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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
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एनसीईआरट समाधान
अध्याय 8: भौगो लक त्र
े कैसे पावन होते
ह?
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
167 – 184 13 27 हन्द
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 8 भौगो लक क्षेत्र कैसे पावन होते ह? AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 7 · सामा जक व ान · समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 8: भौगो लक क्षेत्र कैसे पावन होते ह?
कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 8 भौगो लक क्षेत्र कैसे पावन होते ह? के स ूण एनसीईआरट समाधान — पाठ्यपुस्तक समाज का अध्ययन :
भारत और उसके आगे (कक्षा 7, भाग 1) के वषय-क्षेत्र हमारी सांस्कृ तक वरासत एवं ान परंपराएँ से। अध्याय का प्रत्येक प्रश्न हल कया गया है —
महत्वपूण प्रश्न, पाँच आइए पता लगाएँ बॉक्स, इसे अनदे खा न कर का कुंभ मेले वाला प्रश्न, दोन आइए वचार कर बॉक्स, पृष्ठ 179 और 180 के
पाठ्य प्रश्न, आगे बढ़ने से पहले... तथा प्रश्न एवं याकलाप के आठ प्रश्न — पारंप रक तीथ के मान चत्र ( चत्र 8.6), मोहनजोदड़ो क मुहर ( चत्र
8.12), पृष्ठ 180 क पावन नकुंज क ता लका तथा चत्र 5.5 के व्यापार-माग मान चत्र को मु द्रत पृष्ठ पर ध्यानपूवक दे खकर।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1) (कक्षा 7) 167 – 184
खं ड प्रश्न
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माध्यम
हन्द
महत्वपूण प्रश्न — पृष्ठ 167
अध्याय का आरंभ — वषय-क्षेत्र ‘हमारी सांस्कृ तक वरासत एवं ान परंपराएँ'
महत्वपू ण प्रश्न
प्र.1 ‘पावनता’ क्या है?
अध्याय एक सी मत कतु स्पष्ट प रभाषा दे ता है : पावनता का तात्पय उन समस्त धा मक एवं आध्या त्मक भाव से है, जो
पावन और दव्य ह तथा आदर एवं श्रद्धा के योग्य ह ।
असली प्रश्न यह है क यह ‘भाव’ कसम दखाई दे ता है। इस अध्याय म चार अलग-अलग वस्तुओं म :
क्या पावन बनता है अध्याय से उदाहरण
कोई िवशेष स्थल या धािमक स्थान, जो गंभीर भावों, उच्च िवचार बोधगया का महाबोिध स्तूप; अम ृतसर का अकाल तख्त; अजमेर शरीफ़
और संवेद नाओं को पकट करता है
िकसी िवशेष पकार की यात्रा — तीथयात्रा पंढरपुर की वारी, िजसमें पितवष इक्कीस िदन पैद ल चला जाता है
वह माग िजससे होकर यात्रा गजु रती है सबरीमाला तक पहािड़यों और जंग लों से होकर जाने वाला किठन माग ,
िजसके पाकृ ितक संके त स्वयं पावन माने जाते है ं
स्वयं वह भूभाग संपूण भारत, और अंतत: संपूण पथ्ृ वी — पथ्ृ वी माता या भूदेवी
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यह क्य महत्वपूण है: अं तम पं क्त के कारण ही भारत म पावनता केवल धम और आध्या त्मकता तक सी मत नह
रहती। यह भूगोल और अनेक परंपराओं से भी जुड़ जाती है। इसी से अध्याय का शीषक संभव होता है — केवल
मं दर नह , भूभाग भी पावन हो सकता है।
ध्यान द: पुस्तक ने सावधानी से लखा है — ‘इस अध्याय के सी मत संदभ म'। ‘पावन’ शब्द अन्य अथ म भी
प्रयोग होता है, जैसे पावन कतव्य या पावन वचन। यहाँ केवल धा मक और आध्या त्मक अथ लया गया है।
प्र.2 भू म कैसे पावन हो जाती है?
कसी एक नणय से नह , अ पतु एक लंबी प्र क्रया से, जसक चार धाराएँ पूरे अध्याय म चलती ह।
1. प्रकृ त म दै वीय उप स्थ त का अनुभव। हदू तथा अनेक लोक एवं जनजातीय मान्यताओं म पवत, नद , वृक्ष, पौधे, पशु और
कभी-कभी पत्थर भी पावन माने जाते ह। कई न दयाँ दे वी ह; ड ग रया ख ड के लए नयम ड गर पहाड़ी ‘ नयम राजा’ का
नवास है; नील ग र के टोडा अनेक शखर , शोला वन और व शष्ट वृक्ष को पावन मानते ह। य द प्रकृ त के कण-कण म दै वीय
उप स्थ त है, तो भू म का कोई भाग साधारण नह रहता।
2. पावन स्थल चार ओर फैले ह और आपस म जुड़े ह। ये अकेले नह , जाल बनाते ह — चार कोन के चार धाम, ादश
ज्यो त लग, 51 श क्तपीठ और अनेक क्षेत्रीय जाल। “इन अंतसबंध का जाल संपूण भारत क लंबाई-चौड़ाई म हर दशा से होते
हुए पावन भूभाग का नमाण करता है। नष्कषत: संपूण भारत स्वयं एक पावन स्थल बन जाता है।”
3. लोग इस भू म पर चलते ह। लगभग 3000 वष से, आधु नक यातायात के बना भी, लोग बद्र नाथ और अमरनाथ से लेकर
कन्याकुमारी तक यात्रा करते रहे। प्रत्येक माग, प्रत्येक नद और प्रत्येक पहाड़ी इसी वस्त्र का एक और धागा बन जाती है।
4. कथाएँ मान चत्र को बाँध दे ती ह। श क्तपीठ क कथा कहती है क भगवान वष्णु ने चक्र से माता सती के शरीर को
वभा जत कया और अंग उपमहा प भर म गरे — आशय स्पष्ट है : संपूण भूभाग दे वी माता का ही रूप है। इसी प्रकार
लगभग प्रत्येक क्षेत्र क परंपरा मानती है क रामायण-महाभारत के नायक वहाँ से गुजरे थे और वहाँ पावन स्थल बन गए ( चत्र
8.11, बस्तर)।
ऐसा क्य होता है: कोई स्थान तब पावन बनता है जब समुदाय बार-बार वहाँ लौटता है — पूजा म, यात्रा म और
कथा म। हजार वष तक पूरे उपमहा प म यही दोहराइए, तो जाल पूरा हो जाता है; कोई ऐसा भाग शेष नह रहता
जो केवल ‘भू म’ हो।
प्र.3 पावन स्थल और तीथ स्थल का अंतसबंध कस प्रकार मानव जीवन और संस्कृ त से जुड़ जाता है?
ये जीवन के लगभग हर पक्ष को छू ते ह। अध्याय कम-से-कम पाँच संबंध दखाता है।
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संबंध यह कस प्रकार काम करता है
आध्याित्मक तीथयात्रा “न केवल शारी रक और भौ तक, ब ल्क एक आध्या त्मक यात्रा भी है” और इसके लए व शष्ट आचार-
जीवन व्यवहार आवश्यक है। पहाड़ी पर चढ़ने क क ठनाई आंत रक यात्रा क क ठनाइय का प्रतीक है।
आिथक जीवन तीथया त्रय को भोजन, आवास, फूल, वाहन और पूजा-साम ी चा हए, अत: तीथ के चार ओर बाज़ार, नाव, धमशालाएँ
और सेवाएँ पनपती ह ( चत्र 8.8 तथा 8.17)। व्यापारी उन्ह माग पर चलते ह; कुछ एक साथ व्यापारी और तीथयात्री
दोन होते ह।
सामािजक जीवन गाँव के लोग बड़े समूह म हफ्त यात्रा करते ह — धमपाल को लखनऊ के उत्तर के दो गाँव के बारह लोग रामेश्वरम से
लौटते मले। वारी या कुंभ लाख अप र चत को एक ही सभा म जोड़ दे ता है।
सांस्कृितक जीवन माग म लोग भन्न भाषाएँ, री त- रवाज, वस्त्र और भोजन दे खते ह — और उनक समरूपता भी। वचार, कथाएँ, गीत
और वस्तुएँ साझा होती ह; नए वचार उत्पन्न होते ह और पुराने वचार के साथ सामंजस्य बैठता है।
पािरिस्थितकीय तीथ नद , झील, वन या पहाड़ पर ह, अत: स्थल क रक्षा का अथ है प रदृश्य क रक्षा। पावन नकुंज जैव- व वधता को
जीवन आश्रय दे ते ह; तंजावुर के नकुंज के दे वता फल-चमगादड़ क रक्षा करते ह और चमगादड़ बदले म परागीकरण एवं बीज-
प्रसार करते ह।
क्या आप जानते ह? बोधगया म प्र तवष चालीस लाख से अ धक और सबरीमाला म लगभग एक करोड़ श्रद्धालु
आते ह — ऐसी संख्या पूरे जनपद क सड़क , दुकान , रोजगार और वा षक दनचया को गढ़ दे ती है।
प्र.4 पावन भूगोल ने भारतीय उपमहा प के सांस्कृ तक एक करण म कस प्रकार क भू मका नभाई है?
अध्याय के शब्द म यह सांस्कृ तक एक करण का प्रमुख कारण बना। ंखला इस प्रकार है :
पावन स्थल िकसी एक क्षेत्र में नही ं, संपूण उपमहा ीप में िस्थत है ं
→ िकसी जाल को पूरा करने के िलए तीथयात्री को उत्तर-दिक्षण और पूव-पिश्चम यात्रा करनी पड़ ती है
→ माग में उसे िभन्न भाषाएँ, रीित-िरवाज, वस्त्र और भोजन िमलते है ं — और उनकी समरूपता भी
→ उसके माग व्यापािरयों, िशक्षकों और िवचारकों के माग ं से िमल जाते है ं
→ वस्त एु ,ँ कहािनयाँ, अनुभ व और िवचार साझा और पिरवित त होते है ं
→ साझे मूल्य संपूण उपमहा ीप में फै ल जाते है ं
यह तीन कारण से संभव हुआ :
सु नयो जत वस्तार। चार धाम “सु नयो जत रूप से भारत के द क्षण, उत्तर, पूव तथा प श्चम म स्था पत ह।” जो चार क
यात्रा करना चाहे, उसे पूरा दे श पार करना ही होगा।
साझे प्रतीक। त मलनाडु और असम, दोन का व्य क्त वही 51 श क्तपीठ, वही ादश ज्यो त लग और वही सात न दयाँ गना
सकता था — हजार कलोमीटर पर फैली एक साझी शब्दावली।
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दुतरफा आवागमन। सख परंपरा म गुरु नानक क ह र ार, प्रयाग, मथुरा, वाराणसी, अयोध्या और पुरी क यात्राएँ दज ह;
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अजमेर और वेलांकन्नी म अनेक पंथ के लोग आते ह। एक करण कसी एक परंपरा ारा दूसरी को समा हत करना नह था,
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अ पतु अनेक परंपराओं का एक ही माग पर चलना था।
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aदर-पीढ़ बनाए रखते ह, इस लए वह राज्य के उत्थान-पतन से भी बच जाता है। जवाहरलाल नेहरू ने इसी ओर
ऐसा क्य होता है: राजनी तक एकता राजवंश के साथ आती-जाती है। कतु तीथ-जाल को साधारण लोग पीढ़ -
संकेत कया था — “यह एक दे श और एक संस्कृ त क भावना है।”
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आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 168
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चत्र 8.2 तथा अध्याय के आरंभ के चत्र 8.1
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आइए पता लगाएँ
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a glप्र.1 क्या आप इनम से कसी चत्र से प र चत ह? क्या आप अपने आस-पास इसी तरह के कसी स्थान का नाम बता
सकते ह ?
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चत्र म क्या है — चत्र 8.1 (अध्याय का आरंभ, पृष्ठ 167) तथा चत्र 8.2 (पृष्ठ 168) :
चत्र 8.1, छह छाया चत्र : (1) दे वदार के वन म खड़े पत्थर के मं दर का समूह, जनक छत स्लेट
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क ह; (2) रात म नद पर तैरते जलते द य क पं क्तयाँ और जल म झल मलाते तट के प्रकाश;
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(3) नंगे पथरीले पवत पर स्वण शखर वाला श्वेत स्तूप; (4) मं दर के सरोवर के बीच खड़ा छोटा
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.co agअन्य भट चढ़ ह।
स्तंभयुक्त दे वालय; (5) खुले हरे मैदान म गड़े ऊँचे खड़े पत्थर; (6) वृक्ष क जड़ का नकट- चत्र,
se m जन पर धागे, मनक क ल ड़याँ, न बू, फूल और
g l a चत्र 8.2, पाँच छाया चत्र : (1) खचाखच भरी दरगाह, जहाँ लाल चँदोवे के नीचे स्त्री-पुरुष भू म
a पर बैठे ह; (2) कसी सनेगॉग (यहूद उपासना-गृह) का भीतरी दृश्य — चमकती पीतल क
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जा लयाँ, मेनोरा तथा भू म पर बछा नारंगी वस्त्र; (3) पारसी अ ग्न-मं दर का प्रवेश- ार, ार के
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ऊपर अ भलेख और बगल म उत्क ण पंखयुक्त ारपाल; (4) दो मीनार और श्वेत संगमरमर के
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गुंबद वाली लाल बलुआ पत्थर क बड़ी म स्जद; (5) एक और सनेगॉग का भीतरी दृश्य — झाड़-
agl फ़ानूस, पीतल के स्तंभ तथा लाल परदा।
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चत्र 8.1 (पृष्ठ 167) तथा चत्र 8.2 (पृष्ठ 168) — छाया चत्र, जनका वणन यहाँ दया गया है; मूल चत्र पाठ्यपुस्तक म
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दे खए।
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agl उत्तर
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पहले यह पहचा नए क चत्र म वास्तव म क्या है, फर उसी प्रकार का स्थान अपने आस-पास खो जए।
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चत्र म यह कस प्रकार का अपने आस-पास ऐसा खो जए
पावन स्थल है
िचत्र 8.1 — ऊँचे दे वदार वृक्षों के बीच वन म स्थत मं दर-समूह आपके गाँव या नगर का मंिदर , िवशेषकर जो िकसी वन या
पत्थर के मंिदर पहाड़ी पर हो
िचत्र 8.1 — साँझ के समय नदी पर पूजा के लए प्रयुक्त नद -घाट वह घाट, तालाब या नदी-तट जहाँ आपके नगर में आरती या
तैर ते जलते दीये िवसजन होता है
िचत्र 8.1 — नंग े पवत पर सफ़े द स्तूप बौद्ध स्तूप आपके जनपद का स्तूप, िवहार या मठ, यिद हो
िचत्र 8.1 — तालाब के बीच बना छोटा पावन जलाशय मंिदर का तालाब, कुं ड, बावड़ी या वह पोखर िजसे अनुष्ठानों के
मंिदर िलए स्वच्छ रखा जाता है
िचत्र 8.1 — खुले मैद ान में खड़े पत्थर पावन शलाएँ / लोक अथवा गाँव की सीमा के पत्थर , देवग ड
ु ़ ी, ग ामदे वता का चबूतरा
जनजातीय स्थल
िचत्र 8.1 — धागों, नी ंबू और कु मकु म से पावन वृक्ष िवद्य ालय के पास का पीपल , बरगद या नीम , िजसकी पिर मा क्र
सजी वक्षृ की जड़ें की जाती है और िजस पर धागे बाँधे जाते है ं
िचत्र 8.2 — भीड़ भरी दरगाह, मिस्जद, इस्लाम, यहूद तथा पारसी आपके नगर की दरगाह, मिस्जद , चच, ग रु
ु ारा, अग्यारी या
यहूद ी पाथना-ग ृह, अग्यारी धम के पावन स्थल िसनेग ॉग
नमूना उत्तर: “हाँ — धाग और न बुओं से लदे वृक्ष का चत्र बहुत प र चत है। हमारी गली के मोड़ पर एक पुराना
पीपल है; लोग उस पर लाल धागा बाँधते ह, तने पर कुमकुम लगाते ह और कोई उसक टहनी नह काटता। द य
वाली नद का चत्र उस घाट जैसा है, जहाँ हम का तक पू णमा पर जाते ह। मेरे घर के पास एक पहाड़ी मं दर भी है,
जहाँ मेले के दन हम पैदल चढ़ते ह; एक दरगाह है, जसक जाली पर हर समुदाय के लोग धागा बाँधते ह; और
बाज़ार के अंत म एक चच है।”
पुस्तक यह प्रश्न सबसे पहले क्य पूछती है: यह दखाने के लए क ‘पावन भूभाग’ कोई दूर क , प्राचीन वस्तु नह
है। वह आपके अपने आस-पास का साधारण मान चत्र ही है — एक वृक्ष, एक तालाब, एक पहाड़ी, एक स्थल —
बस उसे दे खने क दृ ष्ट बदल जाती है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 171
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धमपाल का उद्धरण — रामेश्वरम से ह र ार जाते तीथयात्री
आइए पता लगाएँ
प्र.1 इस उद्धरण को प ढ़ए। इस वषय म आपका क्या अ भमत है? उस माग को दशाइए, जससे होकर उन या त्रय ने
रामेश्वरम से ह र ार तक क यात्रा क होगी। आपके अनुसार, इन या त्रय ने दल्ली रूकने के स्थान पर सीधे
ह र ार क यात्रा क्य क ?
उद्धरण से प्राप्त अवलोकन — पाँच बात वशेष रूप से ध्यान ख चती ह :
साधारण ग्रामीण, धनी तीथयात्री नह । लगभग बारह लोग — तीन-चार म हलाएँ और सात-आठ पुरुष — लखनऊ के उत्तर
के दो गाँव से।
अत्यंत लंबी यात्रा। लगभग तीन महीने, और रामेश्वरम — दे श का द क्षणी छोर — उन स्थल म से केवल एक था।
वे अपनी गृहस्थी साथ लए चल रहे थे। गठ रयाँ, मट्ट के पात्र और “भोजन क सभी आवश्यक वस्तुएँ — आटा, घी,
चीनी”। वे स्वयं भोजन बनाते थे, जससे यात्रा सस्ती भी रहती और उनके नयम भी बने रहते।
समूह ही इकाई है। कोई अकेला नह चलता; दो गाँव के स्त्री-पुरुष एक दल के रूप म चलते ह और व्यय, भोजन तथा सुरक्षा
साझा करते ह।
उ े श्य के प्र त दृढ़ता। “हमारे पास समय नह है... हम ह र ार पहुँचना है। उसके बाद हम घर लौटना है।” यात्रा का लक्ष्य तीथ
है, घूमना नह ।
संभा वत माग। वे रेल से चल रहे थे, अत: स्वाभा वक माग पूव तट से उत्तर और फर गंगा के मैदान से होकर जाता है :
रामेश्वरम (तिमलनाडु, पंबन ीप)
→ मदुरई → ितरुिचरापल्ली → चे न्नई
→ कोरोमंडल तट के साथ उत्तर : िवजयवाड़ ा → िवशाखापत्तनम → भुवने श्वर/पुरी (ओिडशा)
→ खड़ गपुर → पयागराज / वाराणसी गंगा के िकनारे
→ कानपुर → लखनऊ (उनका अपना क्षेत्र) → मुरादाबाद
→ िद ल्ली में गाड़ ी बदलकर → हिर ार (उत्तराखंड)
तीथया त्रय का दल इसी रेखा पर पड़ने वाले तीथ को छू ता चलता — रामेश्वरम, कांचीपुरम, पुरी, गया, वाराणसी, प्रयागराज।
इसी लए यात्रा तीन महीने लंबी हुई।
वे दल्ली म क्य नह रुके। क्य क दल्ली एक बड़ी राजधानी अवश्य है, कतु उनक तीथ-सूची का भाग नह है। तीन कारण एक
साथ काम करते ह :
1. उ े श्य। उनक यात्रा एक संकल्प थी, जसम पावन स्थल का क्रम न श्चत था। ह र ार — जहाँ गंगा मैदान म प्रवेश करती है —
उस सूची म था, दल्ली नह । उनके लए दल्ली केवल वह जंक्शन था जहाँ गाड़ी बदलनी थी।
2. समय और व्यय। तीन महीने से घर से बाहर, आटा-घी साथ लए हुए। एक दन अ धक रुकने का अथ था अ धक व्यय और घर
का अधूरा काम। उन्ह ने स्वयं कहा — “हमारे पास समय नह है।”
3. यात्रा को पूण करना। यात्रा व धपूवक पूरी क जाती है — ह र ार म स्नान और फर सीधे घर। बीच म घूमना उस अनुशासन
को तोड़ दे ता।
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धमपाल क्या दखा रहे ह: यह क भारत म तीथयात्रा धनी लोग का वलास नह , अ पतु साधारण जन का वशाल,
स्वत:-संग ठत आंदोलन था — और इसी से संपूण उपमहा प का भूगोल जाना और एक अनुभव कया गया।
प्र.2 प्राचीन काल म जब लोग त मलनाडु के मदुरई से उत्तर प्रदे श के वाराणसी क यात्रा करते थे, तो उनका संपक
कन- कन भाषाओं से होता होगा? उन स्थान म वे लोग से कैसे वातालाप करते ह गे? वे कहाँ ठहरते ह गे? वे
कस प्रकार का भोजन करते ह गे?
मदुरई से उत्तर क ओर माग पर च लए और उत्तर स्वयं बनता जाएगा।
माग म मलने वाली भाषाएँ
यात्रा का भाग सुनाई दे ने वाली भाषा
मदुर ई → काच
ं ीपुर म तिमल
कन्नड़ पदे श (कन टक) से होकर न्न
क ड़
आंध / दक्कन से होकर तेल ुग ,ु और उ त्त र -पिश्चम में मराठी
मध्य भारत िहंद ी क्षेत्र की बोिलयाँ — बुंदे ल ी, बघे ल ी, अवधी
गंग ा का मैद ान, वाराणसी तक भोजपुर ी तथा पूव िहंद ी की अन्य बोिलयाँ
माग के मंिदरों और मठों में संस्कृ त, तथा बौद्ध-जैन कें द ों में पाकृ त या पािल
वे वातालाप कैसे करते ह गे। चार तरीके, जो आज भी काम आते ह :
संस्कृत संपक-भाषा के रूप म — पुरो हत , व ान और भक्षुओं के बीच। त मल व ान और काशी का पं डत बना कसी
साझी बोली के भी संस्कृत म चचा कर सकते थे।
संकेत, गनती और थोड़े व्यापा रक शब्द — अनाज खरीदने, गाड़ी करने या रास्ता पूछने के लए; ठ क वैसे जैसे आज भी
नए नगर के बाज़ार म काम चल जाता है।
मागदशक और बचौ लए — तीथ के पंडे, कारवाँ के मु खया और वे व्यापारी जो कई क्षेत्र म काम करने के कारण कई
भाषाएँ जानते थे।
साझी धा मक शब्दावली — दे वताओं, न दय और पव के नाम सवत्र पहचाने जाते थे, अत: ‘काशी’, ‘गंगा’ या ‘राम’ का
अनुवाद आवश्यक नह था।
वे कहाँ ठहरते ह गे। राजाओं और श्रे ष्ठय ारा बनवाई धमशालाओं, छत्रम और सत्रम म; मं दर के मठ और वहार म; व्यापार-
माग क गुफाओं और वश्राम-स्थल म (अध्याय म नानेघाट क गुफाओं का उल्लेख व्यापा रय के वश्रामगृह के रूप म है); गाँव के
मं दर के प्रांगण म; अथवा कसी उपवन या नद -तट पर डेरा डालकर, जैसे तीथयात्री आज भी करते ह।
वे क्या भोजन करते ह गे। मुख्यत: स्वयं बनाया हुआ — गठ रय और मट्ट के पात्र म लाया चावल, आटा, दाल, घी, नमक और
गुड़, ठ क वैसे जैसे धमपाल के समूह के पास था। माग म वे प्रत्येक क्षेत्र का भोजन भी करते — त मल प्रदे श म चावल और सांभर
जैसे व्यंजन, दक्कन म रागी और ज्वार क रोट , गंगा के मैदान म गेहूँ क रोट और दाल — तथा मं दर का प्रसाद और अन्नदान, जो
पुरी, वाराणसी और अमृतसर म आज भी चलता है।
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प्रश्न का मम: ऐसी यात्रा स्वयं म एक पाठशाला थी। जो ामीण मदुरई से वाराणसी तक चलकर लौटता, वह चार-
पाँच भाषाओं क ध्व न, एक दजन भोजन-शै लयाँ और सैकड़ री तयाँ जानकर लौटता — और यह भी जानकर क
इन सबके पीछे कथाओं और दे वताओं का एक साझा संसार है। यही सांस्कृ तक एक करण है, एक-एक यात्री के
माध्यम से।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 173
पावन भूभाग से अवगत होना — चार धाम क स्थ त
आइए पता लगाएँ
प्र.1 चार धाम क स्थ त का पता लगाइए। आपके अनुसार जब लोग ने भारत के उत्तर-द क्षण तथा पूव-प मक
यात्रा क , तब उनके लए इन धाम का क्या कोई वशेष महत्व था?
पहले स्थ त दे खए। चत्र 8.6 के मान चत्र म चार धाम (हल्के नीले त्रभुज) लगभग ठ क दे श के चार कोन पर ह :
धाम कहाँ दशा
बद ीनाथ उत्तराखंड, ऊँचे हमालय म उ त्त र
पुरी ओ डशा, बंगाल क खाड़ी के तट पर पूव
रामेश्वरम त मलनाडु , द क्षणी छोर पर पाक जलडमरूमध्य के पास दिक्षण
ारका गुजरात, अरब सागर के तट पर पिश्चम
अध्याय स्वयं कहता है क ये चार “सु नयो जत रूप से भारत के द क्षण, उत्तर, पूव तथा प श्चम म स्था पत ह।” इन्ह मलाइए तो
संपूण उपमहा प पर एक वशाल क्रॉस बन जाता है।
यात्रा करने वाल के लए इसका क्या अथ था :
पूरे दे श को पार कए बना यात्रा पूरी नह होती। बद्र नाथ से रामेश्वरम लगभग 2,800 कमी है और ारका से पुरी लगभग
1,900 कमी। तीथयात्री को हमालय, दक्कन, दोन तट और गंगा का मैदान — सब दे खना ही पड़ता था।
भारत मन म एक हो जाता है। जो व्य क्त हम शखर से द क्षणी समुद्र-तट तक चल आया, उसके लए अपना जनपद ही संसार
नह रह जाता। उसने अपने पैर से अनुभव कया क यह सब एक ही भू म है — वही “एक दे श और एक संस्कृ त क भावना”।
भन्नता अजनबी नह रहती। माग म उसे भन्न भाषाएँ, भोजन, वस्त्र और री तयाँ मलत — और वही दे वता, वही पव, न दय
के प्र त वही श्रद्धा भी। व वधता और एकता एक साथ अनुभव होती थी।
माग स्वयं वक सत होते गए। नरंतर उत्तर-द क्षण और पूव-प श्चम आवागमन से रास्ते, घाट, वश्रामगृह और बाज़ार बने रहते
थे, जससे व्यापार, समाचार और वचार भी उन्ह माग से चलते थे।
प्रत्येक क्षेत्र का महत्व बना। कोई कोना दूरस्थ कहकर उपे क्षत नह हो सकता था, क्य क प्रत्येक कोने म संपूण का एक
चौथाई भाग था। इसी प्रकार पावन स्थल का जाल चुपचाप राष्ट्र का मान चत्र बन गया।
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 8 भौगो लक क्षेत्र कैसे पावन होते ह?
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यह क जए: भारत के रेखा-मान चत्र पर चार धाम अं कत क जए और उन्ह सीधी रेखाओं से जो ड़ए। फर सूची
m a s emचत्र बनेगा, वही
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दे खकर ादश ज्यो त लग भी अं कत क जए और दे खए क वे बीच का स्थान कैसे भर दे ते ह। जो
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अध्याय का पावन
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आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 174
चत्र 8.6 — पारंप रक तीथ के अंतसबंध को दशाता मान चत्र m
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आइए पता लगाएँ ag
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क्या आप ऊपर दए गए मान चत्र म कुछ पारंप रक तीथ क पहचान कर सकते ह? आप पुस्तक के अंत म दए
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गए राजनै तक मान चत्र क भी सहायता ले सकते ह।
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संकेत सूची
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उ०
अंतर ीय सीमा
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30°उ०
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ज्योितिल ंग
चार धाम
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कुंभ मेला
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िसख धम के पावन स्थल
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िहंद महासागर
70°पू० 80°पू० 90°पू०
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चत्र 8.6, पृष्ठ 174 — पुनर खत : पारंप रक तीथ के कुछ अंतसबंध को दशाता मान चत्र। प्रत्येक चह्न वह है जहाँ
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पुस्तक म है और पुस्तक क भाँ त यहाँ भी कसी स्थान का नाम नह दया गया — नाम पहचानना ही तो प्रश्न है। छपे
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मान चत्र म एक ही परंपरा के स्थल आपस म उसी रंग क पतली रेखाओं से जुड़े ह, इसी से वे ‘अंतसबंध’ बनते ह।
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मान चत्र पर कोई नाम अं कत नह है — केवल संकेत ह, जो रेखाओं से जुड़े ह। अत: काय यह है क प्रत्येक संकेत क स्थ त को
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राजनै तक मान चत्र पर मलाकर पढ़ा जाए। संकेत सूची म आठ चह्न ह : अंतराष्ट्रीय सीमा, श क्तपीठ (लाल त्रभुज), ज्यो त लग
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(गहरे नीले त्रभुज), चार धाम (हल्के नीले त्रभुज), कुंभ मेला (नारंगी त्रभुज), सख धम के पावन स्थल (पीले वृत्त), बौद्ध धम के
पावन स्थल (गुलाबी वग) तथा जैन धम के पावन स्थल (बगनी चतुष्कोण)।
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संकेत-दर-संकेत दे खने पर ये तीथ वश्वासपूवक पहचाने जा सकते ह :
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संकेत मान चत्र पर स्थ त तीथ
चार धाम उत्तराखंड हमालय, लगभग 30½° उ०, बद ीनाथ
79° पू०
चार धाम ओ डशा तट, लगभग 20° उ०, 86° पू० पुर ी
चार धाम सौराष्ट्र तट, लगभग 22° उ०, 69° पू० ारका
चार धाम द क्षणी छोर, लगभग 9° उ०, 79° पू० रामेश्वरम (जो ज्योितिल गं भी है — दोनों ित्र भुज साथ-साथ है)ं
कुं भ मेल ा जहाँ गंगा पहाड़ से मैदान म आती है, हिर ार
लगभग 30° उ०, 78° पू०
शिक्तपीठ (लाल) गंगा-यमुना संगम, लगभग 25½° उ०, 82° पयागराज — कुं भ मेले का नगर (पष्ृ ठ 176), यद्य िप मानिचत्र पर यहाँ
पू० नारंग ी नही,ं लाल ित्र भुज ही अंिकत है
शिक्तपीठ (लाल) मालवा, लगभग 23° उ०, 76° पू० उ ज्जैन — कुं भ मेले का नगर तथा महाकाले श्वर ज्योितिल गं भी, िकं तु
मानिचत्र पर यहाँ के वल लाल ित्र भुज छपा है
कुं भ मेल ा उत्तरी महाराष्ट्र, लगभग 20° उ०, 74° पू० नािसक (साथ में त्र्यंबके श्वर ज्योितिल गं )
ज्योितिल गं उत्तराखंड क पहा ड़य म बद्र नाथ से थोड़ा के दारनाथ
प श्चम
ज्योितिल गं नमदा तट तथा प श्चमी महाराष्ट्र का समूह ओंक ारे श्वर , भीमाशंक र , घ ृष्णेश्वर , औंढा नागनाथ
िसख धम का पावन पंजाब, लगभग 31½° उ०, 75° पू० अम ृतसर (स्वण मंिदर / अकाल तख्त); उसके पूव का िचह्न आनंद पुर
स्थल सािहब
िसख धम का पावन मध्य गंगा मैदान, लगभग 25½° उ०, 85° पटना सािहब
स्थल पू०
िसख धम का पावन मराठवाड़ा, लगभग 19° उ०, 77° पू० नाद
ं े ड़ (हजूर सािहब)
स्थल
बौद्ध धम का पावन पूव उत्तर प्रदे श तथा नेपाल सीमा सारनाथ, कु शीनगर , लुंिबनी/किपलवस्तु
स्थल
बौद्ध धम का पावन बहार, लगभग 24½° उ०, 85° पू०, तथा बोधगया; म ध् य पदे श में साँची
स्थल मध्य भारत
जैन धम का पावन द क्षणी राजस्थान तथा सौराष्ट्र माउं ट आबू; िगरनार तथा शत्र ंज
ु य (पालीताना)
स्थल
जैन धम का पावन झारखंड, लगभग 24° उ०, 86° पू०, तथा स म्मेद िशखर (पारसनाथ); श्रवणबेल गोला
स्थल द क्षण कनाटक
शिक्तपीठ कोलकाता, गुवाहाट , कन्याकुमारी, काँगड़ा कालीघाट, कामाख्या, क न्याकु मारी, ज्वालामुखी …
तथा दजन अन्य
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संकेत सूची
उ०
अंतर ीय सीमा
वालामुखी
ज्ज्वालामु
अमृतसर केदारनाथ शिक्तपीठ
बदरीनाथ
30°उ० आनंदपरु सािहब ज्योितिल ंग
हिर ार
चार धाम
कु शीनगर
सारनाथ कुंभ मेला
पयागराज पटना सािहब
िहंगलाज कामाख्या
कामाख्या िसख धम के पावन स्थल
माउंट आबू
वाराणसी बोधगया
उज्जैन
उज्जै साँची बौद्ध धम के पावन स्थल
ारका िशखरजी
िगरनार कालीघाट जैन धम के पावन स्थल
पालीतानाओंकारेश्वर
20°उ० सोमनाथ नािसक घृष्णेश्वर परु ी
भीमाशंकर नादं ेड़
श्रीशैलम
श्रीशै बंगाल
की खाड़ ी
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सागर श्रवणबेलगोला
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10°उ०
रामेश्वरम
कन्याकु मारी
कन्याकु
िहंद महासागर
70°पू० 80°पू० 90°पू०
वही मान चत्र, तीथ के नाम स हत — अपने उत्तर क जाँच के लए इसका उपयोग क जए। (पुस्तक के मान चत्र म नाम नह दए गए ह।)
मान चत्र के वषय म एक बात: संकेत सूची म कुंभ मेला दया गया है, कतु मान चत्र पर केवल दो नारंगी त्रभुज
ही स्पष्ट दखते ह — ह र ार और ना सक। प्रयागराज तथा उज्जैन म, जो पृष्ठ 176 पर कुंभ के अन्य दो नगर बताए
गए ह, केवल लाल श क्तपीठ- त्रभुज ही अं कत है।
स्वयं जाँ चए: पुस्तक के अंत के राजनै तक मान चत्र से प्रत्येक संकेत का अक्षांश-दे शांतर पढ़कर ही नाम बताइए —
यही कौशल यह प्रश्न सखाना चाहता है। जहाँ कोई लाल त्रभुज ऐसे क्षेत्र म हो जसे आप पहचान न सक, वहाँ इतना
कहना पयाप्त है — “इस राज्य म स्थत एक श क्तपीठ”।
मान चत्र वास्तव म क्या दखा रहा है: नाम क सूची नह , अ पतु एक प्र तरूप। रेखाएँ सभी परंपराओं के स्थल
को ऐसे जाल म जोड़ती ह, जो बार-बार एक-दूसरे को काटते ह, और उपमहा प का कोई भाग बाहर नह छू टता।
यही प्र तरूप पूरे अध्याय का सार एक चत्र म है।
इसे अनदे खा न कर — पृष्ठ 176
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प्रयागराज, कुंभ मेला और तीन न दय का संगम
इसे अनदे खा न कर
प्र.1 लगभग 66 करोड़ लोग ने 2025 के कुंभ मेले म भाग लया था। भारत क पूरी जनसंख्या का यह कतना अनुपात
है?
2025 म भारत क जनसंख्या लगभग 145 करोड़ है। अत:
अनुपात = 66 करोड़ ÷ 145 करोड़
= 0.455 …
= लगभग 45%, अथ त पत्येक 20 भारतीयों में से लगभग 9 — आधे से कु छ कम।
साधारण भन्न म 66/145 लगभग 9/20 है, अथात लगभग आधा।
संख्या को ध्यान से प ढ़ए: 66 करोड़ पूरे 45 दन के मेले म हुई उप स्थ तय क गणना है, 66 करोड़ भन्न- भन्न
व्य क्तय क नह । अनेक श्रद्धालु कई शुभ त थय पर स्नान करते ह और हर स्नान अलग गना जाता है। अत:
वास्त वक व्य क्तय क संख्या इससे कम रही होगी — फर भी यह वश्व का सबसे बड़ा मानव समागम है।
यह जानना क्य आवश्यक है: इतनी बड़ी भीड़ के लए कुछ ही सप्ताह म एक अस्थायी नगर बसाना पड़ता है —
सड़क, पीपा-पुल, तंबू, जल, बजली, च कत्सालय और स्वच्छता। इसी लए यूनेस्को ने कुंभ मेले को ‘अमूत
सांस्कृ तक धरोहर’ के रूप म सूचीबद्ध कया है, और इसी लए कुंभ जतना आध्या त्मक आयोजन है, उतना ही
आ थक भी।
यह क जए: अपने राज्य क जनसंख्या ली जए और पता क जए क 66 करोड़ म वह कतनी बार समा जाएगी। 7
करोड़ क जनसंख्या वाले राज्य के लए उत्तर है — लगभग 9 बार।
आइए वचार कर — पृष्ठ 177
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चत्र 8.7 और 8.8 — कुंभ मेला और घाट, तथा पावन स्थल के चार ओर का आ थक जीवन
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आइए वचार कर
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a s emे वचार म कस प्रकार ये पावन स्थल लोग के आ थक जीवन और ग त व धय से जुड़े हुए ह। मानस
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आपक
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प्र.1
मान चत्र (माइंड मैप) के माध्यम से इन संबंध का पता लगाएँ। (संकेत— चत्र 8.7 और 8.8 म इस वषय म कुछ
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जानका रयाँ द गई ह।)
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a ऊपर दए गए दोन चत्र म क्या है :
चत्र 8.7 (पृष्ठ 176) — साँझ के समय का कुंभ मेला : चौड़ी नद , तट पर ठसाठस भरी वशाल
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भीड़, उथले जल म खड़े सैकड़ लोग, और उनके पीछे दूर तक फैली जलती दुकान , तंबुओं और
द प क अटू ट पं क्त — ऊपर गुलाबी साँझ का आकाश। m
o m l a sकeे ऊपर उठती गेरुई,
.c श्वेत, पीली और लाल बहुमं ज़ली इमारत; जल के कनारे बँधी नावaतथा g सी ढ़य पर फैले लोग,
चत्र 8.8 (पृष्ठ 177) — कसी नद -नगर के घाट : पत्थर क लंबी सी ढ़य
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छाते और धुले वस्त्र।
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चत्र 8.7 (पृष्ठ 176) तथा चत्र 8.8 (पृष्ठ 177) — छाया चत्र, जनका वणन यहाँ दया गया है; मूल चत्र पाठ्यपुस्तक म
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पहले दोन चत्र दे खए। चत्र 8.7 प्रयागराज का कुंभ मेला है — नद -तट पर ठसाठस भीड़ और उसके पीछे पं क्तबद्ध तंबू, दुकान
comयात्री। दोन चत्र काम और लेन-देन से भरे हुए ह। g l as
पुरो हत.और
और रोशनी। चत्र 8.8 कसी नद -नगर के घाट ह — ऊँची इमारत जो धमशालाएँ और सराय ह, सी ढ़य पर बँधी नाव, तथा घाट पर
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a gl इससे बनने वाला मानस मान चत्र यह है :
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यातायात ठहरने की व्यवस्था
बस, रेल, नाव, कु ली धमशाला, सराय, तंब ू
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पावन स्थल िशल्प और बाज़ार
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दुकानें, फूल, पसाद तीथ, मेला, घाट पीतल, वस्त्र, मूितयाँ, पुस्तकें
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सेवाएँ
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पुर ोिहत, मागदशक, नाई, सफ़ाईकम मेले, मंिडयाँ, व्यापार-माग
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पावन स्थल के चार ओर पनपने वाले आ थक जीवन का मानस मान चत्र। प्रत्येक शाखा तीथया त्रय के नरंतर आगमन से बनी एक
आजी वका है।
मानस मान चत्र को प ढ़ए
यातायात। तीथया त्रय को पहुँचाना पड़ता है — रेल, बस, घाट क नाव, पहाड़ी माग पर घोड़े और पालक , कुली और ठे ला
ख चने वाले। कई सड़क और रेल-लाइन इसी आवागमन के कारण बन ।
ठहरने क व्यवस्था। चत्र 8.8 क ऊँची इमारत सराय और धमशालाएँ ह। कुंभ म तो पूरा तंबुओं का नगर बसाया और उठाया
जाता है।
भोजन और पूजा-सामग्री। फूल और माला बेचने वाले, मठाई क दुकान, ना रयल और कपूर के वक्रेता, हजार के लए
भोजन बनाने वाले — चत्र 8.17 का बाज़ार यही है।
शल्प और बाज़ार। पीतल के पात्र, वस्त्र, मू तयाँ, माला, पुस्तक और स्थानीय वशेष वस्तुएँ बनती और बकती ह; कुछ शल्प
केवल इस लए जी वत ह क्य क कसी पावन स्थल पर उनक माँग बनी हुई है।
सेवाएँ। पुरो हत, पंडे और मागदशक, नाई, ना वक, सफ़ाईकम , सुरक्षाकम , छायाकार, और आज होटल तथा पयटन से जुड़े
लोग।
मेले और व्यापार। मेला एक बाज़ार भी है। व्यापारी दूर-दूर से वस्तुएँ लाते ह, पशु और अनाज का लेन-दे न होता है और —
जैसा अध्याय कहता है — तीथयात्रा माग तथा व्यापार माग प्राय: एक-दूसरे से जुड़ जाते ह।
ऐसा क्य होता है: पावन स्थल एक ही स्थान पर, बार-बार, पहले से ात त थय पर बड़ी संख्या म लोग को एकत्र
करता है। बाज़ार को ठ क यही चा हए। इस प्रकार श्रद्धा से माँग बनती है, माँग से काम और काम से एक नगर
टकता है — इसी लए भारत के अनेक प्राचीन नगर तीथ भी ह।
अभ्यास पु स्तका के लए संकेत: अपने आस-पास के कसी पावन स्थल के लए यही मान चत्र बनाइए और उसम
वास्त वक नाम भ रए — वहाँ जाने वाली बस, ार के बाहर क दुकान, वष म एक बार लगने वाला मेला और उससे
कमाने वाले लोग।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 179
चत्र 8.12, मोहनजोदड़ो क एक मुहर — तथा पीपल पर ‘आइए वचार कर' बॉक्स
प्र.1 मोहनजोदड़ो क इस मुहर का अवलोकन क जए। क्या आप इसके ऊपरी भाग म अं कत प त्तय को पहचान
सकते ह?
हाँ — ये पीपल क प त्तयाँ ह।
चत्र 8.12 को ध्यान से दे खए। छोट वगाकार मुहर के ऊपरी आधे भाग म प त्तय का एक पंखा-सा फैला है, जसक प्रत्येक पत्ती
हृदय के आकार क है और आगे जाकर लंबी नोक म बदल जाती है। यही लंबी नोक पीपल क पहचान है; कसी अन्य सामान्य
भारतीय वृक्ष म ऐसी नह होती। प त्तय के नीचे आमने-सामने दो स गधारी पशु-आकृ तयाँ ह और सबसे नीचे सधु ल प के चह्न
क एक पं क्त है।
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क्या दे ख मुहर पर
पत्ती का आकार चौड़ी, हृ दय जैस ी पत्त ी जो लंबी पतली नोक में समाप्त होती है
सजावट एक कें द ीय डंठल से फै लती पित्त यों का ग च्ु छ, जो मुहर का ऊपरी भाग भर दे ता है
पित्तयों के नीचे दोनों ओर संतिु लत रूप से रखी दो सी ंगधारी आकृ ितयाँ
िनचली प ी िसंध ु िलिप के अब तक न पढ़ े जा सके िचह्न , िजनमें एक पिहए जैस ा िचह्न भी है
यह क्य महत्वपूण है: यह मुहर लगभग 4,500 वष पुरानी है। य द मोहनजोदड़ो म पीपल इतना महत्वपूण था क
मुहर पर अं कत हुआ, तो इस एक वृक्ष के प्र त श्रद्धा उपमहा प म कम-से-कम साढ़े चार सह ा ब्दय से चली आ
रही है — “पीपल का वृक्ष कतनी शता ब्दय से भारत के सांस्कृ तक भूगोल का एक महत्वपूण हस्सा रहा है।” यही
वृक्ष आज भी हदू, बौद्ध, सख तथा जैन — चार के लए पावन है, और उसका वानस्प तक नाम भी यही कहता है :
फाइकस र ल जयोसा।
आइए वचार कर (पृष्ठ 179): पुस्तक आगे बताती है क पीपल के अनेक भाग का औषधीय उपयोग होता है —
प त्तयाँ त्वचा रोग म और छाल उदर रोग के नवारण म उपयोगी होती है — तथा वष भर हरा रहने के कारण यह
अनेक प क्षय और पशुओं को भोजन एवं आश्रय दे ता है। अथात यह वृक्ष केवल प्रतीक नह है : यह औषधालय भी
है और जीव का आश्रय भी। उसे पावन कहना समुदाय का वह उपाय है जससे ऐसा वृक्ष कभी काटा न जाए।
पाठ्य प्रश्न — पृष्ठ 180
भारत क क्षेत्रीय भाषाओं म पावन नकुंज के नाम क ता लका
प्र.1 नीचे द गई ता लका म भारत क क्षेत्रीय भाषाओं म पावन नकुंज के लए प्रयुक्त नाम दए गए ह। क्या आप
इसम कुछ नए नाम जोड़ सकते ह?
हाँ। पहले पुस्तक म दए नौ नाम एक साथ दे ख ली जए :
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भाषा / राज्य पावन नकुंज का नाम
मलयालम कावु
तिमल कोिवलकादु
कन्नड़ देवरे कादु
मराठी देवराई
खासी (मेघ ालय) खलाव केनतांग
िहंद ी (िहमाचल पदे श) देव वन
झारखंड सरना
छत्तीसगढ़ देवग ड
ु ़ी
राजस्थान ओरण
अब ता लका क तीन खाली पं क्तयाँ। भारत के अन्य भाग म प्रयुक्त नाम इस प्रकार ह :
भाषा / क्षेत्र नाम टप्पणी
राजस्थान (िबश्नोई एवं अन्य केंकड़ी, जोगमाया कसी स्थानीय दे वता से जुड़े वन, जनम खेजड़ी वृक्ष और काले हरण भी
समुद ाय) सुर क्षत रहते ह
उत्तराखंड / कु माऊँ देवभूिम वन, बुग्याल के दे व- ाम दे वता से जुड़े वन और ऊँचे बुग्याल
स्थल
मिणपुर (मैतेई) उमंग लाई ‘वन दे वता’ के नकुंज, गाँव के भीतर और आस-पास
के रल सपकावु नाग दे वता का नकुंज, प्राय: पा रवा रक भू म के एक कोने म
कन टक (कोडग )ु देवरकाडु, नागबन अकेले कोडगु जनपद म आज भी सैकड़ बचे ह
महारा (कोंक ण) देवराई, राई प्राय: कसी जल ोत के उद्गम पर, जससे जल भी सुर क्षत रहता है
ओिडशा जाहेर ा, ठाकु र म्मा जंग ल संताल तथा अन्य समुदाय के नकुंज-स्थल
मेघ ालय (खासी) लॉ िकंतांग , लॉ िलंग दोह मावफ्लांग ( चत्र 8.14) सबसे प्र सद्ध है
इसे स्वयं पूरा कैसे कर: सबसे अच्छा उपाय है पूछना। पता क जए क (1) आपके गाँव के पास का वन या पुराने
वृक्ष का झुरमुट आपक अपनी भाषा म क्या कहलाता है, (2) वह कस दे वता का है, और (3) वहाँ क्या करना
व जत है — प्राय: लकड़ी काटना, आखेट करना, यहाँ तक क सूखी टहनी ले जाना भी। स्थानीय नाम खाली पं क्त
म ल खए और उसके साथ वह नयम भी।
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इतने भन्न नाम क्य : क्य क पावन नकुंज कसी सरकारी आदे श से नह बने। प्रत्येक समुदाय ने अपनी भाषा म
और अपने दे वता के नाम पर अपने वन क रक्षा क । नाम भन्न ह; वचार आश्चयजनक रूप से एक ही है — यह वन
दे वता का है, इस लए इसे कोई हा न नह पहुँचा सकता — मेघालय से केरल तक।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 181
तीथयात्रा से व्यापार तक — व्यापार-माग ( चत्र 5.5) का अनुरेखण तीथ के मान चत्र पर
आइए पता लगाएँ
प्र.1 पारदश कागज क एक शीट ली जए जसका उपयोग अनुरेखण ( े सग) के लए कया जा सकता हो।
‘सा ाज्य उदय’ का नामक अध्याय म दए व्यापा रक माग के मान चत्र का अनुरेखण क जए। इसे महत्वपूण
तीथस्थल के मान चत्र पर र खए। आप इसके ारा क्या अवलोकन कर पा रहे ह?
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शिक्तपीठ
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ज्योितिल ंग
चार धाम
कुंभ मेला
िसख धम के पावन स्थल
बौद्ध धम के पावन स्थल
20°उ०
जैन धम के पावन स्थल
बंगाल
की खाड़ ी
अरब
सागर
10°उ०
िहंद महासागर
70°पू० 80°पू० 90°पू०
महत्वपूण तीथ का मान चत्र — चत्र 8.6, पृष्ठ 174, पुनर खत। व्यापा रक माग ( चत्र 5.5, पृष्ठ 92) का अनुरेखण इसी
मान चत्र पर रखना है।
करने क व ध: पारदश शीट को चत्र 5.5 (पृष्ठ 92) पर र खए। पहले समुद्र-तट क रेखा ख चए, फर उत्तरापथ एक रंग से,
द क्षणापथ दूसरे रंग से और शेष माग तीसरे रंग से, और नगर को बदुओं से अं कत क जए। अब शीट उठाकर चत्र 8.6 (पृष्ठ 174)
पर र खए और तट-रेखा तथा 70° पू०, 80° पू०, 90° पू० क रेखाओं को मलाइए, जससे दोन मान चत्र ठ क एक-दूसरे पर बैठ
जाएँ।
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अवलोकन: दोन मान चत्र बहुत हद तक एक-दूसरे पर बैठ जाते ह।
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व्यापार-माग का नगर ( चत्र 5.5) चत्र 8.6 म उसी स्थान पर क्या है
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काशी वाराणसी — एक महान तीथ, ठीक पास में सारनाथ (बौद्ध)
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कौशांबी पयागराज — कुं भ मेल ा स्थल , गंग ा-यमुना के संग म पर
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sज्eजैन — कुं भ मेला स्थल तथा महाकाले श्वर ज्योितिलगं
मथुर ा मथुर ा, जहाँ की यात्र ा िसख परंपरा में ग रु
ु नानक से जुड़ी है
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उज्जियनी
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ारका ारका, पिश्चमी चार धाम
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पुर ी के िनकट, पूव चार धाम
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किलंग नगर
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कांचीपुर कांचीपुर म , मंिदर -नगर तथा शिक्तपीठ
aglमदुरई मदुर ई, और आगे रामेश्वरम का माग — दिक्षणी चार धाम
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पाटिलपुत्र / राजग ृह / चंपा पटना सािहब (िसख), तथा िबहार -झारखंड के बौद्ध और जैन स्थल
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तक्षिशला, सुदू र उत्तर-पिश्चम में व्यापार -जाल और शिक्तपीठ-जाल , दोनों का उ त्त र -पिश्चमी छोर
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इससे तीन नष्कष स्पष्ट नकलते ह :
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e तीथ क भी ंखलाएँ ह।
1. तीथयात्रा माग और व्यापार माग बहुत हद तक एक ही सड़क ह। उत्तरापथ उत्तर म पूव-प श्चम चलता था — मथुरा, काशी
ंखsलाएँ
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g चा हए था, जो व्यापारी देते थे;
2. दोन.c जाल एक-दूसरे को पुष्ट करते थे। तीथया त्रय को भोजन, वस्त्र, पात्र और आवास
और पाट लपुत्र से होकर; द क्षणापथ कौशांबी से उज्ज यनी होते हुए प्र तष्ठान तक। दोन
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a se व्यापा रय को सुर क्षत, व्यस्त माग और वश्रामगृह चा हए थे, जो तीथया त्रय क आवाजाही से बने रहते थे। कुछ व्यापारी
agl “तीथयात्री के रूप म” चलते हुए अपनी वस्तुएँ दूर के नगर तक ले जाते थे।
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3. दोन जाल एक ही प रणाम क व्याख्या करते ह। वस्तुए,ँ सक्के, वचार और कहा नयाँ एक ही रेखाओं पर चल —
इसी लए अध्याय इसे “भारतीय उपमहा प के सांcस्क
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तक एक करण का प्रमुख कारण” कहता है।
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अंतर भी दे खए: व्यापार-मान a glम तट य और बंदरगाह रेखाएँ प्रबल ह (भरुकच्छ, सोपारा, ताम्र ल प्त, मु च र,
चत्र
कावेरीप ट्टनम), जो समुद्र व्यापार से जुड़ी थ ; जब क तीथ-मान चत्र हमालय म भीतर तक जाता है (बद्र नाथ,
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केदारनाथ, अमरनाथ), जहाँ कोई व्यापार-माग नह जाता। जहाँ धन ले जाता है, वहाँ माग बंदरगाह तक जाते ह;
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जहाँ श्रद्धा ले जाती है, वहाँ पगडं डयाँ पवत पर चढ़ती ह।
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आइए वचार कर — पृष्ठ 182
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 8 भौगो लक क्षेत्र कैसे पावन होते ह? AglaSem · NCERT Solutions
पावन स्थल का पुनरुद्धार और संरक्षण — चत्र 8.18, प्रदू षत न दयाँ और पावन प्राणी
आइए वचार कर
प्र.1 उन स्थान और प्रा णय के चत्र को सावधानीपूवक दे खए, जन्ह पावन माना जाता है। उत्तर म यमुना, पूव म
महानद तथा द क्षण म कावेरी, ये सभी न दयाँ पावन मानी जाती ह। फर भी ये इतनी प्रदू षत कैसे हो गईं? क्या
आपके आस-पास ऐसे पावन स्थल ह, जो मानवीय ग त व धय के कारण इसी तरह प्रदू षत एवं क्षीण हो गए ह?
हमारे पावन स्थल क पावनता को बनाए रखना कसका दा यत्व है? कक्षा म इस वषय पर चचा क जए।
तीन चत्र म क्या है — चत्र 8.18 (पृष्ठ 182) :
एक चौड़ी नद , जसक सतह गाढ़े सफ़ेद ज़हरीले झाग से ढक है; दूर के तट पर ऊँची इमारत क
कतार और बजली का एक खंभा (टावर) दखाई दे ता है।
एक भूरी गाय नद के कनारे प्ला स्टक क थै लय , रैपर और घरेलू कचरे के ढे र पर खड़ी है और
उसी कचरे म मुँह डालकर खाना ढूँ ढ़ रही है।
वन से ढक पहाड़ी के नीचे बहती एक नद , जसके घास वाले तट पर प्ला स्टक क बोतल,
थै लयाँ, पै कग और बहकर आई लक ड़याँ बखरी पड़ी ह।
चत्र 8.18, पृष्ठ 182 — छाया चत्र, यहाँ शब्द म व णत; चत्र स्वयं पाठ्यपुस्तक म दे खए।
पहले दे खए क चत्र म क्या है। चत्र 8.18 म चार छाया चत्र ह : रासाय नक झाग से ढक नद , जसके दूसरे तट पर कारखाने ह;
पहाड़ी नद के कनारे जमा प्ला स्टक कचरा; प्ला स्टक क बोतल और थै लय का ढे र; और एक गाय — जो पावन मानी जाती है
— उसी कचरे म मुँह डाले हुए। प्रत्येक चत्र कसी पावन वस्तु के साथ कूड़ाघर जैसा व्यवहार दखाता है।
न दयाँ इतनी प्रदू षत कैसे हो गईं? कसी एक कारण से नह , अनेक कारण से एक साथ :
कारण नद पर प्रभाव
अनुपचािरत मल -जल , तेजी से बढ़ ते नगरों से सबसे बड़ा ोत; नाले सीधे नद म गरते ह
औद्योिगक अपिशष्ट — रंग, चमशोधन, रसायन जल वषैला हो जाता है; चत्र का झाग इसी का प रणाम है
खेतों का बहाव — उवरक और कीटनाशक शैवाल बढ़ते ह, ऑक्सीजन घटती है, मछ लयाँ मरती ह
प्लािस्टक और ठोस कचरा, पूजा-सामग ी सिहत तट भर जाते ह; पशु उसे खाते ह, जैसे चत्र क गाय
अित दोहन — बाँध, नहरे ं, नलकू प जल कम होने से नद क अप शष्ट बहा ले जाने क क्षमता घट जाती है
कतु इन पाँच के पीछे एक गहरा कारण है, जसे अध्याय स्वयं बताता है : लोग और पावन भूभाग के बीच का पुराना सौहादपूण
संबंध आज “संकट” म है। हम आज भी नद को ‘गंगा जी’ कहते और पूजते ह — और फर उसी को नाला बना दे ते ह। श्रद्धा
केवल कमकांड रह गई, उत्तरदा यत्व नह रहा। जो व्य क्त नद को सचमुच माता माने, वह उसम कारखाने का पाइप नह खोलेगा।
आस-पास के क्षीण होते पावन स्थल। कक्षा म इनके वास्त वक नाम बताइए :
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 8 भौगो लक क्षेत्र कैसे पावन होते ह? AglaSem · NCERT Solutions
गाँव का तालाब या मं दर का कुंड, जो अब गाद, प्ला स्टक और जलकुंभी से भरा है।
वह पावन नकुंज, जो खेत , मकान या खदान के कारण सकुड़ गया — अध्याय बताता है क ऐसे अ तक्रमण से हजार नकुंज
घट गए ह।
नगर के नीचे क नद का वह भाग, जहाँ नाल के मलते ही जल का रंग बदल जाता है।
वह पहाड़ी मं दर, जसक ढलान अब नंगी ह या रैपर और बोतल से भरी ह।
सड़क चौड़ी करने म कटे पुराने वृक्ष, या नलकूप के बाद सूख गया जल ोत।
दा यत्व कसका है? सबका — चार स्तर पर; और सच यह है क एक भी स्तर चूक जाए तो काम नह चलता।
कौन क्या करना चा हए
हम में से पत्येक जल म कचरा न डाल; कपड़े का थैला ल; फूल बना प्ला स्टक के चढ़ाएँ; पावन स्थल से अपना कचरा
वापस लाएँ
समुद ाय — मंिदर सिमितयाँ, तालाब, नकुंज या घाट क सफ़ाई और रखवाली; पुराने नयम को पुनज वत करना; श्रमदान
पंचायत, नागिरक समूह
उ द्योग और व्यापार अप शष्ट को छोड़ने से पहले उपचा रत करना; व्यय प्रदूषक उठाए, नद नह
सरकार मल-जल शोधन संयंत्र बनाना और सचमुच चलाना; कानून लागू करना; नकुंज और न दय को व धक
संरक्षण दे ना — जैसे न्यूजीलड ने तारानक माउं गा के लए कया
इसम सं वधान कहाँ आता है: अध्याय अंत म स्मरण कराता है — “हमारी राष्ट्रीय धरोहर क रक्षा करना हमारा
कतव्य है। हमारा सं वधान भी हम इसक याद दलाता है।” अनुच्छेद 51क म प्रत्येक नाग रक के मूल कतव्य म
स म्म लत है — प्राकृ तक पयावरण क , जसम वन, झील, नद और वन्य जीव ह, रक्षा और संवधन करना,
प्रा णमात्र के प्र त दया रखना, तथा हमारी सामा सक संस्कृ त क गौरवशाली परंपरा का सम्मान करना। अत: पावन
नद क चता केवल धा मक भावना नह , संवैधा नक कतव्य है।
कक्षा म यह क जए: अपने क्षेत्र का कोई एक पावन स्थल चु नए। दो स्तंभ म ल खए — व रष्ठ लोग के अनुसार
वह पहले कैसा था और आज कैसा है। फर तीसरा स्तंभ बनाइए — इस महीने से आप म से प्रत्येक क्या एक काय
आरंभ कर सकता है।
आगे बढ़ने से पहले... — पृष्ठ 183
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 8 भौगो लक क्षेत्र कैसे पावन होते ह? AglaSem · NCERT Solutions
अध्याय के चार समापन कथन, स्पष्टीकरण स हत
आगे बढ़ने से पहले . ..
प्र.1 भारत के सभी धम के अपने-अपने पावन स्थल ह, जन्ह बदुओं के ारा स्थलाकृ त पर प्रद शत कया गया है।
बौद्ध, जैन और सख धम म ऐसे पावन स्थल सामान्य रूप से कसी महान व्य क्त से संबं धत होते ह।
अध्याय का पूरा पूवाद्ध इसी वाक्य म समाया है। भारत म जन्मी और बाहर से आई — हर परंपरा ने अपने पावन स्थल इस मान चत्र
पर छोड़े ह।
परंपरा अध्याय म उ ल्ल खत पावन स्थल वे पावन क्य ह
इस्लाम, ईसाई, न्न
अजमेर शरीफ़ ; वेल ांक ी चच, तिमलनाडु प्राथना और पूजा के स्थल, जहाँ वशेष अवसर पर श्रद्धालु जाते ह
यहूद ी, पारसी — और अन्य पंथ के लोग भी
बौद्ध धम साँची का स्तूप (अवशेष स्तूप); बोधगया का जहाँ महात्मा बुद्ध गए या जहाँ उनके अवशेष ह; बोधगया म
महाबोिध स्तूप उन्ह ने नवाण प्राप्त कया
जैन धम माउं ट आबू, िगरनार , शत्र ंज
ु य पहाड़ी (सौरा ) जहाँ तीथकर ने मोक्ष प्राप्त कया या उनके जीवन क व शष्ट
घटनाएँ घट — तथा वे वृक्ष, सरोवर और पवत जहाँ वे गए
िसख धम तख्त श्री पटना सािहब; अकाल तख्त, अम ृतसर ; सख गुरुओं से संबं धत अध्यात्म के आ धका रक कद्र; श्रद्धालु
तख्त श्री के शगढ़ सािहब, आनंद पुर जीवन म कम-से-कम एक बार वहाँ जाना चाहते ह
प्र तरूप दे खए: इन तीन परंपराओं म स्थल इस लए पावन है क्य क वहाँ कोई महान व्य क्त रहा। इसी लए ये
स्थल न श्चत ह और गनाए जा सकते ह। अगले बदु म एक बलकुल भन्न तक मलेगा।
प्र.2 हदू धम म तीथ स्थल का वृहत जाल है, जो संपूण भारत को आपस म जोड़ता है। तीथयात्रा क परंपरा लोग के
जीवन म गहराई से जुड़ी हुई है। यह न केवल व्य क्तगत एवं आध्या त्मक वकास को पो षत करती है, अ पतु
व्यापार और अ खल भारतीय सांस्कृ तक एक करण के सामा जक-आ थक उ े श्य को भी समथन दे ती है।
इस वाक्य को दो भाग म प ढ़ए।
पहला भाग — संपूण भूगोल को समेटता वृहत जाल। बखरे हुए स्थल नह , अ पतु तंत्र : चार कोन के चार धाम; ादश
ज्यो त लग; 51 श क्तपीठ, जो वतमान बांग्लादे श और पा कस्तान तक फैले ह; और “कई अन्य अंतसबं धत क्षेत्र”। चत्र 8.6
दखाता है क ये एक-दूसरे को बार-बार काटते हुए उपमहा प का कोई भाग शेष नह छोड़ते।
दूसरा भाग — तीथयात्रा लोग के लए क्या करती है। अध्याय एक साथ तीन उ े श्य गनाता है :
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उ े श्य अध्याय इसे कैसे दखाता है
व्यिक्तगत और आ ध् याित्मक तीथयात्र ा “न के वल शारीिरक और भौितक , बिल्क एक आ ध् याित्मक यात्र ा भी है” और इसके िलए िविशष्ट
आचार -व्यवहार आवश्यक है; पहाड़ी की किठन चढ़ ाई आंतिरक माग का पतीक है
आिथक — व्यापार का तीथयाित्र यों को वस्तुए ँ चािहए , व्यापारी दे ते है,ं माग िमल जाते है,ं कु छ व्यापारी स्वयं तीथयात्र ी होते है;ं मेले बाज़ार
िवस्तार बन जाते है ं
सास्ं कृितक — अिखल यात्र ी अनेक भाषाओं, रीित-िरवाजों, वस्त्र ों और भोजन के साथ उनकी सम रूपता का भी अनुभव करते है;ं िवचार
भारतीय एकीकरण साझा और पिरवितत होते है ं
यह वाक्य याद र खए: यह अभ्यास के प्रश्न 8 — तीथयात्रा के दोहरे महत्व — का सीधा उत्तर है : व्य क्त के लए
आंत रक वकास और दे श के लए सामा जक, आ थक तथा सांस्कृ तक वकास।
प्र.3 हदुओं, जनजा तय एवं लोक-परंपराओं म भू म को पावन माना जाता है।
यही वह बदु है जससे अध्याय का शीषक बनता है। यहाँ कोई भवन या व्य क्त नह , अ पतु स्वयं प्रकृ त पावन है।
वचार। प्रकृ त के कण-कण म दै वीय उप स्थ त का अनुभव। व शष्ट पवत, नद और वन दे वी-दे वताओं के रूप म पूजे जाते ह;
कई न दयाँ दे वी ह; कुछ वृक्ष, पशु और पौधे वशेष रूप से पावन ह; और अंतत: संपूण पृथ्वी पृथ्वी माता या भूदेवी है — चत्र
8.5 म भगवान वष्णु वराह अवतार म उन्ह क रक्षा करते दखाए गए ह।
अध्याय के जनजातीय उदाहरण। ओ डशा क नयम ग र ंखला म स्थत नयम ड गर पहाड़ी ड ग रया ख ड के लए पावन
है — यह सव च्च दे वता ‘ नयम राजा’ का नवास है, जो उन्ह भरण-पोषण क सब वस्तुएँ दे ते ह; वहाँ वृक्ष काटना दे वता का
अपमान है। नील ग र के टोडा अनेक शखर को अपने दे वताओं से जोड़ते ह, और यह भावना अनेक पौध , शोला वन , आद्र
भू म तथा व शष्ट पत्थर और वृक्ष तक फैली है। वष 2000 के आरंभ म स क्कम सरकार ने अनेक पावन पवत, गुफा, झील,
चट्टान और उष्ण जल ोत च ह्नत कए, जससे उन्ह कसी भी हा न से बचाया जा सके।
लोक और महाकाव्य उदाहरण। मेघालय के रकेव या बासा जैसे दे वताओं के नवास माने गए पावन नकुंज; और वे स्थल जो
श्रीराम के आगमन क स्मृ त म बने ह ( चत्र 8.11, बस्तर)।
इस मान्यता ने प्रकृ त क रक्षा कैसे क : अध्याय स्पष्ट कहता है — “इस अवधारणा ने ही हम प्रकृ त को सुर क्षत
तथा संर क्षत रखने म सहायता क , क्य क हम प्रकृ त से पृथक नह ह।” जो वन दे वता का हो, वह काटा नह जा
सकता; जो पवत स्वयं दे वता हो, उसका खनन नह हो सकता। संरक्षण के लए कसी नरीक्षक क आवश्यकता नह
पड़ी, क्य क नयम मान्यता के भीतर ही रहता था।
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उपेक्षा और दे खभाल क कमी के कारण हमारे पावन स्थल प्रदू षत होते जा रहे ह। हमारी रा ीय धरोहर क रक्षा
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करना हमारा कतव्य है। हमारा सं वधान भी हम इसक याद दलाता है।
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अध्याय एक चेतावनी और एक कतव्य पर समाप्त होता है।
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चेतावनी। यमुना, महानद और कावेरी — तीन पावन न दयाँ ह और तीन अत्यंत प्रदू षत ( चत्र 8.18)। भारत म कभी हजार
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पावन नकुंज थे, जनक संख्या कृ ष और उद्योग के अ तक्रमण से तेजी से घट रही है। न दय के अ त दोहन ने उनके लुप्त होने क
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स्थ त उत्पन्न कर द है और पावन पवत को ‘ वकास’ चुनौती दे रहा है। अध्याय के शब्द म, वह पुराना संबंध आज “संकट” म है।
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कतव्य। इस धरोहर क रक्षा वैक ल्पक नह है। हमारा सं वधान अनुच्छेद 51क म प्रत्येक नाग रक के मूल कतव्य म गनाता है —
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वन, झील, नद और वन्य जीव स हत प्राकृ तक पयावरण क रक्षा और संवधन, प्रा णमात्र के प्र त दया, तथा हमारी सामा सक
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संस्कृ त क समृद्ध वरासत का सम्मान और संरक्षण।
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उठाई है; क.c g सतत वकास एक वै श्वक वषय
आशा। अध्याय केवल नराशा नह दे ता। वह बताता है क लोग ने अपने पयावरण, दे वता और मूल्य क रक्षा के लए आवाज
भारत के अनेक क्षेत्र म पावन नकुंज का संरक्षण आज भी चल रहा है; और कaजब
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seहै, तब पावन भौगो लक क्षेत्र पर आधा रत वश्व-दृ ष्ट महत्वपूण योगदान दे सकती है। माओरी उदाहरण — तारानक माउंगा
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agको मनुष्य के समान अ धकार और दा यत्व देने वाला नयम — दखाता है क आधु नक व ध-व्यवस्था भी ऐसी दृ ष्ट से सीख रही है।
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संकेत: परीक्षा म संरक्षण पर लखते समय अध्याय के तीन स्तर जो ड़ए — मान्यता (प्रकृ त पावन है), व्यवहार
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(समुदाय ारा संर क्षत नकुंज, नद और पवत) तथा व ध (मूल कतव्य, और तारानक माउं गा जैसे कानून)।
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प्रश्न एवं याकलाप — पृष्ठ 183–184
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अध्याय के अंत का अभ्यास
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a प्र.1 प्र सद्ध पयावरण वद डे वड सुजुक के नम्न ल खत वाक्य पढ़ — “हम जस दृ ष्ट से वश्व को दे खते ह, उसी के
अनुसार उसके साथ व्यवहार करते ह। अगर पवत एक दे वता है, न क ख नज का ढे र; अगर न दयाँ पृथ्वी क
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शराएँ ह, न क केवल सचाई का ोत; अगर वन पावन नकुंज है, न क केवल इमारती लक ड़य का ढे र; अगर
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as के साथ व्यवहार करते ह। अत: यह वश्व को एक अलग प रप्रेक्ष्य म दे खने क
अन्य प्रजा तयाँ हमारे संबंधी ह, न क केवल साधनमात्र या अगर पृथ्वी हमारी माता है, न क केवल संसाधन; तब
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a ह म चचा क जए। आप उक्त वाक्य से क्या समझते ह? इससे हमारे चार ओर
हम इन सभी के साथ अत्यंत आदर
चुनौती है।” इस पर छोटे समू
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वद्यमान वायु, जल, भू म, वृक्ष तथा पवत के प्र त हमारे व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
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a s em कथन का अथ। सुजुक का पहला वाक्य ही पूरा तक है : “हम जस दृ ष्ट से वश्व को दे खते ह, उसी के अनुसार उसके साथ व्यवहार
agl करते ह।” हम कसी वस्तु को जो नाम देते ह, वही तय करता है क उसके साथ क्या करने क छू ट हम स्वयं को दे देते ह। फर वे
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पाँच जोड़े दे ते ह, और हर जोड़े म एक ही वस्तु के दो नाम ह :
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ऐसे दे ख … … या ऐसे प्रत्येक दृ ष्ट से क्या होगा
पवत जो दे वता है खिनज का ढे र आप उसे नमन कर उसक रक्षा करगे — या उसे तोड़कर खोदगे
नदी जो पथ्ृ वी की िशरा है के वल िसंचाई का ोत आप उसे बहती और स्वच्छ रखगे — या सूखने तक नचोड़गे
वन जो पावन िनकुं ज है इमारती लकड़ी आप गरी टहनी भी न उठाएँगे — या वृक्ष को घनमीटर म गनगे
अन्य पजाितयाँ जो हमारे संबंध ी है ं साधनमात्र आप उनके साथ स्थान बाँटगे — या उन्ह रास्ते से हटा दगे
पथ्ृ वी जो हमारी माता है के वल संस ाधन आप उतना ही लगे जतना वह दे सके — या वह सब लगे जो बक सके
अं तम चरण पर ध्यान द जए : य द हम वश्व को ऐसे दे ख, “तब हम इन सभी के साथ अत्यंत आदर के साथ व्यवहार करते ह।”
प्रकृ त के प्र त आदर और मनुष्य के प्र त आदर दो अलग आदत नह ह; दोन एक ही दृ ष्ट से उपजते ह। चुनौती नई तकनीक क
नह , दृ ष्ट बदलने क है।
यह कथन इस अध्याय म क्य है। सुजुक एक कनाडाई वै ा नक क दृ ष्ट से ठ क वही वश्व-दृ ष्ट बता रहे ह जसे यह अध्याय
भारत म दे खता आया है — नयम ग र क वह पहाड़ी जो नयम राजा का नवास है, ‘गंगा जी’ कहकर पुकारी जाने वाली नद ,
दे वता का नकुंज, वह पीपल जसे कोई नह काटता, वह पृथ्वी जो भूदेवी है, और माओरी पवत तारानक माउं गा जसे अब मनुष्य के
समान अ धकार प्राप्त ह।
हमारे व्यवहार पर प्रभाव
तत्व यह दृ ष्ट अपनाने पर क्या बदलेगा
वायु कम जलाएँ — पैदल चल, साइ कल और साझा वाहन प्रयोग कर; पत्ते और प्ला स्टक न जलाएँ; कंक्र ट के बदले वृक्ष लगाएँ और
बचाएँ
जल नद , तालाब या कुएँ को कभी कूड़ेदान न बनाएँ; प्ला स्टक और तेल उसम न डाल; रसाव ठ क कराएँ; वषा-जल संचय कर; मल-जल
शोधन का समथन कर
भूिम कचरा अलग कर और घटाएँ; एक बार प्रयोग होने वाला प्ला स्टक छोड़; नकुंज, तालाब क भू म या गोचर पर अ तक्रमण न कर
वृक्ष पुराने वृक्ष क — वशेषकर पीपल, बरगद और नीम क — रक्षा कर; दे शी प्रजा तयाँ लगाएँ; पास के पावन नकुंज को ‘ वक सत’
करने के बदले अक्षुण्ण रख
पवत अपना कचरा साथ नीचे लाएँ; नाजुक ढलान पर नमाण और खनन क सीमा का समथन कर; पहाड़ी तीथ क यात्रा को सैर नह ,
दा यत्व मान
नयम से अ धक दृ ष्ट क्य महत्वपूण है: नयम के लए नरीक्षक चा हए; दृ ष्ट आपके साथ चलती है। जो समुदाय
मानता है क नकुंज दे वता का घर है, वह बना वेतन के वष के हर दन उसक रखवाली करता है। इसी लए अध्याय
कहता है क सतत वकास के इस युग म पावन भौगो लक क्षेत्र आधा रत वश्व-दृ ष्ट “महत्वपूण योगदान दे सकती
है”।
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प्र.2 आपने क्षेत्र के पावन स्थल क सूची बनाइए। पता लगाइए क ये स्थल पावन क्य माने जाते ह? क्या इनसे जुड़ी
कोई कहा नयाँ ह? इस वषय म 150 शब्द म एक सं क्षप्त लेख ल खए। (संकेत— आप अपने प रवार एवं
समुदाय के व रष्ठ लोग से चचा कर सकते ह। अपने शक्षक से भी वचार- वमश क जए। इस प्रकार क
सूचनाओं का संग्रह करने के लए लेख एवं पुस्तक प ढ़ए)।
व ध — सामग्री कैसे जुटाएँ
1. पहले सूची बनाइए। अपने क्षेत्र म घूमकर या सोचकर हर प्रकार का पावन स्थल ल खए, केवल मं दर नह : दे वस्थान, म स्जद,
चच, गुरु ारा, दरगाह, कोई पावन वृक्ष, नकुंज, तालाब या जल ोत, पहाड़ी, सीमा-पत्थर, समा ध।
2. व रष्ठ लोग से पू छए। दादा-दाद , पुजारी या दे खभाल करने वाले, सबसे पुराने दुकानदार। तीन प्रश्न पू छए : यह कतना पुराना
है? यह स्थल वशेष क्य है? इससे जुड़ी कौन-सी कथा है? उनके शब्द उन्ह के रूप म ल खए।
3. दूसरा ोत भी दे खए। अपने शक्षक, जनपद का गजे टयर, पुस्तकालय, या स्थल पर लगे शलालेख और सूचना-पट्ट।
4. नयम खो जए। वहाँ क्या करना व जत है — जूते पहनना, वृक्ष काटना, आखेट, तालाब म मछली पकड़ना? नयम ही पावनता
और प्राय: पा र स्थ तक दोन बचाते ह।
150 शब्द के अ े लेख म क्या अवश्य हो
कम-से-कम तीन-चार स्थल के नाम और ठ क स्थ त।
प्रत्येक क्य पावन माना जाता है — दे वता, संत, कोई घटना या कोई प्राकृ तक वशेषता।
कम-से-कम एक कथा, जो आपके समुदाय म कही जाती है, और यह भी क वह आपको कसने सुनाई।
उस स्थल क वतमान दशा पर एक पं क्त — सुर क्षत है या उपे क्षत।
अंत म अपना एक वाक्य — इसे क्य बचाया जाना चा हए।
नमूना उत्तर (अपने वास्त वक नाम और कथाएँ भरकर इसे बदल ली जए) : “हमारे क्षेत्र म तीन स्थल पावन माने
जाते ह। पहला नद के कनारे का शव मं दर है, जसे गाँव के लोग तीन सौ वष से अ धक पुराना बताते ह; कहते ह
क लग कसी ने स्था पत नह कया था, वह एक ग्वाले को तब मला जब उसक गाय प्र त दन उसी स्थान पर दूध
बहा दे ती थी। दूसरा चौराहे का पुराना पीपल है। उसक टहनी तक कोई नह काटता; स्त्रयाँ उस पर लाल धागा
बाँधती ह और पंचायत उसी क छाया म बैठती है। तीसरा मं दर के पीछे का तालाब है, जहाँ मछली कभी नह पकड़ी
जाती क्य क वे दे वता क मानी जाती ह — यही कारण है क जब आस-पास के पोखर सूख गए, तब भी यह तालाब
भरा और स्वच्छ रहा। ये तीन स्थल कसी कानून से नह , एक कथा से सुर क्षत ह जस पर लोग आज भी वश्वास
करते ह। इसी लए ये बचे ह और इसी लए हम इन्ह बचाए रखना चा हए।”
प्र.3 आपके वचार म प्राकृ तक तत्व, जैसे – नद , पवत और वन आ द लोग के लए पावन क्य माने जाते ह? वे हमारे
जीवन म कस प्रकार योगदान दे ते ह?
वे पावन क्य माने जाते ह। अध्याय म चार कारण चलते ह, और चार एक-दूसरे को पुष्ट करते ह।
1. प्रकृ त के कण-कण म दै वीय उप स्थ त का अनुभव। हदू तथा अनेक लोक एवं जनजातीय मान्यताओं म पवत, नद , वृक्ष,
पौधे, पशु और पत्थर तक पावन ह; कई न दयाँ दे वी के रूप म पूजी जाती ह और अंतत: संपूण पृथ्वी भूदेवी है।
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2. वे जीवन दे ते ह। “ये न दयाँ भारतीय सभ्यता के लए जीवनदा यनी रही ह।” जल, मट्ट , अन्न, औष ध, लकड़ी, वषा —
समुदाय क हर आवश्यकता नद , वन और पवत से आती है। जो जीवन दे ता है, उसके प्र त श्रद्धा स्वाभा वक है।
3. वे वस्मय जगाते ह। हम शखर, बाढ़ म बहती नद या वशाल पुराना वृक्ष कसी भी मानव जीवन से बहुत बड़े और बहुत पुराने
ह। ऊँचाई के कारण ही पवत को “पृथ्वी से स्वग तक के प्रतीकात्मक प्रवेश- ार” के रूप म दे खा गया, अत: चढ़ाई दव्य तक
पहुँचने क यात्रा बन गई।
4. उनसे कथाएँ और स्मृ तयाँ जुड़ी ह। महाकाव्य म पावन न दय , वन और पवत का स्पष्ट वणन है; गाँव मानते ह क राम या
पांडव वहाँ से गए; तीथकर ने कन्ह पहा ड़य और सरोवर पर ध्यान कया; नयम राजा नयम ड गर पर रहते ह। जस स्थान
क कथा हो, उसका नाम भी होता है और रक्षक भी।
वे हमारे जीवन म क्या योगदान दे ते ह
तत्व हम क्या दे ता है
निदयाँ पेयजल , िसंचाई, मछली, आवागमन और व्यापार -माग ; उपजाऊ मैद ान; संग मों पर कुं भ जैसे िवशाल समागम
पवत निदयों का उद् ग म , िहम और वष ; वन, जड़ी-बूिटयाँ और खिनज; शीतल जलवायु; र क्षा-कवच; और वे तीथ जहाँ लाखों आते है ं
वन और पावन स्वच्छ वायु, ईंध न और लकड़ी, फल , औषिध , चारा; वन्य जीवों का आवास ; जल और िम ी की पकड़; पावन िनकुं ज
िनकुं ज “वनस्पितयों एवं जीवों की िवशाल जैव-िविवधता” और छोटे जलाशयों को आ श्रय दे ते है ं
पीपल जैसे वृक्ष छाया, ऑ क्सीजन, औषिध (पित्त याँ त्वचा रोगों में, छाल उदर रोगों में), तथा लगभग पूरे वष पिक्षयों और पशुओ ं को भोजन एवं
आ श्रय
पशु-पक्षी तंजावुर के िनकुं ज के दे वता िजन फल -चमगादड़ों की र क्षा करते है,ं वे पुष्पों का परागीकरण और बीजों का पसार करते है ं —
दे वता, पािरिस्थितकी और मानव, तीनों का एक सामंजस्य
गहरी बात: यहाँ श्रद्धा और उपयो गता वरोधी नह ह। कसी वस्तु को पावन कहना समुदाय का वह उपाय है जससे
जो उसे जी वत रखता है, वह कभी नष्ट न हो। अध्याय के शब्द म — “इस अवधारणा ने ही हम प्रकृ त को सुर क्षत
तथा संर क्षत रखने म सहायता क , क्य क हम प्रकृ त से पृथक नह ह।”
प्र.4 लोग तीथ या अन्य पावन स्थल क यात्रा क्य करते ह?
अध्याय अनेक कारण दे ता है; प्राय: ये एक ही यात्री म एक साथ काम करते ह।
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कारण अध्याय से
उ च्चतर जीवन में पवेश के तीथ शािब्दक अथ में पार करने का स्थल है; पतीकात्मक दृ िष्ट से वह स्थान जहाँ कोई “अपने सामान्य जीवन से
िलए उ च्च और आ ध् याित्मक जीवन में पवेश करता है”
आंतिरक यात्रा के िलए यात्र ा “न के वल शारीिरक और भौितक , बिल्क एक आ ध् याित्मक यात्र ा भी है”; सबरीमाला का किठन माग
“आ ध् याित्मक यात्र ा की किठनाइयों का पतीक ” है
क्योंिक वहाँ कोई महान व्यिक्त जहाँ बुद्ध गए या जहाँ उनके अवशेष है;ं जहाँ तीथक
ं रों ने मोक्ष पाया; ग रु
ु ओं से जुड़े तख्त, जहाँ िसख श्रद्धालु
रहा जीवन में कम -से -कम एक बार जाना चाहते है ं
क्योंिक समय मांग िलक है हिर ार , पयागराज, नािसक और उ ज्जैन में “एक िवशेष खगोलीय अविध में वहाँ की निदयों में डुबकी लगाना
अत्यंत मांग िलक माना जाता है”
संकल्प या आकाक्षं ा पूरी कु छ िहंदू चार धामों की यात्र ा की इच्छा रखते है;ं धम पाल का दल हिर ार पहच
ु ँ े िबना िद ल्ली में भी रुकने को
करने के िलए तैयार नही ं था
सीखने, चच और िवचार- लोग “चच , िवचार -िवमश, अपने मत-िवश्वास को लोकिपय बनाने तथा पितिष्ठत िशक्षकों से सीखने या अध् ययन
िवमश के िलए करने” जाते थे
व्यापार के िलए व्यापारी क्रय-िवक्रय के िलए यात्रा करते थे, और “कु छ व्यापारी तीथयात्री के रूप में” भी चलते थे
संगित और संसार दे खने के पूरे गाँव के दल महीनों साथ चलते थे और माग में नई भाषाएँ, भोजन और रीितयाँ दे खते थे
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एक वाक्य म: लोग तीथ इस लए जाते ह क भीतर कुछ बदल जाए — कतु माग म वे अपना दे श भी दे ख लेते ह,
उसके लोग से मलते ह, क्रय- वक्रय करते ह, सीखते- ववाद करते ह और यह सब साथ लेकर लौटते ह।
प्र.5 प्राचीन तीथयात्रा माग ने उस समय कस प्रकार व्यापार को प्रोत्सा हत कया? आपके अनुसार ये पावन स्थल उन
क्षेत्र के आ थक वकास म कस प्रकार सहायक बने?
भाग 1 — तीथयात्रा माग ने व्यापार को कैसे बढ़ाया
1. तीथयात्री ग्राहक थे। “तीथया त्रय को अनेक प्रकार क वस्तुओं क आवश्यकता होती है, जन्ह व्यापारी उपलब्ध कराते ह” —
भोजन, वस्त्र, पात्र, फूल, तेल, पूजा-साम ी, पहाड़ के लए कंबल। या त्रय का नरंतर प्रवाह अथात नरंतर बाज़ार।
2. दोन के लए एक ही माग। माग आपस म जुड़ जाते थे। उत्तरापथ उत्तर-प श्चम को पूव से जोड़ता था — मथुरा, काशी और
पाट लपुत्र होते हुए; द क्षणापथ कौशांबी से उज्ज यनी होते हुए प्र तष्ठान तक जाता था। ‘आइए पता लगाएँ’ के अनुसार
व्यापार-मान चत्र को तीथ-मान चत्र पर र खए और रेखाएँ एक-दूसरे पर बैठ जाती ह।
3. व्यापारी और तीथयात्री प्राय: एक ही व्य क्त थे। “कुछ व्यापारी तीथयात्री के रूप म तीथ स्थल क यात्रा करते हुए अपनी
वस्तुओं को भी दूर-दूर तक के उपनगर एवं नगर म वक्रय के लए ले जाते ह।”
4. नरंतर आवागमन ने माग जी वत रखे। घाट, वश्रामगृह, नानेघाट जैसी गुफाएँ, कुएँ और पहरा इस लए बने रहते थे क लोग
नरंतर आते-जाते थे; इनका लाभ व्यापा रय को भी उतना ही मला।
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5. मेले थोक बाज़ार थे। जो आयोजन ात त थ पर अनेक क्षेत्र से लाख लोग को एक स्थान पर लाए, वह बड़ी मंडी के लए
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आदश है — वस्तुए,ँ पशु, शल्प और समाचार, सब वह बदलते थे।
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6. वस्तुए ँ दूर तक पहुँच । इन माग से सीप और मोती, सक्के, स्वण और हीरे, कपास, मसाले तथा चंदन ऐसे क्षेत्र तक पहुँचे जहाँ
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भागg2l — क्या पावन स्थल क्षेत्र के आ थक वकास म सहायक बनते ह? हाँ, और यह सरलता से दखता है।
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प्रभाव आज यह कैसा दखता है
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रोजगार
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पुर ोिहत और माग दशक , दुक ानदार , रसोइए , नािवक , चालक , कु ली, होटल और सफ़ ाई कम चारी, छायाकार
स्थानीय िशल्प और उपज
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माला, पीतल और िम ी के पात्र , मूितयाँ, िमठाई, वस्त्र और स्म ृित-िचह्न स्थानीय स्तर पर बनते और िबकते है ं
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अवसंरचना
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सड़कें , रे ल वे स्टेशन, पुल , जलापूित, िबजली और िचिक त्सालय, जो याित्र यों के िलए बनते है ं और सबके काम आते है ं
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पैमाना .co a g
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बोधगया में पितवष चालीस लाख से अिधक ; सबरीमाला में लगभग एक करोड़; 2025 के कुं भ में लगभग 66 करोड़
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क्र पव और शुभ ऋतुए ँ नगर को कमाई का एक िनिश्चत कै ले ंडर दे दे ती है ं
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कतु एक चेतावनी भी जो ड़ए: यह वकास संभालकर करना होगा। भीड़ अपने साथ प्ला स्टक, मल-जल,
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यातायात और नाजुक पहा ड़य तथा नद -तट पर नमाण भी लाती है — चत्र 8.18 यही दखाता है। जो वकास
स्थल क पावनता ही नष्ट कर दे , वह अंgतlत: उस कारण को भी नष्ट कर दे गा जसके लए लोग आते थे। सच्चा उत्तर
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यह है : हाँ, पावन स्थल क्षेत्र क अथव्यवस्था बढ़ाते ह — बशत कमाई के साथ स्थल क रक्षा भी होती रहे।
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प्र.6 .cपावन स्थल कस प्रकार वहाँ के लोग क संस्कृ त और परंपरा को प्रभा वत
a gकरते ह?
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पावन स्थल पर केवल यात्रा नह होती; वह धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र के जीने के ढं ग को गढ़ दे ता है।
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जीवन का पक्ष पावन स्थल उसे कैसे गढ़ता है
वािषक कै ले ंडर पव, मेले और शुभ स्नान-ितिथयाँ वष को बाँध दे ती है ं — पंढरपुर की पितवष वारी, पयागराज का छह वष पर कुं भ,
स्थानीय िनकुं ज-दे वता का वािषक मेल ा
अनुष्ठान और दै िनक क्र
जल के अनुष्ठानों में सात निदयों का आ ान; हल्दी-कु मकु म से वृक्षों का अलंक रण; स्नान, पिर मा या दीपक
आदते ं साधारण जीवन का अंग बन जाते है ं
कलाएँ स्थल के चारों ओर गीत, स्तुितयाँ, नत्ृ य, नाट और मंिदर -स्थापत्य िवकिसत होते है;ं महाकाव्यों के पसंग स्थानीय
पिरवेश में कहे जाते है ं
आजीिवका और पूरे पिरवार माला बनाने वाले , पीतल -िशल्पी, रसोइए , नािवक या माग दशक बन जाते है ं — कौशल पीिढ़ यों तक चलता है
कौशल
भोजन िवशेष पसाद और पव-व्यंजन; क्या और कब खाया जाए , इसके िनयम ; तथा अन्नदान की परंपरा
सामािजक जीवन मंिदर का पांग ण, तालाब या िनकुं ज िमलने, िववाद सुल झाने और गाँव के िनणय ले ने का स्थान बनता है; दू र से आए
यात्र ी नए समाचार और िवचार लाते है ं
भाषा और नाम स्थान-नाम , कु ल -नाम और मुहावरे दे वता से बनते है;ं पावन िनकुं ज का हर भाषा में अपना शब्द है — कावु, देवराई,
सरना, ओरण
पकृित संबंधी िनयम वृक्ष न काटना, आखेट न करना, तालाब में मछली न पकड़ना, पहाड़ी पर खनन न करना — ऐसी रीितयाँ स्थल के साथ
पािरिस्थितकी की भी र क्षा करती है ं
दू सरों के पित खुल ापन न्न न्न
अजमेर और वेल ांक ी जैसे स्थलों पर अनेक पंथों के लोग आते है,ं अत: आस -पास का समाज िभ ता के साथ जीना
सीखता है
प्रभाव इतना गहरा क्य : पावन स्थल समुदाय को एक साथ तीन चीज दे ता है — एक साझी कथा, एक साझा
कैलडर और एक साझा स्थान। जब लोग एक ही कथा कहने लग, एक ही दन पर एकत्र ह और एक ही स्थान पर
मल, तो संस्कृ त और परंपरा लगभग स्वयं ही बन जाती है।
प्र.7 भारत के व वध प्रकार के पावन स्थल म से अपनी रु च के अनुसार कन्ह द का चयन क जए तथा उनका
महत्व बताते हुए एक प रयोजना बनाइए।
प रयोजना कैसे बनाएँ
1. ऐसे दो स्थल चु नए जो एक-दूसरे से भन्न ह , ता क प रयोजना म कहने को कुछ हो — जैसे एक हमालयी और एक तट य,
या एक बौद्ध और एक हदू, या एक वशाल तीथ-नगर और एक छोटा पावन नकुंज।
2. दोन के लए वही आठ शीषक र खए, जससे तुलना हो सके : कहाँ है · कस परंपरा का · पावन क्य है · इससे जुड़ी कथा ·
वहाँ क्या दखता है · लोग कब जाते ह · स्थानीय अथव्यवस्था और पा र स्थ तक पर प्रभाव · आज क एक समस्या।
3. भारत का मान चत्र लगाइए, जस पर दोन स्थल अं कत ह , और प्रत्येक के लए एक चत्र या रेखा चत्र द जए।
4. ोत ल खए — पाठ्यपुस्तक, जन व रष्ठजन से बात क , कोई पुस्तक या वेबसाइट।
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5. अंत म अपना एक पृष्ठ जो ड़ए : इतनी दूर स्थत इन दो स्थल म समान क्या है।
नमूना उत्तर — एक तुलना, जसे आप अपने अनुसार बदल सकते ह
बोधगया, बहार मावफ्लांग पावन नकुंज, मेघालय
कहाँ म ध् य िबहार में फ ल्ग ु नदी के तट पर खासी पहािड़यों में, िशलांग से लगभग 25 िकमी (िचत्र
8.14)
परंपरा बौद्ध धम ; अनेक दे शों के लोग आते है ं खासी समुद ाय की मान्यता; िनकुं ज खलाव केनतांग है
पावन क्य बौद्ध परंपरा के अनुस ार यही ं महात्मा बुद्ध ने ान पाप्त िकया; वन दे वता — िरंके व या बासा — का िनवास है; वन लोगों
महाबोिध स्तूप उस स्थान को िचिह्न त करता है का नही,ं दे वता का है
कथा महाबोिध मंिदर के वृक्ष को मूल वृक्ष का वंशज बताया जाता है, िनकुं ज से कु छ भी बाहर नही ं ले जाया जा सकता, सूखा
ृ ’ और
िजसके नीचे बुद्ध बैठे थे — इसी से ‘बोिध वक्ष पत्त ा तक नही;ं ऐसा करने वाले को दे वता दंड दे ते है,ं यह
‘बोधगया’ नाम पड़े माना जाता है
पैमाना पितवष चालीस लाख से अिधक यात्र ी क्षेत्र फल छोटा, िकं तु भारत भर में फै ले हजारों िनकुं जों में से
एक
क्या बचाता है एक स्मारक और एक जीिवत वृक्ष-परंपरा; िवश्व धरोहर स्थल दुल भ ऑिक ड, औषधीय पौधे , पाचीन वृक्ष, जल ोत —
“वनस्पितयों एवं जीवों की िवशाल जैव-िविवधता”
अथव्यवस्था होटल , माग दशक , अनेक दे शों के मठ, यातायात, िशल्प, समुद ाय ारा संचािलत िनद िशत भमण; नीचे बसे गाँवों के
अंतररा ीय पयटन जल ोतों की र क्षा
आज क भीड़, कचरा और नाजुक स्मारक पर दबाव क्र
कृ िष और िनम ण के िलए अित मण, जैस ा अध् याय
समस्या िनकुं जों के िवषय में सामान्यत: बताता है
आपका समापन अनु े द यह कह सकता है: इनम से एक स्थल वश्वप्र सद्ध है और दूसरा प्राय: अपने ही गाँव
तक सी मत; एक क रक्षा कानून और अंतरराष्ट्रीय ध्यान करते ह, दूसरे क एक कथा और एक नयम। फर भी दोन
एक ही कारण से बचे ह — कसी समुदाय ने तय कया क भू म के इस टु कड़े को कभी हा न नह पहुँचाई जाएगी।
प्र.8 तीथयात्राएँ कस प्रकार दोहरा महत्व रखती ह?
तीथयात्रा दो स्तर पर एक साथ काम करती है — भीतर क ओर, यात्रा करने वाले व्य क्त के लए; और बाहर क ओर, उस
समाज के लए जससे होकर वह गुजरता है।
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1. आंत रक यात्रा — व्य क्त के लए 2. बाह्य यात्रा — समाज के लए
यह क्या है वह यात्र ा जो “न के वल शारीिरक और भौितक , बिल्क एक संपूण उपमहा ीप में लोगों, वस्तुओ ं और िवचारों का
आ ध् याित्मक यात्र ा भी है” और िजसके िलए िविशष्ट आचार - आवागमन
व्यवहार आवश्यक है
यह क्या व्यिक्तगत एवं आ ध् याित्मक िवकास — सामान्य जीवन से उ च्च, सामािजक -आिथक उ े श्य : व्यापार का िवस्तार और
दे ती है आ ध् याित्मक जीवन में पवेश, जो ‘तीथ’ शब्द का ही अथ है अिखल भारतीय सांस्कृ ितक एकीकरण
अध्याय म सबरीमाला की किठन चढ़ ाई, जो आंतिरक माग की किठनाइयों तीथयात्र ा और व्यापार माग ं का िमल जाना; व्यापािरयों का
प्रमाण का पतीक है; पंढरपुर की इक्कीस िदन की वारी; धम पाल के तीथयात्र ी भी होना; याित्र यों का अनेक भाषाओं, रीितयों,
उस दल का अनुशासन, जो िद ल्ली में भी नही ं रुका वस्त्र ों और भोजन तथा उनकी सम रूपता का अनुभव
प रणाम एक बदला हुआ व्यिक्त एक जुड़ा हुआ दे श — नेहरू के शब्दों में, “एक दे श और
एक संस्कृ ित की भावना”
दोन अलग क्य नह हो सकते: तीथयात्री केवल पहले कारण से नकलता है। दूसरा अपने आप घ टत होता है,
केवल इस लए क इतने लोग इतनी दूर तक इतने लंबे समय तक चलते ह। इसी प्रकार श्रद्धा का एक नजी काय,
तीन हजार वष तक करोड़ लोग ारा दोहराए जाने पर, एक पूरे उपमहा प को आपस म बुन गया।
अध्याय — एक नज़र म
इस अध्याय म पावनता का अथ है — कसी वस्तु म गहरे धा मक या आध्या त्मक भाव का अनुभव, जो पावन एवं
दव्य हो तथा आदर और श्रद्धा के योग्य हो। यह ‘वस्तु’ केवल कोई भवन नह होती। यह कोई वशेष स्थल या धा मक स्थान
हो सकता है, कोई वशेष प्रकार क यात्रा (तीथयात्रा), उस यात्रा का माग, अथवा वह संपूण भूभाग जससे होकर यात्रा
गुजरती है। इसी लए पावनता केवल धम और आध्या त्मकता से नह , अ पतु भूगोल और जीवंत परंपराओं से भी जुड़ी हुई है।
भारत म प्राय: प्रत्येक वचारधारा और धम के अपने-अपने पावन स्थल ह। भारत से बाहर उद्भव हुए धम — इस्लाम,
ईसाई, यहूद , पारसी — के पावन स्थल ह, जैसे अजमेर शरीफ़ तथा त मलनाडु का वेलांकन्नी चच, जहाँ अन्य पंथ के लोग भी
जाते ह। बौद्ध धम म वे स्थल पावन ह जहाँ महात्मा बुद्ध गए या जहाँ उनके अवशेष ह — साँची का स्तूप तथा बोधगया का
महाबो ध स्तूप, जहाँ प्र तवष चालीस लाख से अ धक यात्री आते ह। सख धम म तख्त अध्यात्म के आ धका रक कद्र ह —
तख्त श्री पटना सा हब, अकाल तख्त (अमृतसर), तख्त श्री केशगढ़ सा हब (आनंदपुर)। जैन तीथ वहाँ ह जहाँ तीथकर ने
मोक्ष प्राप्त कया — माउं ट आबू, गरनार, शत्रुंजय।
लगभग 3000 वष से, आधु नक यातायात के अभाव म भी, भारतीय जन समस्त उपमहा प म तीथयात्राएँ करते आ
रहे ह। ‘तीथ’ का शा ब्दक अथ है वह स्थल जहाँ नद या जल को पार कया जाता है; प्रतीकात्मक दृ ष्ट से वह स्थान जहाँ कोई
साधारण जीवन से उच्च और आध्या त्मक जीवन म प्रवेश करता है। यह यात्रा केवल शारी रक नह , आंत रक भी है और इसके
लए व शष्ट आचार-व्यवहार आवश्यक है — आठ सौ वष पुरानी पंढरपुर वारी म तीथयात्री आज भी इक्क स दन पैदल चलते
ह, और सबरीमाला म प्र तवष लगभग एक करोड़ श्रद्धालु आते ह।
तीथ के अंतसबंध का जाल मान चत्र को ही पावन भूभाग बना दे ता है। चार धाम भारत के द क्षण, उत्तर, पूव तथा
प श्चम कोन म स्थत ह; ादश ज्यो त लग तथा 51 श क्तपीठ संपूण उपमहा प म फैले ह। सती के शरीर के अंग जहाँ-
जहाँ गरे, वे श क्तपीठ बने — इस कथा का आशय स्पष्ट है : संपूण भारतीय उपमहा प दे वी माता का ही रूप है। इन माग
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पर चलते हुए तीथयात्री व वध भाषाओं, री त- रवाज , वस्त्र और खाद्य पदाथ के साथ-साथ उनक समरूपता का भी अनुभव
करते थे। यही भारतीय उपमहा प के सांस्कृ तक एक करण का प्रमुख कारण बना।
पावन पा र स्थ तक : न दयाँ, पवत, वृक्ष और पावन नकुंज। तीथ स्थल नद , झील, वन या पहाड़ पर होते ह, अत: संपूण
प्राकृ तक प रदृश्य ही पावन क्षेत्र या पुण्यक्षेत्र माना जाता है। ऋग्वेद का नद -स्तु त सूक्त उन्नीस प्रमुख न दय का आ ान
करता है; आज भी जल का आ ान गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नमदा, सधु तथा कावेरी के नाम से होता है। पीपल
(फाइकस र ल जयोसा) हदू, बौद्ध, सख तथा जैन — चार के लए पावन है और उसक प त्तयाँ मोहनजोदड़ो क मुहर पर
अं कत ह। समुदाय ने पूरे वन को पावन नकुंज के रूप म बचाया — कावु, दे वराई, खलाव केनतांग, सरना, ओरण — जो
आज वशाल जैव- व वधता को आश्रय दे ते ह।
तीथयात्रा माग और व्यापार माग एक-दूसरे से जुड़ गए, और यह वचार केवल भारत का नह है। तीथया त्रय को वस्तुएँ
चा हए थ , व्यापारी उन्ह उपलब्ध कराते थे और कुछ व्यापारी स्वयं तीथयात्री भी थे — इसी लए उत्तरापथ और द क्षणापथ
उन्ह नगर से होकर गुजरते थे जहाँ तीथ थे। प्राचीन ीस, अमे रका के मूल नवासी तथा न्यूजीलड के माओरी — जनके
तारानक माउंगा पवत को हाल ही म मनुष्य के समान अ धकार दए गए — भी ऐसी ही दृ ष्ट रखते ह। आज हमारी पावन
न दयाँ और स्थल अत्यंत प्रदू षत ह; इस धरोहर क रक्षा करना हमारा कतव्य है, जसक याद हमारा सं वधान भी दलाता है।
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त्व रत पुनरावृ त्त
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ag रखने योग्य
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शब्द अथ अध्याय म कहाँ याद
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पावनता िकसी वस्तु में गहरे धािमक या आध्याित्मक भाव का अनुभव, पृष्ठ 168 यह कोई स्थल, कोई यात्रा, कोई माग या
स्वयं भूभाग हो सकता है
जो पावन और िदव्य हो तथा आदर एवं श्रद्धा के योग्य हो
co m हा शया, पृष्ठ 169
तीथयात्रा
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िकसी पावन स्थल की यात्रा, जो उससे संबंिधत धम या मत-
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िवश्वास के िलए महत्वपूण स्थान रखती है परंपरा
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पावन स्थल वह स्थल जो िकसी िदव्य, पावन स्म ृित अथवा आध्याित्मक हा शया, पृष्ठ 169 अजमेर शरीफ़ और वेलांकन्नी चच म
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व्यिक्त से संबंध के कारण पावन माना जाता है अनेक पंथ के लोग आते ह
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पावन अवशेष िकसी संत या आध्याित्मक व्यिक्त के शरीर का अंश या उनसे हा शया, पृष्ठ 169
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संबंिधत वस्तु, िजसे सम्मान के साथ रखा जाता है
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तख्त िसख धम में अध्यात्म का आिधकािरक कें द पृष्ठ 169 तख्त श्री पटना सा हब · अकाल तख्त,
अमृतसर · तख्त श्री केशगढ़ सा हब,
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आनंदपुर
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शािब्दक अथ में वह स्थल जहाँ नदी या जल का .cोत पार agl
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तीथ हा शया, पृष्ठ 170 इसी अथ से समझ आता है क तीथ
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से उच्च, आध्याित्मक जीवन मेa ं पg
िकया जाता है; पतीकात्मक दृ िष्ट से जहाँ कोई सामान्य जीवन नद -तट और संगम पर क्य ह
वेश करता है
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तीथकर जो तीथ का िनम ण करता है, अथ त जो साधारण जीवन से हा शया, पृष्ठ 171 जैन तीथ : माउंट आबू, गरनार,
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शत्रुंजय
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ऊपर उठकर उच्चतर जीवन की ओर मागदशन करता है;
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जैन परंपरा में सव च्च धम पदे शक
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वह तीथयात्रा जो िनयिमत रूप से होती है — पंढरपुर में पितवष चत्र 8.4, पृष्ठ 171 महाराष्ट्र क आठ सौ वष पुरानी परंपरा;
a तीथयात्री इक्क स दन चलकर वठोबा
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मं दर पहुँचते ह
चार पावन स्थल, िजनकी यात्रा की इच्छा कु cछoिहंm g l a
चार धाम
ये भारत के चार कोनों में िस्थत है ं em
. दू रखते है;ं पृष्ठ 173, मान चत्र बद्र नाथ (उत्तर) · पुरी (पूव) · रामेश्वरम
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(द क्षण) · ारका (प श्चम)
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चत्र 8.6
ज्यो त लग /
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भगवान िशव से संबंिधत aादश पावन स्थल, पत्येक का अपना पृष्ठ 173 तथा श क्तपीठ वतमान बांग्लादे श तथा
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श क्तपीठ नाम और पौरािणक पष्ृ ठभूिम; तथा वे 51 स्थल जहाँ माता सती हा शया पा कस्तान तक फैले ह
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के अंग िगरे
m as e भूभाग, संस्कृ त और आध्या त्मकता का
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पुण्यक्षेत्र पावन क्षेत्र — संपूण पाकृ ितक पिरदृ श्य ही पावन स्थल के रूप पावन
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में पा र स्थ तक परस्पर स म्मश्रण
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175
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नद -स्तु त ऋग्वेद का वह सूक्त जो निदयों की पशंस ा एवं स्तुित के पित पृष्ठ 175 यह प्राचीन उत्तर-प श्चम भारत क
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सूक्त समिपत है उन्नीस प्रमुख न दय का आ ान करता
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है
कुंभ मेला
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gl और उज्जैन में लगने वाला
हिर ार, पयागराज,aनािसक पृष्ठ 176, चत्र 8.7 यूनेस्को क ‘अमूत सांस्कृ तक धरोहर’;
िवशाल मेल ा, जहाँ अम ृत की बूदँ े ं िगरी मानी जाती है ं 2025 के कुंभ म लगभग 66 करोड़
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कक्षा 7 सामा जक व ान अध्याय 8 भौगो लक क्षेत्र कैसे पावन होते ह? AglaSem · NCERT Solutions
शब्द अथ अध्याय म कहाँ याद रखने योग्य
लोग
पावन नकुंज वह पाकृ ितक वन िजसे समुद ाय दे वता का िनवास मानकर पृष्ठ 179–180 कावु · को वलकादु · दे वरे कादु · दे वराई
आखेट, कटाई और खनन से बचाता है · खलाव केनतांग · दे व वन · सरना ·
दे वगुड़ी · ओरण
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