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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 7: भारत क सांस्कृ तक जड़
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
105 – 123 14 32 हन्द
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 6 · सामा जक वज्ञान · समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 7: भारत क सांस्कृ तक जड़
कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ (पाठ्यपुस्तक समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे) के संपूण
एन.सी.ई.आर.ट . समाधान। अध्याय का प्रत्येक प्रश्न हल कया गया है — महत्वपूण प्रश्न, तीन आइए पता लगाएँ बॉक्स, तीन आइए वचार कर
बॉक्स, पृष्ठ 106, 119 और 120 के पाठ्य प्रश्न, आगे बढ़ने से पहले…, प्रश्न, क्रयाकलाप और प रयोजनाएँ के सात प्रश्न, सही या गलत के सात
कथन तथा कक्षा ग त व ध — पृष्ठ 108 क समय-रेखा, पृष्ठ 114 क बुद्ध क पत्थर क कृ त, पृष्ठ 115 का महावीर का चत्र, पृष्ठ 116 क वानर-
राज क कृ त, पृष्ठ 117 का जैन भ त्त चत्र तथा पृष्ठ 118 क एलोरा क गुफाओं का चत्र — सब मु द्रत पृष्ठ पर ध्यानपूवक दे खकर।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (कक्षा 6) 105 – 123
खं ड प्रश्न
14 32
माध्यम
हन्द
महत्वपूण प्रश्न — पृष्ठ 105
अध्याय का आरंभ
महत्वपू ण प्रश्न
प्र.1 वेद क्या ह? इनका संदेश क्या है?
वेद भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ ह — और वस्तुत: वश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ म से एक। 'वेद' शब्द संस्कृत के वद् से आया है
जसका अथ है 'ज्ञान' (इसी मूल से वद्या भी बना है)। वेद चार ह।
चार वेद नाम का अथ
ऋ वेद
ग् ऋच् अथ त स्तुित की ऋचा से — चारों में पाचीनतम, िजसे अध्याय दो बार उद्धृत करता है
यजुवद यजुस ् अथ त यज्ञ का मंत्र -सूत्र से
सामवेद सामन् अथ त गान या स्वर से — यह वेद गाया जाता है
अथववेद अथवन् नामक ऋिष के नाम पर
वेद म हजार ऋचाएँ ह — क वताओं और गीत के रूप म प्राथनाएँ — जनक रचना ऋ षय (क व) और ऋ षकाओं
(कव य त्रयाँ) ने संस्कृत भाषा के एक प्रारं भक रूप म सप्त सधु क्षेत्र म क । ये ल खत रूप म नह थ , इनका मौ खक पाठ
कया जाता था। वशेषज्ञ ने ऋग्वेद क रचना पाँचव से दूसरी सह ाब्द सा.सं.पू. के बीच कए जाने का प्रस्ताव कया है, अथात
100 से 200 पी ढ़य तक ये ग्रंथ केवल स्मृ त म सुर क्षत रहे और “ बना कसी वशेष प रवतन के” आगे संप्रे षत होते रहे।
संदेश — चार वचार जो इसे बाँधे रखते ह।
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वचार अध्याय क्या कहता है
1. अनेक के ऋचाएँ अनेक दे वों — इंद, अि न, व ण, िम , सर वती, उषा — को संबोिधत है,ं िफर भी आ ऋिषयों और ऋिषकाओं ने
ग् रु त्र स् द्य
पीछे एक इ हे ं “अलग नहीं, बि क एक ही माना”: एकं सत् िवपा बहधु ा वदि त, “परम स य एक ही है, िकं तु मनीषी इसे अनेक नाम दे ते
न् ल् न् त्
है।ं ”
2. ऋत — सत्य दृ ष्टाओं के साथ िमलकर दे वों ने मानव जीवन और बह्माड
ं में ऋत, अथ त स य और क्रम, को बनाए रखा। एक ही शब्द
त्
और क्रम दोनों को समेटता है — जगत की व्यवस्था और व्यिक्त की सच्चाई
3. सव प र “कु छ मान्यताएँ िवशेष रूप से महत्वपूण थी ं जो ' स य' से आरंभ हुई,ं जो ईश्वर का दू सरा नाम था”
त्
मूल्य — सत्य
4. लोग के बीच ऋ वेद के अंितम मं ों में इसका सीधा आ ान है — “साथ िमलकर चले ं, साथ िमलकर बोले ं, एक हो हमारा मन, हमारे
ग् त्र
एकता िवचार िमले ं... एक हो हमारा उ े य, एक हो हमारा दय... हमारे िवचार एक हों, अत: सभी सहमत हों।”
श् हृ
ऋग्वेद के दोन सरे इतने महत्वपूण क्य ह: अनेक दे व क प्राथनाओं वाला ग्रंथ यह कहकर भी समाप्त हो सकता
था क “हमारा दे व ही स ा है”। इसके स्थान पर वह मनुष्य से आपस म सहमत होने को कहता है, और अन्यत्र
कहता है क परम सत्य एक ही है, नाम चाहे जो दे दया जाए। इन्ह दो कथन के कारण यह अध्याय भारतीय
संस्कृ त को अनेक शाखाओं और एक तने वाला वृक्ष कह पाता है।
क्या आप जानते ह? वेद को लखा नह गया, अत: प्रत्येक स्वर और अक्षर को अप रव तत रखने के लए पाठ क
वशेष व धयाँ वक सत क गईं। 2008 म यूनेस्को ने इसी सुव्यव स्थत संप्रेषण को “मानवीयता के मौ खक और
अमूत वरासत क अनुपम को ट” के रूप म मान्यता द — यह सम्मान कसी पुस्तक को नह , स्मरण क एक
पद्ध त को मला।
प्र.2 प्रथम सह ाब्द सा.सं.पू. म भारत म कौन-कौन से नए दशन/मत उभरे? इनके मूल सद्धांत क्या ह?
अध्याय म चार का नाम आता है। दो वेद से वक सत हुए; दो ने वेद क प्रभुता को स्वीकार नह कया और अपनी स्वयं क
पद्ध त वक सत क ।
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दशन / उद्भव मूल सद्धांत अध्याय म
मत उ ल्ल खत ग्रंथ
वेदांत वेद ों से , उपिनषदों के माध्यम सब कु छ — मानव जीवन, पकृ ित और बह्मांड — एक ही दै वी उपिनषद् — छांदोग्य,
से त व ब है (कभी-कभी केवल तत्)। पत्येक जीव में िस्थत
त् ह्म कठ और बहृ दारण्यक,
आ मन् अंतत: बह्म का ही स्वरूप है, अत: सब कु छ आपस में
त् िजनकी कथाएँ अध्याय
जुड़ा और पर पर िनभर है। पुनज म और कम स्वीकाय है ं
स् न् में दी गई है ं
योग वेद ों से , “पथम सह ाब्दी िकसी व्यिक्त की चेतना में ब का आ म-बोध पाप्त करने के
ह्म त् इस अध्याय में नािमत
सा.सं.पू. के आरंभ में” उ े श्य से अनेक िविधयाँ िवकिसत की ं — तक नही ं, अभ्यास नही ं
बौ मत
द्ध अ वीकार।
वेद ों की पभुता स् अिव ा और मोह ही मानवीय कष्ट के ोत है,ं और इन्हे ं दू र
द्य जातक कथाएँ — बुद्ध
िस ाथ गौतम, जन्म लुंिबनी
द्ध करने की एक िविध है। अिहंस ा — 'चोट न पहच ु ँ ाना'। के पूव जन्मों की
(वतमान नेपाल) िनष्ठापूण आंतिरक अनुशासन: “युद्ध के मैद ान में हजारों पर कहािनयाँ
िवजय पाने की तुल ना में स्वयं पर िवजय पाना अिधक बड़ी
उपलिब्ध है। ” संघ — िभक्षओु ं और आगे चलकर िभक्षिु णयों का
समुद ाय
जैन मत वेद ों की पभुता अ वीकार;
स् अिहंसा — “सभी सांस ले ने वाले , उपिस्थत, जीिवत, नािमत नही ं; अध्याय में
“इस मत को अिधक पाचीन संवेद नशील जीवों को मारा न जाए, न ही उनके साथ िहंस ा की रोिहनेय की जैन कथा
माना जाता है”। उपदे शक जाए…”। अनेकांतवाद — सत्य के अनेक पक्ष है,ं एक कथन दी गई है
वधमान, जो महावीर कहलाए से पूर ी तरह नही ं कहा जा सकता। अपिरगह — असंगह।
मानवों से ले क र अदृ श्य जीवों तक सबकी पर पर िनभरता स्
चाव क (या “उस समय” पचिलत एक के वलयह भौितक जगत ही सत्य है; अत: मृ यु के प चात जीवन त् श् कोई ग ंथ शेष नही ं
लोकायत) अन्य दशन असंभव है। इसे अिधक लोकिपयता नही ं िमली और समय के
साथ यह िवलुप्त हो गया
अध्याय क अपनी समय-रेखा (पृष्ठ 108) इस पूरे काल को एक ही रेखा पर रखती है —
ब् ध्
पथम सह ा द ी सा.सं.पू. — अ याय की समय-रेखा (प ृ ठ 108) ष्
बुद्ध और महावीर का ज न् म
टूटी रेखाए ँ बताती है ं िक ितिथयाँ अनुमािनत है ं
और पीछे
1500 सा.सं.पू. 1000 सा.सं.पू. 500 सा.सं.पू. 1 सा.सं. 500 सा.सं.
उपिनषद्
वैिदक दशन
पुस्तक क समय-रेखा, पुन: बनाई गई। बाईं ओर का तीर बताता है क कथा 1500 सा.सं.पू. से आरंभ नह होती — ऋग्वेद इससे भी
प्राचीन है, कतना प्राचीन यह अब भी ववाद का वषय है।
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इनम समान क्या है और भन्न क्या। अध्याय सावधानी से कहता है: “यद्य प वै दक, बौद्ध और जैन दशन म महत्वपूण भन्नताएँ
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थ तथा प उनम कुछ समान संकल्पनाएँ भी थ , जैसे — धम, कम, पुनजन्म, दुख और अज्ञानता के अंत क खोज एवं अनेक
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g के लए पदाथ के अ त रक्त
के पीछे क्या है: वे.दcांत के लए ब्रह्म, बौद्ध और जैन व ेषण म ऐसा कोई एक तत्व नह , और चावाक
अन्य महत्वपूण मूल्य।” भेद वेद क प्रभुता पर है — वै दक दशन इसे मानते ह, बौद्ध और जैन मत नह — तथा इस पर क जगत
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कुछ भीaनह
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पुस्तक से आगे: बौद्ध परंपरा बुद्ध के अनुभव को चार आय सत्य (दुख है; उसका कारण है; उसका अंत संभव है;
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अंत तक ले जाने वाला माग है) तथा अष्टां गक माग के रूप म बताती है, जसका लक्ष्य नवाण है। जैन परंपरा म
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g हए।
24 तीथकर माने जाते ह, जनम महावीर चौबीसव थे। ये शब्द इस अध्याय म नह आए, कतु ये उन परंपराओं के
अपने शब्द ह और इन्ह ठ क-ठ क जाननाaचा
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लोक और जनजातीय परंपराओं का भारतीय संस्कृ त म क्या योगदान रहा है?
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प्र.3
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a उत्तर
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इनका योगदान यह है क ये वृक्ष क जड़ म से एक ह — उस पर लगी सजावट नह । अध्याय प रणाम के लए एक ही शब्द दे ता
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है: “आपसी समृ द्ध” — “इनके बीच दोन ओर से अबा धत आदान-प्रदान चलता रहा है।”
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अध्याय का g l ase
योगदान
a प्रमाण
परंपरा के अनुसार पुरी (ओिडशा) के भगवान जग ाथ मूल प से जनजाित दे वता थे। दे वी माताओं के िजन
िविभ पों की पूजा भारत भर में होती है, उनके िलए भी यही बात कही जा सकती है.com
ऐसे दे वता जो पूरे दे श के न्न रू
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हो गए न्न रू
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संस्कृ त o
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कmजीवंत मौ खक व ध
को भारत की सम ृद्ध मौिखक परंपराएँ — वे उपदे श और पथाएँ जो िलिखत शास्त्रों के िबना िनत्य अभ्यास से आगे
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बढ़ ी ं। लोक परंपराएँ आम लोगों ारा और जनजातीय परंपराएँ जनजाितयों ारा पसािरत होती है ं
महाकाव्य के अपने रूप कु छ जनजाितयों ने बहुत पहले िहंदू दे वों को अपना िलया और महाभारत तथा रामायण के उनके अपने प है ं —
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यह पूव र के रा यों से ले कर तिमलनाडु तक िलखा गया है
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प्रकृ त के प्र त आदर
s e m पिव माने गए, “क्योंिक इन सबमें चेतना है”। तिमलनाडु के
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पवत, निदयाँ, पेड़, पौधे , जंत ु और कु छ पत्थर तक त्र
agहैlं िक टोडा लोग अंगलु ी से इनकी ओर संकेत भी नहीं करते
टोडा जनजाित के अनुस ार इस पवत के 30 से अिधक िशखर दे वी-दे वताओं के िनवास स्थान है;ं ये
इतने पिवत्र
अ णाचल पदे श की अनेक जनजाितयों के डोनीपोलो, जो सूय और चंदमा के िमलेo-जुmले प है;ं म य भारत के
े यह.संcपूण िव व बनाया”
परमात्मा क संकल्पना रु रू ध्
खंडोबा; पूव भारत में मुंडा और संथाल जनजाितयों के िसंगबोंगा, “िज होंनm
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न् श्
m , दं तकथाएँ,
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संcक
e री तयाँ और कला
“दे वताओं, संक ल्पनाओं, दंतकथाओं और रीितयों का आपस में agदोनोंl ही िदशाओं में आदान-पदान होता रहा है” —
g l as और “हजारों वष ं से जनजातीय िवश्वास, पथाओं तथा कलाओं का िहंदू दशन के साथ मेल-जोल होता रहा है”
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भारतीय समाजशास्त्री आंद्रे बेते इस दोतरफा आदान-प्रदान को ठ क-ठ क कहते ह —
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“भारतीय उपमहा ीप में रहने वाली हजारों जाितयाँ और जनजाितयाँ इितहास के आरंिभक समय तथा उससे भी
पहले से आपस में एक -दू सरे की धािमक आस्थाओं और पथाओं को पभािवत करती रही है।
ं जनजातीय धम ं पर
हुए िहंदू दशन के पभाव को व्यापक रूप से स्वीकार िकया गया है, िकं त ु यह भी सत्य है िक न के वल इसके िनम ण
के चरण में, बिल्क इसके पूरे िवकास-क्रम में िहंदू दशन जनजातीय आ स्थाओं से पभािवत हुआ है।”
इस कथन का दूसरा भाग ही अ धक महत्वपूण है: पहला भाग लोग सहज ही मान लेते ह — बड़ी परंपरा छोट
को प्रभा वत करती है। अध्याय उस दशा पर बल दे ता है जसे लोग भूल जाते ह। पुरी के जगन्नाथ कोई छोट बात
नह ह; वे भारत के सवा धक पू जत दे वताओं म ह, और परंपरा कहती है क वे एक जनजातीय समुदाय से आए।
यहाँ 'योगदान' का अथ है — तने म गया कुछ, शाखा पर लटका कुछ नह ।
शब्द म सावधानी: 19व शताब्द म जनजा तय का अध्ययन करने वाले मानव वैज्ञा नक ने उन्ह प्राय: 'आ दम'
या 'हीन' बताया। अध्याय दज करता है क “जनजातीय समुदाय तथा उनक समृद्ध एवं ज टल संस्कृ तय के
गहन अध्ययन के बाद इस प्रकार के पक्षपातपूण वचार को अ धकांशत: नकार दया गया है।” कसी समुदाय के
लए ये शब्द कभी न लख।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 106
वेद और वै दक संस्कृ त — (क) वेद क्या ह?
प्र.1 (क) वेद क्या ह ?
प्रश्न को वैसे ही ली जए जैसे पुस्तक यहाँ ले रही है — “वे सखाते क्या ह?” नह , ब ल्क “ये कस प्रकार के ग्रंथ ह?”
वेद ← संस्कृ त िवद् = 'ज्ञान' → िवद्या
संख्या: चार — ऋग्वेद , यजुवद, सामवेद , अथववेद
िवषय-वस्त :ु हजारों ऋचाएँ — किवताओं और गीतों के रूप में पाथनाएँ
रचियता: ऋिष (किव) और ऋिषकाएँ (कवियित्रयाँ)
भाषा: संस्कृ त का एक पारंिभक रूप
स्थान: सप्तिसंध ु क्षेत्र (अध्याय 5)
ऋग्वेद की पस्तािवत ितिथ: पाँच वी ं से दू सरी सह ाब्दी सा.सं.पू.
रूप: मौिखक पाठ — िलिखत नही ं
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वह एक तथ्य जसम लोग भूल करते ह। वेद कोई ऐसी पुस्तक नह थी जसे कसी ने लख डाला हो। ये “गहन प्र शक्षण के
माध्यम से स्मृ तबद्ध कए गए एवं मौ खक रूप से आगे संप्रे षत कए गए”। पाँचव से दूसरी सह ाब्द सा.सं.पू. एक बहुत बड़ी
अव ध है, कतु सबसे कम अनुमान भी 100 से 200 पी ढ़य क शुद्ध स्मृ त दे ता है — “ बना कसी वशेष प रवतन के”।
पुस्तक यहाँ रुककर यह क्य कहती है: हम प्राय: 'प्राचीन ग्रंथ' और 'प्राचीन पांडु ल प' को एक ही मान लेते ह।
यहाँ ये एक नह ह। वेद भारत के प्राचीनतम ग्रंथ ह, फर भी अपने अ धकांश जीवन म उनका कोई भौ तक रूप था
ही नह — केवल प्र श क्षत मानव स्मृ त। यही कारण है क सही या गलत का कथन “वै दक ऋचाओं को ताड़-पत्र
क पांडु ल पय पर लखा गया है” गलत है।
क्या आप जानते ह? संप्रेषण इतना शुद्ध इस लए रह सका क्य क पाठक प्रत्येक ऋचा को सामान्य क्रम के
अ त रक्त कई उलट-फेर वाले क्रम म भी कंठस्थ करते थे, जससे कोई भी चूक तुरंत पकड़ म आ जाती। यूनेस्को ने
2008 म इसी को “मानवीयता के मौ खक और अमूत वरासत क अनुपम को ट” कहकर मान्यता द ।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 109
(ख) वै दक समाज — जन का शासन
आइए पता लगाएँ
प्र.1 क्या आप जानते ह क उस समाज को क्या कहते ह, जहाँ लोग अपने नेता का चयन करते ह? आपके वचार से
लोग को ऐसी स्थ त से कैसे लाभ होता है? य द वे अपने ारा नह चुने गए नेता के अधीन रहते ह तो क्या हो
सकता है? (संकेत – ‘शासन और लोकतंत्र’ वषय म आपने जो पहले पढ़ा है, उस पर वचार क जए) अपने
वचार 100–150 शब्द म ल खए।
ऐसे समाज को लोकतंत्र कहते ह — यूनानी डेमोस (जनता) और क्रेटोस (शासन) से: जनता का शासन। भारत म हम अपने नेताओं
को चुनाव से चुनते ह, इसी लए भारत एक लोकतां त्रक गणराज्य है।
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जब लोग अपने नेता चुनते ह जब लोग अपने नेता नह चुनते
जवाबदे ही। िजस नेता को िफर चुनाव में जाना है, उसे बीते वष ं का िहसाब दे ना पड़ता िजस शासक को हटाया नहीं जा सकता, उसे िकसी को
है िहसाब नहीं दे ना पड़ ता
शांितपूण पिरवतन। सरकार वोट िगनकर बदली जा सकती है, लड़कर नही ं शासक बदलने के िलए िवदोह के अितिर त कोई माग
क्
नहीं बचता
सबकी सम याएँ सुनी जाती है।ं हर वोट का मूल्य समान है, इसिलए नेता सबसे छोटे
स् िनणय पाय: उ हीं के प में होते है ं जो शासक के िनकट
न् क्ष
गाँव की भी उपेक्षा नही ं कर सकता है ं
असहमित की वतं ता। आलोचना वैध है, इसिलए भूलें जल्दी पकड़ में आती है ं
स् त्र आलोचना जोिखम भरी हो जाती है, भूलें िछपती और
बढ़ ती है ं
नागिरकों में उ रदािय व। जब नेता आपने चुना है तो पिरणाम में आपका भी भाग है
त्त त् लोगों को लगता है िक शासन उन पर हो रहा है, उनका
नहीं है
इस अध्याय से जोड़। वेद हम जन के शासन के वषय म केवल कुछ संकेत दे ते ह — राजा (राजा या शासक), तथा सभा और
स म त, जो दोन सामू हकता को इं गत करते ह। जस समाज के पास सभाओं के लए शब्द ह, वहाँ मल-बैठकर नणय लेने क
कोई परंपरा अवश्य रही होगी। कतु पुस्तक ईमानदार है: “इसके बारे म बहुत अ धक ज्ञात नह है क ये जन अपने समाज का
शासन कैसे चलाते थे।” अत: यह नह कहना चा हए क वै दक समाज लोकतंत्र था — केवल इतना क सामू हक वचार- वमश क
शब्दावली भारत म बहुत पुरानी है।
नमूना उत्तर (लगभग 130 शब्द):
“ जस समाज म लोग अपने नेता स्वयं चुनते ह, उसे लोकतंत्र कहते ह। भारत वश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और
हम चुनाव के माध्यम से अपने प्र त न ध चुनते ह। इससे कई लाभ होते ह। नेताओं को अपने नणय का कारण
बताना पड़ता है, क्य क उन्ह फर मतदाताओं के सामने जाना है। जो सरकार काम न कर रही हो, उसे लड़ाई से नह ,
मतदान से बदला जा सकता है। हर वोट बराबर होने के कारण सड़क, वद्यालय, पानी और रोजगार जैसी आम लोग
क चताओं क उपेक्षा नह क जा सकती। असहम त क स्वतंत्रता होने से भूल बताई और सुधारी जाती ह।
य द लोग अपने ारा न चुने गए नेता के अधीन रह तो अन्यायी शासक को हटाने का कोई उपाय नह रहता। नणय
केवल एक छोटे समूह के हत म हो सकते ह, आलोचना क ठन हो सकती है, और लोग म यह भाव समाप्त हो जाता
है क दे श उनका अपना है।”
वेद के अध्याय म यह प्रश्न क्य : आपक सामा जक वज्ञान क पुस्तक का एक सूत्र यह है क वचार का भी
इ तहास होता है। सभा और स म त जैसे शब्द तीन हजार वष से अ धक पुराने ह, और आज भी दल्ली म राज्य
सभा तथा लोक सभा उसी 'सभा' शब्द को धारण कए हुए ह। मल-बैठकर नणय लेने क प्रथा इस उपमहा प
क सबसे पुरानी नरंतर आदत म से एक है।
आइए वचार कर — पृष्ठ 110
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(ग) वै दक दशन — उप नषद क कथाएँ
आइए वचार कर
प्र.1 क्या आपने इस महत्वपूण संदेश को प्रदान करने वाली कोई अन्य कहानी सुनी या पढ़ है? उनसे आपको कन
मूल्य क शक्षा मली?
यह उत्तर आपको स्वयं दे ना है — कतु अच्छे उत्तर के तीन भाग होते ह: कहानी का नाम और वह आपको कहाँ मली; दो-तीन
वाक्य म कहानी; और फर स्पष्ट रूप से वह मूल्य जो उसने सखाया।
पहले दे खए क अध्याय क अपनी तीन कथाएँ क्या करती ह — यही आदश ह:
कथा क्या होता है कौन-सा मूल्य
श्वेतकेतु बारह वष अध्ययन के बाद पुत्र अहंक ारी होकर लौटता है; िपता उ ालक के बह्म िवनमता — और यह िक सूचना
(छांदोग्य संबंध ी पश्नों का उत्तर वह नही ं दे पाता, और िपता उसे बरगद के बीज तथा िम ी के और वा तिवक समझ एक नहीं है ं
स्
उप नषद्) उदाहरण से समझाते है ं
न चकेता क्रोध में यम को दे िदया गया बालक लंबी पतीक्षा करता है, टाले जाने पर भी नही ं दृ ढ़ता और किठन प न पूछते रहने
श्
(कठोप नषद्) टलता और एक ही पश्न पूछता रहता है — शरीर की म ृत्यु के बाद क्या होता है? का साहस
गाग और एक ऋिषका राजदरबार के सबसे बड़े िव ान से पश्न करती है, मना िकए जाने पर साहस, और यह िक ी के प न
स्त्र श्
याज्ञवल्क्य रुकती है — और िफर पुन: पश्न पूछती है का मह व पु ष के प न से कम
त् रु श्
(बृहदारण्यक नहीं
उप नषद्)
ध्यान द जए, इनसे ठ क पहले पुस्तक कहती है: “उप नषद क कई कथाओं से हम प्रश्न पूछने के महत्व का पता चलता है। फर
चाहे ये प्रश्न कसी म हला, पुरुष या बच्चे ने पूछे ह ।” तीन नायक सत्ता से बाहर के ह — दो बालक और एक स्त्री।
नमूना उत्तर 1: “मने पंचतंत्र क वह कथा पढ़ है जसम कबूतर का झुंड बहे लए के जाल म फँस जाता है। अलग-
अलग छटपटाने के बजाय सभी कबूतर एक साथ उड़कर जाल स हत अपने मत्र चूहे के पास पहुँचते ह, जो जाल
कुतरकर उन्ह मुक्त कर दे ता है। इससे मने सीखा क मलकर काम करने वाले उस संकट से भी नकल आते ह
जो अकेले सबको हरा दे ता — और यह भी क मत्रता नभाना व्यथ नह जाता।”
नमूना उत्तर 2: “मेरी दाद ने मुझे वानर-राज क वही कथा सुनाई थी जो इसी अध्याय म है। वानर-राज ने अपने
शरीर का पुल बनाकर अपने समूह को नद पार कराया और स्वयं घायल होकर मर गए। इससे मने सीखा क नेता का
पहला कतव्य अपने लोग के प्र त होता है, अपने प्र त नह । यह दे खकर राजा ने भी अपनी प्रजा के प्र त अपनी
भू मका पर सोचना आरंभ कया — कथा का यही उ े श्य है।”
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कथा को ही शक्षण क व ध क्य बनाया गया: इस अध्याय के वचार — ब्रह्म, आत्मन्, कम, अ हसा — बहुत
अमूत ह, और अमूत वचार क प रभाषा जतनी सरलता से याद होती है उतनी ही सरलता से भूलeभी
s mजाती है। कतु
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gl कथाएँ और रो हनेय
co क्रुद्ध पता या घायल वानर क कथा टक जाती है। इसी लए उप नषद्,aजातक
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नeकथा — तीन तक से नह , कथा से सखाते ह।
अहंकारी बालक,
क जैs
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आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 114
बौद्ध मत — बुद्ध के उपदे श क पत्थर क कृ त
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आइए पता लगाएँ
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उपरोक्त कृ त म बुद्ध को कैसे दशाया गया है, इस पर चचा क जए।
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प्र.1
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a उत्तर
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उत्तर दे ने से पहले पृष्ठ 114 क कृ त को ध्यान से दे खए — मू तकार ने कई संकेत जान-बूझकर गढ़े ह और हर संकेत कुछ कह रहा
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है।
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जो दखाई दे ता है वह क्या कह रहा है
आकार मह व का सूचक है। दृ िष्ट पहले उन्ही ं पर जाती है
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वे बीच म खड़े ह और सबसे लंबे ह पाचीन कला में त्
. coके पीछे यह नहीं है
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यह पभावलय ान-पा त यि त का पचिलत िचह्न है। कृित में eिकसी और
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सर के पीछे सादा गोल प्रभामंडल
omउठा हुआ, हथेली सामने
ज्ञ प् व् क्
. cहाथ g l
उपदे श और अभय की मुदा। वे आशीव द या आदेaश नहीं दे रहे — वे समझा रहे है ं
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दा हना
agl दोन कंध को ढकता, गहरी सलवट यह िभ ु का व
क्ष स्त्र है, राजसी वेश नही ं। राजकु मार होते हुए भी वे उसे त्यागने वाले के रूप में
वाला लंबा चीवर िदखाए गए है ं
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com g l a
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sकाeअिधकार उनके ज्ञान से है, वैभव से नही ं
न मुकुट, न आभूषण, न कोई शस्त्र तुल ना कीिजए — आस-पास खड़े कई ोताओं ने भारी पगिड़याँ और आभूषण पहन रखे है।
ं बुद्ध
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सर पर बँधा हुआ जूड़ा
agl यह उष्णीष है, जो भारतीय मूितकला में महापुरुष का पारंपिरक िचह्न है
m ृ ट हुए थे
coआक
वही 'शांत' भाव िजसे दे खकर युवा िस ाथ रथ से सं यासी की.ओर
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शांत मुख, झुक हुई दृ ष्ट
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द्ध न् ष्
com ोताओं क भीड़, हाथ जोड़े g l a
m.या उठाए हुए
वे समूह
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दोन ओर वे बुद्ध की ओर और एक-दू स रे की ओर मुड़े है।
ं बुद्ध िकसी िसंहासन पर अके ले नही ं —
e के बीच में है ं
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ऊपर वृक्ष, पीछे वे दका और स्तंभ उद्यान या िवहार का पिरवेश — वही साधारण स्थान जहाँ बुद्ध वास्तव में उपदे श दे ते थे
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रंगmका पत्थर और वस्त्र क अत्यंत सजीव, गहरी सलवट उत्तर-प श्चम क गांधार शैली
कृ त स्वयं क्या है। यह लगभग 1800 वष पुरानी पत्थर क कृ त है, अथात लगभग दूसरी–तीसरी शताब्द सा.सं. क — बुद्ध
के काल के छह-सात शताब्द बाद क । हरे e
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क वशेषताएँ मानी जाती ह।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
सबसे रोचक बात यह है क इसम क्या नह है। बुद्ध ने कहा था क अ वद्या और मोह कष्ट के कारण ह, और “युद्ध
के मैदान म हजार पर वजय पाने क तुलना म स्वयं पर वजय पाना अ धक बड़ी उपल ब्ध है।” मू तकार ने ठ क
यही दृश्य बना दया है: बीच म खड़ा व्य क्त वही है जसके पास न मुकुट है, न आभूषण, न शस्त्र — और मुकुट पहने
लोग सुनने वाले ह। रचना स्वयं एक तक है।
कक्षा म चचा कैसे कर: क्रम से तीन प्रश्न पू छए। (1) इसम सबसे महत्वपूण कौन है, और बना बताए आपको कैसे
पता चला? (2) वे अपने हाथ से क्या कर रहे ह? (3) राजकुमार जो पहनता, उसम से क्या-क्या यहाँ नह है? कसी
चत्र म क्या है और क्या जान-बूझकर नह है — यह पढ़ना एक कौशल है जो आगे हर अध्याय म काम आएगा।
प्र.2 क्या आप भारत के कुछ राज्य या कुछ अन्य दे श के नाम बता सकते ह जहाँ आज भी बौद्ध मत एक प्रमुख मत
है। इन स्थान को वश्व के मान चत्र पर अं कत करने का प्रयास क जए।
बौद्ध मत भारत म आरंभ होकर बाहर फैला — “भारत और पूरे ए शया पर उनका गहरा प्रभाव था… यह प्रभाव आज भी अनुभव
कया जा सकता है।” कहाँ-कहाँ, यह दे खए।
भारत म क्य
िसि कम क् जनसंख्या का बड़ा भाग बौद्ध मत का अनुयायी; रुमटेक और
पेम ायाग्ं त्से जैसे िवहार
अ णाचल पदे श
रु पिश्चमी िजले ; तवांग का िवशाल िवहार
ल ाख (के ं दशािसत पदे श) हेिमस, िठकसे , लामायुरु तथा अनेक िवहार
िहमाचल पदे श लाहौल-स्पीित और िकन्नौर; धमशाला ितब्बती समुद ाय का कें द
महारा भारत के िकसी भी राज्य से अिधक बौद्ध जनसंख्या, डॉ. भीमराव
आंबेडकर के नेतत्ृ व में 1956 के धम तं रण के बाद
पि चम बंगाल (दािजिलंग, कािलंपोंग), िमजोरम और ि पुरा (चकमा
श् त्र उल्ले खनीय बौद्ध जनसंख्या
समुदाय), कन टक (बायलाकु पे की ित बती बि तयाँ)
प् ब् स्
क्षेत्र वे दे श जहाँ बौद्ध मत प्रमुख है
द क्षण ए शया ीलंका, भूटान, नेपाल
द क्षण-पूव ए शया म् याँमार, थाईलै ंड, कं बोिडया, लाओस, िवयतनाम, िसंगापुर
पूव और मध्य ए शया चीन, जापान, दि ण कोिरया, मंगोिलया, ित बत े
क्ष ब् क्ष त्र
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
मान चत्र पर सही ढं ग से कैसे अं कत कर। वश्व के रेखा-मान चत्र पर पहले एक रंग से लुं बनी (नेपाल) और बोधगया ( बहार)
अं कत क जए — कथा यह से आरंभ होती है। फर दूसरे रंग से ऊपर दए दे श को भ रए और अंत म दो तीर बनाइए: एक भारत
से द क्षण-पूव क ओर ीलंका और द क्षण-पूव ए शया तक, और दूसरा उत्तर क ओर मध्य ए शया होते हुए पूव म चीन, को रया
और जापान तक। नीचे संकेत-सूची अवश्य बनाइए।
स्वयं जाँ चए: दोन तीर ही इस ग त व ध का मम ह। बौद्ध मत उन्ह माग से फैला जनसे व्यापारी और भक्षु पहले
से आ-जा रहे थे — बंगाल क खाड़ी का समुद्र माग और वह स्थल-माग जो आगे चलकर रेशम माग कहलाया। कोई
भी वचार उन्ह रास्त से यात्रा करता है जनसे सामान जाता है।
कुछ दे श सूची से क्य छू ट जाते ह: चीन जैसे दे श म बौद्ध मत क उप स्थ त बहुत बड़ी है, कतु वहाँ यह अनेक
वश्वास म से एक है, इस लए उसे सदा 'उस दे श का मत' नह गना जाता। मान चत्र बनाते समय ऐसे दे श के लए
“बड़ी बौद्ध जनसंख्या” और ीलंका, म्याँमार, थाईलड, कंबो डया, लाओस, भूटान तथा मंगो लया के लए
“बहुसंख्यक बौद्ध” लखना अ धक सही होगा।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 117
जैन मत — नई दल्ली के जैन मं दर का भ त्त चत्र
आइए पता लगाएँ
प्र.1 उपरोक्त भ त्त चत्र (नई दल्ली के एक जैन मं दर से) का अवलोकन क जए। इसम क्या वशेष दखाई दे रहा है?
इसम क्या संदेश न हत है?
वशेष यह है क पशु क्या कर रहे ह — या य क हए, क्या नह कर रहे। पृष्ठ 117 क कृ त को ध्यान से दे खए:
बाईं ओर एक सह, पूरी अयाल के साथ, कमल के आकार के बड़े जल-पात्र म सर डाले हुए है।
दाईं ओर एक गाय ने उसी पात्र म सर डाल रखा है — दोन के सर लगभग छू रहे ह।
सह के नीचे एक शावक शांत खड़ा है; गाय के पास एक बछड़ा दूध पी रहा है।
पीछे वृक्ष, पथरीली पहा ड़याँ और आकाश म पक्षी ह — यह एक साधारण वन है, मं दर का प्रांगण नह ।
कोई भी पशु न दुबका है, न भाग रहा है, न दूसरे को ताक रहा है। चत्र म कह भय नह है।
प्रकृ त म सह और गाय शकारी और शकार ह। सह के इतने पास खड़ा बछड़ा जी वत नह रहता। मू तकार ने पशु-जगत क सबसे
न श्चत हसा को उठाकर बंद कर दया है।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
संदेश कृ त यह कैसे कहती है
1.अिहंसा प येक
त् के वल मनुष्यों तक नही ं। पष्ृ ठ 115 पर महावीर के शब्द: “ सभी सांस ले ने वाले , उपि थत, जीिवत, संवेदनशील जीवों को
स्
जीव तक पहचु ँ ती है मारा न जाए, न ही उनके साथ िहंस ा की जाए, न दुव्यवहार िकया जाए, न ही सताया जाए तथा न ही दू र हटाया जाए”
अिहंसा से िनभयता
2. बछड़ा ही इसका पमाण है। जहाँ िकसी का हािन पहच
ु ँ ाने का भाव नही ं, वहाँ िकसी को डरने की आवश्यकता नही ं —
आती है संदे श िजतना िहंस ा के िवषय में है, उतना ही भय के िवषय में
3.सभी जीव पर पर स् दोनों एक ही पात्र से पी रहे है।ं जैन मत “सभी जीवों, मानवों से ले कर अदृ श्य जीवों तक आपसी संबद्धता और आपसी
िनभर है ं िनभरता पर बल दे ता है”
वैर छोड़ ा जा
4. िसंह को न बाँध ा गया है, न हराया गया है; उसने बस रुकना चुना है। िजन अथ त 'िवजेता' का जैन अथ यही है — िवजय
सकता है अपनी अिवद्या और मोह पर, शत्र ु पर नही ं
5. यह हम पर लागू मंिदर का िभित्तिचत्र वहाँ लगाया जाता है जहाँ लोग उसे पितिदन दे खें। िसंह से यह नही ं कहा जा रहा िक वह गाय बन
होता है जाए — के वल यह िक वह चोट न पहच
ु ँ ाए
यह चत्र आया कहाँ से: जैन परंपरा म समवसरण क कल्पना है — वह वशाल गोलाकार सभा जसम तीथकर
उपदे श दे ते ह और जसम स्वभाव से शत्रु पशु भी शांत होकर साथ बैठकर सुनते ह। एक ही पात्र से पानी पीते सह
और गाय इसी वचार का प्रच लत संक्षेप ह, और भारत भर के जैन मं दर म इसका कोई-न-कोई रूप उकेरा मलता
है। अत: यह केवल एक सुंदर पशु-दृश्य नह — यह पूरे उपदे श का एक चत्र म सार है।
यह क जए: यही वचार इसी पृष्ठ के अगले बॉक्स म लौटता है। य द अ हसा का अथ वचार क हसा से भी बचना
है, तो सो चए क आपक कक्षा म वह सह और गाय कौन ह — वह व्य क्त जसके साथ आप नश्चय कर चुके ह क
नभ नह सकती। यह भ त्त चत्र कहता है क वह जोड़ी भी एक ही पात्र से पानी पी सकती है।
आइए वचार कर — पृष्ठ 117
जैन मत — अ हसा का वास्त वक अथ
आइए वचार कर
प्र.1 बौद्ध मत और जैन मत दोन म ही अ हसा का अथ व्य क्त या जीव के प्र त शारी रक हसा न करने से भी कह
अ धक है। इसम वचार क हसा से भी संयम रखने के लए कहा गया है, जैसे क कसी के बारे म बुरी भावना
नह रखना। य द हम अपने आप को ध्यान से दे ख तो हम ऐसे नकारात्मक वचार स्वयं म अनुभव होते ह और हम
इन्ह सकारात्मक वचार म बदलना सीखना चा हए। कभी-कभार ये नकारात्मक वचार स्वयं हमारी ओर भी
नद शत होते ह।
शब्द से आरंभ क जए। पृष्ठ 113 पर पुस्तक बता चुक है क अ हसा का “मूल अथ है — चोट नह पहुँचाना या नुकसान नह
पहुँचाना”। यही अंतर इस पूरे बॉक्स का आधार है। ' हसा' सुनकर हम प्रहार याद आता है; 'चोट पहुँचाना' म वह सब आ जाता है
जससे कसी पर नशान पड़े — और वचार भी नशान छोड़ता है।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
स्तर यह कैसा दखता है कसे पता चलता है
कम क हसा मारना, धक्का दे ना, िकसी जीव को कष्ट दे ना, दू स रे की वस्तु िबगाड़ना सबको
वाणी क िचढ़ ाना, नाम िबगाड़ना, अफवाह फै लाना, कठोर मजाक, जान-बूझकर िजस पर पड़ ती है, उसे
हसा िकसी को अलग कर दे ना
वचार क बुर ी भावना, ितरस्कार, िकसी के असफल होने की कामना, वैर पाल ले ना, के वल आपको — इसीिलए बॉ स कहता है
क्
हसा पहले से ही िकसी पूरे समूह को बुर ा मान ले ना “अपने आप को यान से दे ख”
ध् ें
स्वयं के प्र त “मैं िकसी काम का नही ं”, “मुझसे तो सब िबगड़ जाता है”, अपनी भूल के पाय: िकसी को नहीं
हसा िलए स्वयं को क्षमा न करना
वचार को जड़ क्य माना गया। जसके प्र त मन म अच्छा भाव है, उसे कोई नह मारता। पहले बुरी भावना आती है, फर वाणी,
फर कम। य द अ हसा केवल हाथ का नयम हो, तो वह अं तम क्षण म लागू होगी, जब क्रोध पूरे वेग पर है। वचार पर लागू हो तो
वह तब काम करती है जब बात अभी छोट है।
बॉक्स के अनुसार अभ्यास के तीन क्र मक चरण:
1. दे खए। ल ड़ए नह , नका रए नह — दे खए। “य द हम अपने आप को ध्यान से दे ख तो हम ऐसे नकारात्मक वचार स्वयं म
अनुभव होते ह।” अ धकांश समय ये बना दे खे ही नकल जाते ह।
2. बद लए। बॉक्स दबाने को नह कहता, “इन्ह सकारात्मक वचार म बदलना सीखना चा हए” कहता है। “वह तो बस
दखावा करता है” के स्थान पर “वह जल्द उत्तर दे ता है, यह मुझे भी सीखना चा हए”। ऊजा वही है, दशा बदल जाती है।
3. स्वयं को भी स म लत क जए। “कभी-कभार ये नकारात्मक वचार स्वयं हमारी ओर भी नद शत होते ह।” सबके प्र त
कोमल होना सरल है, क ठन है उस एक व्य क्त के प्र त जससे बचकर कह जाया नह जा सकता।
इसी बात का बौद्ध पक्ष: “युद्ध के मैदान म हजार व्य क्तय पर हजार बार वजय पाने क तुलना म स्वयं पर
वजय पाना अ धक बड़ी उपल ब्ध है।” यह कथन पृष्ठ 113 पर है और यह बॉक्स उसी का व्यावहा रक अथ है। बुद्ध
जस युद्धभू म क बात कर रहे ह, वह बाहर नह है।
एक सप्ताह यह क जए: एक पृष्ठ पर दो स्तंभ बनाइए। बाएँ म — वह नकारात्मक वचार जो आपने स्वयं म
पकड़ा। दाएँ म — वही स्थ त, बुरी भावना के बना लखी हुई। कसी का नाम मत ल खए। सप्ताह के अंत म ग नए
क कतनी पं क्तयाँ दूसर के बारे म ह और कतनी स्वयं के बारे म। अ धकांश वद्याथ उत्तर दे खकर च क जाते ह।
आइए वचार कर — पृष्ठ 118
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़
a g l AglaSem · NCERT Solutions
'धम' के स्थान पर 'दशन' या 'मत' क्य
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आइए वचार कर
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a s eग्रm
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अं ेजी भाषा म हदू, बौद्ध, जैन और सख मत को ‘धम’ का नाम दया जाता है। हमने इन शब्द का प्रयोग नह
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प्र.1
कया है, यहाँ इन्ह ‘दशन’ या ‘मत’ और (इस अध्याय म आगे) ‘ वश्वास’ कहा गया है। इसका कारण यह है क इन
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मत और दशन के अनेक आयाम ह, जनका हम आगे अध्ययन करगे, जैसे क उनका दाश नक पक्ष,
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आध्या त्मक पक्ष, नै तक पक्ष, सामा जक पक्ष, धा मक पक्ष इत्या द। अनेक व ान मानते ह क अंग्रेजी का शब्द
mमत है।
‘ र लजन’ भारतीय सभ्यता के संदभ म बहुतeसी
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पुस्तक यहाँ शब्दावली क बात कर रही है, आस्था क नह । उसका कहना सीधा है: अंग्रेजी का शब्द ' र लजन' इन परंपराओं के
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लए बहुत छोटा डब्बा है।
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पक्ष इसम क्या आता है इसी अध्याय से उदाहरण
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a दाश नक क्या है और हम कै से जानते है ं — इसकी गाग का या व य से िव व और ब के व प पर प न; अनेकातं वाद, िक
ज्ञ ल्क् श् ह्म स् रू श्
स य के अनेक प है ं
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तक पूण खोज त् क्ष
m . योग, िजसने “चेतना में ब का आ म-बोध पा त करने के उ े य से अनेक
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आध्या त्मक आंतिरक अनुभव और उस तक ले जाने ह्म त् प् श्
िविधयाँ िवकिसत कीं”
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वाली िविधयाँ
य ; अि न दे व को दै िनक आहुित; वैिदक ऋचाओं के दे व
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धा मक दे वता, पाथना, अनुष्ठान, पूजा ज्ञ ग्
. coऔर स यक िवचार
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नै तक आचरण कै सा हो अिहंसा, अपिरगह; रोिहनेय की कथा में स यक कम
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म् म्
. co l ; वे गुफाएँ िजनमें रहने वाले िभ ओु ं के
िभ ओु ं और िभ िु णयों का संघa; gिवहार
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सामा जक समुद ाय कै से संग िठत होते है ं क्ष क्ष क्ष
नाम तक िमले है ं
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दो बात, जो ' र लजन' के संक ण अथ म नह समात ।
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coदेmव ही नह । चावाक या लोकायत मानता था क भौ तक जगत ही g l a
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1. ऐसा दशन भी इसी कथा का भाग है जसम कोई
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g माने जाते थे।
एकमात्र सत्य है और मृत्यु के बाद जीवन नह । अध्याय उसक चचा उसी अनुच्छेद म करता है, क्य क भारत म ये सब
वचारशील व्य क्त के लए संभवaपक्ष
2. लोग ने चुना। “यहाँ बौ द्धक या आध्या त्मक वश्वास प्रथाओं म व्यापक व वधता थी और लोग अपने अनुसार इन्ह चुनने के
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लए स्वतंत्र थे।”
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m क्या ढूँ ढ़गे। य द आप इन परंपराओं म केवल ' र लजन' खोजने जाएँगे तो एक दे व, एक ग्रंथ और एक पूजा-स्थल
शब्द के चयन पर पूरा बॉक्स क्य : हर शब्द एक आकार लेकर आता है, और वही आकार तय करता है क आप
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l a se
ag
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ढूँ ढ़गे — और योग क व धयाँ, वेदांत के तक तथा चावाक क आप त्तयाँ छू ट जाएँगी। 'दशन' या 'मत' जैसा
व्यापक शब्द पाँच पक्ष को एक साथ दृ ष्ट म रखता है। यह वही सीख है जो अध्याय 6 ने ' सधु घाट सभ्यता' के
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उदाहरण से द थी: प र चत नाम चुपचाप क्या मान लेता है, यह जाँ चए।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
सावधानी: बॉक्स यह नह कहता क ये परंपराएँ धम नह ह, और न ही कसी को ऊँचा-नीचा बताता है। वह इतना
कहता है क अंग्रेजी शब्द इनके केवल एक भाग को ढकता है। ध्यान द जए क इसम सख मत का भी नाम है,
जसक चचा इस अध्याय म और कह नह — अथात बात भारतीय परंपराओं के लए सामान्य रूप से कही गई है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 119
लोक और जनजातीय जड़ — जनजा त क्या है?
प्र.1 जनजा त क्या है?
कोई एक प रभाषा नह है — अध्याय पहली ही पं क्त म कहता है: “इस सामा जक इकाई क अनेक प रभाषाएँ द गई
ह।” इसके बाद वह वह प रभाषा दे ता है जो आज मानव वैज्ञा नक प्राय: मानते ह। जनजा त प रवार या वंश का ऐसा समूह है
जसम पाँच बात एक साथ ह :
क्र. लक्षण अथ
1 सामा य उ पि
न् त् त्त सदस्य स्वयं को एक ही पूवज का वंशज मानते ह
2 साझा सं कृित
स् अपने त्योहार, वेशभूषा, कला, गीत, री तयाँ और वश्वास
3 साझा भाषा प्राय: ऐसी भाषा जो केवल वही समुदाय बोलता है
4 मुिखया के अधीन िनकट समुदाय लोग एक-दूसरे को जानते ह; ववाद कसी दूर क सरकार नह , मु खया सुलझाता है
5 िनजी संपि नहीं त्त भू म और साधन व्य क्त के नह , समुदाय के होते ह
प्राचीन भारत म इसके लए कोई शब्द ही नह था। बॉक्स का यही वाक्य सबसे रोचक है: “जनजा तयाँ केवल अलग-अलग जन
थ जो एक वशेष प रवेश म रहती थ , जैसे क वन या पहाड़।” वही 'जन' शब्द जो ऋग्वेद भरत और कुरुओं के लए प्रयोग करता
है। इनके लए कोई अलग को ट नह थी, इस लए 'हम' और 'वे' क कोई रेखा भी नह थी। भारत के सं वधान म अंग्रेजी म ' ाइब'
और ' ाइबल कम्यु नट ' तथा हद म जनजा त शब्द का उपयोग कया गया है — और जन वही पुराना शब्द है।
आिधकािरक आँक ड़ े, 2011:
705 जनजाितयाँ, भारत के अिधकांश राज्यों में
जनसंख्या लगभग 104 िमिलयन
— यह ऑ स्टे िलया और यून ाइटे ड िकं गडम की कु ल जनसंख्या से अिधक है
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
प रभाषा को सावधानी से बरतना क्य आवश्यक है: पाँचवाँ लक्षण — नजी संप त्त का न होना — ऐ तहा सक
रूप से अनेक समुदाय पर लागू होता है, आज सब पर नह ; और बॉक्स स्वयं यह मानकर आरंभ होता है क
प रभाषाएँ अनेक ह। भारत के जनजातीय समुदाय अंडमान के अत्यंत छोटे समूह से लेकर ग ड, भील और संथाल
जैसे करोड़ क संख्या वाले समुदाय तक फैले ह। प रभाषा अध्ययन का आरंभ- बदु है, कोई ऐसी परीक्षा नह जसे
कसी जी वत समुदाय को पास करना हो।
अध्याय जो सुधार कराता है: “19व शताब्द म जनजा तय का अध्ययन करने वाले मानव वैज्ञा नक ने उन्ह प्राय:
सभ्य मानव क तुलना म 'आ दम' या 'हीन' बताया। जनजातीय समुदाय तथा उनक समृद्ध एवं ज टल
संस्कृ तय के गहन अध्ययन के बाद इस प्रकार के पक्षपातपूण वचार को अ धकांशत: नकार दया गया है।” ये
दोन शब्द ववरण नह थे — ये नणय थे, और गलत थे।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 120
लोक और जनजातीय जड़ — परंपराओं का आदान-प्रदान
प्र.1 इस प्रकार के परस्पर संपक इतने लंबे समय से तथा इतनी सहजता से कैसे होते रहे ह?
अध्याय अगले ही वाक्य म उत्तर दे दे ता है: “ऐसा इस लए हो सका क्य क लोक, जनजा तय और हदू वश्वास म अनेक
समान प्रकार क संकल्पनाएँ थ ।” जहाँ दो परंपराएँ पहले से एक जैसा सोचती ह , वहाँ लेन-दे न लेन-दे न जैसा लगता ही नह ।
समान तीन म यह कैसे मलती है
संकल्पना
पकृित पिव है
त्र योंिक इन सबमें चेतना है”। यह कारण लोक,
पवत, निदयाँ, पेड़, पौधे , जंत ु “तथा कु छ पत्थरों को भी पिवत्र माना गया, क्
जनजातीय और िहंदू — तीनों में एक ही है
अनेक दे वता जनजाितयों ारा “उन पाकृ ितक तत्वों से संबंिधत कई दे वताओं की पूजा की जाती है”। नीलिगिर की टोडा जनजाित के
अनुस ार 30 से अिधक िशखर दे वी-दे वताओं के िनवास है ं — इतने पिवत्र िक टोडा लोग अंगलु ी से उनकी ओर संकेत तक
नही ं करते
और उनके ऊपर “दे वताओं में इतनी बहुल ता के पश्चात, िहंदू धम के समान अनेक जनजाितयों में भी उच्चतर दे वत्व या परमात्मा की
एक परमा मात् संक ल्पना है”: अरुणाचल पदे श में डोनीपोलो (सूय और चंदमा का िमला-जुला रूप), मध्य भारत में खंडोबा, मुंडा और
संथाल में िसंगबोंगा, “िजन्होंने यह संपूण िवश्व बनाया”
वास्तव म क्या-क्या दोन ओर गया:
जनजातीय → व्यापक परंपरा: पुरी के जगन्नाथ, जो परंपरा के अनुसार मूल रूप से जनजा त दे वता थे; तथा भारत भर म
पूजी जाने वाली दे वी माताओं के व भन्न रूप।
व्यापक परंपरा → जनजातीय: कुछ जनजा तय म “ हदू दे व को काफ समय पहले ही अपना लया गया था और महाभारत
तथा रामायण के उनके अपने रूप ह” — पूव त्तर के राज्य से लेकर त मलनाडु तक।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
नरंतर, दोन ओर: “दे वताओं, संकल्पनाओं, दं तकथाओं और री तय का आपस म दोन ही दशाओं म आदान-प्रदान होता
रहा है।”
और यह सहजता से — अथात बना कसी के आयोजन के — इस लए हुआ क्य क यह तय करने वाली कोई सत्ता नह थी क
कौन-सा दे वता कसका है, कुछ अपनाने से पहले कुछ छोड़ना अ नवाय नह था, और आरंभ म कोई सीमा-रेखा ख ची ही नह गई
थी — प्राचीन भारत म तो 'जनजा त' के लए कोई अलग शब्द तक नह था। लोग बस साथ-साथ रहे और आदान-प्रदान अपने आप
चलता रहा।
प रणाम, अध्याय के अपने शब्द म — समृ द्ध: “स्पष्ट रूप से, इस लंबे समय के परस्पर संपक का प रणाम
आपसी समृ द्ध रही है।” दोन पक्ष जतने से आरंभ हुए थे, उससे अ धक लेकर लौटे । इसी लए लोक और
जनजातीय मान्यताएँ तथा प्रथाएँ “भारत क सांस्कृ तक जड़ म महत्वपूण स्थान रखती ह” — जड़, कोई उधार
नह ।
क्या आप जानते ह? इसी पृष्ठ पर दो चत्र भी ह जन्ह दे खना चा हए — गहरे लाल रंग पर सफेद रेखाओं से बना
एक जनजातीय चत्र, जसक पूरी कनारी छोट -छोट ज्या मतीय आकृ तय क पं क्तय से बनी है; और नील ग र
के एक टोडा व्य क्त का छाया चत्र, जसक सफेद चादर पर लाल-काली कढ़ाई है। जनजातीय कला पर वस्तार से
चचा अध्याय 8 म है।
आगे बढ़ने से पहले... — पृष्ठ 121
अध्याय चार बदुओं म
आगे बढ़ने से पहले . ..
प्र.1 भारत के प्राचीनतम ग्रंथ, वेद ने अनेक दशन को जन्म दया। वेदांत और योग इनम प्रमुख ह।
ग्रंथ से दशन तक क रेखा को दे खए — अध्याय इसे तीन चरण म ख चता है।
वेद — ऋचाओं के चार संगह, स्म ृितबद्ध और मौिखक रूप से पिठत
↓
उपिनषद् — वैिदक संक ल्पनाओं पर आधािरत गंथ , िजनमें नई संक ल्पनाएँ जुड़ी ं: पुन जन्म , कम
↓
दशन — वेद ांत (सब कु छ एक ही दै वी तत्व बह्म है) और योग (चे त ना में बह्म का आत्म-बोध पाप्त करने की
िविधयाँ)
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
वेदांत योग
कद्र य बात या सब कु छ — मानव जीवन, पकृ ित और बह्मांड — एक ही दै वी त व ब है, कभी-
त् ह्म अपनी चेतना में ब का
व्यिक्त की ह्म
लक्ष्य कभी के वल तत् आ म-बोध पाप्त करना
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व शष्ट वाक्य अहम् बह्मािस्म — “ मैं ब हू”ँ ; तत् वम् अिस — “वह ब आप ही है”ं
ह्म त् ह्म कोई वा य नहीं, बि क िविध — योग
क् ल्
िकया जाता है
इससे क्या पत्येक जीव का आ मन् बह्म का ही स्वरूप है, अत: सब कु छ जुड़ा और पर पर
त् स् समझ ले ना पय प्त नही ं; उसे अपने
नकलता है िनभर है — इसी से सव भवन्तु सुिखन:, “सभी जीव सुखी रहे”ं अनुभव में उतारना होता है
“इन सभी दशन से मलकर कुछ आधारभूत वचार बने, जन्ह हम आज ' हदू दशन' कहते ह” — अथात इस अध्याय के अनुसार
हदू दशन कसी एक संस्थापक क शक्षा नह , ब ल्क कई पुरानी धाराओं का मलन है।
संकेत: ब्रह्म (एक दै वी तत्व), ब्रह्मा (दे व) और ब्राह्मण (सामा जक वग) — तीन को अलग र खए। पुस्तक पृष्ठ
109 पर पहले दो के वषय म सावधान करती है; परीक्षा म वद्याथ प्र तवष यह चूकते ह।
प्र.2 बौद्ध और जैन मत वेद के प्रा धकार क्षेत्र से परे गए और उन्ह ने कुछ व शष्ट मूल्य एवं प्रथाओं पर बल दया।
“वेद के प्रा धकार क्षेत्र से परे” — यही भेद का मूल बदु है। दोन ने धम, कम और पुनजन्म स्वीकार कए, कतु दोन म से कसी
ने यह नह माना क कोई बात केवल इस लए सत्य है क्य क वेद ऐसा कहते ह। दोन ने अपने संस्थापक के अनुभव पर अपनी
पद्ध त खड़ी क ।
बौद्ध मत जैन मत
संस्थापक राजकु मार िस ाथ गौतम, जन्म लुंिबनी (वतमान नेपाल) में, लगभग
द्ध राजकु मार वधमान, जन्म वतमान िबहार के वैशाली के
ढाई सह ाब्दी पूव; अध्याय 4 में 560 सा.सं.पू. अनुमािनत वष माना समीप, छठी शता दी सा.सं.पू. के आरंभ में; जैन मत
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गया “अिधक पाचीन माना जाता है”
मोड़ 29 वष की आयु में एक वृद्ध, एक रोगी, एक शव — और एक पसन्न 30 वष की आयु में घर त्यागकर आध्याित्मक ज्ञान की
तथा शांत सं यासी को दे खा। राजसी जीवन, पत्नी और पुत्र त्याग
न् खोज का िनणय
िदए
क्या प्राप्त बोधगया में पीपल के वृ के नीचे कई िदनों की साधना; अनुभव
क्ष संन्यासी जीवन के अनुशासन के 12 वष बाद 'अनंत'
हुआ, कैसे िकया िक अिव ा और मोह कष्ट के ोत है,ं और इन्हे ं दू र करने
द्य ज्ञ ान या सव पिर िववेक पाप्त हआु । महावीर अथ त
की िविध संक िल्पत की। बु अथ त 'जाग ृत' कहलाए
द्ध 'महानायक' कहलाए
बल कन अिहंसा; िन ठापूण आंतिरक अनुशासन — “जल से यि त शु
ष् व् क् द्ध अिहंसा, अनेकातं वाद, अपिरगह; सभी जीवों की
मूल्य पर नहीं हो सकता… वह यि त शु है िजसमें स य और धम िनवास
व् क् द्ध त् पर पर िनभरता
स्
करते है”ं
प्रथा और संघ — िभक्ष ु और आगे चलकर िभक्षिु णयाँ, जो उपदे शों के पालन तपस्वी अनुशासन; िभक्षओ
ु ं और कभी-कभी िभक्षिु णयों
समुदाय और पसार के िलए समिपत थे की उपदे श-यात्राएँ
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़
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दोन म ही भक्षुओं तथा भक्षु णय ने दे श के सुदूर स्थान क यात्राएँ क । कुछ ने नए वहार बनाए, कुछ ने पत्थर क गुफाओं
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म संन्यासी का जीवन बताया। पुराता त्वक खोज म उन वहार के अवशेष मले ह और “उन भक्षुओं के नाम भी मले ह जो यहाँ
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रहे थे और पत्थर के बस्तर पर सोए थे!”
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aमूल जन अथात वजेता — कतु “ कसी क्षेत्र या शत्रुओं पर वजय पाने से नह … अ वद्या और मोह पर वजय पाने
नाम ही बता दे ते ह क दोन परंपराएँ कस प्रकार क वजय चाहती थ : 'बुद्ध' अथात जागृत, और 'जैन' का
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से”। दोन संस्थापक राजप रवार म जन्मे और दोन ने राजाओं क शब्दावली लेकर उसे भीतर क ओर मोड़ दया।
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प्र.3 यद्य प इन मत के सद्धांत और व धयाँ भन्न थे, फर भी इनम कुछ महत्वपूण संकल्पनाएँ समान थ । ये दुख के
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कारण और अज्ञान के नवारण के साधन का पता लगाने का सतत प्रयास करते रहे।
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यही उस वृक्ष का तना है जससे अध्याय आरंभ हुआ था। शाखाएँ अलग, तना एक।
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समान यहाँ इसका अथ
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संकल्पना
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धम
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उिचत आचरण तथा वह व्यवस्था जो संस ार को थामे रखती है — तीनों परंपराएँ यह शब्द अपने-अपने ढं ग से पयोग करती है ं
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कम हमारे कम और कम-फल — उपिनषदों से आया और बौद्ध तथा जैन मत ने भी स्वीकार िकया
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पुनज म
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न् बार-बार जन्म ले ना; जातक कथाएँ स्वयं बुद्ध के पूव जन्मों की कहािनयाँ है ं
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दुख और agकाl अथ ही अिव ा और मोह का िवजेता है;
अिव ा और मोह को कारण बताया; िजन
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ज्ञ पूर ी खोज का यही उ े श्य है। बुद्ध ने द्य द्य
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और योग की िविधयाँ आत्म-बोध के िलए है,ं जो अज्ञान का उलटा है
a समान मू य अिहंसा, िजसे अध्याय भारतीय संस्कृित के केंद में बताता है और जो जैन, बौद्ध तथा वेदांत दशन में “काफी
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ल् सबसे बढ़ कर
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हद तक” साझा है
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और भन्नता कहाँ है — अध्याय इसे छपाता नह :
वेद क प्रभुता — वै दक दशन स्वीकार करते ह, बौद्ध और जैन मत नह ।
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जगत के पीछे क्या है — वेदांत के लए एक दै वी तत्व ब्रह्म; बौद्ध और जैन व ेषण म ऐसा कोई एक तत्व नह ; और
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चावाक के लए पदाथ के अ त रक्त कुछ भी नह ।
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व ध — अनुष्ठान और ज्ञान, आंत रक अनुशासन और ध्यान, अथवा तपस्वी अभ्यास। भन्न माग।
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अ ध्याय का अपना िचत्र : अनेक जड़ ें, एक तना, अनेक शाखाएँ
वेद ातं योग बौद्ध मत जैन मत लोक-जनजातीय
बह्म, आत्मन् आत्म-बोध की िविधयाँ अिहंसा, संघ अनेकातं वाद, अपिरगह पथा, कला, देवता
समान तना
धम · कम · पुनजन्म · समान मूल् य
दुख और अज्ञान के अंत की खोज
वेद मौिखक परंपराएँ लोक और जनजातीय िसंध ु-सरस्वती
और उपिनषद् िनत्य अभ्यास से मान्यताएँ और पथाएँ सभ्यता (अध्याय 6)
जड़ े ं — “िकसी पाचीन वृक्ष के समान इसमें अनेक जड़ े ं और अनेक शाखाएँ है।
ं ”
अध्याय के आरंभ और अंत का चत्र, खोलकर दखाया गया। इसे नीचे से ऊपर प ढ़ए: जड़ एक तने को पोषण दे ती ह, और तने से नकली
शाखाएँ आपस म भन्न रहते हुए भी नीचे सब कुछ साझा करती ह।
संकेत: य द प्रश्न इन दशन क “तुलना” माँगे तो दोन भाग अवश्य द जए — पहले क्या समान है (धम, कम,
पुनजन्म, दुख का अंत, अ हसा), फर कहाँ भेद है (वेद क प्रभुता)। केवल भन्नताएँ या केवल समानताएँ बताने
वाला उत्तर आधा सत्य ही कहता है।
प्र.4 हजार वष से जनजातीय वश्वास, प्रथाओं तथा कलाओं का हदू दशन के साथ मेल-जोल होता रहा है। इनके
बीच दोन ओर से अबा धत आदान-प्रदान चलता रहा है। जनजातीय वश्वास प्रथाएँ आम तौर पर भू म और
उसक वशेषताओं को प वत्र मानती ह, उनम प्राय: दे वत्व क एक उच्च संकल्पना भी होती है।
इस बदु म तीन दावे एक साथ ह। एक-एक करके दे खए।
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दावा अध्याय का प्रमाण
1. हजार वष से, जगन्नाथ परंपरा के अनुसार मूल प से जनजाित दे वता थे, और यही बात दे वी माताओं के अनेक रूपों पर लागू
पुर ी के रू
दोन दशाओं म मेल- होती है; दू स री ओर कु छ जनजाितयों ने बहत महाभारत तथा रामायण है।ं
ु पहले िहंदू दे वों को अपनाया और उनके अपने
जोल आंदे बेते: यह पभाव “इितहास के आरंिभक समय तथा उससे भी पहले से ” दोनों ओर चलता रहा है
2. भू म और उसक पवत, निदयाँ, पेड़, पौधे , जंत ु “तथा कु छ प थर” भी पिव माने गए, योंिक इन सबमें चेतना है। नीलिगिर की टोडा
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वशेषताएँ प वत्र जनजाित के अनुसार 30 से अिधक िशखर दे वी-दे वताओं के िनवास है ं — इतने पिव िक वे उनकी ओर संकेत तक
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नहीं करते
3. और साथ ही अ णाचल पदे श के डोनीपोलो, सूय और चंदमा का िमला-जुला प, िज हे ं “आगे चलकर परमा मा माना गया”; म य
रु रू न् त् ध्
दे वत्व क उच्च भारत में खंडोबा; मुंडा और संथाल के िसंगबोंगा, “िज होंने यह संपूण िव व बनाया”
न् श्
संकल्पना
तीसरा दावा सारांश म क्य है। क्य क यह ठ क उसी भूल को सुधारता है जसक परीक्षा अगला ही अभ्यास लेता है: “जनजातीय
वश्वास परंपराएँ आत्मा और छोटे दे व तक सी मत ह” — गलत। अनेक जनजातीय वश्वास प्रणा लय म स्थानीय दे वताओं क
बहुलता और परमात्मा क संकल्पना, दोन साथ-साथ ह — ठ क वैसे ही जैसे हदू दशन म।
'दोन ओर से अबा धत आदान-प्रदान' कस चत्र को नकारता है: यह उस चत्र को नकारता है जसम कोई बड़ी
परंपरा छोट परंपराओं को नगलती चली जाती है। बेते का वाक्य जान-बूझकर संतु लत है — जनजातीय धम पर
हदू दशन के प्रभाव को “व्यापक रूप से स्वीकार कया गया है, कतु यह भी सत्य है” क हदू दशन जनजातीय
आस्थाओं से प्रभा वत हुआ, “न केवल इसके नमाण के चरण म, ब ल्क इसके पूरे वकास-क्रम म”। यहाँ कोई
केवल लेने वाला नह है।
आगे: “हम अगले अध्याय म इस वषय को और भी वस्तार से बताएँगे।” अध्याय 8 भारत क सांस्कृ तक जड़ क
कथा आगे बढ़ाता है, और इस अध्याय के अंत का वटवृक्ष अध्याय 7 और 8 — दोन क वषयवस्तु का दृष्टांत
बताया गया है।
प्रश्न, क्रयाकलाप और प रयोजनाएँ — पृष्ठ 122
अध्याय के अंत का अभ्यास
प्र.1 य द आप न चकेता होते तो आप यम से कौन-से प्रश्न पूछते? इन्ह 100–150 शब्द म ल खए।
पहले कथा याद क जए (पृष्ठ 111–112)। यज्ञ म अपनी समस्त संप त्त दान कर रहे पता से पुत्र न चकेता बार-बार पूछता है क वे
उसे कस दे वता को अ पत करगे; पता क्रोध म कह दे ते ह, “म तुम्ह यम को अ पत करता ँ।” बालक इसे सचमुच मान लेता है,
यमलोक जाता है, लंबी प्रतीक्षा करता है और मृत्यु के दे वता से मलता है। वह एक ही प्रश्न पूछता है और टलने को तैयार नह
होता: “शरीर क मृत्यु के बाद क्या होता है?” यम पहले उत्तर टालते ह; बालक अड़ा रहता है; और अंतत: प्रसन्न होकर यम बताते ह
क आत्मा सभी जीव म न हत है — “इसका न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु; यह अमर है।”
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इस प्रश्न म अ ा उत्तर क्या है: न चकेता के प्रश्न केवल जज्ञासा नह , आवश्यकता ह। वह वही बात पूछता है जो कोई जी वत
व्य क्त नह बता सकता, और उसी से पूछता है जो बता सकता है। इसी गंभीरता से ल खए — और प्रश्न के रूप म ल खए, भाषण
के रूप म नह ।
प्रश्न का प्रकार उदाहरण
जो शेष रहता है, उसके यिद आत्मा न जन्म ले ती है न मरती है, तो म ृत्यु में समाप्त क्या होता है? क्या आत्मा को छू टा हुआ जीवन स्मरण
वषय म रहता है?
कम और पुनजन्म के वषय क्या हमारे कम हमारे साथ जाते है?ं अगला जन्म कौन तय करता है — आप, या व्यिक्त स्वयं?
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जीने के ढं ग के वषय म यिद म ृत्यु सबको आनी है, तो जीवन िकस पर लगाना चािहए? आप तक पहच
ु ँ ने पर लोग सबसे अिधक िकस बात
का पछतावा करते है?ं
भय के वषय म लोग आपसे इतना क्यों डरते है?ं म ृत्यु के िवषय में लोग कौन-सी बात गलत समझ बैठे है?ं
स्वयं यम के वषय म िजस दे व से सब डरते है,ं वह होना किठन तो नही ं? क्या कभी िकसी को न ले जाने का मन हुआ ?
नमूना उत्तर (लगभग 140 शब्द):
“य द म न चकेता होता तो म थोड़े ही प्रश्न पूछता, पर सीधे पूछता।
पहला — आपने कहा क आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। तो फर शरीर के जलने पर समाप्त क्या होता है? जसे
म प्रेम करता ँ, वह कह अब भी है या केवल एक तत्व शेष है?
दूसरा — क्या आत्मा जन्म-जन्म क स्मृ त साथ ले जाती है? य द नह , तो वह अब भी 'म' कस अथ म है?
तीसरा — क्या हमारे कम सचमुच हमारे साथ जाते ह, और उनका लेखा कौन रखता है — आप, या व्य क्त स्वयं?
चौथा — आप सबसे अंत म मलते ह; बताइए क लोग कस बात का पछतावा सबसे अ धक करते ह। यह म बाद म
नह , अभी जानना चा ँगा।
और अंत म एक प्रश्न केवल आपके लए — जस दे व से सब डरते ह, वह होना भारी नह लगता?”
कथा का अंत ऐसा क्य होता है: न चकेता को उत्तर इस लए मलता है क्य क वह पूछना नह छोड़ता — “यम
ने पहले तो बालक के प्रश्न का उत्तर टालने का प्रयास कया, कतु न चकेता के नरंतर आग्रह करते रहने पर… यम दे व
ने प्रसन्न होकर उन्ह आत्मा के बारे म समझाया।” यही सीख श्वेतकेतु और गाग क कथाओं म भी है: उप नषद् बने-
बनाए उत्तर से अ धक मूल्य अच्छे प्रश्न को दे ते ह।
प्र.2 बौद्ध मत के कुछ कद्र य वचार को समझाइए। इन पर सं क्षप्त टप्पणी ल खए।
इस अध्याय के अनुसार पाँच कद्र य वचार — और प्रत्येक पर एक टप्पणी, क्य क प्रश्न वही माँगता है।
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कद्र य वचार यह क्या कहता है टप्पणी
1.दुख का कारण है, बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे बुद्ध ने “अनुभव रचना पर ध्यान दीिजए: पहले िनदान, िफर उपचार। वे दुख
और कारण दू र िकया िकया िक अिव ा और मोह मानवीय कष्ट के ोत
द्य को दंड या रहस्य नही ं कहते — वे उसे कारण वाली, अत: दू र
जा सकता है है ं और इन दोनों कारणों को दू र करने की िविध की जा सकने वाली वस्तु मानते है ं
संक िल्पत की”
2. अिहंसा सामान्यत: 'िहंस ा न करना', िकं तु मूल अथ ' चोट 'चोट न पहच
ु ँ ाना' कहने से यह िनषेध ों की सूची न रहकर एक
नहीं पहचु ँ ाना या नुकसान नहीं पहचु ँ ाना'; और इसमें पितिदन का सकारात्मक अभ्यास बन जाता है
िवचारों की िहंस ा भी सिम्मिलत है
3. बाहरी अनु ठान से
ष् “जल से व्यिक्त शुद्ध नही ं हो सकता, जबिक कई पिवत्र निदयों के दे श में यह कहना साहस की बात थी। वे
बढ़ कर आंतिरक लोग यहाँ (पिवत्र नदी में) स्नान करते है।
ं परंत ु वह स्नान को मना नही ं करते; वे कहते है ं िक काम स्नान से नही ं
अनुशासन व्यिक्त शुद्ध है िजसमें स य और धम िनवास करते
त् होता
है”ं
4. स् वयं पर िवजय “युद्ध के मैद ान में हजारों व्यिक्तयों पर हजारों बार यह राजाओं और िवजयों के युग में कहा गया — और उस
िवजय पाने की तुल ना में स्वयं पर िवजय पाना व्यिक्त ने कहा जो स्वयं राजकु मार था और वह सब छोड़ आया
अिधक बड़ी उपलिब्ध है” था
5. संघ िभक्षओ
ु ं और आगे चलकर िभक्षिु णयों का समुदाय, िवचार तभी िटकते है ं जब उन्हे ं ले जाने वाला कोई संग िठत
िजसने स्वयं को बुद्ध के उपदे शों के पालन और समूह हो। संघ ही बौद्ध मत को भारत और एिशया तक ले
पसार के िलए समिपत िकया गया, और अध्याय कहता है िक यह पभाव “आज भी अनुभव
िकया जा सकता है”
इनके साथ बौद्ध मत वै दक और जैन दशन के साथ धम, कम और पुनजन्म क संकल्पनाएँ साझा करता है — जातक कथाएँ,
जो बुद्ध के पूव जन्म क कहा नयाँ ह, पुनजन्म पर ही टक ह और “बड़े ही सरल तरीके से बौद्ध आदश को व्यक्त करती ह”, जैसे
वानर-राज क कथा।
पुस्तक से आगे: बौद्ध परंपरा स्वयं ऊपर के पहले वचार को चार आय सत्य के रूप म कहती है — दुख है; दुख
का कारण है; कारण का अंत संभव है; और उस अंत तक ले जाने वाला माग है। वह माग अष्टां गक माग है और
उसका लक्ष्य नवाण, अथात दुख का पूण अंत। यह अध्याय ये शब्द प्रयोग नह करता, कतु ये परंपरा के अपने शब्द
ह और इन्ह ठ क-ठ क कहना अ धक अच्छा है।
परीक्षा म यह उत्तर कैसे लख: वचार का नाम ल खए, जहाँ अध्याय बुद्ध के अपने शब्द दे ता है वहाँ उद्धरण
द जए, फर एक पं क्त क टप्पणी। उद्धरण ही अच्छे उत्तर को साधारण उत्तर से अलग करते ह, और यह अध्याय
एक ही पृष्ठ पर दो उद्धरण दे दे ता है।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़
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बुद्ध के उस उद्धरण पर कक्षा म चचा क जए जो इस प्रकार है — “जल से व्य क्त शुद्ध नह हो सकता, जब क
कई लोग यहाँ (प वत्र नद म) स्नान करते ह” ता क यह सु न त कया जा सके क सबको eइसका
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पूरा कथन पृष्ठ 113 पर है —
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“जल से व्यिक्त शुद्ध नही ं हो सकता, जबिक कई लोग यहाँ (पिवत्र नदी में) स्नान करते है।
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परंत ु वह व्यिक्त शुद्ध है िजसमें सत्य और धम िनवास करते है।
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उपलिब्ध है।”
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“जल से व्य क्त शुद्ध नह हो सकता” स्नान
“जब क कई लोग यहाँ स्नान करते ह”
a वे िकसी िवरली पथा पर नही ं, उस पर उँ गली रख रहे है ं जो सब कर रहे थे — और पूछ रहे है ं िक
इससे िमलता क्या है
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कसौटी भीतर है: स चाई और उिचत आचरण। और 'िनवास
आते है ं नहीं, िदखाए जाते है ं नहीं, बि क वहीं रहतेaहैgं la
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“वह व्य क्त शुद्ध है जसम सत्य और च् ब्
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धम नवास करते ह” ल्
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इस कथन का अथ यह नह है। चचा म दो भ्रम पहले .cही दूर कर देने चा हए। a
यह नह कहता क नद म स्नान करनाla seया मूखता है। यह कहता है क च रत्र क शुद्धता उससे नह आती।
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यह नह कहता क बाहरी प्रथा व्यथ
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नवास करते ह” जोड़ा गया है, काटा नह गया।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
चचा कैसे चलाएँ (लगभग 20 मनट):
1. पूरा उद्धरण दो बार, धीरे-धीरे, पढ़कर सुनाइए।
2. जो ड़य म पहले वाक्य को एक पं क्त म अपने शब्द म लखवाइए। चार-पाँच रूप श्यामपट्ट पर लखकर तुलना
क जए।
3. पू छए: आज ऐसा क्या है जो लोग सही होने के कारण नह , सही दखने के कारण करते ह? — स्वच्छता दवस
पर वेशभूषा ठ क और अगले दन कूड़ा; कसी वषय पर लख दे ना पर करना कुछ नह ; बना भाव के क्षमा माँग
लेना।
4. फर क ठन प्रश्न: क्या बुद्ध अनुष्ठान को व्यथ बता रहे ह? कक्षा को बहस करने द जए और ऊपर वाले सावधान
उत्तर तक ले जाइए।
5. अंत दूसरे वाक्य से क जए। प्रत्येक वद्याथ से क हए क वह चुपचाप, बना कसी को दखाए, अपनी वह एक
बात लखे जस पर वह वजय पाना चाहता है।
दोन वाक्य साथ क्य छपे ह: पहला कहता है क प रवतन भीतर होना चा हए; दूसरा कहता है क यही भीतर
वाला प रवतन क ठनतर है। अकेला पहला वाक्य दूसर पर सरल आक्षेप लग सकता है। दूसरे के साथ पढ़ते ही वह
कहने वाले क ओर मुड़ जाता है — और यही उसका उ े श्य है।
प्र.4 जैन मत के कुछ मुख्य वचार को समझाइए। इन पर सं क्षप्त टप्पणी ल खए।
अध्याय जैन मत के तीन उपदे श गनाता है और एक चौथा वचार जोड़ता है जो इन तीन के नीचे चलता है।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
मुख्य वचार यह क्या कहता है टप्पणी
1. अिहंसा सभी सांस ले ने वाले , उपि थत, जीिवत,
महावीर के अपने शब्द: “ स् पाँचों िक्रयाओं को पिढ़ ए। ये मारने से चलकर दूर
संवेदनशील जीवों को मारा न जाए, न ही उनके साथ िहंसा की हटाने तक जाती है ं — िजस जीव को के वल भगा
जाए, न दु यवहार िकया जाए, न ही सताया जाए तथा न ही दू र
व् िदया गया, उसे भी हािन पहच
ु ँ ी। इसी कारण जैन
हटाया जाए।” बौद्ध मत की भाँित जैन मत में भी यह िवचारों की अिहंस ा अपनी सूक्ष्म ता के िलए जानी जाती है
िहंस ा तक फै ला है
2. अनेकांतवाद 'के वल एक' पक्ष या दृ िष्टकोण नही ं — “सत्य के अनेक प है ं और
क्ष िकसी परंपरा का अपने ही कथनों के िवषय में ऐसा
इसे के वल एक कथन ारा पूर ी तरह समझाया नही ं जा सकता” मानना असाधारण है। यह िवनमता को सत्य के
िसद्धांत में ही बाँध दे ता है, और असहमत व्यिक्त को
सुनना िशष्टाचार नही ं, कतव्य बना दे ता है
3. अपिरगह 'असंग ह' — पािथव वस्तुओ ं से दू र ी और “स्वयं को जीवन में के वल ध्यान दीिजए, यह सीमा है, पूण िनषेध नही ं। मापदंड
अिनवाय व तुओं तक सीिमत रखना”
स् आवश्यकता है, िदखावा नही ं — ऐसी कसौटी िजसे
कोई भी, िकसी भी युग में, अपनी अलमारी पर लगा
सकता है
4.सभी जीवों जैन मत “सभी जीवों, मानवों से ले कर अदृ य जीवों तक आपसी
श् इसी कारण जैन अिहंस ा भावुक ता नही ं, एक ढाँचागत
की पर परस् संबद्धता और आपसी िनभरता पर बल दे ता है, क्योंिक ये सभी एक- बात है: यिद सब कु छ सबसे जुड़ा है तो कोई हािन
िनभरता दू स रे के पूर क है ं और एक-दू स रे के िबना जीिवत नही ं रह सकते” कभी स्थानीय नही ं रहती। अध्याय जोड़ता है िक
वैज्ञ ािनकों ने “इस गहन सत्य की बार-बार पुिष्ट की
है”
और नाम का अथ। 'जैन' या जैन शब्द जन से आया है जसका अथ है ' वजेता' — “इसका अथ कसी क्षेत्र या शत्रुओं पर
वजय पाने से नह है, ब ल्क अ वद्या और मोह पर वजय पाने से है, ता क ज्ञान प्राप्त कया जा सके।” महावीर का अथ ही
'महानायक' है। दोन शब्द योद्धाओं क दु नया से लए गए और भीतर क ओर मोड़ दए गए।
ये वचार “काफ हद तक बौद्ध तथा वेदांत दशन के वचार को साझा करते ह जो क भारतीय संस्कृ त के कद्र म ह” — यह
अध्याय का अपना कथन है, और जड़ के इस अध्याय म जैन मत पर वस्तार से चचा का कारण भी।
पुस्तक से आगे: जैन परंपरा म 24 तीथकर माने जाते ह — 'तीथकर' अथात संसार-सागर पार कराने वाला घाट
बनाने वाला। महावीर चौबीसव थे, इसी लए अध्याय कहता है क जैन मत क जड़ छठ शताब्द सा.सं.पू. से भी
“अ धक प्राचीन मानी जाती ह”। उन्ह एक पुरानी परंपरा का अं तम महान उपदे शक माना जाता है, कसी नए मत का
आ वष्कारक नह ।
इस अध्याय से सबसे उपयोगी वचार: अनेकांतवाद। तीन म यह सबसे दुलभ है और कसी भी बहस म सबसे
काम का। यह यह नह कहता क हर मत बराबर सही है; यह कहता है क कोई एक कथन पूरे सत्य को नह पकड़ता
— इस लए असहमत व्य क्त के साथ बु द्धमानी यह है क पता लगाइए वह कस पक्ष को दे ख रहा है।
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प्र.5 कक्षा म आंद्रे बेते के कथन पर वचार- वमश क जए।
पूरा कथन —
“भारतीय उपमहा ीप में रहने वाली हजारों जाितयाँ और जनजाितयाँ इितहास के आरंिभक समय तथा उससे भी
पहले से आपस में एक -दू सरे की धािमक आस्थाओं और पथाओं को पभािवत करती रही है।
ं जनजातीय धम ं पर
हुए िहंदू दशन के पभाव को व्यापक रूप से स्वीकार िकया गया है, िकं त ु यह भी सत्य है िक न के वल इसके िनम ण
के चरण में, बिल्क इसके पूरे िवकास-क्र म में िहंदू दशन जनजातीय आस्थाओं से पभािवत हआ
ु है।”
इसम चार बात ह।
वाक्यांश वे क्या कह रहे ह
“आपस म एक-दूसरे को” एक ने दू स रे को नही ं — पहले ही वाक्य में वे आवागमन दोनों िदशाओं में रख दे ते है ं
“इ तहास के आरं भक समय तथा उससे यह आदान-पदान िकसी भी अिभले ख से पुर ाना है। ऐसा कोई आरंिभक काल नही ं जब परंपराएँ
भी पहले से” अलग-अलग और 'शुद्ध' रही हों
“स्वीकार कया गया है, कतु यह भी सत्य वे िवनमता से बता रहे है ं िक लोग इस त य का के वल आधा भाग वीकार करते है ं — वही
थ् स्
है” आधा िजसमें बड़ ी परंपरा पभाव डालती है
“न केवल नमाण के चरण म, ब ल्क पूरे चारों में सबसे पबल दावा। यह ले न-दे न बहुत पहले एक बार होकर क नहीं गया; यह िनरंतर
रु
वकास-क्रम म” चलता रहा है
इसी अध्याय के प्रमाण, दोन ओर रखकर:
जनजातीय → व्यापक परंपरा व्यापक परंपरा → जनजातीय
पुर ी के जगन्नाथ परंपरा के अनुसार मूल रूप से जनजाित दे वता कु छ जनजाितयों ने िहंदू दे वों को बहुत पहले अपना िलया
थे
भारत भर में पूजी जाने वाली दे वी माताओं के अनेक रूप जनजाितयों के पास महाभारत और रामायण के अपने प है ं — पूव त्तर से
रू
तिमलनाडु तक
पवत, नदी, वृक्ष और पत्थर की पिवत्रता, जो तीनों पणािलयों में संक ल्पनाओं, दंतकथाओं और रीितयों का दोनों िदशाओं में मुक्त आदान-पदान
समान है
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चचा कैसे चलाएँ: कक्षा को दो समूह म बाँ टए। समूह 'क' अध्याय से वे सब उदाहरण ढूँ ढ़े जो जनजातीय
परंपराओं से प्रभाव दखाते ह; समूह 'ख' वे जो उनक ओर प्रभाव दखाते ह। दस मनट द जए। फर दोन से एक
ही प्रश्न पू छए: क्या तुम्हारी सूची दूसरे समूह क सूची के बना बन सकती थी? उत्तर 'नह ' है — और बेते का कथन
यही है: दोन सू चयाँ एक ही इ तहास के दो सरे ह। अंत अध्याय के अपने शब्द से क जए — आपसी समृ द्ध।
इ तहास के अध्याय म समाजशास्त्री क्य : समाजशास्त्री समाज को उसके वतमान रूप म दे खता है। बेते का
वाक्य कसी दूर के अतीत क बात नह है — “पूरे वकास-क्रम म” म आज भी स म्म लत है। यह ऐसा दावा है जसे
आप अपने नगर के अगले स्थानीय उत्सव म यह पूछकर जाँच सकते ह क यह दे वता या यह री त आई कहाँ से।
प्राय: कोई नह बता पाता — और यही सबसे ईमानदार प्रमाण है।
प्र.6 अपने स्थानीय क्षेत्र म लोक प्रय दे वी-दे वताओं तथा उनसे जुड़े त्योहार क एक सूची बनाइए।
यह सूची आपके अपने क्षेत्र क है — इस लए व ध उत्तर से अ धक महत्वपूण है। इंटरनेट से कोई सामान्य सूची मत उता रए; उ े श्य
आपके क्षेत्र को दज करना है।
सूची कैसे बनाएँ।
1. तीन पी ढ़य से पू छए। दादा-दाद ऐसे दे वता और छोटे स्थानीय पव बताएँगे जो कसी पुस्तक म नह ह।
2. अपने मोहल्ले म घू मए। रास्ते के छोटे -छोटे स्थान स हत हर मं दर और दे वस्थान ल खए। दे वता का नाम ठ क वैसे ही ल खए
जैसे स्थानीय लोग बोलते ह।
3. चार स्तंभ भ रए — दे वता, त्योहार, माह या ऋतु, और लोग वास्तव म करते क्या ह (जुलूस, भोजन, गीत, मेला)।
4. उद्भव पर एक पं क्त जहाँ पता चल सके। कुछ दे वता ग्राम-दे वता या कुल-दे वता ह; कुछ कसी बड़े दे वता के रूप ह; और कुछ
के वषय म, जैसे अध्याय जगन्नाथ के बारे म कहता है, जनजातीय उद्भव क परंपरा है।
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़
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दे वता त्योहार कब क्या कया जाता है
जग ाथ (ओिडशा) om as e
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रथ यात्रा आषाढ़ (जून–जुल ाई)
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पुरी म हजार लोग तीन वशाल रथ ख चते ह
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दुग l(पिasचमe बंगाल, असम,
g आिद)
दुगा पूजा / पंडाल, मट्ट क प्र तमाएँ, संगीत, अं तम दन
aओिडशा
श् आिश्वन (िसतंबर–अक्तूबर)
नवरा त्र वसजन
गणेश (महारा , गोवा, m
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गणेश चतुथ भाद पद (अगस्त–िसतंबर) घर और मोहल्ले म मट्ट क प्र तमा, फर
कन टक)
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वसजन
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खंडोबा (महारा , कन टक)
का मेला
agl मागशीष (नवंबर–िदसंबर)
चंपा षष्ठी, जेजुरी इसी अध्याय म मध्य भारत के परमात्मा के
उदाहरण के रूप म उ ल्ल खत
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मु गन (तिमलनाडु) थैपूसम, पंगुनी पहाड़ी मं दर, कावड़ी जुलूस
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रु थै और पंग नु ी (जनवरी–
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उ त्तरम फरवरी, माच–अपैल )
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डोनीपोलो (अ णाचल पदे श)
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रु सोलुंग, मो पन समुद ाय के अनुस ार िभन्न सूय और चंद्रमा के मले-जुले रूप, अध्याय के
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आद पृष्ठ 120 पर उ ल्ल खत
िसंगबोंगा (झारखंड, ओिडशा,
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सरहुल, करम वसंत और वष ऋतु मुंडा और संथाल जनजा तय के परमात्मा, पृष्ठ
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पि चम बंगाल) 121 पर उ ल्ल खत
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श्
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नमूना उत्तर: “हमारे क्षेत्र (महाराष्ट्र) म सबसे लोक प्रय दे वता गणेश, पंढरपुर के वठोबा और जेजुरी के खंडोबा ह।
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भाद्रपद क गणेश चतुथ हमारे वष का सबसे बड़ा त्योहार है: हर गली म पंडाल लगता है और दस दन बाद वसजन
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होता है। आषाढ़ म वारकरी अभंग गाते हुए पैदल पंढरपुर जाते ह। खंडोबा के लए हमारे गाँव के प रवार मागशीष म
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जेजुरी के मेले म जाते ह और हल्द उड़ाते ह, जससे पूरी पहाड़ी पीली हो जाती है। मेरी दाद कहती ह क हमारी
m .cवी गाँव के पास क एक पहाड़ी क दे वी ह, जनका नाम कसी पुस्तक म aनहg मलता।”
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कुलदे
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यह ग त व ध वास्तव म क्या सखाती है: नमूने क अं तम पं क्त ही सबसे मूल्यवान है। इस अध्याय का पूरा तक
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यही है क भारत क सांस्कृ तक जड़ म वे परंपराएँ भी ह जन्ह आम लोग ने बना लखे आगे बढ़ाया। जस दे वी का
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नाम कसी पुस्तक म नह , वह आपक प रयोजना क कमी नह — वही तो इस अध्याय का वषय है।
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कक्षा क ग त व ध के रूप म अपने क्षेत्र या राज्य के दो या तीन जनजातीय समूह क सूची बनाइए। इनम से कुछ
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प्र.7
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क परंपरा और वश्वास प्रणा लय के बारे म ल खए।
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यह प्रलेखन क प रयोजना है, अत: इसे उसी ढं ग से क जए: पता लगाइए, ठ क-ठ क दज क जए, स्पष्ट रूप से प्रस्तुत
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क जए और ोत बताइए।
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चरण 1 — पहचा नए। अपने राज्य क अनुसू चत जनजा तय क सूची दे खए (राज्य सरकार या जनजातीय कल्याण वभाग क
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वेबसाइट, जला गजे टयर या वद्यालय का पुस्तकालय)। इनम से अपने सबसे नकट रहने वाले दो-तीन समूह चु नए।
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चरण 2 — न त शीषक के a तगत दज क जए, ता क तुलना हो सके:
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शीषक क्या लखना है
नवास िजले , और िकस पकार का पिरवेश — वन, पहाड़, पठार, तट
भाषा समुद ाय की अपनी भाषा और उसका भाषा-पिरवार
कला िचत्रकला, बुनाई, िम ी और धातु का काम, काष्ठ-कला, गोदना; वाद्य यंत्र ; नत्ृ य और वे िकस अवसर पर
होते है ं
वश्वास प्रणाली दे वता और पिवत्र पाकृ ितक स्थल; कोई परमा मा; त्योहार और उनकी ऋतु; अनुष्ठान कौन कराता है
त्
अन्य परंपराओं से आदान- पड़ोिसयों के साथ साझा दे वता या कथाएँ — यही इस अध्याय का िवषय है और तािलका का सबसे रोचक
प्रदान स्तंभ
चरण 3 — आरंभ के लए कुछ सुप्रले खत उदाहरण:
जनजातीय मुख्यत: कहाँ कला वश्वास
समूह
वारली महाराष्ट्र िम ी की दीवारों पर सफे द ज्यािमतीय िववाह और फसल के अवसर पर िचत्र
ृ , ित्रभुज, नत्ृ य करती
िचत्रकला — वत्त बनाए जाते है;ं दे वी पालघाटा कें द में
आकृ ितयों की पंिक्तयाँ
गोंड मध्य प्रदे श, बारीक िबंद ुओ ं और रे खाओं से बनी गोंड बड़ा दे व तथा अन्य दे वता; पिवत्र उपवन
छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, िचत्रकला; काष्ठ और धातु िशल्प और वृक्ष
तेलंगाना
संथाल झारखंड, प श्चम िभित्तिचत्र, बाँस ुर ी तथा तमाक और तुम दाक इसी अध्याय में उिल्लिखत परमात्मा
बंगाल, ओ डशा, ढोल, सामूिहक नत्ृ य िसंगबोंगा; जाहेर नामक पिवत्र उपवन;
बहार वसंत का पव सरहुल
भील राजस्थान, गुजरात, िपथौरा िभित्तिचत्र; रंग ीन िबंद ुओ ं से बनी भील पहाड़ों और खेतों के दे वता; बेणेश्वर का
मध्य प्रदे श िचत्रकला मेल ा
टोडा नील ग र, त मलनाडु सफे द चादर पर िविशष्ट लाल-काली कढ़ ाई; नीलिगिर के 30 से अिधक िशखर दे वी-
अधगोलाकार झोंपिड़याँ दे वताओं के िनवास — इसी अध्याय का
पष्ृ ठ 120
आपातानी, आिद, अरुणाचल प्रदे श बेतं -बाँस का काम, बुनाई, पव-नत्ृ य सूय-चंद दे वता डोनीपोलो — पष्ृ ठ 120
यीशी आिद
न्
जी वत समुदाय के प्रलेखन के तीन नयम — इनका पालन अवश्य क जए:
1. वही नाम ल खए जो समुदाय स्वयं अपने लए प्रयोग करता है, और वैसी ही वतनी।
2. 'आ दम', ' पछड़ा' या 'सीधा-सादा' कभी मत ल खए। अध्याय स्पष्ट कहता है क ऐसे पक्षपातपूण वचार
नकार दए गए ह। जो दे खा, वह ल खए; क्रम मत लगाइए।
3. प्रत्येक तथ्य का ोत बताइए — पुस्तक, वेबसाइट या वह व्य क्त जससे आपने बात क । य द समुदाय के
कसी सदस्य ने बताया हो तो उनक अनुम त लेकर प रयोजना म उनका नाम लेकर धन्यवाद द जए।
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इसे अ े से करना क्य आवश्यक है: जनजातीय कला और वश्वास हजार वष से भारत क सांस्कृ तक जड़ का
भाग ह, और इनका बहुत कुछ कभी लखा ही नह गया। ईमानदारी से क गई एक वद्यालयी प रयोजना भी
वास्त वक प्रलेखन का छोटा-सा अंश है। लापरवाही से क गई प रयोजना ठ क उन्ह रूढ़ धारणाओं को दोहरा दे ती है
जन्ह सुधारने म अध्याय एक पूरा पृष्ठ लगाता है।
सही या गलत — पृष्ठ 122
अध्याय के अंत का अभ्यास
प्र.1 वै दक ऋचाओं को ताड़-पत्र क पांडु ल पय पर लखा गया है।
गलत।
अध्याय स्पष्ट कहता है: ये ऋचाएँ “ ल खत रूप म नह थ , अ पतु इनका मौ खक पाठ कया जाता था”। ये “गहन प्र शक्षण के
माध्यम से स्मृ तबद्ध कए गए एवं मौ खक रूप से बना कसी वशेष प रवतन के आगे संप्रे षत कए गए” — 100 से 200 पी ढ़य
तक।
यह कथन भ्रम म क्य डालता है: ताड़-पत्र क पांडु ल पयाँ भारतीय ग्रंथ-परंपरा का सचमुच महत्वपूण भाग ह —
कतु वे बहुत बाद क ह। वेद के जीवन के अ धकांश काल म कोई पांडु ल प थी ही नह , और यही वह एक तथ्य है
जस पर अध्याय सबसे अ धक बल दे ता है। इसी लए 2008 म यूनेस्को ने कसी पुस्तक को नह , वै दक पाठशैली
को “मानवीयता के मौ खक और अमूत वरासत क अनुपम को ट” कहकर सम्मा नत कया।
प्र.2 वेद भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ ह।
सही।
“ये भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ ह और वस्तुत: वश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ म से एक ह।” वशेषज्ञ ने चार म प्राचीनतम ऋग्वेद क
रचना पाँचव से दूसरी सह ाब्द सा.सं.पू. के बीच कए जाने का प्रस्ताव कया है।
सावधानी: 'सबसे प्राचीन ग्रंथ' और 'सबसे प्राचीन लेखन' एक बात नह । अध्याय 6 क हड़प्पाई मुहर पर बने चह्न
कसी भी उपलब्ध वै दक पांडु ल प से पुराने ह — कतु वह ल प अप ठत है, इस लए उससे हम कोई पाठ नह
मलता। वेद वे प्राचीनतम ग्रंथ ह जन्ह हम वास्तव म पढ़ सकते ह।
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प्र.3 वै दक कथन “एकम् सत् वप्रा बहुधा वद न्त” म ब्रह्मांड क श क्तय क एकता क मान्यता प्रकट होती है।
सही।
अध्याय इसका अनुवाद य दे ता है: “परम सत्य एक ही है, कतु मनीषी इसे अनेक नाम दे ते ह।” यह ऋचा ठ क उस वाक्य के
बाद उद्धत है जो इसे समझाता है: “आद्य ऋ षय और ऋ षकाओं ने दे वताओं और दे वय को अलग नह , ब ल्क एक ही माना।”
व्यवहार म इसका अथ: वै दक ऋचाएँ इंद्र, अ ग्न, वरुण, मत्र, सरस्वती, उषा और अनेक दे व को संबो धत ह —
फर भी परंपरा स्वयं कहती है क ये एक ही सत्य के अनेक नाम ह। ऊपर से अनेक दे व, पीछे एक ही सत्ता। “ब्रह्मांड
क श क्तय क एकता” का यही अथ है।
प्र.4 बौद्ध मत वेद से अ धक पुराना है।
गलत। वेद कह अ धक प्राचीन ह।
ऋग्वेद — पस्तािवत काल: पाँच वी ं से दू सरी सह ाब्दी सा.सं.पू.
िसद्धाथ गौतम का जन्म — “लगभग ढाई सह ाब्दी पूव”; अध्याय 4 में 560 सा.सं.पू. अनुमािनत वष
→ वेद कम से कम एक हजार वष, और संभ वत: तीन हजार वष अिधक पुराने है ं
अध्याय यह संबंध शब्द म भी स्पष्ट करता है: बौद्ध मत उन दशन म से एक था जन्ह ने “वेद क प्रभुता को नह स्वीकार कया”
— अथात बौद्ध मत के उदय के समय वेद पहले से थे और प्रामा णक माने जाते थे।
प्र.5 जैन मत का उद्भव बौद्ध मत क एक शाखा के रूप म हुआ।
गलत।
“जैन मत एक अन्य महत्वपूण दशन है जो उसी समय काफ लोक प्रय हुआ, यद्य प इस मत को अ धक प्राचीन माना जाता है।”
दोन समकालीन ह, एक दूसरे क शाखा नह ।
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बौद्ध मत जैन मत
उपदे शक िसद्धाथ गौतम, जन्म लुंिबनी में वधमान, जन्म वैशाली के समीप
काल लगभग ढाई सह ाब्दी पूव छठी शताब्दी सा.सं.पू. का आरंभ
प्रा प्त बोधगया में पीपल के नीचे ज्ञान; बु कहलाए
द्ध 12 वष की तपस्या के बाद 'अनंत' ज्ञान; महावीर कहलाए
व शष्ट उपदे श अिवद्या और मोह कष्ट के ोत; संघ अिहंस ा के साथ अनेकातं वाद और अपिरगह
भ्रम क्य होता है: दोन एक ही काल म, भारत के एक ही भाग म उभरे, दोन के उपदे शक राजप रवार से थे
जन्ह ने घर त्यागा, दोन ने वेद क प्रभुता अस्वीकार क और दोन अ हसा सखाते ह। समान होना और कसी से
नकला होना — दोन अलग बात ह।
प्र.6 बौद्ध और जैन मत दोन ही शां तपूण सह-अ स्तत्व तथा सभी जीव को नुकसान न पहुँचाने का समथन करते ह।
सही।
दोन अ हसा पर टके ह, और दोन म यह प्रहार न करने से बहुत आगे जाती है।
बौद्ध मत जैन मत
अिहंसा का िवचार िनिहत है, िजसका
बुद्ध के उपदे शों में “ महावीर: “ सभी सांस ले ने वाले , उपि थत, जीिवत, संवेदनशील जीवों को मारा न जाए,
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मूल अथ है — चोट नहीं पहच
ु ँ ाना या नुकसान नहीं न ही उनके साथ िहंस ा की जाए, न दुव्यवहार िकया जाए, न ही सताया जाए तथा न ही
पहचु ँ ाना” दू र हटाया जाए”
“युद्ध के मैद ान में हजारों व्यिक्तयों पर हजारों बार िवजय “सभी जीवों, मानवों से ले क र अदृ श्य जीवों तक आपसी संब ता और आपसी िनभरता”
द्ध
पाने की तुल ना में स्वयं पर िवजय पाना अिधक बड़ी पर बल
उपलिब्ध है”
और दोन म, जैसा पृष्ठ 117 का बॉक्स कहता है, अ हसा का अथ “शारी रक हसा न करने से भी कह अ धक है। इसम वचार
क हसा से भी संयम रखने के लए कहा गया है।”
प्र.7 जनजातीय वश्वास परंपराएँ आत्मा और छोटे दे व तक सी मत ह।
गलत।
“दे वताओं म इतनी बहुलता के प ात, हदू धम के समान अनेक जनजा तय म भी उच्चतर दे वत्व या परमात्मा क
संकल्पना है।” अध्याय उसी पृष्ठ पर तीन उदाहरण दे ता है।
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परमात्मा कनके ारा पू जत अध्याय क्या कहता है
m ase परमात्मा माना गया”
सूय और चंदमा के िमले -जुले रूप, “इन्हे ं आगेlचलकर
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डोनीपोलो
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अरुणाचल प्रदे श क अनेक जनजा तयाँ
खंडlोबाasem मध्य भारत के क्षेत्र
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“मध्य भारत के क्षेत्र में खंडोबा भगवान के संबंध में भी ऐसा ही है”
िसंगबोंगा पूव भारत क मुंडा और संथाल जनजा तयाँ “िजन्हे ं वे परमेश्वर कहते है ं और िज होंने यह संपूण िव व बनाया”
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m प्रणा लय म समृद्ध कला, त्योहार, प वत्र भू-दृश्य तथा महाभारत ag
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“ऐसे अनेक उदाहरण ह,” अध्याय जोड़ता है। जनजातीय वश्वास
और रामायण के अपने रूप भी स म्म लत ह। 'आत्माla
a g और छोटे दे व तक सी मत' कहना ठ क वही 19व शताब्द वाला पक्षपातपूण
नणय है जसे अध्याय के अनुसार अ धकांशत: नकार दया गया है।
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सूची का यह 'गलत' सबसे महत्वपूण क्य है: शेष छह कथन तथ्य जाँचते ह। यह एक दृ ष्टकोण जाँचता है। इसे
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गलत उत्तर दे ने का अथ होगा ठ क वही भूल दोहराना जसे सुधारने म अध्याय एक पूरा पृष्ठ लगाता है।
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कक्षा ग त व ध — पृष्ठ 122
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अध्याय के अंत का अभ्यास
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कक्षा ग त व ध
एक नाटक का मंचन क जए, जसम मृत्यु के दे वता यम से अनेक बच्चे न चकेता के रूप म जीवन के बारे म प्रश्न
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पूछ रहे ह।
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gl वचार सुंदर है: कठोप नषद् म एक बालक पूछता है; नाटक म अनेक ह, जससे पूरी कक्षा भाग ले सकती है और प्रश्न भी अलग-
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अलग हो सकते ह।
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तैयारी कैसे कर।
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अंग सुझाव
यम; पाँच से आठ निचके ता; एक सूत्रधार; चाहे ं तो आरंभ के छोटे दृ श्य के िलए िपता
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पात्र एक
एक ओर यम के िलए एक कु स और बीच में खाली स्थान। और कु छ आवश्यक नही ं m
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मंच
वेcशभूषा
. यम के िलए गहरे रंग का उत्तरीय; शेष सबके िलए साधारण वस्त्र। यम a
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e m को डरावना मत बनाइए — कथा में वे पहले कठोर
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और िफर
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अव ध आठ से दस िमनट। पत्येक निचके ता का एक पश्न, पत्येक पश्न का एक उत्तर
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.coहै,ं ठीक वैसे ही जैसे उपिनषद् में। बच्चों के अड़े रहने पर ही वे उत्तर दे ना आरंभ करे ं। यहagl
टालmसकते
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नाटक का
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यम पहले दो-तीन पश्न
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नयम टालना ही नाटक का पाण है
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
नमूना आरंभ (इसे स्वतंत्रता से बद लए):
सूत्रधार: एक व्य क्त अपना सब कुछ दान कर रहा था। उसका पुत्र न चकेता बार-बार पूछता रहा क पता उसे कसे
दगे।
पता (क्रोध म): म तुम्ह यम को दे ता ँ!
सूत्रधार: और इस प्रकार ब े मृत्यु के दे वता के ार पर पहुँचे, और तीन दन प्रतीक्षा क ।
यम: तुमने बहुत प्रतीक्षा क और कसी ने तुम्ह जल तक नह दया। जो चाहो, माँग लो।
पहला न चकेता: तो बताइए — शरीर क मृत्यु के बाद क्या होता है?
यम: कुछ और माँगो। धन माँगो, द घ आयु माँगो, घोड़े और हाथी माँगो।
दूसरा न चकेता: घोड़े मरते ह। हाथी मरते ह। हम अपना प्रश्न नह छोड़गे।
तीसरा न चकेता: शरीर क मृत्यु के बाद क्या होता है?
यम (क्षण भर रुककर, प्रसन्न होकर): तो सुनो। आत्मा सभी जीव म न हत है। इसका न तो जन्म होता है और न
ही मृत्यु; यह अमर है।
चौथा न चकेता: य द इसका जन्म ही नह होता, तो जसे हम 'म' कहते ह, वह क्या है?
पाँचवाँ न चकेता: और जो वष हम मले ह, उनका कर क्या?
यम: बालक, यही प्रश्न पहले प्रश्न का पूरा उत्तर है।
शेष न चकेताओं के लए प्रश्न — प्रत्येक अ भनेता को एक द जए, और चुनने द जए ता क वह मन से पूछे: क्या हमारे कम म से
कुछ हमारे साथ जाता है? लोग आपसे इतना क्य डरते ह? आप तक पहुँचकर लोग सबसे अ धक कस बात का पछतावा करते ह?
क्या कभी कोई आपको दे खकर प्रसन्न भी हुआ है? कन बात पर समय नह गँवाना चा हए?
यह नाटक सफल कब होगा: यम को डरावने मुखौटे वाला खलनायक बनाने का लोभ छोड़ द जए। उप नषद् म वे
ऐसे गुरु ह जो पहले परीक्षा लेते ह और फर आदर करते ह। नाटक क सारी ऊजा दृढ़ता से आती है — उन ब से
जो कसी सरल वषय पर टाले नह जा सकते। इसी हठ का अभ्यास कराइए, दशक बँधे रहगे।
कक्षा के लए आगे: प्रस्तु त के बाद दशक से क हए क नाटक का वह एक प्रश्न लख जसका उत्तर वे सबसे
अ धक जानना चाहते ह। बना नाम लए प चयाँ इक करके प ढ़ए। आपने अपना छोटा-सा उप नषद् रच लया —
ब ारा पूछे गए प्रश्न का संग्रह, जो मूल उप नषद् भी यही ह।
अध्याय — एक नज़र म
भारतीय संस्कृ त को एक वृक्ष के रूप म दखाया गया है — अनेक जड़, एक तना, अनेक शाखाएँ। अध्याय इसी चत्र
से आरंभ होता है और वटवृक्ष के चत्र पर समाप्त होता है। कुछ जड़ सधु-सरस्वती सभ्यता (अध्याय 6) तक जाती ह। जड़
एक सामान्य तने को पोषण दे ती ह और तने से कला, सा हत्य, वज्ञान, च कत्सा, शासन पद्ध त, युद्ध कलाएँ तथा अनेक दशन
— अथात ऐसे वचारक या आध्या त्मक साधक के समूह जो मानव जीवन और वश्व के बारे म समान वचार रखते ह — रूपी
शाखाएँ नकलती ह।
वेद भारत के प्राचीनतम ग्रंथ ह और इन्ह लखा नह , कंठस्थ कया गया था। 'वेद' शब्द संस्कृत के वद् से आया है
जसका अथ है 'ज्ञान' (जैसे वद्या)। चार वेद ह — ऋग्वेद, यजुवद, सामवेद और अथववेद। इनम हजार ऋचाएँ ह, अथात
क वताओं और गीत के रूप म प्राथनाएँ, जनक रचना ऋ षय और ऋ षकाओं ने संस्कृत भाषा के एक प्रारं भक रूप म
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कक्षा 6 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 भारत क सांस्कृ तक जड़ AglaSem · NCERT Solutions
सप्त सधु क्षेत्र म क । वशेषज्ञ ऋग्वेद क रचना पाँचव से दूसरी सह ाब्द सा.सं.पू. के बीच मानते ह, अथात 100 से 200
पी ढ़य तक ये ग्रंथ केवल स्मृ त म सुर क्षत रहे। 2008 म यूनेस्को ने वै दक पाठशैली को 'मानवीयता के मौ खक और अमूत
वरासत क अनुपम को ट' के रूप म मान्यता द ।
वेद का संदेश एकता से आरंभ होता है। ऋचाएँ अनेक दे व — इंद्र, अ ग्न, वरुण, मत्र, सरस्वती, उषा — को संबो धत ह,
जन्ह ने दृष्टाओं के साथ मलकर मानव जीवन और ब्रह्मांड म ऋत, अथात सत्य और क्रम, को बनाए रखा। फर भी आद्य
ऋ षय और ऋ षकाओं ने इन दे वताओं को अलग नह , ब ल्क एक ही माना — एकं सत् वप्रा बहुधा वद न्त, “परम सत्य
एक ही है, कतु मनीषी इसे अनेक नाम दे ते ह।” 'सत्य' प्राय: ईश्वर का दूसरा नाम था, और ऋग्वेद के अं तम मंत्र म लोग से
साथ मलकर चलने, साथ बोलने और मन तथा हृदय से एक होने का आ ान कया गया है।
उप नषद ने पुनजन्म, कम, ब्रह्म और आत्मन् क संकल्पनाएँ जोड़ । प्रारं भक वै दक समाज जन म संग ठत था —
अकेले ऋग्वेद म 30 से अ धक जन क सूची है — और उनके शासन के वषय म हमारे पास केवल राजा, सभा और स म त
जैसे शब्द के संकेत ह। वै दक संस्कृ त म यज्ञ जैसे अनुष्ठान वक सत हुए जो समय के साथ अ धक ज टल होते गए।
उप नषद ने वै दक संकल्पनाओं के आधार पर पुनजन्म और कम जैसी नई संकल्पनाएँ द । वेदांत के अनुसार सब कुछ एक
ही दै वी तत्व ब्रह्म है — अहम् ब्रह्मा स्म, तत् त्वम् अ स — और प्रत्येक जीव म नवास करने वाला आत्मन् अंतत: ब्रह्म का ही
स्वरूप है। इसी से सव भवन्तु सु खन: क प्राथना नकलती है। योग ने व्य क्त क चेतना म ब्रह्म का आत्म-बोध प्राप्त करने क
व धयाँ वक सत क । इन्ह दशन से मलकर वह बना जसे आज ' हदू दशन' कहा जाता है।
बौद्ध और जैन मत ने वेद क प्रभुता को स्वीकार नह कया। राजकुमार सद्धाथ गौतम का जन्म लगभग ढाई सह ाब्द
पूव लुं बनी (वतमान नेपाल) म हुआ; 29 वष क आयु म उन्ह ने एक वृद्ध, एक रोगी, एक शव तथा एक शांत संन्यासी को
दे खा, राजमहल त्याग दया और बोधगया म पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए अनुभव कया क अ वद्या और मोह ही
मानवीय कष्ट के ोत ह। वे बुद्ध अथात 'जागृत' कहलाए, अ हसा — मूलत: 'चोट नह पहुँचाना' — तथा नष्ठापूण आंत रक
अनुशासन का उपदे श दया और भक्षुओं तथा आगे चलकर भक्षु णय के संघ क स्थापना क । राजकुमार वधमान का जन्म
छठ शताब्द सा.सं.पू. के आरंभ म वैशाली के समीप हुआ; 30 वष क आयु म घर त्यागकर 12 वष क तपस्या के बाद उन्ह
'अनंत' ज्ञान प्राप्त हुआ और वे महावीर कहलाए। जैन मत के उपदे श अ हसा, अनेकांतवाद और अप रग्रह पर टके ह।
दशन भन्न, तना एक — और चुनने क पूरी स्वतंत्रता। एक अन्य दशन चावाक या लोकायत मानता था क यह भौ तक
जगत ही एकमात्र सत्य है और मृत्यु के पश्चात जीवन संभव नह ; इसे अ धक लोक प्रयता नह मली और यह वलुप्त हो गया,
कतु अध्याय इसका उल्लेख यह दखाने के लए करता है क वश्वास-प्रथाओं म कतनी व्यापक व वधता थी — “लोग अपने
अनुसार इन्ह चुनने के लए स्वतंत्र थे।” महत्वपूण भन्नताओं के बावजूद वै दक, बौद्ध और जैन दशन म धम, कम,
पुनजन्म, दुख और अज्ञानता के अंत क खोज तथा अनेक मूल्य समान थे। यही उस वृक्ष का तना है।
लोक और जनजातीय परंपराएँ भी सांस्कृ तक जड़ ह — और आदान-प्रदान दोन ओर से हुआ। भारत क मौ खक
परंपराएँ उपदे श और प्रथाओं को ल खत शास्त्र के बना, नत्य अभ्यास के ारा आगे बढ़ाती ह। आज मानव वैज्ञा नक
जनजा त को ऐसे प रवार या वंश का समूह मानते ह जो सामान्य उत्प त्त, संस्कृ त और भाषा साझा करते ह, एक मु खया के
अधीन नकट समुदाय म रहते ह और नजी संप त्त नह रखते; प्राचीन भारत म इसके लए कोई शब्द ही नह था —
जनजा तयाँ केवल वन या पहाड़ म रहने वाले अलग-अलग जन थ । 2011 म भारत म 705 जनजा तयाँ और लगभग 104
म लयन जनजातीय लोग थे। परंपरा के अनुसार पुरी के जगन्नाथ मूल रूप से जनजा त दे वता थे; अनेक जनजा तय ने बहुत
पहले हदू दे व को अपनाया और उनके अपने महाभारत तथा रामायण ह। लोक, जनजातीय और हदू वश्वास — तीन म
पवत, नद , वृक्ष और कुछ पत्थर तक प वत्र माने जाते ह, और अनेक जनजा तय म डोनीपोलो, खंडोबा, सगब गा जैसी
परमात्मा क संकल्पना भी है। समाजशास्त्री आंद्रे बेते के अनुसार यह प्रभाव “इ तहास के आरं भक समय तथा उससे भी पहले
से” दोन दशाओं म चलता रहा है।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ अध्याय म याद रखने योग्य
कहाँ
वेद भारत के पाचीनतम ग ंथ; संस्कृ त िवद् अथ त 'ज्ञान' से (इसी से पृष्ठ 106 चार — ऋग्वेद, यजुवद, सामवेद,
िवद्या) अथववेद; मौ खक पाठ, ल खत
नह
ऋ ष / ऋ षका वैिदक ऋचाओं की रचना करने वाले द ष्टा और द िष्टयाँ (किव और पृष्ठ 107 वेद क रचना म स्त्रयाँ भी
कवियित्रयाँ) स म्म लत थ
ऋत मानव जीवन और बह्माड
ं में सत्य और क्रम, िजसे दे व और द ष्टा पृष्ठ 107 वै दक वचार — सत्य और व्यवस्था
िमलकर बनाए रखते है ं एक ही वस्तु ह
एकं सत् वप्रा “परम सत्य एक ही है, िकं तु मनीषी इसे अनेक नाम दे ते है”ं पृष्ठ 107 अनेक दे व, एक ही सत्य — वै दक
बहुधा वद न्त दृ ष्ट का कद्र
जन लोगों का बड़ा समूह या कु ल; ऋग्वेद में 30 से अिधक जनों की सूची पृष्ठ 108 भरत, पुरु, कुरु, यदु, तुवश
सभा और स म त वेद ों में सामूिहक सभा या बैठक के िलए पयुक्त शब्द पृष्ठ 109 जन के शासन के वषय म हमारा
लगभग एकमात्र संकेत
यज्ञ वैिदक अनुष्ठान, जो दे वों के पित व्यिक्तगत या सामूिहक मंग ल के पृष्ठ 109 दै नक अनुष्ठान अ ग्न दे व को
िलए िकए जाते थे आहु त; समय के साथ अ धक
ज टल
उप नषद् वे ग ंथ जो वैिदक संक ल्पनाओं के आधार पर रिचत है ं और नई पृष्ठ 109 पुनजन्म और कम क संकल्पनाएँ
संक ल्पनाएँ दे ते है ं
ब्रह्म मानव जीवन, पकृ ित और बह्मांड — सबका एक ही दै वी तत्व; कभी- पृष्ठ 109 यह ब्रह्मा दे व से भन्न है। अहम्
कभी के वल तत् ब्रह्मा स्म, तत् त्वम् अ स
आत्मन् स्व — पत्येक जीव में िनवास करने वाला दै वी तत्व, जो अंतत: बह्म पृष्ठ 110 इसी से सब कुछ आपस म जुड़ा और
का ही स्वरूप है परस्पर नभर है
वेदांत / योग वेद ों से िवकिसत दो पमुख दशन पृष्ठ 109– इन्ह से मलकर हदू दशन क न व
110 बनी
अ वद्या और मोह अज्ञान, तथा िकसी व्यिक्त या वस्तु से भावना या आदत के माध्यम से पृष्ठ 113 बुद्ध का अनुभव — ये दोन ही कष्ट
बना संबंध के ोत ह
अ हसा सामान्यत: 'िहंस ा न करना', िकं तु मूल अथ 'चोट न पहच
ु ँ ाना' या पृष्ठ 113, बौद्ध और जैन दोन म कद्र य; इसम
'नुक सान न पहच
ु ँ ाना' 117 वचार क हसा भी स म्म लत
संघ बुद्ध ारा स्थािपत िभक्षओ
ु ं और आगे चलकर िभक्षिु णयों का समुद ाय पृष्ठ 113 उपदे श के पालन और प्रसार के लए
सम पत
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शब्द अथ अध्याय म याद रखने योग्य
कहाँ
जन 'िवजेता' — क्षेत्र या शत्र ओ
ु ं पर नही ं, अिवद्या और मोह पर िवजय; पृष्ठ 115, महावीर का अथ 'महानायक'
इसी से 'जैन' ध्यान रख
अनेकांतवाद 'के वल एक' पक्ष नही ं — सत्य के अनेक पक्ष है,ं इसे एक कथन से पृष्ठ 115 दूसरे के मत को सुनना सखाने वाला
पूर ी तरह नही ं कहा जा सकता जैन वचार
अप रग्रह 'असंग ह' — पािथव वस्तुओ ं से दू र ी, के वल अिनवाय वस्तुओ ं तक पृष्ठ 115 अध्याय म बताए तीन जैन उपदे श म
सीिमत रहना तीसरा
चावाक / वह दशन िजसके अनुस ार भौितक जगत ही एकमात्र सत्य है, अत: पृष्ठ 118– भारत म वश्वास क व वधता का
लोकायत म त्ृ यु के बाद जीवन नही ं 119 प्रमाण; समय के साथ वलुप्त
जनजा त पिरवारों या वंशों का समूह जो सामान्य उत्पित्त, संस्कृ ित और भाषा पृष्ठ 119 2011 म 705 जनजा तयाँ, लगभग
साझा करता है, मुिखया के अधीन िनकट समुद ाय में रहता है और 104 म लयन लोग
िनजी संपित्त नही ं रखता
मौ खक परंपरा वे उपदे श और पथाएँ जो िलिखत शास्त्रों के िबना, िनत्य अभ्यास से पृष्ठ 119 वेद स्वयं एक मौ खक परंपरा थे
आगे बढ़ ती है ं
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