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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 6: भारतीय सभ्यता का प्रारंभ
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
85 – 104 21 33 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 44 pages
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सामा जक व ान · समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 6: भारतीय सभ्यता का प्रारंभ
कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ (पाठ्यपुस्तक समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे) के सभी प्रश्न के पूण
एनसीईआरट समाधान। इसम महत्वपूण प्रश्न, पाँच आइए वचार कर बॉक्स, सात आइए पता लगाएँ बॉक्स, पृष्ठ 86, 87, 88, 93, 97 और 102
के पाठ्य प्रश्न, आगे बढ़ने से पहले … तथा प्रश्न, क्रयाकलाप और प रयोजनाएँ के सभी आठ प्रश्न स म्म लत ह — ब स्तय का मान चत्र ( चत्र
6.3), समय-रेखा ( चत्र 6.2), कालीबंगा, धौलावीरा, मोहनजो-दड़ो और लोथल के छाया चत्र तथा पृष्ठ 100–101 क सभी वस्तुओं को मु द्रत पृष्ठ पर
ध्यान से दे खकर उत्तर तैयार कए गए ह।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (कक्षा 6) 85 – 104
खं ड प्रश्न
21 33
माध्यम
हन्द
महत्वपूण प्रश्न — पृष्ठ 85
अध्याय का आरंभ
महत्वपू ण प्रश्न
प्र.1 सभ्यता क्या है?
सभ्यता मानव समाज का एक उन्नत चरण है। पुस्तक इतने पर नह रुकती — वह एक स्पष्ट जाँच-सूची दे ती है : कसी समाज को
सभ्यता कहने के लए उसम कम से कम सात वशेषताएँ होनी चा हए।
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क्र. वशेषता पुस्तक के अनुसार इसम क्या आता है
1 शासन और पशासन का ज टल समाज और उसके अनेक कायकलाप के प्रबंधन हेतु
कोई रूप
2 नगरीकरण नगर योजना, नगर का वकास और उनका प्रबंधन, जसम सामान्यत: जल प्रबंधन और जल
नकास व्यवस्था आती है
3 िविभन्न पकार के िशल्प क े माल (पत्थर, धातु) का प्रबंधन और तैयार माल (आभूषण, उपकरण) का उत्पादन
4 व्यापार आंत रक (एक नगर या क्षेत्र के अंदर) और बाहरी (दूरस्थ क्षेत्र या वश्व के अन्य भाग के साथ) —
वस्तुओं के आदान-प्रदान के लए
5 ले खन का कोई रूप अ भलेख को रखने और संवाद बनाने के लए आवश्यक
6 सांस्कृ ितक िवचार जीवन और वश्व के बारे म वचार — कला, स्थापत्य, सा हत्य, श्रु त परंपराओं और सामा जक री त-
रवाज के माध्यम से
7 कृ िष उ त्पादकता जो गाँव ही नह , ब ल्क नगर को भी भोजन उपलब्ध करा सके
ये सात एक-दूसरे के बगल म नह , ब ल्क एक-दूसरे के ऊपर खड़ी ह। सबसे नीचे कृ ष है, क्य क जब तक कोई अ त रक्त अन्न न
उगाए, बाक कुछ भी संभव नह :
शासन · लेखन · सास्ं कृितक िवचार
जो केवल एक िस्थर, संगिठत समाज बना सकता है
नगरीकरण · िशल्प · व्यापार
नगर, कायशालाए ँ और बाजार — इनके िलए ऐसे लोग चािहए
जो अपना भोजन स्वयं न उगा रहे हों
कृिष उत्पादकता
“जो गाँव ही नही,ं बिल्क नगरों को भी भोजन उपलब्ध करा सके”
ऊपर का सब कुछ नीचे उगाए गए अन्न पर िटका है
सभ्यता क सात वशेषताएँ, उसी क्रम म सजी हुई जसम वे उभर सकती ह। नीचे का खंड हटा द जए और पूरी आकृ त गर जाएगी।
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पुस्तक इस शब्द क प रभाषा क्य दे ती है : ‘सभ्यता’ शब्द बोलचाल म बहुत ढ ले ढं ग से प्रयोग होता है।
इ तहासकार को ऐसी कसौट चा हए जसे खुदाई से नकले प्रमाण पर लगाया जा सके। इन सात म से हर एक कुछ
ऐसा छोड़ जाती है जसे पुरातत्ववेत्ता सचमुच खोज सकता है — सड़क क योजना, नाली, मनके क कायशाला,
वदे शी मुहर, अं कत वस्तु, मू त, अनाज का गोदाम। इसी लए हम बना एक भी पढ़ा जा सकने वाला वाक्य पाए यह
कह सकते ह क हड़प्पावा सय क एक सभ्यता थी।
क्या आप जानते ह? अध्याय 4 का अंत मनुष्य के पहले समूह के एक स्थान पर बसने, कृ ष करने और भवन
नमाण, धातु व ान तथा यातायात जैसी तकनीक के वकास पर हुआ था। यह अध्याय ठ क वह से आगे बढ़ता है
— सभ्यता उसी कहानी का अगला चरण है, कोई अलग कहानी नह ।
प्र.2 भारतीय उपमहा प क आरं भक सभ्यता कौन-सी थी?
सधु-सरस्वती सभ्यता — जसे सधु, हड़प्पा अथवा सधु-सरस्वती सभ्यता भी कहा जाता है। यह वश्व क सबसे पुरानी
सभ्यताओं म से एक है और इसके नवासी हड़प्पावासी कहलाते ह।
गाँव → नगर : लगभग 3500 सा.सं.पू. से
नगर → महानगर (भारत का पहला नगरीकरण) : लगभग 2600 सा.सं.पू.
िचत्र 6.2 के अनुसार नगरों का काल : लगभग 2600 से 1900 सा.सं.पू.
कहाँ। उपमहा प के उत्तर-प श्चम म, दो नद -प्रणा लय के कनारे — सधु और उसक पाँच मुख्य सहायक न दयाँ (झेलम, चनाब,
रावी, ब्यास, सतलज), जो पंजाब (आज भारत और पा कस्तान म वभा जत) और सध (अब पा कस्तान म) के मैदान को स चती
थ ; और कुछ पूव म सरस्वती, जो तब हमालय क तलहट से ह रयाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात के कुछ क्षेत्र से होकर
बहती थी।
वश्व-इ तहास म इसका स्थान। पृष्ठ 87 का चत्र 6.2 तीन सभ्यताओं को एक ही रेखा पर रखता है :
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िव व की तीन आरंिभक स यताए ँ भ् , एक ही रेख ा पर
मेसोपोटािमया का आरंभ
िम स्र का आरभ
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4000 सा.सं.पू. 3500 सा.सं.पू. 3100 सा.सं.पू. 2600 सा.सं.पू. 2000 सा.सं.पू.
गाँव नगरों मे ं बदलते है ं महानगर — 2600 से 1900 सा.सं.पू.
िसंध-ु सरस्वती सभ्यता, उन्ही ं ितिथयों के साथ जो यह अध्याय देता है
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मेसोपोटा मया (आधु नक इराक और सी रया) का आरंभ लगभग 6,000 वष पहले हुआ; कुछ शता ब्दय बाद प्राचीन मस्र; और सधु-
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सरस्वती के नगर लगभग 2600 से 1900 सा.सं.पू. तक रहे। (यह रेखा समझने के लए है, मापनी के अनुसार नह बनी।)
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सुझाव : दोन त थयाँ अलग-अलग याद र खए। 3500 सा.सं.पू. म गाँव नगर म बदलने लगे; 2600 सा.सं.पू. म
aनगर महानगर म। ‘पहला नगरीकरण’ केवल दूसरी त थ है।
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प्र.3 उसक मुख्य उपल याँ क्या थ ?
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जा सकता है। om
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पुस्तक क अपनी जाँच-सूची को प्रमाण पर लगाइए — हर खाना भर जाता है, और प्राय: कसी ऐसी चीज़
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a glउपल अध्याय म उसका प्रमाण
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नगर सुिनयोिजत योजना के अंतगत बने; चौड़ ी सड़ कें चारों िदशाओं की ओर उ न्मुख (िचत्र 6.4 कालीबंग ा, िचत्र 6.5
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नगर-योजना
धौलावीरा); िकले बंद ी; ऊपरी नगर और िनचला नगर — धौलावीरा में तीन क्षेत्र
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जल प्रबंधन
कु एँ; धौलावीरा मेa
घरों के स्नानागार सड़glकों के नीचे बहने वाली नािलयों से जुड़े (िचत्र 6.7, लोथल); मोहनजो-दड़ ो में लगभग 700 ईंट के
ं कम से कम छह िवशाल जलाशय, सबसे बड़ ा 73 मीटर , भूिमगत नािलयों से जुड़े
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समान गुणवत्ता का “बड़े और छोटे घरों के िनम ण की गुणवत्त ा एक समान िमलती है” — यही बात बी.बी. लाल अध्याय के आरंिभक
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नमाण उद्धरण में ‘सम्यक रूप से संतिु लत समुद ाय’ कहकर कहते है ं
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कानिलयन मनकों में छे द करने और उन्हे ं सजाने की तकनीक; सख्त शंaखgसे चूिड़ याँ; ताबे और का य पर अिधकार;
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और धातु ं ं
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भार तौलने के पत्थर, कांस्य दपण, कांस्य छै नी (िचत्र 6.14)
दूरस्थ व्यापार हड़ प्पाई कानिलयन मनके सूस ा (वतमान ईरान) में; हाथी दाँत का कं घा ओमान के तट पर ; लोथल का 217 × 36
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मीटर का बंद रगाह — भारत की पथम गहन समुद ी गितिविध
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लेखन प्रणाली
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हजारों स्टीऐटाइट की मुहरे ं, िजन पर िलिप के संके त है ं — यद्यिप वह िलिप अभी तक पढ़ ी नही ं जा सकी
कृ ष उत्पादकता
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जौ, गेह,ँ मोटे अनाज, कभी-कभी धान, दलहन और सिब्जयाँ; यूरे िशया में कपास उगाने वाले पथम ; बनावली से िम ी के
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हल का लघु पितरूप (िचत्र 6.9)
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कला, खेल और ‘नतकी’ की कास्ं य पितमा (10.8 से .मी.); ‘पुर ोिहत राजा’; नम स्ते की मुद ा में मूित; लोथल के पात्र पर प्यासे कौए की
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दै नक कहानी; पत्थर का खेल -बोड और िम ी की सीटी
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a g l शां त कोई से ना नही,ं युद्ध के हिथयार नही,ं युद्ध का कोई िनशान नही ं — “अपेक्षाकृ त एक शािं तपूण स भ्यता”
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सबसे असाधारण उपल कौन-सी है? नगर का आकार नह — बड़े नगर मेसोपोटा मया और मस्र म भी थे।
असाधारण है दो बात का मेल : पूरे नगर म फैली ना लयाँ और कुएँ जो साधारण घर क भी सेवा करते थे, और
अमीर-गरीब के घर का एक ही स्तर का नमाण — वह भी ऐसे समाज म जसने न कोई राजमहल छोड़ा, न राजसी
समा ध, न ह थयार। प्राचीन वश्व क बहुत कम सभ्यताएँ यह दखा सकती ह।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 86
सभ्यता क्या है?
प्र.1 आ खर सभ्यता है क्या?
सामान्यत: इस शब्द का प्रयोग मानव समाज के उन्नत चरण के लए कया जाता है। पुस्तक इसे और स्पष्ट करती है — “हम
यहाँ इस बात पर वचार करगे क एक ‘सभ्यता’ म कम से कम नम्न ल खत वशेषताएँ होनी चा हए” — और सात वशेषताएँ
गनाती है।
शासन और पशासन · नगरीकरण · िविभन्न पकार के िशल्प · व्यापार
लेखन का कोई रूप · सांस्कृ ितक िवचार · कृ िष उत्पादकता
उस वाक्य के दो शब्द पर ध्यान द जए :
“हम यहाँ … वचार करगे” — यह प रभाषा इस पुस्तक क है, एकमात्र संभव प रभाषा नह । भन्न इ तहासकार रेखा थोड़ी
अलग जगह ख चते ह।
“कम से कम” — ये सात न्यूनतम ह, पूरा ववरण नह । कसी सभ्यता म इससे कह अ धक हो सकता है।
प रभाषा क आवश्यकता क्य : “सभ्यता का आरंभ कब हुआ?” इस प्रश्न का कोई उत्तर तब तक नह हो सकता
जब तक आप यह न बताएँ क सभ्यता कसे कहगे। जाँच-सूची मल जाने पर आप कसी भी क्षेत्र क परीक्षा कर
सकते ह — मेसोपोटा मया लगभग 6,000 वष पहले, मस्र कुछ शता ब्दय बाद, और सधु-सरस्वती क्षेत्र लगभग
2600 सा.सं.पू. म। जाँच-सूची के बना ‘सभ्यता’ केवल एक राय है।
सावधान : ‘सभ्यता’ का अथ ‘अच्छा’ या ‘श्रेष्ठ’ नह है। यह बताता है क समाज कस प्रकार संग ठत है — नगर,
अ भलेख, व्यापार, प्रशासन — न क उसके लोग कतने भले या बु द्धमान थे। कसी भी नगर के बनने से बहुत पहले
शकारी-संग्राहक और ग्रामीण समुदाय क अपनी समृद्ध संस्कृ त थी।
आइए वचार कर — पृष्ठ 86
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सभ्यता क्या है? — सात वशेषताएँ
आइए वचार कर
प्र.1 ऊपर बताई गई वशेषताओं म से आप कसे मूलभूत वशेषता मानते ह — अथात ऐसी वशेषता, जो अन्य सभी
के वकास के लए अ नवाय है?
कृ ष उत्पादकता। यही एकमात्र वशेषता है जसके बना सूची क कोई भी दूसरी वशेषता उभर ही नह सकती।
वशेषता अ त रक्त अन्न के बना यह क्य संभव नह
नगरीकरण नगर उन लोग से भरा होता है जो कुछ भी नह उगाते। वे वहाँ तभी रह सकते ह जब कसान अपनी आवश्यकता से
अ धक उगाएँ और वह अ त रक्त अन्न नगर तक पहुँचे। पुस्तक स्पष्ट कहती है — “ग्रामीण क्षेत्र से पयाप्त कृ ष उपज
प्र त दन उपलब्ध होने पर ही नगर जी वत रह सकते थे।”
शल्प मनक म छे द करने वाला या शंख क चूड़ी बनाने वाला दन भर अपने काम म लगा रहता है। उसका भोजन कोई और
जुटाता है।
व्यापार व्यापार उसी का होता है जो बचा हो। अनाज, कपास और यात्रा का समय — तीन कृ ष के अ त रक्त उत्पादन से
आते ह।
शासन, लेखन, अ धकारी, लेखक और कलाकार कोई भोजन नह उगाते। वे वह रह सकते ह जहाँ भोजन पयाप्त और सुर क्षत हो।
सांस्कृ तक वचार
एक दूसरा उत्तर भी मान्य है। कुछ वद्याथ शासन और प्रशासन को मूलभूत मानते ह, और यह तक कमजोर नह है : कसी को
तो सड़क क योजना बनानी थी, ना लयाँ बछानी थ , ईंट और बाट के मानक तय करने थे और सैकड़ श्र मक से धौलावीरा के
जलाशय बनवाने थे। ठ क यही बात पृष्ठ 96 का ‘आइए वचार कर’ पूछता है।
नणय कैसे कर : पू छए क कौन-सी वशेषता दूसरी से पहले आ सकती है। बना शासन के खेती करने वाला गाँव
पूरी तरह संभव है — अध्याय 4 उसी का वणन करता है। बना कृ ष के शासन संभव नह : अ धकारी भूखे मर
जाएँगे। इस लए कृ ष न व है और प्रशासन पहली मं ज़ल। य द एक ही उत्तर दे ना हो तो कृ ष ल खए; य द चचा
करनी हो तो दोन द जए और बताइए क समय के क्रम म कृ ष पहले आती है।
स्वयं जाँ चए : पुस्तक ने कृ ष को सूची म अंत म रखा है, पर महत्व म सबसे पहले — और यही एकमात्र वशेषता है
जसे उसने ‘क्या है’ से नह , ब ल्क ‘क्या करना चा हए’ से प रभा षत कया है (“जो गाँव ही नह , ब ल्क नगर को
भी भोजन उपलब्ध करा सके”)।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 87
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सभ्यता क्या है? — हर वशेषता के पीछे के व्यवसाय
आइए पता लगाएँ
प्र.1 ऊपर द गई सूची म प्रत्येक वशेषता के लए क्या आप उस समय के समाज म वद्यमान व्यवसाय और रोजगार
क सूची तैयार कर सकते ह?
सात वशेषताओं को एक-एक करके ली जए और पू छए — यह काम प्र त दन कसे करना पड़ता? नीचे द गई सूची के सभी
व्यवसाय कसी हड़प्पाई नगर म सचमुच रहे ह गे, और इनम से अ धकांश ने कुछ न कुछ ऐसा छोड़ा है जो खुदाई म मला है।
वशेषता आवश्यक व्यवसाय और रोजगार उनके छोड़े हुए प्रमाण
शासन और शासक या पमुख; पिरषद् के सदस्य; नगर पशासक; कर या भंडार के अिधकारी; गोदाम, मानक बाट,
प्रशासन ले खाकार; न्यायकत ; सावजिनक िनम ण के पयवेक्षक; पहरी सु नयो जत सड़क
नगरीकरण नगर-योजनाकार; भूिम-मापक; ईंट बनाने वाला; राजिमस्त्री; बढ़ ई; कु आँ खोदने वाला; मानक आकार क ईंट, कुएँ,
नाली बनाने वाला; सफाईकम ; जल-वाहक ढक ना लयाँ, जलाशय
शल्प कु म्हार; मनका बनाने और उनमें छे द करने वाला; शंख की चूड़ी बनाने वाला; तामकार चत्र 6.14 का दपण, छै नी,
और कास्ं यकार; स्वणकार; हाथी दाँत का कारीगर; पत्थर तराशने वाला; बुनकर; मनके, कंघा, सीट और खेल-
रंग रे ज; िखलौने और खेल बनाने वाला बोड
व्यापार व्यापारी; दुक ानदार; बैल गाड़ी चालक; नािवक और मल्लाह; बंद रगाह के श्रिमक; मुहर, बाट, लोथल का बंदरगाह,
भारवाहक; तौलने वाला; मुहर उके रने वाला सूसा म मले मनके
लेखन ले खक; मुहर-उत्कीणक; संग हीत अनाज और वस्तुओ ं का िहसाब रखने वाला अं कत मुहर और प काएँ
सांस्कृ तक मूितकार; पात्र िचित्रत करने वाला; संग ीतकार और नतक; कथावाचक; पुर ोिहत; ‘नतक ’, ‘पुरो हत राजा’,
वचार िखलौना बनाने वाला नमस्ते क मू त, प्यासे कौए
वाला पात्र
कृ ष िकसान; हलवाहा; पशुपालक; मछु आ रा; अनाज पीसने वाला; कपास उगाने वाला; बनावली का म का हल;
माली; नगर तक अनाज ले जाने वाला गाड़ीवान पशुओं और मछ लय क
ह याँ
इस अभ्यास का सार। सूची ग नए — लगभग चालीस अलग-अलग व्यवसाय। शकारी-संग्राहक समूह म लगभग सभी लोग
वही कुछ काम करते ह। सभ्यता म लोग वशेषज्ञता प्राप्त करते ह — और वशेषज्ञता तभी संभव है जब कसान अपनी आवश्यकता
से अ धक अन्न उगाएँ।
यह क जए : पृष्ठ 100–101 क कोई भी वस्तु चु नए और पीछे क ओर च लए — उसे बनाने वाले कौन-कौन थे?
अकेली कांस्य छै नी के लए तांबा खोदने वाला, टन का व्यापारी, धातु गलाने वाला, सही अनुपात जानने वाला
कारीगर और उसे खरीदने वाला बढ़ई — एक छोटा उपकरण, पाँच व्यवसाय।
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यह अनुमान नह , इ तहास क व ध है : पुरातत्ववेत्ता ठ क यही करते ह। कसी घर म अधूरे छे द वाले कान लयन
मनके और टू ट पत्थर क बरमी मलती है, तो वे नष्कष नकालते ह क वहाँ मनका बनाने वाला रहता था। वस्तुएँ
व्यवसाय का प्रमाण ह, और व्यवसाय समाज क संरचना का।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 87
सभ्यता क्या है? — सभ्यता का आरंभ कब हुआ
प्र.1 जस तरह हमने सभ्यता को प रभा षत कया है, उस अथ म सभ्यता का आरंभ कब हुआ?
कोई एक त थ नह है, क्य क वश्व के व भन्न भाग म अलग-अलग समय पर सभ्यताओं का आरंभ हुआ। पुस्तक तीन
उदाहरण दे ती है और पृष्ठ 87 का चत्र 6.2 उन्ह दखाता है।
कहाँ आज का दे श आरंभ कब
मेसोपोटा मया आधु नक इराक और सी रया लगभग 6,000 वष पहले — िचत्र 6.2 पर लगभग 4000
सा.सं.पू.
प्राचीन मस्र मस्र “कु छ शतािब्द यों के बाद ” — िचत्र 6.2 पर लगभग 3100
सा.सं.पू.
सधु-सरस्वती भारत और पा कस्तान (तथा अफ़ग़ा नस्तान म एक महानगर लगभग 2600 सा.सं.पू. से 1900 सा.सं.पू. तक
पुरास्थल)
6,000 वष पहले ≈ 6000 − 2026 = लगभग 4000 सा.सं.पू. — ठीक वही ं से िचत्र 6.2 आरंभ होता है।
ये स्थान ही क्य । तीन बड़ी नद -प्रणा लय पर पनपे — दजला-फ़रात, नील, तथा सधु और सरस्वती। न दयाँ म को उपजाऊ
बनाती ह, खेत को स चती ह और नाव ढोती ह। सातव वशेषता — कृ ष उत्पादकता — के लए यही प र स्थ त चा हए।
पुस्तक इन सभ्यताओं को महत्वपूण क्य बताती है : “सही अथ म उन प्राचीन सभ्यताओं के बहुत बड़े योगदान
और प्रग त के कारण ही मानवता आज वतमान स्थ त म पहुँच सक है।” लेखन, नगर, ना लयाँ, मापे हुए बाट,
प हयेदार गा ड़याँ, धातु के उपकरण, दूरस्थ व्यापार — ये सब इन्ह जैसे समाज म एक बार आ वष्कृत हुए और तब
से हम उनका उपयोग कर रहे ह।
सुझाव : ‘लगभग 6,000 वष पहले’ और ‘लगभग 4000 सा.सं.पू.’ का अथ एक ही है। जब पुस्तक दोन तरीक
को मलाकर लखे, तो तुलना करने से पहले एक को दूसरे म बदल ली जए।
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पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 88
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गाँव से नगर — ‘ध्यान रख’ बॉक्स
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वतमान म इस सभ्यता के नवा सय को ‘हड़प्पाई या हड़प्पावासी’ क्य कहते ह?
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aी संlस्कृ त का नाम प्राय: उसी स्थान पर रखा जाता है जहाँ उसे सबसे पहले
क्य क हड़प्पा इस सभ्यता का पहला उत्ख नत नगर था
पा कस्तान के पंजाब म है। पुरातत्व म कसी पूरg
पहचाना गया — चाहे वह स्थान सबसे महत्वपूण रहा हो या नह ।
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नाम कहाँ से आया क्या सुझाता है — और कहाँ भ्रम पैदा करता है
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com हड़प्पा, पहला उत्ख नत पुरास्थल l a
. सुर िक्षत और तटस्थ। यह भूग ोल के बारेaमेgं कु छ नही ं कहता — इसीिलए पुस्तक
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हड़प्पा सभ्यता
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(1920–21) इसे पसंद करती है
सधु सभ्यता सधु नद
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मोहनजो-दड़ो और हड़प्पा के िलए सही, पर आधे पुर ास्थल िसंध ु पर है ं ही नही ं
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.cअपoचिलत। सभ्यता िसंध ु क्षेत्र से बहुत आगे तक फैली थी — पष्ृ ठ 91 का ‘आइए
m िवचार करे ं’ दे िखए agl
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सधु घाट वही नद , साथ म ‘घाट ’
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सधु-सरस्वती दोन नद -प्रणा लयाँ एक साथ सबसे सटीक , क्योंिक सर स्वती की द ोणी में दो महानगर (राखीगढ़ ी, गँवेर ीवाला)
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और पुर ास्थलों की सव िधक सघनता है
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सभ्यता
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नाम क्य महत्वपूण है : हर नाम चुपचाप एक दावा करता है। ‘ सधु घाट ’ कहते ही आपने पाठक से कह दया क
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s m सभ्यता एक नद क घाट म रहती थी — और फर पृष्ठ 89 का मान चत्र आपका खंडन कर दे ता है। यह आदत
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gl पूरे इ तहास म काम आती है : पू छए क कोई प र चत नाम क्या मान बैठा है, और उसे प्रमाण से जाँ चए।
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क्या आप जानते ह? हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो
m .c पहले खोजे गए दो नगर ह, और इन्ह एक ही सभ्यता के रूप म a
l a sदeाई आरंभ होने के तीन-चार वष बाद। खोज और पहचान दो अलग क्षण ह,
और पुस्तक दोन त थयाँ दे ती हैa।g
1924 म पहचाना गया — हड़प्पा क खु
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गाँव से नगर — ब स्तय का मान चत्र ( चत्र 6.3) पढ़ना
आइए पता लगाएँ
प्र.1 इस सभ्यता के कुछ प्रमुख नगर को मान चत्र ( चत्र 6.3) म दशाया गया है। क्या आप (कक्षा म ग त व ध के
माध्यम से) इन दशाए गए नगर का अगले पृष्ठ पर द गई ता लका म दए गए आधु नक राज्य अथवा प्रदे श के
साथ मलान कर सकते ह?
66°पू. 69°पू. 72°पू. 75°पू. 78°पू. 81°पू.
शोतुगई
िह
ंद ुक
ु श
36°उ.
दी
िसंध
ुन दी
मन
झेल
िह
दी म
न ाल
ाब
िच
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माडं ा य
33°उ.
दी नदी सतलज नदी
ीन यास
र ाव
ब्
ाम लै ु स
मुसा खे ल रूपनगर
हड़ प्पा
डाबरकोट
ीण श्रे न
कालीबंग ा बनावली 30°उ.
ी नदी िभर ना
सरस्वत
गँवेर ीवाला करनपुर ा राखीगढ़ ी फरमाना
ागंग
ीदन
मोहनजो--दड़ ो लखनजो--दड़ ो
ार अ
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27°उ.
ानु म
ील व
ीदन
च न् हुद ड़ ो नद
ी
ीण श्रे
ास
बन
बालाकोट
धौलावीरा 24°उ.
िखरसारा
बगासरा नागवाड़ ा
नागे श् वर लोथल
21°उ.
66°पू. 69°पू. 72°पू. 75°पू. 78°पू. 81°पू.
िकलोमीटर (लगभग )
0 200 400 600 800 1000
मानिच त्र मे ं नामािं कत पमुख नगर
अ न् य बस्ती
चत्र 6.3 (पृष्ठ 89) — सधु-सरस्वती सभ्यता क कुछ प्रमुख ब स्तयाँ; पुस्तक के न दय , श्रे णय , ब स्तय तथा
अक्षांश-दे शांतर जाल के साथ पुनः बनाया गया। पुस्तक का शीषक कहता है — “पवत श्रृंखलाओं ारा बनी प्राकृ तक
सीमाओं को दे खए (भूरे रंग म)”। ध्यान द जए क छपे मान चत्र म केवल हदुकुश, सुलैमान श्रेणी तथा हमालय भूरे
ह; अरावली श्रेणी आस-पास के मैदान जैसे पीले-हरे रंग म ही छपी है, इस लए “भूरे रंग म” हर श्रेणी पर लागू नह
होता।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ AglaSem · NCERT Solutions
हड़प्पाई नगर/हड़प्पा के नगर आधु नक राज्य या प्रदे श
धौलावीरा पंजाब
हड़ प्पा गुजरात
कालीबंगा िसंध
मोहनजो-दड़ ो हिरयाणा
राखीगढ़ ी राजस्थान
पृष्ठ 90 पर छपी मलान क ता लका — दोन स्तंभ मलान के क्रम म नह ह; इन्ह जोड़ना ही अभ्यास है।
पृष्ठ 90 क ता लका जान-बूझकर उलट-पुलट द गई है — जैसा छपा है, उसम एक भी जोड़ी सही नह है। चत्र 6.3 पर हर लाल
बदु ढूँ ढ़ए और सही मलान इस प्रकार नकलता है।
हड़प्पाई आधु नक राज्य / आज का चत्र 6.3 म कैसे ढूँ ढ़
नगर प्रदे श दे श
धौलावीरा गुजरात भारत मान चत्र म नीचे क ओर, कच्छ के रन म — खरसारा, बगासरा और
नागवाड़ा के पास
हड़प्पा पंजाब पा कस्तान ऊपर मध्य म, रावी नद पर, चनाब और झेलम के नीचे
कालीबंगा राजस्थान भारत सरस्वती नद क रेखा पर, हड़प्पा और राखीगढ़ के बीच
मोहनजो-दड़ो िसंध पा कस्तान नचली सधु पर, लखनजो-दड़ो के नीचे और चनहुदड़ो के ऊपर
राखीगढ़ हिरयाणा भारत दाईं ओर, बनावली, भराना और फरमाना के पास, पुरास्थल के सघन
समूह म
जै सा छपा है (गलत) → सही
धौलावीरा – पंजाब → धौलावीरा – गुजरात
हड़ प्पा – गुजरात → हड़ प्पा – पंजाब (पािक स्तान )
कालीबंगा – िसंध → कालीबंगा – राजस्थान
मोहनजो-दड़ ो – हिरयाणा → मोहनजो-दड़ ो – िसंध (पािक स्तान )
राखीगढ़ ी – राजस्थान → राखीगढ़ ी – हिरयाणा
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ AglaSem · NCERT Solutions
चत्र 6.3 और क्या बताता है। केवल पाँच नाम मत दे खए :
भूरे रंग म प्राकृ तक सीमाएँ — प श्चम और उत्तर-प श्चम म हदुकुश और सुलेमान श्रेणी, ऊपर हमालय, बीच म अरावली
श्रेणी। सभ्यता इसी चौखट के भीतर बसी है।
एक नह , दो नद -प्रणा लयाँ — सधु के साथ झेलम, चनाब, रावी, ब्यास और सतलज; और सरस्वती, जो कालीबंगा तथा
गँवेरीवाला से होकर रन क ओर दखाई गई है।
सैकड़ छोटे गुलाबी बदु — साधारण ब स्तयाँ। इनक सबसे अ धक सघनता सरस्वती के कनारे है, और यही बात पृष्ठ 91
का पाठ कहता है।
पूरा वस्तार — सबसे उत्तर म शोतुगई (आज अफ़ग़ा नस्तान म), उत्तर-पूव म मांडा और रूपनगर, दूर प श्चम म मकरान तट
पर सुतकाग-डोर, और समुद्र के कनारे लोथल, नागेश्वर तथा बालाकोट।
कक्षा म इसे कैसे कर : दोन स्तंभ उसी उलटे क्रम म श्यामपट पर ल खए जैसे पुस्तक म ह, फर एक-एक वद्याथ
को मान चत्र के पास भे जए क वह तीर ख चने से पहले नगर को ढूँ ढ़े। याद से मलान करने म कुछ नह सीखा
जाता; मान चत्र से मलान करने म मान चत्र पढ़ना सीखा जाता है।
आइए वचार कर — पृष्ठ 91
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ AglaSem · NCERT Solutions
नगर-योजना — ‘ सधु घाट सभ्यता’ शब्द अप्रच लत क्य है
आइए वचार कर
प्र.1 आपने सधु घाट सभ्यता के बारे म सुना होगा और आपने इस बात पर ध्यान दया होगा क हमने इसका प्रयोग
नह कया है। मान चत्र पर दृ ष्ट डाल (पृष्ठ 89 पर चत्र 6.3) तो हम पाएँगे क घाट शब्द का अब इस्तेमाल नह
करते ह क्य क अब हम जानते ह क यह सभ्यता सधु क्षेत्र से बहुत आगे तक फैली हुई थी।
66°पू. 69°पू. 72°पू. 75°पू. 78°पू. 81°पू.
शोतुगई
िह
ंद ुक
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36°उ.
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मन
झेल
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माडं ा य
33°उ.
दी नदी सतलज नदी
ीन यास
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ाम लै ु स
मुसा खे ल रूपनगर
हड़ प्पा
डाबरकोट
ीण श्रे न
कालीबंग ा बनावली 30°उ.
ी नदी िभर ना
सरस्वत
गँवेर ीवाला करनपुर ा राखीगढ़ ी फरमाना
ागंग
ीदन
मोहनजो--दड़ ो लखनजो--दड़ ो
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ानु म
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ीदन
च न् हुद ड़ ो नद
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बालाकोट
धौलावीरा 24°उ.
िखरसारा
बगासरा नागवाड़ ा
नागे श् वर लोथल
21°उ.
66°पू. 69°पू. 72°पू. 75°पू. 78°पू. 81°पू.
िकलोमीटर (लगभग )
0 200 400 600 800 1000
मानिच त्र मे ं नामािं कत पमुख नगर
अ न् य बस्ती
चत्र 6.3 (पृष्ठ 89) — सधु-सरस्वती सभ्यता क कुछ प्रमुख ब स्तयाँ; पुस्तक के न दय , श्रे णय , ब स्तय तथा
अक्षांश-दे शांतर जाल के साथ पुनः बनाया गया। पुस्तक का शीषक कहता है — “पवत श्रृंखलाओं ारा बनी प्राकृ तक
सीमाओं को दे खए (भूरे रंग म)”। ध्यान द जए क छपे मान चत्र म केवल हदुकुश, सुलैमान श्रेणी तथा हमालय भूरे
ह; अरावली श्रेणी आस-पास के मैदान जैसे पीले-हरे रंग म ही छपी है, इस लए “भूरे रंग म” हर श्रेणी पर लागू नह
होता।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ
a g l AglaSem · NCERT Solutions
1924 म यह नाम उ चत था और आज गलत है, और मान चत्र इसका कारण एक ही दृ ष्ट म दखा दे ता है : चत्र 6.3 के अ धकांश
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पुरास्थल सधु क घाट म ह ही नह ।
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पुरास्थल कहाँ.हc
em aसधुg घाट से दूरी
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चत्र 6.3 के उदाहरण
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glघाट म — मूल अथ
aसधु मोहनजो-दड़ो, लखनजो-दड़ो, चनहुद ड़ो, हड़प्पा (रावी पर, जो िसंध ु भीतर
की सहायक है)
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सरस्वती (घग्गर-हाकरा)
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राखीगढ़ ी और गँवेर ीवाला (दोनों महानगर ), कालीबंगा, बनावली, एक अलग नद -प्रणाली, सैकड़ ag
क द्रोणी
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िभर ना, फरमाना, करनपुर ा
as कलोमीटर पूव
गुजरात और कच्छ का रन
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धौलावीरा, लोथल , िखरसारा, बगासरा, नागवाड़ ा, नागेश्वर बहुत द क्षण-पूव म, समुद्र के
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कनारे
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शोतुगई — आज अफ़ ग़ ािनस्तान में
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सुदूर उत्तर हदुकुश के पार
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मांडा, रूपनगर
aglप श्चमी समुद्र तट
उत्तर-पूव हमालय क तलहट क ओर
सुतकागें-डोर , बालाकोट मकरान तट पर, नद से बहुत प श्चम
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‘घाट ’ शब्द पर दो अलग आप त्तयाँ।
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1. यह तथ्यत: बहुत छोटा है। अकेली सरस्वती क द्रोणी म दो सबसे बड़े नगर — राखीगढ़ और गँवेरीवाला — तथा अनेक
छोटे नगर ह। जो नाम आधी सभ्यता को छोड़ दे , वह अच्छा नाम नह ।
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2. सधु के लए भी ‘घाट ’ गलत शब्द है। यहाँ सधु चौड़े मैदान से होकर बहती है, कसी सँकरी पवतीय घाट से नह । यह
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शब्द भू म का ही गलत चत्र ख चता है।
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m .c नाम फर भी क्य चलते रहते ह : 1924 म केवल सधु के आस-पास aकेgपुरास्थल ज्ञात थे, इस लए ‘ सधु
aseघाट ’ उस समय क सारी जानकारी का सही वणन था। फर राखीगढ़ , धौलावीरा, लोथल, बनावली मले — “इस
पुराने
agl प्रकार क खोज आज भी जारी ह” — और नाम प्रमाण से पीछे छू ट गया। इ तहास म यह सामान्य है : नाम खोज के
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‘ सधु-सरस्वती’ या ‘हड़प्पा’ सभ्यता कहती है।.com l a
क्षण पर टक जाता है, पर ज्ञान बढ़ता रहता है। ईमानदारी यही है क नाम बदल दया जाए — इसी लए यह पुस्तक
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परीक्षा के लए सुझाव : य द प्रश्न म ‘ सधु घाट सभ्यता’ लखा हो तो उत्तर अवश्य द जए — पर एक पं क्त जोड़
द जए : “इसे सधु-सरस्वती अथवा हड़प्पा सभ्यता कहना अ धक उ चत है, क्य क यह सभ्यता सधु क्षेत्र से बहुत
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आगे तक फैली हुई थी।”
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ag पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 93
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नगर-योजना — महास्नानागार ( चत्र 6.6)
प्र.1 इसके नमाण का उ े श्य क्या रहा होगा?
न श्चत रूप से हम नह जानते — और अध्याय यह स्वयं कहता है। “पुरातत्ववेत्ताओं ने अनेक संभा वत व्याख्याएँ प्रस्तुत क ह”,
और तीन म से एक अब स्वीकाय नह रही।
व्याख्या स्थ त कारण
1. सावज नक स्नान के लए अब स्वीकाय “यह पाया गया है क इस नगर के अ धकांश घर म स्नानागार बने हुए थे।” जो
स्नानागार नही ं लोग घर म स्नान कर सकते ह, उन्ह सावज नक स्नानागार क आवश्यकता नह
2. केवल राजसी प रवार के अब भी ऊपरी नगर म इसक स्थ त, इसका आकार और सावधानीपूवक क गई जल-रोधक
लए स्नानागार संभव परत — तीन कुछ व शष्ट लोग के लए बनी संरचना से मेल खाते ह
3. धा मक काय के लए प्रयोग अब भी भारत म अनुष्ठा नक स्नान बहुत प्राचीन है, और जल को स्वच्छ रखने के लए कया
होने वाला स्नानागार संभव गया प रश्रम प वत्र उपयोग से मेल खाता है
संरचना से जो न श्चत रूप से कहा जा सकता है :
इसका आकार लगभग 12 × 7 मीटर था — एक कक्षा से थोड़ा बड़ा, इस लए “छोटा और वस्तृत”।
सावधानी से जमाई गई ईंट पर प्राकृ तक बटु मन (डामर के रूप म) क जल-रोधक परत चढ़ाई गई थी।
इसके चार ओर छोटे -छोटे कमरे थे, जनम से एक के अंदर कुआँ मला है।
एक कोने म नाली थी, जससे समय-समय पर पानी खाली करके उसे स्वच्छ जल से फर भरा जा सके।
इन सबका सार : जसने भी इसे बनवाया, उसे जल के स्वच्छ और ताजा होने क बहुत चता थी, और वह इस पर
बहुत कुशल श्रम लगाने को तैयार था। जस कुंड को बार-बार खाली करके भरा जाए, वह साधारण जल-भंडार नह
होता। यही हमारा सबसे मजबूत सूत्र है — और यह शेष दोन व्याख्याओं पर समान रूप से लागू होता है, इसी लए
चचा अभी समाप्त नह हुई है।
उत्तर लखते समय सावधानी : यह मत ल खए क “महास्नानागार धा मक काय के लए प्रयोग होता था”, मानो
यह तथ्य हो। ल खए : “इसका उ े श्य आज भी चचा का वषय है; राजसी स्नानागार और धा मक कुंड — ये दो
व्याख्याएँ शेष ह, जब क सावज नक स्नानागार वाली व्याख्या इस लए छोड़ द गई क अ धकांश घर म अपने
स्नानागार थे।” यह वाक्य छोटा भी है और अ धक स ा भी।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 93
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नगर-योजना — महास्नानागार पर कक्षा म चचा
आइए पता लगाएँ
प्र.1 अं तम दो व्याख्याओं के बारे म कक्षा म चचा क जए। क्या आप कोई अन्य व्याख्या सोच सकते ह? ध्यान द जए
क इस वषय म हमारे पास इ तहास के अन्य स्रोत नह ह, जैसे न कोई शलालेख, न कोई ंथ और न ही कसी
यात्री का ववरण।
शेष दो व्याख्याएँ ह — केवल राजसी प रवार के लए स्नानागार और धा मक काय के लए कुंड। दोन पक्ष प्रमाण से क्या-
क्या कह सकते ह, यह नीचे दया है, और साथ म तीन और संभावनाएँ भी।
पक्ष क — राजसी/अ भजात स्नानागार पक्ष ख — धा मक कुंड
स्थ त ऊपरी नगर में, जहाँ संभवत: अिभजात वग रहता था — ऊपरी नगर में, जहाँ अनेक पाचीन नगरों में सावजिनक और
कु छ लोगों की िनजी सुिवधा पिवत्र भवन भी होते है ं
आकार 12 × 7 मीटर एक पिरवार के दै िनक स्नान के िलए सामूिहक अनुष्ठान के िलए पय प्त बड़ा, पर इतना छोटा िक
बहुत बड़ा है — पर चुिनंद ा समूह के िलए उपयुक्त के वल चुने हुए लोग भाग ले ं
जल-रोधक महत्वपूण लोगों के िलए आराम और स्वच्छता पिवत्रता। बार -बार खाली करके स्वच्छ जल से भरने का
परत और नाली पिर श्रम ठीक वही है जो अनुष्ठािनक स्नान माँगता है
चार ओर के वस्त्र बदलने के कमरे या से वकों के कक्ष स्नान से पहले तैयारी के कक्ष, या पुर ोिहतों के कक्ष
छोटे कमरे
कमजोरी इस पूर ी स भ्यता में कोई राजमहल और कोई राजसी हमारे पास कोई पढ़ ा जा सकने वाला गंथ या िशलाले ख नही;ं
समािध नही ं िमली — इसिलए यह भी िस द्ध नही ं िक ‘धािम क ’ कहना बाद की भारतीय परंपरा पर आधािरत अनुम ान
कोई ‘राजसी पिरवार ’ था है, हड़ प्पाई पमाण पर नही ं
तीन और व्याख्याएँ जो आप सुझा सकते ह :
नाग रक जल-भंडार — शुष्क ऋतु के लए ऊपरी नगर हेतु स्वच्छ जल का सुर क्षत संचय। कुएँ और नाली क उप स्थ त इससे
अच्छ तरह समझ म आती है।
उपचार या औषधीय स्नान का स्थान — रो गय के लए स्वच्छ जल म, संभवत: जड़ी-बू टय के साथ, स्नान।
समय के साथ एक से अ धक उपयोग। नगर स दय तक चलते ह; कोई भवन 700 वष तक एक ही उ े श्य शायद ही नभाता
है।
बॉक्स का अं तम वाक्य सबसे महत्वपूण है : “इस वषय म हमारे पास इ तहास के अन्य स्रोत नह ह — न कोई
शलालेख, न कोई ग्रंथ और न ही कसी यात्री का ववरण।” अशोक के लए हमारे पास उनके अपने शब्द पत्थर पर
उत्क ण ह; हड़प्पावा सय के लए केवल वस्तु स्वयं है। इसी लए तक आकार, स्थ त, सामग्री और जल-व्यवस्था से
गढ़ना पड़ता है — और इसी लए वह पूरा नह हो पाता। अच्छा वक्ता कहेगा “प्रमाण इसका समथन करते ह”, कभी
नह “ऐसा ही हुआ था”।
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चचा नष्पक्ष कैसे रख : दोन पक्ष को दस मनट द जए क वे केवल भौ तक प्रमाण गनाएँ — “मुझे लगता है”
नह । फर हर पक्ष से पू छए क कौन-सी खोज उसका मत बदल दे गी। पक्ष क कहेगा “पास म एक राजमहल”; पक्ष
ख कहेगा “द वार पर पढ़ा जा सकने वाला अ भलेख”। अपनी बात को गलत सद्ध करने वाली शत बता दे ना ही
इ तहास क व ध का मूल है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 95
जल प्रबंधन — धौलावीरा के जलाशय से तुलना
आइए पता लगाएँ
प्र.1 कक्षा क एक ग त व ध के रूप म कसी फ ते (इंच टे प) से अपनी कक्षा, वद्यालय के ग लयारे या खेल के मैदान
क लंबाई माप। इस लंबाई क तुलना धौलावीरा के सबसे वशाल जलाशय क लंबाई से क जए।
धौलावीरा का सबसे बड़ा जलाशय 73 मीटर लंबा था — और चत्र 6.8 म दखा, च ान काटकर बनाया गया जलाशय 33 मीटर
लंबा है। पहले अपने वद्यालय को मा पए, फर भाग द जए।
आप क्या मापते ह सामान्य लंबाई 73 मीटर म कतने आएँगे?
आपक कक्षा लगभग 8 मीटर 73 ÷ 8 ≈ 9 क क्षाएँ एक पंिक्त में
वद्यालय का ग लयारा लगभग 30 मीटर 73 ÷ 30 ≈ ढाई गिलयारे
वद्यालय का खेल का मैदान लगभग 70 मीटर लगभग पूर ा मैद ान
पूरा फुटबॉल मैदान लगभग 100 मीटर मैद ान का लगभग तीन-चौथाई
एक ही मापनी पर बनाने पर इस अध्याय क हड़प्पाई संरचनाएँ ऐसी दखती ह :
सभी एक ही मापनी पर — 1 मीटर = 3 िपक्सेल
कक्षा, 8 मी.
गिलयारा, 30 मी.
च ान का जलाशय, 33 मी.
सबसे बड़ ा जलाशय, 73 मी.
फु टबॉल मैद ान, 100 मी.
लोथल का बेिसन, 217 मी.
100 मीटर
मोहनजो-दड़ ो का महास्नानागार केवल 12 मीटर लंबा था — लगभग डे ढ़ कक्षा
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हड़प्पाई जल-संरचनाएँ उन चीज़ के सामने जन्ह आप वद्यालय म माप सकते ह। लोथल का बे सन “फुटबॉल के दो मैदान से थोड़ी
अ धक” लंबाई का है, ठ क वैसा ही जैसा पृष्ठ 98 कहता है।
असली फ ते से यह ग त व ध करना क्य जरूरी है : पन्ने पर लखी संख्या तब तक कुछ नह कहती जब तक
आपके पैर उसे नाप न ल। मैदान म 73 मीटर च लए और तब समझ म आएगा क यह हाथ से, तांबे और पत्थर के
औजार से, च ान काटकर, 4,000 वष से भी पहले बनाया गया था — और धौलावीरा म ऐसे कम से कम छह
जलाशय थे, जनम से अ धकांश भू मगत ना लय से जुड़े थे।
नमूना उत्तर : “हमारी कक्षा 7.6 मीटर लंबी है और ग लयारा 28 मीटर। धौलावीरा के सबसे बड़े जलाशय म हमारी
लगभग दस कक्षाएँ एक पं क्त म आ जाएँगी, या ढाई ग लयारे। हमारा पूरा खेल का मैदान 60 मीटर है — एक
जलाशय से भी छोटा। हम वश्वास ही नह हुआ क साढ़े चार हजार वष पहले लोग ने बना कसी मशीन के ठोस
च ान म इतनी लंबी संरचना काट होगी।”
आइए वचार कर — पृष्ठ 96
जल प्रबंधन — इतने काम को कसने सु नयो जत कया?
आइए वचार कर
प्र.1 जलाशय के इस प्रकार के नमाण के लए आवश्यक श्र मक क बड़ी संख्या के बारे म सो चए। आपके वचार से
उनके काय को सु नयो जत करने के लए न श्चत नदश कसने दए ह गे? आपके वचार म उन्ह उनक मजदूरी
के लए भुगतान कैसे कया गया होगा? (संकेत — उस समय आज क तरह मुद्रा का प्रचलन नह था)। चूँ क
समय-समय पर जलाशय क सफाई करना आवश्यक था, इस लए क्या उनके रख-रखाव के लए कोई स्थानीय
प्रा धकारी थे? इस नगर के शासक और नगर प्रशासन के बारे म इससे हम क्या संकेत मलते ह?
इस बॉक्स म चार प्रश्न ह। क्रम से ली जए — और पुस्तक का ईमानदार अंत याद र खए : “पुरातत्ववेत्ता भी इन प्रश्न के बारे म चचा
करते ह और उनके उत्तर सदै व नणायक नह होते!”
1. काय को कसने सु नयो जत कया और न श्चत नदश दए?
छह च ान-कटे जलाशय संयोग से नह बनते। कसी को तय करना था क वे कहाँ ह , कतने गहरे ह , और भू मगत ना लयाँ उन्ह
कस प्रकार जोड़ क जल सही दशा म बहे। इसका अथ है क नगर म थे :
एक योजनाकार या अ भयंता, जो ढाल और स्तर समझता हो;
पयवेक्षक, जो एक साथ सैकड़ श्र मक को नदश दे सक;
एक प्रा धकारी — शासक, प रषद् या अ धका रय का समूह — जसके नदश लोग वष तक मानते रहे। ऐसे जलाशय कई
ऋतुओं म बनते ह।
2. मुद्रा के बना श्र मक को भुगतान कैसे हुआ होगा?
लगभग न श्चत रूप से वस्तु के रूप म। संभा वत रूप :
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ
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भुगतान का यह यहाँ क्य संभव लगता है
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agथे। जो नगर अनाज भंडा रत
.c अध्याय कहता है क नगर ग्रामीण उपज पर प्र त दन नभर थे और कुछ बड़े भवन गोदाम
अनाज और
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भोजन a
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करता है, वह अनाज म मजदूरी भी दे सकता है
अन्य वस्तुए ँ कपड़ा (वे कपास बुनते थे), पात्र, उपकरण, मनके, चू ड़याँ — सब कुछ जो नगर के अपने कारीगर बनाते थे
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वस्तु-िविनमय “सभी प्रकार क वस्तुओं के आदान-प्रदान” वाला व्यापार सभ्यता क सात वशेषताओं म से एक है। मजदूरी भी उसी तरह
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चल सकती थी
सामूिहक कतव्य
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शुष्क क्षेत्र म जल सबक आवश्यकता है। कुछ काम मजदूरी के लए नह , समुदाय के दा यत्व के रूप म भी हुआ होगा
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3. क्या रख-रखाव के लए कोई स्थानीय प्रा धकारी था?
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g यही तक सड़क के नीचे क
.c सफाई के लए स्थायी व्यवस्था चा हए, जो काम स पे, जाँचे और उसका खचaउठाए।
बहुत संभव है क हाँ। सफाई ही प्रशासन का असली प्रमाण है। कोई चीज़ एक बार उत्साह म बनाई जा सकती है; पर स दय तक
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sनाeलय पर भी लागू होता है — जस नाली क सफाई न हो वह एक ऋतु म जाम हो जाती है, फर भी ये ना लयाँ सैकड़ वष
हर वष उसक
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agचल ।
ढक
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4. शासक और नगर प्रशासन के बारे म क्या संकेत मलते ह?
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संकेत
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भू मगत ना लय से जुड़े छह वशाल जलाशय दीघकािलक योजना और तकनीकी कौशल; ऐसा पािधकारी जो दशकों आगे सोच
सके
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चार दशाओं क ओर उन्मुख सड़क; मानक ईंट और पूरे नगर पर लागू िनयम — वास्तिवक पशासन, के वल कोई बलवान व्यिक्त नही ं
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बाट
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agl साधारण घर तक पहुँचती ना लयाँ और कुएँ पशासन के वल अिभजात वग के िलए नही,ं आम लोगों के िलए भी काम करता था
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ऐसी स त्ता जो अपना पदशन नही ं करती — बी.बी. लाल का “स म्यक रूप से संतिु लत
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छोटे और बड़े घर क एक जैसी गुणवत्ता
. समुद ाय … शोषण नही,ं बिल्क आपसी सामंजस्य”
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as, कोई िजसने भी शासन िकया, उसने मुख्यत: बल या िदखावे से शासन नही ं िकया। यही
कोई राजमहल नह , कोई राजसी समा ध lनह
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सेना नह , कोई ह थयार नह a हड़ प्पाई इितहास की सबसे बड़ ी पहेल ी है
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se एक भी पढ़ा जा सकने वाला
पुरातत्ववेत्ता आज भी क्य बहस करते ह : मस्र म परा मड अपने फ़राओ का नाम बताता है; मेसोपोटा मया म
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म क प का श्र मक का राशन गनाती है। यहाँ जलाशय तो ह, पर यह बताने वाला
s e m शब्द नह क कसने उन्ह बनवाया। इस लए ईमानदार उत्तर यह है : ये नमाण सद्ध करते ह क एक संग ठत
agla प्रा धकारी अवश्य था, पर उसका स्वरूप नह बताते — राजा, वृद्ध क प रषद्, व्यापा रय का संघ या पुरो हत। यही
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बात ल खए और आपने वही लखा जो एक पेशेवर पुरातत्ववेत्ता लखता।
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पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 97 a
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ AglaSem · NCERT Solutions
हड़प्पावासी क्या खाते थे?
प्र.1 हड़प्पावा सय के खाना पकाने के पात्र म क्या होता था?
म के पात्र क वै ा नक जाँच से कुछ उत्तर मले ह — और सबसे रोचक वे ह जो अप्रत्या शत थे।
पात्र म प्रत्या शत या यह क्या बताता है
मला अप्रत्या शत?
दुग्ध उ त्पाद प्रत्या शत वे पशु पालते और दूध लेते थे — अध्याय कहता है क उन्ह ने अनेक पशुओं को पाला
हल्दी अप्रत्या शत भोजन म मसाले पड़ते थे, वह केवल उबाला नह जाता था। हल्द आज भी हर भारतीय
रसोई म है
अदरक अप्रत्या शत दूसरा मसाला — अथात पाक-कला स्वाद का और संभवत: स्वास्थ्य का भी वषय थी
के ला अप्रत्या शत फल का उपयोग होता था, और उसे उगाया या मँगाया जाता रहा होगा
इन्ह शेष अनुभाग से जो ड़ए तो हड़प्पाई भोजन-थाली यह बनती है — अनाज : जौ, गे ँ, कुछ मोटे अनाज, बाजरा, कभी-कभी
धान; दलहन : सेम, मटर, दाल; अनेक स ब्जयाँ; पालतू पशुओं का मांस; नद और समुद्र दोन क मछली; दुग्ध उत्पाद; और
मसाले तथा फल। पुस्तक का नष्कष है — “स्पष्ट है क उनके भोजन म बहुत व वधता थी।”
4,000 वष पुराने पात्र क साम ी कोई कैसे जान सकता है? पकाने से सूक्ष्म अवशेष म म रच जाते ह —
स्टाच के कण, वनस्प त के क्रस्टल और रासाय नक चह्न। वैज्ञा नक पात्र क भीतरी सतह से नमूना खुरचकर
प्रयोगशाला म उसका व ेषण करते ह। कूड़े के ढे र से मली पशुओं और मछ लय क ह याँ शेष कहानी बताती
ह। यह व ान के साथ काम करता पुरातत्व है — न कोई ग्रंथ, न कोई अ भलेख, फर भी पूरी भोजन-सूची हाथ
लग जाती है।
क्या आप जानते ह? एक ही पात्र म हल्द और अदरक आज के भारतीय तड़के के बहुत नकट है। हड़प्पावा सय
से आपके घर क रसोई तक चलने वाले सबसे स्पष्ट धाग म से यह एक है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 97
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ AglaSem · NCERT Solutions
हड़प्पावासी क्या खाते थे? — हड़प्पाई भोजन पकाना
आइए पता लगाएँ
प्र.1 मान ली जए क आप हड़प्पा के एक घर म खाना पकाते ह। आप ऊपर द गई जानकारी के आधार पर कौन-से
व्यंजन बनाएँगे?
आपक सूची म केवल वही आ सकता है जो अध्याय ने बताया है — आलू, मच, टमाटर, चाय और चीनी नह , क्य क इनम से कोई
भी उस समय भारत नह पहुँचा था। आपक अनुमत रसोई यह है :
वग आप क्या उपयोग कर सकते ह
अनाज जौ, गेहू,ँ कु छ मोटे अनाज, बाजरा, कभी-कभी धान
दलहन से म , मटर के दाने, दाले ं
स ब्जयाँ अनेक िकस्म की — पुस्तक नाम नही ं बताती
मांस और मछली पालतू पशुओ ं का मांस ; नदी और समुद की मछली
दुग्ध उत्पाद दू ध , दही, मक्खन
मसाले और फल हल्दी, अदरक , के ला
एक पूरी हड़प्पाई थाली, जो सचमुच पकाई जा सकती थी :
1. जौ या गे ँ क रो टयाँ, म के गरम तवे पर सक हुई — अनाज हर भोजन का आधार है।
2. हल्द और अदरक के तड़के वाली दाल, चूल्हे पर टे राकोटा के पात्र म पक हुई। पात्र के अवशेष बताते ह क यह मेल
अनुमान नह है।
3. दही के साथ पक कोई सब्जी — कढ़ जैसा व्यंजन, उसी दुग्ध उत्पाद से जो पात्र म मला।
4. हल्द -अदरक लगाकर भुनी नद क मछली, य द घर लोथल या मोहनजो-दड़ो जैसे जल के नकट है।
5. अंत म केला — सूची क एकमात्र मीठ वस्तु।
नमूना उत्तर : “अपनी हड़प्पाई रसोई म म पत्थर क चक्क पर जौ पीसकर म के तवे पर रो टयाँ सकूँगा/सकूँगी।
साथ म टे राकोटा के पात्र म थोड़ी हल्द और अदरक डालकर दाल पकाऊँगा/पकाऊँगी और अपनी भस का दही
रखूँगा/रखूँगी। नद पास है, इस लए एक मछली भी भूनूँगा/भूनूँगी। इसम मच, आलू और चाय नह ह गे, क्य क
हड़प्पावा सय के पास ये थे ही नह । भोजन का अंत केले से करूँगा/करूँगी। इस थाली क हर वस्तु का अवशेष
वैज्ञा नक को हड़प्पाई पात्र या अन्न-भंडार म सचमुच मला है।”
इस खेल के पीछे इ तहासकार का नयम : कल्पना स्वतंत्र है, पर प्रमाण के भीतर। हड़प्पाई दाल म मच डालना
कल्पना नह , भूल है — मच अमे रका से भारत लगभग 500 वष पहले आई। क्या छोड़ना है, यह जानना इ तहास म
उतना ही आवश्यक है जतना यह जानना क क्या रखना है।
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आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 99
स क्रय व्यापार — हड़प्पा क तीन मुहर ( चत्र 6.13)
आइए पता लगाएँ
प्र.1 कुछ लेखन संकेत के साथ हड़प्पा क इन तीन मुहर को दे खते हुए आपके मन म क्या वचार आता है? क्या आप
इनक कोई व्याख्या दे ना चाहगे? अपनी कल्पनाश क्त का उपयोग क जए।
पहले पृष्ठ 99 पर छपी मुहर को ध्यान से दे खए। तीन क बनावट एक जैसी है — ऊपर संकेत क एक पं क्त और नीचे एक
पशु, बाईं ओर मुँह कए, एक आधार-रेखा पर खड़ा।
मुहर कौन-सा पशु उसम ध्यान दे ने योग्य क्या है
चत्र एकशंगृ ी पशु — एक हड़प्पाई मुहर पर सबसे अ धक मलने वाला पशु, और ऐसा पशु जो प्रकृ त म होता ही नह —
6.13.1 सी ंग वाला इस लए वह कसी वचार, कुल या कथा का प्रतीक रहा होगा
चत्र बैल वास्त वक, श क्तशाली, रोज़मरा का पशु — वही बल जो हल और गाड़ी ख चता था
6.13.2
चत्र सी ंग वाला बाघ वास्त वक पशु, पर असंभव अंग के साथ। यह भी कल्पना है, चत्रण नह
6.13.3
जो न श्चत है : मुहर केवल कुछ सट मीटर क ह; ये स्ट ऐटाइट नामक मुलायम पत्थर क ह, जसे गरम कर कठोर बनाया जाता
था; अनेक ब स्तय क खुदाई म हजार मुहर मली ह; पशु के ऊपर के संकेत “लेखन प्रणाली” के ह; और “यह न श्चत है क ये
कसी प्रकार के व्यापार क ग त व धय से संबं धत ह।”
जो न श्चत नह — और यही अ धक महत्वपूण है :
लेखन प्रणाली अभी तक समझी नह जा सक है। आज कोई भी एक हड़प्पाई संकेत नश्चय के साथ नह पढ़ सकता।
पशु- चत्र के प्रतीकात्मक अथ भी उतने ही अज्ञात ह।
इस लए आपक द हुई कोई भी व्याख्या — नीचे द गई स हत — केवल सुझाव है, अनुवाद नह ।
सुझाने योग्य व्याख्याएँ (बॉक्स आपको यही करने को कहता है) :
1. व्यापारी का नाम- चह्न। माल क गठरी पर लगी गीली म पर दबाकर यह बताया जाता होगा क गठरी कसक है — मुहर
या हस्ताक्षर क तरह। यह पुस्तक क अपनी व्याख्या से मेल खाता है : व्यापा रय को “अपने सामान को और एक-दूसरे को
पहचानना” था।
2. नगर या कायशाला का चह्न, जो बताए क माल कहाँ से आया।
3. प रवार, कुल या श्रेणी का प्रतीक — एक समूह के लए एक ंगी, दूसरे के लए बैल, जैसे वद्यालय म सदन का चह्न होता है।
4. नगर प्रशासन ारा व्यापारी को दया गया अनु ापत्र।
5. रक्षक या शुभ प्रतीक, क्य क इनम क ल्पत पशु भी ह।
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ल प का न पढ़ा जाना इतना महत्वपूण क्य है : लेखन सभ्यता क सात वशेषताओं म से एक है, और
हड़प्पावा सय के पास वह स्पष्ट रूप से थी। पर हम उसे पढ़ नह सकते, इस लए हम उनक भाषा, उनके शासक के
नाम, उनके नयम, उनके दे वता और उनक कथाएँ नह जानते। इस अध्याय क हर बात वस्तुओं से नकाली गई है
— ईंट, नाली, मनका, ह ी और पात्र। य द कभी ल प पढ़ ली गई, तो यहाँ पढ़ आधी बात फर से लखनी पड़
सकती ह।
सावधान : आपको कभी-कभी यह दावा सुनने को मलेगा क हड़प्पाई ल प ‘पढ़ ली गई है’। ऐसे सैकड़ दावे हुए ह
और एक भी स्वीकृत नह है। सही वाक्य वही है जो यह पुस्तक लखती है : “इस लेखन प्रणाली … के अथ को
अभी समझा जाना बाक है।”
आइए वचार कर — पृष्ठ 102
प्राचीन जीवन — पृष्ठ 100 और 101 क वस्तुए ँ पढ़ना
आइए वचार कर
प्र.1 पृष्ठ 100 और 101 पर दशाई गई वस्तुओं या इस अध्याय म च त्रत अन्य वस्तुओं को दे खते हुए क्या आप उन
ग त व धय और जीवन के पक्ष का पता लगा सकते ह, जो हड़प्पावा सय के लए महत्वपूण थे?
हर वस्तु कसी ग त व ध का सूत्र है। दोन पृष्ठ क वस्तुएँ एक-एक करके दे खए और पूरा जीवन उभर आता है।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ
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वस्तु ( चत्र) यह बताती है क क्या महत्वपूण था
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कांस्य दपण (6.14.1, धौलावीरा)
lasिक उसमें पितिबंब िदखे
व्यिक्तगत रूप-स ज्जा — और कांसे को ढालकर इतना चमकाने का कौशल
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emपात्र (6.14.2,
टे राकोटाsका
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खाना पकाना, भंडारण — और सजावट। उस पर पि याँ और आकृ ितयाँ िचित्रत है,ं अथ त रसोई का
aधौलावीरा) पात्र भी सुंद र होना चािहए था
व्यापार में सटीक माप। क्रमबद्धmआकारों के बाट का अथ है िनिश्चत मानक, ईमानदार ले न-दे न और
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भार तौलने के पत्थर (6.14.3,
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उसके पीछे एक पशासन
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धौलावीरा)
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कांस्य छै नी (6.14.4, धौलावीरा)
agिनम ण — वही औजार िजससे नगर का पत्थर तराशा गया
िशल्प और
पत्थर का खेल-बोड, लगभग 25 वयस्कों का मनोरंजन — और िनयम, क्योंिक बोड-खेल के िलए सहमत िनयम चािहए
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से.मी. (6.14.5)
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.co बचपन। िकसी ने बच्चों के िलए िखलौने बनाए
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म क सीट , लगभग 4 से.मी.
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(6.14.6, करनपुरा)
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a ‘पुरो हत राजा’ क मू त (6.15.1) महत्वपूण व्यिक्त, बिढ़ या वस्त्र और व्यिक्त-िचत्रण — आकृ ितयों वाला दुशाला दे िखए। पर पुस्तक
चेताती है : “यह मालूम नही ं है िक यह पितमा िकसकी है”
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पतीक और िवश्m
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वास — यह िचह्न भारत में आज भी पचिलत है
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स्व स्तक वाली मुहर (6.15.2)
त्रमुखी दे वता वाली मुहर (6.15.3) agकl या पतीकात्मक िवचार — ऊँ चे स्थान पर बैठी, शिक्तशाली पशुओं से िघरी ित्रमुखी आकृित
धािम
संगीत, नत्ृ य, आभूषण और आत्मिवश्वास — और कास
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ं े की ढलाई पर पूर ा अिधकार m
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‘नतक ’ क कांस्य प्र तमा, 10.8
से.मी. (6.15.4)
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नमस्ते.cकo मुद्रा म मू त (6.15.5) अिभवादन और स म्मान की मुद ाएँ, जो भारत में आज भीaपg l a
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ितिदन पयोग होती है ं
agl पात्र पर प्यासे कौए का चत्रण कथा-परंपरा — ठीक वही कहानी जो आज भी बच्चों को सुनाई जाती है
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(6.15.6, लोथल)
comह :
अब सूत्र को समूह म बाँ टए। जीवन के पाँच पक्ष .उभरते g l a
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1. काम और कौशल — कांसे क ढलाई,
gl पत्थर क तराशी, म के बतन, बुनाई।
2. व्यापार और माप म ईमानदारी — क्रमबद्ध बाट।
3. स दय और शरीर क दे खभाल — दपण, आभूषण, च त्रत पात्र, ओमान म मला हाथी दाँत का कंघा।
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4. खेल, संगीत और बचपन — खेल-बोड, सीट , नृत्य करती आकृ त।
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5. वश्वास और कथा — स्व स्तक, त्रमुखी दे वता क मुहर, नमस्ते, कौआ और पात्र।
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a इन दो पृष्ठ पर जो नह है, वह भी उतना ही बोलता है : यहाँ कोई तलवार नह , कोई कटार नह , कोई ढाल नह ,
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कोई युद्ध-रथ नह , शत्रु को कुचलते राजा का कोई चत्र नह । लगभग हर दूसरी प्राचीन सभ्यता क कला युद्ध से
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भरी है। पृष्ठ 100–101 को एक साथ प ढ़ए और ऐसे लोग दखते ह जन्ह ने अपना कौशल स्नान, माप, सजावट,
e mवह प्रमाण है जसके आधार पर अध्याय कहता है क “यह अपेक्षाकृत एक a
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खेल और उपासना पर लगाया — यही
शां तपूण सभ्यता प्रतीत होती हैl”a
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 भारतीय सभ्यता का प्रारंभ AglaSem · NCERT Solutions
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 102
प्राचीन जीवन — लोथल का पात्र और ‘नतक ’
आइए पता लगाएँ
प्र.1 लोथल के पात्र पर दशाई गई कहानी को पूरा क जए। आपके वचार से इस कहानी को 4,000 से अ धक वष से
क्य याद कया जाता रहा?
यह कहानी प्यासे कौए क है — और लोथल के पात्र का चत्रण ( चत्र 6.15.6) ठ क वही क्षण दखाता है जब कौए को उपाय
सूझता है। पूरी कहानी इस प्रकार है :
गरम िदन में एक कौआ प्यास से व्याकु ल है।
उसे एक पात्र िमलता है िजसकी तली में थोड़ ा-सा जल है — उसकी चोंच वहाँ तक नही ं पहुँच ती।
वह न पात्र िगरा सकता है, न तोड़ सकता है।
तभी उसे उपाय सूझ ता है : वह एक-एक करके कं कड़ उठाकर पात्र में डालता है।
हर कं कड़ के साथ जल ऊपर उठता जाता है … और अंत में ऊपर आ जाता है।
कौआ जल पीता है और उड़ जाता है।
सीख : जहाँ बल हार जाता है, वहाँ बुि जीत जाती है। द्ध
यह पात्र इतना महत्वपूण प्रमाण क्य है। हड़प्पाई कलाकार ने पात्र पर बैठा कौआ नह बनाया — वह केवल एक चत्र होता।
चत्रण म ऊँचा सँकरा पात्र और उसम नीचे तक उतरा जल दखाया गया है, अथात चत्रकार यह मानकर चल रहा था क शेष
कहानी आप पहले से जानते ह। जो चत्र कहानी को मान लेता है, वह इस बात का प्रमाण है क कहानी पहले से प्र सद्ध थी।
यह 4,000 से अ धक वष तक कैसे याद रही? लेखन से नह — हड़प्पाई ल प पढ़ नह जा सक , और यह कहानी बहुत बाद
तक लखी नह गई। यह श्रु त परंपरा से बची, और सभ्यता क वशेषताओं क सूची म ‘श्रु त परंपराओं’ का उल्लेख है ही। इसके
चार कारण :
छोट है और उसके कद्र म एक स्पष्ट चत्र है — पक्षी, पात्र, कंकड़, चढ़ता जल। याद रखना आसान, दोहराना आसान।
यह बच्च को सुनाई जाती है, और ब े बड़े होकर अपने ब को सुनाते ह। यह संसार क सबसे मजबूत कड़ी है।
इसक सीख हर युग म काम क है — धैय और बु द्ध बल से बड़े ह।
इसके लए कसी साम ी क आवश्यकता नह । कोई भी दाद कह भी सुना सकती है। भवन के वपरीत, कहानी ढोने म
कुछ खच नह होता।
क्या आप जानते ह? यही कहानी बाद म यूनान क ईसप-कथाओं म और भारतीय कथा-संग्रह म मलती है, और
आज भी कक्षा 1–2 क पुस्तक म छपती है। जब आप इसे कसी छोटे भाई-बहन को सुनाते ह, तो आप चार हजार
वष लंबी उस ंखला क एक कड़ी होते ह जो लोथल के कुम्हार के चाक से शुरू हुई थी।
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यह अकेला पात्र इ तहासकार के लए क्य बहुमूल्य है : यह उन गनी-चुनी जगह म से एक है जहाँ हम हड़प्पाई
वस्तु नह , हड़प्पाई वचार दखाई दे ता है। ईंट बताती ह क वे कैसे बनाते थे; कौए वाला पात्र बताता है क वे अपने
ब को क्या सखाना ज़रूरी समझते थे।
प्र.2 ‘नतक ’ क लघु प्र तमा पर वचार क जए। इस लघु प्र तमा क भाव-भं गमा से आप क्या समझते ह? पूरी बाँह
को ढँ कने वाली उसक उन चू ड़य को ध्यान से दे खए, जो गुजरात और राजस्थान के क्षेत्र म अभी भी म हलाएँ
पहनती ह। इस अध्याय म आपने और कहाँ पर इस तरह से चू ड़याँ पहनने को च ह्नत कया है। इससे हम क्या
नष्कष नकालना चा हए?
भाव-भं गमा। ‘नतक ’ ( चत्र 6.15.4) मोहनजो-दड़ो से प्राप्त कांस्य प्र तमा है, केवल 10.8 से.मी. ऊँची — आपक हथेली से भी
छोट । उसक मुद्रा दे खए :
एक हाथ कमर पर, कोहनी बाहर; सर पीछे क ओर और थोड़ा एक तरफ झुका; एक पैर मुड़ा हुआ, भार दूसरे पैर पर।
उसके पास बहुमूल्य वस्त्र नह — उसके आभूषण ही उसका ंगार ह : एक हार और चू ड़याँ।
यह मुद्रा आत्म वश्वासी, सहज, न श्चत और कुछ चंचल लगती है — जैसे कोई नृत्य क दो ग तय के बीच ठहरा हो। प्राचीन कला
महत्वपूण व्य क्तय को प्राय: कठोर और औपचा रक मुद्रा म दखाती है; यह प्र तमा वैसी नह है। इसी लए खोज के समय से आज
तक यह छोट -सी कांस्य आकृ त लोग को मोहती रही है — साढ़े चार हजार वष पुरानी, फर भी पूरी तरह जीवंत।
चू ड़याँ। वे उसक लगभग पूरी बाईं बाँह को कलाई से कंधे तक ढँ के हुए ह, और दा हनी कलाई पर भी कुछ ह — जोड़ा नह , पूरी
पं क्त।
इस अध्याय म और कहाँ इस तरह चू ड़याँ पहनी दखती ह? अध्याय के पहले ही पृष्ठ, पृष्ठ 85 के चत्र 6.1 पर लौ टए —
धौलावीरा के ‘ कला’ क्षेत्र के उत्तरी प्रवेश ार का छाया चत्र। सामने बैठ कच्छ वेशभूषा वाली म हला ने पूरी बाँह ढँ कने वाली
सफ़ेद चू ड़याँ पहन रखी ह — ठ क प्र तमा क तरह। वह आज क जी वत म हला है, जो एक हड़प्पाई नगर के भीतर बैठ है।
‘नतक ’ ( चत्र 6.15.4) चत्र 6.1, पृष्ठ 85 क म हला
काल लगभग 4,500 वष पहले , मोहनजो-दड़ो आज, धौलावीरा (कच्छ, ग ज
ु रात) में
चू ड़याँ एक बाँह पर कलाई से कं धे तक पूर ी बाँह पर पंिक्तबद्ध
आज भी हाँ — “जो गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रों में अभी भी मिहलाएँ पहनती है”ं , अथ त ठीक उ न्ही ं क्षेत्रों में जहाँ धौलावीरा और
प्रच लत? कालीबंगा है ं
हम क्या नष्कष नकालना चा हए? यह क हड़प्पाई संस्कृ त हड़प्पाई नगर के साथ समाप्त नह हुई। अध्याय का अं तम
अनुच्छेद यह शब्द म कहता है — “हड़प्पा क संस्कृ त एवं प्रौद्यो गक अ धकांशत: बची रही और यह भारतीय सभ्यता के अगले
चरण म पहुँच गई” — और ये दो चत्र इसे प्रमाण से कहते ह। पहनावे क एक री त भारत के उसी भू-भाग म, स्त्री से स्त्री तक, चार
हजार वष से चली आ रही है।
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यह संयोग नह , मजबूत तक क्य है : समानता अस्पष्ट नह है। यह एक व शष्ट आभूषण को व शष्ट ढं ग से
पहनने क री त है, और वह उसी भौगो लक क्षेत्र म बची है जहाँ पुरास्थल ह। नरंतरता का दावा करने से पहले
इ तहासकार ठ क यही तहरा मेल खोजते ह — वही वस्तु, वही री त, वही स्थान। इस अध्याय के अन्य उदाहरण भी
यही कहते ह : नमस्ते क मू त, स्व स्तक वाली मुहर, प्यासे कौए क कहानी, पात्र म हल्द और अदरक, और वह
हल जसका आकार आधु नक कसान आज भी काम म लाते ह।
एक बात का ध्यान र खए : ‘नतक ’ नाम खोजने वाले पुरातत्ववेत्ताओं ने दया था, हड़प्पावा सय ने नह । हम
वास्तव म नह जानते क वह नतक थी — केवल इतना क मुद्रा म ग त का भाव है। इस लए ल खए “‘नतक ’ नाम
से जानी जाने वाली प्र तमा”, ठ क वैसे ही जैसे पुस्तक लखती है क मू त को “प्राय: ‘पुरो हत राजा’ कहा जाता है
(यद्य प यह मालूम नह है क यह प्र तमा कसक है)”।
आइए वचार कर — पृष्ठ 102
अंत अथवा नई शुरुआत? — हड़प्पावासी गाँव म क्य लौटे
आइए वचार कर
प्र.1 हड़प्पावासी ामीण ब स्तय म लौट गए क्य क कसी नगरीय जीवन-शैली क तुलना म ामीण जीवन-शैली
भोजन और जल तक सहज पहुँच प्रदान करती है। तब से लेकर अब तक नगर भोजन और कभी-कभी जल
आपू त के लए गाँव पर नभर रहते ह।
यह बॉक्स कोई पहेली नह , ब ल्क एक ऐसी बात क व्याख्या है जो अन्यथा व चत्र लगती। य द कोई सभ्यता टू टती है, तो लोग
सु वधाजनक नगर से छोटे गाँव क ओर पीछे क्य जाते ह? क्य क जब आपू त क क ड़याँ टू टती ह, तब जी वत रहने के लए नगर
ही अ धक क ठन स्थान है।
हड़प्पाई नगर म जीवन गाँव म जीवन
भोजन कही ं और उगता है। उसे सै क ड़ों ग ामीण स्थलों से गाड़ी और नाव ारा आस -पास के खेतों में उगता है। जो काटा, वही
पितिदन पहचु ँ ना पड़ता है खाया
जल कु एँ, जलाशय और नािलयाँ — बनाई हुई संर चनाएँ, िजन्हे ं सफाई, मरम्मत कोई झरना, तालाब या उथला कु आँ, िजसे कु छ
और उन्हे ं सँभालने वाला पािधकारी चािहए ही पिरवार काम में लाते है ं
वषा न हो तो हजारों ऐसे लोग एक साथ भूखे हो जाते है ं जो कु छ उगाते ही नही ं कु छ पिरवार वहाँ चले जाते है ं जहाँ अब भी जल
है
कस पर पशासन, व्यापार, योजना — और ये तीनों ठप हो सकते है ं पिरवार और खेत — जो ठप नही ं होते
टका है
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अत: यह लौटना समझदारी थी, पराजय नह । लगभग 2200 सा.सं.पू. से जलवायु शुष्क होती गई और सरस्वती अपने मध्य
बे सन म सूख गई, जससे नगर तक पहुँचने वाला भोजन और जल घट गया। हड़प्पावा सय ने वही कया जो उ चत था — उन्ह ने
“प रव तत वातावरण म ग्रामीण जीवन-शैली को अपनाया” और “हजार नह तो सैकड़ क संख्या म छोट -छोट ब स्तय के रूप म
बखर गए”।
बॉक्स ‘तब से लेकर अब तक’ क्य कहता है : यह नभरता आज भी बनी हुई है। आपके नगर का चावल, गे ँ,
दूध और स ब्जयाँ ऐसे कसान उगाते ह जनसे आप कभी नह मलगे, और उसका बहुत-सा जल नगर से बहुत दूर
सं चत होता है। य द एक सप्ताह ट्रक न चल, तो गाँव से बहुत पहले नगर संकट म आ जाएगा। हड़प्पाई नगर ठ क
उसी बदु पर टू टे जहाँ हर नगर सबसे कमजोर होता है — नगर स्वयं को भोजन नह दे सकता।
चचा का वषय : कक्षा म पू छए क आपके मध्याह्न भोजन का अनाज कहाँ उगा और कतनी दूर से आया। फर
पू छए क य द कुछ न आए तो आपका नगर कतने दन चल सकेगा। यही एक प्रश्न 1900 सा.सं.पू. को बहुत नकट
ले आता है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 102
अंत अथवा नई शुरुआत? — पतन के कारण
प्र.1 इस सभ्यता के पतन के क्या कारण थे?
वतमान म दो कारण पर सहम त है, और एक पुरानी व्याख्या छोड़ द गई है।
कारण स्थ त और प्रमाण
1 लगभग 2200 सा.सं.पू. से वश्व के बड़े भाग को सहमित। इससे कृ िष काय अिधक किठन हआ
ु होगा और नगरों की ओर
प्रभा वत करने वाला जलवायु प रवतन — वषा म खाद्य आपूित घटी होगी
कमी और शुष्कता
2 सरस्वती नद का मध्य बे सन सूख गया सहमित। वहाँ के नगर — जैसे कालीबंगा और बनावली — अचानक छोड़
िदए गए। बाद के गंथ भी इस नदी के सूखने और लुप्त होने का वणन करते
है ं (पष्ृ ठ 90)
3 युद्ध या आक्रमण से नगर का वध्वंस अस्वीकृ त। “युद्ध या आक्रमण के कोई िनशान नही ं िमलते।” हड़ प्पावािसयों
ने “कभी भी कोई से ना या युद्ध के हिथयार नही ं रखे”
अध्याय सावधानी से जोड़ता है — “इसम अन्य कारण भी रहे ह गे”। दो कारण सबसे अ धक प्रमा णत ह, पूरी कहानी नह ।
ध्यान द जए क पतन दखता कैसा था। यह कोई एक आक स्मक वप त्त नह थी :
यह लगभग 1900 सा.सं.पू. म हुआ — शुष्क दौर आरंभ होने के तीन शताब्द बाद; धीमा दबाव, अचानक प्रहार नह ।
“इसके नगर एक के बाद एक खाली होते गए” — भन्न नगर भन्न समय पर।
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लोग लुप्त नह हुए। जो रहे, उन्ह ने “ग्रामीण जीवन-शैली को अपनाया”, और हड़प्पावासी “सैकड़ -हजार छोट ब स्तय के रूप
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म बखर गए”।
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“ऐसा प्रतीत होता है क पूववत सरकार या प्रशासन अब वद्यमान नह रहा” — वास्तव म जो टू टा, वह वही संगठन था जो
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नगर को जोड़े
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अनुभाग का शीषक “अंत अथवा नई शुरुआत?” क्य है : क्य क सभ्यता मरी नह , उसका रूप बदल गया।
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“यद्य प नगर लुप्त हो गए, ले कन हड़प्पा क संस्कृ त एवं प्रौद्यो गक अ धकांशत: बची रही और यह भारतीय
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सभ्यता के अगले चरण म पहुँच गई।” शल्प, फसल, हल, चू ड़याँ, नमस्ते, कहा नयाँ — ये सब नगर से नकलकर ag
गाँव म गए और आज भी हमारे साथ ह।
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परीक्षा के लए सुझाव : तीन भाग म उत्तर द जए — (i) लगभग 2200 सा.सं.पू. से जलवायु प रवतन, (ii)
s e mनह । फर एक
सरस्वती के मध्य बे सन का सूखना, और (iii) युद्ध या आक्रमण नह , क्य क उसका कोई प्रमाण
. com: “ये दो कारण हम याद दलाते ह क हम अपने कल्याण के लए जलवायु
पं क्त जो ड़ए
a glaऔर पयावरण पर कतने
a s emह।”
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नभर
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आगे बढ़ने से पहले ... — पृष्ठ 103
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अध्याय तीन बदुओं म
आगे बढ़ने से पहले ...
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सधु, हड़प्पा या सधु-सरस्वती सभ्यता वश्व क प्राचीनतम सभ्यताओं म से एक हैe
प्र.1
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o धन, व वध शल्प और स क्रय व्यापार के साथ सु नयो जत नगर काagनमाण a s
l कया।
हड़प्पावा सय ने कुशल जल
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ag उत्तर
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इस एक वाक्य को खो लए और अध्याय के पहले दो- तहाई भाग हाथ आ जाते ह। इसका हर वाक्यांश कसी न कसी व शष्ट प्रमाण
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पर टका है।
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वाक्यांश उसके पीछे का प्रमाण
“ वश्व क प्राचीनतम महानगर लगभग 2600 सा.सं.पू. से । िचत्र 6.2 की सभ्यताओं में के वल मेस ोपोटािमया (लगभग 4000 सा.सं.पू.)
सभ्यताओं म से एक” और िमस्र (लगभग 3100 सा.सं.पू.) इससे पुर ाने है ं
“सु नयो जत नगर” “सुिनयोिजत योजना के अंतगत िनिमत”; चौड़ ी सड़ कें चारों िदशाओं की ओर उ न्मुख; िकले बंद ी; ऊपरी और
िनचला नगर (धौलावीरा में तीन क्षेत्र); छोटे-बड़े घरों की एक जैस ी गणु वत्ता
“कुशल जल प्रबंधन” स्नानागार सड़ कों के नीचे की ढकी नािलयों से जुड़े; मोहनजो-दड़ ो में लगभग 700 ईंट के कु एँ; धौलावीरा में छह
या अिधक जलाशय, सबसे बड़ ा 73 मीटर , जल संचयन और िवतरण के िलए भूिमगत नािलयों से जुड़े; जल -रोधक
और पुन: भरा जा सकने वाला महास्नानागार
“ व वध शल्प” कानिलयन मनकों में छे द और सजावट; स ख्त शंख से चूिड़ याँ; तांबे और कांस्य का काम; हाथी दाँत की नक्काशी;
कपास की बुनाई; िम ी के बतन; िखलौने और खेल
“स क्रय व्यापार” आंतिरक और बाहरी; स्थल माग, निदयाँ और समुद ; सूस ा (ईरान) में मनके और ओमान में कं घा; लोथल का 217
× 36 मीटर का बंद रगाह; सामान और व्यापारी पहचानने के िलए हजारों मुहरे ं
तीन नाम, एक ही सभ्यता। प्रश्न जस नाम का प्रयोग करे, वही ल खए — पर यह जा नए क पुस्तक ‘हड़प्पा’ या ‘ सधु-सरस्वती’
को क्य चुनती है : पहला तटस्थ है, दूसरा भौगो लक रूप से ईमानदार, और ‘ सधु घाट ’ इनम से कुछ भी नह ।
सुझाव : य द प्रश्न हो “हड़प्पाई नगर क नगर-योजना का वणन क जए”, तो चार शब्द — योजना – सड़क –
कलेबंद – दो नगर — उत्तर आरंभ करा दगे, और चार शब्द — स्नानागार – ना लयाँ – कुएँ – जलाशय — उसे
पूरा कर दगे।
प्र.2 उपजाऊ कृ ष से नगर को व भन्न प्रकार क फसल प्राप्त हुईं।
यह सभ्यता क सातव वशेषता का पूरी तरह पूरा होना है — और यही वह आधार है जस पर बाक सब टका है।
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क्या उगाया या अध्याय से ववरण
पाला
अनाज जौ, गेहू,ँ कु छ मोटे अनाज, बाजरा और कभी-कभी धान
दलहन से म , मटर के दाने और दाले ं
स ब्जयाँ “अनेक िकस्म की सिब्जयाँ”
कपास यूरे िशया में कपास उगाने वाले वे पथम थे, और उससे कपड़ ा बुनते थे
पशु और मछली मांस के िलए पालतू पशु; निदयों और समुद दोनों में मछली — खुद ाई में िमली ं पशुओ ं की हि यों और मत्स्य जीवाश्म
से ात
पकाने के पात्र म दुग्ध उ त्पाद और — आश्चयजनक रूप से — हल्दी, अदरक और के ला
दो बात ने इसे संभव बनाया। पहली, स्थान : ब स्तयाँ बड़ी और छोट न दय के कनारे बसाई गईं, “ सफ जल स्रोत तक आसानी
से पहुँचने के लए ही नह , ब ल्क कृ ष क दृ ष्ट से भी, क्य क न दयाँ अपने आस-पास क भू म को उपजाऊ बनाती ह”। दूसरी,
उपकरण : उन्ह ने हल स हत खेती के कई उपकरण बनाए — और ह रयाणा के बनावली से मला म का लघु प्र तरूप ( चत्र
6.9) उसी आकार का है जसका उपयोग आधु नक कसान आज भी करते ह।
वह वाक्य जो पूरी सभ्यता को समझा दे ता है : “यह गहन कृ ष ग त व ध सैकड़ छोटे ामीण स्थल अथवा
गाँव ारा संचा लत क जाती थी। अभी क तरह तब भी ग्रामीण क्षेत्र से पयाप्त कृ ष उपज प्र त दन उपलब्ध होने
पर ही नगर जी वत रह सकते थे।” हड़प्पाई नगर वास्तव म एक बहुत बड़े ग्रामीण क्षेत्र का दखाई दे ने वाला शखर
था — और जब उस ग्रामीण क्षेत्र पर सूखा और मरती नद टू ट , तो सबसे पहले शखर ही गरा।
क्या आप जानते ह? कपास हड़प्पावा सय का सबसे मौन वश्व-क तमान है। उसे उगाना, कातना और बुनना पूरे
यूरे शया म सबसे पहले यह हुआ — और उसके बाद अगले चार हजार वष तक भारतीय सूती कपड़ा वश्व क सबसे
वां छत वस्तुओं म रहा।
प्र.3 इस सभ्यता का जलवायु संबंधी और पयावरणीय प रवतन के कारण अंततः ास हो गया; लोग ामीण जीवन-
शैली क ओर लौट गए।
वाक्य ध्यान से प ढ़ए : इसम “ ास” लखा है, “ वनाश” नह ; और “कारण” के साथ ‘ न श्चत रूप से’ नह । दोन बात सोच-
समझकर लखी गई ह।
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लगभग 2200 सा.सं.पू. → िवश्व के बड़ े भाग को पभािवत करने वाला जलवायु पिरवतन : कम वष , शुष्कता
→ कृ िष किठन हुई, नगरों तक खाद्य आपूित घटी
सर वती का म य बेिसन सूखा → कालीबंगा, बनावली अचानक छोड़ े गए
स् ध्
लगभग 1900 सा.सं.पू. → नगर एक के बाद एक खाली; पूववत पशासन समाप्त
→ हड़ प्पावासी सैक ड़ ों-हजारों छोटी गामीण बिस्तयों में िबखर गए
‘संभवत:’ क्य । पुस्तक जोड़ती है — “इसम अन्य कारण भी रहे ह गे।” उस समय का लखा हुआ कोई ववरण नह है और कोई
पढ़ जा सकने वाली ल प नह बची। दो कारण पर सहम त है; शेष खुला है।
‘ ामीण जीवन-शैली क ओर लौट गए’, ‘लुप्त हो गए’ नह । लोग न मरे, न भगाए गए। वे वहाँ गए जहाँ भोजन और जल सहज
थे — पृष्ठ 102 के ‘आइए वचार कर’ क यही बात है — और अपने कौशल साथ ले गए। “यद्य प नगर लुप्त हो गए, ले कन हड़प्पा
क संस्कृ त एवं प्रौद्यो गक अ धकांशत: बची रही और यह भारतीय सभ्यता के अगले चरण म पहुँच गई।”
अध्याय स्वयं जो सीख नकालता है : “ये दो कारण हम याद दलाते ह क हम अपने कल्याण के लए अपनी
जलवायु और पयावरण पर कतने नभर ह।” जस सभ्यता के पास प्राचीन वश्व क सव त्तम ना लयाँ, शानदार
शल्प और समुद्र व्यापार था, वह वषा के बदलाव से अ धक चतुर सद्ध नह हो सक । ऐसी शताब्द म, जब जलवायु
फर बदल रही है, यह सोचने योग्य बात है।
सावधान : पुरानी पुस्तक इन नगर के अंत के लए कसी ‘आय आक्रमण’ को दोषी ठहराती थ । यह अध्याय स्पष्ट
कहता है क युद्ध या आक्रमण का कोई नशान नह मलता, न सेना, न युद्ध के ह थयार। य द आप उत्तर म
‘आक्रमण’ लखते ह, तो आप वह लख रहे ह जसका प्रमाण से खंडन होता है।
प्रश्न, क्रयाकलाप और प रयोजनाएँ — पृष्ठ 104
अध्याय के अंत का अभ्यास
प्र.1 इस अध्याय म अध्ययन क गई सभ्यता के अनेक नाम क्य ह? इनके महत्व पर चचा क जए।
क्य क खोज के अलग-अलग चरण म अलग-अलग लोग ने इसे बार-बार नाम दया — और हर नाम यह दज करता है क उस
समय तक क्या ात था।
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नाम कहाँ से आया क्या दावा करता है — और उसका मूल्य
हड़प्पा हड़ प्पा से , जो 1920–21 में इस सभ्यता का तटस्थ और सुर िक्षत। यह िकसी क्षेत्र का नही,ं एक पुर ास्थल का नाम है,
सभ्यता पहला उत्खिनत नगर था; इसीिलए इसके इसिलए नई खोज इसे गलत िस द्ध नही ं कर सकती — यही कारण है िक
िनवासी हड़प्पावासी कहलाते है ं पुर ातत्ववेत्ता इसे पसंद करते है ं
सधु िसंध ु नदी से , िजसके िकनारे हड़प्पा और सही, पर अधूर ा। अनेक पुर ास्थल िसंध ु के आस-पास है ं ही नही ं
सभ्यता मोहनजो-दड़ो िमले
सधु घाट वही नदी, साथ में ‘घाटी’ — यह शब्द तब अपचिलत। मानिचत्र (िचत्र 6.3) िदखाता है िक स भ्यता “िसंध ु क्षेत्र से बहुत
सभ्यता चला जब के वल िसंध ु के पुर ास्थल ात थे आगे तक फै ली हुई थी”। पुस्तक जान-बूझकर इसका पयोग नही ं करती
सधु- दोनों नदी-पणािलयाँ — िसंध ु और सर स्वती सबसे सटीक। अके ली सर स्वती की द ोणी में दो महानगर (राखीगढ़ ी,
सरस्वती (आज की घग्गर-हाकरा) गँवेर ीवाला), अनेक छोटे नगर (फरमाना, कालीबंगा) और कु छ अन्य नगर
सभ्यता (िभर ना, बनावली) है ं — तथा मानिचत्र पर पुर ास्थलों की सव िधक सघनता
भी
महत्व — इन नाम से तीन बात सीखने को मलती ह।
1. नाम भी एक प्रमाण है, जसक अपनी त थ होती है। ‘ सधु घाट ’ बताता है क 1920 के दशक म लोग क्या जानते थे, यह
नह क सत्य क्या है।
2. हर नाम एक छपा दावा करता है। ‘ सधु’ कहते ही आपने चुपचाप कह दया क यह सभ्यता एक नद क थी। ‘ सधु-
सरस्वती’ कहते ही आपने उसका दूसरा आधा भाग लौटा दया।
3. ान बढ़ता है, इस लए नाम बदलने पड़ते ह। “इस प्रकार क खोज आज भी जारी ह” — राखीगढ़ , धौलावीरा, भराना और
लोथल तब अज्ञात थे जब पहला नाम दया गया।
सुझाव : परीक्षा के लए सबसे सुर क्षत वाक्य — “पहले उत्ख नत पुरास्थल के नाम पर इसे हड़प्पा सभ्यता कहा
जाता है, जस नद के कनारे यह पहले मली उसके नाम पर सधु सभ्यता, और सरस्वती क द्रोणी म इसके बहुत
बड़े वस्तार के कारण सधु-सरस्वती सभ्यता; ‘ सधु घाट सभ्यता’ अब अप्रच लत माना जाता है।”
प्र.2 सधु-सरस्वती सभ्यता क उपल य का सार दे ते हुए सं क्षप्त रपोट (150 से 200 शब्द) ल खए।
पहले रूपरेखा बनाइए, फर ल खए। 150–200 शब्द म लगभग छह वाक्य आते ह, इस लए छह उपल ब्धयाँ चु नए और हर एक
के साथ एक तथ्य द जए।
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वाक्य उपल जो तथ्य अवश्य द जए
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कब और कहाँ महानगर लगभग 2600 से 1900 सा.सं.पू., िसंध ु और सरस्वती के िकनारे
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2 नगर-योजना
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सुिनयोिजत योजना; चारों िदशाओं की ओर चौड़ी सड़कें ; िकले बंद ी; ऊपरी और िनचला नगर
3 जल प्रबंधन सड़कों के नीचे ढकी नािलयाँ; मोहनजो-दड़ो में लगभग 700 कु एँ; धौलावीरा में 73 मीटर का जलाशय
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4 शल्प और धातु वज्ञान कानिलयन मनके , शंख की चूिड़याँ, ताबं ा और कास्ं य
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5 व्यापार
agे , ओमान में कंघा, लोथल का 217 मीटर का बंदरगाह, हजारों मुहरे ं
सूस ा में मनक
यूरे िशया में कपास उगाने वाले पथम; िनम ण की समान ग ण
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6 कृ ष और समाज ु वत्ता; युद्ध के हिथयार नही ं
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नमूना उत्तर (लगभग 185 शब्द) :
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a s em-सरस्वती सभ्यता, जसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है, भारत क पहली सभ्यता थी। इसके महानगर
gl लगभग 2600 से 1900 सा.सं.पू. तक सधु और सरस्वती न दय के कनारे फले-फूले और यह वश्व क सबसे
“ सधु
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पुरानी सभ्यताओं म से एक है।
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इसक सबसे बड़ी उपल ब्ध नगर-योजना थी। मोहनजो-दड़ो, हड़प्पा, धौलावीरा और राखीगढ़ जैसे नगर
सु नयो जत योजना के अंतगत बने, जनम चार mदशाओं क ओर उन्मुख चौड़ी सड़क, कलेबंद तथा ऊपरी और
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asबड़े
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नचला नगर थे। उल्लेखनीय है क छोटेgऔर घर के नमाण क गुणवत्ता एक समान थी।
उनका जल प्रबंधन असाधारण था। घर के स्नानागार सड़क के नीचे बहने वाली ना लय से जुड़े थे; मोहनजो-दड़ो म
लगभग 700 ईंट के कुएँ थे और धौलावीरा म कम से कम छह जलाशय, जनम सबसे बड़ा 73 मीटर लंबा था।
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हड़प्पावासी कुशल कारीगर थे — उन्ह ने कान लयन मनक म छे द कए, शंख क चू ड़याँ बनाईं और कांस्य के
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उपकरण तथा प्र तमाएँ ढाल — और स्थल, नद तथा समुद्र के माग से स क्रय व्यापार कया; उनके मनके ईरान के
s e mसा म मले ह और लोथल म 217 मीटर लंबा बंदरगाह था।
la वे अनेक फसल उगाते थे और यूरे शया म कपास उगाने वाले प्रथम थे। सबसे उल्लेखनीय बात यह है क उन्ह ने युद्ध
सू
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का कोई ह थयार नह छोड़ा।”
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रपोट लंबी नह , ठोस होनी चा हए : हर वाक्य म एक न श्चत संख्या र खए। ‘उनक जल-व्यवस्था अच्छ थी’ एक
राय है; ‘मोहनजो-दड़ो म लगभग 700 ईंट के कुएँ’ इ तहास है।
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m a e व भन्न वकल्प क्या ह? क्या
sे पास
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.c आप प्रत्येक वकल्प म लगने वाले समय का अनुमान लगा सकते ह?ag
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कल्पना क जए क आपको हड़प्पा से कालीबंगा तक यात्रा करनी है। आपक
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पहले चत्र 6.3 पर दोन नगर ढूँ ढ़ए। हड़प्पा आज के पा कस्तानी पंजाब म रावी नद पर है; कालीबंगा उससे द क्षण-पूव म, आज
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के राजस्थान म सरस्वती (घग्गर) पर।
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सीधी रेखा में दू री : लगभग 180 िक .मी.
निदयों के साथ चलने वाला वास्तिवक माग : लगभग 250–300 िक .मी.
क. लगभग 2500 सा.सं.पू. के हड़प्पाई यात्री के वकल्प
वकल्प अनुमा नत ग त ~280 क.मी. म टप्पणी
समय
पैदल 20–25 िक.मी. पितिदन लगभग 12–14 िदन सबसे सस्ता और सबसे प्रच लत तरीका।
बोझ हो तो और अ धक समय
बैलगाड़ी से 15–20 िक.मी. पितिदन लगभग 15–19 िदन पैदल से धीमी, पर सामान ढो सकती है।
हड़प्पाई गा ड़याँ म के प्र तरूप से ज्ञात ह
कुछ दूरी नाव से धारा के साथ 25–40 िक.मी. लगभग 10–15 िदन, बीच रावी से नीचे, फर सरस्वती क ओर। ऋतु
पितिदन; धारा के िवरुद्ध बहुत धीमी में पैद ल चलना अलग पर नभर — वषा के बाद न दयाँ भरी होती
ह
मला-जुला — जहाँ नदी सहायक हो वहाँ नाव, लगभग दो स प्ताह वास्त वक व्यापारी हर हस्से म सबसे तेज
सबसे संभा वत अन्यत्र गाड़ी या पैद ल साधन चुनते
ख. आज के वकल्प
सड़क माग से, य द रास्ता खुला हो : लगभग 350–400 क.मी., कार से 6–8 घंटे।
रेल और सड़क से : बदलाव स हत लगभग एक दन।
असली बाधा दूरी नह है। हड़प्पा पा कस्तान म है और कालीबंगा भारत म, इस लए आज इस यात्रा के लए वीज़ा और सीमा
पार करना आवश्यक है — और उसम उन चौदह दन से कह अ धक समय लग सकता है जो एक हड़प्पाई व्यापारी को लगते
थे।
प्रश्न का मम : हड़प्पा से कालीबंगा एक व्यापारी लगभग पखवाड़े म पहुँच जाता था, और दोन नगर म एक जैसी
ईंट, एक जैसे बाट और एक जैसी मुहर मलती ह। इसका अथ है क ये अलग-थलग कस्बे नह , एक जुड़ा हुआ
जाल थे — और इस अध्याय म ‘सभ्यता’ का यही अथ है। और यह क आज एक सीमा उस जाल को दो टु कड़ म
काट दे ती है, यह स्वयं ध्यान दे ने योग्य इ तहास है।
स्वयं जाँ चए : पृष्ठ 89 के चत्र 6.3 म नीचे बाईं ओर छपी मापनी (स्केल) का उपयोग क जए और स्केल से दोन
बदुओं के बीच क दूरी ना पए। आपका उत्तर सीधी रेखा म लगभग 180 क.मी. के आस-पास आना चा हए। मापनी
से दूरी का अनुमान लगाना अभ्यास योग्य कौशल है।
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प्र.4 कल्पना क जए क य द हड़प्पा के कसी पुरुष या म हला को हम आज के भारत के सामान्य रसोईघर म ले आते
ह, तो उन्ह सबसे बड़े चार या पाँच आश्चय क्या लगगे?
पहले यह दे खए क उन्ह क्या प र चत लगेगा, ता क आश्चय उभरकर सामने आएँ। गे ँ और जौ का आटा, दाल, दही, हल्द , अदरक,
केला, म के पात्र, चक्क और तवा — ये सब उन्ह जाने-पहचाने लगगे। अब आश्चय :
क्र. आश्चय वे च कत क्य ह गे
1 घुंडी घुमाते ही आ जाने वाली वे लकड़ी या उपले क आग पर पकाते थे, जसे जलाना और सँभालना पड़ता था। बना ईंधन,
आग — गैस चू ा बना धुएँ और बना राख क लौ उन्ह जादू लगेगी
2 घर के भीतर नल से , जब चाहे वे प्राचीन वश्व के सबसे बड़े जल-अ भयंता थे — कुएँ, ना लयाँ, जलाशय, महास्नानागार। पर घर
तब आता जल के भीतर दाब के साथ आता जल वे कभी नह कर सके, और इसका मूल्य वे सबसे अ धक
समझगे
3 रे िफ जरे टर — गरम दे श में एक उनके संसार म भोजन को खराब होने से बचाने का कोई उपाय नह था, सवाय सुखाने, नमक
ठं डा बक्सा लगाने और जल्द खा लेने के। जुलाई म सद बना दे ने वाला बक्सा उस कमरे क सबसे व चत्र
वस्तु होगी
4 कभी न दे खा हआ
ु भोजन : ये सब 1900 सा.सं.पू. के बहुत बाद भारत पहुँचे — मच, आलू और टमाटर तो अमे रका से
आलू, टमाटर , िमच, चाय, चीनी लगभग 500 वष पहले। आज क रसोई क मूल वस्तुएँ उनके लए बल्कुल अनजानी ह गी
5 इस्पात, प्ल ािस्टक और काँच — वे तांबा, कांस्य, पत्थर, शंख, हाथी दाँत और टे राकोटा जानते थे। इस्पात का कुकर, प्ला स्टक क
और छपे हुए पैके ट बोतल और लखावट वाला बंद पैकेट — हर एक नई सामग्री भी है और नया वचार भी
य द शक्षक एक और आश्चय पूछ : चार ओर फैली लखावट — पैकेट पर, कैलडर पर, मशीन पर। उनक अपनी ल प थी, पर
हमारी उन्ह अपठनीय लगेगी — ठ क वैसे ही जैसे उनक हम।
नमूना उत्तर : “पहला आश्चय गैस चूल्हा होगा, क्य क उनके यहाँ आग लकड़ी से आती थी और उसे सँभालना पड़ता
था। दूसरा नल होगा : हड़प्पावा सय ने कुएँ, ना लयाँ और जलाशय बनाए थे, इस लए घर के भीतर बहता स्वच्छ जल
उन्ह सबसे अ धक प्रभा वत करेगा। तीसरा रे जरेटर होगा, गरम दे श म एक ठं डा बक्सा। चौथा स्वयं भोजन होगा
— आलू, टमाटर, मच, चाय और चीनी, जो उनके भारत म थे ही नह । पाँचवाँ इस्पात और प्ला स्टक होगा, जो
उन्ह ने कभी नह दे खे। पर हल्द , अदरक और दाल उठाकर वे ठ क-ठ क जान जाएँगे क उनका क्या करना है।”
यह प्रश्न वास्तव म नरंतरता का है : दे खने म खेल लगता है, पर यह आपसे अलग करवाता है क क्या बदला
(तकनीक और सामग्री) और क्या नह बदला (अनाज, मसाले, दाल, रोट , चक्क )। चार हजार वष ने रसोई बदल
द ; भोजन-सूची उतनी नह बदली।
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प्र.5 इस अध्याय के सभी चत्र पर दृ ष्ट डालते हुए उन आभूषण / हाव-भाव / वस्तुओं क सूची बनाइए, जो अभी
भी 21व शताब्द म प र चत प्रतीत होती ह।
अध्याय के चत्र एक-एक करके दे खए। सूची अ धकांश वद्या थय क अपेक्षा से लंबी नकलती है।
वग क्या-क्या दखता है कहाँ
आभूषण पूर ी बाँह ढँक ने वाली चूिड़ याँ — ‘नतकी’ की, और पष्ृ ठ 85 के िचत्र 6.15.4; िचत्र 6.1; िचत्र 6.10
छायािचत्र में बैठी मिहला की
हार और मनकों की मालाएँ
कानिलयन मनके , जो आज भी गुजरात में बनते और िबकते है ं
शंख की चूिड़ याँ, जो भारत के कई भागों में आज भी पहनी जाती है ं
हाव-भाव ‘नम स्ते’ — हथेिलयाँ जोड़ े बैठी टेर ाकोटा मूित, ठीक वैसे जैसे िचत्र 6.15.5; िचत्र 6.15.4
आज लोग अिभवादन करते है ं
कमर पर हाथ रखने की, आज भी िबल्कु ल आधुिनक लगने वाली
मुद ा
दै नक उपयोग क कं घा (हाथी दाँत का, लगभग 7 से .मी. — आज के कं घे जैस ा ही िचत्र 6.11; 6.14.1; 6.14.2; 6.14.4;
वस्तुए ँ आकार ) 6.14.3; 6.14.6; 6.14.5
दपण
पि यों और आकृ ितयों वाला िचित्रत पात्र
छै नी
क्रमबद्ध बाट
सीटी
गोिटयों वाला खेल -बोड
खेती हल — “िजनमें से कु छ का उपयोग आधुिनक समय में भी िकसानों िचत्र 6.9, बनावली से
ारा िकया जाता है”
प्रतीक और कथाएँ स्विस्तक, जो आज भी ारों और बहीखातों पर बनाया जाता है िचत्र 6.15.2; िचत्र 6.15.6; िचत्र 6.13.2
प्यासे कौए की कहानी, जो आज भी बच्चों को सुनाई जाती है
बैल , जो आज भी भारतीय कला की पिरिचत आकृ ित है
रसोई म हल्दी, अदरक और के ला तथा दुग्ध उ त्पाद — पात्रों के अवशेषों से पष्ृ ठ 97
यह सूची क्या सद्ध करती है : अध्याय का अं तम दावा — “हड़प्पा क संस्कृ त एवं प्रौद्यो गक अ धकांशत: बची
रही और यह भारतीय सभ्यता के अगले चरण म पहुँच गई”। नगर लगभग 1900 सा.सं.पू. म खाली हो गए, पर
कंघा, चूड़ी, नमस्ते, हल, कौए क कहानी और हल्द कभी खाली नह हुए। यह वश्व के सबसे लंबे अटू ट सांस्कृ तक
धाग म से एक है।
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प रयोजना का सुझाव : ‘तब’ और ‘अब’ नाम से दो स्तंभ वाला भ त्त- चत्र बनाइए। बाएँ स्तंभ म हड़प्पाई वस्तु
का चत्र चपकाइए और दाएँ म अपने घर क उसी वस्तु का छाया चत्र — कंघा, चूड़ी, सीट , खेल-बोड, हल्द का
डब्बा। दोन को साथ दे खने से नरंतरता जतनी जल्द समझ आती है, उतनी कसी और तरीके से नह ।
प्र.6 धौलावीरा के जलाशय क प्रणाली क्या सोच प्र त ब बत करती है?
दे खए क यह प्रणाली वास्तव म थी क्या : कम से कम छह वशाल जलाशय, पत्थर से बने या सीधे च ान काटकर, सबसे बड़ा
73 मीटर लंबा, और अ धकांश भू मगत ना लय से जुड़े हुए, जससे कुशल जल संचयन और वतरण हो सके — वह भी कच्छ
के रन म, भारत के सबसे शुष्क क्षेत्र म से एक।
उन्ह ने क्या बनाया यह कौन-सी सोच दखाता है
संकट आने से पहले ही, लगभग दू र दिशता और योजना। वे अगले वष के , और उसके अगले वष के जल की िचंता कर रहे थे
मरुस्थल म जलाशय
एक नह , छह सावधानी। यिद एक सूख जाए या उसकी सफाई करनी पड़ े, तब भी नगर के पास जल रहे — आज
के ‘बैक अप’ जैस ी ही सोच
ठोस च ान म हाथ से 73 मीटर का ऐसी वस्तु में िवशाल सामूिहक श्रम लगाने की तत्परता, िजससे कोई लाभ नही,ं के वल सुर क्षा िमलती है
कुंड काटना
भू मगत ना लय से जुड़ाव अिभयांित्रकी बुिद्ध। वष का जल जहाँ िगरे वही ं पकड़ कर वहाँ पहचु ँ ाना जहाँ आवश्यकता है — यह वष
जल संचयन है, इस शब्द के गढ़ े जाने से चार हजार वष पहले
ऐसी प्रणाली जसक सफाई और अनुशासन और नागिरक संगठन। िकसी को इसे पीढ़ ी-दर -पीढ़ ी चालू रखना था
रख-रखाव अ नवाय था
जल पूरे नगर के लए, कसी एक घर सामुद ाियक सोच — जल को साझा संस ाधन मानकर सामूिहक रूप से पबंिधत करना
के लए नह
एक वाक्य म : ये जलाशय जल के प्र त आदर, द घका लक योजना और सामू हक उत्तरदा यत्व क सोच दखाते ह — ऐसा समाज
जसने अपने कठोर पयावरण को ईमानदारी से पढ़ा और आशा के भरोसे बैठने के बजाय उसी के भीतर जीने के लए स्वयं को
संग ठत कया।
यह केवल प्रशंसा क बात क्य नह है : कच्छ आज भी जल क कमी से जूझता है, और भारत के बड़े भाग भी।
आधु नक गुजरात और राजस्थान ने ठ क यही वचार फर अपनाया है — चेक-डैम, गाँव के तालाब, छत का वषा
जल संचयन। शुष्क भू म के लए हड़प्पावा सय का उत्तर यह नह था क जल दूर से लाया जाए, ब ल्क यह क जो
गरता है उसे पकड़ो और सँभालो। यह सोच नई नह है, दोबारा खोजी गई है।
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वचार क जए : अंतत: यह भी पयाप्त नह हुआ — लगभग 2200 सा.सं.पू. से जलवायु शुष्क हुई और लगभग
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1900 सा.सं.पू. म नगर छोड़ दए गए। अच्छ योजना पयावरण के वरुद्ध समय दला सकती है, उसे
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सकती।
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मोहनजो-दड़ो म ईंट से न मत 700 कुओं क गणना क गई है। ऐसा लगता है क उनका नय मत रूप से रख-
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रखाव कया जाता रहा और अनेक शता ब्दय तक उनका उपयोग कया जाता रहा। न हताथ पर चचा क जए।
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इस एक वाक्य म तीन अलग तथ्य ह — 700, रख-रखाव और अनेक शता ब्दयाँ। हर एक का अपना न हताथ है।
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तथ्य उसका न हताथ
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glलगभग 700 कुएँ
एक ही नगर म जल हर घर से थोड़ ी ही दू र ी पर उपल ब्ध था — पूरे नगर के िलए एक कु आँ नही ं। अनेक मोहल्लों और संभवत: अनेक
a घरों के अपने कु एँ थे। इसका अथ है िक जल हर नागिरक की मूल आवश्यकता माना गया, कोई िवशेषािधकार नही ं
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ईंट से न मत गंभीर अिभयांित्रकी। ईंट की परत िकनारों को िगरने से रोकती है और ऊपर का गंद ा जल भीतर िरसने नही ं दे ती —
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अथ त कु एँ िटकाऊपन और स्वच्छता को ध्यान में रखकर बने थे, जल्दबाजी में खोदे नही ं गए
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कोई उ त्तरदायी अवश्gयlथा। कु एँ एक -दो वष में ही भर जाते और गंदे हो जाते है,ं यिद उनकी सफाई न हो। िनयिमत
नय मत रख-रखाव
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रख-रखाव का अथ है नगर पशासन या सुदृ ढ़ सामुद ाियक व्यवस्था, और ऐसे लोग जो जानते थे िक गंद ा जल रोग लाता
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है
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m a s emयह भी अथ है िक भूजल स्तर
स्थाियत्व। यह व्यवस्था पीिढ़ यों के शासकों को पार कर गई, वे जो भी रहे हों। इसका
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अनेक शता ब्दय
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तक उपयोग िवश्वसनीय था — जब तक अंतत: वह िवश्वसनीय नही ं रहा
l a sु eओं के साथ ना लयाँ र खए और चत्र पूरा हो जाता है। स्वच्छ जल 700 कुओं से भीतर आता था; गंदा जल सड़क के नीचे क
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ढक ना लय से बाहर जाता था। यह एक पूरा नगरीय जल-चक्र है — आपू त और नकासी, दोन क योजना एक साथ, तीसरी
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सहस्राब्द सा.सं.पू. के नगर म।
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asक कस्ब म नल का जल और ढक सीवर व्यवस्था पछले सौ वष म ही आई
तुलना करने योग्य बात : भारत केlअने
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है, और कह -कह अब भी दोन aनह ह। मोहनजो-दड़ो म उसक अपनी तकनीक म इसका समतुल्य चार हजार वष
से भी पहले था — और वह स दय तक चलता रहा। सचमुच प्रभावशाली बात रख-रखाव है। एक बार बना दे ना उसे
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तीन सौ वष तक सँभालने से कह आसान है।
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m चचा : कक्षा से पू छए क आपके वद्यालय क पानी क टंक कौन साफ करता है, नल कौन ठ क करता है और a g
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उसका खच कौन उठाता है। फर पू छए क मोहनजो-दड़ो म ये काम कौन करता था। कोई नह जानता — और
इसी लए 700 कुएँ पुरातत्ववेत्ताओं को इतना बेचैन करते ह।
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प्र.8 सामान्यत: यह कहा जाता है क हड़प्पावा सय म नाग रकता का उच्च भाव था। इस कथन के महत्व पर चचा
क जए। क्या आप इससे सहमत ह? वतमान भारत के महानगर के नाग रक के साथ इसक तुलना क जए।
नाग रकता का भाव अथात साझा स्थान और साझा व्यवस्थाओं क चता करना — सड़क, नाली, जल आपू त, पड़ोसी क सु वधा
— केवल अपने घर क नह ।
इस कथन के पक्ष म प्रमाण
अध्याय का प्रमाण यह क्या दखाता है
घर के स्नानागार सड़क के नीचे क सावज नक नाली- हर घर ने अपना िनजी अपिशष्ट साझा व्यवस्था में जोड़ ा और उसके िनयम
प्रणाली से जुड़े स्वीकार िकए
ना लयाँ सड़क के नीचे और ढक हुई अपिशष्ट दृ िष्ट से दू र बहा िदया जाता था — िकसी को सड़ क पर कू ड़ ा डालने
की छू ट नही ं थी
चौड़ी सड़क, चार दशाओं क ओर उन्मुख; उनके कनारे िकसी ने सावजिनक सड़ क में अितक्रमण नही ं िकया। िनजी िनम ण ने
बने घर सावजिनक स्थान का स म्मान िकया
छोटे और बड़े घर क एक जैसी नमाण गुणवत्ता सबके िलए एक ही मानक — बी.बी. लाल का “आपसी सामंजस्य”, शोषण नही ं
लगभग 700 कुएँ और धौलावीरा के छह जलाशय, नय मत साझा संपित्त की दीघ कािलक सामूिहक दे खभाल
रख-रखाव के साथ
न युद्ध के ह थयार, न सेना, न युद्ध का नशान िववाद िहंस ा के िबना सुल झाए जाते थे — नागिरकता के भाव का सबसे व्यापक
रूप
हड़ प्पाई घर सावजिनक नाली से कै से जुड़ता था — एक अनुपस्थ काट
घर
सड़ क — चौड़ ी और खुली रखी गई
स्नानागार चारों िदशाओं की ओर उन्मुख
झरोखा
(ढलान वाला फ़श)
दीवार से िनकास सड़ क के नीचे बहती ढकी नाली
नीचे की भूिम
िनजी अपिशष्ट सावजिनक व्यवस्था में िमलता है — और उस व्यवस्था की सफाई िकसी को करनी पड़ ती है।
हर घर में दोहराया गया यही जोड़ ‘नागिरकता का भाव’ है।
पृष्ठ 94 म व णत और चत्र 6.7 म लोथल पर छाया च त्रत हड़प्पाई व्यवस्था : स्नानागार → नकास → सड़क के नीचे ढक नाली।
क्या म सहमत ँ? हाँ — एक ईमानदार शत के साथ। नाग रकता के भाव के भौ तक प्रमाण बहुत मजबूत ह, और वे ठोस प्रमाण
ह : ना लयाँ झूठ नह बोलत । पर ‘भाव’ शब्द से सावधान रहना चा हए, जो लोग के मन के भीतर क बात सुझाता है। हम वास्तव म
जो दखता है, वह एक व्यवस्था है। खंडहर से यह नह कहा जा सकता क हर हड़प्पावासी प्रसन्नता से अपनी नाली साफ करता था,
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या कोई कठोर प्रा धकारी उससे करवाता था। दोन स्थ तय म नाली स्वच्छ ही मलती।
वतमान भारत के महानगर से तुलना
हड़प्पाई नगर आज का बड़ा भारतीय नगर
जहाँ हम हर सड़क के नीचे ढकी नािलयाँ; सड़कें सड़ कों पर कू ड़ ा और प्ल ािस्टक ; खुल ी और जाम नािलयाँ; फु टपाथ और
पीछे ह खुल ी और साफ सड़ कों पर अितक्रमण
जहाँ हम अमीर-गरीब के घरों की एक जैस ी िनम ण एक ही नगर में अत्यंत असमान आवास
पीछे ह गण
ु वत्ता
जहाँ हम सबसे बड़े नगर में भी संभवत: 30–40 हजार लाखों लोग, और साथ में वाहन, उ द्योग तथा इले क्टॉिनक कचरा — कही ं
आगे ह लोग अिधक किठन समस्या
जहाँ हम अ ात; अिधकारों का कोई अिभले ख नही ं नगरपािलका कानून, िनव िचत िनगम, िशकायत का अिधकार , और स्वच्छ
आगे ह भारत जैसे अिभयान
नष्पक्ष नष्कष : हड़प्पावा सय ने अपने आकार के अनुपात म जतनी अच्छ सावज नक व्यवस्थाएँ बनाईं, उतनी
आज के अ धकांश भारतीय नगर अपने आकार के अनुपात म नह बना पाए — और इससे भी बड़ी बात यह क
उन्ह ने उन्ह स दय तक चलाए रखा। पर उनका काम छोटा था और हमारा कह अ धक ज टल। सीख यह नह क
अतीत बेहतर था; सीख यह है क नगर तभी चलता है जब नजी आदत सावज नक व्यवस्थाओं का सम्मान कर। यह
मोहनजो-दड़ो म सच था और आपक गली म भी सच है।
कक्षा-ग त व ध : वद्यालय के चार ओर एक चक्कर लगाइए और तीन चीज़ ग नए — खुली ना लयाँ, फुटपाथ पर
कूड़ा, और अवरुद्ध या अ तक्र मत पैदल पथ। फर एक अनुच्छेद म ल खए क 4000 सामान्य संवत् म आपके
मुहल्ले क खुदाई करने वाला पुरातत्ववेत्ता आपक नाग रकता के भाव के बारे म क्या नष्कष नकालेगा। यह
अभ्यास सोचने पर ववश कर दे ता है।
अध्याय — एक नज़र म
‘सभ्यता’ केवल ‘बहुत पुराने लोग’ नह है — यह एक जाँच-सूची है। अध्याय सात वशेषताएँ बताता है — शासन और
प्रशासन का कोई रूप, नगरीकरण (नगर योजना, जल प्रबंधन, जल नकास), व भन्न प्रकार के शल्प, आंत रक और बाहरी
व्यापार, लेखन का कोई रूप, कला, स्थापत्य, सा हत्य, श्रु त परंपराओं और सामा जक री त- रवाज से व्यक्त होने वाले
सांस्कृ तक वचार, तथा कृ ष उत्पादकता — जो गाँव ही नह , ब ल्क नगर को भी भोजन उपलब्ध करा सके।
भारत क पहली सभ्यता उत्तर-प श्चम म, दो नद -प्रणा लय के कनारे पनपी। सधु और उसक पाँच मुख्य सहायक
न दयाँ पंजाब और सध के मैदान को स चती थ ; उससे कुछ पूव म सरस्वती नद हमालय क तलहट से ह रयाणा, पंजाब,
राजस्थान और गुजरात के कुछ क्षेत्र से होकर बहती थी। लगभग 3500 सा.सं.पू. से गाँव नगर म बदले और लगभग 2600
सा.सं.पू. म नगर महानगर म। इसे ‘भारत का पहला नगरीकरण’ कहा जाता है।
इस सभ्यता के कई नाम ह और पुस्तक सभी का प्रयोग करती है — सधु, हड़प्पा, सधु-सरस्वती सभ्यता। इसके नवासी
हड़प्पावासी कहलाते ह, क्य क हड़प्पा (आज पा कस्तान का पंजाब) इस सभ्यता का पहला उत्ख नत नगर था — 1920–
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21 म। पुराना नाम ‘ सधु घाट ’ अब अप्रच लत है : मान चत्र ( चत्र 6.3) दखाता है क यह सभ्यता सधु क्षेत्र से बहुत आगे
तक फैली थी।
नगर सु नयो जत थे, और यह योजना जल-व्यवस्था म सबसे स्पष्ट दखती है। बड़े नगर म चौड़ी सड़क चार दशाओं
क ओर उन्मुख थ , चार ओर कलेबंद थी और दो व शष्ट भाग थे — ‘ऊपरी नगर’ (अ भजात वग) और ‘ नचला नगर’
(साधारण लोग); धौलावीरा म तीन क्षेत्र थे। छोटे और बड़े घर के नमाण क गुणवत्ता एक समान थी। स्नानागार सड़क के
नीचे बहने वाली ढक ना लय से जुड़े थे; मोहनजो-दड़ो म लगभग 700 ईंट के कुएँ और महास्नानागार (12 × 7 मीटर) थे;
धौलावीरा म कम से कम छह वशाल जलाशय, जनम सबसे बड़ा 73 मीटर लंबा था।
कृ ष ने नगर को भोजन दया; शल्प और व्यापार ने उन्ह वश्व से जोड़ा। हड़प्पावासी जौ, गे ँ, कुछ मोटे अनाज, बाजरा,
कभी-कभी धान, दलहन और स ब्जयाँ उगाते थे और यूरे शया म कपास उगाने वाले प्रथम थे। म के पात्र म दुग्ध उत्पाद
के साथ-साथ हल्द , अदरक और केले के अवशेष मले ह। उन्ह ने आभूषण, लकड़ी और दै नक उपयोग क वस्तुएँ नयात
क ; उनके कान लयन मनके वतमान ईरान के सूसा म और हाथी दाँत का कंघा ओमान के तट पर मला है। लोथल का 217
× 36 मीटर का बे सन न श्चत ही बंदरगाह था — भारत क प्रथम गहन समुद्र ग त व ध।
मुहर पर लखी ल प आज भी पढ़ नह जा सक है। कुछ ही सट मीटर क हजार स्ट ऐटाइट क मुहर मली ह, जन पर
पशु के चत्र और ऊपर कुछ संकेत ह। ये संकेत एक लेखन प्रणाली के ह, पर वह प्रणाली अभी तक समझी नह जा सक है,
और पशु- चत्र के प्रतीकात्मक अथ भी अज्ञात ह। न श्चत केवल इतना है क ये कसी प्रकार से व्यापार से संबं धत ह।
लगभग 1900 सा.सं.पू. म नगर खाली हो गए — पर कसी ने उन्ह नष्ट नह कया। युद्ध या आक्रमण का कोई नशान
नह मलता, न सेना, न युद्ध के ह थयार। आज दो कारण पर सहम त है — लगभग 2200 सा.सं.पू. से जलवायु प रवतन के
कारण वषा म कमी और शुष्कता, तथा सरस्वती नद के मध्य बे सन का सूख जाना, जससे कालीबंगा और बनावली जैसे
नगर अचानक छोड़ दए गए। लोग ग्रामीण जीवन-शैली क ओर लौट गए — पर हड़प्पा क संस्कृ त और प्रौद्यो गक
अ धकांशत: बची रही और भारतीय सभ्यता के अगले चरण म पहुँच गई।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ अध्याय म कहाँ याद रखने योग्य
सभ्यता मानव समाज का उन्नत चरण — िजसमें शासन, पृष्ठ 86–87 पुस्तक सात वशेषताएँ दे ती है — सूची
नगरीकरण, िशल्प, व्यापार, ले खन, सांस्कृ ितक िवचार के रूप म याद क जए
और कृ िष उत्पादकता हों
धातु वज्ञान पकृ ित से धातु िनष्कषण, उन्हे ं शुद्ध करने और आपस में हा शया, पृष्ठ 86 तांबा + टन = कांस्य, जो तांबे से
िमलाने की तकनीकें तथा धातु और उसके ग ण
ु ों का कठोर है (पृष्ठ 98)
वै ािनक अध्ययन
सधु-सरस्वती भारत की सबसे पाचीन सभ्यता; िसंध ,ु हड़प्पा अथवा िसंध -ु पृष्ठ 88; समय-रेखा नगर का काल लगभग 2600 से
सभ्यता सरस्वती सभ्यता भी कहलाती है चत्र 6.2, पृष्ठ 87 1900 सा.सं.पू.
हड़प्पावासी इस सभ्यता के िनवािसयों का नाम पृष्ठ 88, ध्यान रख हड़प्पा से, जो 1920–21 म पहला
उत्ख नत नगर था
सहायक नद वह नदी जो िकसी बड़ी नदी (या झील) में िमलती है हा शया, पृष्ठ 88 सधु क पाँच मुख्य सहायक न दयाँ
— झेलम, चनाब, रावी, ब्यास,
सतलज
सरस्वती नद वह नदी जो कभी िहमालय की तलहटी से हिरयाणा, पंजाब, बॉक्स, पृष्ठ 90 सबसे पहले ऋग्वेद म उल्लेख; बाद के
राजस्थान और ग ज
ु रात से होकर बहती थी; आज मौसमी ग्रंथ म इसके सूखने का वणन
घ ग्गर-हाकरा
भारत का पहला इस क्षेत्र में गाँवों का नगरों में और िफर महानगरों में पृष्ठ 88 गाँव → नगर लगभग 3500 सा.सं.पू.
नगरीकरण बदलना से; नगर → महानगर लगभग 2600
सा.सं.पू.
कलेबंद आम तौर पर सुर क्षात्मक उ े श्यों से िकसी बस्ती या नगर हा शया, पृष्ठ 91 अ धकांश हड़प्पाई नगर के चार ओर
के चारों ओर बनाई गई एक िवशाल दीवार मलती है
अ भजात वग समाज का उच्च स्तर — शासक, अिधकारी, पशासक हा शया, पृष्ठ 91 संभवत: ये ऊपरी नगर म रहते थे
और पाय: पुर ोिहत
ऊपरी नगर / हड़प्पाई नगर के दो िविशष्ट भाग पृष्ठ 91 धौलावीरा म तीन क्षेत्र थे, दो नह
नचला नगर ( चत्र 6.5)
महास्नानागार मोहनजो-दड़ो का लगभग 12 × 7 मीटर का छोटा िकं तु पृष्ठ 91–93, चत्र इसका उ े श्य आज भी चचा का वषय
िवस्ततृ स्नानागार, िजसकी ईंटों पर पाकृ ितक िबटुम न की 6.6 है — राजसी स्नानागार या धा मक कुंड
जल-रोधक परत है
जलाशय िवशाल पाकृ ितक या कृ ित्रम स्थान, जहाँ जल का भंडारण हा शया, पृष्ठ 95 धौलावीरा : कम से कम छह; सबसे
िकया जाता है बड़ा 73 मीटर लंबा
दलहन फसलों की श्रेणी, िजसमें से म , मटर के दाने और दाले ं हा शया, पृष्ठ 96 जौ, गे ँ, मोटे अनाज और कभी-कभी
सिम्मिलत है ं धान के साथ उगाई जाती थी
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शब्द अथ अध्याय म कहाँ याद रखने योग्य
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मुहर छ से ंटीमीटर की हजारों स्टीऐटाइट वस्तुए ँ, िजन पर पशु पृष्ठ 98–99, चत्र ल प अभी तक पढ़ नह जा सक
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ली गई है
बंदरगाह वह संर चना िजसका उपयोग वस्तुओ ं के आगे पिरवहन के पृष्ठ 98, चत्र 6.12 लोथल का बे सन : 217 मीटर × 36
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िलए नावों को ले ने और भेजने में िकया जाता है मीटर
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