‘ओ’ मलेगा।

अध्याय — एक नज़र म
पाठ कस बात का है — पछले पाठ (सम्यग्वणप्रयोगेण…) म दे खा था क शुद्ध उ ारण क्य ज़रूरी है। यह पाठ आगे
बढ़कर पूछता है — शुद्ध उ ारण होता कैसे है? पुस्तक का अपना वाक्य है — ‘अतः प्रत्येक-वणस्य शुद्धम् उ ारणं कथं
भवती त अत्र ास्यामः।’ अथात् यह पाठ वण ारण क प्र क्रया का पाठ है, केवल नयम गनाने का नह ।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

उ ारण म केवल मुँह काम नह करता — पुस्तक स्पष्ट कहती है — ‘वणानाम् उ ारणे केवलम् आस्यस्य एव उपयोगः
भव त इ त – न।’ शरीर के चार अङ्ग मलकर काम करते ह : १. ना भ-प्रदे शः (मांसपेशी-बल-तन्त्रम्), २. उरः (वायु-बल-
तन्त्रम्), ३. कण्ठ- बलः (ध्व न-तन्त्रम्), ४. आस्यम् (उ ारण-तन्त्रम्)। आस्य के भीतर दो गुहाएँ ह — मुखम् और ना सका।
वायु का माग — चार चरण — (१) ना भ-प्रदे श क मांसपे शयाँ उरः को दबाती ह, (२) उरः फेफड़ क वायु को ऊपर
नकालता है, (३) वह वायु ऊपर चलती हुई कण्ठ- बल तक पहुँचती है, (४) फर ऊपर चलकर आस्य म प्रवेश करती है। वहाँ
छह उ ारण-स्थान म से अपना स्थान पाकर वह वण-रूप म प्रकट होती है। ध्यान रहे — वायु पहले आस्य नह , पहले कण्ठ-
बल पाती है (अभ्यास प्रश्न ३-क इसी पर है)।
तीन तत्त्व, जनम से दो इस पाठ म — आस्य के भीतर वण बनने के लए तीन तत्त्व चा हए — (क) स्थानम्, (ख) करणम्,
(ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः। पुस्तक स्वयं कहती है — ‘अ स्मन् पाठे स्थानस्य, करणस्य च चचा कुमः। आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य वषये
अ ग्रमायां कक्षायां ास्यामः।’ इसी लए पाठ का नाम ‘वण ारण- शक्षा १’ है — यह पहला भाग है।
स्थानम् और करणम् — दो प रभाषाएँ — स्थानम् = उ ारण के समय वायु मुख या ना सका म जस स्थल पर वण-रूप म
प्रकट होती है। करणम् = आस्य का जो भाग उस स्थान को छू ता है या उसके समीप जाता है। पुस्तक का दृष्टान्त मुरली है —
बाँसुरी के अङ्ग ल च्छद्र = स्थाना न, और बजाती हुई अङ्ग लयाँ = करणा न।
आस्य म छह स्थान — मुख म पाँच — कण्ठः, तालु, मूधा, दन्तः, ओष्ठः; और ना सका म एक — ना सका ही। यही छठा
स्थान है। भीतर से बाहर क ओर क्रम है — कण्ठ → तालु → मूधा → दन्त → ओष्ठ (अभ्यास प्रश्न ४ इसी क्रम को उलटकर
पूछता है)।
छह करण — दो नयम — (क) तालु, मूधा, दन्तः — इन तीन स्थान म करण है ज ा (तालव्य म ज ा-मध्यः, मूधन्य म
ज ा-उपाग्रः, दन्त्य म ज ा-अग्रः)। (ख) कण्ठः, ओष्ठः, ना सका — इन तीन स्थान म ज ा प्रायः न ष्क्रय रहती है, अतः
स्व-स्थानम् एव करणम् — उसी स्थान का एक भाग दूसरे भाग को छू ता है (कण्ठ म अग्रभाग↔पृष्ठभाग, ओष्ठ म
अधरोष्ठ↔उत्तरोष्ठ, ना सका म ना सका-मूल का अधोभाग↔उप रभाग)।
पा णनीय- शक्षा — करण-प्रकरणम् — योग्यता वस्तर म पुस्तक वही नयम मूल सूत्र म दे ती है — ‘तालव्य-मूधन्य-दन्त्यानां
ज ा करणम्’, ‘ ज ामध्येन – तालव्यानाम्’, ‘ ज ोपाग्रेण – मूधन्यानाम्’, ‘ ज ाग्रेण – दन्त्यानाम्’, ‘शेषाः –
स्वस्थानकरणाः’। कक्षा ६ म ‘स्थान-प्रकरणम्’ पढ़ा जा चुका है; यहाँ ‘करण-प्रकरणम्’ है।

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 13 वण ारण- शक्षा १ AglaSem · NCERT Solutions

त्व रत पुनरावृ त्त

स्थानम् (सामान्य) वशेष-स्थानम् करणम् ( वशे ष-करणम्) तत्र उत्पद्यमानाः वणाः

कण्ठः कण्ठस्य पष्ृ ठभागः स्व-स्थानं करणम् (कण्ठस्य अग्रभागः) अ आ आ३ · क् ख् ग् घ् ङ् · ह् · वसगः
(◌ः)

तालु तालु ज ा करणम् ( ज ा-मध्यः) इ ई ई३ · च् छ् ज् झ् ञ् · य् · श्

मूधा मूध ज ा करणम् ( ज ा-उपाग्रः) ऋ ॠ ऋ३ · ट् ठ् ड् ढ् ण् · र् · ष्

दन्तः दन्तः ज ा करणम् ( ज ा-अग्रः) ऌ ॡ३ · त् थ् द् ध् न् · ल् · स्

ओष्ठः उत्तरोष्ठः स्व-स्थानं करणम् (अधरोष्ठः) उ ऊ ऊ३ · प् फ् ब् भ् म् · (व्)

ना सका नािसका-मूल स्य स्व-स्थानं करणम् (ना सका-मूलस्य ङ् ञ् ण् न् म् · अनुस्वारः (◌ं)
उपिरभागः अधोभागः)

कण्ठ-तालु (कण्ठ- े अिप स्थाने ज ा + स्व-स्थानम् ए ऐ ऐ३
तालव्यः)

कण्ठ-ओष्ठौ (कण्ठौष्ठ्यः) े अिप स्थाने ओष्ठौ + स्व-स्थानम् ओ औ औ३

दन्त-ओष्ठौ (दन्त्योष्ठ्यः) े अिप स्थाने ज ा-अग्रः + अधरोष्ठः व्

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Updated19 Sep 2026