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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 13: हमारा आवास — पृथ्वी एक
अ तीय जीवनदायी ग्रह
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — ज ासा
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
210 – 228 15 38 हन्द
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कक्षा 8 व ान अध्याय 13 हमारा आवास — पृथ्वी एक अ तीय जीवनदायी ग्रह AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 8 · व ान · ज ासा
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 13: हमारा आवास — पृथ्वी एक
अ तीय जीवनदायी ग्रह
ज ासा का यह अं तम अध्याय पूरे वष क सीख को एक प्रश्न म समेटता है — जीवन केवल यह क्य है? इसका उत्तर कोई एक संयोग नह अ पतु
कारण क एक ंखला है — पृथ्वी क सूय से दूरी, उसका आकार, उसका वायुमंडल एवं चुंबक य क्षेत्र, वायु-जल-च ान एवं जीव के मध्य नरंतर
पारस्प रक क्रया, तथा जनन जो जीवन क नरंतरता बनाए रखता है।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
ज ासा (कक्षा 8) 210 – 228
खं ड प्रश्न
15 38
माध्यम
हन्द
खोजबीन और वचार कर — पृष्ठ 210
अध्याय का आरंभ
खोजबीन और वचार कर
प्र.1 आप क्या सोचते ह य द पृथ्वी पर जीवन ही नह होता तो वह कैसी दखाई दे ती?
वह तब भी नीला ग्रह होती, परंतु एक नग्न ग्रह — केवल च ान, रेत एवं जल; कह भी हरा रंग नह ।
प रवतन केवल रंग तक सी मत नह होता, क्य क जसे हम ‘पृथ्वी’ कहते ह उसका बहुत बड़ा भाग वास्तव म जीव का ही बनाया
हुआ है —
हरी भू म नह होती। वन, घास के मैदान एवं फसल सभी जीवन ह। महा प इस अध्याय म दखाए गए मंगल के चत्र जैसे
नग्न च ान एवं धूल के दखाई दे ते।
वायु म ऑक्सीजन नह के बराबर होती। जस ऑक्सीजन म हम श्वास लेते ह वह पौध ारा प्रकाश सं ेषण म उत्स जत
होती है। पौध एवं समुद्र प्लवक के बना वायुमंडल म यह लगभग नह होती — और ऑक्सीजन के बना ओजोन परत भी न
बनती, अत: पराबगनी करण सीधे सतह तक पहुँचत ।
मृदा नह , केवल टू ट च ान होती। मृदा म नाइ ोजन एवं पोटै शयम इस लए ह क्य क च ान का मंद अपक्षय होता है और
उसम पौध व जंतुओं के अवशेष मलते ह। जीवन के बना यह केवल नज व ख नज धूल होती।
महासागर एवं मौसम तब भी होते। जल द्रव अवस्था म रहता, बादल बनते एवं वषा होती, क्य क यह सब पृथ्वी क सूय से
दूरी एवं उसके वायुमंडल पर नभर है, जीवन पर नह ।
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ऐसा क्य होता है: पृथ्वी क प र स्थ तय ने जीवन को संभव बनाया, परंतु फर जीवन ने पृथ्वी को भी बदल दया
— ऑक्सीजन, ओजोन का कवच एवं मृदा तीन जीव क ही दे न ह। यही दोतरफा संबंध वह ‘संतुलन’ है जसक
चचा यह अध्याय सजीव एवं नज व भाग के मध्य करता है।
प्र.2 पृथ्वी पर जीवन अरब वष से अ स्तत्व म है। बड़े-बड़े प रवतन एवं आपदाओं के उपरांत भी इसके यथावत बने
रहने के क्या कारण ह?
इसके दो भन्न प्रकार के कारण साथ-साथ काय करते ह — पृथ्वी अपनी प र स्थ तय को एक सी मत परास म बनाए रखती है, और
जीवन स्वयं इतना प रव तत होता रहता है क उस परास म समा सके।
1. भौ तक प र स्थ तयाँ स्थर रहती ह।
पृथ्वी वासयोग्य क्षेत्र म बनी रहती है एवं इसक कक्षा लगभग वृत्ताकार है, अत: वष भर प्रकाश एवं ऊष्मा म वशेष अंतर नह
आता।
इसका गुरुत्व वायुमंडल को रोके रखता है, जसका मंद ह रतगृह प्रभाव जल को द्रव बनाए रखता है एवं जसक ओजोन परत
पराबगनी करण को रोकती है।
इसका चुंबक य क्षेत्र कॉ स्मक करण एवं सौर पवन को दूर धकेलता है।
2. जनन जीवन को अनुकूलन का अवसर दे ता है। जनक अपनी संत त को अनुदेश (जीन) स्थानांत रत करते ह, अत: प्रत्येक
प्रकार का जीव बना रहता है। परंतु ये अनुदेश पूणत: एक जैसे स्थानांत रत नह होते और ल गक जनन म दो जनक के अनुदेश
म श्रत होते ह। इस लए प्रत्येक पीढ़ म कुछ ऐसे जीव होते ह जो शेष से थोड़े भन्न होते ह। प रवेश बदलने पर उनम से कुछ अ धक
अच्छ तरह जी वत रह पाते ह और उन्ह क ंखला आगे बढ़ती है।
क्या आप जानते ह? अध्याय के अपने उदाहरण ह — ऊँट, जनम समय के साथ चब सं चत करने वाला कूबड़
वक सत हुआ जससे वे मरुस्थल म जी वत रह सके, तथा वे जीवाणु जो प्र तजै वक दवाओं के प्र त प्र तरोधी हो
गए। प्र क्रया एक ही है, केवल समय-पैमाना भन्न है।
ऐसा क्य होता है: कसी आपदा म प्रत्येक जीव का बचना आवश्यक नह — केवल पयाप्त संख्या का बचना
आवश्यक है। व भन्नता का अथ है क कोई समूह एक ही प्रकार का नह होता, अत: जो प रवतन अ धकांश को
समाप्त कर दे वह भी कुछ को छोड़ जाता है।
प्र.3 कुत्ते अंडे क्य नह दे ते एवं मु गयाँ जी वत चूज को जन्म क्य नह दे त ?
क्य क कुत्ता एवं मुग ूण को पोषण दे ने क दो भन्न प्र क्रयाएँ अपनाते ह, और प्रत्येक जीव को केवल अपने ही प्रकार के अनुदेश
प्राप्त होते ह।
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मुग (पक्षी) कुत्ता (स्तनधारी)
युग्मज का िवकास शरीर के बाहर, अंडा दे ने के प ात सेने क प्र क्रया म मादा के शरीर के भीतर, जन्म तक
कहाँ
भूण को पोषण कै से मादा ारा अंडे म भरे खाद्य पदाथ से — जो अंडे से बाहर माँ का शरीर नरंतर खाद्य पदाथ एवं ऑक्सीजन दे ता
आने तक चलना चा हए रहता है
शरीर में क्या होना पयाप्त खाद्य पदाथ से भरे बड़े अंडे एवं कवच; उन्ह सेने का भीतर वह स्थान जहाँ ूण बढ़ सके तथा उसे पोषण
चािहए व्यवहार दे ने क व्यवस्था
मुग का शरीर बड़े, खाद्य पदाथ से भरे एवं कवचयुक्त अंडे बनाने के लए बना है; कुत्ते का नह — और इसका उल्टा भी सत्य है।
जनन केवल वही अनुदेश स्थानांत रत कर सकता है जो जनक के पास पहले से ह; वह एक पूरी शारी रक रचना दूसरी से नह बदल
सकता।
ऐसा क्य होता है: दोन एक ही समस्या के उत्तर ह — बढ़ते हुए ूण को पोषण कैसे मले? पक्षी इसे पहले ही एक
साथ हल कर लेता है, अंडे म भोजन भरकर। स्तनधारी इसे साथ-साथ हल करता है, माँ के शरीर ारा। कोई भी व ध
दूसरी से ‘अच्छ ’ नह है — दोन म जनक क लागत भन्न प्रकार क होती है।
प्र.4 य द कोई अंत रक्षयान मंगल ग्रह पर अपने साथ मृदा एवं जल ले जाए तो क्या वहाँ पौधे उगाए जा सकते ह?
खुले म नह । मृदा एवं जल आवश्यक तो ह परंतु सूची म केवल दो ही मद ह — और शेष अ धकांश शत मंगल पर पूरी नह होत ।
पौधे को चा हए मंगल ग्रह पर वतमान स्थ त
द व अवस्था में जल वायुम ंडल पथ्ृ वी की तुल ना में 100 ग नु ा कम सघन है एवं ग ह कही ं अिधक ठं डा है — डाला गया जल
जम जाएगा या वाष्प बनकर उड़ जाएगा
काबन डाइऑक्साइड एवं वायुद ाब काबन डाइऑ क्साइड तो है, परंत ु वायु अत्यंत िवरल है
सूय का पकाश उपल ब्ध है, यद्य िप पथ्ृ वी की तुल ना में दुबल
ऐसा तापमान िजसमें जड़ें न जमें औसत तापमान िहमांक से बहुत नीचे
पराबैगं नी िकरणों एवं उच्च ऊज कणों न ओजोन परत है, न पथ्ृ वी जैस ा सुर क्षात्मक चुंबकीय क्षेत्र
से सुर क्षा
कसी बंद, गरम एवं दाबयुक्त कक्ष के भीतर, हाँ। य द आप वायु, दाब, ऊष्मा एवं प्रकाश भी साथ ले जाएँ — अथात य द आप
पृथ्वी के वायुमंडल का एक छोटा-सा भाग साथ ले जाएँ — तो मंगल क प र स्थ तय म भी पौधे उगाए जा सकते ह।
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कक्षा 8 व ान अध्याय 13 हमारा आवास — पृथ्वी एक अ तीय जीवनदायी ग्रह
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यह क जए: अध्याय के अंत म दए गए ‘पृथ्वी जीवन रक्षक कट’ के प्रश्न म यही अ भकल्पना क समस्या है। उस
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बंद कक्ष म क्या-क्या होना चा हए, इसक सूची बना ली जए — दोन प्रश्न का उत्तर एक ही है।
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पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 211
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13.1 पृथ्वी एक अ तीय ग्रह क्य है?
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है gक वास्तव म पृथ्वी पर जीवन कहाँ वद्यमान है?
क्या आपने कभी यह वचार कया a
प्र.1
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समस्त जीवन सतह पर एक अत्यंत पतली परत म ही है — भू-पपट तथा उस पर स्थत जल एवं उसके ऊपर क वायु का नचला
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भाग।
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सबसे ऊँ चे पवत िशखर से सबसे गहरी गत तक ≈ 20 km
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पृथ्वी की ित्रज्या ≈ 6400 km
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अत: जीवन का संपूण क्षेत्र ित्रज्या का लगभग तीन -सौवाँ भाग है
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इसी लए पुस्तक इसक तुलना सेब से करती है — य द पृथ्वी सेब के आकार क होती तो भू-पपट सेब के छलके से अ धक मोट न
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होती ( चत्र 13.1)।
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a g भू-पपटी — समस्त जीवन यही ं
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केवल लगभग 5–70 km मोटी
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ऊपरी मैट
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िनचला मैट
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बाह्य क्रोड — िपघला m लोहा
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इसकी गित
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चुंबकीय क्षेत्र बनता है
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आंतिरक क्रोड
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पृथ्वी की ित्रज्या ≈ 6400 km (परते ं मापक्रम मे ं नही ं)
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पृथ्वी क परत। प्रत्येक वन, महासागर, नगर एवं व्य क्त — सब कुछ कनारे क उसी हरी वलय तक सी मत है।
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ऐसा क्य होता है: जीवन को द्रव जल, वायु एवं सूय का प्रकाश एक ही स्थान पर चा हए। ये तीन केवल सतह पर
मलते ह — कुछ कलोमीटर नीचे न प्रकाश है न मुक्त ऑक्सीजन; बहुत ऊपर वायु अत्यंत वरल हो जाती है। अत:
जीवन उसी संकरी प म समटा है जहाँ भूमंडल, जलमंडल एवं वायुमंडल मलते ह।
क्रयाकलाप 13.1 — आइए, पता लगाएँ — पृष्ठ 212
13.1 पृथ्वी एक अ तीय ग्रह क्य है?
क्रयाकलाप
प्र.1 यहाँ पृथ्वी क कुछ वशेषताएँ द गई ह जन्ह हम प्राय: सामान्य मान लेते ह परंतु वे हमारे लए अत्यंत रोचक एवं
महत्त्वपूण होती ह। ऐसी वशेषताओं को ता लका 13.1 म सूचीबद्ध क जए। इनम से कुछ वशेषताओं को
आपक सहायता के लए ता लका म अं कत कया गया है।
ता लका 13.1 पूण रूप म इस प्रकार बनेगी। पहली दो पं क्तयाँ पुस्तक क ह; शेष वे वशेषताएँ ह जन्ह आप जोड़ सकते ह, प्रत्येक
के साथ उसका कारण भी।
क्र.सं. पृथ्वी क रोचक वशेषता यह उल्लेखनीय क्य है
1. जस वायु म हम श्वास लेते ह वह उड़कर अंत रक्ष म गैस के कण स्वतंत्र रूप से गित करते है ं एवं गैस ों का आयतन िनिश्चत
नह जाती है। नही ं होता (अध् याय 7), िफर भी पथ्ृ वी का ग रु
ु त्व उ न्हे ं रोके रखने के िलए
पय प्त है।
2. हम गुरुत्व के कारण पृथ्वी पर खड़े रह पाते ह (अध्याय ग रु
ु त्व इतना है िक हम िटके रहे,ं और इतना कम है िक एक मु ी-भर
5), परंतु हमारा हृदय रक्त को ऊपर म स्तष्क तक पेशी उसके िवरुद्ध र क्त ऊपर धके ल सके ।
पहुँचा दे ता है।
3. जल एक ही ग्रह पर एक ही समय बफ, द्रव एवं वाष्प पथ्ृ वी का तापमान जल के गलनाक
ं एवं क्वथनाक
ं के ठीक बीच रहता है,
— तीन अवस्थाओं म मलता है। इसीिलए निदयाँ, बादल एवं िहमनद साथ-साथ रह पाते है।
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4. सूय का प्रकाश सीधे हम तक आता है, फर भी हम ओजोन परत हािनकारक पराबैगं नी भाग को अवशोिषत कर ले ती है एवं
जलते नह । चुंबकीय क्षेत्र उ च्च ऊज कणों को दू र कर दे ता है।
5. कसी ऋतु म दन-रात क लंबाई वष दर वष लगभग पथ्ृ वी का घूणन िस्थर है एवं क क्षा लगभग वृ ाकार , अत: पाप्त होने
समान रहती है। वाली ऊष्मा में अिधक उतार -चढ़ ाव नही ं आता।
6. पृथ्वी का अ धकांश जल लवणीय है, फर भी वषा का वाष्पन में लवण पीछे छू ट जाता है, अत: जल -चक्र निदयों, झीलों एवं
जल अलवणीय होता है। भूिमगत जल को बार -बार उपयोगी जल से भरता रहता है।
7. सूखे पत्ते एवं मृत जंतु सदा के लए एक त्रत नह होते अपघटक उ न्हे ं िवघिटत कर नाइटोजन एवं पोटैिशयम म ृद ा में वापस कर
रहते। दे ते है ं िजससे अगली पीढ़ ी के पौधे उग सकें ।
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स्वयं जाँ चए: इस ता लका के लए सबसे अच्छ प्र व ष्ट वह है जसका ध्यान तब तक न आए जब तक वह रुक न
जाए। प्रत्येक मद पर पू छए — ‘इसे स्थर कौन रखे हुए है?’ य द आप कारण बता सक तो वह पं क्त लखने योग्य
है।
क्रयाकलाप 13.2 — आइए, पता लगाएँ — पृष्ठ 213
13.2 हमारे सौरमंडल के ग्रह कैसे दखते ह?
क्रयाकलाप
प्र.1 सौर मंडल के ग्रह के तापमान एवं आकार के वषय म सूचनाएँ एक त्रत क जए। इसके साथ ही यह भी जाँ चए
क क्या सभी ग्रह पर वायुमंडल उप स्थत है? ये सूचनाएँ आप अपने वद्यालय के पुस्तकालय से, वश्वसनीय
वेबसाइट से एवं अपने अध्यापक से चचा करके एक त्रत कर सकते ह। ता लका 13.2 म उ ल्ल खत सूचनाओं के
आधार पर रक्त स्थान क पू त क जए।
पूण ता लका 13.2। जो मान आपक पुस्तक म पहले से छपे ह वे सामान्य अक्षर म ह; जो आपको भरने ह वे नारंगी रंग म ह।
क्र.सं. ग्रह औसत तापमान (°C) पृथ्वी क तुलना म त्रज्या क्या यहाँ वायुमंडल है?
1. बुध 170 0.38 नह
2. शुक्र 450 0.95 हाँ
3. पृथ्वी 15 1 हाँ
4. मंग ल –65 0.53 हाँ (पथ्ृ वी से लगभग 100 ग नु ा कम सघन)
5. बहृ स्पित –110 11 हाँ
6. शिन –140 9 हाँ
7. यूरे नस –195 4 हाँ
8. नेपच्यून –200 4 हाँ
पूण ता लका क्या दशाती है। इसे आठ पं क्तय के रूप म नह , तीन प्र तरूप के रूप म प ढ़ए —
सूय से दूर जाने पर तापमान घटता है — 170, 15, –65, –110, –140, –195, –200 — क्य क ग्रह को ऊजा सूय से
मलती है और दूरी बढ़ने पर वही ऊजा बड़े क्षेत्र म फैल जाती है।
इसका एक अपवाद है — शुक्र, 450 °C पर। वह सूय के सबसे नकट नह है, फर भी सबसे गरम है। उसका सघन काबन
डाइऑक्साइड वायुमंडल ऊष्मा को रोक लेता है।
आकार ग्रह को दो प रवार म बाँट दे ता है। 0.38 से 1 तक क त्रज्या वाले छोटे च ानी ग्रह ह (बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल); 4
से 11 तक क त्रज्या वाले बड़े गैसीय ग्रह ह (बृहस्प त, श न, यूरेनस, नेपच्यून)।
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संकेत: भन्न- भन्न ोत औसत तापमान थोड़े भन्न बताते ह, वशेषकर बुध का, जसके दन एवं रात वाले भाग म
बहुत अंतर है। अपने मान के साथ ोत भी ल खए — वै ा नक इसी प्रकार आँकड़े प्रस्तुत करते ह।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 213
13.2 हमारे सौरमंडल के ग्रह कैसे दखते ह?
प्र.1 सूय से दूरी के सापेक्ष दूसरा ग्रह शुक्र है जसका औसत तापमान सवा धक है एवं यह सबसे गरम ग्रह भी है। ऐसा
क्य है?
इसका कारण उसका वायुमंडल है, दूरी नह । शुक्र का वायुमंडल लगभग पूणत: काबन डाइऑक्साइड से बना है और काबन
डाइऑक्साइड ऊष्मा को बाहर नह जाने दे ती।
ऊजा को तीन चरण म दे खए —
1. सूय का प्रकाश वायुमंडल से होकर आता है एवं ग्रह क सतह को गरम करता है।
2. गरम हुई सतह स्वयं व करण उत्स जत करती है, जो अंत रक्ष क ओर जाता है।
3. सघन वायुमंडल क काबन डाइऑक्साइड उस बाहर जाते व करण को अवशो षत कर लेती है, उसे नकलने नह दे ती। ऊष्मा
भीतर ही रह जाती है।
इसे ह रतगृह प्रभाव कहते ह। शुक्र पर यह इतना प्रबल है क वहाँ का तापमान लगभग 450 °C हो जाता है — बुध से भी अ धक,
जब क बुध सूय के अ धक नकट है और उसे अ धक प्रकाश मलता है।
सूय
काबन डाइऑक्साइड की परत
सतह ारा उत्सिजत
िविकरण अवशोिषत होकर
प ुन: नीचे लौट आता है
गरम हुई सतह
ह रतगृह प्रभाव। सूय का प्रकाश सरलता से भीतर आ जाता है; सतह ारा उत्स जत ऊष्मा सरलता से बाहर नह जा पाती।
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ऐसा क्य होता है: कसी ग्रह का तापमान इस संतुलन से तय होता है क उसे कतनी ऊजा मलती है और कतनी
वह खोता है। दूरी तय करती है क कतनी आती है; वायुमंडल तय करता है क कतनी बाहर जा सकती है। शुक्र को
बुध से कम मलती है परंतु वह उससे कह कम खोता है, अत: उसका तापमान बहुत ऊँचा स्थर हो जाता है।
क्या आप जानते ह? पृथ्वी पर यही प्रभाव मंद है और हम उस पर नभर ह — इसके बना पृथ्वी अपनी ऊष्मा
अंत रक्ष म खोकर जल को द्रव रखने के लए बहुत ठं डी हो जाती। आज समस्या ह रतगृह प्रभाव नह , अ पतु
जीवाश्म ईंधन जलाकर जोड़ी जा रही अ त रक्त काबन डाइऑक्साइड है।
एक सोपान ऊपर — पृष्ठ 215
13.3.1 पृथ्वी क स्थ त
एक सोपान ऊपर
प्र.1 क्या कभी मंगल ग्रह पर जीवन संभव था?
अभी तक वहाँ जीवन होने का कोई प्रमाण नह मला है — परंतु प्रश्न अभी खुला है, और यही ईमानदार उत्तर है।
हम वास्तव म इतना ात है —
मंगल सूय के वासयोग्य क्षेत्र के सीमांत पर स्थत है, अथात ठ क उस सीमा पर जहाँ जल द्रव रह सकता है।
अनेक अंत रक्ष यान वहाँ भेजे जा चुके ह और रोवस उतारकर सतह का अध्ययन कया गया है। कसी को जीवन का प्रमाण नह
मला।
वै ा नक का मानना है क अतीत म मंगल पर जल द्रव अवस्था म रहा होगा — संभवत: कुछ झील भी — और साधारण
जीवन के लए उपयुक्त प र स्थ तयाँ रही ह गी।
ऐसा क्य होता है: मंगल का वतमान वायुमंडल पृथ्वी से लगभग 100 गुना कम सघन है, अत: सतह का जल द्रव
नह रह सकता — वह जम जाता है या वाष्प बन जाता है। जन प र स्थ तय म वहाँ कभी झील रही ह गी, वे अब
नह ह। सूखी झील का तल अतीत म जल होने का प्रमाण है, जीवन होने का नह ; जीवन के लए भन्न प्रकार का
साक्ष्य चा हए।
संकेत: ध्यान द जए क अध्याय इस बॉक्स को कैसे समाप्त करता है — ‘ व ान के पास कभी भी कसी प्रश्न का
अं तम उत्तर नह होता।’ ‘हम अभी नह जानते, और इससे यह प्रश्न सुलझेगा’ — यह भी एक वै ा नक उत्तर है,
उत्तर न दे पाना नह ।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 215
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13.3.2 पृथ्वी का आकार
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क्या तापमान अथवा सूय से दूरी ही एकमात्र कारण है जो पृथ्वी को रहने योग्य बनाता है?
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नह । सूय से दूरी सबसे महत्त्वपूण कारण अवश्य है, क्य क उसी से जल द्रव अवस्था म रह पाता है — परंतु उसके साथ कम-से-
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कम चार अन्य शत भी पूरी होनी चा हए।
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कारक वह क्या करता है
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सूय से दू र ी पृथ्वी को वासयोग्य क्षेत्र म रखती है, जससे जल न पूरा वा ष्पत होता है न पूरा जमता है
वष भर प्रकाश एवं ऊष्मा लगभग समान बनाए रखती है, अत: अ धकांश स्थान पर अत्यem
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लगभग वृ ाकार धक गरमी या ठं ड नह होती
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श्वसन के लए ऑक्सीजन, पराबगनी करण को रोकने वाली ओजोन परत, तथा मंद ह रतगृह प्रभाव जो ग्रह को गरम
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वायुम ंडल
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चुंबकीय क्षेत्र कॉ स्मक करण एवं सौर पवन को दूर धकेलकर वायुमंडल एवं ओजोन परत क रक्षा करता है
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ऐसा क्य होता है: ये अलग-अलग लाभ क सूची नह है — ये एक-दूसरे पर नभर ह। उपयुक्त आकार से
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वायुमंडल टकता है; वायुमंडल से ह रतगृह प्रभाव एवं ओजोन परत मलते ह; चुंबक य क्षेत्रmही वायुमंडल को नष्ट होने
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से बचाता है। इनम से एक भी हटा द जए तो शेष भी क्षीण होने लगते ह।
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क्या होता य द पृथ्वी का आकार बहुत छोटा या बहुत बड़ा होता?
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दोन ही स्थ तय म वह संतुलन समाप्त हो जाता जस पर हम नभर ह — छोट पृथ्वी अपनी वायु खो दे ती, बड़ी पृथ्वी अपने ऊपर
के जीवन को दबा दे ती।
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य द पृथ्वी बहुत छोट होती (औसत घनत्व समान रहते हुए) —
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m वायुमंडल के बना न सतह को गरम रखने वाला ह रतगृह प्रभाव होता, न श्वास लेने को ऑक्सीजन, न पराबगनी करण को
इसका गुरुत्वाकषण वायुमंडल क गैस को रोकने के लए बहुत दुबल होता एवं वे अंत रक्ष म पलायन कर जात ।
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रोकने वाली ओजोन परत।
वायुदाब न होने से सतह पर द्रव जल टक ही नह पाता।
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यह केवल कल्पना नह है — यह हम दखाई दे ता है। मंगल, जो पृथ्वी से छोटा है, का वायुमंडल 100 गुना कम सघन है; बुध, जो
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य द पृथ्वी बहुत बड़ी होती तो गुaरुg
और भी छोटा है, पर वायुमंडल है ही नह ।
त्वाकषण बल कह अ धक प्रबल होता। वह हम इतनी प्रबलता से नीचे ख चता क हमारी
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अ स्थयाँ तक दबकर टू ट सकती थ , और चलना, खड़े रहना तथा रक्त को ऊपर पहुँचाना सब कह अ धक क ठन हो जाता।
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ऐसा क्य होता है: गैस के कण स्वतंत्र रूप से ग त करते ह और सदा बाहर नकलने क ओर होते ह। कोई ग्रह
अपना वायुमंडल रोक पाएगा या नह , यह इन कण क चाल एवं ग्रह के गुरुत्व के बीच क रस्साकशी है — और
गुरुत्व ग्रह के द्रव्यमान पर नभर है। पृथ्वी का आकार यह रस्साकशी जीत लेता है, पर इतना अ धक नह क जीवन
ही दब जाए।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 217
13.3.3 पृथ्वी का चुंबक य क्षेत्र
प्र.1 क्या पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने म उसके चुंबक य क्षेत्र क कोई भू मका है?
हाँ — यह पूरे ग्रह के चार ओर एक सुरक्षा कवच क तरह काय करता है।
तक क ंखला इस प्रकार है —
1. ऐसा माना जाता है क पृथ्वी के क्रोड म पघले हुए लोहे क ग त ही पृथ्वी के चुंबक य क्षेत्र का कारण है; इसी लए पृथ्वी एक
वशाल चुंबक के समान व्यवहार करती है और स्वतंत्र रूप से लटका चुंबक सदै व एक न त दशा म स्थर हो जाता है।
2. पृथ्वी पर नरंतर अंत रक्ष से आने वाले सूक्ष्म एवं उच्च ऊजा वाले कण टकराते रहते ह — दूर ब्र ांड से आने वाली कॉ स्मक
करण तथा सूय से आने वाली सौर पवन।
3. ये कण वायुमंडल को क्ष त पहुँचा सकते ह एवं ओजोन परत का क्षय कर सकते ह, जससे अ धक हा नकारक पराबगनी करण
भीतर आ जाएँगी।
4. चुंबक य क्षेत्र अ धकांश कण को पृथ्वी से दूर धकेल दे ता है, जससे वायुमंडल और इस प्रकार जीवन सुर क्षत रहता है।
चुंबकीय क्षेत्र
सौर पवन एवं
पृथ्वी वायुमंडल एवं
ओजोन परत
सुर िक्षत रहते है ं
कॉिस्मक िकरणें
सूय से एवं दूर ब्र ांड से आने वाले उच्च ऊजा कण वायुमंडल तक पहुँचने से पहले ही पृथ्वी के चुंबक य क्षेत्र ारा मोड़ दए जाते ह।
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कक्षा 8 व ान अध्याय 13 हमारा आवास — पृथ्वी एक अ तीय जीवनदायी ग्रह AglaSem · NCERT Solutions
ऐसा क्य होता है: सौर पवन एवं कॉ स्मक करण के कण आवे शत होते ह, और चुंबक य क्षेत्र ग तशील आवे शत
कण का पथ बदल दे ता है। अत: क्षेत्र को उन्ह रोकना नह पड़ता — केवल ग्रह के चार ओर से मोड़ दे ना पयाप्त है।
प्र.2 परंतु पृथ्वी पर जीवन कैसे सतत और संचा लत है?
कसी एक कारण से नह । जीवन चार तंत्र के नरंतर आदान-प्रदान से बना रहता है — वायुमंडल, जलमंडल, भूमंडल एवं जैवमंडल।
वाय ुमंडल
वायु
जैवमंडल जलमंडल
समस्त जीव जल
भूमंडल
च ान एवं मदृ ा
पृथ्वी के चार तंत्र, जनम से प्रत्येक शेष को पो षत करता है। कसी एक पर पड़ा दबाव इस पूरे चक्र म घूम जाता है।
वायु, जल एवं सूय का प्रकाश। वायुमंडल म वह ऑक्सीजन है जसका उपयोग मानव, जीव-जंतु एवं पौधे श्वसन के लए करते ह।
सूय के प्रकाश क उप स्थ त म पौधे वायुमंडल से काबन डाइऑक्साइड एवं मृदा से जल लेकर प्रकाश सं ेषण ारा भोजन बनाते ह
और ऑक्सीजन उत्स जत करते ह, जो श्वसन के लए आवश्यक है। ह रतगृह प्रभाव तापमान इतना बनाए रखता है क जल द्रव
अवस्था म रह सके; वायु म उप स्थत जलवाष्प से बादल बनते ह, वषा एवं बफ गरती है और न दयाँ, झील व भू मगत जल पुन: भर
जाते ह।
मृदा, च ान एवं ख नज। भूमंडल नाइ ोजन एवं पोटै शयम से समृद्ध मृदा दे ता है — ये पोषक तत्व च ान के मंद अपक्षय तथा
पौध व जंतुओं के अवशेष से आते ह — साथ ही लवण, कोयला, तेल एवं आयरन व कॉपर जैसी धातुएँ भी।
जीव। जैवमंडल म पौधे भोजन बनाते ह, जंतु पौध या अन्य जंतुओं को खाते ह, तथा अपघटक मृत जीव को वघ टत करके पोषक
तत्व मृदा म वापस कर दे ते ह।
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ऐसा क्य होता है: इनम से प्रत्येक एक चक्र है, एकतरफा आपू त नह । पौध से मुक्त ऑक्सीजन जंतु लेते ह,
जनक काबन डाइऑक्साइड पुन: पौध तक पहुँचती है। महासागर से उठा जल वषा बनकर लौट आता है। मृदा से
लए पोषक तत्व अपघटक लौटा दे ते ह। पदाथ चक्र म घूमते ह, समाप्त नह होते — इसी लए एक सी मत आकार के
ग्रह पर जीवन अ न त काल तक चल सकता है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 219
13.4.4 संतुलन का महत्त्व
प्र.1 क्या आप को कभी आश्चय हुआ है क पृथ्वी पर इतनी वस्तुए ँ कस प्रकार संतुलन बनाकर रखती ह?
संतुलन इस लए बना रहता है क्य क ये वस्तुएँ एक-दूसरे से स्वतंत्र नह ह। भू म, वायु, जल एवं जीव परस्पर सहायक ह एवं एक
दूसरे को प्रभा वत करते ह, अत: कसी एक स्थान पर पड़ा दबाव शेष तंत्र ारा संभाला जाता है।
अध्याय का अपना उदाहरण लेकर उसक ंखला दे खए —
जंगल की कटाई
→ जलवाष्प छोड़ ने एवं काबन डाइऑक्साइड लेने वाले वृक्ष कम
→ वष में कमी एवं अिधक ऊष्मा का रुकना
→ नग्न मृद ा बह जाती है, वायु की गुणव ा िगरती है
→ वहाँ रहने वाले जंत ओ
ु ं का भोजन एवं आश्रय समाप्त
→ के वल वृक्ष नहीं, पूरा स्थानीय तं त्र बदल जाता है
यही बात उल्ट दशा म भी सत्य है, और इसी लए संतुलन टक पाता है — बढ़ता हुआ वन वायु को ठं डा रखता है, मृदा को थामता
है, भू मगत जल भरता है एवं अ धक प्रजा तय को आश्रय दे ता है, और इनम से प्रत्येक स्वयं वन को और सुदृढ़ बनाता है।
ऐसा क्य होता है: पृथ्वी एक वशाल जीवंत प्रणाली क भाँ त काय करती है जसम एक भाग का नगत दूसरे भाग
का नवेश होता है। कोई भी वस्तु अकेले संर क्षत करने से नह बचती — वह तभी बचती है जब उसके चार ओर के
भाग अपना काय करते रह। इसी लए अध्याय कहता है क पृथ्वी पर जीवन कसी एक कारण से नह , अ पतु सभी
तंत्र के मलकर संतुलन बनाए रखने से टका है।
संकेत: यही कारण है क स्वच्छ वायु, जल, मृदा एवं जीवन के सभी रूप को संर क्षत रखना अध्याय म केवल
‘महत्त्वपूण’ नह , ‘अ नवाय’ बताया गया है। इन चार म से एक को संभालकर शेष तीन को छोड़ दे ना संभव नह है।
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पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 220
13.5 जीवन को लुप्त होने से कौन बचाता है?
प्र.1 यह वचारणीय वषय है क उपयुक्त प्र क्रया कस प्रकार समानता एवं व भन्नता को दशाती है। समानता (एक
जंतु अपने समान संत त को जन्म दे ता है, जैसे— एक गाय अपनी प्रजा त क ब छया को ही जन्म दे ती है)
व भन्नता (कुछ जंतुओं क प्रजा तय के रंग एवं कद म अंतर के कारण उनके गुण म भी भन्नता होती है)?
क्य क जनन अनुदेश का पूरा सेट स्थानांत रत करता है — परंतु सदै व एक ही पूरा सेट नह ।
समानता कहाँ से आती है। जीन शरीर बनाने क अनुदेश पु स्तका ह, और प्रत्येक संत त को अपने प्रकार का पूरा सेट मलता है।
इसी लए ब छया बड़ी होकर गाय बनती है और बल्ली का बच्चा बल्ली — रक्त, अ स्थ, माँसपेशी एवं त्वचा बनाने के सभी अनुदेश
वहाँ ह, और वे गाय के अनुदेश ह।
व भन्नता कहाँ से आती है। दो कारण से —
ल गक जनन म प्रत्येक युग्मक म जनक के अनुदेश का केवल आधा भाग होता है, और हर बार वह आधा भाग भन्न होता है।
जब शुक्राणु एवं अंडाणु मलते ह तो वह वशेष मश्रण पहले कभी नह बना होता — इसी लए एक बच्चे को माँ जैसी नाक एवं
दूसरे को पता जैसे नेत्र मल सकते ह, और एक ही प रवार के भाई-बहन भन्न दख सकते ह।
स्थानांत रत होते समय अनुदेश म छोटे -छोटे प रवतन भी आ सकते ह।
ऐसा क्य होता है: समानता एवं व भन्नता दो वरोधी प्र क्रयाएँ नह ह; ये एक ही प्र क्रया के दो स्तर ह। प्रजा त के
स्तर पर पु स्तका पूरी क पूरी जाती है — इसी लए गाय से गाय ही जन्म लेती है। व्य क्त के स्तर पर वही पु स्तका
फटकर बाँट जाती है — इसी लए कोई दो गाएँ बलकुल एक जैसी नह होत । जीवन को दोन चा हए: समानता के
बना प्रजा त बनी नह रहती, व भन्नता के बना वह कभी अनुकूलन नह कर पाती।
क्या आप जानते ह? इसी से जनन के दो प्रकार भी समझ आ जाते ह। अल गक जनन म केवल एक जनक होता
है, अत: फटना होता ही नह और संत त लगभग सवसमान होती है। ल गक जनन म दो जनक होते ह, अत:
व भन्नता स्वत: बनी रहती है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 221–222
13.5.1 अल गक जनन
प्र.1 बाँस और गन्ने कस प्रकार नए पौधे बनाते ह? मने कभी उनके बीज नह दे खे।
ये का यक प्रवधन ारा बढ़ते ह — जनक पौधे का एक भाग ही नया पौधा बन जाता है, अत: बीज क आवश्यकता ही नह पड़ती।
गन्ना तने के छोटे टु कड़ से उगाया जाता है। प्रत्येक टु कड़े म एक पवसं ध होती है जस पर कली (‘आँख’) होती है। नम मृदा म
रखने पर कली से प्ररोह ऊपर नकलता है एवं पवसं ध से जड़ नीचे जाती ह।
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बाँस मुख्यत: भू मगत तन (प्रकंद) ारा फैलता है जो कनारे क ओर बढ़कर नए तने ऊपर भेजते ह; पवसं ध वाला कटा हुआ
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तना भी जड़ बना सकता है।
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ऐसा क्य होता है: तने क पवसं ध केवल एक गाँठ नह है — उसम वभाजनशील जी वत ऊतक क कली तथा
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सं lचत भोजन होता है। नमी, वायु एवं उपयुक्त ताप मलते ही वह ऊतक नीचे जड़ एवं ऊपर प्ररोह बना लेता है, और
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aपौधे को स्वतंत्र होने के लए इतना ही चा हए। यह अल गक जनन है — एकल जनक, और संत त को शका के भीतर
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के अनुदेश क दृ ष्ट से पूणत: जनक के समान।
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क्या आप जानते ह? चूँ क खेत का प्रत्येकgगन्ना एक ही जनक से आया है, सभी सवसमान होते ह — इसी लए पूरी
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फसल एक साथ पकती है, और इसी लए एक ही रोग पूरे खेत म फैल भी सकता है।
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प्र.2 m .cआप अपने आस-पास उपयुक्त व ध ारा उगने वाले पौध का अवलोकनagकर एक सूची बना सकते ह?
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क्या
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रसोई, बगीचे एवं खेत के अनेक पौधे बीज से नह , भाग से उगाए जाते ह। दे खए क कौन-सा भाग रोपा जाता है — उसी से पता
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चलता है क का यक प्रवधन कस प्रकार का है।
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पौधा रोपा जाने वाला भाग कहाँ दे ख सकते ह
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आलू कं द , िजस पर ‘आँखें’ (किलयाँ) होती है ं
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रसोई म अंकु रत आलू
m a e घरेलू बगीचा
sरसोई,
.co पकं द (भूिमगत तना)
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अदरक, हल्दी
a s eप्याज,
agl लहसुन शल्ककं द रसोई, बाज़ार
पवसंिध युक्त तने की कतन गन्ने के खेत
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ग ा
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मनी प्लांट, ग ल
ु ाब, ग ड
ु ़ हल, तने की कतन वद्यालय का बगीचा, बालकनी के
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बोगनवेिलया गमले
के ला आधार से िनकलने वाला अंत:भूस्तारी (सकर ) केले का बगीचा, घर का पछवाड़ा
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se खेत, फूल क क्यारी
बायोिफलम (पत्थरच ा) प ी — िकनारे के खाँचों पर किलयाँ बनती है ं बाड़, गमले
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शकरकं द, डहेिलया जड़
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agl घास, पुद ीना भूस्तारी — भूिम पर रे ंग ता तना जो पवसंिधयों से जड़ें लॉन, घरेलू बगीचा
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बनाता है
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स्वयं जाँ चए: यह ता लका लेकर वद्यालय के बगीचे म घू मए। प्रत्येक पौधे के लए पू छए — ‘य द म इसका एक
टु कड़ा काटकर रोपूँ तो क्या यह उगेगा?’ फर एक पर करके भी दे खए — काँच के गलास म रखी मनी प्लांट क
कतन लगभग एक सप्ताह म जड़ दखा दे ती है।
प्र.3 आप अनुमान लगा सकते ह क य द माता- पता दोन अपने आनुवं शक पदाथ नए जीव को बनाने म स्थानांत रत
करते ह तो क्या इस नए जीव म आनुवं शक अनुदेश दोगुने नह हो जाएँगे? इसके साथ ही क्या ये आगे आने वाली
पीढ़ म भी दोगुने नह होते जाएँगे?
नह — और इसका कारण यह है क प्रत्येक जनक अपना पूरा सेट स्थानांत रत करता ही नह । वह व शष्ट जनन को शकाएँ बनाता
है जन्ह युग्मक कहते ह, और युग्मक म जनक के आनुवं शक पदाथ का केवल आधा भाग होता है।
नर युग् मक (आधा सेट ) + मादा युग् मक (आधा सेट )
= नई कोिशका िजसमें एक पूरा सेट
पत्येक जनक से आधा-आधा — दोगुन ा नही ं
िपता
पूरा सेट शुक्राण ु
आधा सेट
य ुग्मज
एक पूरा सेट
अंडाण ु
माँ आधा सेट
पूरा सेट
प्रत्येक जनक म आधा होना, फर मलना — इसी से आनुवं शक पदाथ क मात्रा पीढ़ दर पीढ़ समान बनी रहती है।
ऐसा क्य होता है: य द युग्मक म पूरा सेट होता तो मात्रा वास्तव म प्रत्येक पीढ़ म दोगुनी होती जाती — 1, 2, 4,
8 — जो असंभव है। मलने से पहले आधा होना ही कुल मात्रा को स्थर रखता है। और चूँ क हर बार भन्न आधा
भाग जाता है, वही चरण मात्रा को स्थर रखने के साथ-साथ व भन्नता भी उत्पन्न करता है।
क्रयाकलाप 13.3 — आइए, पता लगाएँ — पृष्ठ 221
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13.5.1 अल गक जनन
क्रयाकलाप
प्र.1 पौध के कुछ भाग को ली जए, जैसे— मनी प्लांट के तने क कतन, आलू क आँख या अदरक का एक टु कड़ा
आ द ( चत्र 13.11, ख)। प्रत्येक प्र तदश को मृदा म भन्न- भन्न अ धक गहराई के स्तर तक रो पए। मनी प्लांट क
कतन को काँच के बतन म रखकर आप इसक वृ द्ध को सरलता से अवलो कत कर सकते ह। यह सु न श्चत
क जए क उन्ह वृ द्ध के लए आवश्यक जल, वायु एवं सूय का प्रकाश प्राप्त होता रहे। इन्ह प्र त दन ध्यानपूवक
दे खए एवं अं कत क जए क इसक जड़, तना एवं प त्तयाँ आने म कतने दन लगते ह। इसके साथ यह भी
अवलोकन क जए क पहला नया पत्ता कब दखाई दया।
(क ) अदरक (ख) आलू
चत्र 13.11, पृष्ठ 221 — का यक प्रवधन: (क) अदरक, (ख) आलू। पाठ्यपुस्तक के छाया चत्र का पुनः चत्रण
(स्केच)।
कैसे लगाएँ। मनी प्लांट क ऐसी कतन ली जए जसम कम-से-कम एक पवसं ध हो (वह हल्क उभरी गाँठ जहाँ पत्ती तने से जुड़ती
है), ऐसा आलू ली जए जसक ‘आँख’ अंकु रत होने लगी ह , तथा अदरक का ऐसा टु कड़ा ली जए जस पर कली दखाई दे । मनी
प्लांट क कतन को काँच के बतन म इस प्रकार र खए क पवसं ध जल म डू बी रहे; शेष दोन को नम मृदा म हल्का-सा ढककर
रो पए। तीन को ऐसे स्थान पर र खए जहाँ वायु एवं छनी हुई धूप मले, तथा मृदा को नम र खए, जलमग्न नह ।
आप क्या अवलो कत करगे। अपनी त थयाँ स्वयं अं कत क जए — यहाँ वे परास द गई ह जो सामान्य कक्ष प र स्थ तय म
मलती ह।
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पौधे का भाग जड़ आने म प्ररोह आने म पहला नया पत्ता
मनी प्लांट, जल में तने की कतन लगभग 5–10 िदन पहले से उपिस्थत लगभग 2–3 स प्ताह
आलू, अंकु िरत ‘आँखें’ लगभग 7–14 िदन लगभग 7–10 िदन लगभग 2–3 स प्ताह
अदरक, पकं द का टुक ड़ा लगभग 10–20 िदन लगभग 2–3 स प्ताह लगभग 3–4 स प्ताह
ऐसा क्य होता है: इनम से कोई भी बीज नह है। प्रत्येक टु कड़े म पहले से एक कली है — वभाजनशील
को शकाओं का छोटा समूह — तथा सं चत भोजन। जल, वायु एवं ताप मलते ही ये को शकाएँ पहले जड़ बनाती ह,
क्य क प त्तयाँ बनाने से पहले पौधे को अपनी जल-आपू त सु न त करनी होती है। उसके प ात ही प्ररोह फैलता है
एवं पहला पत्ता खुलता है, जसके बाद पौधा प्रकाश सं ेषण से अपना भोजन बनाने लगता है।
स्वयं जाँ चए: मनी प्लांट क एक कतन पवसं ध स हत एवं एक बना पवसं ध के र खए। जड़ केवल पवसं ध वाली
म आएँगी। यही एक तुलना दखा दे ती है क वृ द्ध करने वाला ऊतक पवसं ध म है, तने के कसी भी टु कड़े म नह ।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 223
जंतुओं म ल गक जनन
प्र.1 प्रत्यक्ष रूप से ब े को जन्म दे ने एवं अंडे दे ने के लाभ एवं हा न क्या ह?
दोन एक ही समस्या के उत्तर ह — वक सत होते ूण को पोषण एवं सुरक्षा कैसे द जाए। दोन म सुरक्षा क क मत भन्न प्रकार से
चुकाई जाती है।
ब े को जन्म दे ना अंडे दे ना
लाभ ूण माँ के भीतर वक सत होता है, अत: मौसम, परभ क्षय एवं मादा को भार नह उठाना पड़ता, अत: वह सामान्य रूप से
सूखने से सुर क्षत रहता है। खाद्य पदाथ एवं ऑक्सीजन नरंतर चल- फर, खा एवं बच सकती है। एक बार म अनेक अंडे दए
मलते रहते ह, अत: शशु अच्छ तरह वक सत होकर जन्म लेता जा सकते ह, और जल म तो सह एक साथ।
है।
हािन एक बार म बहुत कम संत त। माँ को भार एवं लागत उठानी पड़ती पूरे वकास का भोजन पहले ही अंडे म भरना पड़ता है। अंडा
है तथा लंबे समय तक बँधे रहना पड़ता है। माँ क मृत्यु होने पर दे ने के प ात वह असुर क्षत रहता है — अनेक अंडे खा लए
संत त भी नह बचती। या नष्ट हो जाते ह, अत: अ धकांश से बच्चे नह नकलते।
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ऐसा क्य होता है: यहाँ एक अदला-बदली है — भीतर वकास म बहुत कम संत त पर बहुत अ धक व्यय होता है,
जब क अंडे दे ने म बहुत अ धक संत त पर बहुत कम। दोन सफल होती ह और यह प रवेश तय करता है क कौन-
सी। जल म, जहाँ अंडे एवं युग्मक सीधे छोड़े जा सकते ह, सह अंडे दे ना उपयुक्त है; स्थल पर, जहाँ ूण सूख
जाएगा, उसे भीतर रखना या कवच म बंद करना अ धक सुर क्षत है।
प्र.2 क्या आपको लगता है क कुत्ते, गाय या मनुष्य प क्षय क भाँ त अंडे दे सकते ह? य द हाँ तो क्य अथवा क्य
नह ?
नह , वे ऐसा नह कर सकते। अंडे दे ना कोई वकल्प नह है जसे जीव चुनता हो; यह उसके संपूण शरीर क रचना है, और वह
रचना उसे मले अनुदेश से तय होती है।
तीन कारण, गहराई के क्रम म —
शरीर म उसक व्यवस्था ही नह है। मुग का शरीर ऐसा बड़ा अंडा बनाता है जसम ूण के संपूण वकास के लए पयाप्त
खाद्य पदाथ भरा हो, और फर उस पर कवच चढ़ाता है। कुत्ता, गाय या मनुष्य अत्यंत छोटा अंडाणु बनाते ह जसम लगभग कोई
सं चत भोजन नह होता, क्य क भोजन बाद म माँ के शरीर से मलना है।
पोषण क प्र क्रया वपरीत है। स्तनधा रय म युग्मज का ूण म वकास मादा के शरीर के भीतर होता है एवं माँ का शरीर जन्म
तक खाद्य पदाथ एवं ऑक्सीजन दे ता रहता है। बाहर दए गए अंडे को ऐसी कोई आपू त नह मलती।
अनुदेश बदले नह जा सकते। ब छया इस लए गाय बनती है क्य क उसे गाय के पूरे अनुदेश मले ह। जनन छोटे -छोटे
प रवतन स्थानांत रत कर सकता है और अनेक पी ढ़य म वे जुड़ भी सकते ह — परंतु कसी एक पीढ़ को पूरी नई शारी रक
रचना नह द जा सकती।
ऐसा क्य होता है: जनन जनक के पास पहले से उप स्थत अनुदेश क प्र त ल प बनाता एवं उन्ह फटता है। वह
माँग पर नए अनुदेश नह गढ़ता। जनन क पूरी व ध बदलने के लए बहुत बड़ी संख्या म सम न्वत प रवतन चा हए,
और वे य द होते भी ह तो अत्यंत लंबे समय म।
ज ासा बनाए रख — पृष्ठ 226–227
अध्याय के अंत के प्रश्न
ज ासा बनाए रख
प्र.1 ऐसा कौन-सा प्रमुख कारण है जससे वतमान म मंगल ग्रह पर पृथ्वी के समान जीवन संभव नह है? (i) इस पर
अनेक ज्वालामुखी ह। (ii) यह सूय के अ धक नकट है। (iii) इस पर सघन वायुमंडल और द्रव जल का अभाव है।
(iv) इसका चुंबक य क्षेत्र अत्यंत प्रबल है।
(iii) इस पर सघन वायुमंडल और द्रव जल का अभाव है।
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ऐसा क्य होता है: मंगल का वायुमंडल पृथ्वी क तुलना म लगभग 100 गुना कम सघन है। इतनी वरल वायु म न
mपराबगनी
तो पयाप्त दाब है और न पयाप्त ह रतगृह ऊष्मा क सतह पर जल द्रव अवस्था म रह सके, और नeही
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co वाली ओजोन परत है। हमारी अब तक क जानकारी के अनुसार जीवनagकेl वकास के लए द्रव
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em है — अत: उसका अभाव ही नणायक अंतर है।
करण को रोकने
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जल आवश्यक
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शेष वकल्प क्य गलत ह:
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(i) ज्वालामुखी कसी ग्रह को नजन नह बनाते — पृथ्वी पर भी अनेक ज्वालामुखी ह।
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(ii) मंगल सूय से पृथ्वी क तुलना म दूर है, नकट नह ; वह वासयोग्य क्षेत्र के बाहरी सीमांत पर है।
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(iv) प्रबल चुंबक य क्षेत्र सुरक्षा है, समस्या नह — मंगल क क ठनाई तो यही है क उसके पास पृथ्वी जैसी वह सुरक्षा नह है।
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.cृ तयाँ, जैसे—पहाड़, घा टयाँ और मरुस्थल। (iii) मानसून के समय मौसमagम प रवतन। (iv) तालाब म
प्र.2 इनम से कौन-सा भू व वधता का उदाहरण है? (i) जंगल म व वध प क्षय क चहचहाहट। (ii) व भन्न भू-
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se व भन्न प्रकार क मछ लयाँ।
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(ii) व भन्न भू-आकृ तयाँ, जैसे—पहाड़, घा टयाँ और.मरुस्थल।
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ऐसा क्य होता है: भू व वधता पृथ्वी के नज व भाग क व वधता है — भू-आकृ तयाँ, च ान एवं मृदा — तथा
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उन्ह आकार दे ने वाले प्रक्रम। पहाड़, घा टयाँ एवं मरुस्थल ठ क यही ह।
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omवायुमंडल से संबं धत है, ठोस पृथ्वी से नह । g l as
करता है.,cजो
शेष वकल्प क्य गलत ह: (i) एवं (iv) जीव क व वधता बताते ह, जो जैव व वधता है। (iii) मौसम के प रवतन क बात
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agl संकेत: भू व वधता इस लए महत्त्वपूण है क्य क इससे अ तीय पयावास का सजन होता है। मरुस्थल, नद घाट
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एवं पवतीय ढाल पर पूणत: भन्न जीव समुदाय पनपते ह — अथात नीचे क च ान क व वधता ऊपर के जीवन क
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व वधता बन जाती है।
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य द पृथ्वी अत्य धक छोट होती और उसका घनत्व समान होता तो उसके वायुमंडल का क्या होता? (i) यह
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प्र.3
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अ धक सघन और गरम हो जाता। (ii) दुबल गुरुत्व के कारण यह अंत रक्ष म चला जाता। (iii) यह जम जाता।
c o m(iv) इससे प्रबल पवन चलने लगती। g l
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agl उत्तर
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(ii) दुबल गुरुत्व के कारण यह अंत रक्ष म चला जाता।
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कक्षा 8 व ान अध्याय 13 हमारा आवास — पृथ्वी एक अ तीय जीवनदायी ग्रह AglaSem · NCERT Solutions
ऐसा क्य होता है: समान औसत घनत्व वाले छोटे ग्रह का द्रव्यमान कम होता है, अत: उसका गुरुत्वाकषण बल भी
दुबल होता है। गैस के कण स्वतंत्र रूप से ग त करते ह एवं सदा बाहर नकलने क ओर होते ह; वायुमंडल को रोक
पाना इसी ग त एवं ग्रह के गुरुत्व के बीच क रस्साकशी है। गुरुत्व दुबल हो जाए तो गैस जीत जाती ह — वे अंत रक्ष
म पलायन कर जाती ह।
स्वयं जाँ चए: प्रमाण हमारे सौर मंडल म ही है। मंगल पृथ्वी से छोटा है और उसका वायुमंडल 100 गुना कम सघन
है; बुध और भी छोटा है और उस पर वायुमंडल है ही नह ।
प्र.4 ल गक जनन म संत त अपने माता- पता से भन्न क्य होती ह? (i) उनक वृ द्ध व भन्न जलवायु म होती है। (ii)
वह व भन्न प्रकार का भोजन ग्रहण करते ह। (iii) वह जन्म के पश्चात नए आनुवं शक अनुदेश प्राप्त करते ह। (iv)
वह माता- पता दोन से म त अनुदेश (जीन) प्राप्त करते ह।
(iv) वह माता- पता दोन से म त अनुदेश (जीन) प्राप्त करते ह।
ऐसा क्य होता है: प्रत्येक युग्मक म जनक के आनुवं शक पदाथ का केवल आधा भाग होता है, और हर बार वह
आधा भाग भन्न होता है। जब शुक्राणु एवं अंडाणु मलते ह तो संत त को पूरा सेट मलता है — परंतु ऐसा मश्रण जो
पहले कभी नह बना। इसी लए कसी बच्चे को माँ जैसी नाक एवं कसी को पता जैसे नेत्र मलते ह, और एक ही
प रवार के भाई-बहन भी एक दूसरे से भन्न दखते ह।
शेष वकल्प क्य गलत ह: जलवायु एवं भोजन कसी जीव क वृ द्ध को प्रभा वत कर सकते ह, परंतु वे आनुवं शक रूप से
स्थानांत रत नह होते। और (iii) तो जीन के काय करने क व ध ही नह है — अनुदेश युग्मक के मलने के समय मलते ह, जन्म के
प ात नह ।
प्र.5 आपने मानसून के पश्चात अपने वद्यालय क द वार क दरार म छोटे -छोटे हरे पौधे उगते दे खे ह गे। आपके
अनुसार ये बीज कहाँ से आए? कन प र स्थ तय ने इन पौध को वहाँ उगने म सहायता क होगी?
ये बीज लगभग न श्चत रूप से वहाँ लाए गए थे — सबसे अ धक संभावना प क्षय ारा, कुछ वायु ारा।
वे वहाँ कैसे पहुँचे। जब पक्षी या जंतु फल खाते ह तो बीज मूल पौधे से दूर गर जाते ह। अध्याय का अपना उदाहरण यही है — पक्षी
बरगद का फल खाकर बीज उत्स जत करते ह और वे बीज वषा के समय द वार क दरार म गरकर अंकु रत हो जाते ह। घास एवं
फन के हल्के बीज तथा बीजाणु वायु से भी दरार म पहुँच सकते ह और वषा उन्ह बहाकर भीतर तक ले जा सकती है।
वे वहाँ उग क्य सके। मानसून के प ात दरार म वह सब मल जाता है जो अंकुरण के लए चा हए —
जल — वषा का जल दरार म एक त्रत हो जाता है और छाया म शीघ्र सूखता नह ।
वायु — दरार खुली होती है, अत: बीज तक ऑक्सीजन पहुँचती है।
थोड़ी मृदा — धूल, प त्तय के कण एवं प क्षय क बीट दरार म जमा होकर पोषक तत्व दे ते ह।
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टकने का स्थान — संकरी दरार बीज को थामे रखती है, वह बह नह पाता।
सूय का प्रकाश — पहली कोपल खुलते ही उपलब्ध।
ऐसा क्य होता है: बीज म संगृ हत पोषक तत्व होते ह। जल मलते ही वह उन्ह का उपयोग कर जड़ एवं प्ररोह
नकालता है — आरंभ करने के लए उसे मृदा क नह , केवल जल, वायु एवं उपयुक्त ताप क आवश्यकता होती है।
इसी लए नंगी दरार म अंकुरण संभव है; उसके बाद पौधा तभी टकता है जब दरार उसे थोड़ा जल एवं पोषक तत्व
दे ती रहे।
प्र.6 कुछ समय पूव ही एक शहर म नई सड़क और भवन बनाने के लए जंगल का एक बड़ा भाग काट दया गया। यह
स्थानीय जलवायु एवं जैव व वधता को कस प्रकार प्रभा वत करेगा? इससे स्थानीय क्षेत्र म जल क उपलब्धता
अथवा गुणवत्ता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
जंगल हटाने से कोई एक वस्तु नह हटती — एक साथ कई क ड़याँ टू टती ह, और प्रभाव जलवायु, जीव समुदाय एवं जल तीन तक
पहुँचता है।
स्थानीय जलवायु पर प्रभाव।
वृक्ष वायु म बड़ी मात्रा म जलवाष्प छोड़ते ह। वृक्ष न रहने पर जलवाष्प कम होगी, बादल कम बनगे और स्थानीय वषा घटे गी।
छाया के स्थान पर सड़क एवं भवन आ जाते ह जो ऊष्मा अवशो षत कर रोके रखते ह, अत: क्षेत्र अ धक गरम हो जाता है।
बढ़ता हुआ जंगल काबन डाइऑक्साइड अवशो षत कर रहा था। वह अवशोषण रुक जाता है, जससे वायु म ह रतगृह गैस और
बढ़ती ह।
जैव व वधता पर प्रभाव। प्राकृ तक आवास नष्ट होने पर पौधे एवं जीव-जंतु लुप्त हो जाते ह जससे पा र स्थ तक तंत्र का संतुलन
बगड़ता है। अध्याय 12 के अनुसार — य द शाकाहारी जीव का भोजन बनने वाले पौधे समाप्त हो जाएँ तो हरण एवं ट े अपने
अ स्तत्व के लए संघष करगे; शाकाहारी जीव के बना बाघ या लोमड़ी जैसे शकारी पशुओं को भी भोजन नह मलेगा। प्रत्येक जीव
क अपनी भू मका है, और कुछ के वलुप्त होने से ही प्रकृ त क जीवन सहायक क्षमता क्षीण हो जाती है।
जल क उपलब्धता एवं गुणवत्ता पर प्रभाव।
उपलब्धता: जड़ एवं प त्तय क परत वषा जल को धीमा कर दे ती थ जससे वह रसकर भू मगत जल भरता था। नंगी भू म एवं
कंक्र ट पर वही जल सीधे बह जाता है, अत: कुओं एवं झरन को कम जल मलता है। वषा घटने से स्थ त और बगड़ती है।
गुणवत्ता: जड़ के थामे बना मृदा बहकर नाल म चली जाती है — जल गँदला हो जाता है। सड़क एवं नमाण से बहा जल
तेल, धूल एवं कचरा साथ लाता है, और उसे छानने वाली वनस्प त अब बची नह है।
ऐसा क्य होता है: जंगल केवल वृक्ष का समूह नह है; वह स्थानीय तंत्र का वह भाग है जो जल सं चत करता है,
मृदा थामता है, वायु ठं डी रखता है एवं खाद्य ंखला को पो षत करता है। उसे हटाते ही ये सभी काय एक साथ रुक
जाते ह — यही अध्याय का यह कथन है क पृथ्वी तंत्र के कसी एक भाग म हुआ छोटा-सा प रवतन भी वषा, मृदा,
वायु क गुणवत्ता एवं वहाँ रहने वाले जंतुओं को एक साथ प्रभा वत करता है।
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प्र.7 एक मत्र कहता है, “पृथ्वी पर अतीत म भी जलवायु प रवतन होते रहे ह इस लए आज का वै श्वक तापन कोई नई
बात नह है।” आपने अपनी व ान क पुस्तक के इस अध्याय एवं अन्य अध्याय म जो सीखा है उसका उपयोग
करके आप क्या प्र त क्रया दगे?
आपका मत्र पहली बात म सही है और नष्कष म गलत। पृथ्वी क जलवायु पहले भी बदली है — परंतु आज जो हो रहा है
उसका कारण एवं उसक ग त दोन भन्न ह।
1. कारण भन्न है। अध्याय स्पष्ट बताता है क आज क अ त रक्त ऊष्मा कहाँ से आ रही है। कोयला एवं तेल जैसे जीवाश्म ईंधन
जलाने से काबन डाइऑक्साइड एवं मेथेन जैसी ह रतगृह गैस उत्स जत होती ह जो पृथ्वी ारा उत्स जत ऊष्मा को और अ धक रोक
लेती ह। सामान्यत: पेड़-पौधे एवं समुद्र प्लवक काबन डाइऑक्साइड अवशो षत कर संतुलन बनाए रखते ह। परंतु जीवाश्म ईंधन
जलाने से वह काबन मुक्त होता है जो लाख वष से पृथ्वी के भीतर संगृहीत था, और पृथ्वी उसे उतनी शीघ्रता से अवशो षत नह कर
पाती — अत: ऊष्मा बढ़ती चली जाती है।
2. ग त भन्न है। अतीत के प रवतन प्राय: बहुत लंबे कालखंड म हुए। यह महत्त्वपूण है क्य क अनुकूलन, जैसा इसी अध्याय म
पढ़ा, जनन ारा अनेक पी ढ़य म होता है। जो प रवतन जीव के अनुकूलन से अ धक तेज़ी से आए वह उन्ह बदलने का नह ,
वलुप्त होने का अवसर दे ता है।
3. आज दाँव पर वह तंत्र है जस पर हम नभर ह। तापमान म थोड़ी-सी वृ द्ध से भी हमछत्रक पघल सकते ह, समुद्र का जल-
स्तर बढ़ सकता है जससे अनेक तट य शहर म बाढ़ आ सकती है, मौसम म बड़े प रवतन हो सकते ह और अनेक पौधे व जीव-जंतु
वलुप्त हो सकते ह। जैव व वधता के हनन एवं प्रदूषण के साथ मलकर यही त्रग्रहीय संकट कहलाता है।
क्या आप जानते ह? इसी लए वश्व के दे श ने वै श्वक समझौते कए ह। पे रस समझौते (2015) ने वै श्वक तापन
को 1.5 °C से नीचे रखने का लक्ष्य रखा; पुस्तक के अनुसार 2025 तक भी वश्व इस लक्ष्य को प्राप्त नह कर सका
है और अभी बहुत अ धक प्रयास आवश्यक ह।
ऐसा क्य होता है: ‘यह पहले भी हुआ है’ से केवल इतना पता चलता है क जलवायु बदल सकती है; यह नह पता
चलता क इस बार उसे कौन बदल रहा है। व ान म उपयोगी प्रश्न यह नह होता क प्रभाव नया है या नह , अ पतु
यह क उसका कारण क्या है — और यहाँ कारण पहचाना जा सकता है, मापा जा सकता है, तथा ज्वालामुखी या
कक्षा के वपरीत, मनुष्य चाहे तो उसे बदल भी सकता है।
प्र.8 कल्पना क जए क य द पृथ्वी पर उसका चुंबक य क्षेत्र अचानक लुप्त हो जाए तो पृथ्वी पर जीवन के लए कस
प्रकार क समस्याएँ उत्पन्न हो सकती ह? व्याख्या क जए।
उच्च ऊजा वाले कण को ग्रह से दूर रखने वाला कवच समाप्त हो जाता, और क्ष त चरण-दर-चरण भीतर तक पहुँचती।
1. कॉ स्मक करण एवं सौर पवन सीधे वायुमंडल तक पहुँचत । ये सूक्ष्म, उच्च ऊजा वाले कण दूर ब्र ांड से एवं सूय से आते
ह। अभी चुंबक य क्षेत्र इनम से अ धकांश को दूर धकेल दे ता है।
2. वायुमंडल को क्ष त पहुँचती एवं ओजोन परत का क्षय होता। अध्याय यही व शष्ट हा न बताता है।
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3. अ धक हा नकारक पराबगनी करण सतह तक पहुँचत । पतली ओजोन परत के कारण वे करण भीतर आत जो जी वत
को शकाओं का क्षय करती ह — त्वचा एवं नेत्र को हा न, फसल को क्ष त, तथा समुद्र खाद्य ंखला के आधार प्लवक पर
प्रभाव।
4. लंबे समय म वायुमंडल स्वयं नष्ट हो सकता था, और उसके साथ वह ह रतगृह ऊष्मा भी जो जल को द्रव बनाए रखती है।
दै नक तकनीक पर भी प्रभाव पड़ता — दक्सूचक उत्तर दशा नह बताते, और सूय से आने वाले कण के तूफ़ान उपग्रह एवं संचार
व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दे ते।
ऐसा क्य होता है: कॉ स्मक करण एवं सौर पवन के कण आवे शत होते ह, और चुंबक य क्षेत्र ग तशील आवे शत
कण का पथ मोड़ दे ता है। क्षेत्र हटते ही उन्ह मोड़ने वाला कुछ नह बचता, अत: उनक पूरी ऊजा वायुमंडल के ऊपरी
भाग तक पहुँचती है। उस ऊजा को वायुमंडल को ही अवशो षत करना पड़ता है — और यही अवशोषण ओजोन
जैसे अणुओं को तोड़ता है।
संकेत: स्वाभा वक तुलना मंगल से है। वहाँ पृथ्वी जैसा सुरक्षात्मक चुंबक य क्षेत्र नह है, वायुमंडल अत्यंत वरल है
एवं ओजोन परत नह है — अथात इसी ंखला का अं तम चत्र।
प्र.9 मंगल ग्रह पर मनुष्य के लए एक नई बस्ती क अ भकल्पना बनाने के काय का उत्तरदा यत्व दया गया है। वहाँ
मानव जीवन को बनाए रखने के लए आपको पृथ्वी पर उपलब्ध तीन वस्तुए ँ मंगल ग्रह पर पुन: बनानी ह गी।
इनम से कस वस्तु को वहाँ प्र तकृत करना सबसे क ठन लगता है और क्य ?
म ये तीन वस्तुए ँ पुन: बनाऊँगा —
क्या बनाना है क्य आवश्यक है कैसे बनाया जा सकता है
पथ्ृ वी जैसे दाब पर श्वास श्वसन के लए ऑक्सीजन; जल को द्रव रखने एवं बंद, दाबयुक्त गुंबद; काबन डाइऑक्साइड से तथा
ले ने योग्य वायुम ंडल शरीर क क्रयाओं के लए दाब भीतर उगाए पौध से ऑक्सीजन
द व जल पीने, भोजन उगाने तथा शरीर क प्रत्येक प्र क्रया के मंगल क सतह के नीचे क बफ नकालकर पघलाना
लए तथा प्रत्येक बूँद का पुनचक्रण
िविकरण एवं ठं ड से सुर क्षा मंगल पर न ओजोन परत है, न सुरक्षात्मक चुंबक य मंगल क मृदा क मोट परत के नीचे अथवा गुफाओं म
क्षेत्र, और तापमान हमांक से बहुत नीचे है नमाण; ना भक य या सौर ऊजा से ऊष्मा
सबसे क ठन: व करण से सुरक्षा।
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ऐसा क्य होता है: वायु एवं जल कसी बंद गुंबद के भीतर बनाए, संगृहीत एवं पुनच क्रत कए जा सकते ह — ये
m a s emग्रह-आकार क
वस्तु से आती.cहैo— हज़ार कलोमीटर बड़े क्रोड म पघले लोहे क ग त से बना चुंबक य क्षेgत्रl, और उसके साथ पूरे
उतनी ही बड़ी अ भयां त्रक समस्याएँ ह जतनी हम पहले से समझते ह। परंतु पृथ्वी क सुरक्षा कसी
वायुमs e mम टक ओजोन परत। इसे न साथ ले जाया जा सकता है, न बनाया जा सकताaहै। केवल द्रव्यमान के पीछे
la जा सकता है — प्रत्येक कक्ष के ऊपर मृदा या च ान क कई मीटर मोट परत — जससे बस्ती भारी, अंधेरी
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ंडल
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एवं अत्यंत महँगी हो जाती है।
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संकेत: तीन को क्रम दे ने का एक अच्छा उपाय यह पूछना है — ‘यह आपू त क समस्या है या ग्रह क ?’ आपू त क
समस्याएँ (वायु, जल, भोजन, ऊष्मा) ले जाकर, बनाकर एवं पुनच क्रत करके हल हो सकती ह। ग्रह क समस्याएँ
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(गुरुत्व, चुंबक य क्षेत्र, संपूण वायुमंडल) नह ।
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a s emएक गाँव म वगत वष से तापमान म वृ द्ध हो रही है एवं वषा अप्रत्या शत हो गई है। इस प रवतन का क्या
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a कारण हो सकता है? ऐसे दो उपाय बताइए जन्ह अपना कर यह गाँव उन नई प र स्थ तय के अनुसार अनुकूलन
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कर सके।
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aglह जन्ह अध्याय जलवायु प रवतन कहता है — तापमान, वषा एवं मौसम प्र तमान
कारण क्या हो सकता है। ये ठ क वही लक्षण
म द घका लक प रवतन। संभवत: दो प्रकार के कारण साथ-साथ काय कर रहे ह —
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वाला वै श्वक तापन सवत्र मौसम के प्र तरूप बदल दे ता है — वषा के समय एवं मात्रा स हत। em
वै श्वक: जीवाश्म ईंधन जलाने से उत्स जत ह रतगृह गैस पृथ्वी ारा छोड़ी गई ऊष्मा को अ धक रोक लेती ह, और इससे होने
c o mय द गाँव के आस-पास के वृक्ष खेती, ईंधन या नमाण के लए काटे गए ह तोgवायु
l asम जलवाष्प कम पहुँचती है और
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स्थानीय:
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agl अनुकूलन के दो उपाय।
नं गी भू म अ धक गरम होती है । दोन से गाँ व गरम होता है एवं वषा अ न त।
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1. वषा जल का संचयन। गाँव का तालाब सुधा रए, बरसाती नाले पर चेक डैम बनाइए, तथा छत के वषा जल संचयन के साथ
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aकsु छ भू म पर कम जल एवं अ धक ताप सहने वाली फसल ली जए — बाजरा, ज्वार
भूजल पुनभरण ग े बनाइए। य द वषा अ न त है तो उपाय यही है क जब वह हो तब उसे बहने न दया जाए।
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जैसे मोटे अनाज एवं दाल — औरaउन्ह खेत भरकर नह , टपक ( प) सचाई से पानी द जए। मृदा पर पलवार (मल्च) बछाने
2. फसल एवं सचाई क व ध बदलना।
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एवं खेत क मेड़ पर छायादार वृक्ष लगाने से वाष्पन घटता है एवं भू म ठं डी रहती है।
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.cकारण घटाने के लए वे व्यापक कदम चा हए जनक चचा अध्याय करता aहै g— सौर एवं पवन जैसी नवीकरणीय
क्या आप जानते ह? अनुकूलन एवं समाधान एक बात नह ह। ये उपाय गाँव को प रवतन के साथ जीना सखाते ह;
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ऊजा, ऊजा का उत्कृष्ट उपयोग, तथा पयावरण के अनुकूल यातायात।
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प्र.11 य द पृथ्वी पर वायुमंडल न होता तो क्या यह पृथ्वी पर जीवन, तापमान एवं जल को प्रभा वत करता? स्पष्ट
क जए।
हाँ — और तीन को, जनका प्रश्न म उल्लेख है। वायुमंडल केवल वह नह है जसम हम श्वास लेते ह; वही शेष दोन को संभव
बनाता है।
जीवन। न श्वसन के लए ऑक्सीजन होती, न प्रकाश सं ेषण के लए काबन डाइऑक्साइड। ओजोन परत भी न होती, अत: सूय
क हा नकारक पराबगनी करण सीधे सतह पर पड़त एवं जी वत को शकाओं का क्षय करत । जैसा जीवन हम जानते ह, वह रह ही
नह सकता था।
तापमान। वायुमंडल के बना ह रतगृह प्रभाव नह होता। पृथ्वी अपनी ऊष्मा सीधे अंत रक्ष म नस्ता रत कर अत्य धक ठं डी हो
जाती, और ऊष्मा को फैलाने वाला कुछ न होने से धूप वाला भाग झुलसता और अंधेरा भाग जमता रहता।
जल। यही भाग सबसे च काने वाला है। वायुमंडल न होने पर वायुदाब भी नह होता, अत: सतह का द्रव जल उबलकर अंत रक्ष म
उड़ जाता; जो बचता वह ठं ड म जम जाता। और जल-चक्र तो होता ही नह — न वाष्पन, न बादल, न वषा या बफ; अत: न दयाँ,
झील एवं भू मगत जल कभी पुन: नह भरते।
बादल बनते है ं
वष , बफ
वाष्पन
जलवाष्प को थामने के
िलए वायु आवश्यक
निदयाँ, झीलें एवं भूिमगत जल पुन : भर जाते है ं
महासागर, झील, नदी
जल-चक्र वायुमंडल पर ही चलता है। वायु हटा द जए तो इस आरेख का प्रत्येक तीर रुक जाता है।
ऐसा क्य होता है: वायुमंडल तीन अलग-अलग काय करता है — गैस दे ता है, पयाप्त ऊष्मा रोकता है, तथा वह दाब
एवं स्थान दे ता है जसम जल अवस्था बदल सके एवं यात्रा कर सके। तीन एक ही गैस-परत पर नभर ह, इसी लए
उसका न होना तीन अलग समस्याएँ नह , अ पतु एक ही पतन के तीन रूप उत्पन्न करता है।
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प्र.12 का यक प्रवधन के पाँच उदाहरण पर चचा क जए।
का यक प्रवधन पौध म अल गक जनन है — जनक क पत्ती, तना या जड़ स्वयं एक पूरा नया पौधा बन जाती है। पाँच स्पष्ट
उदाहरण, प्रत्येक म भन्न भाग —
पौधा प्रयुक्त भाग क्या होता है
1. आलू कं द (भूिमगत तना) कंद पर क ‘आँख’ क लयाँ ह। आँख स हत कटा टु कड़ा नम मृदा म रोपने पर प्ररोह
एवं जड़ नकालता है।
2. अदरक पकं द (भूिमगत तना) प्रत्येक टु कड़े म कली होती है; रोपने पर वह नया अदरक का पौधा बनाती है।
3. मनी प्लाट
ं तने की कतन पवसं ध वाली कतन जल या नम मृदा म रखने पर पवसं ध से जड़ एवं फर नई प त्तयाँ
नकालती है।
4. ग ा पवसंिध युक्त तने की पवसं ध क कली नया गन्ना बनाती है — पूरी फसल इसी व ध से लगाई जाती है।
कतन
5. बायोिफलम प ी पत्ती के कनारे के खाँच पर छोट -छोट क लयाँ बनती ह; गरी हुई एक पत्ती से कई
(पत्थरच ा) छोटे पौधे बन जाते ह।
जोड़ने योग्य अन्य उदाहरण — प्याज एवं लहसुन शल्ककंद से, शकरकंद एवं डहे लया जड़ से, केला सकर से, तथा घास एवं पुद ना
भूस्तारी से।
ऐसा क्य होता है: इनम से प्रत्येक भाग म एक कली होती है — वभाजन करने म सक्षम को शकाओं का समूह —
तथा सं चत भोजन। जड़ एवं प्ररोह बनाने के लए इतना ही पयाप्त है; बीज, नषेचन या परागण क आवश्यकता नह
पड़ती। चूँ क जनक एक ही है एवं अनुदेश का कोई मश्रण नह होता, प्रत्येक नया पौधा जनक क सवसमान
प्र तकृ त होता है।
संकेत: कसान का यक प्रवधन का उपयोग इसी लए करते ह क्य क पौधे प्र तकृ त होते ह। इस व ध से उगाई गई
आम क कस्म जनक वृक्ष जैसी ही फल गुणवत्ता बनाए रखती है, जसक गारंट बीज से उगाने म नह होती।
खोज, अ भक ल्पत कर और चचा कर — पृष्ठ 227
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व ान • समाज • अंतर वषयक प रयोजनाएँ
खोज, अ भक ल्पत कर और चचा कर प रयोजनाएँ
प्र.1 एक ‘पृथ्वी जीवन रक्षक कट’ तैयार क जए। कल्पना क जए क आप कसी दूसरे ग्रह के लए पृथ्वी जैसा एक
छोटा-सा नदश (मॉडल) बना रहे ह। जीवन सहायक के रूप म वहाँ कौन सी व्यवस्थाएँ होनी चा हए और क्य ?
कैसे आरंभ कर। वस्तुओं क सूची से आरंभ मत क जए। खंड 13.4 के चार तंत्र से आरंभ क जए — वायुमंडल, जलमंडल,
भूमंडल, जैवमंडल — और पू छए क कट को इनम से प्रत्येक के स्थान पर क्या दे ना होगा। फर वे दो सुरक्षाएँ जो ड़ए जो पृथ्वी
न:शुल्क दे ती है — ऊष्मा एवं कवच। अच्छ कट यह भी बताती है क प्रत्येक वस्तु क पू त कैसे होगी, क्य क जो आपू त समाप्त
हो जाए वह जीवन-रक्षा नह है।
नमूना उत्तर — पृथ्वी जीवन रक्षक कट:
कट म क्या कस तंत्र का स्थान क्य आवश्यक है
लेता है
श्वास योग्य गैस िमश्रण से भरा बंद , वायुम ंडल श्वसन के लए ऑक्सीजन, प्रकाश सं ेषण के लए काबन
दाबयुक्त ग ंबु द डाइऑक्साइड, तथा जल को द्रव रखने के लए दाब
जल की टंक ी तथा पुनचक्रण एवं जलमंडल पीने, भोजन उगाने एवं पोषक तत्व के संचरण के लए; प्रत्येक बूँद पुन:
शोधन इकाई उपयोग होनी चा हए
म ृद ा अथवा नाइटोजन व पोटैिशयम भूम ंडल पौध को पोषक तत्व एवं जड़ को थामने का आधार चा हए
युक्त पोषक शय्या
बीज एवं पौधे , तथा अपघटक जैवमंडल पौधे भोजन बनाते एवं ऑक्सीजन दे ते ह; अपघटक पोषक तत्व मृदा म
सूक्ष्म जीव लौटाकर चक्र पूरा करते ह
पकाश एवं ऊष्मा का ोत (सौर सूय एवं हिरतग ृह पभाव प्रकाश सं ेषण को प्रकाश चा हए; ऊष्मा के बना जल जम जाएगा
पैनल, हीटर)
मोटा कवच — ग ंबु द के ऊपर कई ओजोन परत एवं पराबगनी करण एवं उच्च ऊजा कण को रोकने के लए
मीटर म ृद ा या च ान चुंबकीय क्षेत्र
ऐसा क्य होता है: अ भकल्पना का सबसे क ठन भाग कोई एक वस्तु नह , अ पतु चक्र को पूरा करना है। पृथ्वी पर
कुछ भी सदा के लए समाप्त नह होता — ऑक्सीजन, जल एवं पोषक तत्व सभी चक्र म घूमते ह। जो कट केवल
सामग्री ढोती है उसक आयु न त है; जस कट म पौधे, जंतु एवं सूक्ष्मजीव एक दूसरे को पो षत करते ह वह
चलती रह सकती है। इसी लए अध्याय बार-बार कहता है क जीवन संसाधन से नह , पारस्प रक संबंध से सतत
रहता है।
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प्र.2 भारत एक चुनौतीपूण चंद्र मशन ‘चंद्रयान-4’ क योजना बना रहा है जो चंद्रमा से मृदा के प्र तदश (सपल) लेकर
आएगा। य द चंद्रमा पर जल होता तो क्या उसक मृदा म पौधे उग सकते ह? कसी ऐसे प्रयोग के वषय पर वचार
क जए जो आपको यह ात करने म सहायता कर सके क क्या चंद्रमा पर पौधे उगाना संभव है?
केवल जल पयाप्त नह होता — परंतु चंद्रमा क मृदा के साथ जल, पृथ्वी जैसी वायु, ऊष्मा एवं प्रकाश मल जाएँ तो संभव है,
और प्रयोग को यही जाँचना चा हए।
चंद्रमा क मृदा म क्या है और क्या नह । वह पसी हुई च ान एवं धूल है, अत: उसम ख नज ह। जो नह है वह पृथ्वी क मृदा का
वह भाग है जो जीवन से आता है — पौध एवं जंतुओं के अवशेष के वघटन से मलने वाला नाइ ोजन एवं अन्य पोषक तत्व। वहाँ
अपघटक भी नह ह, और वह मृदा अरब वष से सीधे सौर कण के संपक म रही है।
एक उ चत प्रयोग जसक आप अ भकल्पना कर सकते ह (लौटाए गए प्र तदश क थोड़ी मात्रा से, अथवा पसी ज्वालामुखीय
च ान से बनाई गई अनुरू पत चंद्र-मृदा से) —
1. प्रश्न: जल, वायु एवं प्रकाश मलने पर क्या बीज चंद्र-मृदा म अंकु रत होकर बढ़ सकते ह?
2. व्यवस्था: चार सवसमान पारदश बंद पात्र, प्रत्येक म समान द्रव्यमान क मृदा, मूँग या सरस जैसे शीघ्र उगने वाले पौधे के
समान संख्या म बीज, तथा समान जल, ताप एवं प्रकाश।
क — चंद्र (या अनुरू पत चंद्र) मृदा
ख — सामान्य बगीचे क मृदा, यह नयंत्रण है
ग — चंद्र मृदा जसम थोड़ी खाद मलाई गई हो
घ — चंद्र मृदा, जसम जल नह डाला गया, यह पु ष्ट के लए क सी मत करने वाला कारक जल ही है
3. शेष सब समान र खए — केवल मृदा भन्न हो। एक बार म एक ही वस्तु बद लए।
4. मा पए: कतने बीज अंकु रत हुए, कस दन, दो सप्ताह म ऊँचाई कतनी, प त्तय क संख्या तथा उनका रंग।
5. प्रत्येक पात्र को कम-से-कम तीन बार दोहराइए, क्य क एक गमला ऐसे कारण से भी वफल हो सकता है जनका मृदा से
कोई संबंध नह ।
ऐसा क्य होता है: बीज अपने संगृ हत भोजन से अंकु रत होता है, अत: वह लगभग कसी भी नम माध्यम म —
चंद्र धूल म भी — अंकु रत हो सकता है। असली परीक्षा उसके बाद आती है, जब अंकुर को मृदा से पोषक तत्व लेने
पड़ते ह। क एवं ग क तुलना बताती है क कमी पोषक तत्व क है या नह ; क एवं ख क तुलना बताती है क वह
पृथ्वी क मृदा से कतनी पीछे है; घ यह पु ष्ट करता है क आप केवल बीज का अपना भोजन-भंडार नह दे ख रहे थे।
संकेत: प रणाम चाहे जो हो, यह प्रयोग चंद्रमा पर खुले म पौधे उगाने के वषय म कुछ नह बताता। वहाँ वायुमंडल है
ही नह , अत: यह परीक्षण वस्तुत: कसी बंद चंद्र-ह रतगृह के वषय म है।
प्र.3 पुष्प प्रायः चमक ले रंग के होते ह एवं उनम एक रु चकर गंध होती है। ये वशेषताएँ पौधे के जनन म कैसे सहायक
होती ह?
ये व ापन ह — उन क ट , प क्षय एवं जंतुओं के लए जो परागकण को एक पुष्प से दूसरे तक ले जाएँगे।
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कक्षा 8 व ान अध्याय 13 हमारा आवास — पृथ्वी एक अ तीय जीवनदायी ग्रह
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पौधा चल नह सकता, परंतु उसके नर युग्मक को नषेचन के लए दूसरे पुष्प तक पहुँचना ही होता है। परागकण वायु, क ट या
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जंतुओं ारा ले जाए जाते ह; इस प्र क्रया को परागण कहते ह। चमक ला रंग एवं गंध पौधे क इसी समस्या का हल ह —
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रंग दूर से दखाई दे ता है और क ट को बता दे ता है क कहाँ आना है। यह दन के प्रकाश म काम करता है।
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gकेlपर तीव्र गंध वाले होते ह।
गंध वहाँ काम करती है जहाँ रंग नह — रात म एवं प त्तय के बीच। रात म खलने वाले पुष्प, जैसे रात क रानी, प्राय: हल्के रंग
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मकरंद वह पुरस्कार है जससे यात्रा साथक बनती है, अत: जंतु बार-बार आता है और उसी प्रकार के अन्य पुष्प पर भी जाता
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है।
मकरंद के लए भीतर घुसते समय परागकोश के परागकणeक
s mट के शरीर पर चपक जाते ह और अगले पुष्प म जाकर झड़ जाते ह।
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gl युग्मज बनता है जो बीज के रूप म वक सत होता है, तथा बीजांड के चार
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नर एवं मादा युग्मक का संलयन ही नषेचन है, जससे
ओर पुष्प का मांसल भाग फल बन जाता है।
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mहोगा। ये केवल
ऐसा क्य होता है: रंग एवं गंध बनाने म पौधे क ऊजा लगती है, अत: उनसे कुछ मलता अवश्य
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उन्ह पौध oमmमलते ह जनका परागण जंतुओं ारा होता है। वायु ारा परा गत पौध —
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gl सबसे प्रबल प्रमाण है क ये लक्षण परागण के लए ही ह।
े पुष्प छोटे , फ के एवं गंधहीन होते ह, क्य क वायु को व ापन दखाने से कोई लाभ नह । यही वरोधाभास
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स्वयं जाँ चए: कसी फूलदार पौधे के पास दस मनट बैठकर आने वाले क ट को ग नए। फर घास के पुष्प या
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मक्के क मंजरी को ध्यान से दे खए — न पंखु ड़याँ, न गंध, परंतु हल्के परागकण क वशाल मात्रा। एक ही समस्या
के दो भन्न हल। a
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मछली एवं मढक जैसे जंतु एक बार म सैकड़ यहाँ तक क हजार अंडे क्य दे ते ह जब क दूसरे जानवर बहुत कम
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अंडे दे ते ह? इतने सारे अंडे दे ने के क्या लाभ और हा न हो सकते ह?
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क्य क मछली एवं मढक के अंड क रक्षा लगभग कुछ भी नह करता — अत: यहाँ जी वत रहना संख्या का प्रश्न है।
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स्मरण क जए क इन जंतुओं म नषेचन कैसे होता है — नर एवं मादा मछली या मढक अपने शुक्राणु एवं अंडाणु जल म स्ख लत
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करते ह, जहाँ वे संयो जत होकर युग्मज बनाते ह और युग्मज से ूण का वकास भी जल म ही होता है। उस क्षण से अंडे अपने
भरोसे ह — खुले जल म तैरते हुए, बना दे खभाल के, और अन्य मछ लय , क ट एवं प क्षय ारा खाए जाते हुए। हज़ार अंड म से
शायद कुछ ही वयस्क बन पाते ह। हज़ार दे ना ही उन कुछ को संभव बनाता है।
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बहुत अ धक अंडे दे ने के लाभ हा नयाँ
भारी क्ष त के बाद भी कुछ बच जाते ह, अत: प्रजा त बनी रहती है प्रत्येक अंडे म बहुत कम भोजन भरा जा सकता है, अत: बच्चे
छोटे एवं असहाय नकलते ह
खुले जल म नषेचन अ न त होता है; अ धक अंडे होने से कुछ के इतने अ धक क दे खभाल संभव नह , अत: अ धकांश परभ क्षय
नषे चत होने क संभावना बढ़ती है के भोजन बन जाते ह
अ धक अंडे अथात अनुदेश के अ धक मश्रण, अत: संत त म अ धक प्रत्येक ऋतु म सह अंडे बनाने म मादा क बहुत ऊजा व्यय
व भन्नता होती है
बुरे वष के बाद जनसंख्या शीघ्र पुन: बढ़ सकती है संख्या प र स्थ तय के साथ बहुत घटती-बढ़ती रहती है, स्थर
नह रहती
अन्य जंतु कम अंडे क्य दे ते ह। पक्षी कम अंडे दे ते ह क्य क प्रत्येक अंडे म संपूण वकास के लए पयाप्त भोजन भरा जाता है
और फर उसे सेया, गरम रखा एवं सुर क्षत कया जाता है। कम पर बहुत अ धक व्यय करके एवं उनक रक्षा करके वही लक्ष्य
वपरीत माग से प्राप्त होता है — कुछ का बच जाना।
ऐसा क्य होता है: जनक के पास जनन के लए सी मत ऊजा होती है और उसे दो म से एक प्रकार से व्यय कया
जा सकता है — अनेक सस्ती संत तयाँ बना सुरक्षा के, अथवा कुछ महँगी संत तयाँ पूरी सुरक्षा के साथ। जल पहली
व ध को संभव बनाता है, क्य क वहाँ अंडे सूखते नह और युग्मक केवल छोड़ दे ने से मल जाते ह। स्थल पर पहली
व ध वफल हो जाती है, अत: स्थलीय जंतु प्राय: दूसरी व ध अपनाते ह।
प्र.5 गौरैया जैसे पक्षी घ सले बनाते ह एवं अपने अंड और चूज क दे खभाल करते ह जब क साँप जैसे सरीसृप
सामान्यत: अपने अंडे दे ते ह एवं उन्ह बना सुरक्षा के छोड़ दे ते ह। माता- पता क दे खभाल म यह अंतर प्रत्येक
प्रकरण म ब के जी वत रहने क संभावनाओं को कैसे प्रभा वत कर सकता है?
गौरैया के प्रत्येक चूजे के बचने क संभावना साँप के प्रत्येक ब े से कह अ धक होती है — परंतु साँप इसक भरपाई
संख्या से करता है।
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गौरैया — दे खभाल स हत साँप — दे खभाल र हत
अंडों की संख्या कम प्राय: कह अ धक
अंडे के िवकास के समय घ सला उसे छपाता है, जनक उसे गरम रखते एवं दबाकर या छपाकर छोड़ दया जाता है; अनेक खा
परभ क्षय को भगाते ह लए या नष्ट हो जाते ह
बच्चे िनकलने के बाद जनक भोजन एवं आश्रय दे ते ह जब तक चूजा उड़ना बच्चे को पहले ही दन से स्वयं भोजन खोजना एवं
एवं स्वयं खाना न सीख ले परभ क्षय से बचना पड़ता है
िकसी एक संतित के बचने अिधक कम
की संभावना
जनकों पर लागत बहुत अिधक — स प्ताहों तक भोजन जुटाना एवं पहरा कम — अंडे दे ते ही काय समाप्त
दे ना
ऐसा क्य होता है: दोन व धयाँ एक ही कसौट पर खरी उतरती ह — इतनी संत तयाँ वयस्क बन जाएँ क
जनसंख्या बनी रहे। गौरैया यह संख्या कुछ को भली-भाँ त बचाकर प्राप्त करती है; साँप अनेक को जन्म दे कर और
कसी को न बचाकर। दे खभाल केवल ‘बेहतर’ नह है — उसक क मत जनक का अपना समय एवं सुरक्षा है, और
जो जनक घ सले क रखवाली म लगा है वह उस समय न खा रहा है न भाग सकता है। कौन-सी व ध सफल होगी,
यह इस पर नभर है क प रवेश कतना संकटपूण है और जनक कतना दे सकता है।
क्या आप जानते ह? यही अदला-बदली पछले प्रश्न म मछली एवं मढक के वषय म दखी थी, और उससे पहले
अंडे दे ने एवं बच्चे को जन्म दे ने क तुलना म भी। यह जीव व ान के बार-बार दखने वाले प्र तरूप म से एक है —
अनेक पर थोड़ा-थोड़ा, अथवा कुछ पर बहुत अ धक।
अध्याय — एक नज़र म
पृथ्वी पर समस्त जीवन एक अत्यंत पतली परत म सी मत है। सबसे ऊँचे शखर से सबसे गहरी गत तक क दूरी लगभग 20
km है जब क पृथ्वी क त्रज्या लगभग 6400 km है — य द पृथ्वी सेब के आकार क होती तो भू-पपट सेब के छलके
जतनी पतली होती।
पृथ्वी वासयोग्य क्षेत्र (गो ीलॉक्स जोन) म स्थत है — तारे से वह दूरी जहाँ जल द्रव अवस्था म रह पाता है। इसक लगभग
वृत्ताकार कक्षा के कारण वष भर प्रकाश एवं ऊष्मा लगभग समान बनी रहती है, अत: अ धकांश स्थान पर अत्य धक गरमी या
ठं ड नह होती।
पृथ्वी का आकार भी उपयुक्त है। इसका गुरुत्व वायुमंडल को रोके रखने के लए पयाप्त है — मंगल का वायुमंडल 100 गुना
कम सघन है एवं बुध पर वायुमंडल है ही नह — परंतु इतना अ धक नह क हम अपने ही भार से दब जाएँ।
वायुमंडल तीन काय करता है — श्वसन के लए ऑक्सीजन, पराबगनी करण को रोकने वाली ओजोन परत (ऑक्सीजन के
तीन परमाणु वाला अणु), तथा मंद ह रतगृह प्रभाव जसम काबन डाइऑक्साइड जैसी गैस पृथ्वी ारा उत्स जत व करण को
अवशो षत कर ऊष्मा रोक लेती ह। शुक्र ग्रह पर यही प्रभाव तापमान को 450 °C तक पहुँचा दे ता है।
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ऐसा माना जाता है क पृथ्वी के क्रोड म पघले हुए लोहे क ग त से चुंबक य क्षेत्र बनता है, जो कॉ स्मक करण एवं सौर
पवन को दूर धकेल दे ता है, अन्यथा ये वायुमंडल एवं ओजोन परत को क्ष त पहुँचाते।
जीवन चार तंत्र क पारस्प रक क्रया से बना रहता है — वायुमंडल (वायु), जलमंडल (जल), भूमंडल (च ान, मृदा एवं
ख नज) तथा जैवमंडल (समस्त जीवन)। कसी एक को होने वाली क्ष त शेष तक पहुँचती है।
जनन जीवन को लुप्त होने से बचाता है। अल गक जनन (का यक प्रवधन, हाइ ा म मुकुलन, प्लेने रया म पुनजनन) म संत त
जनक क प्र तकृ त होती है; ल गक जनन म युग्मक ारा दोन जनक से आधे-आधे अनुदेश मलते ह, अत: संत त समान
तो होती है पर सवसमान नह — और यही व भन्नता अनुकूलन का आधार है।
त्रग्रहीय संकट — जलवायु प रवतन, जैव व वधता का हनन एवं प्रदूषण — आज इस संतुलन के लए सबसे बड़ा खतरा है।
पे रस समझौते (2015) ने वै श्वक तापन को 1.5 °C से नीचे रखने का लक्ष्य रखा; पुस्तक के अनुसार 2025 तक भी वश्व इस
लक्ष्य को प्राप्त नह कर सका है।
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त्व रत पुनरावृ त्त
पद अथ जीवन के लए महत्त्व अध्याय म
कहाँ
भू-पपट पथ्ृ वी की पतली ठोस बाहरी परत समस्त जीवन इसी पर अथवा इसके ठ क ऊपर है चत्र 13.1,
— यह सेब के छलके जतनी पतली है खंड 13.1
वासयोग्य क्षेत्र तारे से वह दू र ी जहाँ जल द व अवस्था में रह पाता है हमारी अब तक क जानकारी के अनुसार जीवन के चत्र 13.4,
(गो ीलॉक्स जोन) वकास के लए द्रव जल आवश्यक है खंड 13.3.1
ह रतगृह प्रभाव काबन डाइऑक्साइड जैस ी गैसे ं सूय से गरम हुई पृथ्वी पर मंद रूप म यह जल को द्रव अवस्था म चत्र 13.2,
पथ्ृ वी ारा उत्सिजत िविकरण को अवशोिषत कर बनाए रखता है; शुक्र पर यही 450 °C तक ले खंड 13.2
ऊष्मा रोक ले ती है ं जाता है
ओजोन परत वायुम ंडल का वह भाग िजसमें ओजोन (ऑक्सीजन सूय क हा नकारक पराबगनी करण को रोकने खंड 13.3.2
के तीन परमाण ु वाला अण)ु होती है वाली ढाल, जो जी वत को शकाओं का क्षय करती
ह
कॉ स्मक करण दू र ब ांड से तथा सूय से आने वाले उच्च ऊज ये वायुमंडल को क्ष त एवं ओजोन परत का क्षय कर खंड 13.3.3
एवं सौर पवन वाले कण सकते ह; पृथ्वी का चुंबक य क्षेत्र इन्ह दूर धकेलता
है
पृथ्वी का चुंबक य पथ्ृ वी के चारों ओर का वह क्षेत्र जहाँ उसका वायुमंडल के लए एवं इस प्रकार जीवन के लए खंड 13.3.3
क्षेत्र चुंबकीय पभाव अनुभव होता है; इसका कारण क्रोड सुरक्षा कवच
में िपघले लोहे की गित मानी जाती है
जलमंडल पथ्ृ वी का समस्त जल — तालाब, झील, नदी, जल अच्छा वलायक है, पौध म पोषक तत्व का खंड 13.4.1
झरने, समुद , महासागर एवं भूिमगत जल; सतह का संचरण करता है, जंतुओं म तापमान नयं त्रत
लगभग 70 पितशत करता है, तथा करोड़ जीव का आवास है
भूमंडल पथ्ृ वी का ठोस भाग — च ाने,ं म ृद ा एवं खिनज नाइ ोजन एवं पोटै शयम जैसे पोषक तत्व तथा खंड 13.4.2
लवण, कोयला, तेल, आयरन एवं कॉपर दे ता है
भू व वधता भू-आकृ ितयों, च ानों एवं म ृद ा की िविवधता तथा इससे अ तीय पयावास का सजन होता है जहाँ चत्र 13.9,
उन्हे ं आकार दे ने वाले पक्रम भन्न- भन्न प्रकार के जीव पनप सकते ह खंड 13.4.2
जैवमंडल समस्त जीिवत पाणी तथा वे स्थान जहाँ वे रहते है ं यह जीव अपने प रवेश के साथ पारस्प रक क्रया खंड 13.4.3
— पथ्ृ वी, जल एवं वायु करके अ स्तत्व बनाए रखते एवं वृ द्ध करते ह
आनुवं शक पदाथ पत्येक कोिशका के भीतर संग ृिहत अनुदे श जो इन्ह से ब छया गाय बनती है; इनम आए छोटे खंड 13.5
(जीन) बताते है ं िक िवकास कै से होना है प रवतन अनुकूलन का आधार बनते ह
युग्मक िविशष्ट जनन कोिशकाएँ िजनमें जनक के दोन जनक से आधा-आधा मलकर एक पूरा सेट खंड 13.5.2
आनुवंिशक पदाथ का आधा भाग ही होता है बनता है, अत: अनुदेश प्रत्येक पीढ़ म दोगुने नह
होते
का यक प्रवधन अलै ंिगक जनन िजसमें प ी, तना या जड़ को म ृद ा बाँस, गन्ना, आलू, अदरक एवं मनी प्लांट इसी व ध चत्र 13.11,
में रोपने से नया पौधा बनता है से बना बीज के उगते ह खंड 13.5.1
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कक्षा 8 व ान अध्याय 13 हमारा आवास — पृथ्वी एक अ तीय जीवनदायी ग्रह
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पद अथ जीवन के लए महत्त्व
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m .coजलवायु पिरवतन, जैव िविवधता का हनन एवं आज पृथ्वी पर जीवन के समक्षa
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त्रग्रहीय संकट ये सबसे बड़ी खंड 13.6
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पदू षण — तीनों एक साथ पयावरणीय चुनौ तयाँ ह
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