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2026 II PUC EXAM – 1 KSEAB 03 HINDI
KARNATAKA SCHOOL EXAMINATION AND ASSESSMENT BOARD
2026 II PUC EXAM - 1
SUBJECT: 03 - HINDI SCHEME OF EVALUATION MAX MARKS: 80
Q. No MARKS
खण्ड 'क'
I अ)
1) iii) जो कमाता है 1
2) ii) शामनाथ 1
3) iii) भद्रावतत 1
4) iii) ई. 2010 1
5) ii) माता के मातृत्व को 1
6) i) बरगद
1
7) 1
iv) बेला
1
8) iv) लाला लाजपत राय
1
9) i) सुजान ने 1
10) iv) एक कहानी यह भी
आ) 1
11) से 1
12) में 1
13)
पर 1
14)
की 1
15)
को
इ) 1
16) a) मक्खी मारना. v) बेकार बैठना 1
b) कंचन बरसना. i) आमदनी बढ़ना 1
c) थू-थू करना. vi) बेइज्जती करना 1
d) लू उतारना ii) अहं उतारना 1
e) नौ दो ग्यारह होना iii) भाग जाना
खण्ड 'ख'
॥. अ)
जब तवश्वेश्वरय्या है दराबाद राज्य के इं जीतनयररं ग सलाहकार थे, उन तदनों है दराबाद
17) ररयासत पर तनजाम नवाब का शासन था। उनके सामने एक मुसीबत आ खडी हुई थी।
हर वर्ष मूसी नदी में भयं कर बाढ़ आती थी। इस वजह से खूब तबाही होती थी। उस बाढ़ 3
का पानी है दराबाद नगर में घुस आता था, तजससे सारे काम-काज बंद हो जाते थे।
तवश्वेश्वरय्या ने मूसी नदी के पानी को काबू करने की योजना बनाई, बााँ ध भी बनवाया।
साथ ही है दराबाद नगर के तलए पानी तथा नातलयों का भी बडा अच्छा इन्तजाम तकया,
तजससे नवाब साहब की मुसीबत टल गई।
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18) मनुष्य का परम धमष है - 'सत्यता के साथ कर्त्षव्य पालन करना।' सत्य बोलने को सबसे
श्रेष्ठ मानना चातहए और कभी झूठ नहीं बोलना चातहए, चाहे उससे तकतनी ही अतधक
हातन क्ों न होती हो। सत्य बोलने से ही समाज में हमारा सम्मान हो सकेगा और हम 3
आनंदपूवषक अपना समय तबता सकेंगे क्ोंतक सच्चे को सब लोग चाहते हैं और झूठे से
सभी घृणा करते हैं । यतद हम सदा सत्य बोलना अपना धमष मानेंगे तो हमें अपने कर्त्षव्य
पालन करने में कुछ भी कष्ट न होगा और तबना तकसी पररश्रम और कष्ट के हम अपने
मन में संतुष्ट और सुखी बने रहें गे। अपनी आत्मा के कहने के अनुसार दृढ़ तवश्वास और
साहस से सत्य की रक्षा करनी चातहए।
19) 'पडोस कल्चर' के बारे में लेखखका मन्नू भंडारी कहती हैं तक उस जमाने में घर की दीवारें
घर तक ही समाप्त नहीं हो जाती थीं बखि पूरे मोहल्ले तक फैली रहती थीं। इसतलए
मोहल्ले के तकसी भी घर में जाने पर कोई पाबंदी नहीं थी, बखि कुछ घर तो पररवार का 3
तहस्सा ही थे। लेतकन आज आधुतनक दबाव ने महानगरों के फ्लैट में रहने वालों को हमारे
इस परं परागत 'पडोस कल्चर' से तवखच्छन्न करके हमें संकुतचत, असहाय और असुरतक्षत
बना तदया है ।
20)
मंतदर के गभषगृह में गौतम बुद्ध की ५५ फुट ऊाँची कां स्यप्रततमा है । तजसका वजन ५००
टन है । इस गभषगृह को 'दायुबुत्सु-दे न' कहा जाता है । इस बौद्ध प्रततमा के नीचे एक छोटा-
सा मागष है , इतना साँकरा तक एक अकेले व्यखि का भी उसमें से तनकलना असम्भव लगे
3
। प्रचतलत मान्यता है तक जो इसमें से पार तनकल जाए तो उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है ।
आ)
21) प्रसंग :पाठ का नाम- 'सुजान भगत'
लेखक- प्रेमचंद 1
संदर्भः इस वाक् को तभक्षुक ने सुजान भगत से कहा।
स्पष्टीकरणः सुजान भगत ने आठ महीने के अतवरल पररश्रम करके अनाज का ढे र लगा
तदया। कई भाट और तभक्षुक भगतजी को घेरे हुए थे। उनमें वह तभक्षुक भी था, जो आज
से आठ महीने पहले भगत के द्वार से तनराश होकर लौट गया था। उस तभक्षुक को सुजान
ने पहचान तलया और उससे कहा तक वह तजतना चाहे उतना अनाज ले जा सकता है।
तभक्षुक को भोला का डर था। कहीं उसने अनाज भर तलया और भोला ने गठरी न उठाने
2
दी तो तकतनी भद्द होगी। उसे और अनाज भरने की तहम्मत नहीं पडी। तभक्षुक की खितत
समझकर सुजान भगत ने चादर लेकर उसमें अनाज भरा और गठरी बााँ ध कर बोला इसे
ले जाओ। तब तभक्षुक ने कहा |
22)
प्रसंग : पाठ का नाम- 'गंगा मैया से साक्षात्कार'
1
लेखक- डॉ. बरसाने लाल चतुवेदी
संदर्भ :यह वाक् लेखक के प्रश्न का उर्त्र दे ते हुए गंगा मैया कहती हैं ।
स्पष्टीकरणः लेखक के प्रश्न को उर्त्र दे ते हुए गंगा मैया कहती हैं तक महं गाई ररश्वतखोरी
2
और पश्वीकता बढ़ती चली जा रही है इनका कोई अंत तदखलाई नहीं दे ता धमष का
व्यापरीकरण हो रहा है राजनीतत के बारे में तो तगरा अनयन नयन तबनु बानी आपस में
ऐसे लड रहे हैं जैसे नगर पातलका के स्कूल की कक्षा एक के बच्चे हैं ।
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23) प्रसंग: पाठ का नाम- 'चीफ़ की दावत'
लेखक- डॉ. भीष्म साहनी 1
संदर्भ : इस वाक् को शामनाथ ने अपनी पत्नी से कहा।
स्पष्टीकरणः शामनाथ के घर पर चीफ़ की दावत थी। चीफ़ साहब एक अंग्रेजी अफ़सर
थे। इस पाटी में यतद चीफ़ साहब खुश हुए तो तम. शामनाथ को पदोन्नतत तमलने की 2
सम्भावना थी। शामनाथ और उनकी धमष पत्नी पाटी की तैयाररयों में लगे हुए थे। अचानक
एक गंभीर समस्या खडी हो गई 'मााँ का क्ा होगा?'
24) प्रसंग: पाठ का नाम- 'भोलाराम का जीव'
लेखक- हररशंकर परसाई 1
संदर्भ : इस वाक् को तचत्रगुप्त ने धमषराज से कहा।
स्पष्टीकरणः तचत्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रतजस्टर पर
रतजस्टर दे ख रहे थे। गलती पकड में नहीं आ रही थी। आखखर उन्ोंने रतजस्टर 2
खीझकर इतनी जोर से बंद तकया तक मक्खी चपेट में आ गई। उसे तनकालते हुए
उन्ोंने धमषराज से कहा "महाराज, ररकाडष सब ठीक है ।
III. अ)
25) सूरदास भगवान श्रीकृष्ण के रूप-सौन्दयष का वणषन करते हुए कहते हैं -गोतपकाओं ने
यमुना नदी तट पर श्रीकृष्ण को दे ख तलया। वे मोर मुकुट पहने हुए हैं । कानों में मकराकृत
कुण्डल धारण तकये हुए हैं । पीले रं ग के रे शमी वस्त्र पहने हुए हैं । उनके तन पर चन्दन- 3
लेप है । वे अत्यंत शोभायमान हैं । उनके दशषन मात्र से गोतपकाएाँ तृप्त हुईं। हृदय की
तपन बुझ गई। वे सुन्दररयााँ प्रेम-मग्न हो गईं। उनका हृदय भर आया। सूरदास कहते हैं
तक प्रभु श्रीकृष्ण अन्तयाष मी हैं और गोतपकाओं के व्रत को पूरा करने के तलए ही पधारे हैं ।
26)
रहीम जी तचता और तचन्ता के अंतर स्पष्ट करते हुए कहते हैं तक तचता केवल तनजीव को
जलाती है लेतकन तचंता जीतवत मनुष्य को तनरं तर जलाती रहती है । तचंता तचता से भी
ज्यादा दु ुः ख दे ती है । तचन्ता तचता से अतधक तवनाशकारी होती है । इसीतलए उसे दू र करने
का प्रयत्न करना चातहए। 3
आ)
इस कतवता में कतव समाज में फैली पीडा, अन्याय और जडता के तवरुद्ध पररवतषन की
27) आवश्यकता को कतव व्यि करते हैं । लोगों के दु ख अब बहुत बढ़ चुके हैं , इसतलए
उनमें पररवतषन की धारा तनकलनी चातहए। कतव का मानना है तक केवल शोर मचाने से
काम नहीं चलेगा, बखि समाज की बुतनयाद तक पररवतषन होना चातहए। इसतलए वह
लोगों के हृदय में साहस, जागरूकता और क्ां तत की आग जगाने का आह्वान दे ते हैं | 3
28) कवतयत्री ऐसे अमर लोक अथवा स्वगष को भी ठु कराना चाहती हैं तजसमें वेदना नहीं है ,
तजसमें नाश नहीं है , तजसमें जलन नहीं है , तजसमें तमटने का स्वाद नहीं है । अपनी धरती
के आगे कवतयत्री ऐसे स्वगष को न्योछावर करने के तलए तैयार है । कवतयत्री अपनी इस
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धरती में कष्ट, यातना, पीडा और तवरह झेलते हुए जीना चाहती हैं ।परमात्मा की करुणा
अथवा कृपा से कवतयत्री को अमर लोक का उपहार भी स्वीकायष नहीं करती हैं । । वे 3
भगवान से प्राथषना करती हैं तक इस मरने –तमटने का अतधकार उनसे कोई न छीने ।
दतक्षण भारत तीनों ओर से सागरों से तघरा हुआ है । तीनों सागर रत्न और मोततयों की
खान है । इन तीनों सागरों का पानी भारत माता के चरण धोते हैं । ततमलनाडु में महा
29) कतव कम्ब ने 'कम्ब रामायण' की रचना की है । केरल और आं ध्र प्रदे श की सभ्यता,
संस्कृतत और धमष तवधायक हैं । महाराष्टर में मराठों की वीरता का गाई जाती है । कनाष टक
3
की मलयज शीतल हवा, चंदन वृक्षों के सौरभ को चारों तदशाओं में फैलाती है ।
इ)
30)
प्रसंग :कतवता का नाम : रै दासबानी'
i)
कतव : संत रै दास
संदर्भ : कतव भगवान के प्रतत अपने अटू ट संबंध को इस प्रकार व्यि करते हैं । 1
र्ाव स्पष्टीकरण : रै दास जी कहते हैं तक अब उनका मन राम में लग गया है ।वे कहते
हैं तक प्रभु जी चन्दन के समान है और हम पानी के समान है तजसके शरीर पर लगने से
अंग-अंग सुगंध से भर गया |
2
ववशेषता : दास्य भखि, शरणगत तत्व है ।
अंत्यानुप्रास अलंकार है ।
ii) प्रसंग : कतवता का नाम : 'तबहारी के दोहे '
कतव : तबहारीलाल
संदर्भः कतव सम्पतर्त् रूपी सतलल के बढ़ने से जो पररणाम होता है , उसका वणषन करते 1
हैं
र्ाव स्पष्टीकरण: तबहारी लाल कहते हैं तक सम्पतर्त् रुपी पानी जैसे-जैसे बढ़ता जाता है
वैसे-वैसे मन रूपी सरोज फैलता जाता है । अथाष त् मन की इच्छाएाँ एवं प्रलोभन की वृखद्ध
होती जाती है । लेतकन सम्पतर्त् रूपी पानी जैसे-जैसे घटता है , मन रूपी कमल संकुतचत
नहीं होता बखि पूणष रूप से मुरझा जाता है । इसतलए मन की इच्छाओं को काबू में रखना 2
चातहए |
ववशेषता: नीतत परक दोहा है ।
31)
i)
प्रसंग : कतवता का नाम : 'एक वृक्ष की हत्या'
कतव : कुाँवर नारायण
संदर्भ : कतव वृक्ष न तदखने पर इस प्रकार के भाव को व्यि करते हैं। 1
र्ाव स्पष्टीकरण : कतव बचपन से ही तजस वृक्ष को दे खते थे उसके न तदखने से उस
वृक्ष की याद में खो जाते हैं । कतव और उस वृक्ष का एक ररश्ता बना था। वृक्ष के कट जाने
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पर उसे याद करते हुए कतव कहते हैं तक वह वृक्ष धूप में, बाररश में, गमी में और सदी में
सभी समय हमेशा चौकन्ना बना खाकी वदी में तैनात रहता था। 2
ववशेषता: पयाष वरण के प्रतत संवेदना है |
मानवीकरण अलंकार है |
ii) प्रसंग : कतवता का नाम : 'कायर मत बन'
कतव : नरे न्द्र शमाष
संदर्भ : कतव मनुष्य को मनुष्यता का ध्यान रखने को कहते हैं । 1
र्ाव स्पष्टीकरण : कतव इसमें मानवता को अत्यतधक महत्व दे ते हुए दु ष्टों के सम्मुख
आत्मसमपषण न करने के तलए कहते हैं । हमेशा समझौता करके, हार के, ले-दे कर जीना,
जीना नहीं है । कब तक तुम दु ुः ख के आाँ सू पीते हुए, कष्ट सहते ही रहोगे? मानवता ने 2
तुमको सींचा है । इसतलए शत्रुओं से डटकर मुकाबला करने की बात कहते हैं |,
ववशेषता: कायरता छोडकर साहसी बनने का संदेश तमलता है ।
IV. अ) खण्ड - 'ग'
32) उपेन्द्रनाथ 'अश्क' द्वारा तलखखत 'सूखी डाली' एकां की में दादाजी की तरह बेला भी मुख्य
i) पात्र के रूप में उभरकर आती है । बेला के जररए लेखक ने सखम्मतलत पररवार में
आनेवाले समस्याओं की ओर इशारा तकया है । बेला नए जमाने की लडकी है । प्राचीन
परं परागत तवचारों से आगे आधुतनक तवचारों की ओर अग्रसर होती है । वह स्वच्छं द
स्वतंत्र तवचारों वाली लडकी है ।
बेला लाहौर के एक प्रतततष्ठत तथा सम्पन्न कुल की सुतशतक्षत लडकी है । तजसका
तववाह दादाजी के छोटे पोते परे श से होती है । नयी नवेली दु ल्हन बनकर जब दादाजी के
पररवार में उसका आगमन होता है तब उसे ससुराल के सभी सदस्यों के साथ तमल-
जुलकर रहने में बडी कतठनाई होती है । बेला को ससुराल से भी अतधक मायका ही अच्छा
लगता है । उसे ससुराल में कुछ भी अच्छा नहीं लगता । वहााँ के लोग, नौकर, उनका
रहन-सहन, खान-पान, पहनावा सब कुछ बेकार लगता है ।
5
बेला अपने काम में तकसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करती। समय नष्ट नहीं करना
चाहती। वह परे श को अलग घर बनाने के तलए कहती है । दादाजी, परे श और घर के
सभी सदस्यों को बेला का आदर करने का हुक्म दे ते हैं । तातक वह अलग घर बनाने के
बारे में न सोचे । घरवाले उसका आदर करने लगते हैं वास्तव में वह आदर नहीं चाहती।
सबके साथ तमलजुलकर काम करना चाहती है । जब बेला को पता चलता है तक यह सब
दादा जी के कहने पर हो रहा है तो वह भावावेश में दादा जी से कहती है - "दादाजी आप
पेड की तकसी डाली का टू ट कर अलग होना पसंद नहीं करते, पर क्ा आप चाहें गे तक
पेड से लगी-लगी वह डाली सूख कर मुरझा जाए। इसतरह बेला घर के सदस्यों के साथ
सखम्मतलत होती है ।"
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ii) अथवा
उपेन्द्रनाथ 'अश्क' द्वारा तलखखत 'सूखी डाली' एकां की में दादाजी मुख्य पात्र के रूप में
उभरकर आते हैं | दादाजी ने एक तवशेर् अतभप्राय से सभी को बुलाया था बेला को लेकर
घर में हलचल मरं थी। वह कमषचंद के जररए दादा जी को पता चलता है । हिी-सी
खरोंच भी, यतद उस पर तत्काल दवाई न लगा दी जाय, बढ़कर एक बडा घाव बन जाती
है और वही घाव नासूर हो जाता है , तश लाख मरहम लगाओ ठीक नहीं होता। यही कारण
है तक दादा जी समस्या शुरू होने से पहले ही उसको तमटाना चाहते हैं । पहले परे श को
मनाते हैं । तफर बाकी घर के सभी सदस्यों को बुलाकर समझाते हैं -
दादा जी को यह जान कर बडा दु ुः ख हुआ तक छोटी बहू का मन यहााँ नहीं
लगता। घर के सभी सदस्यों को खास कर इन्दु और माँझली बहू को समझाते हैं तक "बेला
घर में सबसे छोटी है इसतलए यहााँ उसका व्यखित्त्व दब कर रह गया है । बडा, वास्तव
में कोई उम्र से या दजे से नहीं होता । बडा तो बुखदद से होता है , योग्यता से होता है । छोटी
बहू उम्र में न सही अकल में हम सबसे तनश्चय ही बडी है । हमें चातहए तक उसकी बुखदद
से, योग्यता से लाभ उठायें । मेरी इच्छा है तक उसे यहााँ वही आदर सत्कार तमले जो उसे 5
अपने घर में प्राप्त था। सब उसका कहना माने उससे परामशष ले और मैं प्रसन्न हूाँ गा, यतद
उसका काम भी तुम लोग आपस में बााँ ट लो और उसे पढ़ने तलखने का अतधक अवसर
दो। उसे अनुभव ही न हो तक वह तकसी दू सरे घर में, या तकसी दू सरे वातावरण में आ
गयी है ।"
दादा जी और आगे समझाते हैं तक "यह कुटु म्ब एक महान वृक्ष है । हम सब
इसकी डातलयााँ हैं । डातलयों से ही पेड है और डातलयााँ छोटी हो या बडी सब उसकी छाया
को बढ़ाती हैं । मैं नहीं चाहता कोई डाली इससे टू टकर पृथक हो जाए। तुम सदै व मेरा
कहा मानते रहे हो। बस यही बात मैं कहना चाहता हूाँ । यतद मैंने सुन तलया तकसी ने छोटी
बहू का तनरादर तकया है , उसकी हाँ सी उडायी है या तफर उसका समय नष्ट तकया है , तो
इस घर से मेरा नाता सदा के तलए टू ट जाएगा अब तुम सब जा सकते हो ।”
आ)
33) i) 'प्रततशोध' एकां की 'डॉ. रामकुमार वमाष ' जी तलखखत एकां की है । इस एकां की में जब भी
भारतव शास्त्राथष में तवजयी होता था, तो उसके तपता श्रीधर पंतडत उसे सावषजतनक रूप
से अपमातनत करते थे। तजन पंतडतों को भारतव परातजत करता था, वे ही भारतव के स्वर
में बोलकर उसका पररहास करते थे । दो बार जब तपता ने सब पं तडतों के सामने भारतव
की तनन्दा की तो वह क्ोध और ग्लातन से ततलतमला उठा। वह घर नहीं लौट सका।
उसकी सारी तवजय की उमंग रसातल में चली गई। उसने समझ तलया तक जब तक
उसके तपता वतषमान हैं तब तक इसी प्रकार अपमातनत होना पडे गा । वह सोचने लगा
तक तपता को पुत्र की उन्नतत से प्रसन्नता होनी चातहए, तकन्तु तपता को उसकी उन्नतत से
अप्रसन्नता होती है । उसे लगा तक तपता को उसमें दोर् ही दोर् दीख पडते हैं । तवद्वत्मंडली 4
में सभी पंतडतों के सामने उसका अपमान उसे शूल की भााँ तत खटक रहा था। फलस्वरूप
तपता के प्रतत भारतव का क्ोध अखन्तम सीमा तक पहुाँ च गया और उसने तपता से बदला
लेने का तनश्चय तकया।
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ii) 'प्रततशोध' एकां की 'डॉ. रामकुमार वमाष ' जी द्वारा तलखखत एक सां स्कृततक एकां की है ।
इसमें समाज के तवतभन्न पहलुओं को यथाथषपूणष ढं ग से प्रस्तुत तकया गया है । लेखक
समाज में व्याप्त अन्याय और संघर्ों को तदखाने का प्रयास करते हैं । उनका उ्द्देश्य
दशषकों में सामातजक बुराइयों के प्रतत जागरूकता पैदा करना, और सही व गलत के
बीच तववेकपूणष तनणषय लेने के तलए प्रोत्सातहत करना है । एकां की में यह भी तदखाया गया
है तक लोग अच्छे पैदा होते हैं लेतकन जीवन के तकसी न तकसी मोड पर वे तकसी
कारणवश बुरे बन जाते हैं । मन में बसी घृणा उन्ें अन्याय के मागष पर अग्रसर करती है।
लेतकन घृणा प्रेम से अतधक बलवान नहीं होती। प्रेम के आगे उसे हार मानना ही है ।
इन्ीं तवचारों को लेखक ने संस्कृत के महाकतव भारतव के जीवन की घटनाओं
के वणषन के माध्यम से व्यि तकया है । सफलता के तशखर पर पहुं चे पुत्र के अंदर पल
रहे अहं कार के भाव से तपता श्रीधर तचंततत होते हैं । क्ोंतक अहं कार उन्नतत में बाधक है ।
पुत्र के अहं कार को तोडने के उद्दे श्य से पंतडतों के सामने ताडना दे ते हैं । इससे
अपमातनत होकर भारतव अपने तपता को शत्रु मान बैठता है और तपतृ -हत्या रूपी पाप
करने का तनणषय ले लेता है । परं तु जब उसे तपता के प्रेम का पररचय तमलता है तब उसे 4
पश्चाताप होने लगता है । इस प्रकार उसके अंदर की घृणा तपता के प्रेम के आगे हार जाती
है । अपने कलुतर्त तवचारों के कारण ग्लातन से भरकर प्रायतश्चत करने के तलए तत्पर होना
भी समाज के सामने गलती को स्वीकारने के आदशष को प्रस्तुत करता है । श्रीधर के चररत्र
से तपता का आदशष रूप व्यि होता है । इस प्रकार 'प्रततशोध' एकां की का उद्दे श्य समाज
के तहत में पाया जाता है ।
खण्ड - 'घ'
V. अ) 1
i) आप यहााँ से वहााँ जाइए | / तुम यह ाँ से वह ाँ जाओ ।
34) 1
ii) एकता में बडी शखि है ।
1
iii) यह एक ऐवतहावसक घटना है ।
आ) i) शीला कपडे धो रही है । / शीला कपडे धोती है । 1
35) 1
ii) भुवन गाना गाता था | / भुवन ने गाना गाया। / भुवन गाना गा रहा था |…
1
iii) माली पौधों को पानी दे गा।
इ) 1
i) भैंसा 1
36)
ii) चूहा 1
iii) पंतडत
1
ई)
i) दै तनक 1
37)
ii) वैद्य / तचतकत्सक 1
iii) हस्ततलखखत / हस्तप्रतत / पां डुतलतप
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उ) i) अकमष / सुकमष / कुकमष / दु ष्कमष / सत्कमष… 1
38) ii) प्रशासन / अनुशासन / कुशासन / सुशासन 1
ऊ) i) महत्व +पूणष 1
39) ii) राष्टर +ईय 1
VI. अ) i) एकाग्रता | 1
40) 1
ii) मन भटकने से तकया गया कायष अधूरा, त्रुतटपू णष और अतधक समय लेने वाला बन
जाता है ।
1
iii)योग, ध्यान और तनयतमत अभ्यास से एकाग्रता बढ़ती है ।
1
iv) मानतसक पूंजी |
आ)
प्रस्तावना 1
41) i)
वववरण: मनोरं जन के साधन, महत्व, लाभ, हातन, 2
उपसंहार 1
ii) स्थान, वदनांक, संबोधन और अवर्वादन 1
पत्र का ववषय 2
1
समापन- हस्ताक्षर
इ) i) कल महीने का अंततम/ आखखरी तदन है |
42) ii) मैं मंगलूर में एक साल था / थी | 1
1
iii) क्ा हम मोबाइल फोन के तबना जी नहीं सकते? 1
******************
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