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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा8
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 11: आकाशीय प रघटनाएँ और
काल- नधारण
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — ज ासा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
170 – 189 13 37 हन्द
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कक्षा 8 वज्ञान अध्याय 11 आकाशीय प रघटनाएँ और काल- नधारण AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 8 · व ान · ज ासा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 11: आकाशीय प रघटनाएँ और
काल- नधारण
चंद्रमा का अपना आकार नह बदलता — हमारा दृ ष्टकोण बदलता है। इसी एक तथ्य से यह अध्याय कालदशक क पूरी अवधारणा गढ़ता है: चंद्रमा
क कलाएँ सूय, पृथ्वी और चंद्रमा के बीच बदलते कोण के कारण होती ह, और पृथ्वी का घूणन, चंद्रमा का प रक्रमण तथा पृथ्वी का प रक्रमण —
ये तीन प्राकृ तक चक्र हम दन, मास और वष दे ते ह तथा इन्ह से चंद्र, सौर और चंद्र-सौर कालदशक बने ह।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
ज ासा (कक्षा 8) 170 – 189
खं ड प्रश्न
13 37
माध्यम
हन्द
खोजबीन और वचार कर — पृष्ठ 170
अध्याय का आरंभ
खोजबीन और वचार कर
प्र.1 क्या आपने कभी दन के समय चाँद दे खा है? आपके वचार से यह कभी-कभी सूय के क्ष तज पर वद्यमान होने
पर भी क्य दखाई दे ता है?
हाँ — चंद्रमा दन के आकाश म उससे कह अ धक बार होता है जतना हम ध्यान दे ते ह। मकर संक्रां त के दन पतंग महोत्सव म
मीरा ने इसे दे खा था। यह दन म इस लए दखाई दे ता है क्य क यह सूय के प्रकाश को पराव तत करके चमकता है, और यह
पराव तत प्रकाश इतना चमक ला होता है क नीले आकाश क पृष्ठभू म म भी दख जाता है — बशत चंद्रमा क्ष तज के ऊपर हो
और सूय से पयाप्त दूर हो।
ऐसा क्य होता है: चंद्रमा प्रत्येक 24 घंट म लगभग 12 घंटे क्ष तज के ऊपर रहता है, परंतु ये 12 घंटे रा त्र से बँधे
नह ह। चंद्रमा प्र त दन लगभग 50 मनट दे र से उ दत होता है, अतः एक माह म उसका उदय-काल पूरे दन-रात म
घूम जाता है। लगभग आधे माह तक इसका बड़ा भाग दन के उजाले म पड़ता है। अध्याय का ही उदाहरण दे खए —
7 अप्रैल 2025 को चंद्रोदय 14:23 बजे, अथात दोपहर बाद हुआ था।
नवचंद्र (अमावस्या) के आस-पास यह दखाई नह दे गा, और इसके दो कारण एक साथ काम करते ह — तब चंद्रमा सूय क लगभग
उसी दशा म होता है अतः सूय के प्रकाश म खो जाता है, और उसका अद प्त भाग ही पृथ्वी क ओर होता है।
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कक्षा 8 वज्ञान अध्याय 11 आकाशीय प रघटनाएँ और काल- नधारण AglaSem · NCERT Solutions
स्वयं दे खए: पू णमा के बाद वाले सप्ताह म अपराह्न म पूव दशा म दे खए, अथवा अमावस्या के बाद वाले सप्ताह म
प्रातःकाल प श्चम दशा म। एक बार दे खना आरंभ कर द तो नीले आकाश म फ का-सा चंद्रमा प्रायः दखाई दे ने
लगेगा।
प्र.2 मान ली जए क आप पृथ्वी पर नह चाँद पर रहते ह तब आपके लए एक दन, एक माह अथवा एक वष से क्या
अ भप्राय होगा?
समय का प्रत्येक मात्रक उसी प्राकृ तक चक्र से आता है जो हम अपने ान से दखाई दे ता है, अतः तीन मात्रक बदल जाएँगे।
एक दन — एक सूय दय से अगले सूय दय तक। अध्याय बताता है क चंद्रमा का मात्र आधा भाग ही सवदा पृथ्वी के सामने
रहता है। यह तभी संभव है जब चंद्रमा अपने अक्ष पर ठ क उतने ही समय म एक घूणन करे जतने म वह पृथ्वी क एक प रक्रमा
करता है। अतः चंद्रमा पर एक दन लगभग 29.5 पृथ्वी- दन का होगा — लगभग 14¾ दन लगातार सूय का प्रकाश और
फर 14¾ दन अंधकार।
एक माह — पृथ्वी पर माह आकाश म हमारे साथी पड क कलाओं का एक चक्र है। चंद्रमा से दे खने पर वह साथी पड पृथ्वी
होगी, और पृथ्वी भी ठ क इसी 29.5 दन क लय म कलाएँ दखाएगी। परंतु यह लय तो चंद्र- दवस के बराबर है, अतः चंद्रमा
पर माह और दन एक ही मात्रक हो जाएँगे। संभवतः वहाँ अलग से माह क आवश्यकता ही न पड़े।
एक वष — चंद्रमा पृथ्वी के साथ ही सूय के प रतः प रक्रमा करता है, अतः उसका ऋतु-चक्र पृथ्वी का ही चक्र है। चंद्रमा पर भी
वष लगभग 365¼ दन का ही रहेगा।
ऐसा क्य होता है: ‘ दन’ घूणन को मापता है, ‘माह’ साथी पड के प रक्रमण को और ‘वष’ सूय के प रतः यात्रा
को। चंद्रमा पर पहले दो चक्र क अव ध समान हो गई है, इसी लए वहाँ का कालदशक हम इतना व चत्र लगेगा।
प्र.3 क्या होता य द पृथ्वी के दो चंद्रमा होते? इससे रा त्र आकाश का दृश्य कैसे प रव तत हो जाता?
दो चंद्रमाओं क कक्षाएँ और प रक्रमण काल भन्न- भन्न होते, और इसी एक बात से आगे सब कुछ बदल जाता।
एक साथ दो कला-चक्र। प्रत्येक चंद्रमा अपनी-अपनी दर से कलाएँ बदलता। अ धकांश रा त्रय म एक वधमान बालचंद्र होता
तो दूसरा क्षीयमाण अधा धक चंद्र, और दोन का एक साथ पूण होना वरल घटना होती।
अ धक प्रकाशमान रा त्रयाँ। पूणतः अंधकारमय रा त्रयाँ — जब दोन नवचंद्र ह अथवा दोन क्ष तज के नीचे ह — दुलभ हो
जात ।
‘मास’ एक स्पष्ट मात्रक न रह जाता। हमारा मास इस लए है क्य क कलाओं का एक ही चक्र नय मत रूप से दोहराता है। दो
चंद्रमाओं के साथ कालदशक बनाने वाले को कसी एक को चुनना पड़ता, अथवा ऐसा बड़ा मात्रक गढ़ना पड़ता जसम दोन
चक्र समा जाएँ — यह एक वष म 12 चंद्र मास बैठाने से कह क ठन काय होता।
अ धक ग्रहण। प्रत्येक चक्र म कसी चंद्रमा के पृथ्वी क छाया म आने अथवा सूय के सामने से गुजरने के दो अवसर होते; दोन
चंद्रमा परस्पर भी एक-दूसरे को ढक सकते।
ज टल ज्वार-भाटा। ज्वार-भाटा चंद्रमा क त और कला से जुड़े ह। दो आकषण के कारण ज्वार कभी जुड़ते और कभी
कटते, अतः उनका समय और ऊँचाई कह कम नय मत होते।
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क्या आप जानते ह? मंगल ग्रह के वास्तव म दो छोटे चंद्रमा ह — फ़ोबोस और डीमोस। फ़ोबोस मंगल क एक
प रक्रमा मात्र साढ़े सात घंटे म कर लेता है, जो मंगल के घूणन से भी तीव्र है, इस लए मंगल क सतह से वह प श्चम म
उ दत होकर पूव म अस्त होता दखाई दे ता है।
प्र.4 य द हमारे पास घ ड़याँ अथवा कालदशक (कैलडर) नह होते तो हम समय का मापन कैसे करते?
प्राकृ तक आवत घटनाओं को गनकर — अथात ऐसी घटनाएँ जो न श्चत अंतराल पर दोहराती ह। इ तहास का प्रत्येक कालदशक
इसी प्रकार आरंभ हुआ, और यह अध्याय उनम से तीन का उपयोग करता है।
प्राकृ तक चक्र वास्तव म क्या उपयोग कैसे करते अव ध
ग त कर रहा है
सूय दय, मध्याह्न, सूय स्त पृथ्वी का अपने एक छड़ी ऊध्वाधर गाड़कर उसक छाया के सरे पर बदु अं कत 24 घंटे
अक्ष पर घूणन क जए। मध्याह्न म छाया लघुतम होती है; दो मध्याह्न का अंतराल
एक दन है ( क्रयाकलाप 11.3)
चंद मा की कलाएँ पृथ्वी के प रतः एक पू णमा से अगली पू णमा तक रात ग नए; प्रत्येक रात क लगभग
चंद्रमा का आकृ त बता दे ती है क गनती कहाँ पहुँची 29.5 िदन
प रक्रमण
ऋतुओ ं का चक्र; िक्षितज सूय के प रतः कसी वृक्ष या पहाड़ी के सापेक्ष सूय दय का ान अं कत क जए। लगभग
पर सूय दय के स्थान का पृथ्वी का यह लगभग 21 जून तक उत्तर क ओर और 21 दसंबर तक द क्षण 365 िदन
िखसकना प रक्रमण क ओर सरकता है — उत्तरायण और द क्षणायन
दन के भीतर लोग आकाश के ान पर कसी र प्र क्रया पर आधा रत यु क्तयाँ भी काम म लाते थे — धूपघड़ी, जलघड़ी,
बालूघड़ी अथवा च ह्नत द पक का जलना।
यह क्य काम करता है: समय मापना और कुछ नह , कसी वश्वसनीय रूप से दोहराने वाली घटना क पुनरावृ त्तयाँ
गनना है। आकाश ऐसी सवा धक वश्वसनीय आवत घटनाएँ दे ता है, इसी लए प्राचीन खगोलज्ञ बना कसी उपकरण
के भी वष क अव ध लगभग 365 दन नधा रत कर सके।
क्रयाकलाप 11.1 — आइए, खोज कर — पृष्ठ 172
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
11.1 चंद्रमा के रूप म प रवतन कैसे और क्य होता है?
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क्रयाकलाप
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s m 11.1 म आपने जो आँकड़े अ भले खत कए ह उनका व ेषण क जए। क्या चंद्रमा क आकृ त प्रत्येक
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प्र.1
दन भन्न- भन्न दखाई दे ती है?
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ता लका 11.1 — चंद्रमा के आकार म प रवतन का अ भलेखन
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दन दनाँक चंद्रमा दे खे आकाश म चंद्रमा पछले दन क पछले दन क
जाने का का रूप तुलना चमक ले
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तुलना म आकाश म
समय भाग का आकार
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चंद्रमा और सूय के
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सूय दय / — —
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सूयास्त
बढ़ा / घटा कम हुई / अ धक हुई
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g l a 3. सूय दय / बढ़ा / घटा कम हुई / अ धक हुई
a सूयास्त
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ता लका 11.1, पृष्ठ 172 — पुस्तक म मु द्रत रूप म। रक्त खाने आपको अपने अवलोकन से भरने ह।
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se हाँ। चमक ले भाग क आकृ त प्रत्येक दन थोड़ी भन्न होती है, और यह प रवतन पूरे पखवाड़े एक ही दशा म चलता है, तत्पश्चात
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उलट जाता है।
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पू णमा के अगले दन सूय दय से आरंभ करने पर आपक ता लका 11.1 कुछ इस प्रकार बनेगी —
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लगभग कौन- चंद्रमा क आकृ त चमक ला भाग ( पछले दन चंद्रमा-सूय दूरी ( पछले दन
सा दन क अपेक्षा) क अपेक्षा)
िदन 1 पूण चमक ला वृत्त — —
िदन 2–7 अधा धक ( गब्बस), घटता हुआ घटा कम हुई
लगभग िदन 8 अधवृत्त घटा कम हुई
िदन 9–14 बालचंद्र, पतला होता हुआ घटा कम हईु
लगभग िदन 15 दखाई नह दे ता (नवचंद्र) घटकर शून्य सूय के िनकटतम
िदन 16–29 बालचंद्र → अधवृत्त → अधा धक बढ़ ा अिधक हुई
→ पुनः पूणचंद्र
ऐसा क्य होता है: पहला पखवाड़ा क्षीयमाण काल (कृष्ण पक्ष) है और दूसरा वधमान काल (शुक्ल पक्ष)। पूरा चक्र
लगभग 29.5 दन का होने के कारण एक दन से दूसरे दन म दखाई दे ने वाली आकृ त लगभग एक-पंद्रहवाँ भाग ही
बदलती है — कम, परंतु रेखा चत्र बनाने पर सरलता से दख जाती है।
प्र.2 क्या चंद्रमा सभी दन दखाई दया था?
नह । नवचंद्र (अमावस्या) के आस-पास एक-दो दन चंद्रमा बल्कुल नह मलेगा।
ऐसा क्य होता है: उस दन प्रेक्षक के वरुद्ध दो बात एक साथ होती ह। पहली — चंद्रमा का केवल अद प्त भाग
पृथ्वी क ओर होता है, अतः दे खने योग्य कुछ चमक ला बचता ही नह । दूसरी — चंद्रमा तब सूय क लगभग उसी
दशा म होता है, अतः सूय के साथ ही उ दत और अस्त होता है और दन के उजाले म डू ब जाता है।
इसी कारण क्रयाकलाप म बीच म अवलोकन का समय बदलने को कहा गया है। पहले पखवाड़े म चंद्रमा क्षीयमाण है, अतः उसे
सूय दय के समय दे खना सुगम है; दूसरे पखवाड़े म वह वधमान है, अतः सूयास्त के समय। बीच म, नवचंद्र के नकट, वह कसी
भी समय उपलब्ध नह रहता।
प्र.3 क्या प्रत्येक दन चंद्रमा आकाश म उसी ान पर दखाई दया जहाँ पछले दन दखाई दया था?
नह । प्रत्येक दन एक ही समय पर दे खने पर चंद्रमा स्पष्ट रूप से खसका हुआ मलता है — वह पूव क ओर आगे होता है और
क्षीयमाण पखवाड़े म क्रमशः सूय के समीप आता जाता है।
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चंद मा पृथ्वी के पिरतः 360° की पिरक्रमा लगभग 29.5 िदनों में करता है
पितिदन पूव की ओर िखसकाव = 360° ÷ 29.5 ≈ 12.2° पितिदन
पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है = 15° पित घंट ा
अितिरक्त घूणन में लगा समय = 12.2° ÷ 15° पित घंट ा ≈ 0.81 घंट ा = लगभग 49 िमनट
ऐसा क्य होता है: पृथ्वी जब तक एक घूणन पूरा करती है, तब तक चंद्रमा अपनी कक्षा म थोड़ा आगे बढ़ चुका
होता है। चंद्रमा को पुनः उसी ान पर लाने के लए पृथ्वी को कुछ और घूमना पड़ता है, और यह ‘कुछ और’ लगभग
50 मनट बनता है ( चत्र 11.6)।
पखवाड़े भर सूय दय के समय का प्र तरूप बहुत नय मत रहता है — पू णमा के दन चंद्रमा प श्चम म अस्त हो रहा होता है; लगभग
एक सप्ताह बाद अधवृत्त होने पर वह ठ क सर के ऊपर होता है; उसके कुछ दन बाद पतला बालचंद्र सूय के समीप पूव म नीचा
दखाई दे ता है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 173
11.1.2 चंद्रमा का ान नधारण
प्र.1 जब आपने चंद्रमा का अवलोकन क्रमागत दन म एक ही समय पर (उदाहरण के लए सूय दय के समय) कया
तो क्या आपने उसक त आकाश के भन्न- भन्न भाग म पाई?
हाँ, और यह खसकाव पूणतः पूवानुमेय है, क्य क चंद्रमा क कला और आकाश म सूय से उसक दूरी — दोन एक ही सूचना ह।
पू णमा के बाद दन दखाई दे ने वाली कला आकाश म सूय से कोणीय दूरी सूय दय के समय त
0 पूणवृत्त लगभग 180° पिश्चमी िक्षितज पर अस्त होता हुआ
लगभग 7 अधवृत्त लगभग 90° ठीक िसर के ऊपर
लगभग 11 बालचंद्र लगभग 45° पूव आकाश में, सूय से काफी ऊपर
लगभग 15 दखाई नह दे ता लगभग 0° सूय के साथ उिदत — पकाश में लुप्त
ऐसा क्य होता है: सूय का प्रकाश चंद्रमा के आधे भाग को द प्त करता है। उस द प्त भाग का कतना अंश हम
दखेगा, यह केवल इस बात पर नभर है क हम उसे कस कोण से दे ख रहे ह — और वही कोण हमारे आकाश म
चंद्रमा-सूय क दूरी है। अतः जैसे-जैसे चंद्रमा दन-प्र त दन सूय क ओर सरकता है, उसका चमक ला भाग भी साथ-
साथ घटता जाना ही चा हए। एक ही अवलोकन, दो प रणाम।
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संकेत: इसे उलट द जए तो यह एक उपयोगी कौशल बन जाता है। य द आज का चंद्रमा मोटा अधा धक और
वधमान है तो वह सूय से लगभग 135° दूर है, अतः सूयास्त से कुछ घंटे पूव पूव दशा म दे खए। क्षीयमाण बालचंद्र
सूय से मात्र 30° दूर होता है — उसे सूय दय से ठ क पहले पूव म नीचे दे खए।
एक सोपान ऊपर — पृष्ठ 173
11.1.2 चंद्रमा का ान नधारण
एक सोपान ऊपर
प्र.1 अपने क्षेत्र म चंद्रमा के उदय होने का समय जानने हेतु हम कसी ानीय समाचार पत्र अथवा भारत मौसम
व ान वभाग के खगोल व ान कद्र क वेबसाइट दे ख सकते ह। कई दन तक नरंतर अ भले खत समय के इन
मान को ध्यानपूवक दे खने पर आप पाएँगे क चंद्रमा प्र त दन पछले दन क अपेक्षा लगभग 50 मनट के प ात
उ दत होता है।
एक सप्ताह तक ऐसा करने पर यह वलंब आश्चयजनक रूप से नय मत नकलता है। अध्याय के अपने ही दो मान इसे दशाते ह —
7 अपैल 2025 को चंद ोदय = 14:23
8 अपैल 2025 को चंद ोदय = 15:17
िवलंब = 15:17 − 14:23 = 54 िमनट
भन्न- भन्न दन म यह मान थोड़ा भन्न होता है — प्रायः लगभग 30 से 70 मनट के बीच — परंतु पूरे माह का औसत लगभग 50
मनट रहता है।
ऐसा क्य होता है: पृथ्वी को एक घूणन म जो 24 घंटे लगते ह, उतने समय म चंद्रमा अपनी कक्षा म लगभग 12°
आगे बढ़ चुका होता है (360° ÷ 29.5 दन)। अब पृथ्वी को वे अ त रक्त 12° घूमने पड़ते ह ता क चंद्रमा पुनः
आपके क्ष तज पर आए, और 15° प्र त घंटा क दर से इसम लगभग 49 मनट लगते ह।
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कक्षा 8 वज्ञान अध्याय 11 आकाशीय प रघटनाएँ और काल- नधारण AglaSem · NCERT Solutions
आप कल का चंदमा
आज का चंदमा
पृथ्वी
एक िदन मे ं 12.2°
पृथ्वी 1 घंटे मे ं 15° घूमती है,
अतः 12.2° मे ं लगभग 49 िमनट।
चंदोदय ≈ 50 िमनट देर से।
पृथ्वी के एक पूण घूणन म चंद्रमा अपनी कक्षा म लगभग 12° आगे बढ़ जाता है, अतः उसे पुनः दे खने के लए पृथ्वी को लगभग 50 मनट
और घूमना पड़ता है।
यही ता लका बॉक्स म द गई ांत धारणा को भी समाप्त कर दे ती है। चंद्रोदय सूयास्त से केवल पू णमा के दन मेल खाता है। माह
भर म वह पूरी घड़ी का चक्कर लगा लेता है —
कला चंद्रोदय लगभग सर के ऊपर लगभग चंद्रास्त लगभग
नवचंद सूय दय मध् याह्न सूय स्त
अधवृत्त , वधमान मध् याह्न सूय स्त मध् यराित्र
अध िधक, वधमान अपराह्न (2–4 बजे) दे र राित्र पातःकाल
पूणचंद सूय स्त मध् यराित्र सूय दय
अधवृत्त , क्षीयमाण मध् यराित्र सूय दय मध् याह्न
संकेत: ता लका म दया गया समय वह क्षण है जब चंद्रमा का कनारा क्ष तज को छू ता है। उसे वृक्ष और भवन से
ऊपर उठने म लगभग 30 मनट और लगते ह, तब दे खए।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 174
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11.1.3 अपने अवलोकन से नष्कष नकालना
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जब चंद्रमा सूय के समीप दखाई दे ता है तो इसका पृथ्वी से दशनीय द प्त भाग घट क्य जाता है?
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क्य क हम कतना अंश दखेगा यह पूणतः इस बात पर नभर करता है क हम द प्त भाग को कस कोण से दे ख रहे ह, और वही
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कोण आकाश म चंद्रमा-सूय क दूरी है।
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agको देखने के लए पृथ्वी क
सूय का प्रकाश सदै व चंद्रमा के ठ क आधे भाग को — सूय के सामने वाले आधे भाग को — द प्त करता है ( चत्र 11.3)। यह कभी
नह बदलता। जो बदलता है वह है उस द प्त भाग त।
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जब चंद्रमा आकाश म सूय से दूर हो (पू णमा, लगभग 180°), तब हम चंद्रमा को लगभग उसी दशा से दे ख रहे होते ह जस
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दशा से सूय का प्रकाश आ रहा है, अतः द प्त भाग लगभग सीधा हमारी ओर होता है। हम वह पूरा दखता है।
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g फर अधवृत्त, फर पतला
.cश हमारी ओर रह जाता है, अतः चमक ली आकृ त सकुड़ती जाती है — अधा aधक,
जैसे-जैसे चंद्रमा आकाश म सूय के समीप आता है, हम उस द प्त भाग को अ धका धक तरछा दे खने लगते ह। उसका कम-
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से-कम अं
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agl नवचंद्र (लगभग 0°) पर हम चंद्रमा को सूय के प्रकाश क ठ क वपरीत दशा से देखते ह। पूरा द प्त भाग परे मुड़ जाता है और
केवल अद प्त भाग हमारी ओर रहता है।
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दीप्त भाग (हल्का) सदैव सूय की ओर रहताgहै।
केवल हमारे देखने का कोण बदलता है।
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90° सूय की िकरणे ं
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प्रत्येक त म सूय चंद्रमा के उसी आधे भाग को द प्त करता है। ज्य -ज्य चंद्रमा आकाश म सूय क दशा क ओर बढ़ता है, पृथ्वी उस
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द प्त भाग को अ धका धक तरछा दे खती है, अतः चमक ली आकृ त पूणवृत्त से बालचंद्र और फर शून्य हो जाती है।
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सावधान: इसका पृथ्वी क छाया से कोई संबंध नह है। चंद्रमा पर पृथ्वी क छाया पड़ने से चंद्र-ग्रहण होता है, जो
केवल पू णमा के दन ही हो सकता है और प्रत्येक माह नह होता, क्य क चंद्रमा क कक्षा सूय के प रतः पृथ्वी क
कक्षा के सापेक्ष थोड़ी झुक हुई है।
क्रयाकलाप 11.2 — आइए, खोज कर — पृष्ठ 174
11.1.3 अपने अवलोकन से नष्कष नकालना
क्रयाकलाप
प्र.1 गद का वह भाग जो आपक ओर है क्या वह द प्त है अथवा अद प्त है?
‘न’ त म — अथात गद को लप क ओर करके पकड़ने पर — आपक ओर वाला भाग अद प्त होता है। आपको काली गद
दखाई दे ती है।
ऐसा क्य होता है: लप गद के उस आधे भाग को द प्त करता है जो आपक आँख से परे है। आपक ओर वाला
आधा भाग गद क अपनी छाया म रहता है। आपका सर पृथ्वी है, गद चंद्रमा और लप सूय — अतः यह व्यव ा,
जसम चंद्रमा पृथ्वी और सूय के बीच है, ठ क नवचंद्र (अमावस्या) का दन है।
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प्र.2 क्या गद के द प्त भाग का आकार प रव तत होता है?
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चत्र 11.4 (ख), पृष्ठ 175 — पुनःआरे खत रेखा चत्र: छड़ी पर लगी गद को बाहु क लंबाई पर पकड़कर आठ तय
के चार ओर एक बार घुमाया जाता है, लप र रहता है। आपका सर वृत्त के कद्र पर है।
हाँ, और वामावत घूमने पर यह सुचारु रूप से एक न श्चत क्रम म बदलता है —
न (कु छ भी दीप्त नही ं) → प पतला बालचंद → फ अधवृत्त → ब अध िधक → त संपूण दीप्त वृत्त → थ
अध िधक → द अधवृत्त → ध बालचंद → पुन ः न
ऐसा क्य होता है: लप जो द प्त करता है उसम कोई प रवतन नह होता — वह सदै व गद का ठ क आधा भाग ही
द प्त करता है। जो बदलता है वह है आपक दृ ष्ट-रेखा। घूमने से आपक आँख नए कोण पर आ जाती है, अतः द प्त
भाग का भन्न अंश आपक ओर होता है। यही चंद्रमा क कलाओं क संपूण क्रया व ध है, जसे एक अंधेरे कमरे म
दोहराया गया है।
संकेत: गद को सर से थोड़ा ऊपर र खए। य द आप उसे ठ क सर के स्तर पर रखगे तो ‘त’ त पर आपका
अपना सर बीच म आ जाएगा — लघु रूप म यही कारण है क प्रत्येक माह चंद्र-ग्रहण नह होता।
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प्र.3 क्या गद के द प्त एवं अद प्त भाग को पृथक करने वाली रेखा व क्रत है?
हाँ — दो अध-द प्त तय (‘द’ और ‘फ’) को छोड़कर प्रत्येक त पर, जहाँ यह पूणतः सीधी दखाई दे ती है।
ऐसा क्य होता है: गद पर प्रकाश और अंधकार क सीमा वास्तव म एक वृत्त है जो पूरी गद के चार ओर जाता है।
कसी वृत्त को तरछे कोण से दे खने पर वह वृत्त नह , ब ल्क चपटा वृत्त अथात द घवृत्त दखता है, और उसका आधा
भाग एक वक्र रेखा होती है। केवल तब जब आपक आँख उस वृत्त के तल म हो — अथात अध-द प्त तय पर
— यह द घवृत्त दबकर बीचोबीच सीधी रेखा बन जाता है।
इसी कारण बालचंद्र और अधा धक चंद्र क भीतरी सीमा व क्रत होती है जब क अधवृत्ताकार चंद्रमा क सीधी। यह एक उपयोगी
संकेत है — सीधी भीतरी सीमा का अथ है क चंद्रमा आकाश म सूय से ठ क 90° दूर है।
प्र.4 क्या आपके अवलोकन 11.4 (ग) म दशाई गए गद के द प्त भाग के प रव तत होते आकार के समरूप थे?
त थ द ध न प फ ब त
चत्र 11.4 (ग), पृष्ठ 175 — पुनःआरे खत रेखा चत्र: त ‘त’ से ‘ब’ तक और पुनः ‘त’ तक वद्याथ ारा दे खी गई
गद के नौ छाया चत्र।
हाँ। आपको दखाई दे ने वाला क्रम चत्र 11.4 (ग) से त-दर- त मेल खाता है, और प्रत्येक त चत्र 11.5 क कसी
वास्त वक चंद्र-कला से मेल खाती है —
गद क त लप के सापेक्ष ान आपको क्या दखता है संगत चंद्र-कला
त लप के वपरीत संपूण वृत्त द प्त पूणचंद (पूिणमा), िदन 1
थ और ब ‘त’ से थोड़ा एक ओर आधे से अ धक द प्त अध िधक कला (िगब्बस )
द और फ लप के समकोण पर ठ क आधा द प्त, सीधी सीमा अध वृत्त ाकार चंद मा
ध और प ‘न’ से थोड़ा एक ओर आधे से कम द प्त बालचंद कला ( ीसे ंट)
क्र
न लप क ओर कोई द प्त भाग नह नवचंद (अमावस्या), िदन 15
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ऐसा क्य होता है: यह क्रयाकलाप वास्त वक ज्या म त को हूबहू दोहराता है — एक र प्रकाश ोत, केवल
आधे भाग पर प्रका शत एक गोला, और एक ग तशील प्रेक्षक। चूँ क उत्तर केवल सूय-पृथ्वी-चंद्रमा के कोण पर नभर
है, अतः एक गद, एक टॉच और अंधेरा आँगन ही चंद्रमा क कलाएँ व्युत्पन्न करने के लए पयाप्त ह।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 176
11.1.3 अपने अवलोकन से नष्कष नकालना
प्र.1 चत्र 11.5 (क) म आप यह दे ख सकते ह क नवचंद्र (अमावस्या) के दन चंद्रमा सूय के नकटतम दृ ष्टगोचर होता
है और पूणचंद्र (पू णमा) के दन चंद्रमा सूय से सबसे अ धक दूर दखाई दे ता है। क्या हमने क्रयाकलाप 11.1 म
भी यही अवलोकन नह कया था?
चंद मा के दी त भाग का
प्
आधा अंश दे खा जा सकता है।
चंद मा के दी त भाग का
प्
आधे से अिधक अंश दे खा चंद मा के दी त भाग का
प्
जा सकता है आधे से कम अंश दे खा
(अध िधक कला)। फ
जा सकता है
(बालचंद कला)।
ब प
िदन 22
िदन 26 िदन 18
चंद मा का पूण दी त
प्
चंद मा का दी त भाग
ेंणरकि ीक यू स
भाग दे खा जा सकता िदन 1 िदन 15 प्
है (पूण चंद मा)। त न नहीं दे खा जा सकता
है (नवचंद )।
िदन 4 िदन 12
िदन 8
चंद मा के दी त भाग का
प्
थ ध चंद मा के दी त भाग का
प्
आधे से अिधक अंश दे खा आधे से कम अंश दे खा
जा सकता है द जा सकता है
(अध िधक कला)। (बालचंद कला)।
चंद मा के दी त भाग का
प्
आधा अंश दे खा जा सकता है।
चत्र 11.5 (क), पृष्ठ 176 — पुनःआरे खत: पृथ्वी के प रतः अपनी कक्षा म चंद्रमा क आठ तयाँ; सूय क करण
दाईं ओर से आ रही ह। प्रत्येक चंद्रमा पर नारंगी असतत रेखा पृथ्वी क ओर उन्मुख भाग को च त करती है। इस चत्र
म दशाए गए आमाप और दू रयाँ वास्त वक अनुपात म नह ह।
हाँ — यह वही प रणाम है, जस तक हम दो भन्न रास्त से पहुँचे ह।
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a g l AglaSem · NCERT Solutions
क्रयाकलाप 11.1 म आपने ‘चंद्रमा और सूय के बीच आकाश म दूरी’ वाला स्तंभ भरा था। क्षीयमाण पखवाड़े भर आप उसम
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sसेeदोन आकाश म साथ-
कम हुई लखते रहे और साथ ही चमक ला भाग भी घटा लखते रहे; वधमान पखवाड़े म दोन प्र व ष्टयाँ उलट गईं।
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g ह। a
.c त ‘त’ पर चंद्रमा दूसरी ओर है, अतः दोन आकाश के वपरीत छोर पर दखते a
चत्र 11.5 (क) म इसका कारण दख जाता है। त ‘न’ पर चंद्रमा सूय क दशा म है, अतः पृथ्वी
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साथ दखते ह;
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agऐसा क्य होता है: अवलोकन और चत्र एक ही ज्या म त के दो दृश्य ह। पृथ्वी से दे खने पर चंद्रमा और सूय के बीच
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का कोण ही यह तय करता है क द प्त भाग का कतना अंश हमारी ओर होगा। अतः दूरी और कला म कभी वरोध
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हो ही नह सकता — पूणचंद्र को आकाश म सूय से दूर होना ही पड़ेगा और पतले बालचंद्र को उसके समीप। ag
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स्वयं दे खए: पू णमा क संध्या को जब सूय प श्चम म अस्त हो रहा हो तब पूव दशा म दे खए। चंद्रमा ठ क अस्त
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होते सूय के सम्मुख उ दत होता मलेगा।
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aglasप्रश्न — पृष्ठ 178
पाठ्य
11.2 कालदशक अ स्तत्व म कैसे आए?
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m हेतु उपयोग कैसे कया जाता है? agl
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परंतु इन आवत घटनाओं का काल- नधारण
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प्र.1
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m म ह।
उन्ह गनकर। कोई भी घटना जो न श्चत अंतराल के बाद दोहराती हो, मात्रक बन सकती है, और समय मापना केवल यह गनना है
क ऐसे कतने अंतराल बीत चुके ह। इस अध्याय के तीन चक्र हम वे तीन मात्रक दे ते ह जो आज भीeप्रयोग
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aseप्राकृ तक चक्र
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वास्तव म क्या ग त कर रहा है अव ध प रभा षत मात्रक
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सूय का आकाश में उच्चतम िस्थित पर लौटना पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूणन 24 घंटे (माध् य सौर ) िदन
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पृथ्वी c g l a
चंद मा की कलाओं का एक पूण चक्र
m . रतः चंद्रमा का प रक्रमण लगभग 29.5 िदन मास
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ऋतुओ ं का पुनः वही ं लौट आना सूय के प रतः पृथ्वी का प रक्रमण लगभग 365¼ िदन वष
ऐसा क्य होता है: कालदशक और कुछ नह , छोट गन तय को बड़ी गन तय म सुव्यव
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त रूप से बैठाने क
एक योजना है। क ठनाई — और भन्न- भन्न प्रकार के कालदशक के होने का कारणem
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o के पूण गुणज नह ह। 12 चंद्र मास 354 दन के होते ह, 365 कaे gनहl , और वष भी पूण संख्या म दन
— यह है क ये तीन चक्र
.cएक-दूसरे
m नह है। अध्याय का प्रत्येक कालदशक इन्ह दो बची हुई त्रु टय को सँभालने का एक-एक तरीका है।
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m. मापन कर — पृष्ठ 178 e agl
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क्रयाकलाप 11.3 — आइए, दन का
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11.2 कालदशक अ स्तत्व म कैसे आए?
क्रयाकलाप
प्र.1 ता लका 11.2 म दशाए अनुसार छाया के लघुतम आमाप ारा न दष्ट दो क्रमागत दन म आकाश म सूय क
समान तय म अंतर ात करके सौर दवस क अव ध जान सकते ह।
ता लका 11.2 — सौर दवस क अव ध ात करना
दनाँक लघुतम छाया का समय (घंटा : मनट) दन क अव ध (घंटा : मनट)
22 माच 2025 12:20 ——
23 माच 2025 12:20 24:00
24 माच 2025 12:19 23:59
ता लका 11.2, पृष्ठ 179 — पुस्तक म मु द्रत रूप म; अं तम पं क्त आपके अपने प्रेक्षण के लए रक्त है।
दन क लघुतम छाया वह क्षण दशाती है जब सूय आकाश म उच्चतम होता है, अतः दो क्रमागत दन के ऐसे दो क्षण का अंतराल
एक सौर दवस है। ता लका 11.2 म छपे मान से —
22 माच 2025 — लघुत म छाया 12:20 पर
23 माच 2025 — लघुत म छाया 12:20 पर
अविध = अगले िदन का 12:20 − 12:20 = 24 घंटे 00 िमनट
23 माच 2025 — 12:20
24 माच 2025 — 12:19
अविध = 24 घंटे − 1 िमनट = 23 घंटे 59 िमनट
यह क्य काम करता है: ज्य -ज्य सूय ऊपर चढ़ता है, ऊध्वाधर छड़ी क छाया घूमती और छोट होती जाती है; सूय
के ढलने पर वह पुनः लंबी हो जाती है। अतः दन क एकमात्र लघुतम छाया ही सूय क उच्चतम त अथात
ानीय मध्याह्न है। प्रातः 11:00 से अपराह्न 1:10 तक प्रत्येक मनट बदु अं कत करने से वह क्षण लगभग एक
मनट क यथाथता तक ज्ञात हो जाता है।
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संकेत: छड़ी को पूणतः ऊध्वाधर गा ड़ए और समतल भू म चु नए, अन्यथा लघुतम बदु गलत ान पर आ जाएगा।
सूय क ऊँचाई आँकने के लए उसे सीधे मत दे खए — छाया प ढ़ए।
प्र.2 दन क अव ध का माध्य मान ात क जए। क्या यह लगभग 24 घंटे के बराबर है?
हाँ, यह लगभग ठ क 24 घंटे है।
माध्य = (24 घंटे 00 िमनट + 23 घंटे 59 िमनट) ÷ 2
= (1440 िमनट + 1439 िमनट) ÷ 2
= 2879 ÷ 2 = 1439.5 िमनट
= 23 घंटे 59 िमनट 30 सेकं ड, अथ त लगभग 24 घंटे
ऐसा क्य होता है: वषभर सूय क आभासी दै नक ग त पूणतः एकसमान नह रहती, अतः कोई एक सौर दवस 24
घंटे से थोड़ा अ धक या कम हो सकता है। घड़ी के लए हम जो मान लेते ह वह माध्य सौर दन है — पूरे वष का
औसत — और वह ठ क 24 घंटे है। अपने दो-तीन प्रेक्षण का औसत लेने पर ही आप उसके बहुत नकट पहुँच जाते
ह।
स्वयं जाँ चए: आपका मान उतना ही यथाथ होगा जतना आपका अंकन। एक-एक मनट पर बदु लगाने का अथ है
क आपका मध्याह्न ±1 मनट तक ज्ञात है, अतः 23:59 अथवा 24:01 का प रणाम त्रु ट नह , एक अ ा मापन है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 183
11.3 क्या पव का संबंध खगोलीय प रघटनाओं से है?
प्र.1 अ धकांश भारतीय पव प्रत्येक वष भन्न- भन्न दनाँक पर क्य पड़ते ह?
क्य क अ धकांश भारतीय पव चंद्रमा क कला से नधा रत होते ह, जब क जो दनाँक हम बताते ह वे ग्रेगोरी सौर कालदशक के होते
ह — और चंद्र वष तथा सौर वष क अव ध समान नह है।
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12 चंद मास = 12 × 29.5 ≈ 354 िदन
1 सौर वष ≈ 365 िदन
पितवष कमी = 365 − 354 = लगभग 11 िदन
इसके आगे क्या होगा, यह इस पर नभर है क पव कस कालदशक का अनुसरण करता है।
कालदशक उदाहरण ग्रेगोरी दनाँक का व्यवहार
का प्रकार
शुद्ध चंद ईद-उल- फतर, जो रमजान के अंत म बालचंद्र पितवष लगभग 11 िदन पहले िखसकती है और सभी ऋतुओं से
दे खने के पश्चात मनाई जाती है होकर गुजरती है — िकसी भी गेगोरी माह में पड़ सकती है
चंद -सौर द पावली (का तक क अमावस्या), होली लगभग 11 िदन पहले िखसकती है, परंत ु पत्येक 2–3 वष में अिधक
(फाल्गुन क पू णमा), बुद्ध पू णमा (वैशाख क मास उसे एक माह आगे धके ल दे ता है। अतः वह लगभग एक माह
पू णमा), दशहरा (आ श्वन का दसवाँ दन) के दायरे में डोलती रहती है, अपनी ऋतु कभी नही ं छोड़ ती
सौर (नक्षत्र) मकर संक्रां त, प गल, बहू, वैशाखी, पोयला पितवष लगभग एक ही गेगोरी िदनाँक को पड़ ते है ं
बैसाख, पुथांडु
प त्येक सौर वष मे ं चंद वष 11 िदन कम पड़ ता है । यह अंतर ज ड
ु ़ ता जाता है ।
वष 1 354 िदन — 12 चंद मास
11 िदन पीछे
वष 2 354 िदन
22 िदन पीछे
वष 3 354 िदन
33 िदन पीछे
+1 मास
सुधार
2–3 वष मे ं यह अंतर लगभग पूरे माह का हो जाता है , तब अिधक मास जोड़ ा जाता है ।
चंद-सौर वष पुनः ऋतुओ ं के साथ ताल मे ं आ जाता है ।
चंद्र-सौर पव का दनाँक डोलता तो है पर बहकता नह — प्र तवष क 11 दन क कमी दो-तीन वष म जोड़े गए एक अ त रक्त मास से
संतु लत हो जाती है।
ऐसा क्य होता है: चंद्रमा से बँधे पव क चंद्र- त थ न श्चत होती है, सौर दनाँक नह । चूँ क 12 चंद्र मास सौर वष से
11 दन कम पड़ते ह, अतः वह चंद्र- त थ प्रत्येक बार ग्रेगोरी कालदशक म 11 दन पहले आ जाती है। अ धक मास
ठ क वही संशोधन है जो इस खसकाव को रोकता है — इसी लए द पावली सदै व शरद ऋतु म रहती है जब क ईद-
उल- फतर कसी भी ऋतु म पड़ सकती है।
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क्या आप जानते ह? ये दनाँक सूय दय के समय क यथाथ चंद्र-कला से तय होते ह, और पूव भारत म सूय दय
पहले तथा प श्चमी भारत म बाद म होता है, अतः एक ही वष म दे श के भन्न भाग म कोई पव एक दन आगे-पीछे
भी पड़ सकता है। एकरूपता बनाए रखने हेतु खगोल वज्ञान कद्र प्र तवष रा ीय पंचांग प्रका शत करता है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 185
11.4 हम अंत रक्ष म कृ त्रम उपग्रह का प्रमोचन क्य करते ह?
प्र.1 संध्या होते ही जब म रा त्र-आकाश पर दृ ष्टपात करती ँ तो म कुछ तार को ग त करते हुए दे खती ँ। ये क्या ह?
क्या इनक ग त भी आवत है?
वे तारे ह ही नह — वे पृथ्वी क प रक्रमा करते कृ त्रम उपग्रह ह। (वायुयान भी कुछ ऐसा ही दखता है, परंतु उसम लाल-हरी ब त्तयाँ
टम टमाती ह; उपग्रह म नह ।)
उपग्रह क पहचान —
वह ायी अथवा हल्क टम टमाती चमक वाला प्रकाश- बदु होता है, जसम कोई रंग नह होता।
वह स्पष्ट रूप से और तीव्र ग त से चलता है और कुछ ही मनट म आकाश का बड़ा भाग पार कर जाता है, जब क वास्त वक
तारे एक-दूसरे के सापेक्ष र रहते ह।
वह सूयास्त के ठ क प ात अथवा सूय दय से ठ क पूव दखता है। यही सबसे बड़ा संकेत है — वह स्वयं नह चमकता,
ब ल्क सूय के प्रकाश को पराव तत करता है, अतः नीचे भू म पर अंधकार होते हुए भी ऊपर उस तक सूय का प्रकाश पहुँचता
रहना चा हए।
हाँ, इनक ग त आवत है। इनम से अ धकांश पृथ्वी क सतह से लगभग 800 कलोमीटर ऊपर प रक्रमा करते ह और एक
प रक्रमा म लगभग 100 मनट लेते ह।
एक िदन में पिरक्रमाएँ = 24 × 60 िमनट ÷ 100 िमनट
= 1440 ÷ 100 = लगभग 14 पिर क्र माएँ पितिदन
यह क्य महत्त्वपूण है: आवतकाल न श्चत होने के कारण उनका गुजरना पहले से प रक लत कया जा सकता है —
क्रयाकलाप 11.4 के मोबाइल ऐप और वेबसाइट ठ क यही करते ह। यही कारण चंद्रमा को कालदशक के लए
उपयोगी बनाता है: जो ग त नय मत रूप से दोहराए उसे गना जा सकता है, और जसे गना जा सके उससे समय
मापा जा सकता है।
क्या आप जानते ह? चंद्रमा हमारा प्राकृ तक उपग्रह है। भारत के कृ त्रम उपग्रह भन्न- भन्न काय करते ह —
काट सैट मान चत्र , नगर- नयोजन और आपदा प्रबंधन हेतु पृथ्वी के चत्र लेता है जनका उपयोग ‘भुवन’ मंच करता
है, जब क एस् ोसैट बाहर क ओर तार तथा अन्य खगोलीय पड का अवलोकन करता है।
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ज ासा बनाए रख — पृष्ठ 187
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अध्याय के अंत के प्रश्न
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ज ासा बनाए रख
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बताइए क नीचे दए गए कथन सत्य ह या असत्य — (i) हम चंद्रमा के केवल उस भाग को दे ख पाते ह जो सूय के
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प्र.1
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प्रकाश को हमारी ओर पराव तत करता है। (ii) पृथ्वी क छाया सूय के प्रकाश को चंद्रमा तक नह पहुँचने दे ती
और चंद्रमा क कलाओं का कारण बनती है। e(iii)
s m कालदशक व भन्न खगोलीय चक्र पर आधा रत होते ह जो
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न त क्रम म बारंबार घ टत होते ह। (iv) चंद्रमा को केवल रा त्र के समय ही दे खा जा सकता है।
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कथन
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सत्य / कारण
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असत्य
agl(i) हम चंदमा के केवल उस भाग को दे ख पाते स त्य चंद्रमा स्वयं का प्रकाश उत्स जत नह करता। केवल वही भाग दखता है जो
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है ं जो सूय के पकाश को हमारी ओर परावितत सूय से द प्त हो और पृथ्वी क ओर उन्मुख भी हो।
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करता है।
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ु ँ ने दे ती और चंद मा की कलाओं ag
(ii) पथ्ृ वी की छाया सूय के पकाश को चंद मा
तक नही ं पहच l a अस त्य कलाएँ चंद्रमा के प रक्रमण से सूय, पृथ्वी एवं चंद्रमा के सापेक्ष अ भ वन्यास
म प रवतन के कारण होती ह। चंद्रमा पर पृथ्वी क छाया से चंद्र-ग्रहण होता
का कारण बनती है। है, जो केवल कुछ पू णमाओं को ही होता है।
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स त्य
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(iii) कालदशक िविभन्न खगोलीय चक्रों पर दन, मास और वष क्रमशः पृथ्वी के घूणन, चंद्रमा क कलाओं के चक्र और
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आधािरत होते है ं जो िनिश्चत क्रम में बारंबार पृथ्वी के प रक्रमण से आते ह।
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घिटत होते
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(iv) चंद मा को के वल राित्र के समय ही दे खा अस त्य चंद्रमा प्र त दन लगभग 50 मनट दे र से उ दत होता है, अतः अनेक दन म
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जा सकता है। वह दन के उजाले म क्ष तज के ऊपर होता है — जैसा मीरा ने पतंग
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महोत्सव म दे खा।
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s प्रच लत ांत धारणा है। य द कलाओं का कारण पृथ्वी क छाया होती
संकेत: कथन (ii) चंद्रमा के वषय मlaसबसे
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a का कनारा सदै व पृथ्वी के अपने आमाप का वृत्तीय चाप होता — इनम से कुछ
तो वह प्रत्येक माह पड़ती और छाया
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भी हम नह दे खते।
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a s emप्र.2
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अमोल का जन्म 6 मई को पू णमा के दन हुआ था। क्या उसका जन्म दन प्र तवष पू णमा के दन ही होता है?
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अपने उत्तर क व्याख्या क जए।
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नह । उसका जन्म दन प्र तवष 6 मई को आता है, परंतु पू णमा नह आती।
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एक गेगोरी वष = 365 िदन
चंद मा की कलाओं के 12 चक्र = 12 × 29.5 = 354 िदन
अंत र = 365 − 354 = लगभग 11 िदन
ऐसा क्य होता है: उसके जन्म के एक वष बाद चंद्रमा 354 दन म 12 चक्र पूरे कर चुका होता है और फर 11
दन और आगे बढ़ चुका होता है। अतः अगले वष 6 मई को चंद्रमा पू णमा से लगभग 11 दन आगे, अथात क्षीयमाण
बालचंद्र के रूप म और अमावस्या के नकट होगा। द वार के कालदशक का दनाँक सूय से तय होता है और कला
चंद्रमा से; ये दोन चक्र एक-दूसरे म पूरे-पूरे बँटते ही नह ।
क्या आप जानते ह? ये दोन पुनः मलते अवश्य ह, पर धीरे-धीरे। 235 चंद्र मास (लगभग 6940 दन) लगभग
ठ क 19 सौर वष (भी लगभग 6940 दन) के बराबर होते ह, अतः वही कला उसी दनाँक पर लगभग प्रत्येक 19
वष म लौटती है। अमोल को 19, 38 और 57 वष क आयु म पू णमा वाला जन्म दन मलेगा।
प्र.3 ऐसी दो बात बताइए जो चत्र 11.10 म सही नह दशाई गई ह।
चत्र 11.10, पृष्ठ 187 — पाठ्यपुस्तक म मु द्रत चत्र का पुनःआरे खत रेखा चत्र।
उस चत्र म दो बात ऐसी ह जो हो ही नह सकत —
1. चंद्रमा के अद प्त भाग के भीतर तारे दशाए गए ह। चंद्रमा लगभग 3500 कलोमीटर व्यास का ठोस, अपारदश पड है।
उसके पीछे क हर वस्तु ढक जाती है, अतः चंद्रमा के बब के भीतर कोई तारा कभी दखाई नह दे सकता। तारे चंद्रमा के चार
ओर बनाए जा सकते ह, उस पर नह ।
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2. चंद्रमा का अद प्त भाग एक दृश्यमान काले बब के रूप म दखाया गया है। हम केवल उसी भाग को दे ख सकते ह जो सूय
का प्रकाश हमारी ओर पराव तत करता है। बालचंद्र क रा त्र म शेष चंद्रमा आकाश क पृष्ठभू म म काला नह दखता — वह
दखता ही नह , और आकाश तथा उसके तारे चमक ले बालचंद्र के कनारे तक दखाई दे ते ह।
अशुद्ध (जैसा िचत्र 11.10 मे ं है) शुद्ध — केवल दीप्त बालचंद िदखता है
बाएँ — अद प्त भाग एक दृश्यमान बब के रूप म और उसके भीतर चमकते तारे। दाएँ — आकाश वास्तव म जैसा दखता है: केवल
बालचंद्र, और तारे चंद्रमा के बाहर।
स्वयं दे खए: अगली बालचंद्र रा त्र को ध्यान से दे खए। शेष बब हल्का-सा चमकता दख सकता है — यह पृथ्वी-
प्रकाश है, अथात पृथ्वी से पराव तत होकर चंद्रमा क रा त्र वाली सतह पर पड़ता सूय का प्रकाश। तब भी उसम से
कोई तारा नह झाँकता।
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कक्षा 8 वज्ञान अध्याय 11 आकाशीय प रघटनाएँ और काल- नधारण AglaSem · NCERT Solutions
प्र.4 चत्र 11.11 म दशाई गई चंद्रमा क कलाओं के चत्र को दे खए और नम्न ल खत प्रश्न के उत्तर द जए।
त थ द ध न प
चत्र 11.11, पृष्ठ 187 — चंद्रमा के छह चत्र का पुनःआरे खत रेखा चत्र; नामाक्षर पुस्तक के अनुसार त से प तक।
(i) उपयुक्त चत्र म दशाई गई चंद्रमा क कलाओं के संगत सही नामाक्षर ल खए।
चत्र का नामाक्षर (त, थ, द आ द) चंद्रमा क कलाएँ
अमावस्या के तीन दन प ात
पू णमा
पू णमा के तीन दन प ात
पू णमा के एक सप्ताह प ात
अमावस्या के दन
पृष्ठ 187 पर मु द्रत ता लका — बायाँ स्तंभ आपको भरना है।
(ii) चत्र म दशाई गई चंद्रमा क उन कलाओं के नामाक्षर ल खए जो पृथ्वी से दखाई नह दे त । (संकेत — संदभ
के लए आप क्रयाकलाप 11.1 के अपने अवलोकन अथवा चत्र 11.2 का उपयोग कर सकते ह।)
(i) प्रत्येक चत्र का मलान एक ही प्रश्न से क जए — बब का कतना अंश चमक ला है? तीन दन पखवाड़े का लगभग पाँचवाँ भाग
है और एक सप्ताह उसका आधा।
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कक्षा 8 वज्ञान अध्याय 11 आकाशीय प रघटनाएँ और काल- नधारण AglaSem · NCERT Solutions
चत्र का चंद्रमा क कला क्य
नामाक्षर
ध अमावस्या के तीन िदन पतला बालचंद्र — बब का लगभग दसवाँ भाग ही चमक ला है और वह बढ़ रहा है
पश्चात (वधमान)
न पूिणमा पूरा बब चमक ला है
त पूिणमा के तीन िदन लगभग पूण, एक कनारे से पतला अद प्त बालचंद्र कटा हुआ — अभी-अभी क्षीण होना
पश्चात आरंभ हुआ अधा धक चंद्र
द पूिणमा के एक सप्ताह ठ क आधा चमक ला, वभाजक रेखा सीधी — चंद्रमा अब सूय से 90° दूर है
पश्चात
थ अमावस्या के िदन पूणतः अद प्त — केवल अद प्त भाग ही पृथ्वी क ओर है
(ii) चत्र ‘प’ पृथ्वी से कभी दखाई नह दे ता।
संभव — दोनों नोकें एक ही असंभव (प): अदीप्त धब्बे के
व्यास के िसरे है ं दोनों ओर दीप्त चंदमा है
प्रकाश और अंधकार को बाँटने वाली रेखा सदै व चंद्रमा के कनारे के दो वपरीत बदुओं को जोड़ती है और बब को ठ क दो भाग म काटती
है। ‘प’ म अद प्त भाग बब के भीतर पड़ा एक पत्ती जैसा धब्बा है जसके दोन ओर द प्त चंद्रमा है — सूय, पृथ्वी और चंद्रमा क कोई भी
व्यव ा ऐसा नह बना सकती।
ऐसा क्य होता है: सूय का प्रकाश चंद्रमा के पूरे आधे भाग को द प्त करता है, अतः द प्त और अद प्त अधगोल क
सीमा एक वृत्त है जो चंद्रमा के दोन ुव से होकर उसके चार ओर जाता है। पृथ्वी से यह सीधी रेखा (अधवृत्ताकार
चंद्रमा) अथवा एक ओर उभरा वक्र (बालचंद्र) या दूसरी ओर उभरा वक्र (अधा धक) दख सकती है, परंतु उसके दोन
सरे सदै व चंद्रमा के कनारे के वपरीत बदुओं पर ही पड़गे। चत्र ‘प’ ठ क इसी नयम को तोड़ता है।
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कक्षा 8 वज्ञान अध्याय 11 आकाशीय प रघटनाएँ और काल- नधारण
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मा लनी ने सूयास्त के समय चंद्रमा को ठ क अपने सर के ऊपर दे खा — (i) मा लनी ारा प्रे क्षत चंद्रमा क कला
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प्र.5
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का चत्र बनाइए। (ii) क्या यह चंद्रमा का वधमान काल है या क्षीयमाण काल है?
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(i) उसने अधवृत्ताकार चंद्रमा दे खा — ठ क आधा बब चमक ला, वभाजक रेखा सीधी, और चमक ला आधा भाग प श्चम म अस्त
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होते सूय क ओर।
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िसर के ऊपर चंदमा
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अधवृत्ताकार चंदमा (दीप्त भाग सूय की ओर) पूव पिश्चम
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g l a अस्त होता सूय
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सूयास्त के समय सर के ऊपर होने का अथ है क चंद्रमा आकाश म सूय से एक चौथाई चक्कर अथात 90° दूर है, और 90° क दूरी पर
सदै व अधवृत्ताकार चंद्रमा दखता है।
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(ii) यह.c
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द्रमा का वधमान काल (शुक्ल पक्ष) है।
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agl ऐसा क्य होता है: अध्याय इसका दपण-रूप बताता है — जब चमक ला भाग घटकर अधवृत्ताकार होता है तो
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coसेmभी मेल खाता है — वधमान चंद्रमा सूयास्त के समय और a
चंद्रमा सूय दय के समय सर के ऊपर होता है; वह क्षीयमाण अधचंद्र है। सूयास्त के समय सर के ऊपर होना माह का
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eसुmवधाजनक होता है। अगले सप्ताह इसका चमक ला भाग बढ़ता जाएगा
ठ क दूसरा आधा भाग है। यह पृष्ठ 173 के नयम
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agकlे समय उ दत होगा।
क्षीयमाण चंद्रमा सूय दय के समय दे खना
और पू णमा को यह ठ क सूयास्त
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र व ने कहा, “मने एक बालचंद्र दे खा और जब सूय अस्त हो रहा था तो यहaपूsव म उ दत हो रहा था।” कौशल्या ने
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.c कहा, “एक बार मने दोपहर के समय पूव दशा म अधा धक चंद्र दे खaा था।”
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g दोन म से कसक बात सत्य है?
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कौशल्या क बात सत्य है। र व क बात सही नह हो सकती।
mहो उसी क्षण पूव म उ दत होता चंद्रमा सूय से 180° दूर होता है। 180° पर संपूण
र व: जस क्षण सूय प श्चम म अस्त होeरहा
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—lअथात वह पूणचंद्र होगा, बालचंद्र नह । बालचंद्र सूय से मात्र 30°–45° दूर होता है, अतः वह
द प्त भाग हमारी ओर होता है g
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कभी वपरीत क्ष तज पर हो ही नह सकता। र व जो बता रहा है वह ज्या मतीय रूप से असंभव है।
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कौशल्या: अधा धक चंद्र सूय से लगभग 135° दूर होता है। दोपहर बाद सूय आकाश के प श्चमी भाग म होता है, अतः पूव म
नीचा कोई बदु उससे लगभग इतनी ही दूरी पर होता है। वधमान अधा धक चंद्रमा वास्तव म अपराह्न म पूव दशा म उ दत होता
है — अध्याय स्वयं बताता है क कभी-कभी चंद्रोदय 2:00–4:00 बजे के लगभग होता है, इसी लए चंद्रमा दन के उजाले म
दख जाता है।
ऐसा क्य होता है: कला और त परस्पर बँधी हुई ह। य द आपको पता है क चंद्रमा का कतना भाग द प्त है तो
आपको यह भी पता चल जाता है क वह आकाश म सूय से कतनी दूर होगा और इस लए लगभग कब उ दत होगा।
पूणचंद्र सूयास्त पर उ दत होता है; वधमान अधा धक चंद्र सूयास्त से कुछ घंटे पूव; वधमान बालचंद्र दन चढ़े उ दत
होकर सूयास्त के ठ क बाद प श्चम म नीचा दखाई दे ता है।
प्र.7 वै ा नक अध्ययन दशाते ह क चंद्रमा पृथ्वी से दूर हट रहा है और इसक प रक्रमण ग त कम हो रही है। इससे
चंद्र-सौर कालदशक म प्रायः अंतवशी मास बढ़ाने क आवश्यकता होगी या घटाने क आवश्यकता होगी।
घटाने क आवश्यकता होगी — अथात अंतवशी मास कम बार जोड़ना पड़ेगा।
वतमान में: 12 चंद मास = 12 × 29.5 = 354 िदन
सौर वष से कमी = 365 − 354 = 11 िदन पितवष
अितिरक्त मास तब चािहए जब यह कमी लगभग 29.5 िदन हो जाए
लगने वाला समय = 29.5 ÷ 11 ≈ 2.7 वष — अध्याय का ‘पत्येक 2 से 3 वष’
मान लीिजए चंद मा इतना धीमा हो जाए िक एक चक्र 30 िदन का हो जाए:
12 चंद मास = 12 × 30 = 360 िदन
कमी = 365 − 360 = मात्र 5 िदन पितवष
लगने वाला समय = 30 ÷ 5 = 6 वष
ऐसा क्य होता है: धीमे चंद्रमा का अथ है कलाओं का लंबा चक्र, अतः 12 चंद्र मास आज क अपेक्षा अ धक दन
के हो जाएँगे और चंद्र वष सौर वष के अ धक नकट आ जाएगा। प्र तवष क कमी — जो अ धक मास के अ स्तत्व
का एकमात्र कारण है — घट जाएगी, अतः पूरे एक मास जतना अंतर जमा होने म कह अ धक वष लगगे। इस लए
यह संशोधन कम बार करना पड़ेगा।
क्या आप जानते ह? यह एक वास्त वक, मापा गया प्रभाव है। चंद्र अ भयान ारा चंद्रमा पर छोड़े गए परावतक से
पता चलता है क चंद्रमा प्र तवष लगभग 4 सट मीटर हमसे दूर हट रहा है, और दूर जाने के साथ उसका प रक्रमण
धीमा होता जाता है।
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प्र.8 कसी सौर कालदशक म 3 वष क अव ध म कुल 37 पू णमाएँ आती ह। दशाइए क इन 37 पू णमाओं म से कम
से कम दो पू णमाएँ सौर कालदशक के एक ही महीने म आएँगी।
उपलब्ध महीन को गनकर पू णमाओं क संख्या से तुलना क जए।
सौर कालदशक के 3 वष ं में महीने = 3 × 12 = 36 महीने
पूिणमाओं की संख्या = 37
37, 36 से अिधक है
मान ली जए इसके वपरीत कोई भी दो पू णमाएँ एक ही महीने म न आती ह । तब 37 म से प्रत्येक पू णमा को अपना-अपना अलग
महीना चा हए, अथात कम से कम 37 भन्न महीने चा हए। परंतु उन तीन वष म केवल 36 महीने ह। यह असंभव है, अतः हमारी
कल्पना गलत है — कम से कम एक महीने म दो पू णमाएँ अवश्य आएँगी।
ऐसा क्य होता है: यह तक ‘ पजनहोल’ वचार है — 36 खान म 37 वस्तुएँ रखने पर कसी न कसी खाने म एक
से अ धक आएँगी। इसके पीछे क खगोलीय बात यह है क 29.5 दन का चंद्र चक्र लगभग हर कालदशक-मास से
छोटा है, अतः पू णमाएँ महीन से थोड़ी तेज़ी से आती ह और कोई एक महीना दो बार पकड़ ही लेता है। 3 वष म 3
× 365 = 1095 दन होते ह, अथात 1095 ÷ 29.5 ≈ 37 पू णमाएँ — ठ क वही संख्या जो प्रश्न म द है।
क्या आप जानते ह? एक ही कालदशक-मास म आने वाली दूसरी पू णमा को लोक प्रय भाषा म ‘ब्लू मून’ कहा
जाता है। इसम नीला कुछ भी नह होता, और यह चंद्रमा के वषय म नह ब ल्क हमारे कालदशक के वषय म एक
तथ्य है।
प्र.9 कसी वशेष रा त्र म वैशाली ने आकाश म चंद्रमा का सूयास्त से सूय दय तक अवलोकन कया। उसने चंद्रमा क
कस कला का अवलोकन कया होगा?
उसने पूणचंद्र (पू णमा) दे खा होगा।
ऐसा क्य होता है: पूरी रा त्र क्ष तज के ऊपर रहने के लए चंद्रमा को ठ क सूयास्त के समय उ दत और ठ क
सूय दय के समय अस्त होना पड़ेगा। यह तभी संभव है जब चंद्रमा आकाश म सूय के ठ क वपरीत हो, अथात 180°
क दूरी पर। 180° पर पृथ्वी चंद्रमा को लगभग उसी दशा से दे खती है जस दशा से सूय का प्रकाश आता है, अतः
संपूण द प्त भाग हमारी ओर होता है — एक पूण चमक ला वृत्त। यह चत्र 11.5 क त ‘त’, दन 1 है।
कोई अन्य कला यह नह कर सकती। अधवृत्ताकार चंद्रमा सूय से मात्र 90° दूर है अतः लगभग आधी रा त्र ही आकाश म रहता है;
बालचंद्र सूय के समीप होता है अतः या तो उसके तुरंत बाद अस्त हो जाता है या उससे ठ क पहले उ दत होता है।
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प्र.10 य द हम अ धवष (लीप वष) को गणना म लेना बंद कर द तो लगभग कतने वष के प ात भारत का स्वतंत्रता
दवस शीत ऋतु म पड़ेगा?
लगभग 700 से 750 वष — मोटे तौर पर सात शता ब्दयाँ।
ऋत एु ँ लगभग 365¼ िदनों में दोहराती है;ं अिधवष रिहत कालदशक के वल 365 िदन िगनता है
पितवष िखसकाव = ¼ िदन = 0.25 िदन
अतः कालदशक पत्येक 4 वष में ऋत ओ
ु ं से 1 िदन पीछे रह जाता है
15 अगस्त अभी वष ऋत ु में है। शीत ऋत ु का मौसम ऋत -ु चक्र में लगभग 6 माह पहले आता है:
आवश्यक िखसकाव = 365 ÷ 2 ≈ 183 िदन
आवश्यक वष = 183 × 4 = लगभग 730 वष
ऐसा क्य होता है: अ त रक्त दन के बना प्रत्येक कालदशक-वष पृथ्वी क प रक्रमा पूरी होने से लगभग छह घंटे
पहले समाप्त हो जाता है। अतः कालदशक थोड़ा तेज़ चलता है और 15 अगस्त जैसा र दनाँक प्र तवष ऋतु-चक्र
म कुछ पहले आने लगता है। लगभग 730 वष के पश्चात वह वहाँ आ जाएगा जहाँ आज मध्य फरवरी है — अथात
शीत ऋतु म। ऋतुओं को पूरा चक्कर लगाकर वापस उसी ान पर आने म लगभग 4 × 365 ≈ 1460 वष लगगे।
संकेत: ठ क इसी समस्या को रोकने के लए अ धवष क अवधारणा आई, और इसी लए ग्रेगोरी कालदशक इससे भी
आगे जाकर 1700, 1800 तथा 1900 म अ धवष छोड़ दे ता है और 1600 तथा 2000 म रखता है। ये छोटे -छोटे
संशोधन ऋतुओं को हज़ार वष तक उनके दनाँक से बाँधे रखते ह।
प्र.11 कृ त्रम उपग्रह के प्रमोचन का उ े श्य क्या होता है?
कृ त्रम उपग्रह इस लए प्रमो चत कए जाते ह क्य क कक्षा म ा पत कोई यंत्र पृथ्वी के कह बड़े भाग को दे ख, सुन और उस तक
पहुँच सकता है, जतना भू म पर त कोई भी साधन नह कर सकता।
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उ े श्य हमारे लए क्या करता है
संचार दू र भाष, दू र दशन और अंतज ल के संके तों को ऐसे स्थानों के बीच पहच
ु ँ ाता है जो सीधे जुड़ने के िलए बहुत दू र है ं
यान संचालन (नेिवगेशन) भूिम, जलयान अथवा वायुयान पर िस्थत गाही को उसकी यथाथ अविस्थित बताता है
मौसम-अनुवीक्षण ऊपर से बादलों, तूफ ानों और च वातों पर दृ िष्ट रखता है िजससे समय रहते चेतावनी दी जा सके
क्र
आपदा पबंध न बाढ़ , च वात और भूकं प का मानिचत्रण करता है िजससे राहत सही स्थान पर भेजी जा सके
क्र
वै ािनक अनुस ंध ान वायुमंडल के ऊपर से पथ्ृ वी, सूय, गहों, तारों तथा अन्य खगोलीय िपंडों का अध् ययन करता है
भारत के अपने अ भयान इनम से प्रत्येक को दशाते ह। काट सैट मान चत्र को सुधारने, नगर के नयोजन और प्राकृ तक आपदाओं
के प्रबंधन हेतु पृथ्वी क उच्च गुणवत्ता क छ वयाँ लेता है, और भुवन मंच इन छ वय से भू-रूप, मृदा, भू म-उपयोग तथा वनस्प त
दशाता है। एस् ोसैट तार एवं अन्य खगोलीय पड का अवलोकन करता है। चंद्रयान–1, 2 एवं 3 चंद्रमा तक गए, आ दत्य एल–1
सूय का अध्ययन करता है और मंगलयान मंगल तक गया। इसरो भारतीय वद्या थय को आजाद सैट, इंसपायरसैट–1 और जुगनु
जैसे छोटे उपग्रह बनाने एवं प्रमो चत करने क अनुम त भी दे ता है।
क्या आप जानते ह? उपयोग क अव ध पूण होने के पश्चात ये उपग्रह और उनके रॉकेट के अवयव अंत रक्ष म
कचरा बन जाते ह। छोटे टु कड़े पृथ्वी क ओर गरते समय वायु के घषण से जल जाते ह, परंतु बड़े टु कड़े भू म पर आ
गरते ह और कोई भी टु कड़ा कायरत उपग्रह से टकरा सकता है — इसी लए वश्व के दे श अब मलजुल कर इस
कचरे के नपटान पर काय कर रहे ह।
प्र.12 समय के नम्न ल खत माप कन आवत प रघटनाओं पर आधा रत ह — (i) दवस (ii) मास (iii) वष
समय का आधारभूत आवत प रघटना अव ध
माप
(i) िदवस पथ्ृ वी का अपने अक्ष के पिरतः घूणन, िजससे सूय आकाश में पुनः अपनी उ च्चतम िस्थित पर लौटता है 24 घंटे (माध्य सौर
— िजसे लघुतम छाया से ात िकया जाता है दन)
(ii) मास चंद मा की कलाओं का एक पूण च , जो पथ्ृ वी के पिरतः चंद मा के पिर मण से होता है
क्र क्र लगभग 29.5 दन
(iii) वष सूय के पिरतः पथ्ृ वी का पिर मण, िजससे ऋतुओं का एक पूण च िमलता है
क्र क्र लगभग 365¼
दन
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ऐसा क्य होता है: प्रत्येक मात्रक एक भन्न प हये का एक चक्कर है — पृथ्वी का घूणन, पृथ्वी के प रतः चंद्रमा का
m a s emके एक चक्कर
glके लए अ धवष का
प रक्रमण, और सूय के प रतः पृथ्वी का प रक्रमण ( चत्र 11.8)। चूँ क इनम से कोई भी प हया दूसरे
म पूण संख्या.cमoचक्कर नह लगाता, अतः कालदशक म समायोजन करना पड़ता है — वष
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दन और चंद्र-सौर मास के लए अ धक मास।
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खोज, अ भक ल्पत कर और चचा कर — पृष्ठm .co ag
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व ान • समाज • अंतर वषयक प रयोजनाएँ
खोज, अ भक ल्पत कर और चचा कर प रयोजनाएँ
प्र.1 बालचंद्र सदै व सूय क ओर उन्मुख होता है ( चत्र 11.12)। जस दन आपको बालचंद्र दखाई दे ता है उस दन
अपनी अँगुली सूय क ओर करके आकाश म सबसे छोटे पथ का अनुरेखण करते हुए चंद्रमा तक ले जाइए। ध्यान
द जए क आपक अँगुली सदै व चंद्रमा के प्रका शत भाग को पहले पार करती है जो स्पष्ट रूप से यह दशाता है
क हम चंद्रमा ारा पराव तत सूय के प्रकाश को दे ख रहे ह। बालचंद्र क नोक को मलाने वाली रेखा चंद्रमा का
व्यास है।
चत्र 11.12, पृष्ठ 188 — पाठ्यपुस्तक के चत्रांकन का पुनःआरे खत रेखा चत्र: खेत के ऊपर नीचा सूय और उससे
ऊँचाई पर संध्या के आकाश म चंद्रमा।
कैसे कर। सूयास्त के ठ क बाद (वधमान बालचंद्र के लए) ऐसे ान पर खड़े होइए जहाँ से प श्चमी क्ष तज के पास सूय क आभा
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और बालचंद्र — दोन दख। एक अँगुली सूय क ओर क जए और फर उसे आकाश म सबसे छोटे पथ से चंद्रमा तक ले जाइए। सूय
क ओर संकेत क जए, उसे सीधे दे खए मत।
आप क्या पाएँगे। हर बार आपक अँगुली अद प्त भाग से पहले बालचंद्र के चमक ले कनारे तक पहुँचती है। बालचंद्र का उभरा
हुआ बाहरी कनारा सदै व सूय क ओर उन्मुख रहता है।
ऐसा क्य होता है: यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है क चंद्रमा स्वयं के प्रकाश से नह , पराव तत सूय-प्रकाश से
चमकता है। चंद्रमा का जो आधा भाग द प्त होता है वह सूय के सम्मुख वाला भाग है, अतः बब का जो पक्ष हम
चमक ला दखता है वह आकाश म सूय क ओर वाला पक्ष ही होना चा हए। य द चंद्रमा स्वयं चमकता तो उसके
चमक ले भाग के सदै व सूय क ओर संकेत करने का कोई कारण न होता।
नोक को मलाने वाली रेखा। बालचंद्र क दोन नोक वे बदु ह जहाँ प्रकाश-अंधकार क सीमा चंद्रमा के कनारे से मलती है। वह
सीमा चंद्रमा के ुव से होकर जाने वाला एक बृहत् वृत्त है, अतः उसके दोन दृश्य सरे सदै व कनारे के वपरीत बदुओं पर पड़ते ह
— और वृत्त के वपरीत बदुओं को मलाने वाली रेखा व्यास होती है। इस लए नोक के बीच क दूरी नापने का अथ है चंद्रमा क
पूरी चौड़ाई नापना, चाहे बालचंद्र कतना ही पतला क्य न हो।
यह क जए: दोन नोक पर एक सीधी छड़ी या तना हुआ धागा रखकर दे खए क वह आपक सूय-से-चंद्रमा वाली
अँगुली के पथ से समकोण बनाता है। बालचंद्र सदै व सूय से दूर क ओर झुकता है, उसक ओर कभी नह ।
प्र.2 भारत के रा ीय कालदशक क अ धकांश त थय के संगत ग्रेगोरी कालदशक म आपको सदै व वही-वही दनाँक
प्राप्त हो सकती ह। क्या आप बता सकते ह क कुछ न त वष म कौन से दन भन्न हो सकते ह?
जो दन भन्न हो सकते ह वे 29 फरवरी से 20 अप्रैल के बीच पड़ते ह — अथात फाल्गुन के अं तम तीन सप्ताह और संपूण चैत्र। 1
वैशाख से 9 फाल्गुन तक क प्रत्येक त थ प्र तवष उसी ग्रेगोरी दनाँक पर आती है।
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भारतीय रा ीय कालदशक का दन सामान्य वष म ग्रेगोरी दनाँक
मास
चैत्र 30 (अिधवष में 22 माच – 20 अप्रैल (अ धवष म 21 माच – 20 अप्रैल)
31)
वैशाख 31 21 अप्रैल – 21 मई
ज्येष्ठ 31 22 मई – 21 जून
आषाढ़ 31 22 जून – 22 जुलाई
ावण 31 23 जुलाई – 22 अगस्त
भाद पद 31 23 अगस्त – 22 सतंबर
आिश्वन 30 23 सतंबर – 22 अक्तूबर
काितक 30 23 अक्तूबर – 21 नवंबर
अग हायण (मागशीष) 30 22 नवंबर – 21 दसंबर
पौष 30 22 दसंबर – 20 जनवरी
माघ 30 21 जनवरी – 19 फरवरी
फाल्ग नु 30 20 फरवरी – 21 माच (फरवरी 29 दन क हो तो 20 फरवरी – 20
माच)
ऐसा क्य होता है: भारतीय रा ीय कालदशक क लंबाई न श्चत 365 दन है, अतः जब तक ग्रेगोरी वष भी 365
दन का है तब तक दोन पूण ताल म चलते ह। एकमात्र व्यवधान ग्रेगोरी अ धवष का दन है। जब 29 फरवरी आती है
तो वह 10 फाल्गुन बन जाती है, अतः 1 माच से 20 अप्रैल तक प्रत्येक ग्रेगोरी दनाँक पर शक त थ सामान्य से एक
अ धक हो जाती है। फर कालदशक चैत्र को 30 के ान पर 31 दन दे कर संतुलन बठा दे ता है, जससे नववष
21 माच से आरंभ होता है और 1 वैशाख पुनः सदा क भाँ त 21 अप्रैल पर आ जाता है।
स्वयं जाँ चए: स्वतंत्रता दवस सदै व 24 ावण और गणतंत्र दवस सदै व 6 माघ होता है — अ धवष हो या न हो,
क्य क दोन वष के उस भाग म पड़ते ह जो कभी नह बदलता। जाँ चए — ावण 23 जुलाई से आरंभ होता है,
अतः 15 अगस्त उसका 24वाँ दन हुआ।
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प्र.3 भारत के व भन्न राज्य नववष का उत्सव अपनी-अपनी ानीय संस्कृ त के अनुसार मनाते ह। भारत के कन्ह
10 राज्य म मनाए जाने वाले नववष उत्सव के नाम ात क जए। यह भी पता लगाइए क यह चंद्र कालदशक
आधा रत ह सौर कालदशक आधा रत ह अथवा चंद्र-सौर कालदशक आधा रत ह।
कैसे कर। भन्न- भन्न राज्य के प रवारजन और सहपा ठय से पू छए, फर प्रत्येक पव का दनाँक तीन-चार वष तक ग्रेगोरी
कालदशक म दे खए। यही परीक्षण कालदशक का प्रकार बता दे गा — जो दनाँक लगभग नह हलता वह सौर पव है; जो एक माह
तक इधर-उधर डोलता है वह चंद्र-सौर; और जो नरंतर पहले-पहले खसकता हुआ सभी ऋतुओं से गुजर जाए वह शुद्ध चंद्र पव है।
नमूना उत्तर:
राज्य नववष का पव आधा रत कब पड़ता है
कालदशक
महारा गुड़ी पड़वा चंद -सौर चैत्र क अमावस्या के अगले दन (माच–
अप्रैल)
कन टक, आंध पदे श, उगा द चंद -सौर गुड़ी पड़वा के ही दन
तेल ंग ाना
गज
ु रात बेस्तु वरस चंद -सौर द पावली के अगले दन, का तक म
(अक्तूबर–नवंबर)
जम्मू और कश्मीर नवरेह चंद -सौर चैत्र का प्रथम दन (माच–अप्रैल)
मिणपुर चेइराओबा (स जबु न गमा चंद -सौर स जबु मास का प्रथम दन (अप्रैल)
पानबा)
पंजाब वैशाखी सौर (नक्षत्र) प्रायः प्र तवष 13 अथवा 14 अप्रैल
पिश्चम बंग ाल पोयला बैसाख सौर (नक्षत्र) 14 अथवा 15 अप्रैल
असम बोहाग बहू (र गाली बहू) सौर (नक्षत्र) 14 अथवा 15 अप्रैल
तिमलनाडु पुथांडु सौर (नक्षत्र) 14 अप्रैल
के रल वषु सौर (नक्षत्र) 14 अथवा 15 अप्रैल
ओिडशा पणा संक्रां त (महा वषुव सौर (नक्षत्र) 14 अप्रैल
संक्रां त)
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ऐसा क्य होता है: ता लका का यह प्र तरूप संयोग नह है। अप्रैल के मध्य म पड़ने वाले सभी नववष एक ही
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खगोलीय घटना को च ह्नत करते ह — सौर नक्षत्र कालदशक म सूय का मेष तारा-समूह म प्रवेश e —mइसी लए पंजाब
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से केरल तक.वेco14 अप्रैल के आस-पास एकत्र हो जाते ह। इसके वपरीत चंद्र-सौर नववषagकसी
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कसीsचंeद्र-कला से बँधे ह, अतः उनके ग्रेगोरी दनाँक बदलते रहते ह — परंतु केवल एक माह के दायरे म, क्य क
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aअglधक मास उन्ह सुधारता रहता है।
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प्र.4 अपने प रवारजन , शक्षक अथवा अंतजाल (इंटरनेट) क सहायता से पछले पाँच वष के ग्रेगोरी कालदशक
एक त्रत क जए। प्रत्येक वष के लए वह दनाँक दे खए जन पर उस वष ईद-उल- फतर तथा द पावली उत्सव
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मनाए गए थे। एक ता लका बनाकर वष अनुसार उन्ह उसम अ भले खत क जए। क्या आपके ध्यान म यह बात
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आई क प्रत्येक आगामी वष म ईद-उल- फतर 11 दन पहले आ जाता है? क्या द पावली भी इसी नयत प्र तरूप
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का अनुसरण करती है अथवा उसम कुछ आक स्मक प रवतन होते ह? अपने सं चत्र (चाट) के आधार पर अनुमान
m .c का प्रयास क जए क कस वष म अंतवशी माह (अ धक-मास) को सaम्मgलत कया गया है।
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लगाने
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agउत्तर
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नमूना उत्तर (आप जो कालदशक एकत्र कर उनसे अपनी ता लका भरकर मलान क जए — कसी पव का दनाँक क्षेत्र के अनुसार
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एक दन आगे-पीछे हो सकता है):
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वष ईद-उल- फतर agवषl से अंतर
पछले द पावली (लक्ष्मी पूजा) पछले वष से अंतर
14 मई — 4 नवंबर —
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2021
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e11 दन पहले
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3 मई 24 अक्तूबर
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2022 11 दन पहले
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l a se 2023 22 अपैल 11 दन पहले 12 नवंबर 19 दन बाद — एक छलाँग
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2024 11 अपैल 11 दन पहले 1 नवंबर 11 दन पहले
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2025 31 माच 11 दन पहले 20 अक्तूबर 12 दन पहले
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ईद-उल- फतर प्र तवष लगभग ठ क 11 दन पीछे खसकती है, एक भी अपवाद के बना। परंतु चंद्र कालदशक पर उसक त थ
बल्कुल नह बदलती — वह सदै व 1 शव्वाल, अथात रमजान के अंत म बालचंद्र दे खने के अगले दन ही रहती है।
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द पावली भी प्रायः लगभग 11 दन पीछे खसकती है, परंतु 2022 और 2023 के बीच वह 19 दन आगे छलाँग गई। यही छलाँग
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अ धक मास क पहचान है — 2023 म एक अ त रक्त चंद्र मास (अ धक ावण) जोड़ा गया था, जसने उस वष के बाद के सभी
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पव को लगभग एक माह आगे धकेल दया।
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संशोधन के िबना अपेिक्षत अंत र = 11 िदन पहले
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2022 → 2023 में वास्तिवक अंत र = 19 िदन बाद
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e m त चंद मास
अंत र = 19 + 11 = 30 िदन ≈ एक अितिर
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ऐसा क्य होता है: ईद-उल- फतर शुद्ध चंद्र कालदशक का पव है, जो ऋतुओं के साथ ताल बठाने का प्रयास ही
नह करता — अतः वह प्र तवष 11 दन खसकता है और कसी भी ग्रेगोरी माह म पड़ सकता है। द पावली चंद्र-सौर
कालदशक का पव है, जसम वही खसकाव होता है परंतु प्रत्येक दो-तीन वष म अंतवशी माह उसे रद्द कर दे ता है।
इसी लए द पावली शरद ऋतु कभी नह छोड़ती जब क ईद-उल- फतर पूरे वष का चक्कर लगा लेती है।
संकेत: लगभग −11 दन का अंतर सामान्य है; लगभग +19 दन का अंतर अ धक मास वाले वष को च ह्नत करता
है। अपनी ता लका म होली अथवा दशहरा का एक स्तंभ और जो ड़ए — उसी वष म ठ क वैसी ही छलाँग मलेगी।
प्र.5 प्रत्येक दन प्रातः काल अपने वद्यालय जाते हुए माग म ध्यान द जए क सूय कस दशा म उ दत होता है। एक
ान न त कर ली जए और प्र त दन वह से पूव दशा क ओर दे खए और कसी खंभे अथवा भवन को संदभ
बदु मान कर इसके सापेक्ष क्ष तज के ऊपर उठते सूय को दे खए। अपनी अभ्यास पु स्तका म पूव क्ष तज का
रेखा चत्र बनाइए। अगले एक वष तक प्रत्येक मास के आरंभ म उसी ान पर खड़े हो जाइए और अपने रेखा चत्र
पर सूय क त अं कत क जए। वष के अंत म अपने रेखा चत्र का व ेषण क जए। क्या आप यह पाते ह क
सूय दय क त एक वशेष दशा म ानांत रत होती है? क्या आप इस ानांतरण को हमारे पूवज ारा दे खे
गए उत्तरायण और द क्षणायन से जोड़ पाते ह?
अ ा प्रेक्षण कैसे कर। सब कुछ इस पर नभर है क आप हर बार ठ क उसी ान पर खड़े ह , अतः भू म पर कोई न श्चत चह्न
चुन ली जए — कोई दे हरी या कोई वशेष पत्थर — और पूव क्ष तज का रेखा चत्र एक बार, ध्यानपूवक, वृक्ष , खंभ तथा छत
स हत बना ली जए। उसके बाद प्रत्येक मास केवल सूय के लए एक छोटा वृत्त और मास का नाम जोड़ते जाइए।
आप क्या पाएँगे। सूय दय का ान र नह रहता; वह क्ष तज पर लगातार खसकता है और वष म दो बार मुड़ता है।
वष का समय सूय कहाँ उ दत होता है ग त का नाम
लगभग 21 िदसंबर (शीत अयनात
ं ) पूव से सव िधक दिक्षण में मोड़ का बदु — उत्तरायण आरंभ
जनवरी से माच मास -दर -मास उ त्त र की ओर सरकता हुआ उत्तरायण
लगभग 21 माच (वसंत िवषुव) ठीक पूव में — और सूय ठीक पिश्चम में अस्त होता है उत्तरायण जारी
लगभग 21 जून (ग ीष्म अयनांत) पूव से सव िधक उ त्त र में मोड़ का बदु — द क्षणायन आरंभ
जुल ाई से िसतंबर दिक्षण की ओर सरकता हआ
ु द क्षणायन
लगभग 23 िसतंबर (शरद िवषुव) पुनः ठीक पूव में द क्षणायन जारी
हाँ — यह ठ क वही उत्तरायण और द क्षणायन है जसका उल्लेख ‘हमारी वैज्ञा नक धरोहर’ बॉक्स म है। तै त्तरीय सं हता इसी
प्र तरूप को अ भ ल खत करती है — “इस प्रकार सूय छह माह द क्षण क ओर और छह माह उत्तर क ओर ग त करता है।”
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कक्षा 8 वज्ञान अध्याय 11 आकाशीय प रघटनाएँ और काल- नधारण AglaSem · NCERT Solutions
ऐसा क्य होता है: पृथ्वी का अक्ष झुका हुआ है, अतः सूय के प रतः पृथ्वी के प रक्रमण के साथ-साथ वह बदु भी
उत्तर-द क्षण खसकता रहता है जहाँ भोर म सूय क करण क्ष तज से मलती ह। भारत म यह झूला भारत के
द क्षणी छोर पर ठ क पूव से लगभग 24° और दल्ली के आस-पास लगभग 27° दोन ओर तक जाता है — क्ष तज
पर इतना बड़ा अंतर क प्राचीन प्रेक्षक बना कसी उपकरण के, केवल र भू- चह्न के सापेक्ष उसे दे ख लेते थे और
उसी से कालदशक बना लेते थे।
क्या आप जानते ह? नक्षत्र वष सायन वष से 20 मनट अ धक होने के कारण नक्षत्र कालदशक से बँधे पव उन
अयनांत से धीरे-धीरे खसकते जाते ह जन्ह वे कभी च ह्नत करते थे। मकर संक्रां त अब प्रत्येक 71 वष म एक दन
आगे बढ़ जाती है — इसी लए वह आज जनवरी के मध्य म पड़ती है यद्य प कभी वह दसंबर के अयनांत से जुड़ी
थी।
अध्याय — एक नज़र म
चंद्रमा स्वयं का प्रकाश उत्स जत नह करता। सूय का प्रकाश सदै व इसके ठ क आधे भाग को द प्त करता है। पृथ्वी क ओर
उन्मुख भाग सदै व द प्त भाग नह होता, इस लए भन्न- भन्न दन म हम द प्त भाग का भन्न- भन्न अंश दखाई दे ता है — यही
चंद्रमा क कलाएँ ह।
क्षीयमाण काल (कृष्ण पक्ष) म चमक ला भाग लगभग दो सप्ताह म पूणवृत्त से घटकर शून्य हो जाता है; वधमान काल
(शुक्ल पक्ष) म यह पुनः बढ़ता है। एक पू णमा से अगली पू णमा तक लगभग 29.5 दन लगते ह।
कला और त साथ-साथ चलती ह। पू णमा को चंद्रमा सूय के ठ क वपरीत होता है (सूयास्त के समय उ दत होता है);
अमावस्या को यह सूय क लगभग उसी दशा म होता है। चंद्रमा प्र त दन आकाश म लगभग 12° पूव क ओर खसक जाता है,
इस लए यह प्र त दन लगभग 50 मनट दे र से उ दत होता है।
तीन प्राकृ तक आवत घटनाएँ समय के तीन मात्रक दे ती ह — पृथ्वी के घूणन से 24 घंटे का माध्य सौर दन, चंद्रमा क
कलाओं के चक्र से मास, और पृथ्वी के प रक्रमण से लगभग 365¼ दन का सौर वष।
12 चंद्र मास का चंद्र वष मात्र 354 दन का होता है, अतः यह सौर वष से लगभग 11 दन कम पड़ता है। सौर कालदशक
(ग्रेगोरी तथा भारतीय रा ीय कालदशक) ऋतुओं से मेल रखते ह और अ धवष का उपयोग करते ह; चंद्र-सौर कालदशक
मास चंद्रमा से गनते ह परंतु प्रत्येक 2–3 वष म अ धक मास जोड़कर ऋतुओं के साथ बने रहते ह।
अ धकांश भारतीय पव चंद्रमा क कला से नधा रत होते ह, इस लए ग्रेगोरी कालदशक म उनके दनाँक बदलते रहते ह। सौर
नक्षत्र कालदशक के पव, जैसे मकर संक्रां त, लगभग एक ही दनाँक पर आते ह। चंद्रमा के अ त रक्त कृ त्रम उपग्रह भी पृथ्वी
क प रक्रमा करते ह — अ धकांश लगभग 800 कलोमीटर ऊपर, एक प रक्रमा लगभग 100 मनट म।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ पहचान अथवा मापन कैसे कर अध्याय म कहाँ
चंद्रमा क कलाएँ पथ्ृ वी से दे खने पर िदन के साथ पिरवितत चंद्रमा के प रक्रमण से आकाश म सूय- चत्र 11.2 एवं 11.5;
होते चंद मा के चमकीले भाग के रूप चंद्रमा के कोण म प रवतन के कारण — क्रयाकलाप 11.1 तथा 11.2
पृथ्वी क छाया के कारण नह
वधमान काल (शुक्ल वह पखवाड़ा िजसमें चमकीला भाग बढ़ ता वधमान चंद्रमा सूयास्त के समय और अनुभाग 11.1.1, पृष्ठ 172–
पक्ष) एवं क्षीयमाण है, और वह िजसमें घटता है क्षीयमाण चंद्रमा सूय दय के समय दे खना 173
काल (कृष्ण पक्ष) सु वधाजनक है
पूणचंद्र (पू णमा) चंद मा सूय के लगभग िवपरीत होता है, सूयास्त के समय उ दत और सूय दय के चत्र 11.5 म त ‘त’, दन
अतः संपूण दीप्त भाग हमारी ओर होता है समय अस्त होता है 1
नवचंद्र (अमावस्या) चंद मा सूय की लगभग उसी िदशा में होता बल्कुल दखाई नह दे ता; सूय के साथ चत्र 11.5 म त ‘न’, दन
है, अतः के वल अदीप्त भाग हमारी ओर ही उ दत और अस्त होता है 15
होता है
अधा धक कला दीप्त भाग का आधे से अिधक अंश अधा धक कला त ‘थ’ और ‘ब’ पर; पृष्ठ 176
( गब्बस) / बालचंद्र िदखता है / आधे से कम अंश िदखता है बालचंद्र कला त ‘ध’ और ‘प’ पर
कला (क्र सट)
माध्य सौर दन सूय को आकाश में अपनी उच्चतम ऊध्वाधर छड़ी क छाया के सरे पर बदु क्रयाकलाप 11.3 एवं
िस्थित से अगले िदन पुनः उच्चतम िस्थित अं कत क जए; सूय के उच्चतम होने पर ता लका 11.2 — 24 घंटे
तक पहच
ु ँ ने में लगने वाला औसत समय छाया लघुतम होती है
चंद्र मास चंद मा की कलाओं का एक पूण चक्र लगभग 29.5 दन; ऐसे 12 मास अनुभाग 11.2.1, पृष्ठ 179
मलकर 354 दन का चंद्र वष बनाते ह
सौर वष एवं अ धवष सूय के पिरतः पथ्ृ वी की एक पिरक्रमा लगभग 365¼ दन। चार से वभाज्य अनुभाग 11.2.2, पृष्ठ 180
अथ त ऋतुओ ं का एक चक्र; तथा वह वष अ धवष होता है; 1700, 1800,
अितिरक्त िदन जो कालदशक को 1900 छोड़े गए, 1600 तथा 2000 रखे
ऋतुओ ं से जोड़े रखता है गए
चंद्र, सौर एवं चंद्र-सौर वे कालदशक जो क्रमशः चंद मा की 354 दन / 365 दन / मास चंद्रमा से अनुभाग 11.2.1 से 11.2.3
कालदशक कलाओं, ऋतुओ ं के चक्र अथवा दोनों कतु ऋतुओं हेतु संशोधन स हत
का अनुस रण करते है ं
अ धक मास (अंतवशी चंद -सौर वष में पत्येक 2–3 वष में जोड़ा यह चंद्र वष क 11 दन क कमी क पृष्ठ 181–182
माह) जाने वाला अितिरक्त माह पू त करता है जससे पव अपनी ऋतु म
बने रहते ह
सायन वष एवं नक्षत्र एक वसंत िवषुव से अगले वसंत िवषुव नक्षत्र वष सायन वष से मात्र 20 मनट ‘एक सोपान ऊपर’, पृष्ठ 180
वष तक का समय; तथा सूय स्त के समय अ धक होता है
उन्ही ं तारों के पुनः उिदत होने तक का
समय
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शब्द अथ पहचान अथवा मापन कैसे कर अध्याय म कहाँ
भारतीय रा ीय शक संवत् पर आधािरत भारत का सौर 365 दन; वष 22 माच से आरंभ; चत्र 11.9; 21 माच 1956
कालदशक कालदशक, ग ेग ोरी कालदशक के साथ महीन म 30 या 31 दन, दूसरे से छठे सामान्य संवत् अथात 1 चैत्र
पयुक्त माह म 31 1878 शक संवत् से अपनाया
गया
कृ त्रम उपग्रह पथ्ृ वी से पमोिचत मानव िनिमत िपंड जो अ धकांश लगभग 800 कमी ऊपर, एक अनुभाग 11.4; काट सैट,
पथ्ृ वी की पिरक्रमा करता है प रक्रमा म लगभग 100 मनट; तीव्र एस् ोसैट, चंद्रयान, आ दत्य
ग त से चलते ायी प्रकाश- बदु के रूप एल–1, मंगलयान
म दखते ह
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