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F R E E S T U D Y M AT E R I A L F O R E V E R Y S T U D E N T
क ा7
एनसीईआरट समाधान
अध्याय 7: गुप्त काल— अथक
सृजनशीलता का युग
एनसीईआरट पाठ्यपुस्तक — समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)
पुस्तक पृष्ठ खंड प्रश्न माध्यम
145 – 166 12 22 हन्द
Solutions, notes, sample papers & more at 29 pages
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग AglaSem · NCERT Solutions
कक्षा 7 · सामा जक वज्ञान · समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1)
एनसीईआरट समाधान — अध्याय 7: गुप्त काल— अथक सृजनशीलता
का युग
कक्षा 7 सामा जक वज्ञान के अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग के सभी प्रश्न के वस्तृत उत्तर। यह अध्याय पाठ्यपुस्तक समाज
का अध्ययन : भारत और उसके आगे (कक्षा 7, भाग 1) के वषय-खंड अतीत के चत्रपट से है। यहाँ महत्वपूण प्रश्न, छह आइए पता लगाएँ बॉक्स,
आइए वचार कर, प्रश्न पूछने वाले दोन इसे अनदे खा न कर बॉक्स, आगे बढ़ने से पहले... तथा प्रश्न और क्रयाकलाप के सात प्रश्न हल कए गए
ह।
पाठ्यपु स्तक पु स्तक पृ ष्ठ
समाज का अध्ययन : भारत और उसके आगे (भाग 1) (कक्षा 7) 145 – 166
खं ड प्रश्न
12 22
माध्यम
हन्द
महत्वपूण प्रश्न — पृष्ठ 145
अध्याय का आरंभ — वषय-खंड ‘अतीत के चत्रपट’
महत्वपू ण प्रश्न
प्र.1 गुप्त कौन थे? गुप्त काल को कभी-कभी भारतीय इ तहास म ‘उत्कृष्ट युग’ (क्ला सकल ऐज) क्य कहा जाता है?
वे कौन थे: गुप्त एक राजवंश थे, जनका उदय तीसरी शताब्द सा.सं. म उस समय हुआ जब उत्तर और उत्तर-प श्चम म फैला कुषाण
साम्राज्य दुबल पड़ रहा था। अध्याय स्पष्ट कहता है क उनक उत्प त्त के वषय म अनेक मत ह, परंतु व्यापक रूप से यही माना
जाता है क वे वतमान उत्तर प्रदे श के समीप के क्षेत्र म क्षेत्रीय शासक के रूप म उभरे। आगे चलकर वे अपने समय क सबसे बड़ी
श क्त बने। उनक राजधानी पाट लपुत्र (वतमान पटना) थी और उनका शासन तीसरी से छठ शताब्द सा.सं. तक रहा।
अध्याय जन तीन शासक के इद- गद अपनी कथा बुनता है —
शासक कस बात के लए स्मरणीय
चंद गु त पथम
प् साम्राज्य के प्रारं भक वस्तार के लए; अपने सक्क ( चत्र 7.4, रानी कुमारदे वी के साथ) और रणनी तक
गठबंधन के लए, जनसे सुदृढ़ साम्राज्य क न व पड़ी
समुद गु त प् प्रयाग प्रश स्त के योद्धा शासक; महत्वाकांक्षा धरणी-बंध अथात ‘संपूण पृथ्वी को एक करना’। उन्ह ने कला, ज्ञान और
व्यापार को भी प्रोत्साहन दया — एक सक्के पर वे वीणा बजाते दखाए गए ह
चंद गु त ि तीय
प् वष्णु के उपासक; उनके शासनकाल म महरौली का लौह-स्तंभ स्था पत हुआ और उसके अ भलेख म ‘चंद्र’ नामक
‘िवक्रमािद य’ त् राजा का उल्लेख है। कला, वास्तुकला, सा हत्य और वज्ञान वशेष रूप से उन्ह के समय म फले-फूले
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग AglaSem · NCERT Solutions
‘उत्कृष्ट युग’ क्य : क्य क शां त और स्थरता के लंबे काल ने लोग को केवल जी वत रहने से आगे बढ़ने का अवसर दया — और
लगभग हर क्षेत्र म जो काय हुआ, वह आगे के युग के लए मानक बन गया।
शांित और िस्थरता
→ अथव्यवस्था सुदृ ढ़ हुई, िजससे राज्य िव ानों, कलाकारों औ र वैज्ञािनकों को संरक्षण दे सका
→ पूववत युगों का ज्ञान एकित्रत कर गंथ ों में संक िलत िकया गया
→ सािहत्य, गिणत, खगोल िवज्ञान, िचिकत्सा, धात ु िवज्ञान और कला में असाधारण काय
→ इितहासकारों ने इसे भारत का ‘उत्कृ ष्ट य ुग’ कहा
सा हत्य — संस्कृत सा हत्य का वकास: का लदास क रचनाएँ और अनेक प्रमुख पुराण।
वज्ञान और ग णत — आयभट और वराह म हर ने ग णत तथा खगोल वज्ञान म उल्लेखनीय योगदान दया।
च कत्सा — च कत्सा ग्रंथ म सद्धांत और व्यवहार संक लत व प रष्कृत हुए; इसी काल म आयुवद सं हताबद्ध हुआ।
धातु वज्ञान — बना जंग वाला लौह-स्तंभ इसका जी वत प्रमाण है।
कला — सारनाथ क बुद्ध मू तयाँ, अजंता क गुफाएँ, उदय ग र क च ान काटकर बनाई गई गुफाएँ। ‘गुप्तकालीन कला’ ने
स दयबोध के उच्च मानक स्था पत कए, जनका स्थायी प्रभाव पड़ा।
सावधानी: ‘उत्कृष्ट युग’ कुछ इ तहासकार ारा दया गया नाम है, गुप्त शासक ारा नह । यह उस काल म हुए
काय क गुणवत्ता बताता है — यह नह क सबका जीवन सुखी था। फा- शएन ने स्वयं लखा है क चांडाल को
ब हष्कृत माना जाता था और वे नगर क सीमा के बाहर रहते थे।
प्र.2 इस समय भारतीय उपमहा प के अन्य भाग म क्या हो रहा था?
गुप्त सबसे बड़ी श क्त थे, पर अकेली श क्त कभी नह । चत्र 7.2 और चत्र 7.8 दखाते ह क तीसरी से छठ शताब्द सा.सं. के
बीच कम से कम तीन अन्य राज्य भी मान चत्र पर थे।
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राज्य क्षेत्र राजधानी गुप्त से संबंध
वाकाटक भारतीय उपमहा प का मध्य क्षेत्र नं दवधन सहयोगी। चंद्रगुप्त तीय क पुत्री प्रभावती गुप्त का ववाह
(वतमान नागपुर वाकाटक राजकुमार से हुआ और बाद म उन्ह ने शा सका के
के समीप) रूप म दोन वंश के संबंध सुदृढ़ बनाए रखे
प लव
ल् वतमान त मलनाडु , कनाटक, कांचीपुरम सातवाहन के अधीन रहने के बाद उनके पतन पर श क्त
तेलंगाना और आंध्र प्रदे श के कुछ प्राप्त क और 9व शताब्द के उत्तराध तक शासन कया।
भाग समुद्रगुप्त ने एक पल्लव शासक को परा जत कया, पर
सहासन उसी के पास रहने दया
काम प रू ब्रह्मपुत्र घाट — व्यापक रूप से — समुद्रगुप्त ने इसके शासक को भी परा जत कया, परंतु राज्य
(वम न वतमान असम — तथा प श्चम को सीधे नयंत्रण म नह लया
राजवंश) बंगाल और बांग्लादे श के उत्तरी
भाग
दो बात सवत्र हो रही थ , केवल गुप्त क्षेत्र म नह —
कला और ज्ञान का प्रसार। अजंता क गुफाएँ गुप्त और वाकाटक दोन के सहयोग से बन । अ धकांश पल्लव शव भक्त
थे और उन्ह ने भव्य मं दर व च ान काटकर बनी गुफाएँ बनवाईं; सातवाहन काल म स्था पत घ टकाओं ने कांचीपुरम को शक्षा
का बड़ा कद्र बनाया। कामरूप म मं दर और मठ शक्षा के कद्र बने।
अ धपत्य क नी त, अ धग्रहण क नह । समुद्रगुप्त ने पल्लव और कामरूप के शासक को हराकर पुनस्था पत कर दया
और भट लेते रहे। इससे शां तपूण संबंध बने रहे — अध्याय स्वयं कहता है क यह नी त हम बार-बार दोहराई जाती दे खते ह।
अ धग्रहण के स्थान पर भट क्य : सो चए क एक सेना को ले जाने का अथ क्या था — सै नक, हाथी, घोड़े,
रसोइए और अन्य सहायक कमचारी, और इन सबका भोजन। दूर के प्रांत पर स्थायी नयंत्रण रखने म जतना खच
होता, उससे कम आय होती। भट दे ने वाला और सेना क व्यवस्था करने वाला परा जत राजा सस्ता, शीघ्र और
सुर क्षत वकल्प था।
प्र.3 इस काल के कुछ महान व्य क्त कौन थे? आज भी उनके बारे म प्रच लत कथाएँ क्य महत्वपूण ह?
अध्याय छह व्य क्तय का उल्लेख करता है और इनम से प्रत्येक क कोई न कोई दे न आज भी हमारे साथ है।
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग
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व्य क्त क्या कया कथा आज क्य महत्वपूण है
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.co ज्ञान और व्यापार को भी प्रोत्साहन दया; एक सक्के agनह रही
समुद गु त धरणी-बंध बनने के लए अनेक युद्ध लड़े, पर कला, राजा योद्धा भी हो सकता है और संगीतज्ञ भी। केवल श क्त
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कभी राजत्व का संपूण आदश
g l a पर वीणा बजाते दखाए गए
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चंद गु त ि तीय अपने दरबार म अनेक व ान , क वय और संरक्षण का महत्व दखाता है — जो राज्य प्र तभा पर व्यय
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(िवक्रमािद य)
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त् कलाकार को रखा; लौह-स्तंभ उन्ह के काल का है करता है, उसे सृजनशीलता का युग मलता है
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gकl माता’, वष्णु
पभावती गु त चंद्रगुप्त तीय क पुत्री; वाकाटक राज्य प्राचीन भारत म एक स्त्री ने वास्त वक राजनी तक सत्ता
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शा सका (रीजट), ‘दो राजाओं संभाली और उसका प्रयोग कया
और उनके अवतार को सम पत सात मं दर से जुड़ी
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— कुछ राम ग र (रामटे क पहाड़ी), महाराष्ट्र म
भारत का पहला उपग्रह उन्ह के e
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mपर है। गणना क जो
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com रचना; बताया क पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, agl ह, उनम से कुछ 1500 वष
आयभट लगभग 500 सा.सं. म कुसुमपुरा म आयभट य क नाम
m . व धयाँ आप वद्यालय म सीखते
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सूय व चंद्रग्रहण क सट क व्याख्या द , पृथ्वी के पूव लखी गई थ
आकार का उ चत अनुमान लगाया
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वराहिमिहर उज्ज यनी म रहे; उनक वृहत् सं हता म खगोल उन्ह ने नरीक्षण, तक और उपलब्ध परंपरागत ज्ञान को
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वज्ञान से लेकर मौसम पूवानुमान, वास्तुकला, जोड़ा — वज्ञान इसी प्रकार कया जाता है
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नगर नयोजन और कृ ष तक सब कुछ है
कािलदास agl
संस्कृत के महाक व; मेघदूतम् म नवा सत यक्ष उड़ते अध्याय का आरं भक उद्धरण उन्ह का है — राज्य क
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मेघ के माध्यम से अपनी प्रेयसी को संदेश भेजता है वास्त वक श क्त व ा और बु द्ध म है, भोगवृ त्त म नह ।
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कवदं ती कहती है क उपहास के बाद उन्ह ने गहन साधना से
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अपना जीवन बदला — यह प रश्रम क कथा है, जन्म क नह
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m आप जानते ह? आयभट ने वष क अव ध 365 दन, 6 घंटे, 12 मनट और 30 सेकंड बताई थी। आधु नक a g
a s eक्या
agl मान है 365 दन, 5 घंटे, 48 मनट और 45 सेकंड। घटाने पर अंतर आता है 23 मनट 45 सेकंड — लगभग
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0.005% — और यह दूरबीन या घड़ी के बना।
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इसे अनदे खा न कर — पृष्ठ 149
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चंद्रगुप्त के नाम के साथ ‘ तीय’ क्य लगता है
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इसे अनदे खा न कर
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agl क्या आपने चंद्रगुप्त तीय के नाम म ‘ तीय (II)’ दे खा?
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हाँ — और यह केवल सजावट नह , एक संकm
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a संख्या के बना कसी अ भलेख म दोन को अलग पहचानना असंभव होता।
े त है। यह संख्या इ तहासकार ने जोड़ी है, क्य क इसी वंश म उनसे पूव एक और
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‘चंद्रगुप्त’ हो चुके थे — उनके पतामह।
इस पुस्तक म तीन नाम लगभग एक-से ह। इन्ह इस प्रकार अलग र खए —
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नाम राजवंश पहचान
चंद गु त
प् मौय पछले कसी अध्याय म पढ़े गए — बलकुल भन्न राजवंश, गुप्त से शता ब्दय पहले। इन्ह गुप्त से न जोड़
मौय
चंद गु त
प् गु त
प् पतामह। गुप्त साम्राज्य के प्रारं भक वस्तार क दृ ष्ट से अत्यंत महत्वपूण; सक्क ( चत्र 7.4, रानी कुमारदे वी
पथम के साथ) और रणनी तक गठबंधन के लए प्र सद्ध
चंद गु त
प् गु त
प् पौत्र, जन्ह वक्रमा दत्य भी कहा जाता है; वष्णु के उपासक, अ भलेख पर गरुड़; लौह-स्तंभ वाले शासक,
ि तीय जन्ह अ भलेख म ‘चंद्र’ कहा गया है
एक ही नाम बार-बार क्य : अनेक भारतीय प रवार म पहले पुत्र का नाम उसके पतामह के नाम पर रखा जाता है
— यह परंपरा आज भी कह -कह दे खी जाती है। इस लए कसी राजप रवार म हर दूसरी पीढ़ म ‘चंद्रगुप्त’ नाम
लौट आना बलकुल सामान्य बात थी। रोमन अंक तो इ तहासकार क आधु नक सु वधा ह।
संकेत: य द प्रश्न म ‘लौह-स्तंभ कसके शासनकाल म स्था पत हुआ’ पूछा जाए तो उत्तर है चंद्रगुप्त तीय। य द
‘ सक्क और गठबंधन से साम्राज्य क न व कसने रखी’ पूछा जाए तो उत्तर है चंद्रगुप्त प्रथम।
आइए वचार कर — पृष्ठ 150
चत्र 7.5 — ह रषेण ारा ल खत अ भलेख, प्रयाग प्रश स्त
आइए वचार कर
प्र.1 आपके वचार से राजाओं ने अपनी उपल ब्धय को अ भलेख के माध्यम से क्य प्रस्तुत कया होगा?
क्य क अ भलेख एक साथ चार काम करता है, जो उस समय का कोई अन्य माध्यम नह कर सकता था।
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अ भलेख राजा को अध्याय म इसका प्रमाण
क्या दे ता है
थािय व
स् त् पत्थर और धातु ताड़पत्र, वस्त्र और स्मृ त से अ धक टकते ह। लौह-स्तंभ का अ भलेख 1600 वष से भी अ धक
पुराना है और आज भी है; ह रषेण क प्रयाग प्रश स्त ( चत्र 7.5) बची है, जब क गुप्त दरबार कब का समाप्त हो
चुका
सावजिनक घोषणा स्तंभ ऐसे स्थान पर खड़ा होता है जहाँ से सब गुजरते ह — यात्री, व्यापारी, तीथयात्री, प्र त ं राजाओं के दूत।
संदेश उन तक पहुँचता है जनसे राजा कभी नह मलेगा
वैध ता और चेतावनी परा जत राजाओं क सूची पड़ो सय को बताती है क वरोध का प रणाम क्या होता है। अध्याय कहता है क अनेक
राजाओं ने ‘उनक श क्त से भयभीत होकर बना युद्ध के ही समपण कर दया’ — अथात अ भलेख ने आधा
युद्ध स्वयं लड़ लया
भिव य के िलए
ष् ह रषेण केवल युद्ध का नह , राजा ारा कला, ज्ञान और व्यापार को दए गए प्रोत्साहन का भी वणन करते ह।
अिभले खन राजा केवल वजेता नह , संपूण शासक के रूप म स्मरण कया जाना चाहता था
ऐसा क्य हुआ: मुद्रण, समाचार-पत्र और छाया चत्र के बना राजा क क त को कसी ऐसी वस्तु से जोड़ना पड़ता
था, जसे बदला, खोया या भुलाया न जा सके। पत्थर पर उत्क ण करना उस समय का सबसे सशक्त ‘प्रकाशन’ था
— इसी लए बड़ी उपा धयाँ (महाराजा धराज, सम्राट, चक्रवत ) भी अ भलेख और सक्क पर मलती ह।
इ तहासकार क दृ ष्ट: प्रश स्त राजा के अपने राजक व ारा लखी जाती है। ह रषेण प्रशंसा के लए ही नयुक्त थे।
अतः यह अ भलेख इस बात का उत्तम प्रमाण है क राजा लोग से क्या मनवाना चाहता था, और इस बात का
केवल सामान्य प्रमाण क वास्तव म क्या हुआ। इसी लए इ तहासकार इसे सक्क , अन्य अ भलेख और यात्रा-
वृत्तांत से मलाकर दे खते ह।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 151
कक्षा 6 के अध्याय ‘इ तहास क समय-रेखा एवं उसके ोत’ क ओर लौटते हुए
आइए पता लगाएँ
प्र.1 कक्षा 6 के अध्याय ‘इ तहास क समय-रेखा एवं उसके ोत’ म हमने अनेक ोत सूचीबद्ध कए ह, जो हम
अतीत को समझने म सहायता करते ह। इस अध्याय म अब तक हमने जन ोत का उल्लेख कया है, उनक एक
सूची बनाइए और प्रत्येक ोत से प्राप्त जानकारी को ल खए।
पृष्ठ 151 तक अध्याय चार प्रकार के ोत का प्रयोग कर चुका है। इन्ह इ तहासकार क तरह छाँ टए — पुराता त्वक (लोग ारा
बनाई और छोड़ी गई वस्तुए)ँ और सा ह त्यक ( ल खत सामग्री)।
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ोत प्रकार इससे क्या ज्ञात हुआ
महरौली का लौह- तंभ स् पुर ाताि वक —
त् 1600 वष से भी अ धक प्राचीन, भार छह टन, आज भी बना जंग — उन्नत धातु
(िचत्र 7.3) मारक
स् वज्ञान का प्रमाण। संभवतः इसे पहले मध्य प्रदे श स्थत उदय ग र क गुफा के सम्मुख
स्था पत कया गया था और कुछ शता ब्दय बाद दल्ली लाया गया
लौह- तंभ पर अंिकत
स् पुर ाताि वक —
त् इसम ‘चंद्र’ नामक राजा का उल्लेख है, जनक पहचान चंद्रगुप्त तीय से क गई है;
अिभले ख अिभले ख स्तंभ वष्णु को सम पत था और अ भलेख सम्राट क वजयगाथाओं का वणन करते ह
पयाग पशि त — स् पुर ाताि वक —
त् समुद्रगुप्त क महत्वाकांक्षा धरणी-बंध; उनके अनेक युद्ध; परा जत राजाओं का
पयागराज का स्तंभ अिभले ख पुनस्था पत होकर भट दे ना; और उनके ारा कला, ज्ञान तथा व्यापार को प्रोत्साहन
अिभले ख (िचत्र 7.5)
वण मुद ाएँ (िचत्र 7.4,
स् पुर ाताि वक —
त् चत्र 7.4: चंद्रगुप्त प्रथम रानी कुमारदे वी के साथ, पृष्ठ भाग पर आसन पर वरा जत
7.6, 7.7) मुद ाशा ीयस्त्र लक्ष्मी — अथात वैवा हक गठबंधन का प्रचार। चत्र 7.6: समुद्रगुप्त वीणा बजाते हुए
— एक सुसंस्कृत शासक। चत्र 7.7: अश्वमेध यज्ञ का यज्ञीय अश्व और पृष्ठ भाग पर
चँवर लए रानी
िव णु पुर ाण
ष् सािहि यक
त् साम्राज्य के प्रमुख क्षेत्र के नाम — अनुगंगा (मध्य-गंगा घाट ), प्रयाग, साकेत
(अयोध्या) और मगध — यद्य प उत्कष पर साम्राज्य इससे भी बड़ा था
मानिच , िचत्र 7.2
त्र उपयु त सभी से
क् साम्राज्य का वस्तार, राजधानी पाट लपुत्र, प्रमुख नगर और पड़ोसी — वाकाटक,
और िचत्र 7.8 बनी आधुिनक कामरूप, पल्लव
पुनर चना
इस क्रयाकलाप का असली पाठ: ध्यान द जए क एक ही तथ्य अलग-अलग रास्त से दो बार आता है। लौह-
स्तंभ का अ भलेख ‘चंद्र’ कहता है; सक्के और प्रश स्त वंश का ढाँचा दे ते ह; वष्णु पुराण क्षेत्र के नाम दे ता है। जब
दो स्वतंत्र स्रोत एक ही बात कह, तो इ तहासकार का वश्वास बढ़ता है। इसी को पुष्टीकरण कहते ह।
यह भी क जए: अध्याय पूरा करते समय इस ता लका म आगे क पं क्तयाँ जोड़ते जाइए — फा- शएन का यात्रा-
वृत्तांत (पृष्ठ 153), ताम्रपत्र भू म अनुदान (पृष्ठ 156), सोको ा प के पुराता त्वक साक्ष्य (पृष्ठ 156), तथा पृष्ठ
160–163 क मू तयाँ, गुफाएँ और मं दर।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 151
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चत्र 7.8 — आधु नक राजनी तक मान चत्र पर गुप्त साम्राज्य का वस्तार
आइए पता लगाएँ
प्र.1 भारत का राजनी तक मान चत्र लेकर उन वतमान राज्य और कद्रशा सत प्रदे श क पहचान क जए, जहाँ गुप्त
शासक ने शासन कया था ( चत्र 7.8)। इन राज्य को मान चत्र पर च त क जए और यह गणना क जए क
आपको कुल कतने राज्य के बारे म पता चला। इसके पश्चात अपने मत्र के साथ अपने-अपने खोजे गए राज्य
क संख्या क तुलना क जए।
उ० गुप्त सामाज् य
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महत्वपूण नगर
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30°उ० बह्मपुत्र
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पयाग
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काशी पाटिलपु
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पाटिलपत्र
का रण
नमदा मगध
तामिलि
तामिलिप्प्तत
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ज्जियनी
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20°उ० गोद ावर
ी वाकाटक
वाकाटक
द क्कन
अरब बंगाल
का पठार
वलल्प
अरब ब ंगाल
सागर
सागर की
की
खाड़ ी
कांचीपुरम्
खाड़ी
कांचीपरु म्
कावेरी
10°उ०
70°पू० 80°पू० 90°पू०
चत्र 7.8, पृष्ठ 152 — पुनर खत। गुप्त साम्राज्य का वस्तार : पुस्तक म त्रभुज से अं कत आठ नगर, न दयाँ तथा
आस-पास के प्रदे श के नाम। ध्यान द जए: पुस्तक क संकेत सूची म ‘गुप्त साम्राज्य’ के लए भूरा रंग दया गया है,
कतु मान चत्र पर वैसी कोई छाया छपी ही नह है — अत: साम्राज्य को नगर और नाम से ही पढ़ना होगा।
पहले व ध। चत्र 7.8 को भारत के राजनी तक मान चत्र के साथ र खए और अनुमान से नह , च से काम क जए —
1. चत्र 7.8 पर त्रभुज से च ह्नत नगर खो जए — इंद्रप्रस्थ, साकेत, प्रयाग, काशी, वैशाली, पाट लपुत्र, ताम्र ल प्त,
उज्ज यनी — और आधु नक मान चत्र पर इनका स्थान अं कत क जए।
2. अध्याय के शब्द म सीमा पहचा नए — साम्राज्य ने ‘वतमान उत्तर और प श्चम भारत के साथ-साथ मध्य और पूव भारत
के कुछ भाग ’ पर शासन कया (पृष्ठ 151)।
3. अब उन नगर से बाहर क ओर छाया क जए और वह रु कए जहाँ पड़ोसी आरंभ होते ह — मध्य-द क्षण म वाकाटक, सुदूर
द क्षण म पल्लव, पूव त्तर म कामरूप। ये तीन गुप्त क्षेत्र नह थे।
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4. अब ग नए क आपक छाया कतने राज्य और कद्रशा सत प्रदे श को छू ती है।
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एक उ चत उत्तर। इस प्रकार काम करने पर लगभग 13–14 राज्य और 2 कद्रशा सत प्रदे श — कुल लगभग
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aक्षेgत्रl वतमान राज्य / कद्रशा सत प्रदे श चत्र 7.8 का संकेत
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उ र पंजाब, हिरयाणा, िद ली (के .शा.प.), चंडीगढ़ (के .शा.प.), िहमाचल पदे श इंद्रप्रस्थ, साकेत, काशी; चनाब–सतलज–गंगा
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(िनचली पहािड़ याँ), उ राखंड, उ र पदे श
त्त त्त न दयाँ
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श् राज थान, गुजरात
स् वशाल भारतीय मरुस्थल और कच्छ का रण
छायां कत क्षेत्र के भीतर ह
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मय म य पदे श, छ ीसगढ़ के कु छ भाग उज्ज यनी, और मोटे तौर पर द क्षणी सीमा के
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om, झारखंड, पि चम बंगाल, ओिडशा के कु छ भाग a
रूप म नमदा
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ताम्र ल प्त
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नमूना उत्तर: “मने कुल 15 क्षेत्र च ह्नत कए — 13 राज्य (पंजाब, ह रयाणा, हमाचल प्रदे श, उत्तराखंड, उत्तर प्रदे श, राजस्थान,
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गुजरात, मध्य प्रदे श, छत्तीसगढ़, बहार, झारखंड, प श्चम बंगाल और ओ डशा) तथा 2 कद्रशा सत प्रदे श ( दल्ली और चंडीगढ़)। मेरी
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सहपाठ ने 12 गने, क्य क उसने ओ डशा, छत्तीसगढ़ और पहाड़ी राज्य को छोड़ दया था।”
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आपक और मत्र क गणना अलग क्य होगी — और यही तो उ े श्य है: प्राचीन साम्राज्य क सीमाएँ नह ,
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सीमांत होते थे। हर शासनकाल म कनारे बदलते रहते थे और अधीनस्थ राज्य एक अथ म ‘भीतर’ और दूसरे अथ म
स्वतंत्र होते थे। आधु नक राज्य क रेखाएँ 1500 वष बाद ख ची गईं और वे उन पुराने क्षेत्रmको काटती ह। इस लए
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दो ईमानदार वद्या थय क संख्या भी थोड़ी भन्न होगी।
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agl मु द्रत मान चत्र पर एक टप्पणी: चत्र 7.8 क सूची म ‘गुप्त साम्राज्य’ के लए हल्के भूरे रंग का चह्न दया गया
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com कामरूप, पल्लव) का ही सहारा ली जए, जैसा ऊपर बताई l a
है, परंतु मु द्रत पृष्ठ पर यह रंग हरी उ ावच पृष्ठभू म पर बहुत धुँधला दखता है। इस लए सीमा तय करने के लए
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च त नगर और पड़ोसी राज्य के नाम (वाकाटक,
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गई व ध म कहा गया है।
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आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 153
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग AglaSem · NCERT Solutions
गुप्त युग म भारतीय समाज के वषय म एक यात्री का वणन — फा- शएन का यात्रा-वृत्तांत
आइए पता लगाएँ
प्र.1 ऊपर दए गए फा- शएन के यात्रा- ववरण को प ढ़ए और उनके ारा व णत समाज क मुख्य वशेषताओं क
पहचान क जए। अपने वचार को ल खए और सहपाठ मत्र के साथ अपने लेख क तुलना क जए। आपको
यह दे खकर आश्चय हो सकता है क अन्य लोग एक ही अंश क कतनी भन्न व्याख्या कर सकते ह।
अंश क एक-एक पं क्त को एक वशेषता म बद लए। छह वशेषताएँ स्पष्ट रूप से नकलती ह।
गुप्तकालीन समाज क फा- शएन के अपने शब्द
वशेषता
बड़ ी और संत ु ट जनसं या ष् ख् “लोग अत्य धक संख्या म ह और प्रसन्न ह”
ह का शासकीय ह त ेप
ल् स् क्ष “उन्ह पंजीकृत कराने या अ धका रय के पास जाने क आवश्यकता नह होती” — न अ नवाय पंजीकरण,
न दै नक जीवन म दखल
सरल भू-राज व यव था स् व् स् “जो लोग राजक य भू म पर खेती करते ह, वे अपने अनाज का एक भाग कर के रूप म दे ते ह” — उपज
का अंश, और वह भी केवल राजक य भू म पर खेती करने वाल से
वेतनभोगी राजकम “राजा के अंगरक्षक और सेवक को वेतन मलता है” — अ धकारी वेतन पाते थे, प्रजा से वसूली पर नभर
नह थे
समृ , सु यवि थत नगर और
द्ध व् स् “साम्राज्य के मध्य म नगर … सबसे बड़े ह और नवासी धनी, समृद्ध … ह”; “नगर म अनेक धनवान व रष्ठ
सश त यापारी वग
क् व् वैश्य और वदे शी व्यापारी रहते ह, जनके घर सुंदर ह”; “ग लय को अच्छ तरह से व्यव स्थत रखा गया है”
संगिठत दान और िन:शु क ल् “वैश्य प रवार के मु खया दान और औष ध के लए भवन बनवाते ह … नधन , अनाथ और रो गय क
िचिक सा त् दे खभाल क जाती है … वैद्य उपचार करते ह और नधन को भोजन व औष ध मलती है”
अब वह पक्ष जो अंश म नह है। अगले ही पृष्ठ पर अध्याय चेतावनी दे ता है क ऐसे वणन “मात्र एक वशेष समय और समाज के
सी मत वग के प्र त ही लेखक के दृ ष्टकोण को दशाते ह”। इसी यात्रा-वृत्तांत म अन्यत्र फा- शएन ने चांडाल के साथ हुए कठोर
व्यवहार का वणन कया है, जन्ह ब हष्कृत माना जाता था और जन्ह नगर क सीमा के बाहर रहना पड़ता था। अथात यह अंश सच
है — पर अधूरा।
दो पाठक दो उत्तर क्य दगे: जस पाठक क दृ ष्ट ‘पंजीकृत कराने क आवश्यकता नह ’ पर जाती है, उसे यह
स्वतंत्र समाज दखता है; जो ‘अनाज का एक भाग कर के रूप म’ पर रुकता है, उसे कसान पर टका राज्य
दखता है; और जो ‘धनवान वैश्य और वदे शी व्यापारी’ पर ध्यान दे ता है, उसे ऐसा असमान समाज दखता है
जसम नधन क रक्षा अ धकार से नह , दान से होती थी। तीन पाठ एक ही अनुच्छेद के ईमानदार पाठ ह। इसी लए
इ तहासकार नष्कष से पहले अन्य स्रोत से पु ष्ट करते ह।
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग AglaSem · NCERT Solutions
यह भी पू छए: फा- शएन चीन से आए एक बौद्ध तीथयात्री थे, जो प वत्र स्थल और पांडु ल पय क खोज म थे।
उन्ह ने मुख्यतः नगर, वहार और या त्रय का आ तथ्य करने वाले लोग दे खे। कसी दूर के गाँव के कसान या नगर के
बाहर रहने वाले चांडाल का वणन बलकुल भन्न होता।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 155
चत्र 7.10 — दरबार म बैठ प्रभावती गुप्त का एक पुनक ल्पत चत्र
आइए पता लगाएँ
प्र.1 अपने दरबार म बैठ हुई प्रभावती गुप्त पर बनी चत्रकारी को दे खए ( चत्र 7.10)। उनके वस्त्र, मुद्रा, आस-पास के
लोग और दरबार क व्यवस्था पर ध्यान द जए। ये सभी आपको उनके जीवन, भू मका और समय के बारे म क्या
बताते ह? अपने अवलोकन पर समूह म चचा क जए और अपने वचार को कक्षा के साथ साझा क जए।
चत्र 7.10 म क्या है — दरबार म बैठ प्रभावती गुप्त का एक कलाकार ारा बनाया रंगीन चत्र :
बाईं ओर प्रभावती गुप्त गहरे काष्ठ के नक्काशीदार सहासन पर बैठ ह, जसक पीठ गोल है तथा
उस पर मैजटा रंग का ग ा और त कया है; उनके पैर एक नीची चौक पर ह, जो गोल पीले-नारंगी
गलीचे पर रखी है।
उनके वस्त्र और आभूषण : लाल-नारंगी चोली और लंबा लाल प रधान, गुँथे केश पर सूय- करण
जैसा स्वण मुकुट, दो स्वण हार, बाजूबंद, चौड़े कंगन, रत्नज ड़त कमरबंद, पायल, लाल पादुकाएँ
और बड़े कुंडल।
उनक मुद्रा : सीधी और शांत बैठ हुई, दृ ष्ट कुछ दाईं ओर — आगंतुक क ओर। उनक गोद म
एक छोटा बालक — श्वेत धोती और स्वण हार पहने राजकुमार — बैठा है, जसे उन्ह ने बाँह से
सँभाला है।
सहासन के पीछे श्वेत साड़ी और स्वण आभूषण पहने एक प रचा रका श्वेत चँवर लए खड़ी है।
दाईं ओर श्वेत वस्त्र और पगड़ी पहने एक दरबारी अ धकारी हाथ म पत्र लए पढ़ता हुआ खड़ा है,
और उसके नीचे पगड़ी तथा सादे वस्त्र पहने दो श्वेतकेशी वृद्ध हाथ जोड़े भू म पर बैठे ह।
प रवेश : भारी नक्काशीदार स्तंभ, ऊपर गुलाबी चँदोवा तथा दाईं ओर ऊँचा अलंकृत तोरण- ार
— अथात् दरबार का स्तंभयुक्त सभा-भवन।
चत्र 7.10, पृष्ठ 155 — “दरबार म बैठ प्रभावती गुप्त का एक पुनक ल्पत चत्र”। यहाँ इसका वणन दया गया है; मूल
चत्र पाठ्यपुस्तक म दे खए।
चत्र को चार परत म प ढ़ए — वस्त्र, मुद्रा, आस-पास के लोग और प रवेश — और हर परत वही बात कहती है जसक पु ष्ट पृष्ठ
155 का पाठ करता है।
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चत्र 7.10 म जो दखता है वह क्या बताता है
वस्त्र — रत्नजिड़त मुकु ट, भारी स्वण हार, वे वयं राजस ा है,ं िकसी और के दरबार की अितिथ नही ं। वण यह भी बताता है िक रा य
स् त्त स् ज्
बाजूबंद , कं गन, पायल और बड़े कुं डल; लाल- समृ था और व व आभूषण-िश प उ न्नत था
द्ध स्त्र ल्
सुनहरा पिरधान
मुद ा — ऊँचे, नक्काशीदार िसंहासन पर ग ी दरबार वही लगा रही है।ं ऊँचाई और कें द में थान िच कार की स ा िदखाने की भाषा है —
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और पादपीठ के साथ कें द में सीधे बैठी हुई;ं शेष िनणय उ ही ं के है ं न्
सब उनसे नीचे
गोद में बैठा एक छोटा बालक पूरे िच की कुं जी। वाकाटक राजकु मार की असमय मृ यु के बाद उ होंने अपने अ पवय क
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पु के िलए शािसका (रीजेंट) के प में शासन िकया। एक अिभले ख उ हे ं ‘दो राजाओं की
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माता’ कहता है — उनके दोनों पु वाकाटक िसंहासन पर बैठे
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पीछे खड़ी पिरचािरकाएँ, िजनमें एक श्वेत चँवर चँवर भारतीय कला का पचिलत राजिचह्न है — यही व तु अ वमेध वाले िस के (िच 7.7) में
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िलए हुए रानी के हाथ में है। िकसी पर चँवर डुल ाना उसे संपभु घोिषत करना है
सामने भूिम पर बैठे वयोवृद्ध दरबारी — श्वेत वस्त्र यह कायरत दरबार है: मं ी, पुर ोिहत और ले खक , जो परामश दे ते, िनवेद न करते और
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और पगड़ी में, हाथ जोड़े; एक के हाथ में अिभले ख रखते थे। जुड़े हाथ बताते है ं िक उनकी स ा वीकृ त थी। पांडुिलिप मरण
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पांडुिलिप या ले खन-पि का कराती है िक िनणय िलखे जाते थे — जैसे प ृ ठ 156 के तामप ष् त्र
पिरवेश — ऊँचे नक्काशीदार स्तंभ, धनुषाकार प थर से बना राजपासाद। यह गु त और वाकाटक वा तुक ला से मेल खाता है, िजसमें
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ार, अलंकृ त फश न काशीदार तंभ और धनुषाकार प िमलते है ं — वही भाषा अजंता की गुफ ाओं (िच
क् स् रू त्र
7.17) में भी िदखती है
उनका समय क्या कहता है: पाँचव शताब्द के भारत म एक स्त्री वास्त वक राजनी तक सत्ता संभाल सकती थी —
उन्ह ने वाकाटक–गुप्त संबंध जी वत रखे, वष्णु और उनके अवतार को सम पत सात मं दर के नमाण से जुड़ी ह,
और उनके अपने अ भलेख भी मले ह। सत्ता उन्ह प रवार से मली (चंद्रगुप्त तीय क पुत्री, वाकाटक राजकुमार
क वधवा, दो राजाओं क माता), पर उसका प्रयोग उन्ह ने स्वयं कया।
एक ईमानदार सावधानी: चत्र का शीषक स्वयं कहता है — यह ‘एक पुनक ल्पत चत्र’ है। इसे हाल म,
इ तहासकार क जानकारी के आधार पर बनाया गया है; यह गुप्तकालीन चत्र नह है। इस लए हर ववरण को
आधु नक पुनरचना मा नए और उसे ल खत साक्ष्य से मलाकर दे खए, जैसा ऊपर क ता लका म कया गया है।
पुनरचना और स्रोत का यह मलान स्वयं म एक अच्छा इ तहास-अभ्यास है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 159
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भ वषा और ध्रुव के काल-यंत्र म आयभट और वराह म हर से भट
आइए पता लगाएँ
प्र.1 आइए, भ वषा और ध्रुव के साथ काल-यंत्र म बैठकर गुप्त काल क यात्रा करते ह। य द आपको आयभट और
वराह म हर से मलने का अवसर मले तो आप उनसे क्या पूछगे? कक्षा को दो समूह म बाँटकर उनके साथ
साक्षात्कार के लए कुछ प्रश्न तैयार क जए।
अच्छे साक्षात्कार-प्रश्न कैसे बनाएँ। कमजोर प्रश्न का उत्तर ‘हाँ’ या कोई त थ होती है। अच्छा प्रश्न पूछता है क उन्ह ने कैसे पता
लगाया, कहाँ चूक हुई, या वे हमसे क्या कहना चाहगे। प्रत्येक समूह छह से आठ प्रश्न बनाए, सरल से क ठन क ओर, और हर
प्रश्न अध्याय म द गई कसी बात पर आधा रत हो।
समूह 1 — आयभट (कुसुमपुरा, लगभग 500 सा.सं.) से नमूना प्रश्न:
1. आपने आयभट य म लखा क पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और इसी से दन-रात होते ह। आपके चार ओर सब यही दे खते
थे क सूय आकाश म चलता है। फर आपने यह कैसे तय कया क घूमती पृथ्वी है?
2. बना कसी घड़ी के आपने वष क अव ध 365 दन, 6 घंटे, 12 मनट और 30 सेकंड कैसे मापी? आपने कौन-से उपकरण
प्रयोग कए?
3. जस समय अनेक लोग ग्रहण से भयभीत रहते थे, तब आपने सूय और चंद्रग्रहण क सट क व्याख्या द । लोग क प्र त क्रया
क्या रही?
4. आपने पृथ्वी के आकार का उ चत अनुमान भी लगाया। इसके लए आपने कसका मापन कया?
5. ग णत क आपक कस व ध को नकालना सबसे क ठन रहा और कस पर आपको सबसे अ धक गव है?
6. आपने इतना सं क्षप्त ग्रंथ क्य लखा? क्या यह कंठस्थ करने के लए था?
7. कुसुमपुरा म आपके गुरु कौन थे और कन व ान से आपका शास्त्राथ होता था?
समूह 2 — वराह म हर (उज्ज यनी) से नमूना प्रश्न:
1. आपक वृहत् सं हता खगोल वज्ञान से लेकर मौसम पूवानुमान, वास्तुकला, नगर नयोजन और कृ ष तक जाती है। इन
सबको एक ही ग्रंथ म क्य रखा — क्या ये आपके लए एक ही वषय ह?
2. आप मौसम का पूवानुमान कैसे करते थे? आकाश, वनस्प त या पशुओं के कन संकेत पर आपको सबसे अ धक भरोसा था?
3. नए नगर का स्थान चुनने के लए आपने क्या परामश दया था, और क्या आज के नगर- नयोजक को भी वही परामश दगे?
4. आप खगोलशास्त्री भी थे और ज्यो तषी भी। जो गणना से नकल सकता है और जो नह , इनके बीच रेखा आप कहाँ ख चते ह?
5. परंपरागत ज्ञान म से कसे रखना है और कसे छोड़ना है, यह आप कैसे तय करते थे?
6. उज्ज यनी ने आपको ऐसा क्या दया, जो कोई और नगर नह दे सकता था?
7. य द आप आयभट से एक प्रश्न पूछ सक, तो क्या पूछगे?
कक्षा- क्रयाकलाप के लए सुझाव: पहले दोन समूह प्रश्न लख, फर अदला-बदली क जए — समूह 1 आयभट
बनकर उत्तर दे और समूह 2 वराह म हर बनकर, केवल अध्याय और पुस्तकालय क सामग्री के आधार पर। भू मका
म उत्तर दे ने से यह समझ आता है क इन व्य क्तय के जीवन के बारे म हम कतना कम और उनके काय के बारे म
कतना अ धक जानते ह। अंत म उन प्रश्न क सूची बनाइए जनका उत्तर उपलब्ध साक्ष्य से नह दया जा सकता —
यह सूची ही सबसे बड़ा इ तहास-पाठ है।
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग
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अध्याय इन दोन को साथ क्य रखता है: दोन एक ही काल म हुए, दोन प्र सद्ध शक्षा कद्र म रहे (पटना के
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gमl हर को अपने समय के
पास कुसुमपुरा; उज्ज यनी), और दोन क काय व ध एक ही थी — वश्व को तकसंगत दृ ष्टकोण
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उपलब्ध ज्ञान
वज्ञानsम
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अग्रणी कहता है।
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इसे अनदे खा न कर — पृष्ठ 160
गुप्त काल म आयुवद का सं हताबद्ध होना
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क्या आप जानते ह क आयुवद को गुप्त काल म सं हताबद्ध कया गया था?
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हाँ — और शब्द पर ध्यान द जए: सं हताबद्ध, जसका अथ हा शये म दया है — ‘व्यव स्थत या क्रमबद्ध रूप से लखा हुआ’।
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आयुवद गुप्त काल म आ वष्कृत नह हुआ। इसक जड़ कई शता ब्दयाँ पुरानी ह। गुप्त काल ने बखरे हुए ज्ञान को एकत्र कया,
क्रम म रखा और उसे अं तम ल खत रूप दया।
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कई शतािब्दयों का अभ्यास और मौिखक परंपरा
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→ गप्ु त काल में संक लन, संपादन और व्यविस्थत क्रम
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→ चरक संिहता और सु तु संिहता को अंितम रूप
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आ ज भी पयोग में आ ने वाली आ य ुवद प
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इन दोन ग्रंथ म क्या है —
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रोग का वग करण और नदान — बीमा रय को नाम और वग दे ना, ता क उन्ह पहचाना जा सके।
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अनेक रोग का उपचार।
अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने म आहार का महत्व — केवल उपचार नह , बचाव भी।
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औष धय का नमाण।
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अपने समय क दृ ष्ट से अत्यंत उन्नत शल्य- च कत्सा तकनीक।
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m .cसं हताबद्ध होना इतना महत्वपूण क्य है: जो ज्ञान केवल एक वैद्य क स्मृagत म रहता है, वह उसी वैद्य के साथ
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ag समाप्त हो जाता है। व्यव स्थत रूप से लख दए जाने पर उसे प्र त ल प, अध्ययन, परीक्षण और प रष्कार ऐसे
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लोग भी कर सकते ह जो लेखक से कभी नह मले — इसी लए हम आज, डेढ़ हजार वष बाद भी, ये ग्रंथ पढ़ पाते
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ह। यही बात अध्याय पूरे गुप्त काल के बारे म कहता है — ‘पूववत युग के ज्ञान को एक त्रत करके अनेक ग्रंथ म
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संक लत कया गया’।
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग AglaSem · NCERT Solutions
मूल वचार याद र खए: आयुवद समग्र उपचार पर बल दे ता है — मन, शरीर और प्रकृ त के बीच गहरे संबंध पर।
वह रोग का नह , रोगी का उपचार करता है।
आइए पता लगाएँ — पृष्ठ 160
चत्र 7.15.1 और 7.15.2 — ‘गुप्तकालीन कला के व वध रूप’ (पृष्ठ 162)
आइए पता लगाएँ
प्र.1 चत्र 7.15.1 और 7.15.2 म दखाई गई गुप्तकालीन मू तय को ध्यानपूवक दे खए। इनक वशेषताओं को
दे खकर क्या आप अनुमान लगा सकते ह क वहाँ कन दे वताओं को दशाया गया है? दए गए स्थान पर अपने
वचार ल खए और चचा म अपने वचार साझा क जए।
चत्र 7.15.1 तथा चत्र 7.15.2 म क्या है — गुप्तकालीन मू तकला के दो छाया चत्र :
चत्र 7.15.1 — गहरे लाल बलुआ पत्थर का ऊँचा, ऊपर से गोल स्तंभ-रूप, जो श्वेत आधार पर
रखा है। उसके सामने एक मुख उत्क ण है : अधमुँद आँख, हल्क मुस्कान, कुंडल पहने लंबे
कणपाश और कंठ म मनक का हार। मस्तक के ऊपर जटाएँ मोट लट म बँधी ह और उनम
अधचंद्र जड़ा है।
चत्र 7.15.2 — बलुआ पत्थर म उत्क ण खड़ी पुरुष-मू त, चार भुजाओं वाली, जसके सर के
पीछे बड़ा गोल प्रभामंडल है और उसक प र ध पर अलंकरण क प याँ बनी ह। मू त ऊँचा मुकुट,
भारी कुंडल, हार, बाजूबंद तथा पटके से बँधी धोती धारण कए है, और दोन ओर घुटन तक
झूलती लंबी वनमाला है। ऊपरी भुजाएँ खं डत ह; बाईं नचली भुजा म अब भी एक गोल वस्तु है।
चत्र 7.15.1 और 7.15.2, पृष्ठ 162 (“गुप्तकालीन कला के व भन्न आयाम”) — मू तय के छाया चत्र, जनका वणन
यहाँ दया गया है; छाया चत्र पाठ्यपुस्तक म दे खए।
भारतीय मू तकला म दे वता क पहचान उसके लक्षण से होती है — वह क्या धारण कए है, क्या पहने है, कस वाहन पर खड़ा है।
लक्षण प ढ़ए, नाम अपने आप नकल आएँगे।
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चत्र 7.15.1 चत्र 7.15.2
क्या एक ऊँचा गोलाकार स्तंभ-रूप, जसके सामने एक मुख उत्क ण एक चतुभुज खड़ी पुरुष-प्र तमा; ऊँचा अलंकृत
दखता है है; मोट लट वाली ऊपर बँधी जटाएँ; जटाओं म अधचंद्र; भ ह मुकुट; सर के पीछे बड़ा सजा हुआ प्रभामंडल; लंबी
के बीच एक चह्न; भारी कुंडल और म णय का हार माला और हार; एक नचले हाथ म शंख
नणायक जटाओं म अधचंद्र और तीसरे नेत्र का चह्न — तथा स्वयं स्तंभ- शंख स हत चार भुजाएँ, करीट मुकुट और अलंकृत
लक्षण रूप, जो लग है प्रभामंडल
दे वता िशव — यह एक मुख-िलंग है, अथ त वह िलंग िजससे दे वता का िव णु
ष्
मुख पकट होता है
यह पहचान क्य सुर क्षत है: अधचंद्र और जटाएँ केवल शव क पहचान ह — वे चंद्रशेखर कहलाते ह, ‘ जनके
केश म चंद्रमा है’। शंख वष्णु के चार आयुध (शंख, चक्र, गदा, पद्म) म से एक है, और ऊँचे मुकुट व वशाल
प्रभामंडल के साथ बहुभुजी दे वता क प्र तमा गुप्तकालीन वष्णु का प्रच लत रूप है। अध्याय स्वयं दो स्वतंत्र पु ष्टयाँ
दे ता है — गुप्त शासक वष्णु के परम भक्त थे (पृष्ठ 156), और उदय ग र क गुफाएँ हदू दे वी-दे वताओं,
वशेषकर वष्णु क प्र तमाओं के लए प्र सद्ध ह।
चत्र 7.15.3 (तीसरा चत्र) भी दे खए — इसका प रचय शीषक म ही दे दया गया है। अ हच्छत्र (प श्चमी उत्तर प्रदे श) से मली
दो मृण्मू तयाँ भारत क प वत्र न दय को दशाती ह, और यहाँ भी पहचान वाहन से होती है —
गंगा मकर पर खड़ी ह — मगरमच्छ जैसा एक पौरा णक जीव।
यमुना कच्छप (कछु ए) पर खड़ी ह।
दोन के सर के ऊपर से जल प्रवा हत हो रहा है और हाथ म घट है — दोन ही उनके नद -रूप के स्मारक ह।
यह क जए: अपनी अभ्यास-पु स्तका म दो स्तंभ क सूची बनाइए — लक्षण और दे वता। अधचंद्र व जटाएँ →
शव। शंख, चक्र, वनमाला → वष्णु। मकर → गंगा। कच्छप → यमुना। गरुड़ → वष्णु (अध्याय बताता है क
चंद्रगुप्त तीय के अ भलेख पर गरुड़ मलता है)। यह सूची याद हो जाए तो आप कसी भी संग्रहालय म नाम-
प का पढ़े बना मू तयाँ पहचान सकगे।
आगे बढ़ने से पहले... — पृष्ठ 165
अध्याय तीन बदुओं म, चत्र 7.19 क समय-रेखा (पृष्ठ 164) के साथ
आगे बढ़ने से पहले . ..
प्र.1 गुप्त शासक ने युद्ध, भू म अनुदान और वैवा हक संबंध के माध्यम से स्वयं को समथ बनाया और साम्राज्य म
स्थरता सु न श्चत क ।
तीन साधन, एक साथ प्रयुक्त। ध्यान द जए क इनम केवल पहले म युद्ध है।
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साधन कैसे काम करता था अध्याय का उदाहरण
यु / सै य
द्ध न् राजा को परा जत कर उसका राज्य हड़पने के समुद्रगुप्त, जनक महत्वाकांक्षा धरणी-बंध थी; प्रयाग प्रश स्त उनक
अिभयान स्थान पर उसे पुनस्था पत कर भट लेना। कई वजय क सूची दे ती है। उन्ह ने पल्लव और कामरूप के शासक को
राजा तो भयवश बना युद्ध के ही समपण कर हराकर भी उन्ह सहासन पर बने रहने दया
दे ते थे
भूिम साम्राज्य को प्रांत म बाँटकर स्थानीय शासक , ऐसे अनेक ताम्रपत्र हाल के दन म पुरात त्वद ारा खोजे गए ह।
अनुद ान पुरो हत और मु खयाओं को भू म दे ना — और इस व्यवस्था से उ चत कर संग्रह होता था और स्थानीय मु खयाओं का
अनुदान क शत ताम्रपत्र पर लखवा दे ना, अपने क्षेत्र पर नयंत्रण भी बना रहता था
ता क ववाद न हो
वैवािहक पड़ोसी राजवंश को ववाह के सूत्र म बाँध दे ना, चंद्रगुप्त तीय क पुत्री प्रभावती गुप्त का ववाह वाकाटक राजकुमार
संबंध जससे उसक सेना खतरा नह , मत्र बन जाए से हुआ। शा सका के रूप म उन्ह ने ‘वाकाटक और गुप्त के संबंध सुदृढ़
बनाए रखे’। इससे पूव चंद्रगुप्त प्रथम और कुमारदे वी का गठबंधन चत्र
7.4 के सक्के पर ही घो षत है
इससे स्थरता क्य आई: केवल वजय शत्रु बनाती है, जो आपके दुबल पड़ने क प्रतीक्षा करते ह। गुप्त ने इसके
बदले ऐसी व्यवस्था बनाई जसम वद्रोह क तुलना म सहयोग अ धक लाभकारी था — परा जत राजा को
सहासन मला, स्थानीय मु खया को भू म और राजस्व का अंश, पड़ोसी राजवंश को एक राजसी संबंधी। साम्राज्य
इस लए टका क्य क उसके भीतर के लोग के पास खोने को कुछ था।
प्र.2 इस काल म कला, सा हत्य, वज्ञान और ग णत के क्षेत्र म उल्लेखनीय प्रग त दे खी गई।
‘उत्कृष्ट युग’ नाम के पीछे यही वाक्य है। संपूण ववरण एक ता लका म —
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग AglaSem · NCERT Solutions
क्षेत्र कौन / क्या योगदान
सािह य त् कािलदास ; अलंका रक और प रष्कृत संस्कृत काव्य। मेघदूतम् — नवा सत यक्ष उड़ते मेघ से अपनी प्रेयसी को
पुर ाण संदेश भेजता है, और काव्य माग म भारत के भूदृश्य और ऋतुओं का वस्तृत वणन करता है। इसी
युग म अनेक प्रमुख पुराण ने रूप लया
खगोल आयभट आयभट य, लगभग 500 सा.सं.: सूय, चंद्रमा और ग्रह क ग त के सूत्र; पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती
िव ान एवं
ज्ञ है, जससे दन-रात होते ह; वष क अव ध; पृथ्वी के आकार का उ चत अनुमान; सूय व चंद्रग्रहण क
गिणत सट क व्याख्या; गणना और समीकरण-समाधान क वे व धयाँ जो आज भी पढ़ाई जाती ह
िव ान,
ज्ञ वराहिमिहर उज्ज यनी म र चत वृहत् सं हता — खगोल वज्ञान, ज्यो तष, मौसम पूवानुमान, वास्तुकला,
यापक अथ
व् नगर नयोजन और कृ ष
में
िचिक सा त् आयुवद चरक सं हता और सु ुत सं हता इसी काल म संक लत और पूण हुईं — नदान, उपचार, आहार,
औष ध- नमाण और शल्य- च कत्सा
धातु िव ान ज्ञ महरौली का छह टन का स्तंभ, 1600 वष से भी अ धक समय से खुले आकाश के नीचे और फर भी बना जंग —
लौह- तंभ
स् वशेष लौह और वायु क ऑक्सीजन से बनी पतली परत उसक रक्षा करती है
कला एवं सारनाथ, सारनाथ — उत्कृष्ट बुद्ध मू तयाँ। अजंता (महाराष्ट्र) — गुप्त और वाकाटक के सहयोग से बनी
वा तुक ला
स् अजंता, गुफाएँ, कद्र म स्तूप जससे आसनस्थ बुद्ध प्रकट होते ह, और बो धसत्व पद्मपा ण का चत्र।
उदयिगिर , उदय ग र (म.प्र.) — च ान काटकर बनी गुफाएँ और दे वी-दे वताओं क प्र तमाएँ। दे वगढ़ (उ.प्र.) —
दे वगढ़ दशावतार मं दर म शेषनाग पर वष्णु। ‘गुप्तकालीन कला’ ने स दयबोध के ऐसे मानक बनाए जनका
प्रभाव स्थायी रहा
यह सब एक साथ क्य हुआ: अध्याय ंखला स्पष्ट बताता है — शां त और स्थरता लंबे समय तक बनी रहने से
अथव्यवस्था सुदृढ़ हुई, जससे राज्य व ान , कलाकार और वैज्ञा नक को संरक्षण दे सका, और इससे
सांस्कृ तक व बौ द्धक वकास हुआ। चंद्रगुप्त तीय ने अपने दरबार म अनेक व ान, क व और कलाकार रखे।
सृजनशीलता को शां त भी चा हए और संरक्षक भी; गुप्त काल म दोन थे।
प्र.3 गुप्त वंश के अ त रक्त वाकाटक, पल्लव और वमन जैसे राजवंश ने अपने-अपने क्षेत्र म शासन कया। इन सभी
राजवंश ने मलकर इस काल को सांस्कृ तक और बौ द्धक रूप से जीवंत बनाया।
पृष्ठ 164 का चत्र 7.19 चार को एक साथ दखाता है — और सबसे उल्लेखनीय बात यह है क वे कतना एक-दूसरे पर आते ह।
यह कभी एक-साम्राज्य वाला युग नह था।
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग
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पभावती गुप्त चंदगुप्त ि तीय
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समुदगुप्त आयभट
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कािलदास
agl 300 350 400 450 500 550 600 650
सा.सं.
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वाकाटक — गुप्तों के सहयोगी
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e कामरूप (वमन राजवंश) — आगे भी जारी
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गुप्त
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पल्लव — 9वी ं शताब्दी के उत्तराध तक
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चत्र 7.19 का पुन चत्रण। चार श क्तयाँ, सभी एक ही समय म जी वत। गुप्त केवल सबसे चौड़ी प ह, अकेली नह — और कामरूप तथा
l a s पल्लव दोन उनसे अ धक समय तक चलते ह।
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राजवंश क्षेत्र और राजधानी सांस्कृ तक जीवंतता का प्रमाण
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वाकाटक
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भारतीय उपमहा प का मध्य क्षेत्र; गुप्त के माध्यम से गुप्त के सहयोगी। अजंता क गुफाएँ गुप्त और
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राजधानी नं दवधन, वतमान नागपुर केl वाकाटक के सहयोग से बन । प्रभावती सात वष्णु-मं दर से जुड़ी ह, जनम
समीप कुछ महाराष्ट्र के राम ग र (रामटे क पहाड़ी) म ह
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प लव वतमान त मलनाडु , कनाटक, तेलंगाना कला और वास्तुकला के महान संरक्षक; अ धकांश शव भक्त; भव्य मं दर और
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और आंध्र प्रदे श के कुछ भाग; राजधानी च ान काटकर बनी गुफाएँ। ‘एक हजार मं दर का नगर’ कांचीपुरम
c o m कांचीपुरम g l
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घ टकाओं क सहायता से द क्षण का प्रमुख शक्षा कद्र बना
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gl (काम प)
ब्रह्मपुत्र घाट — व्यापक रूप से वतमान एक प्रमुख सांस्कृ तक और राजनी तक कद्र, जहाँ मं दर और मठ शक्षा के
a रू असम — तथा प श्चम बंगाल और कद्र बने। इसका प्राचीन नाम प्राग्ज्यो तष रामायण और महाभारत म मलता है;
बांग्लादे श के उत्तरी भाग महाभारत इसके शासक भगदत्त का उल्लेख करता है
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इ तहास पढ़ने क दृ ष्ट से इसका महत्व: अतीत को एक समय म एक साम्राज्य के रूप म दे खना सरल है, मानो
दौड़ म छड़ी एक से दूसरे को द जा रही हो। समय-रेखा स ाई दखाती है — प याँ एक-दूसरे पर चढ़ हुई ह।
राजनी तक सत्ता बँट हुई थी, फर भी कला, ज्ञान और धम सीमाओं के आर-पार स्वतंत्र रूप से आते-जाते रहे।
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इसी लए अध्याय पूरे काल को — केवल गुप्त साम्राज्य को नह — सांस्कृ तक और बौ द्धक रूप से जीवंत कहता है।
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agl प्रश्न और क्रयाकलाप — पृष्ठ 165–166
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग AglaSem · NCERT Solutions
अध्याय के अंत के अभ्यास प्रश्न
प्र.1 कल्पना क जए क आपको गुप्त साम्राज्य म रहने वाले कसी व्य क्त से एक पत्र मलता है। पत्र का आरंभ इस
प्रकार होता है— “पाट लपुत्र से अ भवादन। यहाँ का जीवन सुखमय और उत्साह से भरा है। कल ही मने दे खा...”
गुप्त साम्राज्य म जीवन का वणन करते हुए एक सं क्षप्त लेख (250–300) के साथ पत्र को पूरा क जए।
अच्छे उत्तर म क्या होना चा हए। लखने से पहले तय क जए क आप कौन ह — व्यापारी क पुत्री, वहार का वद्याथ , या
ताम्रपत्र लखने वाला लेखक — और फर अध्याय क कम से कम पाँच बात पत्र म परोइए, ता क यह केवल कल्पना न रहकर
इ तहास बने:
नगर: पाट लपुत्र, गुप्त क राजधानी; गंगा के मैदान के नगर ‘सबसे बड़े’ थे और ‘ग लय को अच्छ तरह से व्यव स्थत रखा
गया’ था।
दान और च कत्सा: वैश्य मु खया दान और औष ध के लए भवन बनवाते थे; नधन , अनाथ और रो गय क दे खभाल होती
थी।
व्यापार: कपड़ा, मसाले, हाथीदाँत और रत्न भूमध्यसागरीय क्षेत्र, द क्षण-पूव ए शया और चीन जाते थे; नगर म वदे शी व्यापारी
रहते थे।
कर और शासन: मुख्य राजस्व भू म कर; राजक य भू म पर खेती करने वाले अनाज का एक भाग दे ते थे; अ धका रय को वेतन
मलता था; अनुदान ताम्रपत्र पर लखे जाते थे।
ज्ञान और कला: संस्कृत काव्य, खगोलशास्त्री, बौद्ध वहार और नालंदा, मू तकला और मं दर- नमाण।
ईमानदार पक्ष: सुख सबका नह था — चांडाल को नगर क सीमा के बाहर रहना पड़ता था।
नमूना उत्तर (लगभग 270 शब्द):
“पाट लपुत्र से अ भवादन। यहाँ का जीवन सुखमय और उत्साह से भरा है। कल ही मने दे खा क राजा के अंगरक्षक घाट क ओर जा
रहे थे और उनके पीछे बैलगा ड़य क एक कतार थी — सूती कपड़े के गट्ठर, काली मच क बो रयाँ और रत्न क छोट मुहरबंद
पे टयाँ, सब ताम्र ल प्त के लए। चाचा कहते ह क वहाँ से ये वस्तुएँ जहाज म भूमध्यसागर, द क्षण-पूव ए शया और चीन तक जाती
ह। एक रोमन दखने वाला व्यापारी रँगरेज़ से तीन भाषाओं म मोल-भाव करता रहा और अंततः स्वण मुद्राओं म दाम चुकाया।
हमारी गली प्र त दन प्रातः बुहारी जाती है और ना लयाँ साफ बहती ह। मोड़ पर हमारे मोहल्ले के वैश्य व रष्ठ का बनवाया दान-भवन
है; कोई भी रोगी वहाँ जा सकता है और वैद्य बना धन लए भोजन तथा औष ध दे ते ह। पछले मास माँ पड़ोस के अनाथ बालक को
वह ले गई थ ।
पताजी नगर के बाहर राजक य भू म पर खेती करते ह, इस लए फसल पर अनाज का एक भाग कर के रूप म दे ते ह; मापने आने
वाले अ धकारी वेतन पाते ह और हम परेशान नह करते। कल एक लेखक ने मुझे ताम्रपत्र पर अक्षर उकेरते हुए दे खने दया — उसने
बताया क यह राजा ारा एक गाँव के पुरो हत को द गई भू म का अनुदान है, ता क सौ पीढ़ बाद भी कोई ववाद न कर सके।
संध्या को चौक म एक आचाय का लदास का पाठ करते ह, और कुसुमपुरा से आए एक खगोलशास्त्री ने बताया क घूमती तो पृथ्वी
है, इसी लए सूय चलता प्रतीत होता है! फर भी यहाँ सब सुखी नह — चांडाल को नगर क सीमा के बाहर रहना पड़ता है, और यह
बात मुझे सोचने पर ववश करती है। शीघ्र पत्र ल खएगा।”
सुझाव: पत्र को एक ही व्य क्त क आवाज़ म और एक ही दन तक सी मत र खए। तथ्य क सूची वाला पत्र
पाठ्यपुस्तक जैसा लगता है; एक प्रातःकाल का वणन करने वाला पत्र, जसम तथ्य अपने आप आ जाएँ, कसी
जी वत व्य क्त का लगता है।
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प्र.2 कस गुप्तकालीन शासक को ‘ वक्रमा दत्य’ के नाम से भी जाना जाता है?
चंद्रगुप्त तीय।
अध्याय स्पष्ट कहता है — “चंद्रगुप्त तीय को ‘ वक्रमा दत्य’ के नाम से भी जाना जाता है। वे गुप्त वंश के प्र सद्ध शासक म से
एक थे।” उन्ह इन चार बात से पहचा नए:
दल्ली के लौह-स्तंभ के अ भलेख म ‘चंद्र’ नामक राजा का उल्लेख है, जनक पहचान इन्ह से क गई है; छह टन का यह
स्तंभ इन्ह के शासनकाल म स्था पत हुआ।
वे वष्णु के उपासक थे और वष्णु के वाहन गरुड़ क आकृ त उनके अनेक अ भलेख पर मलती है।
कला, वास्तुकला, सा हत्य और वज्ञान वशेष रूप से उन्ह के समय म फले-फूले; उन्ह ने अपने दरबार म अनेक व ान, क व
और कलाकार रखे।
वे प्रभावती गुप्त के पता और समुद्रगुप्त के पुत्र थे।
भ्रम न हो: चंद्रगुप्त प्रथम इनके पतामह थे ( सक्के और गठबंधन); चंद्रगुप्त मौय तो बलकुल भन्न राजवंश के थे,
शता ब्दय पहले।
प्र.3 “शां तकाल सामा जक एवं सांस्कृ तक जीवन, सा हत्य तथा वज्ञान व प्रौ ो गक के क्षेत्र म वकास लाने म
सहायक होते ह।” गुप्त साम्राज्य के संदभ म इस कथन का परीक्षण क जए।
गुप्त साम्राज्य इस कथन क लगभग बदुवार पु ष्ट करता है। अध्याय स्वयं इसका तंत्र बताता है — “गुप्तकाल के अंतगत शां त और
स्थरता लंबे समय तक बनी रही, जसने व भन्न क्षेत्र म उल्लेखनीय उपल ब्धय को प्रोत्साहन दया”, और इसी स्थरता ने
अथव्यवस्था को सुदृढ़ कर राज्य को व ान , कलाकार व वैज्ञा नक के संरक्षण म समथ बनाया।
शांित और िस्थरता
→ व्यापार और कृ िष बढ़ ी, इसिलए राजस्व बढ़ ा (भूिम कर, साथ ही खदान, िसंच ाई, व्यापार व िशल्प कर)
→ राज्य मंिद रों, आ धारभूत ढाँचे , िव ानों औ र कलाकारों पर व्यय कर सका
→ पूववत युगों का ज्ञान एकित्रत कर गंथ ों में संक िलत हुआ
→ सािहत्य, िवज्ञान , िच िक त्सा, धात ु िवज्ञान औ र कला का ‘उत्कृ ष्ट य ुग’
क्षेत्रवार प्रमाण:
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जीवन का शां त ने क्या संभव कया
पक्ष
सामािजक - फा- शएन ने लोग को ‘अत्य धक संख्या म और प्रसन्न’, नगर को समृद्ध, ग लय को व्यव स्थत तथा दान-भवन म
सां कृ ितक
स् न:शुल्क भोजन व औष ध पाया। वष्णु के परम भक्त होते हुए भी शासक ने नालंदा स हत बौद्ध संस्थान को संरक्षण
जीवन दया — यह उदार और समावेशी दृ ष्टकोण केवल सुर क्षत राज्य ही अपना सकता है
सािह य त् का लदास और प्रमुख पुराण; प रष्कृत संस्कृत काव्य। चंद्रगुप्त तीय के संरक्षण ने उनके दरबार को समृद्ध बनाया
िव ान और
ज्ञ आयभट कुसुमपुरा म और वराह म हर उज्ज यनी म — दोन स्था पत शक्षा कद्र म कायरत, और ऐसे कद्र पी ढ़य क
गिणत शां त से ही बनते ह
िचिक सा और त् चरक और सुश्रुत सं हता म आयुवद सं हताबद्ध; धातु वज्ञान इतना उन्नत क बना जंग वाला लौह-स्तंभ बना
पौ ोिगकी
कला और सारनाथ, अजंता, उदय ग र, दे वगढ़। अजंता जैसी गुफा दशक के नरंतर श्रम और स्थर धन से बनती है — युद्धकाल
वा तुक ला
स् म ऐसा काम असंभव है
परंतु कथन का ‘परीक्षण’ क जए, केवल समथन नह । तीन बात उ चत रूप से जोड़ी जा सकती ह:
गुप्तकालीन शां त स्वयं युद्ध से अ जत थी। समुद्रगुप्त ने पहले अनेक अ भयान चलाए। शां त श क्त का प रणाम थी, उसका
वकल्प नह ।
शां त सबके लए समान रूप से हतकर नह थी। चांडाल को तब भी ब हष्कृत माना जाता था और नगर के बाहर रहना
पड़ता था।
सृजनशीलता न तो गुप्त के पतन पर रुक , न केवल उनक सीमाओं के भीतर रही — उसी समय पल्लव और कामरूप म
मं दर और शक्षा-कद्र बन रहे थे, और अजंता क गुफाओं म वाकाटक का भी सहयोग था।
संतु लत नष्कष: शां त स्वयं महान सा हत्य या वज्ञान नह रचती — मनुष्य रचते ह। परंतु शां त, सुदृढ़
अथव्यवस्था और प्र तभा पर व्यय करने को तैयार शासक मलकर उन मनुष्य को समय, सुरक्षा और साधन दे ते ह।
इस दृ ष्ट से गुप्त साम्राज्य भारतीय इ तहास म इस कथन का सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
प्र.4 कसी गुप्तकालीन शासक क राजसभा के एक दृश्य का नाटक य रूपांतरण क जए, जसम राजा, मंत्री और
व ान जैसी भू मकाएँ ह । इस प्रकार आप गुप्त युग को पुनज वत कर सकते ह।
व ध। राजसभा के सामने एक नणय र खए — इससे दृश्य को रीढ़ मल जाती है। छह से आठ भू मकाएँ बाँ टए, हर पात्र को
अध्याय का एक तथ्य द जए, और नाटक तीन-चार मनट का र खए। अध्याय क ही शब्दावली प्रयोग क जए: महाराजा धराज,
प्रश स्त, ताम्रपत्र, चँवर, भट, वहार।
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भू मका यह पात्र दृश्य म क्या लाता है
चंद गु त ि तीय
प् अं तम नणय लेते ह; वष्णु के उपासक; चाहते ह क उनका शासनकाल अ भ ल खत हो
‘िवक्रमािद य’ त्
पधान मं ी त्र राजस्व: भू म कर, साथ ही खदान, सचाई, व्यापार और शल्प कर; कोष कतना सह सकता है
से नापित सै नक , हा थय , घोड़ , रसोइय और रसद को ले जाने का व्यय; कौन-से अधीनस्थ राजा व्यवस्था करगे
राजकिव हिरषेण प्रश स्त रचने का प्रस्ताव; ताड़पत्र के स्थान पर स्तंभ अ भलेख का तक
आयभट (आगंतक
ु िव ान) खगोल-अध्ययन के लए सहायता माँगते ह; बताते ह क पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है
एक वै य यापारी
श् व् भूमध्यसागर, द क्षण-पूव ए शया और चीन के व्यापार तथा सोको ा प के पड़ाव क सूचना; सुर क्षत माग क
माँग
वाकाटक दू त प्रभावती गुप्त का अ भवादन लाता है और गठबंधन जी वत रखता है
ले खक चुपचाप दन का भू म अनुदान ताम्रपत्र पर उकेरता है और अंत म पढ़कर सुनाता है
नमूना पटकथा (आरंभ, लगभग एक मनट का अ भनय):
घोषक: महाराजा धराज चंद्रगुप्त वक्रमा दत्य क जय! (सब खड़े होते ह; प रचा रका चँवर डु लाती है।)
राजा: आसन ग्रहण क जए। मं त्रवर, कोष क्या कहता है?
मंत्री: महाराज, भू म कर इस बार अच्छा आया है। खदान और व्यापार-शुल्क को जोड़ ल तो या तो नमाण हो सकता है, या सेना का
व्यय — दोन नह ।
सेनाप त: तो सेना ही सही। द क्षण के अ भयान म दस सहस्र सै नक चलगे, साथ हाथी, घोड़े और रसोइए। अधीनस्थ राजा भी इनके
भोजन क शकायत करगे।
व्यापारी: (प्रणाम करते हुए) महाराज, य द माग सुर क्षत रह तो व्यापार स्वयं सेना का व्यय उठा लेगा। हमारा कपड़ा और काली मच
सोको ा होते हुए भूमध्यसागर तक जाते ह; पछली ऋतु म एक रोमन जहाज ने स्वण म दाम चुकाया था।
ह रषेण: और जब यह सब हो जाए, महाराज, तब इसे लखवा द जए। ताड़पत्र गल जाता है, पत्थर नह । मुझे एक स्तंभ द जए
और सौ पी ढ़य बाद भी लोग पढ़गे क आप क्या थे।
आयभट: मुझे इससे छोट वस्तु चा हए, महाराज — कुसुमपुरा म एक कक्ष और कुछ यंत्र। मेरा मत है क घूमता आकाश नह , पृथ्वी
है, और म इसे सद्ध करना चाहता ँ।
राजा: (क्षण भर रुककर) माग सुर क्षत कए जाएँगे। ह रषेण को उनका पत्थर मलेगा। और खगोलशास्त्री को उनका कक्ष — राजा
जतना अपने सै नक क वजय से स्मरण कया जाता है, उतना ही अपने व ान क खोज से। लेखक, इसे ताम्रपत्र पर अं कत
क जए।
प्रस्तु त सफल बनाने के लए: वेशभूषा से अ धक महत्वपूण है हर पात्र के हाथ म एक वस्तु — कागज़ क प य
का चँवर, गत्ते का ‘ताम्रपत्र’, एक लपेट हुई पांडु ल प, एक सक्का। दृश्य का अंत लेखक ारा अनुदान पढ़कर
सुनाने से क जए; इससे नाटक को स्वच्छ समापन मलता है और पूरी कक्षा को ताम्रपत्र व्यवस्था क पुनरावृ त्त हो
जाती है।
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m बनाई गई
मलान क जए— अ: (1) कांचीपुरम, (2) उज्ज यनी, (3) उदय ग र, (4) अजंता, (5) पाट लपुत्र; ब: (क)
जातक कथाओं को दशाने वाले जीवंत गुफा चत्र के लए प्र सद्ध है। (ख) यह स्थान च ान e
प्र.5
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गुफाओं.cकo glृ ष्ट प्र तमाएँ उत्क ण क
काटकर
eह। a
m(ग) गुप्त शासक क राजधानी। (घ) ‘एक हजार मं दर का शहर’ के रूप म प्र सद्ध है। (ङ) प्राचीन भारत
े लए प्र सद्ध है, जनम हदू दे वी-दे वताओं, वशेषकर भगवान वष्णु क उत्क
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gl म शक्षा का एक प्रमुख कद्र।
गई
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स्तंभ उत्तर स्तंभ ‘ब’
a g l कारण
‘अ’
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(1) (घ ) ‘एक हजार मं दर का शहर’ के वतमान त मलनाडु म पल्लव क राजधानी; अध्याय इसी वाक्यांश का प्रयोग
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कांचीपुर म रूप म प्र सद्ध करता है
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(2) (ङ) प्राचीन भारत म शक्षा का एक ‘ शक्षा और ज्ञान क परंपरा के लए वख्यात’ नगर — यह वराह म हर रहे
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उज्जियनी प्रमुख कद्र और वृहत् सं हता लखी
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(ख)
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च ान काटकर बनी गुफाएँ, मध्य प्रदे श म — ‘उदय ग र म च ान को काटकर बनाई गई गुफाएँ और
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(3)
.coसम्मुख स्था पत था agl
उदयिगिर जनम वशेषकर वष्णु क दे वी-दे वताओं क प्र तमाएँ’। लौह-स्तंभ संभवतः पहले इन्ह गुफाओं के
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प्र तमाएँ
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कोgदशाने वाले
जातक कथाओं a
(4) अजंता (क ) महाराष्ट्र म, गुप्त और वाकाटक के सहयोग से न मत; चत्र 7.17 म
जीवंत गुफा चत्र बो धसत्व पद्मपा ण का चत्र है
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(ग ) गुप्त शासक क राजधानी वतमान पटना, जैसा चत्र 7.2 म बताया गया है
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(5)
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पाटिलपुत्र
em ची: 1 → घ, 2 → ङ, 3 → ख, 4 → क, 5 → ग। a
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उत्तर-सू
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omडशा क उदय ग र–खंड ग र गुफाओं से अलग है। उत्तर दे ने से a
यहाँ भ्रम क संभावना है: इस सूची म दो नाम मलते-जुलते ह पर स्थान भन्न ह। मध्य प्रदे श का उदय ग र
(गुप्तकालीन गुफाएँ, वष्णु) पछले अध्याय क cओ
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पहले राज्य का नाम अवश्य प ढ़ए। sem
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प्र.6 पल्लव कौन थे और उन्ह ने कहाँ शासन कया?
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a s emउत्तर
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वे कौन थे: पल्लव द क्षण भारत का एक राजवंश थे, जो उत्तर म गुप्त शासन के समय ही एक श क्तशाली श क्त के रूप म उभरे।
उनक उत्प त्त के वषय म स्पष्ट जानकारी नह है, परंतु ऐसा प्रतीत होता है क वे पहले सातवाहन के अधीन थे — जनके बारे
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म हमने पछले अध्याय म पढ़ा — और सातवाहन के पतन के पश्चात उन्ह बल मला। उन्ह ने 9व शताब्द सा.सं. के उत्तराध तक
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शासन कया।
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कहाँ शासन कया: उन्ह ने धीरे-धीरे वतमान त मलनाडु , कनाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदे श के कुछ भाग को अपने राज्य म
मला लया। उनक राजधानी वतमान त मलनाडु स्थत कांचीपुरम थी।
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग AglaSem · NCERT Solutions
वे कस लए स्मरणीय ह:
कला और वास्तुकला के महान संरक्षक — उनम से अ धकांश शव भक्त थे और उन्ह भव्य मं दर तथा च ान को काटकर
बनाई गई गुफाओं के नमाण का श्रेय दया जाता है।
शक्षा का बड़ा कद्र — कांचीपुरम, जो प्रायः ‘एक हजार मं दर का नगर’ कहलाता है, द क्षण म शक्षा के प्रमुख कद्र म से
एक बना। सातवाहन काल म स्था पत घ टकाओं ( शक्षा के कद्र) ने इसके लए अनुकूल वातावरण बनाया।
गुप्त इ तहास म उनका स्थान — पल्लव का उल्लेख प्रयाग प्रश स्त म मलता है। द क्षण भारत के अ भयान के समय
समुद्रगुप्त ने एक पल्लव शासक को परा जत कया, परंतु उस क्षेत्र को अ धकार म नह लया; उन्ह ने स्थानीय राजाओं
को सहासन पर तब तक बने रहने दया जब तक वे अधीनता स्वीकार कर नय मत भट दे ते रहे, जससे शां तपूण संबंध बने रहे।
क्या आप जानते ह? चत्र 7.19 म पल्लव क प समय-रेखा के दा हने कनारे से भी आगे नकल जाती है — वे
गुप्त से लगभग तीन शताब्द अ धक टके।
प्र.7 अपने शक्षक के साथ नकट के कसी ऐ तहा सक स्थल, संग्रहालय या वरासत भवन क यात्रा का आयोजन
क जए। यात्रा के बाद अपने अनुभव का वणन करते हुए एक वस्तृत रपोट ल खए। रपोट म इस स्थल के
ऐ तहा सक महत्व, वास्तुकला, कलाकृ तय और यात्रा के दौरान आपके ारा सीखे गए कसी भी रोचक तथ्य के
बारे म अपने महत्वपूण अवलोकन को स म लत क जए। इस यात्रा ने इ तहास के बारे म आपक समझ को कैसे
वक सत कया?
व ध — यात्रा को तीन चरण म बाँ टए।
1. जाने से पहले: पता क जए क स्थल कसने और कब बनवाया, और दो-तीन प्रश्न लख ली जए जनके उत्तर आप खोजना
चाहते ह। अभ्यास-पु स्तका और प सल साथ र खए (अनेक संग्रहालय म स्याही वाली कलम व जत है) तथा जहाँ अनुम त हो
वह छाया चत्र ली जए। नयम अवश्य दे खए — नक्काशी को कभी न छु एँ और द वार पर कुछ न लख।
2. स्थल पर: केवल छाया चत्र न ल, रेखा चत्र भी बनाइए — रेखा चत्र बनाने से ध्यान से दे खना पड़ता है। कसी भी नाम-प का
या अ भलेख को अक्षरशः उता रए। सामग्री नोट क जए (बलुआ पत्थर? ईंट? मृ त्तका?), स्थल क दशा, और कोई भी स्पष्ट
रूप से बाद म हुई मरम्मत।
3. लौटने के बाद: दो दन के भीतर रपोट लख डा लए, जब तक ववरण स्मृ त म ताज़ा है।
अच्छ रपोट म क्या होना चा हए — इन्ह को शीषक बनाइए:
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग AglaSem · NCERT Solutions
खंड इसम क्या लख
1. पिरचय स्थल का नाम और स्थ त, यात्रा क त थ, कौन-कौन गए, यह स्थल क्य चुना गया
2. ऐितहािसक महत्व कसने और कब बनवाया; कौन-सा राजवंश या काल; क्य बनाया गया; बाद म उसका क्या हुआ
3. वास्तुक ला सामग्री, योजना, वशेषताएँ — स्तंभ, मेहराब, गुंबद, शखर, च ान काटकर बना कक्ष; नक्काशी और उसम क्या
दशाया गया है
4. कलाकृ ितयाँ मू तयाँ, सक्के, अ भलेख, मृ ांड, औज़ार। प्रत्येक के लए: वह क्या है, कस सामग्री क है, और उसे बनाने-बरतने
वाल के बारे म क्या बताती है
5. रोचक तथ् य दो-तीन ऐसी बात जो आप पहले नह जानते थे — गाइड से, नाम-प का से, या अपने अवलोकन से
6. आ त्ममंथन वास्त वक वस्तु दे खकर पाठ्यपुस्तक क बात आपक समझ म कैसे बदली
7. छायािचत्र / नाम स हत, प्रत्येक के नीचे एक पं क्त का ववरण
रे खािच त्र
नमूना उत्तर (खंड 3, 4 और 6 का अंश):
“वास्तुकला। मं दर तराशे हुए लाल बलुआ पत्थर के खंड से बना है, जो बना गारे के जोड़े गए ह, और लगभग एक मीटर ऊँचे
चबूतरे पर खड़ा है। ार के चार ओर तीन उत्क ण प याँ ह — एक लता, छोट मानव आकृ तय क एक पं क्त और एक सादा
कनारा — तथा ार-स्तंभ के नीचे नद -दे वयाँ खड़ी ह। गाइड ने बताया क उनम से एक मगरमच्छ जैसे जीव पर खड़ी है: यह गंगा
का मकर है, ठ क वैसा ही जैसा हमारी पाठ्यपुस्तक के चत्र 7.15.3 म है।
कलाकृ तयाँ। स्थल-संग्रहालय म हमने मृण्मय फलक क एक अलमारी, रथ पर सवार दो योद्धाओं वाला एक टू टा पत्थर-फलक
और चार छोट स्वण मुद्राएँ दे ख । नाम-प का के अनुसार सक्क के एक ओर राजा और दूसरी ओर आसनस्थ दे वी अं कत थ । यह
वणन मने कक्षा म पढ़ा था, पर सक्क का इतना छोटा होना — एक रुपये के सक्के से भी छोटा — मेरे लए आश्चय था।
आत्ममंथन। इस यात्रा ने इ तहास को नाम क सूची से बदलकर लोग ारा बनाई गई वस्तुओं का समूह बना दया। पंद्रह सौ वष
पहले कसी के तराशे हुए पत्थर के सामने खड़े होकर म समझ पाया क हमारा अध्याय बार-बार ोत को दे खने पर क्य बल दे ता है
— अ भलेख पुस्तक म छपा कोई तथ्य नह , ब ल्क पत्थर पर उकेरी गई अक्षर क सचमुच क एक पं क्त है, जसे कसी ऐसे व्य क्त
ने बनवाया था जो स्मरण कया जाना चाहता था। मने यह भी दे खा क कतना कुछ नष्ट हो चुका है — आधी नक्काशी घसकर
सपाट हो गई है। तभी समझ आया क इ तहासकार कसी नष्कष से पहले अनेक ोत से पु ष्ट क्य करते ह।”
सुझाव: य द वद्यालय के पास कोई ऐ तहा सक स्थल न हो, तो स्थानीय संग्रहालय, कोई पुराना मं दर या म स्जद,
बावड़ी, औप नवे शक काल का रेलवे स्टे शन या पुराना मील-पत्थर भी चलेगा। हर स्थान का एक अतीत होता है; यह
क्रयाकलाप उसे पढ़ना सीखने का है।
अध्याय — एक नज़र म
कुषाण के पतन से बनी जगह म एक नई श क्त। तीसरी शताब्द सा.सं. तक उत्तर और उत्तर-प श्चम म फैला कुषाण
साम्राज्य दुबल पड़ने लगा और नए राज्य उभरे। इन्ह म से गुप्त वंश सबसे प्रबल बना। माना जाता है क वे वतमान उत्तर
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प्रदे श के समीप के क्षेत्र म क्षेत्रीय शासक के रूप म उभरे। उनक राजधानी पाट लपुत्र (वतमान पटना) थी और उनका
साम्राज्य तीसरी से छठ शताब्द सा.सं. तक समृद्ध रहा।
तीन शासक अवश्य याद र खए। चंद्रगुप्त प्रथम — अपने सक्क ( चत्र 7.4, रानी कुमारदे वी के साथ) और रणनी तक
गठबंधन के लए। समुद्रगुप्त — प्रयाग प्रश स्त का योद्धा शासक, जसक महत्वाकांक्षा ह रषेण के अनुसार धरणी-बंध
अथात संपूण पृथ्वी को एक करना थी; एक सक्के पर वे वीणा बजाते दखाए गए ह। चंद्रगुप्त तीय ‘ वक्रमा दत्य’ —
वष्णु भक्त, जनके शासनकाल म महरौली का बना जंग वाला लौह-स्तंभ स्था पत हुआ।
केवल कद्र से नह , स्थानीय शासक के माध्यम से शासन। साम्राज्य को प्रांत म बाँटकर स्थानीय शासक , पुरो हत और
मु खयाओं को भू म दान द गई और ये अनुदान ताम्रपत्र पर ल पबद्ध कए गए। परा जत राजाओं को प्रायः पुनस्था पत कर
भट लेने क नी त अपनाई गई। ववाह भी नी त का साधन था — चंद्रगुप्त तीय क पुत्री प्रभावती गुप्त वाकाटक राजकुमार
से ववा हत हुईं और बाद म शा सका (रीजट) बन ।
एक यात्री क दृ ष्ट से समृद्ध समाज। चीनी यात्री फा- शएन (5व शताब्द सा.सं. का आरंभ) लखते ह क लोग अ धक
संख्या म और प्रसन्न थे, दान-भवन और न:शुल्क औष धयाँ उपलब्ध थ । परंतु उन्ह ने ही चांडाल के साथ हुए कठोर व्यवहार
का भी वणन कया, जन्ह नगर के बाहर रहना पड़ता था — इस लए कसी नष्कष से पहले अनेक स्रोत और दृ ष्टकोण क
जाँच आवश्यक है। भू म कर मुख्य राजस्व था और व्यापार भूमध्यसागर, द क्षण-पूव ए शया तथा चीन तक फैला था; सोको ा
प माग का महत्वपूण पड़ाव था।
इसे ‘उत्कृष्ट युग’ क्य कहा जाता है। लंबी शां त ने व ान और कलाकार को अवसर दया। का लदास ने मेघदूतम् लखा;
आयभट (कुसुमपुरा, लगभग 500 सा.सं.) ने बताया क पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और ग्रहण क सट क व्याख्या द ;
वराह म हर (उज्ज यनी) ने वृहत् सं हता क रचना क ; आयुवद चरक सं हता और सुश्रुत सं हता म सं हताबद्ध हुआ; और
धातु वज्ञान ने लौह-स्तंभ दया। कला सारनाथ, अजंता, उदय ग र और दे वगढ़ म फली-फूली।
पतन और पड़ोसी। छठ शताब्द सा.सं. से मध्य ए शया क हूण जनजा त के बार-बार आक्रमण और श क्तशाली क्षेत्रीय
शासक के उदय ने साम्राज्य को दुबल कया। इसी बीच पल्लव ‘एक हजार मं दर के नगर’ कांचीपुरम से शासन कर रहे थे
और वमन राजवंश ब्रह्मपुत्र घाट म कामरूप पर। समुद्रगुप्त ने दोन को परा जत कया, पर सहासन उन्ह के पास रहने दया
— यह नी त हम बार-बार दोहराई जाती दे खते ह।
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त्व रत पुनरावृ त्त
शब्द अथ अध्याय म कहाँ याद रखने योग्य बात
प्रयाग प्रश स्त पयागराज का स्तंभ अिभले ख, जो समुद ग प्ु त की ‘योद्धा शासक’, पृष्ठ इसम पल्लव और कामरूप दोन का
उपलिब्धयों की पशंस ा करता है; ले खक 149 उल्लेख है — प्रमाण क समुद्रगुप्त के
राजकिव हिरषेण अ भयान वहाँ तक पहुँचे
धरणी-बंध ‘संपूण पथ्ृ वी को एक करना’ — हिरषेण ारा पृष्ठ 149 उनके अनेक युद्ध और परा जत राजाओं क
बताई गई समुद ग प्ु त की महत्वाकांक्षा लंबी सूची का कारण
अश्वमेध यज्ञ महत्वाकांक्षी राजाओं ारा शिक्तशाली सामाज्य पुनरावलोकन कर, पृष्ठ इसक स्मृ त म वशेष सक्का ( चत्र 7.7)
स्थािपत करने और िवरासत छोड़ने हेत ु िकया 150 — एक ओर यज्ञीय अश्व, पृष्ठ भाग पर
जाने वाला यज्ञ चँवर लए रानी
महाराजा धराज, ग प्ु त शासकों ारा अपनाई गई उपािधयाँ, जो ‘नए राजा… नई इन्ह ने पूववत सरल उपा धय राजन और
सम्राट, चक्रवत सव च्च सत्ता का दावा करती थी ं उपा धयाँ’, पृष्ठ 154 महाराज का स्थान लया
शा सका (रीजट) वह व्यिक्त जो अल्पवयस्क राजा के स्थान पर हा शये क टप्पणी, प्रभावती गुप्त ने इसी रूप म वाकाटक
अस्थायी रूप से शासन संभालती/संभालता है पृष्ठ 155 राज्य चलाया; एक अ भलेख उन्ह ‘दो
राजाओं क माता’ कहता है
ब हष्कृत वह व्यिक्त िजसे िकसी सामािजक या हा शये क टप्पणी, फा- शएन के चांडाल, जन्ह नगर क सीमा
सास्ं कृ ितक समूह ने अस्वीकार कर िदया हो; पृष्ठ 154 के बाहर रहना पड़ता था — उनके प्रसन्न
यहाँ वे लोग जो वण व्यवस्था से बाहर माने जाते समाज वाले वणन का दूसरा पक्ष
थे
ताम्रपत्र भू म अनुदान स्थानीय शासकों, पुर ोिहतों और मुिखयाओं को ‘शासन और प्रशासन’, प्रमाण क गुप्त शासक सब कुछ कद्र से
दी गई भूिम, िजसका िववरण ताँबे की पि यों पर पृष्ठ 156 नयं त्रत न कर स्थानीय नेतृत्व के माध्यम
िलिपबद्ध होता था से शासन करते थे
लौह-स्तंभ, महरौली िदल्ली के महरौली में खड़ा छह टन का लौह- पृष्ठ 147–148 वशेष लौह और वायु क ऑक्सीजन क
स्तंभ, 1600 वष से भी अिधक पाचीन, चंद ग प्ु त प्र त क्रया से बनी पतली परत इसे क्षरण से
ि तीय के काल में स्थािपत बचाती है
आयभट य आयभट का गिणत और खगोल िवज्ञान पर पृष्ठ 158 पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है; वष क
िलखा संिक्षप्त ग ंथ, लगभग 500 सा.सं. अव ध 365 दन, 6 घंटे, 12 मनट, 30
सेकंड
वृहत् सं हता उज्जियनी में रिचत वराहिमिहर का िवश्वकोशीय पृष्ठ 158 खगोल वज्ञान, ज्यो तष, मौसम पूवानुमान,
ग ंथ वास्तुकला, नगर नयोजन और कृ ष
मेघदूतम् कािलदास का काव्य — ‘मेघ का संदे श’ पृष्ठ 159 नवा सत यक्ष उड़ते मेघ के माध्यम से
अपनी प्रेयसी को संदेश भेजता है
चरक सं हता एवं आयुवद के आधारभूत ग ंथ, जो ग प्ु त काल में इसे अनदे खा न कर, रोग का वग करण व नदान, आहार,
सुश्रुत सं हता संक िलत और पूण िकए गए पृष्ठ 160 औष ध- नमाण और शल्य- च कत्सा —
साथ ही समग्र उपचार
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कक्षा 7 सामा जक वज्ञान अध्याय 7 गुप्त काल— अथक सृजनशीलता का युग
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शब्द अथ अध्याय म कहाँ याद रखने योग्य बात
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पूव त्तर म...’, पृष्ठ द क्षण
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प्राग्ज्यो तष असम की बह्मपुत्र घाटी का एक पाचीन नाम पृष्ठ 161–162 वमन राजवंश का कामरूप राज्य;
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महाभारत म इसके शासक भगदत्त का
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