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NCERT Solutions Class 8 Social Science Chapter 4 भारत में औपनिवेशिक काल

AglaSem पर कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान अध्याय 4 भारत में औपनिवेशिक काल (समाज का अध्ययन) के NCERT समाधान की फ्री PDF डाउनलोड करें। नवीनतम NCERT पुस्तक (2026-27 पाठ्यक्रम) के सभी प्रश्नों के चरण-दर-चरण, अभ्यास-वार हल। Free PDF of NCERT Solutions for Class 8 Social Science Chapter 4 the Colonial Era in India (Exploring Society), Hindi Medium.
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About NCERT Solutions Class 8 Social Science Chapter 4 भारत में औपनिवेशिक काल

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NCERT Solutions Class 8 Social Science Chapter 4 भारत में औपनिवेशिक काल – Text

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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T

क ा8

एनसीईआरट समाधान

अध्याय 4: भारत म औप नवे शक काल

एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे

पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम

83 – 116 16 29 हन्द

Solutions, notes, sample papers & more at 43 pages

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

कक्षा 8 · सामा जक व ान · समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे

एनसीईआरट समाधान — अध्याय 4: भारत म औप नवे शक काल
कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल के सभी प्रश्न के वस्तृत एन.सी.ई.आर.ट . समाधान — पाठ्यपुस्तक समाज का
अध्ययन : भारत और उसके आगे, कक्षा 8, भाग 1 ( वषयवस्तु : अतीत क तानाबाना) से। अध्याय का प्रत्येक प्रश्न हल कया गया है — महत्वपूण
प्रश्न, नौ आइए पता लगाएँ बॉक्स, तीन आइए वचार कर बॉक्स, दो पाठ्य प्रश्न तथा सभी दस प्रश्न और क्रयाकलाप — और 1909 का ब्र टश
भारतीय सा ाज्य का मान चत्र ( चत्र 4.16), समय-रेखा ( चत्र 4.2), पंच का व्यंग्य चत्र ( चत्र 4.3), चह्नां कत चत्र ( चत्र 4.14) तथा 1856 का
संथाल रेखा चत्र ( चत्र 4.17) मु द्रत पृष्ठ से सीधे पढ़कर उत्तर दए गए ह।

पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ

समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (कक्षा 8) 83 – 116

खं ड प्रश्न

16 29

माध्यम

हन्द

महत्वपूण प्रश्न — पृष्ठ 83
अध्याय का आरंभ — वषयवस्तु : अतीत का तानाबाना

महत्वपू ण प्रश्न

प्र.1 उप नवेशवाद क्या है?

उप नवेशवाद वह व्यवहार है जब एक दे श कसी अन्य प्रदे श पर अ धकार कर वहाँ अपनी ब स्तयाँ स्था पत करता है और अपना
राजनै तक, आ थक तथा सांस्कृ तक तंत्र आरो पत करता है। यही अध्याय क अपनी प रभाषा है। ध्यान द जए क इसम तीन बात
ह — केवल व्यापार या केवल वजय उप नवेशवाद नह है।

तीन अंग अथ इसी अध्याय से उदाहरण

राजनै तक िकसी भूभाग के िनणय वहाँ के िनवासी नही ं, सहायक संिध ने वास्तिवक स त्ता िबिटशों को दे दी और भारतीय शासक
नयंत्रण बाहरी लोग ले ते है ं के पास पभुस त्ता का के वल आभास रहा

ब स्तयाँ अिधकार करने वाला दे श अपने लोग, दुग , गोवा (1510) पुतगाली उपिनवेश की राजधानी; सूरत, मद ास , बंबई और
बंद रगाह और पशासन बसाता है कलक त्ता में अंगेजी कें द ; दुग कृ त, िगड-रूपरे खा वाला पांिडचेरी (िचत्र
4.6)

अपना तंत्र उसकी अथव्यवस्था, िविध, भाषा और पथागत िविधयों के स्थान पर िबिटश कानून-संिहताएँ; मैक ॉले की िशक्षा
आरो पत करना मान्यताएँ स्थानीय व्यवस्थाओं का स्थान ले नीित; गोवा का धम-न्यायािधकरण और बलात धम तं रण
ले ती है ं

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

यह नवीन घटना नह है। अध्याय उप नवेशवाद क परंपरा को प्रथम सह ाब्द सा.सं. पू. के महान सा ाज्य तक ले जाता है और
बताता है क प्रथम सह ाब्द सा.सं. म ईसाई तथा इस्लामी धम के प्रसार के साथ-साथ जन क्षेत्र को नए धम म प रव तत कया
गया, वहाँ का उप नवेशीकरण भी हुआ। कतु ‘औप नवे शक युग’ से सामान्यतः आशय 15व शताब्द से आरंभ हुए यूरोपीय
वस्तार से है — स्पेन, पुतगाल, ब्रटे न, ांस और नीदरलड ारा अ का, ए शया, अमे रका, ऑस्ट्रे लया तथा प्रशांत महासागर के
अनेक प पर उप नवेश स्था पत करना।

प रभाषा क्य महत्वपूण है : उप नवेशक अपने काय को ‘सभ्यकारी अ भयान’ कहते थे और उप नवे शत लोग का
‘असभ्य’, ‘आ दम’ या ‘बबर’ कहकर असुरीकरण करते थे। ऊपर द गई प रभाषा से आप उस दावे को वास्त वकता
क कसौट पर परख सकते ह — स्वतंत्रता का ास, उप नवेशक ारा संसाधन का दोहन, पारंप रक जीवन-
पद्ध तय का वनाश तथा वदे शी सांस्कृ तक मूल्य का आरोपण। अध्याय यहाँ सावधान और नष्पक्ष है — वह
मानता है क औप नवे शक युग ने वश्व को जोड़ा और अथव्यवस्थाओं व प्रौद्यो ग कय क तीव्र वृ द्ध हुई, कतु
जोड़ता है क इसका लाभ प्रायः उप नवेशक को ही मला और अनेक ऐ तहा सक अध्ययन ने प्रमा णत कया है
क उप नवे शत समुदाय को अत्यंत कष्ट भोगने पड़े।

क्या आप जानते ह? 20व शताब्द के मध्य म, वशेषकर तीय वश्वयुद्ध के प ात, उप नवेशवाद का अंत होने
लगा और अ धकांश उप नवे शत राष्ट्र स्वतंत्र हुए। अथात ‘औप नवे शक युग’ लगभग पाँच शता ब्दय का था —
लंबा, कतु स्थायी नह ।

प्र.2 यूरोपीय श क्तय को भारत क ओर आक षत करने वाले कारण क्या थे?

भारत क समृ द्ध। यही सं क्षप्त उत्तर है, और अध्याय कारण बताने से पहले उसका प्रमाण दे ता है।

दो सह ा ब्दय क माँग। भारत का व्यापार यूना नय और रोमन के साथ लगभग दो सह ा ब्दय पूव से चलता आ रहा था।
भारतीय वस्तुओं — मसाले, कपास, हाथी-दाँत, रत्न, चंदन, सागवान क लकड़ी और वूट्ज स्ट ल — क भूमध्यसागरीय
क्षेत्र म अत्य धक माँग थी।
अथव्यवस्था का आकार। इ तहासकार ( वशेषतया अथशास्त्री ऐंगस मै डसन) का आकलन है क 16व शताब्द तक वश्व
के सकल घरेलू उत्पाद म भारत का योगदान कम-से-कम एक-चौथाई था, जससे वह चीन के साथ ( जसका योगदान भी समान
स्तर का था) वश्व क दो सबसे बड़ी अथव्यवस्थाओं म से एक था।
प्रत्यक्षदश । 16व शताब्द से अनेक यूरोपीय यात्री भारत को ‘समृद्धशाली’ बताते थे और इसक व नमाण क्षमताओं, व वध
कृ ष उत्पाद तथा व्यापक आंत रक एवं बाह्य व्यापा रक संजाल का वणन करते थे।

इस वशेष आकषण के अ त रक्त उसी समय चार सामान्य कारण प्रत्येक यूरोपीय श क्त को बाहर क ओर धकेल रहे थे :

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

कारण व्यवहार म इसका अथ

1. राजनै तक यूर ोपीय शिक्तयों की आपसी होड़ ने भौगोिलक िवस्तार तथा वैिश्वक पभाव के िलए पितस्पध उत्पन्न कर दी — इसी कारण
प्र तस्पधा िबटेन और फ ास
ं के कन टक युद्ध (1746–1763) भारत की भूिम पर लड़े गए

2. आ थक लाभ नए पाकृ ितक संस ाधनों, नए बाजारों तथा नए व्यापार माग ं तक पहच
ु ँ — और पायः लूट भी

3. धमातरण स्थानीय जनसंख्या का ईसाई धम में पिरवतन — यह पुतगािलयों में सबसे पबल था, िजन्होंने 1560 में गोवा में धम-
न्यायािधकरण स्थािपत िकया

4. वै ा नक “अपेक्षाकृ त गौण िकं तु महत्वपूण” — अ ात भूभागों का अन्वेषण कर पथ्ृ वी के भौगोिलक स्वरूप एवं पाकृ ितक इितहास का
ज ासा ान संिचत करने की अिभलाषा

स्मरण रखने योग्य वाक्य : अध्याय स्पष्ट कहता है — “इसी आ थक संपन्नता ने भारत को यूरोपीय औप नवे शक
महत्वाकांक्षाओं के लए एक आकषक लक्ष्य बनाया।” भारत नधन और दुबल होने के कारण उप नवेश नह बना।
वह समृद्ध होने के कारण बना, और इस लए भी क मुगल सत्ता के ास के बाद क राजनै तक प र स्थ त ने बाहरी
श क्तय को भारतीय झगड़ म पक्ष लेने का अवसर दे दया।

प्र.3 औप नवे शक काल से पूव तथा उसके दौरान भारत क आ थक एवं भू-राजनै तक स्थ त क्या थी?

पूव : वश्व क दो सबसे बड़ी अथव्यवस्थाओं म से एक। दौरान : संसार के सबसे नधन दे श म से एक। अध्याय यह पूरा उलटफेर
एक वाक्य म कह दे ता है — “दो शता ब्दय से भी कम समय म संसार के सबसे समृद्ध भूभाग म से एक, सबसे नधन दे श म से
एक बन गया।”

30%
कम-से-कम 25%
20%

10%
मात्र 5%

0%
16वी ं शताब्दी तक स्वतंत्रता के समय (1947)
िवश्व के जी.डी.पी. में भारत का भाग

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल
a g l AglaSem · NCERT Solutions

अध्याय म दए गए दोन आँकड़े आमने-सामने। पहला ऐंगस मै डसन का पूव-औप नवे शक काल का आकलन है, दूसरा स्वतंत्रता के समय
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भारत का भाग।

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m .co a g
l a se औप नवे शक काल से पूव औप नवे शक काल के दौरान
g
aवश्व जी.डी.पी. कम-से -कम एक-चौथाई — चीन के साथ दो सबसे बड़ी िनरंतर घटता रहा; स्वतंत्रता के समय मात्र 5 पितशत

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म भाग अथव्यवस्थाओं में

.
emपटसन, भांग, ag
व नमाण
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कोयर; मलमल और उभरे हुए वस्त्रl िवश्वभर में माँग में; लोहा,
वस्त्रों के िलए पिसद्ध — सूती, रे शमी, ऊनी, िबटेन में भारी कर तथा भारत में िबिटश वस्तुओं पर

ag
नाममात्र कर से वस्त्र उ ोग नष्ट; यही लोहा, स्टील
स्टील और कागज भी और कागज के साथ हआ ु

िनधनता में धके ल िदए गए ; अिधक o करmवाले कृ िष क्षेत्रों
कारीगर पीढ़ ी-दर-पीढ़ ी िशल्प में िनपुण कु शल कारीगरों के समुद ाय
में जीिवका के िलए लौटने कोm . c
as eिववश

व्यापार .c
om व्यापक आंतिरक एवं बाह्य संजाल; भारतीय व्यापारी a g l
a s em िबटेन ने समुद ी व्यापार तथा िविनमय दरों पर िनयंत्रण कर

a g l स्वतंत्र तापूवक िनय त करते थे िलया, अतः पहले की भाँित िनय त असंभव हो गया

स्थान पर कें द ीकृ त नौकरशाही, िजसका उ े श्य कर -
s
शासन ग ाम पंचायते ं समुद ाय के काय, िववाद तथा िसंचाई व सड़कें

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.co agl
सँभालती थी ं; क्षेत्र ीय राज्यों की जिटल पशासिनक संर चनाएँ संगह और िविध-व्यवस्था था, जनिहत नही ं

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शतािब्दयों में िवकिसत

a
भू-राजनै तक
agकlे ं द, जहाँ अन्य लोग आते थे
एक आिथक व सांस्कृ ितक ‘िबिटश साम ाज्य के मुकु ट में मिण’ — साम ाज्य का
स्थ त सबसे िवशाल उपिनवेश; 500 से अिधक िरयासते ं
सहायक संिधयों से बँधी
co m
m .
गामीण भारत “गहनseिनधनता में डू ब गया और कभी उबर
.co
m la -मृत्यु का अनुमान 5 करोड़ से 10
जनसामान्य
नही ं पाया”;gअकाल
अकाल पड़ते थे — सूखा, बाढ़ , युद्ध से — िकं तु इतने व्यापक

m a
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स्तर पर कभी नही ं

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करोड़
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omकर-प्रणाली ने उजड़े बुनकर को करभा रत भू म पर धकेला; aglas
यह पतन दुघटना क्य नह था : उपयुक्त ता लका का प्रत्येक खाना कसी नी त से जुड़ा है, दुभाग्य से नह । कर
और व नमय दर के नयंत्रण ने नयात समाप्त.cकया;
नकास ने लाभ वदे श भेज दया; और s ‘मुeक्m
रोक दया। मेटकाफ क गवाही a
l a त बाजार’ के सद्धांत ने अकाल म मूल्य बढ़ने पर सरकार को हस्तक्षेप से
—gग्राम समुदाय “लघु गणराज्य के सदृश ह… वे वहाँ बने रहते ह जहाँ अन्य सब
कुछ नष्ट हो जाता है” — यह दखाती है क जसे तोड़ा गया वह ब्र टश आगमन से पूव एक के बाद एक राजवंश

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को झेलकर बचा हुआ था।
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agl तानी ( टश) औप नवे शक प्रभुत्व का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा?
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प्र.4

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a s emप्रभा वत कया, क्य क शासक यह मानते थे क भारत को उनके ‘ ेष्ठ’ वचार के
a l अध्याय इन प्रभाव को वग म बाँटता है; उन्ह अलग-अलग रखना ही उ चत है।
इसने भारतीय जीवन के प्रायः प्रत्येक पक्ष को
अनुसार पुनः आकार दया जाना चाgहए।

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

1. मानवीय क मत — अकाल। भू म क उपज पर नकद कर, चाहे फसल हो या न हो। 1770–1772 म दो वष क फसल
वफलता के ऊपर इस नी त ने ऐसा अकाल उत्पन्न कया जसम बंगाल क लगभग एक- तहाई जनसंख्या, अनुमानतः एक
करोड़ लोग मारे गए — और कंपनी ने उसी समय भू म-कर बढ़ा दया। 1876–1878 म मुख्यतः दक्कन म 80 लाख लोग मरे,
जब क प्र तवष लगभग दस लाख टन चावल ब्रटे न नयात होता रहा। संपूण काल म भीषण अकाल क संख्या 12 से 20 तक
और मृत्यु का अनुमान 5 करोड़ से 10 करोड़ तक है।
2. औ ो गक वनाश। ब्रटे न म भारतीय वस्त्र पर भारी कर, भारत म ब्र टश वस्तुओं पर नाममात्र कर, और ब्रटे न का समुद्र
व्यापार तथा व नमय दर पर नयंत्रण। प रणाम — नयात ढह गया, आयात बढ़ा, बुनकर समुदाय नधनता म धकेल दए गए।
गवनर-जनरल ब टक ने 1834 म लखा : “सूती बुनकर क अ स्थयाँ भारत के मैदान का वरंजन कर रही ह।”
3. संपदा का नकास। नौरोजी (1901) और आर.सी. दत्त ने ब्र टश प्र तवेदन से ही भारत से नकाली गई संपदा का लेखा तैयार
कया; उत्सा पटनायक का नवीनतम अनुमान 1765–1938 के लए 45 लयन अमे रक डॉलर (वतमान मूल्य) है। यह
केवल कर से नह , अ पतु रेलवे, टे लीग्राफ और युद्ध तक के व्यय भारतीय से वसूलकर लया गया।
4. स्वशासन का वघटन। जो ग्राम पंचायत ववाद, सचाई और सड़क सँभालती थ , उनके स्थान पर कर-संग्रह और व ध-
व्यवस्था के लए बनी कद्र कृत नौकरशाही आई। ब्र टश कानून-सं हताओं ने प्रथागत व धय क उपेक्षा क , और नए न्यायालय
महँगे, समय लेने वाले तथा वदे शी भाषा म संचा लत थे — अथात सामान्य जन अपनी ही न्याय-व्यवस्था से बाहर कर दया
गया।
5. शक्षा का रूपांतरण। मैकॉले के 1835 के म नट ने लक्ष्य रखा ऐसे भारतीय का वग जो “रक्त और रंग से तो भारतीय हो परंतु
स्वाद, वचार, नै तकता और बु द्ध से अंग्रेज”। पारंप रक वद्यालय — पाठशालाएँ, मदरसे, वहार — धीरे-धीरे वलुप्त हो गए,
यद्य प ब्र टश प्र तवेदन म ही 1830 तक बंगाल और बहार म 1,00,000 से 1,50,000 ग्राम्य वद्यालय का उल्लेख है।
अंग्रेजी प्र तष्ठा क भाषा बन गई और अंग्रेजी श क्षत अ भजन व सामान्य जन के बीच स्थायी वभाजन उत्पन्न हुआ।
6. समाज म वभाजन। ‘फूट डालो और राज करो’ ने शासक क प्र तस्पधा और उत्तरा धकार ववाद का लाभ उठाया, और
ब्र टश ने धा मक समुदाय के मध्य व े ष को पहचानकर उसे बढ़ावा भी दया। एक औप नवे शक व ध ने सैकड़ जनजा तय
को ‘अपराधी जनजा त’ घो षत कर दया, जससे दशक तक उनके साथ अन्याय हुआ।
7. संस्कृ त — क्ष त, और एक अनपे क्षत लाभ। हजार मू तयाँ, चत्र, रत्न और पांडु ल पयाँ चुराकर यूरोपीय संग्रहालय तथा
नजी संग्रह म भेज द गईं। साथ ही ब्र टश ने उपमहा प का गहन सवक्षण कया, स्मारक के दस्तावेज बनाए, कुछ खंडहर
को पुनस्था पत कया और पुरातत्वशास्त्र का आरंभ कया; और संस्कृत ग्रंथ के अनुवाद (चाल्स व ल्कन्स क भगव ता,
1785 से आरंभ) का यूरोपीय दाश नक , सा हत्यकार और कलाकार पर गहरा प्रभाव पड़ा।

दोन पक्ष को ईमानदारी से कैसे तौल : अध्याय अनपे क्षत प रणाम से इनकार नह करता — रेलमाग ने
आंत रक बाजार को एक कृत कया, पुरातत्वशास्त्र आरंभ हुआ, भारतीय ग्रंथ यूरोप पहुँचे। कतु वह दो बात कहता है
जो तराजू का पलड़ा तय कर दे ती ह। पहली, ये अ धकांशतः अनपे क्षत प रणाम थे, उ े श्य नह : रेलमाग कच्चा
माल बंदरगाह तक और सेनाएँ वद्रोह तक पहुँचाने के लए बछाए गए थे और उन्ह ने वद्यमान व्यापार माग क
प्रायः उपेक्षा क । दूसरी, इनका व्यय भारतीय ने चुकाया। अध्याय का नष्कष है : “भारतवा सय ने अपने ही
अधीनीकरण के लए स्वयं धन उपलब्ध कराया।” और ‘सभ्यकारी अ भयान’ बचाव नह हो सकता — भारत क
अपनी सभ्यता यूरोप से कह प्राचीन थी।

सुझाव : ‘प्रभाव’ पूछे जाने पर सदै व आ थक, राजनै तक/प्रशास नक, सामा जक और सांस्कृ तक प्रभाव को
अलग-अलग ल खए और प्रत्येक के लए एक ठोस प्रमाण द जए। वशेषण क सूची उत्तर नह होती; एक त थ,
एक आँकड़ा या एक उद्धरण उत्तर होता है।

पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 85

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

उप नवेशवाद का युग

प्र.1 ऐसे अ भयान के लए उन रा को कसने प्रे रत कया?

चार बात ने, और अध्याय उन्ह महत्व के क्रम म रखता है।

1. यूरोपीय श क्तय के बीच राजनै तक प्र तस्पधा। यह सबसे पहले आती है। स्पेन, पुतगाल, ब्रटे न, ांस और नीदरलड क
आपसी होड़ ने भौगो लक वस्तार तथा वै श्वक प्रभाव के लए प्र तस्पधा उत्पन्न कर द — एक श क्त ने कोई तट लया तो
प्र त ं को अगला चा हए था।
2. आ थक लाभ। वस्तार से नए प्राकृ तक संसाधन, नए बाजार और नए व्यापार माग मलते थे — और, अध्याय जोड़ता है, प्रायः
लूट भी।
3. धमातरण। स्थानीय जनसंख्या का ईसाई धम म प रवतन “एक अन्य प्रबल प्रेरणा” थी।
4. वै ा नक ज ासा। “एक अपेक्षाकृत गौण कतु महत्वपूण कारण” — अज्ञात भूभाग का अन्वेषण कर पृथ्वी के भौगो लक
स्वरूप एवं प्राकृ तक इ तहास का ज्ञान सं चत करने क अ भलाषा।

यह क्रम क्य महत्वपूण है : पहले दो कारण हसा को समझाते ह। अध्याय ने अभी-अभी कहा है क ये वजय
अ भयान “प्राय: सैन्य बल से संपन्न होते थे, जसम मूल नवा सय का नरसंहार अथवा दासत्व स म्म लत था”।
जज्ञासा कसी राज्य से नरसंहार नह कराती; संपदा और सत्ता क होड़ कराती है। अं तम दो कारण वास्त वक
अवश्य थे, कतु वे औ चत्य भी बने — बाजार के लए क गई वजय को बाद म आत्माओं के उद्धार या ज्ञान-वृ द्ध
का अ भयान कहा जा सकता था।

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 87

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

उप नवेशवाद का युग — चत्र 4.3, पंच प त्रका का 1892 का व्यंग्य चत्र

आइए पता लगाएँ

प्र.1 आपके वचार म यह व्यंग्य चत्र ( चत्र 4.3) क्या अ भव्यक्त करने का प्रयास कर रहा है? (ध्यान रख क टे लीग्राफ,
जसने त्व रत संचार को पहली बार संभव बनाया, उस समय हाल ही म आ वष्कृत हुआ था)। चत्र के व भन्न
तत्व का व ेषण क जए।

आकृ त। औप नवे शक अ भयान-वेश म एक दाढ़ -मूँछ वाला यूरोपीय पुरुष — बुश जैकेट,
घुड़सवारी वाली नेकर, ऊँचे फ तेदार जूते, छाती पर कारतूस-प ा (बडो लयर), कमर पर झोला और
कंधे पर लटकती राइफ़ल।
उसक मुद्रा। उसके पैर असंभव रूप से चौड़े फैले ह — एक जूता अ का महा प के सबसे ऊपरी
सरे पर और दूसरा उसके द क्षणी छोर पर, अथात वह एक ही डग म पूरे अ का को लाँघ रहा है।
उसक दोन भुजाएँ पूरी चौड़ाई म फैली ह।
उसके हाथ म क्या है। दोन फैले हुए हाथ से एक-एक पतला टे लीग्राफ का तार नीचे ज़मीन क ओर
जाता है, मानो तार महा प के एक छोर से दूसरे छोर तक उसी के शरीर से होकर बछाया गया हो।
पृष्ठभू म। उसके नीचे और पीछे अ का का मान चत्र ठोस भूभाग के रूप म बना है, नीचे दाईं ओर
मेडागास्कर है। पीछे का आकाश उत्क ण बादल और आड़ी रेखाओं से भरा है। नीचे दाईं ओर
कलाकार के हस्ताक्षर ह।

चत्र 4.3, पृष्ठ 86 — पंच प त्रका, लंदन म एडवड लनले सैम्बन ारा बनाया 1892 का काष्ठ-उत्क ण व्यंग्य चत्र। यहाँ
केवल उसका वणन है; चत्र के लए पाठ्यपुस्तक दे खए।

संदेश है — प्रभुत्व को वीरता क तरह प्रस्तुत करना। एक अकेला यूरोपीय एक पैर अ का के सुदूर द क्षण म और दूसरा सुदूर
उत्तर म रखकर खड़ा है, और पूरे महा प पर फैला टे लीग्राफ का तार थामे हुए है — चत्र कहता है क एक व्य क्त, एक राष्ट्र के बल
पर, संपूण महा प पर पैर फैलाकर उसे नयं त्रत कर सकता है। अब चत्र के तत्व एक-एक कर दे खए।

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

तत्व चत्र म क्या दखता है यह क्या कह रहा है

मुद्रा पैर अफ ीका के दिक्षणी छोर से पूरा महा ीप एक व्यिक्त का एक डग है — बीच में कु छ भी रुकने योग्य नही ं
उत्तरी छोर तक फै ले हएु

आकार आकृ ित महा ीप से भी ऊँची, िसर अफ ीका खड़ े होने की भूिम मात्र रह जाता है; उपिनवेशक अितमानव जैस ा
बादलों के ऊपर

टे लीग्राफ का दोनों फै ले हाथों में तना हआ
ु , त्विरत संचार की नई तकनीक ही िनयंत्र ण का उपकरण है : लंद न से आदे श अब
तार अफ ीका की पूर ी लंबाई में स प्ताहों के स्थान पर िमनटों में पहचु ँ सकता था। सामाज्य को तार से बाँधा जा रहा है

वेशभूषा सै िनक-सी पोशाक, भारी बूट, कं धे ‘उ ोगपित’ सशस्त्र है। वािणज्य और िवजय एक ही व्यिक्त है ं
पर बंदू क , उठे हुए हाथ में टोप

कौन पूरे िचत्र में एक भी अफ ीकी नही ं महा ीप को खाली भूिम की तरह िदखाया गया है, िजसे बस ले ले ना है — यही सबसे
अनुप स्थत है बताने वाला िववरण है

कहाँ छपा पंच पित्रका, लंद न, 1892 पाठक िबिटश जनता थी, और व्यंग्यिचत्र ने उसे पस िकया : दे खो, हमारे लोग वहाँ
न्न

क्या कर रहे है ं

टे लीग्राफ का संकेत क्य दया गया है : टे लीग्राफ से पूव लंदन से कसी दूरस्थ उप नवेश तक संदेश जहाज से
जाता था और सप्ताह लगते थे; वहाँ बैठे अ धकारी को स्वयं नणय लेना पड़ता था। तार बछते ही नणय सा ाज्य
क राजधानी म लए जाकर उसी दन लागू कए जा सकते थे। इसी लए चत्रकार ने ध्वज नह , तार चुना : यह उस
सा ाज्य का सट क प्रतीक है जसे अब केवल दावा नह , वास्तव म चलाया जा सकता था। और इसी अध्याय म आप
यही तकनीक भारत म भी दे खगे — जहाँ टे लीग्राफ नेटवक का व्यय भी, रेलमाग क भाँ त, भारतीय कर-राजस्व से
चुकाया गया।

क्या आप जानते ह? यह चत्र प्रायः ‘द रोड् स कोलोसस’ नाम से जाना जाता है और इसम दखाए गए व्य क्त क
पहचान सामान्यतः ब्र टश व्यवसायी से सल रोड् स से क जाती है, जो अ का क पूरी लंबाई म टे लीग्राफ और रेल
लाइन चाहते थे। शीषक म रोड् स प क प्राचीन वशाल प्र तमा ‘कोलोसस’ क ओर भी संकेत है, जसके वषय म
कहा जाता था क वह बंदरगाह के मुहाने पर पैर फैलाए खड़ी थी।

पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 91
अंग्रेज का प्रवेश

प्र.1 टे न ने लगभग दो शता ब्दय तक भारतीय उपमहा प पर शासन कया। यह कैसे संभव हुआ?

कसी आक्रमण से नह । अध्याय का उत्तर यह है क ब्र टश अ धग्रहण क्र मक, सु नयो जत तथा प्रायः वा ण ज्यक उपक्रम का रूप
लए हुए था, न क प्रत्यक्ष सैन्य आक्रमण का — और इसी कारण यह सफल हुआ। चरण दे खए।

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल
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यापारी स त्त ा के मध्यस्थ राजिनम ता

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तटीय केंद , 17वी सैन् य सहायता का सौदा प्लासी, 1757

agl प त्येक चरण स्वयं को व्यापार कहते हुए ही पार िकया गया।

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एक व्यापा रक कंपनी सा ाज्यवाद श क्त कैसे बनी — पृष्ठ 92–94 म व णत क्रम।

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जसम वशेष अ धकार थे — जैसे नजी सेaनgा ग ठत करने का अ धकार। एक व्यापा रक कंपनी आरंभ से ही सशस्त्र थी।
1. दाँत वाला अ ध नयम। महारानी ए लजाबेथ प्रथम ने अंग्रेजी ईस्ट इं डया कंपनी को ऐसा राजक य अ ध नयम (चाटर) दया

2. केवल व्यापारी होने का छद्म। इसी से 17व शताब्द म उसे तट य क्षेत्र म बना वशेष वरोध के कद्र स्था पत करने का अवसर

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मला — सूरत, मद्रास, बंबई और कलकत्ता सबसे पहले। स्थानीय शासक को आप त्त नह हुई, क्य क वदे शी व्यापार का
स्वागत भारत क पुरानी परंपरा थी।
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3. सैन्य सहायता बेचना। कंपनी के प्र त न धय ने राजनी तक संबंध बनाए और कुछ शासक को उनके प्र त ं य के वरुद्ध

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gl4. फूट डालो और राज करो। उन्ह ने क्षेत्रीय शासक क प्र तस्पधा और राज्यवंश के उत्तरा धकार ववाद का लाभ उठाया, तथा
सहायता द — इस प्रकार वे “ वदे शी आक्रांताओं के स्थान पर सत्ता के मध्यस्थ बनकर उभरे”।

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धा मक समुदाय के मध्य व े ष को पहचानकर उसे बढ़ावा भी दया।

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. cकomसेनाएँ — नवाब क सेना का प्रमुख भाग — युद्ध म न ष्क्रय रह । agl
5. प्लासी (1757)। क्लाइव ने सराजु ौला के दरबार के असंतुष्ट तत्व को पहचाना और नवाब के अपने सेनाप त मीर जाफर से

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वश्वासघात के बदले नवाबी का वचन दया। मीर जाफर
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6. राजस्व, फर वलय। प्लासी के कुछ a
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संख्या म कम होने पर भी ब्र टश को वजय मली।
वष बाद कंपनी को बंगाल, बहार और ओ डशा — भारत के सबसे समृद्ध क्षेत्र — म

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राजस्व एकत्र करने का अ धकार मला। 19व शताब्द म आई हड़प नी त, जसके अनुसार स्वाभा वक पुरुष उत्तरा धकारी के

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बना शासक क मृत्यु पर रयासत का वलय हो जाता, और सहायक सं ध, जसम शासक सहासन पर रहता कतु अपने व्यय

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पर ब्र टश सै नक रखता और वदे शी संबंध केवल ब्र टश के माध्यम से रख सकता था।

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s m व्यय म सा ाज्य’ से नकलना क्य असंभव था : सहायक सं ध से ब्र टश बना प्रत्यक्ष शासन का
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a प्रशास नक व्यय उठाए वशाल प्रदे श पर नयंत्रण रख सके — वह व्यय भारतीय शासक उठाता था। और एक बार

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coकmचतुराई और उसक क्रूरता, दोन अध्याय के एक वाक्य म ह : a
प्रणाली म स म्म लत हो जाने के बाद बाहर नकलना लगभग असंभव था, क्य क स्वतंत्र होने के कसी भी प्रयास पर

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emहस्तांत रत हो गई और भारतीय शासक पर उनक ही पराधीनता क
ब्र टश सेना का सामना करना पड़ता। इस यु क्त
इस प्रणाली से “वास्त वक सत्ता ब्र टशsको
क मत का बोझ डाल दया गया”a।g
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व्यापा रय से शासक बनने तक — अध्याय के प्रथम पृष्ठ का चत्र ( चत्र 4.1)

आइए पता लगाएँ

प्र.1 आगे पढ़ने से पहले, इस अध्याय के प्रथम पृष्ठ पर दए गए चत्र को ध्यानपूवक दे खए। यह चत्र ईस्ट इं डया
कंपनी के लंदन स्थत मुख्यालय हेतु वशेष रूप से बनवाया गया था। इसक लंबाई तीन मीटर से अ धक है। इस
चत्र के प्रत्येक पक्ष का अवलोकन कर— उसम प्रद शत व्य क्त, वस्तुए,ँ प्रतीक एवं भाव-भं गमाएँ। चार या पाँच
व ा थय के समूह म प्रत्येक समूह इस चत्र से प्राप्त संदेश के वषय म अपने नष्कष प्रस्तुत करे। (हमारे उत्तर
कुछ पृष्ठ के प ात दए गए ह, जब हम चत्र क ओर पुनः लौटगे कतु अभी उन्ह न दे ख!)

आकार एवं चौखट। भारी नक्काशीदार सुनहरी चौखट म जड़ा एक बड़ा अंडाकार चत्र।
ऊपर बाईं ओर। नीले, बादल भरे आकाश के सामने च ानी ऊँचाई पर सफ़ेद और गुलाबी वस्त्र म
एक गौरवण स्त्री बैठ है। उसके नीचे एक बड़े सह का सर है। उसके पीछे पंख वाले बालक एक
ढाल तथा लाल क्रॉस अं कत ध्वज उठाए ह; च ान से एक भाला टका है।
नीचे बाईं ओर। लंबी सफ़ेद दाढ़ और बाल म माला पहने एक वृद्ध पुरुष जल के कनारे अधलेटा है;
उसका एक हाथ लुढ़के हुए घड़े पर टका है जससे जल बह रहा है; दूसरे हाथ म एक छोटा गहरे रंग
का दं ड है।
मध्य म। सुनहरे बाजूबंद, हार तथा जड़ाऊ कणाभूषण पहने, कमर से ऊपर अनावृत एक श्यामवण
स्त्री आगे झुककर मो तय से भरा एक बड़ा गोल पात्र आगे बढ़ा रही है, जससे मो तय क एक लंबी
लड़ी लटक रही है। उसके पीछे कुछ दूरी पर ध्वज स हत एक पालवाला जहाज़ समुद्र म है।
मध्य से दाईं ओर। पीले और नीले लंबे वस्त्र पहने, जूड़ा बाँधे एक आकृ त पीठ झुकाए घुटन के बल
है और एक बड़ा अलंकृत मतबान (जार) ऊपर उठाए है।
दाईं ओर। लाल चादर और कलगीदार टोप पहने एक गौरवण युवक सीधा खड़ा है और ऐसा दं ड आगे
कए है जस पर दो साँप लपटे ह। उसके पीछे ताड़-जैसे ऊँचे वृक्ष ह तथा पीठ पर ढका हुआ बोझ
लादे एक पशु है।
सबसे दाईं ओर। दो श्यामवण पुरुष बड़ी हल्के रंग क गाँठ के नीचे झुके हुए उन्ह आगे ले जा रहे ह;
पास ही आकृ तय के बीच एक छोटा बालक खड़ा है।
संयोजन। गौरवण आकृ तयाँ बाईं ओर ऊँचाई पर ह और सीधी बैठ या खड़ी ह; श्यामवण आकृ तयाँ
दाईं ओर नीचे ह और झुक हुई, घुटन के बल या बोझ ढोती हुई ह।

चत्र 4.1, पृष्ठ 83 — इस अध्याय के प्रथम पृष्ठ पर दया गया चत्र ( स्प र दओने रोमा, 1778; लंबाई तीन मीटर से
अ धक)। यहाँ केवल वही बताया गया है जो चत्र म दखाई दे ता है; चत्र के लए पाठ्यपुस्तक दे खए।

पहले व ध। ऐसे चत्र के सामने चार प्रश्न इसी क्रम म पू छए : यह कसने और कस कक्ष के लए बनवाया? — ऊपर कौन है और
नीचे कौन? — दे कौन रहा है और ले कौन रहा है? — चत्र म क्या नह है? इन्ह के उत्तर संदेश ह।
कसने बनवाया। यह स्प र डयोन रोमा का ‘द ईस्ट ऑफ रग इट् स रचेज टू ब्रता नया’ है, वष 1778 म न मत, तीन मीटर से
अ धक लंबा, और ईस्ट इं डया कंपनी के लंदन स्थत मुख्यालय हेतु वशेष रूप से बनवाया गया। अतः यह व्यापार का तटस्थ चत्रण
नह — यह एक कंपनी का अपने ही वषय म वज्ञापन है, जो वह टँ गा था जहाँ उसके अपने संचालक उसे दे खते।

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क्या दखता है चत्र म स्थान संदेश

बता नया, गौरवण स्त्री, पास म सह, सबसे ऊँचे, चट्टान पर बैठी, िबटेन शासन करता है; िसंह शिक्त का पतीक है; वह उठती नही,ं
पीछे ढाल और ध्वज लए बालक ग हण करती हईु हाथ नही ं बढ़ ाती — संपदा स्वयं उस तक आती है

भारत, श्यामवण स्त्री, मोती-रत्न का पात्र नीचे, आगे झुक ी हुई, अिपत भारत को स्वेच्छा से दे ने वाला िदखाया गया है — और बैठी हुई
आगे बढ़ाती हुई करती हईु स्त्र ी के सामने झुक ी हईु स्त्र ी के रूप में

चीन, लंबे वस्त्र म, बहुमूल्य जार लए और भी नीचे, झुक ा हआ
ु कं पनी का व्यापार चीन से भी था; संपूण ‘पूव’ िबटेन के नीचे
सजाया गया है

दो श्यामवण पुरुष, कपास क गाँठ दािहने िकनारे पर, बोझ से िजस श्रम से यह संपदा बनी वह िचत्र में है, पर नामहीन और
उठाए झुके हुए हािशये पर

दे व मकरी, पंखयुक्त दं ड लए दािहनी ओर खड़े, संके त व्यापार और यात्र ा — पूरे ले न-दे न को दे वता से अनुम ोिदत
करते हुए वािणज्य के रूप में पस्तुत िकया गया है

कंपनी के पोत आकृ ितयों के पीछे , मध्य वह नौसै िनक शिक्त िजसने यह सब वास्तव में संभव बनाया —
दू र ी पर चुपचाप पष्ृ ठभूिम में रखी गई

‘ पता टे म्स’, श्वेत दाढ़ वाला वृद्ध, सबसे नीचे बाईं ओर, जल लंद न गंतव्य है : िचत्र की पत्येक वस्तु इसी नदी की ओर बह रही
जसके पात्र से जल बह रहा है के िकनारे है

भारत के पशु (ऊँट, हाथी) मक री के पीछे पूव को पाकृ ितक संपदा के िविचत्र भंडार की तरह िदखाना

चत्र क्या छपाता है : पूरा चत्र अपने शीषक के एक शब्द पर टका है — अ पत। इसम कसी पर कर नह लगता,
कोई न्यायालय नह , कोई भूखा नह । न सै नक ह, न कर-संग्राहक, न अकाल। कतु इस चत्र के बनने से एक दशक
भी पहले उसी कंपनी ने बंगाल के 1770–1772 के अकाल म, जसम लगभग एक करोड़ लोग मरे, कठोर कर-
वसूली जारी रखी थी। चत्र को अध्याय के सामने रखकर पढ़ना ही इस अभ्यास का उ े श्य है।

समूह म यह क जए : ऊपर दए चार प्रश्न सदस्य म बाँट ली जए और इसी क्रम म प्रस्तुत क जए — कसने
बनवाया, ऊँच-नीच, दे ने क दशा, मौन। अंत म एक वाक्य म उत्तर द जए : य द यही दृश्य 1778 के कसी भारतीय
बुनकर ने च त्रत कया होता तो क्या भन्न होता?

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 98

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भारत क संपदा का नकास

आइए पता लगाएँ

प्र.1 आपके अनुसार ‘अन- टश रूल इन इं डया’ से दादाभाई नौरोजी का क्या तात्पय है? (सूचना संकेत— वे 1892
म हाउस ऑफ कॉमन्स म संसद सदस्य थे।)

उनका तात्पय था क भारत म ब्र टश शासन उन्ह सद्धांत का उल्लंघन कर रहा था जन पर ब्रटे न स्वयं गव करता था। वे यह नह
कह रहे थे क शासन इस लए बुरा है क्य क वह ब्र टश है; वे कह रहे थे क वह पयाप्त टश नह है — अथात न्याय, स्वतंत्रता
और शा सत के हत म शासन के जन मानक क घोषणा ब्रटे न करता था, भारत म उसका शासन उन पर खरा नह उतरता।
सूचना संकेत ही पूरे वाक्यांश क कुंजी है। दादाभाई नौरोजी टश हाउस ऑफ कॉमन्स म नवा चत होने वाले प्रथम भारतीय
थे (1892) — यह यूनाइटे ड कगडम क सदनीय संसद का नवा चत नम्न सदन है। अथात उनके ोता ब्र टश मतदाता और
ब्र टश सांसद थे। दो संभा वत तक क तुलना क जए :

संभा वत तक 1890 के दशक क टश संसद इसे कैसे सुनती

‘भारत में िबिटश शासन अन्यायपूण है, इसे समाप्त होना चािहए।’ एक वरोधी बाहरी व्य क्त क शकायत मानकर टाल दया जाता

‘भारत में िबिटश शासन अन-िबिटश है — आप भारत में वह कर रहे है ं इसे टालने का अथ अपना पाखंड स्वीकारना होता। यह िबटेन की अपनी
जो अपने दे श में कभी स्वीकार न करते। ’ नैितक शब्दावली को ही मापदंड बना दे ता है

इस वाक्यांश के पीछे आवेश नह , ग णत था। उनक 1901 क पुस्तक पावट एंड अन- ब्र टश रूल इन इं डया म उन्ह ने टश
सूत्र से ही प्राप्त आँकड़ के आधार पर भारत से नष्का सत धन का अनुमान प्रस्तुत कया। लगभग उसी समय रोमेश चंद्र दत्त ने
ईकोनॉ मक हस्ट्र ऑफ इं डया म यही अध्ययन कया। इन सब अध्ययन से ज्ञात हुआ क उप नवेशवा दय ने भारत से असंख्य
अरब पाउं ड क संप त्त नकाली। ब्र टश सरकारी आँकड़े प्रयोग करना स्वयं म तक का अंग था — ऐसे प्रमाण को ‘भारतीय
अ तशयो क्त’ कहकर उड़ाया नह जा सकता था।

नकास सबसे तीखा उदाहरण क्य था : ब्रटे न को इस नयम पर गव था क कसी जनता पर उसके अपने
प्र त न धय के माध्यम से ही कर लगाया जा सकता है। भारत म भारतीय पर भारी कर थे, मत का अ धकार नह था,
और फर उनसे औप नवे शक सत्ता के अपने व्यय — रेलवे, टे लीग्राफ और युद्ध तक — क पू त भी वसूली जाती
थी। यही ब्रटे न म होता तो सरकार गर जाती। भारत म यह करना, नौरोजी के ठ क शब्द म, अन- ब्र टश था।

सुझाव : ध्यान द जए क अध्याय इस तक को एक ंखला क तरह बनाता है — पहले ब्रूक्स एडम्स (1895) और
व लयम डग्बी, फर 1901 के आसपास नौरोजी और दत्त, और अंत म उत्सा पटनायक का यह आधु नक अनुमान
क 1765 से 1938 तक भारत से लगभग 45 लयन अमे रक डॉलर नकला (वष 2023 म ब्रटे न के
जी.डी.पी. का लगभग 13 गुना)। ऐसे कुल आँकड़े प्रयुक्त मान्यताओं पर बहुत नभर करते ह, इस लए व भन्न
व ान क संख्याएँ भन्न होती ह; कतु प्रवाह क दशा और उसका प रमाण कसी को ववा दत नह ।

आइए वचार कर — पृष्ठ 98–99

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संकेत के साथ चत्र पर पुनः दृ ष्ट ( चत्र 4.14)

आइए वचार कर

प्र.1 आइए, पुनः इस चत्र ( चत्र 4.14) पर कुछ संकेत के साथ उसके प्रतीकात्मक अथ पर ध्यान द। बता नया ( टे न
का प्रतीकात्मक रूप), उप नवेश क अपेक्षा उच्च स्थान पर वराजमान है जो उसक ेष्ठ सत्ता को प्रद शत करता
है। इसके वपरीत उप नवेश क नम्न स्थ त और झुक हुई मुद्रा पर ध्यान द। क्या उप नवेश ने वास्तव म अपनी
संप त्त ‘अ पत’ क थी? या फर टे न ने उसे बलपूवक अथवा छल से प्राप्त कया? साथ ही भारतीय क त्वचा
का गहरा रंग भी दे ख (जो बता नया के वण से वपरीत है) जो उस समय गोरे लोग क काले वण वाले ‘स्था नक ’
पर ेष्ठता क धारणा को दशाता है।
यह वही अंडाकार चत्र है जो अध्याय के प्रथम पृष्ठ पर है; पृष्ठ 99 पर इसे पुनः छापा गया है और पुस्तक ने उस पर
आठ पीले तीर एवं नामांकन जोड़े ह:

“बता नया, जसम सह श क्त का प्रतीक है” → ऊपर बाईं ओर च ानी ऊँचाई पर सफ़ेद-गुलाबी
वस्त्र म बैठ गौरवण स्त्री, उसके नीचे सह का सर तथा पीछे लाल क्रॉस वाला ध्वज उठाए पंख
वाले बालक।
“‘बुजुग पता थेम्स’, लंदन का प्रतीक” → नीचे बाईं ओर लंबी सफ़ेद दाढ़ वाला अधलेटा वृद्ध,
जसका हाथ जल उड़ेलते लुढ़के घड़े पर है।
“भारत मोती और जवाहरात प्रदान करते हुए” → मध्य म आगे झुककर मो तय से भरा गोल पात्र
आगे बढ़ाती श्यामवण स्त्री।
“ईस्ट इं डया कंपनी क नौसै नक श क्त” → उसके पीछे कुछ दूरी पर ध्वज स हत पालवाला
जहाज़।
“चीन एक क मती जार प्रस्तुत करते हुए” → पीले-नीले वस्त्र म, पीठ झुकाए घुटन के बल बैठकर
अलंकृत मतबान उठाती आकृ त।
“मकरी, जो व्यापार और यात्रा का प्रतीक ह” → दाईं ओर लाल चादर और कलगीदार टोप पहने
गौरवण युवक, जसके हाथ म दो साँप से लपटा दं ड है।
“भारतीय पशु” → ऊपर दाईं ओर मकरी के पीछे बोझ लादा पशु तथा ऊँचे वृक्ष।
“दो श्यामवण पुरुष (भारतीय?) कपास क गांठ चढ़ाते हुए” → सबसे दाईं ओर बड़ी हल्के रंग क
गाँठ के नीचे झुके दो श्यामवण पुरुष क ओर संकेत करते दो तीर।

चत्र 4.14, पृष्ठ 99 — ‘पूव अपनी संपदा बता नया को अ पत कर रहा है’, चत्र के प्रतीक पर पुस्तक के अपने
नामांकन स हत। यहाँ चत्र का वणन दया गया है; चत्र के लए पाठ्यपुस्तक दे खए।

नह — संपदा अ पत नह क गई थी। वह ली गई थी, और अध्याय दोन उपाय दखा चुका है : बल और छल। चत्र का
शीषक एक दावा है, और अभी-अभी पढ़े गए पृष्ठ उसक कसौट ह।

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बलपूवक छल से

omऔर समुद से कालीकट पर बमबारी की; िबना काटज वाली l a se
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पत्र’ की व्यवस्थाaका रूप दे ना
पुतगाली वास्को-डी-गामा ने भारतीय व्यापािरयों को बंद ी बनाकर यातनाएँ दी ं, उनका काटज स्वयं — नौसै िनक नाके बंद ी को ‘अनु ा-

semनौकाएँ जब्त
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ांसीसी डुप्ले ने 1746 में मद ास पर अिधकार िकया उत्तरािधकार िववादों में हस्तक्षेप कर कठपुतली

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शासकों के माध्यम से अपत्यक्ष शासन

a s eकाmदंडात्मक अिभयान,
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टश पंजाब का अिधगहण (1848–49); 1857 के बाद प्लासी (मीर जाफर का िवश्वासघात); हड़ प नीित;
िजसमें गाँव जलाए और फसले ं नष्ट की सहायक संिध; अकाल में भी ऊँ चे रखे गए कर-
ल क्ष्य

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चत्र क रचना को ही एक तक क तरह प ढ़ए। इसका प्रत्येक दृश्य- नणय एक ही बात दो बार कहता है — एक बार सत्ता के
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वषय म, एक बार वण के वषय म :
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em बता नया ऊपर वराजमान है; भारत और चीन उससे नीचे। यूरोपीय चत्रकला म ऊँचाई पद का सूचक है। आँख को यह
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gl बताया जाता है क आदेश कसका चलता है, इससे पहले क उसे और कुछ बताया जाए।
ऊँचाई।

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मुद्रा। बता नया सीधी और स्थर है; उप नवेश झुके हुए, बोझ उठाए, आगे बढ़े हुए। एक ग्रहण करता है, शेष प्रस्तुत करते ह।
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वण। बता नया गौरवण, भारतीय आकृ तयाँ श्यामवण। यह आक स्मक नह था। यह उप नवेशक म प्रच लत उस धारणा को
दशाता है क गोरे लोग काले वण वाले ‘स्था नक ’ m
s e से ेष्ठ ह — यही धारणा उप नवे शत लोग को ‘असभ्य’, ‘आ दम’ या ‘बबर’

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कहने और ‘सभ्यकारी अ भयान’ को सम्मानजनक la बनाने के काम आई।
‘अ पत’ शब्द। य द संपदा स्वेच्छा से द जाती तो न सेना क आवश्यकता होती, न काटज क , न हड़प नी त क , न रे सडट

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क । चत्र ने ठ क उन्ह वस्तुओं को हटा दया है जनसे यह हस्तांतरण संभव हुआ।

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o m l a seवह वश्वसनीय रूप से यह
g म टँगा यह चत्र प्रत्येक
.c है क उसके स्वामी क्या मनवाना चाहते थे। 1778 म कंपनी के लंदन मुख्aयालय
चत्र ऐ तहा सक
ोत क्य है : कोई चत्र यह नह बता सकता क क्या हुआ था, कतु

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aseआगंतुक को एक कहानी सखाता था — पूव कृतज्ञ है, ब्रटेन उदार है, और वा णज्य दोन के बीच स्वाभा वक बंधन
बताता

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है। अब इसके बगल म डब्ल्यू.डब्ल्यू. हंटर का 1770 के बंगाल का ववरण र खए — कृषक अपने पशु, अपने

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उपकरण, अपना बीज-अनाज और अंततः अपने पुत्र-पु त्रयाँ बेचते हुए — और आपको स्पष्ट दख जाएगा क यह
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चत्र कसे छपाने के लए बनाया गया था।

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आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 100
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भारत के स्वदे शी उ ोग का पतन

आइए पता लगाएँ

प्र.1 क्या आप ऊपर दए गए सभी शब्द को समझते ह जो भारतीय वस्त्र का वणन करते ह? य द नह , तो चार या
पाँच व ा थय के समूह बनाएँ और इन शब्द क जानकारी प्राप्त कर, फर अपने शक्षक क सहायता से अपने
नष्कष क तुलना कर।

अभी-अभी पढ़े गए अनुच्छेद म दो प्रकार के शब्द ह : वे रेशे जनसे भारतीय वस्त्र बनते थे, और वे गुण जनसे वे प्र सद्ध हुए। प्रत्येक
का अथ नीचे है।

शब्द यह क्या है कहाँ से / कैसे प्रयोग

सूती (कपास) कपास के पौधे की फली से िमलने वाला कोमल रे शा भारत का प्रमुख वस्त्र-रेशा; यही वह कपड़ा है जसक
माँग वश्व के अनेक भाग म थी

रेशमी रे शम के कीड़े के कोए से िनकाला गया महीन, चमकीला रे शा बंगाल, असम (मूगा और एरी), वाराणसी तथा द क्षण
म बुना जाता था

ऊनी भेड़, बकरी या याक के बालों से िमलने वाला रे शा कश्मीर, हमाचल, ल ाख और राजस्थान — शॉल,
कंबल, कालीन

पटसन (जूट) पौधे के तने का लंबा, मोटा, सुनहरा-भूर ा रे शा बंगाल और असम; बोरे, रस्सी, चटाई

भांग (हप) भांग के पौधे के तने से िमलने वाला मजबूत रे शा रस्सी, तरपाल, बोरे और मोटा कपड़ा

ना रयल रेशा नािरयल के िछलके से िनकाला गया रे शा वशेषकर केरल; चटाई, रस्सी, ब्रश
(कोयर)

मलमल अत्यंत महीन, हलका, लगभग पारदश सूती कपड़ ा अध्याय क ‘अत्यंत पतली’ ेणी; बंगाल क मलमल
वश्वप्र सद्ध थी

उभरा हुआ वस्त्र पर इस पकार आकृ ित अंिकत होना जो उभरी हुई स्पष्ट अध्याय क ‘गहराई से उभरे हुए’ ेणी — मलमल से
(एंबोस्ड) िदखाई दे (पुस्तक की अपनी हािशया िटप्पणी) ठ क वपरीत छोर

बारीक अनेक महीन, सघन िववरणों वाली आकृ ितयाँ बुनकर, छापकर, रँगकर या कढ़ाई से बनाई जाती थ
डजाइन

बनावट कपड़ा छू ने और दे खने में कै सा है — िचकना, खुर दरा, उभरा, अध्याय का बल व वधता पर है — अत्यंत पतली
धारीदार मलमल से लेकर गहराई से उभरे वस्त्र तक

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

यह शब्दावली तक के लए क्य आवश्यक है : यह सूची अपने बाद वाले वाक्य का प्रमाण है। जो दे श छह भन्न
रेश म, सबसे महीन मलमल से लेकर भारी उभरे वस्त्र तक सब कुछ बना सकता था, उसके व नमाण क गहराई
और कौशल असाधारण था। इसी लए अगला अनुच्छेद च काने वाला है — यह पूरा क्षेत्र कसी बेहतर प्र तस्पधा से
नह , नी त से नष्ट हुआ : ब्रटे न म भारतीय कपड़े पर भारी कर, भारत म ब्र टश कपड़े पर नाममात्र कर, और ब्रटे न
का समुद्र व्यापार तथा व नमय दर पर नयंत्रण।

यह क जए : घर से प्रत्येक रेशे का एक छोटा नमूना लाइए — सूती रूमाल, बोरे का एक धागा, पायदान का कोयर
रेशा, ऊनी मोजा — और समूह म घुमाइए। कोयर और मलमल का अंतर हाथ से महसूस करने पर ही ‘अत्यंत पतली
मलमल से लेकर गहराई से उभरे हुए वस्त्र तक’ वाक्य का अथ खुलता है।

आइए वचार कर — पृष्ठ 102
भारतीय शक्षा का रूपांतरण — ‘भूरे अंग्रेज’ तैयार करना

आइए वचार कर

प्र.1 मैकॉले ारा लखे गए इस वाक्य— “एक अ े यूरोपीय पुस्तकालय क मात्र एक शेल्फ, भारत और अरब के
संपूण दे शज सा हत्य से अ धक मूल्यवान है” का वास्त वक अ भप्राय क्या था? और उन्ह ने ऐसा क्य चाहा क
भारतीय “स्वाद, वचार, नै तकता और बु द्ध म अंग्रेज बन जाएँ”? इसका संबंध अध्याय के प्रारंभ म उ ल्ल खत
“सभ्यकारी अ भयान” से कस प्रकार है? इन प्रश्न पर कक्षा-चचा आयो जत करने हेतु अपने शक्षक से अनुरोध
कर।

तीन प्रश्न अलग-अलग ली जए — अं तम प्रश्न ही उन्ह जोड़ता है।
1. वाक्य का अ भप्राय। मैकॉले का दावा था क यूरोपीय ज्ञान भारतीय और अरबी ज्ञान से इतना ऊपर है क तुलना ही नरथक है :
एक शेल्फ दो संपूण सा हत्य से भारी है। यह क्रम का कथन है, वषयवस्तु का नह । और अध्याय वह तथ्य दे ता है जो इस कथन को
ढहा दे ता है — उसी म नट म उन्ह ने स्वीकार कया क उन्ह “संस्कृत अथवा अरबी का कोई ज्ञान नह है”। जसे वे तौल रहे थे, उसे
उन्ह ने पढ़ा ही नह था। अतः यह वाक्य कसी व ान का नणय नह , ेष्ठता का दावा है, और वह कसी सा ह त्यक प्रश्न को नह ,
एक नी तगत ववाद को नपटाने के लए कहा गया था।
2. उन्ह ‘भूरे अंग्रेज’ क्य चा हए थे। उनका लक्ष्य ऐसा वग था जो “रक्त और रंग से तो भारतीय हो परंतु स्वाद, वचार, नै तकता
और बु द्ध से अंग्रेज” हो। इससे एक साथ कई औप नवे शक उ े श्य सधते थे :

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उ े श्य नई शक्षा इसे कैसे पूरा करती थी

सस्ता प्रशासन इससे भारतीय िलिपकों और किनष्ठ कमचािरयों का वग तैयार हुआ, जो पशासन की िनचली से वाएँ िबिटश
कमचािरयों की तुल ना में अत्यंत कम व्यय पर िनभा सके

भरोसेमंद मध्यस्थ शासकों की भाषा और मूल्यों में िशिक्षत वग शासकों को शािसतों तक पहच
ु ँ ाता — और उसका अपना िहत इस
व्यवस्था के बने रहने में होता

प्र त ं प्रामा णकता इसने पारंपिरक ान और अिधकार के ोतों को हािशए पर डाल िदया, िजससे पीिढ़ यों तक भारतीय अपनी
हटाना सांस्कृ ितक िवरासत से कटे रहे

केवल आ ापालन नह , यिद िशिक्षत वग यह मान ले िक शासक की संस्कृ ित श्रेष्ठ है, तो शासन के िलए कम सै िनक चािहए
सहम त

3. ‘सभ्यकारी अ भयान’ से संबंध। सीधा — यह वही दावा है, केवल रणभू म से कक्षा म आ गया। अध्याय के आरंभ म
उप नवेशक वजय को यह कहकर उ चत ठहराते थे क वे ‘असभ्य’, ‘आ दम’ या ‘बबर’ कहे गए लोग तक ‘उन्न त’ ला रहे ह।
मैकॉले यही तक ज्ञान पर लागू करते ह : भारतीय वद्या को नरथक घो षत क जए, तब भारतीय को ब्र टश शक्षा क
‘आवश्यकता’ सद्ध हो जाती है, और उप नवेशक उपकारी बन जाता है। दोन ही स्थ तय म ेष्ठता का दावा ही लेने को दे ने म
बदल दे ता है।

इसक क मत, पुस्तक के ही आँकड़ म : 19व शताब्द के प्रारंभ म ब्र टश प्र तवेदन म ही लाख ग्राम्य
वद्यालय का उल्लेख है — केवल बंगाल और बहार म 1830 तक लगभग 1,00,000 से 1,50,000 — जहाँ
पढ़ना, लखना और अंकग णत “अत्यंत कम व्यय म, परंतु अत्यंत सरल और प्रभावी ढं ग से” सखाया जाता था।
भारत म पहले से पाठशालाएँ, मदरसे, वहार और शष्य-प्र शक्षण क परंपरा थी, जो व्यावहा रक ज्ञान के साथ
सांस्कृ तक मूल्य का भी प्रसारण करती थी। 1835 के बाद ये वद्यालय धीरे-धीरे वलुप्त हो गए। अंग्रेजी प्र तष्ठा क
भाषा बन गई, और भारतीय समाज म अंग्रेजी श क्षत अ भजन तथा सामान्य जन के बीच एक स्थायी वभाजन
उत्पन्न हो गया।

कक्षा-चचा के लए : अध्याय ईमानदारी से बताता है क उस समय वास्त वक ववाद था — कुछ प्रमुख ब्र टश
प्राच्यवाद यह तक दे ते रहे क भारतीय वद्या थय को उनक अपनी भाषाओं म अध्ययन करने दया जाना चा हए,
और वे हार गए। अतः चचा को उसी रूप म र खए : मैकॉले का पक्ष (एक आधु नक भाषा, एक ज्ञान-परंपरा, सस्ती
और एकरूप) बनाम प्राच्यवा दय का पक्ष (उसी भाषा म पढ़ाइए जसम लोग सोचते ह)। दोन पक्ष से प्रमाण
माँ गए, और अंत म यह पू छए क उस कक्ष म कौन नह था — कसी भारतीय शक्षक या वद्याथ से कसी भी
योजना पर परामश नह लया गया था।

आइए वचार कर — पृष्ठ 104

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प्रारं भक प्र तरोध आंदोलन — औप नवे शक प्रा धकार को चुनौती

आइए वचार कर

प्र.1 “ टश सा ाज्य पर सूय कभी अस्त नह होता”— इस वाक्य का अ भप्राय क्या है? क्या यह कथन उ चत था?
वचार कर।

अ भप्राय। ब्र टश सा ाज्य वश्व के इतने भाग म फैला था — अ का, ए शया, अमे रका, ऑस्ट्रे लया और प्रशांत म — क दन
के कसी भी क्षण उसके कसी न कसी भाग पर सूय चमक रहा होता था। लंदन म रात होती तो कलकत्ता म दन; कलकत्ता म रात
होती तो कनाडा म दन। अतः अक्षरशः, सा ाज्य पर सूय कभी अस्त नह होता था।
कतु यह वाक्य केवल भूगोल का कथन नह था। यह दो और अथ लए हुए एक घोषणा थी :

वस्तार। इससे पूव कसी सा ाज्य ने एक ही समय म वश्व के प्रत्येक भाग म भूभाग नह रखा था।
स्था यत्व। इसी लए इस अध्याय म यह वाक्य उसी साँस म आता है जसम यह उ ोषणा है क भारत “सदा के लए ब्र टश
सा ाज्य का अंग बना रहेगा”। ‘सूय कभी अस्त नह होता’ कहने का अथ है : यह कभी समाप्त नह होगा।

क्या यह कथन उ चत था? उत्तर को बाँ टए, क्य क दोन भाग का नणय अलग है।

दावा नणय प्रमाण

सामाज्य के चरम पर स त्य प्रत्येक बसे हुए महा प पर उप नवेश, सभी दे शांतर म फैले हुए
भौगोिलक कथन के रूप में

स्थाियत्व के कथन के रूप अस त्य अध्याय कहता है क 20व शताब्द के मध्य म, वशेषकर तीय वश्वयुद्ध के प ात उप नवेशवाद
में का अंत होने लगा और अ धकांश उप नवे शत राष्ट्र स्वतंत्र हुए — भारत 1947 म

सामाज्य के स्वरूप के भामक यह सा ाज्य को केवल लंदन क ओर से दे खता है। यह नह बताता क ये भूभाग कैसे प्राप्त हुए, या
कथन के रूप में यह क प्रशासन, सेना और अ धका रय क भव्य जीवन-शैली का व्यय भारतीय अपने कर से
चुका रहे थे

यह घोषणा कहे जाने के समय ही असत्य क्य थी : अध्याय म यह वाक्य प्र तरोध वाले अनुभाग से ठ क पहले
आता है — और यह स्थान जानबूझकर चुना गया है। “भारत पर ब्र टश अ धग्रहण के आरंभ से ही प्र तरोध क
चेष्टाएँ प्रकट होने लग ।” संन्यासी-फक र वद्रोह, कोल और खासी जनक्रां तयाँ, संथाल वद्रोह, नील वद्रोह, और
फर 1857 : सा ाज्य कसी भी क्षण वास्तव म न वरोध नह था। जस समय भूभाग बनाए रखने के लए गाँव
जलाए जा रहे ह , उस समय स्था यत्व क घोषणा तथ्य नह , इच्छा का कथन है।

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 105

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल
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चत्र 4.16 — टश भारतीय सा ाज्य का मान चत्र, 1909
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आइए पता लगाएँ

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a s emचत्र का नरीक्षण कर। वतमान भारत के मान चत्र क अपेक्षा सीमाओं तथा नाम म क्या मुख्य अंतर ह?
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प्र.1

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भारतीय सामाज्य के राजनीितक िवभाग, 1909

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अफ़ ग़ ािनस्तान
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उत्तर--पिश् चम सीमा पातं ितब्बत

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पंजाब

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बलूिचस्तान
seपूव बंगाल एवं असम
नेपाल भूटान

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िसंध संयक्ु त पातं

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राजपूताना एजेंसी

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मध्य भारत एजेंसी
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बड़ ौदा मध्य पातं कलकत्ता
कलकत्ता

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बंबई
बंबई

अरब सागर
अरब सागर िनचला बम

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a गोवा ((पुत गाली)) मद ास बंगगाल
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पांिडचेरी ((फ़ांस ीसी))

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िबिटश भारत (सीधे पशािसत) दे शी (िरयासती) राज्य
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अ य यूर ोपीय अिध कार साम ा य के बाहर

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agl टश भारत, दे शी राज्य, सा ाज्य के बाहर) द गई है। मूल प्लेट क भीतरी सीमाएँ एवं
चत्र 4.16, पृष्ठ 105 — 1909 का टश भारतीय सा ाज्य, यहाँ इंपी रयल गैज़े टयर एटलस ऑफ़ इं डया, प्लेट 20 के
आधार पर वास्त वक अक्षांश-दे शांतर पर पुन न मत। इसम प्लेट जतना ही वस्तार, वही वभाग, वही नाम तथा प्लेट
क अपनी तीन-भागी सूची (

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रेल-लाइन यहाँ नह बनाई गई ह; दे शी राज्य को उनके स्थान पर केस रया बदुओं से दशाया गया है। नाम प्लेट क
वतनी के अनुसार ह।
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a s emउत्तर
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पहले मान चत्र क अपनी लीजड दे खए, जो नीचे बाईं ओर छपी है, क्य क शेष सब कुछ उसी से नकलता है :

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टश भारत — लाल सीमा रेखा, अथात प्रत्यक्ष रूप से ब्र टश प्रशासन के अधीन भूभाग।
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गुलाबी — भारत सरकार ारा स्थायी eरूप
s mसे प्रशा सत क्षेत्र।
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पीला — दे शी रयासत और क्षेgत्रl, अथात वे रयासती राज्य जनका वणन अध्याय पहले कर चुका है।
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काली रेखाएँ — रेलमाग।

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मान चत्र का शीषक है ‘भारतीय सा ाज्य के राजनी तक वभाजन’। अब दोन प्रकार के अंतर दे खए।
क. सीमाओं के अंतर

1909 के मान चत्र म आज के भारत के मान चत्र म

िसंध , बलूिचस्तान एजेंस ी, पंजाब, उत्तर-पिश्चम सीमांत पांत और कश्मीर — इसका पिश्चमी भाग पािक स्तान है, जो 1947 से एक अलग दे श
सब एक ही ‘भारतीय सामाज्य’ के भीतर है

पूव बंग ाल और असम एक इकाई, िजसमें ढाका सिम्मिलत वह पूव भाग बांग्लादे श है और ढाका उसकी राजधानी

बम (म्यांम ार) सामाज्य के रंग में — मंडाले , रंग ून, मौलमीन अंिकत ृ क
म्यांम ार — एक अलग दे श, भारत से पूणतः पथ

लाल-ग ल
ु ाबी पांतों के भीतर पीली िरयासतों की चकत्ते द ार बुनावट — कश्मीर, एक भी िरयासत नही ं। आज भारत में िनव िचत सरकारों वाले
राजपुताना एजेंस ी, मध्य भारत एजेंस ी, हैद राबाद, मैस ूर , त्रावणकोर, बड़ौदा, राज्य और कें द शािसत पदे श है,ं और मानिचत्र एक ही अखंड रंग
ग्वािलयर, भोपाल, इंद ौर, बस्तर और सै क ड़ों अन्य का है

िवशाल पांत : बॉम्बे पेस ीडेंस ी, मद ास पेस ीडेंस ी, बंग ाल, संयक्ु त पांत, मध्य पांत अनेक छोटे राज्य, जो अिधकांशतः भाषा के आधार पर बने —
और बेर ार, पंजाब महारा , गुजरात, तिमलनाडु, कन टक , आंध पदे श, तेल ंगाना,
उ त्तर पदे श, मध्य पदे श, छत्तीसगढ़ आिद

गोवा, दमन और दीव (पुतगाली) तथा पांिडचेर ी, कािरकल आिद छोटे क्षेत्र ये सब आज भारत में है ं — गोवा एक राज्य, पुडुचेरी तथा दमन
(फ ांस ीसी) िबिटश भारत का भाग नही ं और दीव कें द शािसत पदे श

सीलोन नीचे अलग िदखाया गया; नेपाल, भूटान, िसिक्कम, ितब्बत और सीलोन अब श्रीलंक ा है; नेपाल और भूटान स्वतंत्र पड़ ोसी;
अफगािनस्तान रंग े हुए सामाज्य से बाहर िसिक्कम भारत का राज्य है; ितब्बत चीन में है

ख. नाम के अंतर — मान चत्र औप नवे शक वत नय से भरा है, जो बाद म बदल द गईं :

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1909 का मान चत्र आज 1909 का मान चत्र आज

कलकत्ता कोलकाता कै िलकट कोिझकोड

बॉम्बे मुंबई कोचीन कोिच्च

मद ास चे ई
न्न ित्रवेन्द म ितरुवनंतपुरम

बंग लौर बेगं लूरु ित्रिचनोपोली ितरुिचरापल्ली

पूना पुणे रंग ून यंगून

डाका ढाका मसुल ीपट्टनम मछलीपट्टनम

बनारस वाराणसी िवशाखापट्टनम् िवशाखापत्तनम

नोवा गोवा गोवा (पणजी) बड़ौदा वडोदरा

सीलोन श्रीलंक ा मैस ूर (नगर) मैस ूरु

बम म्यांम ार लक्का ीप ीपसमूह ल क्ष ीप

पांिडचेर ी पुडुचेरी मंग लौर मंगलूरु

मान चत्र वह बताता है जो पाठ नह बता सकता : लाल के भीतर बखरे पीले टु कड़े दे खए। यही सहायक सं ध
क प्रणाली का चत्र है — ब्र टश को पूरा मान चत्र लाल करने क आवश्यकता नह थी, क्य क जो शासक रे सडट
से बँधा हो, अपने व्यय पर ब्र टश सै नक रखता हो और वदे शी संबंध न रख सकता हो, वह पहले ही नयं त्रत था।
‘कम व्यय म सा ाज्य’ एक दृ ष्ट म दख जाता है। और काली रेलमाग रेखाएँ दे खए : वे भीतरी क्षेत्र से कलकत्ता,
बंबई, मद्रास और कराची — अथात बंदरगाह — क ओर जाती ह, ठ क वैसे ही जैसा अध्याय कहता है क इनका
“वास्त वक उ े श्य कच्चे माल को आंत रक क्षेत्र से बंदरगाह तक पहुँचाना” था।

स्वयं जाँ चए : कसी एटलस म द क्षण ए शया का आज का राजनी तक मान चत्र खोलकर दोन को साथ र खए।
ग नए क 1909 म जसे एक सा ाज्य कहा गया, उस क्षेत्र म आज कतने दे श ह। फर एक ऐसी वस्तु खो जए जो
नह बदली — रेल संजाल आज भी बहुत हद तक वही है जो उस 1909 के मान चत्र म काली रेखाओं से खचा है।

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 107

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जनजातीय वद्रोह — चत्र 4.17, इलस् े टेड लंदन न्यूज का 1856 का रेखा चत्र

आइए पता लगाएँ

प्र.1 चत्र 4.17 म कलाकार क कल्पना से 1856 म च त्रत संथाल के वण, वस्त्र एवं अस्त्र को ध्यान से दे ख और यह
अनुमान लगाएँ क टे न क सामान्य जनता म यह चत्र कस प्रकार क धारणा उत्पन्न करता रहा होगा।

अग्रभू म — संथाल। लगभग एक दजन पुरुष, नंगे बदन और नंगी टाँग वाले, केवल एक छोट सफ़ेद
लंगोट पहने, लंबे बखरे बाल और गहरी छायां कत (श्याम) त्वचा। एक पैर फैलाए लंबा धनुष ख च
रहा है; दूसरा टे ढ़ा अस्त्र भाँज रहा है; तीसरा हाथ म तीर लए झुका है। कई भू म पर पड़े ह — मृत
अथवा घायल — और उनके धनुष-बाण घास म गरे ह।
मध्य दूरी — सपाही। ठोस भू म पर वद धारी सै नक क सीधी, अटू ट पं क्त कंधे से कंधा मलाए
खड़ी है — बटन वाले कोट, टो पयाँ और जूते पहने, बंदूक तानी हुई। अभी-अभी दागी गई गो लय
का सफ़ेद धुआँ उनके सामने फैला है।
पृष्ठभू म। फूस क नीची झोप ड़य क कतार, ताड़ के वृक्ष, वृक्ष से ढक ढलान और धुँधला उत्क ण
आकाश।
दोन पक्ष क स्थ त। संथाल नीची घासभरी अग्रभू म म बखरे, झुके और गरते हुए दखाए गए ह;
सै नक दूर, छोटे कतु पूण व्यवस्था म, सीधे खड़े और अछू ते दखाए गए ह।

चत्र 4.17, पृष्ठ 107 — इलस् े टेड लंदन न्यूज़ म छपा 1856 का काष्ठ-उत्क ण चत्र, जो कलाकार क कल्पना से बनाया
गया था। यहाँ केवल उसका वणन है; चत्र के लए पाठ्यपुस्तक दे खए।

चत्र म वास्तव म क्या है। दोन पक्ष को अलग-अलग दे खए — यही वरोधाभास चत्र का पूरा प्रयोजन है।

संथाल (बाएँ तथा मध्य म) सपाही (दा हनी ओर)

वण गहरा, भारी छायाक
ं न के साथ अपेक्षाकृ त हलका, दू री पर

वस्त्र लगभग िनवस्त्र — के वल किटवस्त्र; नंग े पाँव; लंबे, िबखरे बाल पूरी वद — कोट, टोपी, श्वेत पतलून, पेिटयाँ

अस्त्र धनुष-बाण, एक उठी हुई तलवार बंदू कें , एक साथ चलाई जाती हुई ं — मैद ान में धुआँ फै ला हुआ

व्यवस्था िबखरे हुए , झुके , झपटते — पत्येक अलग-अलग सीधी, अनुशािसत पंिक्त

दशा अनेक पहले ही अग भाग में म ृत या घायल पड़े हएु सुरिक्षत दू री पर, अक्षत

नष्कष। यहाँ कुछ भी तटस्थ रपो टग नह है। कलाकार ने वह घटना दे खी ही नह थी — शीषक कहता है क यह कलाकार क
कल्पना से बनाया गया रेखा चत्र है — और यह ब्रटे न के पाठक के लए इलस्ट्रे टेड लंदन न्यूज म छपा था। अतः यह चत्र संथाल क
युद्ध-पद्ध त का नह , टश जनमत का प्रमाण है।

यह ‘सभ्यता बनाम बबरता’ का दृश्य रचता है। एक ओर वस्त्रधारी, व्यव स्थत, आधु नक; दूसरी ओर लगभग नग्न,
अव्यव स्थत, आ दम। 1856 के ब्र टश पाठक को एक शब्द कहे बना दखा दया गया क ये वही ‘आ दम’ लोग ह जन्ह,
अध्याय के अनुसार, ब्र टश जनजा तय के लए कहते थे।

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यह हत्या को अवश्यंभावी, ब ल्क स्वाभा वक बना दे ता है। य द एक ओर बंदूक ह और दूसरी ओर बाण, तो प रणाम को
कसी औ चत्य क आवश्यकता नह रहती — वह प्राकृ तक नयम जैसा दखने लगता है, न क गाँव जलाने और हजार को
मारने का नी तगत नणय।
यह कारण को हटा दे ता है। चत्र म कह कोई साहूकार, जम दार, कर क माँग या भू-अ भलेख नह है — और वद्रोह के
कारण वही थे। संथाल ने उन साहूकार और जम दार के वरुद्ध वद्रोह कया था जो ब्र टश समथन से उनके पूवज क भू म
छ न रहे थे। कारण हटा द जए तो वद्रोह केवल उग्रता दखने लगता है।
यह ‘सभ्यकारी अ भयान’ को शोभा दे ता है। जो पाठक प्र त सप्ताह ऐसे चत्र दे खते, वे यही नष्कष नकालते क ब्रटे न
असभ्य के बीच व्यवस्था स्था पत कर रहा है — ठ क वही मान्यता जसे अध्याय आरंभ म उप नवेशवाद का आवरण बताता है।

यह रेखा चत्र जो सच्चाई दखा दे ता है : शीषक स्वयं इसे “असमान टकराव” कहता है, और चत्र इस असमानता
को छपाता नह — बाण के सामने बंदूक, भू म पर पड़े शव। उलट दशा से पढ़ने पर वही चत्र इस बात का प्रमाण
बन जाता है क दमन कतना एकपक्षीय था। सद्ध और कान्हू मुमू के नेतृत्व म संथाल ने अपने शासन क घोषणा
क थी और ‘रक्त क अं तम बूँद तक युद्ध’ का संकल्प लया था; ब्र टश ने गाँव जला दए और हजार संथाल क
हत्या क । ब्र टश ेष्ठता सद्ध करने के लए बनाया गया चत्र अंततः ब्र टश बल का ही अ भलेख बन जाता है।

परीक्षा के लए सुझाव : औप नवे शक काल के कसी भी चत्र के सामने तीन प्रश्न अवश्य पू छए — यह कसने
बनाया, कसके लए बनाया, और इसम कौन अनुप स्थत है? यहाँ : एक ब्र टश कलाकार ने, ब्र टश प त्रका के लए,
और अनुप स्थत ह संथाल के कारण।

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 108
आ थक शोषण के वरुद्ध कृषक के वद्रोह — नील वद्रोह

आइए पता लगाएँ

प्र.1 नील एक प्राकृ तक गहरा नीला रंग है, जो वस्त्र रंगने म प्रयोग होता है। क्या आप ऐसे अन्य पारंप रक प्राकृ तक
रंग को जानते ह, जनका उपयोग भारत म वस्त्र रंगने के लए कया जाता रहा है?

हाँ — रासाय नक रंग से बहुत पहले भारत के पास प्राकृ तक रंग क पूरी प का थी, जो जड़ , छाल, फूल , बीज , क ट और
ख नज से बनती थी। इसी लए भारतीय वस्त्र अपने चमक ले रंग के लए प्र सद्ध थे, जैसा अध्याय कुछ पृष्ठ पहले बता चुका है।

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रंग प्राकृ तक ोत टप्पणी

m नील के पौधे की पित्तयों से as e
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यही वह रंग है जसके कारण नील वद्रोह (1859–1862) हुआ

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l a मजीठ का लाल गुजरात और कोरोमंडल तट के प्र सद्ध छापे वाले
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मंिजष्ठा (भारतीय मजीठ) की जड़; लाख के कीट से
पाप्त लाक्षा सूती वस्त्र का आधार था

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पीला हल्दी; अनार का िछलका; हरड़ (हरीतकी) हरड़ रंगबंधक (मॉडट) का काम भी करती है, जो रंग को कपड़े

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कु सुम के फू ल; के सर; पलाश (टेस ू) के फू ल पलाश के फूल आज भी होली के रंग के लए उबाले जाते ह

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भूरा मेहँद कपड़े पर भी नारंगी-भूरा रंग दे ती है
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खैर की लकड़ी से कत्था; अखरोट और प्याज के

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िछलके ; मेहदँ ी

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काला / धूसर गड
ु ़ के पानी में िभगोया लोहे का बुर ादा (कसीम या कलमकारी और अजरख छपाई क परंपरागत काली रेखा
लौह-जल)

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हरा पायः दो बार रँग कर — िकसी वानस्पितक पीले के बहुत कम पौधे सीधे पक्का हरा रंग दे ते ह

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ऊपर नील का नीला

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इसम केवल पौधा नह , कौशल लगता था : अ धकांश प्राकृ तक रंग सूती कपड़े पर स्वयं नह चढ़ते। उन्ह

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रंगबंधक (मॉडट) चा हए — फटकरी, लोहा या हरड़ जैसा कोई पदाथ जो पहले लगाया जाता है, रंग को रेशे से

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बाँधता है और उसे बदल भी दे ता है (वही मजीठ फटकरी के साथ लाल और लोहे के साथ गहरा बगनी-काला दे ती

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है)। भारतीय रँगरेज ने ये संयोग शता ब्दय म सद्ध कए थे, इसी लए भारतीय सूती वस्त्र धोने पर भी रंग नह छोड़ते

m .c क यूरोपीय नकल फ क पड़ जाती थ । ये परंपराएँ आज भी जी वत ह —agअजरख (कच्छ), बगरू और
seसांगानेर क छपाई (राजस्थान), कलमकारी (आंध्र प्रदे श) तथा बंधनी (गुजरात और राजस्थान)।
थे जब

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स्वयं जाँ चए : मु भर प्याज के छलके दस मनट पानी म उबा लए और श्वेत सूती कपड़े क एक प उसम
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m . डु बोइए। अब दोन धोइए। जो जल्द फ क पड़े, उसी को रंगबंधक a
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aहीs बता दे ता है क रँगरेज का ज्ञान इतना मूल्यवान क्य था।
डु बोइए। दूसरे बतन म हल्द उबालकर दूसरी प

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क आवश्यकता थी — यह एक प्रयोग

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आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 108
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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

1857 का महान वद्रोह

आइए पता लगाएँ

प्र.1 आपके अनुसार स्वतंत्रता प्रा प्त के प ात ‘ सपाही वद्रोह’ सं ा को क्य अस्वीकार कया गया? एक अनु ेद म
कारण ल खए।

क्य क यह नाम घटना के लए बहुत छोटा था और वह हारने वाले पक्ष के शत्रु से उधार लया गया था। पुस्तक क अपनी
हा शया टप्पणी से आरंभ क जए : वद्रोह (म्यू टनी) का तात्पय है सै नक ारा अपने अ धका रय के वरुद्ध क गई बगावत। इस
प रभाषा का प्रत्येक अंश यहाँ समस्या है।

‘ सपाही वद्रोह’ से जो वह क्य नह बैठता
ध्व नत होता है

इसमें के वल सै िनक थे उ त्तर एवं मध्य भारत में शासक और सामान्य जन भी सिम्मिलत हुए — िद ल्ली में बहादुर शाह जफर,
कानपुर में नाना साहेब, झाँस ी में रानी ल क्ष्मीबाई, लखनऊ में बेगम हजरत महल , और वे गामवासी िजनके
गाँव और फसले ं बाद में िबिटशों ने जलाईं

यह से ना के भीतर अनुशासन की कारण राजनैितक और आिथक थे : हड़ प नीित के िवलय, भूिमकर नीित जो स्वयं िसपािहयों के कृ षक
समस्या थी पिरवारों को नष्ट कर रही थी, और 1806 के वेल्लोर तक जाने वाली धािमक िशकायते ं

िवद ोिहयों पर अपने अिधकािरयों यह मान्यता तभी बनती है जब ईस्ट इंिडया कं पनी का भारत पर अिधकार वैध माना जाए — स्वतंत्र भारत
की आ ा मानने का वैध दाियत्व यह मान्यता स्वीकार नही ं कर सकता था
था

यह कोई स्थानीय उपद व था, जो यह उ त्तर और मध्य भारत में फै ला, कानपुर, लखनऊ और झाँस ी जैसे महत्वपूण नगरों पर अिधकार हुआ,
शीघ दबा िदया गया और इसे कु चलने के िलए लंबा दंडात्मक अिभयान चलाना पड़ ा

नमूना अनु े द (प्रश्न के अनुसार एक ही अनु े द म) :
‘ सपाही वद्रोह’ संज्ञा स्वतंत्रता के प ात इस लए अस्वीकार क गई क्य क वह शासक का दया हुआ नाम था और घटना के केवल
सबसे छोटे अंश का वणन करता था। ‘ वद्रोह’ (म्यू टनी) का अथ है सै नक ारा अपने अ धका रय क अवज्ञा, कतु 1857 म जो
हुआ वह इससे कह व्यापक था : मेरठ के सपा हय के साथ दल्ली म मुगल स ाट, कानपुर म नाना साहेब, झाँसी म रानी
लक्ष्मीबाई, लखनऊ म बेगम हजरत महल और गाँव के असंख्य सामान्य जन जुड़े, और ब्र टश को इसे समाप्त करने के लए महीन
तक गाँव जलाने और फसल नष्ट करने पड़ । यह शब्द कारण को भी छपा दे ता है — हड़प नी त के अंतगत हुए वलय, वे भू मकर
क माँग जो सपा हय के अपने कृषक प रवार को उजाड़ रही थ , और धा मक आचरण म हस्तक्षेप का वह पुराना क्रोध जो 1806
के वेल्लोर वद्रोह म भी फूट चुका था। सबसे बढ़कर, ‘ वद्रोह’ यह मानकर चलता है क ईस्ट इं डया कंपनी वैध सत्ता थी और उससे
लड़ने वाले भारतीय अपना वैध कतव्य तोड़ रहे थे; स्वतंत्र भारत यह मान्यता स्वीकार नह कर सकता था, और उप नवेशक का शब्द
रखने का अथ होता उप नवेशक क दृ ष्ट रखना। इस लए इ तहासकार ने अन्य संज्ञाएँ प्रस्ता वत क , और यह पुस्तक अनेक व ान
के अनुसार इसे ‘1857 का महान वद्रोह’ कहती है।

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जहाँ इ तहासकार आज भी असहमत ह — यह जानना आवश्यक है : ‘ सपाही वद्रोह’ को अस्वीकार करना
सरल था; उसका स्थान क्या ले, इस पर सहम त क ठन रही। कुछ इ तहासकार इसे भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम
कहते ह, यह तक दे ते हुए क पहली बार व भन्न क्षेत्र , धम और वग के भारतीय एक वदे शी श क्त के वरुद्ध साथ
लड़े। अन्य मानते ह क यह नाम आवश्यकता से अ धक दावा करता है, क्य क — जैसा यही अध्याय कहता है —
वद्रो हय म एकता एवं सुसंगत रणनी त का अभाव था, उपमहा प के बड़े भाग शांत रहे, और वजय के बाद
क्या होगा, इसका कोई साझा कायक्रम नह था। ‘1857 का महान वद्रोह’ बीच का माग है : यह घटना को उसका
वास्त वक वस्तार दे ता है, कतु उस राष्ट्रीय एकता का दावा नह करता जो अभी बननी शेष थी। अध्याय का अपना
नष्कष भी यही सहारा दे ता है — वद्रोह वफल रहा, कतु उसने यह बीज बोया क वदे शी शासन अस्वीकाय है,
और वही बीज 20व शताब्द के आरंभ म “अन्य व धय के साथ” पूण स्वतंत्रता के संघष म प रणत हुआ।

आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 112
भारत म यूरोपीय उप नवेशवाद क वरासत

आइए पता लगाएँ

प्र.1 “इसने भारत को वश्व से और वश्व को भारत से जोड़ा (या पुनः जोड़ा)” वाक्य म ‘पुनः जोड़ा’ क्य स म्म लत
कया गया होगा? वचार कर।

क्य क भारत कभी बंद था ही नह । ‘पुनः जोड़ा’ एक सुधार है — यह वाक्य को उस औप नवे शक दावे को अनजाने दोहराने से
रोकता है क यूरोपीय लोग ने भारत को ‘खोजा’ या ‘खोला’।
प्रमाण इसी अध्याय म, कुछ पृष्ठ पहले ह :

भारत का व्यापार यूना नय और रोमन के साथ लगभग दो सह ा ब्दय पूव से चलता आ रहा था।
भारतीय वस्तुओं — मसाले, कपास, हाथी-दाँत, रत्न, चंदन, सागवान, वूट्ज स्ट ल — क भूमध्यसागरीय क्षेत्र म अत्य धक माँग
थी।
यूरोपीय पोत के आने से पहले भारत के पास व्यापक आंत रक एवं बाह्य व्यापा रक संजाल थे, और 16व शताब्द से
यूरोपीय यात्री उसे ‘समृद्धशाली’ बताते थे।
1498 म वास्को-डी-गामा को कोई अनजान भू म नह मली थी; वह एक चलते हुए बंदरगाह — को झकोड के समीप कप्पड़
— पर पहुँचा था, जहाँ उसका स्वागत भलीभाँ त हुआ, जब तक उसके अपने आक्रामक आचरण ने संबंध बगाड़ नह दए।

अथात भारत और वश्व के बीच वस्तुओं, लोग और वचार का आवागमन बहुत पुराना है। औप नवे शक शासन म जो बदला वह
संपक का आरंभ नह था, ब ल्क यह था क उस संपक पर नयंत्रण कसका है और शत क्या ह। ब्रटे न ने समुद्र व्यापार और
व नमय दर तक पर नयंत्रण कर लया, जससे जो संबंध कभी दोन दशाओं म बहता था, वह मुख्यतः एक दशा म बहने लगा।

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कोष्ठक का गहरा कारण : भाषा अपने साथ मान्यताएँ लाती है। ‘भारत को वश्व से जोड़ा’ कहने म चुपचाप यूरोप
कता बन जाता है और भारत कम — वही व्याकरण जो ‘सभ्यकारी अ भयान’ का है। ‘(या पुनः जोड़ा)’ जोड़ने से यह
तथ्य लौट आता है क भारत दो हजार वष से वश्व-व्यापार और वश्व- चतन म स क्रय भागीदार रहा है, और
औप नवे शक काल ने उस आदान-प्रदान को आरंभ नह कया, ब ल्क बा धत और मोड़ दया। अध्याय का अंत यही
बात दूसरी दशा से कहता है — राजनै तक प्रभुत्व एक दशा म बहा, कतु सांस्कृ तक प्रभाव कभी-कभी वपरीत
दशा म भी बहा : यूरोप पहुँचे संस्कृत ग्रंथ, हेगेल के शब्द म, ‘नव-महा प क खोज’ के तुल्य थे।

प्र.2 कुछ लोग कहते ह क चोरी क गई सांस्कृ तक धरोहर वदे श म अ धक सुर क्षत रह । आपके अनुसार क्या इन्ह
भारत वापस लाना उ चत होगा? समूह म वचार कर।

यह वास्त वक ववाद है, अतः इसे तक से ल ड़ए, केवल घोषणा से नह । पहले दोन पक्ष का सबसे सशक्त रूप र खए —
जस तक को आपने ईमानदारी से रखा नह , उसका उत्तर भी आपने नह दया।

वापस न लाने का पक्ष वापस लाने का पक्ष

संरक्षण। अनेक वस्तुएँ एक शताब्दी से िनयंित्रत तापमान वस्तुए ँ चुराई गई थी ं। अध्याय स्पष्ट है : औपिनवेिशक शिक्तयों ने “हजारों मूितयाँ,
वाले संग हालयों में सुर िक्षत रखी गई है ं िचत्र, रत्न, पांडुिलिपयाँ एवं अन्य सांस्कृ ितक धरोहरे ं चुरा ली”ं । सावधानी से रखना
स्वािम त्व नही ं बनाता

पहुचँ । िकसी बड़े िवश्व-संगहालय को हर दे श से लाखों पहचु ँ िकसकी? िजनके पूवजों ने ये वस्तुए ँ बनाईं, उ न्हे ं उ न्हे ं दे खने के िलए पासपोट
लोग दे खते है,ं िजससे भारतीय कला की सराहना फै लती और हवाई िटकट चािहए। भारतीय संगहालयों में भी बहुत बड़ ी संख्या में दशक आते है ं
है

अध्ययन। एक ही स्थान पर एकत्र संगह िव ानों को अथ खो जाता है। मंिदर से अलग की गई पितमा सजावट बनकर रह जाती है। इनमें
अनेक क्षेत्र ों की वस्तुओ ं की तुल ना करने दे ता है से अनेक वस्तुए ँ के वल ‘कला’ नही ं — कु छ आज भी जीिवत पूजा की वस्तुए ँ है ं

व्यावहािरकता। यिद पत्येक संग हालय सब कु छ लौटा दे कोई सब कु छ माँगता भी नही ं। दावे पायः िविशष्ट और पमाण-सिहत होते है,ं और
तो िवश्व के संग ह खाली हो जाएँग े अध्याय बताता है िक वापस लाने के पयास पहले से चल रहे है ं

नमूना उत्तर (एक ऐसा पक्ष जसका बचाव कया जा सके) :
संरक्षण वाला तक गलत प्रश्न का उत्तर दे ता है। वह पूछता है क वस्तुओं क दे खभाल हुई या नह ; वास्त वक प्रश्न यह है क वे उ चत
री त से प्राप्त क गई थ या नह , और अध्याय के अपने प्रमाण के अनुसार नह क गई थ । चोरी क वस्तु क अच्छ दे खभाल चोर
को स्वामी नह बना दे ती — य द ऐसा होता तो जो जतना कुशल चोर, उसका दावा उतना ही मजबूत होता। इस लए म उन वस्तुओं
क वापसी का समथन करूँगा जनका औप नवे शक काल म उठाया जाना प्रमा णत कया जा सके, तीन उ चत शत के साथ।
पहली, दावे प्रत्येक वस्तु के लए अलग-अलग और प्रमाण के आधार पर ह , सामू हक माँग के रूप म नह । दूसरी, प्राप्त करने वाली
संस्था उस वस्तु का संरक्षण और प्रदशन ठ क से कर सके — और भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय तथा भारतीय पुरातत्व सवक्षण, जस
अनुशासन का आरंभ अध्याय के अनुसार इसी काल म हुआ, इसके लए उत्तरोत्तर सक्षम होते जा रहे ह। तीसरी, जहाँ कोई वस्तु
सुर क्षत यात्रा न कर सके, वहाँ द घका लक ऋण, संयुक्त प्रदश नयाँ और उच्च गुणवत्ता क प्र तकृ तयाँ एक उ चत मध्यवत उपाय
ह। उ े श्य आज के संग्रहालय को उनके पूवज के काय का दं ड दे ना नह , ब ल्क उस अन्याय को सुधारना है जो वस्तु के वहाँ रहने
के प्रत्येक दन जारी है।

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समूह-चचा के लए : प्रत्येक सदस्य एक वास्त वक वस्तु चुने — जैसे एक पांडु ल प, एक मं दर-प्र तमा और एक
रत्न — और उसका पक्ष अलग से रखे। आप पाएँगे क उत्तर वस्तु के अनुसार बदलता है, और यही कारण है क
दोन ओर के सवव्यापी दावे दुबल होते ह। समूह यह भी तय करे क कसी दावे को स्वीकार करने से पहले वह कौन-
से प्रमाण माँगेगा।

प्रश्न और क्रयाकलाप — पृष्ठ 114–115
अध्याय के अंत म

प्र.1 उप नवेशवाद क्या है? इस अध्याय या अपनी जानकारी के आधार पर तीन व भन्न प रभाषाएँ द जए।

तीन प रभाषाएँ, प्रत्येक उप नवेशवाद को एक भन्न दृ ष्ट से दे खती हुई। तीन मलकर उसे कसी एक से बेहतर ढं ग से घेरती ह।

1. अध्याय क प रभाषा (राजनै तक)। उप नवेशवाद वह व्यवहार है “जब एक दे श कसी अन्य प्रदे श पर अ धकार कर वहाँ
अपनी ब स्तयाँ स्था पत करता है और अपना राजनै तक, आ थक तथा सांस्कृ तक तंत्र आरो पत करता है”।
मूल बात : बाहरी नयंत्रण + ब स्तयाँ + आरो पत तंत्र।
2. आ थक प रभाषा। उप नवेशवाद वह व्यवस्था है जसम एक दे श दूसरे दे श क अथव्यवस्था को अपने हत के अनुसार
पुनग ठत करता है — उप नवेश को कच्चे माल का आपू तकता और अपनी वस्तुओं का बंधा हुआ बाजार बना दे ता है, और
लाभ अपने दे श ले जाता है।
अध्याय से प्रमाण : ब्रटे न म भारतीय वस्त्र पर भारी कर और भारत म ब्र टश वस्तुओं पर नाममात्र कर; कच्चा माल भीतरी क्षेत्र
से बंदरगाह तक ले जाने के लए बने रेलमाग; नौरोजी, दत्त और पटनायक ारा मापा गया संपदा का नकास।
3. सांस्कृ तक प रभाषा। उप नवेशवाद वह शासन है जसे ेष्ठता के दावे से उ चत ठहराया जाता है — उप नवेशक उप नवे शत
को ‘असभ्य’, ‘आ दम’ या ‘बबर’ घो षत करता है, वजय को ‘सभ्यकारी अ भयान’ कहता है, और उनक शक्षा, व ध तथा
भाषा को अपने साँचे म ढाल दे ता है।
अध्याय से प्रमाण : मैकॉले का 1835 का म नट और “स्वाद, वचार, नै तकता और बु द्ध से अंग्रेज” बनाने का लक्ष्य; प्रथागत
व धय के स्थान पर ब्र टश कानून-सं हताएँ; चत्र 4.14 क गौरवण बता नया और श्यामवण ‘स्था नक’।

तीन प रभाषाएँ क्य , एक क्य नह : उप नवे शत दे श एक साथ तीन भन्न वस्तुएँ खोता है — अपनी प्रभुसत्ता,
अपना अ धशेष और अपनी आत्म-छ व। जो प रभाषा केवल सै नक क बात करती है वह कर को छोड़ दे ती है;
जो केवल कर क बात करती है वह कक्षा को छोड़ दे ती है। भारत ने तीन खोए; पहले दो 1947 म वापस मले,
तीसरे म अ धक समय लगा।

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उप नवेशवाद शासक प्रायः यह दावा करते थे क उनका उ े श्य शा सत लोग को ‘सभ्य’ बनाना था। इस अध्याय
म प्राप्त प्रमाण के आधार पर बताइए क क्या भारत के संदभ म यह सत्य था? क्य या क्य eनह
प्र.2

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उत्तर as
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ag। lइस अध्याय के प्रमाण पर यह दावा टकता नह , और अध्याय स्वयं यह कहता है : भारत पर यूरोपीय वजय और
नह

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शासन “ कसी भी प्रकार से ‘सभ्यकारी अ भयान’ नह था, क्य क भारत क अपनी सभ्यता यूरोप से कह प्राचीन थी। यह शासन

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अधीनता और शोषण क नय मत व्यवस्था थी, जसम आवश्यकता पड़ने पर क्रूर दमन कया जाता था।” कतु केवल नणय
दोहराना दुबल उत्तर है। दावे को पर खए।
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परीक्षा 1 — वास्त वक सभ्यकारी अ भयानa ै सा दखता? वह लोग को अ धक स्वस्थ, बेहतर शा सत, बेहतर श क्षत और
अ धक संपन्न छोड़ता। तुलना क जए :

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सभ्यकारी वास्तव म क्या हुआ
अ भयान क्या
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करता

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a लोगों को अकाल से फसल हो या न हो, नकद कर की माँग; 1770–72 के बंगाल के अकाल में (लगभग एक करोड़ मृत) भूिम-कर बढ़ ाया
बचाता गया; 1876–78 के अकाल में (80 लाख तक मृत) अनाज िनय त होता रहा; िलटन ने आदे श िदया िक अ के मूल्य घटाने
m जाएगा”, और उसी चरम अकाल में 68,000 अितिथयों का सप्ताहभर a s
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के िलए “िकसी भी पकार का हस्तक्षेप नहीoं िकया
न्न

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का भोज कराया
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उ ोग और कौशल agत्रण से वस्त्र उ ोग नष्ट; कु शल कारीगर समुदाय िनधनता में; िवश्व जी.डी.पी. में भारत का भाग
करों और िविनमय-िनयं
बढ़ ाता कम-से -कम एक -चौथाई से घटकर मात्र 5 पितशत
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.c , और महँगे, धीमे,
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शासन सुध ारता जो गाम पंचायते ं िसंचाई, सड़ कें और िववाद सँभालती थी ं उनके स्थान पर कर-संगह की नौकरशाही
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िवदे शी भाषा वाले न्यायालय
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as eिशक्षा फैलाता
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िबिटश पितवेद नों के अनुस ार ही 1830 तक के वल बंगाल और िबहार में 1,00,000–1,50,000 गाम्य िव ालय थे; मैक ॉले
a g के िमिनट के बाद वे धीरे -धीरे िवलुप्त हो गए , और नई पणाली का ल क्ष्य स स्ते िलिपकों का वग था

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लोगों को बराबर
अवै ािनक अवधारणा पर बनी ं .com
एक िविध से सै क ड़ ों जनजाितयाँ ‘अपराधी जनजाित’ घोिषत हुई ं और दशकों तक अन्याय सहा; जाित-सूिचयाँ ‘नस्ल ’ की
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मानता

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परीक्षा 2 — व्यय कसने उठाया और लाभ कसे हुआ? रेलवे, टे लीग्राफ, सवक्षण, प्रशासन और युद्ध तक का व्यय भारतीय
कर से चुकाया गया। जस उपहार का बल पाने वाले को थमा दया जाए, वह उपहार नह होता। और जब दोन पलड़े तौले जाते ह
तो अध्याय का नणय है क लाभ “प्रायः उप नवेशक को ही मला”।
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परीक्षा 3 — दूसरे पक्ष के साथ न्याय क जए। अध्याय वास्त वक लाभ को दज करता है, e
s mआपको भी करने चा हए :
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और

. co प का गहन सवक्षण; स्मारक के दस्तावेज, उनक कला और वास्तुकला काagअध्ययन, l कुछ खंडहर क पुनस्थापना तथा
emभारत म पुरातत्वशास्त्र का आरंभ; संस्कृत ग्रंथ के प्रथम अंग्रेजी अनुवाद ( व ल्कन्स क भगव ता, 1785), जो यूरोपीय
उपमहा

as दाश नक , सा हत्यकार और कलाकार तक पहुँचे; और वे रेलमाग जन्ह ने लोग को नकट लाया और आंत रक बाजार को एक कृत
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कया। कतु इस सूची के वषय म तीन बात ध्यान र खए : ये अ धकांशतः अनपे क्षत प रणाम थे, उ े श्य नह ; इनका व्यय

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भारतीय ने चुकाया; और इनके साथ-साथ हजार मू तय , चत्र , रत्न और पांडु ल पय क चोरी भी चलती रही।

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सबसे सशक्त एकल तक : ‘सभ्यकारी अ भयान’ के लए यह आवश्यक है क सभ्य बनाने वाला अ धक सभ्य हो।
जहाज के आने से शता ब्दय पहले भारत म नगर, वद्या-कद्र, सा हत्य, ग णत, धातुकम और कायरत स्थानीय
स्वशासन थे — कायवाहक गवनर-जनरल मेटकाफ ने ग्राम समुदाय को “लघु गणराज्य… वे वहाँ बने रहते ह जहाँ
अन्य सब कुछ नष्ट हो जाता है” कहा था। वह दावा वास्त वकता का वणन नह था; वह, जैसा अध्याय आरंभ म ही
दखाता है, वजय को सम्मानजनक बनाने के लए गढ़ गई कहानी थी।

प्र.3 भारत को उप नवेश बनाने क टश नी त पूववत यूरोपीय श क्तय जैसे पुतगाली या ांसीसी से कस प्रकार
भन्न थी?

मुख्य अंतर पद्ध त का है : पुतगा लय ने बल और धम का खुला प्रयोग कया, ांसी सय ने सी मत पैमाने पर प्रभाव
आजमाया, और टश ने छद्म का प्रयोग कया — स्वयं को व्यापारी कहते हुए वस्तार करते रहे। छह बदुओं पर तुलना
क जए।

पुतगाली (1498 से) ांसीसी (1668 से) टश (17व शताब्द से)

मुख्य लक्ष्य मसालों के व्यापार पर एकािधकार तथा व्यापार, और भारत में पहले व्यापार, िफर राजस्व, िफर भूभाग
धम तं रण फ ांस ीसी सामाज्य

मुख्य पद्ध त नौसै िनक बल — काटज अनु ा-पत्र; यूर ोपीय कौशल में पिशिक्षत क्र िमक , सुिनयोिजत िवस्तार जो
िबना अनुम ित वाली नौकाएँ जब्त; समुद िसपाही; उत्तरािधकार िववादों क्र
“वािणिज्यक उप म का रूप िलए हुए था न
से कालीकट पर बमबारी में हस्तक्षेप कर कठपुतली क्र
िक पत्यक्ष सैन्य आ मण का”; फू ट डालो
शासकों से अपत्यक्ष शासन और राज करो; हड़ प नीित; सहायक संिध

धम और गहरा हस्तक्षेप : गोवा का धम- अिधक हस्तक्षेप नही ं; एक पत्यक्ष उ त्पीड़ न कम, िकं तु िवभाजनों का
समाज न्यायािधकरण (1560–1812), िहंद ुओ ं, दुल भ अपवाद — 1748 में सुिनयोिजत उपयोग — उ न्होंने “धािमक
मुस लमानों, यहूिदयों और धम तं िरतों पांिडचेर ी के वेद ापुर ीश्वरन समुद ायों के मध्य िव ेष को पहचानकर उसे
का उत्पीड़न, बलात धम तं रण, अनेक मंिदर का िवध्वंस बढ़ ावा भी िदया” — और आगे चलकर
मंिदरों का िवध्वंस िशक्षा तथा िविध का पूरा पुनगठन

वस्तार गोवा (1510) राजधानी, तथा मालाबार कन टक युद्धों (1746–1763) लगभग संपूण उपमहा ीप — पत्यक्ष रूप से
और कोरोमंडल तट पर कें द के बाद पांिडचेर ी और कु छ अथवा 500 से अिधक िरयासतों के माध्यम
छोटे क्षेत्र ों तक िसमट गए से

सा ाज्य का पुतगाल ने उठाया फ ांस ने उठाया; व्यापार सदा भारतीयों पर डाल िदया गया — ‘कम व्यय
व्यय सीिमत ही रहा में सामाज्य’; पशासन और अिधकािरयों की
जीवन-शैल ी तक भारतीय कराधान से पोिषत

अथव्यवस्था एक व्यापार माग पर िनयंत्र ण सीिमत व्यापार संपूण अथव्यवस्था का पुनगठन — भारत
पर प्रभाव क च्चे माल का आपूितकत और िबिटश
वस्तुओं का बाध्य बाजार बन गया

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छद्म इतना नणायक क्य था : क्य क उसने प्र तरोध का कारण ही हटा दया। स्थानीय शासक वदे शी व्यापार का
स्वागत करते ही थे, इस लए एक व्यापा रक कद्र नरापद लगा — और अध्याय बताता है क ब्र टश को अपने कद्र
“ बना वशेष वरोध के” मल गए। जो श क्त बंदरगाह पर गोले बरसाती हुई आती है, वह अपने वरो धय को जोड़
दे ती है; जो श क्त आपके प्र त ं के वरुद्ध सहायता दे ने आती है, वह उन्ह बाँट दे ती है। साथ ही अध्याय क दज
क हुई यह वडंबना भी ध्यान र खए : ब्र टश शासन को संभव बनाने वाली दो यु क्तयाँ — सपाही सेना और
कठपुतली शासक से अप्रत्यक्ष शासन — ांसीसी डु प्ले ने आरंभ क थ ; ब्र टश ने उन्ह बस कह बड़े पैमाने पर
चलाया।

प्र.4 “भारतीय ने अपने ही दमन का खच उठाया।” रेलवे एवं टे लीग्राफ जैसी टश आधारभूत संरचना प रयोजनाओं
के संदभ म इस कथन का क्या तात्पय है?

इसका तात्पय है क जस तंत्र ने भारत को दबाकर रखा, उसका व्यय भारतीय क जेब से चुकाया गया। रेलवे और टे लीग्राफ इसका
सबसे स्पष्ट उदाहरण ह, क्य क इन्ह दोन को औप नवे शक शासन का ‘वरदान’ सबसे अ धक कहा जाता है।
व्यय कसने उठाया। अध्याय स्पष्ट है : भारत म रेल का नमाण “औप नवे शक शासक क ओर से दया गया कोई उपहार नह
था। इसका अ धकांश व्यय भारतीय कर-राजस्व से वहन कया गया” — अथात भारतवा सय ने ऐसी अधोसंरचना के लए धन दया
जो मुख्यतः ब्र टश रणनी तक एवं व्यापा रक हत क पू त करती थी, न क जनसामान्य क आवश्यकताओं क । टे लीग्राफ नेटवक
के वषय म भी यही बात कही जा सकती है। उत्सा पटनायक के नकास-अनुमान म भी यही बदु है : धन केवल कर से नह ,
अ पतु रेलवे, टे लीग्राफ तथा युद्ध पर होने वाले व्यय क पू त भारतीय से वसूलकर भी नकाला गया।
ये कस लए बनाए गए। अध्याय के क्रम म तीन उ े श्य :

1. कच्चे माल को आंत रक क्षेत्र से बंदरगाह तक नयात हेतु पहुँचाना — इसी लए 1909 के मान चत्र ( चत्र 4.16) म काली
रेल-रेखाएँ कलकत्ता, बंबई, मद्रास और कराची पर आकर मलती ह।
2. टश न मत वस्तुओं को संपूण भारत म वत रत करना — वही पटरी जो सस्ता वदे शी कपड़ा उन बाजार तक ले जाती
थी जो कभी भारतीय बुनकर से खरीदते थे।
3. सेना को छाव नय से शीघ्र कसी दूरवत वद्रोह या युद्धस्थल तक पहुँचाना। 1857 के बाद यह उ े श्य अत्यंत महत्वपूण हो
गया।

और माग का चयन ही मंशा बता दे ता है : रेलमाग का नधारण “प्रायः वद्यमान व्यापार माग क उपेक्षा करते हुए केवल उप नवेशी
आ थक हत क पू त हेतु कया गया था”। भारतीय के लए बनाया गया संजाल उन्ह माग पर चलता जन पर भारतीय पहले से
चलते थे।
यह अधोसंरचना तक सी मत नह था। अध्याय जोड़ता है क “औप नवे शक शासन क प्रशास नक लागत भी भारतीय ारा
वहन क जाती थी” — प्रशास नक ढाँचे, सै नक छाव नयाँ तथा ब्र टश अ धका रय क भव्य जीवन-शैली, सब भारतीय कराधान से
पो षत थे।

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

यह वाक्य केवल शकायत क्य नह है : यह व्यवस्था क मूल यु क्त पहचानता है। साधारण वजय म वजेता
अपनी सेना का व्यय अपने कोष से उठाता है, और यही व्यय उसक पकड़ क सीमा तय करता है। यहाँ व्यय व जत
पर डाल दया गया — सहायक सं ध ने भारतीय शासक से उन्ह सै नक का खच उठवाया जो उन्ह नयं त्रत करते
थे, और भारतीय करदाता ने उन पट रय का, जन पर वे सै नक दौड़ते थे। इसी से यह संभव हुआ क एक छोटा दे श
लगभग दो शता ब्दय तक एक उपमहा प पर शासन करे। और इसी लए अध्याय रेलवे को क्ष तपू त मानने से
इनकार करता है : उपहार पाकर उसी का बल चुकाना उपहार नह होता।

सुझाव : इस प्रश्न का न्यायसंगत उत्तर रेलवे क उपयो गता से इनकार करना नह है। वही क हए जो अध्याय कहता
है — रेलमाग ने लोग को एक-दूसरे के नकट लाया और आंत रक बाजार को एक कृत कया — और फर दखाइए
क यह एक ऐसे संजाल का उपोत्पाद था जसका अ भकल्प, माग और वत्त कसी और के लाभ के लए तय हुआ
था।

प्र.5 ‘फूट डालो और राज करो’ वाक्यांश का क्या अथ है? भारत म टश शासन ारा इसे कस प्रकार प्रयोग म लाया
गया, उदाहरण स हत स्पष्ट क जए।

अथ। ‘फूट डालो और राज करो’ वह नी त है जसम शा सत लोग को आपस म बाँटे रखा जाता है ता क वे शासक के वरुद्ध एक न
हो सक। इसक श क्त यह है क शासक को दे श क सबसे बड़ी श क्त होने क आवश्यकता नह — उसे केवल वह होना है जसक
आवश्यकता सबको कसी न कसी के वरुद्ध पड़े। तब वह आक्रांता नह , सहयोगी, मध्यस्थ और संरक्षक दखने लगता है।
इसी अध्याय से उदाहरण :

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कस फूट का कैसे प रणाम
उपयोग

शासक क कं पनी के पितिनिधयों ने राजनीितक संबंध बनाए और वे “िवदे शी आ ांताओं के स्थान पर स त्ता के मध्यस्थ बनकर
क्र

आपसी कु छ शासकों को उनके पित ंि यों के िवरुद्ध सै न्य उभरे ” — भारतीय राजनीित में िनमंत्रण पाकर घुसे
प्र तस्पधा सहायता दी

राज्यवंश के एक दावेद ार का साथ दे क र दू स रे के िवरुद्ध खड़ा होना नया शासक अपना िसंहासन कं पनी का ऋणी रहता
उत्तरा धकार (यह युिक्त फ ांस ीसी डुप्ले पहले ही कठपुतली शासक
ववाद िबठाने के िलए काम में ला चुके थे)

दरबार के भीतर प्लासी, 1757। क्लाइव ने िसराजु ौला के दरबार के मीर जाफर की से नाएँ — नवाब की से ना का पमुख भाग —
का असंतोष असंतष्ु ट तत्वों को पहचाना और नवाब के अपने से नापित िनिष् य रही ं और कम संख्या वाले िबिटशों ने बंगाल जीत
क्र

मीर जाफर को िवश्वासघात के बदले नवाबी का वचन िलया। आज भी ‘मीर जाफर’ भारत में ‘िवश्वासघाती’ का
िदया पय यवाची है

धा मक समुदाय िबिटशों ने “धािमक समुद ायों के मध्य िव ेष को जो समुद ाय साथ खड़ े हो सकते थे, वे एक -दू स रे के सामने
पहचानकर उसे बढ़ ावा भी िदया” खड़ े कर िदए गए

रयासत को सहायक संिध के अंतगत शासक िवदे शी संबंध के वल िरयासते ं परस्पर स्वतंत्र संवाद तक नही ं कर सकती थी,ं
अलग-थलग िबिटशों के माध्यम से रख सकता था संगिठत होना तो दू र; और पणाली से बाहर िनकलना लगभग
रखना असंभव था

जनजातीय ऐसी भू-नीित जो मूल िनवािसयों की उपेक्षा कर बाहरी जनजातीय समाज अपने पड़ ोिसयों से और स्वयं िविध से भी
समुदाय लोगों को लाभ दे (कोल िवद ोह, 1831–32); एक िविध कट गया
िजसने सै क ड़ों समुद ायों को ‘अपराधी जनजाित’ घोिषत
कर िदया

1857 के बाद भारतीय से ना का पुनगठन इस पकार िकया गया “िक 1857 का पाठ लागू कर िदया गया : िसपािहयों को िफर
सेना भिवष्य में एकीकृ त िवद ोह की संभावना न रहे” कभी एक शरीर न बनने दे ना

18व शताब्द म यह इतना कारगर क्य रहा : पछला अध्याय मराठ को मुगल सा ाज्य दुबल करते हुए और फर
स्वयं ब्र टश से परा जत होते हुए छोड़ता है। उस काल का भारत परस्पर होड़ करती श क्तय का प रदृश्य था, और
प्रत्येक के लए दूरस्थ कंपनी क तुलना म नकट का शत्रु बड़ा था। ‘फूट डालो और राज करो’ शून्य से फूट नह
बनाती — वह वास्त वक झगड़ को ढूँ ढ़कर उन्ह पोसती है। इसी कारण इसे परास्त भी कया जा सकता है : जो
आंदोलन साझे शत्रु को पहले रखता है, वह शासक के हाथ से यह औजार छ न लेता है — और 20व शताब्द के
स्वतंत्रता संग्राम म ठ क यही हुआ।

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल
a g l AglaSem · NCERT Solutions

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emहोते ह? अपने
प्र.6 भारतीय जीवन के कसी एक क्षेत्र को चु नए, जैसे— कृ ष, शक्षा, व्यापार या ग्रामीण जीवन। उप नवेशवाद

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coएक लघु नबंध, क वता या चत्र के रूप म व्यक्त क जए। gl
शासन ने उसे कस प्रकार प्रभा वत कया? क्या आज भी उन प रवतन के कुछ चह्न दृ ष्टगोचर
वचार .को
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ag

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व ध। एक ही क्षेत्र चु नए — चार समेटने का प्रयास न क जए। फर तीन चरण म उत्तर द जए : (1) वह क्षेत्र पहले कैसा था, (2)

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औप नवे शक नी त ने उसका क्या कया — त थ, आँकड़े या उद्धरण के साथ, (3) उस प रवतन का कौन-सा चह्न आज भी शेष है।

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अच्छा उत्तर केवल प्रभाव नह , नी त का नाम बताता है।

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क्षेत्र पहले बदलने वाली नी त आज दखने वाला चह्न

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अंगेजी का पित.ष्cठाoऔर अवसर की
e;mअंगेजी-माध्यम और अन्य
शक्षा पाठशालाएँ, मदरसे , िवहार, िशष्य- मैक ॉले का िमिनट, 1835

m a s
.co िबहार में 1,00,000–1,50,000 गाम्य agिवl ालयों के बीच की खाई
पिशक्षण; 1830 तक के वल बंग ाल और भाषा होना

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g l a िव ालय

a कृ ष िनव ह और स्थानीय बाजार के िलए फसल की परवाह िकए िबना नकद गामीण ऋणगस्तता; नकदी फसलों
m a s
agl
की ओर झुक ाव; नील िवद ोह की स्मृित
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खेती, साथ-साथ िशल्प उत्पादन कर; खा ान्न के स्थान पर नील की

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जबरन खेती

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व्यापार िवश्वपिसद्ध वस्त्र; व्यापक आंतिरक-बाह्य िबटेन में भारतीय कपड़े पर भारी कर, हथकरघा एक संघ षरत िशल्प के रूप
और संजाल भारत में िबिटश कपड़े पर नाममात्र मे,ं अगणी उ ोग के रूप में नही;ं और

m
उ ोग कर, नौवहन और िविनमय दरों पर आगे चलकर खादी का िवशेष अथ
. co
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िनयंत्र ण

a sपंचeायतों के माध्यम से स्थानीय
. com गसँामभालती
ग्रामीण पंचायते ं िववाद, िसंचाई और सड़कें
ag
कर-संग ह की कें द ीकृ त नौकरशाही; l
s e m
जीवन स्वशासन को पुनः खड़ ा करने का लंबा
a
थी ं — मेटकाफ के “लघु पथागत िविधयों पर िबिटश कानून-

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गणराज्य” संिहताएँ पयास

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नमूना उत्तर : शक्षा (लघु नबंध, लगभग 200 शब्द)
o
.cअनेक प्रकार के वद्यालय म पढ़ाता था — पाठशालाएँ, मदरसे, वहार, और ag l
m
ानeकौशल और सांस्कृ तक मूल्य साथ-साथ दे ते थे, और दुलभ नह थे : ब्र टश
ब्र टश के आने से पूव भारत अपने बच्च को एक साथ
कसी शल्प का द घ शष्य-प्र शक्षण। ये संस्थs
प्र तवेदन म ही 1830 तक केवल बंगa l a
ालgऔर बहार म एक लाख से डेढ़ लाख ग्राम्य वद्यालय का उल्लेख है, जनक प्रशंसा म
लखा गया क वहाँ “अत्यंत कम व्यय म, परंतु अत्यंत सरल और प्रभावी ढं ग से” पढ़ाया जाता है। 1835 म थॉमस मैकॉले ने अपना

c o m
.
म नट ऑन इं डयन एजुकेशन प्रस्तुत कया। यह स्वीकार करते हुए भी क उन्ह संस्कृत या अरबी का कोई ज्ञान नह , उन्ह ने घो षत
कया क एक यूरोपीय पुस्तकालय क एक शेल्फ भारत और अरब के संपूण दे शज सा हत्य से अm
s e धक मूल्यवान है, और लक्ष्य रखा

. c om का जो “स्वाद, वचार, नै तकता और बु द्ध से अंग्रेज” ह । उ ेश्य व्यावहा
ऐसे भारतीय
a g la था — प्रशासन के नचले स्तर के लए
रक

a emसस्ते ल पक। पारंप रक वद्यालय धीरे-धीरे वलुप्त हो गए और अंग्रेजी प्र तष्ठा क भाषा बन गई।
s आज का चह्न : हम आज भी कसी वद्यालय क ेष्ठता आं शक रूप से उसक अंग्रेजी से आँकते ह, नौकरी के साक्षात्कार म
agl c
अंग्रेजी- श क्षत और अन्य वद्या थय के बीच का अंतर दे खते ह, और उन्ह परीक्षाओं क तैयारी करते ह जो कभी कायालय के लए
m .
m a s e
co agl
उम्मीदवार छाँटने हेतु बनी थ । जो हमने खोया वह वह ग्राम- वद्यालय था जो नाममात्र व्यय म पढ़ना, लखना और ग णत सखा दे ता

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था।

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य द आप क वता या चत्र चुन : तब भी वही तीन चरण दखने चा हए। कोई चत्र तीन खंड म एक बुनकर का
करघा दखा सकता है — व्यस्त, फर सूना, और अंत म हल पकड़ा हुआ हाथ — और नीचे ब टक का 1834 का
वाक्य लखा जा सकता है : “सूती बुनकर क अ स्थयाँ भारत के मैदान का वरंजन कर रही ह।” त थ और उद्धरण
वाला चत्र एक ऐ तहा सक तक है; उनके बना वह केवल सजावट है।

प्र.7 कल्पना क जए क आप 1857 म एक संवाददाता ह। रानी लक्ष्मीबाई ारा झाँसी म कए गए प्र तरोध पर एक
सं क्षप्त समाचार ववरण ल खए। यह भी दशाइए क यह वद्रोह कस प्रकार आरंभ हुआ, फैला और समाप्त
हुआ— मुख्य घटनाओं एवं नेताओं को रेखां कत करते हुए एक समय-रेखा या चत्रपट बनाइए।

व ध। समाचार ववरण नबंध नह होता : सबसे नई बात से आरंभ क जए, पहले दो वाक्य म कौन–क्या–कहाँ–कब द जए, फर
पृष्ठभू म, फर कोई उद्धरण। और द गई त थ का नवाह क जए — 1857 म लखने वाला संवाददाता झाँसी को वद्रो हय के
अ धकार म और रानी को उसका नेतृत्व करते हुए बता सकता है, कतु झाँसी पर ब्र टश आक्रमण और रानी के ब लदान क सूचना
नह दे सकता, क्य क वे 1858 क घटनाएँ ह। नीचे द गई समय-रेखा कथा को उसके अंत तक ले जाती है।
नमूना समाचार ववरण — झाँसी, 1857 के उत्तराध
वद्रोह क लपट उत्तर भर म फैल , झाँसी सन्नद्ध
हमारे संवाददाता ारा, झाँसी
झाँसी आज अपनी रानी लक्ष्मीबाई के अ धकार म है, जब क इस ग्रीष्म म मेरठ के सपा हय से आरंभ हुआ वद्रोह उत्तर और मध्य
भारत म नरंतर फैल रहा है। कानपुर और लखनऊ भी कंपनी के नयंत्रण से बाहर हो चुके ह, और दल्ली म सपा हय ने वृद्ध मुगल
स ाट बहादुर शाह जफर को अपना नेता घो षत कया है, यद्य प वास्त वक सैन्य नणय सेनानायक ही ले रहे ह।
झाँसी का ववाद इस वष से पुराना है। कंपनी क हड़प नी त के अनुसार य द कसी रयासत के शासक क मृत्यु स्वाभा वक पुरुष
उत्तरा धकारी के बना हो जाए तो उस राज्य का वलय कर लया जाता है — यह नयम हदू धम क उस दत्तकपुत्र परंपरा क जान-
बूझकर उपेक्षा करता है जो भारतीय राजवंश म उत्तरा धकार का वैध माध्यम रही है। झाँसी इसी नी त के अंतगत लया गया था।
रानी ने अपने राज्य को इसी अ धग्रहण से बचाने के लए संघष कया है।
बताया जाता है क उनक तैयारी पूण है और उनके साथ नाना साहेब के सैन्य सलाहकार मराठा तात्या टोपे भी ह। कंपनी क सेनाओं
के नगर क ओर बढ़ने क संभावना है। जन ब्र टश अ धका रय ने उनका सामना कया है, वे उन्ह कम नह आँकते; एक ब्र टश
सेनाप त ने आगे चलकर लखा क रानी “अपनी बु द्धमत्ता, धैय तथा अपने अधीनस्थ के प्र त उदारता के लए उल्लेखनीय थ … वे
वद्रो हय म सव ेष्ठ और सवा धक वीर थ ।”
झाँसी म आगे जो होगा, उस पर पूरे उत्तर क दृ ष्ट रहेगी।
वद्रोह क समय-रेखा

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कब क्या हुआ कौन

1806 ‘वेल्लोर वद्रोह’ : नए वद - नयम ने ललाट पर धा मक चह्न पर प्र तबंध लगाया और दाढ़ मुँड़वाना मद ास से ना के
अ नवाय कया। सपा हय ने वेल्लोर का कला ले लया; सैकड़ मारे गए या मृत्युदंड पाए िसपाही

1830– पृष्ठभू म का असंतोष : हड़प नी त के वलय, और भू मकर नी त जो उन्ह कृषक प रवार को उजाड़ —
1850 का रही थी जनसे अ धकांश सपाही आते थे
दशक

1857 के उत्तर एवं मध्य भारत म यह जनप्रवाद फैला क नई राइफल क कारतूस पर गाय और सूअर क —
आरंभ में चब लगी है — हदू और मु स्लम, दोन सपा हय क भावनाएँ आहत

1857, सपाही मंगल पांडेय ने ब्र टश अ धका रय पर आक्रमण कया; उनक फाँसी ने असंतोष और बढ़ा मंगल पांडेय
बैर कपुर दया

1857, मेर ठ सपा हय ने अपने ब्र टश अ धका रय क हत्या क और दल्ली कूच कर बहादुर शाह जफर को बहादुर शाह जफर
→ िदल्ली नेता घो षत कया; वद्रोह तेजी से फैला

1857 वद्रो हय ने कानपुर, लखनऊ और झाँसी पर अ धकार कया। कानपुर म नाना साहेब ने पहले नाना साहेब; रानी
ब्र टश नाग रक को सुर क्षत माग का वचन दया, फर 200 से अ धक पुरुष , म हलाओं और बच्च ल क्ष्मीबाई; बेगम
क हत्या कर द — जसके कारण आज भी ववा दत ह हजरत महल

िसतंबर ब्र टश ने दल्ली पुनः अधीन क और घर-घर नरसंहार कया; कानपुर म जनसाधारण म भय व्याप्त िबिटश से ना
1857 करने हेतु सामू हक मृत्युदंड दए। लंबे दं डात्मक अ भयान म गाँव जलाए और फसल नष्ट क ,
जससे वद्रो हय के हाथ हुई मृत्यु से कह अ धक लोग मरे

1858 तात्या टोपे के सहयोग से रानी लक्ष्मीबाई घरी हुई झाँसी से नकल , ग्वा लयर का दुग जीता और रानी ल क्ष्मीबाई;
वहाँ का कोष तथा अस्त्रागार अपने अ धकार म लया। 18 जून 1858 को रणभू म म वीरग त तात्या टोपे
प्राप्त क

1858 बेगम हजरत महल ने लखनऊ क रक्षा का नेतृत्व कया, आत्मसमपण पर सुर क्षत माग का प्रस्ताव बेगम हजरत महल
ठु कराया और अंततः नेपाल म शरण ली। नवंबर म महारानी वक्टो रया के घोषणा-पत्र ने कंपनी का
शासन समाप्त कया; बेगम ने प्र त-घोषणा जारी कर भारतीय को उस पर वश्वास न करने क
चेतावनी द

1859 का तात्या टोपे संघष जारी रखते रहे, कतु वश्वासघात ारा पकड़कर ब्र टश को स प दए गए, तात्या टोपे
पारंभ जन्ह ने उन्ह फाँसी दे द

1858 के ब्र टश राजसत्ता ने ईस्ट इं डया कंपनी से शासन अपने अधीन ले लया — ब्र टश राज आरंभ। िबिटश राजस त्ता
बाद नी तयाँ आक्रामक वस्तार के स्थान पर नयंत्रण सुदृढ़ करने पर क द्रत हुईं, और भारतीय सेना का
पुनगठन इस प्रकार हुआ क भ वष्य म एक कृत वद्रोह न हो सके

वद्रोह क्य वफल हुआ, और फर भी क्य महत्वपूण रहा : कुछ इ तहासकार के अनुसार वीर नेतृत्व के होते
हुए भी वद्रो हय म एकता एवं सुसंगत रणनी त का अभाव था — और यही कारण है क टे लीग्राफ तथा रेलमाग
से लैस ब्र टश एक-एक स्थान पर बल क द्रत कर सके। फर भी अध्याय 1857 को ऐ तहा सक मोड़ कहता है,
क्य क इसने यह वचार बो दया क वदे शी शासन अस्वीकाय है। वही बीज 20व शताब्द के आरंभ म “अन्य
व धय के साथ” पूण स्वतंत्रता के संघष म प रणत हुआ।

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प्र.8 कल्पना क जए य द भारत कभी भी यूरोपीय श क्तय का उप नवेश नह बना होता, तब यह कस प्रकार अपने
पथ पर वक सत हुआ होता? इस वषय पर लगभग 300 शब्द क एक लघु कथा ल खए।

व ध। वैक ल्पक इ तहास तभी अच्छा होता है जब वह वास्त वक प्रमाण से अनुशा सत हो। अध्याय ने उप नवेशीकरण से पूव के
भारत के वषय म जो तथ्य दए ह — व नमाण, वश्व जी.डी.पी. म भाग, ग्राम पंचायत, वद्यालय, व्यापा रक संजाल — उन्ह
ली जए और पू छए क इनम से प्रत्येक से संभवतः क्या वक सत होता। साथ ही यह भी ईमानदारी से मा नए क क्या स्वतः हल नह
हो जाता : 1750 के भारत म क्षेत्रीय श क्तय के युद्ध भी थे और सामा जक असमानताएँ भी, जन्ह कोई कथा छपा नह सकती।
इसे व्याख्यान नह , एक पात्र वाला दृश्य बनाइए।
नमूना उत्तर (लगभग 300 शब्द)
1947 क मलमल-व्यापारी
कमला ने थान खोलकर प्रकाश के सामने कया और लस्बन से आए ग्राहक ने वही साँस ख ची जो सब ख चते थे। एक इंच म दो सौ
धागे, सोनारगाँव म बुने हुए, और नौ पी ढ़य से चली आ रही उसी दुकान से बकते हुए।
वह दाद क सुनाई उस लंबी बेचैन शताब्द क कहा नय म पली थी, जसे सब ‘जहाज क सद ’ कहते थे। पुतगाली, डच, ांसीसी
और अंग्रेज — सब अनुज्ञा-पत्र और तोप लेकर आए थे, और कुछ समय तक यह स्पष्ट ही नह था क व्यापार कौन कर रहा है और
वजय कौन। फर मराठ , बंगाल के नवाब तथा मैसूर और त्रावणकोर के शासक ने वह कया जो वे पहले कभी न कर सके थे :
आपस म लड़ना इतनी दे र के लए रोका क तट के वषय म एक समझौता हो सके। वदे शी जहाज नयत बंदरगाह पर, भारतीय
व ध के अधीन, भारतीय शुल्क दे कर व्यापार कर सकते थे। कसी को नजी सेना रखने क अनुम त नह थी।
इससे भारत शांत नह हो गया था। दाद के जीवनकाल म दक्कन पर तीन युद्ध हुए, और यह ववाद अब भी चल रहा था क कस
वद्यालय म कौन प्रवेश पा सकता है। कतु करघे कभी नह रुके। 1820 के दशक म जब ब्रटे न से भाप का इंजन आया, बुनकर क
े णय ने पहले दो खरीदे , फर बीस, और फर अहमदाबाद म अपने बनाने लग । जो ग्राम पंचायत हर राजवंश के बाद भी बची रह ,
वे नहर का व्यय कस पर पड़े — इस पर खूब झगड़ , और फर व्यय उठाया भी।
कमला के पता कहा करते थे क उन्ह वरासत म मली सबसे बड़ी वला सता एक साधारण-सी बात थी : लाभ कभी दे श से बाहर
नह गया। वह यह रहा और कुओं, कारखान और वद्यालय म बदलता रहा — वही भीड़भरे, झगड़ालू, लाख ग्राम- वद्यालय, जो
अब बांग्ला म अ भयां त्रक पढ़ा रहे थे।
ग्राहक ने मूल्य पूछा। कमला ने रुपय म बताया, और उसने रुपय म ही चुकाया, क्य क कपड़े के लए संसार यही मुद्रा चलाता था।

यह उत्तर अ ा क्य है, केवल सुंदर कथा क्य नह : इसका प्रत्येक क ल्पत ववरण अध्याय क कसी न कसी
बात से बँधा है — मलमल और उसक महीनी, चार यूरोपीय श क्तयाँ, कंपनी के चाटर से मली नजी सेना,
कोलाचल का प्र तरोध जसने दखाया क कोई ए शयाई श क्त यूरोपीय श क्त को हरा सकती है, मेटकाफ क सराही
ग्राम पंचायत, ग्राम्य वद्यालय, और सबसे बढ़कर संपदा का नकास (“य द यह संप त्त भारत म ही नवे शत होती, तो
स्वतंत्रता प्रा प्त के समय भारत एक अत्यंत भन्न स्वरूप वाला राष्ट्र होता”)। यह भी दे खए क कथा यह दखावा नह
करती क सब कुछ आदश होता — यही ईमानदारी इ तहास को मनोकामना से अलग करती है।

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प्र.9 भू मका-अ भनय (रोल-प्ले)— एक ऐ तहा सक संवाद का मंचन क जए जसम एक टश अ धकारी एवं एक
भारतीय व्य क्तत्व जैसे दादाभाई नौरोजी के मध्य टश उप नवेशवाद पर चचा हो रही हो।

व ध। भू मका-अ भनय तभी साथक है जब दोन पक्ष को उनके सबसे सशक्त तक दए जाएँ। अ धकारी को वही तक द जए जो
वस्तुतः लंदन म दए जाते थे — व्यवस्था, एकता, रेलवे, व ध, शक्षा — और नौरोजी को आँकड़ से उत्तर दे ने द जए, जैसा उन्ह ने
वास्तव म कया। अध्याय के प्रमाण पर टके र हए, और उसी संसद के दो सदस्य के बीच के औपचा रक संवाद का स्वर र खए।
नमूना संवाद — लंदन, 1893। हाउस ऑफ कॉमन्स का एक स म त-कक्ष।
अ धकारी : ी नौरोजी, आप इस सदन म सट्रल फन्सबरी के सदस्य के रूप म बैठे ह। क्या यही आपक पुस्तक का उत्तर नह है?
संसार म और कहाँ कोई शा सत जनता शासक संसद म अपना सदस्य भेज सकती है?
नौरोजी : छह सौ सत्तर म से एक सदस्य, महोदय — और भारत क अपनी सरकार म एक भी भारतीय नह । आपने मुझे एक
आसन दया है और उसे भागीदारी कह रहे ह।
अ धकारी : तो जो हमने बनाया है, उस पर वचार क जए। हजार मील रेलमाग। एक टे लीग्राफ जो मद्रास से पेशावर तक संदेश
एक घंटे म पहुँचाता है। कराची से चटगाँव तक एक ही व ध-सं हता।
नौरोजी : मने लेखे पढ़े ह, महोदय — और वे आपके ही लेखे ह। रेलमाग का व्यय भारतीय कर-राजस्व से चुकाया गया। टे लीग्राफ
का भी। छाव नय , अ धका रय क व्यवस्था और भारत क सीमाओं से बाहर लड़े गए युद्ध का भी। आपने भारत को उपहार भट
कया और उसी का बल भी भेज दया। और आपक पट रयाँ भीतरी क्षेत्र से बंदरगाह क ओर जाती ह; वे कपास बाहर ले जाने
और मैनचेस्टर का कपड़ा भीतर लाने के लए बछाई गईं, भारतीय को एक-दूसरे तक पहुँचाने के लए नह ।
अ धकारी : व्यापार दोन ओर चलता है। भारत बेचने के लए स्वतंत्र है।
नौरोजी : क्या वह स्वतंत्र है? ब्रटे न म आने वाले भारतीय कपड़े पर भारी कर लगता है। भारत म आने वाले ब्र टश कपड़े पर लगभग
कुछ नह । नौवहन और व नमय दर ब्रटे न तय करता है। स्वयं गवनर-जनरल ब टक ने साठ वष पूव लखा था क सूती बुनकर क
अ स्थयाँ भारत के मैदान का वरंजन कर रही ह। यह कसका मुक्त बाजार है?
अ धकारी : आप भूलते ह क अकाल सूखे से पड़े थे, सरकार से नह ।
नौरोजी : भारत म अकाल हर काल म पड़े ह, महोदय, कतु इस पैमाने पर कभी नह । 1770 म बंगाल क एक- तहाई जनसंख्या
मर गई — और उसी समय भू म-कर बढ़ाया गया। 1876 म दक्कन भूखा मरता रहा और अनाज इंग्लड भेजा जाता रहा, और
आपके वाइसराय ने अन्न के मूल्य घटाने के लए कसी हस्तक्षेप पर रोक लगा द — उसी ऋतु म जब उन्ह ने दल्ली म अड़सठ हजार
अ त थय को सप्ताहभर भोज कराया।
अ धकारी : तो एक वाक्य म आपका आरोप क्या है?
नौरोजी : यही क भारत म आपका शासन अन- टश है। आप हम पर वे सद्धांत चलाते ह जो इस प म एक सप्ताह भी सहन
न कए जाएँ — प्र त न धत्व के बना कराधान, और कोष का वदे श नकास। म इंग्लड से यह नह माँगता क वह अपने से कम बने।
म यह माँगता हूँ क वह भारत म भी वही रहे जो वह है।

मंचन का सुझाव : प्रत्येक पात्र को एक छोट वस्तु द जए जो उसके तक का प्रतीक हो — अ धकारी के हाथ म रेल
क समय-सारणी, नौरोजी के हाथ म आँकड़ का पन्ना। अंत म दशक से एक ही प्रश्न पू छए : अ धकारी के कौन-से
दावे सत्य थे, और क्या सत्य होने मात्र से वे बचाव बन गए? रेलमाग वास्तव म थे; अध्याय का प्रश्न यह है क वे
कसके लए थे और उनका व्यय कसने उठाया।

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल
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emबदु स म्म लत ह
प्र.10 औप नवे शक काल म अपने राज्य या क्षेत्र के कसी स्थानीय प्र तरोध आंदोलन (जनजातीय, कृषक या

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o कोई व शष्ट कारण था? आंदोलन का नेतृत्व कसने कया? उनकagमाँlग क्या थ ? टश शासन
रयासती) का अन्वेषण क जए। एक ववरण या पोस्टर तैयार क जए, जसम नम्न ल खत

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emप्र त क्रया क्या थी? आज यह घटना कस प्रकार स्मरण क जाती है (जैसे— स्थानीय उत्सव , गीत , स्मारक
— क्या

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ag के माध्यम से)?

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व ध। पाँच बदुओं का उत्तर इसी क्रम म, एक-एक छोटे अनुच्छेद म द जए, और ोत अलग-अलग र खए : आपक पाठ्यपुस्तक

agजला गजे टयर क्या कहता है, और कोई बुजुग या लोकगीत क्या कहता है। जहाँ
क्या कहती है, स्थानीय संग्रहालय, पुस्तकालय या
ये आपस म भन्न ह , वहाँ यह लख द जए — यही इ तहास है, त्रु ट नह ।

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अपना आंदोलन कैसे चुन। पहले इसी अध्याय म ना मत आंदोलन से आरंभ क जए, फर अपने नकटतम स्थानीय आंदोलन को
खो जए :
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आंदोलन क्षेत्र प्रकार

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a संन्यासी-फकीर िवदोह (1770 के बाद) बंगाल संन्यासी-फक र तथा कृषक

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छोटा नागपुर, वतमान झारखंड जनजातीय

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कोल िवद ोह (1831–1832)

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खासी जनक्रांित (1829–1833)
agl वतमान मेघालय जनजातीय

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संथाल िवद ोह (1855–1856) झारखंड, बहार, प म बंगाल जनजातीय

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नील िवद ोह (1859–1862) उत्तरी बंगाल
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कृषक
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वेल्लोर.cिवद ोह (1806) ag सपाही
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वतमान त मलनाडु

a रानी अब्बक्का पथम और ि तीय का पितरोध
agl उल्लाल, द क्षण कनाटक रयासती (पुतगा लय के वरुद्ध)

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कोलाचल का युद्ध (1741)
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त्रावणकोर, द क्षण केरल रयासती (डच के वरुद्ध)
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नमूना उत्तर : संथाल वद्रोह, 1855–1856

व शष्ट कारण। ब्र टश समथन से साहूकार और जम दार संथाल के पूवज क भू म छ न रहे थे। इसके पीछे वही पूरा ढाँचा था
जो अध्याय जनजा तय के वषय म बताता है : वन और वनोपज से वं चत करना, जनजातीय भू म को नजी संप त्त म
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बदलना, नकद कर लगाना, ऋण-जाल म फँसाना, उनक पंचायत को समाप्त कर अंग्रेजी न्याय व्यवस्था लागू करना, और उन्ह

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.cनेतृत्व। दो भाई — सद्ध और कान्हू मुमू, जन्ह ने वतमान झारखंड, बहार औरagप म बंगाल के भाग म यह व्यापक वद्रोह
‘सभ्य बनाने’ तथा धमात रत करने के लए मशन रय को प्रोत्साहन।

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माँग। पूवज क भू म वापस, साहूकार के ऋण से मु क्त, और अपना शासन। अध्याय दज करता है क उन्ह ने अपने शासन

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क घोषणा क और ‘रक्त क अं तम बूँद तक युद्ध’ का संकल्प लया — अथात यह केवल राहत क नह , प्रभुसत्ता क माँग

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थी।
टश प्र त क्रया। नमम। कुछ आरं e
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aglडाला। ब्र टश पाठक के सामने यह संघष कस रूप म रखा गया, यह इसी अध्याय के चत्र
भक क्ष त के बाद ब्र टश सेना ने गाँव को जला दया, हजार संथाल क हत्या क और
अंततः वद्रोही नेतृत्व को भी मार
4.17 म दे खा जा सकता है।

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कक्षा 8 सामा जक वज्ञान अध्याय 4 भारत म औप नवे शक काल AglaSem · NCERT Solutions

आज कैसे स्मरण कया जाता है। यह वद्रोह हूल कहलाता है — संथाली भाषा म वद्रोह का शब्द — और झारखंड तथा
आसपास के क्षेत्र म प्र तवष हूल दवस (30 जून) के रूप म मनाया जाता है, जसम सद्ध-कान्हू क प्र तमाएँ, लोकगीत और
शोभायात्राएँ स म्म लत होती ह; अनेक संस्थान और माग इन भाइय के नाम पर ह। अध्याय अपनी ओर से एक और प्रकार क
स्मृ त जोड़ता है : यह साहसी वद्रोह “अन्य जनजा तय के लए औप नवे शक प्र तरोध क प्रेरणा बना”। अपने जले के ववरण
स्वयं जाँ चए — आयोजन क त थ और स्वरूप तथा स्मारक के नाम स्थान-स्थान पर भन्न होते ह, और उन्ह स्थानीय रूप से
पुष्ट करना इस काय का ही अंग है।

पोस्टर के लए : पाँच खंड बनाइए, प्रत्येक बदु के लए एक, इसी क्रम म, और बीच म प्रभा वत जल का मान चत्र
र खए। पोस्टर पर एक मूल ोत अवश्य लगाइए — कसी स्मारक का चत्र, स्थानीय भाषा म लोकगीत क एक
पं क्त उसके अनुवाद स हत, या जला गजे टयर का एक वाक्य — और नीचे ल खए क वह आपको कहाँ मला।
ोत वाला पोस्टर शोध है; ोत के बना वह केवल चत्रकारी है।

अध्याय — एक नज़र म
उप नवेशवाद का अथ है — एक दे श ारा कसी अन्य प्रदे श पर अ धकार करना, वहाँ अपनी ब स्तयाँ स्था पत करना
और अपना राजनै तक, आ थक तथा सांस्कृ तक तंत्र आरो पत करना। यह नवीन घटना नह है (प्रथम सह ाब्द सा.सं. पू. के
महान सा ाज्य; प्रथम सह ाब्द सा.सं. म ईसाई तथा इस्लामी धम का प्रसार), कतु ‘औप नवे शक युग’ से आशय 15व
शताब्द से आरंभ हुए यूरोपीय वस्तार से है — स्पेन, पुतगाल, ब्रटे न, ांस और नीदरलड ारा अ का, ए शया, अमे रका,
ऑस्ट्रे लया तथा प्रशांत प पर अ धकार। इसके चार कारण थे — राजनै तक प्र तस्पधा, आ थक लाभ, धमातरण और (गौण
रूप से) वैज्ञा नक जज्ञासा।
भारत लक्ष्य इस लए बना क्य क भारत समृद्ध था। दो सह ा ब्दय पूव से यूना नय और रोमन के साथ व्यापार; मसाले,
कपास, हाथी-दाँत, रत्न, चंदन, सागवान और वूट्ज स्ट ल क भूमध्यसागरीय क्षेत्र म अत्य धक माँग। अथशास्त्री ऐंगस
मै डसन के आकलन के अनुसार 16व शताब्द तक वश्व के सकल घरेलू उत्पाद म भारत का योगदान कम-से-कम एक-
चौथाई था — चीन के साथ वश्व क दो सबसे बड़ी अथव्यवस्थाओं म से एक। स्वतंत्रता के समय यह घटकर मात्र 5 प्र तशत
रह गया।
चार यूरोपीय श क्तयाँ आईं; टके टश। पुतगा लय (वास्को-डी-गामा, 1498) ने काटज अनुज्ञा-पत्र से समुद्र एका धकार
बनाया और व्यापार के साथ धा मक उत्पीड़न जोड़ा — गोवा का धम-न्याया धकरण (1560–1812)। डच केवल व्यापार पर
क द्रत रहे और कोलाचल (1741) म त्रावणकोर के राजा मातण्ड वमा से परा जत हुए। ांसीसी डु प्ले ने दो यु क्तयाँ गढ़
जन्ह बाद म ब्र टश ने अपनाया — सपाही तथा कठपुतली शासक के माध्यम से अप्रत्यक्ष शासन — कतु कनाटक
युद्ध (1746–1763) म हार गए।
अंग्रेजी ईस्ट इं डया कंपनी व्यापारी से शासक आक्रमण ारा नह , छद्म ारा बनी। महारानी ए लजाबेथ प्रथम के
राजक य अ ध नयम ने उसे नजी सेना रखने का अ धकार दया; प्र त न धय ने स्वयं को केवल व्यापारी बताया, तट य कद्र
बनाए, फर शासक को उनके प्र त ं य के वरुद्ध सैन्य सहायता बेची। प्लासी (1757) संख्या से नह , मीर जाफर के साथ
क्लाइव के ष ंत्र से जीता गया। इसके बाद आई हड़प नी त तथा सहायक सं ध — ‘कम व्यय म सा ाज्य’, जसके
फलस्वरूप 1947 तक 500 से अ धक रयासती राज्य उपमहा प के लगभग 40 प्र तशत क्षेत्र म वद्यमान थे।
इसक मानवीय क मत अकाल थी। फसल हो या न हो, उच्च दर से नकद कर क माँग ने फसल क वफलता को महा वप त्त
म बदल दया — 1770–1772 के बंगाल के अकाल म लगभग एक- तहाई जनसंख्या अथात अनुमानतः एक करोड़ लोग मारे
गए, और कंपनी ने उसी समय भू म-कर बढ़ा दया। 1876–1878 के भीषण अकाल म मुख्यतः दक्कन म लगभग 80 लाख
लोग मरे, जब क प्र तवष लगभग दस लाख टन चावल नयात होता रहा और लॉड लटन ने अन्न के मूल्य घटाने म कसी
हस्तक्षेप पर रोक लगा द । संपूण औप नवे शक काल का अनुमान 5 करोड़ से 10 करोड़ मृत्यु का है।

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भारत क संपदा, उ ोग, शासन और शक्षा — सब टे न के लए ढाल दए गए। ब्रटे न म भारतीय वस्त्र पर भारी कर
और भारत म ब्र टश वस्तुओं पर नाममात्र कर ने बुनकर को नष्ट कर दया — ब टक, 1834 : “सूती बुनकर क अ स्थयाँ
भारत के मैदान का वरंजन कर रही ह।” ग्राम पंचायत के स्थान पर कर-संग्रह क नौकरशाही आई; मैकॉले के 1835 के
म नट ऑन इं डयन एजुकेशन का लक्ष्य था ऐसे भारतीय जो “स्वाद, वचार, नै तकता और बु द्ध से अंग्रेज” ह । नौरोजी,
दत्त और बाद म उत्सा पटनायक ने संपदा के नकास को मापा। और रेलवे, टे लीग्राफ तथा सेना का व्यय भारतीय कर से
चुकाया गया : भारतीय ने अपने ही अधीनीकरण के लए स्वयं धन दया।
प्र तरोध कभी रुका नह । 1770 के बाद संन्यासी-फक र वद्रोह, कोल वद्रोह (1831–32), खासी जनक्रां त (1829–33),
सद्ध और कान्हू मुमू के नेतृत्व म संथाल वद्रोह (1855–56), नील वद्रोह (1859–62) — और फर 1857 का महान
वद्रोह, जसम रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहेब और बेगम हजरत महल स म्म लत थे। यह वफल रहा, कतु इसने यह
वचार बो दया क वदे शी शासन अस्वीकाय है। 1858 म कंपनी के स्थान पर ब्र टश राजसत्ता आई और ब्र टश राज आरंभ
हुआ।

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त्व रत पुनरावृ त्त

शब्द अथ अध्याय म कहाँ पुस्तक इसके वषय म क्या
कहती है

उप नवेशवाद एक दे श िकसी अन्य पदे श पर अिधकार कर ‘उप नवेशवाद का युग’, पृष्ठ परंपरा प्रथम सह ाब्द सा.सं. पू. तक
वहाँ बिस्तयाँ बनाता है और अपना राजनैितक, 84 जाती है; ‘औप नवे शक युग’ का अथ
आिथक व सांस्कृ ितक तंत्र आरोिपत करता है 15व शताब्द से यूरोपीय वस्तार

दासत्व िकसी व्यिक्त को दास बना दे ने की िक्रया हा शया टप्पणी, पृष्ठ 85 यूरोपीय वजय अ भयान म प्रायः मूल
नवा सय का नरसंहार अथवा दासत्व
स म्म लत था

असुरीकरण िकसी व्यिक्त या समूह को अत्यंत नकारात्मक हा शया टप्पणी, पृष्ठ 86 उप नवे शत लोग को ‘असभ्य’,
(डेमोनाइज) रूप में िचित्रत करना ‘आ दम’ या ‘बबर’ कहा गया ता क
‘सभ्यकारी अ भयान’ उ चत लगे

सकल घरेलू उत्पाद एक वष में उत्पािदत वस्तुओ ं व से वाओं के हा शया टप्पणी, पृष्ठ 87 16व शताब्द तक वश्व के जी.डी.पी. म
(जी.डी.पी.) मूल्य का माप भारत का भाग कम-से-कम एक-चौथाई;
स्वतंत्रता के समय मात्र 5 प्र तशत

काटज पुतगाली अनु ा-पत्र, जो अरब सागर की ‘पुतगाली — व्यापार एवं अनुम त-पत्र न होने पर नौका जब्त;
पत्येक नौका को ले ना पड़ता था उत्पीड़न’, पृष्ठ 88 इससे लगभग एक शताब्द तक मसाल
के व्यापार पर एका धकार

धम-न्याया धकरण रोमन कै थोिलक चच ारा स्थािपत िवधिमयों हा शया टप्पणी, पृष्ठ 88 गोवा म 1560 म स्था पत, 1812 म
(इं क्व जशन) पर िनणय दे ने वाला िवशेष न्यायािधकरण समाप्त; बलात धमातरण तथा अनेक
हदू मं दर का वध्वंस

सपाही यूर ोपीय युद्ध-कौशल में पिशिक्षत तथा यूर ोपीय ‘ ांसीसी — औप नवे शक डु प्ले ारा ग ठत; कंपनी क सेना के
कं पनी की से ना में भत भारतीय सै िनक आकांक्षाएँ’, पृष्ठ 90; ‘महान अ धकारी “प्रायः सभी ब्र टश” थे
वद्रोह’, पृष्ठ 108

फूट डालो और राज शासकों की पितस्पध , उत्तरािधकार िववादों पृष्ठ 92–93 प्लासी (1757) : नवाब के सेनाप त मीर
करो तथा समुद ायों के िव ेष का लाभ उठाना तािक जाफर के साथ क्लाइव का ष ंत्र
शािसत एक न हो सकें

हड़प नी त स्वाभािवक पुरुष उत्तरािधकारी के िबना पृष्ठ 93–94 यह “जान-बूझकर” दत्तकपुत्र परंपरा क
(डॉ क्ट्रन ऑफ शासक की म ृत्यु होने पर िरयासत का िवलय उपेक्षा करती थी; इसने 1857 के वद्रोह
लैप्स) क पृष्ठभू म बनाई

सहायक सं ध भारतीय दरबार में िबिटश रे िसडेंट; शासक पृष्ठ 94 1798 म हैदराबाद प्रथम; ब्र टश इसे
अपने व्यय पर िबिटश सै िनक रखे और िवदे शी ‘कम व्यय म सा ाज्य’ कहते थे
संबंध के वल िबिटशों के माध्यम से करे

रयासती राज्य भारतीय राजकु मार, महाराज या नवाब के इसे अनदे खा न कर, पृष्ठ 94 स्वतंत्रता के समय 500 से अ धक,
अधीन क्षेत्र , िजसने आंतिरक स्वायत्तता हेत ु उपमहा प के लगभग 40 प्र तशत क्षेत्र
िबिटश संर क्षण स्वीकार िकया म

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शब्द अथ अध्याय म कहाँ पुस्तक इसके वषय म क्या
कहती है

संपदा का नकास करों ारा तथा औपिनवेिशक व्यय भारतीयों से ‘भारत क संपदा का नौरोजी (1901) व आर.सी. दत्त ने
वसूल कर भारत से िबटेन गई संपित्त नकास’, पृष्ठ 97–98 मापा; उत्सा पटनायक का अनुमान
1765–1938 के लए 45 ट्र लयन
डॉलर

प्राच्यवाद ‘पाच्य’ का िव ान — अब ‘भारतिवद् ’ हा शया टप्पणी, पृष्ठ 102 कुछ प्रमुख ब्र टश प्राच्यवाद चाहते थे
(ओ रएंट लस्ट) क भारतीय अपनी भाषाओं म पढ़;
मैकॉले क नी त प्रभावी सद्ध हुई

वद्रोह (म्यू टनी) सै िनकों या नािवकों ारा अपने अिधकािरयों हा शया टप्पणी, पृष्ठ 108 इसी कारण इ तहासकार ने ‘ सपाही
के िवरुद्ध बगावत वद्रोह’ संज्ञा अस्वीकार क ; पुस्तक
‘1857 का महान वद्रोह’ कहती है

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Document Details

Board / OrgNCERT
ExamClass 8
TypeSolution
Pages44
Languagehindi
Updated19 Sep 2026