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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा7
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 6: पुनगठन का काल
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
117 – 143 25 36 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 42 pages
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 पुनगठन का काल AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 7 · सामा जक वज्ञान · समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 6: पुनगठन का काल
कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 पुनगठन का काल के स ूण एनसीईआरट समाधान — पाठ्यपुस्तक समाज का अध्ययन : भारत और उसके
आगे (कक्षा 7, भाग 1) के वषय-क्षेत्र अतीत के चत्रपट से। अध्याय का प्रत्येक प्रश्न हल कया गया है — महत्वपूण प्रश्न, आठ आइए पता लगाएँ
बॉक्स, पुनरावलोकन कर, नौ आइए वचार कर बॉक्स, पृष्ठ 122, 128, 133 और 137 के पाठ्य प्रश्न, आगे बढ़ने से पहले… तथा सभी छह प्रश्न
और क्रयाकलाप — राजवंश के मान चत्र ( चत्र 6.2), द क्षण के राज्य के मान चत्र ( चत्र 6.14), पृष्ठ 126 के ा ी अंक , चेर, इंडो-ग्रीक तथा
कुषाण सक्क , चत्र 6.6 एवं चत्र 6.27 क कलाकृ तय और समय-रेखा ( चत्र 6.28) को मु द्रत पृष्ठ पर ध्यानपूवक दे खकर।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1) (कक्षा 7) 117 – 143
खं ड प्रश्न
25 36
माध्यम
हन्द
महत्वपूण प्रश्न — पृष्ठ 117
अध्याय का आरंभ — वषय-क्षेत्र ‘अतीत के चत्रपट'
महत्वपू ण प्रश्न
प्र.1 मौय त्तर काल को कभी-कभी ‘पुनगठन का काल’ क्य कहा जाता है?
क्य क इन शता ब्दय म भारत का राजनी तक मान चत्र बखरा और फर से गढ़ा गया। अध्याय स्वयं कहता है — “इस काल म
पूववत क्षेत्र का पुनगठन कर नवीन राज्य का नमाण हुआ, जो नरंतर सत्ता क आकांक्षा म एक-दूसरे से स्पधा कर रहे थे।”
घटनाओं क ंखला दे खए :
लगभग 185 सा.सं.पू. — अंितम मौय शासक की हत्या उनके सेन ापित पुष्यिमत्र शुंग ारा
→ अशोक के लगभग आधी शताब्दी बाद ही सामाज्य का िवघटन
→ जो राज्य पहले मौय अधीनता में थे , वे स्वतं त्र हो गए
→ उत्तर-पि चम दुबल हुआ और बाह्य आक्रमणों के िलए असुरिक्षत हो गया
→ नए राज्य वैवािहक गठबंधन और युद्ध से क्षेत्र पर अिधकार करने लगे
→ भारत का मानिच त्र िवशेष रूप से बदला — और जनसामान्य का जीवन भी
एक साथ दो चीज़ का पुनगठन हो रहा था :
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राजनी तक सत्ता — एक वशाल सा ाज्य के स्थान पर अनेक छोटे -बड़े राज्य : उत्तर और दक्कन म शुंग, चे द, सातवाहन;
द क्षण म चोल, चेर, पांड्य; उत्तर-प म से आते इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण।
संस्कृ त — “कला, शल्प और सा हत्य के क्षेत्र म वकास म तेजी आई और सांस्कृ तक आदान-प्रदान भी समृद्ध हुआ।” नई
कला-शै लयाँ, नए सक्के और संस्कृत सा हत्य का उत्कष इसी युग क दे न ह।
ऐसा क्य हुआ : वशाल सा ाज्य तभी तक टकता है जब तक उसका कद्र सुदृढ़ हो। मौय कद्र के ढहते ही क्षेत्र
लुप्त नह हुए — वे नए राज्य क ईंट बन गए। इसी लए इ तहासकार इसे वनाश का नह , पुनगठन का काल कहते
ह।
प्र.2 वह कौन-से मूल्य और सद्धांत थे जन्ह ने इस काल के स ाट का मागदशन कया?
अध्याय के साक्ष्य को एक-एक शासक के अनुसार प ढ़ए — वही कुछ मूल्य बार-बार सामने आते ह।
मूल्य या अध्याय म इसका साक्ष्य
सद्धांत
सभी मतों के जैन दशन के अनुयायी खारवेल “सभी मत के प्र त सम्मान-भाव रखते थे” और स्वयं को ‘सवमत का सम्मानकता और
पित स म्मान समस्त दे वालय का पुनरुद्धारक' कहते ह। सातवाहन वासुदेव के उपासक थे, फर भी वै दक व ान , जैन मु नय और
बौद्ध भक्षुओं को कर-मुक्त भू म दे ते थे। क नष्क ने एक सक्के पर बुद्ध और दूसरे पर नंद स हत शव अं कत करवाए।
पांड्य अ भलेख म “समस्त दशन-परंपराओं और आस्थाओं” को प्रोत्साहन का उल्लेख है। अध्याय इसे ‘भारतीय
सांस्कृ तक दृ ष्ट' कहता है।
जनक ल्याण हाथीगुंफा अ भलेख म खारवेल के “जनकल्याण हेतु कए गए पुण्य काय ” का वणन है। क रकाल ने कल्लनई बनवाई
ता क अ धक भू म स चत हो सके। पांड्य नरेश “प्रजा के कल्याण के प्र त अत्यंत सजग” थे।
याय और
न् सलप्प दकारम् “न्याय के सद्धांत तथा राजधम क महत्ता को उ ा टत करती है” — कोवलन को अन्यायपूवक दं ड दे ने
राजधम वाला पांड्य नरेश सत्य जानकर शोक से प्राण त्याग दे ता है।
वैध एवं पकट पुष्य मत्र ने स्वयं को सबसे श क्तशाली शासक सद्ध करने के लए अश्वमेध यज्ञ कया; क नष्क क मू त पर अं कत है —
स त्ता ‘महाराजा राजा धराज दे वपुत्र क नष्क'।
िव ा और शुंग ने सा हत्य, कला और वास्तुकला का संरक्षण कया (भरहुत); चेर ने संगम क वय को आश्रय दया; क नष्क “कला
कला का और संस्कृ त को प्रोत्सा हत करते थे, जससे नवीन कला शै लय का वकास हुआ”।
संरक्षण
दान की भावना नानेघाट के अ भलेख म रानी ारा द गई भू म, गाय, घोड़े, हाथी और चाँद के सक्के — पुरो हत , अ त थय , कमकार ,
व ान और भक्षुओं को सम पत।
संकेत : य द एक पं क्त म उत्तर दे ना हो तो ल खए — सभी दशन के प्र त स हष्णुता, जनकल्याण क चता,
राजधम के रूप म न्याय, तथा व ा और कला का उदार संरक्षण।
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प्र.3 वदे शी आक्रमणका रय ने कस प्रकार भारतीय समाज म समा हत होकर सांस्कृ तक संगम म योगदान दया?
वे वजेता बनकर आए और यह के होकर रह गए। अध्याय इंडो-ग्रीक के बारे म स्पष्ट कहता है — “जब वे वजेता के रूप म आए,
तो वे समृद्ध स्थानीय संस्कृ त से बहुत प्रभा वत हुए।”
आक्रमणकारी कस प्रकार समा हत हुए सांस्कृ तक संगम म योगदान
इंडो-ग ीक भारतीय दे वताओं और वचार को अपनाया। राजदूत शासन, कला, भाषा और दै नक जीवन म ग्रीक
(एले क्जेंडर के क्षत्रप, हे लयोडोरस ने व दशा के पास स्तंभ पर वासुदेव क और भारतीय तत्व का मश्रण; स्तंभ के तीन
जो स्वतंत्र शासक बने) स्तु त ‘दे वताओं के दे वता' के रूप म क । कुछ सक्क पर उपदे श — आत्म-संयम, दान, चेतना।
वासुदेव-कृष्ण और लक्ष्मी अं कत ह।
शक दूसरी शताब्द सा.सं.पू. से पाँचव शताब्द सा.सं. तक शक संवत पंचांग — जो आज भी भारतीय
(इंडो-िसिथयन) शासन कर वे यहाँ क एक नय मत श क्त बन गए। राष्ट्रीय पंचांग है (1957 से)।
कु षाण क नष्क ने भारतीय उपा धयाँ धारण क , बौद्ध धम को रेशम माग पर नयंत्रण और व्यापार म वृ द्ध;
(मूल तः मध्य एिशया से ) संरक्षण दया और शव का सम्मान कया; उनके शासन म गांधार तथा मथुरा कला शै लयाँ; दे वताओं का
“व्यापक सांस्कृ तक मेल-जोल” हुआ। मानव रूप म चत्रण, जसने आगे क मं दर
वास्तुकला का आधार तैयार कया।
यह समावेशन तीन कारण से संभव हुआ :
1. व्यापार — नवागंतुक व्यापार माग पर बैठे थे; स्थानीय व्यापा रय से लड़ने के बजाय उनके साथ काम करने म ही उनका लाभ
था।
2. सक्के — जो शासक चाहता है क उसक मुद्रा स्वीकार क जाए, वह उस पर प्रजा के आदरणीय दे वताओं को अं कत करता
है। इसी कारण ‘ वदे शी' सक्क पर बुद्ध, शव, वासुदेव-कृष्ण और लक्ष्मी दखाई दे ते ह।
3. कला — ग्रीक मू तकला भारतीय वषय से मली। प रणाम — गांधार म यथाथ शरीर और उड़ते वस्त्र वाले बुद्ध, तथा मथुरा
म गोल-मटोल, चकनी भारतीय आकृ तयाँ।
महत्वपूण बात : अध्याय कहता है क इस आदान-प्रदान म शै लय ने एक-दूसरे को प्रभा वत कया, “परंतु उनम
भारतीय वषय प्रमुख बने रहे”। अथात् बाहरी लोग ने भारत को नह बदला — भारत ने उन्ह आत्मसात कया और
साथ ही नई तकनीक एवं वचार भी पाए।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 118
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 पुनगठन का काल
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मौय सा ाज्य का वघटन — अध्याय क समय-रेखा बनाना
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आइए पता लगाएँ
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a s emपृष्ठ पर दूसरी शताब्द सा.सं.पू. के प्रारं भक वष से लेकर तीसरी शताब्द सा.सं. के अं तम वष तक क
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एक
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प्र.1
अव ध को च ह्नत करते हुए एक समय-रेखा बनाइए। यह अव ध कुल कतने वष को स म्म लत करती है? जैसे-
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जैसे हम अध्याय म आगे बढ़गे, समय-रेखा पर प्रमुख व्य क्तय , राज्य और घटनाओं को च ह्नत क जए।
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a है।
यह अव ध कुल 500 वष को स म्म लत करती
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दू सरी शताब्दी सा.सं.पू. का पारंिभक वष = 200 सा.सं.पू. (सा.सं.पू. के वष उलटे िगने जाते है ं : 200 → 101)
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तीसरी शताब्दी सा.सं. का अंितम वष = 300 सा.सं. (सा.सं. के वष सीधे िगने जाते है ं : 201 → 300)
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a s em.पू. के वष : 200 + सा.सं. के वष : 300 = 500 वष
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सा.सं
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स्वयं जाँ चए : 300 म से 200 घटाकर 100 मत ल खए। और ‘शून्य वष' भी मत जो ड़ए — कोई वष 0 होता ही
नह । गणना इस प्रकार चलती है … 2 सा.सं.पूe.m
a s , 1 सा.सं.पू., 1 सा.सं., 2 सा.सं. …
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नीचे अध्याय क वही समय-रेखा है जो पुस्तक के चत्र 6.28 (पृष्ठ 142) म द गई है। अपनी शीट पर यही मापदं ड ली जए —
प्रत्येक 25 वष के लए 1 सेमी — और जैसे-जैसे नाम मलते जाएँ, उन्ह जोड़ते जाइए।
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खारवेल किनष्क
a 185 सा.सं.पू. शातकण
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पुष्यिमत्र शुंग गौतमीपुत्र
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200 पू. 100 पू. 100 200 300
सा.सं.पू. | सा.सं.
शंगु
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इंड ो-ग ीक, िफर शक
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सातवाहन
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कु षाण →
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चोल,
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चेर ,
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पाड
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अध्याय के 500 वष — 200 सा.सं.पू. से 300 सा.सं. तक। प ट्टयाँ अनुमा नत ह; इसी कारण पुस्तक क समय-रेखा म भी कुछ सरे
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बदुओं से दशाए गए ह।
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यह क जए : आगे पढ़ते हुए घटनाएँ भी जो ड़ए — भरहुत क वे दकाएँ, नानेघाट का कर-संग्रह, हाथीगुंफा
अ भलेख, कल्लनई का नमाण, हे लयोडोरस स्तंभ और क नष्क के सक्के।
पुनरावलोकन कर — पृष्ठ 119
चत्र 6.2 — पुनगठन काल के दौरान भारत के प्रमुख राजवंश
पु न रावलोकन कर
प्र.1 समय-रेखा पर काय करते हुए क्या आपने सा.सं.पू. से सा.सं. तक के बदलाव पर ध्यान दया है? याद क जए क
आपने कक्षा 6 के अध्याय ‘इ तहास क समयरेखा एवं उसके ोत’ के अंतगत इ तहास म समय को मापने के बारे
म क्या पढ़ा था?
हाँ — और समय-रेखा पर यही वह स्थान है जहाँ सबसे अ धक सावधानी चा हए।
सा.सं.पू. का अथ है सामान्य संवत पूव और सा.सं. का अथ है सामान्य संवत। दोन एक ही बदु पर मलते ह और बीच म
कोई वष 0 नह होता : 1 सा.सं.पू. के तुरंत बाद 1 सा.सं. आता है।
सा.सं.पू. के वष उलटे चलते ह। 200 सा.सं.पू. 100 सा.सं.पू. से पहले का है। इस लए पुष्य मत्र शुंग (185 सा.सं.पू.)
खारवेल से पहले हुए, यद्य प 185 बड़ी संख्या है।
सा.सं. के वष सीधे चलते ह — गौतमीपुत्र शातकण (लगभग 100 सा.सं.) क नष्क (लगभग 150 सा.सं.) से पहले हुए।
यिद अंत राल इस िवभाजन को पार करता हो तो जोिड़ ए, घटाइए मत।
185 सा.सं.पू. से 150 सा.सं. तक = 185 + 150 = 335 वष
(घटाने पर 35 वष आता — जो पूणतः गलत है।)
ऐसा क्य : सा.सं.पू. और सा.सं. एक ही बदु पर टक दो सी ढ़याँ ह — एक पीछे क ओर चढ़ती है, दूसरी आगे क
ओर। एक सीढ़ से दूसरी तक जाने के लए दोन क ऊँचाइयाँ जोड़नी पड़ती ह, अंतर नह नकाला जाता।
क्या आप जानते ह? भारत क अपनी संवत् गणनाएँ भी ह। पृष्ठ 135 पर आने वाला शक संवत 78 सा.सं. से
आरंभ होता है — इस लए शक वष ग्रेग्रो रयन वष से 78 कम होता है (जनवरी से माच तक 79 कम)।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 120
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चत्र 6.2 क तुलना मौय सा ाज्य के मान चत्र ( चत्र 5.13, पृष्ठ 100) से
आइए पता लगाएँ
प्र.1 पछले अध्याय म आपने मौय सा ाज्य का मान चत्र दे खा ( चत्र 5.13)। चत्र 6.2 मौय त्तर काल का मान चत्र है।
आप उस क्षेत्र म कतने राजवंश क गणना कर सकते ह जो पूव म मौय शासन के अधीन थे?
60° पू० 70° पू० 80° पू० 90° पू०
40° उ०
इंड
ो--ग
ीक
कु
णाष
30° उ०
शक
((इंडो--िसिथयन))
शुंग
न
ा तवाह
20° उ० स
दिचे
अरब बंगाल की
सागर खाड़ ी
लोच
रेच
10° उ० 0 500 1,000 िक.मी.
डं ाप
60° पू० 70° पू० 80° पू० 90° पू०
चत्र 6.2 (पृष्ठ 119) — पुनगठन काल के दौरान भारत के प्रमुख राजवंश।
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30° उ०
20° उ०
10° उ०
मौय सामाज्य
70° पू० 80° पू० 90° पू०
तुलना के लए : पछले अध्याय के मौय सा ाज्य का वस्तार ( चत्र 5.13, पृष्ठ 100), यहाँ रूपरेखा म पुनः बनाया गया।
सीमाएँ अनुमा नत ह।
चत्र 6.2 म कुल नौ श क्तय के नाम ह। इनम से छह उस क्षेत्र म ह जो पहले मौय सा ाज्य के अधीन था।
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क्रम चत्र 6.2 म नाम स्थ त क्या यह क्षेत्र मौय था? ( चत्र 5.13)
1 इंडो-गीक सुदूर उत्तर-प म, सधु के पार हाँ — अशोक का सामाज्य कांध ार तक था
2 कु षाण उत्तर-प म तथा ऊपरी गंगा मैदान हाँ
3 शक (इंडो-िसिथयन) प मी भारत / पंजाब का मैदान हाँ
4 शुंग उत्तर एवं मध्य भारत (मौय सा ाज्य का हृदय-क्षेत्र) हाँ — पाटिलपुत्र मौय राजधानी थी
5 सातवाहन दक्कन हाँ — पितष्ठान और अमरावती मौय मानिचत्र पर है ं
6 चेिद क लग, पूव तट हाँ — अशोक ने किलंग जीता था
— चोल, चेर, पांड्य सुदूर द क्षण नही ं — मौय मानिचत्र इनसे पहले ही रुक जाता है
अथात् — पूव मौय क्षेत्र म छह राजवंश, और तीन द क्षणी राज्य जो कभी मौय अधीन थे ही नह ।
ऐसा क्य : तीन द क्षणी राज्य मौय सा ाज्य के चरमोत्कष के समय भी स्वतंत्र रहे — अशोक ने स्वयं अपने
शलालेख म उनका उल्लेख पड़ोसी के रूप म कया है, प्रजा के रूप म नह । इस लए उत्तर, प म, मध्य और पूव
के वे छह राज्य ही बताते ह क मौय सा ाज्य कैसे बखरा : एक सा ाज्य से छह स्पधारत राज्य।
संकेत : य द कोई मान चत्र पर ‘शक' और ‘इंडो- स थयन' को दो नाम गन ले, तो ध्यान र खए क ये एक ही जन ह
— दूसरा नाम केवल कोष्ठक म दया गया है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 122
शुंग का उत्कष — संस्कृत और योग सूत्र
प्र.1 क्या आपको कक्षा 6 क ‘शारी रक शक्षा और स्वास्थ्य’ म योग सूत्र के कुछ अंश याद ह?
हाँ। योग सूत्र — छोटे , सारग भत वाक्य (सूत्र अथात् ‘धागा') — इसी काल म मह ष पतंज ल ारा संक लत कए गए थे, जब
संस्कृत दाश नक और सा ह त्यक रचनाओं क प्रमुख भाषा बन चुक थी।
कक्षा 6 म जो अभ्यास कराया गया था, उसका मूल यह है :
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जो अभ्यास आपने कया योग सूत्र म उसका स्थान
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आसन
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स्थर और सुखपूण मुद्रा — अष्टांग योग का तीसरा अंग
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पाणायाम श्वास का नयमन — चौथा अंग; व्यायाम से पहले और बाद म यही कराया जाता है
यान एकाग्रता और वह शांत सजगता जसके साथ प्रत्येक क्रया करने को कहा जाता है
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यम और िनयम
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दूसर के प्र त तथा स्वयं के प्र त आचरण के नयम — शौच, सत्य, अ हसा, संतोष
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यह इ तहास के अध्याय म क्य : इससे पता चलता है क ‘पुनगठन का काल' केवल राजाओं और युद्ध का काल
नह था। जब राज्य सीमाओं के लए लड़ रहे थे, तब व ान ऐसे ग्रंथ क रचना और संकलन कर रहे थे जनका
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उपयोग भारतीय आज भी करते ह। योग उस काल और आपक कक्षा के बीच जी वत कड़ी है।
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क्या आप जानते ह? पतंज ल ने योग का आ वष्कार नह कया — उन्ह ने पहले से चली आ रही शक्षाओं को
a एकत्र और व्यव स्थत कया। इसी लए पुस्तक ‘संक लत' शब्द का प्रयोग करती है।
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आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 124
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चत्र 6.7 — भरहुत स्तूप क एक प का
आइए पता लगाएँ
प्र.1 नीचे भरहुत स्तूप क एक प का का चत्र है। दा हने तरफ क दोन आकृ तय को ध्यानपूवक दे खए। वे क्या कर
रही ह? क्या आप उनके व्यवसाय का अनुमान लगा सकते ह? उनके प रधान पर ध्यान द जए। यह हम उनके
बारे म क्या बता रहे ह? प का म आपको जो अन्य ववरण दखे, उन्ह सूचीबद्ध कर कक्षा म उन पर चचा
क जए।
प का म क्या-क्या है :
यह उत्क ण पत्थर क एक प का है। बीच म कमल क बारीक पंखु ड़य से भरा एक बड़ा गोल
पदक है; उसके कद्र म एक बड़े नुक ले पत्ते जैसी आकृ त के भीतर एक नीची चौक पर लपट हुई
गठरी जैसी छोट वस्तु रखी है।
पदक के ऊपर माला जैसी एक मोट प घूमती है और उसके दोन ओर छोटे -छोटे पुष्प-चक्र बने
ह।
सबसे नीचे क लय और मनक क दो पं क्तय वाली कनार चलती है।
दा हनी ओर दो मानव-आकृ तयाँ ग तशील मुद्रा म ह — घुटने मुड़े हुए, शरीर मुड़ा हुआ, एक दूसरी
से थोड़ा पीछे और ऊपर। प्रत्येक दोन हाथ मुख तक उठाए हुए है और एक लंबी पतली वस्तु थामे
है, जो कंधे के ऊपर से पीछे क ओर पतली होती जाती है।
दोन ने बड़ी लपेट हुई पगड़ी, बड़े गोल कणाभूषण, गले का हार, बाजूबंद, प्रत्येक कलाई म कई
चू ड़याँ और कमर पर बँधा छोटा वस्त्र पहन रखा है; ऊपरी शरीर और पैर अनावृत ह।
उनके पीछे क पृष्ठभू म चपटे पत्थर-खंड के खुरदरे प्रारूप म तराशी गई है।
चत्र 6.7 (पृष्ठ 124) — भरहुत स्तूप क एक प का; छाया चत्र, जसका वणन यहाँ दया गया है। चत्र स्वयं
पाठ्यपुस्तक म दे खए।
वे क्या कर रही ह। दा हनी ओर क दोन आकृ तयाँ ग तशील मुद्रा म ह — घुटने मुड़े हुए, शरीर आगे क ओर झुका हुआ, हाथ मुख
के सामने उठे हुए और प्रत्येक के हाथ म कोई पतली वस्तु है। वे न लड़ रही ह, न उनके पास शस्त्र ह : वे प ट्टका के बीच रखी वस्तु के
चार ओर हो रहे उत्सव म स म्म लत ह — संभवतः वादक के रूप म। एक मुख से कोई वाद्य (शंख या तुरही) बजाता प्रतीत होता
है और दूसरा लंबा वाद्य थामे हुए है।
उनका व्यवसाय। सबसे संभा वत अनुमान है — राजदरबार या स्तूप के उत्सव से जुड़े वादक अथवा कलाकार। (दूसरा अनुमान
भी ठ क हो सकता है क वे भट लेकर आते हुए सेवक या उपासक ह — आप जो भी चुन, अपना कारण अवश्य ल खए।)
उनके प रधान, और वे हम क्या बताते ह। ध्यान से दे खए :
सलीके से लपेट हुई बड़ी पगड़ी, जसक गाँठ एक ओर है।
बड़े गोल कणाभूषण, गले का हार, बाजूबंद और प्रत्येक कलाई म कई चू ड़याँ।
कमरबंद से बँधी छोट धोती, ऊपरी शरीर अनावृत — ग त के अनुकूल हल्के वस्त्र।
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यह कसी नधन श्र मक का पहनावा नह है। इन उत्क णन म साधारण श्रमजीवी इससे कह कम पहने दखाए जाते ह। अतः
प ट्टका बताती है क ये कुशल और सम्मा नत लोग थे — इतने संपन्न क आभूषण रख सक, और इतने महत्वपूण क प वत्र शल्प
म स्थान पाएँ।
प का के अन्य ववरण (कक्षा म इन्ह सूचीबद्ध क जए) :
ववरण उस पर क्या कहा जाए
कमल -दलों से भरी बड़ ी गोल पि का (मेडिलयन) भरहुत का सबसे आम अलंकरण कमल है; बीच म रखी वस्तु का सम्मान कया जा
रहा है
मेडिलयन पर झुक ी मोटी माला या लता माला उस वस्तु को प वत्र घो षत करती है — ठ क वैसे ही जैसे आज कसी चत्र पर
माला चढ़ाई जाती है
दोनों ओर छोटे कमल -चक्र बार-बार दोहराए गए अलंकरण — शल्पी ने पूरी योजना बनाकर काम कया था
पष्ृ ठभूिम में च ानों की परते ं पवत या पहाड़ी दखाने क प्रच लत शैली
नीचे की प ी में मनकों की झालर और कमल -किलयाँ वे दका का नचला कनारा — यही झालर पूरे स्तूप के चार ओर चलती है
कलशों पर
यह महत्वपूण क्य : शुंग ने अशोककालीन स्तूप म ये वे दकाएँ और उत्क ण शल्प जोड़े। चूँ क इनम साधारण
जीवन दखता है — वस्त्र, आभूषण, वाद्य, केश-स ा — ये हमारे लए यह जानने के सव त्तम ोत ह क दो हजार
वष पूव लोग कैसे दखते थे।
स्वयं जाँ चए : पुस्तक को पास लाकर प्रत्येक आकृ त के हाथ दे खए। य द वाद्य स्पष्ट दखे तो ठ क-ठ क वही
ल खए जो दख रहा है — अ ा इ तहास पहले यह बताता है क साक्ष्य क्या दखाता है, तब यह क उसका अथ
क्या है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 124
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 पुनगठन का काल AglaSem · NCERT Solutions
चत्र 6.6 (पृष्ठ 123) — कला म शुंग का योगदान
आइए पता लगाएँ
प्र.1 चत्र 6.6 के कोलाज म चत्र को ध्यान से दे खए। कपड़ , आभूषण और दै नक उपयोग क अन्य वस्तुओं पर
अपने वचार ल खए।
कोलाज के दस चत्र, पुस्तक म दए गए क्रम से :
6.6.1 ग्रीक योद्धा वाला स्तंभ — पत्थर का एक ऊँचा स्तंभ, जस पर उभरी हुई एक खड़ी आकृ त
उत्क ण है।
6.6.2 पुरुष आकृ त — म (टे राकोटा) क एक लंबी प का पर एक खड़ी आकृ त।
6.6.3 बालक को गोद म लए स्त्री — टे राकोटा क टू ट प का; एक खड़ी स्त्री, कमर पर छोटा
बालक।
6.6.4 पंखे के साथ स्त्री — अंडाकार टे राकोटा प का; हाथ म गोल पंखा लए खड़ी स्त्री।
6.6.5 एक कलश — ऊँचा पात्र, जस पर छोट -छोट ढली हुई आकृ तय क पं क्तयाँ ह।
6.6.6 केश-आभूषण स हत स्त्री-आकृ त, टे राकोटा — टू ट प का, जसम वस्तृत केश-स ा
वाला एक मुख दखता है।
6.6.7 राजप रवार — आयताकार टे राकोटा प का, जसम एक चौखट के भीतर दो आकृ तयाँ
साथ-साथ ह।
6.6.8 सोने क पतली परत चढ़े काँसे के कंगन — दो सादे गोल कंगन, काली पृष्ठभू म पर।
6.6.9 हाथीदाँत क कंघी — घुमावदार कंघी, जसके दाँते बारीक और पास-पास ह तथा ऊपर
आकृ तयाँ उत्क ण ह।
6.6.10 हार के मनके — छोटे सोने के मनक क एक अधवृत्ताकार पं क्त, बीच म एक बड़ा
टु कड़ा।
चत्र 6.6 (पृष्ठ 123) — शुंगकालीन वस्तुओं का कोलाज; छाया चत्र, जनका वणन यहाँ दया गया है। चत्र स्वयं
पाठ्यपुस्तक म दे खए।
नमूना उत्तर — प्रश्न जस प्रकार क टप्पणी माँगता है। कोलाज म दस वस्तुएँ ह; अपने वचार इस प्रकार वग कृत क जए।
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चत्र 6.6 क वस्तु क्या दखाई दे ता है
6.6.1 ग ीक योद्धा को दश ता स्तंभ छोटा कसा हुआ अंगरखा, छाती पर आड़ा पट्टा, कमर म तलवार और जूते — भारतीय स्तंभ पर
उत्क ण वदे शी वेशभूषा
6.6.2 पुरुष आकृ ित ऊपरी शरीर अनावृत, चुन्नटदार धोती, भारी पगड़ी, बड़े कणाभूषण, चू ड़याँ
6.6.3 बालक को गोद में िलए स्त्र ी सजी हुई केश-रचना, बड़े गोल कुंडल, कई ल ड़य वाले हार, कमर म चौड़ी मनक क मेखला,
कलाई से कोहनी तक चू ड़याँ, पायल
6.6.4 पंखे के साथ स्त्र ी पंखा स्वयं दै नक उपयोग क वस्तु है; यहाँ भी मेखला और चू ड़य क पं क्तयाँ दे खए
6.6.5 गमला पक मट्ट का, जसक पूरी सतह पर मनुष्य और पशुओं क छोट -छोट आकृ तय क पं क्तयाँ
ह — अलंकृत घरेलू पात्र
6.6.6 बालों के आभूषण के साथ स्त्र ी की मुकुट जैसी केश-स ा, माथे पर अधचंद्र — केश-स ा स्वयं एक कला थी
आकृ ित, पकी िम ी
6.6.7 राजपिरवार पगड़ी, आभूषण और लंबे दं ड के साथ दो संपन्न आकृ तयाँ — आभूषण वही, पर मात्रा अ धक
6.6.8 काँसे की चूिड़याँ िजन पर सोने की यह वास्त वक आभूषण है, मू त नह : सोने क परत चढ़ाना एक चतुर शल्प-तकनीक थी,
पतली परत जससे बहुमूल्य दखने वाले गहने सुलभ हो जाते थे
6.6.9 हाथी दाँत का कं घा बारीक लंबे दाँते और ऊपरी भाग पर आकृ तय तथा पशुओं का उत्क णन — दै नक वस्तु को भी
सुंदर बनाया गया
6.6.10 हार के मनके भन्न- भन्न आकार के छोटे स्वण मनके, जनम एक छोट पशु-आकृ त भी है — अत्यंत सूक्ष्म
स्वणकारी का प्रमाण
पूरे कोलाज से क्या पता चलता है :
वस्त्र मुख्यतः बना सले थे — धोती, साड़ी जैसा प रधान, कमरबंद और पगड़ी। अपवाद है ग्रीक योद्धा, जो सला अंगरखा
और जूते पहने है। अथात् वदे शी वेशभूषा प र चत थी और उसे सहजता से उत्क ण कया गया।
आभूषण सभी ने पहने ह, पुरुष ने भी : कुंडल, हार, बाजूबंद, चू ड़याँ, मेखला, पायल। सामग्री — पक म , काँसा, सोने
क परत चढ़ा काँसा, स्वण और हाथी दाँत।
दै नक वस्तुए ँ भी सजाई जाती थ — कंघा, गमला, पंखा। कला केवल मं दर तक सी मत नह थी।
पक मट्ट क इतनी वस्तुएँ बताती ह क केवल धनी नह , साधारण लोग भी सुंदर गढ़ हुई आकृ तयाँ रख सकते थे। मट्ट सस्ती
थी, कौशल नह ।
यह क जए : 6.6.8 क तुलना आज बकने वाली कसी सोने क परत चढ़ चूड़ी से क जए। सस्ती धातु पर सोने
क पतली परत — यह तकनीक दो हजार वष से भी पुरानी है।
आइए वचार कर — पृष्ठ 126
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सातवाहन काल म जन-जीवन — माता के नाम पर रखे जाते राजकुमार के नाम
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a s emे अनुसार राजा के नाम के आरंभ म उसक माँ का नाम लखने क परंपरा का क्या अथ है?
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इसका अथ है क सातवाहन समाज म माता का कुल और m .
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राजक य नाम म, सक्क पर और अ भलेख म घो षत
पुस्तक का उदाहरण दे खए :
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गौतमीपु शातकण = ‘शातकण , गौतमी के पुत्र'
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माता : गौतमी ु ं को भूिम दान दीaऔर
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िचत्र 6.10 के िसक्के पर बा ी िलिप में — ‘गौतमीपुत्र राजा शातकण '
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इसके संभा वत अथ :
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स्त्रय का वास्त वक प्रभाव था। गौतमी बलश्री ने अपने नाम से दान दया और अ भलेख उत्क ण करवाया — ये कसी
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प्रभावशाली व्य क्त के काय ह, केवल राजप रवार क सदस्या के नह ।
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माता का वंश महत्वपूण था। न नहाल का नाम जोड़ने से राजग पर राजकुमार का दावा और सुदृढ़ होता था।
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.c स्पष्ट होती थी। एक ही राजवंश के कई राजकुमार क उपा ध ‘शातकण ' aहोgसकती थी; माता का नाम उन्ह अलग-
माता का सम्मान एक सावज नक मूल्य था, केवल नजी भाव नह — अन्यथा वह सक्क पर अं कत न होता।
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se अलग पहचान देता था।
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comसमाज एकरूप नह था और भन्न- भन्न क्षेत्र ने प रवार तथा l a
यह वशेष क्य : अ धकांश प्राचीन राजवंश म राजा का नाम पता के नाम से जुड़ता था। सातवाहन ने इसके
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वपरीत कया — यह स्मरण दलाता है क भारतीय
उत्तरा धकार क अपनी-अपनी परंपराएँsबनाईं।
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क्या आप जानते ह? नानेघाट के अ भलेख ( चत्र 6.9) एक अन्य सातवाहन स्त्री पर क द्रत ह — वह वधवा रानी,
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जन्ह ने अश्वमेध यज्ञ स हत अनेक वै दक अनुष्ठान संपन्न कए, जो सामान्यतः राजाओं से जुड़े माने जाते ह।
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नानेघाट अ भलेख के ा ी अंक
आइए वचार कर
प्र.1 उपयुक्त अंक क श्रृंखला म से कौन-से अंक कुछ-कुछ हमारे आधु नक अंक जैसे दखते ह? कौन-से नह ?
पृष्ठ पर सात ा ी चह्न छपे ह, जनके ऊपर मान लखे ह — 1, 2, 4, 6, 7, 9 और 10। मु द्रत पृष्ठ पर वे इस प्रकार दखते ह :
मान ा ी चह्न जैसा छपा है क्या हमारे अंक जैसा?
1 एक छोटी आड़ी रे खा — नह — हमारा 1 खड़ी रेखा है
2 एक के नीचे एक, दो आड़ी रे खाएँ = नह — पर वचार सरल है : रेखाएँ गन ली जए
4 खड़ी रे खा, उस पर आड़ा डंडा और ऊपर कटोरी जैस ा मोड़ कुछ-कुछ — हमारे 4 जैसी कट हुई बनावट है, आकृ त नह
6 नीचे आकर छोटे छल्ले में बंद होता वक्र हाँ — बहुत िमलता-जुल ता। हमारा 6 तेज़ी से िलिखए , यही बनेगा
7 ऊपर छोटी रे खा, िफर तीखा मोड़ नीचे-बाईं ओर, िसरे पर हक
ु हाँ — लगभग वैस ा ही जैस ा हमारा 7
9 खुल ा ‘स ' जैस ा घुम ाव, ऊपर हुक नह — हमारे 9 से कोई साम्य नह
10 ग ीक अक्षर α जैस ी आकृ ित नह — और ध्यान द जए, यह एक ही चह्न है, ‘1' और ‘0' नह
हमारे जै से िदखते है ं : 6 और 7 (तथा कु छ हद तक 4)
नही ं िदखते : 1, 2, 9 और 10
ऐसा क्य होता है : शता ब्दय तक तेज़ी से लखते- लखते आकृ तयाँ बदलती जाती ह। कुछ ा ी चह्न अपना रूप
बनाए रखकर भारत से प म ए शया और फर यूरोप तक पहुँचे, जहाँ उन्ह ‘अरबी अंक' कहा गया — जब क अरब
ने स्वयं उन्ह हदसा अथात् ‘भारत से आए' कहा। यह अ भलेख “इस बात का एक साक्ष्य है क आधु नक अंक क
उत्प त्त भारत म ही हुई।”
संकेत : यह भी दे खए क इस ंखला म क्या नह है — शून्य का चह्न और स्थानीय मान (प्लेस वैल्यू)। ा ी म
10 के लए अलग चह्न था। शून्य और स्थानीय मान बाद म आए, और उन्ह ने भारतीय अंक को वश्व का ग णत
बना दया।
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चत्र 6.12 — पीतलखोरा गुफाओं से प्राप्त यक्ष क मू त
आइए वचार कर
प्र.1 पीतलखोरा से प्राप्त यक्ष क इस मू त के हाथ पर एक लेख उत्क ण है — ‘कन्हणदासेन हीरामकारेना काट’
जसका अथ है — ‘कन्हणदास नामक स्वणकार ारा न मत’। क्या यह रोचक नह है क एक सुनार भी पत्थर
क मू त बना सकता था? आपके वचार म इससे हम उस समय के लोग के व्यवसाय के बारे म क्या पता चलता
है?
इससे पता चलता है क उस काल म व्यवसाय वास्त वक कौशल थे, जड़ लेबल नह — एक सामग्री म प्र श क्षत शल्पी दूसरी
सामग्री म भी काम कर सकता था और करता भी था।
इस एक छोटे -से लेख से चार बात नकलती ह :
1. शल्प एक-दूसरे से जुड़े थे। स्वणकार बारीक छे नी, ठप्पे और रेती से सूक्ष्म काम करता है। हाथ और आँख का वही अभ्यास
पत्थर पर भी काम आता है। इस लए हीरामकार (स्वणकार) कहलाने वाला व्य क्त एक बड़ा यक्ष गढ़ सका।
2. शल्पी को अपने काम पर गव था। कन्हणदास ने मू त पर अपना नाम अं कत कया। वह पहचाना जाना चाहता था —
अथात् कारीगर के नाम और प्र तष्ठा का मूल्य था।
3. शल्पी साक्षर थे या उन्ह लेखन उपलब्ध था — कसी को वह ा ी पं क्त रचकर उत्क ण करनी ही पड़ी।
4. माँग और ग तशीलता थी। पीतलखोरा जैसे गुफा-स्थल पर बड़े पैमाने पर काम चल रहा था, इस लए कुशल हाथ वह पहुँचते
थे जहाँ काम था।
यह क्य महत्वपूण है : हम प्रायः राजाओं के वषय म इस लए जानते ह क्य क उन्ह ने अ भलेख छोड़े। यहाँ एक
साधारण शल्पी ने अ भलेख छोड़ा है। वह एक पं क्त हम उन लोग तक पहुँचा दे ती है जन्ह ने वास्तव म प्राचीन
संसार गढ़ा — और बताती है क वे मौन नह थे।
क्या आप जानते ह? यक्ष प्रकृ त से जुड़ा एक गौण दे वता है। यह मू त भारी आभूषण और चुन्नटदार अधोवस्त्र
वाली हृष्ट-पुष्ट, मुस्कराती आकृ त है, जसके हाथ ऊपर उठे हुए ह — यक्ष प्रायः ऊपर क संरचना को थामे हुए रूप
म गढ़े जाते ह।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 128
चे दय का आगमन — क लग क ओर लौटते हुए
प्र.1 क्या आपको पछले अध्याय म व णत क लग युद्ध का स्मरण है?
हाँ। क लग युद्ध स ाट अशोक ारा क लग (लगभग वतमान ओ डशा) पर कया गया आक्रमण था, जो लगभग 261 सा.सं.पू. म
हुआ। उसम हुए वनाश और जनहा न ने अशोक को इतना वच लत कया क उन्ह ने युद्ध ारा वजय (भेरीघोष) छोड़कर धम्म ारा
वजय (धम्मघोष) का माग अपनाया और इसे अपने शलालेख म अं कत करवाया।
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अध्याय आपको यह इस लए स्मरण कराता है क उसी क्षेत्र म आगे क्या हुआ :
लगभग 261 सा.सं.पू. — अशोक ारा किलंग की िवजय
185 सा.सं.पू. के बाद — मौय सामाज्य का पतन
→ किलंग पुन ः उभरा, अब चे िद वंश के अधीन एक पमुख शिक्त के रूप में
→ उसके महान शासक खारवेल ने अपनी उपलिब्धयाँ हाथीगुंफा अिभलेख में अंिकत करवाईं
यह क्य महत्वपूण है : यही अध्याय के शीषक वाला ‘पुनगठन' एक स्थान पर घ टत होते हुए दखता है। सा ाज्य
म मला लया गया क्षेत्र लुप्त नह हुआ; ज्य ही सा ाज्य दुबल हुआ, क लग अपने वंश, अपने राजधानी-क्षेत्र
(भुवनेश्वर के समीप) और पत्थर पर अं कत अपने इ तहास के साथ फर स्वतंत्र राज्य बन गया।
आइए वचार कर — पृष्ठ 129
उदय ग र-खंड ग र गुफाएँ और शैलकृत स्थापत्य
आइए वचार कर
प्र.1 लगभग दो सह ाब्द पूव के इन शैलकृत कक्ष क समरूपता पर ध्यान द जए। शल्पकार को केवल छे नी और
हथौड़ी से यह अ त दक्षता कैसे प्राप्त हुई होगी? कल्पना क जए क आप उस युग म एक शल्पी ह और अपने
कौशल से पत्थर को कला म रूपांत रत कर रहे ह। आप कन उपकरण का प्रयोग करगे?
चत्र 6.13.1 को फर दे खए : दो मं ज़ल म एक जैसे ार, एक जैसे कक्ष और समान अंतराल पर स्तंभ, और यह सब एक ही
पहाड़ी को काटकर। यहाँ कुछ जोड़ा नह गया — जो बचा है, वह पत्थर हटाने के बाद बचा है।
इतनी समरूपता कैसे संभव हुई :
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शल्पकार ने क्या इससे शुद्धता कैसे आई
कया
उपयुक्त च ान चुनी समान कण वाला, दरार-र हत बलुआ पत्थर एक जैसा कटता है
पहले रे खांक न िकया पहली चोट से पहले डोरी, साहुल और पट्ट से चट्टान पर रेखाएँ ख ची जाती थ
ऊपर से नीचे की ओर छत से आरंभ करने पर मचान क आवश्यकता नह रहती — नीचे क चट्टान स्वयं मंच बनी रहती है और मलबा
काटा तैयार भाग पर नह गरता
पहले मोटा, िफर बारीक भारी नोकदार औज़ार से बड़ा भाग हटाया गया, महीन छे नय से आकार दया गया, फर रगड़-पत्थर और बालू
काम से चकना कया गया
एक ही माप बार-बार हर ार के लए एक ही मापदं ड — यही ‘समरूपता' का रहस्य है
दोहराई
पिशिक्षत दलों में काम मुख्य शल्पी योजना बनाते, शष्य मोटा काम करते। कौशल पीढ़ -दर-पीढ़ हस्तांत रत होता रहा
िकया
य द म उस काल का शल्पी होता तो मेरे उपकरण होते :
लोहे का हथौड़ा और चट्टान तोड़ने के लए भारी लोहे क नोक।
व भन्न चौड़ाई क चपट और नोकदार छे नयाँ, तथा सतह समतल करने के लए दं तीदार छे नी।
खड़ी रेखाओं के लए साहुल (डोरी म बँधा पत्थर), समकोण के लए गु नया, माप दोहराने के लए मापदं ड और सीधी रेखाओं
के लए रंग म डू बी डोरी।
लकड़ी क फान — कट हुई खाँच म ठ ककर पानी डालने पर वे फूलती ह और चट्टान इ त रेखा पर चरती है।
अं तम चमक के लए बालू, पानी और रगड़-पत्थर; अँधेरे कक्ष म काम के लए तेल के द पक; मलबा ढोने के लए टोक रयाँ।
असली रहस्य : यहाँ शुद्धता बेहतर औज़ार से नह , व ध से आई — नापो, रेखांकन करो, चरण म काटो और एक
ही मानक दोहराओ। शेष काम लोहे क छे नी और धैय कर दे ते ह। आज का बढ़ई भी यही तक अपनाता है।
यह क जए : साबुन क ट कया पर प सल से एक ार बनाइए और भोथरे चाकू से ऊपर से नीचे क ओर खोखला
क जए। पाँच मनट म समझ आ जाएगा क क्रम क्य महत्वपूण है — मट्ट के वपरीत, पत्थर वापस नह जोड़ा जा
सकता।
आइए वचार कर — पृष्ठ 129
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चत्र 6.14 — द क्षण म राज्य और उनके चह्न
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a s em6.14 म दए गए मान चत्र म आप व भन्न राज्य के नाम के साथ कुछ व शष्ट चह्न भी दे ख सकते ह। ये
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चह्न क्या दशाते ह? वचार क जए क ये प्रत्येक राज्य क व शष्ट पहचान को कस प्रकार दशाते ह?
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चत्र 6.14 (पृष्ठ 130) — द क्षण म राज्य (सीमाएँ अनुमा नत ह और समय के साथ बदलती रही ह)।
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ये तीन राज्य के राज चह्न ह, जो प्रत्येक राज्य के भूभाग पर गड़े ध्वज पर बने ह। हर राज चह्न उस वंश क पहचान है — सक्क ,
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ध्वज , मुहर और अ भलेख पर उसका प्रतीक।
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राज्य ध्वज पर चह्न ( चत्र राजधानी चह्न क्या संकेत दे ता है
6.14)
चोल लाल ध्वज पर छलाँग उरैयूर श क्त और साहस, वन का सबसे बलशाली शकारी — उस वंश के लए उपयुक्त
लगाता बाघ जसने ‘अपनी सव च्चता स्था पत क '
चेर पीले ध्वज पर धनुष (और वं ज कौशल और पहुँच — यही धनुष पृष्ठ 133 के चत्र 6.18 के चेर सक्के पर भी
बाण) (करूर) दखता है
पाडं पीले ध्वज पर दो मदुरै समुद्र — पांड्य ‘एक महत्वपूण नौसै नक श क्त' थे और मो तय के लए प्र सद्ध
मछिलयाँ
ये चह्न व शष्ट पहचान कस प्रकार दशाते ह :
ये तुरंत पहचाने जाते ह — जो सै नक, व्यापारी या ग्रामवासी पढ़ नह सकता था, वह भी जान लेता था क कसका ध्वज
फहरा रहा है।
ये प्रत्येक राज्य क श क्त और भूगोल से मेल खाते ह : समुद्र श क्त के लए मछली, कावेरी क उपजाऊ भू म क स्थल-श क्त
के लए बाघ, प मी पहाड़ी-वन क्षेत्र के लए धनुष।
ये वंश को सतत पहचान दे ते ह, जो अलग-अलग राजाओं के भुला दए जाने के बाद भी बनी रहती है — इसी लए आज का
मान चत्रकार भी उन्ह का प्रयोग कर सकता है।
ये प्र त ं ता भी दशाते ह : एक छोटे मान चत्र पर तीन अलग राज चह्न उन तीन राज्य का चत्र ह जो “आपसी प्र त ं ता” म
लगे रहते थे।
क्या आप जानते ह? ये चह्न राज्य से भी अ धक जी वत रहे। मछ लय क जोड़ी और धनुष आज भी त मलनाडु
तथा केरल के प्रतीक और मं दर-कला म दखते ह, और बाघ आगे चलकर परवत चोल का स्थायी राज चह्न बना।
आइए वचार कर — पृष्ठ 132
चत्र 6.16 — ग्रड एनीकट स्मृ त उ ान म राजा क रकाल क प्र तमा
आइए वचार कर
प्र.1 राजा क मू त दे खए। इस मू त म राजा को कैसे दशाया गया है? उनक दे ह-मुद्रा, वस्त्र और मुख-मुद्रा उनके
साम य एवं प्र तष्ठा के वषय म क्या संकेत दे ते ह?
कस रूप म दशाया गया है। क रकाल को भव्य रूप से सजे हाथी पर आसीन दखाया गया है, त मलनाडु के ‘ग्रड एनीकट
स्मृ त उद्यान' के खुले प्रांगण म। वे ऊँचा मुकुट, बूटेदार उत्तरीय और श्वेत अधोवस्त्र धारण कए ह; गले, भुजाओं और कान म
आभूषण ह और चेहरे पर भरी हुई मूँछ। एक हाथ ऊपर उठा है, दूसरा सहज रूप से टका है। हाथी क पीठ पर अलंकृत झूल, स्वण-
वण साज और मस्तक पर चत्रकारी है।
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जो दखाई दे ता है साम य और प्र तष्ठा के वषय म संकेत
हाथी पर आसीन हाथी राजसी वाहन है — पालना महँगा, युद्ध और शोभायात्रा दोन म प्रयुक्त। जनसमूह से ऊपर होना स्वयं म पद
क घोषणा है
सीधी, सहज दे ह-मुद ा आत्म वश्वास और नयंत्रण। वे युद्ध के लए तने हुए नह , ब ल्क पहले से सत्ता-संपन्न व्य क्त क तरह बैठे ह
उठा हुआ हाथ प्रजा के प्र त अ भवादन, आशीवाद या आश्वासन क मुद्रा — राजा रक्षक है, भय का कारण नह
मुकु ट और बहुमूल्य संगम क व चोल, चेर और पांड्य को ‘मुकुटधारी राजा' कहते ह; मुकुट उसी दावे को दृश्य बनाता है
वस्त्र
शांत, गिरमामय मुख- भयंकर नह , ब ल्क ववेक और न्याय प्रय शासक — उस राजा के अनुरूप जसे कल्लनई जैसे जन हत-काय के
मुद ा लए स्मरण कया जाता है
सजा हुआ हाथी राज्य क समृ द्ध, जो पशु के साज-स ा तक म झलकती है
महत्वपूण, पर एक सावधानी : यह आधु नक स्मृ त-प्र तमा है, प्राचीन चत्र नह । क रकाल कैसे दखते थे, यह
कसी को ज्ञात नह । यह प्र तमा बताती है क आज त मलनाडु उन्ह कैसे स्मरण करता है — उस राजा के रूप म
जसका बनाया ग्रड एनीकट दो हजार वष बाद आज भी खेत को स च रहा है। प्र तमाएँ जतना अपने वषय के बारे
म बताती ह, उतना ही उन लोग के बारे म भी जो उन्ह स्था पत करते ह।
आइए वचार कर — पृष्ठ 133
चेर राजवंश — इ तहासकार प्राचीन व्यापार का पता कैसे लगाते ह
आइए वचार कर
प्र.1 क्या आपने कभी सोचा है क इ तहासकार कई शता ब्दय पहले सुदूर स्थत दो राज्य के बीच व्यापा रक संबंध
का पता कैसे लगाते ह? आइए, इस पर वचार- वमश कर क यह जानकारी कैसे प्राप्त क जाती होगी।
दो हजार वष पुराने बीजक या रसीद इ तहासकार के पास नह होत । वे यह चत्र अनेक प्रकार के साक्ष्य को मलाकर बनाते ह,
जो एक-दूसरे क पु ष्ट करते ह।
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साक्ष्य का यह व्यापार कैसे सद्ध करता है इस अध्याय से उदाहरण
प्रकार
दू र िमले िस क्के मुद्रा व्यापा रय के साथ चलती है; वदे शी सक्क सातवाहन सक्के गुजरात से आंध्र प्रदे श तक मले; द क्षण
का ढे र बताता है क वहाँ क्रय- वक्रय हुआ भारत म रोमन सक्के मलते ह
िस क्कों पर वे बताते ह क अथव्यवस्था म क्या महत्वपूण था दो मस्तूल वाले जहाज का सातवाहन सक्का — जहाज-
अंिकत िचत्र नमाण और समुद्र व्यापार का प्रमाण
उ त्खनन में िमली दूर दे श के मृ ांड, मनके, काँच या धातु कसी स्थल सातवाहन राज्य म काँच और सुगं धत मलहम का आयात
वस्तुए ँ पर व्यापार से ही पहुँच सकते ह
अिभले ख राजा और व्यापारी दान, कर और वस्तुओं का खारवेल लखते ह क उन्ह पांड्य राज्य से सैकड़ मोती प्राप्त
उल्लेख करते ह हुए
िवदे शी ले खकों के यात्री और अ धकारी अपने दे खे बंदरगाह का वणन मेगस्थनीज क इं डका पांड्य राज्य को समृद्ध और ग्रीस-रोम
िववरण करते ह से व्यापार करता बताती है
सािहत्य क व उन वस्तुओं और नगर का वणन करते ह जो सलप्प दकारम् हम “समृद्ध व्यापा रक नगर ” से होकर ले
उन्ह ने दे खे जाती है; संगम काव्य बंदरगाह का जीवन दशाते ह
यापार माग की
व् चुंगी-चौ कयाँ, वश्राम-स्थल और बंदरगाह बताते ह पुणे के पास नानेघाट गुफाएँ — कर-संग्रह और व्यापा रय के
संरचनाएँ क आवागमन कहाँ था वश्राम के लए
वस्तुओं की सामग्री क जाँच से पता चलता है क वह कहाँ क मनके के पत्थर या पात्र क मट्ट क जाँच से वस्तु का मूल क्षेत्र
वै ािनक जाँच खान या कहाँ क बनी है मल जाता है
एक साक्ष्य पयाप्त क्य नह : कसी खेत म मला एक रोमन सक्का बहुत कम सद्ध करता है — वह कसी एक
यात्री के पास आया हो सकता है या बहुत बाद म गरा हो सकता है। परंतु रोमन सक्के और रोमन मृ ांड और उसी
बंदरगाह का वणन करता ग्रीक लेखक और उन्ह वस्तुओं का नाम लेती त मल क वता — यह ऐसा प्रमाण बनाते ह
जो अकेला कोई साक्ष्य नह बना सकता। इ तहासकार इसे संपु ष्ट कहते ह।
यह क जए : कल्पना क जए क 3000 सा.सं. म कोई पुरातत्ववेत्ता आपक कक्षा खोदता है। कौन-सी वस्तुएँ
सद्ध करगी क आपके नगर का दूसरे स्थान से व्यापार था? सूची बनाइए और दे खए क उनम से कतनी को दूसरे
साक्ष्य क आवश्यकता पड़ती है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 133
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चत्र 6.18 — चेर राजाओं के सक्के
प्र.1 चेर राजाओं ने अपने शासनकाल म अनेक सक्के नगत कए। क्या आप यहाँ दए गए कसी एक सक्के पर चेर
राजवंश का राज चह्न दे ख पा रहे ह?
हाँ। यहाँ ताँबे के दो घसे हुए सक्के दए गए ह। दा हनी ओर वाले सक्के पर एक लंबा वक्र और उसके आर-पार जाती सीधी
रेखा दखाई दे ती है — यही धनुष-बाण है, चेर वंश का राज चह्न। यह वही चह्न है जो कुछ पृष्ठ पहले द क्षण के राज्य के मान चत्र
( चत्र 6.14, पृष्ठ 130) म चेर ध्वज पर दखा था।
चत्र 6.18 का सक्का उस पर क्या दखता है
बायाँ िसक्का खड़ा हुआ कोई पशु, संभवतः हाथी, और उसके आस-पास धुँधले चह्न
दायाँ िसक्का धनुष-बाण — चेर राजिचह्न — और उसके ऊपर कु छ अन्य िघसे हुए पतीक
राजा अपना चह्न सक्के पर क्य अं कत करता है : सक्का एक छोटा, कठोर, आसानी से चलने वाला सरकारी
संदेश है। राज चह्न एक साथ तीन बात कहता है — यह मुद्रा कसने जारी क , इसके भार और धातु पर भरोसा
कया जा सकता है, और चेर राजा क सत्ता वहाँ-वहाँ तक है जहाँ-जहाँ यह सक्का पहुँचता है। इसी लए
इ तहासकार के लए सक्के इतने मूल्यवान साक्ष्य ह।
संकेत : प्राचीन सक्के प्रायः जंग खाए और घसे होते ह। स्पष्ट चत्र के बजाय आकृ त क रूपरेखा खो जए —
यहाँ एक लंबा वक्र और एक सीधी रेखा ही धनुष पहचानने के लए पयाप्त है।
आइए वचार कर — पृष्ठ 134
पांड्य वंश — व्यापार म मो तय का महत्व
आइए वचार कर
प्र.1 पांड्य राज्य मो तय के लए प्र सद्ध था। आपके वचार म मोती उस समय व्यापार क दृ ष्ट से क्य महत्वपूण था?
क्य क उस युग के दूरगामी व्यापारी को जो-जो गुण चा हए थे, वे लगभग सभी मोती म थे।
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मोती का गुण इससे व्यापार म उसका महत्व क्य
दुल भ, िगने-चुने स्थानों m मोती क सी पयाँ वशेष समुद्र जल म ही पलती ह — पांड्य तट क मन्नार क खाड़ीla
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वश्व ोत म थी।
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पर दुलभता ऊँचा मूल्य तय करती है
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aछोटा ल् मु भर मोती अनाज से लदे जहाज के बराबर मूल्यवान हो सकते थे। लंबी और जो खम भरी यात्रा म कम भार म
बहमु ूल्य अ धक मूल्य ही व्यापारी को चा हए
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न सड़ ता, न जंग लगती मसाल या वस्त्र के वपरीत मोती महीन क समुद्र यात्रा और वष का भंडारण सह लेता है
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िबना गढ़ े ही सुंद र ag या चमकाने क आवश्यकता नह — समुद्र से नकालकर सीधे बेचा जा सकता है
रत्न क तरह मोती को तराशने
पितष्ठा का पतीक
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भारत, रोम और प म ए शया के राजा-रानी और कुलीन वग मोती धारण करते थे। माँग उन्ह से आती थी जनके
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पास व्यय करने को सबसे अ धक था
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संिचत धन और
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मोती कोष भी थे और राजक य उपहार भी — खारवेल लखते ह क उन्ह पांड्य राज्य से सैकड़ मोती प्राप्त हुए
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agl राज्य के लए इसका अथ : मो तय ने पांड्य को समृद्ध और दूर-दूर तक प्र सद्ध बनाया। मेगस्थनीज उनके राज्य
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को समृद्ध कहते ह और रोमन लेखक भारतीय मो तय क प्रशंसा करते ह। इस समृ द्ध से सुदृढ़ प्रशासन और वह
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नौसै नक श क्त बनी जसका उल्लेख अध्याय करता है — और मजबूत नौसेना बदले म मोती-क्षेत्र क रक्षा करती
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थी। व्यापार और श क्त एक-दूसरे को पो षत करते रहे।
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क्या आप जानते ह? मोती नकालना कुशल और जो खम भरा काम था; गोताखोर एक ही रस्सी के सहारे साँस
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रोककर बार-बार गहराई म उतरते थे। मोती के ऊँचे मूल्य म उस गोताखोर का जो खम भी स म्म लत था।
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a आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 135
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इंडो-ग्रीक आक्रमण — चत्र 6.20, एक इंडो-ग्रीक चाँद का सक्का
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आइए पता लगाएँ
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प्र.1 आपके वचार म कुछ इंडो-ग्रीक सक्क पर वासुदेव-कृष्ण या लक्ष्मी जैसे दे वी-दे वताओं के चत्र अं कत होने का
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क्या अथ रहा होगा?
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emइसका अथ है क इंडो-ग्रीक शासक अपनी भारतीय प्रजा से उसी भाषा म बात कर रहे थे जसे वह समझती थी — और यह
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agl भी क वे स्वयं भारतीय देवताओं को स्वीकार करने लगे थे।
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अ धकांश इंडो-ग्रीक सक्क पर एक ओर राजा और दूसरी ओर ग्रीक दे वता होते ह। जब कसी सक्के पर उनके स्थान पर वासुदेव-
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कृष्ण ( चत्र 6.20 के चौकोर चाँद के सक्के पर चक्र और गदा जैसी वस्तु लए हुए) या लक्ष्मी आ जाते ह, तो कुछ बदल चुका होता
है। संभा वत अथ, जनका आधार अध्याय e मm
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l शासक को चा हए था क उनके सक्के भारतीय व्यापा रय से भरे बाज़ार म चल।
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1. स्वीकृ त पाना। वजेता बनकर
प र चत दे वता ने मुद्रा को — और शासक को — स्वीकाय बनाया।
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2. स्थानीय आस्थाओं को सचमुच अपनाना। अध्याय कहता है क वे “समृद्ध स्थानीय संस्कृ त से बहुत प्रभा वत हुए”।
हे लयोडोरस स्तंभ इसका प्रमाण है : एक इंडो-ग्रीक राजदूत वासुदेव को ‘दे वताओं का दे वता' कहते ह और तीन उपदे श
अं कत कराते ह — आत्म-संयम, दान, चेतना।
3. एक राजनी तक संदेश। राजक य मुद्रा पर भारतीय दे वता का अथ है — अब यह भू म हमारी भी है।
4. लक्ष्मी क दशा म समृ द्ध। सक्का धन का प्रतीक है और लक्ष्मी धन क दे वी — मुद्रा के लए अत्यंत उपयुक्त चत्र।
5. सांस्कृ तक संगम का साक्ष्य। एक ओर ग्रीक ल प और ग्रीक शैली का मुख- चत्र, दूसरी ओर भारतीय दे वता : एक छोट -सी
वस्तु पर दो संसार मलते हुए।
सक्के इतने अ े साक्ष्य क्य : अध्याय बताता है क इंडो-ग्रीक सक्क से ही “हम इन शासक के बारे म
अ धकांश जानकारी मली है”। सोने, चाँद , ताँबे और गलट के ये सक्के तब भी बचे रहते ह जब भवन और ग्रंथ नष्ट
हो जाते ह — और चूँ क वे राज्य ारा जारी होते थे, उन पर अं कत प्रत्येक चत्र सोच-समझकर चुना गया होता था।
संकेत : दो पृष्ठ आगे क नष्क के सक्क क व्याख्या भी इसी तक से होती है — एक पर बुद्ध, दूसरे पर नंद स हत
शव। वदे शी मूल के शासक ने बार-बार मुद्रा के माध्यम से अपनी प्रजा क आस्थाओं का सम्मान प्रकट कया।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 136
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कुषाण का उदय — चत्र 6.22, क नष्क क सर वहीन मू त
आइए पता लगाएँ
प्र.1 इस वशाल मू त (1.85 मीटर ऊँची) को ध्यान से दे खए। इसके वस्त्र, आयुध और जूत को दे खए। इनसे इस
आकृ त के बारे म क्या पता चलता है?
मू त म क्या-क्या दखाई दे ता है :
1.85 मीटर ऊँची एक खड़ी आकृ त, हल्के चत्तीदार बलुआ पत्थर क । सर और कंध से नीचे के
दोन हाथ टू टे हुए ह; कंध से नीचे का धड़ बचा है, जो एक काले आधु नक चबूतरे पर टका है।
उसने घुटन से नीचे तक जाता भारी सला हुआ लंबा कोट पहन रखा है, जो सामने से खुला है और
कमर पर चौड़ी पेट बँधी है; कपड़ा कड़ी, सीधी, बराबर दूरी क चुन्नट म गरता है।
कोट के नीचे टखन तक आता ढ ला पाजामा है।
बाईं ओर म्यान म एक लंबी सीधी तलवार लटक है और टू टा हुआ बायाँ हाथ उसक मूठ पर टका
था। दा हनी ओर एक भारी गदा — मोटे गोल सरे वाला डंडा — खड़ी है, जसका दं ड टू टे हुए
दा हने हाथ म था।
पैर म बड़े, मोटे , मुलायम जूते ह, जनके पंजे बाहर क ओर मुड़े ह; पैर चौड़े और दृढ़ता से जमे हुए
ह।
चत्र 6.22 (पृष्ठ 136) — वही वशाल मू त जसके बारे म यह प्रश्न है; छाया चत्र, जसका वणन यहाँ दया गया है। चत्र
स्वयं पाठ्यपुस्तक म दे खए।
सर न होने पर भी यह मू त लगभग सब कुछ बता दे ती है। यह राजा क नष्क क है, जो संभवतः कुषाण वंश के सबसे श क्तशाली
शासक थे — उस पर ा ी ल प म अं कत है : ‘महाराजा राजा धराज दे वपुत्र क नष्क'।
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जो दखाई दे ता है उससे क्या पता चलता है
घुटनों से नीचे तक जाता भारी िसला यह मध्य ए शयाई वेशभूषा है, भारतीय नह । ठं डे प्रदे श और घुड़सवारी के अनुकूल — कुषाण
हआ
ु लंबा कोट, नीचे पाजामा “मूलतः मध्य ए शया के नवासी थे”। वे जैसे थे वैसे ही दखाए गए ह : वदे शी मूल के शासक, और
इस पर संकोच नह
भारी ग े द ार जूते, पैर चौड़ े जमाए हएु घुड़सवारी के जूते — फर वही अश्वारोही परंपरा। पैर का जमाव स्थरता, अ धकार और दृढ़ता
दशाता है
बाईं ओर लटकती लंबी तलवार और वे योद्धा राजा ह। गदा जतनी शस्त्र है, उतनी ही आदे श-सत्ता का प्रतीक भी
दािहने हाथ में बड़ ी गदा या छोटी
तलवार
आकार : 1.85 मीटर — पूण मानव- यह दे खे जाने और ऊपर उठकर दे खे जाने के लए बनी थी — कसी सावज नक दे वकुल या सभा-
आकार से भी बड़ ा भवन के लए, नजी कक्ष के लए नह
वस्त्र के िनचले िकनारे पर बा ी उन्ह ने स्थानीय ल प और भारतीय राजक य उपा धयाँ अपनाईं — वदे शी शासक स्वयं को
अिभले ख भारतीय स ाट के रूप म प्रस्तुत करता है
सादी, अलंक रण-रिहत सतहे ं यहाँ श क्त आभूषण से नह , वस्त्र और शस्त्र से दशाई गई है — पृष्ठ 123 क शुंग आकृ तय से
बलकुल भन्न
बड़ी बात : यह मू त चलते हुए समावेशन का चत्र है। मध्य ए शयाई कोट, जूते और तलवार; भारतीय पत्थर,
भारतीय ल प और भारतीय उपा धयाँ; और राजक य प्र तमा स्था पत करने क कल्पना भी। वे कुषाण होना नह
छोड़े, और भारतीय स ाट बन गए।
क्या आप जानते ह? सर बहुत पहले खं डत हो गया था, इसी लए यह ‘ सर वहीन' क नष्क के रूप म प्र सद्ध है।
यह मथुरा के नकट मात नामक स्थान से प्राप्त हुई — उसी क्षेत्र से, जसके नाम पर इस अध्याय क एक प्रमुख
कला शैली का नाम पड़ा।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 136
चत्र 6.23 — क नष्क के सक्के
आइए पता लगाएँ
प्र.1 इन सक्क को ध्यान से दे खए। स ाट के अ त रक्त और कौन इस मुद्रा पर अं कत है?
स ाट के अ त रक्त इन सक्क पर दो दे वता अं कत ह — महात्मा बुद्ध, और अपने वाहन नंद के साथ शवजी।
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सक्का एक ओर दूसरी ओर
पथम िस क्का वेद के पास खड़े क नष्क, हाथ म भाला, उपा ध महात्मा बुद्ध, पभामंडल सिहत खड़ े हुए , गीक िलिप में BOΔΔO
‘राजा धराज' (बुद्ध) अंिकत
ि तीय पुनः स ाट, वेद के पास िशवजी, साथ में बैल नंद ी
िस क्का
दे खते समय तीन बात पर ध्यान द जए :
ये सक्के स्वण के ह — रेशम माग के व्यापार से कुषाण अत्यंत समृद्ध थे।
कनारे पर लेख ग्रीक अक्षर म है, जो इंडो-ग्रीक से मली परंपरा है — अथात् एक ही सक्के पर मध्य ए शयाई राजा, भारतीय
दे वता और ग्रीक ल प।
स ाट सदै व वेद के पास आहु त दे ते हुए दखाए गए ह — वे केवल शासन नह कर रहे, उपासना भी कर रहे ह।
संकेत : अगले ही पृष्ठ पर पूछा गया है क एक श क्तशाली शासक ने ऐसा क्य कया होगा। यह नरीक्षण साथ
र खए — उस प्रश्न का उत्तर सीधे इसी पर टका है।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 137
‘आइए, नम्न ल खत बदुओं पर वचार कर' — क नष्क के सक्क का अथ
प्र.1 क्य एक श क्तशाली शासक ने अपने सक्क पर महात्मा बुद्ध और शवजी को अं कत कया होगा? यह उसके
मूल्य और प्राथ मकताओं के बारे म क्या दशाता है?
क्य क सक्का कसी शासक का सबसे दूर तक पहुँचने वाला सावज नक वक्तव्य था, और क नष्क ने उसके ारा यह कहा क
उनका राज्य हर मत के लोग का है।
कारण मूल्य और प्राथ मकताओं के वषय म यह क्या दशाता है
सभी आस्थाओं का एक सक्के पर बुद्ध, दूसरे पर शव — उन्ह ने प्रजा पर कोई एक मत नह थोपा। अध्याय बताता है क कुषाण
स म्मान मू तकला म भी “ व वध दे वताओं का चत्रण मलता है, जो व भन्न वचारधाराओं के शां तपूण सह-अ स्तत्व को
दशाता है”
िमि त सामाज्य की उनका सा ाज्य मध्य ए शया से उत्तर भारत तक फैला था, जसम बौद्ध, शव-उपासक, ग्रीक और ईरानी सभी थे।
िनष्ठा जीतना उनके दे वताओं का सम्मान बल क अपेक्षा सा ाज्य को अ धक मजबूती से जोड़ता था
अपनापन वदे शी मूल का शासक अपनी मुद्रा पर भारतीय दे वता अं कत कर यह कहता है — यह मेरी भू म है और ये मेरे भी
दे वता ह
यिक्तगत आस्था
व् वे वेद पर आहु त दे ते हुए दखाए गए ह — ऐसा राजा जो केवल आदे श नह दे ता, उपासना भी करता है
यापार और पितष्ठा
व् सक्के रेशम माग पर यात्रा करते थे। प र चत और आदरणीय चत्र उनके स्वण को समस्त ए शया म स्वीकाय बनाते थे
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यह उल्लेखनीय क्य है : वे “कुषाण वंश के सबसे श क्तशाली शासक” थे और चाहते तो एक ही मत को अ नवाय
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म भी पाता है.।coभन्न- भन्न मूल के शासक ारा बार-बार कया गया यही चुनाव वह है जसेgपुlस्तक ‘भारतीय
कर सकते थे। इसके स्थान पर उन्ह ने बहुलता चुनी — वही मूल्य जो अध्याय खारवेल म, सातवाहन
e mदृ ष्ट' कहती है। a
सांस्कृsतक
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प्र.2 क्या आप आज के कुछ आधु नक उदाहरण जानते ह, जहाँ मुद्राओं पर प्रतीकात्मक चत्र अं कत कए जाते ह?
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हाँ — आपक जेब का हर नोट और सक्का चुने हुए प्रतीक लए हुए है। पहले भारतीय मुद्रा दे खए।
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आधु नक वह क्या कहना चाहता है
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उदाहरण
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a हर भारतीय नोट सारनाथ का सह-शीष (राज्य- चह्न) और अशोक गणराज्य क सत्ता, और अशोक से जानबूझकर जोड़ा गया
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चक्र सूत्र — ठ क वैसा ही उधार जैसा क नष्क के सक्क म
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दखता है
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भारतीय नोटों का
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स्मारक और उपल याँ — लाल कला, कोणाक राष्ट्रीय धरोहर और गौरव; नोट भारत के इ तहास और वज्ञान
िपछला भाग का सूय मं दर, साँची स्तूप, मंगलयान, रानी क वाव क एक छोट प्रदशनी ह
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सभी भारतीय नोट भाषा-पट्ट पर 17 भाषाओं म मूल्य मुद्रा पर छपी ‘ व वधता म एकता' — एक दे श, अनेक
भाषाएँ
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मारक.cिस agरखना चाहता है
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स् क् वषगाँठ पर जारी चत्र और चह्न — कोई नेता, राष्ट्र जसे स्मरण
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कोई आंदोलन, कोई संस्था
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यूरो के नोट पर पुल और ार जो कसी एक दे श पुल = राष्ट्र के बीच जुड़ाव; राजा = सत्ता का ोत
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टश सक्क पर राजा या रानी
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अप रव तत तक : मुद्रा दे श के हर हाथ से गुज़रती है। इस लए जो उसे जारी करता है, वह उस पर वही चत्र अं कत
करता है जो वह सबको दखाना और स्वीकार कराना चाहता है। क नष्क के स्वण सक्के और आज के ₹500 के
नोट के बीच दो हजार वष ह, पर चत्र के पीछे का तक बलकुल वही है।
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g और प्रत्येक के बारे म एक पं क्त
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sem ल खए क वह क्या कहना चाहता है। फर अपनी सूची क तुलना पृष्ठ 137 पर क नष्क के सक्क के वणन से
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आइए वचार कर — पृष्ठ 137
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गांधार कला शैली
आइए वचार कर
प्र.1 क्या आप जानते ह क गांधार कहाँ है? क्या यह आपको महाकाव्य महाभारत के कसी पात्र क याद दलाता है?
गांधार कहाँ था। गांधार उपमहा प के उत्तर-प म का प्राचीन प्रदे श था — पेशावर और स्वात क घा टयाँ, तक्ष शला से लेकर
काबुल क ओर तक; अथात् वतमान उत्तर-प मी पा कस्तान और पूव अफगा नस्तान। अध्याय इस कला शैली को “पंजाब के
प मी भाग ” म वक सत बताता है। यही वे माग थे जनसे इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण भारत म आए — और इसी लए वहाँ क
कला म ग्रीक-रोमन तथा भारतीय तत्व का मेल दखता है।
महाभारत से संबंध। हाँ — गांधारी, जनके नाम का अथ ही है ‘गांधार क कन्या'। वे गांधार क राजकुमारी थ , जनका ववाह
नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र से हुआ और जन्ह ने प त क स्थ त म सहभागी होने के लए स्वयं अपनी आँख पर पट्ट बाँध ली। वे सौ
कौरव क माता थ , जनम ज्येष्ठ दुय धन थे। उनके भाई थे शकु न, गांधार के राजकुमार, जनके द्यूत-क्र ड़ा के कारण पांडव को
वनवास हुआ।
गाधं ार (पदे श) → गाधं ारी (‘गाधं ार की') → धृत रा की पत्नी, कौरवों की माता
उनके भाई : शकु िन , गांधार के राजकु मार
नाम का महत्व : गांधार कोई वदे शी भू म नह थी जहाँ संयोगवश भारतीय कला बन गई हो। भारत के अपने
महाकाव्य म उसका उल्लेख उस राज्य के रूप म है जसक राजकुमारी ह स्तनापुर के राजप रवार म ब्याही गई। ग्रीक
शैली के आने से बहुत पहले वह क्षेत्र भारतीय जगत का अंग था — इसी लए वहाँ क मू तकला समन्वय है, आयात
नह ।
क्या आप जानते ह? अफगा नस्तान का कंधार नगर आज भी उस प्राचीन नाम क स्मृ त संजोए है, और अशोक ने
वहाँ अपना एक शलालेख छोड़ा — ग्रीक और आरामाइक भाषा म, ता क उस क्षेत्र के लोग उसे पढ़ सक।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 140
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चत्र 6.27 (पृष्ठ 141) — मथुरा और गांधार शैली क पहचान
आइए पता लगाएँ
प्र.1 अब आप मथुरा और गांधार कला शै लय क मूल वशेषताओं से प र चत हो चुके ह। अगले पृष्ठ पर चत्र 6.27 म
द गई कलाकृ तय को दे खए और पहचा नए। क्या आप बता सकते ह क चत्र म द गई प्रत्येक कलाकृ त कस
कला शैली से संबं धत है? अपने वचार कारण स हत ल खए और सहपा ठय के साथ चचा क जए।
चत्र 6.27 क छह कलाकृ तयाँ, पुस्तक के क्रमांक के अनुसार :
6.27.1 बुद्ध के महाप र नवाण का दृश्य — गहरे स्लेट -काले पत्थर क आयताकार उत्क ण
प का : बुद्ध एक शय्या पर करवट लेटे ह, पीछे शोकाकुल जन खड़े ह और नीचे क प म बैठ
हुई आकृ तयाँ ह।
6.27.2 बो धसत्व मैत्रेय — गहरे स्लेट -काले पत्थर म लगभग गोल तराशी गई खड़ी आकृ त; मूँछ,
मुकुट जैसी केश-स ा, भारी आभूषण, एक हाथ म कमंडल और गहरी चुन्नट म गरता वस्त्र।
6.27.3 कुषाण भक्त ारा पू जत शव लग — चत्तीदार लाल बलुआ पत्थर क टू ट प का;
ऊपर शव लग और नीचे गोल-मटोल खड़ी आकृ तयाँ।
6.27.4 दो ना गय के बीच एक नाग, जस पर क नष्क के शासन के आठव वष का उल्लेख करता
अ भलेख है — हल्के लाल बलुआ पत्थर क खड़ी प का; साँप के फण के नीचे एक चौड़ी खड़ी
आकृ त, दोन ओर एक-एक छोट आकृ त, और आधार पर अ भलेख क एक पं क्त।
6.27.5 युद्ध के दे वता का तकेय और अ ग्न के दे वता अ ग्न — चत्तीदार लाल बलुआ पत्थर का
फलक, जसम दो भारी खड़ी आकृ तयाँ ह; एक के हाथ म भाला और दूसरे के चार ओर ज्वालाएँ।
6.27.6 खड़े बुद्ध — गहरे स्लेट -काले पत्थर क ऊँची आकृ त, उत्क ण चौक पर खड़ी; सर के
पीछे बड़ा गोल प्रभामंडल, लहरदार केश और दोन कंध को ढकता वस्त्र, जसक चुन्नट पास-पास
और नय मत ह।
चत्र 6.27 (पृष्ठ 141) — छह कलाकृ तयाँ; छाया चत्र, जनका वणन यहाँ दया गया है। चत्र स्वयं पाठ्यपुस्तक म
दे खए।
पहले दो कसौ टयाँ मन म बठा ली जए — पत्थर और आकृ त का गठन।
गांधार शैली मथुरा शैली
पत्थर ले टी-काला िशस्ट
स् लाल (पायः िचत्तीदार) बलुआ पत्थर — कभी हल्का पीला
प्रभाव ग्रीक-रोमन तथा भारतीय तत्व का समायोजन व शष्ट भारतीय; ग्रीको-रोमन प्रभाव बहुत कम
आकृ तयाँ यथाथ शरीर-रचना, गहरी चुन्नट वाले उड़ते वस्त्र, मृदुलाकार (गोल-मटोल) चकनी आकृ तयाँ, शरीर से चपके
लहरदार केश, सूक्ष्म ववरण पतले वस्त्र, चौड़े मुख
वषय प्रायः बुद्ध और बो धसत्व क प्र तमाएँ तथा बुद्ध-जीवन बुद्ध के साथ-साथ भारतीय दे वी-दे वता — कुबेर, लक्ष्मी, शव,
के दृश्य का तकेय, यक्ष-य क्षणी, नाग
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अब छह कलाकृ तय पर यही कसौट लगाइए :
क्र. कलाकृ त शैली कारण
1 बुद्ध के प र नवाण का दृश्य गाधं ार स्लेट -काला शस्ट; भीड़भरा कथात्मक फलक; लेटे हुए बुद्ध पर गहरी,
यथाथ चुन्नट; शोकाकुल जन के अलग-अलग मुख और मूँछ — ग्रीक-रोमन
गठन
2 बो धसत्व मैत्रेय गांधार गहरा नीला-स्लेट शस्ट; लहरदार केश, मूँछ, भारी आभूषण और रोमन
‘टोगा' जैसी गहरी चुन्नट म गरता उत्तरीय; छरहरा, शरीर-रचना के अनुसार
गढ़ा शरीर
3 कुषाण भक्त ारा शव लग क मथुरा व शष्ट चत्तीदार लाल बलुआ पत्थर; भारतीय, अ-बौद्ध वषय; सपाट और
पूजा सरलता से गढ़ आकृ तयाँ
4 दो ना गन के बीच एक नाग, मथुरा हल्का लाल बलुआ पत्थर; सर के पीछे फण का छत्र लए वशुद्ध भारतीय
क नष्क के आठव वष का उल्लेख लोक-दे वता; भारी गोल शरीर; कुषाण राजवष का ा ी लेख — मथुरा ही
करता शलालेख कुषाण का भारतीय कला-कद्र था
5 का तकेय (युद्ध के दे वता) एवं मथुरा चत्तीदार लाल बलुआ पत्थर; भारतीय दे वता; चौड़े मुख, भरे हुए शरीर,
अ ग्नदे व चकनी सतह, उथला उभार
6 दं ड मुद्रा म महात्मा बुद्ध (खड़े बुद्ध) गांधार गहरा शस्ट पत्थर; बड़ा सादा प्रभामंडल; दोन कंध को ढकता उत्तरीय, जो
लगातार लहरदार चुन्नट म गरता है — गांधार बुद्ध क पहचान
गांधार : 1, 2, 6 · मथुरा : 3, 4, 5
सबसे तेज़ कसौट : पहले रंग, फर वषय। गहरा स्लेट पत्थर और भारी चुन्नटदार वस्त्र → गांधार। लाल या हल्का
बलुआ पत्थर और भरी- चकनी भारतीय आकृ त → मथुरा। फर वषय जाँ चए : नाग, यक्ष, का तकेय या शव लग
प्रायः मथुरा ही ह गे।
संकेत : कारण लखते समय सदै व दो वशेषताएँ बताइए — सामग्री और आकृ त क कोई एक बात। अकेली एक
वशेषता भ्र मत कर सकती है, क्य क बुद्ध क प्र तमाएँ दोन शै लय म बन ।
आगे बढ़ने से पहले… — पृष्ठ 142–143
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चार बदुओं म अध्याय, चत्र 6.28 क समय-रेखा के साथ
आगे बढ़ने से पहले …
प्र.1 मौय सा ाज्य के वघटन के प ात भारतीय उपमहा प म कई छोटे -बड़े राज्य का उदय हुआ।
यही पूरा अध्याय एक पं क्त म है। पृष्ठ 119 का चत्र 6.2 इसे दखा दे ता है — जहाँ एक सा ाज्य था, वहाँ अब नौ श क्तयाँ
मान चत्र बाँटे हुए ह।
क्षेत्र राज्य कससे याद रख
उत्तर एवं मध्य शुंग लगभग 185 सा.सं.पू. म पुष्य मत्र शुंग ारा स्था पत; अश्वमेध यज्ञ; भरहुत क वे दकाएँ
भारत
किलंग (पूव तट) चेिद खारवेल, ‘ भक्षु-राजा'; हाथीगुंफा अ भलेख; उदय ग र-खंड ग र गुफाएँ
दक्कन सातवाहन अमरावती और प्र तष्ठान; जहाज वाले सक्के; गौतमीपुत्र शातकण ; नानेघाट और काल
गुफाएँ
सुदू र दिक्षण चोल , चेर, पांड संगम काव्य के तीन ‘मुकुटधारी राजा' : उरैयूर, वं ज (करूर), मदुरै
उत्तर-पि चम इंडो-गीक , शक , हे लयोडोरस स्तंभ; शक संवत; क नष्क और रेशम माग
कु षाण
इतने राज्य क्य उभरे : इनम से अ धकांश नए जन नह थे। ये वही अधीनस्थ राज्य थे जो पहले मौय अधीनता
स्वीकार करते थे। कद्र के ढहते ही उन्ह ने कर दे ना बंद कया और अपने नाम से शासन करने लगे।
प्र.2 आंत रक संघष के साथ-साथ अनेक वदे शी आक्रमण भी हुए, जसके फलस्वरुप राजनी तक श क्तय के
पुनगठन क प्र क्रया आरंभ हुई।
एक ही समय म काम करते दो अलग-अलग दबाव मान चत्र को बार-बार बदलते रहे।
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 पुनगठन का काल
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आंत रक संघष वदे शी आक्रमण
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coड्यmआपस म; खारवेल का द क्षणी राजाओं के महासंघ
और.पां सीमा से प्रवेश करते हुए a g l
कौन शुंग के पड़ो सय से युद्ध (संभवतः सातवाहन से भी); चोल, चेर इंडो-ग्रीक, फर शक, फर कुषाण — सभी उत्तर-प मी
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से संघष
क्य क्षेत्रीय नयंत्रण, वशेषकर सीमावत क्षेत्र पर — उन पर मौय पतन के बाद “उत्तर-प म का क्षेत्र दुबल हो गया
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अ धकार ही सा ाज्य को आक्रमण से बचाता था जससे भारतीय उपमहा प बाह्य आक्रमण के लए
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असुर क्षत हो गया”
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साधन
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युद्ध, तथा शां तपूण उपाय वैवा हक गठबंधन वजय — और उसके बाद, प्रत्येक बार, बसना तथा समा हत
होना
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प रणाम वनाश नह , पुनगठन था। राज्य उठते, गरते और बदलते रहे — शुंग लगभग एकem
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gl होते आ थक पतन से
शताब्द चले;
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emडत हुआ, जससे “क्षेत्रीय श क्तय को अपनी सत्ता स्था पत करने या पुनः प्र त ष्ठत करने का अवसर मला”।
सातवाहन
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वखं
a हर पतन एक नया आरंभ भी था।
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प्र.3
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इस काल म भन्न- भन्न संस्कृ तय के बीच संवाद और सांस्कृ तक आदान-प्रदान के ारा कला, स्थापत्य और
मुद्रण जैसी नई शै लय का वकास हुआ। इन शै लय म भारतीय वषय क प्रधानता दखाई द तथा संस्कृत
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सा हत्य का चरमोत्कष हुआ।
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इस वाक्य के दो शब्द ध्यान से दे खए : ‘संवाद' — अथात् एक संस्कृ त ारा दूसरी क वजय नह — और ‘भारतीय वषय क
a gl प्रधानता'।
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क्षेत्र संवाद से क्या बना
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कला
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गांधार शैली (ग्रीक-रोमन गठन, स्लेट -काला शस्ट, उड़ते वस्त्र) और मथुरा शैली (लाल बलुआ पत्थर, गोल-मटोल भारतीय
आकृ तयाँ)। दे वताओं को मनुष्य जैसा दखाया जाने लगा — जैसे सूय
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थापत्य जैन और बौद्ध भक्षुओं के लए शैलकृत गुफाएँ — उदय ग र-खंड ग र, काल, पीतलखोरा; भरहुत क उत्क ण वे दकाएँ; और
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धा मक कला का वकास, जसने उपमहा प म “बाद क मं दर वास्तुकला के लए आधार तैयार कया”
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मुदo
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इंडो-ग्रीक सक्क पर ग्रीक ल प के साथ भारतीय दे वता; क नष्क के स्वण पर बुद्ध और शव; सातवाहन तथा चेर सक्क पर
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सािहत्य संस्कृत दशन और सा हत्य क प्रमुख भाषा बनी; पतंज ल ने योग सूत्र संक लत कए; महाभारत और रामायण का संकलन
हुआ; द क्षण म संगम काव्य-संग्रह और सलप्प दकारम्
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भारतीय वषय प्रमुख क्य बने रहे : नवागंतुक थोड़े थे और स्थानीय जनसंख्या वशाल, जसक परंपराएँ प्राचीन
और आत्म वश्वासी थ । वदे शी तकनीक का स्वागत हुआ — गठन, वस्त्र क चुन्नट, मुख- चत्र वाले सक्के — परंतु
उनका उपयोग भारतीय वषय को दखाने के लए कया गया : बुद्ध, शव, लक्ष्मी, यक्ष और नाग। समावेशन का
यही अथ है।
प्र.4 यह काल आंत रक और बाह्य व्यापा रक ग त व धय म उल्लेखनीय वकास का समय भी रहा।
व्यापार वह सूत्र है जो अध्याय के हर भाग से होकर गुज़रता है।
साक्ष्य वह क्या दशाता है
गुजरात से आंध पदे श तक िमले भारत के प मी और पूव तट के बीच वस्तुओं और मुद्रा का आवागमन — आंत रक व्यापार
सातवाहन िस क्के
उ न्ही ं िस क्कों पर जहाज (िचत्र 6.8) पाल स हत दो मस्तूल और नीचे लहर — उन्नत जहाज- नमाण एवं नौप रवहन
नानेघ ाट गुफ ाएँ प्रमुख व्यापार माग पर कर-चौक , जो व्यापा रय का वश्राम-स्थल भी थी — व्यापार संग ठत था
और उस पर कर लगता था
िनय त मसाले, वस्त्र, चंदन, स्वणाभू षत मोती, हाथी दाँत, लकड़ी — रोमन सा ाज्य और प म ए शया
तक
आयात काँच और सुगं धत मलहम
रे शम माग (िचत्र 6.25) कुषाण ने इसके महत्वपूण भाग पर नयंत्रण रखा, जससे भारत ए शया के अन्य भाग और प म
से जुड़ा
खारवेल के मोती; पांड ों पर मेगस्थनीज वला सता क वस्तुओं के दूरगामी व्यापार का ल खत प्रमाण
संघष के युग म व्यापार क्य बढ़ा : क्य क व्यापार को एक सा ाज्य नह , माग, मुद्रा और माँग चा हए — और ये
तीन उपलब्ध थे। राज्य क आय कर और शुल्क से होती थी, इस लए माग और बंदरगाह चालू रखना हर शासक के
हत म था, चाहे लड़ाई कसी से भी चल रही हो।
संकेत : ‘आगे बढ़ने से पहले…' के चार बदु एक पृष्ठ का उत्तम पुनरावलोकन बनाते ह — अनेक राज्य →
आंत रक संघष और वदे शी आक्रमण → सांस्कृ तक संवाद → समृद्ध व्यापार।
प्रश्न और क्रयाकलाप — पृष्ठ 143
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अध्याय के अंत का अभ्यास
प्र.1 मौय त्तर काल को पुनगठन का काल क्य कहा जाता है?
क्य क जो क्षेत्र मलकर एक सा ाज्य बने थे, उनका पुनगठन कर परस्पर स्पधा करते नए राज्य बनाए जा रहे थे और भारत का
मान चत्र नए सरे से खच रहा था।
लगभग 185 सा.सं.पू. — अंितम मौय शासक की हत्या पुष्यिमत्र शुंग ारा
→ अशोक के आधी शताब्दी बाद ही सामाज्य का िवघटन
→ पूव के अधीन स्थ राज्य स्वतं त्र हो गए
→ दुबल उत्तर-पि चम पर इंडो-गीक , शक , कु षाण के आक्रमण
→ पुरानी और नई शिक्तयाँ युद्ध तथा वैवािहक गठबंधनों से स्पध करने लगी ं
→ नया राजनीितक मानिचत्र, और उसके साथ नई कला, मुद ा, सािहत्य एवं व्यापार
तीन चीज़ का एक साथ पुनगठन हुआ :
भूभाग — उत्तर म शुंग, क लग म चे द, दक्कन म सातवाहन, द क्षण म चोल-चेर-पांड्य, उत्तर-प म म इंडो-ग्रीक, शक और
कुषाण।
सत्ता — कोई एक सव च्च शासक नह ; भन्न- भन्न आकार के अनेक राज्य, जो नरंतर उठते- गरते रहे।
संस्कृ त — संस्कृ तय का संवाद, जससे नई कला और स्थापत्य शै लयाँ बन , पर भारतीय वषय प्रमुख बने रहे।
संकेत : ऐसे उत्तर म वचार समझाने से पहले त थ और नाम अवश्य द जए — 185 सा.सं.पू. और पुष्य मत्र शुंग।
प्र.2 संगम सा हत्य पर 150 शब्द म एक लेख ल खए।
संगम सा हत्य (लगभग 150 शब्द) :
संगम सा हत्य द क्षण भारत का प्राचीनतम सा हत्य है, जसक रचना त मल म लगभग दूसरी-तीसरी शताब्द सा.सं.पू. से तीसरी
शताब्द सा.सं. के बीच हुई। ‘संगम' शब्द संस्कृत के ‘संघ' से बना है, जसका अथ है ‘स म त' या ‘एकत्र होना' — यहाँ इसका
तात्पय क वय क सभाओं से है। उस काल म इतने महान क व हुए क पूरे युग को ‘संगम युग' कहा जाता है। यह कोई एक ग्रंथ
नह , ब ल्क अनेक क वय क रचनाओं के व भन्न काव्य-संग्रह ह। इसके वषय दो प्रकार के ह — व्य क्तगत भावनाएँ, जैसे प्रेम,
तथा सामा जक मूल्य, जैसे वीरता और उदारता; दोन अत्यंत कुशल एवं सरल भाषा-शैली म अ भव्यक्त हुए ह। इन रचनाओं म
तीन ‘मुकुटधारी राजाओं' — चोल, चेर और पांड्य — तथा उनक राजधा नय , युद्ध , दान और व्यापार का वणन मलता है।
इसी लए इ तहासकार तत्कालीन समाज-व्यवस्था और संस्कृ त जानने के लए संगम काव्य का नरंतर उपयोग करते ह। महाकाव्य
सलप्प दकारम् क रचना इन्ह संग्रह के तुरंत बाद हुई।
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संकेत : 150 शब्द के लेख म चार बात अवश्य ह — यह क्या है, नाम का अथ, इसम क्या है, इ तहासकार के
लए महत्व — और एक उदाहरण। केवल क वय के नाम गनाना पयाप्त नह ।
प्र.3 इस अध्याय म उ ल्ल खत कन शासक ने अपनी उपा ध म माता का नाम स म्म लत कया। उन्ह ने ऐसा क्य
कया?
सातवाहन वंश के शासक ने। अध्याय कहता है — “सातवाहन परंपरा के अनुसार, राजकुमार के नाम प्रायः उनक माताओं के नाम
पर रखे जाते थे।”
शासक उपा ध म माता का नाम कहाँ दखता है
गौतमीपुत्र गौतमी-पुत्र = ‘गौतमी के पुत्र' — माता गौतमी उनके सक्क पर ा ी ल प म — ‘गौतमीपुत्र राजा शातकण '
शातकण बलश्री ( चत्र 6.10)
ऐसा क्य कया :
1. माता क प्र तष्ठा महत्वपूण थी। गौतमी बलश्री “एक श क्तशाली रानी थ , जन्ह ने बौद्ध भक्षुओं को भू म दान द और
ना सक म एक महत्वपूण शलालेख उत्क ण करवाया” — अथात् राज्य म वास्त वक प्रभाव रखने वाली स्त्री।
2. इससे राजा का दावा सुदृढ़ होता था, क्य क उसम न नहाल के प्र त ष्ठत कुल का नाम भी जुड़ जाता था।
3. यह माता का सावज नक सम्मान था, जो उस समाज म स्त्रय को प्राप्त आदर को दशाता है।
4. इससे पहचान स्पष्ट होती थी, क्य क उस वंश के कई राजकुमार क उपा ध ‘शातकण ' होती थी।
क्या आप जानते ह? नानेघाट के अ भलेख एक और उल्लेखनीय सातवाहन स्त्री का वणन करते ह — वह वधवा
रानी जन्ह ने अश्वमेध यज्ञ स हत अनेक वै दक अनुष्ठान कए और भू म, गाय तथा चाँद के सक्क का बड़ा दान
दया।
प्र.4 इस अध्याय म व णत कसी एक राज्य जो आपको रोचक लगता है, के वषय म 250 शब्द का एक लेख ल खए।
आपने उस राज्य का चयन क्य कया? अपना लेख कक्षा म प्रस्तुत क जए और यह जानने का प्रयास क जए क
आपके सहपा ठय ने कौन-से राज्य का सवा धक चयन कया है।
इसे अ े ढं ग से कैसे कर। कोई एक राज्य चुनकर लेख को पाँच बदुओं पर खड़ा क जए : (1) कहाँ और कब शासन कया; (2)
प्रमुख शासक; (3) अथव्यवस्था — कृ ष, व्यापार, सक्के; (4) कला, स्थापत्य या सा हत्य; (5) आपने उसे क्य चुना, अपने
शब्द म। फर श्यामपट्ट पर कक्षा के चयन क गनती क जए और दे खए कौन-सा राज्य सबसे आगे रहा।
नमूना उत्तर (लगभग 250 शब्द) — सातवाहन :
मने सातवाहन को चुना है, जन्ह ने दूसरी शताब्द सा.सं.पू. से तीसरी शताब्द सा.सं. तक दक्कन के वस्तृत भूभाग पर, शुंग
सा ाज्य के द क्षण म शासन कया। उन्ह कभी-कभी ‘आंध्र' भी कहा जाता है। उनका सा ाज्य वतमान आंध्र प्रदे श, तेलंगाना और
महाराष्ट्र म फैला था और भन्न- भन्न समय पर उनक राजधा नयाँ रह , जनम अमरावती और प्र तष्ठान (पैठन) सवा धक प्र सद्ध
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ह।
मुझे वे इस लए रोचक लगते ह क वे एक व्यापा रक श क्त थे। उनके सक्के गुजरात से आंध्र प्रदे श तक, दोन तट पर मले ह और
अनेक सक्क पर दो मस्तूल वाला जहाज अं कत है — उन्नत जहाज- नमाण और रोमन सा ाज्य तक फैले समुद्र व्यापार का
प्रमाण। वे मसाले, वस्त्र, चंदन, हाथी दाँत और स्वणाभू षत मोती नयात करते थे तथा काँच और सुगं धत मलहम आयात करते थे।
कृष्णा-गोदावरी घा टय क कृ ष ने उन्ह स्थर आधार दया और नानेघाट जैसे स्थान पर लया गया कर कोष बढ़ाता रहा।
उनके समाज क दो बात मुझे वशेष प्रय ह। पहली, राजकुमार के नाम माताओं के नाम पर रखे जाते थे — गौतमीपुत्र शातकण ,
उनक माता गौतमी बलश्री के नाम पर, जन्ह ने भू म दान द और ना सक म शलालेख उत्क ण करवाया। दूसरी, राजा वासुदेव के
उपासक होते हुए भी वै दक व ान , जैन मु नय और बौद्ध भक्षुओं को समान रूप से कर-मुक्त भू म दे ते थे और भव्य काल
गुफाओं के नमाण म योगदान करते थे।
मने सातवाहन को इस लए चुना क्य क वे दखाते ह क समृ द्ध, स हष्णुता और स्त्रय का सम्मान साथ-साथ चल सकते ह — और
इस लए भी क जहाज अं कत सक्का एक अ त साक्ष्य है।
संकेत : प्रस्तु त के समय चत्र 6.8 या चत्र 6.11 वाला पृष्ठ दखाइए। कक्षा एक चत्र को अनु े द से कह अ धक
दे र तक याद रखती है।
प्र.5 कल्पना क जए क आपको एक स्वतंत्र राज्य स्था पत करने का अवसर प्राप्त हुआ है। आप कौन-सा राज चह्न
चुनगे और क्य ? आप एक शासक के रूप म कौन-सी उपा ध धारण करगे? अपने राज्य के वषय म एक लेख
ल खए जसम राज्य के मूल्य, नयमावली एवं व शष्टताएँ स म्म लत ह ।
अ े उत्तर म क्या होना चा हए। अपने राज्य क रचना उसी तरह क जए जैसे इस अध्याय के राज्य बने थे, और हर चरण पर
कारण बताइए :
नाम और स्थान — और उसका कारण भू म से जुड़ा हो (कोई नद , पहाड़ी या तट)।
चोल के बाघ, चेर के धनुष और पांड्य क दो मछ लय जैसा एक राज चह्न — एक स्पष्ट चत्र जो आपके राज्य के बारे म कुछ
कहे।
एक उपा ध — क नष्क क ‘महाराजा राजा धराज दे वपुत्र' और खारवेल क ‘ भक्षु-राजा' याद र खए।
मूल्य, नयमावली और दो-तीन व शष्टताएँ।
नमूना उत्तर :
नाम : नद पुर, ‘नद का नगर'। स्थान : वहाँ जहाँ नद पहा ड़य से मलती है, ता क कृ ष और व्यापार दोन संभव ह ।
राज चह्न : चक्र पर खड़ा मोर। मोर मेरे क्षेत्र का पक्षी है और स दय तथा सजगता का प्रतीक; चक्र ग त, व्यापार और ऋतु-चक्र का।
इसे बनाना सरल है, इस लए यह सक्के, ध्वज या मील-पत्थर पर अं कत हो सकता है — राज चह्न म यही गुण चा हए।
उपा ध : सवजन- मत्र, अथात् ‘सब लोग का मत्र'। म वजय-सूचक उपा ध नह लूँगा। खारवेल क तरह, जन्ह ने स्वयं को
‘सवमत का सम्मानकता' कहा, म चाहता ँ क मेरी उपा ध मेरी श क्त नह , मेरा कतव्य बताए।
मूल्य : सव प र न्याय — सलप्प दकारम् दखाती है क एक अन्यायपूण नणय ने राजा और नगर दोन को नष्ट कर दया; सभी
दशन के प्र त सम्मान; और जल क रक्षा, क्य क जल ने ही कावेरी डेल्टा को ‘द क्षण का अन्न भंडार' बनाया।
नयमावली : (1) बना सावज नक रूप से सुने प्रमाण के कसी को दं ड नह ; (2) उपज का दसवाँ भाग कर, और फसल नष्ट होने
पर कुछ नह ; (3) प्रत्येक गाँव अपने तालाब क दे खभाल करे और राज्य उसका व्यय उठाए; (4) सभी बच्च के लए न:शुल्क
शक्षा; (5) व्यापारी सीमा पर शुल्क द और बदले म उन्ह वश्राम-गृह तथा सुर क्षत माग मल।
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व शष्टताएँ : कल्लनई जैसा एक बाँध; एक सभा-भवन जहाँ प्र तवष क व एकत्र ह , संगम क परंपरा म; और ऐसे सक्के जन पर
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एक ओर राज चह्न और दूसरी ओर हल हो, ता क कृषक का सम्मान हो।
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संकेत : अंक कल्पना म नह , कारण म ह। अपने हर चयन के साथ एक वाक्य अवश्य ल खए — ‘मने यह इस लए
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चुना क्य क…'।
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aglकुछ स्थापत्य कलाओं के स्थान को च ह्नत क जए।
प्र.6 आपने मौय त्तर काल के वास्तु कलात्मक वकास
मान चत्र पर इस अध्याय म उ ल्ल खत
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m a s em कावेरी) बनाइए
l जो ड़ए। उत्तर से द क्षण क
व ध। उपमहा प का रेखां कत मान चत्र ली जए। पहले तट-रेखा और तीन-चार न दयाँ (गंगा, नमदा, गोदावरी,
. coरहे। फर प्रत्येक स्थल को बदु और नाम से अं कत क जए तथा एक छोट संaकgे तका
mता क कसी एक कोने म भीड़ न हो।
ता क दशा-बोध
ओर s ब eढ़ए
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स्थापत्य कहाँ च ह्नत कर कसने बनवाया / जोड़ा
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गांधार क्षेत्र (कला शैल ी, सुदूर उत्तर-प म, सधु के पार कुषाण काल
तक्षिशला)
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मथुरा (मथुरा कला शैल ी)
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यमुना तट पर, वतमान उत्तर प्रदे श कुषाण काल
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हेिलयोडोरस स्तंभ,
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मध्य भारत, मध्य प्रदे श एक इंडो-ग्रीक राजदूत
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िविदशा के पास
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स् मध्य प्रदे श, व दशा के पूव म मूल नमाण संभवतः अशोक काल म; वे दकाएँ
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और शल्प शुंग ने जोड़े
उदयिगिर-खंडिगिर गुफ ाएँ
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भुवनेश्वर के पास, ओ डशा (क लग) चे द — खारवेल; हाथीगुंफा अ भलेख यह है
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नानेघ ाट गुफ ाएँ पुणे के पास, महाराष्ट्र सातवाहन — व्यापार माग पर कर-चौक
काल गुफ ाएँ agl
लोनावला के पास, महाराष्ट्र सातवाहन — बौद्ध भक्षुओं के लए
पीतलखोरा गुफ ाएँ
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महाराष्ट्र, काल समूह से उत्तर क ओर सातवाहन काल — चत्र 6.12 का यक्ष यह से
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अमरावतीm और पितष्ठान अमरावती — आंध्र प्रदे श म नचली कृष्णा पर; पैठन —
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सातवाहन राजधा नयाँ
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न) महाराष्ट्र म गोदावरी पर
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agl क ल्लनई (गैंड एनीकट) कावेरी पर, श्रीरंगम प से नीचे, त मलनाडु चोल राजा क रकाल
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मदुरै, उरै यूर, वंिज द क्षण क तीन राजधा नयाँ — मदुरै द क्षणी त मलनाडु पांड्य, चोल, चेर
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(क रूर ) म, उरैयूर तथा करूर कावेरी पर
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 पुनगठन का काल AglaSem · NCERT Solutions
संकेत : शैलकृत गुफाओं के लए एक रंग, स्तूप और स्तंभ के लए दूसरा तथा जल-संरचनाओं एवं
राजधा नय के लए तीसरा रंग ली जए। तब मान चत्र एक बात स्वयं कह दे गा : गुफा-स्थापत्य प मी घाट और
ओ डशा म समटा है — ठ क वह जहाँ कठोर चट्टान और व्यस्त व्यापार माग मलते थे।
स्वयं जाँ चए : च ह्नत करने के बाद ग नए क कतने स्थल कसी व्यापार माग पर या उसके पास ह। लगभग सभी।
इस युग क महान वास्तुकला का व्यय व्यापार ने ही उठाया था।
अध्याय — एक नज़र म
मौय सा ाज्य का वघटन हुआ और भारत का मान चत्र बदल गया। लगभग 185 सा.सं.पू. म अं तम मौय शासक क
हत्या उनके सेनाप त पुष्य मत्र शुंग ने कर द — स ाट अशोक के लगभग आधी शताब्द बाद ही। अनेक नवीन राज्य उभरे,
जो पहले मौय सा ाज्य क अधीनता म शासन कर रहे थे। पूववत क्षेत्र का पुनगठन कर नए राज्य बने, इसी लए व ान इस
काल को ‘पुनगठन का युग' कहते ह।
मान चत्र ( चत्र 6.2) पर नौ श क्तयाँ ह — छह भीतर क , तीन बाहर क । उपमहा प म स्थत राजवंश : शुंग, चे द,
सातवाहन, चोल, चेर, पांड्य। उपमहा प के बाहर से आए : इंडो-ग्रीक, शक (इंडो- स थयन) तथा कुषाण। ये सभी क्षेत्रीय
नयंत्रण के लए स्पधा कर रहे थे — कभी वैवा हक गठबंधन से, कभी युद्ध से, वशेषकर सीमावत क्षेत्र पर।
दक्कन म सातवाहन व्यापार से समृद्ध हुए। गुजरात से आंध्र प्रदे श तक मले उनके सक्क पर दो मस्तूल वाले जहाज
अं कत ह — रोमन सा ाज्य तक फैले समुद्र व्यापार का प्रमाण। कृष्णा-गोदावरी घा टय म कृ ष फली-फूली; नानेघाट
गुफाओं जैसे स्थान पर लया जाने वाला कर राज्य क आय बढ़ाता था। राजकुमार के नाम माता के नाम पर रखे जाते थे —
गौतमीपुत्र शातकण , गौतमी बलश्री के पुत्र।
सुदूर द क्षण म तीन ‘मुकुटधारी राजा' और संगम युग। चोल (उरैयूर; राजा क रकाल, कल्लनई या ग्रड एनीकट के
नमाता), चेर (वं ज/करूर, ‘केरलपुत्र', रोम से व्यापार) और पांड्य (मदुरै, मो तय तथा नौसै नक श क्त के लए प्र सद्ध)।
इनके क वय क रचनाएँ ही संगम सा हत्य ह — संस्कृत ‘संघ' से बना शब्द, अथात् ‘स म त', ‘एकत्र होना' — द क्षण भारत
का प्राचीनतम सा हत्य।
आक्रमणकारी उत्तर-प म से आए — और यह समा गए। एलेक्जडर के क्षत्रप इंडो-ग्रीक बने, जनके राजदूत
हे लयोडोरस ने व दशा के पास स्तंभ खड़ा कर वासुदेव को ‘दे वताओं का दे व' कहा। फर आए शक (शक संवत ग्रेग्रो रयन
से 78 वष पीछे , 1957 से भारतीय राष्ट्रीय पंचांग) और कुषाण, जनके राजा क नष्क ने अपने सक्क पर बुद्ध और शव को
अं कत कया तथा रेशम माग के बड़े भाग पर नयंत्रण रखा।
राजनी त ने बाँटा, संस्कृ त ने जोड़ा। गांधार शैली (स्लेट -काला शस्ट पत्थर, ग्रीक-रोमन प्रभाव) और मथुरा शैली (लाल
बलुआ पत्थर, गोल-मटोल भारतीय आकृ तयाँ) साथ-साथ वक सत हुईं; दे वताओं को मनुष्य के रूप म दशाया जाने लगा,
जससे आगे चलकर मं दर वास्तुकला का आधार बना। संस्कृत सा हत्य का उत्कष हुआ — इसी काल म महाभारत और
रामायण का संकलन हुआ। ‘अतीत के चत्रपट' को कसी एक राजा क कथा नह , ब ल्क आदान-प्रदान और समावेशन क
सतत प्र क्रया के रूप म दे खना चा हए।
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 6 पुनगठन का काल AglaSem · NCERT Solutions
त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ अध्याय म याद रखने योग्य
कहाँ
पुनगठन का मौय त्तर काल, जब पूववत क्षेत्र ों का पुनगठन कर परस्पर पृष्ठ 118 लगभग 200 सा.सं.पू. से 300 सा.सं. —
काल स्पध करते नवीन राज्य बने अध्याय क समय-रेखा क अव ध
वैवा हक िववाह के ारा तय िकया गया गठबंध न; पायः राजा अपनी हा शया, पृष्ठ नयंत्रण पाने का शां तपूण उपाय; दूसरा
गठबंधन पुत्र ी का िववाह पड़ोसी राजपिरवार में करता था 120 उपाय था युद्ध
अश्वमेध यज्ञ वैिदक अनुष्ठान िजसमें घोड़ा सै िनकों के साथ स्वतंत्र छोड़ा इसे अनदे खा न पुष्य मत्र शुंग तथा एक सातवाहन वधवा
जाता था; जो क्षेत्र वह िबना चुनौती पार करे , वह राजा का कर, पृष्ठ 121 रानी ने यह कया
माना जाता
भरहुत स्तूप वतमान मध्य पदे श का स्तूप; मूल िनम ण संभवतः अशोक के पृष्ठ 122, चत्र बौद्ध कला के प्रारं भक उदाहरण म
काल में, शुंग ों ने वेिदकाएँ और िशल्प जोड़े 6.5 एवं 6.7 गना जाता है
सातवाहन दक्कन का शिक्तशाली राजवंश (दू स री शताब्दी सा.सं.पू. पृष्ठ 124–128 राजधा नयाँ अमरावती तथा प्र तष्ठान
से ), कभी-कभी ‘आंध ' भी कहा गया (पैठन)
नानेघाट गुफाएँ पुणे के पास पमुख व्यापार माग की ग फ
ु ाएँ, जो कर-संग ह पृष्ठ 125, चत्र इनके अ भलेख म रानी के दान और
और व्यापािरयों के िव ाम स्थल के रूप में पयुक्त होती थी ं 6.9 आरं भक ा ी अंक मलते ह
हाथीगुंफा उदयिगिर की एक ग फ
ु ा में बा ी िलिप में उत्कीण अिभले ख, पृष्ठ 129, चत्र खारवेल स्वयं को ‘सवमत का सम्मानकता
अ भलेख जो राजा खारवेल की पितवष की उपलिब्धयों का वणन 6.13.2 और समस्त दे वालय का पुनरुद्धारक'
करता है कहते ह
शैलकृत च ान को काटकर कक्ष, स्तंभ आिद बनाने की शैल ी — पृष्ठ 128 उदय ग र-खंड ग र (जैन) तथा काल
स्थापत्य िनम ण नही ं, उत्कीणन (बौद्ध) गुफाएँ
संगम सा हत्य किवयों की सभाओं ारा रिचत तिमल काव्य-संग ह; संस्कृ त पृष्ठ 130 द क्षण भारत का प्राचीनतम सा हत्य;
‘संघ ' अथ त् ‘सिमित', ‘एकत्र होना' से बना शब्द इसम तीन मुकुटधारी राजाओं का उल्लेख
कल्लनई (ग्रड किरकाल ारा कावेर ी पर, ीरंग म ीप से नीचे बनाई गई पृष्ठ 132, चत्र आज भी प्रयोग म; इसी से यह क्षेत्र ‘द क्षण
एनीकट) जल-िवतरण पणाली 6.17 का अन्न भंडार' कहलाया
शक संवत शक काल में िवकिसत पंचांग , ग ेग ोिरयन कै ले ंडर से 78 वष इसे अनदे खा न 1957 म भारतीय राष्ट्रीय पंचांग के रूप
पीछे (जनवरी–माच में 79) कर, पृष्ठ 135 म स्वीकृत
रेशम माग चीन को भूम ध्यसागरीय क्षेत्र से जोड़ने वाला व्यापार माग, जो चत्र 6.25, पृष्ठ कुषाण ने इसके महत्वपूण भाग पर
( सल्क रूट) मध्य एिशया और फारस से होकर जाता था 138–139 नयंत्रण रखा
गांधार कला पंजाब के पि चमी भागों की कला, िजसमें ग ीक-रोमन और पृष्ठ 137, चत्र यथाथ शरीर-रचना, उड़ते हुए वस्त्र, सूक्ष्म
शैली भारतीय तत्वों का समायोजन है; पायः स्ले टी-काला िशस्ट 6.24 ववरण
पत्थर
मथुरा कला मथुर ा क्षेत्र की िविशष्ट भारतीय शैल ी, पायः लाल बलुआ पृष्ठ 140, चत्र मृदुलाकार (गोल-मटोल) चकनी
शैली पत्थर में 6.26 आकृ तयाँ, भारतीय दे वी-दे वता, यक्ष-
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कहाँ
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